Lip Care Tips : क्या नियमित रूप से आप भी होठों पर अप्लाई करती हैं लिपस्टिक ?

Writer- Monika Aggarwal

 Lip Care Tips: चाहे कोई शादीशुदा औरत हो या फिर लड़की एक मेकअप का प्रोडक्ट ऐसा होता है जो हर कोई लगाना पसंद करता है और वह भी रोजाना. वह प्रोडक्ट है लिपस्टिक. ऐसा कहा जाता है कि मेकअप चाहे कितना भी ब्रांडेड क्यों न हो और कितनी ही अच्छी उसकी क्वालिटी क्यों न हो लेकिन अगर आप उसका प्रयोग रोजाना करते हैं या ज्यादा मात्रा में करते हैं तो वह आपकी स्किन के लिए नुकसानदायक हो सकता है. इसलिए आपको लिपस्टिक जैसे उत्पादों से भी थोड़ा बच कर रहना होगा. लेकिन यह कथन हर एक लिपस्टिक पर सूट नहीं करता है. आइए जानते हैं लिपस्टिक का प्रयोग करना आपके होठों के लिए सही होता है या फिर नहीं.

लिपस्टिक लगाना आपके होठों को नुकसान पहुंचा सकता है लेकिन यह हर एक व्यक्ति के हिसाब से अलग रिएक्शन हो सकता है. कुछ महिलाओं के लिए लिपस्टिक का प्रयोग करना बिलकुल सुरक्षित है लेकिन अगर कुछ महिलाओं को पहले से ही पिग्मेंटेशन या ड्राई स्किन जैसी समस्या है तो उन्हें लगातार लिपस्टिक का प्रयोग करने से बचना चाहिए. आइए जानते हैं लिपस्टिक का प्रयोग करने से होठों को क्या क्या नुकसान पहुंच सकता है.

 1.ड्राईनेस और होंठ फटना 

लिस्पटिक का प्रयोग करने से होंठ फट सकते हैं और होठों की स्किन काफी ड्राई भी हो सकती है. अगर आप अच्छी क्वालिटी की लिपस्टिक का प्रयोग करती हैं तो इसमें मौइश्चराइजिंग इंग्रेडिएंट्स जैसे औयल, बटर आदि मौजूद होते हैं तो उनसे यह रिस्क कम हो सकता है. इस रिस्क से आप नियमित रूप से एक्सफोलिएट करके और मौइश्चराइज करते रहने से होंठ फटने का रिस्क कम कर सकती हैं.

2. एलर्जिक रिएक्शन 

अधिकतर महिलाओं को यह खतरा रहता है कि लिपस्टिक का प्रयोग करने से उन्हें एलर्जिक रिएक्शन हो जायेगा लेकिन इसकी संभावना बहुत ही कम होती है. केवल कम ही बार ऐसा होता है की किसी लिपस्टिक में एलर्जन इंग्रीडिएंट मौजूद हो.

 3. पिग्मेंटेशन और स्किन डार्क होना 

बहुत सी महिलाओं को लगता है कि लिपस्टिक का नियमित प्रयोग करने से उनके होठों पर पिग्मेंटेशन हो सकती है और उनके होठ काले हो सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि पिग्मेंटेशन आपके जेनेटिक गुणों और सूर्य के संपर्क में रहने के कारण ही हो सकती है. अगर आप सूर्य से अपना बचाव करती हैं और नियमित रूप से एक्सफोलिएशन करती हैं तो इसका रिस्क कम हो सकता है.

4.लिपस्टिक का प्रयोग करने के बाद इन टिप्स का पालन करें

1. हाइड्रेशन 

आपको ड्राईनेस से बचने के लिए अपने होंठों को हाइड्रेशन देना होगा. हाइड्रेशन देने के दो तरीके हैं. एक तो आपको शरीर में पानी की पूर्ति करनी होगी जो खूब सारी लिक्विड चीजों को पी कर हो सकती है और दूसरा आप लिप बाम का प्रयोग कर सकती हैं.

 2. एक्सफोलिएशन करें 

किसी सौफ्ट टूथ ब्रश का प्रयोग करके और जेंटल एक्सफोलिएशन के माध्यम से आप होठों की डेड स्किन सेल्स निकाल सकती हैं और अपने होंठों को नर्म बना सकती हैं.

 3. क्वालिटी प्रोडक्ट्स का प्रयोग करें 

आपको सस्ते के चक्कर में अपनी स्किन से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए इसलिए आपको हमेशा क्वालिटी वाली अच्छी चीजों का ही प्रयोग करना चाहिए.

तो यह थी कुछ टिप्स जिनका प्रयोग करके आप लिपस्टिक लगाने के बाद भी अपने होंठों को डैमेज होने से बचा सकती हैं. इसके अलावा आपके होंठों को लिस्प्टिक का प्रयोग करने से कम ही नुकसान पहुंच सकता है.

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सामग्री

1/2 कप मूंगफली,

1/2 कप मखाना,

1 छोटा चममच धनिया साबूत,

1/4 छोटा चम्मच हींग,

1/4 छोटा चम्मच कश्मीरी मिर्च पाउडर,

1 छोटा चम्मच काजू बादाम कटे,

कुकिंग मीडियम तलने के लिए,

250 ग्राम मैदा, नमक स्वादानुसार.

विधि

1 बड़ा चम्मच कुकिंग मीडियम तेल में मूंगफली और मखाने को सुगंध आने तक भूनें. ठंडा होने पर मूंगफली और मखाने को दरदरा पीस लें और धनिया, जीरा, हींग, कश्मीरी लालमिर्च पाउडर व नमक डाल कर अच्छी तरह मिला लें. अंत में काजू बादाम व 2-3 बूंदें प्रीत लाइट कुकिंग मीडियम डाल कर फिर से मिलाएं. मैदे में नमक व मोयन डाल कर मिक्स करें. अब पानी डाल कर आटा गूंध लें और 10 मिनट तक सैट होने दें. मैदे के छोटेछोटे पेड़े बना कर स्टफिंग भरें व कचौडि़यां तैयार करें. तैयार कचौडि़यों को धीमी आंच पर करारा होने तक तलें. चाय के साथ सर्व करें या एअरटाइट कंटेनर में स्टोर कर के रखें.

बनारसी साड़ी : मां उस साड़ी को ताउम्र क्यों नहीं पहन पाई?

आज सुबह सुबह ही प्रशांत भैया का फोन आया. ‘‘छुटकी,’’ उन्होंने आंसुओं से भीगे स्वर में कहा, ‘‘राधा नहीं रही. अभी कुछ देर पहले वह हमें छोड़ गई.’’

मेरा जी धक से रह गया. वैसे मैं जानती थी कि कभी न कभी यह दुखद समाचार भैया मुझे देने वाले हैं. जब से उन्होंने बताया था कि भाभी को फेफड़ों का कैंसर हुआ है, मेरे मन में डर बैठ गया था. मैं मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि भाभी को और थोड़े दिनों की मोहलत मिल जाए पर ऐसा न हुआ. भला 40 साल की उम्र भी कोई उम्र होती है, मैं ने आह भर कर सोचा. भाभी ने अभी दुनिया में देखा ही क्या था. उन के नन्हेनन्हे बच्चों की बात सोच कर कलेजा मुंह को आने लगा. कंठ में रुलाई उमड़ने लगी.

मैं ने भारी मन से अपना सामान पैक किया. अलमारी के कपड़े निकालते समय मेरी नजर सफेद मलमल में लिपटी बनारसी साड़ी पर जा टिकी. उसे देखते ही मुझे बीते दिन याद आ गए.

कितने चाव से भाभी ने यह साड़ी खरीदी थी. भैया को दफ्तर के काम से बनारस जाना था. ‘‘चाहो तो तुम भी चलो,’’ उन्होंने भाभी से कहा था, ‘‘पटना से बनारस ज्यादा दूर नहीं है और फिर 2 ही दिन की बात है. बच्चों को मां देख लेंगी.’’

‘‘भैया मैं भी चलूंगी,’’ मैं ने मचल कर कहा था.

‘‘ठीक है तू भी चल,’’ उन्होंने हंस कर कहा था.

हम तीनों खूब घूमफिरे. फिर हम एक बनारसी साड़ी की दुकान में घुसे.

‘‘बनारस आओ और बनारसी साड़ी न खरीदो, यह हो ही नहीं सकता,’’ भैया बोले.

भाभी ने काफी साडि़यां देख डालीं. फिर एक गुलाबी रंग की साड़ी पर उन की नजर गई, तो उन की आंखें चमक उठीं, लेकिन कीमत देख कर उन्होंने साड़ी परे सरका दी.

‘‘क्यों क्या हुआ?’’ भैया ने पूछा, ‘‘यह साड़ी तुम्हें पसंद है तो ले लो न.’’

‘‘नहीं, कोई हलके दाम वाली ले लेते हैं. यह बहुत महंगी है.’’

‘‘तुम्हें दाम के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं,’’ कह कर उन्होंने फौरन वह साड़ी बंधवाई और हम दुकान से बाहर निकले.

‘‘शशि के लिए भी कुछ ले लेते हैं,’’ भाभी बोलीं.

‘‘शशि तो अभी साड़ी पहनती नहीं. जब पहनने लगेगी तो ले लेंगे. अभी इस के लिए एक सलवारकमीज का कपड़ा ले लो.’’

मेरा बहुत मन था कि भैया मेरे लिए भी एक साड़ी खरीद देते. मेरी आंखों के सामने रंगबिरंगी साडि़यों का समां बंधा था. जैसे ही हम घर लौटे मैं ने मां से शिकायत जड़ दी. मां को बताना बारूद के पलीते में आग लगाने जैसा था.

मां एकदम भड़क उठीं, ‘‘अरे इस प्रशांत के लिए मैं क्या कहूं,’’ उन्होंने कड़क कर कहा, ‘‘बीवी के लिए 8 हजार रुपए खर्च कर दिए. अरे साथ में तेरी बिन ब्याही बहन भी तो थी. उस के लिए भी एक साड़ी खरीद देता तो तेरा क्या बिगड़ जाता? इस बेचारी का पिता जिंदा होता तो यह तेरा मुंह क्यों जोहती?’’

‘‘मां, इस के लिए भी खरीद देता पर यह अभी 14 साल की ही तो है. इस की साड़ी पहनने की उम्र थोड़े ही है.’’

‘‘तो क्या हुआ? अभी नहीं तो एकाध साल बाद ही पहन लेती. बीवी के ऊपर पैसा फूंकने को हरदम तैयार. हम लोगों के खर्च का बहुत हिसाबकिताब करते हो.’’

भैया चुप लगा गए. मां बहुत देर तक बकतीझकती रहीं.

भाभी ने साड़ी मां के सामने रखते हुए कहा, ‘‘मांजी, यह साड़ी शशि के लिए रख लीजिए. यह रंग उस पर बहुत खिलेगा.’’

मां ने साड़ी को पैर से खिसकाते हुए कहा, ‘‘रहने दे बहू, हम साड़ी के भूखे नहीं हैं. देना होता तो पहले ही खरीदवा देतीं. अब क्यों यह ढोंग कर रही हो? तुम्हारी साड़ी तुम्हें ही मुबारक हो.’’ फिर वे रोने लगीं, ‘‘प्रशांत के बापू जीवित थे तो हम ने बहुत कुछ ओढ़ा और पहना. वे मुझे रानी की तरह रखते थे. अब तो तुम्हारे आसरे हैं. जैसे रखोगी वैसे रहेंगे. जो दोगी सो खाएंगे.’’ साड़ी उपेक्षित सी बहुत देर तक जमीन पर पड़ी रही. फिर भाभी ने उसे उठा कर अलमारी में रख दिया.

मुझे याद है कुछ महीने बाद भैया के सहकर्मी की शादी थी और घर भर को निमंत्रित किया गया था.

‘‘वह बनारसी साड़ी पहनो न,’’ भैया ने भाभी से आग्रह किया, ‘‘खरीदने के बाद एक बार भी तुम्हें उसे पहने नहीं देखा.’’

‘‘भाभी साड़ी पहन कर आईं तो उन पर नजर नहीं टिकती थी. बहुत सुंदर दिख रही थीं वे. भैया मंत्रमुग्ध से उन्हें एकटक देखते रहे.’’

‘‘चलो सब जन गाड़ी में बैठो,’’ उन्होंने कहा.

मां की नजर भैया पर पड़ी तो वे बोलीं, ‘‘अरे, तू यही कपड़े पहन कर शादी में जाएगा?’’

‘‘क्यों क्या हुआ ठीक तो है?’’

‘‘खाक ठीक है. कमीज की बांह तो फटी हुई है.’’

‘‘ओह जरा सी सीवन उधड़ गई है. मैं ने ध्यान नहीं दिया.’’

‘‘अब यही फटी कमीज पहन कर शादी में जाओगे? जोरू पहने बनारसी साड़ी और तुम पहनो फटे कपड़े. तुम्हें अपनी मानमर्यादा का तनिक भी खयाल नहीं है. लोग देखेंगे तो हंसी नहीं उड़ाएंगे?’’

‘‘मैं अभी कमीज बदल कर आता हूं.’’

‘‘लाइए मैं 1 मिनट में कमीज सी देती हूं,’’ भाभी बोलीं, ‘‘उतारिए जल्दी.’’

थोड़ी देर में भाभी बाहर आईं, तो उन्होंने अपनी साड़ी बदल कर एक सादी फूलदार रेशमी साड़ी पहन ली थी.

‘‘यह क्या?’’ भैया ने आहत भाव से पूछा,’’ तुम पर कितनी फब रही थी साड़ी. बदलने की क्या जरूरत थी?

‘‘मुझे लगा साड़ी जरा भड़कीली है. दुलहन से भी ज्यादा बनसंवर कर जाऊं यह कुछ ठीक नहीं लगता.’’

भैया चुप लगा गए.

उस दिन के बाद भाभी ने वह साड़ी कभी नहीं पहनी. हर साल साड़ी को धूप दिखा कर जतन से तह कर रख देतीं थीं.

मैं जानती थी कि भाभी को मां की बात लग गई है. मां असमय पति को खो कर अत्यंत चिड़चिड़ी हो गई थीं. भाभी के प्रति तो वे बहुत ही असहिष्णु थीं. और इधर मैं भी यदाकदा मां से चुगली जड़ कर कलह का वातावरण उत्पन्न कर देती थी.

घर में सब से छोटी होने के कारण मैं अत्यधिक लाडली थी. भैया भी जीजान से कोशिश करते कि मुझे पिता की कमी महसूस न हो और उन पर आश्रित होने की वजह से मुझ में हीन भाव न पनपे. इधर मां भी पलपल उन्हें कोंचती रहती थीं कि प्रशांत अब गृहस्थी की बागडोर तेरे हाथ में है. तू ही घर का कर्ताधर्ता है. तेरा कर्तव्य है कि तू सब को संभाले, सब को खुश रखे.

लेकिन क्या यह काम इतना आसान था? सम्मिलित परिवार में हर सदस्य को खुश रखना कठिन था.

भैया प्रशासन आधिकारी थे. आय अधिक न थी पर शहर में दबदबा था. लेकिन महीना खत्म होतेहोते पैसे चुक जाते और कई चीजों में कटौती करनी पड़ती. मुझे याद है एक बार दीवाली पर भैया का हाथ बिलकुल तंग था. उन्होंने मां से सलाह की और तय किया कि इस बार दीवाली पर पटाखे और मिठाई पर थोड़ेबहुत पैसे खर्च किए जाएंगे और किसी के लिए नए कपड़े नहीं लिए जाएंगे.

‘‘लेकिन छुटकी के लिए एक साड़ी जरूर ले लेना. अब तो वह साड़ी पहनने लगी है. उस का मन दुखेगा अगर उसे नए कपड़े न मिले तो. अब कितने दिन हमारे घर रहने वाली है? पराया धन, बेटी की जात.’’

‘‘ठीक है,’’ भैया ने सिर हिलाया.

मैं नए कपड़े पहन कर घर में मटकती फिरी. बाकी सब ने पुराने धुले हुए कपड़े पहने हुए थे. लेकिन भाभी के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं आई. जहां तक मुझे याद है शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरा हो जब घर में किसी बात को ले कर खटपट न हुई हो. भैया के दफ्तर से लौटते ही मां उन के पास शिकायत की पोटली ले कर बैठ जातीं. भैयाभाभी कहीं घूमने जाते तो मां का चेहरा फूल जाता. फिर जैसे ही वे घर लौटते वे कहतीं, ‘‘प्रशांत बेटा, घर में बिन ब्याही बहन बैठी है. पहले उस को ठिकाने लगा. फिर तुम मियांबीवी जो चाहे करना. चाहे अभिसार करना चाहे रास रचाना. मैं कुछ नहीं बोलूंगी.’’

कभी भाभी को सजतेसंवरते देखतीं तो ताने देतीं, ‘‘अरी बहू, सारा समय शृंगार में लगाओगी, तो इन बालगोपालों को कौन देखेगा?’’ कभी भाभी को बनठन कर बाहर जाते देख मुंह बिचकातीं और कहतीं, ‘‘उंह, 3 बच्चों की मां हो गईं पर अभी भी साजशृंगार का इतना शौक.’’

इधर भैया भाभी को सजतेसवंरते देखते तो उन का चेहरा खिल उठता. शायद यही बात मां को अखरती थी. उन्हें लगता था कि भाभी ने भैया पर कोई जादू कर दिया है तभी वे हर वक्त उन का ही दम भरते रहते हैं. जबकि भाभी के सौम्य स्वभाव के कारण ही भैया उन्हें इतना चाहते थे. मैं ने कभी किसी बात पर उन्हें झगड़ते नहीं देखा था. कभीकभी मुझे ताज्जुब होता था कि भाभी जाने किस मिट्टी की बनी हैं. इतनी सहनशील थीं वे कि मां के तमाम तानों के बावजूद उन का चेहरा कभी उदास नहीं हुआ. हां, एकाध बार मैं ने उन्हें फूटफूट कर रोते हुए देखा था. भाभी के 2 छोटे भाई थे जो अभी स्कूल में पढ़ रहे थे. वे जब भी भाभी से मिलने आते तो भाभी खुशी से फूली न समातीं. वे बड़े उत्साह से उन के लिए पकवान बनातीं.

उस समय मां का गुस्सा चरम पर पहुंच जाता, ‘‘ओह आज तो बड़ा जोश चढ़ा है. चलो भाइयों के बहाने आज सारे घर को अच्छा खाना मिलेगा. लेकिन रानीजी मैं पूछूं, तुम्हारे भाई हमेशा खाली हाथ झुलाते हुए क्यों आते हैं? इन को सूझता नहीं कि बहन से मिलने जा रहे हैं, तो एकाध गिफ्ट ले कर चलें. बालबच्चों वाला घर है आखिर.’’

‘‘मांजी, अभी पढ़ रहे हैं दोनों. इन के पास इतने पैसे ही कहां होते हैं कि गिफ्ट वगैरह खरीदें.’’

‘‘अरे इतने भी गएगुजरे नहीं हैं कि 2-4 रुपए की मिठाई भी न खरीद सकें. आखिर कंगलों के घर से है न. ये सब तौरतरीके कहां से जानेंगे.’’

भाभी को यह बात चुभ गई. वे चुपचाप आंसू बहाने लगीं.

कुछ वर्ष बाद मेरी शादी तय हो गई. मेरे ससुराल वाले बड़े भले लोग थे. उन्होंने दहेज लेने से इनकार कर दिया. जब मैं विदा हो रही थी तो भाभी ने वह बनारसी साड़ी मेरे बक्से में रखते हुए कहा, ‘‘छुटकी, यह मेरी तरफ से एक तुच्छ भेंट है.’’

‘‘अरे, यह तो तुम्हारी बहुत ही प्रिय साड़ी है.’’

‘‘हां, पर इस को पहनने का अवसर ही कहां मिलता है. जब भी इसे पहनोगी तुम्हें मेरी याद आएगी.’’

‘हां भाभी’ मैं ने मन ही मन कहा, ‘इस साड़ी को देखूंगी तो तुम्हें याद करूंगी. तुम्हारे जैसी स्त्रियां इस संसार में कम होती हैं. इतनी सहिष्णु, इतनी उदार. कभी अपने लिए कुछ मांगा नहीं, कुछ चाहा नहीं हमेशा दूसरों के लिए खटती रहीं, बिना किसी प्रकार की अपेक्षा किए.’ मुझे उन की महानता का तब एहसास होता था जब वे अपने प्रति होते अन्याय को नजरअंदाज कर जातीं.

मेरी ससुराल में भरापूरा परिवार था. 2 ननदें, 1 लाड़ला देवर, सासससुर. हर नए ब्याहे जोड़े की तरह मैं और मेरे पति भी एकदूसरे के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की कोशिश करते. शाम को जब मेरे पति दफ्तर से लौटते तो हम कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम बनाते. जब मैं बनठन का तैयार होती, तो मेरी नजर अपनी ननद पर पड़ती जो अकसर मेरे कमरे में ही पड़ी रहती और टकटकी बांधे मेरी ओर देखती रहती. वह मुझ से हजार सवाल करती. कौन सी साड़ी पहन रही हो? कौन सी लिपस्टिक लगाओगी? मैचिंग चप्पल निकाल दूं क्या? इत्यादि. बाहर की ओर बढ़ते मेरे कदम थम जाते. ‘‘सुनो जी,’’ मैं अपने पति से फुसफुसा कर कहती, ‘‘सीमा को भी साथ ले चलते हैं. ये बेचारी कहीं बाहर निकल नहीं पाती और घर में बैठी बोर होती रहती है.

‘‘अच्छी बात है,’’ ये बेमन से कहते, ‘‘जैसा तुम ठीक समझो.’’

मेरी सास के कानों में यह बात पड़ती तो वे बीच ही में टोक देतीं,

‘‘सीमा नहीं जाएगी तुम लोगों के साथ. उसे स्कूल का ढेर सारा होमवर्क करना है और उस को ले जाने का मतलब है टैक्सी करना, क्योंकि मोटरसाइकिल पर 3 सवारियां नहीं जा सकतीं.’’

सीमा भुनभनाती, मुंह फुलाती, अपनी मां से हुज्जत करती पर सास का फरमान कोई टाल नहीं सकता था.

मैं मन ही मन जानती थी कि मेरी सास जानबूझ कर सीमा को हमारे साथ नहीं भेजती थीं और उसे घर के किसी काम में उलझाए रखती थीं. मैं मन ही मन उन का आभार मानती.

एक बार मेरे भैया मुझ से मिलने आए थे. मां ने अपने सामर्थ्य भर कुछ सौगात भेजी थीं. मेरी सास ने उन वस्तुओं की बहुत तारीफ की और घर भर को दिखाया. फिर उन्होंने मुझ से कहा, ‘‘बहू, बहुत दिनों बाद तुम्हारे भाई तुम से मिलने आए हैं. तुम अपनी निगरानी में आज का खाना बनवाओ और उन की पसंद की चीजें बनवा कर उन्हें खिलाओ.’’

मेरा मन खुशी से नाच उठा. उन के प्रति मेरा मन आदर से झुक गया. कितना फर्क था मेरी मां और मेरी सास के बरताव में, मैं ने सोचा. मुझे याद है जब भी मेरी भाभी का कोई रिश्तेदार उन से मिलने आता तो मेरी मां की भृकुटी तन जाती. वे किचन में जा कर जोरजोर से बरतन पटकतीं ताकि घर भर को उन की अप्रसन्नता का भान हो जाए.

मुझे याद आया कि जब मेरी शादी हुई तो मेरी मां ने मुझे बुला कर हिदायत दी थी, ‘‘देख छुटकी, तेरा दूल्हा बड़ा सलोना है. तू उस के मुकाबले में कुछ भी नहीं है. मैं तुझे चेताए देती हूं कि तू हमेशा उन के सामने बनठन कर रहना. तभी तू उन का मन जीत पाएगी.’’

मुझ से कहे बिना नहीं रहा गया, ‘‘लेकिन भाभी को तो तुम हमेशा बननेसंवरने पर टोका करती थीं.’’

‘‘वह और बात है. तेरी भाभी कोई नईनवेली दुलहन थोड़े न है. बालबच्चों वाली है,’’ मां मुझ से बोलीं.

इस के विपरीत मेरी ससुराल में जब भी कोई त्योहार आता तो मेरी सास आग्रह कर के मुझे नई साड़ी पहनातीं और अपने गहनों से सजातीं. वे सब से कहती फिरतीं, ‘‘मेरी बहू तो लाखों में एक है.’’

इधर मेरी मां थीं जिन्होंने भाभी को तिलतिल जलाया था. उन की भावनाओं की अवहेलना कर के उन के जीवन में जहर घोल दिया था. ऐसा क्यों किया था उन्होंने? ऐसा कर के न केवल उन्होंने मेरे भाई की सुखशांति भंग कर दी थी बल्कि भाभी के व्यक्तित्व को भी पंगु बना दिया था.

मुझे लगता है भाभी अपने प्रति बहुत ही लापरवाह हो गई थीं. उन में जीने की इच्छा ही मर गई थी. यहां तक कि जब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी ने उन्हें धर दबोचा तब भी उन्होंने अपनी परवाह न की, न घर में किसी को बताया कि उन्हें इतनी प्राणघातक बीमारी है. जब भैया को भनक लगी तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

जब मैं घर पहुंची तो भाभी की अर्थी उठने वाली थी. मैं ने अपने बक्से से बनारसी साड़ी निकाली और भाभी को पहना दी.

‘‘ये क्या कर रही है छुटकी,’’ मां ने कहा, ‘‘थोड़ी देर में तो सब राख होने वाला है.’’

‘‘होने दो,’’ मैं ने रुक्षता से कहा.

मुझे भाभी की वह छवि याद आई जब वे वधू के रूप में घर के द्वार पर खड़ी थीं. उन के माथे पर गोल बिंदी सूरज की तरह दमक रही थी. उन के होंठों पर सलज्ज मुसकान थी. उन की आंखों में हजार सपने थे.

भाभी की अर्थी उठ रही थी. मां का रुदन सब से ऊंचा था. वे गला फाड़फाड़ कर विलाप कर रही थीं. भैया एकदम काठ हो गए थे. उन के दोनों बेटे रो रहे थे पर छोटी बेटी नेहा जो अभी 4 साल की ही थी चारों ओर अबोध भाव से टुकुरटुकुर देख रही थी. मैं ने उस बच्ची को गोद में उठा लिया और भैया से कहा, ‘‘लड़के बड़े हैं. कुछ दिनों में बोर्डिंग में पढ़ने चले जाएंगे. पर यह नन्ही सी जान है जिसे कोई देखने वाला नहीं है. इस को तुम मुझे दे दो. मैं इसे पाल लूंगी और जब कहोगे वापस लौटा दूंगी.’’

‘‘अरी ये क्या कर रही है?’’ मां फुसफुफसाईं ‘‘तू क्यों इस जंजाल को मोल ले रही है. तुझे नाहक परेशानी होगी.’’

‘‘नहीं मां मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. उलटे अगर बच्ची यहां रहेगी तो तुम उसे संभाल न सकोगी.’’

‘‘लेकिन तेरी सास की मरजी भी तो जाननी होगी. तू अपनी भतीजी को गोद में लिए पहुंचेगी तो पता नहीं वे क्या कहेंगी.’’

‘‘मैं अपनी सास को अच्छी तरह जानती हूं. वे मेरे निर्णय की प्रशंसा ही करेंगी,’’ मैं ने दृढ़ शब्दों में कहा.

मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे भाभी अंतरिक्ष से मुझे देख रही हैं और हलकेहलके मुसकारा रही हैं. ‘भाभी,’ मैं ने मन ही मन कहा, ‘मैं तुम्हारी थाती लिए जा रही हूं. मुझे पक्का विश्वास है कि इस में तुम्हारे संस्कार भरे हैं. इसे अपने हृदय से लगा कर तुम्हारी याद ताजा कर लिया करूंगी.

12 साल बाद: अजीत के तिरस्कार के बाद जब टूटा तन्वी के सब्र का बांध

आज पूरे 12 साल बाद आखिर तन्वी के सब्र का बांध टूट ही गया. वह अपनी 2 साल की बेटी को गोद में उठाए अपना घर छोड़ कर निकलने को मजबूर हो गई. घर से सीधे रेलवे स्टेशन जा कर उस ने अपने मायके के शहर का टिकट लिया और टे्रन में चढ़ गई. गुस्से के मारे उस का शरीर उस के वश में नहीं था.

बेटी आस्था को सीट पर लिटा कर वह खुद खिड़की से सिर टिका कर बैठ गई. टे्रन ज्योंही स्टेशन छोड़ कर आगे बढ़ी, घंटों से रोका हुआ उस का आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा और वह अपनी हथेलियों से मुंह छिपा कर रो पड़ी. आसपास के सहयात्रियों की कुतूहल भरी निगाहों का एहसास होते ही उस ने अपनेआप को संभाला और आंसू पोंछ कर खुद को संयत करने की कोशिश करने लगी. थोड़ी ही देर में वह ऊपर से तो सहज हो गई पर भीतर का भयंकर तूफान उमड़ताघुमड़ता रहा.

आसान नहीं होता है किसी औरत के लिए अपना बसाबसाया घरसंसार अपने ही हाथों से बिखेर देना. पर जब अपने ही संसार में सांस लेना मुश्किल हो जाए, तो खुली हवा में सांस लेने के लिए बाहर निकलने के अलावा कोई चारा ही नहीं रह जाता. रहरह कर तन्वी की आंखें गीली होती जा रही थीं. सब कुछ भूलना और नई जिंदगी की शुरुआत कर पाना दोनों ही बहुत मुश्किल थे, पर अजीत के साथ पलपल मरमर कर जीना अब उस के बस की बात नहीं रह गई थी.

टे्रन अपनी पूरी गति से भागी जा रही थी और उसी गति से तन्वी के विचार भी चल रहे थे. आगे क्या होगा कुछ पता नहीं था. उसे इस तरह आया देख पता नहीं मायके में सब की प्रतिक्रिया कैसी होगी? शादी के बाद अपने पति का घर छोड़ कर मायके में लड़की कितने दिन इज्जत से रह पाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. अपना तो कुछ नहीं पर आस्था के उज्ज्वल भविष्य के लिए उसे जल्दी से जल्दी अपना जीवन व्यवस्थित करना पड़ेगा और अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा. तन्वी सोच रही थी कि सब कुछ जानने के बाद शुरू के कुछ दिन तो सब का रवैया सहानुभूतिपूर्ण और सहयोगात्मक रहेगा, पर धीरेधीरे वह सब पर बोझ बन जाएगी. वहां लोग उसे अपने पर बोझ समझें, इस से पहले ही उसे अपने पैरों पर हर हाल में खड़ा हो जाना होगा और अपना एक किराए का घर ले कर अलग रहने का इंतजाम करना होगा.

नौकरी और पैरों पर खड़े होने की बात दिमाग में आते ही तन्वी का ध्यान फिर से अजीत की तरफ चला गया. शादी से पहले अच्छीभली नौकरी कर रही थी तन्वी, पर अजीत की ही वजह से उसे वह नौकरी छोड़नी पड़ी थी.

तन्वी देखने और बातव्यवहार दोनों में ही अजीत से कहीं ज्यादा अच्छी थी और इसी वजह से औफिस से ले कर घर तक हर जगह उस की तारीफ हुआ करती थी. शुरू में तो इस का कोई खास असर नहीं पड़ा था अजीत पर, लेकिन शादी के बाद 3 साल के अंदर ही तन्वी को

2 प्रमोशन मिल गए और अजीत को 1 भी नहीं, तो धीरेधीरे अजीत के मन की हीनभावना बढ़ती चली गई और उस ने अलगअलग बहानों से घर में क्लेश करना शुरू कर दिया. उस का एक ही समाधान वह निकालता था कि तन्वी तुम नौकरी छोड़ दो. हार कर घर की सुखशांति के नाम पर तन्वी ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

उस समय तो तन्वी को इतना नहीं खला था, पर अब उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा है. अजीत की याद आते ही तन्वी फिर से असहज होने लगी. उस के द्वारा दी गई मानसिक यंत्रणाएं तन्वी के विचारों को मथने लगीं.

तन्वी सोचने लगी, ‘मैं और कितना बरदाश्त कर सकती थी. बरदाश्त की भी एक सीमा होती है. घरपरिवार की सुखशांति के नाम पर आखिर कोई औरत कब तक अपमान और तिरस्कार के घूंट पीती रह सकती है? सामने वाला किसी को हर पल यह एहसास दिलाता रहे कि हमारे जीवन में तुम्हारी कोई अहमियत नहीं है, तो क्या साथ रहना आत्मसम्मान को चोट नहीं पहुंचाता है? मानसिक यंत्रणाओं को आखिर कब तक मैं घर की सुखशांति और मानमर्यादा के नाम पर सहती और चुप रहती कि कम से कम मेरी चुप्पी से मेरी गृहस्थी तो बची रहेगी. घर का कलह बाहर वालों के सामने तो नहीं आएगा.’

अजीत को तो किसी की भी परवाह नहीं ?थी कि लोग क्या कहेंगे. उस की दुनिया तो उस से शुरू हो कर उस पर ही खत्म हो जाती थी. अपनेआप को किसी शहंशाह से कम नहीं समझता था अजीत.

अपना अतीत जैसेजैसे तन्वी को याद आता जा रहा था उस का मन और कसैला हुआ जा रहा था. उसे खुद पर आश्चर्य होता जा रहा था कि आखिर इतने सालों तक वह सब कुछ क्यों और कैसे बरदाश्त करती रही? उसे लगने लगा कि शायद पति के अत्याचार बरदाश्त करते रहना पत्नियों की आदत में ही शुमार होता है.

औरतों का एक तबका ऐसा होता है, जो रोज पति के लातघूंसे खाता है. ऐसी औरतें बिरादरी के सामने पति को गालियां देती हैं, लेकिन सब कुछ भूल कर दूसरे ही दिन पति के साथ हंसतीखिलखिलाती नजर आती हैं.

दूसरा तबका वह होता है, जो पति की एक धौंस भी बरदाश्त नहीं करता. ऐसी औरतें रातोंरात पति के अस्तित्व को ठोकर मार कर अपनी एक अलग दुनिया बसा लेती हैं. औरतों के ये दोनों तबके खुश रहते हैं.

सब से अधिक मजबूर होती हैं संतुलित परिवारों की महिलाएं, जो न तो इतनी सक्षम होती हैं कि रातोंरात पति से अलग हो कर एक अलग दुनिया बसा सकें और न ही इतनी आत्मसम्मानविहीन कि पति की ज्यादतियों को रात गई बात गई की तर्ज पर भुला सकें.

वे तो बस सहती हैं और चुप रहती हैं. कभी पड़ोसियों के कानों तक बात न पहुंचे यह सोच कर, तो कभी बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा यह सोच कर. कभी उन्हें यह भय सताता है कि अगर वे पति का घर छोड़ कर मायके चली गईं तो उन की छोटी बहनों के विवाह में दिक्कतें आएंगी, तो कभी यह डर सताता है कि उन के मातापिता इतना बड़ा सदमा बरदाश्त न कर सके तो?

पढ़ी-लिखी तन्वी भी सुखशांति, मायके की इज्जत और छोटी बहनों के भविष्य के बारे में सोचसोच कर वर्षों तक अजीत की ज्यादतियां बरदाश्त करती रही और अपमान के कड़वे घूंट पी कर भी चुप रही, पर अब सब कुछ असहनीय हो गया था. तन्वी को लगने लगा कि अब वह और नहीं बरदाश्त कर पाएगी और अंतत: उसे अपना घर छोड़ने जैसा कदम उठाना पड़ गया.

अपना अपमान और तिरस्कार तो तन्वी कैसे भी बरदाश्त कर रही थी, पर आस्था के साथ भी अजीत का वही रवैया उस से बरदाश्त न हो पाया. कुछ दिन पहले ही आस्था की तबीयत खराब होने पर अजीत का जो व्यवहार था, उसे देख कर भविष्य में अजीत के सुधरने की जो एक छोटी सी उम्मीद थी, वह भी जाती रही.

उस ने सुना था कि बच्चा होने के बाद पतिपत्नी में प्यार बढ़ता है, क्योंकि बच्चा दोनों को आपस में बांध देता है. इसी उम्मीद पर उस ने 10 वर्ष तक संयम रखा कि शायद पिता बनने के बाद अजीत के अंदर कुछ परिवर्तन आ जाए, पर ऐसा कुछ भी न हुआ. शादी के 10 साल बाद इतनी मुश्किलों से हुई बेटी से भी अजीत का कोई लगाव नहीं झलकता था. आस्था के प्रति अजीत का उस दिन का रवैया सोच कर आज भी तन्वी की आंखें नम हो जाती हैं.

उस दिन सुबह जब तन्वी ने आस्था को गोद में उठाया, तो उसे ऐसा लगा कि उस का शरीर कुछ गरम है. थर्मामीटर लगाया तो 102 बुखार था. दिसंबर का महीना था और बेमौसम बारिश से गला देने वाली ठंड पड़ रही थी. ऐसे में आटोरिकशा में आस्था को डाक्टर के पास ले कर जाना तन्वी को ठीक नहीं लगा. अत: उस ने औफिस फोन कर के अजीत को आने को कहा तो उस ने थोड़ी देर में आने के लिए कहा.

तन्वी इंतजार करती रही थी पर शाम तक न ही अजीत आया और न ही उस का फोन. आस्था का बुखार बढ़ता गया और शाम होतेहोते उसे लूज मोशन के साथसाथ उलटियां भी होने लगीं. घबरा कर उस ने दोबारा अजीत को फोन किया, तो उस ने बताया कि वह अपने बौस के यहां बर्थडे पार्टी में है और 2 घंटे में घर पहुंचेगा.

तन्वी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि जिस की बेटी बुखार में तप रही हो वह उसे डाक्टर को दिखाने के बजाय बर्थडे पार्टी अटैंड कर रहा है. बाहर का मौसम और आस्था की हालत देखते हुए तन्वी के हाथपैर ठंडे हो गए और उस की आंखों से बेबसी के आंसू निकल पड़े.

उस ने किसी तरह खुद को संयत किया और पड़ोस में रहने वाली अपनी एक सहेली को फोन कर के उस से मदद मांगी. संयोग से उस के पति औफिस से आ चुके थे. वे अपनी गाड़ी से आस्था और तन्वी को डाक्टर के पास ले गए. वहां डाक्टर ने आस्था की हालत देख कर तन्वी को खूब डांट लगाई कि बच्चे को अब तक घर पर रख कर उस की हालत इतनी बिगाड़ दी. अपने आवेगों पर नियंत्रण रख बुखार में तपती बेसुध आस्था को ले कर जब तन्वी घर पहुंची तो घर के बाहर अजीत को खड़ा पाया. हड़बड़ी में ताला लगा कर तन्वी चाबी पड़ोस में देना भूल गई थी.

तन्वी को देखते ही अजीत उस पर बरस पड़ा, ‘‘चाबी दे कर नहीं जा सकती थीं? घंटे भर से बाहर खड़ा इंतजार कर रहा हूं मैं.’’

हालांकि अजीत का ऐसा अमानवीय व्यवहार तन्वी के लिए कोई आश्चर्यजनक नहीं था, फिर भी साथ में खड़ी सहेली और उस के पति की वजह से तन्वी का चेहरा अपमान से लाल हो गया. लेकिन उस ने अपने सारे संवेगों को दबाते हुए बात को सहज बनाते हुए कहा, ‘‘आस्था की हालत देख कर मैं इतनी घबरा गई कि हड़बड़ी में चाबी देना याद ही नहीं रहा.’’

‘‘बुखार ही तो था कोई मर तो नहीं रही थी, जो सुना रही हो कि हालत बिगड़ रही थी,’’ कहते हुए उस ने तन्वी के हाथ से चाबी ली और दरवाजा खोल कर अंदर चला गया.

बाहर खड़ी तन्वी की सहेली और उस के पति को धन्यवाद के शब्द कहना तो दूर उन की ओर नजर उठा कर देखने तक की जहमत नहीं उठाई उस ने. अपमान से लाल हुई तन्वी मुंह से कुछ न कह सकी, बस हाथ जोड़ कर अपनी डबडबाई आंखों से उन के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर कर दी.

अजीत की अमानवीयता पर आश्चर्यचकित वे दोनों तन्वी को आंखों से ही हौसला बंधाते हुए वहां से चले गए. तन्वी अंदर जाने के लिए मुड़ी ही थी कि अजीत का अगला बाण चल निकला, ‘‘यारों के साथ ही जाना था, तो मुझे फोन करने का नाटक करने की क्या जरूरत थी?’’

उस समय तन्वी का मन किया था कि पास पड़ा गुलदस्ता उठा कर अजीत के सिर पर दे मारे, पर आस्था की मम्मीमम्मी की आवाज सुन उस ने स्वयं को रोक लिया और ‘तुम जैसा गंदी मानसिकता वाला इंसान इस से ज्यादा और सोच ही क्या सकता है?’ कहते हुए स्वयं को आस्था के साथ कमरे में बंद कर लिया.

उस रात तन्वी बहुत आहत हुई थी. ऐसा नहीं था कि अजीत ने पहली बार उस के साथ इतना संवेदनहीन व्यवहार किया था, पर इस बार बात केवल तन्वी के दिल को पहुंची चोट तक ही सीमित नहीं थी. बेटी का तिरस्कार और उस के लिए ‘मर तो नहीं रही थी’ जैसे शब्द, पड़ोसियों का अपमान, पड़ोसियों के सामने उस की बेइज्जती और फिर उस के चरित्र पर कसा हुआ फिकरा, सब कुछ एकसाथ मिल कर उस के मस्तिष्क में कुलबुलाहट पैदा कर रहा था और सब्र को तारतार कर रहा था.

इस तरह का व्यवहार करना इंसान की कायरता की पहली निशानी होती है. कायर इंसान ही अपनी गलती को छिपाने के लिए अनायास दूसरों पर चीखते और चिल्लाते हैं. वे समझते हैं कि चीख और चिल्ला कर, अपनी गलती दूसरे पर थोप कर वे सब के सामने निर्दोष सिद्ध हो जाएंगे, पर वे बहुत गलत सोचते हैं.

उन के ऐसे व्यवहार से दूसरों के मन में उन के लिए नफरत के अलावा और कुछ उत्पन्न नहीं होता. अजीत ने भी वही किया. उस के समय पर न पहुंचने के लिए उसे तन्वी या कोई और कुछ कह न सके, इस से बचने के लिए उस ने पहले ही तन्वी पर आरोपों की झड़ी लगा कर खुद की गलती ढकने की एक तुच्छ कोशिश की. अजीत की बातों से आहत तन्वी की वह सारी रात रोतेरोते ही गुजर गई.

आसान नहीं था, फिर भी दूसरे दिन सुबह से तन्वी ने सब कुछ भुला कर सामान्य रूप से दिनचर्या शुरू कर दी, क्योंकि उसे अपने मानअपमान से ज्यादा आस्था की चिंता थी. वह नहीं चाहती थी कि उस की बेटी आस्था के कोमल मन पर उस के मातापिता की आपसी तकरार का बुरा असर पड़े.

जिस प्रकार गाड़ी का एक पहिया पंक्चर हो जाए तो गाड़ी सही तरीके से चल तो नहीं सकती सिर्फ कुछ दूर तक घसीटी जा सकती है, ठीक उसी तरह तन्वी को भी लगने लगा था कि जहां तक भी हो सके, अपनी जिंदगी की गाड़ी को घसीटते जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है.

गृहस्थी बचाने के लिए अंतर्मन पर पड़ती चोटों को लगातार अनदेखा करती जा रही तन्वी के मन में खुशहाल जिंदगी का सपना सच होने की एक उम्मीद अचानक जाग गई, जब एक दिन औफिस से बड़े अच्छे मूड में आ कर अजीत ने तन्वी से कहा कि औफिस में लगातार 3 दिनों की छुट्टी पड़ रही है अत: 2 दिन के फैमिली टूर का प्रोग्राम औफिस से बनाया गया है. तुम तैयारी कर लो. शुक्रवार की शाम को चलना है.

सुन कर तन्वी को अच्छा लगा. वह सोचने लगी कि ऐसे कार्यक्रमों से थोड़ा मूड भी बदलेगा और दूसरे पतियों को देख कर शायद अजीत के व्यवहार में भी कुछ सुधार हो.

पर कुछ भी सुधार हुआ होता तो भला आज तन्वी अपने हाथों से अपनी जिंदगी बिखेर कर क्यों निकल पड़ती? शुक्रवार को निश्चित समय से पहले ही तन्वी पूरी तरह तैयार हो चुकी थी. घर से निकलने से पहले जब उस ने आस्था को गोद में उठाया, तो उस ने देखा कि आस्था ने पौटी की हुई है. उस ने अजीत से

2 मिनट में आने को कहा और आस्था को ले कर बाथरूम की ओर चल पड़ी.

‘‘इस निकम्मी को सिवा इस के और कुछ आता भी है?’’ बाथरूम की ओर जाती तन्वी के कान में अजीत का यह वाक्य पड़ा तो दिल किया कि पलट कर इस का करारा जवाब दे पर अच्छाखासा माहौल वह खराब नहीं करना चाहती थी अत: चुप रह गई. उस ने फटाफट आस्था को साफ किया और उस की नैपी को कागज में लपेट कर डस्टबिन में डाल दिया. आस्था को पैंट पहनाती हुई ही 2 मिनट से कम समय में ही तन्वी बाहर आ गई. बाहर आ कर देखा तो उसे अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ. बाहर न तो आटो था और न ही अजीत. तन्वी का सूटकेस गेट के पास पड़ा हुआ था. अजीत तन्वी को छोड़ कर चला गया था.

आश्चर्य से तन्वी का मुंह खुला का खुला रह गया. अजीत ऐसा भी कर सकता है उस को यकीन नहीं आ रहा था. अपनी तसल्ली के लिए उस ने इधरउधर झांक कर देखा भी, पर उस का क्या फायदा था. उस की आंखें अपमान और आक्रोश के मिश्रित आंसुओं से झिलमिलाने लगीं. एक ऐसा आक्रोश, जिसे वह न चीख कर व्यक्त कर सकती थी न चिल्ला कर. अपमान की ऐसी अनुभूति, जो पल भर में ही पूरा शरीर जला गई. विवेकशून्य सी तन्वी दरवाजे पर ही खड़ी रह गई.

उस की सहेली नीरू को उस के प्रोग्राम की जानकारी थी और वह उसे बाय करने के मकसद से अपने घर के बाहर खड़ी थी. उस ने सब कुछ देखा तो सोच में डूब गई कि ऐसे इंसान के साथ आखिर तन्वी कैसे जीवन बिता रही है? तन्वी की दशा वह अच्छी तरह समझ रही थी अत: उस का मन बहलाने के लिए उसे अपने घर में चाय पीने के लिए बुला लिया. उस दिन नीरू के सामने तन्वी अपने को रोक न सकी और रोरो कर अपनी सारी पीड़ा बहा दी.

उस ने कहा, ‘‘नीरू, मैं यह अच्छी तरह समझ चुकी हूं कि अजीत एक कायर और कर्तव्यविमुख आदमी है. वह अपनी जिम्मेदारियों से हमेशा मुंह छिपाता रहता है और मैं या कोई और उसे कुछ कहे, इस से पहले ही वह मुझ पर आरोप मढ़ देता है और माहौल इतना खराब कर देता है कि मुख्य मुद्दा ही खत्म हो जाए. मैं उस की इस कमजोरी को समझ चुकी हूं और उस के आधार पर खुद को ढाल कर जीना शुरू कर दिया था, तो अब उस के अंदर की हीनभावना ने मेरा जीना हराम कर दिया है.

‘‘मेरा किया कोई अच्छा काम या किसी के द्वारा की गई मेरी तारीफ वह बरदाश्त नहीं कर पाता है और मौकेबेमौके जगहजगह पर मुझे अपमानित कर आत्मसंतुष्टि महसूस करता है. मेरे बरदाश्त की सीमा अब खत्म हो रही है, डर लगता है मैं कहीं कुछ कर न बैठूं. मेरी सहनशक्ति को अजीत मेरी कमजोरी मान बैठा है और दिनबदिन मेरा जीना हराम किए जा रहा है.’’

नीरू ने तन्वी को बड़े प्यार से समझाया कि घर की सुखशांति बनाए रखना और आस्था को बेहतर परवरिश देना दोनों की जिम्मेदारी उस की ही है. घर छोड़ देना या कुछ कर बैठना किसी समस्या का समाधान नहीं होता. वह थोड़ा सब्र करे और किसी दिन अच्छा समय देख कर अजीत से बात करे और उसे बताए कि उस के इस तरह के व्यवहार से न केवल उन की गृहस्थी पर बुरा असर पड़ रहा है, बल्कि आस्था का कोमल मन भी प्रभावित हो रहा है.

घर आ कर तन्वी बुरी तरह अपसैट थी. अजीत ने उस के साथ जो किया था उसे सोचसोच कर उस का दिल नफरत से भरता जा रहा था, पर नीरू की कही बात सोच कर उस ने एक बार अजीत से बात कर के सब कुछ ठीक करने की एक और कोशिश करने का निश्चय किया.

अजीत के वापस आने के कुछ ही दिन बाद उन की शादी की 12वीं सालगिरह पड़ी. तन्वी ने तय किया था कि उस दिन अजीत से बात कर के उपहार के बदले उस से उस के व्यवहार में कुछ परिवर्तन लाने का वादा लेगी.

उस दिन वह रोज की अपेक्षा जल्दी उठी और अजीत और आस्था के जगने से पहले ही घर का सारा काम यह सोच कर निबटा लिया कि आराम से बैठ कर अजीत से अपनी समस्याओं पर चर्चा करेगी. उस ने चाय बनाई और अजीत को उठाया. वह मन ही मन सोच रही थी कि किन शब्दों से अजीत को शादी की सालगिरह मुबारक कहे, तभी अजीत उस से अखबार मांग बैठा.

‘‘अखबार तो अभी नहीं आया है, थोड़ी देर में आएगा, तन्वी के इतना कहते ही अजीत ने चाय का कप दीवार पर दे मारा, ‘‘कितनी बार कहा है कि पेपर वाले को कहो कि पेपर जल्दी डाला करे, पेपर नहीं आया है तो क्या अपना थोबड़ा दिखाने के लिए उठा कर बैठा दिया मुझे?’’

बधाई देने और अपनी समस्या पर विचार करने के लिए हफ्ताभर सोचे गए उस के सारे शब्द धरे के धरे रह गए. वह पल ही तन्वी के लिए उस घर में अंतिम पल बन गया. पहली बार उस ने भी उस के ही शब्दों में उसे जवाब दिया और अपने हाथ में पकड़ा चाय का कप भी जमीन पर दे मारा. आक्रोश से भरी तन्वी ने उसी समय अपने और आस्था के कपड़े सूटकेस में डाले और सोती हुई आस्था को गोद में उठा कर घर से निकल गई.

अपने दुखद अतीत को पीछे छोड़ कर घर से निकल आई तन्वी रहरह कर अपने उठाए गए कदम और भविष्य को ले कर आशंकित होती जा रही थी, पर जब वह पिछले 12 वर्षों तक पाया तिरस्कार और अपमान याद करती थी तो उसे अपने निर्णय पर कोई पछतावा नहीं होता था.

‘उस ने मुझे जो मानसिक यंत्रणाएं दी हैं, उस की सजा क्या मैं उसे दे सकूंगी? शायद पत्नी और बेटी के बिना उस के जीवन में आया खालीपन ही उस के लिए माकूल सजा होगा. अपने पैरों पर खड़े हो कर अपना व आस्था का भविष्य संवार पाने की आशा में ही मुझे अपना सुनहरा भविष्य दिखाई दे रहा है,’ आस्था के माथे पर हाथ रख कर यह सोचतेसोचते तन्वी ने आंखें बंद कर लीं.

मैं दकियानूसी विचारों वाली जेठानी से परेशान हो गई हूं…

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल-

मैं 31 वर्षीय शादीशुदा महिला हूं. हमारे 2 बच्चे हैं और हम एक ही छत के नीचे सासससुर, जेठजेठानी व उन के बच्चे के  साथ रहते हैं. मेरी जेठानी बातबेबात मु झ से  झगड़ती हैं  और सासूमां के कान भी भरती रहती हैं. मैं खुले विचारों वाली महिला हूं जबकि जेठानी दकियानूसी विचारों वाली और कम पढ़ीलिखी हैं. वे आएदिन मु झ से  झगड़ती रहती हैं. घर में जेठानी से बारबार लड़ाई होने की वजह से क्या हमें अलग घर में रहना चाहिए? सासूमां इस के लिए मु झे मना करती हैं पर जेठानी की बात सहते रहने के लिए भी कहती हैं. पति से इस बारे में बात करना चाहती हूं पर कभी कर नहीं पाई क्योंकि, वे अपने मातापिता को छोड़ अलग रहना नहीं चाहते. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब-

सुलह के सभी रास्ते बंद हों और गृहक्लेश आएदिन हो तो अलग रहने में कोई बुराई नहीं मगर इस से पहले अगर आप एक सार्थक पहल करें तो घर में सुकून और शांति का वातावरण स्थापित हो सकता है.

पहले आप के लिए यह जानना जरूरी होगा कि आपसी  झगड़े की असल वजह क्या है? आमतौर पर गृहक्लेश बजट की हिस्सेदारी को ले कर, रसोई में कौन कितना काम करे, घर के कामकाज के बंटवारे आदि को ले कर होता है. कभीकभी एकदूसरे से ईर्ष्या रखने पर भी आपसी मनमुटाव का वातावरण पैदा हो जाता है.

बेहतर होगा कि  झगड़े की असल वजह जान कर सुलह की कोशिश की जाए. सास और पति से जेठानी के  झगड़ालू बरताव की वजह जानने की कोशिश भी आपसी संबंधों को सही कर सकती है. जेठानी कम पढ़ीलिखी हैं तो संभव है यह भी एक वजह हो. आप को ले कर उन में हीनभावना हो सकती है. आप के लिए बेहतर यह भी होगा कि जेठानी से उपयुक्त समय देख कर बात करें. अगर सास आप को अलग घर लेने से मना कर रही हैं तो जाहिर है वे आप को व जेठानी को बेहतर रूप से जानतीसम झती हैं, इसलिए सही निर्णय आप की सास ही ले सकती हैं. यदि 1-2 बातों को नजरअंदाज कर दें तो संयुक्त परिवार आज की जरूरत है, जहां रहते हुए हरकोई अपने सपनों के पंखों को उड़ान दे सकता है.

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या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

श्रद्धा कपूर की जिंदगी में लौटा प्यार, 3 साल छोटे लेखक राहुल मोदी के साथ है रिश्ता

Shradha Kapoor : ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन, जगजीत सिंह की आवाज में गाया हुआ ये गाना फिल्म इंडस्ट्री के लोगों पर एकदम फिट बैठता है. क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री में कई ऐसे कपल है जिन्होंने प्यार और शादी करते वक्त उम्र, जात का फासला नहीं देखा बस जब प्यार हुआ तो उस प्यार को कबूल कर लिया . फिर चाहे वह संजय दत्त हो कौमेडियन भारती सिंह या उर्मिला मातोंडकर ही क्यों ना हो.

बौलीवुड की मोस्ट ब्यूटीफुल हीरोइन श्रद्धा कपूर भी आजकल एक लेखक के प्यार में गिरफ्तार है और उन्होंने खुद अपने प्यार को कबुला है. श्रद्धा जिस शख्स के प्यार में गिरफ्तार है उनका नाम राहुल मोदी है जो श्रद्धा से 3 साल छोटे हैं और राहुल मोदी ने श्रद्धा कपूर और रणबीर कपूर अभिनीत तू झूठी मैं मक्कार के लेखक हैं इसके अलावा राहुल ने प्यार का पंचनामा सोनू के टीटू की स्वीटी आदि फिल्मों में भी बतौर लेखक काम किया है.

राहुल फिल्म मेकर सुभाष घई के करीबी हैं और उन्होंने विसलिंग वुड्स इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट से राइटिंग की डिग्री ली हैं. खबरों के अनुसार श्रद्धा काफी समय से राहुल मोदी के साथ डेटिंग कर रही हैं. ऐसे में कहना गलत ना होगा कि श्रद्धा की शादी की शहनाई भी जल्दी उनके फैंस को मिलने वाली है .

6 साल बाद सोनी चैनल पर वापस लौटा CID, नए सीजन का वीडियो आया सामने

सीआईडी छोटे पर्दे का वह मशहूर शो है जिसने 20 सालों तक टीवी इंडस्ट्री में और भारत के हर घर में राज किया. सीआईडी ( CID) के सारे किरदार जैसे दया, एसीपी प्रद्युमन दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय है. यही वजह है कि जब यह शो 6 साल पहले बंद हुआ था तो इस धारावाहिक के प्रशंसकों को भारी निराशा हुई थी. लेकिन अब सीआईडी के फैंस के लिए बड़ी खुशखबरी है एक बार फिर 6 साल बाद सी आई डी शो वापस लौट रहा है. सीआईडी शो की शुरुआत 1998 में सोनी चैनल पर हुई थी और 2018 तक इस शो ने दर्शकों को लगातार एंटरटेन किया.

इस शो के निर्देशक बी पी सिंह सीआईडी किस्म के स्पाई शोज बनाने के लिए प्रसिद्ध है. जिसके चलते सीआईडी में दिखाई गई जासूसी कहानियां को दर्शकों ने हमेशा पसंद किया. हाल ही में सोनी टीवी ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम हैंडल पर सीआईडी के नए सीजन का पहले वीडियो रिलीज किया.

जिसमें एसीपी प्रद्युमन अर्थात शिवाजी साटम , दया अर्थात दयानंद शेट्टी, और सीनियर इंस्पेक्टर अभिजीत अर्थात आदित्य श्रीवास्तव की झलक देखने को मिली. खबरों के अनुसार इस बार के नए सीआईडी में और ज्यादा दिलचस्प कहानी और सस्पेंस देखने को मिलेगा. जो पहले से और ज्यादा दिलचस्प होगा.

पायल रोहतगी ने Anupama फेम रुपाली गांगुली की लगा दीं क्लास, कहा ‘गरीब हो क्या पैसे नहीं है ?’

टीवी की अनुपमा (Anupama) यानी रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) लगातार विवादों में बनी हुई हैं. कुछ दिनों पहले ही गांगुली की सौतेली बेटी ने उन पर कई गंभीर आरोप लगाए थे. जिसके बाद रुपाली गांगुली कुछ दिनों तक चुप थी. लेकिन एक इंटरव्यू में ईशा ने ये तक कह दिया कि गांगुली शादी से पहले प्रेग्नेंट हो गई थीं. इस वजह से रुपाली गांगुली की काफी बदनामी होने लगी.

ऐसे में रुपाली गांगुली ने अपनी सौलेती बेटी ईशा वर्मा (Esha Varma) को 50 लाख रुपए का मानहानि का नोटिस भेज दिया था. इसके ईशा वर्मा ने अपनी सारी पोस्ट सोशल मीडिया से डिलीट कर दी थीं. यहां तक कि इंस्टाग्राम का अकाउंट भी उन्होंने प्राइवेट कर दिया है और एक्स(ट्विटर) का अकाउंट डिलीट कर दिया है.

rupali ganguly

अनुपमा पर भड़कीं पायल रोहतगी

इसी बीच टीवी ऐक्ट्रैस पायल रोहतगी (Payal Rohatgi) अनुपमा की क्लास लगा दी है. पायल रोहतगी ने इस विवाद पर चुप्पी तोड़ी हैं. सोशल मीडिया पर रुपाली गांगुली से डायरेक्ट सवाल कर डाला है.

पायल ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में लिखा, ‘इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि रुपाली गांगुली आपका सच क्या है. जब आप उस आदमी से मिलीं तो वो उस समय पहले से ही शादीशुदा था. लोग इसे कर्मा कहते हैं. लोग आपके साथ वहीं करते हैं जो आप किसी और के साथ कर चुके होते हैं. पिछली पत्नी की बेटी तो अपनी कहानी सबको बताएगी ही ना… बाकी आप कोर्ट में खड़े होकर एक बार ये जरूर सोचना कि आपने किस मुंह के साथ अपनी सौतेली बेटी से इतनी बड़ी मानहानि की रकम मांगी है.’

कहा, 50 लाख रुपए की कीमत क्या होती ? समझ नहीं आया

पायल रोहतगी ने आगे ये भी गांगुली से पूछा कि ‘क्या आपके पास पैसे नहीं हैं. आप गरीब हो चुकी हैं. एक टीवीशो में काम करके भी आपको नहीं समझ आया कि 50 लाख रुपए की कीमत क्या होती है. पायल रोहतगी की इस बात से लोग सहमत है और उन्हें सपोर्ट कर रहे हैं. तो वहीं ईशा वर्मा की उम्र अभी 26 साल है और 50 करोड़ रुपए जमा कर पाना उनके बस की बात नहीं है.

राजन शाही ने अनुपमा का किया सपोर्ट

तो वहीं दूसरी तरफ अनुपमा के प्रोड्यूसर राजन शाही ने एक लंबा चौड़ा पोस्ट कर अनुपमा का सपोर्ट किया है.  उन्होने लिखा, ‘रुपाली आपकी कड़ी मेहनत, समर्पण, ईमानदारी, निष्ठा और विनम्रता से शाही प्रोडक्शंस को प्रेरित करती हैं. अनुपमा आपने इतिहास रचा है. एक बेंचमार्क और मील का पत्थर तक बहुत कम लोग ही पहुंच पाते हैं या उसे बना पाते हैं. हमने पर्दे के पीछे उन सभी कड़ी मेहनत की चुनौतियों को देखा है जिनका सामना आपको मुस्कुराते हुए करना पड़ता है.

राजन शाही ने आगे अनुपमा के लिए ये भी लिखा कि एक अभिनेत्री के रूप में आपकी विनम्रता अनुपमा की टीम में हम सभी के लिए प्रेरणादायक है. हमेशा की तरह मुस्कुराहट और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें क्योंकि आपकी रोज की कड़ी मेहनत ही सभी का उत्तर है. हमें आप पर गर्व है और हमेशा आपके साथ हूं. थू थू थू…

इस पोस्ट पर अनुपमा  का रिएक्शन भी आया है. उन्होंने राजन का साथ देने के लिए धन्यवाद दिया है. ऐक्ट्रैस ने कमेंट में लिखा, ‘उस आदमी की तरफ से आया है, जिसने मुझे अनुपमा के रूप में खड़ा किया है. इसका मतलब मेरे लिए बहुत ज्यादा है. मेरे गुरू, मेरा डीकेपी परिवार, मैं जीवन में आपको पाकर धन्य हूं.’

नायिका : बंद कमरे में सीता को देख रेवा क्यों हैरान हो गई?

राइटर-  भावना केसवानी

‘‘सच ही तो है. हर इंसान अपने लिए खुद ही जिम्मेदार होता है. दुनिया कहां पहुंच गई और ये लोग अपनी पुरानी सोच के वजह से पिछड़े ही रह गए. अफसोस तो इस बात का है कि इन की ऐसी मानसिकता के कारण इन के बच्चों का जीवन भी बरबाद हो जाता है,’’ कमरे में घुसते ही रेवा बड़बड़ाने लगी.

औफिस के लिए तैयार हो रहे पराग ने मुड़ कर रेवा की ओर देखा, ‘‘क्या हुआ? मेरे अलावा अब और किस की शामत आई है?’’

‘‘पराग, तुम्हें तो हर वक्त मजाक ही सूझता है. मैं तो सीता के बारे में सोच रही थी. शोभा को कितना समझ रही हूं. मगर वह तो उस की शादी करने पर तुली हुई है. अरे, अभी सिर्फ 16 की ही तो है. इतनी कच्ची उम्र में शादी कर देंगे, फिर जल्दी 3-4 बच्चे हो जाएंगे और फिर झाड़ूपोंछा, चौकाबरतन करते ही उस की जिंदगी कब खत्म हो जाएगी, उसे खुद भी पता नहीं पड़ेगा. कितना कह रही हूं कि लड़की छोटी है, थोड़ा रुक जाओ पढ़ना चाहती है तो पढ़ने दो… जो मदद चाहिए होगी मैं कर दूंगी पर नहीं… लड़की ज्यादा बड़ी हो जाएगी तो शादी में मुश्किल होगी… हुंह, रेवा, मेरे पास एक आइडिया है. तुम मेड लिबरेशन ऐसोसिएशन बनाओ और उस की प्रैसिडैंट बन जाओ. तुम्हारे जैसी कुछ और औरतें मिल जाएंगी तो सीता ही क्यों, सारी मेड्स की समस्याओं का समाधान मिल जाएगा. रेवा प्लीज… यू मस्ट डू इट. तुम्हारी मैनेजरियल स्किल्स भी काम आएंगी और फिर इतनी कामवालियों का उद्धार कर के तुम्हें कितना पुण्य मिलेगा… सोचो जरा.’’

पराग की चुहल से रेवा और चिढ़ गई, ‘‘सब से पहले तो मुझे खुद को लिबरेट करना है तुम से. आज फिर तुम ने गीला तौलिया पलंग पर फेंक दिया है. मेरे घर का अनुशासन तोड़ा न तो अच्छा नहीं होगा.’’

पराग ने हाथ जोड़ लिए, ‘‘अभी उठाता हूं मेरी मां, माफ करो. वैसे तुम्हारा जोर सिर्फ मुझ पर चलता है. इतना प्यार करने वाला पति मिला है पर उस की कोई कद्र नहीं है.’’

‘‘अच्छा, अच्छा, अब ज्यादा नाटक मत करो. जल्दी औफिस जाओ वरना लेट हो जाओगे.’’

‘‘औफिस तो मैं चला जाऊंगा, बट औन ए सीरियस नोट, रेवा… प्लीज इतनी इमोशनल मत बनो. जिंदगी में प्रैक्टिकल होना ही पड़ता है. तुम सीता के बारे में सोच कर इतनी परेशान हो रही हो लेकिन तुम कुछ नहीं कर पाओगी. यह उन लोगों का निजी मामला है, हम इस में कुछ नहीं कर सकते. मुझे लगता है कि तुम घर पर बैठ कर स्ट्रैस्ड हो रही हो. पहले औफिस के कामों में इतनी व्यस्त रहती थीं कि किसी और बात में ध्यान ही नहीं होता था तुम्हारा और अब… अच्छा होगा कि तुम अपने लिए कोई नई नौकरी ढूंढ़ लो. घर पर रहोगी तो फालतू बातों में उलझ रहोगी.’’

थोड़ी देर में पराग तो चला गया लेकिन रेवा गहरी सोच में डूब गई. वह हमेशा से एक कैरियर वूमन रही थी और पराग इस बात को जानता था.

वह अपनी मेहनत से कामयाबी की सीढि़यां चढ़ भी रही थी पर रिसेशन के कारण उस की नौकरी चली गई. नौकरी छूट जाने का उसे बहुत मलाल हुआ था लेकिन उसे भरोसा था कि उसे दूसरी नौकरी जल्द ही मिल जाएगी… मगर आज पराग ने उस की हताशा को गलत अर्थ में लिया था. वह कुंठित जरूर थी लेकिन सिर्फ सीता की मदद न कर पाने के कारण. रेवा ने एक लंबी सांस ली और बाहर ड्राइंगरूम में आ गई.

सीता वहां नम्रा के साथ खेल रही थी. कितना हिल गई थी नम्रा सीता के साथ… अब जब कुछ दिनों में सीता चली जाएगी तो नम्रा बहुत मिस करेगी उसे. रेवा ने सीता की ओर देखा. दुबलीपतली, श्यामवर्णा सीता परिस्थितियों के कारण समझ से चाहे परिपक्व हो चुकी हो पर थी तो आखिर बच्ची ही. इतनी नाजुक उम्र में शादी का बोझ कैसे उठा पाएगी? रेवा की सोच फिर सीता पर ही आ कर अटक गई.

सीता रेवा की कामवाली शोभा की बेटी थी. नम्रा का जन्म सिजेरियन से हुआ था. सास तो रेवा की थी नहीं, मां भी कितने दिन रहती. तब शोभा सीता को ले आई थी, ‘‘दीदी, इसे रख लो. बच्ची को संभालने में भी मदद कर देगी और ऊपर का छोटामोटा काम भी करा लेना.’’

‘‘अरे, यह तो बहुत छोटी है… यह कैसे कर पाएगी और यह स्कूल नहीं जाती है क्या?’’

‘‘स्कूल तो सुबह जाती है… 11 बजे तक आ जाएगी. काम तो यह सब कर लेती है. दूसरे घर में करती थी पर अब उन लोगों की बदली दूसरे शहर में हो गई है. आप 2-4 रोज देख लो… दिनभर आप के पास रहेगी और शाम को मेरे साथ वापस लौट जाएगी.’’

सीता ने पहले दिन से ही रेवा को प्रभावित कर दिया. उस ने धीरेधीरे नम्रा का सारा काम संभाल लिया. वह बड़े प्यार से नम्रा की मालिश कर उसे नहला देती, बोतल से दूध पिला देती, नैपी बदल देती और अपनी गोद में ही थपका कर सुला भी देती. इस के साथ ही वह रेवा को सब्जी काट देती, आटा गूंध देती और नम्रा के कपड़े धोसुखा कर तह कर देती. वह स्वभाव की भी इतनी शांत थी कि उस ने जल्द ही रेवा का विश्वास जीत लिया.

सीता के होने से रेवा नम्रा और घर के प्रति निश्चिंत हो गई थी इसलिए जब उसे नई नौकरी का औफर मिला तो उस ने शोभा से कह कर सीता को सारे दिन के लिए अपने घर रख लिया. 3 बैडरूम का फ्लैट था, रेवा ने एक कमरा सीता को दे दिया. अच्छा खानेपहनने को मिलता था तो सीता भी खुश ही थी.

सीता ने एक बार रेवा से कहा था कि वह कुछ बनना चाहती है. तब रेवा ने उसे मन लगा कर पढ़ने की सलाह दी थी. रेवा के काम का समय दोपहर से शुरू हो कर रात तक चलता था. उसे तो वर्क फ्रौम होम की सुविधा भी थी. रेवा ने इस बात का पूरा खयाल रखा कि सीता की पढ़ाई न छूटे. सीता पहले की तरह ही स्कूल जाती रही.

धीरेधीरे रेवा को सीता के प्रति एक अपनापन महसूस होने लगा. रेवा ने उस की स्कूल की कापियां देखी थीं. उसे लगता था कि सीता यदि लगन से पढ़ाई करती रहे तो अपने लिए अपनी नियति से हट कर कोई मुकाम बनाने में सक्षम हो सकती है. रेवा ने तय कर लिया था कि वह सीता की शिक्षा में हर तरीके से सहयोग करेगी.

मगर जिंदगी हमेशा पक्की सड़क पर तो आराम से नहीं चलती न… कभी कच्चे रास्तों की असुविधाएं भी सहन करनी पड़ती हैं, कभी घुमावदार रास्तों के जाल में भी उलझना पड़ता है और कभी स्पीडब्रेकर्स के ?ाटके भी लग ही जाते हैं. शोभा ने आ कर रेवा को सीता की शादी तय होने की खबर सुना दी.

‘‘अरे, ऐसे कैसे? सीता तो बहुत छोटी है अभी.’’

‘‘कहां दीदी… 16 की हो गई है. हमारे ही गांव का लड़का है, अच्छा घरपरिवार है. यह भी सुखी हो जाएगी और हम भी निबट जाएंगे.’’

‘‘शोभा, तुम भी कैसी बातें कर रही हो? इतनी छोटी उम्र में तो शादी गैरकानूनी है न और सीता का भी तो सोचो. इस नाजुक उम्र में वह शादी की जिम्मेदारी कैसे निभा पाएगी?’’

‘‘अरे दीदी, हम लोगों में तो ऐसा ही होता है. मेरा ब्याह भी तो 15 साल की उम्र में हुआ था.’’

‘‘पर शोभा इस का दिमाग अच्छा है. पढ़ने दो अभी. इस की पढ़ाई के खर्चे में मैं मदद कर दूंगी. पढ़लिख जाएगी तो जिंदगी बन जाएगी.’’

‘‘देखो दीदी, आप को हम लोगों का नहीं पता. ज्यादा पढ़ गई और उम्र बढ़ गई तो कोई नहीं मिलेगा इस से शादी करने के लिए. आप चिंता न करो. 2 महीने बाद इस का ब्याह ठहरा है. उस के पहले मैं आप को दूसरी कामवाली लगा दूंगी,’’ कह कर शोभा ने बात खत्म कर दी.

शोभा की बातें सुनने के बाद रेवा क्या कहती? वह मन मसोस कर चुप रह गई.

‘‘दीदी, नम्रा सो गई है. कौन सी सब्जी काटनी है?’’

रेवा ने महसूस किया कि जब से सीता का विवाह तय हुआ था तब से उस के व्यवहार में परिवर्तन आना शुरू हुआ था. वह सारे काम जैसे यंत्रवत करती…ध्यान तो उस का किसी और ही दुनिया में होता. हमेशा खोईखोई रहती, अपने ही खयालों में. पढ़ाई में भी उस का मन नहीं लगता था पहले की तरह. रेवा ने सोचा आज उस के मन को टटोल ले.

‘‘क्यों सीता… तू तो कहती थी तुझे पढ़ना है, कुछ बनना है. तेरी मां तो तेरी शादी करा रही है. तू मना क्यों नहीं करती?’’

‘‘क्या बोलेंगे, दीदी? अब कामवाली के घर पैदा हुए हैं तो कामवाली ही बनेंगे. ऊंची पढ़ाई में खर्चा भी तो बहुत होता है. आप का भी कितना एहसान लेंगे और फिर शादी भी तो जरूरी है. सारी उम्र अकेले कैसे रहेंगे?’’

रेवा चुप रह गई. वह सोचती थी कि सीता अपनी नियति के चक्रव्यूह को तोड़ गिराएगी लेकिन अब जब उस ने स्वयं ही अपने लिए यह रास्ता चुन लिया था तो रेवा कर भी क्या सकती थी?

‘‘दीदी, आप मां से कुछ न कहा कीजिए. मेरी हिस्से में यही लिखा है और मैं बहुत खुश हूं. आप को पता है. घर में सब बहुत खुश हैं. मां ने तैयारी करनी भी शुरू कर दी है. इसी बहाने आज सब को मेरा खयाल है नहीं तो कब मैं सूखी रोटी के टुकड़ों और फटेपुराने कपड़ों में बड़ी हो गई, किसी को पता ही नहीं चला. अब 2-4 जोड़ी ही सही, मेरे लिए नए कपड़े बनेंगे. मां मेरे लिए सोने के  जेवर बनवाएगी. फिर चाहे मेरे ही कमाए पैसों को जोड़ कर. सब सीतासीता कर के पूछेंगे. दीदी, एक गरीब की लड़की को इस से ज्यादा और क्या खुशी मिल सकती है?’’

रेवा फिर चुप रह गई. एक स्त्री के मन की गहराइयों में क्या है, यह खुद उस के अलावा कोई नहीं जान सकता. परिस्थितियों से समझौता करना और चंद लमहों की खुशियों को अपने जेहन में कैद कर उन्हीं के सहारे जिंदगी को आगे बढ़ाना, यह सिर्फ एक स्त्री ही कर सकती है. सीता की सोच के सिरे को पकड़ कर उस के मन की तहों को खोल कर रेवा को लगा कि कम से कम इतनी खुशी पाने का अधिकार तो था ही उसे. अपनी ही जिंदगी की पटकथा में हमेशा छोटेमोटे किरदार ही निभाती आई थी सीता. अब चंद लमहों के लिए ही सही, नायिका बनने की उस की हसरत कहां गलत थी.

शाम को ही बाजार जा कर रेवा सीता के लिए शादी की साड़ी और सोने की अंगूठी ले आई. उपहार देख कर सीता के चेहरे पर जो खुशी आई, उस से रेवा को भी जैसे आत्मिक तृप्ति का एहसास हुआ. वह दिल से सीता की खुशी चाहती थी.

रेवा नम्रा को ले कर बहुत पशोपेश में थी. सीता के रहते उसे नम्रा की कोई फिक्र नहीं होती थी लेकिन सीता के जाने के बाद नम्रा को वैसी देखभाल कौन देता? वह सोच ही रही थी कि एक दिन अचानक शोभा मायूस सूरत ले कर दरवाजे पर खड़ी थी, ‘‘इस लड़की के हिस्से शादी नहीं है… लड़का शादी से पहले ही भाग गया. किसी और से चक्कर था उस का. अब पता नहीं इस से कौन शादी करेगा? दीदी, अब यह आप का काम छोड़ कर नहीं जाएगी.’’

जीवन फिर पुराने रूटीन पर चल पड़ा लेकिन सीता में अब थोड़ा बदलाव आ गया था. वह पहले से कम बोलती और अपनी पढ़ाई पर अत्यधिक केंद्रित हो चुकी थी. रेवा को लगा कि जो हुआ शायद अच्छा ही हुआ. अब वह सीता के भविष्य को संवारने में उस की मदद करेगी. यह सोच कर रेवा सीता को बहुत प्रोत्साहित करती.

एक रात रेवा देर तक अपने लैपटौप पर काम कर रही थी. प्यास लगने पर पानी लेने उठी तो देखा कि सीता के कमरे की लाइट जल रही है. इतनी रात को सीता जाग क्यों रही है… रेवा ने धीरे से दरवाजा खोल कर अंदर झांका तो हैरान रह गई.सीता शादी का जोड़ा और तमाम गहने पहने खुद को बड़ी हसरत से आईने में निहार रही थी.

रेवा ज्यादा देर वहां न खड़ी रह पाई. उस कमरे में कुछ दबी आकांक्षाएं थीं, कुछ अधूरे खवाब थे. समाज ने उस मासूम को यही यकीन दिलाया था कि चंद लमहों की नायिका बनना ही उस के जीवन की उपलब्धि थी.

अब रेवा की जिम्मेदारी बढ़ गई थी. उसे सीता को यह विश्वास दिलाना था कि वह सक्षम है अपने जीवन की पटकथा खुद लिखने के लिए और ताउम्र उस में नायिका का किरदार निभाने के लिए. रेवा ने अपने मन को इस संकल्प के लिए दृढ़ कर लिया.

ऐसा तो नहीं सोचा था

‘‘फोन की घंटी बज रही है, उठो,’’ सुबह का समय है, सर्दियों के दिन हैं. इस समय गरमगरम रजाई से निकल कर फोन उठाना एक आफत का काम है. मोबाइल में सिगनल नदारद रहता है तब पुराना लैंडलाइन फोन ही काम आता है. पति को सोता देख कर झल्ला कर ममता को ही उठ कर फोन उठाना पड़ा. हालांकि ममता को मालूम था, आज रविवार सुबह बच्चों का ही फोन होगा. अब किस का होगा, यह तो फोन उठाने पर ही मालूम होगा.

ममता ने फोन उठाया और बातों में मशगूल हो गई. आज उस की बेटी सुकन्या का फोन था. उस से ढेरों बातें होने लगीं. बृजमोहन भी उठ कर आ गए, फिर बेटी और दामाद से उन की भी बातें हुईं. आखिर घूमफिर कर वही बातें होती हैं, क्या हाल है? बच्चे कैसे हैं? छुट्टी में इंडिया आओगे? आज कौन सी दालसब्जी बनी है या बनेगी? मौसम का क्या हाल है?

पड़ोसियों की शिकायत, सब यही कुछ. सुकन्या को भी पड़ोसियों की बातें सुनने में

मजा आता था. ममता भी वही बातें दोहराती,

सारी पड़ोसिनें जलती हैं. पूरा 1 घंटा ममता और बृजमोहन का व्यतीत हो गया. सुबह 6 से 7 बज गए.

ममता और बृजमोहन के 3 बच्चे, सब से बड़ी लड़की सुकन्या फिर छोटे लड़का गौरव और फिर सौरभ. सभी अमेरिका में सैटल हैं. सभी शादीशुदा अपने बच्चों के साथ अमेरिका के विभिन्न शहरों में बसे हुए हैं.

सुकन्या खूबसूरत थी. एक पारिवारिक विवाह में दूर के रिश्ते में अमेरिका में बसे लड़के को पहली नजर में भा गई और फिर विवाह के बाद अमेरिका चली गई. कुछ समय बाद दोनों लड़के भी अमेरिका सैटल हो गए.

अब ममता और बृजमोहन दिल्ली में अकेले एक तिमंजिला मकान में रह रहे हैं. आर्थिक रूप से संपन्न बृजमोहन की कपड़े की दुकान थी जिसे वे आज भी चला रहे हैं. कभीकभी बच्चे मिलने आ जाते हैं और कभी वे बच्चों के पास मिलने चले जाते हैं.

अब बिना किसी बंधन के अकेले रहने का सुख भी बहुत है. ममता कुछ नखरैल अधिक हो गई. जब आर्थिक संपन्नता हो तब चिंता किस बात की.

बृजमोहन का हर सुबह कालोनी के मंदिर जाने की दिनचर्या है. अकेले समय भी काटना है, मंदिर में चंदा दे दिया और धार्मिक कार्यों में मुख्य अतिथि का तमगा मिल जाता.

‘‘पंडित रामराम,’’ मंदिर में घुसते ही बृजमोहन ने आवाज दी.

‘‘रामराम सेठजी,’’ पंडित भी आरती के बीच में बोल पड़ा. मंदिर में उपस्थित श्रद्धालुओं में कुछ मुसकरा दिए और कुछ की भृकुटियां तन गईं. यह क्या? सेठ होगा अपने घर में. मंदिर में भगवान के आगे सब बराबर हैं. चंदा ज्यादा देता है, इस का यह मतलब तो नहीं आरती में विघ्न डालेगा. आरती के बाद बात नहीं कर सकता है. पंडित को चंदा चाहिए, प्रभु की प्रतिमा से चंदा मिलेगा नहीं, देना सेठ ने है, अब उन की कुछ तो जीहुजूरी बनती है.

‘जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी,’ सेठ जी नवरात्रि आ रही हैं, पूरे मंदिर को लाइट्स से रोशन करना है.

‘‘सम?ा हो गया पंडित. लाइट्स मेरी तरफ से. अभी ताजेताजे डौलर आए हैं. डौलर भी महंगा है,’’ बृजमोहन सब को यह जताना चाहते हैं, लड़के ने कल ही डालरों की एक खेप भेजी है. उन के लड़के कितना खयाल रखते हैं.

‘‘‘मांग सिंदूर विराजत टीको मृदमद को,’ सेठजी भंडारा भी हर रोज होगा.’’

‘‘पंडित, मेरी जेब काट ले, सबकुछ मेरे से करवाएगा? भंडारे का नहीं दूंगा. लाइट्स लगवा रहा हूं वह क्या कम है?’’ बृजमोहन ने दो टूक मना कर दिया. पैसों के बड़े पक्का इंसान थे. पाईपाई का हिसाब रखते थे.

‘‘‘चंड मुंड संहारे शोणित बीज हरे,’ सेठजी हर शाम मंदिर में कीर्तन भी होगा.’’

‘‘पंडित कर कीर्तन, तेरा काम है. मैं तो कीर्तन करूंगा नहीं?’’ बृजमोहन ने आरती में सुर लगाया.

‘‘‘तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता,’ सेठजी माता रानी से डरो, तुम ही भरता हो, कीर्तन के बाद प्रसाद भी बांटना है,’’ पंडित उन की जेब ढीली करवाने पर तुला था.

‘‘‘कहत शिवानंद स्वामी, सुख संपत्ति पावे,’ सेठजी और डौलर आएंगे, प्रसाद का प्रबंध तो आप के जिम्मे है,’’ पंडित भी कौन से कम होते हैं, उन को भी हजार तरीके आते हैं.

‘‘पंडित अष्ठमी वाले कीर्तन का प्रसाद दे दूंगा. तू भी क्या याद करेगा पंडित, किसी रईस से पाला पड़ा है.’’

आरती समाप्ति के बाद पंडित ने मुंह ही मुंह में कहा, ‘‘इन की जेब से पैसे निकलवाने का मतलब ऐवरैस्ट की चोटी पर चढ़ने के बराबर है.

मंदिर में पंडित और अन्य श्रद्धालुओं के साथ कुछ बातचीत, कुछ गपशप लगाने के बाद बृजमोहन घर वापस आए और नाश्ता करने के बाद कालोनी के पार्क में चक्कर लगाने चले गए. शाम के समय 1-1 कर के बेटों का फोन आया. ममता ने नवरात्रि पर पूजाअर्चना की विशेष हिदायत दी.

‘‘चलो कोटपैंट पहन लो, रविवार छुट्टी के दिन घर पर डिनर नहीं करना है,’’ ममता ने और्डर दे दिया.

हर रविवार शाम को मौल घूम कर रैस्टोरैंट में डिनर करना उन की आदत थी. सिर्फ 2 जने. उम्र 70 के करीब, खुद कार चला कर मौल जाते हैं. लौटते समय कार ट्रैफिक सिगनल पर बंद हो गई. ग्रीन लाइट हुई, तब स्टार्ट करने में दिक्कत हुई. पीछे खड़े वाहनों ने बारबार हौर्न बजाने चालू कर दिए.

‘‘देखो इस खटारा को बदल दो. एक बार बंद हो जाए तब स्टार्ट ही नहीं होती है. हमारी लाइन में सब के पास चमचमाती नई कारें हैं,

बड़ी वाली और हम खटारा ले कर घूम रहे हैं. मैं पड़ोस में और हंसी नहीं उड़वा सकती हूं. देखो अगले हफ्ते से नवरात्रि आरंभ हो रहे हैं.

नई कार घर में आनी चाहिए और वह भी बड़ी वाली.’’ बृजमोहन दुनिया के आगे अपनी जेब सिल कर रखते थे, परंतु परमप्रिय ममता के आगे सदा खुली रहती थी. बिलकुल चूंचपड़ नहीं करते थे.

जब 4-5 सैल्फ मारने पर कार स्टार्ट हुई, बृजमोहन ने पक्का वाला प्रौमिस कर दिया, ‘‘बिलकुल ममता, इस बार बड़ी वाली कार खरीदते हैं.’’

पिछले 15 वर्ष से बच्चों से अलग रह रहे ममता और बृजमोहन को अकेले रहना रस आने लगा था.

न बच्चों की चिकचिक न कोई बंधन, जो दिल में हो, करो. संपूर्ण आजादी में रह रहे दंपती को किसी का दखल पसंद नहीं था.

बृजमोहन और ममता बेफिक्र आजादी के संग अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे. आराम से सुबह उठना, पार्क में सुबह की सैर करना उन की दिनचर्या थी. ममता अपनी किट्टी पार्टी में मस्त रहती. बृजमोहन आराम से 11 बजे दुकान जाने के लिए निकलते थे. उन के बच्चे उन को डौलर भेजते थे फिर भी अपनी दुकान बंद नहीं की. आरामपरस्त होने के कारण उन की दुकानदारी कम हो गई थी, किंतु उन को इस की कोई चिंता नहीं थी. एक पुराना विश्वासपात्र नौकर था. वही दुकान संभालता था. पड़ोस के दुकानदार उस से कहते कि असली मालिक तो तू ही है. देख लेना, मरने पर दुकान तेरे नाम लिख कर जाएंगे.

नौकर भी हंस देता. मजाक करने का कोई टैक्स नहीं लगता है. एक बात पक्की है, बृजमोहन दुकान को अपने साथ बांध कर ले जाएंगे. नौकर अपने मालिक की हर रग से वाकिफ था.

हर जगह सुपर मार्केट और स्टोर खुलने से महल्ले की छोटी परचून की दुकानों का कामधंधा गिरने लगा. आज की युवा पीढ़ी हर छोटे से बड़ा सामान औनलाइन खरीदती है. ऊपर से इन सुपर स्टोर्स ने छोटी दुकानों का धंधा लगभग चौपट ही कर दिया. इसी कारण बृजमोहन के मकान के करीब एक परचून की दुकान बंद हो गई.

एक शाम बृजमोहन अपनी दुकान से लौटे तो उस परचून के मालिक ने बृजमोहन को लपक कर पकड़ लिया, ‘‘सेठजी, रामराम.’’

‘‘रामराम तो ठीक है, तूने दुकान बंद क्यों कर रखी है? पहले तो रात के 10 बजे तक दुकान खोलता था?’’

‘‘अब क्या बताऊं सेठजी, इन औनलाइन और सुपर स्टोर्स की वजह से धंधा चौपट हो गया. दुकान बंद कर दी है. सारा स्टाक खरीद रेट पर बेच रहा हूं. खरीद लो, आप का फायदा ही सोच रहा हूं.’’

बृजमोहन ने सस्ते में 2 महीने का राशन खरीद लिया.

ममता राशन समेटने में लग गई, ‘‘किस ने कहा था, उस की दुकान खरीद लो. 2 महीने का राशन जमा हो गया है. हम 2 जने हैं, हमारे से अधिक तो चूहे खा जाएंगे. असली मौज तो उन की लगेगी,’’ ममता ने तुनक कर कहा.

‘‘भाग्यवान, आधे दाम पर सारा सामान खरीदा है, थोड़ा चूहे खा भी जाएंगे तब भी शुद्ध लाभ ही होगा. खाने दो चूहों को, अब क्या करें, ऐसा सौदा हर रोज नहीं मिलता.’’

‘‘हम दो जने हैं, कितना खाएंगे? चूहों की मौज रहेगी.’’

ममता बृजमोहन की कंजूसी पर परेशान रहती थी. जब बच्चे डालर भेजते हैं तब आराम

से बुढ़ापे में ऐश से रहें. इसी कारण ममता टोकाटाकी करती थी, जिस से बृजमोहन परेशान हो जाते थे.

सस्ता राशन खरीद कर बृजमोहन अपनी ताल खुद ठोंक रहे थे. ममता इस बात पर परेशान थी, कामवाली बाई 2 दिन से नहीं आ रही है. सारा राशन कौन संभालेगा. किसी नए नौकर को घर में कैसे घुसा लें? खैर, कामवाली बाई 2 दिन छुट्टी की बोल गई, 1 हफ्ते बाद आई. 1 सप्ताह ममता का भेजा एकदम फ्राई ही रहा.

बृजमोहन को इस का यह लाभ मिला कि ममता नई कार खरीदना भूल गई. ममता का भेजा बच्चों से फोन पर बात कर के खुश हो गया. वे कुशलमंगल हैं और अपनी कामवाली का नहीं आना भी भूल सी गई.

दोनों का जीवन सरलता से बीत रहा था. दिन बीतते गए लेकिन उम्र ंका तकाजा था जो कभी नहीं सोचा था, वही हो गया.

एक रात नींद में बृजमोहन को बेचैनी महसूस हुई और इससे पहले वे पास लेटी ममता को हाथ लगाता या फिर आवाज दे कर पुकारता, उस की जीवनलीला समाप्त हो गई. थोड़ी नींद खुली, थोड़ी तड़पन हुई और फिर जीवनसाथी को छोड़ दूसरे लोक की सैर को निकल पड़े.

ममता ने यह कभी नहीं सोचा था. अभी तो वह नींद में थी. उस का जीवनसाथी अब उस का नहीं रहा, इस का इल्म उस को नहीं था. 70 की उम्र में रात को 2-3 बार नींद खुलती है, करवट बदल कर देखा, बृजमोहन सो रहा है, बस इतना पूछा, ‘‘सो रहे हो?’’ बिना कोई उत्तर सुने फिर आंखें बंद कर लेती, यही हर रात की कहानी थी.

ममता सुबह उठी, नित्यक्रिया से निबट कर चाय बनाई और बृजमोहन को आवाज दी, ‘‘उठो.’’

बृजमोहन नहीं उठा. ममता ने हाथ लगाया, बृजमोहन का मुंह खुला था, कोई सांस नहीं, उस का कलेजा धक से थम गया.

‘‘बृज क्या हुआ? बृज,’’ लेकिन बृज का शरीर अकड़ गया था. बदहवास ममता घर से बाहर आई और पड़ोस का दरवाजा खटखटाया.

बदहवास ममता को देख पड़ोसी रमन घबरा गया ‘‘क्या हुआ भाभी जी?’’

‘‘भाई साहब इन को देखो, मालूम नहीं क्या हुआ है, बोल ही नहीं रहे हैं.’’

रमन तुरंत ममता के संग हो लिए. बृज को देखते ही उन्होंने तुरंत अस्पताल फोन कर के ऐंबुलैंस बुलाई. अस्पताल जाना मात्र औपचारिकता ही थीं. तुरंत ईसीजी कर के आईसीयू में डाल दिया.

अस्पताल के वेटिंगरूम में अकेली बैठी ममता आंसुओं में डूबी सोच रही थी. ऐसा नहीं सोचा था, बृज की यह हालत होगी और मैं अकेली कुछ करने में भी असमर्थ हूं. कोई साथ नहीं है. 3 बच्चे हैं, 2 बहुएं, 1 दामाद, 6 पोते, पोतियां, दोतेदोतियां, इस दुख की घड़ी में कोई साथ नहीं है. अकेली किस को पुकारे. बच्चे बाहर विदेश में सैटल हैं, खुश थी, बूढ़ाबूढ़ी पिछले 15 वर्षों से बिना रोकटोक के आनंद से जी रहे थे.

बृज को हार्ट अटैक हुआ था और चुपचाप चल बसा. अस्पताल ने पूरा एक दिन रोक लिया और रात को उस की मृत्यु घोषित की. पड़ोसी रमन ने अस्पताल में 2 चक्कर लगा कर चाय खाना ममता को दिया.

2 पड़ोसी और भी ममता से हालचाल पूछने आ गए. नहीं था तो कोई अपना. जिस आजादी को वह अपनी जीत सम?ाती थी, वह आज पराजय थी. ममता ने बच्चों को सूचना दी. बच्चे 7 समंदर पार से सिर्फ सांत्वना ही दे सकते थे. कोई इस संकट की घड़ी में उस की मदद के लिए 7 समंदर पार से उड़ कर आ नहीं सकता था. पड़ोसी अवश्य उन के संग खड़े थे. पड़ोसियों संग रोतीबिलखती ममता घर आ गई.

ममता ने बच्चों को फोन किया. बड़े लड़के गौरव ने आने का तुरंत कार्यक्रम बनाया. किसी भी हालात में वह 2 दिन से पहले नहीं आ सकता था. ममता और बृजमोहन, दोनों की बहनें शहर में रहती थीं, वे ममता के पास पहुंचीं और सांत्वना दी.

रात के अंधेरे में ममता अपने बिस्तर पर लेटे रोती जा रही थी. ऐसा तो नहीं सोचा था. ऐसा समय अचानक से आ जाएगा और कोई अपना साथ नहीं होगा. बहनें भी सिर्फ दिखावे के आंसू बहा रही थीं. ममता चिल्लाए जा रही थी, ‘‘इतना बड़ा परिवार है, बच्चे पास नहीं. भाई, बहन, कोई सगा नहीं. क्या जमाना आ गया है? मुसीबत की घड़ी में सिर्फ नाममात्र का दिखावा. हिम्मत देने वाला कोई बच्चा भी नहीं है. ऐसा तो नहीं सोचा था. आगे का जीवन कैसे कटेगा?’’

रात के सन्नाटे में ममता की आवाज बहनों के कानों में पड़ रही थी, लेकिन वे मन ही मन मुसकरा रही थीं, यहां अकेले रह कर खूब मजे लिए. हम पर रोब झड़ती थी कि बच्चे डौलर भेज रहे हैं. डौलर के साथ रहो. कितनी बार कहा था, बच्चों के साथ अमेरिका रहों लेकिन आजाद जीवन प्यारा था. हम क्या करें? हमारा नाता तो केवल श्मशान तक का है. उस के बाद इस नखरैल के साथ कौन रहेगा? बुढ़ापे में भी पूरी आजादी चाहिए. बच्चों संग नहीं रहना. हर किसी पर रोब झड़ना है.

तीसरे दिन उस का लड़का गौरव अमेरिका से आया. उस की बहू और परिवार का अन्य सदस्य नहीं आया. सीधे एअरपोर्ट से अस्पताल. मृत देह का श्मशान ले जा कर अंतिम संस्कार किया. घर

पहुंच कर ममता से कहा, ‘‘चलो मां, मेरे साथ चलो. मैं टिकट ले कर आया हूं. तुम्हारा वीजा अभी 1 महीने तक वैध है. वहां बढ़ जाएगा.’’

‘‘क्रिया यहां कर ले, फिर चलती हूं,’’ ममता की आंखों से गंगाजमुना बह रही थी कि वह बस यही बुदबुदा रही थी. ऐसा तो नहीं सोचा था. आजादी चली जाएगी. अकेली रह जाऊंगी. मालूम नहीं अमेरिका में बच्चे कैसा व्यवहार करेंगे.

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