Home Security Tips: सुरक्षित घर सुखद यात्रा

Home Security Tips: त्योहार का मौसम हो या छुट्टियों का, कहीं घूमने जाने का या फिर अपनों से मिलने का मन तो करता ही है. किंतु कई बार हम घर की ओर बिना ध्यान दिए आननफानन में पैकिंग कर निकल जाते हैं. नतीजतन वापस आने के बाद या तो कोई बड़ा नुकसान हो जाता है या फिर घर बहुत गंदा और अव्यवस्थित मिलता है, जिस से आने के बाद बेहद तनाव और परेशानी का सामना करना पड़ता है, साथ ही घूमने के क्षणों को याद कर खुशी का एहसास भी न के बराबर रह जाता है.

सरिता भाभी की पोती का जन्मदिन था. बेटेबहू के आग्रह पर दिल्ली से 4-5 दिनों के लिए पति संग देहरादून चली गईं. कुछ दिनों में तो आ ही जाऊंगी यही सोच घर भलीभांति न तो बंद किया, न ही घर में रखे जेवरात व नक्दी बैंक में रख कर गईं. दोनों देहरादून से वापस आए तो घर का पीछे का दरवाजा टूटा था व कमरे की खिड़की के रास्ते अंदर जा कर अज्ञात लोग काफी सामान ले जा चुके थे. अब सिवा पछताने के कुछ भी हासिल नहीं हो सकता था. बस भविष्य के लिए सबक मिल गया कि आगे से घर को ध्यान से बंद कर के जाएंगे ताकि भविष्य में ऐसा नुकसान न हो.

मेरी एक और परिचित है रविवार सुबह प्रोगाम बना कि आज पूरा दिन सुबह से शाम तक घूमा जाएं, मस्ती की जाए. फिर क्या था, फटाफट नाश्ता किया, तैयार हुए और निकल गए. जब रात को वापस आए तो दरवाजा खोलते ही हक्केबक्के रह गए. सारे घर में पानी भरा था.

जल्दबाजी में उन की बेटी नहाकर आई तो बाथरूम का नल खुला छोड़ दिया था, जिसे  चलते वक्त किसी ने चैक नहीं किया. थोड़ी सी लापरवाही से जहां घर में रखे सामान का पानी भरने से नुकसान हुआ वहीं पानी निकालने में भी अच्छीखासी मेहनत करने पड़ी. घूमने का सारा मजा क्षणभर में ही खत्म हो गया.

ऐसी स्थिति का सामना जीवन में न ही करना पड़े इस के लिए कहीं घूमने जाने से पहले निम्न बातों का ध्यान अवश्य रखें ताकि वापस आने पर साफ और सुरक्षित घर देख आप की खुशियां दोगुनी हो जाएं:

– आप जहां जा रहे हैं अथवा जाना चाह रहे हैं, वहां से संबंधित आवश्यक जानकारी साथ ले कर जाएं. सारा इंतजाम पहले से समयानुसार कर लें ताकि किसी तरह की असुविधा न हो और अपनी छुट्टियां मनमाफिक तनावरहित बिता सकें.

– घर से बाहर जाने से पहले जितने भी खिड़कीदरवाजे हैं उन्हें जाली सहित बंद कर दें,

– ऐसा करने से आप के न रहने पर जहां धूलमिट्टी आने से घर गंदा नहीं होगा वहीं सुरक्षा की दृष्टि से भी बेहतर रहेगा. घर के बाहर तथा पीछे की तरफ खुलने वाले दरवाजे ध्यान से बंद कर ताले लगा दें, सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर रहेगा, साथ ही किसी अन्य को न कह स्वयं ही सब नल बंद करें और वाटर सप्लाई पंप का कनैक्शन भी बंद है कि नहीं, अवश्य चैक कर लें.

– माइको सर्किट बेकर (एमसीबी), जिसे मिनिएचर सर्किट बे्रकर भी कहा जाता है, एक विद्युत सुरक्षा उपकरण है जो ओवरलोड या शौर्ट सर्किट से बचाता है. यह स्वचालित रूप से सर्किट को बंद कर देता है, जब विद्युतधारा एक निश्चित स्तर से अधिक हो जाती है, जिस से उपकरण और तारों को नुकसान से बचाया जा सकता है. सभी विद्युत उपकरणों टीवी, कंप्यूटर आदि को अनप्लग करें व सुनिश्चित कर के ही जाएं  कि कोई भी उपकरण बिजली से जुड़ा न हो. वापस आने पर सभी उपकरणों को वापस लगा कर एमसीबी चालू करें.

– अपने घर में हर जगह सैंसर लगाएं जिन में दरवाजा सैंसर, खिड़की सैंसर और कांच तोड़ने वाले सैंसर शािमल हैं.

– सिस्टम में जो भी सुरक्षा कैमरे शािमल हैं, उन्हें अपने सामने के प्रवेशद्वार और मुख्य रहने वाले क्षेत्र जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में रखें. जब आप अपने सुरक्षा कैमरे लगाते हैं तो सुनिश्चित करें कि आप उन सभी कोनों को कवर करें जहां कोई व्यक्ति दरवाजे या खिड़की से घुसता हुआ दिखाई दे सकता है.

– कुछ अतिरिक्त कदम भी उठाए जा सकते हैं जैसेकि रात में लाइट चालू रखना, इस के अलावा रेडियो या टीवी चालू रखने के लिए टाइमर स्विच का उपयोग भी किया जा सकता है. अपने घर की देखभाल के लिए किसी भरोसेमंद व्यक्ति को कहना और उस से लगातार फोन पर संपर्क में रहना. इस से आप की घनिष्ठता को भी बढ़ावा मिलता है.

– सुरक्षा की दृष्टि से यह भी जांच करें कि अलार्म काम कर रहे हैं या नहीं, आप की सुरक्षा स्थापनाएं चुस्तदुरुस्त हैं या नहीं, आग बु झाने वाले यंत्रों में वह दबाव है जिस की उन्हें जरूरत है आदि.

– घनी, कांटेदार  झाडि़यां या हैजेज भी आप के घर में न रहने पर बाहरी व्यक्ति को अंदर आने से काफी हद तक रोकती हैं, इसलिए अपने घर के आसपास इन्हें अवश्य लगाएं. एक अहम बात कि कहीं जाने से पहले अपने कीमती सामान की तसवीरें लें और उन पर अपना पोस्टकोड और घर का नंबर लिख कर

– सुरक्षाचिह्न लगा दें. कहीं कभी आप के न रहने पर चोरी आदि हो भी जाए तो पुलिस को चोरी हुए सामान को बरामद करने मे मदद मिल सके व आप को अपना सामान वापस पाने की संभावना बढ़ सके. तसवीरें लेने से बीमा पर दावा करना भी आसान हो जाएगा.

– कहीं बाहर जाने से पहले घर में रखे नक्द रुपए व गहने लौकर में रख कर जाएं. बाहर जाने से पहले अखबार अथवा दूध से संबंधित व्यक्ति या फिर जिन का रोजाना किसी न किसी कारण घर में आनाजाना रहता हो, आवश्यकतानुसार अपने न रहने की सूचना दे दें ताकि बेवजह का आवागमन रुक सके.

– जहां तक संभव हो फर्नीचर और सजावटी सामान पर कोई कपड़ा या अखबार ढक दे, ताकि घूम कर आने के बाद सफाई करने में ज्यादा दिक्कत का सामना न करना पड़े. कमरे या रसोईघर में जो भी अलमारी या वार्डरोब है उसे भलीभांति बंद कर दें पर आप के न रहने पर कीड़ेमकोड़े उस में प्रवेश न करें. कई बार खाने के सामान अलमारी खुली रहने से छोटेछोटे कीड़े खाद्यपदार्थों में आ जाते हैं व उन्हें प्रदूषित कर देते हैं.

– फ्रिज में ऐसा कोई खाने का सामान न छोड़ कर जाएं जो आने तक खराब हो जाए. इस के अतिरिक्त ज्यादा दिन के लिए जा रहे हों तो रसोईघर में भी ऐसा कोई मसाला या खाने का सामान न छोड़ कर जाएं जो जल्दी खराब होने वाला हो. रास्ते में उपयोग आने के लिए खानेपीने का सामान व कुछ महत्त्वपूर्ण दवाइयां अवश्य साथ रख लें और जहां जा रहे हैं वहां के मौसम अनुसार कपड़ों का चयन भी सोचसम झ कर करें ताकि घूमने का बिना परेशानी भरपूर आनंद ले लिया जा सके.

– अपने घर को सुरक्षित रखने के लिए सिर्फ सिस्टम और लौक के बारे में ही जानकारी पर्याप्त नहीं है वरन इस बात से भी सुरक्षा

जुड़ी होती है कि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी कैसे जीते हैं? हम सभी को अपने घूमनेफिरने जाने के बारे में बताने की आदत है, लेकिन इस प्रक्रिया में हम अपराधियों को भी यह बता देते हैं कि हमारा घर खाली है. इसलिए अपन द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ऐप्स और सोशल मीडिया पर अपनी प्राइवेसी सैटिंग पर नजर रखें.

– जाने से पहले घर व्यवस्थित कर ही जाएं न कि इतना अव्यवस्थित छोड़ जाएं कि आते ही आप की खुशियां घर को देख कम हो जाएं व समझ ही न सकें कि घर व्यवस्थित करना कहां से शुरू करें और कहां खत्म?

Home Security Tips

Special Recipes: ठंडी शामों का परफेक्ट स्नैक और बच्चों के लिए डेजर्ट

Special Recipes

‘तिल की चिक्की तो बहुत खा ली अब जरा यह बना कर देखें.’

तिल हौट पौट

सामग्री

– 2 आलू उबले

– 50 ग्राम नूडल्स उबले

– 50 ग्राम पत्तागोभी कद्दूकस की

– 4 बड़े चम्मच प्याज कटा

–  हरी व लाल मिर्च स्वादानुसार

– 1/2 छोटा चम्मच अमचूर

– 11/2 छोटे चम्मच कौर्नफ्लोर

– 1/4 कटोरी मैदे का घोल

– 3 कलियां लहसुन

– थोड़ा सा लाल, औरेंज कलर

– थोड़ा सा तेल तलने के लिए

– नमक स्वादानुसार.

विधि

आलुओं को कद्दूकस कर के उन में नमक, कौर्नफ्लोर, मिर्च व अमचूर डाल कर अच्छी तरह मिक्स कर लें. मैदे के घोल में कलर मिक्स कर लें. नूडल्स में प्याजलहसुन व पत्तागोभी मिला लें. हलका सा नमक व मिर्च मिला लें. 2 बड़े चम्मच पीठी हाथ पर फैला कर उस में नूडल्स मिक्सचर भर के चारों तरफ से बंद कर दें. फिर मैदे के घोल में डुबो कर पेड़े को तिल में लपेट गरम तेल में सुनहरा होने तक तल लें. इसी तरह सारे तैयार कर चटनी के साथ गरमगरम सर्व करें.

‘अब जरा बच्चों के मन का भी कुछ हो जाए.’

क्रीमी ट्रूफल पुडिंग

सामग्री

– थोड़ा सा स्पंज केक – व्हिपिंग क्रीम – 1 कप मिक्स फू्रट केला, अनार, बब्बूगोसा,

सेब, अंगूर – थोड़ा सा वैनिला कस्टर्ड पाउडर – थोड़ा सा पीला, लाल फूड कलर

– 1 गिलास दूध  – चीनी या शहद स्वादानुसार.

विधि

दूध में  से 3-4 छोटे चम्मच दूध एक कटोरी में निकाल कर बाकी दूध एक फ्राइंगपैन में डाल कर उबलने रखें. जब दूध उबलने लगे तो आंच धीमी कर दें. कस्टर्ड पाउडर को निकाले दूध में घोल कर दूध को चलाते हुए उस में मिला दें. 5 मिनट पका कर आंच से उतार कर ठंडा होने दें. व्हिपिंग क्रीम बीट में क्रीम भर लें. अलगअलग कलर की तैयार कर लें. एक सर्विंग बाउल में स्पंज केक के टुकड़े कर के लगा लें. ऊपर से फू्रट्स सजा कस्टर्ड फैला दें. फिर अलगअलग कलर की क्रीम से सजा कर फ्रिज में चिल्ड कर सर्व करें.    Special Recipes

Winter Season: सर्दियों में जायकेदार रैसिपीज ट्राई जरूर करें

Winter Season

कौर्न कौस्तिनी

सामग्री

– 2 ब्रैड

– 2 चम्मच मक्खन

– 1 टमाटर

– 1 खीरा

– 1 कप पत्तागोभी

– 1-1 लाल, हरी व पीली शिमलामिर्च

– चाटमसाला स्वादानुसार

– 1/2 कप कौर्न उबले

– कालीमिर्च पाउडर स्वादानुसार.

विधि

धीमी आंच पर तवा गरम कर ब्रैड को सुखा लें. इस से वह कुरकुरी हो जाएगी. टमाटर के बीज निकाल कर 2 टुकड़े कर लें. पत्तागोभी और तीनों शिमलामिर्च को भी बीज निकाल कर काट लें. फ्राइंगपैन में 1/2 चम्मच मक्खन डाल कर हलका सा सौफ्ट होने पर शैलो फ्राई कर लें. ब्रैड के छोटेछोटे टुकड़े करें. इस में सारी सामग्री मिला लें. ऊपर से चाटमसाला व कालीमिर्च पाउडर बुरक तुरंत सर्व करें.

‘मिल्क, कोकोनट और क्रीम से बना यह स्वादा सभी को पसंद आएगा.’

स्वीट्स डिलाइट

सामग्री      

– 1 कप मिल्क पाउडर

– 1 कप नारियल पाउडर

–  4-5 छोटे चम्मच क्रीम

– 1 कप बूरा

–  कुछ बूंदें गुलाबजल

– थोड़ा सा लाल फूड कलर

– 10-12 काजू कटे हुए.

विधि

बूरा, मिल्क पाउडर, नारियल पाउडर और क्रीम को अच्छी तरह आटे की तरह कड़ा गूंध लें. फिर इस में से आधा अलग निकाल लें. इस में लाल कलर मिला लें. फिर गुलाबजल मिक्स कर लें. काजुओं के सफेद हिस्सों के नीचे भी और ऊपर भी पौलिथीन लगा कर लंबे डंडे की तरह उतना ही लंबा बना लें जितनी सफेद हिस्से की रोटी की चौड़ाई हो. लंबे लाल डंडे को रोटी पर रख कर रोटी में लपेट दें. अब अंदर लाल बाहर सफेद रंग का लंबा डंडा बन जाएगा. अब टुकड़े काट कर लाल रंग के हिस्से पर काजू रख कर हलका सा दबा कर चिपका दें ताकि काजू हटें नहीं. स्वीट डिलाइट तैयार है.

‘विंटर सीजन में गोंद और मखाने वाली यह रैसिपी बनाना तो बनता है.’

ड्राईफ्रूट डिलाइट

सामग्री

– 15 मखाने शैलो फ्राई किए

– गोंद फ्राई किया

– 2 बड़े चम्मच मगज भुनी

– 50 ग्राम काजूबादाम

भुने – 1/4 छोटा चम्मच सोंठ

– गुड़ स्वादानुसार

– 2 बड़े चम्मच घी

– 1 गिलास पानी

विधि

मखाने, गोंद, मगज व काजूबादाम को दरदरा पीस या कूट लें. पैन में घी गरम करें. 1 गिलास पानी में गुड़ डाल कर घुलने तक पकाएं. अब इस में सारी सामग्री डाल कर 20 मिनट धीमी आंच पर पकाएं और फिर गरमगरम सर्व करें.

‘चावल और सागूदाना से बनी स्वीट डिश बना तो देखें.’ 

बादामी चसका

सामग्री

– 50 ग्राम चावल

– 3-4 चम्मच सागूदाना

– 100 ग्राम बादाम

– थोड़ा सा गुड़

– 1/2 छोटा चम्मच इलायची पाउडर

– 5-6 बूंदें केवड़ा ऐसेंस

– 1 कप मिल्क पाउडर

– 1/2 लिटर दूध

– मिस्री स्वादानुसार

– थोड़ा सा चांदी वर्क सजाने के लिए.

विधि

चावलों और सागूदाने को पानी में भिगो कर रख दें. दूध को उबलने रखें. जब वह उबलने लगे तो उस में चावल व सागूदाना डाल कर पकने दें. बादामों को पानी में भिगो दें ताकि छिलका उतार सकें. दूध उबलने लगे तो 5 मिनट के बाद सारी सामग्री मिला दें. 10 मिनट में बादामी चसका तैयार हो जाएगा. आंच बंद करने के बाद केवड़ा ऐसेंस की बूंदें डाल कर चांदी के वर्क से सजा कर गरम या ठंडा सर्व कर सकती हैं.

Drama Story: एहसास- शिखा की जिंदगी क्यों दांव पर लग चुकी थी

Drama Story: करीब 50 से ज्यादा मेहमान मेरी सहेली सीमा की शादी की दूसरी सालगिरह की पार्टी का पूरा आनंद उठा रहे थे. मैं ने फ्रैश होने की जरूरत महसूस करी तो हौल में बनी सीढि़यां चढ़ कर पहली मंजिल पर बने गैस्टरूम में आ गई.

मैं बाथरूम में घुस पाती उस से पहले ही रवि ने तेजी से कमरे में प्रवेश कर के मु झे पीछे से अपनी बांहों में भर लिया. मैं बड़ी कठिनाई से अपनी चीख दबा पाई.

‘‘बड़ी देर से इंतजार कर रहा था मैं इस मौके का स्वीटहार्ट. कितनी सुंदर हो तुम शिखा,’’ बड़ी गरमगरम सांसे छोड़ते हुए उस ने मेरी गरदन पर छोटेछोटे चुंबन अंकित करने शुरू कर दिए.

उस का स्पर्श बड़ा उत्तेजक था, पर अपनी भावनाओं को नियंत्रण में रखते हुए मैं ने उसे डपट दिया, ‘‘पागल हो गए हो क्या. कोई देख लेगा तो गजब हो जाएगा. छोड़ो मु झे.’’

‘‘वहां कब मिलोगी जहां कोई देखने वाला नहीं होगा, मेरी जान,’’ मेरे गाल का चुंबन लेने के बाद उस ने मु झे अपनी बांहों को कैद से तो आजाद कर दिया, पर मेरा हाथ पकड़े रखा.

‘‘तुम जाओ यहां से,’’ कुछ सहज हो कर मैं मुसकरा उठी.

‘‘पहले अकेले में मिलने का पक्का वादा करो.’’

‘‘ऐसी कोई जगह नहीं है जहां हम अकेले मिल सकें.’’

‘‘है, बिलकुल है.’’

‘‘कहां?’’ मेरे मुंह से अपनेआप निकल गया.

‘‘मेरे घर वाले परसों शहर से बाहर जा रहे हैं. पूरा दिन घर खाली रहेगा. तुम्हें किसी भी तरह मु झ से मिलने आना ही पड़ेगा, शिखा.’’

‘‘मैं कोशिश करूंगी. अब तुम…’’

‘‘प्लीज, पक्का वादा करो.’’

‘‘ओके, बाबा. अब भागो यहां से.’’

कमरे से बाहर जाने से पहले रवि ने खींच कर मु झे एक बार फिर अपनी चौड़ी

छाती से चिपका लिया. मेरी आंखों और गालों को कई बार जल्दीजल्दी चूमने के बाद ही वह वहां से गया.

बाथरूम के अंदर अपनी उखड़ी गरम सांसों और दिल की बढ़ी धड़कनों को संतुलित करने में मु झे कुछ वक्त लगा. अगर मैं अपनी घर में होती तो रवि के स्पर्श सुख की कल्पना करते हुए जरूर ही फव्वारे के नीचे नहा लेती. इस वक्त वही मेरे दिलोदिमाग पर पूरी तरह से छाया हुआ था.

रवि सीमा का देवर है. उस से मेरी अकसर मुलाकात हो जाती है क्योंकि सीमा के यहां हमारा आनाजाना बहुत है. मेरे पति अजय भी सीमा के पति नीरज के अच्छे दोस्त बन गए हैं.

रवि के पास मनमोहक बातें करने की कला है. मैं बहुत सुंदर हूं. अकसर लोगों के मुंह से मैं अपनी प्रशंसा सुनती रहती हूं, लेकिन जिस खूबसूरत अंदाज में रवि मेरे रंगरूम की तारीफ करता है, वह मेरे मन को गुदगुदा जाता है.

करीब 3 महीने पहले सीमा के प्रकाश नर्सिंगहोम में बेटा हुआ था. वहां मैं रोज ही उस से मिलने जाती थी. एक  शाम को मैं रवि की किसी बात पर खुल कर हंस रही थी जब उस ने अचानक मेरा हाथ पकड़ कर चूमा और बड़े भावुक लहजे में बोला था, ‘‘शिखा, मैं ने हमेशा तुम जैसी सुंदर, हंसमुख लड़की की हमसफर के रूप में कल्पना करी है. तुम्हारी जोड़ी अजय भैया के नहीं, बल्कि मेरे साथ जमती है.

उस वक्त सीमा बाथरूम में थी. कमरे में हम दोनों के अलावा बस नन्हा शिशु ही था. रवि ने अजय का जिक्र कर के मु झे अंदर तक बेचैन कर दिया था. अजीब सी उल झन व घबराहट का शिकार बन कर मैं कुछ भी बोल नहीं पाई थी.

तब उस ने मौके का फायदा उठा कर मु झे जल्दी से अपनी बांहों में भरा और मेरे गाल का चुम्मा ले कर शरारती अंदाज में मुसकराता हुआ कमरे से बाहर चला गया.

उस रात मैं बहुत बेचैन रही. अजय ने मु झे प्यार करना चाहा तो मैं ने तेज सिरदर्द का  झूठा बहाना बना कर उन्हें अपने से पहली बार दूर रखा. मु झे उस रात अजय का स्पर्श सुहा ही नहीं रहा था.

‘‘तुम्हारी जोड़ी अजय भैया के साथ नहीं बल्कि मेरे साथ जमती है,’’ रवि के मुंह से निकला यह वाक्य बारबार मेरे मन में गूंज कर मेरे अंदर तनाव, बेचैनी और असंतोष के भाव गहराता जा रहा था.

यह सचाई ही है कि अजय शक्लसूरत और कदकाठी के हिसाब से मेरे लिए उपयुक्त जीवनसाथी नहीं है.

‘‘हूर की बगल में लंगूर. कौए की चोंच में अनार की कली जैसे वाक्य कई बार बाहर घूमते हुए हमारे कानों में पड़ते रहे हैं.

वरमाला के समय मैं ने अपनी सहेलियों की आंखों में जबरदस्त हैरानी व सहानुभूति के मिलेजुले भाव देखे थे. मेरी सब से अच्छी सहेली निशा ने तो अफसोस भरे लहजे में विदा होने से पहले कह भी दिया था, ‘‘शिखा, तु झे यहां शादी करने से इनकार कर देना चाहिए था.’’

वैसे उसे पता था कि मैं चाह कर भी शादी करने से इनकार नहीं कर सकती थी. अपने तानाशाह पिताजी की इच्छा और आदेश के खिलाफ चूं तक की आवाज निकालने की हिम्मत भी नहीं बल्कि घर में किसी की भी नहीं थी.

उन्हीं के डर के कारण मैं ने कभी किसी लड़के को अपने करीब नहीं आने दिया था. अनगिनत आकर्षक युवकों ने मेरा दिल जीतने की पहल करी थी, पर पापा के भय के चलते मैं ने किसी से भी निकटता बढ़ने नहीं दी थी.

कालेज की सब से खूबसूरत लड़की को वे सब हताश युवक लैस्बियन मानने लगे थे. मेरे सपने बड़े रोमांटिक होते, पर असलियत में किसी युवक के साथ अकेले में बात करते हुए मेरे हाथपैर पापा के गुस्से की कल्पना कर फूलने लगते थे.

अजय की नौकरी बहुत अच्छी थी. अपनी बेटी को इज्जतदार घर की बहू बनाने का फैसला पापा ने अकेले ही लिया था. अजय की शक्लसूरत को छोड़ कर सबकुछ बहुत अच्छा था. पापा के फैसले का विरोध कोई कर ही नहीं सकता था, सो 10 महीने पहले मैं अजय की दुलहन बन कर ससुराल आई थी.

अजय की आंखों में मैं ने सुहागरात के दिन अपने लिए गहरे प्यार के भाव देखे थे, ‘‘शिखा, तुम जैसी सुंदर लड़की का पति बनने की तो मैं ने सपने में भी कभी उम्मीद नहीं की थी. तुम्हें पा कर मैं संसार का सब से खुशहाल इंसान बन गया हूं.’’

अजय के प्यार ने उसी पल से मेरा दिल जीत लिया था. वे दिल के बड़े अच्छे इंसान निकले. मेरी इच्छाओं व खुशियों का हमेशा ध्यान रखते.

बस कभीकभी लोगों की बातें मन को दुखी व परेशान कर जातीं. जिस भी परिचित या रिश्तेदार को मौका मिलता, वह हंसीमजाक करने के बहाने हम दोनों के रंगरूम की तुलना करने से चूकता नहीं था.

इस का नतीजा यह रहा कि अजय का रंगरूम से आकर्षक न होने का सत्य मेरा मन भूल नहीं पाता था. यह बात फांस सी बन कर मेरे मन में चुभती ही रहती थी. उन के बाकी सब गुणों पर यही एक कमी कभीकभी भारी पड़ कर मु झे बहुत परेशान कर जाती थी.

दूसरी तरफ रवि किसी फिल्म स्टार सा सुंदर और आकर्षक था. उस की आंखों में अपने लिए मैं ने चाहत के भाव पढ़े, तो यह मेरे दिल को बहुत अच्छा लगा था.

न जाने कब मैं रवि के सपने देखने लगी थी. हमारे मिलनेजुलने पर कोई रोकटोक नहीं थी. मैं जब चाहे सीमा से मिलने के बहाने उस के घर जा सकती थी. उस के सासससुर व पति को कभी रत्तीभर शक हम दोनों पर नहीं हुआ था.

परसों वे सब नीरज की मौसी के घर मेरठ जा रहे थे. उन के पोते की पहली

सालगिरह का समारोह था. यह बात मु झे सीमा से पहले ही मालूम पड़ गई थी.

‘क्या मैं अकेले घर में परसों रवि से मिलने आऊंगी.’ अपने मन से मैं ने यह सवाल गुसलखाने में कई बार पूछा और मेरे मन की गुदगुदी व उत्तेजना से बढ़ी धड़कनों ने हर बार जवाब ‘हां’ में दिया.

हाथमुंह धोने के बाद मैं ने अपने बाल व लिपस्टिक ठीक की और रवि के स्पर्श को अब भी अपने बदन पर महसूस करती सीमा के गैस्टरूम के गुसलखाने से बाहर आ गई.

गुसलखाने का दरवाजा खोल कर मैं कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ी तो अचानक मेरा ध्यान कमरे से जुड़ी बालकनी की तरफ गया.

जब मैं अंदर आई थी, तब भी बालकनी में खुलने वाला दरवाजा खुला था, यह मु झे याद आ गया, लेकिन इस बार मैं ने जब उस तरफ देखा, तो वहां बालकनी में अपने पति को खड़ा पाया.

अजय की पीठ मेरी तरफ थी. मु झे पता नहीं था कि वे कब से वहां मौजूद हैं. वैसे जब मैं हौल से यहां गैस्टरूम में करीब 10 मिनट पहले आई थी, तब मैं ने उन्हें हौल में नहीं देखा था.

‘क्या रवि और मु झे उन्होंने कमरे में साथसाथ देखा है?’ इस सवाल ने हथौड़े की

तरह से मेरे मन पर चोट करी और मैं बेहद डरीघबराई सी हौल की तरफ चलती चली गई. अपने पति का सामना करने की मेरी बिलकुल हिम्मत नहीं हुई.

पार्टी की सारी रौनक और मौजमस्ती इस पल के बाद मेरे लिए बिलकुल खत्म हो गई. रवि ने मेरी आंखों से आंखें मिलाने की कोशिश कई बार करी, पर इस वक्त तो वे मु झे जहर नजर आ रहा था.

‘अजय ने हमें साथसाथ देखा है या नहीं’ मेरे मन में तो बस यही एक सवाल हड़कंप सा मचाए जा रहा था.मेरी नजरें सीढि़यों की तरफ बारबार उठ जातीं. अजय के हावभाव देखने को मेरा मन बेचैन होने के साथसाथ अजीब सा डर भी महसूस कर रहा था. तभी रवि को अपनी तरफ बढ़ते देख कर मैं ने अपना मुंह फेर लिया.

उस ने पास आ कर मु झ से कुछ कहने को मुंह खोला ही था कि मैं ने दबे पर गुस्से से कांपते स्वर में कहा, ‘‘मु झ से दूर रहो तुम.’’

‘‘क्या हुआ है शिखा?’’ मेरी ऐसी प्रतिक्रिया देख वह जोर से चौंक पड़ा.

‘‘मर गई शिखा. बात मत करना तुम कभी मु झ से,’’ उसे यों चेतावनी दे कर मैं अपनी कुछ परिचित महिलाओं की तरफ  झटके से चल पड़ी.

‘अजय ने अगर मु झे रवि की बांहों में बंधे देख लिया होगा और हमारी बातें सुन ली होंगी, तो क्या होगा’ इस सवाल के मन में उठते ही मेरे ठंडे पसीने छूट जाते.

अजय को करीब 15 मिनट बाद मैं ने सीढि़यों से नीचे आते देखा. उन्होंने गरदन घुमा कर मु झे ढूंढ़ा और मेरी तरफ बढ़ चले.

वे मु झे देख कर मुसकराए नहीं, तो मेरा मन बैठ सा गया. अपराधबोध की एक तेज लहर मेरे अंदर उठ कर मु झे जबरदस्त डर और तनाव का शिकार बना गई.

‘‘तुम ने खाना खा लिया है?’’ अजय ने पास आ कर सुस्त से स्वर में पूछा.

‘‘नहीं,’’ मैं उन के मुर झाए चेहरे की तरफ बड़ी कठिनाई से ही देख पा रही थी.

‘‘तुम जल्दी से खाना खा लो. फिर घर चलेंगे.’’

‘‘आप की तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ इस सवाल को पूछते हुए मेरी जान खूख हो रही थी.

‘‘सिर में तेज दर्द है. मैं कुछ नहीं खाऊंगा,’’ कह कर वे थके से मेरे पास से हटे और कोने में पड़ी एक कुरसी पर आंखें मूंद कर बैठ गए. मैं ने नाम के लिए अपनी प्लेट में थोड़ा सा खाना परोसा पर वह भी मेरे गले से नीचे नहीं उतरा. बारबार मेरी नजर अजय की तरफ उठ जाती. वे आंखें मूंदे ही बैठे रहे. उन के मन में क्या चल रहा है, यह जानने को मैं मरी जा रही थी, पर सवाल पूछ कर उन के मनोभावों को जानने की हिम्मत मुझ में बिलकुल नहीं थी.

हम दोनों करीब पौने घंटे बाद सीमा और नीरज से विदा ले कर घर लौट आए. मेरे खराब मूड को पहचान कर रवि मेरे निकट नहीं आया, तो मैं ने मन ही मन बड़ी राहत महसूस करी. अजय कपड़े बदल कर पलंग पर लेट गए थे. कमरे की रोशनी भी उन्होंने बु झा रखी थी. उन के चेहरे के भावों को न देख पाने के कारण मेरे मन की उल झन, परेशानी और तनाव बढ़ता जा रहा था.

‘‘मैं सिर दबा दूं? बाम लगा दूं?’’ इन सवालों को अजय से पूछते हुए मु झे अपनी आवाज असहज और बनावटी सी लगी.

‘‘नहीं, मैं ने दर्द के लिए गोली खा ली है,’’ उन्होंने थके से स्वर में जवाब दिया और फिर तकिया मुंह पर रख आगे न बोलने की अपनी इच्छा जाहिर कर दी.

अजय ने रवि और मु झे साथसाथ गैस्टरूम में देखा था या नहीं यह सस्पैंस मु झे मारे जा रहा था. जब मन सोचता कि उन्होंने मु झे रवि के साथ देखा है, तो मैं अपराधबोध, आत्मग्लानि और शर्मिंदगी के भावों से खुद को जमीन में गड़ता सा महसूस करती.

उन्होंने कुछ नहीं देखा है, मन ऐेसे भी सोचता, लेकिन यह विचार ज्यादा देर रुकता नहीं था. अजय की खामोशी मेरे मन को सब बुराबुरा ही सोचने में सहायक हो रही थी. अजय को यों तेज सिरदर्द पहले भी हो जाता था. तब मैं बड़े अधिकार से उन का सिर दबा देती थी. उन से लिपट कर सोने की भी मु झे आदत है, लेकिन उस रात ऐसा कुछ भी करने की हिम्मत मु झ में पैदा नहीं हो सकी.

‘‘तुम धोखेबाज और चरित्रहीन स्त्री हो,’’ अजय के मुंह से ऐसे शब्दों को सुनने का भय मु झे उन के नजदीक आने से रोक रहा था.

वे तो कुछ देर बाद सो गए, पर मेरी आंखों से नींद कोसों दूर थी. मैं अपने को खूब कोस रही थी. बारबार रो पड़ने का दिल करता.

कभी अजय से माफी मांगने का दिल करता, पर फिर मैं खुद को रोक लेती. अगर उन्होंने कुछ देखा नहीं, तो बेकार रवि से अपने संबंध की जानकारी उन्हें देना मूर्खतापूर्ण होता.

वह सारी रात मैं ने करवटें बदलते हुए गुजारी. सुबह मेरे सिर में तेज दर्द हो रहा था. अजय मु झ से सहज हो कर वार्त्तालाप नहीं कर रहे थे. मैं अपने अंदर उन से आंखें मिला कर कुछ भी कहनेसुनने का साहस नहीं पैदा कर पा रही थी. औफिस जाते हुए उन्होंने हमेशा की तरह मु झे गले से नहीं लगाया, तो मेरा यह शक बड़ी हद तक विश्वास में बदल गया कि पिछली रात उन्होंने रवि और मु झे कमरे में बालकनी से जरूर देख लिया था.

उन्हें विदा कर मैं शयनकक्ष में आ कर पलंग पर गिर पड़ी. रातभर मेरे अंदर पैदा हुए अपराधबोध, तनाव, डर, अनिश्चितता जैसे भावों ने अचानक मु झ पर हावी हो मु झे रुला डाला.

मैं खुद से बेहद खफा थी. रवि की बातों के जाल में फंस कर मैं ने अपने अच्छेखासे विवाहित जीवन की खुशियां और सुखशांति नष्ट कर ली थी. अजय की नजरों में हमेशा के लिए गिर जाने का एहसास मेरे मन को बुरी तरह कचोट रहा था.

शाम को अजय औफिस से लौटे, तो भी सुस्त और मुर झाए से दिख रहे थे. कुछ वार्त्तालाप हमारे बीच हुआ, पर उस में सहज आत्मीयता का अभाव मु झे साफ खल रहा था.

मैं चाहती हूं कि अब एक बार सारा मामला साफ हो जाए. उन्होंने रवि और मु झे साथसाथ देखा है, तो वे मु झे खूब डांटें, मारें और शर्मिंदा करें. दूसरी तरफ वे अगर बालकनी में बाद में आए थे, तो किसी तरह से यह बात मु झे मालूम पड़नी ही चाहिए. तब मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ उन के संग अपने संबंध सहज व प्रेमपूर्ण बना लूंगी.

इस मामले को ले कर बना सस्पैंस मु झे मारे जा रहा है. अजय की नजरों में मैं चरित्रहीन साबित हो चुकी हूं, इस बात का अंदेशा भी मु झे मारे शर्म के जमीन में गाड़े दे रहा था.

रवि जैसा प्रेमी मेरे जीवन में कभी नहीं आएगा, यह सबक मैं ने हमेशा के लिए सीख लिया है. ऐसा गलत कदम उठाना मेरे बस की बात नहीं है. मुझे एहसास हो चुका है कि अपने पति की नजरों में गिर कर जीना जीते जी नर्क भोगने जैसा है. खेलखेल में आपसी प्रेम व विश्वास को खो देने की नौबत मेरे जीवन में फिर कभी नहीं आएगी.

Drama Story

Best Hindi Story: बेकरी की यादें- काम शुरु करने पर क्या हुआ दीप्ति के साथ

Best Hindi Story: मिहिरऔर दीप्ति की शादी को 2 साल हो गए थे, दोनों बेहद खुश थे. अभी वे नई शादी की खुमारी से उभर ही रहे थे कि मिहिर को कैलिफोर्निया की एक कंपनी में 5 सालों के लिए नियुक्ति मिल गई. दोनों ने खुशीखुशी इस बदलाव को स्वीकार कर लिया और फिर कैलिफोर्निया पहुंच गए.

दीप्ति को शुरूशुरू में बहुत अच्छा लगा. सब काम अपने आप करना, किसी तीसरे का आसपास न होना… सुबह उठ कर चाय के साथ ही वह नाश्ता और लंच बना लेती. फिर जैसे ही मिहिर दफ्तर जाता वह बरतन साफ कर लेती. बिस्तर ठीक कर के नहाधो लेती, इस के बाद सारा दिन अपना. अकेले बाजार जाना और पार्क के चक्कर लगाना, यही उस का नियम था. अब वह पैंट, स्कर्ट और स्लीवलैस कमीज पहनती तो अपनी तसवीरें फेसबुक पर जरूर डालती और पूरा दिन फेसबुक पर चैक करती रहती कि किस ने उसे लाइक या कमैंट किया है. 100-200 लाइक्स देख कर अपने जीवन के  इस आधुनिक बदलाव से निहाल हो उठती.

मगर यह जिंदगी भी चंद दिनों तक ही मजेदार लगती है. कुछ ही दिनों में यही रूटीन वाली जिंदगी उबाऊ हो जाती है, क्योंकि इस में हासिल करने को कुछ नहीं होता. दीप्ति के साथ भी ऐसा ही हुआ, फिर उस ने कुछ देशी लोगों से भी दोस्ती कर ली.

अब भारतीय तो हर जगह होते हैं और फिर इस अपरिचित वातावरण में परिचय की गांठ लगाना कौन सी बड़ी बात थी. घर के आसपास टहलते हुए ही काफी लोग मिल जाते हैं. दीप्ति ने उन्हीं लोगों के साथ मौल जाना, घूमनाफिरना शुरू कर दिया.

यूट्यूब देख कर कुछ नए व्यंजन बना कर वह अपने दिन काटने लगी, लेकिन जैसेजैसे मिहिर अपने काम में व्यस्त होता गया, वैसेवैसे दीप्ति का सूनापन भी बढ़ता गया. उसे अब भारत की बहुत याद आने लगी. वह परिवार के साथ रहने का सुख याद कर के और भी अकेला महसूस करने लगी.

एक दिन उस ने बैठेबैठे सोचा कि अब उसे कुछ काम करना चाहिए. काम करने का उसे परमिट मिला हुआ था. अत: कई जगह आवेदन कर दिया. राजनीति शास्त्र में एमए की डिग्री लिए हुए दीप्ति कई जगह भटकी. औनलाइन भी आवेदन किया, लेकिन कहीं से भी कोई जवाब नहीं आया. उस की बेचैनी बहुत बढ़ने लगी. वह किसी दफ्तर में डाटा ऐंट्री का काम करने को भी तैयार थी, लेकिन काम का कोई अनुभव न होने के कारण कहीं काम नहीं बना.

एक दिन पास की ग्रोसरी में शौपिंग करते हुए उस ने देखा कि बेकरी में एक जगह खाली है. उस ने वहीं खड़ेखड़े आवेदन कर दिया. 2 दिन बाद उस का इंटरव्यू हुआ. इंग्लिश उस की बहुत अच्छी नहीं थी. बस कामचलाऊ थी. लेकिन उस का इंटरव्यू ठीकठाक हुआ, क्योंकि उस में बोलना कम और सुनना अधिक था.

बेकरी के मैनेजर ने कहा, ‘‘तुम यहां काम कर सकती हो, लेकिन बेकरी में काम करने के लिए नाक की लौंग और मंगलसूत्र उतारना पड़ेगा, क्योंकि साफसफाई के नजरिए से यह बहुत जरूरी है.’’

दीप्ति को यह बहुत नागवार लगा. उस ने सोचा कि अगर ये लोग दूसरों की संस्कृति और भावनाओं का खयाल करते तो वह ऐसा न कहता. क्या मेरे मंगलसूत्र और लौंग में गंद भरा है, जो उड़ कर इन के खाने में चला जाएगा? फिर खुद को नियंत्रित करते हुए उस ने कहा कि वह सोच कर बताएगी.

मिहिर से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘जो तुम ठीक समझो, करो. मुझे कोई आपत्ति नहीं है. बस शाम को मेरे आने से पहले घर वापस आ जाया करना.’’

दीप्ति ने वहां नौकरी शुरू कर दी. नाक की लौंग तो उस ने बहुत पीड़ा के साथ उतार दी. अभी शादी के कुछ दिन पहले ही उस ने नाक छिदवाई थी और बड़ी मुश्किल से वह लौंग नाक में फिट हुईर् थी, लेकिन मंगलसूत्र नहीं उतार पाई, इसलिए कमीज के बटन गले तक बंद कर के रखती ताकि वह दिखे न. पहले दिन वह बहुत खुशीखुशी बेकरी पर गई. वहां जा कर उस ने बेकरी का ऐप्रन पहन लिया.

मैनेजर ने पूछा, ‘‘क्या पहले कभी काम किया है?’’

‘‘नहीं, लेकिन मैं कोई भी काम कर सकती हूं.’’

मैनेजर ने हंसते हुए कहा, ‘‘ठीक है अभी सिर्फ देखो और काम समझो… कुछ दिन सिर्फ बरतन ही धोओ.’’

दीप्ति ने देखा बड़ीबड़ी ट्रे धोने के लिए रखी थीं. उस ने सब धो दीं. जब मैनेजर ने देखा कि वह खाली खड़ी है तो कहा, ‘‘जाओ और बिस्कुट के डब्बे बाहर डिसप्ले में लगाओ, लेकिन पहले सभी मेजों को साफ कर देना,’’ और उस ने आंखों के इशारे से मेज साफ करने का सामान उसे दिखा दिया.

4 घंटों तक यही काम करतेकरते दीप्ति को ऊब होने लगी. लेकिन मन में कुछ संतुष्टि थी.

दीप्ति को वहां काम करना ठीकठाक ही लगा. काम करने से एक तो यहां की दुकानों के बारे में और जानकारी मिली वहीं बेकिंग के कुछ राज भी उस के हाथ लग गए. लेकिन उस के मन में बेकरी पर नौकरी करना एक निचते दर्जे का काम था. उस की जाति और खानदान के संस्कार उसे यह करने से रोक रहे थे.

वह इस काम के बारे में अपने घर या ससुराल में शर्म के मारे कुछ नहीं बता पाई. उस के लिए यह कोई इज्जत की नौकरी तो थी नहीं.

खैर, वह कुछ भी सोचे लेकिन काम तो वह बेकरी पर ही कर रही थी और उस में मुख्य काम था हर ग्राहक का अभिवादन करना और सैंपल चखने के लिए प्रेरित करना. दूसरा काम था ब्रैड और बिस्कुट को गिन कर डब्बों में भरना और बेकरी के बरतनों को धोना.

धीरेधीरे उस ने महसूस किया कि वहां भी प्रतिद्वंद्विता की होड़ थी, एकदूसरे की चुगली की जाती थी. परनिंदा में परम आनंद का अनुभव किया जाता था. लगभग 50 फीसदी बेकरी पर काम करने वाले लोग मैक्सिकन थे जो सिर्फ स्पैनिश में पटरपटर करते थे. दीप्ति उन की बातों का हिस्सा नहीं बन पाती.

बरहाल दीप्ति को बिस्कुट भरने में मजा आता, लेकिन बरतन धोने में बहुत शर्म आती. उसे अपना घर याद आता. उस ने भारत में कभी बरतन नहीं धोए थे. कामवाली या मां सब काम करती थीं. अब यहां बरतन धोते हुए उसे लगता उस का दर्जा कम हो गया है.

एक दिन वहां काम करने वाली एक महिला ने उसे झाड़ू लगाने का आदेश दिया. पहले तो दीप्ति ने कुछ ऐसा भाव दिखाया कि बात उस की समझ में नहीं आई, लेकिन वह महिला तो उस के पीछे ही पड़ गई.

दीप्ति ने मन कड़ा कर के कहा, ‘‘दिस इज नौट माई जौब.’’

यह सुनते ही वह मैनेजर के पास गई और उस की शिकायत करनी लगी. दीप्ति ने भी सोचा कि जो करना है कर ले.

शाम को जब दीप्ति बरतन धो रही थी तो एक देशी आंटी पीछे आ कर खड़ी हो गईं और उसे पुकारने लगीं. उस ने अपनी कनखियों से पहले ही उसे आते देख लिया था. अब जानबूझ कर पीछे नहीं मुड़ रही थी. आंटी भी तोते की तरह ऐक्सक्यूज मी की रट लगाए खड़ी थीं, वहां कोई नहीं था सिवाए रौबर्ट के, जो बिस्कुट बना रहा था.

आखिर रौबर्ट ने भी दीप्ति को पुकार कर कहा, ‘‘जा कर देखो कस्टमर को क्या चाहिए.’’

हार कर दीप्ति को अपना न सुनने का अभिनय बंद कर के काउंटर पर आना पड़ा. बातचीत शुरू हुई. बिस्कुट के दाम से और ले गई फिर वही कि तुम कहां से हो? तुम्हारे घर में कौनकौन है? यहां कब आई? पति क्या करते हैं? हिचकिचाते हुए उसे प्रश्नों के उत्तर देने पड़े जैसे यह भी उस के काम का हिस्सा हो.

खैर, आंटी ने कुछ बिस्कुट के सैंपल खाए और बिना कुछ खरीदे खिसक गई.

अभी दीप्ति आंटी के सवालों और जवाबों से उभरी ही थी कि बेकरी का फोन घनघना उठा. रिसीवर उसी को उठाना पड़ा. फोन पर लग रहा था कि कोई बूढ़ी महिला केक का और्डर देना चाह रही है. जैसे ही दीप्ति ने थोड़ी देर बात की, बूढ़ी महिला ने कहा, ‘‘कैन यू गिव द फोन टू समबौडी हू स्पीक्स इंग्लिश?’’

दीप्ति को काटो तो खून नहीं. इस का मतलब क्या? क्या वह अब तक उस से इंग्लिश में बात नहीं कर रही थी? उस ने पहले कभी इंग्लिश को ले कर इतना अपमानित महसूस नहीं किया था. इतनी तहजीब और सब्र से वह ‘मैडममैडम’ कह कर बात कर रही थी.

लेकिन उस का उच्चारण बता देता है कि इंग्लिश उस की भाषा नहीं है. उसे बहुत कोफ्त हुई, उस ने रौबर्ट को बुलाया और रिसीवर उस के हवाले कर दिया और कहा, ‘‘आई विल नौट वर्क हियर एनीमोर.’’

इस के बाद दनदनाती हुई वह अपना बेकरी का ऐप्रन उतार कर समय से पहले ही बेकरी से बाहर निकल आई. अगर वह न जाती तो उस की आंखों के आंसू वहीं छलछला पड़ते.

घर जा कर दीप्ति खूब रोई. पति के सामने अपना गुबार निकाला. पति ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बस इतने में ही डर गई. अरे, अपनी भाषा का हम ही आदर नहीं करते, लेकिन अन्य लोग तो अपनी भाषा ही पसंद करते हैं और वह भी सही उच्चारण के साथ.

‘‘जिस इंग्लिश की हम भारत में पूजा करते हैं वह हमें देती क्या है और इस बात को भी समझो कि सभी लोग एकजैसे नहीं होते. शायद उस औरत को विदेशी लोग पसंद न हों.

‘‘भाषा तो सिर्फ अपनी बात दूसरे तक पहुंचाने का माध्यम है. तुम ने कोशिश की. तुम इतना निराश मत हो. ये सब तो विदेश में होता ही रहता है.’’

मिहिर की बातों का दीप्ति पर असर यह हुआ कि अगले दिन वह समय पर अपना ऐप्रन पहन कर बेकरी के काम में लग गई जैसे कुछ हुआ ही न हो. किसी ने भी उस से सवालजवाब नहीं किया. अब उसे लगा कि वह किसी से नहीं डरती. अपने अहं को दरकिनार कर उस ने नए सिरे से काम शुरू कर दिया. उस ने अपने काम को पूरे दिल से अपना लिया. अपनी मेहनत पर उसे गर्व महसूस होने लगा.

Best Hindi Story

Family Kahani: आत्मबोध- क्या हुआ था सुनिधि के साथ

Family Kahani: ‘‘सनी,मेरे पापा मेरी शादी की जल्दी कर रहे हैं,’’ सुनिधि कालेज कंपाउंड में घूमते हुए अपने बौयफ्रैंड से बोली.

‘‘तो इस में कौन सी बड़ी बात है? हर बाप पैदा होते ही अपनी लड़की की शादी कर देना चाहता है,’’ सनी लापरवाही से बोला.

‘‘तुम समझे नहीं. वे मेरी पंसद के नहीं अपनी पसंद के लड़के से शादी करना चाहते हैं,’’ सुनिधि कुछ तनाव में बोली.

‘‘जाहिर है, घर के मुखिया वे हैं तो उन की पसंद ही चलेगी न?’’ सनी उसी अंदाज में बोला.

‘‘सुनिधि, देखो अभी मेरे परिवार के साथ कई समस्याए हैं. पहली तो पापा की फैक्टरी उस हिसाब से नहीं चल रही जिस हिसाब से चलनी चाहिए. दूसरे मुझ से बड़ी 2 बहनें हैं जिन की शादी करनी है. अगर दोनों की शादी एकसाथ भी कर दें तो भी कम से कम 3 साल तो लगेंगे ही और उस के बाद 2 साल यानी 5 साल तक तो तुम्हे इंतजार करना ही पड़ेगा,’’ सनी बोला.

‘‘5 साल तक तो शायद पिताजी इंतजार न कर पाएं, क्योंकि 6 बहनों में मैं सब छोटी हूं. बाकी 5 बहनों की शादी वे कर चुके हैं. मेरी शादी कर के वे अपने कर्तव्यों की इतिश्री करना चाहते हैं. मां तो बचपन से है नहीं, पिताजी को भी एक अटैक आ चुका है. इसी कारण जल्दी मचा रहे हैं,’’ सुनिधि बोली.

‘‘तब तो तुम्हें अपने पिता की इच्छा का सम्मान करना ही चाहिए, क्योंकि मेरी समस्या तो 5 साल से अधिक भी चल सकती है,’’ सनी सुनिधि को समझाते हुए बोला.

‘‘मैं जानती हूं सनी, मगर डर इस बात का है कि शादी के बाद मेरे पति को यदि हमारे संबंधों के बारे में पता चल गया तो क्या होगा? हम लोग गलती तो कर ही चुके हैं,’’ सुनिधि तनिक भयभीत स्वर में बोली.

‘‘देखो सुनिधि डरो मत. जब तक तुम खुद अपने मुंह से नहीं बताओगी किसी को कुछ मालूम नहीं पड़ेगा. विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इस तरह की चीजें कभी भी नष्ट हो सकती हैं. किसी भी अप्रिय स्थिति में तुम विज्ञान की इन बातों का सहारा ले सकती हो,’’ सनी ने रास्ता सुझाया.

न चाहते हुए भी पारिवारिक स्थितियों से समझौता करते हुए सुनिधि ने शादी के लिए स्वीकृति दे दी.

सुनील की शादी के समय उस के

मातापिता ने सोचा था सुनिधि 6 बहनों में सब से छोटी और बिन मां की बच्ची है, इसलिए संयुक्त परिवार में अच्छी तरह रहेगी. इसीलिए उन्होंने इसे अपनी बहू के रूप में चुना था. सुनील का परिवार वैसे बहुत बड़ा नहीं था. मातापिता के अलावा एक छोटा भाई ही था. पिता बैंक में नौकरी करते हैं तथा छोटे भाई का अपना बिजनैस है. सुनील खुद एक प्राइवेट फैक्टरी में मैकैनिकल इंजीनियर है.

सुनिधि के परिवार में पिता और कुल 6 बहनों व 1 छोटे भाई के साथ 8 लोग थे. भाई के जन्म के कुछ समय बाद मां का निधन हो गया था. पिता का रैडीमेड कपड़ों का छोटामोटा व्यवसाय था. दूसरी तरफ सुनील का परिवार अपेक्षाकृत छोटा था तथा बेटी न होने के कारण सुनील की मां ऐसी लड़की चाहती थी जो परिवार के महत्त्व को जानती हो. सासससुर और देवर के साथ परिवार को जोड़ कर रखे. कई भाईबहनों के बीच रहने और मां न होने के कारण सुनिधि इन सब मानदंडों पर खरी उतरती थी.

शादी के बाद सुनिधि का नए घर में शानदार स्वागत हुआ. शादी के बाद 2 महीनों तक सुनिधि को सब बहुत अच्छा लगा. फिर धीरेधीरे उस की भावनाओं ने जन्म लेना प्रारंभ किया. पिता के घर अभावों और दबावों के बीच पत्नी सुनिधि को अपने स्वतंत्र होने का एहसास होने लगा. अब उसे सास की कोईर् भी बात, सलाह या निर्देश अपनी निजी जिंदगी में दखल लगने लगा. सुनिधि को दिनभर साड़ी पहनना और संभालना भी बहुत भारी लगता. यद्यपि सुनिधि अपने साथ कई सलवार सूट लाई थी, किंतु छोटी जगह होने के कारण उसे पहनने की अनुमति नहीं थी.

‘‘अभी नईनई शादी है. मिलने, देखने के लिए कई लोग आ सकते हैं. ऐसे में तुम्हारा साड़ी के अलावा कोईर् और ड्रैस पहनना उचित नहीं होगा,’’ सुनिधि के पूछने पर सास ने जवाब दिया.

‘तब तक तो इन कपड़ों का फैशन ही चला जाएगा और मेरी शादी भी पुरानी हो जाएगी तब इन भारीभारी कपड़ों को कौन पहनेगा?’ कुढ़ती हुई सुनिधि मन ही मन बोली. फिल्मों में देर रात वाले शो देखने पर भी प्रतिबंध था. सुनिधि को यह भी लगता था कि मातापिता के साथ रहने के कारण सुनील उसे पर्याप्त समय नहीं दे पाता.

यहां पर ‘करेला और वह भी नीम चढ़ा वाली’ कहावत चरितार्थ हो रही थी. सनी की छवि दिल में बसाए सुनिधि सुनील को दिल से स्वीकार न कर सकी थी. ऊपर से सास के निर्देश उसे कलेजे में छुरी के समान चुभते थे. वैसे भी

6 बहनों में सब से छोटी होने के कारण सभी से आदेशित होती रहती थी और अपनेआप को उपेक्षित सा महसूस करती थी. इसी कारण उसे संयुक्त परिवार से चिढ़ सी हो गईर् थी.

यही सोच कर एक दिन सुनिधि सुनील से बोली, ‘‘यदि तुम नौकरी बदलते हो तो कितना पैसा बढ़ जाएगा?’’

‘‘लगभग 25-30%.’’ सुनील ने जवाब दिया.

‘‘तो कोशिश करो न नौकरी बदलने की,’’ सुनिधि ने कहा.

‘‘क्यों यहां क्या परेशानी है?’’ सुनील ने पूछा.

‘‘परेशानी कुछ नहीं, परंतु अपना पैसा अपना होता है. फिर कुछ समय बाद अपना परिवार भी बढ़ेगा ही. मेरी भी कई तरह की इच्छाएं हैं कि मैं तुम्हें अलगअलग तरह का खाना बना कर खिलाऊं. क्या जिंदगीभर ऐसा ही बिना रस वाला खाना खाते रहोगे?’’ सुनिधि अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए बोली.

पहली बार तो सुनील ने इसे हंसी में टाल दिया था, किंतु जब रोजरोज इस

तरह की बातें होने लगीं तो उस ने इसे गंभीरता से लिया. एक दिन सुनिधि उस से बोली, ‘‘यदि तुम्हें आवेदन करने में कोई परेशानी आ रही हो तो मुझे बताओ… मेरे कालेज के एक मित्र सनी की फैक्टरी उसी इंडस्ट्रियल एरिया में है. वह कोशिश कर के किसी अच्छी फैक्टरी में तुम्हारी जौब लगवा देगा?’’

सुनील ने आसपास के शहरों की फैक्टरियों में आवेदन देना आरंभ किया. अच्छा कार्यानुभव होने के कारण उसे अपने शहर से 50 किलोमीटर दूर ही अच्छी नौकरी भी मिल गई. वेतन बढ़ोतरी तो थी ही.

उसी शहर में होने के कारण सुनिधि व सनी फिर से मिलने लगे. कई बार सनी के बुलाने पर सुनिधि उस के साथ होटल के कमरों में भी गई. लगभग वर्षभर के अंतराल के बाद सुनिधि गर्भवती हो गई. यह बच्चा सुनील का ही था, क्योंकि सनी तो अपनी तरफ से पूरी सावधानी बरतता था. यद्यपि अपने पे्रम का सच्चा एहसास दिलवाने के लिए सनी यह जरूर कहता कि मौका पड़ने पर वह अपने खून का एक-एक कतरा तक उसे दे देगा.

इन सब के बीच सुनिधि गर्भवती भी हो गई और उस ने सुयश को जन्म भी दे दिया. सुयश के जन्म के बाद सुनिधि ससुराल से सुनील के साथ आ गई. यद्यपि सास ने बहुत आग्रह किया. सुनील को भी समझाया, किंतु सुनिधि अपने निर्णय पर अडिग रही.

नए शहर में आते ही सुनिधि ने अपने पासपड़ोसियों से अच्छे संबंध बना लिए. सभी छोटीमोटी जरूरतों के समय अच्छे तालमेल के साथ एकदूसरे का साथ देते. इन्हीं बेहतर रिश्तों के दम पर सुनिधि इतना आश्वस्त थी कि जरूरत पड़ने पर उसे अपनी ससुराल वालों की मदद की कतई आवश्यकता नहीं पड़ेगी.

अलग रहतेरहते सुनिधि की सेहत भी कुछ ठीक हो गई तथा चेहरे की रंगत भी खिल गई. यद्यपि ससुरजी हफ्ते 2 हफ्ते में सुयश से मिलने जरूर आते थे. शुरुआत में कुछ दिन सास भी आईं, किंतु शायद वे यह समझ चुकी थीं कि उन का आना सुनिधि को पसंद नहीं आता. अत: उन्होंने स्वयं ही आना कम कर दिया.

समय की अपनी रफ्तार है. आज सुयश का 5वां जन्मदिन है. इस उपलक्ष्य में शाम

को बच्चों की पार्टी का आयोजन किया गया था.

सुनील केक और मिठाई ले कर अपनी बाइक से लौट रहा था. हलकी बारिश के कारण सड़क पर फिसलन बढ़ गई थी और इसी कारण सड़क से टर्न लेते समय सुनील की बाइक स्लिप हो गई. यह सब इतना अचानक हुआ कि सामने से आती हुई तेज कार को संभलने का मौका ही नहीं मिला और उस ने गिर कर उठते हुए सुनील को टक्कर मार दी. सुनील के सिर में गहरी चोट लगी और उसे तुरंत आईसीयू में भरती करना पड़ा.

इस स्थिति में सुनिधि को सब से पहले याद सनी की आई. उस ने घबरा कर सनी को फोन किया. असमय फोन आते ही सनी समझ गया कि सुनिधि किसी मुसीबत में है.

‘‘हैलो सनी, सुनील का गंभीर ऐक्सीडैंट हो गया है,’’ सुनिधि ने घबराए स्वर में कहा.

‘‘तो मैं क्या करूं?’’ सनी ने रूखा सा जवाब दिया.

‘‘मुझे क्व2 लाख की सख्त जरूरत है. तुरंत ले कर अस्पताल आ जाओ,’’ सुनिधि ने सुबकते हुए कहा.

‘‘हम रईस हैं और रईसों के 2 ही शौक होते हैं शराब और शबाब. वह रईस ही क्या जिस की 2-4 रखैल न हों. हर रखैल पर इस तरह लाखों लुटाता रहा तो रईस एक दिन तो भिखारी ही बन जाऊंगा न?’’ कहते हुए सनी ने फोन काट दिया.

सुनील के मातापिता और छोटा भाई तुरंत पहुंच गए. सुनिधि तो बेसुध सी हो गई थी. पासपड़ोसियों ने तात्कालिक सहायता अवश्य की, किंतु स्थिति को लंबी व गंभीर होते देख सभी ने धीरेधीरे आना कम कर दिया. 5 दिनों के बाद ही यह दशा थी कि परिवार वालों के अलावा धैर्य बंधाने वाला और कोई भी नहीं था. सुनील के मातापिता व भाई पूरा समय उस के साथ बने रहते. हालांकि छोटे भाई के बिजनैस में काफी नुकसान हो रहा था, फिर भी वह भाई को इस हालत में छोड़ कर जाने को तैयार नहीं था.

करीब 2 महीने अस्पताल में रहने के बाद सुनील को छुट्टी मिली, किंतु अगले 6 महीने कंप्लीट बैड रैस्ट की सलाह दी गई. सुनिधि पड़ोसियों की सहायता और मजबूरी पहले ही देख चुकी थी. अब तक सुनिधि समझ चुकी थी कि पासपड़ोस और जानपहचान के माध्यम से मात्र छोटीमोटी और दिखावटी चीजें ही प्राप्त की जा सकती हैं. किंतु साथ, साहस, अपनापन, संबल और समर्पण अपनों से और परिवार से ही प्राप्त किया जा सकता है. ऐसे में पड़ोसियों के भरोसे रहना असंभव था. वैसे ही सुनिधि अपने पिछले आचरण को ले कर शर्मिंदा महसूस कर रही थी.

सुनिधि को बहुत संकोच हो रहा था, फिर भी उस ने हिम्मत कर के सास से पूछ ही लिया, ‘‘क्या बैड रैस्ट वाले पीरियड में सुनील को ससुराल में शिफ्ट कर सकते हैं?’’

‘‘इस में इतना संकोच करने वाली कौन सी बात है सुनिधि. वह घर तो हमेशा से ही हम सब लोगों का है. 6 महीने क्या तुम पूरी जिंदगी बेझिझक वहां रह सकती हो,’’ सास ने स्नेह से सिर पर हाथ फेरते हुए जब यह बात कही तो सुनिधि की आंखें नम हो गईं.

आज सुनील पूरी तरह स्वस्थ हो कर नौकरी जौइन करने जा रहा था. मां ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘बेटा, सुनिधि कब जाएगी?’’

‘‘नहीं मां मैं अब कभी नहीं जाऊंगी. मैं अपने और पराए में अंतर समझ चुकी हूं. मैं यह भी समझ चुकी हूं कि सिर्फ परिवार ही अपना होता है. सुनील ने अपनी पुरानी फैक्टरी में बात कर ली है और अगले महीने से वही ड्यूटी जौइन कर लेंगे,’’ किचन में से सुनील के लिए लंच का डब्बा ले कर निकलते हुए सुनिधि बोली.

‘‘सब मिल कर एकसाथ रहें, इस से बड़ी खुशी की बात क्या हो सकती है,’’ मां सुनील को दहीशक्कर खिलाते हुए बोली.

‘‘देखो सुधा, मैं कहता था न कि खून ही खून को पुकारता है,’’ पिताजी सुनील की मम्मी से बोल रहे थे.

‘‘हां, हमेशा घुटने ही पेट की तरफ मुड़ते हैं,’’ मां खुश हो कर बोलीं, आज उन्हें लग रहा था 7 वर्षों बाद ही सही पर उन का चयन सार्थक हुआ.

Family Kahani

Fictional Story: बीज- कैसी थी सीमा की जिंदगी

Fictional Story: ‘‘ज्यादा बकबक मत कर और चुपचाप नाश्ता करने बाहर आ जा,’’ सीमा ने अपनी आवाज और ऊंची कर के उसे डांटा, ‘‘मेरे आराम और सुखचैन की भी कभी फिक्र कर लिया करो तुम लोग. अभी नहाने से पहले मुझे कपड़े धोने की मशीन लगानी है. ओ नेहा की बच्ची, अब तो बाहर आ जा. आज घर की साफसफाई तुझे ही करनी है. 6 दिन औफिस की ड्यूटी निभाओ

और इतवार को घर में नौकरानी की तरह से काम करो. आप इन दोनों आलसियों को डांटते क्यों नहीं हो?’’

यह आखिरी वाक्य सीमा ने अपने पति मनोज को संबोधित कर के कहा जिन्होंने नाश्ता कर के अखबार के पन्ने पलटने शुरू ही किए थे. उन्होंने अखबार मोड़ कर मेज पर रखा और उठते हुए धीमे स्वर में बोले, ‘‘तुम नाश्ता मेज पर रख दो. जिसे जब खाना होगा खा लेगा.’’

‘‘इन दोनों को तुम ने ही बिगाड़ा हुआ है. मैं चिल्लाचिल्ला कर पागल हो जाऊं पर तुम्हारे कान पर जूं तक नहीं रेंगती है. आज तक तुम ने इन को सम?ाया कि मां की बात एक बार में मान…’’

‘‘इतना परेशान मत होओ. मशीन मैं लगा रहा हूं. तुम कोई और काम निबटा लो,’’ मनोज बालकनी की तरफ चल पड़े जहां वाशिंग मशीन रखी हुई थी.

सीमा ने कुछ पलों तक  उन की पीठ को गुस्से से घूरा और फिर से चिल्ला पड़ी, ‘‘मशीन मैं ही लगा लूंगी. तुम मंडी से हफ्तेभर की सब्जीफल ले आओ. मेरे बस का नहीं है वहां की भीड़ और गंदगी में धक्के खाना.’’

‘‘जो लाना है उस की लिस्ट बना दो. औनलाइन और्डर कर देता हूं,’’ कह वे बैडरूम की तरफ चल पड़े.

‘‘नेहा, जरा पैन और कागज दे जा. समीर, तू 2 मिनट में बाहर आ जा, नहीं तो मैं तेरे ऊपर पानी डालने आ रही हूं,’’ एक बार फिर से ऊंचा बोल कर सीमा थकीहारी सी सोफे पर बैठ अपने सिर का दर्द दूर करने को हाथों से कनपटियां मसलने लगी.

कुछ मिनट बाद नेहा ने उन के सामने पेपर व पैन रखा और फिर चिड़ी सी बोली, ‘‘आप ने आज नाश्ता जल्दी क्यों बनाया है? इतवार के दिन कौन घड़ी के हिसाब से चलता है?’’

‘‘जिस के सिर पर काम करने की जिम्मेदारी हो वह जरूर समय का ध्यान रखता है, राजकुमारीजी,’’ सिर को दबाना भूल सीमा फौरन अपनी बेटी के साथ उल?ाने को तैयार हो गई.

‘‘पूरे सप्ताह में सिर्फ एक रविवार का दिन मिलता है हम सब को इकट्ठे बैठ कर

हंसनेखाने का और आप उस दिन भी अपने हिसाब से चलती हो. शोर मचामचा कर घर की सुखशांति भंग करने से नहीं चूकती हो.’’

‘‘मुझे लैक्चर देने के बजाय घर की साफसफाई में जुट जा.’’

‘‘साफसफाई मैं परीक्षाओं के बाद करूंगी,’’ नेहा पैर पटकती अपने कमरे की तरफ लौट गई.

‘‘तू ने घर के कामों से बचने के लिए पढ़ाई का अच्छा बहाना पकड़ रखा है,’’ सीमा शोर मचाती रही तो कुछ देर बाद समीर भी आंखें मलता अपने कमरे से बाहर आ गया.

जब समीर ने अपने पिता को मोबाइल पर उल?ाते देखा तो उस ने फौरन खुद मोबाइल ले कर औनलाइन ग्रौसरी और्डर कर दी.

मनोज ने उसे रोकना चाहा तो उस ने जवाब दिया, ‘‘ठंड बहुत हो रही है और आप ऐसे मौसम में जल्दी बीमार पड़ जाते हो. मैं मोटरसाइकिल से मंडी चला जाता हूं.’’

बहुत देर बाद नेहा और समीर दोनों ने अपने कमरे में नाश्ता किया. आखिरी में जब सीमा नाश्ता करने बैठी तो उसे ठंडे परांठे खाने में मजा नहीं आया और चाय भी गरम नहीं रही थी.

‘‘नेहा, 1 कप चाय तो बना दे,’’ सीमा ने आवाज ऊंची कर के अपनी इच्छा बताई.

‘‘मैं पढ़ रही,’’ नेहा ने अपने कमरे में बैठेबैठे टका सा जवाब

दे दिया.

‘‘तू मेरे काम से बहुत बचती है,’’ सीमा को तेज गुस्सा आ गया.

‘‘तू पढ़ती रह. तेरी मां को चाय मैं पिला रहा हूं,’’ मनोज ने नेहा को बाहर आने से मना किया और खुद रसोई की तरफ चल पड़े.

‘‘ये दोनों आप के बिगाड़े

हुए हैं. मजाल है जो मेरी तरफ से बोलते हुए आप ने कभी इन्हें कुछ कहा हो.’’

‘‘तुम जरा प्यार से बोला करो. फिर देखना ये कैसे भागभाग कर तुम्हारे काम करने लगेंगे.’’

‘‘मैं इन की सेवा करतेकरते मर

भी जाऊं तो भी मु?ो वह दिन देखने को

नहीं मिलेगा जब मेरी औलाद भागभाग कर मेरा काम करेगी.’’

सीमा को अपने मन की शिकायतें कहने का और मौका नहीं मिला क्योंकि तभी उस की पड़ोसिन सहेली निशा की बेटी प्रिया उन के घर आ गई.

‘‘आंटी, हमारी मिक्सी खराब हो गई है

और मैं घर में सब को डोसा बना कर खिलाना चाहती हूं. आप की मिक्सी में ये दाल और

चावल पीसने आई हूं,’’ प्रिया ने अपने आने का कारण बताया.

‘‘हांहां, जरूर पीस ले पर डोसा हम सब को भी खिलाना पड़ेगा,’’ सीमा ने मजाक किया.

‘‘श्योर आंटी. आप सब भी डोसा खाने घर आ जाओ.’’

‘‘थैंक यू बेटी, पर मु?ो इतवार के दिन तो मरने की भी फुरसत नहीं होती है.’’

‘‘नेहा और समीर कहां हैं?’’

‘‘नेहा पढ़ रही है और समीर लाट साहब सो रहे हैं. इन दोनों का मु?ो रत्तीभर सहयोग नहीं मिलता है. पता नहीं मेरी जिंदगी में वह दिन कब आएगा जब मेरी बेटी मु?ो अपने हाथ से बना गरमगरम डोसा खिलाएगी.’’

‘‘डोसे बनाना मुश्किल काम नहीं है, आंटी.’’

‘‘उस के लिए तो मुश्किल ही है जो अगर ब्रैड भी सेंके, तो जला दे,’’ सीमा ऊंची आवाज में बोल रही थी ताकि अपने कमरे में बैठी नेहा भी उस की बातें सुन ले.

सीमा ने रसोई में घुसते ही मनोज से नेहा की शिकायत करी, ‘‘यह प्रिया आज अपने मातापिता को डोसे बना कर खिला रही है.

तुम्हारी बात तो दोनों बच्चे सुनते हैं. अपनी लाडली बेटी को सम?ाओ कि वह घरगृहस्थी के कुछ काम तो सीख ले, नहीं तो ससुराल में जा कर बहुत दुख पाएगी.’’

‘‘धीरेधीरे नेहा को भी सब आ जाएगा,’’ मनोज ने प्रिया के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और सीमा को ज्यादा नाराजगी जाहिर करने का मौका न देने के लिए रसोई से बाहर आ गए.

प्रिया के जाते ही समीर और नेहा अपनेअपने कमरे से बाहर आए और सीमा से

?ागड़ने लगे.

‘‘क्या जरूरत थी आप को उस के सामने मेरी इतनी सारी बुराइयां करने की,’’ नेहा बहुत खफा नजर आ रही थी.

‘‘मैं ने उसे असलियत ही बताई है. तुझे

बुरा लगा है और तू चाहती है कि मैं आएगए के सामने तेरी तारीफ करूं, तो अपनेआप को बदल न,’’ सीमा अपनी बेटी के बोलने के ढंग से चिड़ गई थी.

‘‘नेहा, तू इन से मत उल?ा क्योंकि ये तेरीमेरी भावनाओं को समझने की कभी कोशिश ही नहीं करती हैं. कभीकभी तो मुझे लगता है कि ये हम दोनों से मन ही मन नफरत करती हैं,’’ समीर गुस्से में अपनी बात कह कर वापस अपने कमरे में घुस गया.

समीर के इस आरोप को सुन सीमा बहुत जोर से भड़क उठी, ‘‘मैं तुम से नफरत करती तो बसों में धक्के खा कर रोज नौकरी करने न जाती. ये जो तुम दोनों बढि़या कपड़े पहनते हो, अच्छा खाते हो और अच्छे स्कूल में पढ़ते हो, इसीलिए संभव है क्योंकि तुम्हारी मां डबल मेहनत कर रही है. मेरे ऊपर काम का इतना बोझ है कि अब कमर का दर्द मेरा पीछा नहीं छोड़ता है. शर्म नहीं आई तुझो यह कहते हुए कि मैं तुम दोनों से नफरत करती हूं?’’

‘‘सारा दिन बोलबोल कर तुम्हारी जीभ क्यों नहीं दुखती है?’’ नेहा ने व्यंग्य किया और फिर सीमा के तीखे शब्दों की बौछार से बचने के लिए अपने कमरे में घुस गई.

‘‘यह दिनबदिन कितनी ज्यादा बदतमीज होती जा रही है. आप इसे डांटते क्यों नहीं हो?’’ सीमा मनोज पर गुस्सा हो उठी.

‘‘कमर का दर्द कम करने वाली गोली

ला कर दूं?’’ मनोज ने विषय बदलने की

कोशिश करी.

‘‘गोली मारो दर्द की गोली को. यों ही भागतेदौड़ते एक दिन मेरे प्राण निकल जाएंगे पर धन्यवाद शब्द मु?ो कभी सुनने को नहीं मिलेगा.’’

‘‘आप अपना गुणगान करने से रुको तो ही कोई दूसरा आप को धन्यवाद दे पाएगा न,’’ समीर अपने कमरे में से ही चिल्ला कर बोला.

‘‘पापा आप का हर काम में बराबर हाथ बंटाते हैं. क्या आप ने कभी उन्हें धन्यवाद दिया है?’’ नेहा ने अपने कमरे में से चुभते लहजे

में पूछा.

‘‘कितनी बेइज्जती होने लगी है मेरी इस

घर में. कैसे आदमी हो आप… इन दोनों के

2-2 तमाचे लगा कर आप इन्हें मेरी इज्जत करना नहीं सिखा सकते हो?’’ सीमा मनोज से उलझने को तैयार हो गई तो वे उस के पास से उठ कर अपने कमरे में चले गए.

इस के बाद सीमा घर में सारा दिन मुंह सुजाए घूमती रही. नेहा और समीर भी उस के सामने पड़ने से बचते रहे. मनोज ने खामोश रह कर उस के हर काम में हाथ बंटाया, पर सीमा का मूड नहीं सुधरा.

शाम को दोनों बच्चे बाजार घूमने जाना चाहते थे.

सीमा ने तबीयत ठीक न होने का बहना बना कर साथ चलने से इनकार कर दिया.

वह चाहती थी कि दोनों बच्चे उसे मनाएं, अपने खराब व्यवहार के लिए माफी मांगें, पर नेहा और समीर ने ऐसा करने के बजाय बाजार जाने का कार्यक्रम ही कैंसिल कर दिया तो सीमा का मुंह और ज्यादा सूज गया.

सीमा ने रात का खाना बनाने में भी कोई दिलचस्पी नहीं ली तो समीर बाजार से छोलेभठूरे ले आया. सीमा को भूख लगी थी, पर उस ने नाराजगी दिखाने के लिए एक टुकड़ा तक नहीं खाया. उन तीनों ने चुपचुप खाना खाया और फिर सीमा को टीवी के सामने बैठा छोड़ छत पर घूमने चले गए.

रात को अपने मनपसंद सीरियल देखने के बाद सीमा शयनकक्ष के पास पहुंची तो अंदर से आ रही उन तीनों की आवाजें सुन दरवाजे के पास ठिठक कर रुक गई.

‘‘पापा, मुझे मैथ की ट्यूशन लेनी पड़ेगी,’’ नेहा की आवाज में चिंता के भाव ?ालक रहे थे.

‘‘कितना खर्चा आएगा?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘2000 हर महीने देने पड़ेंगे.’’

‘‘अगर जरूरी है तो ट्यूशन ले लो.’’

‘‘जब मां को पता लगेगा तो वे ताने मारमार कर मेरा जीना मुश्किल कर देंगी.’’

‘‘तुम उन की बातों का बुरा न माना करो.’’

इस के बाद समीर ने अपनी समस्या बताई, ‘‘पापा, कुछ दूर भागने पर मेरी सांस फूल जाती है सारा दिन थकाथका सा भी रहता हूं.’’

‘‘कल शाम को डाक्टर उमेश से तुम्हारा चैकअप करा लेते हैं. तुम सुबह पार्क में घूमने जाना भी शुरू कर दो. बाहर का खाना खाने से भी बचो,’’ मनोज ने सलाह दी.

‘‘आप कितनी शांति से हमारी बात सुनते हो. आप की जगह मम्मी होतीं तो भैया को अब तक न जाने कितनी डांट पड़ चुकी होती,’’ नेहा की आवाज में अपने पिता के लिए बहुत प्यार ?ालक रहा था.

उन के बीच चल रही सुखदुख की चर्चा और आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि सीमा कमरे में घुस आईर् थी. जब उस ने देखा कि समीर अपने पिता के पैर दबा रहा है और नेहा उन के सिर की मालिश कर रही है, तो वह ताना मारने से नहीं चूंकी, ‘‘पिता की कैसी बढि़या सेवा चल रही है. अरे, कभी अपनी मां को भी खुश कर दिया करो. मैं मानती हूं कि मु?ो में सिर्फ बुराइयां ही बुराइयां हैं, पर बच्चों से सेवा कराने का सुख पाने को मेरा भी मन करता है.’’

‘‘मेरा कल ऐग्जाम है. समीर कर देगा आप की सेवा,’’ नेहा फौरन पलंग से उतर कर खड़ी

हो गई.

‘‘मुझे तो बहुत जोर से नींद आ रही है,’’ समीर भी अपने कमरे में जाने को तैयार हो गया.

‘‘तुम दोनों ही एहसानफरामोश हो,’’ अपने दोनों बच्चों को कमरे से बाहर जाने को तत्पर देख सीमा गुस्से से फट पड़ी.

‘‘मां, आप का सारा दिन तो गुस्सा करतेकरते बीत गया है. अब सोने के टाइम तो प्लीज शांत हो जाओ,’’ समीर अचानक भावुक

हो उठा.

‘‘अपनी नहीं तो पापा की सेहत का खयाल करो, मां. आप घर में 24 घंटे जो टैंशन का माहौल बनाए रखती हो, उस कारण ही पापा का ब्लड प्रैशर हाई रहने लगा है,’’ चिढ़ी नजर आ रही नेहा अपनी मां का कड़वा जवाब सुनने को रुकी नहीं और कमरे से बाहर निकल गई.

‘‘यह लड़की आप की बिगाड़ी हुई है. इसे आप ने जोर से डांटा क्यों नहीं?’’ सीमा की आंखों में एकाएक आंसू भर आए.

‘‘तुम्हारा सिरदर्द कैसा है,’’ मनोज ने अपनी आदत के अनुरूप ?ागड़े की बात को बदलने की कोशिश करी.

‘‘सिर फटा जा रहा है दर्द के मारे.’’

‘‘लाओ, मैं आप का सिर दबा दूं,’’ समीर सिर दबाने को उन की तरफ खिसक गया.

‘‘मुझे नहीं चाहिए किसी की दया,’’ सीमा ने बहुत जोर से अपने बेटे का हाथ ?ाटक कर दूर कर दिया.

मां के खराब व्यवहार से समीर को पहले तेज ?ाटका लगा और वह एक शब्द भी बोले बगैर रोनी सूरत लिए कमरे से बाहर चला गया.

‘‘मैं नेहा की कुछ डाइग्राम बना कर सोऊंगा,’’ मनोज भी बच्चों को शांत करने के इरादे से उठ खड़े हुए.

‘‘ये बच्चे मेरी जो बातबात में बेइज्जती करते हैं, उस का कारण सिर्फ तुम हो,’’ सीमा खीज कर मनोज पर चिल्ला उठी.

‘‘आप बिलकुल गलत कह रही हो,’’ समीर जाते-जाते ठिठक कर रुका और मां को सुनाने लगा, ‘‘असली कारण है आप को पापा से ज्यादा पगार मिलने का घमंड है और आप घर में सब को दबा कर रखना चाहती हो. आप ही कहां हमें प्यार और इज्जत देती हो. जिंदगी में इंसान जैसा बोलता है वैसा ही…’’

‘‘समीर, एक शब्द भी आगे मत बोलना,’’ मनोज ने उसे शांत लहजे में हिदायत दी तो वह फौरन चुप हो गया.

‘‘अपनी मम्मी से सोरी बोलो.’’

‘‘सौरी, मम्मी,’’ समीर ने अपने पापा का कहा टाला नहीं और सीमा से माफी मांग कर कमरे से बाहर चला गया.

‘‘हमारे बच्चे बहुत अच्छे हैं, सीमा. उन की बातों का बुरा न माना करो,’’ मनोज ने सीमा को सम?ाने की कोशिश करी, पर उस की आंखों में गुस्से के भाव पढ़ कर वे आगे कुछ नहीं बोले और नेहा की फाइल पूरी करने चले गए.

कमरे में अकेली बची सीमा अचानक रोने लगी. वह इस वक्त अपने-आप को

बहुत गहरी उदासी और अकेलेपन का शिकार बना हुआ पा रही थी.

‘मैं ने इन सब के लिए इतना किया और बदले में मु?ो इस घर में किसी से न इज्जत मिली है न प्यार, न धन्यवाद के 2 मीठे बोल,’ यह विचार बारबार उस के मन में उठ कर उसे लगातार रुलाए जा रहा था.

कुछ देर बाद सीमा ने उठ कर सिरदर्द की गोली खाई और करवटें बदलती नींद आने का इंतजार करने लगी. कुछ देर बाद दर्द कम होने के साथ उस के आंसू सूखने लगे और मन में अपने पति व बच्चों के लिए शिकायत और गुस्से के भाव पलपल बढ़ने लगे. अपने दुख के बीज वह खुद ही बोती है, यह सबक सीखने से वह आज भी वंचित रह गई.

Fictional Story

लघु स्टोरी: देर से जगे- आखिर बुआ जी से क्या गलती हो गई?

लघु स्टोरी: ताला खोलते ही खिड़कियों के परदे सरकाते हुए मेरी नजर आयरन बोर्ड पर पड़ गई. ‘ओह, आज क्या हो जाता अगर आयरन आटोमैटिक न होती या फिर स्टैंड पर खड़ी कर के न रखी होती. इतने सारे प्रैस के कपड़े पास ही कुरसी पर रखे हुए थे. अगर यह आग खिड़की के परदों में लगती, फिर इसी तरह और कपड़ों में, सारा कमरा धूधू कर के… पीछे वाले कमरे में रामदुलारी सो रही थी. जब तक वह शोर मचाती, लोग आते, तब तक न जाने क्या हो जाता. लाचार व बेसहारा दुलारी कुछ कर भी नहीं पाती. उस का बेटा श्यामू तो रात को ही वापस आता. तब तक न जाने क्याक्या हो जाता…’ मैं बड़बड़ा रही थी.

‘‘क्या हुआ, मां?’’  रीतू, मीनू ने घबरा कर पूछा.

‘‘क्या बात है, बूआजी?’’  दीपाली ने कहा.

‘‘सब ठीकठाक तो है न. चलो, खैर मनाओ कुछ हुआ नहीं,’’ साहिल ने कहा.

‘‘सौरी बूआजी, मैं ने अपना सूट प्रैस किया था. मैं ही जल्दी में स्विच औफ करना भूल गई थी,’’ दीपाली अपनी गलती पर पछता रही थी.

‘‘चलो, कोई बात नहीं,’’ कह कर मैं मन ही मन कुछ सोचने लगी.

‘‘1 कप चाय मिलेगी गरीब को,’’ साहिल ने चाय मांगने का रटारटाया नुसखा आजमाया.

चाय बनाने मैं रसोई में आ गई. नीली लपटों से चाय के पानी में उबाल के साथसाथ मेरे विचारों में भी उबाल आ रहे थे. मैं यादों के गलियारे में पहुंच गई. जब दीपाली मुश्किल से 8-9 महीने की होगी. उसे गोद में ले कर कुछ न कुछ खेल उस के साथ मैं खेलती थी. रजाईगद्दे के बक्से के ऊपर एक छोटा बक्सा रखा रहता था, जहां प्रैस रखी रहती थी. दीपाली जब कभी रोती या किसी चीज को पाने का हठ करती तो मैं उसे बक्से पर खड़ा कर के आयरन का स्विच औनऔफ कराती. इस औनऔफ के खेल को देख कर भाभी ने दबी जबान से कहा भी था, ‘‘अगर भूल से कभी स्विच औन रह गया तो?’’

‘‘हुंह ऐसे कैसे भूल हो जाएगी?’’ मैं ने टका सा जवाब दे कर भाभी को चुप करा दिया था.

मगर एक दिन वही हुआ, जिस का डर भाभी को हमेशा रहता था. जिस बक्से पर प्रैस औन रखी थी, उस बक्से की चादर और बिछा हुआ कंबल झुलस कर काले हो गए थे. बक्से में रखे हम दोनों बहनों के सूट प्रैस की गरमी से धीरेधीरे सुलगते रहे और जब उन्हें परदे की रौड से निकाला गया, वे जले कागज की तरह बिखर गए थे. जो कपड़े जलने से बच भी गए थे, वे भी पहनने के काबिल नहीं रहे थे. तह की तह काली हो रही थी. कोई भी सूट पूरा इस हालत में नहीं था कि पहना जा सके.

घर की माली हालत भी उन दिनों अच्छी नहीं चल रही थी. कुछ महीने पहले दीदी की शादी हुई थी. दीपाली का जन्म भी सीजेरियन से हुआ था. 1-1 कर के खर्चे बढ़ रहे थे. ऐसे में इतना बड़ा नुकसान. अंदर ही अंदर मुझे कुछ कचोट रहा था.

अगले दिन हम लोगों के कई सूट बाजार से आए थे. कितनी मुश्किल हुई होगी भैयाभाभी को, क्या हम लोग इस बात से अनभिज्ञ थे? पिताजी के गुजरने के बाद सारी जिम्मेदारी भैया पर ही आ गई थी. भैया अंदर ही अंदर मन मसोस कर रह गए थे. शायद भाभी ने ही उन्हें कुछ भी कहने से मना कर दिया हो. कुछ ही दिनों में बात आईगई हो गई. हां, भाभी आयरन का प्लग निकाल कर रखने लगी थीं. ‘‘तुम चाय बना रही हो या काढ़ा?’’ साहिल ने हंस कर गुहार लगाई. ‘‘ओह,’’ कहते हुए मैं ने देखा, चाय का पानी सूख कर जरा सा रह गया था.

जल्दीजल्दी दोबारा चाय बना कर टे्र लेकर मैं अंदर आई और बच्चों को आवाज दी. ‘‘आज मेरी गलती से बहुत बड़ा नुकसान हो सकता था,’’ दीपाली बारबार अपनी बात दोहरा कर दुखी हो रही थी. डाकपत्थर और राजाजी नैशनल पार्क घूम कर वापस आते समय चहक रही थी. लेकिन अब कितनी उदास है, पछता रही है. ‘‘अच्छा बताओ, दीपाली, तुम्हें देहरादून कैसा लगा?’’ साहिल ने माहौल बदलने की कोशिश की. ‘‘सौरी फूफाजी, आप ने मुझे इतना घुमाया और मैं ने…’’ ‘‘अब कोई बात नहीं होगी इस बारे में,’’ साहिल ने दीपाली की बात काटते हुए कहा. लेकिन आज से 22 वर्ष पहले दीपाली को गोद में ले कर आयरन का स्विच औन छोड़ कर जो गलती मैं ने की थी, उस के लिए मैं ने अफसोस करना तो दूर, एक बार भी भैयाभाभी से माफी तक नहीं मांगी थी.

आज मेरे घर होने वाले नुकसान की कल्पना मात्र से दीपाली इतनी उद्विग्न हो रही है. तब इतने नुकसान के बाद भी हम लोगों के चेहरों पर कोई शिकन तक नहीं आई थी.सच, कितने नाशुके्र थे हम लोग. सोचसोच कर आज मुझे अपराधबोध हो रहा था. इतने बरस बाद भाभी से माफी मांगने के लिए मैं ने रिसीवर उठा कर फोन नंबर मिलाना शुरू कर दिया.

लघु स्टोरी

Hindi Short Story: आदमी का स्वार्थ- पेड़ के पास क्यों आता था बच्चा

Hindi Short Story: उस बालक को मानो सेब के उस पेड़ से स्नेह हो गया था और वह पेड़ भी बालक के साथ खेलना पसंद करता था. समय बीता और समय के साथसाथ नन्हा सा बालक कुछ बड़ा हो गया. अब वह रोजाना पेड़ के साथ खेलना छोड़ चुका था. काफी दिनों बाद वह लड़का पेड़ के पास आया तो बेहद दुखी था.

‘‘आओ, मेरे साथ खेलो,’’ पेड़ ने लड़के से कहा.

‘‘मैं अब नन्हा बच्चा नहीं रह गया और अब पेड़ पर नहीं खेलता,’’ लड़के ने जवाब दिया, ‘‘मुझे खिलौने चाहिए. इस के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं. मैं पैसे कहां से लाऊं?’’

‘‘अच्छा तो तुम इसलिए दुखी हो?’’ पेड़ ने कहा.

‘‘मेरे पास पैसे तो नहीं हैं, पर तुम मेरे सारे सेब तोड़ लो और बेच दो. तुम्हें पैसे मिल जाएंगे.’’

यह सुन कर लड़का बड़ा खुश हुआ. उस ने पेड़ के सारे सेब तोड़ लिए और चलता बना. इस के बाद वह लड़का फिर पेड़ के आसपास दिखाई नहीं दिया. पेड़ दुखी रहने लगा.

अचानक एक दिन लड़का फिर पेड़ के पास दिखाई दिया. वह अब जवान हो रहा था. पेड़ बड़ा खुश हुआ और बोला, ‘‘आओ, मेरे साथ खेलो.’’

‘‘मेरे पास खेलने के लिए समय नहीं है. मुझे अपने परिवार की चिंता सता रही है. मुझे अपने परिवार के लिए सिर छिपाने की जगह चाहिए. मुझे एक घर चाहिए. क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो?’’ युवक ने पेड़ से कहा.

‘‘माफ करना, मेरे बच्चे, मेरे पास तुम्हें देने के लिए कोई घर तो नहीं है, हां, अगर तुम चाहो तो मेरी शाखाओं को काट कर अपना घर बना सकते हो.’’

युवक ने पेड़ की सभी शाखाओं को काट डाला और खुशीखुशी चलता बना. उस को प्रसन्न जाता देख कर पेड़ प्रफुल्लित हो उठा. इस तरह नन्हे बच्चे से जवान हुआ दोस्त फिर काफी समय के लिए गायब हो गया और पेड़ फिर अकेला हो गया, उस की हंसीखुशी उस से छिन गई.

काफी समय बाद अचानक एक दिन गरमी के दिनों में वही युवक  से अधेड़ हुआ व्यक्ति पेड़ के पास आया तो पेड़ खुशी से फूला नहीं समाया, मानो उस की जिंदगी वापस आ गई हो. पेड़ ने उस से कहा, ‘‘आओ, मेरे साथ खेलो.’’

‘‘मैं बहुत दुखी हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘अब मैं बूढ़ा होता जा रहा हूं. मैं एक जहाज पर लंबे सफर पर निकलना चाहता हूं ताकि आराम कर सकूं. क्या तुम मुझे एक जहाज दे सकते हो?’’

‘‘मेरे तने को काट कर जहाज बना लो. तुम इस जहाज से खूब लंबा सफर करना और बस, अब खुश हो जाओ,’’ बालक से अधेड़ बने व्यक्ति ने पेड़ के तने से एक जहाज बनाया और सफर पर निकल गया और फिर गायब हो गया.

काफी समय के बाद वह पेड़ के पास फिर पहुंचा.

‘‘माफ करना मेरे बच्चे, अब मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं बचा है. अब तो सेब भी नहीं रहे,’’ पेड़ ने बालक से कहा.

‘‘मेरे दांत ही नहीं हैं कि मैं सेब चबाऊं,’’ उस ने उत्तर दिया.

‘‘अब वह तना भी नहीं बचा जिस पर चढ़ कर तुम खेलते थे.’’

‘‘अब मेरी उम्र मुझे पेड़ पर चढ़ने की इजाजत नहीं देती,’’ रुंधे गले से उस ने कहा.

‘‘मैं सही मानों में तुम्हें कुछ दे नहीं सकता. अब मेरे पास केवल मेरी बूढ़ी मृतप्राय जड़ें ही बची हैं,’’ पेड़ ने आंखों में आंसू ला कर कहा.

‘‘अब मैं ज्यादा कुछ नहीं चाहता. चाहता हूं तो बस एक आराम करने की जगह. मैं इस उम्र में अब बहुत थका सा महसूस कर रहा हूं,’’ उस ने कहा.

‘‘वाह, ऐसी बात है. पेड़ की पुरानी जड़ें टेक लगा कर आराम करने के लिए सब से बढि़या हैं. आओ मेरे साथ बैठो और आराम करो,’’ पेड़ ने खुशीखुशी उस को आराम करने की दावत दी.

वह टेक लगा कर बैठ गया.

ये सेब के पेड़ हमारे अभिभावकों की तरह हैं. जब हम बच्चे होते हैं तो पापामम्मी के साथ खेलना पसंद करते हैं. जब हम पलबढ़ कर बड़े होते हैं तो अपने मातापिता को छोड़ कर चले जाते हैं और उन के पास गाहेबगाहे अपनी जरूरत से ही जाते हैं, जब कोई ऐसी जरूरत आन पड़ती है जिसे खुद पूरा करने में असमर्थ होते हैं. इस के बावजूद हमारे अभिभावक ऐसे मौकों पर हमारी सब जरूरतें पूरी कर हमें खुश देखना चाहते हैं.

आदमी कितना कू्रर है कि उस सेब के पेड़ का फल तो फल उस की शाखाएं और तने तक काट डालता है, वह भी अपने स्वार्थ की खातिर. इतना कू्रर कि पेड़ काटते समय उसे जरा भी उस पेड़ पर दया नहीं आई, जिस के साथ बचपन से खेला, उस के फल खाए और उस के साए में मीठी नींद का मजा लिया.

Hindi Short Story

Romantic Story in Hindi: मखमली पैबंद- एक अधूरी प्रेम कहानी

Romantic Story in Hindi: मेरी उंगलियां गिटार के तारों पर लगातार थिरक रही थीं और कंठ किसी मशहूर इंगलिश सिंगर के गानों की लय में डूबता चला जाता था. मेरे सामने एक छोटी सी बच्ची जिस की उम्र लगभग 5 वर्ष रही होगी उस इंगलिश गाने की धुन पर थिरक रही थी. उस के गोलमटोल चेहरे पर घुंघराले बालों का एक गुच्छा बारबार लटक आता था जिसे वह बड़ी ही बेपरवाही से पीछे की ओर झटक देती और बीचबीच में कभी अपनी मम्मी तो कभी पापा की उंगलियों को थाम अपने साथ डांस करने के लिए सामने की मेज से खींच लाती.

बच्ची के मातापिता की आंखों में अपनी बच्ची के इंगलिश गानों के प्रति प्रेम व लगाव से उत्पन्न गर्व उन की आंखों से साफ झलक रहा था. इन इंगलिश गानों का अर्थ वह बच्ची कितना समझ पा रही थी, यह तो नहीं पता, परंतु हां फाइवस्टार होटल के उस डाइनिंगहौल में उपस्थित सभी मेहमानों के लिए वह बच्ची आकर्षण का केंद्र अवश्य बनी हुई थी.

मैं इस समय नील आइलैंड के एक फाइवस्टार होटल के डाइनिंगहौल में गिटार थामे होटल के मेहमानों के लिए उन की फरमाइशी गीतों को गा रहा था. यह डाइनिंगहौल होटल के बीच में केंद्रित था और इस से करीब 20 गज की दूरी पर कौटेज हाउस बने हुए थे, जिन की संख्या लगभग 25 से 30 होगी. लोगों के लिए गाना गा कर उन का दिल बहलाना मेरा शौक नहीं, बल्कि मेरा पेशा  था. हां, संगीत का यह शौक कालेज के दिनों में मेरे लिए महज टाइम पास हुआ करता था.

संगीत के इसी शौक ने तो नायरा को मेरे करीब ला दिया था. वह मुझ से अकसर गानों की फरमाइश करती रहती थी और मैं तब दिल खोल कर बस उस के लिए ही गाता था. कालेज की कैंटीन में जब उस दिन भी मैं कालेज में होने वाले वार्षिक समारोह के लिए अपने दोस्तों के साथ किसी गाने की प्रैक्टिस कर रहा था. तभी तालियों की आवाज ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा. नायरा से कालेज की कैंटीन में मेरी वह पहली मुलाकात थी. कालेज की पढ़ाई खत्म करने के बाद जहां मुझे  किसी कंपनी में फाइनैंस ऐग्जिक्यूटिव की जौब मिली, वहीं नायरा किसी मल्टीनैशनल कंपनी में एचआर मैनेजर के पद पर तैनात हुई. हम दोनों एक ही शहर मुंबई में ही 2 अलगअलग कंपनियों में कार्यरत थे. हम ने किराए का फ्लैट ले लिया था जिस में हम साथ रहते थे. हम लिव इन में 4 सालों से थे.

एक दिन अचानक मेरा तबादला कोलकाता हो गया. कोलकाता आने पर भी हमारा साथ पूर्ववत बना रहा. वीकैंड में कभी वह कोलकाता आ जाती तो कभी मैं मुंबई पहुंच जाता और साथ में अच्छा समय व्यतीत करने के बाद वापस अपनेअपने कार्यस्थल लौट जाते. लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि मेरी जौब चली गई और धीरेधीरे नायरा का साथ भी. जौब जाने के बाद से ही वह मुझ से कटीकटी सी रहने लगी थी. हमारे बीच की दूरियां लगातार बढ़ती जा रही थीं. हालांकि मेरी पूरी कोशिश रही कि हमारे बीच की दूरियां मिट जाएं.

खैर, आज मैं इस छोटे से आइलैंड के बड़े से होटल में गिटार बजा रहा हूं और मेरा शौक ही अब मेरा पेशा बन गया है.

‘‘ऐक्स्क्यूज मी’’ मैं ने पानी पी कर गिलास साइड की टेबल पर रखा ही था कि तभी एक महिला की आवाज सुनाई दी जिस ने मुसकराते हुए ‘कैन यू सिंग दिस सौंग’ बोल कर कागज का एक टुकड़ा जिस पर किसी हिंदी गाने की कुछ पंक्तियां लिखी हुई थीं. मेरी और बढ़ाते हुए कहा. उस की उम्र करीब 28 वर्ष की रही होगी.

उस ने अपने सवाल फिर से दोहराया, ‘‘क्या आप यह हिंदी गाना गा सकते हैं? यह उन की फरमाइश है,’’ यह कहते हुए उस महिला ने अपनी उंगली से एक ओर इशारा किया.

मेरी आंखों ने उस की उंगली का अनुकरण किया. मेरी नजर मेरे से कुछ दूरी पर मेरी दाईं तरफ की मेज पर बैठी उस महिला से जा टकराई. उस की आंखों में गजब का आकर्षण था. वह बड़े प्यार से मेरी ओर देखते हुए मुसकराई तो मैं ने हामी में सिर हिला दिया और फिर मेरी उंगलियों ने गिटार के तारों पर थिरकना शुरू कर दिया.

मैं ने उस महिला की फरमाइश के गीत को अभी खत्म ही किया था कि उस ने एक और हिंदी गाने की फरमाइश कर दी. इस बार वह महिला स्वयं मेरे सामने खड़ी थी. इस से पहले उस महिला की सहेली थी. गाने के बोल थे, ‘‘नीलेनीले अंबर पे…’’

धीरेधीरे रात बीतती जा रही थी और होटल का डाइनिंगहौल भी एकएक कर खाली होने लगा था, लेकिन वह महिला अब भी वहीं बैठी हुई थी.  मंत्रमुग्ध सी मेरी ओर देखे जा रही थी. उस का इस प्रकार मुझे एकटक देखना मेरे अंदर झिझक  पैदा कर रहा था. मैं ने अपने गिटार पैक किए और चलने की तैयारी की. उस महिला की बाकी सहेलियां भी जा चुकी थीं और शायद अब वह भी डाइनिंगहौल से बाहर निकलने ही वाली थी कि अचानक मौसम बेहद खराब हो चला. बाहर तेज गरज के साथ बारिश शुरू हो गई थी. आइलैंड पर अचानक साइक्लोन का आना और मौसम का इस तरह खराब होना सामान्य बात थी.

मुझे इस बात का पूर्व अंदेशा था फिर भी अपने किराए के कमरे से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर यहां आना मेरी मजबूरी थी. यह आइलैंड न तो  बहुत बड़ा है और न ही यहां की आबादी ही इतनी ज्यादा है. यहां की जितनी आबादी है उतनी तो मेरे शहर कोलकाता में किसी शादी में बरात में ही लोग आते होंगे. खैर, अमूमन यहां हरकोई एकदूसरे को पहचानता था. वैसे मेरी जानपहचान यहां के लोगों से उतनी अधिक अभी नहीं हुई थी क्योंकि यहां रहते हुए मुझे बामुश्किल 1 महीना हुआ होगा और दूसरा मैं अपनी शर्मीले  स्वभाव के कारण लोगों से कम ही घुलतामिलता हूं.

‘‘कृपया आप इस छाते के अंदर आ जाइए बाहर बारिश बहुत तेज है,’’ मैं जैसे ही डाइनिंगहौल से कांच के बने उस दरवाजे से बाहर निकला कि वह महिला उस बड़े से छाते का एक हिस्सा मेरी ओर करते हुए मु?ा से छाते के अंदर आने का आग्रह करने लगी.

‘‘जी धन्यवाद, मेरे पास खुद का रेनकोट है, आप बेकार में परेशान न हों,’’ मैं ने अपने बैग को टटोला, लेकिन यह क्या रेनकोट आज मैं घर पर ही भूल आया था. मुझे अपनी लापरवाही पर गुस्सा आया.

‘‘कोई बात नहीं आप इस छाते के अंदर आ सकते हैं. वैसे भी यह काफी बड़ा है. आप इतनी रात गए इस तूफान में वापस कैसे जाएंगे?’’ उस ने मेरे प्रति चिंता जाहिर करते हुए पूछा, ‘‘मेरे विचार से, आप जब तक मौसम ठीक नहीं हो जाता कुछ घंटे मेरे साथ मेरे कौटेज हाउस में रुक सकते हैं तूफान थमने के बाद वापस जा सकते हैं. वैसे आप के पास घर जाने का क्या कोई साधन है?’’

मैं ने खामोशी से इनकार में सिर हिलाया. संजोग से मेरी बाइक को भी आज ही खराब होना था.

‘‘इस वक्त आप को कोई औटोरिकशा भी शायद ही मिले,’’ उस की बातों में सचाई थी.  सच में ऐसे मौसम में बाहर किसी भी तरह की सवारी का मिल पाना मुश्किल था. चारों ओर  सन्नाटा पसरा था. मैं ने नोटिस किया डाइनिंगहौल खाली हो चुका था. मैं ने कलाई घड़ी पर नजर दौड़ाई. रात के 11:30 बज रहे थे. अब मैं बिना कोई सवाल किए उस के साथसाथ चल पड़ा. हम दोनों डाइनिंगहौल वाले एरिया से निकल कर थोड़ी दूर आ चुके थे.

 

सामने गार्डन में लगा पाम ट्री बड़ी तेजी के साथ हिल रहा था. हवा का तेज झोका मानो जैसे उस की मजबूती को बारंबार चुनौती दे रहा था. तेज तूफानी हवा जब उस के ऊपर से हो कर गुजरती तो वह एक ओर झक जाता और फिर वापस उसी मजबूती के साथ तन कर खड़ा हो जाता. मालूम नहीं, वह इस तूफान का मुकाबला कब तक कर पाएगा? तेज हवा का एक गीला झोंका हमारे ऊपर से हो कर निकला और छाते  को अपने साथ उड़ा ले गया.

‘‘मौसम तो बहुत ही ज्यादा खराब हो चला है,’’ कह वह महिला मेरे करीब आ गई थी.

मैं ने गौर से देखा बारिश की तेज बौछार के कारण वह महिला बिलकुल भीग चुकी थी. बिजली की तेज कौंध से उस का चेहरा चमक उठता था और उस के होंठ शायद सर्द हवाओं के कारण कांप रहे थे. मैं ने एक सभ्य और शालीन पुरुष की भूमिका अदा करते हुए अपना कोट उतार कर उस के कंधों पर टिका दिए जोकि लगभग गीले हो चुके थे.

मेरे द्वारा ऐसा करने पर वह महिला खिलखिला कर हंस पड़ी और मेरा कोट वापस मुझे पकड़ाते हुए बोली, ‘‘इस की कोई जरूरत नहीं.’’

इतने सन्नाटे में और ऐसी स्थिति में उस का इतने जोर से हंसना मुझे बिलकुल पसंद नहीं आया. हालांकि तभी मुझे अपनी इस बेवकूफी

पर गुस्सा भी आया. मैं ने गंभीर होते हुए पूछा, ‘‘आप का कौटेज हाउस कौन सा है?’’ क्योंकि होटल के डाइनिंग एरिया से 20 गज की दूरी पर करीब 25 से 30 की संख्या में कौटेज हाउस बने हुए हैं, जिन में से हरेक कौटेज एकदूसरे से लगभग 50 कदम की दूरी पर स्थित है.

होटल समुद्र किनारे था. अत: लहरों का शोर उस सन्नाटे में सिहरन पैदा कर रहा था. स्ट्रीट लाइट के धुंधले से प्रकाश में हम दोनों एकदूसरे को सहारा देते हुए तेज कदमों के साथ चल रहे थे. थोड़ी ही देर में हम कौटेज के बाहर थे. उस ने दरवाजे का लौक खोला और कमरे के अंदर जाते हुए मुझे भी हाथ के संकेत से अंदर आने के लिए कहा. मैं संकोचवश दरवाजे पर ही खड़ा रहा.

‘‘आप अंदर आ जाइए,’’ उस ने जब फिर से मुझे अंदर आने के लिए कहा तो मैं थोड़ा सोचते हुए कमरे के अंदर आ गया.

‘‘आप की सहेलियां क्या आप के साथ नहीं ठहरी हैं?’’ मैं ने देखा कि इतने बड़े कौटेज हाउस में वह महिला अकेली ठहरी हुई थी.

‘‘हम सभी अलगअलग ठहरे हुए हैं. मैं यहां अकेली ही ठहरी हूं. हम सभी पोर्ट ब्लेयर से साथ आई थीं. हमारा किट्टी ग्रुप है, हर एज की महिलाएं हैं. कुछ तो अपने बच्चों को भी साथ लाई हैं, लेकिन मुझे जरा शांत और अकेले रहना पसंद है इसलिए मैं ने यहां कौटेज हाउस लिया है. आप चिंता न करें आप के यहां रुकने से मुझे कोई परेशानी नहीं है,’’ कहते हुए वह महिला बाथरूम में चली गई और मैं वहां लगे सोफे पर पसर गया, जोकि उस के बैडरूम के साथ ही लगा था. थोड़ी देर में जब वह चेंज कर के लौटी तब भी मैं उस सोफे पर था, न जानें किस गहरी सोच में डूबा हुआ. ‘‘आप ने अभी तक चेंज नहीं किया? आप के कपड़े तो बिलकुल गीले हो चुके हैं.’’ ‘‘नहीं, मैं अपने साथ…’’ मैं कहने ही वाला था कि मेरे पास ऐक्स्ट्रा कपड़े नहीं हैं.   उस ने अपना ट्रैक सूट मुझे थमाते हुए कहा, ‘‘आप इसे तब तक पहन सकते हैं जब तक आप के कपड़े सूख नहीं जाते.’’ मैं मना नहीं कर सका क्योंकि मेरे पास इस के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था. थोड़ी देर बाद मैं लेडीज ट्रैक सूट में था जोकि मेरी माप का बिलकुल नहीं था.

मैं ने अपनी पतलून और शर्ट वहीं चेयर पर पंखे के नीचे फैला दी.

‘‘आप के पति क्या काम करते हैं?’’ मैं ने उस के गले में लटकते मंगलसूत्र की ओर देखते हुए पूछा. हालांकि मुझे यह खुद भी पता नहीं था कि क्या मैं सच में इस सवाल का उत्तर जानना चाहता था, लेकिन शायद माहौल को सहज बनाने के लिए, बातचीत की पहल के लिए मैं ने यह सवाल किया.

इस का जवाब उस ने बड़े ही शांत भाव से दिया, ‘‘बिजनैस?’’ उत्तर काफी संक्षिप्त था. इस के बाद कुछ पल के लिए कमरे में खामोशी छाई रही.

मैं उस के बैड से कुछ ही दूरी पर लगे एक बड़े से सोफे पर पैर पसारे हुए सिर को सोफे की दूसरे छोर पर कुशन के सहारे टिकाए लेटा था, जहां से मैं उस के चेहरे की भावभंगिमाओं को अच्छी तरह से पढ़ पा रहा था. उस के चेहरे पर एक अजीब सी उदासी नजर आ रही थी. न जाने क्यों मुझे उस की हंसी में एक खोखलापन नजर आ रहा था. उस की खुशी बनावटी प्रतीत हो रही थी. वह जब भी जोर से हंसती तो ऐसा महसूस होता कि जैसे वह अपने अंदर के किसी खालीपन को ढकने की कोशिश कर रही है, कोई दर्द जो उस ने अपने अंदर समेटा हुआ है. मालूम नहीं कैसे?

उस कमरे में उस के साथ कुछ घंटे व्यतीत करने के बाद ही मुझे उस की वास्तविक आंतरिक स्थिति का एहसास होने लगा था. उस की आंखों में छिपे दर्द को मैं महसूस करने लगा था. मैं अभी तक उस के नाम से वाकिफ नहीं था और न ही वह मेरे विषय में ज्यादा कुछ जानती थी, फिर भी हम दोनों कमरे में साथ थे.

‘‘आप किसी बात से परेशान हैं क्या…’’  मैं ने कमरे में छाई चुप्पी को तोड़ना चाहा.

‘‘मेरा नाम राधिका है,’’ उस ने मेरे अधूरे वाक्य को पूरा करते हुए अपना परिचय दिया.

‘‘और आप समीर? मैं ने आप के आईडैंटटी कार्ड मैं आप का नाम देखा था,’’ और फिर से वह किसी गहरी सोच में डूब गई.

‘‘वैसे मुझे पूछने का हक तो नहीं, लेकिन माफ कीजिएगा मैं फिर भी पूछ रहा हूं. कुदरत ने तो आप के झाले में रुपएपैसे, सारे ऐशोआराम दिए हैं, फिर भी पिछले कुछ घंटों से मैं ने एक बात नोटिस की है कि आप के चेहरे की खुशी बनावटी है. आप की हंसी मालूम नहीं क्यों मुझे लगती है?’’

‘‘खुशी, ऐशोआराम, रुपएपैसे,’’ उस ने मेरे द्वारा कहे गए इन सारे शब्दों को दोहराते हुए एक गहरी सांस ली, ‘‘मैं तुम से एक सवाल पूछना चाहती हूं, धनदौलत, रुपएपैसे का तुम्हारी जिंदगी में क्या अहमियत है? चलो तुम्हें ये सब मैं दे दूं तो भी क्या तुम इन से सुखशांति खरीद लोगे?’’

‘‘बिलकुल, धनदौलत से सबकुछ हासिल किया जा सकता है. मेरी समझ से जिंदगी में अगर एक इंसान के पास धनदौलत है तो उस के पास सबकुछ है. नायरा ने इन्हीं वजहों से तो मुझे छोड़ा था, जब मेरी नौकरी चली गई थी, मैं आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. नायरा और हमारे बीच आई दूरियों की वजह तो यही रुपएपैसे थे.’’

‘‘मेरा मतलब प्रेम से था, सच्चे प्रेम से, क्या तुम रुपएपैसे की बदौलत सच्चे प्रेम को खरीद  सकते हो या ठीक इस के विपरीत कहूं तो यदि मैं तुम्हें रुपएपैसे, धनदौलत दे दूं, तो क्या बदले में तुम मुझे सच्चा प्रेम दे सकते हो? क्या दे सकोगे  मुझे सच्चा प्रेम? मेरे पास धन, दौलत, रुपएपैसे सबकुछ है परंतु नहीं है तो सच्चा प्रेम जो मेरी जिंदगी के खालीपन को भर सके.’’

‘‘क्यों? क्या आप के पति आप से प्रेम नहीं करते?’’ मैं ने अचानक सवाल पूछा.

‘‘उन का बहुत बड़ा कारोबार है, बहुत सारी संपत्ति है और नहीं है तो एक औलाद जो उन के बाद उन की संपत्ति का मालिक बन सके औलाद की चाहत में उन्होंने अपनी पहली पत्नी को तलाक दे दिया. पैसों के बल पर मुझे से 50 वर्ष की आयु में शादी कर ली, जबकि मेरी उम्र उस वक्त 22 साल थी. मेरे पिता जोकि उन के यहां एक साधारण सी नौकरी करते थे ने मेरी मां के इलाज के लिए काफी पैसे उधार ले लिए थे,’’ बोलतेबोलते वह अचानक चुप हो गई.

कुछ देर की खामोशी के बाद उस ने आगे बताना जारी रखा, ‘‘मेरी शादी के कुछ ही महीने बाद मेरी मां की मृत्यु हो गई और उन की मृत्यु के कुछ महीने बाद ही अपने पिता भी चल बसे. मेरे पास सबकुछ है और जो नहीं है वह है प्रेम, सच्चा प्रेम जिस के अभाव में जीवन निरर्थक लगता है. अपने पति के लिए मैं सिर्फ एक साधन हूं. एक ऐसा साधन जो उन के लिए संतान की प्राप्ति करा सकता है, उन की अपार संपत्ति का वारिस दिला सकता है. हमारी शादी के 5 वर्ष बीत गए हैं, लेकिन संतान की प्राप्ति नहीं हुई. वे इस सब का जिम्मेदार मुझे ठहराते हैं, जबकि कमी उन के अंदर है. मैं आज अच्छीखासी संपत्ति की मालकिन हूं. फिर भी जिंदगी में एक खालीपन है, खोखलापन है.’’

वह बिलकुल मेरे नजदीक बैठी थी. मैं सोफे पर शांत बैठा हुआ उस की बातों को सुन रहा था. न जाने कब मेरा हाथ उस के हाथों में आ गया. मेरे हाथ पर पानी की बूंद सा कुछ टपका तो मैं ने देखा उस की आंखों में आंसू भरे थे.

मैं ने सोफे पर बैठेबैठे पीछे खिड़की पर से परदे को थोड़ा सरका कर कांच से बाहर झंकते हुए मौसम का मुआयना किया. बाहर अभी भी तेज हवा के साथ जोरदार बारिश हो रही थी.

‘‘मौसम अभी भी काफी खराब है,’’ मैं ने टौपिक चेंज करने की कोशिश की.

‘‘क्या तुम मेरे लिए कुछ गा सकते हो?’’

‘‘अभी इस वक्त?’’ मैं ने घड़ी देखी रात के 2 बज रहे थे.

‘‘क्या तुम मुझे कुछ पल की खुशी दे सकते हो? ऐसी खुशी जिसे मैं ताउम्र संजो कर रख सकूं? कुछ ऐसे लमहे जिन की मखमली यादों से मैं अपनी जिंदगी की इस रिक्तता को भर सकूं? मैं तुम्हें मुंहमांगे पैसे दे कर इन लमहों को तुम से खरीदना चाहती हूं.’’

अचानक उस ने अपना सिर मेरे सीने पर टिका दिया. मैं उस की तेज धड़कन को साफसाफ सुन पा रहा था, उस की गरम सांसों को महसूस कर रहा था. उस ने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए.

बाहर बिजली की कड़कड़ाहट के साथ एक तेज आवाज हुई. शायद पाम का वह वृक्ष जो अभी तक अपनी जड़ों पर मजबूती के साथ खड़ा था, उसे इस तूफान ने उखाड़ गिराया था. मैं ने जीवन में पहली बार नायरा से बेवफाई की. हम सारी रात एकदूसरे के आगोश में थे.

सुबह जब आंख खुली तो बारिश थम चुकी थी. मैं ने कांच की खिड़की से परदे को सरका कर बाहर देखा. बारिश थम चुकी थी. हवा के हलकेहलके झांके बाहर खूबसूरत फूलपत्तियों को सहला रहे थे. हवा के इस प्रेमस्पर्श से लौन में लगे पेड़ों की पत्तियां थिरकथिरक कर जैसे खुशी का इजहार कर रही थीं.

सामने दीवार पर लटकी उस मोटी तार पर बारिश के पानी की एक अकेली बूंद अपने अकेलेपन की बेचैनी को एक ओर झटकते हुए नीचे टपकने को आतुर था. सामने किसी वृक्ष के डाल पर एक छोटी सी चिडि़या कहीं से उड़ती आई और फुदकफुदक कर अपने गीले पंखों को फड़फड़ाते हुए सुखाने की चेष्टा करने लगी मानो जैसे खुले आसमान में वापस उड़ने की तैयारी कर रही हो.

‘‘आप चाय लेंगे या कौफी?’’

‘‘नहीं, मैं अब जाना चाहूंगा,’’ यह कहता  हुआ मैं उठ खड़ा हुआ और बाहर निकलने की तैयारी करने लगा तो उस ने मेरे हाथों में एक विजिटिंग कार्ड पकड़ा दिया और कहा, ‘‘यदि आप कोलकाता आएं तो इस पते पर अवश्य संपर्क करें.’’

मैं ने आश्चर्य से उस की ओर देखा.

‘‘मैं इस कंपनी की मालकिन हूं. दरअसल,  यह कंपनी मेरे ही नाम है. आप को आप की पसंद की पोस्ट मिल जाएगी और तनख्वाह आप जितना कहें क्योंकि मेरे पति के बहुत सारे बिजनैस हैं. अलगअलग शहरों में कई कंपनियां हैं, तो उन में से यह एक कंपनी मेरे नाम है. शादी के इतने सालों में मैं ने यही एक समझदारी का काम किया है कि मैं ने खुद को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया वरना यह जालिम दुनिया,’’ और वह कुछ कहतेकहते अचानक चुप हो गई, फिर आगे बोली, ‘‘इस जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है. वैसे आप चाहें तो पोर्ट ब्लेयर में भी आप को काम मिल सकता है क्योंकि मैं पोर्ट ब्लेयर में भी एक बिजनैस जल्द ही शुरू करने वाली हूं. आप के लिए यहां भी मौका है.’’

मैं कुछ दिनों बाद कोलकाता वापस आ गया. वादे के मुताबिक मुझे नौकरी भी मिल गई और ऊंची तनख्वाह भी. धीरेधीरे वक्त अपनी गति से बीतता चला गया.

‘‘हैलो, मैं कोलकाता वापस आ रही हूं,’’ एक दिन अचानक नायरा ने मुझे फोन कर के अपने आने की सूचना दी और उस के अगली सुबह वह मेरे घर आ गई. मैं ने कोलकाता के पौश एरिया में एक बड़ा सा फ्लैट खरीद लिया था. एक नई गाड़ी भी खरीद ली थी. ऐशोआराम की सारी सुखसुविधा अब हमारे पास थी. अब नायरा मुझ से शादी करना चाहती थी. नायरा के  मांबाप भी जोकि पहले हमारी शादी के पक्ष में नहीं थे क्योंकि वह अपनी बेटी की शादी किसी बेरोजगार से नहीं करा सकते थे और नायरा अपने मांबाप की मरजी के खिलाफ मुझ से शादी नहीं कर सकती थी. परंतु अब नायरा और उस के मांबाप जल्द से जल्द शादी के पक्ष में थे.

वैसे मुझे भी शादी से कोई ऐतराज नहीं था. जल्द ही शादी की तारीख भी तय हो गई और हमारी ऐंगजेमैंट भी हो गई. जिंदगी वापस पटरी पर दौड़ने लगी थी. ऐंगजेमैंट के बाद नायरा वापस मुंबई आ गई थी क्योंकि शादी में अभी कुछ दिन बाकी थे. मैं वीकैंड पर नायरा से मिलने मुंबई गया हुआ था. मैं और नायरा साथ में एक अच्छा टाइम स्पैंड कर रहे थे ताकि मैं किसी औफिस कौल में बिजी न हो जाऊं, नायरा ने मेरे फोन को साइलैंट मोड पर कर के फोन अपने पास ही रख लिया था.

मैं इस बात से बेखबर था कि उस दिन राधिका के 10 फोन आए थे. फोन नहीं उठा पाने के कारण राधिका ने वाट्सऐप मैसेज सैंड कर दिया, ‘‘मुबारक हो मैं ने बेटे को जन्म दिया है. मुझे इतनी बड़ी खुशी मिली है कि संभाले नहीं संभल रही है. इस खुशी का सारा श्रेय आप को जाता है. मेरे दामन को खुशियों से भरने के लिए आप का बहुतबहुत शुक्रिया. मुझे भनक तक नहीं लगी और यह मैसेज नायरा ने पढ़ लिया. उस दिन मेरे और नायरा के बीच काफी बहस हुई. बात वापस संबंधविच्छेद तक आ गई, लेकिन मैंने हार नहीं मानी.

मैं ने नायरा को समझना जारी रखा. मैं ने उसे बड़े शांतभाव और प्रेमपूर्वक समझाया, ‘‘नायरा, मेरे हृदय में तुम्हारे प्रति जो प्रेम है वह सिर्फ तुम्हें ही समर्पित है. मैं तुम्हें दिल की गहराइयों से प्यार करता हूं. तुम्हारे प्रति मेरा यह प्रेम कभी खत्म नहीं हुआ. हां, मैं ने उन में से कुछ लमहे किसी को सौंप कर तुम्हारे लिए जीवनभर की खुशियां ही तो खरीदी हैं. तुम्हारा जीवनभर का साथ ही तो चाहा है. अब तुम ही बताओ जब मेरे पास नौकरी नहीं थी, पैसे नहीं थे, सुखसुविधा नहीं थी तब तुम ने ही मेरा साथ छोड़ा था.’’

नायरा चुप थी क्योंकि उस के पास मेरे सवालों के जवाब नहीं थे.

मैं ने राधिका की सारी सचाई, सारी बातें नायरा के समक्ष रख दीं. सारी बातें जानने के बाद नायरा ने मुझे माफ कर दिया. अब मैं और नायरा शादी के बंधन में बंध कर एक खुशहाल जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं. बच्चे की पहली सालगिरह पर राधिका ने हमें भी आमंत्रित किया है और उन के पति कन्हैया भी इस सचाई से अब तक वाकिफ हो चुके हैं फिर भी वे अपनी खुशी का इजहार कर रहे हैं. हालांकि वे अपनी आंतरिक पीड़ा को लोगों के समक्ष प्रकट करने से  कतराते नजर आ रहे हैं. अपने चेहरे पर खुशी ओढ़े हुए वे मेहमानों की आवभगत में लगे हुए हैं. यह सचाई हालांकि कन्हैया के पुरुषरूपी अहंकार पर प्रहार तो अवश्य कर रही है, लेकिन दुनिया के समक्ष इन बातों से ऊपर उन के लिए एक पुत्र का पिता कहलाने का गौरव और उस की महत्ता अधिक हो गई थी.

नायरा और मैं बच्चे को प्यार और दुलार कर गिफ्ट पकड़ा कर केक, मिठाई और स्वादिष्ठ व्यंजनों की दावत उड़ा कर अपने घर लौट रहे थे. इस मौके पर राधिका बेहद खुश दिख रह थी. उस ने नायरा से खूब सारी बातें कीं और हमें गेट तक छोड़ने कन्हैया भी राधिका के साथ आए.

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