Long Story: चक्रव्यूह- सायरा को मुल्क अलग होने का क्यों हुआ फर्क

Long Story: सुबह का अखबार देखते ही मंसूर चौंक पड़ा. धूधू कर जलता ताज होटल और शहीद हुए जांबाज अफसरों की तसवीरें. उस ने लपक कर टीवी चालू किया. तब तक सायरा भी आ गई.

‘‘किस ने किया यह सब?’’ उस ने सहमे स्वर में पूछा.

‘‘वहशी दरिंदों ने.’’

तभी सायरा का मोबाइल बजा. उस की मां का फोन था.

‘‘जी अम्मी, हम ने भी अभी टीवी खोला है…मालूम नहीं लेकिन पुणे तो मुंबई से दूर है…वह तो कहीं भी कभी भी हो सकता है अम्मी…मैं कह दूंगी अम्मी… हां, नाम तो उन्हीं का लगेगा, चाहे हरकत किसी की हो…’’

‘‘सायरा, फोन बंद करो और चाय बनाओ,’’ मंसूर ने तल्ख स्वर में पुकारा, ‘‘किस की हरकत है…यह फोन पर अटकल लगाने का मुद्दा नहीं है.’’

सायरा सिहर उठी. मंसूर ने पहली बार उसे फोन करते हुए टोका था और वह भी सख्ती से.

‘‘जी…अच्छा, मैं कुछ देर बाद फोन करूंगी आप को…जी अम्मी जरूर,’’ कह कर सायरा ने मोबाइल बंद कर दिया और चाय बनाने चली गई.

टीवी देखते हुए सायरा भी चुपचाप चाय पीने लगी. पूछने या कहने को कुछ था ही नहीं. कहीं अटकलें थीं और कहीं साफ कहा जा रहा था कि विभिन्न जगहों पर हमले करने वाले पाकिस्तानी आतंकवादी थे.

‘‘आप आज आफिस मत जाओ.’’

इस से पहले कि मंसूर जवाब देता दरवाजे की घंटी बजी. उस का पड़ोसी और सहकर्मी सेसिल अपनी बीवी जेनेट के साथ खड़ा था.

‘‘लगता है तुम दोनों भी उसी बहस में उलझ कर आए हो जिस में सायरा मुझे उलझाना चाह रही है,’’ मंसूर हंसा, ‘‘कहर मुंबई में बरस रहा है और हमें पुणे में, बिल में यानी घर में दुबक कर बैठने को कहा जा रहा है.’’

‘‘वह इसलिए बड़े भाई कि अगला निशाना पुणे हो सकता है,’’ जेनेट ने कहा, ‘‘वैसे भी आज आफिस में कुछ काम नहीं होगा, सब लोग इसी खबर को ले कर ताव खाते रहेंगे.’’

‘‘खबर है ही ताव खाने वाली, मगर जेनी की यह बात तो सही है मंसूर कि आज कुछ काम होगा नहीं.’’

‘‘यह तो है सेसिल, शिंदे साहब का बड़ा भाई ओबेराय में काम करता है और बौस का तो घर ही कोलाबा में है. इसलिए वे लोग तो आज शायद ही आएं. और लोगों को फोन कर के पूछते हैं,’’ मंसूर बोला.

‘‘जब तक आप लोग फोन करते हैं मैं और जेनी नाश्ता बना लेते हैं, इकट्ठे ही नाश्ता करते हुए तय करना कि जाना है या नहीं,’’ कह कर सायरा उठ खड़ी हुई.

‘‘यह ठीक रहेगा. मेरे यहां जो कुछ अधबना है वह यहीं ले आती हूं,’’ कह कर जेनेट अपने घर चली गई. यह कोई नई बात नहीं थी. दोनों परिवार अकसर इकट्ठे खातेपीते थे लेकिन आज टीवी के दृश्यों से माहौल भारी था. सेसिल और मंसूर बीचबीच में उत्तेजित हो कर आपत्तिजनक शब्द कह उठते थे, जेनी और सायरा अपनी भरी आंखें पोंछ लेती थीं तभी फिर मोबाइल बजा. सायरा की मां का फोन था.

‘‘जी अम्मी…अभी वही बात चल रही है…दोस्तों से पूछ रहे हैं…हो सकता है हो, अभी तो कुछ सुना नहीं…कुछ मालूम पड़ा तो जरूर बताऊंगी.’’

‘‘फोन मुझे दो, सायरा,’’ मंसूर ने लपक कर मोबाइल ले लिया, ‘‘देखिए अम्मीजान, जो आप टीवी पर देख रही हैं वही हम भी देख रहे हैं इसलिए क्या हो रहा है उस बारे में फोन पर तबसरा करना इस माहौल में सरासर हिमाकत है. बेहतर रहे यहां फोन करने के बजाय आप हकीकत मालूम करने को टीवी देखती रहिए.’’

मोबाइल बंद कर के मंसूर सायरा की ओर मुड़ा, ‘‘टीवी पर जो अटकलें लगाई जा रही हैं वह फोन पर दोहराने वाली नहीं हैं खासकर लाहौर की लाइन पर.’’

‘‘आज के जो हालात हैं उन में लाहौर से तो लाइन मिलानी ही नहीं चाहिए. माना कि तुम कोई गलत बात नहीं करोगी सायरा, लेकिन देखने वाले सिर्फ यह देखेंगे कि तुम्हारी कितनी बार लाहौर से बात हुई है, यह नहीं कि क्या बात हुई है,’’ सेसिल ने कहा.

‘‘सायरा, अपनी अम्मी को दोबारा यहां फोन करने से मना कर दो,’’ मंसूर ने हिदायत के अंदाज में कहा.

‘‘आप जानते हैं इस से अम्मी को कितनी तकलीफ होगी.’’

‘‘उस से कम जितनी उन्हें यह सुन कर होगी कि पुलिस ने हमारे लाहौर फोन के ताल्लुकात की वजह से हमें हिरासत में ले लिया है,’’ मंसूर चिढ़े स्वर में बोला.

‘‘आप भी न बड़े भाई बात को कहां से कहां ले जाते हैं,’’ जेनेट बोली, ‘‘ऐसा कुछ नहीं होगा लेकिन फिर भी एहतियात रखनी तो जरूरी है सायरा. अब जब अम्मी का फोन आए तो उन्हें भी यह समझा देना.’’

दूसरे सहकर्मियों को फोन करने के बाद सेसिल और मंसूर ने भी आफिस जाने का फैसला कर लिया.

‘‘मोबाइल पर नंबर देख कर ही फोन उठाना सायरा, खुद फोन मत करना, खासकर पाकिस्तान में किसी को भी,’’ मंसूर ने जातेजाते कहा.

मंसूर ने रोज की तरह अपना खयाल रखने को नहीं कहा. वैसे आज जेनी और सेसिल ने भी ‘फिर मिलते हैं’ नहीं कहा था.

सायरा फूटफूट कर रो पड़ी. क्या चंद लोगों की वहशियाना हरकत की वजह से सब की प्यारी सायरा भी नफरत के घेरे में आ गई?

नौकरानी न आती तो सायरा न जाने कब तक सिसकती रहती. उस ने आंखें पोंछ कर दरवाजा खोला. सक्कू बाई ने उस से तो कुछ नहीं पूछा मगर श्रीमती साहनी को न जाने क्या कहा कि वह कुछ देर बाद सायरा का हाल पूछने आ गईं. सायरा तब तक नहा कर तैयार हो चुकी थी लेकिन चेहरे की उदासी और आंसुओं के निशान धुलने के बावजूद मिटे नहीं थे.

‘‘सायरा बेटी, मुंबई में कोई अपना तो परेशानी में नहीं है न?’’

‘‘मुंबई में तो हमारा कोई है ही नहीं, आंटी.’’

‘‘तो फिर इतनी परेशान क्यों लग रही हो?’’

साहनी आंटी से सायरा को वैसे भी लगाव था. उन के हमदर्दी भरे लफ्ज सुनते ही वह फफक कर रो पड़ी. रोतेरोते ही उस ने बताया कि सब ने कैसे उसे लाहौर बात करने से मना किया है. मंसूर ने अम्मी से तल्ख लफ्जों में क्या कहा, यह भी नहीं सोचा कि उन्हें मेरी कितनी फिक्र हो रही होगी. ऐसे हालात में वह बगैर मेरी खैरियत जाने कैसे जी सकेंगी?

‘‘हालात को समझो बेटा, किसी ने आप से कुछ गलत करने को नहीं कहा है. अगर किसी को शक हो गया तो आप की ही नहीं पूरी बिल्ंिडग की शामत आ सकती है. लंदन में तेरा भाई सरवर है न इसलिए अपनी खैरखबर उस के जरिए मम्मी को भेज दिया कर.’’

‘‘पता नहीं आंटी, उस से भी बात करने देंगे या नहीं?’’

‘‘हालात को देखते हुए न करो तो बेहतर है. रंजीत ने तुझे बताया था न कि वह सरवर को जानता है.’’

‘‘हां, आंटी दोनों एक ही आफिस में काम करते हैं,’’ सायरा ने उम्मीद से आंटी की ओर देखा, ‘‘क्या आप मेरी खैरखबर रंजीत भाई के जरिए सरवर को भेजा करेंगी?’’

‘‘खैरखबर ही नहीं भेजूंगी बल्कि पूरी बात भी समझा दूंगी,’’ श्रीमती साहनी ने घड़ी देखी, ‘‘अभी तो रंजीत सो रहा होगा, थोड़ी देर के बाद फोन करूंगी. देखो बेटाजी, हो सकता है हमेशा की तरह चंद दिनों में सब ठीक हो जाए और हो सकता है और भी खराब हो जाए, इसलिए हालात को देखते हुए अपने जज्बात पर काबू रखो. आतंकवादी और उन के आकाओं की लानतमलामत को अपने लिए मत समझो और न ही यह समझो कि तुम्हें तंग करने को तुम से रोकटोक की जा रही…’’ श्रीमती साहनी का मोबाइल बजा. बेटे का लंदन से फोन था.

‘‘बस, टीवी देख रहे हैं…फिलहाल तो पुणे में सब ठीक ही है. पापा काम पर गए. मैं सायरा के पास आई हुई हूं. परेशान है बेचारी…उस की मां का यहां फोन करना मुनासिब नहीं है न…हां, तू सरवर को यह बात समझा देना…वह भी ठीक रहेगा. वैसे तू उसे बता देना कि हमारे यहां तो कसूरवार को भी तंग नहीं करते तो बेकसूर को क्यों परेशान करेंगे, उसे सायरा की फिक्र करने की जरूरत नहीं है.’’

श्रीमती साहनी मोबाइल बंद कर के सायरा की ओर मुड़ीं, ‘‘रंजीत सरवर को बता देगा कि वह मेरे मोबाइल पर तुम से बात करे. वीडियो कानफें्रस कर तुम दोनों बहनभाइयों की मुलाकात करवा देंगे.’’

‘‘शुक्रिया, आंटीजी…’’

‘‘यह तो हमारा फर्ज है बेटाजी,’’ श्रीमती साहनी उठ खड़ी हुईं.

उन के जाने के बाद सायरा ने राहत की सांस ली. हालांकि सरवर के जरिए अम्मी को उस की खैरखबर भिजवाने की जिम्मेदारी और सरवर के साथ वीडियो कानफें्रसिंग करवाने की बात कर के आंटी ने उसे बहुत राहत दी थी मगर उन का यह कहना ‘हमारे यहां तो कसूरवार को भी तंग नहीं करते तो बेकसूर को क्यों परेशान करेंगे’ या ‘यह तो हमारा फर्ज है’ उसे खुद और अपने मुल्क पर कटाक्ष लगा. वह कहना चाहती थी कि आप लोगों की अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने और एहसान चढ़ाने की आदत से चिढ़ कर ही तो लोग आप को मजा चखाने की सोचते हैं.

सायरा को लंदन स्कूल औफ इकनोमिक्स के वे दिन याद आ गए जब पढ़ाई के दबाव के बावजूद वह और मंसूर एकदूसरे के साथ वहां के धुंधले सर्द दिनों में इश्क की गरमाहट में रंगीन सपने देखते थे. सुनने वालों को तो यकीन नहीं होता था लेकिन पहली नजर में ही एकदूसरे पर मर मिटने वाले मंसूर और सायरा को एकदूसरे के बारे में सिवा नाम के और कुछ मालूम नहीं था.

अंतिम वर्ष में एक रोज जिक्र छिड़ने पर कि नौकरी की तलाश के लिए कौन क्या कर रहा है, सायरा ने मुंह बिचका कर कहा था, ‘नौकरी की तलाश और वह भी यहां? यहां रह कर पढ़ाई कर ली वही बहुत है.’

‘तुम ने तो मेरे खयालात को जबान दे दी, सायरा,’ मंसूर फड़क कर बोला, ‘मैं भी डिगरी मिलते ही अपने वतन लौट जाऊंगा.’

‘वहां जा कर करोगे क्या?’

‘सब से पहले तो सायरा से शादी, फिर हनीमून और उस के बाद रोजीरोटी का जुगाड़,’ मंसूर सायरा की ओर मुड़ा, ‘क्यों सायरा, ठीक है न?’

‘ठीक कैसे हो सकता है यार?’ हरभजन ने बात काटी, ‘वतन लौट कर सायरा से शादी कैसे करेगा?’

‘क्यों नहीं कर सकता? मेरे घर वाले शियासुन्नी मजहब में यकीन नहीं करते और वैसे भी हम दोनों पठान यानी खान हैं.’

‘लेकिन हो तो हिंदुस्तानी- पाकिस्तानी. दोनों मुल्कों के बाशिंदों को नागरिकता या लंबा वीसा आसानी से नहीं मिलता,’ हरभजन ने कहा.

सायरा और मंसूर ने चौंक कर एकदूसरे को देखा.

‘क्या कह रहा है हरभजन? सायरा भी पंजाब से है…’

‘बंटवारे के बाद पंजाब के 2 हिस्से हो गए जिन में से एक में तुम रहते हो और एक में सायरा यानी अलगअलग मुल्कों में.’

‘क्या यह ठीक कह रहा है सायरा?’ मंसूर की आवाज कांप गई.

‘हां, मैं पंजाब यानी लाहौर से हूं.’

‘और मैं लुधियाना से,’ मंसूर ने भर्राए स्वर में कहा, ‘माना कि हम से गलती हुई है, हम ने एकदूसरे को अपने शहर या मुल्क के बारे में नहीं बताया लेकिन अगर बता भी देते तो फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि फिदा तो हम एकदूसरे पर नाम जानने से पहले ही हो चुके थे.’

‘जो हो गया सो हो गया लेकिन अब क्या करोगे?’ दिव्या ने पूछा.

‘मरेंगे और क्या?’ मंसूर बोला.

‘मरना तो हर हाल ही में है क्योंकि अलग हो कर तो जी नहीं सकते सो बेहतर है इकट्ठे मर जाएं,’ सायरा बोली.

‘बुजदिली और जज्बातों की बातें करने के बजाय अक्ल से काम लो,’ अब तक चुप बैठा राजीव बोला, ‘तुम यहां रहते हुए आसानी से शादी कर सकते हो.’

‘शादी के बाद मैं इसे लुधियाना ले कर जा सकता हूं?’ मंसूर ने उतावली से पूछा.

‘शायद.’

‘तब तो बात नहीं बनी. मैं अपना देश नहीं छोड़ सकता.’

‘मैं भी नहीं,’ सायरा बोली.

‘न मुल्क छोड़ सकते हो न एकदूसरे को और मरना भी एकसाथ चाहते हो तो वह तो यहीं मुमकिन होगा इसलिए जब यहीं मरना है तो क्यों नहीं शादी कर के एकसाथ जीने के बाद मरते,’ हरभजन ने सलाह दी.

‘हालात को देखते हुए यह सही सुझाव है,’ राजीव बोला.

‘घर वालों को बता देते हैं कि परीक्षा के बाद यहां आ कर हमारी शादी करवा दें,’ मंसूर ने कहा.

‘मेरी अम्मी तो आजकल यहीं हैं, अब्बू भी अगले महीने आ जाएंगे,’ सायरा बोली, ‘तब मैं उन से बात करूंगी. तुम्हें अगर अपने घर वालों को बुलाना है तो अभी बात करनी होगी.’

‘ठीक है, आज ही तफसील से सब लिख कर ईमेल कर देता हूं.’

‘तुम भी सायरा आज ही अपनी अम्मी से बात करो, उन लोगों की रजामंदी मिलनी इतनी आसान नहीं है,’ राजीव ने कहा.

राजीव का कहना ठीक था. दोनों के घर वालों ने सुनते ही कहा कि यह शादी नहीं सियासी खुदकुशी है. खतरा रिश्तेदारों से नहीं मुल्क के आम लोगों से था, दोनों मुल्कों में तनातनी तो चलती रहती थी और दोनों मुल्कों के अवाम खुनस में उन्हें नुकसान पहुंचा सकते थे.

सायरा की अम्मी ने तो साफ कहा कि शादी के बाद हरेक लड़की को दूसरे घर का रहनसहन और तौरतरीके अपनाने पड़ते हैं लेकिन सायरा को तो दूसरे मुल्क और पूरी कौम की तहजीब अपनानी पड़ेगी.

‘तुम्हारी इस हरकत से हमारी शहर में जो इज्जत और साख है वह मिट्टी में मिल जाएगी. लोग हमें शक की निगाहों से देखने लगेंगे और इस का असर कारोबार पर भी पड़ेगा,’ मंसूर के अब्बा बशीर खान का कहना था.

घर वालों ने जो कहा था उसे नकारा नहीं जा सकता था लेकिन एकदूसरे से अलग होना भी मंजूर नहीं था इसलिए दोनों ने घर वालों को यह कह कर मना लिया कि वे शादी के बाद लंदन में ही रहेंगे और उन लोगों को सिवा उन के नाम के किसी और को कुछ बताने की जरूरत नहीं है. उन की जिद के आगे घर वाले भी बेदिली से मान गए. वैसे दोनों ही पंजाबी बोलते थे और तौरतरीके भी एक से थे. शादी हंसीखुशी से हो गई.

कुछ रोज मजे में गुजरे लेकिन दोनों को ही लंदन पसंद नहीं था. दोस्तों का कहना था कि दुबई या सिंगापुर चले जाओ लेकिन मंसूर लुधियाना में अपने पुश्तैनी कारोबार को बढ़ाना चाहता था. भारतीय उच्चायोग से संपर्क करने पर पता चला कि उस की ब्याहता की हैसियत से सायरा अपने पाकिस्तानी पासपोर्ट पर उस के साथ भारत जा सकती थी. सायरा को भी एतराज नहीं था, वह खुश थी कि समझौता एक्सप्रेस से लाहौर जा सकती थी, अपने घर वालों को भी बुला सकती थी लेकिन बशीर खान को एतराज था. उन का कहना था कि सायरा की असलियत छिपाना आसान नहीं था और पंजाब में उस की जान को खतरा हो सकता था.

उन्होंने मंसूर को सलाह दी कि वह पंजाब के बजाय पहले किसी और शहर में नौकरी कर के तजरबा हासिल करे और फिर वहीं अपना व्यापार जमा ले. बशीर खान ने एक दोस्त के रसूक से मंसूर को पुणे में एक अच्छी नौकरी दिलवा दी. काम और जगह दोनों ही मंसूर को पसंद थे, दोस्त भी बन गए थे लेकिन उसे हमेशा अपने घर का सुख और बचपन के दोस्त याद आते थे और वह बड़ी हसरत से सोचता था कि कब दोनों मुल्कों के बीच हालात सुधरेंगे और वह सायरा को ले कर अपनों के बीच जा सकेगा.

सब की सलाह पर सायरा ने नौकरी नहीं की थी. हालांकि पैसे की कोई कमी नहीं थी लेकिन घर बैठ कर तालीम को जाया करना उसे अच्छा नहीं लगता था और वैसे भी घर में उस का दम घुटता था. अच्छी सहेलियां जरूर बनी थीं पर कब तक आप किसी से फोन पर बात कर सकती थीं या उन के घर जा सकती थीं.

मंसूर के प्यार में कोई कमी नहीं थी, फिर भी पुणे आने के बाद सायरा को एक अजीब से अजनबीपन का एहसास होने लगा था लेकिन उसे इस बात का कतई गिला नहीं था कि उस ने क्यों मंसूर से प्यार किया या क्यों सब को छोड़ कर उस के साथ चली आई.

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Hindi Drama Story: इसमें गलत क्या है- क्या रमा बड़ी बहन को समझा पाई

Hindi Drama Story: मेरी छोटी बहन रमा मुझे समझा रही है और मुझे वह अपनी सब से बड़ी दुश्मन लग रही है. यह समझती क्यों नहीं कि मैं अपने बच्चे से कितना प्यार करती हूं.

‘‘मोह उतना ही करना चाहिए जितना सब्जी में नमक. जिस तरह सादी रोटी बेस्वाद लगती है, खाई नहीं जाती उसी तरह मोह के बिना संसार अच्छा नहीं लगता. अगर मोह न होता तो शायद कोई मां अपनी संतान को पाल नहीं पाती. गंदगी, गीले में पड़ा बच्चा मां को क्या किसी तरह का घिनौना एहसास देता है? धोपोंछ कर मां उसे छाती से लगा लेती है कि नहीं. तब जब बच्चा कुछ कर नहीं सकता, न बोल पाता है और न ही कुछ समझा सकता है.

‘‘तुम्हारे मोह की तरह थोड़े न, जब बच्चा अपने परिवार को पालने लायक हो गया है और तुम उस की थाली में एकएक रोटी का हिसाब रख रही हो, तो मुझे कई बार ऐसा भी लगता है जैसे बच्चे का बड़ा होना तुम्हें सुहाया ही नहीं. तुम को अच्छा नहीं लगता जब सुहास अपनेआप पानी ले कर पी लेता है या फ्रिज खोल कर कुछ निकालने लगता है. तुम भागीभागी आती हो, ‘क्या चाहिए बच्चे, मुझे बता तो?’

‘‘क्यों बताए वह तुम्हें? क्या उसे पानी ले कर पीना नहीं आता या बिना तुम्हारी मदद के फल खाना नहीं आएगा? तुम्हें तो उसे यह कहना चाहिए कि वह एक गिलास पानी तुम्हें भी पिला दे और सेब निकाल कर काटे. मौसी आई हैं, उन्हें भी खिलाए और खुद भी खाए. क्या हो जाएगा अगर वह स्वयं कुछ कर लेगा, क्या उसे अपना काम करना आना नहीं चाहिए? तुम क्यों चाहती हो कि तुम्हारा बच्चा अपाहिज बन कर जिए? जराजरा सी बात के लिए तुम्हारा मुंह देखे? क्यों तुम्हारा मन दुखी होता है जब बच्चा खुद से कुछ करता है? उस की पत्नी करती है तो भी तुम नहीं चाहतीं कि वह करे.’’

‘‘तो क्या हमारे बच्चे बिना प्यार के पल गए? रातरात भर जाग कर हम ने क्या बच्चों की सेवा नहीं की? वह सेवा उस पल की जरूरत थी इस पल की नहीं. प्यार को प्यार ही रहने दो, अपने गले की फांसी मत बना लो, जिस का दूसरा सिरा बच्चे के गले में पड़ा है. इधर तुम्हारा फंदा कसता है उधर तुम्हारे बच्चे का भी दम घुटता है.’’

‘‘सुहास ने तुम से कुछ कहा है क्या? क्या उसे मेरा प्यार सुहाता नहीं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अरे नहीं, दीदी, वह ऐसा क्यों कहेगा. तुम बात को समझना तो चाहती नहीं हो, इधरउधर के पचड़े में पड़ने लगती हो. उस ने कुछ नहीं कहा. मैं जो देख रही हूं उसी आधार पर कह रही हूं. कल तुम भावना से किस बात पर उलझ रही थीं, याद है तुम्हें?’’

‘‘मैं कब उलझी? उस ने तेरे आने पर इतनी मेहनत से कितना सारा खाना बनाया. कम से कम एक बार मुझ से पूछ तो लेती कि क्या बनाना है.’’

‘‘क्यों पूछ लेती? क्या जराजरा सी बात तुम से पूछना जरूरी है? अरे, वही

4-5 दालें हैं और वही 4-6 मौसम की सब्जियां. यह सब्जी न बनी, वह बन गई, दाल में टमाटर का तड़का न लगाया, प्याज और जीरे का लगा लिया. भिंडी लंबी न काटी गोल काट ली. मेज पर नई शक्ल की सब्जी आई तो तुम ने झट से नाकभौं सिकोड़ लीं कि भिंडी की जगह परवल क्यों नहीं बनाए. गुलाबी डिनर सैट क्यों निकाला, सफेद क्यों नहीं. और तो और, मेजपोश और टेबल मैट्स पर भी तुम ने उसे टोका, मेरे ही सामने. कम से कम मेरा तो लिहाज करतीं. वह बच्ची नहीं है जिसे तुम ने इतना सब बिना वजह सुनाया.

‘‘सच तो यह है, इतनी सुंदर सजी मेज देख कर तुम से बरदाश्त ही नहीं हुआ. तुम से सहा ही नहीं गया कि तुम्हारे सामने किसी ने इतना अच्छा खाना सजा दिया. तुम्हें तो प्रकृति का शुक्रगुजार होना चाहिए कि बैठेबिठाए इतना अच्छा खाना मिल जाता है. क्या सारी उम्र काम करकर के तुम थक नहीं गईं? अभी भी हड्डियों में इतना दम है क्या, जो सब कर पाओ? एक तरफ तो कहती हो तुम से काम नहीं होता, दूसरी तरफ किसी का किया तुम से सहा नहीं जाता. आखिर चाहती क्या हो तुम?

‘‘तुम तो अपनी ही दुश्मन आप बन रही हो. क्या कमी है तुम्हारे घर में? आज्ञाकारी बेटा है, समझदार बहू है. कितनी कुशलता से सारा घर संभाल रही है. तुम्हारे नातेरिश्तेदारों का भी पूरा खयाल रखती है न. कल सारा दिन वह मेरे ही आगेपीछे डोलती रही. ‘मौसी यह, मौसी वह,’ मैं ने उसे एक पल के लिए भी आराम करते नहीं देखा और तुम ने रात मेज पर उस की सारे दिन की खुशी पर पानी फेर दिया, सिर्फ यह कह कर कि…’’

चुप हो गई रमा लेकिन भन्नाती रही देर तक. कुछ बड़बड़ भी करती रही. थोड़ी देर बाद रमा फिर बोलने लगी, ‘‘तुम क्यों बच्चों की जरूरत बन कर जीना चाहती हो? ठाट से क्यों नहीं रहती हो. यह घर तुम्हारा है और तुम मालकिन हो. बच्चों से थोड़ी सी दूरी रखना सीखो. बेटा बाहर से आया है तो जाने दो न उस की पत्नी को पानी ले कर. चायनाश्ता कराने दो. यह उस की गृहस्थी है. उसी को उस में रमने दो. बहू को तरहतरह के व्यंजन बनाने का शौक है तो करने दो उसे तजरबे, तुम बैठी बस खाओ. पसंद न भी आए तो भी तारीफ करो,’’ कह कर रमा ने मेरा हाथ पकड़ा.

‘‘सब गुड़गोबर कर दे तो भी तारीफ करूं,’’ हाथ खींच लिया था मैं ने.

‘‘जब वह खुद खाएगी तब क्या उसे पता नहीं चलेगा कि गुड़ का गोबर हुआ है या नहीं. अच्छा नहीं बनेगा तो अपनेआप सुधारेगी न. यह उस के पति का घर है और इस घर में एक कोना उसे ऐसा जरूर मिलना चाहिए जहां वह खुल कर जी सके, मनचाहा कर सके.’’

‘‘क्या मनचाहा करने दूं, लगाम खींच कर नहीं रखूंगी तो मेरी क्या औकात रह जाएगी घर में. अपनी मरजी ही करती रहेगी तो मेरे हाथ में क्या रहेगा?’’

‘‘अपने हाथ में क्या चाहिए तुम्हें, जरा समझाओ? बच्चों का खानापीना या ओढ़नाबिछाना? भावना पढ़ीलिखी, समझदार लड़की है. घर संभालती है, तुम्हारी देखभाल करती है. तुम जिस तरह बातबात पर तुनकती हो उस पर भी वह कुछ कहती नहीं. क्या सब तुम्हारे अधिकार में नहीं है? कैसा अधिकार चाहिए तुम्हें, समझाओ न?

‘‘तुम्हारी उम्र 55 साल हो गई. तुम ने इतने साल यह घर अपनी मरजी से संभाला. किसी ने रोका तो नहीं न. अब बहू आई है तो उसे भी अपनी मरजी करने दो न. और ऐसी क्या मरजी करती है वह? अगर घर को नए तरीके से सजा लेगी तो तुम्हारा अधिकार छिन जाएगा? सोफा इधर नहीं, उधर कर लेगी, नीले परदे न लगाए लाल लगा लेगी, कुशन सूती नहीं रेशमी ले आएगी, तो क्या? तुम से तो कुछ मांगेगी नहीं न?

‘‘इसी से तुम्हें लगता है तुम्हारा अधिकार हाथ से निकल गया. कस कर अपने बेटे को ही पकड़ रही हो…उस का खानापीना, उस का कुछ भी करना… अपनी ममता को इतना तंग और संकुचित मत होने दो, दीदी, कि बेटे का दम ही घुट जाए. तुम तो दोनों की मां हो न. इतनी तंगदिल मत बनो कि बच्चे तुम्हारी ममता का पिंजरा तोड़ कर उड़ जाएं. बहू तुम्हारी प्रतिद्वंद्वी नहीं है. तुम्हारी बच्ची है. बड़ी हो तुम. बड़ों की तरह व्यवहार करो. तुम तो बहू के साथ किसी स्पर्धा में लग रही हो. जैसे दौड़दौड़ कर मुकाबला कर रही हो कि देखो, भला कौन जीतता है, तुम या मैं.

‘‘बातबात में उसे कोसो मत वरना अपना हाथ खींच लेगी वह. अपना चाहा भी नहीं करेगी. तुम से होगा नहीं. अच्छाभला घर बिगड़ जाएगा. फिर मत कहना, बहू घर नहीं देखती. वह नौकरानी तो है नहीं जो मात्र तुम्हारा हुक्म बजाती रहेगी. यह उस का भी घर है. तुम्हीं बताओ, अगर उसे अपना घर इस घर में न मिला तो क्या कहीं और अपना घर ढूंढ़ने का प्रयास नहीं करेगी वह? संभल जाओ, दीदी…’’

रमा शुरू से दोटूक ही बात करती आई है. मैं जानती हूं वह गलत नहीं कह रही मगर मैं अपने मन का क्या करूं. घर के चप्पेचप्पे पर, हर चीज पर मेरी ही छाप रही है आज तक. मेरी ही पसंद रही है घर के हर कोने पर. कौन सी चादर, कौन सा कालीन, कौन सा मेजपोश, कौन सा डिनर सैट, कौन सी दालसब्जी, कौन सा मीठा…मेरा घर, मैं ने कभी किसी के साथ इसे बांटा नहीं. यहां तक कि कोने में पड़ी मेज पर पड़ा महंगा ‘बाऊल’ भी जरा सा अपनी जगह से हिलता है तो मुझे पता चल जाता है. ऐसी परिस्थिति में एक जीताजागता इंसान मेरी हर चीज पर अपना ही रंग चढ़ा दे, तो मैं कैसे सहूं?

‘‘भावना का घर कहां है, दीदी, जरा मुझे समझाओ? तुम्हें जब मां ने ब्याह कर विदा किया था तब यही समझाया था न कि तुम्हारी ससुराल ही तुम्हारा घर है. मायका पराया घर और ससुराल अपना. इस घर को तुम ने भी मन से अपनाया और अपने ही रंग में रंग भी लिया. तुम्हारी सास तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकती थीं. तुम गुणी थीं और तुम्हारे गुणों का पूरापूरा मानसम्मान भी किया गया. सच पूछो तो गुणों का मान किया जाए तभी तो गुण गुण हुए न. तुम्हारी सास ने तुम्हारी हर कला का आदर किया तभी तो तुम कलावंती, गुणवंती हुईं.

वे ही तुम्हारी कीमत न जानतीं तो तुम्हारा हर गुण क्या कचरे के ढेर में नहीं समा जाता? तुम्हें घर दिया गया तभी तो तुम घरवाली हुई थीं. अब तुम भी अपनी बहू को उस का घर दो ताकि वह भी अपने गुणों से घर को सजा सके.’’

रमा मुझे उस रात समझाती रही और उस के बाद जाने कितने साल समझाती रही. मैं समझ नहीं पाई. मैं समझना भी नहीं चाहती. शायद, मुझे प्रकृति ने ऐसा ही बनाया है कि अपने सिवा मुझे कोई भी पसंद नहीं. अपने सिवा मुझे न किसी की खुशी से कुछ लेनादेना है और न ही किसी के मानसम्मान से. पता नहीं क्यों हूं मैं ऐसी. पराया खून अपना ही नहीं पाती और यह शाश्वत सत्य है कि बहू का खून होता ही पराया है.

आज रमा फिर से आई है. लगभग 9 साल बाद. उस की खोजी नजरों से कुछ भी छिपा नहीं. भावना ने चायनाश्ता परोसा, खाना भी परोसा मगर पहले जैसा कुछ नहीं लगा रमा को. भावना अनमनी सी रही.

‘‘रात खाने में क्या बनाना है?’’ भावना बोली, ‘‘अभी बता दीजिए. शाम को मुझे किट्टी पार्टी में जाना है देर हो जाएगी. इसलिए अभी तैयारी कर लेती हूं.’’

‘‘आज किट्टी रहने दो. रमा क्या सोचेगी,’’ मैं ने कहा.

‘‘आप तो हैं ही, मेरी क्या जरूरत है. समय पर खाना मिल जाएगा.’’

बदतमीज भी लगी मुझे भावना इस बार. पिछली बार रमा से जिस तरह घुलमिल गई थी, इस बार वैसा कुछ नहीं लगा. अच्छा ही है. मैं चाहती भी नहीं कि मेरे रिश्तेदारों से भावना कोई मेलजोल रखे.

मेरा सारा घर गंदगी से भरा है. ड्राइंगरूम गंदा, रसोई गंदी, आंगन गंदा. यहां तक कि मेरा कमरा भी गंदा. तकियों में से सीलन की बदबू आ रही है. मैं ने भावना से कहा था, उस ने बदले नहीं. शर्म आ रही है मुझे रमा से. कहां बिठाऊं इसे. हर तरफ तो जाले लटक रहे हैं. मेज पर मिट्टी है. कल की बरसात का पानी भी बरामदे में भरा है और भावना को घर से भागने की पड़ी है.

‘‘घर वही है मगर घर में जैसे खुशियां नहीं बसतीं. पेट भरना ही प्रश्न नहीं होता. पेट से हो कर दिल तक जाने वाला रास्ता कहीं नजर नहीं आता, दीदी. मैं ने समझाया था न, अपनेआप को बदलो,’’ आखिरकार कह ही दिया रमा ने.

‘‘तो क्या जाले, मिट्टी साफ करना मेरा काम है?’’

‘‘ये जाले तुम ने खुद लगाए हैं, दीदी. उस का मन ही मर चुका है, उस की इच्छा ही नहीं होती होगी अब. यह घर उस का थोड़े ही है जिस में वह अपनी जानमारी करे. सच पूछो तो उस का घर कहीं नहीं है. बेटा तुम से बंधा कहीं जा नहीं सकता और अपना घर तुम ने बहू को कभी दिया नहीं.

‘‘मैं ने समझाया था न, एक दिन तुम्हारा घर बिगड़ जाएगा. आज तुम से होता नहीं और वह अपना चाहा भी नहीं करती. मनमन की बात है न. तुम अपने मन का करती रहीं, वह अपने मन का करती रही. यही तो होना था, दीदी. मुझे यही डर था और यही हो रहा है. मैं ने समझाया था न.’’

रमा के चेहरे पर पीड़ा है और मैं यही सोच कर परेशान हूं कि मैं ने गलती कहां की है. अपना घर ही तो कस कर पकड़ा है. आखिर इस में गलत क्या है?

Hindi Drama Story

Family Kahani: मन से मन का जोड़

Family Kahani: मोती से मिल कर धागा और गंगाजल के कारण जैसे साधारण पात्र भी कीमती हो जाता है, वैसे ही छवि भी मनोज से विवाह कर इतनी मंत्रमुग्ध थी कि अपनी किस्मत पर गर्व करती जैसे सातवें आसमान पर ही थी. उस का नया जीवन आरंभ हो रहा था.

हालांकि अमरोहा के इतने बड़े बंगले और बागबगीचों वाला पीहर छोड़ कर गाजियाबाद आ कर किराए के छोटे से मकान में रहना यों आसान नहीं होता, मगर मनोज और उस के स्नेह की डोर में बंध कर वह सब भूल गई.

मनोज के साथ नई गृहस्थी, नया सामान, सब नयानया, वह हर रोज मगन रहती और अपनी गृहस्थी में कुछ न कुछ प्रयोग या फेरबदल करती. इसी तरह पूरे 2 साल निकल गए.

मगर, कहावत है ना कि ‘सब दिन होत न एक समान‘ तो अब छवि के जीवन में प्यार का प्याला वैसा नहीं छलक रहा था, जैसा 2 साल पहले लबालब रहता था.

यों तो कोई खास दिक्कत नहीं थी, मगर छवि कुछ और पहनना चाहती तो मनोज कुछ और पहनने की जिद करता. यह दुपट्टा ऐसे ओढ़ो, यह कुरता वापस फिटिंग के लिए दे दो वगैरह.

मनोज हर बात में दखलअंदाजी करता था, जो छवि को कभीकभी बहुत ही चुभ जाती थी. बाहर की बातें, बाहर के मामले तो छवि सहन कर लेती थी, मगर यह कप यहां रखो, बरतन ऐसे रखो वगैरह रोकटोक कर के मनोज रसोई तक में टीकाटिप्पणी से बाज नहीं आता था.

परसों तो हद ही हो गई. छवि पूरे एक सप्ताह तक बुखार और सर्दी से जूझ रही थी, मगर मनोज तब भी हर पल कुछ न कुछ बोलने से बाज नहीं आ रहा था. छवि जरा एकांत चाहती थी और खामोश रह कर बीमारी से लड़ रही थी, मगर मनोज हर समय रायमशवरा दे कर उस को इतना पागल कर चुका था कि वह पक गई थी.

तब तो हद पार हो गई, जब वह सहन नहीं कर सकी. हुआ यह था कि अपने फोन पर पसंदीदा पुराने गीत लगा कर जब किसी तरह वह रसोई में जा कर नाश्ता वगैरह तैयार करने लगी और मनोज ने आदतन बोलना शुरू कर दिया, ‘‘छवि, यह नहीं यह वाले बढ़िया गाने सुनो,‘‘ और फिर वह रुका नहीं, ‘‘छवि, यह भिंडी ऐसे काटना, वो बींस वैसे साफ करना, उस लहसुन को ऐसे छीलना,‘‘ बस, अब तो छवि ने तमतमा कर चीखनाचिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘ये लो, यह पकड़ो अपने घर की चाबी. यह रहा पर्स, यह रहे बचत के रुपए और यह रहे 500 रुपए, बस यही ले जा रही हूं… और जा रही हूं,‘‘ कह कर छवि ने बड़बड़ाते हुए बाहर आ कर रिकशा किया और सीधा बस स्टैंड चल दी.

बस तैयार खड़ी थी. छवि को सीट भी मिल गई. वह पूरे रास्ते यही सोचती रही, ‘‘अब इस टोकाटाकी करने वाले मनोज नामक व्यक्ति के पास कभी जाएगी ही नहीं, कभी नहीं.‘‘

महज 4 घंटे में वह पीहर पहुंच गई. वह पीहर, जहां वह पूरे 2 साल में बस एक बार पैर फिराने और दूसरी बार पीहर के इष्ट को पूजने गई थी.

पीहर में पहले तो उस को ऐसे अचानक देख पापामम्मी, चाचाचाची और चचेरे भाईबहन सब चैंक गए, मगर छवि ने बहाना बनाया, ‘‘वहां कोई परिचित अचानक बीमार हो गए हैं. मनोज को वहां जाना है. मुझे पहले से बुखार था, तो मनोज ने कहा कि अमरोहा जा कर आराम करो. बस जल्दी में आना पड़ा, इसलिए केवल यह मिठाई लाई हूं.‘‘

सब लोग खामोश रहे. मां सब समझ गई थीं. वे छवि को नाश्ता करा कर उस की अलमारी की चाबी थमा कर बोलीं, ‘‘जब से तुम गई हो, तुम्हारे पापा हर रोज 100 रुपए तुम्हारे लिए वहां रख देते हैं. यह लो चाबी और वो सब रुपए खुल कर खर्च करो.‘‘

यह सुन कर छवि उछल पड़ी और चाबी ले कर झटपट अपनी अलमारी खोल दी. उस में बहुत सी पोशाकें थीं और कुछ पर्स थे नोटों से भरे हुए.

छवि ने मां से पूछा, ‘‘पापा यहां रुपए क्यों रख रहे थे?‘‘

मां ने हंस कर कहा, ‘‘तुम हमारी सलोनी बिटिया कैसे कुशलता से अपना घर चला रही हो. हम को गर्व है, यह तो तुम्हारे लिए है बेटी.‘‘

‘‘अच्छा, गर्व है मुझ पर,‘‘ कह कर छवि आज सुबह का झगड़ा याद कर के मन ही मन शर्मिंदा होने लगी. उस को लगा कि मां कुछ छानबीन करेंगी, कुछ सवाल तो जरूर ही पूछ लेंगी, मगर उस को प्यार से सहला कर और आराम करो, ऐसा कह कर मां कुछ काम करने चली गईं. वह अलमारी के सामने अकेली रह गई, मगर अभी कुछ जरूरी काम करना था. इसलिए छवि सबकुछ भूल कर तुरंत दुनियादार बन गई. वहां तकरीबन 25,000 रुपए रखे थे. उस ने चट से एक सूची बना कर तैयार कर ली.

छवि फिलहाल तो कुछ खा कर सो गई, मगर शाम को बाजार जा कर उन रुपयों से पीहर में सब के लिए उपहार ले आई. बाजार में उस को अपनी सहेली रमा मिल गई. छवि और उस की गपशप भी हो गई. उस के गांव का बाजार बहुत ही प्यारा था. छोटा ही था, पर वहां सबकुछ मिल गया था.

उपहार एक से बढ़ कर एक थे. सब से उन उपहारों की तारीफ सुन कर कुछ बातें कर के वह उठ गई और फिर छवि ने रसोई में जा कर कुछ टटोला. वहां आलू के परांठे रखे थे. उस ने बडे़ ही चाव से खाए और गहरी नींद में सो गई. नींद में उस को रमा दिखाई दी. रमा से जो बातें हुईं, वे सब वापस सपने में आ गईं. छवि पर इस का गहरा असर हुआ.

सुबह उठ कर छवि वापस लौटने की जिद पर अड़ गई थी. मां समझ गईं कि शायद सब मामला सुलझ गया है. वे कभी भी बच्चों के किसी निर्णय पर टोकाटाकी नहीं करतीं थीं. वे ग्रामीण थीं, मगर बहुत ही सुलझी हुई महिला थीं. छवि को पीहर की मनुहार मान कर कम से कम आज रुकना पड़ा. वह कल तो आई और आज वापस, यह भी कोई बात हुई. सब की मानमनुहार पर छवि बस एक दिन और रुक गई.

उधर, मनोज को इतनी लज्जा आ रही थी कि उस ने ससुराल मे शर्म से फोन तक नहीं किया. मगर वह 2 दिन तक बस तड़पता ही रहा और उस के बाद फोन ले कर कुछ लिखने लगा.

‘‘छवि, पता है, तुम सब से ज्यादा शाम को याद आतीं. दिनभर तो मैं काम करता था, मगर निगोड़ी शाम आते ही पहली मुश्किल शुरू हो जाती थी कि आखिर इस तनहा शाम का क्या किया जाए. तुम नहीं होती थीं, तो एक खाली जगह दिखती थी, कहना चाहिए कि बेचैनी और व्याकुलता से भरी. तब मैं एलबम उठा लेता था, इसे तुम्हारी तसवीरों से, उन मुलाकातों की यादों से, बातों से, तुम्हारी किसी अनोखी जिद और बहस को हूबहू याद करता और जैसेतैसे भर दिया करता था, वरना तो यह दैत्य अकेलापन मुझे निगल ही गया होता.

‘‘तुम होती थीं, तो मेरी शामों में कितनी चहलपहल, उमंग, भागमभाग, तुम्हारी आवाजें, गंध, शीत, बारिश, झगड़े, उमस या ओस सब हुआ करता था, मगर अब तो ढलती हुई शाम हर क्षण कमजोर होती हुई जिंदगी बन रही है कि जितना विस्मय होता है, उस से अधिक बेचैनी.

‘‘तुम्हारे बिना एक शाम न काटी गई मुझ से, जबकि मैं ने कोशिश भरसक की थी. परसों सुबह तुम नाराज हो कर चली गईं. मैं ने सोचा कि वाह, मजा आ गया. अब पूरे 2 साल बाद मैं अपनी सुहानी शाम यारों के साथ गुजार लूंगा. अब पहला काम था उन को फोन कर के कोई अड्डा तय करना. रवि, मोहित और वीर यह तीनों तो सपरिवार फिल्म देखने जा रहे थे. इसलिए तीनों ने मना कर दिया. अब बचा राजू. उसे फोन किया तो पता लगा कि वह अपनी प्रेमिका को समय दे चुका है. इतनी कोफ्त हुई कि आगे कोई कोशिश नहीं की.

‘‘बस, चैपाटी चला गया, मगर वहां तो तुम्हारे बिना कभी अच्छा लगता ही नहीं था. बोर होता रहा और कुछ फोटोग्राफी कर ली. बाहर कुछ खाया और घर आ गया.

‘‘घर आ कर ऐसा लगा कि घर नहीं है, कोई खंडहर है. बहुत ही भयानक लग रहा था तुम्हारे बिना, पर मेरे अहंकार ने कहा कि कोई बात नहीं, कल सुबह से शाम बहुत मजेदार होने वाली है और बस सोने की कोशिश करता रहा. करवट बदलतेबदलते किसी तरह नींद आ ही गई. सुबह मजे से चाय बनाई, मगर बहुत बेस्वाद सी लगी, फिर अकेले ही घर साफ कर डाला और दफ्तर के लिए तैयार हो गया.

‘‘अब नाश्ता कौन बनाता, बाहर ही सैंडविच खा लिए, तब बहुत याद आई, जब तुम कितने जायकेदार सैंडविच बनाती हो, यह तो बहुत ही रूखे थे.

‘‘मुझे अपने जीवन की फिल्म दिखाई देने लगी किसी चित्रपट जैसी, मगर नायिका के बगैर. मैं बहुत बेचैन हो गया. दफ्तर की मारामारी में मन को थोड़ा सा आराम मिला, मगर पलक झपकते ही शाम हो गई और दफ्तर के बाहर मैदान में हरी घास देख कर तुम्हारी फिर याद आ गई. 1-2 महिला मित्र हैं, उन को फोन लगाया, मगर वे तो अब अपनी ही दुनिया में मगन थीं. कहां तो 4 साल पहले तक वे कितनी लंबीलंबी बातें करती थीं और कहां अब वे मुझे भूल ही गई थीं.

अब क्या करता, फिर से एक उदास शाम को धीरेधीरे से रात में तबदील होता नहीं देख सकता, पर झक मार कर सहता रहा. मन ऐसा बेचैन हो गया था कि खाना तो बहुत दूर की बात पानी तक जहर लग रहा था. शाम के गहरे रंग में तारों को गिन रहा था, मगर तुम को न फोन किया और न तुम्हारा संदेश ही पढ़ा. तुम को जितना भूलना चाहता, तुम उतना ही याद आ रही थीं.

बस, इस तरह से दो शामों को रात कर के अपने ऊपर से गुजर जाने दिया. मेरा अहंकार मुझे कुचल रहा था, पर मैं कुछ समझना ही नहीं चाहता था. तुम हर पल मेरे सामने होतीं और मैं नजरअंदाज करना चाहता, यह भी मेरे अहंकार का विस्तार था.

अब तुम को लेने आ रहा हूं, तुम तैयार रहना, यह सब अपने फोन पर टाइप कर के मनोज ने छवि को भेज दिया. मगर 10 मिनट हो गए, कोई जवाब नहीं आया. 20 मिनट बीततेबीतते मनोज की आंखें ही छलक आईं. वह समझ गया कि अब शायद छवि कभी लौट कर नहीं आने वाली है, तभी दरवाजा खुला. मनोज चैंक गया, ‘‘ओह छवि, उसे पता रहता तो कभी दरवाजा बंद ही नहीं करता.’’

छवि ने हंस कर अपने फोन का स्क्रीन दिखाते हुए कहा, ‘‘वह बारबार यह संदेश पढ़ रही थी.‘‘

संदेश पढ़ कर तुम उड़ कर ही वापस आ गई, ‘‘हां… हां, पंख लगा कर आ गई,’’ यह सुन कर मनोज ने कुछ नहीं कहा. वह बडे़ गिलास में पानी ले आया और छवि को गरमागरम चाय भी बना कर पिला दी.

छवि ने अपने भोलेपन में मनोज को यह बात बता दी कि पीहर के बाजार में सहेली रमा मिली थी. रमा से बात कर के उस का मन बदल गया. वह उसे पूरे 2 साल बाद अचानक ही मिली थी. वह बता रही थी, ‘‘उस के पति सूखे मेवे का बड़ा कारोबार करते हैं. रोज उस को 5,000 रुपए देते हैं कि जहां मरजी हो खर्च करो. घरखर्च अलग देते हैं, पर कोई बात नहीं करते. कभी पूछते तक नहीं कि रसोई कैसे रखूं, कमरा कैसे सजाऊं, क्या पहनूं और क्या नहीं?

‘‘हर समय बस पैसापैसा यही रहता है दिमाग में. मुझे हर महीने पीहर भेज कर अपने कारोबारी दोस्तों के साथ घूमते हैं. मेरे मन की बात, मेरी कोई सलाह, मेरा कोई सपना, उन को इस से कुछ लेनादेना नहीं है. बस, मैं तो चैकीदार हूं, जिस को वे रुपयों से लाद कर रखते हैं.

‘‘सच कहूं, ऐसा लापरवाह जीवनसाथी है कि बहुत उदास रहती हूं, पर किसी तरह मन को मना लेती हूं. मगर यह सपाट जीवन लग रहा है.‘‘

यह सब सुन कर मुझे बारबार मनोज बस आप की याद आने लगी. मन ही मन मैं इतनी बेचैन हो गई कि रात सपने में भी रमा दिखाई दी और वही बातें कहने लगी. मैं समझ गई कि यह मेरी अंतरात्मा का संकेत है. रमा अचानक राह दिखाने को ही मिली, और मैं वापस आ गई.’’

‘‘पर छवि, तुम कम से कम रमा को कोई उचित सलाह तो देतीं. तुम तो सब को अच्छी राय देती हो. जब वह तुम को अपना राज बता रही थी छवि,‘‘ मनोज ने टोका, तो छवि ने कहा, ‘‘हां, हां, मैं ने उस को अपने दोनों फोन नंबर दे दिए हैं और गाजियाबाद आने का आमंत्रण दिया है.

‘‘साथ ही, उसे यह सलाह दी कि रमा, तुम मन ही मन मत घुटती रहो. मुझे लगता है, मातापिता, भाईबहन, पड़ोसन या किसी मित्र को अपना राजदार बना लो. अगर कोई एक भी आप को समझता है, तो अगर वह सलाह नहीं देगा, पर कम से कम सुनेगा तो, तब भी मन हलका हो जाता है. साहित्य से लगाव हो, तो सकारात्मक साहित्य पढ़ो. नई जगहों पर अकेले निकल जाओ, नई जगह को अपनी यादों में बसा कर उन को अपना बना लो.

‘‘आमतौर पर जब भी कभी किसी को ऐसी बेचैनी वाली परिस्थिति का सामना करना पड़ा है, अच्छी किताब और संगीत, वफादार मित्र साबित होते हैं वैसे समय में. और अकेले खूब घूमा करो, पार्क में या मौल में या हरियाली को दोस्त बना लो और यह भी सच है कि सब से बड़ा आनंद तो अपना काम देता है. झोंक देना स्वयं को, काम में. चपाती सेंकना और पकवान बनाना यह सब मन की सारी नकारात्मकता को खत्म करता है.‘‘

‘‘हूं, वाह, वाह, बहुत अच्छी दी सलाह,‘‘ कह कर मनोज ने गरदन हिला दी.

‘‘बहुत शुक्रिया,‘‘ शरारत से कह कर छवि ने मनोज को कुछ पैकेट थमा दिए. उन सब में मनोज के लिए उपहार रखे थे, जो छवि को पीहर से दिए गए थे.

छवि ने रुपयों से भरी अलमारी का पूरा किस्सा भी सुना दिया, तो मनोज ने उस का हाथ थाम कर कहा, ‘‘तब तो पिता के गौरव की हिफाजत करो. छवि, अब नाराज मत होना. ठीक है.‘‘

छवि ने प्रगट में तो होंठों पर हंसी फैला दी, पर वह मन ही मन कहने लगी, मगर, मुझे तो मजा आ गया, ऐसे लड़ कर जाने में तो बहुत आनंद है. नहीं, अब बिलकुल नहीं, मनोज ने उस के मन की आवाज सुन कर प्रतिक्रिया दी. दोनों खिलखिला कर हंसने लगे.

Family Kahani

Teachers vs AI: महज ज्ञान नहीं व्यक्तित्व गढ़ते हैं शिक्षक                      

Teachers vs AI: आज के डिजिटल युग में ज्ञान पाना बेहद आसान हो गया है. गूगल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अनेक औनलाइन प्लेटफार्म ने सीखने के साधन बदल दिए हैं. हर सवाल का जवाब तुरंत मिल जाता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जानकारी ही जीवन संभालने की क्षमता देती है?

यहीं शिक्षक और मशीन का मूल अंतर सामने आता है. तकनीक तेज है, लेकिन संवेदनहीन; वह डेटा देती है, दिशा नहीं. एक अच्छा गुरु सिर्फ तथ्य नहीं समझाता, वह सोचने की कला, जीवन की जटिलताओं को समझने और मानसिक मजबूती विकसित करने की शक्ति देता है.

आज मानसिक स्वास्थ्य हर उम्र के लिए चुनौती बन चुका है. प्रतियोगिता, अपेक्षाएं, सोशल मीडिया का दबाव और बदलते रिश्ते युवाओं को भीतर से कमजोर बना रहे हैं. ऐसे समय में गुरु ही वह शख़्सियत है, जो पढ़ाने के साथ सहारा देता है, सुनता है, समझता है और आत्मविश्वास तथा भावनात्मक संतुलन का आधार तैयार करता है.

गूगल हर प्रश्न का उत्तर दे सकता है, लेकिन “तुम कर सकते हो” जैसा आत्मविश्वास नहीं जगा सकता. AI भविष्य की संभावनाएं बता सकता है, लेकिन किसी के आंसू पोंछकर उसके मन का बोझ हल्का नहीं कर सकता. शिक्षक का यही मानवीय स्पर्श जीवन में संतुलन लाता है, आत्मसम्मान बढ़ाता है और कठिन समय में सही राह दिखाता है.

तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ जानकारी देना नहीं, बल्कि इंसान को इंसान बनाना है. मानसिक मज़बूती, नैतिकता, संवेदना और आशा का संचार केवल एक अच्छे शिक्षक ही कर सकते हैं. मशीनें ज्ञान दे सकती हैं, पर मानवीय संवेदना और दिशा देने का कार्य गुरु ही निभाते हैं.

Teachers vs AI

Dowry System: दहेज प्रेम का सौदा या मानसिक असंतुलन का प्रतीक   

Dowry System: भारत आज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में ऊंचाइयां छू रहा है, परंतु दहेज जैसी कुप्रथाएं अब भी हमारे मानसिक विकास पर प्रश्न उठाती हैं. यह केवल सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि उन लड़कों की मानसिक अस्वस्थता का प्रतीक है जो विवाह जैसे पवित्र बंधन को लेनदेन का सौदा बना देते हैं.

दहेज प्रथा भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक सोच, आर्थिक असमानता और लैंगिक भेदभाव का परिणाम है. विवाह के बाद महिलाओं को बोझ समझने की प्रवृत्ति आज भी बनी हुई है. दहेज मांगने वाले परिवार महिलाओं को वस्तु के रूप में देखते हैं, जिससे हिंसा और मानसिक शोषण बढ़ता है.

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 80 और 85 के बावजूद, कई मामले “पारिवारिक विवाद” कहकर दबा दिए जाते हैं. वर्ष 2017 से 2022 के बीच 6,100 से अधिक दहेज हत्याएं दर्ज हुईं. उपभोक्तावाद, आर्थिक दबाव और भव्य विवाह संस्कृति ने इस कुप्रथा को और गहरा बना दिया है, जो समाज की मानसिक अस्वस्थता को दर्शाता है.

दहेज मांगने वाले लड़के न केवल अपने व्यक्तित्व की कमजोरी दिखाते हैं, बल्कि विवाह की नींव को पहले दिन से ही खट्टा कर देते हैं. जो रिश्ता प्रेम, समानता और सम्मान पर टिकना चाहिए, वह लालच और दिखावे के बोझ तले टूटने लगता है. ऐसे पुरुष यह नहीं समझते कि दहेज लेकर वे पत्नी का नहीं, बल्कि अपनी सोच का अपमान कर रहे हैं.

निकी जैसी घटनाएं यह दर्शाती हैं कि दहेज अब केवल लालच नहीं, बल्कि मानसिक रोग का रूप ले चुका है. यह पुरुषों की असुरक्षा और हीनभावना का परिणाम है. जब परिवार और समाज ऐसे व्यवहार को “परंपरा” कहकर स्वीकार करते हैं, तो वे भी इस मानसिक बीमारी को बढ़ावा देते हैं.

अब समय है कि लड़के खुद यह संकल्प लें कि वे दहेज नहीं लेंगे — क्योंकि आत्मसम्मान और सच्चे प्रेम का कोई मोल नहीं होता. दहेज मांगने वाला लड़का केवल पैसे नहीं लेता, वह अपने रिश्ते की गरिमा और पत्नी के सम्मान को भी गिरवी रख देता है.

लड़के वाले लड़को को चेक मानते हैं जिन्हें शादी के बंधन में बांधते समय लड़की पक्ष से मन मुताबिक कैश कराया जाता है. वास्तविक प्रगति तभी होगी जब पुरुष वर्ग स्वयं इस सोच को बदले और विवाह को सम्मान, समानता और साझेदारी का बंधन समझे न कि सौदेबाजी का मंच. जब लड़के यह ठान लेंगे कि दहेज नहीं चाहिए, तब समाज अपने आप बदल जाएगा.

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Nepal Genz: सबक लेना है जरूरी

Nepal Genz: किसी भी देश के लिए उसकी युवा पीढ़ी उसका भविष्य होती है, खासकर भारत जैसे देश में, जहां युवाओं की संख्या सर्वाधिक है. ऐसे में लोकतंत्र को केवल चुनाव और सत्ता परिवर्तन तक सीमित समझना किसी भी देश के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है, क्योंकि जहां सत्ता केवल लालच बन जाती है, वहां देशहित की भावना नहीं पनप पाती.

देश के भीतर बेरोजगारी और महंगाई जैसी समस्याएं जरा-सी चिंगारी पाकर सब कुछ ध्वस्त कर सकती हैं, और इसका सीधा असर युवाओं पर पड़ता है. जब यही युवा एकजुट होते हैं, तब नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों की तरह हालात बिगड़ना तय हो जाता है.

नेपाल का उदाहरण भारत के लिए एक चेतावनी है. वहां लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार ने लोकतंत्र को कमजोर किया है. नेताओं की आपसी खींचतान, सत्ता का लालच और जनता की आकांक्षाओं की अनदेखी ने युवाओं में गहरा असंतोष पैदा किया है. रोजगार और अवसरों के अभाव में निराशा इतनी बढ़ गई कि आंदोलन और हिंसा तक हुए.

नेपाल के अनुभव से भारत को सबक लेना चाहिए. यदि भारत के नेता युवाओं की समस्याओं को नजरअंदाज करेंगे, तो यहाँ भी वही स्थिति उत्पन्न हो सकती है. भारत में तेजी से बढ़ती बेरोजगारी और युवाओं की बेचैनी को समय रहते गंभीरता से समझना होगा.

भारत के लिए आवश्यक है कि वह ऐसा लोकतांत्रिक मॉडल बनाए, जिसमें शिक्षा, रोजगार और अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित हो. युवाओं को यह महसूस होना चाहिए कि उनके सपनों और संघर्षों का सम्मान होता है.

देश की सरकार उनके उज्ज्वल भविष्य के प्रति जागरूक दिखे और योजनाएं केवल सरकारी दफ्तरों की फाइलों तक सीमित न रहें. युवाओं तक सरल तरीकों से इन योजनाओं का लाभ पहुंचे. जहां युवाओं को अवसर मिलेगा, वहां देश तरक्की की राह पर आगे बढ़ेगा.

अंततः संदेश यह है कि नेपाल की राजनीतिक असफलताएं भारत के लिए आईना हैं. यदि युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा न दी गई, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ सकता है. मजबूत लोकतंत्र वही है, जो नागरिकों, विशेषकर युवाओं, को आशा और अवसर प्रदान करें.

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Beauty Tips: औयली स्किन के लिए कौन सा फेशियल होगा सही?

Beauty Tips:

मेरी उम्र 28 वर्ष है. मेरी त्वचा तैलीय है और मेरे चेहरे पर मुंहासे बहुत जल्दी आ जाते हैं. मुझे कौन सा फेशियल कराना चाहिए. और्गेनिक फेशियल क्या होता है? क्या इसे कराने से मेरे मुंहासे दूर हो जाएंगे, मौसम बदलते ही ये भयानक रूप ले लेते हैं. मुझे डर है कि कहीं मेरे चेहरे पर काले गड्ढे न बन जाएं. कृपया कोई घरेलू फेस पैक बताएं?

मुंहासों की समस्या हारमोनल प्रौब्लम के कारण हो सकती है. आप किसी अच्छे ऐंडोक्राइनोलौजिस्ट से संपर्क करें और अपना पूरा इलाज करवाएं. और्गेनिकल फेशियल में नैचुरल प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन मुंहासे होने पर फेशियल न करवाएं क्योंकि फेशियल के दौरान स्क्रब किया जाता और मुंहासे होने पर स्क्रब करने से बचना चाहिए. फेस से ऐक्स्ट्रा औयल को रिमूव दिन में 2-3 बार एस्ट्रिंजैंट से अपना फेस क्लीन करें. घरेलू पैक के लिए 1 चम्मच मुलतानी मिट्टी में क्रश नीम की पत्तियों व गुलाबजल मिक्स कर के चेहरे पर लगाएं.

  मेरे चेहरे पर साइन औफ एजिंग दिखने लगे हैं. इन से बचने के लिए मुझे कौन सा फेशियल करवाना चाहिए? क्या ब्यूटी क्लीनिक में इन्हें दूर करने के लिए ट्रीटमैंट है?

आप किसी भी अच्छे कौस्मैटिक क्लीनिक से माह में एक बार ट्रिपल आर फेशियल करवा लें. इन तीन आर का मकसद स्किन को रिहाइड्रेट, रिजनरेट और रिजुविनेट करना होता है. इस फेशियल में शामिल प्रोडक्ट्स से त्वचा में कोलाजन बनने का प्रोसैस बढ़ जाता है जो त्वचा को साइन औफ एजिंग से प्रोटैक्ट करता है जिस से त्वचा में नवीनीकरण दिखाई देता है. इस ट्रीटमैंट में माइक्रो मसाजर या फिर अपलिफ्टिंग मशीन द्वारा फेस को लिफ्ट किया जाता है जिस से सैगी स्किन अपलिफ्ट हो जाती है और उस में कसाव आ जाता है. इस के अलावा घर पर बादाम को रातभर पानी में भिगो दें. सुबह उन्हें पीस लें और फिर उस में थोड़ा कैलामाइन पाउडर, पका हुआ केला व गुलाबजल डाल कर पेस्ट बनाएं और अपने चेहरे पर स्क्रब करें. इस स्क्रब से स्किन को कंप्लीट पोषण मिलेगा और त्वचा चमक उठेगी.

मेरी स्किन रूखी है और रंग दबा हुआ है. रूखापन कम करने और रंग को निखारने के लिए मैं ने पार्लर में बहुत बार फेशियल भी करवाए लेकिन कोई फायदा नहीं मिला. कृपया इस के लिए कोई उपाय बताएं?

आप एक बार अपना पार्लर बदल कर देखें. कई बार सही तरीके से स्टैप्स न फौलो करने के कारण फेशियल का फायदा चेहरे पर दिखाई नहीं देता. इसलिए इस बार आप किसी अच्छे कौस्मैटिक क्लीनिक से एएचए फेशियल करवाएं. एएचए यानी अल्फा हाइड्रौक्सी ऐसिड फलों से निकाले गए ऐसिड होते हैं जो स्किन को रिजनरेट कर के फेयरनैस देता है साथ ही त्वचा को हाइड्रेट कर के उस की ड्राईनैस को दूर करता है. घरेलू उपाय के तौर पर औलिव औयल और आमंड औयल में कुछ बूंदें औरेंज औयल की मिक्स कर के फेस पर मसाज करें. ऐसा रोजाना करने से रूखापन कम होगा और रंग भी निखरेगा.

मेरी उम्र 48 साल है. मेरी स्किन ढीली होने लगी है साथ ही आंखों के चारों ओर डार्क सर्कल्स भी बन गए हैं. मैं ऐसा क्या उपाय करूं जिस से मेरी स्किन में कसाव आ जाएं?

त्वचा के कसाव को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि आप का खानपान उचित हो क्योंकि हमारी त्वचा सौफ्ट प्रोटीन से बनती है. ऐसे में इस की पूर्ति के लिए दाल, अंकुरित अनाज व हो सके तो अंडा, मछली जरूर खाएं. त्वचा की इलास्टिसिटी और फ्लैक्सिबिलिटी को बढ़ाने के लिए ओमेगा फैटी ऐसिड युक्त आहार जैसे अखरोट, फ्लैकसीड व सालमन फिश लेना आरंभ कर दें. इन के साथ ही अंडे की सफेदी को फेंट कर उस में 1/2 चम्मच कियोलिन पाउडर और शहद डाल कर चेहरे पर लगाएं. सूखने पर ठंडे पानी से धो दें. इस पैक को लगाने से त्वचा में कसाव आएगा. काले घेरों के लिए घर पर 1/2 चम्मच आमंड औयल में 2 बूंद औरेंज औयल की मिक्स कर के आंखों के नीचे रोजाना हलकी मालिश कीजिए. ऐसा नियमित करने से काले घेरे हलके हो जाएंगे. रात में सोने से पहले फेस साफ कर के एएचए क्रीम से अपनी मसाज कीजिए और सुबह फेस पर लाइट स्क्रब करने के बाद कोलाजन सीरम लगाएं. जल्दी व इफेक्टिव रिजल्ट के लिए इन सब के साथसाथ किसी अच्छे कौस्मैटिक क्लीनिक से माह में एक बार एएचए फेशियल करवाएं. साथ ही कोलाजन मास्क भी जरूर लगवाएं.

  मेरा ऊपर वाला होंठ तो गुलाबी है, परंतु निचला गेहुआं है. कृपया इन्हें ठीक करने का कोई घरेलू रेमेडी सुझाएं. साथ ही मेरे अंडरआर्म्स काफी काले हैं, उन्हें हलका करने का उपाय बताएं?

आप होंठों के रंग को हलका करने के लिए मलाई, गुलाब की पत्तियों व शहद मिला कर अपने होंठों पर रोजाना लगाएं. ऐसा कुछ दिन तक लगातार करने से लिप्स गुलाबी नजर आएंगे. अंडरआर्म्स के रंग को हलका करने के लिए ब्लीच करवा सकती हैं और घर पर कच्चे पपीते की फांक रगड़ सकती हैं. क्लीनिकल ट्रीटमैंट के तौर पर पील भी करवा सकती हैं.

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Short Story in hindi: दो बूंद आंसू- सुनीता ने अंजान की मदद क्यों की

Short Story in hindi: ‘कुमारी सुनीता, आप की पूरी फीस जमा है. आप को फीस जमा करने की आवश्यकता नहीं है,’’ बुकिंग क्लर्क अपना रेकौर्ड चैक कर के बोला.‘‘मगर मेरी फीस किस ने जमा कराई है. वह भी पूरे 50 हजार रुपए,’’ सुनीता हैरानी से पूछ रही थी.

‘‘मैडम, आप की फीस औनलाइन जमा की गई है,’’ क्लर्क का संक्षिप्त सा उत्तर था.वह हैरानपरेशान कालेज से वापस लौट आई. उस की मां बेटी का परेशान चेहरा देख कर पूछ बैठी, ‘‘क्या बात है बेटी?’’

‘‘मां, किसी व्यक्ति ने मेरी पूरी फीस जमा करा दी है,’’ वह हैरानी से बोली.‘‘किस ने और क्यों जमा कराई?’’ सुनीता की मां भी परेशान हो उठी. ‘‘पता नहीं मां, कौन है और बदले में हम से क्या चाहता है?’’ बेटी की परेशानी इन शब्दों में टपक रही थी.

उस की मां सोच में पड़ गई. आजकल मांगने के बाद भी मुश्किल से 5-10 हजार रुपए कोई देता है वह भी लाख एहसान जताने के बाद. इधर ऐसा कौन है जिस ने बिना मांगे 50 हजार रुपए जमा करा दिए. आखिर, बदले में उस की शर्त क्या है?‘‘खैर, जाने दो जो भी होगा दोचार दिनों में खुद सामने आ जाएगा,’’ मां ने बात को समाप्त करते कहा.दोनों मांबेटी खाना खा कर लेट गईं.

सुनीता की मां एक प्राइवेट हौस्पिटल में 4 हजार रुपए मासिक पर दाई की नौकरी करती है. आज से 15 साल पहले एक रेल ऐक्सिडैंट में वह पति को खो चुकी थीं. तब सुनीता मुश्किल से 5-6 साल की रही होगी. तब से आज तक दोनों एकदूसरे का सहारा बन जी रही हैं.

सुनीता को पढ़ाना उस का एक फर्ज है. बेटी बीए कर रही थी.सुनीता ने अपने पिता को इतनी कम उम्र में देखा था कि उसे उन का चेहरा तक ठीक से याद नहीं है. कोई नातेरिश्तेदार इन से मिलने नहीं आता था. ऐसे में यह कौन है जो उस की फीस भर गया?दोनों मांबेटी की आंखों में यह प्रश्न तैर रहा था.

पिता के नाम के स्थान पर दिवंगत रामनारायण मिश्रा लिखा था मगर वे कौन थे और कैसे थे, इस की चर्चा घर में कभी नहीं होती थी.

मगर आज…सुनीता के चाचा, मामा, मौसा या किसी दूसरे रिश्तेदार ने आज तक कभी एक रुपए की मदद नहीं की, ऐसी स्थिति में इतनी बड़ी रकम की मदद किस ने की.

बहरहाल, सुनीता उत्साह के साथ पढ़ाई में जुट गई. दोचार वर्षों में वह बैंक, रेलवे या कहीं भी नौकरी कर के घर की गरीबी दूर कर देगी. वह मां को इस तरह खटने  नहीं  देगी. मां ने विधवा की जिंदगी में काफी कष्ट झेला है.

सुनीता उस दिन अचकचा गई जब उस के प्राचार्य  ने उसे एक खत दिया. और कहा, ‘‘बेटी, आप के नाम यह पत्र एक सज्जन छोड़ गए हैं, आप चाहें तो इस पते पर उन से संपर्क कर सकती हैं या फोन पर बात कर सकती हैं.’’‘‘जी, धन्यवाद सर,’’ कह कर वह उन के कैबिन से बाहर आ गई और सीधा घर जा कर खत पढ़ा. उस में लिखा था, ‘‘बेटी, आप की फीस मैं ने भरी है, बदले में मुझे तुम से कुछ भी नहीं चाहिए, न ही तुम्हें यह पैसा लौटाना है.’’

नीचे उन के हस्ताक्षर और मोबाइल नंबर था.सुनीता की मां ने जब वह नंबर डायल किया तो तुरंत जवाब मिला, ‘‘जी, आप सुनीता या उस की मां?’’‘‘मैं उस की मां बोल रही हूं. आप ने मेरी बेटी की फीस क्यों भरी?’’‘‘जी, इसलिए कि मुझे इन के पिता का कर्ज चुकाना था.’’ वह संक्षिप्त उत्तर दे कर चुप हो गया.‘‘ऐसा कीजिए आप मेरे घर आ जाइए.‘‘‘‘ठीक है, रविवार को दोपहर 1 बजे मैं आप के घर आऊंगा,’’ कह कर उस व्यक्ति ने फोन काट दिया.

रविवार को वह समय पर हाजिर हो गया. करीब 28-30 वर्ष का वह नौजवान आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था. वह बाइक से आया और सुनीता की मां को मिठाई का डब्बा दे कर नमस्कार किया.सुनीता ने भी उसे नमस्कार किया और पास में बैठते हुए अपना प्रश्न दोहराया.

‘‘मैं ने फोन पर बताया तो था कि आप का ऋण चुकता किया है,’’ वह सरल स्वर में बोला था.‘‘कैसा ऋण? दोनों मांबेटी चौंकी थीं.‘‘ऐसा है कि रामनारायणजी ने मेरे पिताजी की 3 हजार रुपए की मदद की थी. उस के बाद मेरे पिताजी जब तक वह पैसा लौटाते तब तक रामनारायणजी गुजर चुके थे.

परिवार का कोई ठिकाना नहीं था. मेरे पिताजी ने आप लोगों को बहुत ढूंढ़ा पर खोज नहीं पाए,’’ वह स्पष्ट स्वर में जवाब दे रहा था, मैं पढ़लिख कर नौकरी में आ गया और स्टेट बैंक की उसी शाखा में आ गया जहां आप लोगों का खाता है.

साथ ही, वहीं सुनीता के कालेज का भी खाता है. मुझे यहीं आप का परिचय और आप की माली हालत का पता चला. मैं ने आप की मदद का निश्चय किया और फीस भर दी.’’‘‘मगर आप अपनेआप को छिपा कर क्यों रखना चाहते थे,’’ यह सुनीता का प्रश्न था.‘‘वह इसलिए कि मुझे बदले में कुछ भी नहीं चाहिए था और जमाने को देखते हुए मुझे चलना था.’’

‘‘फिर सामने क्यों आए?’’ यह सुनीता की मां का प्रश्न था.‘‘जब आप लोगों को परेशान देखा, खास कर आप का यह डर की पता नहीं इस आदमी की छिपी शर्त क्या है? मैं ने आप का ऋण चुकाया था, डराना मेरा पेशा नहीं है. सो, सामने आ गया.’’

अब उस के इस जवाब से वे दोनों मांबेटी, आश्चर्य से भर उठीं.‘‘मैं अब निकलना चाहूंगा. आप लोग चिंता न करें. मैं ने अपने पिताजी का ऋण चुकाया है,’’ वह उठते ही बोला.‘‘ऐसे कैसे? वह भी 3 हजार के 50 हजार रुपए?’’ अभी भी सुनीता की मां समझ नहीं पा रही थी.‘‘3 हजार रुपए नहीं, उन 3 हजार रुपए से मेरे पिता ने मेरी जान बचाई, मेरा इलाज कराया.

मैं जीवित हूं, तभी आज बैंक में काम कर रहा हूं. गरीबी की हालत में मेरे पिताजी की रामनारायणजी ने मदद की थी. आज मेरे पास सबकुछ है, बस, पिताजी नहीं हैं,’’ वह भावुक हो कर बोल रहा था.‘‘फिर तुम यह पैसा वापस क्यों नहीं लेना चाहते?’’ यह सुनीता की मां का प्रश्न था.‘‘उपकार के बदले प्रत्युपकार हो गया. सो कैसा पैसा?’’ वह स्पष्ट बोला.‘‘फिर भी…’’ सुनीता की मां समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे?‘‘कुछ नहीं आंटीजी, आप ज्यादा न सोचें. अब मुझे इजाजत दें,’’ इतना कह कर वह चल दिया.

दोनों मांबेटी उसे जाता देख रही थीं. इन की आंखों से खुशी के आंसू झर रहे थे.‘‘मां, आज भी ऐसे लोग हैं,’’ सुनीता बोली.‘‘हां, तभी तो वह हमारी मदद कर गया.’’‘‘मैं नौकरी कर के उन का पैसा वापस कर दूंगी,’’ वह भावुक हो कर बोली.‘‘बेटी, ऐसे लोग बस देना जानते हैं, लेना नहीं. सो, फीस की बात भूल जाओ. हां, बैंक में मेरा परिचय हो गया है, काम जल्दी हो जाएगा,’’ मां के बोल दुनियादारी भरे थे.

दोनों मांबेटी की आंखों में आंसू थे जो एक ही वक्त में 2 अलग सोच पैदा कर रहे थे. मां जहां पति को याद कर रो रही थी जिन के दम पर आज 50 हजार रुपए की मदद मिली, वहीं बेटी को यह व्यक्ति फरिश्ता नजर आ रहा था. काश, वह भी किसी की मदद कर पाती. 50 हजार रुपए कम नहीं होते.अब बस, दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे.

Short Story in hindi

Short Story: चपत- क्या शिखा अपने मकसाद में कामयाब हो पाई

Short Story: औफिस  से निकल कर रितु आकाश रेस्तरां में पहुंची. वहां एक कोने में बैठी शिखा को उस ने फौरन पहचान लिया, क्योंकि समीर ने उसे उस का फोटो दिखा रखा था.

रितु जानबूझ कर उस की तरफ बढ़नेके बजाय किसी को खोजने वाले अंदाज में इधरउधर देखने लगी. वह नहीं चाहती थी कि शिखा को यह मालूम पड़े कि वह उसे पहले से पहचानती थी.‘‘रितु,’’ शिखा ने जब उसे पुकारा तभी वह उस की तरफ बढ़ी.

शिखा के सामने वाली कुरसी पर बैठते ही रितु ने उस से आक्रामक लहजे में पूछा, ‘‘तुम ने मुझे फोन कर के यहां क्यों बुलाया है?’’शिखा ने गहरी सांस लेने के बाद रितु के हाथ पर अपना हाथ रखा और फिर सहानुभूति भरी आवाज में पूछा, ‘‘क्या तुम समीर से शादी कर के खुश हो?’’‘‘तुम मुझ से यह सवाल क्यों पूछ रही हो?’’ रितु के माथे पर बल पड़ गए.

‘‘तुम मुझे अपनी शुभचिंतक समझे.’’‘‘तुम मेरा कुछ भला करने जा रही हो?’’‘‘हां.’’‘‘क्या?’’‘‘इन्हें देखो,’’ कह शिखा ने अपने पर्स से कुछ पोस्टकार्ड साइज की तसवीरें निकाल कर रितु को पकड़ा दीं.रितु उन तसवीरों को देख कर हक्कीबक्की रह गई. उफ, मुंह से सिर्फ इतना निकला और फिर सिर झुका लिया.

शिखा ने उत्तेजित लहजे में बोलना शुरू किया, ‘‘यों मायूस होने के बजाय तुम मेरी बात ध्यान से सुनो. ये तसवीरें साफ बता रही हैं कि तुम से शादी करने से पहले समीर ने मेरे साथ प्यार का नाटक खेला था. शादी का वादा करने के बाद मुझे धोखा दिया… मेरी जिंदगी बरबाद कर दी… देख लेना एक दिन वह तुम्हें भीधोखा देगा.’’‘‘ऐसा न बोलो,’’ रितु रोंआसीहो उठी.

‘‘वह भरोसे के काबिल है ही नहीं, रितु. उस ने मुझे छोड़ा, क्योंकि तुम एक अमीर बाप की बेटी थीं. अब किसी और कली का प्रेमी बन कर उसे धोखा देगा, क्योंकि वहलालची होने के साथसाथ स्वाद बदलने का भी आदी है.’’‘‘अगर उस ने मेरे साथ ऐसा कुछ किया, तो मैं उस की जान ले लूंगी,’’ रितु अचानक गुस्से से फट पड़ी.‘‘उसे सीधी राह पर रखने का यही तरीका है कि वह तुम से डरे, रितु.

तुम समीर पर कभी भरोसा न करना. उस की मीठी बातों में न आना. किसी भी औरत का दिल जीतने की कला मेंवह कितना निपुण है, इस का अंदाजा तो अबतक तुम्हें भी हो गया होगा. रितु, अगर तुम ने कभी उसे किसी भी सुंदर स्त्री के साथ घुलनेमिलने का मौका दिया, तो बुरी तरह पछताओगी.’’‘‘धन्यवाद शिखा. तुम ने मुझे वक्त से चेता दिया.

अब मैं पूरी तरह होशियार रहूंगी,’’ रितु ने फौरन उस का आभार प्रकट किया.‘‘मेरी शुभकामनाएं सदा तुम्हारे साथ हैं.’’‘‘मैं तुम से मिलती रहना चाहूंगी.’’‘‘मैं अपना फोन नंबर तुम्हें देती हूं.’’‘‘और अपना पता भी दे दो.’’‘‘ठीक है.’’‘‘इन तसवीरों को मैं रख लूं?’’‘‘क्या करोगी इन का?’’‘‘इन्हीं के बल पर तो मैं समीर की नाक में नकेल डाल पाऊंगी.’’‘‘तो रख लो.’’‘‘धन्यवाद. अब कुछ ठंडा या गरम पी लिया जाए?’’

रितु ने वार्त्तालाप का विषय बदला और फिर दोनों सहेलियों की तरह गपशप करने लगीं. रितु शाम 7 बजे के करीब घर पहुंची.समीर ने मुसकरा कर स्वागत किया. वह उसे अपने पास बैठाना चाहता था, पर रितु ने अपने पर्स से तसवीरें निकाल कर उसे पकड़ाईं और बिना कुछ बोले अपने कमरे में चली गई.

रितु ने अभी पूरे कपड़े भी नहीं बदले थेकि समीर कमरे में आ गया, ‘‘तो मेरी पुरानी सहेली आज तुम से मिलने पहुंच ही गई,’’और फिर रितु को बांहों में भर कर अपनी गरमगरम सांसें उस के कान में छोड़नी शुरूकर दीं.‘‘तुम मुझ से दूर रहो,’’ रितु उस की बांहों की कैद से निकलने की कोशिश करने लगी.‘‘मैं ने तुम से दूर रहने के लिए शादी नहीं की है, जानेमन.’’‘‘शिखा ने मुझे आगाह कर दिया है.’’‘‘किस बारे में?’’‘‘यही कि तुम औरतों का दिल जीतने की कला में बहुत ऐक्सपर्ट हो, पर अब से तुम मुझे उत्तेजित कर के बुद्धू नहीं बना सकोगे.’’‘‘कोशिश करने में क्या हरज है, स्वीटहार्ट,’’ समीर ने उस के गालों को चूमना शुरू कर दिया.‘‘तुम एक दिन किसी दूसरी औरत के चक्कर में जरूर फंस जाओगे.’’‘‘ऐसा शिखा ने कहा?’’‘‘हां.’’‘‘नैवर… बंदा तुम्हें जिंदगी भर सिर्फ तुम्हारा दीवाना बना रहने का वचन दे सकता है.’’‘‘उस ने कहा है कि तुम उस की मीठी बातों पर कभी विश्वास न करना.’’‘‘मेरी बातों पर नहीं, बल्कि मेरे ऐक्शन पर विश्वास करो, मेरी जान,’’ समीर ने उसे झटके से अपनी बांहों में उठा लिया और फिर गुसलखाने की तरफ चल दिया.‘‘अरे, गुसलखाने में क्यों जा रहे हो?’’ रितु घबरा उठी.‘‘आज साथसाथ नहाने का मूड है.’’‘‘मेरे कपड़े भीग जाएंगे.’’‘‘मेरे भी भीगेंगे, पर मैं तो शोर नहीं मचा रहा हूं.’’

रितु के रोके समीर रुका नहीं. जब फुहारे का ठंडा पानी दोनों पर पड़ने लगा, तो रितुमस्त हो अपनी आंखें मूंद समीर के बदन से लिपट गई.‘‘मेरा हनीमून जिंदगी भर चले,’’ ऐसी कामना करने के बाद उस ने अपने तनमन को समीर के स्पर्श से मिल रही उत्तेजक गुदगुदी के हवाले कर दिया.3 दिन बाद रितु ने लंच अवकाश में शिखा से फोन पर बात की.‘‘मैं अपनी अटैची ले कर आज सुबह मायके रहने आ गई हूं,’’ रितु ने उसे गंभीर स्वर में जानकारी दी.‘‘क्या झगड़ा हुआ समीर से?’’ शिखा की आवाज में फौरन उत्सुकता के भाव पैदा हुए.‘‘हां.’’‘‘किस बात पर?’’

‘‘बात लंबी है और मुझे तुम्हारी सलाह भी चाहिए. क्या शाम को मैं तुम से मिलने तुम्हारे घर आ जाऊं?’’‘‘हां, आ जाओ पर कुछ तो बताओ कि हुआ क्या है?’’‘‘अभी नहीं, आसपास कई लोग हैं.’’‘‘कितने बजे तक पहुंचोगी?’’‘‘7 तक.’’‘‘मैं इंतजार करूंगी.’’फोन बंद कर रितु रहस्यमयी अंदाज में मुसकरा रही थी. शाम को घंटी बजाने पर दरवाजा शिखा नेही खोला.

वह अपनी मां के साथ फ्लैट में रहती थी. दोनों ड्राइंगरूम में बैठीं तो उस की मां वहां से उठ कर अपने कमरे में टीवी देखने चली गईं. ‘‘क्या बहुत झगड़ा हुआ तुम दोनों के बीच?’’ शिखा से सब्र नहीं हुआ और उस ने बैठते ही वार्त्तालाप शुरू कर दिया.‘‘समीर का असली चेहरा बेनकाब करवाने में मेरी सहायता करने के लिए तुम्हारा बहुतबहुत धन्यवाद, शिखा,’’ रितु भावुक हो उठी.‘‘हुआ क्या है, यह तो बताओ?’’‘‘उस ने मेरी बहुत बेइज्जती की.’’‘‘क्या किया उस ने?’’‘‘मैं ने तो उस से तलाक लेने का मन बना लिया है.’’‘‘क्यों, तुम उस पर इतना गुस्सा हो रही हो?’’‘‘मेरा बस चले तो मैं उस की जान हीले लूं.’’‘‘रितु,’’ शिखा चिढ़ उठी, ‘‘तुम पहले मुझे वह सब क्यों नहीं बता रही हो, जो तुम दोनों के बीच घटा है?’’‘‘उस की बातों को याद कर के मेरा दिल करता है कि उसे कच्चा चबा…’’‘‘रितु,’’ शिखा चिल्ला पड़ी.

रितु ने उसे अजीब नजरों से देखने के बाद चिढ़े लहजे में कहा, ‘‘उस ने मुझ से साफसाफ कह दिया कि कोई न कोई प्रेमिका उस की जिंदगी में हमेशा रहेगी.’’‘‘क्या?’’‘‘और यह भी कहा कि मैं अकेली उसे कभी संतुष्ट नहींकर पाऊंगी.’’‘‘तुम्हारा ऐसा अपमान करने की उस की हिम्मत कैसे हुई?’’‘‘उस ने मुझे मोटी भैंसभी कहा.’’‘‘तुम ने उस के सिर पर कुछ फेंक कर क्यों नहीं मारा?’’‘‘मुझे बदसूरत भी कहा और यह भी ताना मारा कि न मुझे ढंग के कपड़े पहनने की तमीज है और न ही मेरे पास ढंग के कपड़े हैं.’’‘‘तुम ने अच्छा किया जो मायके चली आईं… अब जब तक वह तुम से हाथ जोड़ कर माफी न मांगे, तुम वापस मत जाना.’’‘‘मैं अपनी मरजी से मायके नहीं आई हूं, शिखा.’’‘‘तो?’’‘‘उस ने मुझे जबरदस्ती भेजा.’’‘‘क्यों?’’‘‘उस ने चेतावनी दी है कि जब तक मेरी पर्सनैलिटी में निखार न आ जाए.

तब तक वापस न आना.’’‘‘वह खुद शर्मिंदा होनेके बजाय उलटा तुम्हें धमकी देरहा है?’’‘‘हां, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि अब मैं क्या करूं?’’‘‘तुम उस से न डरो और न उस के सामने झुको, रितु. इस बार तुम अगर कमजोर पड़ गईं, तो उसे दूसरी औरतों के साथ गुलछर्रे उड़ाने की खुली छूट मिल जाएगी.’’‘‘अगर मैं अपनी जिद पर अड़ी रही, तो मेरा घर उजड़सकता है.’’‘‘ऐसा कुछ नहीं होगा.’’रितु इस का कोई जवाब दे पाती, उस से पहले ही किसी ने घंटी बजा दी तो शिखा दरवाजा खोलने चली गई.

ड्राइंगरूम में जब गुस्से से आगबबूला हो रहे समीर ने शिखा के आगेआगे कदम रखा तो रितु चौंक कर खड़ीहो गई.‘‘मुझे पता था कि तुम यहीं मिलोगी,’’ समीर की आवाज गुस्से के मारे कांप रही थी, ‘‘इस चालाक औरत की बातों में आ कर तुम क्यों अपना घर बरबाद कर रही हो?’’‘‘इन्हें तुम्हारा असली चेहरा क्या है, यह मालूम पड़ना ही चाहिए,’’ शिखा ने रितु की तरफदारी की.‘‘क्या ये तुम्हारा असली चेहरा पहचानती हैं?’’ समीर ने अपनी भूतपूर्व प्रेमिका को गुस्सेसे घूरा.‘‘ये जानती हैं कि मैं इन की शुभचिंतक…’’‘‘नहीं,’’ समीर ने उसे टोक दिया, ‘‘तुम्हारा इरादा तो हमारे विवाहित जीवन की खुशियों को बरबाद करने का है.

क्या तुम ने इसे यह बताया है कि हमारा रिश्ता क्यों टूटा था?’’‘‘तुम्हारे गंदे दिमाग में जो बेबुनियाद शक…’’‘‘मेरा शक बेबुनियाद होता, तो उस शाम तुम मेरे हाथों चुपचाप मार न खातीं.’’ समीर ने फिर रितु को संबोधित किया, ‘‘इस की बदचलनी का ब्योरा मैं तुम्हें सुनाता हूं. मैं वायरल बुखार की चपेट में आ कर करीब 10 दिनों तक बिस्तर पर पड़ा रहा था.

इस धोखेबाज ने इसी घर के अंदर अपने एक सहयोगी के साथ मुंह काला किया. मैं ने इन्हें रंगे हाथों पकड़ा था. उस शाम मैं बड़ी कठिनाई से इसे सरप्राइज देने आया था, पर जो सरप्राइज मु?ो मिला उस का जख्म आज भी टीसता है तो मैं ढंग से सो नहीं पाता हूं, रितु.’’‘‘यह झूठ बोल रहा है,’’ शिखा चिल्लाई.‘‘कौन सच्चा है और कौन झूठा, इस की गवाही के लिए तुम्हारे पड़ोसियों को बुलाऊं?’’‘‘तुम जैसे घटिया आदमी से मैं सारे संबंध पहले ही तोड़ चुकी हूं.

तुम इसी वक्त यहां से चले जाओ.’’‘‘अगर सारे संबंध तोड़ चुकी थीं, तो फिर मेरी पत्नी को मेरे खिलाफ भड़ाकने की कोशिश क्यों की?’’‘‘मैं ने ऐसी कोई कोशिश नहीं…’’‘‘चुप,’’ उसे डांट कर चुप कराने के बाद समीर ने रितु की तरफ घूम कर उसे धमकी दी, ‘‘इस के कहे में आ कर मेरा दिमाग खराब करने की सजा तुम्हें भी मिलेगी. जब तक तुम मेरे मनमुताबिक चलने और दिखने लायक न हो जाओ, तब तक अपने मायके में ही सड़ो,’’ पत्नी को धमकी दे कर समीर गुस्से से पैर पटकता दरवाजे की तरफ चल पड़ा.

कुछ कदम चल कर वह अचानक पलटा और क्रूर मुसकान होंठों पर सजा कर शिखा से बोला, ‘‘तुम ने जो फोटो मेरे घर में आग लगाने के लिए रितु को दिए थे, अब वही फोटो तुम्हारी ऐसी की तैसी करेंगे. मैं देखता हूं कि तुम्हारी शादी अब नीरज से कैसे होती है.’’ समीर को शिखा ने रोकने की कोशिश जरूर की, पर उस के मुंह से कोई शब्द नहीं निकल पाया.

उस का चेहरा पीला पड़ गया था. बेहद चिंतित नजर आते हुए वह थकीहारी सी सोफे पर बैठ गई.रितु के कई बार पूछने पर शिखा ने उसे रोंआसी आवाज में बताया, ‘‘नीरज से मेरा रिश्ता पक्का होने जा रहा है.’’‘‘तब तो समीर उन फोटोज के बलपर तुम्हारे लिए गंभीर समस्या खड़ी करसकता है,’’ रितु भी चिंतित नजर आने लगी.‘‘वे फोटो मैं ने तुम्हारी हैल्प करने के लिए तुम्हें दिए थे.

प्लीज, अब उन को तुम ही वापस ला कर दो, रितु,’’ शिखा बहुत घबराई सी नजर आ रही थी.‘‘वे फोटो मैं तुम्हें जरूर लौटाऊंगी… तुम फिक्र न करो, लेकिन…’’‘‘लेकिन क्या?’’‘‘मैं तो वापस घर नहीं जा सकती. अभी तुम ने समीर की धमकी सुनी थी न.’’‘‘मेरी खातिर वापस चली जाओ, प्लीज,’’ शिखा ने उस के सामने हाथ जोड़ दिए.‘‘नहीं,’’ रितु ने सख्ती से इनकार कर दिया.‘‘प्लीज.’’‘‘तुम समझ नहीं रही हो… मैं ने पक्का इरादा कर लिया है कि अपनी फिगर ठीक करने के लिए पहले जिम जाना शुरू करूंगी… कुछ नई ड्रैसेज खरीदूंगी… ब्यूटीपार्लर से ब्राइडल पैकेज लूंगी, जो मुझे दुलहन सा आकर्षक बना दे.

मैं अगर इन सब कदमों को उठाए बिना लौट गई, तो मेरी कितनी किरकिरी होगी, जरा सोचो तो,’’ रितु परेशान नजर आने लगी.‘‘मेरे सुखद भविष्य की खातिर उन फोटोज का वापस मिलना क्या जरूरी नहीं है?’’‘‘यह भी ठीक है, पर मैं नहीं चाहतीकि समीर मुझे दुत्कार कर फिर से मायकेभेज दे.’’‘‘तो कल ही तुम इन सब सोचे हुए कामों को कर डालो.

फिर फौरन लौट कर उस से फोटो ले कर मुझे लौटा दो.’’‘‘मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकती हूं, शिखा,’’ रितु ने गहरी सांस छोड़ी.‘‘क्यों?’’‘‘मैं अपनी सारी पगार समीर को दे देती हूं. मेरे अकाउंट में मुश्किल से क्व2 हजार होंगे. अपने मम्मीपापा से मैं ने आर्थिक सहायता न लेने का प्रण कर रखा है, क्योंकि वे रुपए देते हुए मुझे बहुत शर्मिंदा करते हैं.’’‘‘तब सारा खर्चा कैसे करोगी?’’‘‘अगले महीने से अपनी पगार मैं अपने पास रखूंगी.’’‘‘पर तब तक तो समीर न जाने क्याकर बैठेगा.’’‘‘शायद कुछ न करे,’’ रितु ने उसे तसल्ली देने की कोशिश की, पर शिखा की चिंता कम नहीं हुई.

शिखा बहुत देर तक भुनभुनाते हुए कभी समीर को तो कभी रितु को भलाबुरा कहतीरही. उस की सारी बातें को रितु ने खामोश रह कर सुना.कुछ वक्त तो लगा, पर अपना बहुत सारा खून फूंकने के बाद आखिर में शिखा को यहबात समझ आ ही गई कि अगर फोटो लानेके लिए उसे रितु को फौरन लौटने के लिएराजी करना है, तो उसे अपनी ही जेब हलकी करनी पड़ेगी. अगले दिन शिखा ने क्व5 हजार दे कररितु की 3 महीने की जिम कीफीस भरी.

फिर बाजार से कपड़ों की खरीदारीमें क्व8 हजार खर्च किए. बाद में ब्यूटीपार्लर में क्व10 हजार ऐडवांस जमा कराते हुए शिखा रोंआसी हो उठी थी.‘‘धन्यवाद शिखा. मैं अभी यहीं से अपने घर लौट जाती हूं. कल तक वे फोटो तुम्हें कूरियर से मिल जाएंगे, यह मेरा वादा रहा,’’ कह रितु बहुत खुश नजर आ रही थी.‘‘मेरा काम जरूर कर देना, प्लीज,’’ परेशान नजर आ रही शिखा उसे मन ही मन खूब गालियां दे रही थी.‘‘चिंता न करो… मुझे भी तुम अपना शुभचिंतक समझे,’’ रितु ने उसे जबरदस्ती गले लगाया और फिर अपने घर चल दी.

रितु को पलपल दूर होता देख रही शिखा उस घड़ी को कोस रही थी जब उस ने समीर की विवाहित जिंदगी में अशांति पैदा करने के लिए रितु को रेस्तरां में बुलाया था. उसे क्व23 हजार की चपत तो लगी ही थी, पर जो बात उसे बहुत ज्यादा चुभ रही थी, वह यह एहसास था कि समीर और रितु ने मिल कर बड़ी चतुराई से उसे बुद्धू बनाया.

Short Story

Family Story: फायदे का नुकसान- घर में हुई चोरी

Family Story: रात के 2 बज रहे थे. शेखर के घर के आगे कुछ लोग इकट्ठा थे. पुलिस की 2 जीपें भी खड़ी थीं. 6-7 पुलिस वाले शेखर व उस की पत्नी स्मिता से घर के अंदर बातचीत कर रहे थे.

करीब 1 घंटा पहले उन की रसोई की दीवार तोड़ कर चोर घर में घुस आया था. स्टडीरूम से शेखर का मोबाइल, पर्स व घड़ी उठाने के बाद वह बैडरूम में आया जहां स्मिता अकेली सो रही थी. चोर ने जैसे ही उस के गले से सोने की चेन खींची वह जाग गई और जोरजोर से चिल्लाने लगी.

स्मिता का शोर सुन कर शेखर, जो उस रात मैच देखतेदेखते ड्राइंगरूम में ही सो गया था, बदहवास सा दौड़ादौड़ा आया और फिर तुरंत बैडरूम की लाइट जलाई. देखा, स्मिता डर के मारे कांप रही थी.

‘‘क्या हुआ?’’ शेखर ने पूछा तो उस के स्वर में घबराहट थी.

‘‘हम…हम… हमारे घर में कोई घुस आया है,’’ बड़ी मुश्किल से स्मिता के मुंह से निकला.

‘‘मतलब चोर?’’ शेखर घबराते हुए बोला.

‘‘हां शायद,’’ कह स्मिता ने अपने गले पर हाथ फेरा.

‘‘हाय, मेरी चेन ले गया चोर,’’ कह कर स्मिता रोने लगी.

‘‘बिस्तर झड़ कर देखो,’’ शेखर बोला.

‘‘यहां कहीं नहीं है,’’ स्मिता ने बिस्तर झड़ते हुए कहा.

‘‘मैं जा कर अशोकजी को जगाऊं क्या?’’ शेखर ने सकुचाते हुए पूछा.

‘‘हांहां, जल्दी जाओ,’’ कह कर स्मिता भी बाहर आ गई.

शेखर सामने अशोकजी को जगाने गया तो स्मिता भी बराबर वाले राजेंद्र अंकल को बुलाने दौड़ी.

दोनों घरों की लाइटें जलीं और सारे सदस्य बाहर आ गए. फिर सब

लोग स्मिता के घर पहुंचे व सारी घटना को सुना.

‘‘चलो, किचन की तरफ चलते हैं, वहीं से तो आया था चोर,’’ राजेंद्र अंकल बोले तो सभी उन के पीछे हो लिए

संयोग से स्मिता की चेन रसोई में ही पड़ी मिल गई. शायद जल्दबाजी में चोर के हाथ से छूट गई होगी.

‘‘अरे भाभीजी, शायद चोर को आप की चेन पसंद नहीं आई,’’ अशोकजी के बेटे निखिल ने चेन उठाते हुए कहा.

चेन पा कर स्मिता की जान में जान आई

‘‘कमबख्त ने कितना बड़ा छेद कर डाला है. दीवार में,’’ राजेंद्र अंकल की पत्नी ने चोर

को कोसा.

‘‘अरे, यह क्या है?’’ कह कर राजेंद्र

अंकल ने पौकेट से चश्मा निकाल कर पहना. चश्मा पहनते ही वे चौंक कर बोले, ‘‘अरे, यह

तो चाकू है?’’

‘‘स्मिता, तुम्हारे पास चोर चाकू ले कर आया था. गनीमत सम?ो जो बच गईं,’’ कह कर राजेंद्र अंकल की पत्नी ने और डरा दिया.

‘‘निखिल, पुलिस को फोन करो,’’ अशोकजी परेशान से बोले.

आधे घंटे में पुलिस भी वहां पहुंच गई.

इसी बीच राजेंद्र अंकल ने शेखर के दोनों बड़े भाइयों के टैलीफोन नंबर पूछ कर उन्हें भी

सूचित कर दिया. वे भी आधी रात को वहां

आ पहुंचे.

मझले भैया के साथ उन का 5 वर्षीय बेटा मोंटू भी आया था.

‘‘चाची, मुझे वह वाला बिस्कुट दोगी?’’ उस ने अलमारी में रखे डब्बे की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘हां, जितने चाहे ले लो,’’ स्मिता ने डब्बा ही मोंटू के हाथ में थमा दिया.

अब तक बड़े भैया भी अपने बेटे मनीष के साथ आ पहुंचे थे. सभी एक ही शहर में थोड़ीथोड़ी दूरी पर रहते थे. शेखर से लड़ाई कर के घर से अलग हो जाने के कारण सभी ने उस से रिश्ता तोड़ लिया था. रिश्ता निभाने की जहमत कभी शेखर ने नहीं उठाई थी. इसलिए तो पहले वाला किराए का मकान छोड़ कर जब वे लोग इस नई कालोनी में आए तो यहां भी शेखर ने किसी से ज्यादा जानपहचान नहीं बढ़ाई.

स्मिता के मिलनसार स्वभाव के कारण राजेंद्रजी व अशोकजी दोनों के परिवार उस से हिलमिल गए थे.

राजेंद्रजी बड़ी बहू वसंती भाभी, जो स्मिता के ठीक पीछे वाले मकान में अलग रह रही थीं को पुलिस के जाने के बाद करीब 3 बजे चोरी का पता चला.

‘‘यह कैसे हो गया स्मिता?’’ पहली बार उन के घर आई वसंती भाभी ने दुख प्रकट किया.

‘‘क्या कहूं भाभी, जब समय खराब होता है तो ऐसी घटनाएं होती रहती हैं,’’ और फिर स्मिता ने उन्हें पूरी घटना से अवगत कराया.

सभी ने रात 3 बजे चाय पीते हुए एकसाथ सहानुभूति जताई. मोंटू अब तक बिस्कुट के

2 पैकेट खाली कर चुका था.

रोशनी और नेहा कहां हैं?’’ बड़े भैया ने स्मिता से पूछा.

‘‘3 दिनों से नानी के पास हैं. छुट्टियां चल रही हैं न,’’ स्मिता ने कहा.

‘‘पर तुम दोनों अलगअलग कमरे में सोए ही क्यों? एकसाथ सोते तो शायद चोर स्मिता के पास आने की हिम्मत नहीं करता,’’ काफी देर से उधेड़बुन में लगीं वसंती भाभी ने आखिर पूछ ही लिया.

‘‘चुप रहो,’’ पास बैठे उन के पति ने गुस्से में उन का हाथ दबाया.

बाकी लोगों के चेहरों पर उस तनाव के माहौल में भी मुसकान देख वसंती भाभी ने अपने शब्दों पर गौर किया तो वे भी झोप गईं और स्मिता भी.

‘‘चाची टौयलेट जाना है,’’ मोंटू दोनों पैरों को आपस में जोड़े हुए बोला तो स्मिता उसे ले कर कमरे से बाहर आ गई.

अब तक 4 बज चुके थे. अशोक अंकल का परिवार

विदा ले चुका था. थोड़ी देर बाद

राजेंद्रजी का परिवार भी सुबह मिलते हैं कह कर चला गया.

‘‘पुलिस वालों को कुछ खिलानापिलाना पड़ेगा तभी वे कोशिश करेंगे,’’ सब के जाने के बाद बड़े भैया स्मिता से बोले.

म?ाले भैया ने भी इस में अपनी सहमति जताई. शेखर वहीं बैठा सब कुछ चुपचाप सुन रहा था. उसे बातचीत शुरू करने में थोड़ी ?ोंप महसूस हो रही थी. आखिर 2 साल बाद पहली बार दोनों बड़े भाई उन के घर आए थे. और वे भी इस तरह आधी रात को.

मुझे भैया भी अपने नए मकान में कुछ समय पहले ही मां की अनुमति से अलग रहने गए थे. मां बड़े भैया के साथ थीं.

लगभग 4.30 बजे तक वे भी चले गए.

शेखर को रसोई में ही चटाई बिछा कर सोना पड़ा, क्योंकि दीवार में बना छेद उन के अंदर डर पैदा कर गया था.

स्मिता कमरे में सोने चली गई. सुबह करीब 7 बजे कालबैल की आवाज से दोनों चौंक कर उठे. शेखर ने देखा कि दीवार के छेद से वसंती भाभी का 4 साल का बेटा दीपू अंदर आने की कोशिश कर रहा था.

‘‘कौन है वहां?’’ आंखें मलते हुए रसोई के दूसरे कोने में लेटे शेखर ने पूछा.

‘‘अंकल मैं हूं. मम्मी काफी देर से चाय लिए आप के दरवाजे की घंटी बजा रही हैं. उन्होंने ही मु?ो इस चोर वाले छेद से अंदर आ कर आप लोगों को जगाने को कहा,’’ दीपू मासूमियत से बोला.

यह सब सुन कर शेखर मुसकरा दिया. तब तक वसंती भाभी भी चाय की केतली ले कर स्मिता के संग रसोई में आ गईं.

‘‘लो भाई साहब चाय पी

लो. मैं ने सोचा आप दोनों काफी थके हुए होंगे, इसलिए मैं ही चाय बना लाई.’’

मौर्निंग वाक पर आ जा रहे कालोनी के दूसरे लोगों को चोरी की जानकारी देने का जिम्मा दीपू को सौंप कर वसंती भाभी फिर से उन के दुख में शामिल हो गई.

थोड़ी ही देर में बहुत से अनजान चेहरे उन के ड्राइंगरूम में मेहमान बने बैठे थे. सभी पहले उस दीवार में बने छेद को देखते, फिर ड्राइंगरूम में आ कर अपने दुख और विचारों का आदानप्रदान करते.

‘‘बताओ चोर काफी देर से दीवार तोड़ता रहा और आप लोगों को पता भी न चला,’’ कालोनी के सैके्रटरी नीरज ने आश्चर्यचकित हो कर कहा.

‘‘पुलिस वाले क्या कर लेंगे. सब उन की सहमति से ही तो होता है,’’ प्रोफैसर जानकीदास ने अपना गुस्सा पुलिस पर निकाला.

इसी बीच वसंती भाभी,

जो अकेले ही स्मिता की रसोई संभाल रही थीं सभी के लिए चाय बना लाईं.

सुबह की चाय थी अत:

सभी ने चाय का आनंद उठाते हुए चोर को और कोसा व शेखर को धीरज बंधाया.

शेखर व स्मिता इन 6-7 महीनों में इनलोगों से पहली बार मिल रहे थे. शेखर के एकांतप्रिय स्वभाव ने स्मिता की मिलनसारिता पर भी बंदिशें लगा दी थीं.चाय की चुसकियों के बीच ही सभी का परिचय हुआ. ‘‘मुझे चिंता इस बात की है कि पर्स में मेरा एटीएम कार्ड व ड्राइविंग लाइसैंस भी था,’’

थोड़ी देर बाद शेखर ने चिंतित स्वर में कहा.

‘‘कोई बात नहीं, दोबारा लाइसैंस तो मैं तुम्हारा बनवा दूंगा,’’ राजेशजी मेज पर चाय का कप रखते हुए बोले.

यह सुन नीता भला कैसे चुप रहतीं. वे तुरंत बोलीं, ‘‘शेखर, मैं

9 बजे तक बैंक के लिए निकलूंगी. तुम चाहो तो मेरे साथ बैंक चल पड़ना. मैं तुम्हारा पुराना एटीएम कार्ड कैंसिल करवा कर नया बनाने का इंतजाम कर दूंगी.’’

‘‘जी शुक्रिया, मैं सोमवार को ही बैंक जाऊंगा,’’ शेखर बोला.

भीड़ छंटने का नाम ही नहीं ले रही थी. औफिस जाने वाले सज्जन जल्दी अपनी हाजिरी लगा रहे थे इस वादे के साथ कि शाम को मिलेंगे.

स्कूलों की छुट्टी थी, इसलिए दीपू भी एक अच्छे पड़ोसी का फर्ज निभाते हुए सभी को चोरी की खबर सुना रहा था.

इसी बीच वसंती भाभी की नेक सलाह पर शेखर और स्मिता मौका मिलने पर नहाधो लिए.

करीब 9 बजे उस लाइन के आखिरी मकान में रहने वाली सुधा टीचर दोनों के लिए नाश्ता ले आईं.

‘‘सुबह से लोगों का आनाजाना लगा है. ऐसे में कहां समय है नाश्ता बनाने का. इसलिए मैं ही कचौरियां ले आई. सोचा तुम लोगों से परिचय भी हो जाएगा,’’ प्लेट में कचौरियां व चटनी सजाते हुए सुधा बोले जा रही थीं. उन्होंने सारांश में अपने जीवन के एकाकीपन का वर्णन करते हुए स्मिता को 2-3 व्यंजन बनाने की विधियां भी बता डालीं.

बहती गंगा में हाथ धोने में निपुण वसंती भाभी ने न जाने कब 4 कचौरियां पीछे की दीवार से पति को पार्सल कर दीं व दीपू को भी वहीं नाश्ता करा दिया. बेचारा आखिर सुबह से गेट पर खड़ा अपना फर्ज जो निभा रहा था.

‘‘अरे निखिल बुरा न मानो तो 6 पैकेट दूध ले आओ? शायद और चाय बनानी पड़ जाए,’’ सकुचाते हुए शेखर ने निखिल से कहा तो निखिल ने मुसकरा कर सिर हां में हिला दिया.

10.30 बजे तक 2 कारों में शेखर की रूठी मां, दोनों भाई, भाभियां व उन के बच्चे पहुंच गए. शेखर उस समय बाहर ही खड़ा था.

अब गेट पर ही खड़ा रखेगा या अंदर भी बुलाएगा?’’ मां ने जोर से कहा तो शेखर जैसे नींद से जागा. सभी को एकसाथ देख कर वह हक्काबक्का रह गया था.

‘‘अरे मां, शीतल भाभी, उमा भाभी अंदर आइए न,’’ आवाज सुन स्मिता अंदर से निकल कर गेट की ओर भागी.

ड्राइंगरूम में जगह नहीं थी, इसलिए

स्मिता ने पड़ोसियों से परिचय कराने के बाद उन सभी को बैडरूम में ले आई.

शेखर मां के पास ही बैठा था. आखिर 2 साल बाद मांबेटे का मिलन हो रहा था. मां से रहा न गया, तो वे बेटे से लिपट कर रो पड़ीं. भाभियों की आंखें भी नम हो गई थीं.

अब दीपू का साथ देने मोंटू भी पहुंच गया. एक से भले दो. दोनों नमकमिर्च लगा कर खबर फैला रहे थे.

थोड़ी देर में वसंती भाभी सब के लिए चाय ले आईं.

‘‘मम्मीजी, आप लोगों ने नाश्ता किया?’’ स्मिता ने उन के पास बैठते हुए पूछा.

‘‘हम सब ने कर लिया, तुम दोनों के लिए भी लाए हैं. शेखर की पसंद के आलू के परांठे व

नीबू का अचार,’’ शीतल भाभी ने डब्बा खोल कर शेखर को पकड़ाते हुए कहा.

शेखर ने भी फटाफट 2 परांठे खा लिए. गेट तक पहुंची अचार की महक ने दीपू व मोंटू को थोड़ी देर के लिए अपने फर्ज से मुंह मोड़ने पर मजबूर कर दिया.

करीब 11 बजे तक उस कालोनी की वाचाल महिला मंडली भी अपने सारे काम निबटा कर वहां शोक व्यक्त करने पहुंच गई.

फिर से चायनाश्ते का दौर शुरू हुआ. इस बार वसंती भाभी का साथ देने उमा भाभी भी पहुंच गईं.

महिलाएं कुछ ज्यादा ही उत्साह में थीं. राखी ने तो मौका देख कर रीना की बेटी के लिए 2-3 रिश्ते भी बता डाले. सुधा टीचर का विमला के साथ 4 दिन बाद दांतों के डाक्टर के पास जाना फिक्स हो गया. कई व्यंजनों की रैसिपीज का आदानप्रदान हुआ. कई सीरियलों की नायिकाएं दया की पात्र बनीं.

दरअसल, काफी समय बाद सभी इतनी फुरसत से एक जगह मिले थे, इसलिए सभी समय का पूरापूरा लाभ उठाना चाह रहे थे.

बीचबीच में शेखर व स्मिता उन के बीच बैठ कर उन्हें यह याद दिलाते कि वे सभी यहां चोरी का दुख प्रकट करने आए हैं. पर सब व्यर्थ था.

करीब 1 बजे तक दोनों भाई भी सब कुछ भूल कर शेखर से पहले की तरह

घुलमिल गए. यह नजारा स्मिता को अंदर तक खुशी दे गया. उस ने तो हमेशा से सभी का साथ चाहा था, परंतु पति के अक्खड़ स्वभाव के आगे उस की एक न चलती.

महिला मंडली को विदा कर सभी ने खाना खाया. राजेंद्रजी की पत्नी लौकी के कोफ्ते दे गईं तो अशोकजी की पत्नी भरवां भिंडी बना लाईं. सभी ने एकसाथ खाना खाया. पूरा घर किसी शादी के माहौल से कम नहीं लग रहा था.

हां, इस में वसंती भाभी व दीपू का पूरापूरा योगदान रहा. दोपहर को औफिस से लंच करने आए अपने पति को भी वसंती भाभी ने वहीं बुला लिया.

शाम 4 बजे तक दूसरे शहर से स्मिता के मम्मीपापा भी आ पहुंचे. रोशनी व नेहा दादी, ताऊजी, ताईजी व बच्चों को देख कर बहुत खुश हुईं.

बड़ेबुजुर्ग जहां एक ओर राजनीति व खेल पर चर्चा कर रहे थे वहीं बच्चे चोर द्वारा किए छेद के आरपार खेल कर मजा ले रहे थे.

औफिस से लौटने के बाद फिर से लोगों का आनाजाना शुरू हो गया. अब तक शेखर व स्मिता भी ये भूल गए थे कि कल रात उन के घर चोरी हुई थी. दोनों लोगों की आवभगत में बिजी हो गए थे.

शाम को फोन की घंटी की आवाज सुन

बड़े भैया ने रिसीवर उठाया. थाने से इंस्पैक्टर का फोन था थोड़ी देर बातचीत हुई. फिर भैया बैडरूम में आए. जहां वसंती भाभी व घर के सारे सदस्य बैठे थे.

शेखर से बोले, ‘‘थाने से इंस्पैक्टर साहब कह रहे हैं कि तुम व स्मिता थाने जा कर एफआईआर दर्ज कराओ. तभी वे आगे कुछ

कर पाएंगे.’’

‘‘हमें कोई एफआईआर दर्ज नहीं करानी है, भैया. आप ही उन से फोन पर कह दीजिए,’’ स्मिता के चेहरे पर मुसकान थी.

सभी उसे आश्चर्यचकित नजरों से घूरने लगे.

‘‘आप सभी मुझे यों न देखें. वह चोर यहां से 2-3 चीजें ही तो चुरा कर भागा है न… किसी को शारीरिक रूप से कोई नुकसान भी नहीं पहुंचाया. परंतु उस महान व्यक्ति के कारण

2 सालों से बिछड़ी मेरी ससुराल मुझे वापस मिल गई. यहां 6-7 महीनों से अजनबियों की तरह रह रहे कालोनी वालों का स्नेह और अपनापन मिल गया. मेरे खयाल से चोरी एक फायदे का सौदा रहा. वह चोर जहां भी रहे सलामत रहे,’’ स्मिता ने कहा तो सभी को मिलीजुली मुसकान ने वातावरण को हलका कर दिया.

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