Emotional Story: कहीं किसी रोज- जब जोया से मिला विमल

Emotional Story: स्विमिंग पूल के किनारे एक तरफ जा कर विमल ने हाथ में लिए होटल के गिलास से ही सूर्य को जल चढ़ाया, सुबह की हलकीहलकी खुशनुमा सी ताजगी हर तरफ फैली थी, जल चढ़ाते हुए उस ने कितने ही शब्द होठों में बुदबुदाते हुए कनखियों से पूल के किनारे चेयर पर बैठी महिला को देखा, आज फिर वह अपनी बुक में खोई थी.

कुछ पल वहीं खड़े हो कर वह उसे फिर ध्यान से देखने लगा, सुंदर, बहुत स्मार्ट, टीशर्ट, ट्रैक पैंट में, शोल्डर कट बाल, बहुत आकर्षक, सुगठित देहयष्टि.

विमल को लगा कि वह उस से उम्र में कुछ बड़ी ही होगी, करीब चालीस की तो होगी ही, वह उसे निहार ही रहा था कि उस स्त्री ने उस की तरफ देख कर कहा, ‘‘इतनी दूर से कब तक देखते रहेंगे, आप की पूजाअर्चना हो गई हो और अगर आप चाहें तो यहां आ कर बैठ सकते हैं.‘‘

विमल बहुत बुरी तरह झेंप गया. उसे कुछ सूझा ही नहीं कि चोरी पकडे जाने पर अब क्या कहे, चुपचाप चलता हुआ उस स्त्री से कुछ दूर रखी चेयर पर जा कर बैठ गया.

स्त्री ने ही बात शुरू की, ‘‘आप भी मेरी तरह लौकडाउन में इस होटल में फंस गए हैं न? आप को रोज देख रही हूं पूजापाठ करते. और आप भी मुझे देख ही रहे हैं, यह भी जानती हूं.‘‘

विमल झेंप रहा था, बोला, ‘‘हां, यहां देहरादून में औफिस के टूर पर आया था, अचानक लौकडाउन में फंस गया, मैं लखनऊ में रहता हूं और आप…?‘‘

‘‘मैं देहरादून घूमने आई थी. मैं बैंगलोर में रहती हूं, वहीं जौब भी करती हूं.‘‘

‘‘अकेले आई थीं घूमने?‘‘ विमल हैरान हुआ.

‘‘जी, मगर आप इतने हैरान क्यों हुए?‘‘

विमल चुप रहा, महिला उठ खड़ी हुई, ‘‘चलती हूं, मेरा एक्सरसाइज का टाइम हो गया. थोड़ी रीडिंग के बाद ही मेरा दिन शुरू होता है.‘‘

विमल ने झिझकते हुए पूछा, ‘‘आप का शुभ नाम?‘‘

‘‘जोया.‘‘

‘‘आगे?‘‘

‘‘आगे क्या?‘‘

‘‘मतलब, सरनेम?‘‘

‘‘मुझे बस अपना नाम अच्छा लगता है, मैं सरनेम लगा कर किसी धर्म के बंधन में नहीं बंधना चाहती, सरनेम के बिना भी मेरा एक स्वतंत्र व्यक्तित्व हो सकता है. आप भी मुझे अपना नाम ही बताइए, मुझे किसी के सरनेम में कभी कोई दिलचस्पी नहीं होती.‘‘

विमल का मुंह खुला का खुला रह गया, ‘‘यह औरत है, क्या है,’’ धीरे से बोला विमल.

‘‘ओके, बाय,‘‘ कह कर जोया चली गई. विमल जैसे एक जादू के असर में बैठा रह गया.

लौकडाउन के शुरू होने पर रूड़की के इस होटल में 8-10 लोग फंस गए थे, कुछ यंग जोड़े थे जो कभीकभी दिख जाते थे, कुछ ऐसे ही टूर पर आए लोग थे, दिनभर तो विमल लैपटौप पर औफिस के काम में बिजी रहता. वह बहुत ही धर्मभीरु, दब्बू किस्म का इनसान था, उस की पत्नी और दो बच्चे लखनऊ में रहते थे, जिन से वह लगातार टच में था, जोया को वह अकसर ऐसे ही स्विमिंग पूल के आसपास खूब देखता. अकसर वह इसी तरह बुक में ही खोई रहती.

जोया एक बिंदास, नास्तिक महिला थी, बैंगलोर में अकेली रहती थी, एक कालेज में फाइन आर्ट्स की प्रोफेसर थी, विवाह किया नहीं था. पेरेंट्स भाई के पास दिल्ली रहते थे, घूमनेफिरने का शौक था, खूब सोलो ट्रैवेलिंग करती, खूब पढ़ती, हमेशा बुक्स साथ रखती, अब लौकडाउन में फंसी  थी तो बुक्स पढ़ने के शौक में समय बीत रहा था. वह बहुत इंटेलीजेंट थी, कई फिलोसोफर्स को पढ़ चुकी थी, कई दिन से देख रही थी कि विमल उसे चोरीचोरी खूब देखता है, उसे मन ही मन हंसी भी आती, विमल देखने में स्मार्ट था, पर उसे एक नजर देखने से ही जोया को अंदाजा हो गया था कि वह धर्म में पोरपोर डूबा इनसान है.

होटल में स्टाफ अब बहुत कम  था, खानेपीने की चीजें सीमित थीं, पर काम चल रहा था. विमल का आज काम में दिल नहीं लगा, आंखों के आगे जोया का जैसे एक साया सा लहराता रह गया.

शाम होते ही लैपटौप बंद कर स्विमिंग पूल की तरफ भागा, जोया अपनी बुक में डूबी थी. विमल उस के पास जा कर खड़ा हो गया, ‘‘गुड ईवनिंग, जोयाजी.”

बुक बंद कर जोया मुसकराई, ‘‘गुड ईवनिंग, आइए, फ्री हैं तो बैठिए.”

विमल तो उस के पास बैठने के लिए ही बेचैन था, जोया बहुत प्यारी लग रही थी, नेवई ब्लू, टीशर्ट में उस का गोरा सुनस
सुंदर चेहरा खिलाखिला लग रहा था. जोया ने छेड़ा, ‘‘देख लिया हो तो कोई बात करें.”

हंस पड़ा विमल, ‘‘आप बहुत स्मार्ट हैं, नजरों को खूब पढ़ती हैं.”

‘‘हां जी, यह तो सच है,” जोया ने दोस्ताना ढंग से कहा, तो दोनों में कुछ बढ़ा, जोया ने कहा, ‘‘आजकल तो यहां जितनी भी सुविधाएं मिल रही हैं, बहुत हैं, मेरी सुबहशाम तो स्विमिंग पूल पर कट रही है और दिन होटल के कमरे में. आप क्या करते रहते हैं?”

‘‘औफिस का काम काफी रहता है, बस यों ही टाइम बीत जाता है.”

जोया ने पूछा, ‘‘और आप की फैमिली में कौनकौन हैं?”

विमल ने बता कर उस से भी पूछा. जोया ने जब बताया कि वह अविवाहित है. विमल हैरानी से उस का मुंह देखता रह गया.

यह देख जोया हंस पड़ी, ‘‘आप बहुत हैरान होते हैं, बातबात पर.‘‘ विमल को अब तक जोया के जौली नेचर का अंदाजा हो गया था. जोया ने फिर कहा, “मैं अपनी लाइफ अपने तरीके से ऐंजौय कर रही हूं, पता नहीं, लोग मेरी लाइफ पर हैरान ही होते रहते हैं, जैसे मैं जीती हूं, मुझे उस पर गर्व है.”

‘‘आप को एक फैमिली की जरूरत महसूस नहीं होती?”

‘‘पेरेंट्स हैं, भाई हैं, बाकी पति, बच्चे जैसी चीजों की कमी कभी नहीं महसूस हुई. मैं तो यहां लौकडाउन में फंसा होना भी ऐंजौय कर रही हूं, आप के पास पैसा हो तो आप को लाइफ ऐसे ही ऐंजौय करनी चाहिए, डेनिस रोडमैन ने तो कह ही दिया, ‘‘इनसान के जीवन में ५० पर्सेंट सैक्स होता है और ५० पर्सेंट पैसा.”

विमल का चेहरा शर्म से लाल हो गया. पहली बार कोई महिला उस के सामने बैठी सैक्स शब्द ऐसे खुलेआम बोल रही थी, जोया ने फिर कहा, ‘‘आप को अजीब लगा न कि कोई महिला कैसे सैक्स शब्द खुलेआम बोल रही है, इस विषय पर तो आप लोगों का कौपीराइट है,‘‘ कह कर जोया बहुत प्यारी हंसी हंसी.

विमल इस हंसी में कहीं खो सा गया, बोला, ‘‘आप सब से बहुत अलग हैं.”

‘‘जी, मैं जानती हूं.”

‘‘आजकल आप क्या पढ़ रही हैं?”

‘‘कार्ल मार्क्स.”

‘‘और क्याक्या शौक हैं आप के?”

‘‘खुश रहने का शौक है मुझे, बाकी सब चीजें इस के साथ अपनेआप जुड़ती चली गईं. आज डिनर साथ करें क्या?”

‘‘आज तो मेरा फास्ट है. मंगलवार है न. मैं जरा धार्मिक किस्म का इनसान हूं.”

जोया मुसकराई, तो विमल ने पूछ लिया, ‘‘आप किस धर्म को मानती हैं?”

‘‘मैं तो धर्म के खिलाफ हूं, क्योंकि इस में मेरे तर्कों का कोई जवाब नहीं. लोगों ने मुझे हमेशा दिमाग से काम लेने की सलाह दी. मैं ने मानी, बस, मैं फिर नास्तिक हो गई, है न ये मजेदार बात. जब लोग मुझ से मेरा धर्म पूछते हैं, मैं कह देती हूं, नॉन डेलूशनल.

‘‘मैं तो यह मानता हूं कि ऊपर वाला हर वस्तु में है और सब से ऊपर भी, भगवान को अपने आसपास ही महसूस करता हूं, इसी अनुभूति से जीवन सफल हो सकता है, भगवान ही हमारी हर मुश्किल का अंत कर सकते हैं.”

‘‘और मैं कार्ल मार्क्स की इस बात को मानती हूं कि लोगों की खुशी के लिए पहली जरूरत धर्म का अंत है और धर्म लोगों का अफीम है.”

‘‘आप विदेशी लेखकों की बुक्स शायद ज्यादा पढ़ चुकी हैं.”

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है, मुझे बीआर अंबेडकर की यह बात बहुत पसंद है, जो उन्होंने कहा है कि मैं ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाए.”

‘‘पर, जोयाजी.”

‘‘आप मुझे सिर्फ जोया ही कह सकते हैं, यह जी मुझे अकसर बहुत फिजूल की चीज लगती है.”

विमल थोड़ा हिचकिचाया, पर उसे अपने मुंह से निकलता सिर्फ जोया बहुत प्यारा लगा, वह इस नाम पर ही अब मरमिटा था, इस नाम ने ही उस के अंदर एक हलचल मचा दी थी, उसे लग रहा था कि सामने बैठी, उस से उम्र में बड़ी महिला सारी उम्र बस उस के सामने ऐसे ही बैठी रहे और वह उस की बातें सुनता रहे, उसे देखता रहे, ब्यूटी विद ब्रेन.

‘‘तो आज आप फास्ट में डिनर में क्या खाएंगे?”

‘‘फ्रूट्स और मिल्क,”
जोया मुसकराई, ‘‘मैं ने तो अपनी लाइफ में कभी कोई फास्ट नहीं रखा.”

‘‘मैं सचमुच हैरान हूं, आप किसी भी धर्म को नहीं मानती? अच्छा, ठीक है, चलो, मुझे यह तो बता दो कि आप के पेरेंट्स का सरनेम क्या है?”

जोया बहुत जोर से हंसी, ‘‘आप उन्ही लोगों में से हैं न, जो सामने वाले के धर्म, जाति पूछ कर आगे बात करते हैं, तरस आता है मुझे ऐसे लोगों पर, जिन की दुनिया बस इतनी ही छोटी है जिस में सरनेम ही रह सकता है. खैर, मैं हूं जोया सिद्दीकी.”

विमल का चेहरा उतर गया, मुंह से निकल ही गया, ‘‘ओह्ह्ह.”

जोया ने छेड़ा, ‘‘आया मजा? क्या हुआ? झटका लगा न? अब बात नहीं कर पाएंगे?”

‘‘नहीं, नहीं, ऐसा तो नहीं है.”

दोनों फिर यों ही कुछ देर बात करते रहे, विमल जोया की नौलेज से प्रभाावित था, कमाल की थी जोया, विमल अपने रूम में आ कर भी सिर्फ जोया के बारे में ही सोचता रहा, पूरी रात उस के बारे में करवटें बदल बदल कर गुजारीं, जोया को भी विमल की सादगी बहुत अच्छी लगी थी, वह भी उस के बारे में सोच कर मुसकराती रही, अगली सुबह विमल ने उसे देखते ही बेचैनी से कहा, ‘‘आज तो मैं सो ही नहीं पाया.”

जोया ने बड़े स्टाइल से कहा, ‘‘जानती हूं.”

‘‘अरे, आप को कैसे पता?”

‘‘अकसर लोग मुझ से मिल कर जल्दी सो नहीं पाते.”

विमल थोड़ा फ्लर्ट के मूड में आ गया, ‘‘बहुत जानती हैं आप ऐसे लोगों को?”

‘‘हां, जनाब, बहुत देखे हैं.”

दोनों ने अपनेआप को एकदूसरे के कुछ और करीब महसूस किया, दोनों स्विमिंग पूल के किनारे चहलकदमी करते हुए बातें कर रहे थे, जोया ने कहा, ‘‘आज आप ने नहाधो कर सूर्य को जल नहीं चढ़ाया.”

‘‘हां, आज मन ही नहीं हुआ, मैं ठीक से सोता नहीं तो मेरा सारा काम उलटापुलटा हो जाता है.”

‘‘आप के भगवान मुझ से गुस्सा तो नहीं हो जाएंगे कि मेरी वजह से आप सो नहीं पाए. वैसे, अच्छा ही हुआ एक गिलास पानी वेस्ट होने से बच गया. आप ने कभी सोचा नहीं कि आप के भगवान को सचमुच उस पानी की जरूरत है? मुझे इस के पीछे का लौजिक समझा दीजिए, प्लीज.”

विमल ने हाथ जोड़े, ‘‘मैं समझ चुका हूं कि मैं आप से जीत नहीं सकता, जोया. मैं आप से हार चुका हूं,” उस के इस भोले से व्यवहार पर जोया मुसकरा दी. जोया ने कहा, ‘‘फिर तो बात ही खत्म, हारे हुए इनसान को क्या कहना? आज नाश्ता साथ करें?”

‘‘बिलकुल, फ्रेश हो कर मिलते हैं, इन का रैस्टोेरैंट तो बंद ही है आजकल, औफिस की मीटिंग में एक घंटा है, मेरे रूम में आओगी?”

‘‘हां, मिलते हैं.”

घुटने तक की एक ड्रेस, शोल्डर कट बाल शैंपू किए, हलका सा मेकअप, उस के पास से आती बढ़िया परफ्यूम की खुशबू, तैयार विमल ने जब अपने रूम का दरवाजा खोला, तो जोया को देखता ही रह गया. वह बहुत सुंदर थी, उस के रूप के जादू से बचना विमल को बहुत मुश्किल सा लग रहा था. वह पूरी तरह उस के होशोहवास पर छा चुकी थी, विमल ने उस की पसंद पूछ कर नाश्ता आर्डर किया, वेटर स्टेचू सा चेहरा लिए चला गया, तो जोया हंसी, ‘‘आज तो इन लोगों को भी टाइमपास करने का हमारा टौपिक मिल गया, ये बेचारे भी लौकडाउन में ऐसी बातों के लिए तरस गए होंगे.”

विमल को बहुत जोर से हंसी आई, ‘‘क्याक्या सोच लेती हो आप भी?”

‘‘तुम भी कहोगे मुझे तो अच्छा लगेगा, आप बहुत दूर कर देता है सामने वाले को.”

‘‘पर, आप मुझ से बड़ी हैं शायद.”

‘‘शायद नहीं, बड़ी ही हूं, पर मुझे तुम से तुम ही सुनना अच्छा लगेगा, विमल, जब करीब आ ही रहे हैं तो फौर्मलिटीज क्यों?”

नाश्ता करते हुए जोया की रोचक बातों में डूबा रहा विमल. जोया बता रही थी, ‘‘तुम्हें पता है, जब मैं यूरोप से अपनी आर्ट्स की पढ़ाई खत्म कर के  लौटी, और वहां के न्यूड स्कल्प्चर के बारे में स्टूटेंड्स को  बताती, उन्हें पढ़ाती, उन के चेहरे शर्म से लाल हो जाते. मुझे बड़ा मजा आता, मैं बहुत जगह घूमी, तुम्हें पता है डेनमार्क और स्वीडन में धार्मिक लोग सब से कम हैं और वहां सब से अच्छी शिक्षा है, अपराध न के बराबर हैं. ईमानदार लोग है,” जोया और विमल ने काफी अच्छे मूड में नाश्ता खत्म किया, जोया फिर उठ गई और बोली, ‘‘अब तुम औफिस के काम करो, मैं चलती हूं.”

विमल का मन ही नहीं कर रहा था कि जोया उस के पास से जाए, पर मजबूरी थी, एक मीटिंग थी, बोला, ‘‘तुम क्या करती हो पूरा दिन होटल में जोया?”

‘‘आराम, बुक्स, एक्सरसाइज, कुछ फोन पर बातें, फोन पर नेटफ्लिक्स भी देखती हूं.”

‘‘अच्छा? कौनकौन से शोज देखे हैं अब तक?”

‘‘सेक्रेड गेम्स देख रही हूं आजकल, वैसे और भी बहुत से देख लिए.”

विमल की आंखें कुछ चौड़ी हुईं, ‘‘सेक्रेड गेम्स?”

‘‘हां, फिर हैरान हुए तुम?”

विमल हंस पड़ा, जोया चली गई.

शाम को दोनों फिर बहुत देर तक स्विमिंग पूल के किनारे बैठे रहे, चाय भी साथ पी, जोया ने शरारती स्वर में कहा, ‘‘आज डिनर मेरे रूम में?”

विमल ने हां में सिर हिला दिया. विमल अब उस से अपनी फैमिली की बातें करता रहा, अपनी वाइफ और बच्चों के बारे में बताता रहा, जोया पूरी रुचि से सुनती रही, फिर बोली, ‘‘आप अपनी वाइफ को मेरे बारे में बताएंगे?”

‘‘नहीं,” कहता हुआ विमल मुसकरा दिया, तो जोया भी हंस पड़ी, कहा, ‘‘इसलिए मैं ने शादी नहीं की.” दोनों इस बात पर एकदूसरे को छेड़ते रहे, रात को डिनर के लिए जब विमल तैयार होने लगा, मन ही मन यही सोच रहा था कि वह अपनी वाइफ को धोखा दे रहा है, भगवान उसे कभी माफ नहीं करेंगे, यह पाप है वगैरह, पर जब जोया की हसीन कंपनी याद आती, सब नैतिकता धरी की धरी रह जाती.

जोया विमल के साथ समय बिताने के लिए उत्साहित थी, उसे विमल का स्वभाव सरल, सहज लगा था, वह उस से खूब मजाक करने लगी थी, उसे अपनी बातों पर विमल का झेंपना बहुत अच्छा लगता, रात को विमल उस के रूम में आया, दोनों ने काफी सहज हो कर बहुत देर बातें कीं, डिनर आर्डर किया, खूब हंसतेहंसाते खाना खाया, वेटर सब क्लीन कर  गया, तो जोया ने कहा, ‘‘विमल, मुझे तुम से मिल कर अच्छा लगा. यह और बात है कि हम एकदूसरे से बिलकुल अलग हैं.”

‘‘जोया, मैं ने बहुत सोचा कि तुम से दूरी न बढ़ाऊं, पर दिल है कि अब मानता  नहीं,” कहतेकहते विमल ने उसे खींच कर अपनी बांहों में भर लिया. जोया भी उस के सीने से जा लगी, फिर जो होना था, वही हुआ. पूरी रात दोनों ने एक बेड पर ही बिताई. सुबह जोया ही उठ कर फ्रेश हुई पहले, विमल को झकझोर कर हिलाया, ‘‘उठो, आज क्या इरादा है?”

‘‘तुम्हारे साथ ही रातदिन बिताने का इरादा है, और क्या?”

‘‘तुम्हे पता है जौन अपड़ाईक ने कहा है, सैक्स बिलकुल पैसे की तरह होता है, जितना मिले, उतना कम.

‘‘और मुझे डीएच लौरेंस की बात भी सही लगती है कि सैक्स वास्तव में इनसान के लिए सब से करीबी स्पर्शों में से एक स्पर्श होता है, लेकिन इनसान इसी स्पर्श से डरता है.”

‘‘अब तो वही सही लगता है, जो तुम्हें सही लगता है, कभी भी नहीं सोचा था कि ऐसे किसी के करीब आऊंगा.”

जोया की संगत का ऐसा असर हुआ कि हर बात में धर्म और ईश्वर की बात आंख मूंद कर मानने वाले विमल को अब कुछ याद न आता, औफिस के पहले और बाद का सारा समय जोया के साथ होता, वेटर्स और बाकी स्टाफ से दोनों की नजदीकी छुपने वाली थी ही नहीं, पर दोनों को परवाह भी नहीं थी किसी की, विमल पूरे का पूरा बदल रहा था, न उसे सुबह जीवनभर का नियम सूरज पर जल चढ़ाना याद रहता, न कोई फास्ट, अब उसे जोया की तर्कपूर्ण बातें भातीं, दुनियाभर के दार्शनिकों की कोट्स जोया के मुंह से सुन कर उस का दिल खुश हो जाता कि आजकल वह कितनी इंटेलीजेंट महिला के साथ रातदिन बिता रहा है, अपनी फैमिली से बात करता हुआ भी वह अब परेशान न होता, बल्कि उसे फोन रखने की जल्दी होती, वह इस लौकडाउन को अब मन ही मन थैंक्स कहने लगा था. जोया, वह तो थी ही अपनी तरह की एक ही बंदी, विमल का दीवानापन देख वह हंस देती.

अचानक ट्रेनें और बाकी सेवाएं शुरू हुईं, जोया के एक स्टूडेंट ने रूड़की में अपने किसी रिश्तेदार को कह कर पास दिलवा कर जोया के टैक्सी से दिल्ली जाने का इंतजाम कर दिया, वहां से वह अपने भाई के पास रह कर फिर बैंगलोर चली जाती, उस ने यह खबर जब विमल को दी तो विमल को ऐसा झटका लगा कि उस का चेहरा देख जोया भी गंभीर हुई, ‘‘विमल, हमारे रास्ते, मंजिल तो अलग हैं ही, इस में तुम इतना उदास मत हो, मुझे दुख हो रहा है.”

विमल ने उस का हाथ पकड़ लिया. गमगीन से स्वर में वह बोला, ‘‘मैं तो भूल ही गया था कि हमे बिछुड़ना भी होगा.”

जोया अपनी पैकिंग करने लगी.  होटल वालों को इस समय ध्यान रखने के लिए विशेष रूप से थैंक्स कहा, वेटर्स को बढ़िया टिप्स दी, विमल भी टूटे दिल से जाने के रास्ते खोजने लगा. चलते समय जोया विमल के गले लग गई, अपना कार्ड दिया, बोली, ‘‘जब मन करे, फोन कर लेना. वैसे, मैं जानती हूं कि कुछ ही दिन याद आएगी मेरी, फिर अपनी लाइफ में बिजी हो कर कभीकभी ही याद करोगे मुझे.”

‘‘और तुम…?”

जोया बस मुसकरा दी, कहा कुछ नहीं. टैक्सी आ गई, जोया बैठने लगी तो विमल ने बेकरारी से पूछा, ‘‘जोया, कब मिलेंगे?”

‘‘ऐसे ही, कभी भी, कहीं किसी रोज.”

टैक्सी चली गई. विमल का दिल जैसे बहुत उदास हुआ, मन ही मन कहा, ‘‘जोया सिद्दीकी, बहुत याद आओगी तुम.”

Emotional Story

Hindi Fictional Story: दर्द- क्या नदीम ने कनीजा बी को छोड़ दिया

Hindi Fictional Story: कनीजा बी करीब 1 घंटे से परेशान थीं. उन का पोता नदीम बाहर कहीं खेलने चला गया था. उसे 15 मिनट की खेलने की मुहलत दी गई थी, लेकिन अब 1 घंटे से भी ऊपर वक्त गुजर गया?था. वह घर आने का नाम ही नहीं ले रहा था.

कनीजा बी को आशंका थी कि वह महल्ले के आवारा बच्चों के साथ खेलने के लिए जरूर कहीं दूर चला गया होगा.

वह नदीम को जीजान से चाहतीं. उन्हें उस का आवारा बच्चों के साथ घर से जाना कतई नहीं सुहाता था.

अत: वह चिंताग्रस्त हो कर भुनभुनाने लगी थीं, ‘‘कितना ही समझाओ, लेकिन ढीठ मानता ही नहीं. लाख बार कहा कि गली के आवारा बच्चों के साथ मत खेला कर, बिगड़ जाएगा, पर उस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. आने दो ढीठ को. इस बार वह मरम्मत करूंगी कि तौबा पुकार उठेगा. 7 साल का होने को आया है, पर जरा अक्ल नहीं आई. कोई दुर्घटना हो सकती है, कोई धोखा हो सकता है…’’

कनीजा बी का भुनभुनाना खत्म हुआ ही था कि नदीम दौड़ता हुआ घर में आ गया और कनीजा की खुशामद करता हुआ बोला, ‘‘दादीजान, कुलफी वाला आया है. कुलफी ले दीजिए न. हम ने बहुत दिनों से कुलफी नहीं खाई. आज हम कुलफी खाएंगे.’’

‘‘इधर आ, तुझे अच्छी तरह कुलफी खिलाती हूं,’’ कहते हुए कनीजा बी नदीम पर अपना गुस्सा उतारने लगीं. उन्होंने उस के गाल पर जोर से 3-4 तमाचे जड़ दिए.

नदीम सुबकसुबक कर रोने लगा. वह रोतेरोते कहता जाता, ‘‘पड़ोस वाली चचीजान सच कहती हैं. आप मेरी सगी दादीजान नहीं हैं, तभी तो मुझे इस बेदर्दी से मारती हैं.

‘‘आप मेरी सगी दादीजान होतीं तो मुझ पर ऐसे हाथ न उठातीं. तब्बो की दादीजान उसे कितना प्यार करती हैं. वह उस की सगी दादीजान हैं न. वह उसे उंगली भी नहीं छुआतीं.

‘‘अब मैं इस घर में नहीं रहूंगा. मैं भी अपने अम्मीअब्बू के पास चला जाऊंगा. दूर…बहुत दूर…फिर मारना किसे मारेंगी. ऊं…ऊं…ऊं…’’ वह और जोरजोर से सुबकसुबक कर रोने लगा.

नदीम की हृदयस्पर्शी बातों से कनीजा बी को लगा, जैसे किसी ने उन के दिल पर नश्तर चला दिया हो. अनायास ही उन की आंखें छलक आईं. वह कुछ क्षणों के लिए कहीं खो गईं. उन की आंखों के सामने उन का अतीत एक चलचित्र की तरह आने लगा.

जब वह 3 साल की मासूम बच्ची थीं, तभी उन के सिर से बाप का साया उठ गया था. सभी रिश्तेदारों ने किनारा कर लिया था. किसी ने भी उन्हें अंग नहीं लगाया था.

मां अनपढ़ थीं और कमाई का कोई साधन नहीं था, लेकिन मां ने कमर कस ली थी. वह मेहनतमजदूरी कर के अपना और अपनी बेटी का पेट पालने लगी थीं. अत: कनीजा बी के बचपन से ले कर जवानी तक के दिन तंगदस्ती में ही गुजरे थे.

तंगदस्ती के बावजूद मां ने कनीजा बी की पढ़ाईलिखाई की ओर खासा ध्यान दिया था. कनीजा बी ने भी अपनी बेवा, बेसहारा मां के सपनों को साकार करने के लिए पूरी लगन व मेहनत से प्रथम श्रेणी में 10वीं पास की थी और यों अपनी तेज बुद्धि का परिचय दिया था.

मैट्रिक पास करते ही कनीजा बी को एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क की नौकरी मिल गई थी. अत: जल्दी ही उन के घर की तंगदस्ती खुशहाली में बदलने लगी थी.

कनीजा बी एक सांवलीसलोनी एवं सुशील लड़की थीं. उन की नौकरी लगने के बाद जब उन के घर में खुशहाली आने लगी थी तो लोगों का ध्यान उन की ओर जाने लगा था. देखते ही देखते शादी के पैगाम आने लगे थे.

मुसीबत यह थी कि इतने पैगाम आने के बावजूद, रिश्ता कहीं तय नहीं हो रहा था. ज्यादातर लड़कों के अभिभावकों को कनीजा बी की नौकरी पर आपत्ति थी.

वे यह भूल जाते थे कि कनीजा बी के घर की खुशहाली का राज उन की नौकरी में ही तो छिपा है. उन की एक खास शर्त यह होती कि शादी के बाद नौकरी छोड़नी पड़ेगी, लेकिन कनीजा बी किसी भी कीमत पर लगीलगाई अपनी सरकारी नौकरी छोड़ना नहीं चाहती थीं.

कनीजा बी पिता की असमय मृत्यु से बहुत बड़ा सबक सीख चुकी थीं. अर्थोपार्जन की समस्या ने उन की मां को कम परेशान नहीं किया था. रूखेसूखे में ही बचपन से जवानी तक के दिन बीते थे. अत: वह नौकरी छोड़ कर किसी किस्म का जोखिम मोल नहीं लेना चाहती थीं.

कनीजा बी का खयाल था कि अगर शादी के बाद उन के पति को कुछ हो गया तो उन की नौकरी एक बहुत बड़े सहारे के रूप में काम आ सकती थी.

वैसे भी पतिपत्नी दोनों के द्वारा अर्थोपार्जन से घर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सकती थी, जिंदगी मजे में गुजर सकती थी.

देखते ही देखते 4-5 साल का अरसा गुजर गया था और कनीजा बी की शादी की बात कहीं पक्की नहीं हो सकी थी. उन की उम्र भी दिनोदिन बढ़ती जा रही थी. अत: शादी की बात को ले कर मांबेटी परेशान रहने लगी थीं.

एक दिन पड़ोस के ही प्यारे मियां आए थे. वह उसी शहर के दूसरे महल्ले के रशीद का रिश्ता कनीजा बी के लिए लाए थे. उन के साथ एक महिला?भी थीं, जो स्वयं को रशीद की?भाभी बताती थीं.

रशीद एक छोटे से निजी प्रतिष्ठान में लेखाकार था और खातेपीते घर का था. कनीजा बी की नौकरी पर उसे कोई आपत्ति नहीं थी.

महल्लेपड़ोस वालों ने कनीजा बी की मां पर दबाव डाला था कि उस रिश्ते को हाथ से न जाने दें क्योंकि रिश्ता अच्छा है. वैसे भी लड़कियों के लिए अच्छे रिश्ते मुश्किल से आते हैं. फिर यह रिश्ता तो प्यारे मियां ले कर आए थे.

कनीजा बी की मां ने महल्लेपड़ोस के बुजुर्गों की सलाह मान कर कनीजा बी के लिए रशीद से रिश्ते की हामी?भर दी थी.?

कनीजा बी अपनी शादी की खबर सुन कर मारे खुशी के झूम उठी थीं. वह दिनरात अपने सुखी गृहस्थ जीवन की कल्पना करती रहती थीं.

और एक दिन वह घड़ी भी आ गई, जब कनीजा बी की शादी रशीद के साथ हो गई और वह मायके से विदा हो गईं. लेकिन ससुराल पहुंचते ही इस बात ने उन के होश उड़ा दिए कि जो महिला स्वयं को रशीद की भाभी बता रही थी, वह वास्तव में रशीद की पहली बीवी थी.

असलियत सामने आते ही कनीजा बी का सिर चकराने लगा. उन्हें लगा कि उन के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है और उन्हें फंसाया गया है. प्यारे मियां ने उन के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया था. वह मन ही मन तड़प कर रह गईं.

लेकिन जल्दी ही रशीद ने कनीजा बी के समक्ष वस्तुस्थिति स्पष्ट कर दी, ‘‘बेगम, दरअसल बात यह थी कि शादी के 7 साल बाद?भी जब हलीमा बी मुझे कोई औलाद नहीं दे सकी तो मैं औलाद के लिए तरसने लगा.

‘हम दोनों पतिपत्नी ने किसकिस डाक्टर से इलाज नहीं कराया, क्याक्या कोशिशें नहीं कीं, लेकिन नतीजा शून्य रहा. आखिर, हलीमा बी मुझ पर जोर देने लगी कि मैं दूसरी शादी कर लूं. औलाद और मेरी खुशी की खातिर उस ने घर में सौत लाना मंजूर कर लिया. बड़ी ही अनिच्छा से मुझे संतान सुख की खातिर दूसरी शादी का निर्णय लेना पड़ा.

‘मैं अपनी तनख्वाह में 2 बीवियों का बोझ उठाने के काबिल नहीं था. अत: दूसरी बीवी का चुनाव करते वक्त मैं इस बात पर जोर दे रहा था कि अगर वह नौकरी वाली हो तो बात बन सकती है. जब हमें, प्यारे मियां के जरिए तुम्हारा पता चला तो बात बनाने के लिए इस सचाई को छिपाना पड़ा कि मैं शादीशुदा हूं.

‘मैं झूठ नहीं बोलता. मैं संतान सुख की प्राप्ति की उत्कट इच्छा में इतना अंधा हो चुका था कि मुझे तुम लोगों से अपने विवाहित होने की सचाई छिपाने में कोई संकोच नहीं हुआ.

‘मैं अब महसूस कर रहा हूं कि यह अच्छा नहीं हुआ. सचाई तुम्हें पहले ही बता देनी चाहिए थी. लेकिन अब जो हो गया, सो हो गया.

‘वैसे देखा जाए तो एक तरह से मैं तुम्हारा गुनाहगार हुआ. बेगम, मेरे इस गुनाह को बख्श दो. मेरी तुम से गुजारिश है.’

कनीजा बी ने बहुत सोचविचार के बाद परिस्थिति से समझौता करना ही उचित समझा था, और वह अपनी गृहस्थी के प्रति समर्पित होती चली गई थीं.

कनीजा बी की शादी के बाद डेढ़ साल का अरसा गुजर गया था, लेकिन उन के भी मां बनने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे. उस के विपरीत हलीमा बी में ही मां बनने के लक्षण दिखाई दे रहे थे. डाक्टरी परीक्षण से भी यह बात निश्चित हो गई थी कि हलीमा बी सचमुच मां बनने वाली हैं.

हलीमा बी के दिन पूरे होते ही प्रसव पीड़ा शुरू हो गई, लेकिन बच्चा था कि बाहर आने का नाम ही नहीं ले रहा था. आखिर, आपरेशन द्वारा हलीमा बी के बेटे का जन्म हुआ. लेकिन हलीमा बी की हालत नाजुक हो गई. डाक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद वह बच नहीं सकी.

हलीमा बी की अकाल मौत से उस के बेटे गनी के लालनपालन की संपूर्ण जिम्मेदारी कनीजा बी पर आन पड़ी. अपनी कोख से बच्चा जने बगैर ही मातृत्व का बोझ ढोने के लिए कनीजा बी को विवश हो जाना पड़ा. उन्होंने उस जिम्मेदारी से दूर भागना उचित नहीं समझा. आखिर, गनी उन के पति की ही औलाद था.

रशीद इस बात का हमेशा खयाल रखा करता था कि उस के व्यवहार से कनीजा बी को किसी किस्म का दुख या तकलीफ न पहुंचे, वह हमेशा खुश रहें, गनी को मां का प्यार देती रहें और उसे किसी किस्म की कमी महसूस न होने दें.

कनीजा बी भी गनी को एक सगे बेटे की तरह चाहने लगीं. वह गनी पर अपना पूरा प्यार उड़ेल देतीं और गनी भी ‘अम्मीअम्मी’ कहता हुआ उन के आंचल से लिपट जाता.

अब गनी 5 साल का हो गया था और स्कूल जाने लगा था. मांबाप बेटे के उज्ज्वल भविष्य को ले कर सपना बुनने लगे थे.

इसी बीच एक हादसे ने कनीजा बी को अंदर तक तोड़ कर रख दिया.

वह मकर संक्रांति का दिन था. रशीद अपने चंद हिंदू दोस्तों के विशेष आग्रह पर उन के साथ नदी पर स्नान करने चला गया. लेकिन रशीद तैरतेतैरते एक भंवर की चपेट में आ कर अपनी जान गंवा बैठा.

रशीद की असमय मौत से कनीजा बी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन उन्होंने साहस का दामन नहीं छोड़ा.

उन्होंने अपने मन में एक गांठ बांध ली, ‘अब मुझे अकेले ही जिंदगी का यह रेगिस्तानी सफर तय करना है. अब और किसी पुरुष के संग की कामना न करते हुए मुझे अकेले ही वक्त के थपेड़ों से जूझना है.

‘पहला ही शौहर जिंदगी की नाव पार नहीं लगा सका तो दूसरा क्या पार लगा देगा. नहीं, मैं दूसरे खाविंद के बारे में सोच भी नहीं सकती.

‘फिर रशीद की एक निशानी गनी के रूप में है. इस का क्या होगा? इसे कौन गले लगाएगा? यह यतीम बच्चे की तरह दरदर भटकता फिरेगा. इस का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. मेरे अलावा इस का?भार उठाने वाला भी तो कोई नहीं.

‘इस के नानानानी, मामामामी कोई भी तो दिल खोल कर नहीं कहता कि गनी का बोझ हम उठाएंगे. सब सुख के साथी?हैं.

‘मैं गनी को लावारिस नहीं बनने दूंगी. मैं भी तो इस की कुछ लगती हूं. मैं सौतेली ही सही, मगर इस की मां हूं. जब यह मुझे प्यार से अम्मी कह कर पुकारता है तब मेरे दिल में ममता कैसे उमड़ आती है.

‘नहींनहीं, गनी को मेरी सख्त जरूरत है. मैं गनी को अपने से जुदा नहीं कर सकती. मेरी तो कोई संतान है ही नहीं. मैं इसे ही देख कर जी लूंगी.

‘मैं गनी को पढ़ालिखा कर एक नेक इनसान बनाऊंगी. इस की जिंदगी को संवारूंगी. यही अब जिंदगी का मकसद है.’

और कनीजा बी ने गनी की खातिर अपना सुखचैन लुटा दिया, अपना सर्वस्व त्याग दिया. फिर उसे एक काबिल और नेक इनसान बना कर ही दम लिया.

गनी पढ़लिख कर इंजीनियर बन गया.

उस दिन कनीजा बी कितनी खुश थीं जब गनी ने अपनी पहली तनख्वाह ला कर उन के हाथ पर रख दी. उन्हें लगा कि उन का सपना साकार हो गया, उन की कुरबानी रंग लाई. अब उन्हें मौत भी आ जाए तो कोई गम नहीं.

फिर गनी की शादी हो गई. वह नदीम जैसे एक प्यारे से बेटे का पिता भी बन गया और कनीजा बी दादी बन गईं.

कनीजा बी नदीम के साथ स्वयं भी खेलने लगतीं. वह बच्चे के साथ बच्चा बन जातीं. उन्हें नदीम के साथ खेलने में बड़ा आनंद आता. नदीम भी मां से ज्यादा दादी को चाहने लगा था.

उस दिन ईद थी. कनीजा बी का घर खुशियों से गूंज रहा था. ईद मिलने आने वालों का तांता लगा हुआ था.

गनी ने अपने दोस्तों तथा दफ्तर के सहकर्मियों के लिए ईद की खुशी में खाने की दावत का विशेष आयोजन किया था.

उस दिन कनीजा बी बहुत खुश थीं. घर में चहलपहल देख कर उन्हें ऐसा लग रहा था मानो दुनिया की सारी खुशियां उन्हीं के घर में सिमट आई हों.

गनी की ससुराल पास ही के शहर में थी. ईद के दूसरे दिन वह ससुराल वालों के विशेष आग्रह पर अपनी बीवी और बेटे के साथ स्कूटर पर बैठ कर ईद की खुशियां मनाने ससुराल की ओर चल पड़ा था.

गनी तेजी से रास्ता तय करता हुआ बढ़ा जा रहा था कि एक ट्रक वाले ने गाय को बचाने की कोशिश में स्टीयरिंग पर अपना संतुलन खो दिया. परिणामस्वरूप उस ने गनी के?स्कूटर को चपेट में ले लिया. पतिपत्नी दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए और डाक्टरों के अथक प्रयास के बावजूद बचाए न जा सके.

लेकिन उस जबरदस्त दुर्घटना में नन्हे नदीम का बाल भी बांका नहीं हुआ था. वह टक्कर लगते ही मां की गोद से उछल कर सीधा सड़क के किनारे की घनी घास पर जा गिरा था और इस तरह साफ बच गया था.

वक्त के थपेड़ों ने कनीजा बी को अंदर ही अंदर तोड़ दिया था. मुश्किल यह थी कि वह अपनी व्यथा किसी से कह नहीं पातीं. उन्हें मालूम था कि लोगों की झूठी हमदर्दी से दिल का बोझ हलका होने वाला नहीं.

उन्हें लगता कि उन की शादी महज एक छलावा थी. गृहस्थ जीवन का कोई भी तो सुख नहीं मिला था उन्हें. शायद वह दुख झेलने के लिए ही इस दुनिया में आई थीं.

रशीद तो उन का पति था, लेकिन हलीमा बी तो उन की अपनी नहीं थी. वह तो एक धोखेबाज सौतन थी, जिस ने छलकपट से उन्हें रशीद के गले मढ़ दिया था.

गनी कौन उन का अपना खून था. फिर भी उन्होंने उसे अपने सगे बेटे की तरह पालापोसा, बड़ा किया, पढ़ाया- लिखाया, किसी काबिल बनाया.

कनीजा बी गनी के बेटे का भी भार उठा ही रही थीं. नदीम का दर्द उन का दर्द था. नदीम की खुशी उन की खुशी थी. वह नदीम की खातिर क्या कुछ नहीं कर रही थीं. कनीजा बी नदीम को डांटतीमारती थीं तो उस के भले के लिए, ताकि वह अपने बाप की तरह एक काबिल इनसान बन जाए.

‘लेकिन ये दुनिया वाले जले पर नमक छिड़कते हैं और मासूम नदीम के दिलोदिमाग में यह बात ठूंसठूंस कर भरते हैं कि मैं उस की सगी दादी नहीं हूं. मैं ने तो नदीम को कभी गैर नहीं समझा. नहीं, नहीं, मैं दुनिया वालों की खातिर नदीम का भविष्य कभी दांव पर नहीं लगाऊंगी.’ कनीजा बी ने यादों के आंसू पोंछते हुए सोचा, ‘दुनिया वाले मुझे सौतेली दादी समझते हैं तो समझें. आखिर, मैं उस की सौतेली दादी ही तो हूं, लेकिन मैं नदीम को काबिल इनसान बना कर ही दम लूंगी. जब नदीम समझदार हो जाएगा तो वह जरूर मेरी नेकदिली को समझने लगेगा.

‘गनी को भी लोगों ने मेरे खिलाफ कम नहीं भड़काया था, लेकिन गनी को मेरे व्यवहार से जरा भी शंका नहीं हुई थी कि मैं उस की बुराई पर अमादा हूं.

अब नदीम का रोना भी बंद हो चुका था. उस का गुस्सा भी ठंडा पड़ गया था. उस ने चोर नजरों से दादी की ओर देखा. दादी की लाललाल आंखों और आंखों में भरे हुए आंसू देख कर उस से चुप न रहा गया. वह बोल उठा, ‘‘दादीजान, पड़ोस वाली चचीजान अच्छी नहीं हैं. वह झूठ बोलती हैं. आप मेरी सौतेली नहीं, सगी दादीजान हैं. नहीं तो आप मेरे लिए यों आंसू न बहातीं.

‘‘दादीजान, मैं जानता हूं कि आप को जोरों की भूख लगी है, अच्छा, पहले आप खाना तो खा लीजिए. मैं भी आप का साथ देता हूं.’’

नदीम की भोली बातों से कनीजा बी मुसकरा दीं और बोलीं, ‘‘बड़ा शरीफ बन रहा है रे तू. ऐसे क्यों नहीं कहता. भूख मुझे नहीं, तुझे लगी है.’’

‘‘अच्छा बाबा, भूख मुझे ही लगी है. अब जरा जल्दी करो न.’’

‘‘ठीक है, लेकिन पहले तुझे यह वादा करना होगा कि फिर कभी तू अपने मुंह से अपने अम्मीअब्बू के पास जाने की बात नहीं करेगा.’’

‘‘लो, कान पकड़े. मैं वादा करता हूं कि अम्मीअब्बू के पास जाने की बात कभी नहीं करूंगा. अब तो खुश हो न?’’

कनीजा बी के दिल में बह रही प्यार की सरिता में बाढ़ सी आ गई. उन्होंने नदीम को खींच कर झट अपने सीने से लगा लिया.

अब वह महसूस कर रही थीं, ‘दुनिया वाले मेरा दर्द समझें न समझें, लेकिन नदीम मेरा दर्द समझने लगा है.’

Hindi Fictional Story

Family Story: थोड़ा सा समय-सास और मां के अंतर को कैसे भूल गई जूही

Family Story: हनीमून से लौटते समय टैक्सी में बैठी जूही के मन में कई तरह के विचार आ जा रहे थे. अजय ने उसे खयालों में डूबा देख उस की आंखों के आगे हाथ लहरा कर पूछा, ‘‘कहां खोई हो? घर जाने का मन नहीं कर रहा है?’’

जूही मुसकरा दी, लेकिन ससुराल में आने वाले समय को ले कर उस के मन में कुछ घबराहट सी थी. दोनों शादी के 1 हफ्ते बाद ही सिक्किम घूमने चले गए थे. उन का प्रेमविवाह था. दोनों सीए थे और नरीमन में एक ही कंपनी में जौब करते थे.

अजय ब्राह्मण परिवार का बड़ा बेटा था. पिता शिवमोहन एक प्राइवेट कंपनी में अच्छे पद पर थे. मम्मी शैलजा हाउसवाइफ थीं और छोटी बहन नेहा अभी कालेज में थी. अजय का घर मुलुंड में था.

पंजाबी परिवार की इकलौती बेटी जूही कांजुरमार्ग में रहती थी. जूही के पिता विकास डाक्टर थे और मां अंजना हाउसवाइफ थीं. दोनों परिवारों को इस विवाह पर कोई एतराज नहीं था. विवाह हंसीखुशी हो गया. जूही को जो बात परेशान कर रही थी वह यह थी कि उस के औफिस जानेआने का कोई टाइम नहीं था. अब तक तो घर की कोई जिम्मेदारी उस पर नहीं थी, नरीमन से आतेआते कभी 10 बजते, तो कभी 11. जिस क्लाइंट बेसिस पर काम करती, पूरी टीम के हिसाब से उठना पड़ता. मायके में तो घर पहुंचते ही कपड़े बदल हाथमुंह धो कर डिनर करती और फिर सीधे बैड पर.

शनिवार और रविवार पूरा आराम करती थी. मन होता तो दोस्तों के साथ मूवी देखती, डिनर करती. वैसे भी मुंबई में औफिस जाने वाली ज्यादातर कुंआरी अविवाहित लड़कियों का यही रूटीन रहता है, हफ्ते के 5 दिन काम में खूब बिजी और छुट्टी के दिन आराम. जूही के 2-3 घंटे तो रोज सफर में कट जाते थे. वह हमेशा वीकैंड के लिए उत्साहित रहती.

जैसे ही अंजना दरवाजा खोलतीं, जूही एक लंबी सांस लेते हुए कहती थी, ‘‘ओह मम्मी, आखिर वीकैंड आ ही गया.’’ अंजना को उस पर बहुत स्नेह आता कि बेचारी बच्ची, कितनी थकान होती है पूरा हफ्ता.

जूही को याद आ रहा था कि जब बिदाई के समय उस की मम्मी रोए जा रही थीं तब उस की सासूमां ने उस की मम्मी के कंधे पर हाथ रख कर कहा था, ‘‘आप परेशान न हों. बेटी की तरह रहेगी हमारे घर. मैं बेटीबहू में कोई फर्क नहीं रखूंगी.’’

तब वहीं खड़ी जूही की चाची ने व्यंग्यपूर्वक धीरे से उस के कान में कहा, ‘‘सब कहने की बातें हैं. आसान नहीं होता बहू को बेटी समझना. शुरूशुरू में हर लड़के वाले ऐसी ही बड़ीबड़ी बातें करते हैं.’’

बहते आंसुओं के बीच में जूही को चाची की यह बात साफसाफ सुनाई दी थी. पहला हफ्ता तो बहुत मसरूफियत भर निकला. अब वे घूम कर लौट रहे थे, देखते हैं क्या होता है. परसों से औफिस भी जाना है. टैक्सी घर के पास रुकी तो जूही अजय के साथ घर की तरफ चल दी.

शिवमोहन, शैलजा और नेहा उन का इंतजार ही कर रहे थे. जूही ने सासससुर के पैर छू कर उन का आशीर्वाद लिया. नेहा को उस ने गले लगा लिया, सब एकदूसरे के हालचाल पूछते रहे.

शैलजा ने कहा, ‘‘तुम लोग फै्रश हो जाओ, मैं चाय लाती हूं.’’

जूही को थकान तो बहुत महसूस हो रही थी, फिर भी उस ने कहा, ‘‘नहीं मम्मीजी मैं बना लूंगी.’’

‘‘अरे थकी होगी बेटा, आराम करो और हां, यह मम्मीजी नहीं, अजय और नेहा मुझे मां ही कहते हैं, तुम भी बस मां ही कहो.’’ जूही ने झिझकते हुए सिर हिला दिया. अजय और जूही ने फ्रैश हो कर सब के साथ चाय पी. थोड़ी देर बाद शैलजा ने पूछा, ‘‘जूही, डिनर में क्या खाओगी?’’ ‘‘मां, जो बनाना है, बता दें, मैं हैल्प करती हूं.’’ ‘‘मैं बना लूंगी.’’ ‘‘लेकिन मां, मेरे होते हुए…’’

हंस पड़ीं शैलजा, ‘‘तुम्हारे होते हुए क्या? अभी तक मैं ही बना रही हूं और मुझे कोई परेशानी भी नहीं है,’’ कह कर शैलजा किचन में आ गईं तो जूही भी मना करने के बावजूद उन का हाथ बंटाती रही.

अगले दिन की छुट्टी बाकी थी. शिवमोहन औफिस और नेहा कालेज चली गई. जूही अलमारी में अपना सामान लगाती रही. सब अपनेअपने काम में व्यस्त रहे. अगले दिन साथ औफिस जाने के लिए अजय और जूही उत्साहित थे. दोनों लोकल ट्रेन से ही जाते थे. हलकेफुलके माहौल में सब ने डिनर साथ किया.

रात को सोने के समय शिवमोहन ने कहा ‘‘कल से जूही भी लंच ले जाएगी न?’’ ‘‘हां, क्यों नहीं?’’ ‘‘इस का मतलब कल से उस की किचन की ड्यूटी शुरू?’’ ‘‘ड्यूटी कैसी? जहां मैं अब तक 3 टिफिन पैक करती थी, अब 4 कर दूंगी, क्या फर्क पड़ता है?’’ शिवमोहन ने प्यार भरी नजरों से शैलजा को देखते हुए कहा, ‘‘ममतामयी सास बनोगी इस का कुछ अंदाजा तो था मुझे.’’ ‘‘आप से कहा था न कि जूही बहू नहीं बेटी बन कर रहेगी इस घर में.’’ शिवमोहन ने उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘लेकिन तुम्हें तो बहुत कड़क सास मिली थीं.’’

शैलजा ने फीकी हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘इसीलिए तो जूही को उन तकलीफों से बचाना है जो मैं ने खुद झेली हैं. छोड़ो, वह अम्मां का पुराना जमाना था, उन की सोच अलग थी, अब तो वे नहीं रहीं. अब उन बातों का क्या फायदा? अजय ने बताया था जूही को पनीर बहुत पसंद है. कल उस का पहला टिफिन तैयार करूंगी, पनीर ही बनाऊंगी, खुश हो जाएगी बच्ची.’’

शिवमोहन की आंखों में शैलजा के लिए तारीफ के भाव उभर आए. सुबह अलार्म बजा. जूही जब तक तैयार हो कर किचन में आई तो वहां 4 टिफिन पैक किए रखे थे. शैलजा डाइनिंग टेबल पर नाश्ता रख रही थीं.

जूही शर्मिंदा सी बोली. ‘‘मां, आप ने तो सब कर लिया.’’ ‘‘हां बेटा, नेहा जल्दी निकलती है. सब काम साथ ही हो जाता है. आओ, नाश्ता कर लो.’’ ‘‘कल से मैं और जल्दी उठ जाऊंगी.’’ ‘‘सब हो जाएगा बेटा, इतना मत सोचो. अभी तो मैं कर ही लेती हूं. तबीयत कभी बिगड़ेगी तो करना ही होगा और आगेआगे तो जिम्मेदारी संभालनी ही है, अभी ये दिन आराम से बिताओ, खुश रहो.’’

अजय भी तैयार हो कर आ गया था. बोला, ‘‘मां, लंच में क्या है?’’ ‘‘पनीर.’’जूही तुरंत बोली, ‘‘मां यह मेरी पसंदीदा डिश है.’’ अजय ने कहा, ‘‘मैं ने ही बताया है मां को. मां, अब क्या अपनी बहू की पसंद का ही खाना बनाओगी?’’ जूही तुनकी, ‘‘मां ने कहा है न उन के लिए बहू नहीं, बेटी हूं.’’ नेहा ने घर से निकलतेनिकलते हंसते हुए कहा, ‘‘मां, भाभी के सामने मुझे भूल त जाना.’’ शिवमोहन ने भी बातों में हिस्सा लिया, ‘‘अरे भई, थोड़ा तो सास वाला रूप दिखाओ, थोड़ा टोको, थोड़ा गुस्सा हो, पता तो चले घर में सासबहू हैं.’’ सब जोर से हंस पड़े. शैलजा ने कहा, ‘‘सौरी, यह तो किसी को पता नहीं चलेगा कि घर में सासबहू हैं.’’ सब हंसतेबोलते घर से निकल गए.

थोड़ी देर बाद ही मेड श्यामाबाई आ गई. शैलजा घर की सफाई करवाने लगी. अजय के कमरे में जा कर श्यामा ने आवाज दी, ‘‘मैडम, देखो आप की बहू कैसे सामान फैला कर गई हैं.’’ शैलजा ने जा कर देखा, हर तरफ सामान बिखरा था, उन्हें हंसी आ गई. श्यामा ने पूछा, ‘‘मैडम, आप हंस रही हैं?’’ शैलजा ने कहा, ‘‘आओ, मेरे साथ,’’ शैलजा उसे नेहा के कमरे में ले गई. वहां और भी बुरा हाल था.

शैलजा ने कहा, ‘‘यहां भी वही हाल है न? तो चलो अब हर जगह सफाई कर लो जल्दी.’’ श्यामा 8 सालों से यहां काम कर रही थी. अच्छी तरह समझती थी अपनी शांतिपसंद मैडम को, अत: मुसकराते हुए अपने काम में लग गई. जूही फोन पर अपने मम्मीपापा से संपर्क में रहती ही थी. शादी के बाद आज औफिस का पहला दिन था. रास्ते में ही अंजना का फोन आ गया. हालचाल के बाद पूछा, ‘‘आज तो सुबह कुछ काम भी किए होंगे?’’

शैलजा की तारीफ के पुल बांध दिए जूही ने. तभी अचानक जूही को कुछ याद आया. बोली, ‘‘मम्मी, मैं बाद में फोन करती हूं,’’ फिर तुरंत सासूमां को फोन मिलाया. शैलजा के हैलो कहते ही तुरंत बोली, ‘‘सौरी मां, मैं अपना रूम बहुत बुरी हालत में छोड़ आई हूं… याद ही नहीं रहा.’’‘‘श्यामा ने ठीक कर दिया है.’’‘सौरी मां, कल से…’’ ‘‘सब आ जाता है धीरेधीरे. परेशान मत हो.’’

शैलजा के स्नेह भरे स्वर पर जूही का दिल भर आया. अजय और जूही दिन भर व्यस्त रहे. सहकर्मी बीचबीच में दोनों को छेड़ कर मजा लेते रहे. दोनों रात 8 बजे औफिस से निकले तो थकान हो चुकी थी. जूही का तो मन कर रहा था, सीधा जा कर बैड पर लेटे. लेकिन वह मायका था अब ससुराल है.

10 बजे तक दोनों घर पहुंचे. शिवमोहन, शैलजा और नेहा डिनर कर चुके थे. उन दोनों का टेबल पर रखा था. हाथ धो कर जूही खाने पर टूट पड़ी. खाने के बाद उस ने सारे बरतन समेट दिए. शैलजा ने कहा, ‘‘तुम लोग अब आराम करो. हम भी सोने जा रहे हैं.’’ शैलजा लेटीं तो शिवमोहन ने कहा, ‘‘तुम भी थक गई होगी न?’’‘‘हां, बस अब सोना ही है.’’‘‘काम भी तो बढ़ गया होगा?’’ ‘‘कौन सा काम?’’ ‘‘अरे, एक और टिफिन…’’

‘‘6 की जगह 8 रोटियां बन गईं तो क्या फर्क पड़ा? सब की तो बनती ही हैं और आज तो मैं ने इन दोनों का टिफिन अलगअलग बना दिया. कल से एकसाथ ही पैक कर दूंगी. खाना बच्चे साथ ही तो खाएंगे, जूही का खाना बनाने से मुझ पर कोई अतिरिक्त काम आने वाली बात है ही नहीं.’’

‘‘तुम हर बात को इतनी आसानी से कैसे ले लेती हो, शैल?’’

‘‘शांति से जीना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है, बस हम औरतें ही अपने अहं, अपनी जिद में आ कर अकसर घर में अशांति का कारण बन जाती हैं. जैसे नेहा को भी अभी कोई काम करने की ज्यादा आदत नहीं है वैसे ही वह बच्ची भी तो अभी आई है. आजकल की लड़कियां पहले पढ़ाई, फिर कैरियर में व्यस्त रहती हैं. इतना तो मैं समझती हूं आसान नहीं है कामकाजी लड़कियों का जीवन. अरे मैं तो घर में रहती हूं, थक भी गई तो दिन में थोड़ा आराम कर लूंगी. कभी नहीं कर पाऊंगी तो श्यामा है ही, किचन में हैल्प कर दिया करेगी, जूही पर घर के भी कामों का क्या दबाव डालना. नेहा को ही देख लो, कालेज और कोचिंग के बाद कहां हिम्मत होती है कुछ करने की, ये लड़कियां घर के काम तो समय के साथसाथ खुद ही सीखती चली जाती हैं. बस, थोड़ा सा समय लगता है.’’

शैलजा अपने दिल की बातें शेयर कर रही थीं, ‘‘अभी नईनई आई है, आते ही किसी बात पर मन दुखी हो गया तो वह बात दिल में एक कांटा बन कर रह जाएगी जो हमेशा चुभती रहेगी. मैं नहीं चाहती उसे किसी बात की चुभन हो,’’ कह कर वे सोने की तैयारी करने लगीं, बोलीं, ‘‘चलो, अब सो जाते हैं.’’

उधर अजय की बांहों का तकिया बना कर लेटी जूही मन ही मन सोच रही थी, आज शादी के बाद औफिस का पहला दिन था. मां के व्यवहार और स्वभाव में कितना स्नेह है. अगर उन्होंने मुझे बेटी माना है तो मैं भी उन्हें मां की तरह ही प्यार और सम्मान दूंगी. पिछले 15 दिनों से चाची की बात दिल पर बोझ की तरह रखी थी, लेकिन इस समय उसे अपना दिल फूल सा हलका लगा, बेफिक्री से आंखें मूंद कर उस ने अपना सिर अजय के सीने पर रख दिया.

Family Story

Hindi Family Story: नया द्वार- मनोज की मां ने कैसे बनाई बहू के दिल में जगह

Hindi Family Story: एक दिन रास्ते में रेणु भाभी मिल गईं. बड़ी उदास, दुखी लग रही थीं. मैं ने कारण पूछा तो उबल पड़ीं. बोलीं, ‘‘क्या बताऊं तुम्हें? माताजी ने तो हमारी नाक में दम कर रखा है. गांव में पड़ी थीं अच्छीखासी. इन्हें शौक चर्राया मां की सेवा का. ले आए मेरे सिर पर मुसीबत. अब मैं भुगत रही हूं.’’

भाभी की आवाज कुछ ऊंची होती जा रही थी, कुछ क्रोध से, कुछ खीज से. रास्ते में आतेजाते लोग अजीब नजरों से हमें घूरते जा रहे थे. मैं ने धीरे से उन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘चलो न, भाभी, पास ही किसी होटल में चाय पी लें. वहीं बातें भी हो जाएंगी.’’

भाभी मान गईं और तब मुझे उन का आधा कारण मालूम हुआ.

रेणु भाभी मेरी रिश्ते की भाभी नहीं हैं, पर उन के पति मनोज भैया और मेरे पति एक ही गांव के रहने वाले हैं. इसी कारण हम ने उन दोनों से भैयाभाभी का रिश्ता जोड़ लिया है.

मनोज भैया की मां मझली चाची के नाम से गांव में काफी मशहूर हैं. बड़ी सरल, खुशमिजाज और परोपकारी औरत हैं. गरीबी में भी हिम्मत से इकलौते बेटे को पढ़ाया. तीनों बेटियों की शादी की.

अब पिछले कुछ वर्षों से चाचा की मृत्यु के बाद, मनोज भैया उन्हें शहर लिवा लाए. कह रहे थे कि वहां मां के अकेली होने के कारण यहां उन्हें चिंता सताती रहती थी. फिर थोड़ेबहुत रुपए भी खर्चे के लिए भेजने पड़ते थे.

‘‘तभी से यह मुसीबत मेरे पल्ले पड़ी है,’’ रेणु भाभी बोलीं, ‘‘इन्हीं का खर्चा चलाने के लिए तो मैं ने भी नौकरी कर ली. कहीं इन्हें बुढ़ापे में खानेपीने, पहनने- ओढ़ने की कमी न हो. पर अब तो उन के पंख निकल आए हैं,’’

‘‘सो कैसे?’’

‘‘तुम ही घर आ कर देख लेना,’’ भाभी चिढ़ कर बोलीं, ‘‘अगर हो सके तो समझा देना उन्हें. घर को कबाड़खाना बनाने पर तुली हुई हैं. दीपक भैया को भी साथ लाएंगी तो वह शायद उन्हें समझा पाएंगे. बड़ी प्यारी लगती हैं न उन्हें मझली चाची?’’

चाय खत्म होते ही रेणु भाभी उठ खड़ी हुईं और बात को ठीक तरह से समझाए बिना ही चली गईं.

मैं ने अपने पति दीपक को रेणु भाभी के वक्तव्य से अवगत तो करा दिया था, लेकिन बच्चों की परीक्षाएं, घर के अनगिनत काम और बीचबीच में टपक पड़ने वाले मेहमानों के कारण हम लोग चाची के घर की दिशा भूल से गए.

तभी एक दिन मेरी मौसेरी बहन सुमन दोपहर को मिलने आई. उस ने एम.ए., बी.एड कर रखा था, पर दोनों बच्चे छोटे होने के कारण नौकरी नहीं कर पा रही थी. हालांकि उस के परिवार को अतिरिक्त आय की आवश्यकता थी. न गांव में अपना खुद का घर था, न यहां किराए का घर ढंग का था. 2 देवर पढ़ रहे थे. उन का खर्चा वही उठाती थी. सास बीमार थी, इसलिए पोतों की देखभाल नहीं कर सकती थी. ससुर गांव की टुकड़ा भर जमीन को संभाल कर जैसेतैसे अपना काम चलाते थे.

फिर भी सुमन की कार्यकुशलता और स्नेह भरे स्वभाव के कारण परिवार खुश रहता था. जब भी मैं उसे देखती, मेरे मन में प्यार उमड़ पड़ता. मैं प्रसन्न हो जाती.

उस दिन भी वह हंसती हुई आई. एक बड़ा सा पैकेट मेरे हाथ में थमा कर बोली, ‘‘लो, भरपेट मिठाई खाओ.’’

‘‘क्या बात है? इस परिवार नियोजन के युग में कहीं अपने बेटों के लिए बहन के आने की संभावना तो नहीं बताने आई?’’ मैं ने मजाक में पूछा.

‘‘धत दीदी, अब तो हाथ जोड़ लिए. रही बहन की बात तो तुम्हारी बेटी मेरे शरद, शिशिर की बहन ही तो है.’’

‘‘पर मिठाई बिना जाने ही खा लूं?’’

‘‘तो सुनो, पिछले 2 महीने से मैं खुद के पांवों पर खड़ी हो गई हूं. यानी कि नौ…क…री…’’ उस ने खुशी से मुझे बांहों में भर लिया. बिना मिठाई खाए ही मेरा मुंह मीठा हो गया. तभी मुझे उस के बच्चों की याद आई, ‘‘और शरद, शिशिर उन्हें कौन संभालता है? तुम कब जाती हो, कब आती हो, कहां काम करती हो?’’

‘‘अरे…दीदी, जरा रुको तो, बताती हूं,’’ उस ने मिठाई का पैकेट खोला, चाय छानी, बिस्कुट ढूंढ़ कर सजाए तब कुरसी पर आसन जमा कर बोली, ‘‘सुनो अब. नौकरी एक पब्लिक स्कूल में लगी है. तनख्वाह अच्छी है. सवेरे 9 बजे से शाम को 4 बजे तक. और बच्चे तुम्हारी मझली चाची के पास छोड़ कर निश्ंिचत हो जाती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘जी हां. मझली चाची कई बच्चों को संभालती हैं. बहुत प्यार से देखभाल करती हैं.’’

खापी कर पीछे एक खुशनुमा ताजगी में फंसे हुए प्रश्न मेरे लिए छोड़ कर सुमन चली गई. मझली चाची ऐसा क्यों कर रही थीं? रेणु भाभी क्या इसी कारण से नाराज थीं?

‘‘बात तो ठीक है,’’ शाम को दीपक ने मेरे प्रश्नों के उत्तर में कहा, ‘‘फिर भैयाभाभी दोनों कमाते हैं. मझली चाची के कारण उन्हें समाज की उठती उंगलियां सहनी पड़ती होंगी. हमें चाची को समझाना चाहिए.’’

‘‘दीपक, कभी दोपहर को बिना किसी को बताए पहुंच कर तमाशा देखेंगे और चाची को अकेले में समझाएंगे. शायद औरों के सामने उन्हें कुछ कहना ठीक नहीं होगा,’’ मैं ने सुझाव दिया.

दीपक ने एक दिन दोपहर को छुट्टी ली और तब हम अचानक मनोज भैया के घर पहुंचे.

भैयाभाभी काम पर गए हुए थे. घर में 10 बच्चे थे. मझली चाची एक प्रौढ़ा स्त्री के साथ उन की देखभाल में व्यस्त थीं. कुछ बच्चे सो रहे थे. एक को चाची बोतल से दूध पिला रही थीं. उन की प्रौढ़ा सहायिका दूसरे बच्चे के कपड़े बदल रही थी.

चाची बड़ी खुश नजर आ रही थीं. साफ कपड़े, हंसती आंखें, मुख पर संतोष तथा आत्मविश्वास की झलक. सेहत भी कुछ बेहतर ही लग रही थी.

‘‘चाचीजी, आप ने तो अच्छीखासी बालवाटिका शुरू कर दी,’’ मैं ने नमस्ते कर के कहा.

चाची हंस कर बोलीं, ‘‘अच्छा लगता है, बेटी. स्वार्थ के साथ परमार्थ भी जुटा रही हूं.’’

‘‘पर आप थक जाती होंगी?’’ दीपक ने कहा, ‘‘इतने सारे बच्चे संभालना हंसीखेल तो नहीं.’’

‘‘ठहरो, चाय पी कर फिर तुम्हारी बात का जवाब दूंगी,’’ वह सहायिका को कुछ हिदायतें दे कर रसोईघर में चली गईं, ‘‘यहीं आ जाओ, बेटे,’’ उन्होंने हम दोनों को भी बुला लिया.

‘‘देखो दीपक, अपने पोतेपोती के पीछे भी तो मैं दौड़धूप करती ही थी? तब तो कोई सहायिका भी नहीं थी,’’ चाची ने नाश्ते की चीजें निकालते हुए कहा, ‘‘अब ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की उम्र है न मेरी? इन सभी को पोतेपोतियां बना लिया है मैं ने.’’

फिर मेरी ओर मुड़ कर कहा, ‘‘तुम्हारी सुमन के भी दोनों नटखट यहीं हैं. सोए हुए हैं. दोपहर को सब को घंटा भर सुलाने की कोशिश करते हैं. शाम को 5 बजे मेरा यह दरबार बरखास्त हो जाता है. तब तक मनोज के बच्चे शुचि और राहुल भी आ जाते हैं.’’

‘‘पर चाची, आप…आप को आराम छोड़ कर इस उम्र में ये सब झमेले? क्या जरूरत थी इस की?’’

‘‘तुम से एक बात पूछूं, बेटी? तुम्हारे मांपिताजी तुम्हारे भैयाभाभी के साथ रहते हैं न? खुश हैं वह?’’

मेरी आंखों के सामने भाभी के राज में चुप्पी साधे, मुहताज से बने मेरे वृद्ध मातापिता की सूरतें घूम गईं. न कहीं जाना न आना. कपड़े भी सब की जरूरतें पूरी करने के बाद ही उन के लिए खरीदे जाते. वे दोनों 2 कोनों में बैठे रहते. किसी के रास्ते में अनजाने में कहीं रोड़ा न बन जाएं, इस की फिक्र में सदा घुलते रहते. मेरी आंखें अनायास ही नम हो आईं.

चाची ने धीरे से मेरे बाल सहलाए. ‘‘बेटी, तू दीपक को मेरी बात समझा सकेगी. मैं तेरी आंखों में तेरे मातापिता की लाचारी पढ़ सकती हूं, लेकिन जब तुझ पर किसी वयोवृद्ध का बोझ आ पड़े, तब आंखों की इस नमी को याद रखना.’’

दीपक के चेहरे पर प्रश्न था.

‘‘सुनो बेटे, पति की कमाई या मन पर जितना हक पत्नी का होता है उतना बेटे की कमाई या मन पर मां का नहीं होता. इस कारण से आत्मनिर्भर होना मेरे लिए जरूरी हो गया था. रही काम की बात तो पापड़बडि़यां, अचारमुरब्बे बनाना भी तो काम ही है, जिन्हें करते रहने पर भी करने वालों की कद्र नहीं की जाती. घर में रह कर भी अगर ये काम हम ने कर भी लिए तो कौन सा शेर मार दिया? बहू कमाएगी तो सास को यह सबकुछ तो करना ही पड़ेगा,’’ चाची ने एक गहरी सांस ली.

‘‘कब आते हैं बच्चे?’’ दीपक ने हौले से पूछा.

‘‘9 बजे से शुरू हो जाते हैं. कोई थोड़ी देर से या जल्दी भी आ जाते हैं कभीकभी. मेरी सहायिका पार्वती भी जल्दी आ जाती है. उसे भी मैं कुछ देती हूं. वह खुशी से मेरा हाथ बंटाती है.’’

‘‘और भी बच्चों के आने की गुंजाइश है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘पूछने तो आते हैं लोग, पर मैं मना कर देती हूं. इस से ज्यादा रुपयों की मुझे आवश्यकता नहीं. सेहत भी संभालनी है न?’’

चाय खत्म हो चुकी थी. सोए हुए बच्चों के जागने का समय हो रहा था. इसलिए ‘नमस्ते’ कह कर हम चलना ही चाहते थे कि चाची ने कहा, ‘‘बेटी, दीवाली के बाद मैं एक यात्रा कंपनी के साथ 15 दिन घूमने जाने की बात सोच रही हूं. अगर तुम्हारे मातापिता भी आना चाहें तो…’’

मैं चुप रही. भैयाभाभी इतने रुपए कभी खर्च न करेंगे. मैं खुद तो कमाती नहीं.

चाची को भी मनोज भैया ने कई बहानों से यात्रा के लिए कभी नहीं जाने दिया था. उन की बेटियां भी ससुराल के लोगों को पूछे बिना कोई मदद नहीं कर सकती थीं. अब चाची खुद के भरोसे पर यात्रा करने जा रही थीं.

‘‘सुनीता के मातापिता भी आप के साथ जरूर जाएंगे, चाची,’’ अचानक दीपक ने कहा, ‘‘आप कुछ दिन पहले अपने कार्यक्रम के बारे में बता दीजिएगा.’’

रेणु भाभी और मनोज भैया की नाराजगी का साहस से सामना कर के मझली चाची ने एक नया द्वार खोल लिया था अपने लिए, देखभाल की जरूरत वाले बच्चों के लिए और सुमन जैसी सुशिक्षित, जरूरतमंद माताओं के लिए.

हरेक के लिए इतना साहस, इतना धैर्य, इतनी सहनशीलता संभव तो नहीं. पर अगर यह नहीं तो दूसरा कोई दरवाजा तो खुल ही सकता है न?

जीवन बहुत बड़ा उपहार है हम सब के लिए. उसे बोझ समझ कर उठाना या उठवाना कहां तक उचित है? क्यों न अंतिम सांस तक खुशी से, सम्मान से जीने की और जिलाने की कोशिश की जाए? क्यों न किसी नए द्वार पर धीरे से दस्तक दी जाए? वह द्वार खुल भी तो सकता है.

Hindi Family Story

Best Hindi Story: ठूंठ से लिपटी बेल- रूपा को आखिर क्या मिला

Best Hindi Story: रूपा के आफिस में पांव रखते ही सब की नजरें एक बारगी उस की ओर उठ गईं और तुरंत सब फिर अपनेअपने काम में व्यस्त हो गए. सब की नजरों में छिपा कौतूहल दूर अपनी मेज पर बैठे मैं ने देख लिया था. मेरे पास से निकल कर अपनी मेज तक जाते रूपा ने मेरे कंधे पर हलके हाथ से दबाव दे कर कहा, ‘हैलो, स्वीटी.’ उस की इस शरारत पर मैं भी मुसकरा दी.

रूपा में आया परिवर्तन मुझे भी दिखाई पड़ रहा था पर मैं चाहती थी वह खुद ही खुले. मैं जानती थी वह अधिक दिनों तक अपना कोई भी सुखदुख मुझ से छिपा नहीं सकती. हमेशा बुझीबुझी और उदास रहने वाली रूपा को मैं वर्षों से जानती थी. उसे किसी ने हंसतेचहकते शायद ही कभी देखा हो. हंसने, खुश रहने के लिए उस के पास था ही क्या? छोटी उम्र में मां का साया उठ गया था. मां के रहने का दुख शायद कभी भुलाया भी जा सकता था, पर जिस हालात में मां मरी थीं वह भुलाना बहुत ही मुश्किल था.

शराबी बाप के अत्याचारों से मांबेटी हमेशा पीडि़त रहती थीं. मां स्कूल में पढ़ाती थीं और जो तनख्वाह मिलती उस से तो पिताजी की पूरे महीने की शराब भी मुश्किल से चलती थी. पैसे न मिलने पर रूपा के पिता रतनलाल घर का कोई भी सामान उठा कर बेच आते थे. जरा सा भी विरोध उन्हें आक्रामक बना देता. मांबेटी को रुई की तरह धुन कर रख देते.

धीरेधीरे रूपा की मां भूख, तनाव और मारपीट सहतेसहते एक दिन चुपचाप बिना चीखेचिल्लाए चल बसीं. उस वक्त रूपा 9वीं कक्षा में पढ़ती थी. बिना मां की किशोर होती बेटी को एक दिन मौसी आ कर उस को अपने साथ ले गईं. मौसी तो अच्छी थीं, पर उन के बच्चों को रूपा फूटी आंखों न भाई.

मौसी के घर की पूरी जिम्मेदारी धीरेधीरे रूपा पर आ गई. किसी तरह वहीं रह कर रूपा ने ग्रेजुएशन किया. ग्रेजुएशन करते ही रतनलाल आ धमके और सब के विरोध के बावजूद रूपा को अपने साथ ले गए. इतने दिनों बाद उन की ममता उमड़ने का कारण जल्दी ही रूपा की समझ में आ गया. उन्होंने उस के लिए एक नौकरी का प्रबंध कर रखा था.

रूपा की नौकरी लगने के बाद कुछ दिनों तक तो रतनलाल थोड़ेथोड़े कर के शराब के लिए पैसे ऐंठते रहे फिर धीरेधीरे उन की मांग बढ़ती गई. पैसे न मिलने पर चीखतेचिल्लाते और गालियां बकते थे. रूपा 2-3 साडि़यों को साफसुथरा रख कर किसी तरह अपना काम चलाती. चेहरे पर मेघ छाए रहते. सारे सहयोगी उस की जिंदगी से परिचित थे. सभी का व्यवहार उस से बहुत अच्छा था. लंच में चाय तक के लिए उस के पास पैसे न रहते. मैं कभीकभार ही चायनाश्ते  के लिए उसे राजी कर पाती. पूछने पर वह अपनी परेशानियां मुझे बता भी देती थी.

इधर करीब महीने भर से रूपा में एक खास परिवर्तन आया था, जो तुरंत सब की नजरों ने पकड़ लिया. 33 साल की नीरस जिंदगी में शायद पहली बार उस ने ढंग से बाल संवारे थे. उदास होंठों पर एक मदहोश करने वाली मुसकराहट थी. आंखें भी जैसे छलकता जाम हों.

मैं ने सोचा शायद आजकल रूपा के पिता सुधर रहे हों…यह सब इसी कारण हो. करीब 1 माह पहले ही तो रूपा ने एक दिन बताया था कि कैसे चीखतेचिल्लाते और गालियां बकते पिता को रवि भाई समझाबुझा कर बाहर ले गए थे. करीब 1 घंटे बाद पिताजी नशे में धुत्त खुशीखुशी लौटे थे और बिना शोर किए चुपचाप सो गए थे. रवि भाई उस के मौसेरे भाई के दोस्त हैं. पहले 1-2 बार मौसी के घर पर ही मुलाकात हुई थी. अब इसी शहर में बिजनेस कर रहे हैं.

ऐसे ही रूपा ने बातचीत के दौरान बताया था कि अब पिताजी चीखते-चिल्लाते नहीं, क्योंकि रवि भाई की दुकान पर बैठे रहते हैं. काफी रात गए वहीं से पी कर आते हैं और चुपचाप सो जाते हैं.

2 महीने बाद अचानक एक दिन सुबहसुबह रूपा मेरे घर आ पहुंची. बहुत खुश नजर आ रही थी. जैसे जल्दीजल्दी बहुत कुछ बता देना चाहती हो पर मुझे व्यस्त देख उस ने जल्दीजल्दी मेरे काम में मेरा हाथ बंटाना शुरू कर दिया. नाश्ता मेज पर सजा दिया. मुन्ने को नहला कर स्कूल के लिए तैयार कर दिया. पति व बच्चों को भेज कर जब हम दोनों नाश्ता करने बैठीं तो आफिस जाने में अभी डेढ़ घंटा बचा था. रूपा ने ऐलान कर दिया कि आज आफिस से छुट्टी करेंगे. मैं ने आश्चर्य से कहा, ‘‘क्यों भई, छुट्टी किसलिए. डेढ़ घंटे में तो पूरा नावेल पढ़ा जा सकता है…सुना भी जा सकता है.’’

पर वह डेढ़ घंटे में सिर्फ एक लाइन ही बोल पाई, ‘‘मैं रवि से शादी कर लूं, रत्ना?’’ मैं जैसे आसमान से गिरी, ‘‘रवि से? पर वह तो…’’

‘‘शादीशुदा है, बच्चों वाला है, यही न?’’ मैं आगे सुनने के लिए चुप रही. रूपा ने अपनी छलकती आंखें उठाईं, ‘‘मेरी उम्र तो देख रत्ना, इस साल 34 की हो जाऊंगी. पिताजी मेरी शादी कभी नहीं करेंगे. उन्होंने तो आज तक एक बार भी नहीं कहा कि रूपा के हाथ पीले करने हैं. मुझे…एक घर…एक घर चाहिए, रत्ना. रवि मुझे बहुत चाहते हैं. मेरा बहुत खयाल रखते हैं. आजकल रवि के कारण पिताजी ऊधम भी नहीं करते. रवि के कारण ही मैं चैन की सांस ले पाई हूं. शादी के बाद मैं रवि के पास रहूंगी. पिताजी यहीं अकेले रहें और चीखेंचिल्लाएं.’’

मुझे उस की बुद्धि पर तरस आया. मैं ने कहा, ‘‘यहां तो अकेले पिताजी हैं, वहां सौत और उस के बच्चों के बीच रह कर किस सुख की कल्पना की है तू ने? जरा मैं भी तो सुनूं?’’

उस ने मेरे गले में बांहें डाल दीं, ‘‘ओह रत्ना, तुम समझती क्यों नहीं. वहां मेरे साथ रवि हैं फिर मुझे नौकरी करने की भी जरूरत नहीं. रवि की पत्नी बिलकुल बदसूरत और देहाती है. रवि मेरे बिना रह ही नहीं सकते.’’

इस के बाद की घटनाएं बड़ी तेजी से घटीं. रूपा से तो मुलाकात नहीं हुई, बस, उस की 1 महीने की छुट्टी की अर्जी आफिस में मैं ने देखी. एक दिन सुना दोनों ने कहीं दूसरी जगह जा कर कोर्ट मैरिज कर ली है. इस बीच मुझे दूसरी जगह अच्छी नौकरी मिल गई. जहां मेरा आफिस था वहां से बच्चों का स्कूल भी पास था. इसलिए मेरे पति ने भागदौड़ कर उसी इलाके में मकान का इंतजाम भी कर लिया. इस भागमभाग में मुझे रूपा के बारे में उठती छिटपुट खबरें ही मिलीं कि रूपा उसी आफिस में नौकरी कर रही है, फिर सुना रूपा 1 बेटी की मां बन गई है.

एक ही शहर में रहते हुए भी हमारी मुलाकात एक शादी में 10 साल बाद हुई. करीब 9 साल की बेटी भी उस के साथ थी. देखते ही आ कर लिपट गई. मैं ने पूछा, ‘‘रवि नहीं आए?’’

ठंडा सा जवाब था रूपा का, ‘‘उन्हें अपने काम से फुरसत ही कहां है.’’

रूपा का कुम्हलाया चेहरा यह कहते और बेजान हो गया. उस की बेटी का उदास चेहरा भी झुक गया. मैं ने पूछा, ‘‘रूपा, तुम्हारे पिताजी आजकल कैसे हैं?’’

‘‘वैसे ही जैसे थे,’’ वह बोली.

‘‘कहां रहते हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कभी मेरे पास, कभी गांव में जमीनजायदाद बेचते हैं. पीते रहते हैं, शहर आते हैं तो मैं हूं ही पैसे देने के लिए. महीने में 8-10 दिन यहीं मेरे पास रहते हैं. गांव में पिक्चर हाल जो नहीं है. वहां बोर हो जाते हैं.’’

‘‘पैसे देने से मना क्यों नहीं कर देतीं.’’

‘‘मना करती हूं तो ऐसी भद्दी और गंदी गालियां देते हैं कि सारा महल्ला सुनता है. मेरी बेटी डर कर रोती है. पढ़- लिख नहीं पाती.’’

‘‘घर के बाकी लोग कुछ नहीं कहते. रवि कुछ नहीं कहते?’’

‘‘बाकी कौन से लोग हैं? मैं तो अपने उसी घर में रहती हूं. रात को रवि 10 बजे आते हैं, 12-1 बजे चले जाते हैं. वह भी एक दिन छोड़ कर. बस, हमारा पतिपत्नी का नाता यही 2-3 घंटे का है. घर खर्च देना नहीं पड़ता, कारण, मैं कमाती हूं न.’’

‘‘भई, कुछ तो खर्चा देते ही होंगे. तुझे न सही अपनी बेटी को ही.’’

‘‘और क्या देंगे जब शाबाशी तक तो दे नहीं सकते. नीलूहर साल फर्स्ट आती है. कभी टौफी तक ला कर नहीं दी.’’

नीलू का चेहरा और बुझ गया था. उस का सिर झुक गया. मेरा मन भर आया. बोली, ‘‘पागल, मैं ने तो तुझे पहले ही समझाना चाहा था पर…’’

रूपा की आंखें छलक गईं, ‘‘क्या करती, रत्ना? मुझ जैसी बेसहारा बेल के लिए तो ठूंठ का सहारा भी बड़ी बात थी. फिर वह तो…’’

इतने में हमारे पास 2-3 महिलाएं और आ बैठीं. मैं ने बात बदल दी, ‘‘भई, तेरी बेटी 9 साल की हो गई, अब तो 1 बेटा हो जाना चाहिए था,’’ फिर धीरे से कहा, ‘‘1 बेटा हो जाए तो तुम दोनों का सहारा बने, और नीलू को भाई भी मिल जाए.’’

अचानक नीलू हिचकियां ले कर रोने लगी, ‘‘नहीं चाहिए मुझे भाई, नहीं चाहिए.’’

मैं सहम गई, ‘‘क्या हो गया नीलू बेटे…क्या बात है मुझे बताओ?’’ नीलू को मैं ने गोद में समेट लिया. उस ने हिचकियों के बीच जो कहा सुन कर मैं सन्न रह गई.

‘‘मौसी, वह भी नाना और पापा की तरह मां को तंग करेगा. वह भी लड़का है.’’

मैं हैरान सी उसे गोद में समेटे बैठी उस के भविष्य के बारे में सोचती रह गई. इस नन्ही सी उम्र में उस ने 2 ही पुरुष देखे, एक नाना और दूसरा पापा. दोनों ने उस के कोमल मन पर पुरुष मात्र के लिए एक खौफ और नफरत पैदा कर दी थी.

हम चलने लगे तो रूपा भी चल दी. गेट के बाहर निकले तो रवि को एक महिला के साथ अंदर जाते देखा. समझते देर नहीं लगी कि यह उस की पहली पत्नी है. सेठानियों जैसी गर्वीली चाल, कमर से लटकता चाबियों का गुच्छा और जेवरों से लदी उस अनपढ़ सांवली के चेहरे की चमक के सामने रूपा का गोरा रंग, सुंदर देह, खूबसूरत नाकनक्श, कुम्हलाया सा चेहरा फीका पड़ गया. एक के चेहरे पर पत्नी के अधिकारों की चमक थी तो दूसरी का चेहरा, अपमान और अवहेलना से बुझा हुआ. मैं नहीं चाहती थी कि रूपा और नीलू की नजर भी उन पर पड़े, इसलिए मैं ने जल्दी से कार का दरवाजा खोला और उन्हें पहले अंदर बैठा दिया.

Best Hindi Story

Love Story: चिर आलिंगनरत- मोहन को गौरी मैम से कैसे प्यार हो गया

Love Story: संसार भर के सागरों में की जाने वाली क्रूज? यात्राओं में अलास्का की क्रूज सब से अधिक मनोहारी और रोमांचकारी मानी जाती है. इस यात्रा हेतु सिल्विया और मोहन 2 दिन पहले कनाडा के वैंकूवर नगर के बंदरगाह से नौर्वेजियन क्रूज लाइन के शिप पर सवार हुए थे.

क्रूज 7 दिन का था और शिप आज प्रात: जूनो नगर में आ कर रुका था. उन्होंने शिप पर ओशन व्यू कमरा बुक कराया था, जिस की खिड़की से दूरदूर तक लहराता सागर और यदाकदा ऊंचेऊंचे वृक्षों की हरीतिमा से आच्छादित द्वीपों का मंत्रमुग्धकारी बियाबान दिखाई देता था. यद्यपि इस प्रेमी युगल को पारस्परिक संग के दौरान किसी अन्य मुग्धकारी उत्तेजक की आवश्यकता नहीं थी, तथापि क्रूज शिप का मोहक वातावरण और महासागर का सम्मोहन अद्वितीय कैमिस्ट्री के जनक थे.

दोनों पृथ्वी पर स्वर्ग का आनंद प्राप्त कर रहे थे. जूनो अलास्का प्रांत की राजधानी है. अलास्का प्रांत की आबादी अधिक नहीं है, परंतु अलास्का की राजधानी होने के कारण यह नगर महासागर के किनारे बसा एक बड़ा कसबा सा है. शिप से उतर कर उन्होंने एक बस पकड़ ली.

उन्होंने 2 घंटे में कसबा व बाजार देख लिया. उन्हें यह देख कर आश्चर्य हुआ था कि बाजार में कुछ दुकानें गहनों की थीं जिन में अधिकांश के मालिक मुंबई के मूल निवासी थे.समयाभाव के कारण वे रोपवे और सी प्लेन की राइड पर नहीं गए.

तत्पश्चात वे मेंडेनहौल ग्लेशियर देखने और व्हेलवाच के लिए बोट से चल दिए. उस बोट में 2 ही हिंदीभाषी पर्यटक थे. शेष में अधिकांश इंग्लिश बोलने वाले अथवा अलास्का की आदिमजातियों की भाषा वाले थे, जिन में मुख्यतया ट्लिंगिट भाषा बोलने वाले थे.

अत: उसे और सिल्विया को आपस में कुछ भी बोलने और चुहलबाजी करने का निर्बाध अवसर उपलब्ध था. दोनों अन्यों की उपस्थिति से अनभिज्ञ रह कर इस अद्भुत यात्रा का आनंद ले रहे थे और जीवनिर्जीव सब पर हिंदी में अच्छीबुरी टिप्पणी कर के हंसते रहे थे.

मेंडेनहौल ग्लेशियर देख कर सिल्विया तो जैसे पागल हो रही थी. उस के और ग्लेशियर के बीच तट के निकट के सागर का एक भाग था. ग्लेशियर सागर के उस भाग के पार स्थित पर्वत से निकल रहा था. वह सुदूर पर्वत से निकल कर हिम की एक विस्तृत नदी की भांति चल कर सागर में समा रहा था. ऊपर से खिसक कर आई हिम सागर किनारे आ कर रुक जाती थी और वहां विशाल हिमखंड के रूप में परिवर्तित हो जाती थी जैसे सागर में कूदने के पूर्व उस की गहराई की थाह लेना चाह रही हो.

कुछकुछ अंतराल के पश्चात सागर किनारे स्थित शिलाखंड पीछे से आने वाली हिम के दबाव से भयंकर गरजना के साथ टूटता था और टुकड़ों में बिखर कर समुद्र में तैरने लगता था.हिमशिला टूटते समय सहस्रों पक्षी उस के नीचे से अपने प्राण बचाने को चिचिया कर निकलते थे. सिल्विया और मोहन यह देख कर हैरान थे कि उन पक्षियों ने सागर किनारे जमी उस हिमशिला के नीचे कुछ अंदर जा कर अपनी कालोनी बसा रखी थी.

हिमखंड के टूटने से उत्पन्न गरजना और जल का उछाल थम जाने पर वे पक्षी उस के नीचे बनी अपनी कालोनी में पुन: चले जाते थे. हिम के टूटे हुए खंड सागर में आइसबर्ग बन कर तैरने लगते थे.सिल्विया और मोहन जहां खड़े थे, वहां से बाईं ओर सागर में दूर तक वे आइसबर्ग दिखाई देते थे. उन के दाहिनी ओर एक पहाड़ी थी, जिस के ऊपर से एक झरना बह रहा था.

उस का आकर्षण सिल्विया को खींचने लगा और वह उस के किनारेकिनारे ऊपर दूर तक जाने लगी. मोहन भी उस के पीछेपीछे चलता गया.एकांत पा कर सिल्विया मोहन से सट गई और बोली, ‘‘मोहन, मेरा मन तो यहीं खो जाने को हो रहा है.’’पता नहीं क्यों तभी मोहन के मन में किसी अनहोनी की आशंका व्याप्त हो गई, परंतु मोहन ने सिल्विया को बांहों में भर लिया और उसे एक चुंबन दिया.

तभी यात्रियों की बोट पर वापसी का अलार्म बज गया और वे जल्दीजल्दी बोट पर वापस आ गए.बोट यात्रियों को व्हेल, सी लायन, सामन मछली, बोल्ड ईगिल आदि जीवधारियों को दिखाने हेतु गहरे समुद्र की ओर चल दी. व्हेलों के निवास के क्षेत्र में जब बोट पहुंची और यात्रियों ने उन की उछलकूद तथा श्वास के साथ पानी के फुहारे छोड़ने के दृश्यों का आनंद लेना प्रारंभ किया, तभी उन की बोट नीचे से एक भीषण ठोकर खा कर उछली और उलट गई. किसी यात्री को संभलने का अवसर नहीं मिला.

कोई डूब रहा था तो कोई तैर रहा था.कुछ यात्री बोट को पकड़ने उस की ओरतैरे भी, परंतु बोट अपने नीचे फंसी व्हेल केसाथ गहरे समुद्र में खिंची जा रही थी. सिल्विया और मोहन ने पानी में बहती लाइफ जैकेट पकड़ कर पहन ली और बोट से समुद्र में गिरे एकचप्पू को पकड़ कर पानी के ऊपर रुके हुए थे. पानी बेहद ठंडा था. थोड़ी देर में चीखपुकार कम हो गई. कुछ यात्री डूब गए थे और कुछ अशक्त हो रहे थे.मोहन और सिल्विया भी शिथिल होने लगे थे.

ऐसे में दोनों के मन एकदूसरे पर केंद्रित हो गए थे. मोहन एकटक सिल्विया की आंखों में देखे जा रहा था. सिल्विया भी उसे अपलक देख रही थी. दोनों के मानस एकदूसरे को ऐसे आत्मसात कर रहे थे कि किसी के होंठ हिलें न हिलें, दूसरा उस के मन की भाषा पढ़ लेता था.दिन ढल रहा था और मोहन का मन आशानिराशा के भंवर में डूबनेउतराने लगा था.

व्याकुलता पर नियंत्रण रखने हेतु वह सिल्विया से प्रथम मिलन की घटना को वर्णित करने लगा था और सिल्विया होंठों पर स्मितरेखा उभार कर तन्मयता से सुनने लगी थी. ‘‘सिल्विया, तुम से प्रथम मिलन में ही मैं सम?ा गया था कि तुम जीवन के विषय में निर्द्वंद्व सोच वाली, साहसी और नटखट स्वभाव की हो. मैं तभी से तुम्हारी इस अदा पर फिदा हो गया था.

उस दिन तुम होटल के कौरीडोर में मोबाइल कान में दबाए किसी से बात करती हुई निकल रही थीं, तभी मैं कमरे से निकल रहा था और तुम मुझ से टकरा गई थीं और तुम्हारे मुंह से अनायास निकल गया था कि ओह, आई एम सौरी. मैं भी अपने उच्छृंखल स्वभाव के वशीभूत हो बोल पड़ा था कि यू आर वैल्कम. तुम नहले पर दहला धर देने में माहिर थीं और बिना किसी झिझक के मेरी ओर बढ़ कर मुझे से फिर टकरा कर बोली थीं कि देन टेक इट. इस पर हम दोनों बेसाख्ता हंस दिए थे और यही बन गया था हमारी अंतरंग दोस्ती का सबब. ‘‘फिर मैं ने तपाक से हाथ बढ़ा कर कहा था कि आई एम मोहन,’’ तुम ने अविलंब हाथ बढ़ा कर अपना नाम बताया था.

मैं तुम्हारे हाथ को सामान्य से अधिक देर तक अपने हाथ में लिए रहा था और तुम ने भी हाथ वापस खींचने का कोई उपक्रम नहीं किया था. तुम्हारे जाते समय मैं ने केवल शरारत हेतु एक आंख मारते हुए पूछ लिया था कि सो, व्हेयर आर वी मीटिंग दिस ईविनिंग ऐट एट पी. एम.? और तुम ने उत्तर दिया था कि औफकोर्स, इन योर रूम.‘‘शाम होने पर मैं तुम्हारे आने हेतु जितना उत्सुक था, उतना आश्वस्त नहीं था.

तुम्हारे आने और न आने की आशानिराशा के काले में झलता हुआ मैं काफी पहले से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था, जब अपने वादे के अनुसार तुम ने ठीक 8 बजे मेरे कमरे की घंटी बजा दी थी. घंटी सुनते ही मैं ने लपक कर दरवाजा खोला था और तुम को देख कर प्रसन्नता के आवेग में आगापीछा सोचे बिना तुम्हें बांहों में भर कर बोला था कि ओह सिल्विया. लंबे बिछोह के उपरांत मिलने वाले प्रेमी की भांति तुम ने भी मुझे बांहों में समेट लिया था.

फिर मैं ने अपनी सांसों को सामान्य करते हुए तुम्हें कुरसी पर बैठा दिया था और स्वयं सामने की कुरसी पर बैठ गया था. कुछ क्षण तक हम दोनों में एक प्रश्नवाचक सा मौन व्याप्त रहा था. फिर उसे तोड़ते हुए मैं सहज हो कर अपना परिचय देने लगा था कि सिल्विया, मैं मोहन मूल रूप से नैनीताल के एक गांव का रहने वाला हूं. मेरे मातापिता और छोटी बहन पहाड़ पर ही रहते हैं.

आजकल दिल्ली में टी.सी.एस. में जौब करता हूं. उसी सिलसिले में कोच्चि आया हूं. अभी 1 सप्ताह तक और यहां रुकना है. फिर कुछ रुक कर चुहल करने के अंदाज में आगे जोड़ा था कि और मैं निबट कुंआरा हूं.’’इतना बोलने के श्रम से मोहन हांफ गया था और एक निरीह सी दृष्टि से सिल्विया को देखने लगा था. तब सिल्विया बोल पड़ी, ‘‘मुझे सब याद है मोहन. मैं ने अपना परिचय देते हुए कहा था कि मैं सिल्विया मूलरूप से कोच्चि की ही रहने वाली हूं और इसी होटल में असिस्टैंट मैनेजर के पद पर कार्यरत हूं.

मेरे मातापिता बग इस दुनिया में नहीं हैं, परंतु उन की प्रेमकथा यहां अभी तक प्रचलित है. मेरी माता जेन का जन्म फ्रांस में हुआ था. वे अपनी युवावस्था में फ्रांस से भ्रमण हेतु यहां आई थीं. उन्हें समुद्र से बहुत लगाव था. मेरे पिता शंकर एक छोटी सी यात्री बोट के चालक थे और उस के मालिक भी.एक दिन जब मौसम काफी खराब था, तब मेरी मां उन की नाव के पास आई थीं और पिता से समुद्र में घूमने की जिद करने लगी थीं. वे पूरी नाव का भाड़ा देने को कह रही थीं.

पिता ने मौसम का हवाला दे कर पहले तो मना किया परंतु सुंदर गोरी महिला की जिद के आगे उन का हृदय पिघल गया. आखिरकार वे अविवाहित नौजवान थे और जिंदादिल भी.‘‘पिता की आशंका के अनुसार नाव के समुद्र में कुछ दूरी तक पहुंचतेपहुंचते तूफान आ गया और नाव को उलट कर बहा ले गया. पिता कुशल तैराक थे और अपनी जान पर खेल कर मां को बचा कर किनारे ले आए.

मां बेहोश थीं और उन का पताठिकाना न जानने के कारण पिता उन्हें अपने घर ले आए. देर रात्रि में होश आने पर मां ने अपने को उन के द्वारा लिपटाए हुए और अश्रु बहाते हुए पाया. वह लजाई तो अवश्य परंतु अलग होने के बजाय उन से और जोर से लिपट गईं और फिर सदैव के लिए उन की हो कर कोच्चि में ही रुक गई थीं.’’सिल्विया के सांस लेने हेतु रुकते ही मोहन बोल पड़ा, ‘‘उसी ढंग से तुम उस दिन होटल के कमरे में मुझ से लिपट गई थीं और सदैव के लिए मेरी हो कर रह गई थीं.

फिर मैं दिल्ली की अपनी जौब छोड़ कर कोच्चिवासी हो गया था.’’ यह सुन कर सिल्विया हलदी सा मुसकरा दी थी. फिर वह बोली, ‘‘तुम ने मुझे जिंदगी में वह सब दिया है, जिस की मुझे चाह थी. हम ने कितनी तूफानी जिंदगी जी है? कितनी बार हम आंधीपानी के तूफानों, वीरान जंगलों और पहाड़ों के जानलेवा झंझवातों में फंसते रहे हैं और हर बार तुम हम दोनों को जीवित बाहर निकालते रहे हो,’’ फिर कुछ आशंकित हो कर प्रश्न किया, ‘‘क्या आज नहीं बचाओगे मेरे मोहन?’’मोहन ने सिल्विया को आश्वस्त करने हेतु कह दिया, ‘‘बचाऊंगा, अवश्य बचाऊंगा मेरी मोहिनी,’’ परंतु उस के शब्दों में वह आत्मविश्वास नहीं था, जो उस के सामान्य स्वभाव में रहता था.

दिन में तो मोहन और सिल्विया एकदूसरे से प्रेमालाप करते रहे थे, परंतु अंधेरा हो जाने और किसी प्रकार की सहायता आती न दिखाई देने पर उन के मन में निराशा व्याप्त हो गई.तब मोहन ने आगे बढ़ कर सिल्विया को अपनी बांहों के घेरे में ले लिया और उस के मुख से अनायास निकला, ‘‘मेरी सिल्विया, क्षमा करना.’’सिल्विया की पथराई सी आंखों के कोरों से मात्र अश्रु ढलका था. दूसरे दिन जूनो से आई एक रैस्क्यू बोट को एक हिंदुस्तानी युवक तथा एक गोरी युवती के बांहों में जकड़े शरीर लहरों पर तैरते मिले थे.

Love Story

Motivational Story: हौसले बुलंद हैं- समाज की परवाह किए बिना सुहानी ने क्या किया

Motivational Story: रात सिर्फ करवटें ही तो बदली थीं, नींद न आनी थी, न आई. फिर सुबह ताजी कैसे लगती. 4 बजे ही बिस्तर छोड़ दिया. समीर सो रहे थे पर उन्हें मेरी रात भर की बेचैनी सोतेसोते भी पता था. नींद में ही आदतन कंधा थपथपाते रहे थे. बोलते रहे, ‘‘सुहानी, सो जाओ. चिंता मत करो.’’

मैं ने फ्रैश हो कर पानी पीया. अपने लिए चाय चढ़ा दी. 20 साल की अपनी बेटी पीहू के कमरे में भी धीरे से झंक लिया. वह सो रही थी. मैं चुपचाप बालकनी में आ कर बैठ गई. इंतजार करने लगी कि कब सुबह हो तो बाहर सैर पर ही निकल जाऊं. सोसाइटी की सड़कों को साफ करने वाली लड़कियां काम पर लग चुकी थीं. मेरे दिल में इन लड़कियों के लिए बहुत करुणा, स्नेह रहता है. करीब 20 से 50 साल के ये लोग इतनी सुबह अपना काम शुरू कर चुके हैं. मुंबई में यह दृश्य आम है पर इन की मेहनत देख कर दिल मोम सा हुआ जाता है.

देख इन सब को रही थी पर मम्मी की चिंता में दिल बैठा जा रहा था. रात को उन्होंने फोन पर बताया था कि उन का बीपी बहुत हाई चल रहा है. वे गिर भी गई थीं, कुछ चोटें आई हैं. सुनते ही मन हुआ कि उन्हें देखूं. पीहू ने कहा भी कि नानी को वीडियोकौल कर लो मम्मी. पर 80 साल

की मेरी मम्मी को वीडियोकौल करना आता ही नहीं है. उन्हें कई बार कहा कि मम्मी व्हाट्सऐप या वीडियोकौल सीख लो, कम से कम आप को देख ही लिया करूंगी पर उन की इस टैक्नोलौजी में कोई रुचि ही नहीं है. तड़प रही हूं कि जाऊं, उन्हें देखूं, उन की देखभाल करूं. पर मायके नहीं जाऊंगी, यह फैसला कर लिया है तो कर लिया.

5 साल पहले मैं जब रुड़की मायके गई तो वहीं से यह फैसला कर के आई थी कि अब यहां कभी नहीं आऊंगी. मैं अपने से कई साल बड़े अपने बड़े भाईबहन के नफरतभरे दिलों की आग सहन नहीं कर पाती. वे मुझ से सालों बाद भी नाराज हैं. उन की नजर में मैं ने ऐसा गुनाह किया है जिसे माफ नहीं किया जा सकता.

प्यार करने का गुनाह. ब्राह्मण की बेटी हो कर एक मुसलिम से प्रेमविवाह करने का गुनाह. स्वार्थी, लालची भाईबहन को निश्छल समीर कैसे समझ आते.

वे तो मम्मी थीं कि समीर से मिलते ही समझ गई थीं कि उन की बेटी समीर के साथ हमेशा खुश रहेगी. मम्मी ने कैसे इस समाज को झेला है, मैं ही जानती हूं. मैं बहुत छोटी थी, पापा चले गए थे. मम्मी अगर अपने पैरों पर न खड़ी होतीं तो हम इन भाईबहन के सामने कैसे जीते, यह सोच कर ही खौफ आता है.

आसमान में जब इतना उजाला दिख गया कि सैर पर जाया जा सकता है तो मैं ने अपने सैर के शूज पहने और धीरे से घर से निकल गई. आज कदम सुस्त थे, मन जैसा था, वैसी ही चाल थी, थकी सी, उदास. गार्डन के चक्कर काटने के साथसाथ आज मन अतीत की गलियों में भी घूम रहा था. जब मैं ने मम्मी को अपने दिल की बात बताई, उन्होंने सिर्फ इतना पूछा, ‘‘एडजस्ट कर लोगी? सबकुछ अलग होगा.’’

मैं ने कहा था, ‘‘हां, मम्मी. सब ठीक होगा. समीर को इन 3 सालों में अच्छी तरह समझ

चुकी हूं.’’

‘‘तुम दोनों कब शादी करना चाहते हो?’’

‘‘मम्मी जब आप कहें कर लेंगे.’’

‘‘तो फिर ठीक है, जल्द ही करवा देती हूं. तुम्हारे भाईबहन को भनक भी पड़ गई तो मुश्किल हो जाएगी.’’

मैं खुशी के मारे रोती हुई मम्मी के गले लग गई थी. उन्होंने भी किसी छोटी बच्ची की तरह मुझे अपने से लिपटा लिया. फिर मम्मी ने अपने दम पर हमारी शादी करवाई, अपने बुलंद हौसलों के साथ. जाति, धर्म को दूर धकेल दिया. बहनभाई सिर पीटते रह गए. मैं तो नई गृहस्थी संभालने में व्यस्त थी पर मम्मी ने जो ?ोला वह सोच कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. मम्मी टीचर रही हैं. यह शादी करवाने पर स्कूल में उन का सोशल बायकौट हुआ, स्कूल का चपरासी तक उन्हें पानी ला कर नहीं देता था. 1 महीना उन्होंने स्कूल के स्टाफरूम में बैठ कर अकेले खाया, अकेले बैठ कर चुपचाप अपने काम किए और किसी से बिना बात किए घर वापस.

मम्मी ने उस समय किसी की चिंता नहीं की, उन की बेटी खुश है, सिर्फ यही बात उन के लिए माने रखती थी. उन्होंने तो हर जाति के स्टूडैंट्स को बराबर स्नेह दिया था. हमारे घर उन के कितने ही मुसलिम स्टूडैंट्स उन से मिलने आ जाते थे. हम मांबेटी ने तो पता नहीं कितनी बार उन की लाई हुई ईद की सेवइयां खाई थीं जिन्हें मेरे भाईबहन छूते भी नहीं थे.

खुद को गर्व से कट्टर ब्राह्मण बताने वाला भाई शराब पी सकता था, दुनिया के सारे गलत काम कर सकता था पर ईद की सेवइयां कैसे छूता. बहन अपनी बीमारी में एक मौलवी से खुद को ?ाड़वाने जा सकती थीं, पर छोटी बहन के मुसलिम पति को, एक सभ्य, शिष्ट इंसान को कैसे स्वीकार करतीं. उन का धर्म न नष्ट हो जाता.

आज मैं कुछ जल्दी ही थक गई, मन की थकान ज्यादा थकाती है वरना इस समय तो मैं गार्डन में कूदतीफांदती चल रही होती हूं. शायद  ही कभी बैंच पर बैठने की नौबत आई हो. आज मैं थोड़ी देर के लिए बैंच पर बैठ गई.

शुरूशुरू में मम्मी मेरे पास काफी दिन रहीं. समीर ने ही कहा था कि आप कुछ दिन हमारे साथ शांति से रह लें. धीरेधीरे मेरे लालची भाईबहन को मम्मी की बातों से समझ आया कि छोटी बहन तो ससुराल में सुखी है, पति के साथ बनारस में समृद्ध गृहस्थी की उन्हें खबर मिली तो उन्हें सम?ा आ गया कि छोटी बहन से बिगाड़ना नुकसानदायक होगा. समीर अच्छी जौब में रहे हैं. 1-2 बार हिंदूमुसलिम की नफरतों से भरे स्वार्थी, बेशर्म भाईबहन ने समीर से बीमारी के बहाने पैसे भी मांग लिए जो उन्होंने खुशीखुशी दे भी दिए पर हर बार जब भी मतलब निकल जाता है उन की मुसलमानों के प्रति नफरत देख कर मेरा खून खौल जाता.

गिरने की कोई सीमा ही नहीं काम निकलना होता तो समीरसमीर करते हैं और काम पूरा होते ही समीर सिर्फ एक मुसलमान रह जाते हैं. बनारस घूमना है तो आ कर घर भी रह गए, मंदिरों के दर्शन भी कर लिए, खूब आवभगत हो गई. पर जाते ही फिर वही सब. फिर वे सब मुंबई भी आ गए, फिर वही सब किया. ऐसे सिलसिलों से किस का मन नहीं थकेगा.

5 साल पहले मायके गई थी. अब उन्हें मुझ से कोई स्वार्थ नहीं था, सब काम हो ही चुके थे. बातबात पर सुनाया जाने लगा कि मांबेटी ने ब्राह्मण हो कर धर्म को गर्त में गिरा दिया. इतने सालों बाद अब मैं यह सब सुनने के मूड में नहीं रहती. देखा जाए तो बात पुरानी हो चुकी है. अब इस पर बात होनी नहीं चाहिए थी पर मेरे पढ़ेलिखे भाईबहन धर्म के नाम पर जितने तमाशे हो सकते हैं, सब कर सकते हैं.

मुझे लगता है जब तक वे लोग इस धरती पर रहेंगे, जातिधर्म के नारे लगाते रहेंगे. ऐसी

बुद्धि पर मुझे अब तरस आता है. मैं इन लोगों से डरती नहीं, इन्हें हिंदूमुसलमान करने में जिंदगी बितानी है, मुझे यह बताना है कि अंतर्जातीय विवाह होते रहने चाहिए, धर्म, जाति के चक्कर में न पड़ कर प्यार देखा जाए, इंसान के गुण देखे जाएं. वे भी अपने पिछले रास्ते पर चल रहे हैं, मैं भी अपने बुलंद हौसलों के साथ जीवन में आगे बढ़ रही हूं.

पिछली बार मुझे लगा कि मैं यह सब अब नहीं सहूंगी, कह कर आई हूं कि अब कभी नहीं आऊंगी. कह कर आई हूं सब रिश्ते खत्म और यह सच भी है कि मैं अब उन लोगों की शक्ल भी नहीं देखना चाहती जिन के लिए छोटी बहन की खुशी कुछ नहीं, धर्म ही सबकुछ है.

मेरी उन लोगों से कैसे निभ सकती है जिन के लिए धर्म, जाति ही सबकुछ है जबकि मेरे लिए यह सबकुछ माने नहीं रखता. मम्मी से

फोन पर बात रोज होती है, पर उन्हें 5 सालों से देखा नहीं है. इस बात का दुख रहता है. अब वे बीमार हैं. मुझे पता है कि वहां उन की सेवा नहीं होती है. वे वहां अकेली ही हैं. मैं चाहती हूं कि मैं उन की बीमारी में उन की देखभाल करूं. बैठेबैठे पता नहीं मैं क्याक्या सोचती रही. फिर फोन में टाइम देखा. 6 बज रहे थे. कब से बैठी रह गई. घर जा कर पीहू और समीर के लिए टिफिन बनाना है.

अचानक कुछ सोच मम्मी को फोन मिला लिया. हैरान सी कमजोर

आवाज आई, ‘‘अरे, इतनी जल्दी? क्या हुआ?’’

‘‘मम्मी. किसी तरह दिल्ली आ जाओ टैक्सी में. मैं आप को दिल्ली एअरपोर्ट पर मिल जाऊंगी. वहां से आप को अपने साथ ले आऊंगी. फिर तबीयत ठीक होने तक आराम से मेरे साथ कुछ दिन रह कर जाना. दिल्ली तक आ पाओगी?’’

मम्मी हंस पड़ीं, ‘‘इतनी सुबहसुबह यह क्या प्लान बना रही है?’’

मैं भी अचानक हंस पड़ी, ‘‘मैं उस मां की बेटी हूं जिस के हौसले मैं ने हमेशा बुलंद देखे हैं. आप बीमार हैं, मुझे आप की देखभाल करनी है. चलने लायक तो हो न. बस एअरपोर्ट पहुंच जाओ, बाकी मैं सब देख लूंगी.’’

मम्मी की आवाज की कमजोरी अब गायब हो चुकी थी. अब उन की आवाज में एक उल्लास था. कहा, ‘‘ठीक है बना ले प्रोग्राम. यहां से क्याक्या चाहिए, बता देना.’’

मुझे हंसी आ गई, ‘‘कुछ नहीं चाहिए मम्मी. वहां सब कबाड़ है.’’

मेरे कहने का मतलब समझ मम्मी जोर से हंसी, बोलीं, ‘‘सही कह रही है.’’

हम दोनों फिर थोड़ी देर हंसतीबोलती रहीं. मुझे इतनी हिम्मती मां की बेटी होने पर हमेशा गर्व रहा है.

हां, मैं ऐसे ही जीऊंगी बेखौफ, निडर उन सब बेकार के रिश्तों से दूर. मम्मी को लाना है, उन की देखभाल करनी है. रास्ता निकाल लिया है मैं ने. जब ठीक हो जाएंगी, जब कहेंगी, ऐसे ही छोड़ भी आऊंगी. बस अब घर जा कर कल की ही फ्लाइट बुक करती हूं. मैं एक बार फिर अपने बुलंद हौसलों पर खुद को ही शाबाशी देती हुई अब तेज कदमों से घर की तरफ बढ़ गई.

Motivational Story

Bollywood Gossips: फिल्मी जगत से जुड़े नए अपडेट्स

Bollywood Gossips

इस फिल्म का चलना जरूरी है

लंबे समय के बाद अनन्या पांडे को बड़ी फिल्म मिली है. अब यह बात अलग है कि उन्हें फिल्म में नैपो किड्स के गौडफादर करण जौहर ने कास्ट किया है. कुछ भी हो लेकिन अनन्या के लिए ‘तू मेरी मैं तेरा मैं तेरा तू मेरी’ का चलना बेहद जरूरी है नहीं तो इंडस्ट्री में आगे टिक पाना उन के लिए बहुत मुश्किल होने वाला है. उन के साथ इंडस्ट्री में आने वाली उन की फ्रैंड्स जाह्नवी, सारा काफी आगे निकल चुकी हैं तो यह उन के लिए एक और चुनौती है. फिल्म का ट्रेलर दर्शकों को दमदार नहीं लगा तो ऐसे में हम तो आप को आल द बैस्ट ही बोल सकते हैं, अनन्या.

क्या है शनाया का नया प्लान

विक्रांत मैसी के साथ शनाया की फिल्म ‘आंखों की गुस्ताखियां’ कुछ खास नहीं चली. शनाया की अदाकारी भी फिल्म में ठीकठाक ही थी और देखने से यह लग रहा था कि अभी उन्हें और मेहनत करने की जरूरत है. वैसे अभी उन की और एक फिल्म लाइन में हैं ‘तू या मैं’ जिस का निर्देशन आनंद राय कर सकते हैं. फिल्म रोमांटिक होगी और आनंद की मानें तो यह फिल्म अभी तक की सभी लव स्टोरीज पर भारी पड़ेगी. अगर यह बात सही निकली तो शनाया की तो बल्लेबल्ले हो जाएगी.

पहले स्टोरी फिर कैरेक्टर

आयुष्मान खुराना को दर्शक ‘विक्की डोनर,’ ‘आर्टिकल 15’ जैसी बेहतरीन फिल्मों के लिए पसंद करते हैं. इन फिल्मों की खास बात इन की स्टोरी थी. इन की स्टोरी में सोसायटी के लिए एक संदेश था. वैसे कौमेडी फिल्मों में भी आयुष्मान छाए रहे लेकिन इन फिल्मों की बात ही अलग थी. आयुष्मान का कहना है कि वे फिल्म के लिए हां करने से पहले उस की स्टोरी देखते हैं और फिर अपने कैरेक्टर पर ध्यान देते हैं. अगर स्टोरी नहीं जमी तो वे फिल्म नहीं करते. शायद तभी दर्शकों को अच्छी फिल्में देखने को मिल रही हैं नहीं तो वही बूढ़े खान और कुमार थकी हुई कहानियां परोसते मिलते

टौक्सिक बोल दिया लोगों ने

एक तरफ धनुष अपनी फिल्म ‘तेरे इश्क में’ की सफलता से खुश नजर आ रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ एक दर्शक वर्ग उन की फिल्म को टौक्सिक बोल रहा है. वैसे बात कुछ हद तक सही भी है कि क्या प्यार ही आजकल की जैनरेशन की प्रायोरिटी रह गई है. प्यार तो ठीक है लेकिन उस के लिए अपनी जान और अपना परिवार तक दांव पर लगा देना कहां की सम?ादारी है. धनुष, आप की ऐक्टिंग एकदम सही थी लेकिन आप का यह फिल्म चुनना कुछ दर्शकों को आहत तो कर ही गया.

यह इश्क नहीं आसान

आजकल पूरा बौलीवुड जैसे इश्क में डूबा हुआ है, ‘तेरे इश्क में’ के साथसाथ विजय वर्मा और फातिमा सना शेख की ‘गुस्ताख इश्क’ भी सिनेमाघरों में आई. चूंकि ज्यादा शोशा नहीं हुआ तो फिल्म को ज्यादा स्क्रीन नहीं मिल सके फिर भी कुछ दर्शकों को यह पसंद आई. इस की स्टोरी में भी कोई खास दम नहीं है. विजय वर्मा बड़े परदे पर लीड रोल में आने को ले कर बहुत ऐक्साइटेड थे लेकिन नतीजा टांयटांय फिस्स निकला. कोई बात नहीं विजय, आप बेहतरीन अदाकार हैं और ओटीटी पर छाए हुए हैं. वैसे भी बड़े परदे से इश्क आसान नहीं होता.

कृति के कैरियर को मिला बूस्ट

‘तेरे इश्क में’ कृति सैनन और धनुष की जोड़ी को दर्शक काफी पसंद कर रहे हैं. कृति के किरदार की इंटैंसिटी को लगभग सभी ने पसंद किया. फिल्म को मिली बंपर ओपनिंग के बाद कृति काफी खुश हैं. उन के लिए इस फिल्म का चलना जरूरी था क्योंकि उन की पिछली फिल्में औसत ही रही थीं. वैसे पैप्स आजकल उन के नए घर की तसवीरें लेने में भी काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं और बता रहे हैं कि उन का नया घर लगभग 80 करोड़ का है. फिर तो अच्छा हुआ कि यह फिल्म चल गई नहीं तो अंधविश्वासी यह कहने में एक मिनट भी नहीं लगाते कि कृति का नया घर उन के लिए पनौती है.

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बाजी जारी है: शतरंज की बिसात पर कोनेरू हम्पी की दूसरी चाल

लेखिका – भव्या डोरे
Koneru Humpy: कोनेरू हम्पी ने अपने कंधों पर डाली हुई धारीदार स्लेटी जैकेट को जरा सा कस लिया. सामने रखे शतरंज के क्रीम रंग के मुहरों को उन्होंने विधिवत ढंग से व्यवस्थित किया. उन की प्रतिद्वंद्वी महाराष्ट्र की 19 वर्षीय प्रतिभाशाली दिव्या देशमुख अपनी घुमावदार कुरसी पर हलके से झूलती हुई इंतजार कर रही थीं. दिव्या टाइमर सैट करने के लिए आगे बढ़ीं. दोनों महिलाओं ने एकदूसरे से हाथ मिलाया.

जुलाई, 2025 में जार्जिया अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ के महिला विश्व कप की मेजबानी कर रहा था. पहली बार 2 भारतीय खिलाड़ी फाइनल में आमनेसामने थीं. 3 दिनों तक लगातार बराबरी के मुकाबलों के बाद हम्पी और दिव्या आखिरी बार आमनेसामने भिड़ीं थीं.

मैच शुरू हुआ. हम्पी ने क्वीन्स गैम्बिट  खेला. उन्होंने रानी के सामने रखे प्यादे को आगे बढ़ाया, एक ऐसी चाल जो बोर्ड के केंद्र पर नियंत्रण बनाने की कोशिश थी. लगभग 15 मिनट में दिव्या ने उन्हें मात दे दी. भारत की पहली और सब से वरिष्ठ महिला ग्रैंडमास्टर ने भारत की नवीनतम और सब से युवा ग्रैंडमास्टर के खिलाफ आखिरी मैच में गलती कर दी थी.

2 महीने बाद विजयवाड़ा स्थित अपने घर में मुझ से बात करते हुए 38 वर्षीय हम्पी ने उस हार पर विचार किया. इस दौरान उन्होंने एक साधारण सफेद कुरता और छोटी बिंदी लगाई हुई थी. पीछे एक हलके रंग का परदा लहरा रहा था.

‘‘निश्चित रूप से यह एक कठिन और चुनौतीपूर्ण मुकाबला था,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘इस स्तर पर बने रहने के लिए आप को युवाओं के खिलाफ संघर्ष करना पड़ता है क्योंकि उन के पास बहुत ऊर्जा होती है, वे हमारी पीढ़ी की तुलना में अधिक तैयार और बेहतर प्रशिक्षित हैं.’’

तजरबे की झलक

हम्पी की बातों में 3 दशक से ज्यादा के तजरबे की झलक है. उन्होंने 1993 में प्रतिस्पर्धात्मक शतरंज खेलना शुरू किया था. तब वे लगभग 6 वर्ष की थीं. उस के 3 साल बाद उन्होंने अपना पहला राष्ट्रीय खिताब जीता. उस के बाद उन्होंने इस खेल की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक के रूप में अपनी पहचान बनाई. 2002 में अपने 15वें जन्मदिन के सिर्फ 1 महीने बाद हम्पी भारत की पहली महिला ग्रैंडमास्टर बनीं. उस समय दुनिया की सब से युवा ग्रैंडमास्टर. 2003 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार मिला जो देश के शीर्ष खेल सम्मानों में से एक है. 2007 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया जो देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है. तब मैं अपने चरम पर थी उन्होंने कहा, ‘‘निश्चित रूप से मेरा चरम अब पीछे छूट चुका है.’’

2014 में हम्पी ने दसरी अन्वेश से विवाह किया. वे प्रशिक्षण से इलैक्ट्रिकल इंजीनियर हैं और एक उद्योगपति के बेटे. 2 साल बाद गर्भावस्था के कठिन समय में हम्पी ने शतरंज की बिसात से दूरी बना ली.

भले ही हम्पी ने कुछ समय के लिए अपनी रफ्तार कम की हो, उन की कहानी किसी अधूरे रह गए कैरियर की नहीं है. यह संतुलित सधे धैर्य की है. 2018 में शतरंज में अपनी वापसी के बाद उन्होंने कई बड़ी हारों का सामना किया है और मेहनत से मिली जीतों का जश्न भी मनाया है. एक समय ऐसा भी आया जब वे चेस को लगभग छोड़ने वाली थीं.

‘‘मैं तो छोड़ने का सोच ही रही थी क्योंकि मैं केवल शतरंज नहीं खेलना चाहती हूं अगर मैं पर्याप्त प्रतियोगी नहीं हूं या फिर सफल नहीं हूं. अगर में खेल रही हूं तो फिर मुझे कुछ हासिल करना होगा, किसी के लिए प्रेरणा बनना ही होगा,’’ उन्होंने मुझ से कहा.

‘‘हालांकि मां बनने से हम्पी की प्राथमिकताओं का विस्तार हुआ है लेकिन खेल के प्रति उन का समर्पण अभी भी बना हुआ है. अब वे अपने कैरियर के दूसरे पड़ाव में हैं. अनुभव और आत्मविश्वास से भरी हुईं.’’

विश्व चैंपियन

पिछले कुछ वर्षों में हम्पी ने प्रभावशाली जीतें हासिल की हैं, जिन में महिलाओं के रैपिड शतरंज में विश्व चैंपियन का खिताब शामिल है. यह खेल का एक तेज गति वाला प्रारूप है. यह खिताब उन्होंने 2019 और 2024 में 2 बार जीता. उन के अलावा सिर्फ एक और महिला हैं जिन्होंने 2 बार यह खिताब जीता है. 2008 के बाद हम्पी  की रैंकिंग शीर्ष 5 से नीचे कभी नहीं गई.

न्यूज पब्लिकेशन हम्पी की वापसी का वर्णन करने के लिए अकसर अतिशयोक्ति भरे सनसनीखेज शब्दों का सहारा लेते हैं. सनसनीखेज, प्रेरणादायक, चकित कर देने वाला. लेकिन उन की उपलब्धियों को परिस्थितियों से अलग कर के नहीं देखा जा सकता.

‘‘ज्यादातर मामलों में बच्चों के पालनपोषण की जिम्मेदारी और मानसिक श्रम मां के हिस्से ही आता है और पेशेवर रूप से काम करते हुए ऐसा करने का मतलब होता है एक साथ कई काम करना.’’

पत्रकार जेनिया डी कुन्हा ने स्पोर्ट्स पब्लिकेशन ईएसपीएन के लिए गए एक लेख में कहा, ‘‘2 बार की विश्व चैंपियन बनते हुए ऐसा करना? इस के लिए जबरदस्त जुझारूपन की जरूरत पड़ती है.’’

पहले हम्पी किसी मैच में ड्रा करने वाली होती तो वे ‘जीतने के लिए जरूरत से ज्यादा जोर लगातीं,’ वे याद करती हैं. लेकिन जब वे खेल में वापस लौटीं, ‘‘मुझे अपनी ताकत समझ में आई, कहां दबाव डालना है और कहां रुकना है,’’ वे बताती हैं, ‘‘इस ब्रेक ने मेरी शतरंज को एक नए दृष्टिकोण से देखने में मदद की. मैं पूरी तरह से तरोताजा थी, मेरा दिमाग बिलकुल साफ था.’’

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ओएनजीसी के कर्मचारी और दोहा एशियन गेम्स के गोल्ड मैडल विजेता दिल्ली में (जनवरी 2007), कोनेरू हम्पी ने 2006 में ओएनजीसी जॉइन किया. Pic : PRAKASH SINGH/AFP/Getty Images

मेहनत से बनाई पहचान

हम्पी के पिता अशोक कोनेरू अपनी बेटी को हमेशा से किसी खेल से जोड़ना चाहते थे. उन्होंने अपने पिता से टैनिस और शतरंज सीखा था. वे इंडियन ऐक्सप्रैस की एक कहानी में बताते हैं कि 90 के दशक की शुरुआत में जब हम्पी बड़ी हो रही थी, 2 बहनें वीनस और सेरेना विलियम्स वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त कर रही थीं. अशोक के लिए उन का उभार टेनिस की महिमा और पुरस्कार दोनों की संभावना का प्रमाण था.

‘‘इसीलिए मैं चाहता था कि वह (हम्पी) टैनिस खेले,’’ वे इंडियन ऐक्सप्रैस को बताते हैं. लेकिन, ‘‘जब मैं खेल का अध्ययन कर रहा था, हम्पी शतरंज की तरफ आकर्षित हो गई,’’ अशोक ने कहा, ‘‘तब मैं ने हम्पी से मेरे पिता को हराने के लिए कहा. वे क्लब स्तर के शतरंज खिलाड़ी थे, महज 8 साल की उम्र में उस ने उन्हें हरा दिया. उस के बाद मैं ने उस के खिलाफ खेलना शुरू किया. मैं टूरनामैंट स्तर का खिलाड़ी था. 11 साल की उम्र में वह मुझे भी हराने में सक्षम थी.’’

हम्पी ने जल्द ही घर से बाहर भी अपनी पहचान स्थापित कर ली. शतरंज खेलना शुरू करने के कुछ समय बाद ही उन्हें जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में भी सफलता मिली. इसी बीच अशोक ने भी अप्लाइड साइंस के प्रोफैसर की नौकरी छोड़ दी ताकि वे हम्पी को पूर्णकालिक रूप से प्रशिक्षित कर सकें और उन के साथ टूरनामैंट्स के लिए होने वाली यात्राओं में उन के साथ जा सकें.

मैनुअल एरान फ्रंटलाइन पत्रिका के लिए 1998 के एक लेख में बताते हैं, ‘‘हम्पी एक गंभीर श्रोता और कम बोलने वाली बच्ची है, लेकिन जब बात शतरंज के वैरिएशन को ले कर हो तो वह खुल कर बात करती है.’’

मैनुअल भारत के पहले अंतर्राष्ट्रीय मास्टर थे, जिन का चैन्नई की समृद्ध शतरंज संस्कृति की नींव रखने में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है. हालांकि हम्पी केवल 10 वर्ष की थी, लेकिन बहुत धैर्य के साथ खेलती थी. मैनुअल ने टिप्पणी की, ‘‘वह कभी जल्दबाजी में आक्रमण नहीं करती. पहले वह अपने मुहरों से बिसात बिछाती है और जब समय सही होता है तब वार करती है.’’

इस समय तक हम्पी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रही थीं. पत्रकार सूजन निनान ने ईएसपीएन में लिखा कि उन के पिता का यह फैसला कि वे हम्पी को किशोरावस्था की शुरुआत से ही लड़कों के टूरनामैंट में दाखिला दिलाएंगे. इस ने हम्पी को तेजी से आगे बढ़ने में मदद की. शतरंज उन गिनेचुने खेलों में से एक है जहां पुरुष और महिलाएं एक ही टूरनामैंट में एकदूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं.

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कोनेरू हम्पी ने अपनी स्ट्रैंथ को समझ कर यह सीखा कि कहां जोर लगाना है और कहां रुक जाना है. Pic : K Bhaskar/The The India Today Group/Getty Images

आत्मविश्वास को मजबूती

हम्पी ‘‘अंडर-12 लड़कों के एशियाई टूरनामैंट 1999 में इकलौती लड़की थीं, जिसे उन्होंने जीता था. अगले साल उन्होंने अंडर-14 लड़कों का टूरनामैंट जीता,’’ सूजन ने लिखा.

इन जीतों से हम्पी के आत्मविश्वास को मजबूती मिली. उस दौर में उन्हें लगता था कि बिसात पर सच में उन की टक्कर की महिला प्रतिद्वंद्वियां बहुत कम हैं.

‘‘मुझे महिला प्रतियोगिता में जीतने की बजाय पुरुषों के खिलाफ जीतने पर ज्यादा आत्मविश्वास महसूस होता था,’’ हम्पी ने मुझ से कहा, ‘‘मुझे ऐसा करने से अधिक खुशी मिलती थी क्योंकि मैं कहीं ज्यादा कठिन प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ खेल रही थी.’’

हम्पी का रास्ता स्पष्ट था. उन्होंने शतरंज के अलावा कभी किसी दूसरे कैरियर के बारे में सोचा भी नहीं. कभी स्कूल पूरा नहीं किया, कभी सामान्य बचपन का अनुभव नहीं किया. लेकिन उन्हें इस का कोई पछतावा नहीं है.

‘‘अगर मैं सफल नहीं होती तो शायद मुझे ऐसा महसूस होता, लेकिन चूंकि मैं ने सफलता देखी है और दुनिया के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की है, मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ,’’ वे कहती हैं.

लैंगिक भेदभाव ने हम्पी के उभार की धार को कुछ धीमा किया. 2002 में भारत की पहली महिला ग्रैंडमास्टर का खिताब हासिल करने के तुरंत बाद वे एक ऐसे दौर में पहुंच गईं जिसे वे दु:स्वप्न जैसा कहती हैं. पुरुष खिलाडि़यों ने उन की आलोचना की और क्षमताओं को कम आंका. उन्होंने याद किया.

तब वे 15 वर्ष की थी, ‘‘उस के बाद कुछ प्रतियोगिताओं में मुझे सफलता नहीं मिली,’’ हम्पी ने मुझ से कहा.

साल 2003 में हम्पी ने नागपुर में होने वाली एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में क्वालिफायर स्तर की श्रेणी में भाग लेने का निर्णय लिया, जबकि वे अपनेआप ही उच्च श्रेणी में प्रवेश कर सकती थीं. वे अपने आलोचकों को चुप कराना चाहती थीं. बताया जाता है कि उन्होंने करीब 300 पुरुष खिलाडि़यों के समूह में प्रतिस्पर्धा की. उन्होंने याद किया कि अंतिम

और सब से अहम बाजियों में से एक के दौरान देखने वालों की भीड़ उमड़ आई थी. हम्पी के प्रतिद्वंद्वी ने मैच को ड्रा पर समाप्त करने की पेशकश की, लेकिन वे अड़ी रहीं. यह मैच वे जीतना चाहती थीं.

‘‘बाद में मैं एक बहुत बुरी स्थिति में पहुंच गई थी, जहां से वह प्रतिद्वंद्वी मुझे मात दे सकता था,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘लेकिन अंत में किसी तरह मैं ने वह मैच जीत लिया. वह टूरनामैंट में दूसरे स्थान पर रही. मुझे लगता है उस के बाद से अब तक मुझे आलोचना का सामना नहीं करना पड़ा है,’’ वे हंसती हैं.

Koneru Humpy
कोनेरू के पिता अशोक ने जहां अपनी जौब छोड़ कर उन्हें कोचिंग देना शुरू किया, वहां उन की मां लता उन्हें प्रोत्साहित करती रहीं. Photo by K Bhaskar/The The India Today Group / Getty Images

चुनौतियां भी कम न थीं

अन्य चुनौतियां भी थीं जैसे प्रायोजकों की कमी. शुरुआत में बैंक औफ बड़ौदा ने लगभग 6-7 वर्षों तक हम्पी को प्रायोजित किया था, उन्होंने याद किया. लेकिन अचानक ही सब रुक गया. ठीक उसी समय जब 2002 में वे ग्रैंडमास्टर बनी थीं.

‘‘मेरी जगह उन्होंने एक क्रिकेटर को ब्रैंड ऐंबैसेडर रख लिया,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘तो उन सालों में कोई स्पौंसरशिप नहीं थी.’’

अशोक सहायता के लिए कौरपोरेट को लगातार पत्र लिखते, लेकिन बदले में मिलती एक शालीन चुप्पी, उन्होंने एक समाचार रिपोर्ट में याद किया.

2006 तक हम्पी ने ‘औयल ऐंड नैचुरल गैस कौरपोरेशन’ (ओएनजीसी) में एक पर्सनल ऐडमिनिस्ट्रेटर की नौकरी कर ली. उन्हें प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए जाने की अनुमति थी, बस शर्त यह थी कि वे इस के लिए शीर्ष प्रबंधन को सूचित करेंगी.

इसी बीच हम्पी ने लगातार मेहनत जारी रखी. अक्तूबर, 2007 में उन्होंने ईएलओ रेटिंग सिस्टम में 2,606 के आंकड़े को भी छुआ. यह आंकड़ा शतरंज खिलाड़ी की मजबूती को उस के प्रतिद्वंद्वी से मुकाबले में प्रदर्शन के आधार पर मापा जाता है. हम्पी से पहले केवल एक महिला ने 2,600 की सीमा को पार किया था. उसी साल अशोक को द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला, जो उत्कृष्ट खेल प्रशिक्षकों को सम्मानित करने के लिए दिया जाता है. 2009 में हम्पी ने अपने कैरियर के अब तक के सब से ऊंचे ईलो रेटिंग 2,623 का आंकड़ा हासिल किया.

2009 में हम्पी ने महिला ग्रैंड प्रिक्स प्रतियोगिता भी जीती. यह अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ द्वारा आयोजित टूरनामैंटों की एक शृंखला है. कोनेरू हम्पी ने भारतीय महिला शतरंज के लिए वही काम किया है जो सानिया मिर्जा ने भारतीय महिला टैनिस और साइना नेहवाल ने भारतीय महिला बैडमिंटन के लिए किया है.

न्यू इंडियन ऐक्सप्रैस की एक रिपोर्ट में हम्पी  की प्रशंसा करते हुए लिखा गया कि वे लगातार मानकों को ऊंचा और ऊंचा करती जा रही हैं.

2014 में हम्पी ने अन्वेश से शादी के ठीक बाद यात्रा की हनीमून के लिए नहीं बल्कि शारजाह में होने वाले महिला ग्रैंड प्रिक्स में खेलने के लिए.

हम्पी भले ही टैनिस नहीं खेलीं लेकिन उन का सानिया मिर्जा और सेरेना विलियम्स से एक सा?ा पहलू था- तीनों ने मातृत्व के बीच कमाल की वापसी की.

खेल और परिवार

शतरंज का खेल अपने खिलाडि़यों से उतनी शारीरिक मांग नहीं करता जितनी कि कई अन्य खेल करते हैं. लेकिन फिर भी किसी भी पेशे की तरह ब्रेक एक खिलाड़ी की प्रतिस्पर्धात्मक धार धीमी कर सकता है. इसलिए हरकोई जल्दी और अपनी शर्तों पर वापसी नहीं कर पाता. गर्भावस्था के दौरान हम्पी ने शतरंज से दूरी बना ली. वे प्रसवपूर्व जटिलताओं से जू?ा रही थीं और डाक्टरों ने भी 5वें महीने के बाद बैड रैस्ट की सलाह दी.

‘‘मैं शतरंज देखने के लिए भी बहुत उत्सुक नहीं थी. मैं परिवार के साथ आराम करते हुए समय बिताना चाहती थी,’’ उन्होंने याद किया, ‘‘मुझे उस का कोई पछतावा नहीं है. मैं उस समय को बहुत खुशनुमा समय के रूप में याद करती हूं.’’

जहां हम्पी के लिए यह सिर्फ एक विराम था, खेल से कोई बड़ी दूरी नहीं. वे जानती थीं कि वे वापस लौटेंगी. बस यह पता नहीं था कि कब. 2017 में बेटी आहना के जन्म के तुरंत बाद निमंत्रण आने शुरू हो गए. लेकिन हम्पी तैयार नहीं थीं. 2018 में जब उन की बेटी लगभग 1 साल की थी, उन्होंने खेल में वापस लौटने के लिए सावधानीपूर्ण कदम उठाए.

‘‘यह सबकुछ एकदूसरे के सहयोग पर निर्भर करता है,’’ हम्पी ने मुझ से कहा, ‘‘मैं बहुत खुश हूं कि मेरे मातापिता भी उसी शहर में रहते हैं जहां मैं हूं. मेरे पति भी बहुत सहयोगी हैं. सहयोग की भावना के बिना बच्चे को छोड़ कर किसी भी पेशे में वापस लौट पाना मुश्किल होता है क्योंकि एक मां के तौर पर आप को यह महसूस होना चाहिए कि आप का बच्चा सुरक्षित और सहज है.’’

हम्पी की मां लता ने भले ही कभी शतरंज न खेला हो लेकिन वे अच्छी तरह जानती थीं कि उन की बेटी के लिए इस खेल के क्या माने हैं.

‘‘मेरी मां हमेशा मेरे कैरियर पर नजर रखती हैं और मुझे प्रोत्साहित करती रहती हैं,’’ हम्पी ने खेल पत्रिका स्पोर्ट स्टार से कहा, ‘‘वे यह सुनिश्चित करती हैं कि मैं अपने खेल पर पर्याप्त समय दे पाऊं. शादी के बाद मुझे खाना बनाने और घर के दूसरे कामों में काफी समय देना पड़ता था लेकिन वे मुझे लगातार याद दिलाती रहती हैं कि यह सब मेरी प्रैक्टिस की कीमत पर न हो.’’

किसी भी टूरनामैंट के लिए अकसर 15 से 20 दिनों तक की यात्रा करनी पड़ती है. जब हम्पी यात्रा पर जाती थीं तो उन के मातापिता आहना की देखभाल करते थे. शुरूशुरू में यह दूरी मुश्किल होती थी. हम्पी जब वापल लौटती थीं तो आहना कई दिनों तक उन से ही लिपटी रहती थी. लेकिन अब यह दूरी कुछ हद तक सहज हो गई है. वे बारबार फोन काल या छोटीछोटी चीजें के जरीए इस फासले को दूर कर लेती हैं.

महत्त्वपूर्ण मुकाम

हम्पी ने अपनी वापसी के लिए 2018 के चेस ओलिंपियाड को चुना जोकि अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ द्वारा हर 2 साल में आयोजित कराई जाने वाली एक टीम प्रतियोगिता है. यह फैसला उन्हें इसलिए सही लगा क्योंकि इस में वे भारत का प्रतिनिधित्व करने जा रही थीं. प्रतियोगिता से 1 महीना पहले ही उन्होंने अभ्यास शुरू कर दिया ताकि अपनी प्रतिस्पर्धात्मक धार वापस पा सकें. लेकिन टीम का प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा. भारत कुल मिला कर 8वें स्थान पर रहा.

उसी साल नवंबर में हुए एक और टूरनामैंट में हम्पी दूसरे दौर से ही बाहर हो गईं. परिणाम प्रभावशाली नहीं थे, उन्होंने बताया. लेकिन 2019 में हम्पी फिर से अपनी लय में वापस आने लगीं. सितंबर में उन्होंने रूस के स्कोल्कोवो में आयोजित ‘वूमंस ग्रैंड प्रिक्स’ में जीत हासिल की. कुछ महीनों बाद मोनाको में हुए अगले ग्रैंड प्रिक्स इवेंट में उन्होंने रजत पदक हासिल किया. इन प्रतियोगिताओं में जीतने वाले खिलाडि़यों को उच्च स्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए क्वालिफाई करने का मौका मिलता है.

साल के अंत में हम्पी ने अपने कैरियर का एक महत्त्वपूर्ण मुकाम हासिल किया. उन्होंने पहली बार ‘वूमंस वर्ल्ड रैपिड चेस चैंपियनशिप’ का खिताब जीता. जीतों का सिलसिला जारी रहा. फरवरी, 2020 में हम्पी ने कैरन्स कप का खिताब जीता, जिसे दुनिया की सब से ज्यादा प्रतिस्पर्धी महिला शतरंज प्रतियोगिताओं में से एक माना जाता है.

मातृत्व ने हम्पी को सिर्फ एक नया नजरिया ही नहीं दिया बल्कि परिस्थितियों के हिसाब से उन की ढलने की क्षमता को और ज्यादा मजबूत किया.

‘‘पहले जब मैं किसी अलग टाइम जोन में जाती थी तब मु?ो ठीक से नींद नहीं आती थी, जिस का असर मेरे खेल पर तुरंत दिखाई पड़ता था,’’ उन्होंने बताया, ‘‘लेकिन मां बनने के बाद मैं इन चीजों की आदी हो गई हूं.’’

हम्पी की ही तरह उन का खेल भी एक नई ऊंचाई पर पहुंचा. पिछले 5 सालों में शतरंज की लोकप्रियता दुनियाभर में तेजी से बढ़ी है.

रूस और चीन का दबदबा

शतरंज के इस अप्रत्याशित उभार का एक सिरा जुड़ता है कोविड-19 महामारी से. जब लोग अपने घरों में कैद थे और बाहरी दुनिया से कटे हुए थे, तब उन्होंने औनलाइन शतरंज में सुकून और मानसिक राहत पाई. इस की लोकप्रियता को और बढ़ावा दिया लोकप्रिय संस्कृति के एक तत्त्व ने. अक्तूबर, 2020 में नैटफ्लिक्स पर ‘द क्वीन्स गैम्बिट’ नामक एक सीरीज रिलीज हुई जो एक युवा प्रतिभाशाली महिला शतरंज खिलाड़ी की उथलपुथल भरी यात्रा पर आधारित थी. रिपोर्टों के अनुसार, इस सीरीज को 1 महीने के भीतर 62 मिलियन घरों में देखा गया. तब से ले कर अप्रैल 2022 तक दुनिया के सब से बड़े औनलाइन शतरंज समुदाय चेस.कौम के मासिक उपयोगकर्ताओं की संख्या 8 मिलियन से बढ़ कर लगभग 17 मिलियन तक पहुंच गई.

भारत में एक तीसरा प्रेरक कारक भी काम कर रहा था. यह देश अब उस खेल में उभर रहा था, जिस पर पारंपरिक रूप से रूस और चीन का दबदबा रहा था. 2009 में भारत में कुल 20 ग्रैंडमास्टर थे. इस साल नवंबर तक यह संख्या बढ़ कर 91 तक पहुंच गई. पिछले वर्ष भारत की महिला और पुरुष दोनों टीमों ने शतरंज ओलिंपियाड में ऐतिहासिक रूप से पहली बार स्वर्ण पदक जीते. अक्तूबर, 2025 तक दुनिया के शीर्ष 100 खिलाडि़यों में 12 भारतीय थे, वहीं शीर्ष 100 महिला खिलाडि़यों में 7 भारतीय थीं.

इस का मतलब यह भी है कि आज के उभरते शतरंज खिलाड़ी असाधारण प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं.

‘‘मेरे समय से तुलना करें तो अब 14 या 15 साल की उम्र ही किसी भी खिलाड़ी का शिखर माना जाता है,’’ हम्पी कहती हैं, ‘‘अगर आप 12 या 13 साल की उम्र तक ग्रैंडमास्टर नहीं बनते हैं तो आप इसे पेशेवर कैरियर के तौर पर नहीं ले सकते.’’

परिणामस्वरूप कम उम्र के खिलाड़ी अधिक तेज और बेहतर तैयारी के साथ आते हैं. उन्हें अभ्यास के लिए पहले से ज्यादा अवसर उपलब्ध हैं. चाहे वे टूरनामैंट हों या औनलाइन प्रतियोगिताएं.

‘‘निश्चित रूप से युवा खिलाडि़यों के पास ज्यादा ज्ञान और तैयारी होती है क्योंकि वे शतरंज पर ज्यादा समय बिताते हैं,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘वे मु?ा से ज्यादा खेल रहे हैं, इसलिए उन के साथ प्रतिस्पर्धा करना काफी चुनौतीपूर्ण है.’’

वे मानती हैं कि उन का अनुभव ही उन की सब से बड़ी ताकत है. वर्षों तक तराशी हुई समझ और खेल पर गहरी पकड़.

हम्पी कहती हैं कि वे अब चयनात्मक हो गई हैं और पहले की तुलना में कम टूरनामैंट खेलती हैं. उन की प्राथमिकता वे प्रतियोगिताएं हैं जो उन्हें विश्व चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई करने में मदद करें. वे देर रात तक चलने वाले औनलाइन टूरनामैंट्स से भी बचती हैं.

जोखिम भी कम नहीं

हम्पी ने 2024 में लगभग 8 टूरनामैंट खेले. इस साल अब तक उन्होंने 5 टूरनामैंट खेले हैं और कुछ और बाकी हैं. वहीं युवा खिलाड़ी आमतौर पर एक ही अवधि में दर्जनभर टूरनामैंट खेलते हैं. अब वे ओपन सर्किट से भी दूर हो चुकी हैं, जिस में पुरुष और महिला दोनों खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं.

हालांकि हम्पी ने पुरुषों और महिलाओं के खेलने के तरीकों में कुछ अंतर जरूर बताए लेकिन उन्होंने इन फर्कों को ताकत के रूप में देखा.

‘‘महिलाएं जो खेलती हैं, उस में बहुत चयनात्मक होती हैं खासकर ओपनिंग्स में लेकिन जो भी वे खेलती हैं, उस के लिए वे बहुत गहराई से और अच्छी तरह तैयार होती हैं,’’ उन्होंने कहा, ‘‘वहीं पुरुष खिलाडि़यों का ओपनिंग रेपर्टौयर कहीं ज्यादा व्यापक होता है लेकिन वे ज्यादा जोखिम भी लेते हैं.’’

आज महिलाओं का शतरंज भी पहले की तुलना में ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो गया है. इस का दर्शक वर्ग भी पहले से कहीं ज्यादा बड़ा है. इतिहास में सब से ज्यादा देखे गए 5 महिला मैचों में से 4 तो पिछले 2 साल में ही खेले गए. लेकिन अभी भी बहुत कम टूरनामैंट ऐसे हैं, जहां पुरुषों और महिलाओं के लिए पुरस्कार राशि समान हो. उदाहरण के लिए इंटरनैशनल चेस फेडरेशन (स्नढ्ढष्ठश्व) ने जार्जिया में हुई महिला विश्वकप की विजेता के लिए 50 हजार डौलर की पुरस्कार राशि रखी थी, जबकि ओपन कैटेगरी जहां पुरुष और महिला दोनों खेलते हैं के विजेता के लिए 1 लाख, 20 हजार डौलर का पुरस्कार तय किया गया था.

पहले की तुलना अलग रख दें तो अब स्थिति काफी बेहतर है,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘हमारे पास आमंत्रित टूरनामैंट नहीं होते थे और इनाम राशि भी अच्छी नहीं थी. 5 या 6 हजार यूरो को ही अच्छा माना जाता था,’’ उन्होंने याद किया, ‘‘आज आमंत्रित महिला टूरनामैंट में 30 से 40 हजार यूरो सामान्य हैं. इस हिसाब से सुधार हुआ है. लेकिन पुरुष खिलाडि़यों की तुलना में यह काफी कम है.’’

बुरा वक्त भी रहा

पिछले वर्ष हम्पी काफी बुरे दौर से गुजरीं. नार्वे में एक टूरनामैंट में उन्होंने अंतिम से दूसरे स्थान पर अपना सफर समाप्त किया और जल्द ही अगले टूरनामैंट में भी हार गईं. क्या यह अंत की शुरुआत थी? मायूस हो कर, उन्होंने अपने पति और मातापिता से कहा कि वे अब खेल छोड़ने को तैयार हैं. लेकिन यह निर्णय उन्हें सही नहीं लगा.

‘‘किसी न किसी समय हर खिलाड़ी नीचे आता ही है और उसे खेल से बाहर होना पड़ता है,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘मैं सोच रही थी कि मैं अपनी पूरी क्षमता कैसे दिखा सकती हूं और इस हालात से खुद को कैसे बाहर निकाल सकती हूं.’’

दिसंबर, 2024 में जब हम्पी ने न्यूयौर्क में महिला विश्व रैपिड शतरंज चैंपियनशिप में भाग लिया, तब उन्हें खिताब की मजबूत दावेदार नहीं माना जा रहा था. हालांकि वे 2019 में यह खिताब जीत चुकी थीं. वे अपना पहला मैच हार गईं. लेकिन फिर कुछ बदला. उन्होंने अगले 3 मैच ड्रा किए और 7 मैच जीते.

आखिरी राउंड से पहले हम्पी और अन्य 6 फाइनलिस्ट के अंक समान थे. फाइनल मुकाबले में हम्पी ने इंडोनेशियाई खिलाड़ी आइरीन सुकंदर को हराया और सभी प्रतिस्पर्धी खिलाडि़यों में सब से ज्यादा अंक हासिल किए. इस जीत ने उन का नजरिया बदल दिया.

‘‘इस ने मुझे दोबारा शतरंज खेलने के लिए प्रेरित किया और मुझे लगा कि मैं फिर से खेलना चाहती हूं,’’ वे याद करती हैं.

अपनी वापसी के 7 वर्षों बाद हम्पी शायद और अधिक विचारशील हो गई हैं लेकिन जीतने की भूख अभी भी उतनी ही तीव्र है. हार का दर्द लंबे समय तक बना रहता है. शतरंज के मुहरे पैक हो जाने के बाद भी.

‘‘यह मेरे साथ तब तक रहता है जब तक मैं फिर से नहीं जीत जाती,’’ हम्पी ने हंसते हुए कहा, ‘‘कुछ मैच ऐसे हैं जो मुझे अभी तक परेशान करते हैं यहां तक कि 2011 के पुराने खेल भी.

‘‘यह आसान नहीं है. मैं अभी भी सीख रही हूं कि इसे कैसे संभालना है,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘लेकिन संयोग से अपने परिवार और बेटी के कारण घर लौटते ही मैं आराम महसूस करती हूं. जब मैं घर होती हूं तो पूरी तरह उन के साथ होती हूं और जब मैं खेल में होती हूं तो इस दूसरी दुनिया को पूरी तरह बंद कर देती हूं.’’

समय मिलने पर क्या करती हैं?

घर पर हम्पी की कार्यक्रम काफी लचीला है. उन की दिनचर्या में लगभग 1 घंटा शारीरिक गतिविधियों जैसे जौगिंग या योग और 5-6 घंटे शतरंज का अभ्यास शामिल है. यह तब है जब पास में अगर कोई प्रतियोगिता आने वाली हो.

‘‘लेकिन जब कोई टूरनामैंट नहीं होता तो मैं बहुत सख्त नहीं रहती,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘अगर मुझे समय मिलता है तो मैं देखती हूं वरना प्राथमिकता अपनी बेटी के साथ समय बिताने की होती है.’’

आहना उस उम्र से बड़ी हो गई है जब उन की मां ने शतरंज खेलना शुरू किया था लेकिन अब तक आहना ने इस खेल में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

हम्पी शतरंज के बाहर भी खुशी तलाशती हैं. वे फिल्में देखती हैं, परिवार के साथ समय बिताती हैं, ध्यान करती हैं और बोर्ड गेम खेलती हैं. ‘द क्वीन्स गैम्बिट’ जिस में सफेद मुहरे वाला खिलाड़ी क्वीन का प्यादा दो घर आगे बढ़ा कर केंद्र पर नियंत्रण करता है. एक ऐसी रणनीति है जिसे हम्पी अकसर इस्तेमाल करती हैं जैसे उन्होंने जार्जिया में दिव्या के खिलाफ मैच में किया था. लेकिन उन्होंने नैटफ्लिक्स की यह सीरीज नहीं देखी है.

‘‘मैं सीरीज देखने की शौकीन नहीं हूं क्योंकि एक बार शुरू कर दूं तो मुझे इस की लत पड़ जाती है,’’ हम्पी ने मुझ से कहा.

अगर कभी उन की अपनी कहानी स्क्रीन पर दिखाई जाए तो वे बौलीवुड अभिनेत्री तापसी पन्नू को अपना किरदार निभाते हुए देखना पसंद करेंगी.

इस वर्ष दिसंबर में हम्पी ग्लोबल चेस लीग और वर्ल्ड रैपिड और ब्लिट्ज चैंपियनशिप में खेलेंगी. रिटायरमैंट अभी उन की योजना में नहीं है. वे एक समय सोचती थीं कि अपनी बेटी के 10 साल की उम्र में खेल छोड़ देंगी. यह अहम मोड़ अब 2 साल दूर है. हम्पी के रुकने या धीरे होने का कोई संकेत नहीं दिखता है.

‘‘अगर आप का टूरनामैंट खराब रहा या आप अपने सब से खराब प्रदर्शन पर खेल रहे हैं लेकिन आप सिर्फ एक मैच जीतते हैं तो भी आप को वापस आने और अपनी ताकत दिखाने की ललक रहती है,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘एक जीत यह दिखाती है कि आप अभी भी जीतने में सक्षम हैं. मुझे लगता है कि यही मुझे खेल के प्रति प्रेरित रखता है.’’

Koneru Humpy

Beauty Tips: फुंसियां फोड़ने के बाद रह गए दाग? जानिए आसान घरेलू नुस्खे

Beauty Tips: मेरे हाथ काफी रूखे रहते हैं. मौइस्चराइजर लगाने के बाद भी ये सामान्य नहीं दिखते. कोई उपाय बताएं जिस से ये नर्ममुलायम बने रहें?

हाथों की स्किन में औयल ग्लैंड्स नहीं होने के कारण इन्हें औयल देना पड़ता है. इसलिए इन्हें मुलायम और चिकना बनाए रखने के लिए हाथ धोने के बाद हमेशा कोई थिक क्रीम लगाएं. यह आप की त्वचा में औयल को बनाए रखने में मदद करेगी.

आप हाथ धोने के लिए कौन सा साबुन इस्तेमाल करती हैं इस पर भी ध्यान दें. ज्यादातर साबुन आप के हाथों को रूखा बना देते हैं, इसलिए लिक्विड सोप ही बेहतर है. रात को आप थोड़ी सी वैसलीन अपने हाथों पर लगा कर इसे एक ओवरनाइट ट्रीटमैंट की तरह भी इस्तेमाल कर सकती हैं. बस हाथ धोने के बाद इसे अपने हाथों पर लगाएं और कौटन के दस्ताने पहन कर सो जाएं.

मेरी उम्र 22 साल है. मेरी स्किन बहुत सैंसिटिव है. मैं जब भी कोई क्रीम, मेकअप प्रोडक्ट यूज करती हूं तो मेरे फेस पर दाने निकल जाते हैं. ऐसे में मैं बहुत परेशान रहती हूं. बताएं मैं क्या करूं?

आप कोशिश करें कि इस्तेमाल में लाई जाने वाली क्रीम खुशबू वाली न हो. हो सकता है उस की खुशबू से आप को ऐलर्जी हो. इसलिए आप सैंसिटिव स्किन के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली क्रीम ही खरीदें. जब भी यह क्रीम यूज करें तो इसे लगाने से पहले स्किन टोनर लगा कर उसे सूखने दें. उस के बाद क्रीम लगाएं.

यदि आप को दानों की समस्या रहती है तो ब्र्रैंडेड प्राइमर का इस्तेमाल करने से आप की प्रौब्लम सौल्व हो सकती है. आप को औयल फ्री प्राइमर का ही इस्तेमाल करना चाहिए.

मेरी उम्र 30 साल है. मेरी आईलैशेज काफी कम और छोटी हैं. मुझे कोई उपाय बताएं, जिस से उन की ग्रोथ हो सके?

घनी आईलैशेज के लिए अरंडी का तेल काफी फायदेमंद माना जाता है. इस में रिसिनोलिक ऐसिड पाया जाता है. यह बालों की जड़ों में रक्तप्रवाह को बढ़ाता है और पलकों के विकास के लिए उत्तेजित करता है.

अरंडी के तेल से न सिर्फ आप की पलकें घनी होंगी बल्कि यह पलकों को टूटने से भी बचाएगा. इसे लगाने के लिए अपने चेहरे को अच्छी तरह साफ कर लें. ध्यान रहे कि आप की आंखों पर किसी तरह का मेकअप न हो. अब साफ मसकारा ब्रश लें. इस ब्रश को अरंडी के तेल में डुबोएं और पलकों पर लगाएं. इसे रातभर पलकों पर लगा रहने दें और सुबह गुलाबजल या फिर मेकअप वाइप्स की मदद से साफ कर लें.

मेरी उम्र 16 साल है. मेरे चेहरे पर फुंसियां निकली थीं तो मैं ने उन्हें फोड़ दिया था. अब उन के मार्क्स रह गए हैं जो देखने में भद्दे लगते हैं. कोई घरेलू उपाय बताएं जिस से मार्क्स खत्म हो जाएं तथा मेरे चेहरे का ग्लो लौट आए?

कई बार दानों को छील देने से त्वचा पर उस के भद्दे निशान पड़ जाते हैं. आप घर पर रोज सुबहशाम अपने चेहरे को धो कर एएचए सीरम से फेस की मसाज कर सकती हैं. ऐसा करने से मार्क्स काफी हद तक कम हो जाएंगे. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो आप माइक्रोडर्मा एब्रेजर व लेजर थेरैपी की सिटिंग्स ले सकती हैं. इस थेरैपी में लेजर की किरणों से त्वचा को रीजनरेट कर के नया रूप दिया जाता है. उस के बाद यंग स्किन मास्क से त्वचा को निखारा जाता है.

वैक्सिंग के बाद मेरी स्किन पर लाल धब्बे उभर आते हैं. मैं अनचाहे  बालों को हटाने के लिए क्या उपाय अपना सकती हूं?

आप वैक्सिंग से पहले ऐंटीऐलर्जिक टैबलेट ले सकती हैं. वैसे इस समस्या से परमानैंट छुटकारा पाने के लिए पल्स लाइट ट्रीटमैंट की सिटिंग्स ले सकती हैं. ये एक इटैलियन टैक्नोलौजी है जो अनचाहे बालों को रिमूव करने का सब से तेज, सुरक्षित व दर्दरहित समाधान है. लेजर अंडरआर्म्स के बालों पर ज्यादा इफैक्टिव होती है. इसी कारण इस की कुछ ही सिटिंग्स में बाल न के बराबर हो जाते हैं. इस से 80% तक अनचाहे बाल दूर हो जाते हैं और शेष बाल इतने पतले और हलके रंग के हो जाते हैं कि वे नजर नहीं आते.

  मेरे चेहरे पर ब्लैकहैड्स हैं जो आसानी से नहीं निकलते हैं. बताएं मैं क्या करूं?

ब्लैकहैड्स को फेस पैक के जरीए निकाल पाना पौसिबल नहीं है क्योंकि वे पोर्स के अंदर होते हैं और पोर्स को खोल कर क्लीन करने के लिए स्क्रब करना जरूरी होता है. इन ब्लैकहैड्स को रिमूव करने के लिए आप किसी अच्छे कौस्मैटिक क्लीनिक से वेज या फ्रूट पील करवा सकती हैं. 15 दिन में एक बार पील करवा लेने से ब्लैकहैड्स व व्हाइट हैड्स रिमूव हो जाएंगे साथ ही चेहरे पर निखार भी आएगा.

इस के साथ ही डेली बेसिस पर अपने फेस को क्लीन करने के लिए स्क्रब बना लें. घर पर बादाम व दलिया खुरदरा पीस कर पाउडर बनाएं और इस में चुटकीभर हलदी और गुलाबजल मिला कर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को अपनी नाक व चेहरे पर लगा कर हलके हाथों से स्क्रब कीजिए और थोड़ी देर बाद सादे पानी से धो लें.

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