इज्जत के आगे रुतबा भारी

देश में औरतों को क्या सम्मान मिल रहा है यह भारतीय कुश्ती संघ के चुनावों से स्पष्ट है. संघ के पिछले अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी के सांसद बृजभूषण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों ने खुल्लमखुल्ला आरोप लगाए थे और वे महीनों धरनों पर बैठी रहीं, पर कुछ खास नहीं हुआ. भारतीय जनता पार्टी ने बृजभूषण सिंह का पूरा बचाव किया और न आपराधिक मामले में गिरफ्तारी हुई, न पार्टी से निकाला गया. बहाना बना डाला गया कि अपराध साबित होने पर पार्टी से निकाला जाएगा.

महिला पहलवानों के जख्मों पर तेजाब छिड़कते हुए भारतीय कुश्ती संघ के नए चुनावों में बृजभूषण सिंह के सहयोगी संजय सिंह को 47 में से 40 वोट भी मिल गए और कार्यकारिणी की 15 सीटों में से 13 पर उस गुट का कब्जा हो गया. इस में वोट डालने वाले देश के विभिन्न कुश्ती संघों के स्थानीय अध्यक्ष होते हैं.

बाद में आलोचना होने पर इन चुनाव को खारिज कर दिया गया क्योंकि नए पपेट अध्यक्ष ने बृजभूषण सिंह के गांव में ही नई कुश्ती प्रतियोगिता के आयोजन की घोषणा तुरंत कर के जता दिया था कि महिला पहलवानो, हम पुरुष ही इस जीवन को चलाने के लिए पैदा होते हैं और बारबार दबदबा हमारा ही रहेगा. भारतीय जनता पार्टी को लगा कि विपक्षी 2024 के चुनावों में इसे उछालेंगे इसलिए स्पोर्ट्स अथौरिटी ने आननफानन में चुनाव भी खारिज कर दिए और नई कार्यकारिणी भी.

यह एक नमूना भर है, औरतों के हकों का- उन औरतों के हकों का जो शारीरिक रूप से कमजोर नहीं हैं और जो 80-85% पुरुषों को आपसी ?ाड़प में पटक सकती हैं. इन मजबूत औरतों का दम था कि

वे महीनों धरने पर बैठीं, पुलिस की लाठिया खाईं, सर्दी, बरसात, गरमी सही पर अड़ी रहीं मगर समाज और सरकार इतनी बेरहम निकली कि न तो सांसद अध्यक्ष का खास बिगड़ा न उस के राजपाट में आखिर तक कोई कमी आई. वह अध्यक्ष नहीं बना तो उस का मुहरा बन गया था.

यह चैलेंज हर उस औरत को सहना पड़ता है जो पुरुषों की ज्यादती का मुकाबला करने निकलती है. अपने घर से ले कर महल्ले, कालोनी, शहर व रिश्तेदार सब नाराज होते हैं और इस तरह पुरुष के खिलाफ खड़ी होने का हुक्कापानी उसी तरह बंद किया जाता है जैसे लोकसभा में ओम बिरला व राज्यसभा में जगदीप धनखड़ विपक्षी सांसदों के साथकर रहे हैं जैसे बंगाल की महुआ मौयत्रा के साथ किया गया क्योंकि वह मुखर भी थी और अपनी मरजी से जीना चाहती थी.

विद्रोह करने वाली युवतियों के परिवारों पर एक तरह से धर्मसम्मत काला धब्बा लगा दिया जाता है. उन्हें नई नौकरियां नहीं मिलतीं, उन के परिवारों के साथ रिश्तेदारी निभानी बंद हो जाती है, उन के भाईबहनों, भतीजोंभतीजियों के विवाह में सवाल पूछे जाने लगते हैं, उन्हें आयोजनों में नहीं बुलाया जाता.

हिंदू धर्म ही नहीं, सभी धर्म औरतों को गुलाम बनाए रखने में सब से ज्यादा आगे रहते हैं क्योंकि धर्म की दुकानदारी चलती तभी है जब धर्म आदमियों को गुलाम सी औरतें सैक्स सुख व घर चलाने के लिए देता रहे. स्ट्रौंग और सैल्फकौन्फिडैंट औरतें सदा ही धर्म की पावर का विरोध करती रही हैं. अहल्या, सीता, द्रौपदी जैसे नाम लेने पर बेचारी औरतों सी इमेज उभरती है और यही घरघर में आज भी खटती दिखती हैं. बृजभूषण सिंह की कुश्ती संघ में जीत तो एक  नमूना भर थी.

बानो के न्याय में शामिल हुई तीन महिलाएं

एक महिला सम्मान की हकदार है, भले ही उसे समाज में कितना भी ऊंचा या नीचा क्यों न माना जाए, चाहे वह किसी भी धर्म को मानती हो या किसी भी पंथ को मानती हो . क्या महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों में दोषियों की सजा कम करके और उन्हें आजादी देकर सजा माफ की जा सकती है?’

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गुजरात राज्य द्वारा अगस्त 2022 में बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और दो महीने के शिशु सहित उसके परिवार की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा पाए 11 लोगों को दी गई सामूहिक छूट के आदेश को रद्द कर दिया जिन्हे गुजरात सरकार द्वारा “अच्छे व्यवहार” के आधार पर रिहा कर दिया गया था.

सुश्री बानो, जो उस समय गर्भवती थीं, और उनके परिवार के साथ जो हुआ उसे” सांप्रदायिक घृणा से प्रेरित वीभत्स और शैतानी अपराध” बताते हुए न्यायमूर्तिबी.वी. नागरत्ना और उज्जल भुइयां की पीठ ने गुजरात में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को तीखी फटकार लगाई . सोमवार का फैसला केंद्र के लिए एक झटका साबित हुआ जिसने पुरुषों की समयपूर्व रिहाई को मंजूरी दे दी थी .

यथास्थिति का आदेश देते हुए, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने तर्क दिया कि दोषियों को फिर से छूट का आवेदन करने के लिए भी पहले उन्हें जेल में वापस आना होगा . साथ ही अदालत ने कहा कि दोषियों को सजा में छूट देने का अधिकार गुजरात के पास नहीं था और आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 432( 7)( बी) के तहत गुजरात “उपयुक्त सरकार” नहीं थी, जिस में सजा को निलंबित करने और माफ करने की शक्ति का विषय शामिल था .

यह मामला अगस्त 2004 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजरात से महाराष्ट्र स्थानांतरित कर दिया गया था . यह देखते हुए कि सुश्री बानो को एक अनाथ का जीवन जीने के लिए मजबूर किया गया था . ग्रेटर मुंबई में सीबीआई के विशेष न्यायाधीश ने जनवरी 2008 में 11 लोगों को दोषी ठहराया था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी .

इसलिए, अदालत ने यह स्पष्ट किया की वह महाराष्ट्र राज्य था, जहां 11 लोगों पर मुकदमा चलाया गया और सजा सुनाई गई थी न कि गुजरात, जहां अपराध हुआ था या दोषियों को कैद किया गया था, जो धारा 432 के तहत छूट देने के लिए” उचित सरकार” थी .

इस केस को देखते हुए महिलाओं के मन में सर्वप्रथम यह सवाल ज़रूर होगा की केसे अकेली बिल्किस ने कोर्ट में यह लड़ाई लड़ी होगी? तो जान लीजिए की बिलकिस का साथ के लिए आगे आयीं थी यह तीन महिलाएं-

लखनऊ विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा लखनऊ के लिए उड़ान भरने के लिए दिल्ली हवाई अड्डे पर थीं, तभी उन्हें एक मित्र का फोन आया और उन्होंने प्रोफेसर से पूछा कि क्या वह जनहित याचिका दायर करने के लिए याचिकाकर्ता बनेंगी . दोषियों को हत्या का भी दोषी पाया गया था. वर्मा तुरंत सहमत हो गए और सह- याचिकाकर्ता बनने के लिए अगले दिन कूरियर के माध्यम से उन्होंने अपना आधार कार्ड भेजा .

इस समय तक, सीपीआई( एम) की सुभाषिनी अली- जो 2002 में सामूहिक बलात्कार और हत्याओं के दो दिन बाद गुजरात के एक राहत शिविर में बिलकिस बानो से मिली थीं, पहले ही फैसला कर चुकी थीं की वह इस लड़ाई में बिलिस के लिए याचिकाकर्ता बनेंगी .

अब, टीम तीसरे याचिकाकर्ता की तलाश कर रही थी  और उसे वह पत्रकार रेवती लौल के रूप में मिली . रेवती लौल गुजरात में एनडीटीवी के पत्रकार थीं और घटना घटने के बाद उन्होंने बिलकिस से मुलाकात की थी. उन्होंने’ एनाटॉमी ऑफ हेट’ नाम से एक किताब भी लिखी है .

इस तरह बिलकिस बानो के न्याय की भागीदार हुईं तीन महिलाएं . जिन्होंने बानो की यह लड़ाई जारी रखी . इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने बिलकीस के पक्ष मे फैसला लेकर और उसे न्याय दिलाकर कई महिलाओं का न्यायालय के न्याय पर खोया हुआ विश्वास बहाल किया है.

खुश क्यों नहीं आप्रवासी भारतीय

‘वि देश’ शब्द पढ़ते ही आंखों के आगे सुख, आराम, अमीरी, आजादी और खुलेपन आदि को चित्र उभर आते हैं. इस आकर्षक शब्द के मोहजाल में विश्व का कोई एक देश नहीं बल्कि समूचा विश्व और वहां के हर वर्ग के लोग आकर्षित हैं. दूसरा देश कैसा है, वहां की चीजें कैसी हैं, वहां का वातावरण कैसा है, उस देश का इतिहास क्या रहा है और उस ने कितनी आधुनिक प्रगति की है आदि बातों को जानने, देखने के
लिए इनसान अपने मन में एक खिंचाव सा महसूस करता है.

नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री जास्टिन ट्रूडो का खालिस्तान समर्थक कनाडा नागरिकों को ले कर पैदा हुआ विवाद वहां बसे 14-15 लाख भारतीय मूल के लोगों के लिए एक खतरा है क्योंकि वे अब न तो अपने रिश्तेदारों को बुला पा रहे हैं न भारत जाने का रिस्क ले रहे हैं.

अक्तूबर, 2023 में दोनों देशों ने वीजा देना बंद कर दिया था. अपनों से न मिल पाना दूसरे देश में रह रहे लोगों के लिए एक मानसिक जेल बन जाता है. जीवनसाथी के रूप में विदेशी औरत और पुरुष का आकर्षण कोई आधुनिक समय की देन नहीं है बल्कि यह आदिकाल में भी था. तभी तो किस्सेकहानियों में कहा जाता है कि अमुक देश के राजकुमार ने अमुक देश की राजकुमारी से विवाह रचाया था. वह दूसरे देश को देखने और सम?ाने का कुतूहल ही था जिस ने कोलंबस और वास्कोडिगामा को सागर में उतरने को मजबूर किया. दरअसल, नए की खोज और कुछ नया जानने की कल्पना करना इनसान की प्रकृति है.

क्यों जाते हैं विदेश

यह ‘विदेश’ का मोह अलगअलग लोगों को अलगअलग तरह का होता है. जहां विकसित देशों के लोग चमकदमक से दूर शांत प्रकृति की गोद में कुछ समय गुजारना चाहते हैं वहीं विकासशील देशों के लोग चमकदमक वाले देशों की चकाचौंध को नजदीक से देखना चाहते हैं. गरीब और पिछड़े देशों के लोग अपने आर्थिक स्तर को बढ़ाने के लिए विदेश जाते हैं.

इसे सीधेसीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका, इंगलैंड, कनाडा और फ्रांस के लोग वातावरण व स्थान बदली के लिए विश्वपर्यटन पर निकलते हैं तो चीन, जापान व दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों के लोग यूरोप व अमेरिका के देशों को देखने के लिए जाते हैं जो वहां कुछ सप्ताह घूम कर वहां की ढेरों यादें और आनंद समेटे वापस घर लौट आते हैं.

गरीब देशों के लोग अपने आसपास की परिस्थितियों से भाग कर रोजीरोटी कमाने के लिए विदेश का रास्ता अपनाते हैं और वहीं बस जाते हैं. ऐसे लोगों को आप्रवासी कहा जाता है. कुछ लोग इन्हें रिफ्यूजी भी कहते हैं. इन में कुछ ऐसे लोगों की भी संख्या होती है जो समाज के बंधनों से घबरा कर विदेश भागते हैं.

भारत से विदेश गए लोगों का मुख्य ध्येय विदेशों में रह कर आर्थिक रूप से विकसित होना है. कुछ समय पहले एक सर्वे में यह भी पता चला है कि आप्रवासी भारतीयों को यदि अपने देश में वे सारी सुविधाएं मसलन अच्छी नौकरी, अच्छी डाक्टरी सुविधा, बच्चों के लिए उच्च शिक्षा, साफ शुद्ध खानेपीने की वस्तुएं मिलें तो ये लोग अपने देश में ही रहना ज्यादा पसंद करेंगे.

एक सच यह भी इसी के साथ एक सच यह भी है कि जब आज समूचा विश्व सिमट कर एक शहर के रूप में बदल गया है तो क्यों न ऐसे लोग उन का लाभ उठाएं जिन में संकल्प है, लगन, साधना करने की क्षमता है और वे महत्त्वाकांक्षी भी हैं पर भारतीय तो अपने देश में रह कर ‘विदेश’ की कल्पना सोनेचांदी के ढेर से या अति आधुनिक वस्तुओं से सजा जीवनस्तर से करता है.

दरअसल, विदेशी लड्डू उसे बड़ा मीठा और खत्म न होने वाला लगता है पर जो इस लड्डू का स्वाद ले रहा है उस के दिल से पूछिए कि उस लड्डू तक पहुंचने के लिए उसे क्याक्या करना पड़ा. कितने ऐसे लोगों को मैं ने देखा है कि घर को सही ढंग से चलाने और बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्हें अपनी तमाम व्यक्तिगत खुशी को दांव पर लगाना पड़ा है.

आज भारतीय आप्रवासी विश्व के कोनेकोने में हैं. मेहनतकश मजदूर के रूप में खाड़ी के
देशों में जहां आप्रवासी भारतीयों की भरमार है वहीं उच्च शिक्षिति लोगों ने इंगलैंड, अमेरिका और कनाडा में अपनी अच्छीखांसा पहचान बना रखी है.

पैसा कमाना मुख्य ध्येय

सालों से यह सिलसिला चल रहा है कि जो छात्र अमेरिका पढ़ने जाते हैं, उच्च शिक्षा पाने के बाद वे वहीं के हो कर रह जाते हैं. आज इंगलैंड और अमेरिका में तो कुछ शहर ऐसे हैं जिन्हें छोटा भारत के रूप में देखा जाता है.

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आम भारतीय विदेशों में जाने से पहले यही सोचता है कि वह पैसा कमा कर अपने देश वापस आ जाएगा पर जब वहां जाने के बाद तमाम स्थानीय परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए वह अपने पैर जमा लेता है तब सोचता है कि जमेजमाए धंधे को छोड़ कर अब क्यों जाए. इन्हीं में ऐसे लोग जो नियम कानून, भाषा, वातावरण से घबरा जाते हैं वापस भी आ जाते हैं. पर एक बात तो जरूरी है कि
आप किसी भी देश में रोजगार की नीयत से जाएं, वहां के बारे में संपूर्ण जानकारी अवश्य रखें.

यदि भारतीय अंगरेजी भाषा वाले देश में आते हैं तो उन के लिए काम व परिस्थितियां दोनों आसान हो जातीं लेकिन विश्व में कुछ देश ऐसे भी हैं जहां अंगरेजी में कामकाज नहीं होता क्योंकि वे अपनी भाषा में इतने प्रगतिशील हैं कि उसी में सब काम करना चाहते हैं. ऐसे देशों में जाने से पहले वहां की भाषा का अच्छी तरह ज्ञान होना चाहिए. आप चाहें कि वहां पहुंच कर भाषा सीख कर सफलता पा लेंगे तो यह सोच गलत है
और सफलता पाने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ सकता है.

भारत में वह बात नहीं विदेशों में हर शिक्षित को उस की शिक्षा के अनुसार काम नहीं मिलता. ऐसे आप्रवासी भारतीयों की हालत अलगअलग देशों में अलगअलग तरह की होती है. कई लोग तो नए देश और नए वातावरण में तालमेल न बैठा पाने के कारण उदास, चिड़चिड़े हो जाते हैं, कुछ खुद को कोसते हुए
देखे जा सकते हैं तो कुछ गलत जगह पर गलत बात करते हैं, उन्हें खुद ही सम?ा में नहीं आता कि ऐसे समय में क्या करना चाहिए.

इंगलैंड में आप्रवासियों और उन के बच्चों की स्थिति क्या है यह अब किसी से छिपा नहीं है. रंगभेद के शिकार बच्चे अपने भविष्य के लिए मातापिता को दोषी मानते हैं कि वे क्यों इंगलैंड आए थे. हां, अमेरिका और कनाडा का हाल इंगलैंड से बेहतर है जहां रंगभेद नहीं है और स्थानीय लोग खुले विचारों वाले और उच्च शिक्षित हैं.

यद्यपि मैं यह नहीं कह सकता कि वहां कर आप्रवासी सुखी है. इस धनी देश में भी विशाल मध्यवर्ग है, जो भारत की तरह ही चक्की के दो पाटों के बीच फंस कर गेहूं की तरह पिस रहा है. यहां के लोगों में जो खास बात देखने को मिलती है वह दिखावा है. वे बैंक से मोटी रकम उधार ले कर आलिशान घर, मोटर और तमाम दूसरी शानशौकत की चीजें बटोर तो लेते हैं, अपने को इतने कर्ज में डुबो लेते हैं कि मेहनत से
कमाई पूंजी का एक बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में ही खर्च करना पड़ता है. पीड़ा यह है कि इस दिखावे की जिंदगी के लिए उन्हें लगातार अधिक काम करना पड़ता है.

अब तो उन के पास इतना भी समय नहीं है कि वे अपने बच्चों की देखभाल कर सकें. लिहाजा, भारत से अपने माता या पिता को बुला कर उन पर बच्चों की जिम्मेदारी सौंप कर कुछ निश्चिंत होना चाहते हैं. चूंकि उन की आर्थिक हैसियत ऐसी नहीं है कि वे नौकरानी रख सकें. अत: अपने बुजुर्गों से वे यह उम्मीद भी रखते हैं कि वे घर का सारा काम जैसे खाना बनाना, बाजार जा कर सब्जी लाना, बच्चो को स्कूल बस तक
छोड़ना और लाना आदि सभी काम करें.

रंगभेद व असमानता का सामना मातापिता को यह कह कर बुलाया जाता है कि आप यहां आएं और आराम करें पर जब धीरेधीरे उन पर जिम्मेदारियां थोपी जाती हैं तो वे अंदर ही अंदर घुटने लगते हैं और फिर जल्द ही इस फिराक में लग जाते हैं कि कैसे वापस भारत जाया जाए.

आप्रवासी भारतीयों के जवान बच्चे कभी घर तो कभी बाहर के माहौल के बीच टकराते रहते हैं. परंपरागत जीवन का बहिष्कार करने पर उन्हें बिगड़ैल और उद्दंड कहा जाता है. यदि बच्चे अपने संस्कारों के साथ जुड़ कर चलते हैं तो उन्हें आजाद खयाल अपने दोस्तों के बीच नीचा देखना पड़ता है. कई बच्चे आज्ञाकारी हो कर अपने अरमानों का खून कर देते हैं और कई अंतर्मुखी हो जाते हैं. घर का माहौल संघर्षमय है तो
कुछ बच्चे दूसरों के मुकाबले जीवन में संभावनाओं को न पा कर उदास हो जाते हैं.

आप्रवासियों के बच्चे शिक्षा ले कर काम की तलाश में निकलते हैं, यहां तक तो ठीक है पर जब उन्हें काम की तलाश में रंगभेद व असमानता का सामना करना पड़ता है तब वे तिलमिला उठते हैं क्योंकि वे अपने को किसी भी तरह आप्रवासी मानने को तैयार नहीं होते. वे अपने को उस देश का नागरिक मानते हैं
और इस से उन के अंदर जो विद्रोह पनपता है वह उन के बाकी के समूचे जीवन को प्रभावित करता है.

लग्जरी से भरपूर लाइफ का आनंद लेना चाहते हैं, तो नए साल में करनी होगी कैरियर प्लानिंग

२४की उम्र में अच्छा सैलरी पैकेज पाना हर किसी की चाहत होती है. लेकिन बिस्तर पर पड़ेपड़े तो अच्छा पैकेज मिलेगा नहीं. अच्छा पैकेज तो छोडि़ए जनाब आप को एक अच्छी नौकरी भी नहीं मिलेगी. इसलिए बिस्तर को छोड़ कर अपने लक्ष्य की ओर दौडि़ए, तभी आप बिग ब्रैंड्स की बिग लाइफ जी पाएंगे.
इस के उलट अगर आप अपने आलस के कारण बिस्तर पर ही पड़े रहेंगे तो आप कभी लग्जरी लाइफ नहीं जी पाएंगे.

आप अपने दोस्तों को ऐसी लाइफ जीते देख कर अपने सिर के बाल नोचेंगे और अपनेआप को कोसेंगे कि काश मैं ने मेहनत कर ली होती. इस से पहले कि आप अपने किए पर पछताएं हम आप को समय रहते मेहनत करने की सलाह देते हैं. अगर आप ने अपने सपनों के लिए मेहनत की तो न सिर्फ आप अपने सपनों को पूरा कर पाएंगे बल्कि आप वह सब भी खरीद पाएंगे जिस की चाह आप को हमेशा से थी.

अगर आप मेहनत कर रहे हैं तो सफलता आप के कदम जरूर चूमेगी. इस बात की गवाह मधुरिमा चतुर्वेदी है. मधुरिमा 36 साल की है. वह पेशे से डाटाऐनालिस्ट है. वह गाजियाबाद की इंदिरापुरम सोसाइटी में रहती है. आज मधुरिमा के पास अपने खुद के पैसों के 2 घर हैं. अपने ही पैसों से उस ने मर्सडीज भी ले ली है. वह जानती है कि पैसे कैसे कमाए जाते हैं इसलिए उस ने स्टौक मार्केट में भी इनवैस्ट किया है.

मेहनत तो करनी पड़ेगी

ऐसा नहीं है कि मधुरिमा हमेशा से ही अमीर रही है. उस ने बचपन में बहुत स्ट्रगल किया है. बचपन में ही मधुरिमा के पिता की कैंसर से डैथ हो गई थी. मां ने छोटीमोटी नौकरी कर के किसी तरह मधुरिमा को पाला. सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली मधुरिमा पढ़ाई में बहुत होशियार थी. वह अच्छी तरह जानती थी कि अगर अपने बदलने हैं तो मेहनत तो करनी ही होगी.

मधुरिमा ने अपने पूरे दिन का टाइम टेबल बनाया हुआ था. 10वीं क्लास से ही उस ने अपनी कैरियर प्लानिंग शुरू कर दी थी. वह जानती थी कि अपना भविष्य अच्छा बनाने के लिए अपने कैरियर पर फोकस करना होगा.

12वीं कक्षा पास करते ही मधुरिमा ने इंटर्नशिप स्टार्ट कर दी. सोसाइटी वाले उस के बारे में तरहतरह की बातें करने लगे. लेकिन वह नहीं रुकी. उस ने अपने सपनों की उड़ान जारी रखी और आज एक अच्छी पोस्ट पर है. इसी के जरीए उस ने अपनी लाइफ को बदला.

सपनों का साथ नहीं छोड़ा

मगर कभी वह समय भी था जब मधुरिमा ने त्योहारों पर पुराने कपड़े भी पहने थे लेकिन अब वह बड़ेबड़े ब्रैंड के कपड़े पहन रही है. ऐसा पौसिबल तब ही हो पाया जब उस ने अपने सपनों का साथ नहीं छोड़ा और खुद पर विश्वास रखा. यही वजह है कि आज मधुरिमा बिग ब्रैंड्स की बिग लाइफ ऐंजौय कर रही है.
मधुरिमा कहती है, ‘‘अगर आप को लाइफ में कुछ बड़ा करना है तो अपने आराम को मारना होगा और कड़ी मेहनत करनी होगी. आप का पैंशन और मेहनत ही आप के लाइफस्टाइल को बदलने की हिम्मत रखती है. पैसों के बिना कुछ नहीं है यह तो जग जाहिर है. ऐसे में आप को पैसे कमाने हैं तो बचपन से ही अपने कैरियर की प्लानिंग कर लें. लोगों की बातों में न आएं. सिर्फ अपने और अपने भविष्य के बारे में सोचें.

आप किसी के बहकावे में न आएं. धर्म के पाखंडी आप को धर्म के चक्कर में फंसाएंगे और खुद के साथ बांध कर रखना चाहेंगे लेकिन आप उन की बातों में फंसना मत. खासकर लड़कियां क्योंकि धर्म के पाखंडी उन्हें घरों में सिमटा कर रखना चाहते हैं.’’

मधुरिमा आगे कहती है, ‘‘आप अपना भविष्य बनाने में इतना भी मशगूल न हो जाओ कि अपने वर्तमान को ऐंजौय न कर पाओ. इसलिए कैरियर की चिंता करतेकरते लाइफ को भी ऐंजौय करते रहें.’’

महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत

सिर्फ मधुरिमा ही नहीं जिवामी की कोफाउंडर और सीईओ रिचा कर ने भी अपनी कड़ी मेहनत से क्व700 करोड़ की कंपनी खड़ी कर दी. उन की कंपनी जिवामी एक ऐसा औनलाइन प्लेटफौर्म है, जो महिलाओं के लिए लौंजरी बनाता है. रिचा कर ने लोगों व समाज की परवाह न करते हुए सफलता की नई ऊंचाइयों को छुआ है. उन की कहानी सभी युवाओं खासकर महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है.

हम ने अकसर देखा है कि लड़कियां लौंजरी खरीदते वक्त असहज महसूस करती हैं. रिचा ने लड़कियों की इस समस्या को सम?ा और उस पर काम किया. आज जिवामी अपनी सर्विस में 5 हजार से ज्यादा रेंज, 50 से ज्यादा ब्रैंड और 1 हजार से ज्यादा साइज शामिल कर चुका है. उन की वैबसाइट पर हर महीने 2.5 मिलियन विजिटर्स आते हैं. इस कंपनी में कई बड़ेबड़े इनवैस्टर्स ने फंड इनवैस्ट किया है.
जिवामी आज एक ऐसी कंपनी बन चुकी है जो लाखोंकरोड़ों महिलाओं को बैस्ट क्वालिटी प्रौडक्ट उपलब्ध कराती है. अपने हौसले और मेहनत के दम पर रिचा ने वह कर दिखाया जो कभी किसी ने सोचा भी नहीं था.

मेहनत का नतीजा

रिचा आज जिस मुकाम पर हैं वह उन की मेहनत का ही नतीजा है. अगर आज वे मर्सिडीज में घूम रही हैं तो इस के पीछे उन की दिनरात की मेहनत है. इसी तरह शुगर कौस्मैटिक्स की कोफाउंडर और सीईओ विनीता सिंह भी हैं, जिन्होंने अपनी क्व1 करोड़ की कौरपोरेट जौब को छोड़ कर अपना
बिजनैस करने की ठानी. इसी का नतीजा है कि वे आज करोड़ों की कंपनी की मालकिन हैं.

विनीता का मंत्र है, ‘‘अगर आप कुछ वर्ल्ड क्लास करना चाहते हैं तो आप को लगातार अपने काम में योगदान देना होगा और नतीजों को ले कर धैर्य रखना होगा.’’ अगर बात करें उन के बिजनैस की तो विनीता ने 2015 में शुगर कौस्मैटिक्स की शुरुआत की. आज शुगर कौस्मैटिक्स के 130 से ज्यादा
शहरों में 2,500 से ज्यादा आउटलैट हैं. उन की कंपनी की वैल्युएशन क्व750 करोड़ है.

2019-20 में उन की कंपनी का रेवेन्यु क्व105 करोड़ था. विनीता की कंपनी की कमाई एक दिन में क्व2 करोड़ है. mअगर आज विनिता इतनी स्टैबलिश हैं तो इस का कारण उन की मेहनत और कभी न हार मानने वाला दृढ़ निश्चय है. इसी के बलबूते आज कामयाबी उन के कदम चूम रही है. उन की मेहनत का ही नतीजा है कि आज शुगर कौस्मैटिक्स एक ऐसा ब्रैंड बन गया है जो हर महिला की जबान पर चढ़ा हुआ है.

हार नहीं मानी

मगर एक वक्त ऐसा भी आया जब विनीता ने क्व10 हजार महीना की नौकरी भी की थी. लेकिन उन्होंने खुद का बिजनैस करने के सपने को नहीं छोड़ा, हार नहीं मानी और आखिर में सफलता को अपने कदमों में ला कर ही दम लिया.

आजकल ब्यूटी इंडस्ट्री और स्टौक मार्केट

मार्केट में एक नया नाम छाया हुआ है. यह नाम और कोई नहीं नायका है. नायका की फाउंडर एक महिला है जो अखबपति महिलाओं की श्रेणी में शामिल है. इन का नाम है फाल्गुनी नायर. फाल्गुनी नायर ने विरासत में मिली किसी कंपनी को आगे नहीं बढ़ाया है बल्कि अपनी खुद की कंपनी खड़ी की और उसे आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया. फाल्गुनी चाहती तो कोटक महिंद्रा इनवैस्टमैंट बैंक की प्रबंध निर्देशक के पद
पर बनी रहती. लेकिन उन्होंने कोटक को छोड़ने का फैसला किया.

यहां से फाल्गुनी नायर ने अपनी लाइफ का दूसरा चैप्टर शुरू किया. फाल्गुनी ने 2012 में नायका की शुरुआत की. नायका एक ब्यूटी और पर्सनल केयर से जुड़ी कंपनी है. उन के 35 स्टोर हैं. इतना ही नहीं उन के नायका फैशन में एपेरल, एसैसरीज, फैशन से जुड़े प्रोडक्ट्स भी हैं. इस के अलावा 4 हजार से ज्यादा ब्यूटी, पर्सनल केयर और फैशन बै्रंड्स शामिल हैं.

सफलता की कहानी

नायका में फाल्गुनी 16 सौ से ज्यादा लोगों की टीम को लीड करती हैं. वर्तमान में फाल्गुनी नायर की नैटवर्थ 6.5 बिलियन डौलर से ज्यादा हो गई है. इसी के चलते फाल्गुनी नायर इंडिया की सब से अमीर सैल्फ मेड महिला बन गई हैं. उन की कंपनी नायका स्टौक ऐक्सचेंज में ऐंट्री करने वाली इंडिया की पहली महिला नेतृत्व वाली कंपनी बन चुकी है.

फिल्म ‘12वीं फेल’ की कहानी आईपीएस मनोज कुमार शर्मा की जिंदगी पर बेस्ड है. फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक लड़का अपने सपनों के पीछे भागताभागता एक दिन अपनी मंजिल तक पहुंच ही जाता है. लेकिन उस का यह सफर आसान नहीं होता. अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए एक व्यक्ति के जीवन में क्या संघर्ष होता है यही इस फिल्म की कहानी है.

कहने का मतलब यह है कि अगर आप अपनी लाइफ में सफल होना चाहते हैं तो अपने आलस, अपने भाग्य को पीछे छोड़ कर अपनी मेहनत पर फोकस करें. अगर आप को लग्जरी लाइफ की चाह है तो आज ही से आप अपने कैरियर की प्लानिंग शुरू कर दें. याद रखें अगर आप के पास पैसा नहीं होगा तो आप अपनी जिंदगी में वह सब नहीं खरीद पाएंगे जो आप फिल्मी कलाकारों के पास देख कर सोचते हैं कि एक दिन आप के पास भी ये सभी चीजें होंगी.

आत्मनिर्भर बनें

वहीं अगर आप ने अपने स्कूली दिनों में ही अपने कैरियर की प्लानिंग नहीं की तो आप को पछताना पड़ेगा. आज ऐसा ही पछतावा विधि सिंह को है. आज वह एक हाउसमेकर है. हाउसमेकर होना कोई बुरा नहीं है लेकिन अकसर हाउसमेकर को अपने हस्बैंड से पैसों को ले कर बातें सुननी पड़ती हैं. उस का हस्बैंड आए दिन कहता है, ‘‘तुम कमा के नहीं लाती इसलिए ज्यादा मत बोला करो.’’

वहीं विधि की पड़ोसिन अनु बुटीक चलाती है. बुटीक से वह महीने में 30-35 हजार रुपए कमा लेती है. इस तरह वह भी घर कमाई करती है. उस का हस्बैंड मोहित भी पैसों को ले कर उसे ताने नहीं मारता. यही नहीं बुटीक की वजह से अनु में विधि से ज्यादा कौन्फिडैंस भी है.

अगर आप भी कौन्फिडैंस से भरी लग्जरी लाइफ जीना चाहते हैं तो छोटी उम्र से ही अपने कैरियर की प्लानिंग करें. अगर आप को भी गूची के बैग, जारा के टौप, लिवाइस, पैंटालून की जींस, ऐप्पल के मोबाइल फोन और बीएमडब्लू कार की चाह है तो अपने कैरियर पर काम करें. इस की शुरुआत अपने स्कूल के दिनों से ही करें. आप ऐसा कैरियर चुने जो ट्रैंड में हो और कैरियर टाइम पीरियड ज्यादा हो, साथ ही ऐक्स्ट्रा
एक्टिविटीज और ऐक्स्ट्रा कोर्स भी करें. ये आप के सीवी में प्लस पौइंट एड करते हैं.

गृहिणियों के लिए उत्तम रणनीति: कैसे करें गवर्नमेंट जॉब की प्रिपरेशन

यदि आप अपनी पसंद से गृहिणी नहीं हैं, और सरकारी क्षेत्र में काम करना चाहती हैं तो इस आर्टिकल में आप जान सकती हैं की अपने समय का सदुपयोग एग्जाम निकालने के लिए कैसे कर सकते हैं. यदि आपकी कम उम्र में शादी हो गई है और आपको लगता है की सरकारी नौकरी पाने का सपना अधूरा रह गया है तो यह सही नहीं है. आप चाहें तो घरेलू काम के साथ साथ थोड़ा वक्त निकाल कर पढ़ाई भी कर सकतें हैं.

यदि आप सरकारी परीक्षा के लिए घर पर ही, बिना किसी कोचिंग का सहयोग लिए अध्ययन करना चाहते हैं, तो आप नीचे दिए गए टॉप की सहायता से घर पर अध्ययन कर सकते हैं. गृहणी के लिए जरूरी है की सबसे पहले आप अपने दिन की योजना बनाएं. अगर आप घर पर रहेंगे तो आपके लिए पढ़ाई करना आसान हो जाएगा.

स्व-अध्ययन आपके लिए एक विकल्प हो सकता है. सुबह का समय पढ़ाई के लिए अच्छा रहेगा. जब आपके बच्चे स्कूल में हों और पति काम पर हों, तो आप उस समय का उपयोग पढ़ाई के लिए कर सकती हैं.

  • आपको एक शेड्यूल बनाने की ज़रूरत है जिससे आप सभी घरेलू काम कर सकें और आपको पढ़ाई के लिए भी पर्याप्त समय मिल सके. इसलिए एक प्रभावी अध्ययन योजना बनाएं. एक अध्ययन योजना में केवल अध्ययन ही नहीं बल्कि इसमें अपने दैनिक कार्य जैसे की खाना, सोना, घरेलू काम, बच्चों व पार्टनर के लिए वक्त आदि भी शामिल करें.
  •  फिर आप उन सभी विषयों की एक सूची बनाएं जिनसे आप परिचित हैं और दूसरी सूची उन विषयों की जिनसे आप परिचित नहीं हैं. तैयारी शुरू करते समय उन विषयों पर ध्यान केंद्रित करें जिनसे आप परिचित नहीं हैं. बाद में, उन विषयों का रिवीजन करें जिन्हें आप अच्छी तरह जानते हैं या ग्रेजुएशन के वक्त आपने उन टॉपिक्स पर पढ़ाई की हो.
  •  जिस भी परीक्षा की आप तैयारी कर रहे हैं, उसके परीक्षा पैटर्न और पाठ्यक्रम पर ध्यान जरूर दें. आप चाहें तो पिछले वर्ष के क्वेश्चन पेपर को देख के भी आइडिया ले सकती हैं. इससे आपको एग्जाम पैटर्न समझने में आसानी होगी. और यह आप बिना घर से निकले या किसी कोचिंग को ज्वाइन किए ही अपने मोबाइल की सहायता से कर सकतीं हैं.
  • तैयारी के दौरान याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बात ये है कि आप छोटे लेकिन अधिक बार होने वाले सत्र यथार्थवादी लक्ष्य निर्धारित करें. लगातार 5 से 6 घंटे खर्च करने के बजाय, अधिक उपलब्धि योग्य लक्ष्य बनाएं. आपके लिए पूरे दिन पढ़ाई कर पाना मुश्किल है लेकिन कोशिश करें कि आप दिन में दो बार पढ़ाई के लिए वक्त निकाल सकें.
  • परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए अध्ययन योजना का ठीक से पालन करें. योजना बनाना आसान है, लेकिन उस पर कायम रहना कठिन हो सकता है. अपनी नजरें हमेशा पुरस्कार पर रखें और अपनी तैयारी यात्रा के दौरान किसी भी चीज से आपका ध्यान भटकने न दें.
  • तैयारी लगभग पूरी होने लगे तो आप साथ ही मॉक परीक्षा का प्रयास करें.
    किसी भी परीक्षा की तैयारी का सबसे अच्छा तरीका मॉक परीक्षा देना है. नियमित रूप से मॉक परीक्षा देने से आपको अपने परीक्षा भय से छुटकारा पाने में मदद मिलेगी और आपको वास्तविक परीक्षा देने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास मिलेगा. आप जिस परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, उसके लिए हर दिन एक मॉक परीक्षा देने की आदत बनाएं.
  • अखबार पढ़ना अपने रूटीन में जरूर शामिल करें, क्योंकि किसी भी सरकारी नौकरी की तैयारी के लिए आपको देश विदेश में ही रही दैनिक गतिविधियों के बारे में जानकारी होना आवश्यक है. चाय के साथ न्यूजपेपर पर जरूर गौर करें. चाहें तो सीरियल की जगह भी टीवी पर न्यूज चैनल ही देखें. इससे आपको सहायता मिलेगी.
  • कॉन्फिडेंट रहें. जब आपके प्रिपरेशन के बारे में लोगों को पता चलेगा तो हो सकता है की आपको कई तरह की बातें सुननी पढ़ें जिससे आप डी-मोटिवेट हो जाएं लेकिन इन बातों को न तो दिल पर लें और न ही इनसे निराश हों. जब तक आपका पार्टनर और आपकी फैमिली आपको सपोर्ट कर रहे हैं, आपको दूसरों की बातों की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है. क्योंकि इससे आपकी ही प्रिपरेशन में विघ्न पढ़ सकता है. इसलिए अपने डिसीजन पर कॉन्फिडेंट रहें और तैयारी रुकने न दें.

ध्यान दें: करियर योजना बनाना अच्छी बात है, लेकिन अपने निजी पलों को न गंवाएं. इसलिए अपने निजी जीवन का आनंद लेने के लिए भी समय निकालें ताकि आपके पार्टनर और बच्चों को भी वक्त मिल सके.

इमीग्रेशन और हक

इंगलैंड  ने बाहरी देशों से आ कर काम करने के इच्छुक लोगों की गिनती घटाने के लिए उस वेतन सीमा को बढ़ा दिया है जिस पर इमीग्रेशन की इजाजत पहले दी जाती थी. पहले 26,000 पाउंड से ज्यादा वेतन की नौकरी मिलने पर ब्रिटेन में स्थायी रूप से रहने की इजाजत मिल जाती थी. अब यह इजाजत 38,000 पाउंड की नौकरी मिलने पर मिलेगी. इस से हर साल 3 लाख इमीग्रेंट्स कम हो जाएंगे.

यह अब पक्का हो गया है कि एक देश से दूसरे देश में जा कर रहने वाले असल में अपने साथ मूल देश की भाषा, रंग, जीवनशैली ही नहीं, धार्मिक व राजनीतिक कट्टरता भी साथ बांध कर ले जाते हैं और वहां की नागरिकता मिलने के बावजूद उन्हें फ्लश कर के नहीं बहाते. इंगलैंड के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक इस के सब से बड़े उदाहरण हैं जो हिंदू धर्म का पिटारा लिए घूमते हैं और मुख्यतया प्रोटैस्टैंट चर्च वाले देश के आचारव्यवहार को केवल पब्लिक में निभाते हैं.

मानव हमेशा से घुमक्कड़ रहा है. लोग देश, जमीन, जंगल, बदलते रहे हैं. लेकिन अमेरिका की तरह का मेल्ंिटग पौट, जिस में विभिन्न देशों के लोग एक सांचे में ढलते रहे, अब बंद हो गया है. अमेरिका और यूरोप ही नहीं, दूसरी जगह भी अपने मूल देश से आने वाले लोग कुछ न कुछ संबंध मूल देश से रखते हैं और यही वहां की नीतियों में रेस व धर्म के भेद पैदा करते हैं.

आव्रजन या इमीग्रेशन नहीं होना चाहिए. जब आने वाला अपना मूल देश छोड़े तो वहां के रीतिरिवाज, धर्म, सोच, भाषा, रहनसहन सब छोड़े. हर देश में एक ही रंग व भाषा वाले विभिन्न तरह के लोग होते हैं जो साथसाथ रह सकते हैं. इस विभिन्नता को तो सिरमाथे पर रखा जाए लेकिन नए देश में बराबरी का हक भी मांगा जाए, तो फिर यह गलत है.

मजेदार बात यह है कि जिन देशों से इमीग्रेशन होता है, वहां विदेशियों को बिलकुल जगह नहीं मिलती. ऋषि सुनक इंगलैंड के प्रधानमंत्री हैं, कमला हैरिस अमेरिका की उपराष्ट्रपति हैं जबकि भारत में इटैलियन बार वाला, जर्सी काऊ जैसे शब्द सत्तारूढ़ लोगों के मुंह से सुने जा सकते हैं. यही भारतीय तब हायहाय करते हैं जब इंगलैंड या अमेरिका भारतीयों (भारत से आने वालों) पर अंकुश लगाते हैं.

हमारा यह दोगलापन तो ज्यादा ही मुखर है. भारत पर अंगरेजों ने 200 साल राज किया पर यहां कोई अंगरेजी कालोनी नहीं है. वहीं, इंगलैंड में कितने ही साउथ हाल हैं जहां पूरा रंगढंग भारतीय लगता है. अमेरिका के शहर में चाइना टाउन दिख जाएगा. इंगलैंड को ऐसे माहौल में बाहरी लोगों को रोकना ही चाहिए.

सोशल मीडिया और डीपफेक

सोशल मीडिया पर डीपफेक्स बना कर अपलोड करने वाले प्लेटफौर्मों के बारे में अब सरकार कानून बना रही है. आर्टिफिशियल इंटैजिलैंस टैक्निक से अब किसी का धड़ व किसी का चेहरा जोड़ कर फोटो ही नहीं, फिल्म भी एडिट कर बनाई जा सकती है. देखने वालों को यह सच लगेगी. कानून के अनुसार, संबंधित प्लेटफौर्म को शिकायत मिलने के 36 घंटों के भीतर उसे हटाना होगा और सब्सक्राइबर को कंटैंट वैरिफिकेशन टूल्स को डाउनलोड करने की सुविधा दी जाएगी.

आर्टिफिशियल इंटैजिलैंस टैक्निक जहां बहुत से काम आसान करने वाली है वहीं कंटैंट क्रिएशन से यूजर्स और व्यूअर्स के लिए यह परेशानियां खड़ी करने वाली भी है. डीपफेक्स उन्हीं में से एक है जिस में किसी पौर्न आर्टिस्ट के चेहरे को हटा कर किसी और का चेहरा लगाया जा सकता है जिसे एक्सपर्ट भी नहीं पकड़ सकते.

यह टैक्निक रिवेंज (किसी से किसी तरह का बदला लेने) के लिए खूब इस्तेमाल की जाएगी तो वहीं यह यूट्यूब और रील्स की फैक्चुएलिटी पर सवालिया निशान खड़े कर देगी. मुफ्त के यूजर्स तो इसे सम?ा ही नहीं पाएंगे, न ही फैक्ट चैक कर पाएंगे. जैसे व्हाट्सऐप मैसेज, जिन में जानकारी का दावा किया जाता था, अब भरोसे के लायक नहीं रह गए और फौरवर्ड करने वाले कतरा रहे हैं वैसे ही अब यूट्यूब, इंस्टाग्राम, पिंटरेस्ट, फेसबुक रील्स की असलियत पर निशाने लगाए जाने शुरू हो जाएंगे. लोगों को पता ही नहीं रहेगा कि वे जो देख रहे हैं क्या वह सही है, फैक्ट है या बनावटी है.

सदियों से लोग किस्सों को इतिहास सम?ाते रहे हैं. आज भी रामायण और महाभारत को इतिहास में घुसाने की कोशिश वही सरकार कर रही है जो फैक्ट चैक टूल्स से डीपफेक्स को जंचवाना चाहती है. रामायण और महाभारत काल का अभी तक कहीं कोई आर्कियोलौजिकल एविडैंस नहीं मिला है, कहीं कोई महल, मकान, रथ, धनुष, लाशों का अंबार नहीं दिखा है. जो भी जहां मिलता है वह कार्बनडेटिंग टैक्निक से पता चलता है कि वह 400-500 साल पुराना भी नहीं है.

जो सरकार धर्म के डीपफेक्स को सच मानती है वह आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस के बारे में केवल सरकार को नुकसान पहुंचाने वाले डाउट्स/फैक्ट्स को चैक करेगी, यह पक्का है. मोदी, शाह और भाजपा सरकार अपने देवीदेवताओं राम, कृष्ण आदि के बारे में कुछ भी किया जाएगा तो उस पर ऐक्शन लेंगे, वहीं अगर दीपिका पादुकोण के बारे में कोई डीपफेक तैयार होगा तो उसे छेड़ेगी भी नहीं.

मौजूदा भगवा सरकार के शासन के दौरान ही व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी ने हिंदू व मुसलिम भेदभाव को जम कर परोसा, इतिहास को तोड़मरोड़ कर पेश किया. हैरानी यह है कि ऐसा करने वाले खुलेआम घूम रहे हैं जबकि जिन्होंने सरकार की किसी भी नीति के खिलाफ कुछ किया उन्हें 24 घंटे के भीतर पकड़ लिया गया. डीपफेक कानून का भी सिर्फ मिसयूज किया जाएगा, इस की सौ फीसदी गारंटी है.

थप्पड़ है स्त्री के वजूद का अपमान

मेरठ के कंकरखेड़ा क्षेत्र में इस 26 दिसम्बर को बीटेक की एक छात्रा को सहपाठी लड़के द्वारा थप्पड़ मारने का मामला सामने आया. दरअसल छात्रा ने साथ में पढ़ने वाले इस छात्र की दोस्ती का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. जिस के बाद उस छात्र ने कक्षा में अन्य छात्रों के सामने ही बीटेक की सीनियर छात्रा को कई थप्पड़ जड़े. वह इतने पर ही शांत नहीं हुआ बल्कि गुस्से में कुर्सी उठाकर लड़की को मारने की कोशिश की. लड़की ने भाग कर अपनी जान बचाई. बाद में लड़की ने यह घटना घर पर परिजनों को बताई और थाने में रिपोर्ट लिखवाने पहुंची. छात्रा ने आरोप लगाया कि आरोपी कई दिन से उस पर दोस्ती करने का दबाव बना रहा था. दोस्ती स्वीकार न किए जाने पर वह हिंसा पर उतर आया.

इस बार के बिग बॉस में  ईशा मालवीय और अभिषेक कुमार ऐसे कंटेस्टेंट हैं जो अपने पास्ट रिलेशन को ले कर चर्चा में रहते हैं. अभिषेक ईशा के एक्स बॉयफ्रेंड हैं. एक साल पहले उन का रिश्ता ख़त्म हो चुका है. उन का रिश्ता टूटने की वजह भी कहीं न कहीं अभिषेक का थप्पड़ और उस की तरफ अग्रेसिव व्यवहार ही था. ईशा ने अंकिता और खानजादी से बात करते वक्त बताया था कि उस ने एक बार अभिषेक को अपने दोस्तों से मिलवाया. ईशा के ज्यादा दोस्त होने की वजह से अभिषेक को गुस्सा आ गया था और उस ने ईशा को सबके सामने थप्पड़ मार दिया था. थप्पड़ की वजह से ईशा के आंख के नीचे  निशान पड़ गए थे. इसी के बाद उन का रिश्ता टूटता चला गया.

कुछ समय पहले डायरेक्टर अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘थप्पड़’ कुछ ऐसे ही विषय को ले कर आई थी. इस में बात शुरू होती है सिर्फ एक थप्पड़ से लेकिन ये पूरी फिल्म महज थप्पड़ के बारे में नहीं थी बल्कि उस के इर्द-गिर्द तैयार हुए पूरे ताने बाने और हर उस सवाल को कुरेद के निकालने की कोशिश करती दिखी जिसने इस ‘सिर्फ एक थप्पड़’ को पुरुषों के हक का दर्जा दे दिया.

इस में अमृता की भूमिका में तापसी पन्नू अपने पति विक्रम के साथ एक परफेक्ट शादीशुदा जिंदगी बिताती दिखती है. अमृता सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक बस अपने पति और परिवार के इर्द गिर्द घिरी जिंदगी में बिजी है और इस ‘परफेक्ट’ सी जिंदगी में बहुत खुश है. लेकिन इसी बीच एक दिन उन के घर हुई पार्टी में विक्रम अमृता को एक जोरदार थप्पड़ मार देता है और सब कुछ बदल जाता है. किसी ने सोचा न था कि एक थप्पड़ रिश्ते की नींव हिला देगी. लेकिन अमृता ‘सिर्फ एक थप्पड़’ के लिए तैयार नहीं थी. एक औरत की जंग शुरू होती है एक ऐसे पति के साथ जिसका कहना है कि मियां बीवी में ये सब तो हो जाता है. उस के आसपास के लोगों के लिए ये बात पचा पाना बहुत मुश्किल था कि सिर्फ एक थप्पड़ की वजह से कोई स्त्री अपने ‘सुखी संसार’ को छोड़ने का फैसला कैसे ले सकती है जबकि पुरुष को तो समाज ने स्त्री को मारने पीटने का हक़ दिया ही हुआ है.

सवाल स्त्री के मान का

सच यही है कि एक थप्पड़ स्त्री के मान सम्मान और अस्तित्व पर सवाल खड़ा करता है. एक थप्पड़ यह दर्शाता है कि आज भी पुरुषों ने औरत को अपनी प्रॉपर्टी समझ रखी है. जबरन उस पर अपना हक़ जमाना चाहते हैं. अगर स्त्री ने हक़ नहीं दिया तो थप्पड़ की गूँज में उसे अहसास दिलाना चाहते हैं कि उस की औकात क्या है. समाज में उसका दर्जा क्या है.

 महिलाओं के खिलाफ हिंसा

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक महिलाओं से हिंसा पूरी दुनिया का भयंकर मर्ज़ है.  दुनिया की 70 फीसदी महिलाओं ने अपने करीबी साथियों के हाथों हिंसक बर्ताव झेला है. फिर चाहे वो शारीरिक हो या यौन हिंसा. दुनियाभर में हर रोज़ 137 महिलाएं अपने क़रीबी साथी या परिवार के सदस्य के हाथों मारी जाती हैं.

हमारे समाज में अक्सर लड़कियां और लड़के दोनों ही पुराने रिवाजों से बंधे हुए होते हैं. लड़कियों को ये सिखाया जाता है कि घर के काम करना, पति की सेवा करना और उस की हर बात मानना उन का कर्तव्य है. उन्हें सिखाया जाता है कि पुरुष महिलाओं का मौखिक , शारीरिक या यौन शोषण करने के लिए स्वतंत्र हैं. इस का उन्हें कोई नतीजा भी नहीं भुगतना होगा.

बचपन से लड़कियों का 40 फीसदी समय ऐसे कामों में जाता है जिसके पैसे भी नहीं मिलते. इस का ये नतीजा होता है कि उन्हें खेलने, आराम करने या पढ़ने का समय लड़कों के मुक़ाबले कम ही मिल पाता है.

 प्यू रिसर्च सेंटर की स्टडी

हाल ही में अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर ने एक दिलचस्प स्टडी की थी. इस में भारत में महिलाओं के बारे में पुरुषों की सोच का अध्ययन किया गया. स्टडी में पाया गया कि ज्यादातर भारतीय इस बात से काफी हद तक सहमत है कि पत्नी को हमेशा पति का कहना मानना चाहिए.

ज्यादातर भारतीय इस बात से पूरी तरह या काफी हद तक सहमत हैं कि पत्नी को हमेशा ही अपने पति का कहना मानना चाहिए. एक अमेरिकी थिंक टैंक के एक हालिया अध्ययन में यह कहा गया है. प्यू रिसर्च सेंटर की यह नई रिपोर्ट हाल ही में जारी की गई. रिपोर्ट 29,999 भारतीय वयस्कों के बीच 2019 के अंत से लेकर 2020 की शुरुआत तक किए गए अध्ययन पर आधारित है.

इस के अनुसार करीब 80 प्रतिशत इस विचार से सहमत हैं कि जब कुछ ही नौकरियां है तब पुरुषों को महिलाओं की तुलना में नौकरी करने का अधिक अधिकार है. रिपोर्ट में कहा गया है कि करीब 10 में नौ भारतीय (87 प्रतिशत) पूरी तरह या काफी हद तक इस बात से सहमत हैं कि पत्नी को हमेशा ही अपने पति का कहना मानना चाहिए. यही नहीं  इस रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर भारतीय महिलाओं ने इस विचार से सहमति जताई कि हर परिस्थिति में पत्नी को पति का कहना मानना चाहिए.

 महिलाओं पर केंद्रित होती हैं ज्यादातर गालियां

नारी शक्ति की बात तो होती है लेकिन अभी भी महिलाएं दोयम दर्जे पर हैं. पढ़ी लिखी महिलाएं भी प्रताड़ित हो रही हैं. अगर आपको किसी को अपमानित करना है तो आप उसके घर की महिला को गाली दे देते हैं. उसका चरम अपमान हो जाता है. और वो मर्दों के अहंकार को भी संतुष्ठ करता है. किसी पुरुष से बदला लेना होगा तो बोलेंगे स्त्री को उठा लेंगे, महिला अपमानित करने का माध्यम बन जाती है. गांव में तो बहुत होता था पहले अमूमन ये देखा गया था कि ये गालियां समाज के निचले पायदान पर रहने वाले लोग ही देते थे लेकिन अब आम पढ़े लिखे लोग भी देने लगे हैं.

जब भी कोई बहस झगड़े में तब्दील होने लगती है तो गालियों की बौछार भी शुरू हो जाती है. ये बहस या झगड़ा दो मर्दों के बीच भी हो रहा हो तब भी गालियां महिलाओं पर आधारित होती हैं. कुल मिला कर गालियों के केन्द्र में महिलाएं होती हैं. दरअसल समय के साथ स्त्री पुरुषों की संपत्ति होती चली गई और उस संपत्ति को गाली दी जाने लगी. ये गाली दे कर मर्द अपने अहंकार की तुष्टि करते हैं और दूसरे को नीचा दिखाते हैं. महिलाएं परिवार की इज़्ज़त के प्रतीक के तौर पर देखी जाती हैं. इज़्ज़त को बचाना है तो उसे देहड़ी के अंदर रखिए. महिलाएं समाज में कमज़ोर मानी जाती हैं. आप किसी को नीचा दिखाना चाहते हैं, तंग करना चाहते हैं तो उन के घर की महिलाओं- मां, बहन या बेटी को गालियां देना शुरू कर दीजिए.

गाली सिर्फ़ गाली देना ही नहीं है वो मानसिकता का प्रतीक भी है जो विभत्स गाली देते हैं और उसे व्यावहारिकता में लाते हैं इसलिए निर्भया जैसे मामले दिखाई देते हैं.

 धर्म है इस सोच का जिम्मेदार

जितने भी धर्म हैं, हिंदू, इस्लाम, कैथोलिक ईसाई, जैन, बौद्ध, सूफी, यहूदी, सिक्ख आदि सभी के संस्थापक पुरुष हैं स्त्री नहीं. न ही स्त्री किसी धर्म की संचालिका है. न वह पूजा-पाठ, कथा, हवन करानेवाली पंडित है, न मौलवी है, न पादरी है. वह केवल पुरुष की आज्ञा का पालन करने के लिए इस संसार में जन्मी है. धर्म का मूल आधार ही पुरुष सत्ता है. स्त्री का दोयम दर्जा सिर्फ हिंदू धर्म में ही नहीं, हर धर्मग्रंथ में वह चाहे कुरान हो, बाइबल हो या कोई और धर्मग्रंथ हो स्त्रियों को हमेशा पुरुष से कमतर माना गया. सिमोन द बोउवार ने कहा था- ‘जिस धर्म का अन्वेषण पुरुष ने किया वह आधिपत्य की उसकी इच्छा का ही अनुचिंतन है.’

धर्म की आड़ में कहानियों के माध्यम से स्त्री जीवन को दासी और अनुगामिनी के रोल मॉडल दिखा कर उसी सांचे में ढालने का प्रयास किया जाता है. सीता, सावित्री, माधवी, शकुंतला, दमयंती, द्रौपदी, राधा, उर्मिला जैसी कई नायिकाओं के ‘रोल मॉडल’ को सामने रखकर सदियों से स्त्री का अनावश्यक शोषण चलता आ रहा है. पुरुष सत्ता स्वीकृत भूमिका से अलग किसी स्थिति में स्त्री को देखना पसंद नहीं करती. इसलिए धार्मिक आचार संहिता बनाकर वह स्त्री की स्वतंत्रता और यौन शुचिता पर नियंत्रण रखती है.

दुनिया का कोई देश या जाति हो उसका धर्म से संबंध रहा है. सभी धर्मों में स्त्री की छवि एक ऐसी कैदी की तरह रही है जिसे पुरुष के इशारे पर जीने के लिए बाध्य होना पड़ता है. वह पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियों से जकड़ी होती है.

धर्मों में स्त्री सामान्यतः उपयोग और उपभोग की वस्तु है. उसकी ऐसी छवि गढ़ी गई है जिससे स्त्री ने भी स्वयं को एक वस्तु मान लिया है. धर्म ने स्त्री को हमेशा पुरुष की दासी के रूप में चित्रित किया. रामचरितमानस में सीता को अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है और महाभारत में द्रौपदी को चीरहरण जैसे सामाजिक कलंक से गुजरना पड़ता है.

स्त्री अधिकार की बात हमारे धर्मग्रंथों में कभी की ही नहीं गई. वह पुरुष के शाप से शिला बन जाती है, पुरुष के ही स्पर्श से फिर से स्त्री बन जाती है. पुरुष गर्भवती पत्नी को वनवास दे देता है, पुरुष अपनी इच्छा से उसे वस्तु की तरह दांव पर लगा देता है. सभी धर्मग्रंथों में उसे नरक की खान, ताड़न की अधिकारी और क्या-क्या नहीं कहा गया.

हिंदू धर्म की कोई भी किताब आप उठा कर देख लें उस में स्त्रियों के लिए कर्तव्य की लंबी सूची होगी लेकिन अधिकारों की नहीं. गीता प्रेस की एक किताब ‘स्त्रियों के लिए कर्तव्य शिक्षा’ है. इसे पढ़ कर देखा जा सकता है कि स्त्रियों को हम किस काल में धकेले रखना चाहते हैं.

महिला को चोट पहुंचाने के पुरुष अनेक बहाने दे सकता है जैसे कि वह अपना आपा खो बैठा या फिर वह महिला इसी लायक है .परंतु वास्तविकता यह है कि वह हिंसा का रास्ता केवल इसलिए अपनाता है क्योंकि वह केवल इसी के माध्यम से वह सब प्राप्त कर सकता है जिन्हें वह एक मर्द होने के कारण अपना हक समझता है.

आज की बहुत सी महिलाएं शिक्षित होकर भी पुरानी धार्मिक रूढ़ियों की अनुगामिनी बनी रहती हैं. देश की स्त्रियां अंधविश्वासों की तरफ फिर लौट रही हैं, महंतों-बाबाओं की तरफ दौड़ रही हैं और प्रवचनों में भीड़ की शोभा बढ़ा रही हैं. उन्हें देखकर लगता है कि वे शायद इक्कीसवीं शताब्दी में नहीं बल्कि बारहवीं या तेरहवीं शताब्दी में हैं.

इन स्थितियों से महिलाएं तभी उबर सकती हैं जब वे पुरुष सत्ता और धर्मगुरुओं के षड्यंत्र को जान सकें और अपनी शक्ति की पहचान कर सकें. अपने मान की रक्षा के लिए खुद खड़ी हों न कि दूसरों की राह देखें.

 

पति अब परमेश्वर नहीं

अब यह समझ नहीं आ रहा है कि पूना की रेखा खन्ना की बुराई जीभर के की जाए, अब उसे टै्रंड सैंटर कहा जाए. दरअसल, उस ने नवंबर, 2023 के अंतिम सप्ताह में पुणे में अपने एक बिल्डर पति निखिल खन्ना से बहस के दौरान नाक पर मुक्का मारा जिस से उस के नाक की हड्डियां चटक गईं और वह गिर गया तथा बहुत खून बहने से उस की मौत हो गई.

बुराई इसलिए कि वह पति की हत्यारिन है, ट्रैंड सैंटर इसलिए कि उस ने सभी पतियों को चेतावनी दी है कि हिंसा दोनों तरफ से हो सकती है और पिटने वाली औरतें अब रिश्वत न लेने वाले गुप्त सरकारी कर्मचारी जीवों की तरह कम होने लगी हैं. अभी यह पता नहीं कि नाक पर मुक्का मारा गया था या कोई और चीज मारी गई थी.

अगर मुक्का मारा गया तो यह पतियों को ही नहीं सभी पुरुषों, लड़कों के लिए संदेश है कि औरतों को कमजोर कतई न समझें. औरतों को ताड़न का अधिकारी कहने वाले तुलसीदास के दिन लदने लगे हैं. अब न शूद्र को पीटा जा सकता है, न पशु को. ढोल ही बचा जिसे तुलसीदास प्रेमी बजाबजा कर दानदक्षिणा की महिमा गा सकते हैं जिस से रामचरितमानस भरी है.

रामचरितमानस वाली नारी अब अपनेआप में वैसे ही कम हो गई है. वह न दान की वस्तु है, न भोग की, न हिंसा की शिकार. अकेले में तो हर आदमी भी पिट लेता है पर उसे कमजोर नहीं सम?ा जाता. अब औरतों के समूह आसानी से जमा करे जा सकते हैं जो लड़कियों में हिंसा करने वाले लड़कों की छुट््टी कर सकते हैं.

राजस्थान का गुलाबी गैंग इस बारे में प्रसिद्ध हो चुका है और रेणुका खन्ना ने एक नया ट्रैंड स्थापित कर दिया है. 2017 में निखिल खन्ना से विवाहित रेणुका की नाराजगी यह बताई जाती है कि वह उसे उस के बर्थडे पर दुबई नहीं ले गया, फिर उस ने विवाह वर्षगांठ पर सही उपहार नहीं दिया और ऊपर से मर्दानगी दिखाते हुए उस की भतीजी की शादी के लिए दिल्ली जाने का टिकट नहीं बनवाया.

अब पतियों को उसी तरह होशियार रहना होगा जैसे सदियों से पत्नियां रहती आई हैं. धर्म का दिखावा औरतों पर से उतर रहा है और वे पति को परमेश्वर नहीं, साथी, बराबर का साथी मानती हैं. रेणुका के साथ कानून कुछ भी करे पर यह पक्का है कि बहुत से पति अब पत्नी पर हाथ उठाने से पहले 2 बार सोचेंगे.

इस ज्ञान का क्या फायदा

आप को कुछ भी जानकारी चाहिए गूगल करें और सारी जानकारी आप की स्क्रीन पर होगी, बिना कुछ अतिरिक्त खर्च किए. अतिरिक्त का मतलब है कि आप फोन, चार्जिंग और डेटा कनैक्शन पर अच्छाखासा पैसा खर्च कर चुके हैं पर जो जानकारी ढूंढ़ रहे हैं वह बिना अतिरिक्त खर्च के मिल जाएगी.

गूगल आप को यों ही मुफ्त में जानकारी नहीं देता. आप के खर्च के बदले वह धड़ाधड़ आप को उस से संबंधित विज्ञापन दिखाना शुरू कर देता है. आप ने ‘धौलावीरा’, गुजरात में मोहनजोदाड़ो, हड़प्पा संबंधित एक जगह के बारे में खर्च किया नहीं कि आप को गुजरात के होटलों, गुजरात के कपड़ों, गुजरात सरकार के महान कामों, गुजरात के रेस्तरांओं या अस्पतालों के विज्ञापन दिखने शुरू हो जाएंगे.

गूगल ने जो जानकारी दी वह उपलब्ध समाचारपत्रों, बैवसाइटों, किताबों से जुटाई होगी. अब तक गूगल इन से कोई पैसा शेयर नहीं करता था. अब गूगल पर दबाव पड़ रहा है कि वह जहां की जानकारी दे रहा है वहां के स्रोत को पैसे दे.

सरकार के दबाव में गूगल कनाडा में क्व612 करोड़ मीडिया फर्मों को उन की जानकारी के बदले देगा. यह पैसा कैसे बंटेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है पर यह अच्छी शुरुआत है.

ज्ञान की खोज में जो नुकसान गूगल ने दुनिया का किया है वह अभूतपूर्व है. उस ने ज्ञानियों और ज्ञान जुटाने वालों को भिखारी बना डाला और उन के नौलेज, विज्ञान और ऐनालिसिस की जानकारी का इस्तेमाल कर खुद अरबोंखरबों की कंपनी बन गई. उस ने जानकारी और ज्ञान जमा करने वाले के नामों को गूगल के हाथी पांवों के नीचे कुचल दिया.

दुनियाभर की सरकारों ने इसे होने दिया क्योंकि आज अधिकांश देशों की जनता की चुनी हुई सरकारें भी ?ाठ, छल, फरेब और बहकावे पर टिकी हैं. गूगल ने सत्ता में बैठी सरकारों के पक्ष में खूब जानकारी उस क्षेत्र में प्रचारित की जहां से सर्च की जा रही है. यदि आप भारत से सर्च कर रहे हैं तो आप को खालिस्तानियों या दलितों की विश्वभर में उठ रही मांगों पर बहुत कम मिलेगा. गूगल आप को ऐसी साइटों पर ही ले जाएगा जहां सरकार की अनुमति मिली है, उस ज्ञान की तरफ जिस में क्या फायदा सरकार, धर्म या किसी तरह के उद्योगों का हो.

गूगल आज भ्रमित जानकारी देने वाला स्रोत बन गया है. भारत की न्यूज मीडिया गोदी मीडिया इसीलिए गोदी मीडिया कहा जाता है क्योंकि यह जो सही बताता है, खास मकसद से बताता है: सरकार की प्रशंसा करने के लिए. जब गूगल को पैसे देने होंगे तो वह उस जानकारी को देगा जिसे लोग वास्तव में चाहते हैं. वह विज्ञापन की आय शेयर करेगा. लोगों को सही व पूरी जानकारी मिल सकती है, स्पौंसर्ड ही नहीं. जानकारी जमा करने वालों को अपनी मेहनत का सही पैसा मिलना शुरू हो जाएगा.

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