Romantic Story: मन बहुत प्यासा है:- क्या थी शेखर की गलती

Romantic Story: शाम बहुत उदास थी. सूरज पहाडि़यों के पीछे छिप गया था और सुरमई अंधेरा अपनी चादर फैला रहा था. घर में सभी लोग टीवी के सामने बैठे समाचार सुन रहे थे. तभी न्यूज ऐंकर ने बताया कि सुबह दिल्ली से चली एक डीलक्स बस अलकनंदा में जा गिरी है. यह खबर सुनते ही सब के चेहरे का रंग उड़ गया और टीवी का स्विच औफ कर दिया गया. मैं नवीन की कमीज थामे सन्न सी खड़ी रह गई. ढेर सारे खयाल दिलोदिमाग में हलचल मचाते रहे. क्या सचमुच नवीन इज नो मोर?

मां का विलाप सुन कर आंगन में आसपास की औरतें जुड़ने लगीं. उन में से कुछ रो रही थीं तो कुछ उन्हें सही सूचना आने तक तसल्ली रखने की सलाह दे रही थीं. बाबूजी ने मेरे डैडी को फोन किया और तुरंत घटनास्थल पर चलने को कहा. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? क्या मैं सचमुच… इस के आगे सोचने से दिल घबराने लगा. 3 दिन तक जीनेमरने जैसी स्थिति रही. चौथे दिन हारे हुए जुआरी की तरह बाबूजी और डैडी वापस लौट आए. अलकनंदा में उफान के कारण लाशें तक निकाली नहीं जा सकी थीं. पता कर के आए मर्दों के चेहरों पर हताशा को पढ़ कर औरतें चीखचीख कर रोने लगीं. कुछ उस घड़ी को कोस रही थीं, जिस घड़ी नवीन ने घर से बाहर कदम निकाला था.

एक बूढ़ी औरत मेरे कमरे में आई और मुझे घसीटती हुई बाहर ले आई. कुछ औरतों ने आंखों ही आंखों में सरगोशियां कीं और मेरा चूडि़यों से भरा हाथ फर्श पर दे मारा. चूडि़यां टूटने के साथ खून की कुछ बूंदें मेरी कलाई पर छलक आईं पर इस की परवाह किस को थी. भरी जवानी में मेरे विधवा हो जाने से जैसे सब दुखी थीं और मुझे गले लगा कर रोना चाहती थीं. मैं पत्थर की शिला सी हो गई थी. मेरी आंखों में बूंद भर पानी भी नहीं था.

अपने विफल हो रहे प्रयासों से औरतों में खीज सी पैदा हो गई. कुछ मुझे घूरते हुए एकदूसरे से कुछ कह रही थीं, तो महल्ले की थुलथुली बहुएं, जो मेरी स्मार्टनैस से कुंठित थीं अपनी भड़ास निकालने की कोशिश कर रही थीं. मेरा लंबा कद, स्याह घने बाल, हिरनी जैसी आंखें और शादी में लाया गया ढेर सारा दहेज, जिस के कारण महल्ले की सासें अपनी बहुओं को ताने दिया करती थीं, आज बेमानी बन कर रह गया, तो मेरी सुंदर काया का मूल्य पल भर में कौडि़यों का हो गया.

मेरी उड़ती नजर आंगन के कोने में खड़ी मोटरसाइकिल पर गई. इसी मोटरसाइकिल के लिए मझे 4 दिन तक भूखा रखा गया था और 6 महीने तक मैं मायके में पड़ी रही थी. आखिर पापा ने अपने फंड में से पैसा निकाल कर नवीन को मोटरसाइकिल ले दी थी. अब कौन चलाएगा इसे? नवीन की मौत से हट कर मेरा

मन हर राउंड में लाई गई चीजों की फेहरिस्त बना रहा था.

कुल 2 साल ही तो हुए थे हमारी शादी को और हमारी बेट मिनी साल भर की है. खुद को कर्ज में डुबो कर बेटी का घर भर दिया था पापा ने. क्या मैं उस आदमी के लिए रोऊं जो हर वक्त कुछ न कुछ मांगता ही रहता था और हर चौथे दिन रुई की तरह धुन देता था. तभी औरतों की खींचातानी से मिनी रोई तो मेरी तंद्रा टूटी. मैं उसे औरतों की भीड़ से निकाल कर कमरे में ले आई.

औरतों का आनाजाना कई दिनों तक लगा रहा. कुछ मुझ कुलच्छनी बहू को घूरघूर कर एकदूसरे से बतियाती हुई आंसू बहातीं तो कुछ मेरे न रोनेधोने के कारण किसी रहस्य को सूंघने की कोशिश करतीं. पर मुझे उन की परवाह नहीं थी.

मां जो शेरनी की तरह दहाड़ती रहती थीं अब भीगी बिल्ली सी आंसू बहाती रहतीं. मेरी ननद गीता और उस के पति रजनीश भी आ गए थे. गीता मेरे कमरे के फेरे मारती रहती और एकएक कीमती चीज के दाम पूछती रहती. रजनीश की नजरमोटरसाइकिल पर थी.

गीता को वापस जाना था. रजनीश ने खिसियानी सी हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘भाभी, अब इस मोटरसाइकिल का यहां क्या होगा? कहो तो मैं ले जाऊं. डीटीसी बसों में आतेजाते मैं तो तंग आ गया हूं. रोज देर हो जाती है तो बौस की डांट खानी पड़ती है.’’ फिर मोटरसाइकिल पर बैठ कर ट्रायल लेने लगा.

गीता भी पीछे नहीं रही, ‘‘भाभी, इस कौस्मैटिक बौक्स का अब आप क्या करेंगी? आप के लिए तो बेकार है. मैं ले जाती हूं इसे. कितने सारे तो परफ्यूम्स हैं. इतनी अच्छी चीजें इंडिया में कहां बनती हैं. आप के पापा का भी जवाब नहीं. हर चीज कीमती दी है आप को.’’

क्या संबंध स्वार्थ की कागजी नींव पर टिके होते हैं? यह सोचते हुए संबंधों पर से मेरी आस्था हटने लगी. यह वही गीता है, जो बारबार गश खा कर गिर रही थी और भाई की मौत को अभी 4 दिन भी नहीं गुजरे इस ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया.

गीता और रजनीश की नजर तो मेरे लैपटौप और महंगे मोबाइलों पर भी थी, क्योंकि बाबूजी ने कह दिया था कि मोटरसाइकिल वगैरह अभी यहीं रहने दो. बाद में देखेंगे. गीता ने एक बार झिझकते हुए कहा, ‘‘भाभी, आप के पास तो 2 मोबाइल हैं. वाऊ, कितने खूबसूरत हैं.’’

मैं ने जब कोई जवाब नहीं दिया तो वह बोली, ‘‘मैं तो ऐसे ही कह रही थी.’’

गीता और रजनीश के जाने के बाद घर में गहरा सन्नाटा छा गया. मां और बाबूजी दोनों ही शंकित थे कि कहीं मैं भी उन्हें छोड़ कर न चली जाऊं. पर अब कहां जाना था मुझे. हालांकि पापा ने मुझे साथ चलने को कहा था पर मैं ने मना कर दिया. बाबूजी का दुलार तो मुझे हमेशा ही मिलता रहा था पर मां और नवीन के सामने उन की चलती ही नहीं थी. पर अब कितना कुछ बदल गया था.

थोड़ी भागदौड़ के बाद मुझे नवीन की जगह नौकरी भी मिल गई. रसोईघर जहां मैं दिन भर खटती रहती थी, को मां ने संभाल लिया था. नौकरी पर आतेजाते मुझे लगता था कि कई आंखें मुझे घूर रही हैं. दरअसल, वे औरतें, जिन्हें मुझे ले कर निंदासुख मिलता था अब अजीब नजरों से मुझे देखती थीं.

एक अभी हुई विधवा रोज नईनई पोशाकें पहन कर दफ्तर जाए यह बात उन के गले से नहीं उतरती थी. मां का भी अब महल्ले की चौपाल पर बैठना लगभग बंद हो गया था, तो पड़ोसिनों का आनाजाना भी कम हो गया था.

मेरी नौकरी ने जैसे मुझे नया जीवन दे दिया था. ऐसा लगता था जैसे मरुस्थल में बरसाती बादल उमड़नेघुमड़ने लगे हों. इस से बेचैनी और भी बढ़ जाती, तो मैं सोचती कि मैं विधवा हो गई तो इस में मेरा क्या कुसूर? दहेज में मिली कई कीमती साडि़यों की तह अभी तक नहीं खुली थीं. मैं जब उन में से कोई साड़ी निकाल कर पहनती तो मां प्रश्नवाचक नजरों से चुपचाप देखती रहतीं और मैं जानबूझ कर अनजान बनी रहती. कालोनी की जवान लड़कियों को मेरा कलर कौंबिनेशन बहुत पसंद आता. वे प्रशंसनीय नजरों से मुझे देखतीं पर मैं इस सब से तटस्थ रहती. दफ्तर में मुझे सब से ज्यादा आकर्षित करता था शेखर. वह मेरे काम में मेरी मदद करता. फिर कभीकभी बाहर किसी रेस्तरां में कौफी पीने भी हम चले जाते. गपशप के दौरान कब वह मेरे करीब आता चला गया मुझे पता ही नहीं चला. धीरेधीरे हम दोनों एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे.

एक दिन इतवार को दोपहर के समय जब मैं मिनी को गोद में लिए बाहर निकली तो मां ने प्रश्नवाचक नजरों से मुझे देखा. मुझे लगा जैसे मैं कोई अपराध करने जा रही हूं. पर अब मैं ने नजरों की भाषा को पढ़ना छोड़ दिया था. मन में एक अजीब सी प्यास थी और मैं मृगतृष्णा के पीछे दौड़ रही थी. देर शाम को जब घर लौटी तो मां की नजर में कई सवाल थे. वे मिनी को उठा कर बाहर ले गईं और लौटीं तो पूछा, ‘‘यह शेखर अंकल कौन है?’’ मैं सन्न रह गई. मां मुझ से ऐसा सीधा सवाल करेंगी यह तो मैं ने सोचा ही नहीं था. मगर जल्दी ही मैं ने खुद को संभाला ओर बोली, ‘‘शेखर मेरे दफ्तर में काम करता है. मौल में मिल गया था.’’ मां ने हुंकार भरा और अपने कमरे में चली गईं. देर रात तक मां और बाबूजी की आवाजें कटकट कर मेरे कानों में आती रहीं और मैं दमसाधे सुनती रही. साथ में यह भी सोचती रही कि आखिर क्या चाहते हैं ये लोग? क्या मैं सारी उम्र यों ही गुजार दूं? मुझे अकसर औफिस से आतेआते देर हो जाती. तब बाबूजी मुझे बस स्टौप पर खड़े मिलते. मुझे देखते ही कहते, ‘‘मैं यों ही टहलता हुआ इधर निकल आया था. सोचा, तुम आ रही होगी.’’ फिर सिर झुकाए साथसाथ चलने लगते. मुझे ऐसा लगता जैसे मैं कांच के मकान में रह रही हूं, जरा सी ठोकर लगते ही टूट जाएगा.

मैं अपनी जिंदगी में आगे बढ़ना चाहती थी पर बाबूजी और मां का बुढ़ापा कैसे कटेगा यह सवाल मुझे सालता था. मैं शेयर के साथ अपनी तनहाई शेखर करना चाहती पर मां और बाबूजी का बुढ़ापा बीच में आ जाता था उन की आंखों का डर मुझे खुल कर जीने नहीं दे रहा था. शेखर कुछ दिनों की छुट्टी ले कर घर गया था. मैं सोच रही थी कि जब वह वापस आएगा तो उस से खुल कर बात करूंगी. उस ने वादा किया था कि वह अपने मांबाप को मना लेगा इसलिए मैं आश्वस्त थी. लेकिन एक दिन औफिस में मैं ने अपनी मेज पर एक लंबा लिफाफा रखा देखा. लिफाफा खुला ही था. अंदर से कागज निकाला तो देखा तो लगा छनाक से कुछ टूट गया हो. एक वैडिंग कार्ड था- शेखर विद सरोज. साथ में एक चिट्ठी भी थी जिस में लिखा था- मीरा, एक विधवा के साथ विवाह करने की बात मेरे मम्मीडैडी के गले नहीं उतरी. विधवा, उस पर एक बच्ची की मां. सच मानो मीरा मैं ने मम्मीडैडी को समझाने की बहुत कोशिश की पर अपने अविवाहित बेटे के लिए उन के दिल में बड़ेबड़े अरमान हैं. कैसे तोड़ दूं उन्हें… मुझे क्षमा कर देना, मीरा.

अगले दिन मैं ने निगाह घुमा कर देखा, शेखर मोटीमोटी फाइलों में गुम होने का असफल प्रयास कर रहा था. मैं ने खत सहित वैडिंग कार्ड को टुकड़ेटुकड़े कर डस्टबिन में डाला तो उस ने घूर कर मुझे देखा.मैं रोई नहीं. रोना मेरी आदत नहीं है. मैं तेजी से टाइप करती रही और मैं ने चपरासी को पंखा तेज करने को कहा, क्योंकि मन की तपिश और बढ़ गई थी.  शाम को जब औफिस से निकली तो खुली हवा के झोंके मन को सहलाने लगे मेरे कदम अपनेआप ही न्यू औप्टिकल स्टोर की ओर बढ़ गए. बाबूजी केलिए नया चश्मा बनवा कर जब निकली तो याद आया कि मां कई दिन से एक साड़ी लाने को कह रही थीं. एक ही क्षण में दुनिया कितनी बदल गई थी. बाबूजी डेढ़ महीने से नया चश्मा बनवाने को कह रहे थे पर उस ओर मेरा ध्यान ही नहीं जा रहा था. उन्हें पढ़नेलिखने में कितनी परेशानी हो रही थी, आज याद आया तो मन में अपराधबोध सा जागने लगा था. लगता है बाबूजी को शेखर के विवाह की बात पता चल गई थी. वे बस स्टौप पर भी नहीं आए. अगली सुबह देखा तो वे मोटरसाइकिल साफ कर रहे थे. मुझे लगा इसे बेचने की तैयारी है. मन में कसैलापन भर गया. पर तभी बोले, ‘‘बेटा, तुम्हें तो मोटरसाइकिल चलानी आती है न. चलो जरा डाक्टर की दुकान तक ले चलो. बसों में जाने में दिक्कत होती है.’’ मैं मुंह खोले उन्हें देखती रह गई और फिर उन के सीने से जा लगी, ‘‘बाबूजी…’’ मुझ से बोला नहीं जा रहा था. तभी मां की आवाज आई, ‘‘और हां, लौटते हुए बेकरी से एक केक लेती आना. आज तेरा जन्मदिन है न…’’

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Samajik Kahani: मेरे घर के सामने- कम्युनिटी हाल से क्यों परेशान थी वह

Samajik Kahani: मेरे घर के सामने एक कम्युनिटी हाल है, या अगर यों कहें कि कम्युनिटी हाल के सामने मेरा घर है तो भी घर की भौगोलिक स्थिति में कोई अंतर नहीं आएगा. कम्युनिटी हाल के सामने मेरा घर होना ही मेरी सब से बड़ी मुसीबत है. इस कम्युनिटी हाल में आएदिन ब्याहशादी, अन्य समारोह और पार्टियां आयोजित होती रहती हैं.

पर एक मुसीबत और भी है, वह यह कि मेरे घर के आंगन में एक आम का पेड़ भी है. बस, यों ही समझिए कि करेला और नीम चढ़ा जैसी स्थिति है. शुभकार्य हो और उस में आम के पत्तों का तोरण न बांधा जाए ऐसा हो ही नहीं सकता. कम्युनिटी हाल के सामने घर के आंगन में प्रवेशद्वार पर ही आम का पेड़ हो, इस का दर्द सिर्फ वही भुक्तभोगी जान सकता है जिस का घर कम्युनिटी हाल के सामने हो.

जैसे ही मेजबान कम्युनिटी हाल किराए पर ले कर अपना मंगलकार्य शुरू करता है, उस के कुछ देर बाद ही प्रभात वेला में मेरे दरवाजे की घंटी बजती है. संपन्न घर के कोई सज्जन या सजनी विनम्रता से पूछते हैं, ‘‘आप को कष्ट दिया. कुछ आम के पत्ते मिल सकेंगे क्या? बेटी की शादी है, मंडप में तोरण बांधना है. और सब सामान तो ले आए, पर देखिए, कैसे भुलक्कड़ हैं हम कि आम के पत्ते तो मंगाना ही भूल गए.’’

शायद उन्हें आम का पेड़ देख कर ही आम के पत्तों का तोरण बांधने की सूझती है. इनकार कैसे करना चाहिए, यह कला मुझे आज तक नहीं आई. हर बार यही होता है कि जरूरत से ज्यादा पत्ते तोड़ लिए जाते हैं. इन में से कुछ पत्ते मेरे साफसुथरे आंगन में इधरउधर बिखर कर बेमौसमी पतझड़ का आनंद देते हैं और कुछ पत्ते मेरे घर से कम्युनिटी हाल तक ले जाने में सड़क पर लावारिस से गिरते जाते हैं. जिन के घर विवाह हो रहा है, उन को इस की कोई चिंता नहीं होती. पर मुझे तो ऐसा महसूस होता है जैसे कोई मेरा रोमरोम मुझ से खींच कर ले जा रहा है. पर अपना यह दर्द मैं किस से कहूं? कैसे कहूं?

और यह तो इस दर्द की शुरुआत है. उस के बाद बड़ी देर तक ‘‘हैलो, माइक टेस्टिंग, हैलो’’ की मधुर ध्वनि के बाद फिल्मी गीतों के रिकार्ड पूरे जोर से बजने शुरू हो जाते हैं. उस पर तुर्रा यह कि माइक्रोफोन के भोंपू का मुंह हमेशा मेरे घर की ओर ही रहता है. ऐसा लगता है जैसे कि यह बहरों की बस्ती है. अगर धीमी आवाज में रिकार्ड बजता रहे तो हमें कैसे मालूम पड़ेगा कि सामने कम्युनिटी हाल में आज विवाह समारोह है? इस के बाद हमें दिन भर घर के अंदर भी एकदूसरे से चीख- चिल्ला कर बातचीत करनी पड़ती है, तभी एकदूसरे को सुनाई पड़ेगा.

इन रिकार्डों ने मेरे बच्चों की पढ़ाई का रिकार्ड बिगाड़ कर रख दिया है. धूमधाम और दिखावे के लिए ये लोग खूब खर्च करते हैं. पर एक बचत वे अवश्य करते हैं. पता चला कि इन सब के बिजली वाले इतने चतुर हैं कि इन की बचत के लिए बिजली का कनेक्शन गली के खंभे से ही लेते हैं ताकि कम्युनिटी हाल के मीटर के अनुसार बिजली का खर्च उन्हें नाममात्र ही अदा करना पड़े.

फिर आती है नगरनिगम की पानी की गाड़ी, जो ठीक मेरे घर के सामने आ कर खड़ी हो जाती है. इस गाड़ी से पानी अंदर पंडाल में पहुंचाने के प्रयत्न में जो पानी बहता है, वह ढलान के कारण मेरे आंगन में इकट्ठा हो जाता है. बस, सावनभादों सा सुहावना कीचड़भरा वातावरण बन जाता है. और फिर इस कीचड़ से सने पैरों के घर में आने के कारण घर का हर सदस्य मेरे कोप का भाजन बनता है. अकसर गृहयुद्ध छिड़ने की नौबत आ जाती है.

सामने शामियाने में जब भट्ठियां सुलगाई जाती हैं तब उन का धुआं हवा के बहाव के कारण बिन बुलाए मेहमान की तरह सीधा मेरे ही घर का रुख करता है. हवा भी मुझ से ऐसे समय न जाने किस जनम का बैर निकालती है. वनस्पति घी की मिठाई की खुशबू और तरहतरह के मसालों की महक से घर के सारे सदस्यों के नथने फड़क उठते हैं. परिणामस्वरूप सब की पाचन प्रणाली में खलबली मच जाती है.

आएदिन इस कम्युनिटी हाल में होने वाले ऐसे भव्य भोजों की खुशबू के कारण अब मेरे परिवार को मेरे हाथों की बनाई रूखीसूखी गले नहीं उतरती. रोज यही उलाहना सुनने को मिलता है, ‘‘क्या तुम ऐसा खाना नहीं बना सकतीं जैसा कम्युनिटी हाल में बनता है? कब तक ऐसा घासफूस जैसा खाना खिलाती रहोगी?’’ अब मुझे समझ नहीं आ रहा है कि सामने कम्युनिटी हाल में होने वाले समारोहों को बंद करा दूं या यह घर ही बदल लूं?

इस तरह सारा दिन तेज स्वर में बज रहे फूहड़ फिल्मी रिकार्डों से कान पकने लगते हैं और पकवानों की खुशबू से नाक फड़कती है. जैसेतैसे दिन गुजर जाता है. शाम को बरात आने का (यदि लड़की की शादी हो तो) या बरात विदा होने का (यदि लड़के की शादी हो तो) समय होता है, दिन भर में दिमाग की नसें तड़तड़ाने और कानों की फजीहत करने में जो कसर रह गई थी, उसे ये बैंडबाजे वाले पूरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. ऐन दरवाजे पर डटे हुए बैंडमास्टर अपनी सारी ताकत लगा कर बैंड बजा रहे हैं.

कुछ ही देर में कुछ नई उम्र की फसलें लहलहा कर डिस्को और भंगड़ा का मिलाजुला नृत्य करने लगती हैं. फिर तो ऐसा लगने लगता है जैसे बैंड वालों और नृत्य करने वालों के बीच कोई प्रतियोगिता चल रही है. नोट पर नोट न्योछावर होते हैं. यह क्रम बड़ी देर तक चलता है. मैं यही सोचती हूं कि कितना अच्छा होता अगर ये कान कहीं गिरवी रखे जा सकते. मैं अपने डाक्टर को कैसे बताऊं कि मेरे रक्तचाप बढ़ने का कारण मेरा मोटापा नहीं, बल्कि मेरे घर के सामने कम्युनिटी हाल का होना है. पर मैं जानती हूं कि इस तथ्य पर कोई विश्वास नहीं करेगा.

बड़ी मुश्किल से बरात आगे रेंगती है. गाढ़े मेकअप में सजीसंवरी कुंआरियों और सुहागनों की फैशन परेड और उन के चमकीले और भड़कीले गहनों व कपड़ों की नुमाइश देख कर मेरी पत्नी के हृदय पर सांप तो क्या अजगर लोटने लगता है. हाय, कित्ती सुंदरसुंदर साडि़यां हैं सब के पास, नए से नए फैशन की. अब की बार पति से ऐसी साड़ी की फरमाइश जरूर करूंगी, चाहे जो भी हो जाए. और देखो तो सही सब की सब गहनों से कैसी लदी हुई हैं.

मेरी दूरबीन जैसी आंखें एकएक के गहनों और कपड़ों की बारीकियां परखने लगती हैं. उस कांजीवरम साड़ी पर मोतियों का सेट कितना अच्छा लग रहा है. उस राजस्थानी घाघरा चोली पर यह सतलड़ी सोने का हार कितना फब रहा है. और झीनीझीनी शिफान की साड़ी पर हीरों का सेट पहने वह महिला तो बिलकुल रजवाड़ों के परिवार की सी लग रही है. पर कौन जाने ये हीरे असली हैं या नकली.

इन बरातनियों के गहनों और कपड़ों में उलझी हुई मैं बड़ी देर तक अपने होश खोए रहती हूं. मेरे घर के सामने कम्युनिटी हाल होने का यह सब से हृदयविदारक पहलू है. जैसेजैसे बरात आगे बढ़ती है, देसीविदेशी परफ्यूम की झीनीझीनी लपटें आआ कर मेरी खिड़की से टकराने लगती हैं और इस खुशबू में रचबस कर मैं एकदूसरे ही लोक में पहुंच जाती हूं.

बरात आ जाने के बाद तो कम्युनिटी हाल में चहलपहल, दौड़भाग तथा चीखपुकार और बढ़ जाती है. उपहारों के पैकेट थामे, सजेसंवरे दंपती एक के बाद एक चले आते हैं. उन के स्कूटर, मोटर आदि मेरे घर के सामने ही खड़े किए जाते हैं. घर में आनेजाने के लिए मार्ग बंद हो जाता है. और मेरा घर किसी टापू सा लगने लगता है.

कुछ जोड़े ऐसे भी हैं जिन्हें मैं ने इस कम्युनिटी हाल में होने वाले हर समारोह में शामिल होते देखा है. वे इन समारोहों में आमंत्रित रहते हैं या नहीं, पर उन के हाथों में एक लिफाफा अवश्य रहता है. वे इस लिफाफे को वरवधू को थमाते हैं या नहीं, यह तो वे ही जानें. मैं तो बस, इतना जानती हूं कि वे हमेशा तृप्त हो कर डकार लेते हुए रूमाल से मुंह पोंछते बाहर निकलते हैं.

लिफाफे में 11 रुपए रख कर, सूट पहन कर, सजसंवर कर किसी भी विवाह समारोह में जा कर छक कर भोजन कर के आना तो किसी होटल में जा कर भोजन करने से काफी सस्ता पड़ता है. कन्या पक्ष वाला यह समझता है कि बरातियों में से कोई है और वर पक्ष समझता है कि यह कन्या पक्ष का आमंत्रित है. ऐसे में उन्हें कोई यह पूछने नहीं आता कि ‘‘श्रीमान आप यहां कैसे पधारे?’’

मेरे घर की ऊपरी मंजिल से इस कम्युनिटी हाल का पिछला दरवाजा बहुत अच्छी तरह दिखाई देता है. वहां का आलम कुछ निराला ही रहता है. जैसे मिठाई देखते ही उस पर मक्खियां भिनभिनाने लगती हैं, वैसे ही कहीं शादीब्याह के समारोह होते देख मांगने वाले, परोसा लेने वाले पहले से ही इकट्ठे हो जाते हैं. इन के साथ ही गाय, सूअर, कुत्ते आदि भी अपनी क्षुधा शांति के लिए पिछले दरवाजे पर ऐसे इकट्ठे होते हैं मानो उन सब का सम्मेलन हो रहा हो.

हर पंगत के उठने के बाद जब पत्तलदोनों का ढेर पिछवाड़े फेंका जाता है, उस के बाद वहां इनसान और जानवर के बीच जूठी पत्तलों के लिए हाथापाई और छीनाझपटी का जो दृश्य सामने आता है उसे देख कर इनसानियत और न्याय पर से विश्वास उठ जाता है.

यह दृश्य देखे बगैर कोई विश्वास नहीं कर सकता कि लोग जूठन पर भी कितनी बुरी तरह टूट सकते हैं. उस के लिए मरने और मारने पर उतारू हो जाते हैं. गाय की पूंछ मरोड़ कर या उसे सींगों से धकिया कर और कुत्तों को लतिया कर उन के मुंहमारी हुई जूठी पत्तलों में से खाना बटोर कर अपनी टोकरी में रखने में इनसान को कोई हिचक नहीं, कोई शर्म नहीं. घर ले जा कर शायद वह इसी जूठन को अपने परिवारजनों के साथ बैठ कर चटखारे ले कर खाएगा.

गृहस्वामी या ब्याहघर का प्रमुख केवल 2 ही जगह मिल सकता है, या तो प्रमुख द्वार पर, जहां वह सजधज कर हर आमंत्रित का स्वागत करता है या पिछवाड़े के दरवाजे पर जहां वह हाथों में मोटा डंडा लिए जूठन पर मंडराते जानवरों और इनसानों को एकसाथ धकेलता है. साथ ही जूते, हलवाई व उस के साथ आए कारीगरों पर निगाह रखता है.

जैसेजैसे विवाह समारोह यौवन पर आता है कुछ बराती सुरा की बोतलें खोलने के लिए लालायित हो जाते हैं. बरातों में जाना और पीना तो आजकल एक तरह से विवाह का आवश्यक अंग माना जाने लगा है. कुछ ब्याहघरों में, जहां सुरापान की अनुमति नहीं मिलती है, उन के बराती अंदर कम्युनिटी हाल में बोतलें ले कर मेरे ही घर की ओट ले कर नीम अंधेरे में बैठ कर यह शुभकार्य संपन्न करते हैं.

मैं जानती हूं कि जैसेजैसे यह सुरा अपना रंग दिखाएगी, वैसेवैसे उन की वाणी मुखर होती जाएगी. उन की वाणी मुखर हो उस के पहले ही मुझे अपनी खिड़कियां और दरवाजे सब बंद कर के अंदर दुबक जाना पड़ता है.

वह जमाना गया, जब बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना हुआ करता था. परंतु मेरे घर की तरह ही जिस का घर कम्युनिटी हाल के सामने हो, वह बेगानी शादी में अब्दुल्ला कैसे बन सकता है? वैसे विवाह संपन्न होने के बाद जब घरबाहर के सब लोग विदा हो जाते हैं, तो वे कभी सफाई करवाने का कष्ट नहीं करते. उस से जो सड़ांध उठती है, उस से अब्दुल्ला तो क्या हर अड़ोसीपड़ोसी दीवाना हो जाता है.

दूसरे दिन ब्याह निबटा कर जब सारा कारवां गुजर जाता है, तब मैं भी ऐसी ही शांति की सांस लेती हूं जैसे कि मैं अपनी ही बेटी का ब्याह कर के निवृत्त हुई हूं.

Samajik Kahani

Best Hindi Story: दुनिया नई पुरानी

Best Hindi Story: पदोन्नति के साथ जनार्दन का तबादला किया गया था. अब वे सीनियर अध्यापक थे. दूरदराज के गांवों में 20 वर्षों का लंबा सेवाकाल उन्होंने बिता दिया था. उन की पत्नी शहर आने पर बहुत खुश थी. गांव की अभावभरी जिंदगी से वह ऊब चुकी थी. अपने बच्चों को पढ़ानेलिखाने में जनार्दन व उन की पत्नी ने खूब ध्यान दिया था.

उन की 2 बेटियां और एक बेटा था. बड़ी का नाम मालती, मंझली मधु और छोटे बेटे का नाम दीपू था. मालती सीधीसादी मगर गंभीर स्वभाव की, तो मधु थोड़ी जिद्दी व शरारती थी, जबकि दीपू थोड़ा नटखट था.

मालती बीए की पढ़ाई कर रही थी, मधु 11वीं में पढ़ रही थी और दीपू तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था. समय बीत रहा था.

वहां गांव में जनार्दन पैदल ही स्कूल जातेआते थे. यहां शहर में आ कर उन्होंने बाइक ले ली थी. जिस पर छुट्टी के दिन श्रीमतीजी को बैठा कर जनार्दन शौपिंग करने या घूमने जाते थे. उन की पत्नी दुपहिया वाहन में सैर कर फूले न समाती. कभीकभी दीपू भी जिद कर मांबाप के बीच बैठ कर सवारी का आनंद ले लेता था.

मधु विज्ञान विषय ले कर पढ़ रही थी. जनार्दन ने शहर के एक ट्यूशन सैंटर में भी अब उस का दाखिला करवा दिया था. वह बस से आयाजाया करती. दीपू को जनार्दन खुद स्कूल छोड़ जाया करते और लौटते समय ले आते. एक व्यवस्थित ढर्रे पर जीवन चल रहा था.

नई कालोनी में आ कर जनार्दन की पत्नी बच्चों के लालनपालन में तल्लीन थी. दिन के बाद रात, रात के बाद दिन. समय कट रहा था. बेहद घरेलू टाइप की महिला थी वह. एक ऐसी आम भारतीय महिला जिस का सबकुछ उस का पति, बच्चे व घर होता है. मां का यह स्वभाव बड़ी बेटी को ही मिला था.

मधु ट्यूशन खत्म होते ही बस से ही लौटती. कालोनी के पास ही बस का स्टौप था. ट्यूशन सैंटर के पास एक ढाबा था. शहर के लड़के और बाबू समुदाय अपने खाने का शौक पूरा करने वहां आते थे. एक दिन यहीं पर मधु सड़क पार कर बसस्टौप के लिए जा रही थी, एक कार टर्न लेते हुए मधु के एकदम पास आ कर रुकी. मधु घबरा गई थी. वह पीछे हट गई. कारचालक ने कार किनारे पार्क की और मधु के पास आया, बोला, ‘‘मैडम, सौरी, मैं जरा जल्दी में था.’’  दोनों की आंखें चार हुईं.

‘‘दिखाई नहीं देता क्या,’’ वह गुस्से से बोली.

‘‘अब एकदम ठीक दिखाई देता है मैडम.’’ उस ने मधु की आंखों में आंखें डालते हुए कहा.

‘‘नौनसैंस,’’ मधु ने उसे गुस्से से देख कर कहा.

फिर मधु बसस्टौप की तरफ बढ़ चली. वह उसे जाता हुआ देखता रहा. उस का नाम था शैलेश. शहर के एक कपड़े के व्यापारी का बेटा. अब तो शैलेश अकसर ट्यूशन सैंटर के पास दिखता- कभी ढाबे से निकलते हुए, कभी कार खड़ी कर इंतजार करते हुए. फिर वही हुआ जो ऐसे में होता है. एक शरारत पहचान में, पहचान दोस्ती में, और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई.

बस की जगह अब मधु कार या कभी बाइक में ट्यूशन से लौटती. मधु के मातापिता इस बात से अनजान थे. लेकिन कालोनी के एक अशोकन सर को सबकुछ पता था. इधर अशोकन सर

शाम की चहलकदमी को निकलते और कालोनी से कुछ कदम दूर मधु कार से कभी बाइक से उतरती, दबेपांव धीरेधीरे घर की ओर जाती. इन की हायबाय उन्होंने कितनी ही बार देखी.

मां तो यही सोचती कि उस की बेटी सयानी है, विज्ञान की छात्रा है, एक दिन उसे डाक्टर बनना है. वह एक मौडर्न लड़की है. दुनिया में आजकल यही तो चाहिए. पिता को घर की जिम्मेदारियों से फुरसत कहां मिलती है भला.

लेकिन मधु के प्यार की भनक मालती को लग गई थी. उस के फोनकौल्स अब ज्यादा ही आ रहे थे. जब देखो मोबाइल फोन कान से लगाए रहती. एक शाम जब वह काफी देर बातें कर चुकी, तो मालती ने पूछा, ‘‘मधु, कौन था वह जिस से तुम इतनी हंसहंस कर बातें कर रही थी? तुम कहीं ऐसेवैसे के चक्कर में तो नहीं पड़ गईं. अपनी पढ़ाई का खयाल रखना.’’

मधु ने जवाब में कहा, ‘‘नहीं दीदी, ऐसीवैसी कोई बात नहीं है.’’

आखिर एक दिन उस ने दीदी को बता ही दिया कि वह शैलेश से प्यार करने लगी है. वह अच्छा लड़का है.’’

मालती ने मन में सोचा, ‘शायद यह सब सच हो.’

एक दिन अचानक मुख्यभूमि से

जनार्दन के पास फोनकौल आई.

उन्हें अपने पैतृक गांव जाना पड़ा. उन के मित्र वेंकटेश ने फौरन उन के विमान टिकट का बंदोबस्त किया. पापामम्मी दोनों को जाना था. ज्यों ही मम्मीपापा गए, मधु ने दीदी से कहा कि वह 2-3 दिनों के लिए चेन्नई जाना चाहती है. शैलेश 2-3 दिनों के लिए अपने बिजनैस के सिलसिले में चेन्नई जाएगा. वह उसे भी साथ ले जाना चाहता है.

‘‘दीदी, तू साथ दे दे. बस, 2-3 दिनों की ही तो बात है.’’

मालती अवाक रह गई. मगर वह क्या कर पाती भला. उस की ख्वाहिश और बारबार यह आश्वासन कि शैलेश बहुत अच्छा लड़का है, वह उस से शादी करने को राजी है. मालती ने उसे इजाजत दे दी. शैलेश के साथ विमान से मधु चेन्नई चली गई. मालती का जैसे दिन का चैन और रातों की नींद उड़ गई थी. पता नहीं क्या हो जाए. लेकिन चौथे दिन वह शैलेश के साथ लौट आई थी. टूरिस्ट सीजन की वजह से उन्हें किसी ने ज्यादा नोटिस नहीं किया था.

एक सप्ताह के बाद मम्मीपापा मुख्यभूमि से लौट आए थे. गांव की पुश्तैनी जमीन का उन का हिस्सा उन्हें मिलने वाला था. मम्मीपापा के लौट आने पर मालती का मन बेहद हलका हो गया था.

समय गुजरता जा रहा था. जनार्दन और उन की पत्नी बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए दिनरात एक कर रहे थे. मालती अब बीए पास कर चुकी थी. वह आगे पढ़ने की सोच रही थी. दीपू 7वीं कक्षा में पहुंच गया था और मधु अब कालेज में पढ़ रही थी.

आधुनिक खयाल की लड़की होने के कारण मधु के पहनावे भी आधुनिक थे. उस की सहेलियां अमीर घरों की थीं. उन लड़कियों के बीच एक नाम बहुत ही सुनाई देता था- बबलू. वैसे उस का सही नाम जसवंत था. बबलू कभी अकेला नहीं घूमता था, 3-4 चेले हमेशा उसे घेरे रहते. क्यों न हों, वह शहर के एक प्रभावी नेता का बेटा जो था. ऊपर से वह तबीयत का भी रंगीन था. उस ने जब मधु को देखा, तो देखता ही रह गया उस की गोरी काया और भरपूर यौवन को. पर मधु भला उस पर क्यों मोहित होती, वह तो शैलेश की दीवानी थी. जब कभी कक्षाएं औफ होतीं तो मधु अपना समय शैलेश के साथ ही बिताती, कभी किसी पार्क या किसी दूसरी जगह पर.

जर्नादन और वेंकटेश की दोस्ती अब पारिवारिक बंधन में बदलने जा रही थी. वेंकटेश के बेटे को मालती बहुत पसंद थी. पिछले बरस उस ने अपनी सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी और उस की सरकारी नौकरी भी लग गई थी.

एक सुबह वेंकटेश और उन की पत्नी अपने बेटे का रिश्ता मालती के लिए ले कर आ गए थे. और अगले फागुन में शादी की तिथि निकल आई थी. मालती शादी के बाद भी पढ़ाई करे, उन्हें एतराज नहीं था. मां यही तो चाहती थी कि उस की बेटी को अच्छी ससुराल मिले.

इधर, मधु कालेज में अपनी सहेलियों की मंडली में हंसतीखेलती व चहकती रहती. क्लास न होने पर कैंटीन में समय बिताती या लाइब्रेरी में पत्रिकाएं उलटतीपलटती. कभीकभार शैलेश उसे पार्क में बुला लेता. बबलू तो बस हाथ मसोस कर रह जाता. वैसे, बहुत बार उस ने मधु को आड़ेहाथों लेने की कोशिश की थी.

वह गांधी जयंती की सुबह थी. कालेज में हर वर्ष की तरह राष्ट्रपिता की जयंती मनाने का प्रबंध बहुत ही अच्छे तरीके से किया गया था. लड़कियां रंगबिरंगे कपड़ों में कालेज के कैंपस और पंडाल में आजा रही थीं. तभी, बबलू की टोली ने देखा कि मधु शैलेश की कार में बैठ रही है.

अक्तूबर का महीना. सूरज की किरणों में गरमी बढ़ रही थी. शहर से दूर समुद्र के किनारे एक पेड़ के तने से लगे मधु और शैलेश बैठे हुए थे. शैलेश का सिर मधु की गोद में था और मधु की उंगलियां उस के बालों से खेल रही थीं. जब भी दोनों को मौका मिलता तो शहर से दूर दोनों एकदूसरे की बांहों में समा जाते. तभी, शैलेश ने जमीन पर फैले पत्तों में किसी के पैरों की पदचाप सुनी और वह उठ गया, देखा कि सामने एक नौजवान खड़ा है और उस के पीछे 3 और लड़के. मधु ने देखा, वह बबलू था.

और अगले क्षण बबलू ने मधु को हाथों में जकड़ लिया. बब्लू ने मधु को उस की गिरफ्त से छुड़ाना चाहा और पूछा, ‘‘तुम लोग कौन हो और इस बदतमीजी का मतलब…’’ बात अभी पूरी भी न हो पाई थी कि बबलू के बूटों का एक प्रहार उस की कमर पर पड़ा. वह उठ कर भिड़ना ही चाहता था कि बबलू का एक सख्त घूंसा उस के गाल पर पड़ा.

बबलू के इशारे पर 2 लड़कों ने उसे पीटना शुरू कर दिया. शैलेश ने मधु को अपनी बलिष्ठ बांहों में उठा लिया और पास ही के जंगल की ओर बढ़ चला. मधु प्रतिवाद करती रही. बबलू का तीसरा सहायक भी उन के पीछे पहुंच गया था.

शाम तक मधु के न लौटने पर जनार्दन व उन के घर वाले घोर चिंता में घिर गए. उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी. मालती अनजाने भय से अंदर ही अंदर घबरा रही थी.

अगले दिन यह खबर जंगली आग की तरह फैल गई थी कि शहर से दूर जंगल में एक लड़की का शव और समुद्र के किनारे एक लड़का घायल अवस्था में मिला है. पुलिस हरकत में आई. उस ने शव को अस्पताल पहुंचा दिया और घायल लड़के को अस्पताल में भरती करा दिया.

जनार्दन को पुलिस ने अस्पताल बुला लिया था शिनाख्त के लिए. जब पुलिस अधिकारी ने शव के मुंह से कपड़ा हटाया, जनार्दन के मुंह से चीख निकल गई. वे वहीं गिर पड़े.

दोपहर तक शव कालोनी में लाया गया. कालोनी के लिए वह दिन शोक का था. सभी जनार्दन परिवार के दुख में शामिल थे. मां का रो कर बुरा हाल था, छोटे दीपू को जैसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. मालती दहाड़ें मारमार कर रो रही थी. जर्नादन के लिए सबकुछ एक अबूझ पहेली की तरह था. उन के सपनों का महल धराशायी हो गया था. रोरो कर उन का भी बुरा हाल था.

मालती के सिवा कौन जानता था कि मधु के जीवन के ऐसे अंत के लिए मालती भी तो जिम्मेदार थी. काश, शुरू से उस ने उसे बढ़ावा न दिया होता और मांपिताजी को सबकुछ बता दिया होता.

दहाड़े मार कर रोती मालती को अड़ोसीपड़ोसी ढांढ़स बंधा रहे थे.

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Social Story: मेट्रो सिटी- श्रुति के साथ क्या हुआ

Social Story: यूट्यूब पर अपनी वीडियो क्लिप देख कर श्रुति के पसीने छूटने लगे. उस के मुंह से सहसा निकल पड़ा, “अब तो मैं किसी को मुंह दिखाने लायक भी नहीं रही.”

श्रुति ने मोबाइल फोन तकिए पर रखा और हाथ को आंखों पर रख कर सिसकने लगी. उस के दिमाग में परसों रात वाली बातें कौंधने लगीं.

रात के 11 बज रहे थे. टौपजींस पहने, आंखों पर चश्मा चढ़ाए, एक हाथ में पर्स लटकाए श्रुति किसी मौडल की तरह बनीठनी एक पुल के नीचे खड़ी थी. यही उस का इलाका था. 100-200 मीटर आगेपीछे की रेंज में वह रोजाना यहीं खड़ी होती थी.

यह जगह श्रुति के घर से 10-12 किलोमीटर की दूरी पर थी. वह घर में सब को खाना खिला कर नाइट ड्यूटी के बहाने 11 बजे घर से निकलती और बैटरी रिकशा पकड़ कर यहां आ जाती.

श्रुति एक प्राइवेट अस्पताल में नर्स का काम करती थी. उस अस्पताल की साख अच्छी नहीं थी. अस्पताल में न डाक्टर अच्छे थे, न सुविधाएं अच्छी थीं. वहां बस गिनती के ही मरीज आते थे. जो आते थे, वे भी कमीशन एजेंटों के दम पर आते थे. महज 3,000 रुपए महीना उस की तनख्वाह थी, जबकि उस के घर का खर्च 15,000 रुपए के आसपास था.

6 महीने पहले इसी अस्पताल की एक दूसरी नर्स ने श्रुति को यह शौर्टकट रास्ता सुझाया था. श्रुति अस्पताल जाती, हाजिरी लगाती, थोड़ी देर 1-2 मरीजों की देखभाल करती, फिर निकल जाती अपने ग्राहकों का इंतजार करने.

श्रुति का पति अरुण दिल्ली में एक बैटरी रिकशा चालक था, जो पिछले साल 3 बच्चों, पत्नी और मां को छोड़ कर कोरोना की भेंट चढ़ चुका था. अरुण से पहले अरुण के पिता रामेश्वर प्रसाद भी, जो लकवे के मरीज थे, कोरोना की भेंट चढ़ चुके थे.

5 साल पहले श्रुति के मांबाप ने खाताकमाता लड़का देख कर ही उस की शादी की थी. उस का पति अरुण अच्छे से परिवार का भरणपोषण करता भी था, लेकिन बुरा हो इस कोरोना वायरस का जिस की चपेट में अरुण आ गया और श्रुति के सिर पर जिम्मेदारियों का पहाड़ लाद कर चला गया.

श्रुति की बड़ी और मंझली बेटी एक प्राइवेट स्कूल में क्लास 3 और 2 में पढ़ती थीं. सब से छोटा एक साल का बेटा था. डायबिटीज के चलते अरुण की मां दामिनी की एक किडनी खराब हो चुकी थी. 4,000 रुपए बच्चों की फीस, 4,000 रुपए दवा का खर्च और महानगर में रहनेखाने के खर्च का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

जिस घड़ी श्रुति रात में घर से बाहर निकलती, उस की बूढ़ी बीमार सास दामिनी समझ जाती कि बहू गलत रास्ते पर जा रही है, लेकिन अपनी महंगी दवाओं का खर्च और परिवार की तंगहाली के चलते वह श्रुति को रोक पाने की हालत में नहीं थी.

श्रुति ने अपने हाथों को आंखों से हटाया और छत को घूरने लगी. आंसुओं से तकिए के दोनों किनारे भीग चुके थे. उसे क्या पता था कि ग्राहक के वेश में मोलभाव करने वाला वह नौजवान उस की वीडियो क्लिप बना रहा था.

उस नौजवान के हाथों में न मोबाइल फोन था, न कैमरा… फिर कैसे? शायद उस की कमीज के बटन में या जेब में टंगे पैन में छिपा कैमरा लगा हुआ था.

श्रुति ने एक बार फिर यूट्यूब खोला और उस वीडियो क्लिप को देखने लगी. वह नौजवान पूछ रहा था, ‘कितना लेती हो?’

‘2,000…’ श्रुति बोली थी.

‘2,000… 2,000 रुपए ज्यादा नहीं हैं…’

‘नहीं, ज्यादा नही हैं. मैं इतना ही लेती हूं.’

‘पूरी रात का कितना लेती हो?’

‘4,000.’

‘लेकिन 2 जने हैं हम लोग.’

‘फिर तो 6,000 लगेंगे.’

‘6,000 ज्यादा हैं. चलो, 4,000 दे देंगे.’

वीडियो क्लिप देखते हुए श्रुति कांपने लगी. यही संवाद परसों रात में उसे सहज लगे थे, जबकि वीडियो में बम धमाके की तरह लग रहे थे. वह घबरा कर उठ बैठी और जल बिन मछली की तरह तड़पने लगी.

तभी पूजा की घंटी बजने लगी. श्रुति ने खिड़की खोली. उस की सास दामिनी पूजा शुरू कर चुकी थी. वह उठ कर बाथरूम चली गई.

बाथरूम में भी श्रुति को चैन नहीं था. उस के दिमाग की सनसनाहट रोजमर्रा के कामों में रुकावट पैदा कर रही थी. कुछ देर बैठने के बाद वह उठ खड़ी हुई और बाहर निकल पड़ी. फिर किचन में जा कर चाय बनाने लगी.

“बहू, प्रसाद ले लो.”

श्रुति ने पास जा कर सास के हाथों से प्रसाद लिया. प्रसाद लेते समय उस के हाथ थरथरा रहे थे, जिसे दामिनी ने भी महसूस कर लिया.

“क्या हुआ बहू? तबीयत तो ठीक है न?”

“हां… ठीक है,” यह कहते हुए श्रुति किचन में घुस गई. चाय उबाल मार कर चूल्हे पर गिर रही थी. उस ने गैस बंद की और चाय कप में उड़ेलने लगी.

चाय कप में उड़ेलते हुए श्रुति ने महसूस किया कि सचमुच उस के हाथ कांप रहे थे. उस ने चाय का कप अपनी सास को थमाया.

दामिनी ने फिर महसूस किया कि श्रुति के हाथ कांप रहे थे. इस बार उस ने कहा तो कुछ नहीं, लेकिन श्रुति के चेहरे को गौर से देखा. श्रुति सास से नजरें नहीं मिला रही थी. वह चाय दे कर बच्चों को जगाने चली गई.

छोटा बेटा अपनी मां श्रुति के साथ सोता था, जबकि दोनों बेटियां अपनी दादी के साथ सोती थीं.

सब को नाश्तापानी दे कर श्रुति सोने चली गई. यह उस का रोज का काम था. रातभर जागने के चलते सुबह उसे नींद बहुत आती थी. लेकिन आज नींद आंखों से गायब थी.

श्रुति सोचने लगी कि इस समय लाखों लोग यूट्यूब पर उस की वीडियो क्लिप देख रहे होंगे. अब वह घर से बाहर कैसे निकलेगी? लोगों को क्या जवाब देगी? अभी तो बच्चों को बहला लेगी, लेकिन जब बड़े होंगे तब? क्या वे उस के अतीत की काली परछाईं से बच पाएंगे?

इस तरह के अनेक सवाल श्रुति परेशान कर रहे थे. लग रहा था कि उस की कनपटी की धमनियां फट जाएंगी. अगर यह दिल्ली नहीं कोई छोटी जगह रहती तो अब तक वीडियो क्लिप देख रहे लोग उसे तड़ीपार की सजा सुना चुके होते.

श्रुति इन्हीं खयालों में गुम थी कि मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी. उस ने देखा कि पिताजी का काल था. उस का कलेजा मुंह को आने लगा. उस ने सोचा कि बात पिताजी तक पहुंच चुकी है. उस ने काल रिसीव नहीं की.

श्रुति का चेहरा पसीने से भीग गया. उस ने दुपट्टे से चेहरा पोंछा और मोबाइल फोन को किसी खतरनाक चीज की तरह देखने लगी.

घंटी फिर बजने लगी. श्रुति की मोबाइल फोन उठाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन मजबूरन उस ने कांपते हाथों से काल रिसीव की.

उधर से पिताजी रोते हुए कहने लगे, ‘श्रुति, तुम्हारी मां हमें छोड़ कर चली गई…’

श्रुति के हाथ से मोबाइल फोन छूट गया. वह फूटफूट कर रोने लगी. यूट्यूब वाली वीडियो क्लिप जो अंदर तूफान मचाए हुए थी, मां की मौत पर ज्वालामुखी की तरह फट पड़ी.

दामिनी भागीभागी आई. श्रुति को रोता देख बच्चे भी मां से लिपट कर रोने लगे. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन श्रुति को चुप कराते हुए सब रो रहे थे.

श्रुति ने अपनी सास का कंधा पकड़ कर कहा, “मां हमें छोड़ कर हमेशा के लिए चली गई…”

दामिनी ने श्रुति को अपने सीने से चिपकाते हुए कहा, “बहू, सब्र करो. एक न एक दिन सब को जाना पड़ता है… और अभी मैं हूं न. एक मां चली गई तो क्या, दूसरी मां है न.”

श्रुति सोच रही थी कि काश, इसी गम में यूट्यूब क्लिप वाला दर्द भी फना हो जाता तो कितना अच्छा होता, लेकिन यह दर्द फना होने वाला कहां था. श्रुति के हालात का फायदा उठा कर पैसे कमाने वाला वह घटिया इनसान आज मुसकरा रहा होगा, जबकि श्रुति के साथसाथ कई जिंदगियां तबाही के कगार पर पहुंच चुकी हैं.

बस में सवार परिवार के साथ मायके जा रही श्रुति सोच रही थी कि काश, इस बस का ऐक्सिडैंट हो जाता और सारे मुसाफिर मर जाते तो उस के सारे दुखों का अंत हो जाता. वह अनजाने में ही सही, अपने दुखों के साथ दर्जनों जिंदगियों का अंत चाहने लगी थी, लेकिन अगर इनसान की हर सोच हकीकत का रूप लेने लगे, तो फिर कुदरत का क्या काम रह जाए…

मां के क्रियाकर्म से फारिग हो कर श्रुति मध्य प्रदेश से वापस अपनी ससुराल दिल्ली लौट आई. राहत की बात यह रही कि मायके में किसी ने भी उस की वीडियो क्लिप का जिक्र नहीं किया.

जब कहीं से कोई शिकायत नहीं आई तो श्रुति का मन स्थिर होने लगा. कलेजे की धड़कन सामान्य होने लगी. धीरेधीरे फिर हौसला बढ़ने लगा.

इस मैट्रो सिटी में कौनक्या कर रहा है, इस से दूसरों को कोई मतलब नहीं रहता. बगल के फ्लैट में लोग मर कर सड़ जाते हैं, फिर भी पड़ोस वालों को खबर नहीं होती, तो वीडियो क्लिप वाली लड़कियों को भला कौन ढूंढ़ता फिरे.

2 महीने बाद श्रुति फिर अपने पुराने काम पर लौट आई थी. आज वह नीली साड़ी में बिना चश्मे के उसी पुल के नीचे अपने ग्राहक के इंतजार में खड़ी थी.

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Men’s Makeup: पुरुषों में मेकअप का बढ़ता ट्रेंड

Men’s Makeup: कई बार ऐक्टर्स की इंटरव्यू के दौरान उन्हें पत्रकार तक पहुंचने में समय लगता है. पता चलता है कि उन्हें मेकअप लेने में देर हो गई, क्योंकि वे बिना मेकअप के आम जनता के आगे आना पसंद नहीं करते, फिर चाहे वे लिजेंड ऐक्टर अमिताभ बच्चन हों या शाहरुख खान, हमेशा मेकअप के साथ आम लोगों के बीच में दिखाई पड़ते हैं.

यह तो हुई कलाकारों की बात, आम जीवन में भी आज के लड़के मेकअप लेने से पीछे नहीं हटते, इस की वजह उन का हैंडसम या स्मार्ट दिखने के अलावा प्रभावशाली व्यक्तित्व का होना भी वे मानते हैं, जो उन के दैनिक जीवन में उन्हें अच्छा एहसास कराता है.

लड़कों में मेकअप ट्रेंड है पौपुलर

यह सही है कि मेकअप आमतौर पर करना लड़कियों का काम माना जाता है, मगर बदलते समय के साथ लड़कों में भी मेकअप का ट्रेंड बढ़ा है. अलगअलग तरह के परफ्यूम के अलावा अब लड़के मेकअप के सामान भी यूज करने लगे हैं.

मेकअप आर्टिस्ट ओजस राजानी कहती हैं कि लड़कों में मेकअप ट्रेंड आजकल काफी बढ़ा है, क्योंकि उन सभी पर हमेशा परफैक्ट दिखने का दबाव है. इस की वजह वे खुद में आत्मविश्वास का बढ़ना मानते हैं, क्योंकि किसी भी जौब में अगर आप क्लीन और फ्रेश दिखते हैं, अगर पर्सनैलिटी अच्छी है, तो उस लड़के को जौब पर रखने की कोशिश की जाती है, खासकर कारपोरेट वर्ल्ड, होटल्स, बैंक्स, कौल सेंटर्स, मार्केटिंग फील्ड्स आदि कई स्थानों पर अच्छी तरह से खुद को ग्रूम किए हुए लड़के ही अकसर जौब के हकदार होते हैं, क्योंकि वहां कस्टमर हैंडलिंग का काम होता है, जहां एक हैंडसम लड़के के पास कोई भी ग्राहक जाना पसंद करता है.

अगर आप कही भी जाते हैं और आप के सामने वाला लड़का क्लीन दिखने वाला न हो, तो आप को उस से बात करना भी पसंद नहीं आता. अच्छा दिखना आज की तारीख में हर किसी के वश में होता है. रंगरूप कैसा भी हो अगर आप ने खुद को अच्छी तरह ग्रूमिंग या स्टाइलिंग की है, तो लोग आप की तरफ आकर्षित अवश्य होते हैं और आप के बात करने का टोन भी उस व्यक्ति के साथ बदल जाता है.

बैंक हो या एअरपोर्ट, हर जगह पर एक गुडलुकिंग व्यक्ति से बात करना सभी को पसंद आता है और यह ह्यूमन नैचर है. यही वजह है कि कारपोरेट सैक्टर के अलावा बैंक में भी क्लीन लुक वाले व्यक्ति को ग्राहकों के साथ बात करने के लिए आगे रखते हैं, ताकि उन का व्यवसाय बढ़े. यह किसी अस्पताल से ले कर क्लिनिक में हर स्थान पर फौलो किया जाता है.

होती है अच्छी कमाई

ओजस कहती हैं कि आजकल लेडीज ब्यूटी पार्लर से अधिक कमाई जैंट्स सैलून में होती है, क्योंकि अगर कोई लड़का शैव करने भी जाता है, तो उस के साथ मसाज, स्टीम कराना, चेहरे पर पैक लगवाना, हेयर कलर या मेहंदी लगवाना आदि बजट के अनुसार करवाता रहता है.

हर रविवार को अगर आप किसी जेन्ट्स सैलून में जाते हैं, तो वहां पुरुषों की भीड़ लगी होती है. फिल्मों या टीवी पर सैकंड रो में काम करने वाले पुरुषों से ले कर, स्टूडैंट्स, प्रोफेशर्स आदि सभी अपना मेकओवर करते रहते हैं. इस में वे पैसे देने से कतराते नहीं, क्योंकि बाद में उन्हें गुड लुक मिलता है. इस के अलावा आज के लड़के पेडिक्योर या मेनीक्योर भी करवाते रहते हैं.

मेकअप का सहारा लेना नहीं गलत

ओजस कहती हैं कि मेरे हिसाब से लड़कों को नियमित पेडीक्योर, मेनिक्योर अपनी साफसफाई के लिहाज से करवाते रहना चाहिए, ताकि किसी प्रकार की बीमारी आप के पैरों में न हो. नौर्मल सैलून आजकल हमेशा कुछ न कुछ सस्ते पैकेज देती रहती है, जिस का फायदा लड़कों को होता है. इस के अलावा आईब्रोज को शैप देना, नाक या कान के बालों को साफ रखना आदि सभी पर ध्यान देना जरूरी है, ताकि आप का लुक आकर्षक रहे. यह गलत भी नहीं है. जरूरत पड़े तो कहीं पर मेकअप का भी सहारा ले लेने में कोई हरज नहीं है. केवल सेलिब्रिटी ही नहीं, आम इंसान भी हलका मेकअप अवसर के अनुसार ले सकता है.

चेहरे पर ब्यूटी प्रोडक्ट्स ट्राई करने से पहले जानें कुछ जरूरी बातें :

 

  • मेकअप करने से पहले चेहरे को साफ करना जरूरी है. किसी हर्बल क्लींजर से अपने चेहरे को साफ करें. इसके बाद ऐक्सफोलिएटिंग स्क्रब से चेहरे पर सर्कुलर मोशन में मसाज करें. इस से आप के चेहरे से मृत त्वचा कोशिकाएं हट जाएंगी और पोर्स खुल जाएंगे. इस के बाद कौटन से अपने चेहरे पर टोनर लगाएं. इस से त्वचा का पीएच लेवल बना रहता है.
  • अब कोकोनट मिल्क जैसे हलके मोइश्चराइजर को अपने चेहरे और गरदन पर लगाएं. इस से स्किन हाइड्रेट होती है और मेकअप के लिए तैयार होती है. यदि आप की स्किन ड्राई है, तो औयल बेस्ड मोइश्चराइजर लगाएं. औयली स्किन वाले लोगों को वाटर बेस्ड मोइश्चराइजर यूज करना चाहिए.
  • अब अपने चेहरे पर कंसीलर लगाएं. कंसीलर चेहरे के डार्क स्पौट और मुंहासों को छिपा देता है. आप को अपने स्किन टोन से मैच करता हुआ कंसीलर यूज करना चाहिए. आंखों के नीचे और नाक पर कंसीलर लगा कर इसे ब्लेंडर स्पंज से अच्छी तरह ब्लेंड करें.
  • अपने स्किनटोन से मैच करता हुआ लिक्विड फाउंडेशन लें. इसे ब्रश से अपने चेहरे पर लगाएं. इसे ब्लेंड करने के लिए आप ब्लेंडर स्पंज का यूज कर सकते हैं. यह पूरे चेहरे के लुक को यूनीफौर्म कर देता है.
  • अब लूज पाउडर से अपने मेकअप को सैट करें. चेहरे पर जहांजहां आप ने कंसीलर लगाया है, वहां ब्रश से लूज पाउडर लगाएं. यह आप के मेकअप को सैट करने में मदद करता है.
  • आइब्रो पेंसिल से अपने आइब्रो को सैट करें. इस के बाद अपने होंठों पर अच्छी क्वालिटी का लिपबाम लगाएं. इस से आप के होंठ सौफ्ट नजर आएंगे.

इस प्रकार गुडलुकिंग होना अब आप के वश में है. इसे अपना कर कोई भी पुरुष, फ्रैश और क्लीन लुक पा सकता है, जो उस के दैनिक जीवन में आत्मविश्वास को बढ़ाता है और वह सफलता की मंजिल आसानी से चढ़ सकता है.

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Mobile Addiction: कहीं आप भी तो इस के शिकार नहीं

Mobile Addiction: जब से लोगों ने मोबाइल को एंटरटेनमैंट के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया है, उन्हें इस की लत लग गई है. स्मार्टफोन की यह लत कब हमारी लाइफ का अहम पार्ट बन जाती है हमें पता भी नहीं चलता. दिन में 4 घंटे मोबाइल पर चिपके रहना लाइफस्टाइल का हिस्सा बन गया है.

स्मार्टफोन यूज करना अच्छा तो बहुत लगता है लेकिन इस की अच्छीखासी कीमत हमें अपनी सेहत के जरीए चुकानी पड़ती है. इस बारे में बता रही हैं जनरल फिजिशन डाक्टर रिया अग्रवाल :

रील्स देखनेसुनने के लिए घंटों ईयरफोन का यूज खतरनाक है

कहीं आप को भी तो रातों में जाग कर फोन पर रील्स देखनेसुनने की आदत तो नहीं? अब रात में मोबाइल स्पीकर पर भी नहीं कर सकते इसलिए कहीं आप भी तो इस के लिए ईयरफोन का यूज तो नहीं कर रहे. अगर ऐसा कर रहे हैं तो हम आप को बता दें कि हेडफोन या ईयरफोन लगातार लगाने से कानों में हीट पैदा होती है, जिस से ईयर इन्फैक्शन का खतरा बढ़ सकता है. ज्यादा समय तक ईयरफोन लगाने से कानों की नसों पर भी दबाव पड़ता है. उन में सूजन भी आ सकती है. कानों में वाइब्रेशन से हियरिंग सेल्स भी प्रभावित होती है. ईयरफोन सुनने की क्षमता ही नहीं सिरदर्द को भी बढ़ा सकता है. ईयर स्पेशलिस्ट का कहना है कि है कि ईयरफोन की 100 डीबी तक आवाज भी कानों को डैमेज कर सकती है.

टेक्स्ट नेक सिंड्रोम

टेक नेक वह स्थिति है, जब व्यक्ति लंबे समय तक मोबाइल या लैपटौप का उपयोग करते हुए गरदन झुका कर बैठता है. सामान्य स्थिति में सिर का वजन 4-5 किलोग्राम होता है, लेकिन जैसे ही हम सिर को आगे की ओर झुकाते हैं, यह वजन कई गुना बढ़ कर गरदन और रीढ़ पर अतिरिक्त दबाव डालता है. सिर्फ यही नहीं बल्कि घंटों सिर झुकाए रहने से स्पाइनल कौर्ड की डिस्क में खराबी आने लगती है, जिस से कंधा जाम हो जाता है और हाथ घुमाने, उठाने में तकलीफ हो जाती है.

गरदन झुका कर बैठने से सर्वाइकल डिस्क पर लगातार दबाव पड़ता है. यह स्थिति डिस्क बल्ज या हर्निएशन का कारण बन सकती है. लंबे समय तक स्क्रीन पर झुक कर बैठने से गरदन की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं, जिस से अकड़न और दर्द होता है. गरदन पर तनाव बढ़ने से सिरदर्द, आंखों में थकान और हाथों में झनझनाहट या कमजोरी भी महसूस हो सकती है.

डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम की प्रौब्लम हो सकती है

मोबाइल ऐडिक्शन से आंखों में थकान, सूखापन, सिरदर्द, धुंधली दृष्टि, आंखों में जलन और लालिमा जैसी दिक्कतें हो सकती हैं, जिसे डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम कहते हैं. इस के मुख्य कारण स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट और कम पलकें झपकाना हैं, जिस से आंखों में तनाव आता है.

एक ताजा रिसर्च में खुलासा हुआ है कि रोजाना सिर्फ 1 घंटे मोबाइल, टैबलेट या स्मार्टफोन जैसी डिजिटल स्क्रीन का इस्तेमाल करने से मायोपिया (नजदीक की चीजें साफ दिखना, दूर की चीजें धुंधली लगना) का खतरा 21% तक बढ़ सकता है. सामान्यतया 1 मिनट में 12 से 14 बार पलक झपकनी चाहिए, लेकिन लगातार मोबाइल स्क्रीन पर नजरें गड़ाने से यह कम हो जाती है, जिस से आंखों की नमी खत्म होती है और जलन, खुजली व लालिमा जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं. आंखों पर पड़ने वाले तनाव के कारण चीजें धुंधली दिखाई देने लग सकती हैं.

डिजिटल डिमेंशिया तो नहीं हो गया आप को

लगातार मोबाइल को देखना अपनेआप में एक गंभीर बीमारी है. इस कंडीशन में दिमाग में ब्लड सप्लाई कम हो जाती है जिस से सेल्स को नुकसान पहुंचता है और वे डैमेज होने लगते हैं. इस से आप चीजें भूलने लगते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि फोन पर घंटो स्क्रोल करने पर ढेरों फोटोज, एप्स, वीडियोज सामने आते हैं जिस से आप के दिमाग के लिए सबकुछ याद रखना मुश्किल हो जाता है. परिणामस्वरूप आप की याद्दाश्त, कंसंट्रेशन और सीखने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है.

अगर आप का बच्चा याद किया हुआ भूल जाए या फिर किसी चीज पर फोकस न कर पाए या फिर उस की परफौर्मेंस घटने लगे, तो उसे डांटने से कुछ नहीं होगा बल्कि आप समझ लीजिए कि वह डिजिटल डिमेंशिया से जूझ रहा है.

डिजिटल डिमेंशिया सिर्फ बच्चों पर ही नहीं बल्कि बड़ों पर भी अटैक कर रहा है.

ब्रिटेन में हुई स्टडी के मुताबिक, दिन में 4 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम से वैस्कुलर डिमेंशिया और अल्जाइमर का जोखिम बढ़ जाता है. सिर्फ यही नहीं बल्कि इस से न्यूरोडीजैनेरेशन का रिस्क भी हो जाता है.

दरअसल, 18-25 साल की उम्र में ज्यादा स्क्रीन पर देखते रहने से  दिमाग की सब से बाहरी परत सेरेब्रल कौर्टेक्स पतला हो सकता है. यही परत मेमोरी, कौग्निटिव फंक्शंस को बेहतर बनाने में मदद करता है. जब यह पतली होती जाती है तो समस्याएं भी बढ़ती जाती हैं.

टेक्स्टिंग टेंडनाइटिस भी हो सकता है

घंटों मोबाइल चलाने से कलाई, हाथ और उंगलियों में दर्द और अकड़न महसूस हो सकती है, जिसे टेक्स्टिंग टेंडनाइटिस कहा जाता है. घंटों तक स्मार्टफोन का इस्तेमाल शारीरिक दर्द और थकान को बढ़ा सकता है. यह स्थिति लंबे समय तक रह सकती है और यदि उचित उपचार न लिया जाए तो यह स्थायी समस्या बन सकती है. जैसेकि मोबाइल चलाने में लगातार अंगूठे का इस्तेमाल करने से कापल टर्नल सिंड्रोम भी हो सकता है जिस में अंगूठे में इतना दर्द रहने लगता है कि आप उसे हिला भी नहीं पाते, काम करना तो दूर की बात है.

दरअसल, लंबे समय तक मोबाइल के इस्तेमाल से कलाई की मेडियन नस पर दबाव पड़ सकता है, जिस की वजह से दर्द, झनझनाहट, सुन्नपन और कमजोरी जैसे लक्षण दिखते हैं.

सिर्फ यही नहीं बल्कि ज्यादा स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने से टेंडन में सूजन हो सकती है, जिस में कलाई में दर्द और स्टिफनैस भी होती है, जिस से हाथ हिलाना कठिन हो जाता है, जिसे टेंडिनाइटिस कहते हैं. बारबार उंगली का इस्तेमाल करने से टेंडन डिस्टल पाम के पास चिपक सकती है, जिस से डिसकंफर्ट होने के साथ ही आप का मूवमैंट भी प्रभावित हो सकता है. इसे ट्रिगर फिंगर भी कहते हैं. यह सब दिक्कतें मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल करने से होती हैं.

मोबाइल ऐडिक्शन से ओबेसिटी

मोबाइल ऐडिक्शन से ओबेसिटी हो सकती है क्योंकि यह शारीरिक गतिविधियों को कम करती है, नींद की कमी पैदा करती है और अस्वस्थ खानपान की आदतों को बढ़ावा देती है. लोग घंटों फोन पर बैठे रहते हैं, जिस से बैठने का जीवनशैली बढ़ती है और शारीरिक गतिविधियां जैसे व्यायाम या खेलकूद छूट जाते हैं, जो वजन बढ़ने का एक प्रमुख कारण है.

मोबाइल देखने के चलते हम देर रात तक जागते हैं और इस से नींद की कमी हो जाती है और भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन प्रभावित होते हैं, जिस से हम अनहैल्दी चीजों जैसे चिप्स, नमकीन, बिस्कुट जैसे क्रेविंग बढ़ती है और हमें पता भी नहीं चलता कि हम कितना और कब खा रहे हैं. यह मोटापे का कारण बन सकता है.

Mobile Addiction

Oil or Serum: क्या है आपके खूबसूरत बालों का राज, जानें

Oil or Serum: सभी लड़कियों को लंबे और शाइनी केश पसंद आते हैं, लेकिन आज की भगदौड़ भरी जिंदगी में उन के बढ़ते स्ट्रेस, असंतुलित डाइट, कम नींद आदि ने उन के हेयर ग्रोथ को काफी हद तक प्रभावित किया है. कम उम्र में ही वे गंजेपन का शिकार हो रही हैं. ऐसा देखा गया है कि जिन लड़कियों के पेरैंट्स के हेयर ग्रोथ उम्र हो जाने के बाद भी अच्छे हैं, लेकिन उन की बेटी के हेयर लौस अधिक मात्रा में है, इस की वजह वे असंतुलित लाइफस्टाइल, स्ट्रेस और डाइट को मानती हैं.

इन लड़कियों ने दादीनानी के नुसखों से ले कर आज के महंगे सैलून ट्रीटमैंट्स तक, सबकुछ अपना लिया है, लेकिन हेयर ग्रोथ में फर्क नहीं आया है. कुछ लड़कियों को तो हमेशा इस बात की चिंता रहती है कि केशों के झड़ने की वजह हेयर औयल लगाना है या नहीं, क्योंकि आजकल बाजार में कई प्रकार के हेयर औयल, कंडिशनर, सीरम आदि मिलते हैं, जिसे ले कर वे बहुत कन्फ्यूज्ड रहती हैं. बालों में औयल लगाना कितना सही है या नहीं, इसे ले कर अलगअलग लोगों के अलगअलग मत हैं.

आइए, जानते हैं ऐक्सपर्ट की राय क्या है और हेयर औयल का हेयर ग्रोथ में कितना हाथ होता है.

स्कैल्प का क्लीन होना जरूरी

इस बारें में डर्मेटोलौजिस्ट डा. सोमा सरकार कहती हैं कि आमतौर पर मैं हेयर औयल लगाने से पहले उन के स्कैल्प क्लीन होने चाहिए, डैंड्रफ न हों, जिस में औयल अधिकतर रूट्स पर नहीं आगे के हेयर पर लगाने की सलाह देती हूं.

असल में उंगली के पोरो से औयल मसाज करने पर स्कैल्प का ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है, जिस से फीलगुड फैक्टर काम करता है. इस का हेयर ग्रोथ या हेयर फौल से कोई मतलब नहीं होता. यदि किसी को औयल लगाने की इच्छा होती है, तो औलिव, आलमंड या मस्टर्ड औयल बालों के लिए अच्छा माना जाता है.

किसी प्रकार की कैमिकल युक्त औयल हमेशा ही केशों के लिए नुकसानदायक होता है. बाजार में आजकल कई प्रकार के प्रोडक्ट्स विटामिन और मिनरल युक्त औयल मिलते हैं. ये सब मार्केटिंग गिमिक हैं, जिन में अधिकतर कुछ खास कैमिकल या आयुर्वेदिक दवाओं के मिश्रण से हेयर को हैल्दी बनाने का नुसखा कहा जाता है, जिस का असर हेयर पर नहीं होता.

हेयर क्वालिटी और ग्रोथ अधिकतर जेनेटिक होता है, जो जींस और लाइफस्टाइल पर निर्भर करता है. इस के अलावा कुछ जगहों पर आज हेयरफौल की वजह केशों के साथ कई ऐक्सपेरिमैंट का करते रहना है, मसलन ब्लो ड्राई, कलरिंग, प्रदूषण, असंतुलित भोजन आदि जिम्मेदार हैं.

सप्लिमेंट्स का सहारा

डा. सोमा कहती हैं कि हेयर स्ट्रैंथ के लिए ऐनिमल प्रोटीन, जिस में खासकर एमीनो एसिड होता है, जिस में एग, मछली, चिकन आदि के साथ, ऐंटी औक्सीडैंट मसलन विटामिन सी, सिलेनियम, प्रोटीन, बायोटिन आदि डाइट में होने की आवश्यकता है. अगर आप की डाइट में कुछ कमी हो रही है तो डाक्टर की सलाह से सप्लिमैंट्स भी ले सकती हैं.

कई बार लोग शैंपू करने के बाद बालों में तेल लगा लेते हैं, ऐसा करने से बालों को नुकसान पहुंच सकता है. अकसर लोग यह सोचते हैं कि बालों में लंबे समय तक तेल लगा कर रखने से फायदे मिलते हैं, लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है.  बालों में 40 से 45 मिनट के लिए तेल लगा कर रखें. मसाज के बाद इसे छोड़ दें और 40 मिनट बाद बालों को हलके शैंपू से धो लें. बालों में तेल लगाने के बाद इन्हें गरम पानी से न धोएं.

1 घंटे से ज्यादा समय के लिए बालों में तेल लगा रहने से डैंड्रफ और गंदगी बढ़ने का खतरा रहता है. ऐसा करने से स्कैल्प के छिद्र बंद हो सकते हैं. इस से बालों को कई तरह के नुकसान पहुंच सकते हैं. अगर आप को ऐलर्जी या किसी अन्य तरह की समस्या है, तो बिना डाक्टर की सलाह के बालों की औयलिंग करने से बचना चाहिए.

सीरम कब लगाएं

हेयर सीरम एक सिलिकान बेस्ड लिक्विड प्रोडक्ट होता है. हेयर सीरम बालों की सतह पर कोटिंग करती है. हेयर सीरम बालों की ऊपरी सतह को ही पोषण दे कर मुलायम बनाता है. यह बालों के क्यूटिकल्स तक नहीं जाता. हेयर सीरम का इस्तेमाल करने से बालों की चमक को बढ़ावा मिलता है.

ऐक्सपर्ट के अनुसार, बालों में हेयर सीरम का इस्तेमाल हमेशा औयलिंग, शैंपू और कंडीशनर के बाद किया जाता है. इस के अलावा हेयर सीरम का कम पीएच लेवल बालों के स्ट्रैंड्स को एकसाथ रखता है, जो डैमेज को कम कर सकता है.

इस प्रकार सीरम और हेयर औयल दोनों बालों के लिए फायदेमंद होते हैं. अगर आप के केश ड्राई और डैमेज हैं, तो अपने लाइफस्टाइल में बदलाव करें. हेयर औयलिंग हमेशा बालों को शैंपू से धोने से पहले करनी चाहिए. वहीं, हेयर सीरम का इस्तेमाल शैंपू करने के बाद किया जाता है. जो लोग अकसर अपने बालों की स्टाइलिंग करते हैं, उन के लिए हेयर सीरम ज्यादा बेहतर औप्शन है.

ऐक्सपर्ट की मानें तो सप्ताह में 2 बार हेयर औयल लगाने के बाद शैंपू करना चाहिए. शैंपू के बाद बालों के नमी को सही तरीके से सुखा कर सीरम लगाना चाहिए. ऐसा करने से बालों को सही पोषण मिलता है और बालों का डैमेज कम हो सकता है.

Oil or Serum

Motivational Story: मुक्त- क्या पिंजरे से छूट पाई इंदू

Motivational Story: भारतीय लोक सेवा आयोग की परीक्षा का परिणाम आ गया था. चुने हुए कुल 790 उम्मीदवारों में इंदु का स्थान 140वां था. यह कहना सर्वथा अनुचित नहीं था कि उस की स्वयं की लगन, परिश्रम तथा संघर्ष ने उसे आज का दिन दिखाया था. घर में उत्सव जैसा माहौल था. बधाई देने के लिए मिलने आने वालों का सिलसिला लगा हुआ था. उस का 7 सालों का लंबा मानसिक कारावास आज समाप्त हुआ था. आखिर उस का गुनाह क्या था? कुछ भी नहीं. बिना किसी गलती के दंड भोगा था उस ने. उस की व्यथाकथा की शुरुआत उसी दिन हो गई थी जिस दिन वह विवाहबंधन में बंधी थी.

इंदु के पिता एक सरकारी संस्थान में कार्यरत थे और मां पढ़ीलिखी गृहिणी थीं. उस की एक छोटी बहन थी. दोनों बहनें पटना के एक कौन्वैंट स्कूल में पढ़ती थीं. इंदु शुरू से ही एक विशिष्ट विद्यार्थी थी और मांबाप उसे पढ़ने के लिए सदा प्रोत्साहित करते रहते थे. 10वीं व 12वीं दोनों बोर्ड परीक्षाओं में इंदु मैरिट लिस्ट में आई थी. इस के बाद उसे दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रख्यात कालेज में दाखिला मिल गया था. इधर इंदु अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी, उधर उस के घर में एक अनहोनी हो गई. उस के चाचाजी की 20 साल की बेटी घर छोड़ कर एक पेंटर के साथ भाग गई. उस ने अपना भविष्य तो खराब किया ही, इंदु के जीवन को भी वह स्याह कर गई. सभी रिश्तेदारों के दबाव में आ कर, उस के पिता इंदु के लिए रिश्ते तलाशने लगे. सब को समझाने की सारी कोशिशें व्यर्थ चली गई थीं इंदु की. गलती किसी और की, सजा किसी और को. कितना रोई थी छोटी के गले लग कर इंदु जिस दिन उस की शादी तय हुई थी.

उस के चाचा एक पंडे को बुला लाए जिस ने अनापशनाप गणना कर शादी को आवश्यक बता डाला. चाचा ने अपना दोष छिपाने के लिए उस के घर में जबरन यज्ञहवन करा डाला. एक असाध्य वास्तु के अनुसार सोफे इधर से उधर कर पड़ा दानदक्षिणा बटोर कर चलता बना. आनंद आईआईटी से इंजीनियरिंग कर के एक प्रख्यात कंपनी में काफी ऊंचे पद पर था. उस का परिवार भी उस के समुदाय में काफी समृद्ध तथा प्रतिष्ठित माना जाता था. उस पर भी उन लोगों की तरफ से एक रुपए की भी मांग नहीं रखी गई थी. देखने में तो आनंद साधारण ही था, परंतु वैसे भी हमारे समाज में लड़के की सूरत से ज्यादा उस का बैंक बैलेंस तथा परिवार देखा जाता है. हां, बात अगर लड़की की हो तो, नाक का जरा सा मोटा होना ही शादी टूटने का कारण बन जाता है. आनंद को उस के आगे पढ़ने से कोई एतराज नहीं था. वैसे भी शादी के बाद उन दोनों को दिल्ली में रहना था. उन की सिर्फ एक ही शर्त थी, इंदु नौकरी कभी नहीं करेगी. आनंद और उस के परिवार को एक घरेलू लड़की चाहिए थी.

शादी तय होने से ले कर शादी होने तक इंदु के अश्रु नहीं थमे. अपनी विदाई में तो वह इतना रोई थी कि बरात में मौजूद अजनबी लोगों की भी आंखें भर आईं. सब को लग रहा था, मातापिता से जुदाई का दुख उसे दर्द दे रहा है परंतु सिर्फ इंदु ही जानती थी कि वह रो रही थी अपने सपनों, अपनी उम्मीदों और अपने लक्ष्य की मृत्यु पर. विवाह कर के इंदु भौतिक सुखसुविधाओं से भरे हुए ससुराल में आ गई थी. संसार की नजरों में उस के जैसा सुखी कोई नहीं था. उस ने दोबारा कालेज जाना भी शुरू कर दिया था. परंतु तब की इंदु और अब की इंदु में एक बहुत बड़ा अंतर आ गया था और वह अंतर था लक्ष्य का. लक्ष्यविहीन शिक्षा का कोई औचित्य नहीं होता, लक्ष्य कुछ भी हो सकता है, परंतु उस का होना आवश्यक है.

उस का वैवाहिक जीवन बाह्यरूप में तो सुखद ही लगता था परंतु शयनकक्ष के अंदर अगर कुछ था तो वह था बलात्कार, अतृप्ति तथा अपमान. हर रात आनंद स्वयं से लड़ते हुए उस के साथ जो कुछ करने की कोशिश करता, उस में कभीकभी ही सफल हो पाता. परंतु हर रात की इस प्रताड़ना से इंदु को गुजरना पड़ता था. कभीकभी तो कुछ न कर पाने का क्षोभ वह इंदु पर हाथ उठा कर निकालता था. इंदु की इच्छाओं, उस के सुख, उस की मरजी से आनंद को कभी कोई मतलब नहीं रहा. साल में कईकई महीने आनंद घर से बाहर रहता. इंदु के पूछने पर उसे झिड़क देता था.

इस बारे में इंदु ने पहले अपनी सास तथा बाद में अपनी मां से भी बात की. परंतु दोनों ने ही आनंद का पक्ष लिया. उन का कहना था आनंद काम से ही तो बाहर जाता है, फिर इस में क्या परेशानी? दोनों की सलाह थी कि अब उन दोनों को अपना परिवार आगे बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए. एक शिशु मातापिता की बीच की कड़ी को और मजबूत करता है. बच्चे के बाद आनंद का बाहर जाना भी कम हो जाएगा. कैसे बताती इंदु उन्हें कि एक बच्चे के जन्म के लिए पतिपत्नी के बीच सैक्स होना भी जरूरी होता है. परंतु आनंद और इंदु के बीच जो होता था, वह सैक्स तो कदापि नहीं था. पूरी रात उस के शयनकक्ष का एसी चलता, परंतु अपमान, क्षोभ तथा अतृप्ति की आग को तो वह ठंडा नहीं कर पाता था. मुख पर मर्यादा के ताले को लगा कर, जीवन के 3 साल निकाल दिए थे इंदु ने. कुछ नहीं बदला था सिवा इस के कि उस की पढ़ाई पूरी हो गई थी. और फिर वह दिन आया जब आनंद का एक सच उस के सामने आया था.

उन दोनों की शादी की चौथी वर्षगांठ थी. आनंद औफिस के काम से पुणे गया था. इंदु की एक कालेज मित्र ने उस के साथ शौपिंग का प्लान बनाया था. इंदु ने भी सोचा वह आनंद के लिए कुछ खरीद लेगी. सहेली के घर जाते समय इंदु की नजर एक बड़े अपार्टमैंट के बाहर फोन पर बात करते हुए एक आदमी पर पड़ी. वह चौंक गई, क्योंकि वह आदमी और कोई नहीं, आनंद था. आनंद वहां क्या कर रहा था? इंदु समझ नहीं पा रही थी. गाड़ी लालबत्ती पर रुकी हुई थी. इंदु ने ड्राइवर को गाड़ी आगे लगाने का निर्देश दिया और स्वयं आनंद के पीछे भागी. आनंद तब तक बिल्ंिडग के अंदर जा चुका था.

अपनेआप को संयत कर के इंदु आगे बढ़ी. आनंद का नाम बताने पर वाचमैन ने उस के फ्लैट का नंबर इंदु को बता दिया. अभी इंदु कौरिडोर में पहुंची ही थी कि उस ने आनंद को किसी लड़के के साथ खड़ा पाया. इंदु ने सोचा आनंद का कोई मित्र होगा. परंतु अगले ही पल जो हुआ वह उस की कल्पना से परे था. आनंद और वह लड़का अचानक ही एकदूसरे को बेतहाशा वहीं पर चूमने लगे थे. शायद, उन्हें वहां उस समय किसी के होने की उम्मीद नहीं थी. इंदु के मानसपटल पर उस के अपने शयनकक्ष की तसवीर आ गई. आनंद की बेचैनी, उस की कमजोरी, उस का साल में कईकई महीने बाहर रहने का कारण उस की समझ में आ गया था. अपनेआप को संभाल नहीं पाई थी इंदु, लड़खड़ा कर गिर पड़ी. इंदु जब होश में आई, अपनेआप को एक अपरिचित कमरे में पाया. अभी वह अपनेआप को संभाल रही थी कि सामने से वह लड़का आता दिखाई दिया.

‘अब कैसी तबीयत है आप की?’

‘ठ…ठ…ठीक हूं, बस, सिर थोड़ा सा भारी है. मेरे पति कहां हैं?’ अभी वह उस लड़के से बात करने के मूड में बिलकुल नहीं थी.

‘सिर तो भारी होगा ही, चोट जो लगी है. अच्छीखासी भीड़ इकट्ठी कर ली थी आप ने तो. वह तो मैं ने बात संभाल ली.’

‘अच्छा, क्या बताया आप ने लोगों को?’

‘यही कि आप मेरी कजिन हैं. अब यह तो बता नहीं सकता कि आप मेरी सौतन हैं. हा…हा…हा…’ उस की बेहयाई पर इंदु ठगी सी रह गई, परंतु अपने पर काबू रख कर उस ने जवाब दिया, ‘‘जी, बिलकुल, सच बता देना चाहिए था आप को…’’ ‘अच्छा, सच बता देना चाहिए था,’ उसी वक्त चीखते हुए आनंद कमरे में दाखिल हुआ. कितना बेशर्म तथा संगदिल था वह इंसान. अभी भी उस की नजरों में लेशमात्र भी पछतावा नहीं था.

‘आनंद शांत हो जाओ, इंदु आज के जमाने की लड़की है, मुझे यकीन है वह हमें समझेगी. समझोगी न इंदु?’ ‘मिस्टर सौतन, आप बिलकुल सही कह रहे हैं, मैं समझती हूं. परंतु आप को नहीं लगता कि इसे मैं ज्यादा अच्छे से समझ पाती अगर मुझ से खुल कर बात की जाती.’

‘मिस्टर सौतन…’

‘मेरा नाम राजीव है.’

‘हां तो राजीव, आप को पता है आप की गलती क्या है?’

‘यही कि हम गे…’

‘नहीं, आप क्या हैं उस में आप का बस नहीं है, इसलिए वह आप की गलती हो ही नहीं सकती,’ राजीव को बीच में ही रोक कर इंदु बोली.

‘तो फिर?’ इस बार आनंद बोला था. ‘मुझ से शादी क्यों की? मेरी जिंदगी बरबाद क्यों की? यह आप की गलती है आनंद. और राजीव आप की गलती यह है कि आप ने इन्हें नहीं रोका.’ ‘मैं ने समाज के लिए तुम से शादी की. मुझे घर संभालने के लिए एक बीवी तो चाहिए थी. और फिर तुम्हें क्या कमी थी? सोना, हीरा, लेटेस्ट गैजेट, महंगे कपड़े… और क्या चाहिए था तुम्हें?’

‘अच्छा, तो फिर आप को दिखावे के लिए एक पत्नी चाहिए थी, तो फिर हर रात मुझ पर वह जुल्म क्यों किया जो आप करना ही नहीं चाहते थे या कर नहीं सकते थे?’ ‘तुम्हें क्या लगता है, वह सब मैं अपनी मरजी से करता था? तुम से कहीं ज्यादा मुझे तकलीफ होती थी. पर मां खानदान का वारिस चाहती थीं. उन्होंने मुझ से वादा किया था कि उस के बाद मुझे अपनी जिंदगी अपनी मरजी से जीने की आजादी होगी.’

‘म…म…म…म…मम्मीजी को पता था?’ ‘जी हां, वरना तुम जैसे कंगालों से रिश्ता कौन करता. मम्मी को तुम गऊ जैसी सीधी लगी थी. तुम्हारे बाप की औकात भी है हमारे सामने खड़े होने की. चलो, अच्छा ही है तुम्हें पता चल गया. जाओ, अब घर जाओ.’ ‘सही पहचाना आप की मां ने, मैं गऊ हूं. परंतु वे मेरे सिर के ऊपर की सींगों को देखना भूल गईं,’ अपमान की आग मैं झुलसती हुई इंदु ने कहा.

‘अच्छा, क्या करेगी तू, जरा मैं भी तो सुनूं?’

‘मैं सब को तुम्हारी और तुम्हारे खानदान की असलियत बता दूंगी. तुम सब इंसान के भेष में छिपे भेडि़ए हो. मैं जा रही हूं. हमारी अगली मीटिंग कोर्ट में होगी.’ ‘अच्छा, यह बात है. राजीव, देख, मैं ने कहा था न, यह ऐसे नहीं मानेगी. चल आ जा, चढ़ जा इस के ऊपर.’ उन दोनों ने इस की तैयारी शायद तभी कर ली थी जब इंदु बेहोश पड़ी थी. इंदु मुसीबत में फंस चुकी थी, उसे थोड़ा होशियार रहना चाहिए था. परंतु आनंद इतना नीचे गिर जाएगा, इस की कल्पना उस ने नहीं की थी. राजीव ने इंदु को बिस्तर पर गिरा दिया था और उस के कपड़े उतारने की कोशिश कर रहा था. यह सबकुछ आनंद अपने वीडियो में रिकौर्ड कर रहा था.

‘अरे राजीव, उतर नहीं रहा तो फाड़ दे, फिर इस का वीडियो बनाएंगे. हमें धमकी दे रही थी. इस के बाद यह वही करेगी जो हम कहेंगे. वरना यह वीडियो…’ तभी दरवाजे की घंटी जोर से बजी, रुकरुक कर काफी बार बजी. राजीव और आनंद दोनों चौंक पड़े. इस बात का फायदा उठा कर, इंदु ने राजीव को वहां किक मारी जहां उसे सब से ज्यादा दर्द होता. फिर जोरजोर से शोर करते हुए दौड़ी. आनंद ने लपक कर उस का मुंह बंद किया और उस का सिर दीवार पर जोर से दे मारा. परंतु तब तक उस की आवाज बाहर जा चुकी थी. लोगों ने दरवाजा तोड़ दिया था. स्थानीय लोगों ने पुलिस को भी बुला लिया था. दरवाजा तोड़ने पर उस के अस्तव्यस्त कपड़ों को देख कर लोगों को सारा माजरा समझते देर न लगी थी. गनीमत यह हुई थी कि पुलिस की पैट्रोलिंग टीम पास में ही थी. इसलिए पुलिस को भी आने में ज्यादा समय नहीं लगा था.

अस्पताल में इंदु से मिलने उस के कालेज के कई मित्र आए थे. उन्होंने ही उस के मम्मीपापा को फोन किया था. मम्मीपापा शाम तक आ गए थे. पापा बारबार स्वयं को दोष दे रहे थे. इंदु की यंत्रणाओं का दौर यहीं खत्म नहीं हुआ था. जब उस ने आनंद

को तलाक देने का निर्णय लिया, मम्मीपापा के अलावा सभी रिश्तेदारों ने उस का जम कर विरोध किया. उन का तर्क था कि इस के बाद खानदान की बाकी लड़कियों का क्या होगा, छोटी का क्या होगा. कौन करेगा उस से शादी? आनंद के परिवार वाले बड़े लोग हैं, वे तो साफ निकल जाएंगे. भुगतना तो इंदु को ही और उस के परिवार को पड़ेगा. परंतु इस बार इंदु के साथ उस की ढाल बन कर उस के पापा खड़े थे. आनंद की मां ने भी कई चक्कर काटे. उन का कहना था कि आनंद निर्दोष था. सारा दोष राजीव का था. परंतु जब इंदु इतने पर भी नहीं मानी, तब शुरू हुआ उस के चरित्र पर दाग लगाने का दौर. उस की ससुराल वालों ने कहना शुरू किया कि उस का और राजीव का अनैतिक संबंध था. जिस का पता आनंद को चल गया था. इंदु और उस के परिवार वालों का घर से निकलना मुश्किल हो गया था. परंतु इंदु नहीं हारी, लड़ती रही और आखिरकार कोर्ट ने उस के हक में फैसला सुना दिया था. उसे तलाक मिल गया.

तलाक के बाद जीवन सरल होने की जगह और कठिन हो गया था. उसे हर दिन पुरुषों की लोलुप नजरों, महिलाओं की शक्की नजरों तथा रिश्तेदारों की तिरछी नजरों का सामना करना पड़ता था. अपनी मां की सलाह पर इंदु ने प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का निर्णय लिया. उस ने अपनेआप को एक कमरे में सीमित कर लिया और लग गई परीक्षा की तैयारी में. लोगों की छींटाकशी उस तक पहुंच ही नहीं पाती थी. थोड़ीबहुत छींटाकशी उस तक पहुंचती भी थी तो इंदु उन्हें हंस कर टाल देती. बहुत अधिक कष्ट झेल लेने पर, इंसान को पीड़ा का एहसास भी कम हो जाता है, वही इंदु के साथ हो रहा था. 2 सालों के अथक परिश्रम के बाद, अपने दूसरे ही प्रयास में इंदु का चयन हो गया था. आज उस ने अपना आत्मसम्मान तथा अपनी आजादी दोनों पा लिए थे.

‘‘इंदु, बाहर आ जा बेटा.’’

‘‘दीदी, क्या कर रही हो?’’

मां और छोटी की आवाज से इंदु वर्तमान में लौट आई थी. बाहर रिश्तेदारों तथा जानने वालों की फौज बैठी हुई थी. भविष्य में कुछ पाने की आशा ले कर, कई गुमनाम रिश्तेदार ऐसे प्रकट हो रहे थे जैसे थोड़े से शहद को देख कर चीटियां न जाने कहां से प्रकट हो जाती हैं. ‘‘भाईसाहब, अब तो इंदु के लिए अच्छे रिश्तों की कमी न होगी,’’ कोई कह रहा था पापा से.

बात घूमफिर कर वहीं आ गई थी… शादी, जैसे स्त्रीजीवन का एकमात्र लक्ष्य तथा उस की पूर्णता शादी में ही है. ‘‘बेटा, पंडितजी आ गए हैं.’’ तभी चाचा टपके, ‘‘इन्हीं की कृपा से सबकुछ हुआ है.’’

‘‘जी नहीं चाचा. इन की कृपा से तो मेरे 7 साल खराब हुए हैं. मैं ने जो दुख झेले हैं उन्हें मैं ही जानती हूं.’’ उस की वकील भी आई. उन्हें गले लगा कर वह बोली,

‘‘सोने के पिंजरे से निकला पक्षी सामने उस के अनंत आकाश था पड़ा जंजीर का टुकड़ा अभी भी पैरों में था उस के पिंजरे का दरवाजा भी था खुला पलट कर न देखा उस ने दोबारा झटक कर उस टुकड़े को भी तोड़ दिया मुक्त होना क्या होता है अब उस ने था जान लिया.

Motivational Story

Fictional Story: पिया बावरा- उस धुंधली छाया में बस एक छवि अटकी थी

Fictional Story: घंटी बजते ही दरवाजे खोल दिए गए थे. डा. सुभाष गर्ग चुपचाप बाहर निकल गए. सब की तरह उन के हाथों में भी फावड़ाटोकरी थमा दिए गए थे.

सुभाष ने हैरत से अपने हाथों को देखा कि जिन में कल तक सिरिंज और आपरेशन के पतले नाजुक औजार होते थे अब उन में फावड़ा और कुदाल थमा दी गई.

‘‘क्यों डाक्टर, उठा तो पा रहे हो न?’’ एक कैदी ने मसखरी की, ‘‘अब यहां कोई नर्स तो मिलेगी नहीं जो अपने नाजुकनाजुक हाथों से आप को कैंचीछुरी थमाएगी.’’

सभी कैदियों को एक बड़ी चट्टान पर पहुंचा दिया गया और कहा गया कि यहां की चट्टानों को तोड़ना शुरू करो.

यह सुन कर सुभाष के पूरे शरीर में सिहरन सी दौड़ गई थी.

‘यह क्या हो गया मुझ से. कुछ भी बुरा करते समय आखिर ऐसे अंजाम के बारे में हम क्यों नहीं सोच पाते हैं?’ सुभाष मन ही मन अपने उस अतीत के लिए तड़प उठे जिस की वजह से आज वे जेल की सजा काट रहे हैं और अब कुछ हो भी नहीं सकता था. इतनी भारी कुदाल उठा कर पत्थर तोड़ना आसान नहीं था. डा. सुभाष गर्ग बहुत जल्दी थक गए. पहले पत्थर तोड़ना फिर उन्हें फावड़े की मदद से तसले में डालना. कुदाल की चार चोटों में ही उन की सांस फूल गई थी. काम रोक कर वहीं पत्थर पर बैठ कर वे सुस्ताने लगे. हीरालाल ने दूर से देखा और अपना काम रोक कर वहीं आ गया.

‘‘थक गए, डाक्टर?’’

सुभाष चुप रहे.

हीरालाल ने पूछा, ‘‘क्यों मारा था पत्नी को?’’

‘‘मैं ने नहीं मारा.’’

‘‘तो मरवाया होगा?’’ हीरालाल ने व्यंग्य से कहा.

डाक्टर चुप रहे.

‘‘बहुत सुंदर होगी वह जिस के लिए तुम ने पत्नी को मरवाया?’’ हीरा शरारत से बोला.

तभी एक सिपाही का कड़कदार स्वर गूंज उठा, ‘‘क्या हो रहा है. एक दिन आए हुआ नहीं कि कामचोरी शुरू हो गई,’’ और दोनों पर एकएक बेंत बरसा कर तुरंत काम करने का आदेश दिया.

बेंत लगते ही दर्द से तड़प उठे डाक्टर. अपनी हैसियत और हालात पर सोच कर उन की आंखें भर आईं. चुपचाप डाक्टर ने कुदाल उठा ली और काम में जुट गए.

जैसेतैसे शाम हुई. सभी कैदी अपनीअपनी कोठरी में पहुंचा दिए गए.

अपनी कोठरी में लेटेलेटे डा. सुभाष बारबार आंखें झपकाने की कोशिश कर रहे थे पर गंदी सीलन भरी जगह और नीची छत देख कर लग रहा था जैसे वह अभी सिर पर टपकने ही वाली है. 2 दिन पहले एक रिपोर्टर उन का इंटरव्यू लेने आई थी. उस ने प्रश्न किया था :

‘अपने प्यार को पाने के लिए क्या पत्नी का कत्ल जरूरी था? आप तलाक भी तो ले सकते थे?’

डाक्टर की यादों के मलबे में जाने कितने कांच और पत्थर दबे हुए थे. रात भर खयालों की हथेलियां उन पत्थरों और कांच के टुकड़ों को उन के जज्बातों पर फेंकती रहती हैं. काश, वे उत्तर दे पाते कि इतने बड़ेबड़े बच्चों की मां और अमीर बाप की उस बेटी को तलाक देना कितना कठिन था.

सुभाष गर्ग जिस साल डाक्टरी की डिगरी ले कर घर पहुंचे थे उसी साल 6 माह के भीतर ही वीणा पत्नी बन कर उन के जीवन में आ गई थी.

वीणा बहुत सुंदर तो नहीं पर आकर्षक जरूर थी. बड़े बाप की इकलौती संतान थी वह. उस के पिता ने सुभाष के लिए नर्सिंग होम बनवाने का केवल वादा ही नहीं किया, बल्कि टीके की रस्म होते ही वह हकीकत में बनने भी लगा था.

मातापिता बहत गद्गद थे. सुभाष भी नए जीवन के रोमांचक पलों को भरपूर सहेज रहे थे. जैसेजैसे डा. सुभाष अपने नर्सिंग होम में व्यस्त होने लगे और वीणा अपने बच्चों में तो पतिपत्नी के बीच की मधुरता धूमिल हो चली.

वीणा के तेवर बदले तो मुंह से अब कर्कश स्वर निकलने लगे. उसे हर पल याद रहने लगा कि वह एक अमीर पिता की संतान है और वारिस भी. इसलिए घर में उस की पूछ कुछ अधिक होनी चाहिए. इसीलिए उस की शिकायतें भी बढ़ने लगीं. सुभाष जैसेजैसे पत्नी वीणा से दूर हो रहे वैसेवैसे वे नर्सिंग होम और अपने मरीजों में खोते जा रहे थे. जीवन में तनिक भी मिठास नहीं बची थी. दवाओं की गंध में फूलों से प्यारे जीवन के क्षण खो गए थे. याद करतेकरते जाने कब डा. सुभाष को नींद ने आ घेरा.

खाने की थाली ले कर जब डा. सुभाष कैदियों की लाइन में लगते तो अपने नर्सिंग होम पर लगी मरीजों की लाइन उन्हें याद आने लगती. वह लाइन शहर में उन की लोकप्रियता का एहसास कराती थी जबकि यह लाइन किसी भिखारी का एहसास दिलाती है. डा. सुभाष को उस पत्रकार महिला का प्रश्न याद आ गया, ‘क्या सचमुच समस्या इतनी बड़ी थी, क्या और कोई राह नहीं थी?’

खाना खाते समय लगभग वे रोते रहते. अपने घर की वह शानदार डाइनिंग टेबल उन्हें याद आने लगती. बस, वही तो कुछ पल थे जिस में पूरा परिवार एकसाथ बैठ कर खाना खाता था. हालांकि यह नियम भी वीणा ने ही बनाया था.

वीणा का नाम व चेहरा दिमाग में आते ही डा. सुभाष फिर पुरानी यादों में खो से गए.

उस साल बड़ा बेटा पुनीत इंजीनियरिंग पढ़ने आई.आई.टी. रुड़की गया था और छोटा भी मेडिकल के लिए चुन लिया गया था. इधर नर्सिंग होम में पहले से और अधिक काम बढ़ गया तो डा. सुभाष दोपहर में घर कम आने लगे. रोज की तरह उस दिन भी घर से उन का टिफिन नर्सिंग होम आ गया था और उन के सामने प्लेट रख कर चपरासी ने सलाद निकाला था. तभी तीव्र सुगंध का झोंका लिए 30 वर्ष की एक युवती ने कमरे में प्रवेश किया.

‘सौरी सर, आप को डिस्टर्ब किया.’

डा. सुभाष ने गर्दन उठाई तो आंखें खुली की खुली रह गईं. मन में खयाल आया कि इतना सौंदर्य कहां से मिल जाता है किसीकिसी को.

‘सर, मैं डा. सुहानी, मुझे आप के पास डा. रावत ने भेजा है कि तुरंत आप से मिलूं.’

एक सांस में बोल कर युवती अपना पसीना पोंछने लगी.

सुभाष मुसकरा दिए.

‘आइए, बैठिए.’

‘नो सर. आप कहें तो मैं थोड़ी देर में आती हूं.’

‘नर्वस क्यों हो रही हैं डाक्टर, आप बैठिए,’ सुभाष ने खड़े हो कर सामने वाली कुरसी की ओर संकेत किया.

सुहानी डरती हुई कुरसी पर बैठ गई. डा. सुभाष ने चपरासी को इशारा किया तो उस ने दूसरी प्लेट सुहानी की तरफ रख दी.

‘नो सर, मैं दोपहर में पूरा खाना नहीं खाती हूं.’

‘आप सलाद लीजिए.’

उन के इतने अनुरोध की मर्यादा रखते हुए सुहानी ने थोड़ा सा सलाद अपनी प्लेट में रख लिया.

डा. सुभाष उस के सौंदर्य को देखते हुए मुसकरा कर बोले, ‘आज मेरी समझ में आया है कि कैसे लड़कियां केवल सलाद खा कर सुंदरता बनाए रखती हैं.’

सुहानी ने संकोच से देखा और बोली, ‘ओके, डाक्टर.’

डा. सुभाष ने कांटे में पनीर का एक टुकड़ा फंसा कर मुख में रख लिया और बोले, ‘आप यहां मेरी सहायक के रूप में काम करेंगी. अभी थोड़ी देर में सुंदर आप को केबिन दिखा देगा.’

उस दिन के बाद डा. सुभाष का हर दिन सुहाना होता गया. सुहानी केवल सौंदर्य की ही नहीं, मन की भी सुंदरी थी. उस के मीठे बोल डा. सुभाष में स्फूर्ति भर देते. यह काम की नजदीकियां कब प्यार में बदल गईं, दोनों को पता ही नहीं चला.

तब घर का पूरा उत्तरदायित्व वे अच्छी तरह पूरा कर रहे थे. पर पहले की तरह अब घर पर दुखी भी होते तो सुहानी की यादें उन की आंखों में घुलीमिली रहतीं.

उन दिनों वीणा कुछ अधिक ही चिड़चिड़ी होती जा रही थी. शायद इस की वजह यह थी कि बच्चों के जाने के बाद सुभाष भी उस से दूर हो गए थे और बढ़ती दूरी के चलते उस को अपने पति सुभाष पर शक हो गया था. एक रात वीणा ने पूछ ही लिया, ‘आजकल कुछ ज्यादा ही महकने लगे हो, क्या बात है?’

डा. सुभाष चौंक पड़े, ‘ये क्या बेसिरपैर की बातें कर रही हो. अब उम्र महकने की तो रही नहीं. मेरी तकदीर में तो आयोडीन और…’

‘बसबस. आदमियों की उम्र महकने के लिए हमेशा 16 की होती है.’

‘देखो वीणा, रातदिन दवाओं की खुशबू सूंघतेसूंघते जी खराब होने लगता है तो कभीकभार सेंट छिड़क लेता हूं. बहुत संभव है कि कभी ज्यादा सेंट छिड़क लिया होगा,’ सुभाष ने सफाई दी, लेकिन धीरेधीरे वीणा की शिकायतों और डा. सुभाष की सफाइयों का सिलसिला बढ़ गया.

नर्सिंग होम में वीणा के बहुत सारे अपने आदमी भी थे जो तरहतरह की रिपोर्ट देते रहते थे.

‘तुम्हारे इतने बड़ेबड़े बच्चे हो गए हैं. कल को उन की शादी होगी. बुढ़ापे में इश्क फरमाते कुछ तो शर्म करो,’ वीणा क्रोध में उन्हें सुनाती.

सुभाष ने उन दिनों चुप रहने की ठान ली थी. इसीलिए वीणा का पारा अधिक गरम होता जा रहा था.

रोजरोज की चिकचिक से तंग आ कर आखिर एक दिन सुभाष के मुख से निकल ही गया कि हां, मैं सुहानी से प्यार करता हूं और उस से शादी भी करना चाहता हूं.

डा. सुभाष को जेल की यातना सहते महीनों बीत चुके थे, लेकिन घर से मिलने कोई नहीं आया था. वे बच्चे भी नहीं जो उन के ही अंश हैं और जिन को उन्होंने अपना नाम दिया है. ऐसा नहीं कि बच्चे उन्हें प्यार नहीं करते थे पर मां तो मां ही होती है. मां की हत्या ने उन्हें बच्चों की नजरों में एक अपराधी, मां का हत्यारा साबित कर दिया था, पर क्या इस हादसे के लिए वे अकेले ही उत्तरदायी हैं?

बच्चे क्या जानें कि वीणा सुहानी को ले कर कितनी हिंसक हो उठी थी. एक दिन गुस्से में  उस ने कहा भी था, ‘आप अगर सोचते हैं कि मैं आप से तलाक ले लूंगी और आप मजे से उस से शादी कर लेंगे तो मैं आप को याद दिला दूं कि मैं उस बाप की बेटी हूं जो अपनी जिद के लिए कुछ भी कर सकती है. मेरे एक इशारे पर आप की वह प्रेमिका कहां गायब हो जाएगी पता भी नहीं चलेगा.’

वीणा की धमकियां जैसेजैसे बढ़ रही थीं वैसेवैसे सुभाष की घबराहट भी बढ़ रही थी…वे अच्छी तरह जानते थे कि इस आयु में बड़ेबड़े बच्चों के सामने पत्नी को तलाक देना या दूसरा विवाह करना उन के लिए सरल न होगा. पर सुहानी को वीणा सताए यह भी उन्हें स्वीकार नहीं था. इसलिए ही उन्होंने सुहानी से कहा था कि वह जितनी जल्दी हो सके यहां से लंबे समय के लिए कहीं दूर चली जाए.

अगले दिन सुहानी को नर्सिंग होम में न देख कर वीणा बोली थी, ‘उसे भगा दिया न. क्या मैं उसे खोज नहीं सकती. पाताल से भी खोज कर उसे अपनी राह से हटाऊंगी. तुम समझते क्या हो अपनेआप को.’

‘इतनी नफरत किस काम की,’ गुस्से से डा. सुभाष ने कहा था, ‘क्या इस उम्र में मैं दूसरी शादी कर सकता हूं.’

‘प्यार तो कर रहे हो इस उम्र में.’

‘नहीं, किसी ने गलत खबर दी है.’

‘किसी ने गलत खबर नहीं दी,’ वीणा फुफकारती हुई बोली, ‘मैं ने स्वयं आप का पीछा कर के अपनी आंखों से आप दोनों को एकदूसरे की बांहों में सिमटते देखा है.’

डा. सुभाष स्तब्ध थे, कितनी तेज है यह औरत. घबरा कर कहा, ‘अपने बच्चों को भी तो हम किसी अच्छी बात पर प्यार कर लेते हैं.’

‘शर्म नहीं आती तुम को इतना झूठ बोलते हुए,’ वीणा के अंदर का झंझावात बुरी तरह उफन रहा था.

उस दिन पत्थर तोड़ते हुए हीरा ने कहा, ‘‘डाक्टर आप चाहते तो बच सकते थे. आप ने बीवी की कार का पीछा क्यों किया. अच्छेभले नर्सिंग होम में बैठे रहते तो बच जाते.’’

‘‘मैं बहुत डरा हुआ था, क्योंकि वीणा के पिता के आदमी उस की सुरक्षा में लगे हुए थे. शायद हत्या की सुपारी लेने वाला अपना काम न कर पाता,’’ हीरालाल की सहानुभूति पा कर डा. सुभाष ने भी बोल दिया.

‘‘उस के आदमी चारों तरफ सुरक्षा में फैले रहते हैं. तभी तो आप आसानी से अंदर हैं.’’

शायद हीरालाल ठीक कह रहा था, वे क्या करते, जो कुछ भी हुआ वह सोचीसमझी योजना का हिस्सा नहीं था. वह सबकुछ केवल सुहानी को बचाने की जिद से हो गया. शायद उन से बचकानी हरकत हो गई. इतनी बड़ी बात को गंभीरता से नहीं लिया और नतीजे के बारे में भी नहीं सोचा था.

उन्हें लगा कि वीणा सुहानी के घर की तरफ ही जा रही है और बिना समय गंवाए उन्होंने वीणा पर गोली चला दी. सुहानी तो बच गई मगर वीणा के पिता का कुछ भरोसा नहीं. केवल उन्हें सलाखों के पीछे भेज कर वे संतुष्ट होने वाले नहीं हैं. सुभाष के जीवन से तो सबकुछ छिन गया, पत्नी भी और प्रेमिका भी.

वह 15 अगस्त का दिन था. सभी कैदियों को सुबह झंडा फहराते समय राष्ट्रगान गाना था. फिर सब को बूंदी के लड्डू दिए गए थे. सुभाष अपना लड्डू खाने का प्रयत्न कर ही रहे थे कि हीरालाल ने जल्दी से आ कर उन के कान से मुख सटा दिया और कहा, ‘‘अभीअभी इंस्पेक्टर के कमरे से सुन कर आया हूं, कह रहे थे कि डाक्टर की प्रेमिका का पता चल गया है. बहुत जल्द उसे भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा.’’

‘‘क्या?’’ उन के हाथ से लड्डू छिटक गया. हीरालाल ने झट से लड्डू उठा लिया और बोला, ‘‘डाक्टर, मुझे पता है कि अब तुम इस लड्डू को नहीं खाओेगे. डाक्टर हो न, जमीन पर गिरा लड्डू कैसे खा सकते हो.’’

उस ने वह लड्डू भी खा लिया.

सुभाष बहुत व्याकुल हो उठे थे. वे समझ गए थे कि यह सब वीणा के पिता ने ही करवाया है. उन की आंखों से आंसू बहने लगे.

हीरा ने कहा, ‘‘यह क्या, डाक्टर साहब. आप इतने कमजोर दिल के हैं, फिर भला दूसरों के दिल का आपरेशन कैसे करते थे?’’

डाक्टर ने अपने आंसू पोंछे और कहा, ‘‘हीरा, सब को अपने अंत का पता होता है, फिर भी हम जैसों से इतनी भूल कैसे हो जाती है.’’

‘‘आप शरीफ इनसान हैं इसलिए सबकुछ शराफत के दायरे में करने की कोशिश की. काश, आप भी शातिर खिलाड़ी होते तो आज पकड़ा कोई और जाता और आप अपनी सुहानी के साथ हनीमून मना रहे होते.’’

सुभाष ने चौंक कर हीरालाल को देखा और बोले, ‘‘क्या कह रहे हो?’’

‘‘ठीक कह रहा हूं, डाक्टर. आज मैं जिस कत्ल की सजा भोग रहा हूं उस व्यक्ति को मैं ने कभी देखा ही नहीं. उस का हत्यारा बहुत शातिर और धनवान था. मुझे उलझा कर खुद मजे से घूम रहा है.’’

डाक्टर ठगे से खड़े रह गए.

‘‘डाक्टर, सच यह है कि इतने वर्षों में इस जेल के अंदर रह कर मैं ने दांवपेंच सीख लिए हैं. एक बार यहां से भागने का अवसर मिला तो उस शातिर की हत्या कर के सचमुच का हत्यारा बन जाऊंगा.’’

डा. सुभाष अपनी सोच में डूबे हुए थे, धीरे से बुदबुदाए, ‘इस से तो अच्छा था कि मुझे फांसी हो जाती.’’

इतना कहने के साथ ही उन्होंने कस कर अपनी छाती को दबाया और कराह उठे. उन का हृदय दर्द से तड़प रहा था.

‘‘डाक्टर,’’ हीरा चिल्ला उठा.

डाक्टर धीरेधीरे धरती पर गिर कर तड़पने लगे. हलचल मचते ही कई अधिकारी वहां आ गए थे. डाक्टर को स्ट्रेचर पर लिटाया गया और सिपाही चल पड़े. हीरा भाग कर वहां पहुंचा और झुक कर डाक्टर के कान में कहने की चेष्टा की कि वहां से भाग जाना पर सुभाष बेसुध हो चुके थे.

हीरा मन मसोस कर उन्हें जाता देखता रहा. सुभाष की बंद आंखों के सामने बहुत से चेहरे घूम रहे थे.

‘तुम पागल हो गए हो उस बेटी समान लड़की के लिए,’ वीणा के पुराने स्वर डाक्टर को नीमबेहोशी में सुनाई दे रहे थे. फिर सबकुछ डूबने लगा. आवाज, सांस और धुंधलाती सी पुरानी यादें. उस धुंधली छाया में बस एक छवि अटकी थी सुहानी…सुहानी.

Fictional Story

Short Story: विटामिन-पी- संजना ने कैसे किया अस्वस्थ ससुरजी को ठीक

Short Story: संजना टेबल पर खाना लगा रही थी. आज विशेष व्यंजन बनाए गए थे, ननदरानी मिथिलेश जो आई थी.

‘‘पापा, ले आओ अपनी कटोरी, खाना लग रहा है,’’ मिथिलेश ने अरुणजी से कहा.

‘‘दीदी, पापा अब कटोरी नहीं, कटोरा खाते हैं. खाने से पहले कटोरा भर कर सलाद और खाने के बाद कटोरा भर फ्रूट्स,’’ संजना मुसकराती हुई बोली.

‘‘अरे, यह चमत्कार कैसे हुआ? पापा की उस कटोरी में खूब सारे टैबलेट्स, विटामिन, प्रोटीन, आयरन, कैल्सियम होता था… कहां, कैसे, गायब हो गए?’’ मिथिलेश ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘बेटा यह चमत्कार संजना बिटिया का है,’’ कहते हुए वे पिछले दिनों में खो गए…

नईनवेली संजना ब्याह कर आई, ऐसे घर में जहां कोई स्त्री न थी. सासूमां का देहांत हो चुका था और ननद का ब्याह. घर में पति और ससुरजी, बस 2 ही प्राणी थे. ससुरजी वैसे ही कम बोलते थे और रिटायरमैंट के बाद तो बस अपनी किताबों में ही सिमट कर रह गए थे.

संजना देखती कि वे रोज खाना खाने से पहले दोनों समय एक कटोरी में खूब सारे टैबलेट्स निकाल लाते. पहले उन्हें खाते फिर अनमने से एकाध रोटी खा कर उठ जाते. रात को भी स्लीपिंग पिल्स खा कर सोते. एक दिन उस ने ससुरजी से पूछ ही लिया, ‘‘पापाजी, आप ये इतने सारे टेबलेट्स क्यों खाते हैं.’’

‘‘बेटा, अब तो जीवन इन पर ही निर्भर है, शरीर में शक्ति और रात की नींद इन के बिना अब संभव नहीं.’’

‘‘उफ पापाजी, आप ने खुद को इन का आदी बना लिया है. कल से आप मेरे हिसाब से चलेंगे. आप को प्रोटीन, विटामिन, आयरन, कैल्सियम सब मिलेगा और रात को नींद भी जम कर आएगी.’’

अगले दिन सुबह अरुणजी अखबार देख रहे थे तभी संजना ने आ कर कहा, ‘‘चलिए पापाजी, थोड़ी देर गार्डन में घूमते हैं, वहां से आ कर चाय पीएंगे.’’

संजना के कहने पर अरुणजी को उस के साथ जाना पड़ा. वहां संजना ने उन्हें हलकाफुलका व्यायाम भी करवाया और साथ ही लाफ थेरैपी दे कर खूब हंसाया.

‘‘यह लीजिए पापाजी, आप का कैल्सियम, चाय इस के बाद मिलेगी,’’ संजना ने दूध का गिलास उन्हें पकड़ाया.

नाश्ते में स्प्राउट्स दे कर कहा, ‘‘यह लीजिए भरपूर प्रोटींस. खाइए पापाजी.’’

लंच के समय अरुणजी दवाइयां निकालने लगे, तो संजना ने हाथ रोक लिया और कहा, ‘‘पापाजी, यह सलाद खाइए, इस में टमाटर, चुकंदर है, आप का आयरन और कैल्सियम. खाना खाने के बाद फू्रट्स खाइए.’’

अरुणजी उस की प्यार भरी मनुहार को टाल नहीं पाए. रात को भोजन भी उन्होंने संजना के हिसाब से ही किया. रात को संजना उन्हें फिर गार्डन में टहलाने ले गई.

‘‘चलिए पापा, अब सो जाइए.’’

अरुणजी की नजरें अपनी स्लीपिंग पिल्स की शीशी तलाशने लगीं.

‘‘लेटिए पापाजी, मैं आप के सिर की मालिश कर देती हूं,’’ कह कर उस ने अरुणजी को बिस्तर पर लिटा दिया और तेल लगा कर हलकेहलके हाथों सिर का मसाज करने लगी. कुछ ही देर में अरुणजी की नींद लग गई.

‘‘संजना, बेटी कल रात तो बहुत ही अच्छी नींद आई.’’

‘‘हां पापाजी, अब रोज ही आप को ऐसी नींद आएगी. अब आप कोई टैबलेट नहीं खाएंगे.’’

‘‘अब क्यों खाऊंगा. अब तो मुझे रामबाण औषधि मिल गई है,’’ अरुणजी गार्डन जाने के लिए तैयार होते हुए बोले.

‘‘थैंक्यू भाभी,’’ अचानक मिथिलेश की आवाज ने अरुणजी की तंद्रा भंग की.

‘‘हां बेटा, थैंक्स तो कहना ही चाहिए संजना बेटी को. इस ने मेरी सारी टैबलेट्स छुड़वा दीं. अब तो बस मैं एक ही टैबलेट खाता हूं,’’ अरुणजी बोले.

‘‘कौन सी?’’ संजना ने चौंक कर पूछा.

‘‘विटामिन-पी यानी भरपूर प्यार और परवाह.’’

Short Story

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