बिग 0 पर चुप्पी क्यों

तनु के विवाह को 6 महीने हो गए थे. वह मायके आई हुई थी. विवाह के बाद अनुभव पूछते हुए उस की हमउम्र भाभी रेखा उस के साथ छेड़छाड़ करने लगी.

तब तनु ने बुझे स्वर में कहा, ‘‘मुझे तो कुछ अच्छा नहीं लगता. सब बोरिंग ही लगता है.’’

सुन कर रेखा हैरान हुई. फिर विस्तार से खुल कर बात करने पर रेखा को महसूस हुआ कि तनु ने अब तक चरमसुख का आनंद लिया ही नहीं है. सैक्स उसे एक रूटीन की तरह लग रहा है कि बस, पति का साथ देना, चाहे अच्छा लगे या बुरा.

रेखा अपनी एक रिश्तेदार डाक्टर मीनाक्षी से बात कर तनु को उन के पास ले गई. दोनों को अकेले छोड़ वहां से हट गई. डाक्टर ने बातोंबातों में उसे और्गेज्म के बारे में समझाया तो तनु झिझकती हुई सब बातें सुनतीसमझती रही. अगली बार मायके आने पर जब उस का खिला, चमकता चेहरा देख रेखा ने फिर आंखों ही आंखों में शरारती सवाल पूछा तो तनु शरमा कर हंस दी. तब रेखा को तसल्ली हो गई कि अब उस की ननद शारीरिक और मानसिक रूप से वैवाहिक जीवन का पूरापूरा आनंद ले रही है.

सैक्स की हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका है. विशेष रूप से महिलाएं स्वयं को बहलाती हैं कि मजबूत रिश्ते के लिए अच्छा सैक्स जरूरी नहीं है. उन के लिए यह पार्टनर से जुड़े रहने के लिए ही है.

25 वर्षीय कविता का कहना है, ‘‘मेरा पार्टनर आसानी से उत्तेजित हो जाता था, जबकि मेरा मूड बनने में काफी समय लगता था. मैं उसी के लिए सैक्स करती थी. हर बार मुझे खाली और अधूरा लगता था.’’

फोरप्ले के महत्त्व के बारे में बताते हुए कंसल्टैंट मनोवैज्ञानिक हेल्थेनबेर इंडिया से अदिति आचार्य का कहना है, ‘‘जहां 90% पुरुष शारीरिक संबंध में चरमसुख का अनुभव करते हैं वहीं 30% महिलाओं ने अपने जीवन में चरमसुख का अनुभव कभी किया ही नहीं है. एक महिला को मानसिक रूप से इस खेल में शामिल होने में समय लगता है. 15 से 40 मिनट लगते हैं.’’

फुट स्पा, बौडी मसाज से यौवन, सौंदर्य वृद्धि होती है पर यह सब करवाना रोज तो

संभव नहीं हो सकता न? ‘द और्गेज्म आंसर गाइड’ में मनोवैज्ञानिक कैरल रिंकलेव एलिसन के द्वारा किए गए अध्ययन में एलिसन ने 23 से 90 साल उम्र की 2,632 महिलाओं का इंटरव्यू लिया था, जिस में पता चला था कि इन में से 39% ने ही स्वयं को रिलैक्स करने के लिए इस का आनंद उठाया है. विशेषज्ञ इस का श्रेय औक्सिटोसिन हारमोन को देते हैं. मनोवैज्ञानिक और सैक्सोलौजिस्ट डा. श्याम मिथिया बताते हैं, ‘‘जब एक महिला उत्तेजित होती है, तो औक्सीटोसिन नामक फीलगुड हारमोन हाइपोथेलेमस में नर्व्स सैल्स से खून में प्रवाहित होता है. औक्सीटोसिन न सिर्फ तनाव कम करता है, बल्कि जोश और आराम की भावना भी उत्पन्न करता है. यह रिश्ते को मजबूत करता है.’’

बिग 0 (चरमसुख) से शरीर को लाभ ही लाभ है. इस से यौनांगों में बेहतर रक्तप्रवाह होता है, शरीर को प्राकृतिक डिटौक्सीफिकेशन होता है, संतानोत्पत्ति की क्षमता बढ़ती है, याद्दाश्त सुधरती है, रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, स्वस्थ ऐस्ट्रोजन हारमोन का स्तर बढ़ता है. यह औस्टियोपोरोसिस, हृदयरोग और स्तन कैंसर से भी सुरक्षा करता है.

37 वर्षीय अध्यापिका कविता गोयल कहती हैं, ‘‘चाहे दिन कितना भी खराब बीते, मैं और मेरे पति लगभग प्रतिदिन अच्छे सैक्स का आनंद उठा कर ही सोते हैं. यह एक ऐस्प्रिन खाने से तो अच्छा ही है और जब आप हर सुबह चेहरे की प्राकृतिक चमक के साथ उठें तो मेकअप की भी क्या जरूरत है.’’

चरमसुख के दौरान उत्पन्न होने वाले ऐंडोर्फिंस हारमोन सिरदर्द, मासिक उथलपुथल, आर्थ्राइटिस के लिए दर्दनिवारक का काम करते हैं.

आप ने कभी सफल, आनंददायक सैक्स के बाद अपने चेहरे की चमक देखी है? उस का श्रेय डीएनईए को जाता है. यह हारमोन त्वचा की चमक बढ़ाता है, नष्ट हुए टिशूज की मरम्मत करता है और त्वचा को जवान बनाए रखता है. यह हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाता है. काफी अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि जो लोग हफ्ते में कम से कम 3 बार शारीरिक संबंध बनाते हैं वे अपनी उम्र से 10 साल छोटे लगते हैं. सैक्स कोच आनंदिति सेन कहती हैं, ‘‘अरोमाथेरैपी वाली कैंडल्स के बारे में सोचो, लाइट्स हलकी करो, आंखें बंद कर के कल्पना के घोड़ों को दौड़ने दें.’’

फिल्मों में महिलाओं को सैक्सुअल आनंद में ही लीन दिखाया जाता है, जबकि वास्तविकता में 20% महिलाएं ही चरमसुख को पाती हैं. तो क्या अच्छी सैक्स लाइफ न होने से आप का रिश्ता प्रभावित होता है? इस संबंध में फिटनैस ट्रेनर शिवानी जोशी का कहना है, ‘‘बिलकुल. पार्टनर का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है. उसे साफसाफ बताना बहुत जरूरी है कि आप को क्या अच्छा लगता है क्या नहीं.’’

तो सारी चिंताएं, संदेह छोड़ कर पार्टनर के साथ सैक्स का आनंद लें. इसे बोझ नहीं, तनमन के लिए एक औषधि की तरह समझें. इस का अनुभव कर प्राकृतिक रूप से स्वस्थ और सुखी रहें. पुरानी मानसिकता से बाहर निकलें, पार्टनर को अपनी पसंदनापसंद, इच्छाअनिच्छा बताएं और खुल कर जीएं.              

आज भी पापा से डरता हूं: सनी देओल

शरमीले स्वभाव वाले सनी देओल सिल्वर स्क्रीन पर हमेशा रोबीले अंदाज में नजर आते हैं, उन्हें फिल्मों में रोमांस करते कम ढाई किलोग्राम का हाथ दिखाते ज्यादा देखा जाता है. उनका जोशीला अंदाज और रोबीले डायलौग सुनने के लिए ही प्रशंसक उन की फिल्में पसंद करते हैं.

सनी देओल बौलीवुड के उन नायकों में से हैं, जिन्हें उतनी चर्चा नहीं मिली, जितनी के वे हकदार हैं. 1983 में फिल्म ‘बेताब’ से बौलीवुड में ऐंट्री करने वाले सनी ने लंबे समय तक अपने ऐक्शन से दर्शकों को दीवाना बनाए रखा. 

सनी के काफी समय से डगमगाते कैरियर को इस साल आई उन की फिल्म ‘घायल वंस अगेन’ से थोड़ी राहत मिली है, जिस में उन्होंने पटकथा लेखन से ले कर निर्माता, निर्देशक, अभिनेता सभी की जिम्मेदारी निभाई. 

सनी का आज भी ऐक्शन भूमिकाओं वाली फिल्मों में काम करने और अपने बेटे करण को बौलीवुड डेब्यू कराने को ले कर एक इवेंट के मौके पर विस्तार से चर्चा हुई. पेश हैं, कुछ खास अंश:

खुद को निर्देशित करना टेढ़ा काम 

खुद का निर्देशन करने के सवाल के जवाब में सनी कहते हैं, ‘‘यह वास्तव में बड़ा मुश्किल काम है. मैं ऐक्टिंग तो आसानी से कर लेता हूं, क्योंकि शौट देने के बाद निर्देशक की आंखों से ही मैं समझ जाता हूं कि शौट सही गया या नहीं. पर अपनेआप को निर्देशित करना बड़ी टेढ़ी खीर है.

अपना शौट देने के बाद मुझे अपनी टीम के फीडबैक पर डिपैंड होना पड़ता था. अगर टीम की फीडबैक सही हुई तो शौट अच्छा हो जाता था. अगर टीम में ही अच्छेबुरे की परख रखने वाले न हों तो फिल्म का क्या होगा सहज कल्पना की जा सकती है.

‘‘बतौर डायरैक्टर काम करने के लिए काफी ऐनर्जी की जरूरत होती है. एक बार कैमरे में देखना फिर मौनीटर में, यह सब बहुत मुश्किल भरा होता है. मेरे साथ तो कई बार ऐसा भी हुआ जब डायरैक्शन को ले कर मैं अपनों से ही लड़ पड़ता था, तो कभी खुद में उलझा महसूस करता था.

जब मैंने ऐक्टिंग की शुरुआत की थी मैं कालेज पास कर के ही निकला था. मेरी पहली फिल्म ‘बेताब’ के निर्देशक राहुल रवैल और मेरी उम्र में ज्यादा अंतर नहीं था. मैंने उन से परदे के पीछे की दुनिया के बारे में बहुत कुछ सीखा.

‘‘इस के बाद जब 1999 में फिल्म ‘दिल्लगी’ को निर्देशित किया तो आत्मविश्वास बढ़ता गया और फिल्म ‘घायल रिटर्न’ में मुझे लगा कि जो कहानी मैं लोगों को दिखाना चाहता हूं, अगर उसे खुद ही बनाऊं तो उसे अच्छी तरह लोगों के सामने ला पाऊंगा.’’

अब बेटे की बारी है

अपने बेटे करण को फिल्मों में लौंच करने के सवाल पर वे बताते हैं कि मेरे पापा ने मुझे फिल्म ‘बेताब’ से और बौबी को फिल्म ‘बरसात’ से बौलीवुड डेब्यू करवाया था. मैं भी करण के लिए एक रोमांटिक फिल्म बनाने की तैयारी कर रहा हूं.

जल्द ही आप लोगों के सामने देओल परिवार की नैक्स्ट जैनरेशन होगी. उसे भी हमारे प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले रिलीज किया जाएगा. मैं खुश हूं कि अब मेरे बेटे की बारी आ रही है. उम्मीद है कि वह अच्छा काम करेगा. वह अभी से मेहनत कर रहा है. हम ने उसे यह समझा दिया है कि मेहनत से बढ़ कर कुछ नहीं.

वह अपने पापा को 58 साल की उम्र में मेहनत करते और ऐक्शन वाली भूमिकाएं करते देख खुश होता है. उस के दादाजी ने भी 60 साल की उम्र तक कई ऐक्शन फिल्में की हैं.

अब भी डरता हूं

पापा इतने जौली नेचर के हैं, फिर भी मैं आज भी उन से डरता हूं. शायद यह हमारी खानदानी परंपरा चली आ रही है कि पिताजी अपने पिताजी से डरते थे और हम अपने पिताजी से. उन की हमेशा इच्छा होती है कि हम उन के साथ बैठ कर बातें करें. लेकिन लिहाज के चलते है हम उन के साथ अधिक देर नहीं बैठ पाते. मेरे बेटे के साथ भी मेरा ऐसा ही रिश्ता है. लेकिन एक बात अपने बेटे को जरूर समझाई है कि हमेशा जमीन से जुड़े रहना. यही बात मेरे पापा ने हमें सिखाई थी.

मेरी पहली फिल्म मुझे याद है, जब मैं ने ऐक्टिंग की शुरुआत की थी. मैं नया नया कालेज से आया

था. शूटिंग पर कभी तैयारी से नहीं आता था. लेकिन वहां मौजूद सभी अपने सीनियर्स से कुछ न कुछ सीखने की कोशिश में लगे रहते थे. मैं ने जब ‘बेताब’ की थी तब मुझे खास कुछ भी पता नहीं था कि फिल्में बनती कैसे हैं. हां, मगर दिलचस्पी बहुत थी. चूंकि पापा को हमेशा देखता आया था तो रुझान तो था ही.

आज के बच्चे जब आते हैं तो वे मेकअप को ही सब कुछ समझ लेते हैं. सिर्फ सिक्स पैक बौडी को ले कर सोचते हैं कि यही अभिनय है. ऐक्टिंग छोड़ कर यही सब उन की फिल्म के लिए तैयारी होती है.

मेहनत करना शुरू से पसंद

मेरे दिन की शुरुआत आज भी जिम और खेल के मैदान से होती है. आज भी मुझे जल्दी उठ कर सारा काम निबटाने की आदत है. आज भी मैं एक भी दिन मिस नहीं करता हूं जब मैं ऐक्सरसाइज न करूं. अगर मैं लेट नाइट शूट से भी लौटता हूं तब भी डेली रूटीन वही रोज वाला रहता है.

मैं मानता हूं कि मुझे यहां तक पहुंचाने में स्पोर्ट्स का बहुत बड़ा योगदान है. मेरी शुरू से इच्छा थी कि मैं स्पोर्ट्स पर फिल्म बनाऊं. हम ने काफी कुछ सोचा था. बातें भी हुई थीं. लेकिन फिर बाद में हम बना नहीं पाए और अब तो काफी फिल्में बन चुकी हैं. मैं फुटबौल, क्रिकेट, बास्केटबौल सब खेला करता था और शायद इसीलिए आज भी शरीर में फुरती है. मुझे याद है मैं ने और शेखर कपूर ने तय किया था कि हम मिल कर स्पोर्ट्स पर फिल्म बनाएंगे और उसे बनाने के लिए जीपी सिप्पी ने हां भी कर दी थी पर फिर न जाने वे किस कारण पीछे हट गए और फिल्म नहीं बन पाई.

रोमांस की कोई उम्र नहीं होती

सनी के हमउम्र कई अभिनेताओं ने अपनी भूमिकाएं बदल दी हैं. अनिल और जैकी श्रौफ अब पिता की भूमिका निभा रहे हैं. फिल्म ‘घायल वंस अगेन’ में भी सनी ने एक मजबूर पिता की भूमिका निभाई है. भविष्य में क्या इस तरह की भूमिकाएं करते रहेंगे या रोमांस वाला करैक्टर भी करेंगे? के सवाल पर वे बताते हैं, ‘‘अगर किरदार अच्छा मिला तो जरूर रोमांस वाली भूमिकाएं करूंगा. अभी इतनी भी उम्र नहीं हुई है कि मैं रोमांस न कर सकूं. हमारी इंडस्ट्री में तो आज सभी 50 के ऊपर वाले ही रोमांटिक फिल्में कर रहे हैं.’’

लोगों को मेरे साथ काम करने में परेशानी

बौलीवुड में किसी दूसरे अभिनेता के साथ सनी की जोड़ी आज तक नहीं बन पाई है. वैसे सलमान खान के साथ वे काम करने की इच्छा रखते हैं पर कहते हैं कि पहले ऐसी स्क्रिप्ट तो लिखी जाए जिस में हम दोनों फिट हो सकें. वैसे मैं यह जानता हूं कि इंडस्ट्री में कोई मेरे साथ काम नहीं करना चाहेगा. इस में मुझे कोई प्रौब्लम नहीं है.

कहां तक बचेंगे आप

फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ पर सैंसर की दादागीरी पर हाई कोर्ट की फटकार के बाद क्या उन की फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ भी सैंसर से मुक्त होगी? सवाल के जवाब में वे बताते हैं, ‘‘कोर्ट के तेवर देख कर तो यही लगता है कि शायद फिल्म रिलीज हो जाए. मेरा मानना है कि सैंसर बोर्ड का काम फिल्मों को सर्टिफिकेट देना का होना चाहिए, उन्हें बैन करने का नहीं.

मैं यह भी मानता हूं कि अगर सैंसर बोर्ड न हो तो लोग आजादी का गलत फायदा उठाएंगे. लेकिन हमारे देश में स्वतंत्र हो कर फिल्में बनाना संभव नहीं है. जब आप कोई ऐसी फिल्म बनाते हैं, जो सत्य तथ्यों पर आधारित हो या समाज को संदेश देने वाली हो तो कभी उस के आड़े धर्म आता है, कभी जाति आती है तो कभी समाज. आप कहां कहां तक बचेंगे इस से. कला की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धीरेधीरे खत्म हो रही है.’’

क्या है फीमेल फैन्स से शाहरुख की डिमांड

शाहरुख खान को किंग ऑफ रोमांस ऐसे ही नहीं कहा जाता. साधारण बातों को भी वो इस ढंग से पेश करते हैं, कि रोमांस का अहसास उसमें खुद-ब-खुद शामिल हो जाता है.

शाहरुख इस समय एम्सटर्डम में इम्तियाज अली की फिल्म ‘द रिंग’ की शूटिंग कर रहे हैं, जहां रात में भी शूटिंग चल रही है. एम्सटर्डम की रातें सर्द होती हैं. लिहाजा शाहरुख ने अपने फैंस से दिलचस्प गुजारिश की है.

शाहरुख ने ट्वीट किया है, ”एम्सटर्डम की सर्द रात में शूट. गर्म रहने के लिए लड़कियां मुझे हग भेजें. लड़के लेदर जैकेट कूरियर कर सकते हैं.”

शाहरुख की ये डिमांड पूरी होगी ये तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन ह्यूमर में लिपटा उनका रोमांटिक अंदाज फैंस को जरूर पसंद आएगा. एम्सटर्डम से पहले शाहरुख फिल्म का प्रोग्राम शेड्यूल पूरा कर चुके हैं. फिल्म में अनुष्का शर्मा फीमेल लीड रोल निभा रही हैं.

साक्षी मलिक के बायोपिक में काम करना चाहती हैं सोनाक्षी

अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा का कहना है कि वह ओलंपिक पदक विजेता पहलवान साक्षी मलिक के जीवन पर आधारित फिल्म करने की इच्छुक हैं.

सोनाक्षी ने कहा, यदि कोई मुझे साक्षी मलिक के जीवन पर आधारित फिल्म की पेशकश करे तो मैं इसे करना चाहूंगी. वहीं साक्षी मलिक ने भी कहा कि मैं एक सबल लड़की हूं. उन्होंने अपने जीवन पर आधारित फिल्म करने की सहमति भी दी है.

धोनी की फिल्म में कौन बना है ‘विराट’

ऐ दिल है मुश्किल से पहले फवाद खान की एक और बॉलीवुड फिल्म रिलीज होने वाली है. यह फिल्म कोई पाकिस्तानी फिल्म नहीं बल्की बॉलीवुड की एक चर्चित रिलीज है. जी हां यह फिल्म कोई और नहीं बल्कि स्टार क्रिकेटर धोनी की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘एम.एस धोनी: द अन टोल्ड स्टोरी’ है.

इस फिल्म में जहां सुशांत सिंह राजपूत धोनी के रोल में नजर आ रहे हैं. वहीं इस फिल्म में फवाद खान विराट कोहली के रोल में नजर आने वाले हैं. मतलब कि फवाद फैन्स को अपने स्टार को स्क्रीन पर देखने के लिए 28 अक्टूबर तक का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. 30 सितंबर को रिलीज हो रही इस फिल्म फवाद स्टार क्रिकेटर के रोल में दिखने वाले हैं.

जिस वक्त फिल्म की शूटिंग चल रही थी तब भी खबरें आई थीं कि फवाद फिल्म मे विराट कोहली का रोल कर रहे हैं. लेकिन फिल्म ट्रेलर रिलीज होने के बाद और इसकी प्रमोशन शुरू होते ही इन खबरों ने दम तोड़ दिया क्योंकि कहीं भी फवाद का नाम सामने नहीं आ रहा था.

ट्रेलर में भी लीड रोल प्ले कर रहे सुशांत ही अलग-अलग अंदाज में दिखे. लेकिन फवाद की एक झलक भी नहीं थी. लेकिन अब ये खबर फिल्म से जुड़े एक सोर्स ने बताई है कि इसमें फवाद भी नजर आने वाले हैं. जब उनसे पूछा गया कि फिल्म में कौन किसका किरदार निभा रहा है तो उन्होंने कहा जहां तक मुझे पता है फवाद खान विराट कोहली का किरदार निभा रहे हैं.

हाल ही में इस फिल्म का एक गाना भी रिलीज हुआ है. यह गाना फिल्म ‘MS Dhoni: The Untold Story’ का थीम सॉन्ग ‘हर गली में धोनी है’ है. 21 सितंबर को यह गाना यूट्यूब पर आ गया है. न सिर्फ गाने के बोल शानदार हैं बल्कि वीडियो भी ऐसा है जो आपको पूरी तरह धोनी के रंग में रंग जाता है.

फिल्म भले ही 30 सितंबर को रिलीज होने जा रही है लेकिन इसका बुखार अभी से दर्शकों के सर चढ़ कर बोल रहा है. फिल्म का टीजर बेहद दमदार था, और इसके बाद जब ट्रेलर आया तो इन्होंने फिल्म को देखने के लिए दर्शकों की जिज्ञासा और अधिक बढ़ा दी. मेकर्स लगातार फिल्म के टीजर्स रिलीज कर रहे हैं ताकि रिलीज डेट तक दर्शकों की दिलचस्पी फिल्म में बनी रहे.

छोटे पर्दे से बड़े पर्दे तक का सफर तय कर चुके अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत स्टारर इस फिल्म को डायरेक्टर नीरज पांडे ने निर्देशित किया है. रोचक कोहली का यह गाना कुछ ऐसा है कि इसके बहुत जल्द फैन्स के जुबान पर चढ़ जाने की उम्मीद है. मनोज मुंताशिर ने गाने को लिखा है और अरमान मलिक ने कंपोज किया है. यदि गाने के वीडियो के बारे में आपको और बताएं तो किस तरह धौनी के फैन्स गली-गली में उनके क्रिकेट शॉट्स से लेकर उनके चाल ढाल और विकेट कीपिंग के अंदाज को कॉपी करते हैं इसे बखूबी फिल्माया गया है.

इन आदतों से झट उतर जाएगा चश्मा

कम उम्र में आंखों पर चश्मा चढ़ जाना एक मुसीबत बन जाता है. उम्र लग जाती है चश्मा हटाने में. कुछ लोग तो कामयाब हो जाते हैं बाकी को जीवन भर चश्मा चढ़ा कर रखना पड़ता है. ऐसे में अगर कोई आसान उपाय मिल जाए जिससे आंखों की रोशनी को बचाया जा सके तो इससे बेहतर कुछ नहीं.

आंखों पर चश्मा खराब खान पान, उम्र बढ़ने या फिर आंखों पर ज्यादा तनाव बढ़ने की वजह से चढ़ता है. कुछ लोगों में ये समस्या जेनेटिक भी होती है. लेकिन इन सब के बावजूद थोड़ी सी कोशिश करके इससे निपटा जा सकता है.

आंखों की कमजोरी से निपटने के लिए कुछ आसान कसरत हैं जिसे आप कुर्सी पर आराम से बैठकर भी कर सकते हैं.

– एक पेंसिल को आंखों के सामने एक हाथ की दूरी पर रखें और उसे देखते रहें. फिर उसे धीरे-धीरे नाक के पास लाएं. पेंसिल  जैसे-जैसे पास आएगी, उतना ही इससे फोकस खत्म होगा. इसे दिन में कम से कम 10 बार दोहराएं.

– दूसरी कसरत है आंखों को कुछ सेकेंड के लिए क्लॉकवाइज घुमाएं और कुछ देर के लिए एंटी क्लॉकवाइज घुमाएं. इसे 4 से 5 बार दोहराएं.

– दिन का कुछ समय सूरज की रोशनी में बिताएं. कुछ देर आंखें बंद करके सूरज की रोशनी के सामने खड़े हो जाएं. इससे आखों को आराम मिलेगा साथ ही हीलिंग भी होगी.

– इसके अलावा एक तरीका है दोनों हाथों को रगड़ें जिससे हथेली गर्म हो जाएंगी और हल्के हाथों से दोनों आंखों को कवर करें. ध्यान रहे आंखों को पूरी तरह से कवर करें, रोशनी ना जाने पाए. इसे दिन में कई बार करें, फायदा होगा.

आंखों के लिए बादाम खाना सबसे बेहतर होता है. रात में 4 से 5 बादाम पानी में भिगो दें. इसके छिलके उतार कर इसे गर्म दूध के साथ लें. रोजाना बादाम खाने से आंखों की रोशनी बढ़ेगी साथ ही इससे याददाश्त भी मजबूत होती है.

फैशन में चोटी

अंगरेजी में एक मुहावरा है ‘फैशन रिपीट इट सैल्फ’. हेयरस्टाइल फैशन के मामले में भी यह एकदम सटीक बैठता है. यही वजह है कि जहां एक तरफ इंगलिश हेयरस्टाइल ने महिलाओं को दीवाना बना रखा है और अधिकतर महिलाओं को शॉर्ट हेयर रखने का शौक बढ़ा है, तो वहीं दूसरी तरफ वैस्टर्न कल्चर और फैशन के रंगढंग में रंगी महिलाओं को लंबे बाल भी लुभाने लगे हैं. इसकी बड़ी वजह है स्टाइलिश चोटियों का फिर से फैशन में आना.

चोटियों में सब से अधिक फिश टेल का क्रेज महिलाओं में दिख रहा है. इसकी वजह है बॉलीवुड अभिनेत्रियों द्वारा मूवीज, पार्टीज और अवार्ड फंक्शन में फिश टेल में दिखाई पड़ना. फिश टेल बनाना बेहद आसान है और इसे खुद ही बनाया जा सकता है. इस के लिए बालों को एक तरफ कर के 2 हिस्सों में विभाजित कर लें. अब दोनों हिस्सों से कुछ बाल ले कर गूथें. फिश टेल कम बालों में भी अच्छी लगती है. वैसे फिश टेल के अतिरिक्त वाटर फाल, डच टेल, फ्रैंच टेल और ब्रैंडेड टॉप नौट भी काफी चलन में हैं.

हेयर एक्सपर्ट प्रिसिला कहती हैं, ‘‘चोटियां अब सिर्फ ट्रैडिशनल हेयरस्टाइल नहीं रह गईं. अब महिलाएं वैस्टर्न आउटफिट में भी स्टाइलिश चोटी करना पसंद करती हैं. चोटी से दरअसल 2 फायदे होते हैं, पहला यह कि चोटी ट्रैंडी लुक देती है और दूसरा इस से बाल व्यवस्थित रहते हैं.’’

दीपिका पादुकोण की फैवरेट फिश टेल

– बालों को 2 हिस्सों में बाटें.

– अब दोनों हिस्सों से थोड़ेथोड़े बाल ले कर गूंथें.

– 1-2 बार गूंथ लेने के बाद अपनी ग्रिपिंग को थोड़ा कसें.

– ध्यान रखें दोनों तरफ से बराबर हिस्सा ले कर गूंथें.

– दोनों हिस्सों को अंत तक गूंथें यदि बाल निकलने लगें तो वहीं इलास्टिक से बाल बांध लें.

– यदि रियल फिश टैक्सचर देना चाहती हैं तो चोटी में से कुछ लटें निकाल लें और हेयर स्प्रे से बालों को सेट करें.                                          

क्या आप जानती हैं फिश टेल बनाना?

प्रिसिला से जानें

बालों में अच्छी तरह से कंघी करें और उलझे बालों को सुलझाएं.

– चोटी बनाने के पूर्व बालों को नियंत्रित करना आवश्यक है. इसलिए बालों में सिरम, हलका तेल (केयो कार्पिन)या पानी बेस्ड जैल जैसे स्टाइलिंग प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करें. इस से चोटी में अच्छी फिनिशिंग आती है.

– स्टाइलिंग प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल जरूरत भर ही करें खासकर हेयर जैल का, क्योंकि इस से चोटी कड़ी हो जाती है.बेहतर है हलका तेल (केयो कार्पिन) इस्तेमाल करें.

– चोटी को अधिक सफाई से बनाने के लिए पिन टेल कौंब से पार्टिंग करें.

– अपनी चोटी को घना दिखाने के लिए चोटी के लिए बालों का सैक्शन करें और बैककौंबिंग करें.

कॉर्नर

हेयर एक्सपर्ट प्रिसिला

डा. कायनात काजी को बेस्ट हिंदी ब्लॉगर का अवार्ड

फोटोग्राफर, ट्रेवल राइटर और ब्लॉगर डा. कायनात काजी को देश के प्रतिष्ठित न्यूज चैनल एबीपी न्यूज के बेस्ट हिंदी ब्लॉगर अवार्ड से सम्मानित किया गया है. डा. कायनात काज़ी जितना अच्छा लिखती हैं, उतनी अच्छी फोटोग्राफी भी करती हैं. हिंदी साहित्य में पीएचडी कायनात एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर हैं. राहगिरी (rahagiri.com) नाम से उनका हिंदी का प्रथम ट्रेवल फोटोग्राफी ब्लॉग है. इसी के लिए एबीपी न्यूज ने उन्हें बेस्ट हिंदी ब्लॉगर का अवार्ड दिया है.

कायनात कहती हैं, “फोटोग्राफी के दौरान मैंने महसूस किया कि ट्रेवेल ब्लॉग भी बहुत सारे हैं और फोटोग्राफी के भी खूब ब्लॉग हैं. लेकिन हिंदी में एक भी ब्लॉग ऐसा नहीं है जिसमें कंटेंट भी अच्छा हो और फोटोग्राफ भी उम्दा. मैंने सोचा क्यों न इस कमी को पूरा किया जाए? इसमें मेरा लेखक और फोटोग्राफर होना काम आया और इस तरह से हिंदी के पहले ट्रेवल फोटोग्राफी ब्लॉग “राहगिरी” का उदय हुआ.”

फोटोग्राफी और लेखन के लिए डा. कायनात काजी को इससे पहले भी कई पुरस्कार मिल चुके हैं. वह यायावर और घुमक्कड हैं. फोटोग्राफी कायनात का जुनून है और भ्रमण उनका शौक. कायनात कहती हैं, “यात्रा और फोटोग्राफी के लिए मैं हमेशा अपना एक बैग तैयार रखती हूं. एक सोलो फीमेल ट्रेवलर के रूप में मैं महज तीन वर्षों में ही देश-विदेश में करीब 80 हजार किलोमीटर की दूरी नाप चुकी हूं.”

कायनात के पास विभिन्न विषयों पर करीब 25 हजार फोटो का कलेक्शन भी है. उनकी नई दिल्ली के इंडिया हैबीटेट सेंटर सहित कई अन्य जगहों पर फोटो प्रदर्शनियां लग चुकी हैं. एमबीए करने के साथ-साथ उन्होंने प्रतिष्ठित जागरण इंस्टीट्यूट आफ मॉस कम्यूनिकेशन से पत्रकारिता की पढ़ाई भी की है. कई मीडिया संस्थानों में काम भी किया. लेकिन मन नहीं रमा तो सब कुछ छोड़ कर फोटोग्राफी और लेखन में जुट गईं.

उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में जन्मी कायनात बचपन में फोटोग्राफर बनकर दुनिया को नापने का सपना देखा करती थीं. लेकिन तब पढ़ाई और करियर के चक्कर में यह सपना धरा ही रह गया. कायनात बताती हैं, “मेरे अब्बू बहुत अच्छे फोटोग्राफर थे. जब मैंने होश संभाला तो सबसे पहले अब्बू के हाथ में ही कैमरा देखा. अब्बू के साथ मैं साल में कई दफा घूमने जाया करती थी. अब्बू घूमते कम और फोटोग्राफी ज्यादा करते. बस यहीं से मुझे भी फोटोग्राफी का चस्का लग गया. पहला कैमरा मुझे अब्बू ने ही खरीद कर दिया था.” करीब चार साल पहले कायनात ने प्रसिद्ध फोटोग्राफर डा. ओपी शर्मा से फोटोग्राफी के गुर सीखे. फिर दुनिया नापने निकल पड़ी. हाल ही में वह यूरोप यात्रा करके भी लौटी हैं.

कायनात कहानीकार भी हैं और साहित्य की शोधार्थी भी. कृष्णा सोबती पर लंबे शोध के बाद उन्होंने “कृष्णा सोबती का साहित्य और समाज” नाम से एक किताब लिखी है. कॉलेज के दिनों में ही उनकी कई कहानियों का आकाशवाणी पर प्रसारण हो चुका है. जल्दी ही उनका कहानी संग्रह “बोगनबेलिया” भी प्रकाशित होने वाला है. फिलहाल, वह शिव नाडर विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

Film Review: पार्च्ड

फिल्म ‘‘पार्च्ड’’ खत्म होने के बाद दिमाग में एक ही बात आती है कि काश इस फिल्म का नाम होता-‘‘सेक्स और गांव’’. यह फिल्म नारी उत्थान के नाम पर महज  सेक्स के प्रति जागरूकता पैदा करती है. फिल्म में यह सवाल जरुर उठाया गया है कि हमारे यहां अभी भी औरतों को महज भोग्या ही समझा जाता है. तो वहीं फिल्मकार ने इस फिल्म में यह भी रेखांकित किया है कि एक औरत के लिए यौन संबंध की चाहत या अपने शरीर पर अपना हक जताना शर्म की बात नहीं है.

फिल्म ‘‘पार्च्ड’’ की कहानी के केंद्र में गुजरात राज्य के एक गांव की चार औरतें लज्जो (राधिका आप्टे), रानी (तनिष्ठा चटर्जी), जानकी (लहर खान) व बिजली (सुरवीन चावला) हैं. यह ऐसे गांव की कहानी है, जहां सभी सिर्फ सेक्स व दारू के ही चक्कर में नजर आते हैं. लज्जो (राधिका आप्टे) और रानी (तनिष्ठा चटर्जी) गांव में पड़ोसी व दोस्त हैं. लज्जो का पति मनोज (महेश बलराज) एक नम्बर का शराबी है. उसके बगल में ही रानी रहती है. रानी, अपनी सास और बेटे गुलाब (रिद्धिसेन) के साथ रहती है. रानी विधवा है, उसे अपने बेटे की चिंता रहती है. जिसके कारण वह उसकी शादी जल्दी जानकी (लहर खान) से करवा देती है. गुलाब की शादी के बाद रानी की सास मर जाती है. वह अकेली रह जाती है.

बेटा गुलाब अपनी पत्नी जानकी के बाल छोटे होने से गांव के कुछ लोगों के हंसने के कारण उससे दूर रहता है. रात रात भर घर ही नहीं आता है. गुलाब अपने लोफर दोस्तों के साथ हर समय बियर पीना, झगड़ा करना यही सब करता है. दारू पी कर अपनी पत्नी जानकी को भी मारता है. रानी इससे बहुत दुःखी है.

गुलाब की शादी के बाद रानी की सहेली बिजली (सुरवीन चावला) जो एक नाचने वाली वेश्या है, वह भी रानी से मिलने आती है, जिसे देख कर सब गांव वाले चौंक जाते हैं. और आपस में बातें करने लगते हैं. इसलिए बिजली तुरंत चली जाती है. रानी बाद में बिजली के डेरे पर ही उससे मिलने जाती है. साथ में लज्जो भी जाती है. तीनों मिलकर बहुत सारी बातें करती हैं. इतना ही नहीं कुछ समय बाद पता चलता है कि बिजली के यौन संबंध रानी के पति के साथ रहे हैं.

लज्जो का पति लज्जो को ‘बांझ औरत’ कहकर अक्सर पीटता रहता है. लज्जो अपना दर्द बिजली से बयां करती है. तब बिजली, लज्जो को बताती है कि उसको बच्चा नहीं हो रहा है, तो उसके पति में कमी होगी. उसके बाद बिजली, लज्जो को लेकर रात में पहाड़ी पर एक पुरूष (आदिल हुसेन) के पास ले जाती है. जहां लज्जो उस पुरूष के साथ यौन संबंध बनाकर आनंद की अनुभति करती है और वह पेट से हो जाती है.

उधर रानी की बहू जानकी से मिलने उसके घर पर उसका एक दोस्त आता है. गुलाब सदैव घर से बाहर रहता है. गुलाब एक लड़की प्रीति के साथ सेक्स संबंध बनाना चाहता है, इसके लिए उसे ढेर सारे रूपए चाहिए. तो एक दिन गुलाब, रानी के पैसे चुरा लेता है. रानी अपनी बहू जानकी के उपर शक जताती है. जब गुलाब घर लौटता है, तो जानकी अपने पति से सास के पैसे के बारे में सवाल कर देती है. जिससे गुलाब उसे बहुत मारता है. रानी यह सब देख कर बहुत दुःखी होती है. वह  बहू से बात करती है कि वह अपने दोस्त को बुला ले और उसके साथ चली जाए. रानी बहू जानकी को उस लड़के के साथ भेज देती है. रानी व लज्जो दोनों घर से अकेले बिजली के डेरे पर जाती हैं. तीनों वहां से गाड़ी लेकर घूमने चली जाती हैं.

इसी गांव में किशन (सुमीत व्यास) और उसकी पत्नी भी रहते हैं, जो शहर से गांव में आकर सब औरतों को सिलाई का काम लाकर देते हैं और सब को अर्थिक रूप से मदद करते हैं. लेकिन यह बात रानी के बेटे गुलाब को बुरी लगती है. वह अपने दोस्तों के साथ किशन को मारकर घायल कर देता है. किशन अस्पताल पहुंच जाता है. इस घटना के बाद किशन व उसकी पत्नी गांव छोड़ कर चले जाते हैं.

गांव में दशहरा का मेला लगा है. दशहरा के मेले में जाने से पहले जब लज्जो के पति मनोज को पता चलता है कि लज्जो गर्भवती है, तो वह लज्जो को बहुत मारता है. वह कहता है कि उसके पेट में किसका बच्चा है? लज्जो कहती है कि गांव में सभी के सामने वह बोल दे कि मैं बच्चा नहीं पैदा कर सकता, तो वह मान लेगी. फिर लोग उसे क्यों ताने मारते हैं? दोनों में मारपीट होती है. इसी मार पीट में घर में आग लग जाती है और इस आग में मनोज जल जल जाता है.

लज्जो दशहरा के मेले में जाकर रानी व बिजली से मिलती. पूरी कहानी बयां करती है. लज्जो मेले से निकल कर गांव से गाड़ी में शहर की तरफ भागती हैं. तीनों रास्ते में बहुत खुश है.

‘शब्द’ और ‘तीन पत्ती’ जैसी फिल्मों की निर्देशक लीना यादव ने निर्देशक के तौर पर प्रगति की है. इस फिल्म के कुछ दृश्य उन्होंने आम भारतीय फिल्मों से इतर व बेहतर तरीके से लिए हैं. कुछ सीन इस बात की ओर इशारा करते हैं कि उन पर विदेशी सिनेमा का प्रभाव आ चुका है. शायद इसकी वजह उत्कृष्ट हौलीवुड फिल्मों के कैमरामैन रूसेल का इस फिल्म का कैमरामैन होना भी हो सकता है. क्योंकि पटकथा के स्तर पर वह कई जगह मार खा जाती हैं. औरतों के मुद्दे सही ढंग से उभर ही नहीं पाते हैं. फिल्म में ग्रामीण परिवेश को बेहतर तरीके से उकेरा जा सकता था. पुरूष मानसिकता को सही परिपेक्ष्य में नहीं पेश कर पायीं. औरतों के शोषण के नाम पर कुछ भी नया नहीं परोसा गया. क्या नारी स्वतंत्रता व नारी की खुशी महज सेक्स या यानी कि यौन संबंधों तक ही सीमित है? क्या हर रिश्ते को महज यौन संबंधों की कसौटी पर ही कसा जाना चाहिए? नारी उत्थान के नाम पर भी सेक्स व गंदी गालियों का परोसा जाना जायज नहीं ठहराया जा सकता.

फिल्म का नकारात्मक पक्ष यह है कि फिल्मकार ने अपनी फिल्म को बहुत गलत ढंग से प्रचारित किया. लीना यादव व अजय देवगन यह चिल्लाते रहे कि फिल्म नारी उत्थान की बात करती है, जो कि फिल्म देखकर महज झूठ का पुलिंदा साबित होता है. दूसरी बात फिल्म के प्रोमो से भी फिल्म की गलत तस्वीर पेश की गयी. जिस तरह के  प्रोमो वगैरह आए थे, उससे उम्मीद बंधी थी कि यह एक हार्ड हीटिंग फिल्म होगी, पर इसे ‘सेक्स एंड सिटी’ का घटिया भारतीय करण ही कहा जा सकता है. फिल्म के अंत को भी सही नहीं ठहराया जा सकता. फिल्म में अनावश्यक गंदी गालियों का समावेश है. नारी पात्र भी गंदी गालियां बकते हुए नजर आते हैं. नारी प्रधान फिल्म के रूप में भी यह निराश करती है. शहरी लड़कियां व औरतें भी शायद इस फिल्म को न पसंद करें.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म तनिष्ठा चटर्जी की ही फिल्म है. फिल्म में तनिष्ठा चटर्जी की आंखें उनकी बेबसी व उनका दर्द बयां करती हैं. इस फिल्म में उनके किरदार की कई परते हैं. राधिका आप्टे उम्मीद पर खरी नहीं उतरती. सुरवीन चावला के संवादों में पंजाबी टच ही नजर आाता है. आदिल हुसेन के किरदार के पास राधिका आप्टे यानी कि लज्जो के संग यौन संबंध स्थापित करने के अलावा कुछ करने का है ही नहीं.

‘‘टू लाइज’, ‘टाइटानिक’, ‘एंट मैन’’ जैसी फिल्मों के कैमरामैन रूसेल कारपेंटर ने कमाल की फोटोग्राफी की है. फिल्म का संगीत ठीक है. लगभग दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘पार्च्ड’’ का निर्माण अजय देवगन, असीम बजाज, गुलाब सिंह तनवर, लीना यादव, रोहन जगदाले ने किया है. लेखक व निर्देशक लीना यादव, एडीटर केविन टेंट, कैमरामैन रूसेल कारपेंटर, गीतकार स्वानंद किरकिरे, नृत्य निर्देशक अशेले लोबो व कास्ट्यूम डिजायनर आशिमा बेलापुरकर हैं.

फिल्म के कलाकार हैं: तनिष्ठा चटर्जी, राधिका आप्टे, सुरवीन चावला, आदिल हुसेन, महेश बलराज, रिद्धिसेन, लहर खान व अन्य.

‘लाइक ए गर्ल’ कैम्पेन में शामिल हुईं सोनाक्षी और साक्षी

जैसा कि एक कहावत है कि ‘लड़कियों की तरह मत करों’ इस फ्रेज को फिर से परिभाषित करने की जरुरत है. इसी प्रसंग को लेकर ‘व्हिस्पर इंडिया’ ने ‘लाइक ए गर्ल’ कैम्पेन का अनावरण अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा और रियो ओलिंपिक ब्रोंज मेडलिस्ट रेसलर साक्षी मलिक से मुंबई में करवाया. उनके अनुसार आज लड़कियां हर काम आसानी से कर सकती हैं, फिर चाहे वह खेल, ड्राइविंग या फाइटिंग हो. वे हर क्षेत्र में आगे जा सकती हैं.

इस अवसर पर अभिनेत्री सोनाक्षी कहती हैं कि ‘लाइक ए गर्ल’ एक अच्छी कैम्पेन है. यह शब्द लड़कियों को नीचा दिखाता है, जबकि आज की लड़कियों ने हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिती दर्ज़ करवाई है, फिर चाहे वह शिक्षा हो या किसी और क्षेत्र. मैंने जब फिल्म ‘अकीरा’ में फाइट के दृश्य किये, तो सारे स्टंट्स मैंने खुद किये और मैं अभी भी कर सकती हूँ. हमारी अपनी सख्सियत है मेरे हिसाब से कोई जेंडर इसे निर्धारित नहीं करती और महिलाएं जितना कर रही है इसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती. ये सब हमारा समाज,धर्म और परिवार कहता है कि लड़की होने के नाते कुछ पाबंधियाँ है,जो गलत है.मुझे इसका सामना कभी नहीं करना पड़ा. मेरे माता-पिता बहुत ‘लिबरल’ है. मेरे दो भाई होने के बावजूद उन्होंने मुझे किसी काम से नहीं रोका. कही आने-जाने से नहीं रोका. मैं अपनी ख़ुशी से हर काम कर सकती हूँ.

रेसलर साक्षी कहती हैं कि जब मैं इस क्षेत्र में आई तो सभी ने डराया कि तुम लड़की हो ‘रेसलिंग’ तुम्हारे वश में नहीं, लोग मेरा मजाक उड़ाते थे, मैंने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया और अभ्यास करती रही. मैं दृढ प्रतिज्ञ थी और जानती थी कि मेरी मेहनत अवश्य सफल होगी. मैं सभी लड़कियों से कहना चाहती हूँ कि आप जो भी बनना चाहो बनो और खुलकर जियो.

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