Romantic Story: प्यार की परीक्षा

Romantic Story: ‘‘अभी औफिस से घर पहुंची ही थी आरोही कि सुमित्रा उस की मां उस के सामने आ कर खड़ी हो गईं. ‘‘आज इतनी देर क्यों लगा दी आने में?’’

‘‘बताया तो था कि मीटिंग है आज, लेट आऊंगी,’’ सोफे पर पसरते हुए आरोही बोली, ‘‘प्लीज मां, 1 कप चाय पिला दो, सिर दर्द से फटा जा रहा है. उफ, दिल्ली का पौल्यूशन तो लोगों की जान ले कर रहेगा. ऊपर से यह सड़ी हुई गरमी और दिल्ली का ट्रैफिक तो पूछो ही मत. ऐसे में सिरदर्द नहीं होगा तो और क्या होगा,’’ अपने सिर पर बाम लगाती हुई आरोही भुनभुनाई.

तभी सुमित्रा चाय ले कर आ गई.

‘‘ओह, थैंक्यू मां,’’ गरमगरम अदरक वाली चाय पी कर आरोही को थोड़ा अच्छा लगा.

‘‘कई बार फोन किया तुझे. कम से कम फोन तो उठा सकती थी?’’

सुमित्रा आरोही की बगल में बैठती हुई शिकायती लहजे में बोलीं.

‘‘फोन की आवाज सुनाई नहीं पड़ी होगी शायद,’’ चाय का घूंट भरते हुए आरोही बोली, ‘‘वरना जरूर उठाती. वैसे भी औफिस आवर में मैं अपने फोन की आवाज कम ही रखती हूं. कोई जरूरी काम था क्या?’’

‘‘हां, तभी तो फोन कर रही थी. अच्छा यह देख 2-3 लड़कों के फोटो भेजे हैं तुम्हारी इंदौर वाली मौसी ने. बायोडाटा भी भेजा है. देख कर बता, कैसा लगा. तीनों लड़के अच्छीअच्छी पोस्ट पर हैं. लाखों में सैलरी है इन की और घर से भी मजबूत.’’

‘‘मां,’’ सुमित्रा आगे कुछ और कहतीं उस से पहले ही आरोही बोल पड़ी, ‘‘मां, आप को कितनी बार समझऊं कि मुझे अभी शादी नहीं करनी. एक तो वैसे ही मेरा सिर दुख रहा है ऊपर से आप… जब करनी होगी बता दूंगी न,’’ बोल कर आरोही अपने कमरे की तरफ बढ़ गई तो सुमित्रा भी उस के पीछेपीछे कमरे में पहुंच गईं और कहने लगीं, ‘‘शादी नहीं करनी तो क्या उम्रभर कुंआरी ही बैठी रहेगी? शादी की भी एक उम्र होती है बेटा. समय से शादी और बच्चे हो जाएं तो अच्छा है न.’’

‘‘बच्चे. अब ये बच्चे कहां से आ गए?’’ आरोही ने अपना माथा ही पीट लिया, ‘‘मां, अभी आप जाओ यहां से प्लीज, सुबह बात करती हूं. गुड नाइट.’’

‘‘अरे पर सुन तो… समय से बच्चे होना भी तो जरूरी है. डाक्टर क्या कहते हैं कि 30 के पहले बच्चे कर लेने चाहिए. इस साल पूरे 27 की हो जाएगी तू. उम्र निकलते देर नहीं लगाती है बेटा. फिर अच्छा लड़का मिलना मुश्किल हो जाएगा, समझ मेरी बात.’’

‘‘समझ गई मैं, अब जाओ यहां से,’’ बोल कर आरोही ने अपने कमरे का दरवाजा लगा लिया. कल संडे है तो वह देर तक आराम से सोना चाहती है. किसी की कोई डिस्टरबैंस नहीं चाहिए उसे. इसलिए अपना फोन भी स्विच्डऔफ कर बेफिक्र हो कर सो गई.

आरोही अपनी मां और छोटे भाई अक्षत के साथ दिल्ली में रहती है और उस के पिता महावीर प्रसाद गुजरात पुलिस में हैं. 7-8 महीने पर घर आते हैं, फिर कुछ दिन रह कर वापस चले जाते हैं. आरोही दिल्ली की ही एक कंपनी में जौब करती हैं. आरोही बचपन से ही पढ़ने में तेज रही है. इंजीनियरिंग के बाद उस की दिल्ली की ही एक बड़ी कंपनी में जौब लग गई.

आरोही का सपना था कि जब उस की जौब लगेगी, तब वह अपने सारे सपने पूरे करेगी. खूब घूमेगीफिरेगी, ऐश करेगी. मन चाहे कपड़े पहनेगी. मगर जौब लगते ही उस की मां उस की शादी के लिए पीछे पड़ गईं. बेटी पराया धन होती है. मांबाप आखिर कब तक बेटी को अपने घर में बैठाए रख सकते हैं, परिवार, समाज क्या कहेगा जैसी फिलौस्फी भरी बातें कहना शुरू कर देती थीं जिस से आरोही और इरीटेट हो उठती थी.

लड़की चाहे कितनी ही पढ़लिख क्यों न जाए और क्यों न लड़कों के बराबर सैलरी उठाती हो, लेकिन इस के बावजूद मांबाप को अपनी बेटी कम ही लगती है. कहीं अच्छे लड़के हाथ से निकल न जाएं, इस के लिए वे लड़के वालों की सारी शर्तें भी मानने को तैयार हो जाते हैं. बेटी की शादी की चिंता उन्हें ऐसे खाए जाती है जैसे लगता है दुनिया में अच्छे लड़के बचे ही नहीं हैं अब और अगर उन की बेटी की शादी नहीं हुई तो कितना बड़ा अनर्थ हो जाएगा.

तभी तो सुमित्रा ने एक लड़के वालों की यह शर्त भी मान ली थी कि अगर वे लोग नहीं चाहते कि शादी के बाद आरोही नौकरी करे तो वह नहीं करेगी. मगर यह बात सुनते ही आरोही तिलमिला उठी थी और पलटवार करते हुए उस ने भी बोल दिया कि अगर वह कहेगी कि शादी के बाद लड़का अपनी जौब छोड़ दे तो क्या वह अपनी जौब छोड़ देगा? आखिर क्यों परिवार की जिम्मेदारी के चलते वह अपनी खुशियों का गला घोंट दे? आखिर क्यों एक लड़की से ही यह उम्मीद की जाती है कि शादी के बाद वह लड़का और उस के परिवार के हिसाब से चले?

आरोही की बात पर लड़का और उस के परिवार वाले तिलमिला उठे थे और बोले थे कि ऐसी बदतमीज और मुंहफट लड़की से वे कभी अपने बेटे की शादी नहीं करेंगे.

‘‘हां, तो मत करिए,’’ आरोही ने भी तन कर जवाब दिया था.

‘‘शादी के बाद आप का बेटा नौकरी नहीं छोड़ सकता और मैं छोड़ दूं, क्यों छोड़ दूं क्या मैं ने दिनरात एक कर के पढ़ाई नहीं की? जौब पाने के लिए मैं ने जद्दोजहद नहीं की? क्या मेरे पेरैंट्स ने मुझ पर पैसे खर्च नहीं किए पढ़ाने के लिए? मगर सब से आप लोगों को क्या मतलब. आप लोगों को तो बस एक पढ़ीलिखी बाई चाहिए अपने बेटे के लिए जो उस का ध्यान रख सके, उस के लिए खाना पकाए, उस के कपड़े धोए, उस की छोटीछोटी जरूरतों का ध्यान रखे और हां, मोटा दहेज भी ले कर आए नहीं तो आप लोग मुझे जला कर मार भी सकते हैं. सही कह रही हूं न मैं?’’

‘‘नहीं मम्मी, आप मुझे आंखें मत दिखाओ क्योंकि मैं जो कह रही हूं सही ही कह रही हूं,’’ सुमित्रा की तरफ देखते आरोही बोली, ‘‘मैं शादी करूंगी तो अपनी शर्तों पर वरना नहीं.’’

आरोही की बात सुन कर लड़के वाले पैर पटकते हुए वहां से चले गए और सुमित्रा वहीं धम्म से सोफे पर बैठ कर सिसकने लगी. लेकिन आरोही कुछ न बोल कर सीधे अपने कमरे में चली गई. समझ नहीं आ रहा था उसे की कि क्यों उस की नुमाइश बनाई जा रही है लड़के वालों के सामने. आखिर किस बात में कम है वह लड़के से? हाई क्लास जौब है, देखने में सुंदर, फिर क्यों उस की मां जब देखो, शादी कर लो, अच्छे लड़के नहीं मिलेंगे फिर की रट लगाए रहती हैं?

सुमित्रा के मुंह से रोजरोज वही शादी की बातें सुन कर अब आरोही बोर होने लगी थी. मन तो कर रहा था उस का कि कहीं दूसरे शहर चली जाए रहने क्योंकि जब देखो, कभी बूआ, तो कभी मौसी, चाची उसे ज्ञान देने पहुंच जातीं कि बेटा, तुम्हारी मां सही कह रही हैं. कर लो न शादी. अरे, शादी कोई हलुवा है, जो बनाया और खा लिया? किसी को अच्छे से जानेपरखे बिना कैसे शादी कर सकती है वह?

किसी तरह करवटें बदलते हुए आरोही को देर रात नींद आई. सुबह संडे था, इसलिए करीब 2 बजे सो कर उठी. एक संडे ही मिलता है जब वह अच्छे से सो पाती है और यह बात सुमित्रा भी जानती हैं, इसलिए उसे परेशान नहीं करतीं, सोने देती हैं.

सो कर उठने के बाद आरोही फ्रैश हो खाना खा कर सीधे अपने कमरे में आ गई और लैपटौप ले कर बैठ गई ताकि सुमित्रा फिर शादी की बात ले कर न बैठ जाए उस के सामने. शाम को थोड़ी देर के लिए वह अपनी सहेली सांची के घर चली गई. कुछ देर उस के साथ बिता कर वापस घर आई तो सुमित्रा फिर शुरू हो गईं. मांबेटी में उसी बात को ले कर झगड़ा भी हो गया और इस कारण आरोही ठीक से सो भी नहीं पाई.

इधर सुबह जब अन्वय उठा तो देखा रात के डेड़ बजे उस के फोन पर आरोही का फोन आया था लेकिन वह उठा नहीं पाया था. ‘आरोही का फोन. लेकिन इतनी रात को उस ने मुझे क्यों फोन किया, ठीक तो होगी वह?’ अन्वय के मन में नैगेटिव विचार उभर आए. ‘‘हैलो, आरू, फोन किया था तुम ने मुझे. कोई बात है क्या?’’

‘‘फोन. ओह, शायद गलती से लग गया होगा. अच्छा, सुनो, मैं जरा लेट से औफिस के लिए निकलूंगी. तुम चले जाना,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया.

इधर अन्वय सोच में पड़ गया कि आरोही कुछ अजीब ही विहेव नहीं कर रही है. वैसे आधी रात को उस ने अन्वय को फोन लगाया तो था, पर पता नहीं झठ क्यों बोल गई कि गलती से लग गया होगा. अन्वय  ने वापस आरोही को फोन किया.

‘‘हां, बोलो अन्वय. हांहां, मैं चली जाऊंगी तुम चिंता मत करो.’’

‘‘तबीयत तो ठीक हैं तुम्हारी? सच बोलो?’’

अन्वय को चिंता करते देख उसे अच्छा लगा, ‘‘हां, वह जरा फीवर जैसा लग रहा है.’’

‘‘ऐसे कैसे अचानक फीवर हो गया? कल तक तो ठीक थी. अच्छा, मैं आता हूं.’’

‘‘अरे, नहीं मैं अब ठीक…’’ वह कहती रही पर अन्वय ने फोन काट दिया और कुछ ही देर में वह दवा के साथ आरोही के सामने खड़ा था.

‘‘ओह, तुम भी न. मैं ने दवा ले ली थी. बेकार में परेशान होने की जरूरत नहीं थी.’’

‘‘क्यों जरूरत नहीं थी? एक काम करो, आज छुट्टी ले लो. आराम करो.’’

मगर आरोही कहने लगी कि वह छुट्टी नहीं ले सकती. जाना पड़ेगा.

‘‘ठीक है तो तुम तैयार हो जाओ. मैं तब तक हाल मैं बैठता हूं.’’

औफिस जाते समय रस्ते भर आरोही यही सोचती रही कि क्या करे.

कैसे बताए मांपापा को कि वह किसी और से प्यार करती है और उसी से शादी करना चाहती है.

रोज की तरह औफिस से निकल कर दोनों अपने फैवरिट ‘यूनाइटेड कौफी हाउस’ में आ कर बैठ गए. अन्वय का औफिस आरोही के औफिस से हो कर गुजरता है इसलिए वह उसे वहां ड्रौप कर अपने औफिस चला जाता है.

दोनों रोज साथ ही औफिस आतेजाते हैं. अन्वय ने बैरा को इशारे से 2 कप कौफी लाने को कहा और आरोही की तरफ देखते हुए बोला, कुछ खाओगी, मंगाएं?

‘‘नहीं, बस कौफी,’’ केवल इतना ही बोल कर आरोही चुप हो गई.

‘‘क्या हुआ, सब ठीक है? इतनी चुपचुप क्यों हो?’’

अन्वय की बात पर आरोही अजीब तरह से हंस कर बोली, ‘‘क्यों, चुप रहना गुनाह है क्या?’’

‘‘नहीं, मैं ने तो ऐसे ही पूछा.’’

कौफी आ चुकी थी. दोनों धीरेधीरे कौफी पी रहे थे. लेकिन आरोही को आज

कौफी में कोई टेस्ट नहीं लग रहा था. किसी तरह कौफी को अपने गले से नीचे उतारा और कंधे पर बैग टांग उठ खड़ी हुई, ‘‘चले अब?’’

अन्वय कुछ देर बैठना चाहता था. कुछ बात करनी थी उसे आरोही से, ‘‘आरू, बैठो न थोड़ी देर, मुझे तुम से कुछ कहना है.’’

‘‘क्या, बोलो?’’

कुरसी पर बैठते हुए आरोही बोली.

‘‘कभीकभी मैं बहुत डर जाता हूं कि मैं कहीं तुम्हें खो न दूं,’’ आरोही का हाथ अपने हाथ में लेते हुए अन्वय इमोशनल हो गया.

‘‘सच में?’’ अन्वय की आंखों में झंकते हुए आरोही बोली, ‘‘अच्छा, ठीक है अब ज्यादा इमोशनल होने की जरूरत नहीं है. चलो अब घर नहीं चलना?’’

अन्वय जो बोलना चाह रहा था बोल नहीं पाया उस से. खैर, रोज की तरह आरोही को उस के घर छोड़ते हुए अन्वय  अपने घर की तरफ निकल गया.

औफिस से आ कर आरोही इतनी थक चुकी थी कि कुछ करने का मन नहीं हो रहा था. खाना खा कर सोने गई तो नींद भी नहीं आ रही थी. सोचने लगी कि कब तक वह अपने मांपापा से अपने और अन्वय के रिश्ते को छिपाएगी. एक दिन बताना तो पड़ेगा वरना मां यों ही शादी के लिए उस के पीछे पड़ी रहेगी. लेकिन उस से

पहले उसे अन्वय को परखना है, जानना है कि वह उस से सच्चा प्यार करता है या सिर्फ दिखावा कर रहा है.

‘‘सुबह जैसे ही उस की आंखें खुलीं, सुमित्रा सामने खड़ी दिखीं.

‘‘मां… आप ने तो डरा ही दिया मुझे. क्या है बोलो? देखो, फालतू की बातें फिर शुरू मत कर देना.’’

‘‘ऐसे कैसे बात कर रही हो?’’ सुमित्रा बेटी के रूखे व्यवहार से दुखी हो उठीं.

‘‘तो कैसे बात करूं? रोज तो औफिस में खटती हूं. उस पर भी आराम से सोने नहीं देतीं आप. कभी पापा फोन कर के परेशान करते हैं तो कभी आप. अच्छा बोलो, क्या बात है?’’ इस बार उस ने जरा नर्मी से कहा.

‘‘मैं तो बस यह पूछने आई थी कि लड़के की तसवीर देखी तूने कैसा लगा?’’

‘‘नहीं देखी क्योंकि मुझे कोई इंटरैस्ट नहीं है इन लड़कों में. और आप क्या बोलती रहती हैं कि लड़का बहुत बड़ी पोस्ट पर है. लाखों की सैलरी है. तो मैं क्या घर बैठी हूं? मैं भी अच्छी पोस्ट पर हूं और मेरी भी लाखों में सैलरी है. मैं भी अच्छे घराने से विलौंग करती हूं. फिर क्यों आप गिरीपड़ी बातें करती हैं मां कि इतना अच्छा रिश्ता हाथ से चला जाएगा. तो चला जाए, मेरी बला से.’’

बेटी के तेवर देख सुमित्रा सिटपिटा गईं. इसलिए जबान पर जरा मिठास लाते हुए बोलीं, ‘‘लेकिन बेटा मैं तो तेरे भले के लिए ही बोल रही हूं और एक न एक दिन शादी तो करेगी ही न तू. अगर तूने किसी को पसंद कर रखा है तो यह भी बता दे?’’

‘‘आ ऐसी कोई बात नहीं है मां और कुछ होगा तो बताऊंगी ही न. अच्छा मुझे एक जरूरी फोन करना है, मैं आप से बाद में बात कराती हूं,’’ कह कर आरोही पता नहीं किस से फोन पर बात करने लगी.

आरोही भी समझ रही थी कि उस के मांपापा की चिंता जायज है. हर मांबाप को अपने बच्चे की शादी की चिंता होती है. लेकिन अभी वह अपने मातापिता को अपने और अन्वय के रिश्ते के बारे में बताना नहीं चाहती थी. नहीं… नहीं… उस के मातापिता प्रेम विवाह के खिलाफ नहीं हैं. जातिपांति भी नहीं मानते हैं वे. हां, लेकिन इस बात पर शायद एतराज हो उन्हें कि अन्वय की आर्थिक स्थिति हमारे जैसी मजबूत नहीं है. लेकिन मुझे इस बात से कोई एतराज नहीं है और इस के लिए मैं उन्हें मना भी लूंगी.

बात यह है कि अन्वय मुझे किस हद तक प्यार करता है वह देखना है मुझे. कहीं ऐसा तो नहीं कि कल को अगर मेरे साथ कोई हादसा हो जाए. तो वह मुझे बीच राह में छोड़ कर भाग जाए क्योंकि ऐसे कई किस्से सुन चुकी हूं जहां एक प्रेमी, पति बनते ही अपने असली

रूप में आ गया. छोटीछोटी बातों को ले कर पत्नी पर शक करता, उसे मारतापिटता यहां तक कि तलाक तक दे देता और औरत बेचारी बन कर रह जाती है.

मेरी सहेली सांची के साथ यही तो हुआ. एक दिन जब उस के पति को पता चला कि शादी से पहले किसी ने उस का रेप कर दिया तो उस बात को ले कर उस ने उसे कितना प्रताडि़त किया. यहां तक कहा कि उस का बच्चा उस का नहीं, उस रैपिस्ट का है और फिर एक दिन उस ने सांची को तलाक दे दिया. बेचारी, अपनी बेटी को ले कर मांबाप के घर रह रही है. लेकिन मैं अपने साथ कभी ऐसा नहीं होने दूंगी. अच्छे से समझबूझ कर ही शादी करूंगी ताकि कल को मुझे पछताना न पड़े.

मां और अक्षत कुछ दिनों के लिए इंदौर वाली मौसी के घर गए हुए थे. इसलिए मुझे खुद ही अपने लिए नाश्ताखाना बनाना पड़ रहा था. झड़ूपोंछा, बरतनकपड़ों के लिए बाई आती थी. अपने लिए मैं ने 1 कप कौफी बनाई और आ कर बालकनी में बैठ गई. समझ नहीं आ रहा था कि कैसे पता लगाऊं कि अन्वय मुझ से किस हद तक प्यार करता है. मगर जैसे भी हो, पता तो लगाना ही पड़ेगा.

‘मैं तो केवल प्रेम की परीक्षा ले रही हूं. लोग तो प्रेम में जिंदगी तक हार जाते हैं. वैसे मुझे उस की जिंदगी नहीं चाहिए. भरोसा और विश्वास चाहिए कि हर हाल में वह मेरा साथ निभाएगा या नहीं. हो सकता है मेरा यह तरीका उसे अच्छा न लगे. लेकिन भविष्य के लिए यही सही है’ अपने मन में सोच आरोही ने गहरी सांस ली और बालकनी से उठ कर अपने कमरे में आ गई.

आरोही बाथरूम जा ही रही थी कि सांची का फोन आ गया, ‘‘हैलो, सोई है या जागी मैडम?’’ सांची ने फोन पर कहा.

‘‘जाग रही हूं, बोल? अरे, रे… हम ने तो आज साथ मूवी देखने का प्रोग्राम बनाया था न. ओह शिट भूल गई मैं,’’ आरोही को बुरा लगा, ‘‘प्लीज,’’ आरोही ने माफी मंगाते हुए कहा कि अगले संडे जरूर उस के साथ मूवी देखने जाएगी.

‘‘अरे, कोई बात नहीं. इतना परेशान क्यों हो रही है. न तो फिल्म भगे जा रही है, न हम,’’ सांची हंस पड़ी, ‘‘वैसे एक बात बता कोई प्रौब्लम है क्या?’’

‘‘उफ, वही शादी का प्रैशर.’’

‘‘तो तू उन्हें बता क्यों नहीं देती अपने और अन्वय के रिश्ते के बारे में? क्यों नहीं बता देती कि तुम अन्वय से शादी करना चाहती हो. कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे मांपापा दूसरी जाति के लड़के से तुम्हारे विवाह के खिलाफ होंगे?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसी कोई बता नहीं. बल्कि इस मामले में मेरे मांपापा बहुत खुले विचारों के हैं.’’

‘‘तो दिक्कत क्या है फिर?’’ सांची हैरान थी.

‘‘दिक्कत कुछ नहीं है, पर मैं अन्वय को परखना चाहती हूं कि क्या सच में मुझ से प्यार करता है. जानती है सांची, तेरे साथ जो हुआ न उस से ही मैं ने सबक लिया.’’

‘‘तू भी न. मेरी बात कुछ और थी. मेरा समय खराब था जो मेरा पति मुझे छोड़ गया. मुझ से अपनी तुलना मत कर. अन्वय ऐसा लड़का नहीं है और वह तो तुम्हें इतना प्यार करता है कि आधी रात को भी उसे बुलाए तो दौड़ा चला आएगा. नहींनहीं यार, इतना मत सोच.’’

‘‘हां, तेरी बात सही है,’’ एक लंबी सांस लेते हुए आरोही हंस पड़ी, ‘‘लेकिन परखने में हरज ही क्या है. चल, आजा मेरे घर साथ में चाय पीते हैं,’’ आरोही ने फोन रख दिया और सांची यह सोच कर परेशान हो उठी कि यह आरोही भी पागल है एकदम. ऐसा भी कोई करता है.

दरवाजे की घंटी बजी तो आरोही समझ गई कि सांची ही आई होगी, ‘‘आजा. अन्वय भी आता ही होगा. मैं तब तक चाय रखती हूं.’’

कुछ देर में अन्वय भी आ गया. आरोही सब के लिए ट्रे में चाय ले आई. दोनों को चाय दे कर वह अपनी भी चाय लेकर बैठ गई. अभी उसने चाय का पहला घूंट लिया ही कि अचानक से वह नीचे जमीन पर गिर गई. वह अजीब तरह से मुंह बनाने लगी. उस के हाथपैर फड़कने लगे. वह ऊपर शून्य भाव में देखने लगी. उस की मांसपेशियां अकड़ गईं एकदम.

‘‘आरूआरू, क्या हो गया तुम्हें?’’ अन्वय आरोही को हिलाते हुए बोला, वह प्यार से आरोही को ‘आरू’ बुलाता है. उसे इस हालत में देख वह बुरी तरह घबरा गया. सांची भी समझ नहीं पा रही थी कि अच्छीभली आरोही को अचानक क्या हो गया. उसने उसे उठाया और बिस्तर पर लिटा कर उस के सिर के निचे तकिया रख दिया. उसे पानी पिलाया तो उसे थोड़ा आराम महसूस हुआ.

‘‘मैं… मैं… अभी डाक्टर को फोन करता हूं,’’  कह कर उस ने अपना फोन निकाला ही था कि आरोही ने उस का हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोली कि डाक्टर को बुलाने की कोई जरूरत नहीं है. अब वह ठीक है. उसे ऐसे मिरगी के दौरे अकसर पड़ते रहते हैं.’’

‘‘मिरगी. तू तुम्हें मिरगी के दौरे पड़ते हैं कब से?’’

‘‘बचपन से ही,’’ आरोही बोली.

‘‘बचपन से लेकिन तुम ने कभी मुझे

बताया नहीं?’’

‘‘वह इलाज के बाद दौरे पड़ने बंद हो गए थे. लेकिन फिर पड़ने लगे…’’  तिरछी

नजर से अन्वय की तरफ देखते हुए आरोही बोली. देख रही थी कि वह कैसे रिएक्ट करता है. इधर सांची तो समझ ही रही थी कि उसे कोई दौरा नहीं पड़ा है बल्कि नाटक कर रही है.

‘‘कोई बात नहीं, मैं एक अच्छे डाक्टर को जानता हूं. उस के पास चलेंगे,’’ आरोही के सराहने बैठ अन्वय उस के बालों को सहलाते हुए बोला, ‘‘सच में मैं बहुत डर गया था कि अचानक तुम्हें क्या हो गया.’’

‘‘यह जान कर तुम्हें बुरा नहीं लगा कि मुझे मिरगी आती है?’’ आरोही ने सवाल किया.

‘‘हां लगा लेकिन इस बात से कि तुम बचपन से सफर कर रही हो और मैं इस बात से अनजान हूं. कोई बात नहीं, अब जान गया न. अब से तुम्हारा ध्यान रखूंगा.’’

आरोही को आश्चर्य हुआ कि उसे यह जान कर जरा भी बुरा नहीं लगा कि जिस से वह प्रेम करता है और जिस से शादी करने वाला है वह एक मिरगी पेशैंट है.

‘‘बहुत हो चुका यार, अब हमें शादी कर लेनी चाहिए,’’ उस दिन कौफी शौप में काफी पीते हुए अन्वय बोला तो आरोही कहने लगी कि हां, उसे भी लगता है अब उन्हें अपने रिश्ते को एक नाम दे देना चाहिए.

‘‘वैसे, मैं ने तो हमारे बारे में अपने घर वालों को सब कुछ बता दिया है और यह भी बोल दिया है मैं तुम से ही शादी करूंगा. लेकिन क्या तुम ने अपने मांपापा से बात की हमारे बारे में?’’

‘‘नहीं, लेकिन सोच रही हूं आज ही उन से बात कर लूं.’’

दूसरे दिन जब दोनों कौफी शौप में मिले तो आरोही बहुत उदास थी. अन्वय के पूछने पर बोली कि उस के मांपापा उस की इस शादी के खिलाफ हैं. कहते हैं अगर तुम ने अपनी मरजी से शादी की तो हम तुम से सारा रिश्ता खत्म कर लेंगे.

‘‘अच्छा, ऐसा कहा उन्होंने?’’ सुन कर अन्वय भी उदास हो उठा.

इसी तरह कुछ दिन और बीत गए. एक रोज आरोही घबराती हुई अन्वय के पास आई

और कहने लगी, ‘‘अन्वय, चलो हम भाग कर शादी कर लेते हैं क्योंकि मेरे मांपापा कभी हमारी शादी के लिए राजी नहीं होंगे. हम इस शहर से बहुत दूर चले जाएंगे. तुम पैसों की चिंता मत करो, मैं अपने सारे गहने ले आई हूं, जो मां ने मेरी शादी के लिए बनवाए थे और ये पैसे भी. कुछ दिन तो इन से गुजारा हो ही जाएगा हमारा. फिर कोई न कोई जौब मिल ही जाएगी हमें.’’

आरोही की बात सुन कर अन्वय हैरानी से उसे देखने लगा, ‘‘ऐसे देख क्या रहे हो, चलो न? इस से पहले कि मेरे मांपापा को सब पता चल जाए… देखो, बहुत अच्छा मौका है यह.’’

‘‘यह क्या कह रही हो तुम. पागल हो गई हो क्या? नहीं मैं ऐसा हरगिज नहीं करूंगा.’’

‘‘तुम समझ नहीं रहे हो अन्वय.’’

‘‘सब समझ रहा हूं मैं. हम कोई छोटे बच्चे नहीं हैं जो ऐसी बेतुकी हरकत करें. सोचा है तुम्हारे ऐसा करने से तुम्हारे मांपापा पर क्या बीतेगी? कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे वे. क्या तुम यही चाहती हो? जाओ अपने घर और ये गहने और पैसे भी लेती जाओ.’’

‘‘आरोही जैसे ही जाने लगी, अन्वय ने उसे रोका, ‘‘मैं तुम्हे तुम्हारे घर तक छोड़ आता हूं,’’ फिर वह खुद आरोही को उस के घर छोड़ आया.

सांची ने जब आरोही के मुंह से भाग कर शादी करने वाली बात सुनी और जाना कि अन्वय ने क्या कहा तो उसे आरोही पर गुस्सा आ गया.

‘‘बस हो गया और कितना परखेगी उसे?’’

सांची की बात पर आरोही अजीब तरह से मुसकराई.

‘‘बड़ी जालिम है तू सच में. छोड़ दे न अब बेचारे को, कितना इम्तिहान लेगी. वैसे अब क्या करने वाली है तू?’’

‘‘सब्र रख बहन,’’ आरोही खतरनाक तरीके से हंसती हुई बोली.

अन्वय की दादी और उस के चाचाचाची यूपी के एक गांव में रहते हैं. एक दिन खबर आई कि अन्वय की दादी की तबीयत बहुत खराब है. शायद अब न बचें, इसलिए आ कर मिल लो. अन्वय अपनी दादी को देखने अपने गांव चला गया यह सोच कर कि जैसे ही वह ठीक हो जाएंगी, आ जाएगा. लेकिन उस की दादी गुजर गईं. इसलिए उसे कुछ दिन और अपने गांव में रुकना पड़ गया. 1 महीने बाद दिल्ली आया और पहले की तरह अपने काम में लग गया. लेकिन देख रहा था वह. आरोही पहले की तरह फ्रैश नहीं लगी उसे. कुछ चुपचुप थी. पूछा भी कितनी बार कि सब अब ठीक है? और हर बार वह केवल सिर हिला कर जवाव देती हां ठीक है.

एक दिन आरोही अन्वय को फोन कर फूटफूट कर रोने लगी, ‘‘आरू, क्या हुआ तुम रो क्यों रही हो? हांहां, मैं अभी आता हूं, तुम चुप हो जाओ पहले,’’ अन्वय जिन कपड़ों में था उन्हीं कपड़ों में भगा. देखा तो आरोही अभी भी रोए जा रही थी, ‘‘क्या हुआ, बताओ मुझे? आंटीअंकल ने कुछ कहा?’’

‘‘अन्वय, जब जब तुम अपने गांव गए थे न. तब,’’ आरोही डरडर कर बोल रही थी, ‘‘तब एक रोज मैं औफिस से घर आ रही थी, तब 2 लड़कों ने मेरे साथ…’’

‘‘तुम्हारे साथ क्या. बोलो न?’’ अन्वय का दिल धकधक कर रहा था.

‘‘तब उन 2 लड़कों ने मेरा रेप… रेप किया था,’’ बोल कर आरोही फिर फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘क्या रेप?’’ रेप की बात सुन कर अन्वय को जोर का धक्का लगा.

‘‘मुझे लग रहा है, शायद मैं प्रैगनैंट… क्योंकि इस महीने मेरा पीरियड मिस हो गया. अब मैं क्या करूंगी अन्वय. मांपापा तो मेरी जान ही ले लेंगे जब उन्हें पता चलेगा कि मैं प्रैगनैंट हूं. कुछ करो अन्वय वरना मैं अपनी जान दे दूंगी,’’ अन्वय के सीने से लग आरोही सिसक पड़ी.

‘‘तुम… तुम… चिंता मत करो. मेरी पहचान की एक लेडी डाक्टर है, उस के पास चलते हैं. सब ठीक हो जाएगा. किसी को कुछ पता नहीं चलेगा.’’

आरोही हैरान थी कि रेप जैसी इतनी बड़ी बात सुन कर अन्वय  को बुरा नहीं लगा और वह उसे डाक्टर के पास ले जा रहा है. डाक्टर अनुभवा, अन्वय की ही कास्ट की थी. दोनों ने साथ में ही स्कूल की पढ़ाई पूरी की थी. जहां अन्वय ने इंजीनियरिग फील्ड चुनी, वहीं अनुभवा ने मेडिकल. दोनों आज भी पक्के दोस्त थे.

अन्वय उसे डाक्टर अनुभवा के पास ले गया और सब बात बताते हुए कहा कि वह इस का बच्चा गिरा दे.

मगर जांच के बाद डाक्टर ने बताया कि प्रैगनैंसी तो दूर की बात, आरोही का

रेप तक नहीं हुआ है क्योंकि इस की हाइमनअभी तक सुरक्षित है. डाक्टर की बात सुन कर अन्वय के पैरों तले की जमीन खिसक गई. तो फिर आरोही ने ऐसा क्यों कहा कि उस का रेप हुआ था और वो प्रैगनैंट हो गई.

‘‘तुम ने झठ कहा मुझ से कि तुम्हारा रेप हुआ है क्यों?’’ अन्वय इतनी जोर से चीखा कि आरोही हिल गई.

‘‘नहींनहीं अन्वय, मैं ने कोई झठ नहीं बोला तुम से. बल्कि वे दोनों लड़के खींच कर मुझे उस पुरानी बिल्डिंग में ले गए थे, उस के बाद मैं बेहोश हो गई थी. मुझे लगा उन दोनों ने मेरा रेप किया और भाग गए. जब मुझे होश आया तो वहां पर कोई नहीं था. फिर किसी तरह मैं अपने घर पहुंची. मां को कुछ नहीं बताया.

तुम्हें भी बड़ी मुश्किल से बता पाई हूं वह भी जब मेरा पीरियड मिस हो गया तब. मुझे लगा उन दोनों ने मेरा रेप किया और मैं प्रैगनैंट हो गई.’’

‘‘तुम्हें लगा लेकिन मुझे क्या लगा पता भी है तुम्हें?’’ अन्वय गुस्से से भर उठा.

‘‘वैसे तुम्हें बता दूं कि न तो मेरा कोई रेप हुआ है और न ही मुझे मिरगी की बीमारी है

और उस दिन गहनेपैसे ले कर भागने का जो प्लान बनाया था वह सब भी तुम्हें परखने के लिए ही था. मैं जानना चाहती थी कि इन सब के बावजूद तुम मुझ से उतना ही प्यार करोगे या छोड़ दोगे मुझे.’’

आरोही की बात सुन कर अन्वय की आंखें फटी की फटी रह गईं.

‘‘ओह, तो झठी कहानी बनाई तुम ने और तुम्हें कोई बीमारी भी नहीं है. देखना चाहती थी कि मैं तुम्हारे गहनेपैसे देख कर लालच में तो नहीं आ जाऊंगा. वैरी गुड,’’ अन्वय जोरजोर से तालियां बजाने लगा, ‘‘अरे, मैं तो तुम्हें इतना प्यार करता हूं कि तुम्हारे जान देने की बात सुन कर भागाभागा आ गया. लेकिन तुम इतनी छोटी सोच वाली लड़की  हो, नहीं पता था मुझे. छि: तुम मेरा टैस्ट ले रही थी. अगर मैं ऐसा तुम्हारे साथ करता तो?’’

‘‘बिलकुल करो, मैं ने कब मना किया,’’ बड़ी बेफिक्री से बोल कर आरोही हंसी.

अन्वय का गुस्सा सिर चढ़ गया, ‘‘मैं तुम्हारे जैसा नहीं हूं. तुम्हारे दिमाग में इतनी गंदगी भरी है, नहीं पता था मुझे,’’ आरोही की तरफ नफरतभरी नजरों से देखते हुए अन्वय बोला, ‘‘आज से मैं तुम्हें नहीं जानता. कोई रिश्ता नहीं है हमारे बीच, समझं तुम?’’  बोल कर वह वहां से निकलने ही लगा.

तभी पीछे से आरोही बोली, ‘‘हांहां जाओ, लेकिन एक बात सुनते जाओ. यही सब लड़कियों के साथ सदियों से होता आया है, तब तो किसी को बुरा नहीं लगा.’’

आरोही की बात पर अन्वय ने पीछे मुड़ कर देखा.

‘‘बल्कि आज भी हो रहा  है. लड़की नाटी है, मोटी है, दुबली है, काली है, बदसूरत है कह कर तुम लड़के और परिवार वाले लड़कियों का तिरस्कार करते हो. अरे, तुम लड़कों को तो शादी से पहले यह सर्टिफिकेट भी चाहिए होता है कि लड़की का कौमार्य सुरक्षित है या नहीं. छि:, शर्म नहीं आती ऐसा करने पर और मुझे बुरा बोल रहे हो एक लड़की का अगर रेप हो जाए तो भी लड़की ही मुंह छिपाती फिरती है और रेपिस्ट आजाद घूमता है. रेपिस्ट से कोई नहीं पूछता कि तुम ने रेप क्यों किया. लेकिन लड़की को कठघरे में जरूर खड़ा करते हैं कि अरे, तुम्हारा रेप हुआ है.

‘‘शादी से पहले एक लड़की को पता नहीं क्याक्या डर सताते हैं. जिन लड़कियों के शादी से पहले बौयफ्रैंड रहे हों और शादी घर वालों की मरजी से कर रही है तो उस लड़की का डर बहुत बड़ा होता है कि कहीं होने वाला पति कुछ जान गया तो उसे छोड़ दिया या तलाक दे दिया तो… शादीब्याह के मामले में ज्यादातर लड़कियों को ही सवाल झेलने पड़ते हैं.

‘‘बोलो न क्यों हर समय लड़कियां ही सवालों के जवाब देती रहें. लड़कों से ऐसे सवाल क्यों नहीं पूछे जाते कि शादी से पहले उस का किसी के साथ संबंध तो न था? उस ने कभी किसी लड़की का रेप तो नहीं किया? उस का कौमार्य क्यों नहीं जांचा जाता? क्या वर्जिनिटी सिर्फ लड़कियों का ठेका है?’’

आरोही की बात पर अन्वय ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘इस के बाद भी तुम्हें लगता है कि मैं ने जो किया गलत किया तो जाओ और अगर लगे कि मैं ने जो किया सही किया तो आ जाना. मैं यहीं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’

पूरी रात अवन्य के मन में उथलपुथल मचती रही, ‘आखिर क्या गलत कहा आरोही ने

बोलो, क्यों हर बार लड़कियां ही क्यों परखी जाती हैं? क्यों हर बार दोष निकाल कर उन का तिरस्कार किया जाता है? जब एक लड़की का रेप होता है, तब भी दोषी वह कैसे हो जाती है? जब आरोही ने कहा था कि 2 लड़कों ने उस का रेप किया, तब तुम्हारा भी मन अजीब हो गया था न? झठ मत बोलो,’ अन्वय के दिल से आवाज आई, ‘हां, लगा था मुझे. लेकिन अन्वय तब भी मेरा प्यार उस के लिए कम नहीं हुआ था. लेकिन फिर मुझे उस की बात का इतना बुरा क्यों लगा? नहीं लगना चाहिए था.

प्यार की परीक्षा ही ली न उस ने? तो क्या गलत किया? कहीं बहुत देर न हो जाए,’ अपने मन में सोच अन्वय ने फोन उठा लिया और आरोही को मैसेज किया, ‘‘सौरी, तुम सही थीं. मैं आ रहा हूं तुम्हारे पास.’’

अन्वय का मैसेज पढ़ कर आरोही मुसकरा उठी.

Romantic Story

Satire: नैपो बेबी की रीलें- जेन जी की क्रांति

Satire: हमारे समय में लोकतंत्र को सब से बड़ा खतरा विपक्ष से नहीं, नैपो बेबीज से है. ये ऐसे पौधे हैं जिन की खाद भ्रष्टाचार का पैसा और धूप सत्ता की ताकत है. नेपाल का हालिया आंदोलन इस बात का सुबूत है कि जनता अब इंस्टारील्स के तख्तापलट को भी गंभीरता से लेने लगी है. सोचिए, एक तरफ आम नेपाली युवा बेरोजगारी, महंगाई और भविष्य की चिंता में धंसे हुए हैं और दूसरी तरफ नैपो बेबीज महंगी कारों की चाबियां झनझनाते, लंदन, न्यूयौर्क के स्कूलों की पढ़ाई का बखान करते, इंस्टाग्राम पर अपने बाप की दौलत का तमाशा दिखाते फिरते हैं.

यही विरोधाभास अंतत: फट पड़ा. नेपाल में लोग सड़कों पर उतर आए न नारों के लिए, न किसी वैचारिक एजेंडे के लिए बल्कि नैपो बेबीज की ऐयाशी की रील्स देख कर. आम जनता ने पहली बार समझ कि डिजिटल क्रांति का मतलब क्या होता है जब जनता का गुस्सा व्यूज बन कर सरकार को गिरा दे. ये नैपो बेबी कौन हैं? ये वे लोग हैं जिन की डिक्शनरी में ‘मेहनत’ शब्द नहीं है. इन की डिगरियां विदेश से हैं पर अक्ल जमीनी स्तर पर शून्य.

इन की लाइफ में सब से बड़ा काम है कार के बोनट पर बैठ कर रील बनाना, पार्टी करना, महंगी शराब उड़ाना, रोड रेज करना और फिर बाप के ओहदे से छूट जाना. आम युवा नौकरी ढूंढ़ें, ये ‘नया क्लब’ ढूंढ़ते हैं. गाड़ी चलाना इन्हें स्पोर्ट्स समझ में आता है, कानून नहीं. जब ये अपनी मसिडीज में गले में हाथ डाले लिपटी गर्लफ्रैंड के साथ स्पीडिंग करते हैं तो महाकाल भी घबराहट में फुटपाथियों के ऊपर मंडराने लगते हैं. बाप भ्रष्टाचार करे, बेटा डिस्को में नोट उछाले. बाप संसद में हंगामा करे बेटा पब में. मेहनत सिर्फ जिम में, वह भी फोटो क्लिक कराने की. इन के लिए राजनीति कैरियर नहीं, वसीयत है. इन के संघर्ष की कहानियां व इंस्टाग्राम फिल्टर दोनों नकली हैं. पापा की फोन बुक इन का टेलैंट है.

यदि पूछो बड़ा हो कर बेटा क्या बनेगा तो बताएंगे बेटा पहले से ही बनाबनाया है. एक आम नौजवान की जिंदगी हर महीने की किस्त और रोजगार के संघर्ष में बीत रही है, जबकि नैपो बेबी की जिंदगी में किस्त सिर्फ गडि़यों की ईएमआई की होती है. उसे भी पापा भरते हैं. जब ये रील्स वायरल हुईं. जहां महंगी कारें, डौलर के बंडल और स्विमिंगपूल में शैंपेन तैर रही थी तो जनता ने पूछा, ‘‘ये पैसे कहां से आए?’’ उत्तर सरल था. हमारे टैक्स और इन के बाप की लूट से. यही सवाल ज्वालामुखी बन गया. नेपाल की सड़कों पर वही नौजवान उतरे, जिन के लिए कल तक डाटा पैक भी महंगा था. आज वे पूछ रहे थे, ‘‘हमें बेरोजगारी और इन्हें बाप की विरासत में ऐयाशी क्यों?’’ पापा की फोन बुक इन का टेलैंट है.

ये क्विक कौमर्स हैं राजनीति के. नैपो बेबी का असली गुण यही है कि ये न तो खुद के दम पर पासपोर्ट बनवा सकते हैं, न लाइसैंस, न नौकरी. सभी चीजें बाप की मुहर से आती हैं. वे बारबार जनता को भरोसा दिलाने की कोशिश करते हैं कि न पापा के दम पर न उन की मनी के दम पर बल्कि हनी अपने टेलैंट के दम पर मुकाम बना रहे हैं. नेपाल में सरकार गिरी, पर गिराने वाला नारा गरीबी, बेरोजगारी दूर करो, महंगाई कम करो नहीं था. चिनगारी का कार्य किया.

नैपो बेबी की रील्स और बवाल बढ़ने पर सोशल मीडिया पर रातोंरात ठोकी प्रतिबंध की कील्स ने. युवाओं ने देखा कि हमें रोजगार, रोटी के लाले और ये रोज नई लग्जरी कार निकालें तो तख्त हिलना तय था. नैपो बेबीज की नस्ल वैश्विक है. घाटी का देख लो, नेताओं की औलादें विदेशों में पढ़ रही हैं और स्थानीय युवाओं को नफरत और नारे थमा रहे हैं. दरअसल, नैपो बेबी लोकतंत्र को अपने पापा की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी मानते हैं. मगर एक दिन जनता का गुस्सा आता है और फिर नैपो बेबी की पूरी पीढ़ी सत्ता से उखड़ नप जाती है. हद पार की तो पलक झपकते सत्ता के पार लगा दिए जाओगे. नेपाल ने यह कर दिखाया. अब नैपो बेबी समझ लें. रील्स सिर्फ व्यूज नहीं लातीं, कभीकभी क्रांति भी ले आती हैं. बिगड़ैल औलाद की रील्स बाप की पौलिटिकल ओबीच्यूरी बन जाती हैं.

Satire

Love Story: आधीअधूरी या पूरी

Love Story: मेरे जीवन में उस का प्रवेश बरखा की शीतल फुहारों समान हुआ था जो बारिश से धुले आसमान में सतरंगी इंद्रधनुषीय छटा की भांति कुछ देर दृष्टिगोचर हो विलीन हो गया. मैं उस के मिलन और विछोह का अर्थ भी न समझ सका कि वह बिजली की भांति मेरे जीवन को कुछ क्षण चमका कर ओझल हो गई. मेरे बालपन की 11-12 वर्ष की उम्र में उस का आगमन हुआ था. मैं एक सरकारी स्कूल में कक्षा 6 का छात्र था.

उसी स्कूल में मेरी ही कक्षा में एक नई लड़की ने दाखिला लिया. उस के कक्षा में प्रवेश करते ही सभी बच्चों की निगाहें उसे देखने के लिए उठीं, मैं भी उधर ही देखने के लिए घूमा. सांवली सी साधारण नैननक्श की होते हुए भी वह अन्य लड़कियों से अलग थी. उस की नीली आंखों में अजीब सा आकर्षण था जो मेरे जीवन में हलचल मचाने के लिए काफ़ी था. उसे रोज निहारते रहना मुझे अच्छा लगने लगा. वह अन्य लड़कियों के साथ अलग बैंच पर बैठती थी. मैं उसे दूर से ही निहारता रहता.

वह भी मुझे वहीं से बैठीबैठी देखा करती. हम दोनों में कभी कोई बात नहीं हुई, बस एकदूसरे को देखना अच्छा लगता था तो देखते रहते. उस का नाम आभा है यह मुझे स्कूल की हाजिरी लेते वक्त मास्टरजी के पुकारने से ज्ञात हुआ. शायद ऐसे ही मेरा नाम भी उसे पता लग गया होगा. 70 वर्ष पूर्व के बच्चे प्रेम क्या होता है जानते भी नहीं थे. हम दोनों अबोध, अबोले मासूमियत से भरे आंखों ही आंखों से एकदूसरे को निहारते रहते. खेल के मैदान में पहुंचता तो वह भी आ जाती और दूर से खड़ीखड़ी मुझे ताकती रहती. वह झला झलती तो मैं उसे देखता रहता. हम दोनों ने कभी एकदूसरे से बात नहीं की न कक्षा में न कक्षा के बाहर. बस हमें एकदूसरे को देखते रहने में खुशी महसूस होती थी. वार्षिक परीक्षा का परिणाम आने के बाद अचानक एक दिन वह अपने नाम के अनुरूप अपनी आभा बिखेर आकाश की बिजली की भांति चमक कर चली गई. मेरा मन कुछ दिनों तक उदास रहा. समय के साथ उस की यादें कम होती गईं.

मैं अपनी उच्च शिक्षा ग्रहण करने में व्यस्त हो गया परंतु उसे भूल नहीं पाया. जड़ें कहीं दिल की गहराई में पैठी हुई थीं. युवावस्था में पहुंच मैं ने उस के प्रति अपने लगाव के बारे में सोचा और इस गुत्थी को सुलझने की कोशिश की. जितना सुलझया उस से ज्यादा उलझ. मन ने सोचा कहीं मैं उस से प्यार तो नहीं करने लगा. मेरा बालमन तुरंत बोला कि बच्चू प्यार जानते हो क्या होता है? मैं ने कहा कि उस समय तो नहीं जानता था पर अब कुछ कुछ जान गया हूं. स्कूल के दिनों में उसे देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता था. वह भी तो दूर से मुझे ताकती रहती थी. जब मैं खेल के मैदान में पहुंचता वह भी तुरंत आ जाती. बता यह प्यार नहीं तो क्या था? हम एकदूसरे को निहार वापस अपनी कक्षा में आ जाते. यों ही मन ही मन मैं अपने आप को भुलावे में रख कर उस की उन्हीं भावनाओं को प्यार का रूप देने की हिमाकत करता या वास्तव में प्यार करता था दोनों का अंतर नहीं समझ सका.

एक लंबे अंतराल के बाद मैं उच्च शिक्षा ग्रहण कर अपने ही शहर के एक कालेज में लैक्चरर के पद पर नियुक्त हो गया. मेरी नौकरी लगने से मेरे मातापिता बहुत खुश हुए. अब उन की एक ही इच्छा शेष थी वह थी मेरी शादी. वे जल्द से जल्द मेरी शादी कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे. शादी करने का अभी मेरा इरादा नहीं था. दिल के किसी कोने से उस का खयाल उभरता, मन उड़ान भरने लगता. कभी सोचता बड़ी हो गई होगी, कैसी दिखती होगी, मेरी याद भी होगी या नहीं. कहां होगी, क्या किया है उस ने, कभी मुझे मिली तो क्या हम दोनों एकदूसरे को पहचान भी पाएंगे? हो सकता है कि शादी हो गई हो बच्चे भी हों.

यह सब सोचतेसोचते दिमाग का दही बनने लगता. थकहार कर अपनी किताबें उठा अगले लैक्चर की तैयारी करने की कोशिश करता. वह भी नहीं होता तो थकहार कर सो जाता. दिनों का काम ही गुजरना है, गुजरते जाते हैं किसी के दिन गम में तो किसी के खुशी में और किसी के दिन पुरानी यादों में. पुरानी यादें… कितनी सुहानी, कितनी मीठी. बचपन की हैं तो सोने में सुहागा. क्या भूलूं क्या याद करूं बैठा हुआ सोच रहा था कि दरवाजे की कुंडी खटकी. विचारों में खलल पड़ने पर झल्लाहट में उठ दरवाजा खोला, सामने अपने बचपन के यार राम प्रकाश को देख सारी झल्लाहट हवा हो गई.

वह मेरी उतरी शक्ल देख पूछ बैठा, ‘‘क्या बात है जो इतना परेशान नजर आ रहा है?’’ मैं ने कहा, ‘‘तू पहले अंदर तो आ. चौखट पर खड़ा हो कर बातें करेगा क्या?’’ मैं उस के साथ अपने कमरे में आया. कमरे में बैठ उस की तरफ मुखातिब होते हुए बोला, ‘‘मेरी बात छोड़ अपनी सुना. डाक्टर बन गया है, अपने मरीजों को ढंग से देखता है कि नहीं? कैसी प्रैक्टिस चल रही है? कहां पर है आजकल? शादी कर ली क्या?’’ रामप्रकाश इतने सवाल सुन झल्ला गया. मेरी पीठ पर धौल जमाते हुए कहने लगा, ‘‘इतने दिनों बाद आया हूं कुछ चायपानी तो पिलाया नहीं ऊपर से सवाल पर सवाल दाग रहा है. तेरी आदत अभी तक गई नहीं. चल पहले पानी पिला गला सूख रहा है.’’ मैं रामप्रकाश के लिए पानी ले कर आया. पानी पीने के बाद गिलास टेबल पर रख आराम से पैर पसार कर सोफे पर बैठ गया.

यह उस की पुरानी आदत थी. राम की आवाज सुन मां चाय बनाने चली गईं. मां जानती थीं कि थोड़ी देर बाद ही वह उन के पास चाय की फरमाइश करने आ जाएगा. दरअसल, राम को मां के हाथों की बनी चाय बहुत पसंद थी. मां को भी उस की हर पसंदनापसंद पता थी. बचपन से घर में आताजाता रहा था. राम मां से चाय के लिए कहने ही वाला था कि मां चाय ले कर आ गईं. साथ में ढेर सारा नमकीन भी. राम ने मां के पैर छुए हम दोनों चाय पीते हुए एकदूसरे से चुहलबाजी कर देर तक ढेरों बातें करते रहे. वह अचानक ही बोला, ‘‘तुझे याद है अपने साथ आभा नाम की एक लड़की पढ़ती थी जो तुझे घूरती रहती थी, पता है वह डाक्टर बन गई है?’’ आभा नाम सुन सोते से जागा. उसे झिंझड़ते हुए बोला, ‘‘क्या बात कर रहा है, तुझे पक्का यकीन है कि वह वही थी?’’ रामप्रकाश ने बताया कि वह एक सेमिनार में गया था वहीं उस से मुलाकात हुई थी.

मैं ने उसे नहीं पहचाना मेरा नाम सुन कर वह स्वयं ही मेरे पास आई और पूछने लगी कि ‘‘क्या आप फलांफलां शहर से आए हैं?’’ मेरे हां कहने पर बोली कि मेरी याद है मैं आभा आप के साथ उसी शहर के सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. मुझे सब याद आ गया. मैं ने कहा, ‘‘हां याद आया आप 1 साल तक हमारे साथ उसी स्कूल में पढ़ी हैं.’’ ‘‘आभा ने तेरा नाम लेकर पूछा कि क्या आप उन्हें जानते हैं? वे भी हमारे साथ पढ़ते थे?’’ ‘‘उस के मुख से तेरा नाम सुन जोर से हंसते हुए मैं ने कहा कि वह तो मेरा लंगोटिया यार है. उसी शहर में एक कालेज में लैक्चरर बन गया है. बच्चों को ज्ञान बांटता रहता है.’’ ‘‘आभा के चेहरे पर अनेक भाव आ और जा रहे थे. खुशी उस के चेहरे से टपक रही थी. चहकते हुए बोली कि आप जब भी वहां जाएं मेरे बारे में उन्हें जरूर बताइएगा और कहिएगा कि मैं अभी तक उन्हें भूली नहीं हूं. आभा ने अपने शहर और होस्टल का पता बताया साथ में तेरा पता पूछ मुसकराती, गुनगुनाती चली गई.’’ रामप्रकाश से आभा की बातें सुन कर हक्काबक्का सा हो मैं उस का मुंह ताकने लगा.

रामप्रकाश कहने लगा, ‘‘क्या तू भी उसे भूला नहीं है? वह वहां मुसकरा रही है यहां तू पगलाया दिख रहा है,’’ यह कहते हुए उस ने आभा के हास्टल का पता बताया और हंसता हुआ अपने घर चला गया. मेरा मन जैसे अपना होश ही खो बैठा. जीवन में अनेक वसंत एकसाथ खिल उठे. पोस्ट औफिस से ढेर सारे लिफाफे और टिकट ले कर आया और उसे पत्र लिखने बैठा. किस नाम से संबोधित करूं, क्या डाक्टर नाम से या आभा नाम से. उन दिनों में वह मेरी दोस्त भी नहीं थी, कौन थी वह मेरी कि मैं उस के बारे में सुन कर बेचैन हो रहा था. आखिर मैं ने ‘आभा’ नाम से ही संबोधित करते हुए 2 लाइन का पत्र लिख डाक में डाल दिया.

आभा को भी कहां चैन था. उस ने रामप्रकाश से मिलने के बाद ही मुझे 2 लाइन का पत्र डाल दिया था कि मैं आप का इंतजार कर रही हूं, कब आएंगे? मेरे पंख परवाज मिलते ही उड़ने को बेताब हो उठे. तुरंत पत्र लिख डाक में डाल दिया कि फलां ट्रेन से आ रहा हूं तुम स्टेशन पर मिलना. ट्रेन की रातभर की यात्रा बड़ी लंबी लग रही थी, समय ही नहीं कट रहा था. नींद कोसों दूर, मन उमंग में उड़ान भर झम और घूम रहा था. साथ में यह जिज्ञासा भी थी कि हम एकदूसरे को कैसे पहचानेंगे, बातचीत की पहल कौन करेगा यदि नहीं आई तो? जैसेतैसे रात कटी, सवेरा होते ही ट्रेन अपने गंतव्य पर पहुंच गई. मैं ट्रेन से उतर वेटिंगरूम में पहुंच कर तरोताजा हो बाहर आया.

स्टेशन के दरवाजे के पास पहुंच मेरी निगाहें उसे खोजने लगीं. वह भी मुझे खोज रही थी. भीड़ छंटते ही उस ने अचानक मेरे सामने आ कर मुझ से पूछा, ‘‘क्या आप रामप्रकाश के मित्र हैं?’’ ‘‘मैं ने कहा हां.’’ अपना परिचय देते हुए बोली, ‘‘मैं आभा.’’ मेरे मुंह से बोल ही नहीं निकले, भौचक सा खड़ा हुआ कभी उसे देखता कभी अपने को. कुछ पल मौन रह. पहल करते हुए आभा ने कहा, ‘‘यहीं खड़े रहने का विचार है क्या?’’ मेरी तंद्रा टूटी. मैं ने कहा, ‘‘मैं कहीं खो गया था.’’ वह पूछ बैठी, ‘‘कहां?’’ मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारी नीली आंखों में.’’ आभा के साथ मैं अपने बचपन के दोस्त के घर पहुंचा, आभा का परिचय कराया, चायनाश्ता कर हम दोनों घूमने निकल गए. आभा के साथ उस के होस्टल गया.

वह एमबीबीएस करने के बाद पीजी की परीक्षा की तैयारी कर रही थी. उस ने मुझे पूरा मैडिकल कालेज घुमाया. दोपहर का भोजन हम ने वहीं कैंटीन में किया. शाम तक वहीं बैठ कर अपने बचपन और बीते दिनों की बातें एकदूसरे को सुना हंसतेहंसाते रहे. बचपन की जिस बात को हम बचपना समझ रहे थे वह वास्तव में प्यार का अंकुर था जो अब फूट रहा था. 3-4 दिन यों ही बीत गए, सुबह का निकला मैं रात को अपने दोस्त के घर पहुंचता. भाभीजी खिलखिला कर कहतीं, ‘‘वाह देवरजी क्या ऊंचा हाथ मारा है अब बस बरात की तैयारी कर लो.’’ मैं ने उन से कहा, ‘‘माताजी को तो आप ही राजी करोगी, शादी की तैयारी भी आप को ही करनी है.’’ पत्र लिखते रहने का वादा कर मैं आभा से विदा ले वापस आ गया. हमारे संपर्क का माध्यम अब पत्र थे.

हफ्ते में 1-2 पत्र उस के आते और प्रत्युत्तर में मेरे भी उतने ही पहुंच जाते. दुनिया गोल है यह अब पता लगा, अबोध, अबोले बच्चों के एकदूसरे के प्रति आकर्षण ने दोनों को यौवनकाल में मिला दिया. वक्त का चक्र कब किस का समय बदल दे कोई नहीं जानता. महीने 2 महीने में मैं आभा से मिलने चला जाता. 2-3 दिन वहां रुकता एकदूसरे से दिल की बातें कर नई उमंगों से सराबोर हो वापस आता. कभीकभी मैं उस से शादी के बाद आगे के भविष्य की बातें करने लगता कि वह कहां रहेगी, किसी हौस्पिटल में काम करेगी या अपना क्लीनिक खोल प्राइवेट प्रैक्टिस करेगी. वह हंस कर टाल देती कहती, ‘‘शादी की जल्दी क्या है समय आने पर हो जाएगी.’’ मेरी माताजी भी मुझ पर शादी करने का दबाव डाल रही थीं, वे जल्द से जल्द अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती थीं.

मैं उन्हें यह कह कर टाल देता कि अभी शादी की जल्दी क्या है? मैं ने आभा के बारे में उन्हें कुछ नहीं बताया था, पर मुझे यकीन था कि वे मेरी इच्छा जरूर पूरी करेंगी. मैं ने सोचा कि शादी के बारे में पहले आभा से सब बातें तय कर लूं फिर उन्हें बताऊंगा. इधर हम दोनों का प्यार परवान चढ़ रहा था उधर तकदीर अपनी तदबीर से जीवन की शतरंज की गोटी बिछा रही थी. भविष्य की अनहोनी से अनजान मैं अपने नए जीवन के तानेबाने बुन रहा था. वसंत का मदहोश महीना विरह की आग लगाने लगा, रातभर करवट बदलते बीत जाती. मन ने कुछ निर्णय लिया और मैं रात की ट्रेन से आभा से मिलने चल दिया.

अचानक मुझे आया देख वह चौंक गई, मेरी ओर देख अपनी आंखों का जादू बिखेरते हुए बोली, ‘‘सब ठीक तो है न?’’ हंसते हुए मैं बोला, ‘‘मदमाते इस वसंती मौसम में सब ठीक कैसे हो सकता है तुम्हारी याद सताती है? अब हमें शादी कर लेनी चाहिए. मेरी माताजी भी मेरी शादी का इंतजार कर रही हैं.’’ आभा ने कहा, ‘‘अभीअभी तो आए हो 1-2 दिन बाद इस बारे में बात करेंगे अभी कौफी पीने चलते हैं थकान दूर कर लो,’’ आभा को कौफी बहुत पसंद थी. 2-3 दिन ऐसे ही इधरउधर घूमने में निकल गये. मेरा मन घबरा रहा था कुछ अनहोनी का आभास भी हो रहा था. मैं रात की ट्रेन से वापसी का टिकट बुक करा चुका था.आभा और मैं एक पार्क में बैठे हुए वसंती मौसम का आनंद ले रहे थे.

तभी मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम्हारा शादी का क्या इरादा है? मुझे आज वापस भी जाना है, मैं चाहता हूं कि इस बार माताजी को यह खुशखबरी दे ही दूं.’’ आभा यह सुन कर बोली, ‘‘अपने मातापिता को इस संबंध में बताने से पहले मैं तुम्हें अपने बारे में कुछ बताना चाहती हूं.’’ मैं आश्चर्य से उस की ओर देख कुछ सोचने लगा. कुछ क्षण मौन रहने के बाद आभा ने कहा, ‘‘तुम अपने मातापिता के इकलौते बेटे हो और उन की इच्छा होगी कि उन के खानदान की वंश बेल आगे बढ़ती रहे…’’ आभा की बात बीच में ही काटते हुए मैं ने कहा, ‘‘भला यह भी कोई कहने की बात है हर किसी की यही इच्छा होती है.’’ वह मेरे मुंह पर हाथ रख कहने लगी, ‘‘शांत मन हो ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनो, दिल से नहीं दिमाग से सोच कर जवाब देना.’’ बातें करते हुए आभा अपने अतीत में खो गई, उसे वह दिन याद आ रहा था जब वह उस छोटे शहर और अपनी चाहत को छोड़ कर एक नए शहर में जा रही थी. मन ही मन वह काफी दुखी थी. अभी प्यार को समझने की उम्र भी नहीं थी किस को बोले और क्या बोले कि उस का यहां बहुत कुछ छूट रहा है.

आभा को वह पल भी याद आया जब उस के पिताजी मां से कह रहे थे कि अच्छा हुआ कि मेरा तबादला बड़े शहर में हो गया अब हम आभा को किसी बड़े डाक्टर को दिखा सकते हैं. वहां उस का ठीक से इलाज भी हो जाएगा. आभा के पेट में अकसर दर्द उठता रहता था. यहां के इलाज से फायदा नहीं हो रहा था. वह अपनी जिंदगी का एक अमूल्य हिस्सा छोड़ कर मातापिता के साथ बड़े शहर आ गई. उस के मातापिता ने वहां पहुंच कर बड़े हौस्पिटल में उसे दिखाया.

सघन जांच के बाद डाक्टर ने बताया कि उस के गर्भाशय में गांठ है जिस का औपरेशन करना होगा. कुछ क्षण मौन रहने के बाद डाक्टर ने कहा कि एक बात और है औपरेशन के बाद यह मां नहीं बन सकेगी. आप लोग सोचविचार कर जवाब दीजिए तभी हम औपरेशन करेंगे. डाक्टर की बातें सुन मातापिता दुविधा में पड़ गए. वे कुछ निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थे. एक तरफ बेटी का जीवन तो दूसरी तरफउस की बाकी बची जिंदगी. आखिर काफी सोचविचार कर के उन्होंने डाक्टर को औपरेशन करने की अनुमति दे दी. औपरेशन के बाद आभा को उस की मां ने धीरेधीरे सब बातें बता दीं. आभा ने तभी एक निर्णय लिया कि वह बड़ी हो कर डाक्टर ही बनेगी, अपने निर्णय से मातापिता को भी अवगत करा दिया.

अचानक अपने विचारों को झटका दे वर्तमान में वापसी कर उस ने कहना शुरू किया, ‘‘चूंकि मैं एक डाक्टर हूं और जानती हूं कि किसी कारणवश मैं मां नहीं बन सकती, तुम से शादी करूंगी तो तुम्हारे मातापिता की खवाहिश अधूरी रह जाएगी.’’ कुछ क्षण मौन में बीते. अपनी जादुई आंखें मेरी आंखों में डाल कर बोली, ‘‘जरा सोचो, क्या हम दोनों दोस्त बने रहकर ज्यादा खुश रह सकते हैं या पतिपत्नी. निर्णय तुम्हें लेना है.’’ मैं यह सुन अवाक रह गया. मुंह से बोल ही नहीं निकला जबान जैसे तालू से चिपक गई थी. असमंजस की स्थिति से मुझे उबारते हुए बड़े ही प्यार से बोली, ‘‘देखो सोचसमझ कर ही किसी नतीजे पर पहुंचना ठीक होता है् जल्दबाजी अच्छी नहीं होती.’’ अचानक अपने हाथ की घड़ी में समय देखा. मुसकराई और बोली, ‘‘मुझे अपनी नाइट ड्यूटी पर जाना है और तुम्हें स्टेशन, हम फिर मिलेंगे.’’ उसे हौस्पिटल छोड़ता हुआ मैं स्टेशन के लिए रवाना हो गया. लुटापिटा थकाहारा सा स्टेशन पहुंचा. 1 कप चाय पी ट्रेन में बैठ गया. व्यथित मन मझधार में फंस कर चक्कर काट रहा था.

दिल से बीचबीच में आवाज आती काश यह सब झठ होता. कुदरत के खेल निराले हैं. बचपन में मिलना फिर बिछड़ना जवानी में मिलना फिर बिछड़ना क्या यही नियति है? अगर ऐसा ही था तो दोबारा क्यों मिलाया? मेरे पास इन सवालों के जवाब नहीं थे. कभी अपना प्यार याद आता तो कभी बूढ़े मांबाप का चेहरा. सारी रात आंखों में कट गई. सुबह थकाहारा घर पहुंचा, पहुंचते ही सीधे अपने कमरे में जा कर लेट गया. माताजी ने कमरे में आ कर पूछा ‘‘क्या हुआ, तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ मैं ने कहा, ‘‘बुखार आ गया था अब ठीक हूं.’’ मां तो मां होती हैं. झट तेल ले आईं सिर में मालिश कर कहने लगीं, ‘‘अब ठीक हो जाओगे.’’ मां का आशीर्वाद भरा हाथ सिर पर आते ही मन को शांति मिली.

कुछ देर लेटे रहने के बाद स्वयं को तरोताजा महसूस कर उठ गया. अपने सकुशल पहुंचने का 2 लाइन का पत्र लिख डाक में डाल दिया. मैं हमेशा वापस आने पर आभा को एक लंबी सी चिट्ठी लिख कर डालता था परंतु इस बार सिर्फ चंद लाइनें. क्या सोचेगी वह? अपना निर्णय भी बताना है, क्या करूं क्या न करूं. मेरी नैया मझधार में डोल रही थी. कल चिट्ठी लिखूंगा सोचतेसोचते कितने ही कल निकल गए पर मेरा कल नहीं आना था तो नहीं आया. 8-10 दिन बाद आभा की एक लंबी सी चिट्ठी आई, हैरानपरेशान मन को कुछ चैन आया.

आभा ने मुझे संबोधित करते हुए लिखा था कि उस ने बहुत सोचसमझ कर एक निर्णय लिया है और इसे पूरा करने में मेरा सहयोग चाहती है. उस ने लिखा था कि चूंकि मैं अपने मातापिता की इकलौती संतान हूं और उन की इच्छा पूरी करना मेरा फर्ज है. तुम्हारे मातापिता की अभिलाषा अपने परिवार की वंश बेल को फलीभूत होते हुए देखने की है जिसे मैं पूरा नहीं कर सकती. ‘‘मैं अपने प्यार को यहीं विराम दे रही हूं. जो प्यार रूह से किया जाता है वही वास्तव में प्यार होता है, प्यार का कोई नाम नहीं होता.

हमारा प्यार बचपन का पवित्र प्यार है, अब भी है और हमेशा रहेगा. शादी के बंधन में बंधने से प्यार का रूप कुछ और ही हो जाता है. ‘‘मैं तुम्हें और तुम्हारे मातापिता को सुखी देखना चाहती हूं. कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. ऐसे ही कुछ निर्णय दिल से नहीं विवेक से लिए जाते हैं. मैं ने जो कुछ भी सोचा है उसी में हम दोनों की खुशियां निहित हैं. ‘‘मेरा चयन गायनिक में पीजी के लिए हो गया है फिलहाल मैं शादी नहीं करूंगी. तुम अपने मातापिता की इच्छानुसार शादी जरूर कर लेना. ‘‘यही हमारे प्यार का सुखद अंत होगा. मैं तुम्हें भूल तो नहीं पाऊंगी और जानती हूं कि तुम भी नहीं भूल पाओगे क्योंकि तुम से ज्यादा मैं तुम्हें जानती हूं. हम मिलतेमिलाते रहेंगे.

आशा है तुम मेरे निर्णय का सम्मान करोगे.’’ पत्र पढ़ कर सन्न रह गया,आंखों में अश्रुबिंदु छलछला गए. क्या जवाब दूं. सारे सवालजवाब तो उसी ने कर दिए. आभा के पास से वापस आने के बाद से मन और शरीर वैसे ही अधमरा था. अब पत्र पढ़ कर तो जैसे जान ही निकल गई. मन की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी. अक्ल ने भी जैसे काम करना बंद कर दिया. क्या करूं कुछ सूझ ही नहीं रहा था. नियति ने हमारे प्यार का क्या यही अंत रचा था? 2-4 गहरीगहरी सांसें ले अपने मन पर काबू किया और शांति से सोचसमझ कर आखिरी बार आभा से मिलने का निर्णय लिया. मन कहीं भटक रहा था. तन स्थिर था दोनों के बीच किसी तरह तालमेल बैठाने में लगा हुआ था.

आभा के पत्र को वापस लिफाफे में डाला, जाने की तैयारी करने के लिए जरूरी सामान निकाल कर पलंग पर रखा. विचारों की रेलमपेल के बीचोंबीच दरवाजे की कुंडी की खटखटाहट ने खलल डाल दिया. झंझलाते हुए मैं ने दरवाजा खोला. देखा तो सामने रामप्रकाश खड़ा था. मुझे इस हालत में देख वह सकते में आ गया. बिना कुछ कहेसुने धकियाते हुए मुझे कमरे में ले आया. कमरे में बिखरा सामान और मेरे चेहरे पर उड़ती हवाइयां देख उस ने मन ही मन अंदाजा लगा लिया कि हम दोनों के बीच कुछ तो हुआ है. सबकुछ देखने के बाद उस ने पूछा, ‘‘बता आभा और तेरे बीच सब ठीकठाक है न?’’ कोई उत्तर न दे कर मैं ने उस के हाथ में आभा का पत्र थमा दिया.

एक ही सांस में रामप्रकाश ने आभा का पत्र पढ़ लिया. पत्र पढ़ कर वापस लिफाफे में डाला. मेरी ओर मुखातिब हो बोला, ‘‘तुझ से एक ही बात पूछ रहा हूं सचसच बताना. अपना एक बच्चा होना चाहिए सिर्फ एक इसी कारण आभा की बात मान कर तू दूसरी लडकी से शादी करेगा. अरे पढ़ेलिखे बेवकूफ आदमी यह बता कि उस दूसरी लड़की से भी शादी के बाद बच्चा नहीं हुआ तो क्या करेगा? क्या मुझे नहीं देखा? मैं मां को सारी बातें समझ दूंगा.’’ रामप्रकाश की बातों ने मुझे अंदर तक हिला दिया, यह क्या अनर्थ करने जा रहा था मैं? बचपन के बिछड़े अब मिले वह भी कुदरत ने मौका दिया और मैं उसे गंवाने को तैयार हूं. नहीं ऐसा नहीं कर सकता मैं, राम ने सच ही कहा था कि मैं पढ़ालिखा बेवकूफ आदमी ही हूं. एक बच्चे के कारण 2 जिंदगियां बरबाद नहीं होने दूंगा. मेरा बड़बड़ाना चालू था. एकाएक राम ने मुझे झकझरते हुए पूछा, ‘‘क्या बड़बड़ा रहा है तू?’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं आभा की बात नहीं मानूंगा, उसे राजी कर उसी से शादी करूंगा. तू ने मेरी आंखों से परदा हटा दिया. चल मेरे साथ मैं मां को खुशखबरी दे दूं.’’ हम दोनों की कुछकुछ बातें मां के कानों में जा रही थीं.

चाय देने के बहाने वे कमरे में आईं. कमरे की हालत और मेरी उतरी सूरत देख ठिठक कर दरवाजे पर खड़ी की खड़ी रह गईं. रामप्रकाश ने आगे बढ़ कर मां के हाथ से चाय ले कर टेबल पर रखी और झक कर उन के पैर छुए. मां ने प्रश्नवाचक निगाहों से रामप्रकाश से पूछा, ‘‘बेटा राम सचसच बताना क्या हुआ है?’’ राम ने पलक झपकते ही सारी बात मां को बता दीं. मां ने मेरी ओर देखा और फिर कहने लगीं, ‘‘मुझे तो शुरू से सब समझ में आ गया था. तुम्हारा बारबार जानेआने और चेहरे के हावभाव से मैं अनजान नहीं थी बस इंतजार कर रही थी कि तुम मुझे कब बताओगे? ‘‘आभा मां नहीं बन सकती तो क्या हुआ उस ने अपना सच नहीं छिपाया इस बात से मैं बहुत खुश हूं. बेटे राम की ही भांति हम भी किसी बच्चे को गोद ले कर उसे एक अच्छी जिंदगी देंगे,’’ मैं ने मां के चरणों में प्रणाम किया.

मन इतना हलका हो गया था कि जैसे हवा में उड़ रहा हो. वह उड़तेउड़ते आभा से बातें करने लगा. आभा और मैं पार्क में बैठ कर बातचीत में मशगूल हो कर अपनी जिंदगी की पुस्तक के पन्नों को अपने ख्वाबों के सतरंगी रंगों से सजा कर रखने में लगे हुए थे. ऐसे समय मेरी आंखें अकसर बंद हो जाती थीं. तब आभा हंस कर कहती ज्यादा ख्वाब मत देखा करो. ख्वाबों में आंखें बंद रहती हैं और बंद आंखों से ठोकरें ही लगती हैं. मेरा एक ही जवाब होता कि तुम हो न और हौले से मुसकरा देता.

लेखक- आशा सक्सेना

Love Story

Hindi Fictional Story: डाक्टर की मेहरबानी- क्या गलती कर बैठी आशना?

Hindi Fictional Story: एकदिन गौतम अपनी मोटरसाइकिल से आशना को ले कर शहर से कुछ दूर स्थित एक पार्क में पहुंचा.  झील के किनारे एकांत में दोनों प्रेमी पैर पसारे बैठे थे. उन्हें लगा दूरदूर तक उन्हें देखने वाला कोई नहीं है.

तभी  झील के पानी में छपाक की धीमी सी आवाज हुई, तो आशना बोली, ‘‘लगता है किसी ने पानी में पत्थर फेंका है… कोई आसपास है और हमें देख रहा है.’’

‘‘अरे, ऐसा कुछ नहीं है. कभीकभी मछलियां ही पानी के ऊपर उछलती रहती हैं. यह उन्हीं की आवाज है,’’ गौतम बोला.

आशना के बालों से उठती भीनीभीनी मादक खुशबू से गौतम को बिन पीए ही अजीब सा नशा हो रहा था. उस ने पूछा, ‘‘तुम कौन से ब्रैंड का तेल लगाती हो?’’

आशना मुसकरा दी और फिर उस ने धीरेधीरे गौतम की जांघ पर अपना सिर रख दिया. गौतम उस के लंबे बालों को हाथों में ले कर

कभी सूंघता तो कभी सहलाता. मौसम भी खुशनुमा था. वह आशना के चेहरे पर देर से निगाहें टिकाए था.

आशना ने पूछा, ‘‘क्या देख रहे हो?’’

‘‘तुम्हारे मृगनयनों को.’’

‘‘अब चलें? शाम हो चली है. अंधेरा होने से पहले घर पहुंचना होगा,’’ कह वह धीरेधीरे उठ खड़ी हुई और अपनी साड़ी की सलवटें ठीक करने लगी. आसमानी रंग की प्लेन साड़ी उस पर अच्छी लग रही थी. तभी हवा का एक झोंका आया और उस के आंचल ने उड़ कर गौतम के चेहरे को ढक लिया.

गौतम ने उस के पल्लू को पकड़ लिया तो वह बोली, ‘‘छोड़ दो आंचल.’’

‘‘मौसम है आशिकाना और आज प्यार करने को जी चाह रहा है.’’

‘‘छोड़ो, देर हो रही है.’’

‘‘चलो आज छोड़ देता हूं,’’ कह आशना की कमर के खुले हिस्से को अपनी बांह के घेरे में ले कर उसे कस कर अपनी ओर खींच लिया और फिर सट कर दोनों बाइक की तरफ चल पड़े.

गौतम और आशना की इन हरकतों को थोड़ी ही दूर बैठा एक दंपती देख रहा था. डाक्टर प्रेम लाल और डाक्टर शीला माथुर. उस पार्क से थोड़ी दूर उन का अस्पताल था. कभीकभी अस्पताल से छूटने पर अपना तनाव और थकान कम करने के लिए वे भी इसी झील के किनारे बैठते थे.

उन दोनों प्रेमियों के जाने पर शीला बोलीं, ‘‘मैं इस लड़के को जानती हूं. कुछ दिनों तक मैं उस के महल्ले में रही थी. एकदम आवारा लड़का है. अमीर बाप का बिगड़ा लड़का है. कालेज में एक ही क्लास में 3 साल से फेल होता आ रहा है और नईनई लड़कियों को फंसाता है. एक लड़की ने इस के दुष्कर्मों के चक्कर में पड़ कर आत्महत्या का भी प्रयास किया था.’’

डाक्टर प्रेम ने कहा, ‘‘छोड़ो, हमें क्या लेनादेना है इन लोगों से.’’

इस घटना के करीब 4-5 महीने बाद डाक्टर दंपती की नाइट ट्यूटी थी. अचानक एक औटोरिकशा से एक दंपती ने एक लड़की को सहारा दे कर उतारा. वे उस लड़की के साथ इमरजैंसी रूम में डाक्टर के पास गए. औरत बोली, ‘‘डाक्टर साहब, यह मेरी बेटी है. आज दोपहर से ही इस के पेट में बहुत दर्द हो रहा है और ब्लीडिंग भी हो रही है.’’

डाक्टर ने लड़की का ब्लड प्रैशर चैक किया और तुरंत फोन पर कहा, ‘‘डाक्टर शीला, आप तुरंत यहां आ जाएं. एक इमरजैंसी केस है.’’

2 मिनट के अंदर ही स्त्रीरोग विशेषज्ञा शीला वहां आ गईं. उन्होंने रोगी को बैड पर लिटा कर परदा लगा दिया. कुछ देर बाद वे बोलीं, ‘‘इसे तो बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हो रही है. फौरन औपरेशन थिएटर में ले जाना होगा… मु झे लगता है औपरेशन करना होगा.’’

औपरेशन का नाम सुन कर उस लड़की के मातापिता घबरा उठे. पिता ने पूछा, ‘‘डाक्टर साहिबा, खतरे की कोई बात तो नहीं है?’’

‘‘अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है. आप लोग ओटी के बाहर इंतजार करें,’’ कह वे अपने पति डाक्टर प्रेम के साथ औपरेशन थिएटर में गईं.

थोड़ी देर बार एक नर्स ने बाहर आ कर पूछा, ‘‘इस लड़की के गार्जियन आप लोग हैं?’’

उस के पिता उठ कर बोले, ‘‘हां, मैं उस का पिता हूं.’’

नर्स ने एक पेपर देते हुए कहा, ‘‘आप जल्दी से इस पर साइन कर दें, लड़की का औपरेशन करना है, अभी तुरंत.’’

‘‘क्या बात है सिस्टर?’’

‘‘अभी बात करने का वक्त नहीं है. बाकी बातें औपरेशन के बाद डाक्टर से पूछ लेना. आप को डिस्चार्ज से पहले एक बोतल खून ब्लड बैंक में जमा कराना होगा. अभी हम अपने स्टौक से खून चढ़ा रहे हैं.’’

उस आदमी ने ब्लड बैंक में जा कर अपना खून जमा किया और वापस आ कर ओटी के बाहर बैंच पर बैठते हुए पत्नी से कहा, ‘‘पता नहीं बैठेबैठाए आशना बिटिया को अचानक क्या हो गया है?’’

औपरेशन टेबल पर डाक्टर ने आशना से पूछा, ‘‘क्या यह उसी लड़के के साथ का नतीजा है, जिस के साथ अकसर तुम लेक पार्क में जाती हो?’’

आशना ने रोते हुए कहा, ‘‘जी डाक्टर, पर मेरी एक गलती का अंजाम यह होगा, मैं नहीं जानती थी. आप मेरी जान बचाने की कोशिश न करें, मुझे मरने दें.’’

‘‘मैं तुम्हारी तरह बेवकूफ और गैरजिम्मेदार नहीं हूं… मैं अपनी ड्यूटी जानती हूं.’’

‘‘पर मैं इस कलंक के साथ जी कर क्या करूंगी? अगर मु झे बचा भी लेती हैं तो भी मैं सुसाइड करने वाली हूं… मेहरबानी कर मुझे मरने दें.’’

‘‘तुम घबराओ नहीं, मैं तुम्हें बदनाम नहीं होने दूंगी और तुम यहां से सहीसलामत घर जाओगी. आगे अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना और अपने मातापिता की इज्जत का खयाल करना.’’

‘‘जी, डाक्टर.’’

‘‘बस, अब तुम पर ऐनेस्थीसिया का असर होगा और मैं औपरेशन करने जा रही हूं.’’

करीब 2 घंटे बाद डाक्टर शीला ओटी से बाहर आईं. उन्हें देखते ही आशना के मातापिता दौड़े आए. पूछा, ‘‘अब कैसी है हमारी बेटी?’’

‘‘आप बेटी को सही समय पर अस्पताल ले आए वरना और ज्यादा ब्लीडिंग होने से जान का खतरा था. आप की बेटी का औपरेशन सफल रहा और खतरे की कोई बात नहीं है.’’

‘‘पर उसे हुआ क्या है?’’ आशना के पिता ने पूछा.

‘‘आप मेरे साथ मेरे कैबिन में आएं.’’

दोनों मातापिता डाक्टर के कैबिन में गए, तो डाक्टर शीला ने पेशैंट के पिता से पूछा, ‘‘आप ने फाइल में बेटी की उम्र 17 साल लिखी है यानी वह नाबालिग है… माफ करना आशना गर्भवती थी?’’

‘‘पर यह कैसे संभव है?’’

‘‘यह तो आप की बेटी ही बता सकती है. उस का एक फर्टलाइज्ड एग गर्भाशय तक नहीं पहुंच सका और फैलोपियन ट्यूब में ही ठहर गया था. जब गर्भ बड़ा हो गया तो उस की नली फट गई और ब्लीडिंग होने लगी. उस नली को हम ने काट कर निकाल दिया है. अब चिंता की कोई बात नहीं है.’’

आशना के मातापिता ने आश्चर्य से डाक्टर की तरफ देखा और फिर शर्म से सिर  झुका लिया.

आशना को 1 सप्ताह बाद डिस्चार्ज होना था. डाक्टर शीला की सहायक ने पूछा, ‘‘डिस्चार्ज फाइल में क्या लिखें मैम? आप ने कहा था डिस्चार्ज फाइल तैयार करते समय आप से पूछने को?’’

‘‘पेशैंट को देने वाली डिस्चार्ज स्लिप पर तुम पूरा सच लिखना और हौस्पिटल की फाइल में लिखना दाहिनी साइड की फैलोपियन ट्यूब फट गई थी, जिसे औपरेशन कर निकाल दिया गया है. आगे एक नोट लिख देना कि डिटेल रिपोर्ट्स औफ सर्जरी गायनोकोलौजिस्ट की फाइल में है और यह डिटेल पेपर्स की फाइल मुझे दे देना, साथ ही यह बात बस हमारे बीच ही रहे. तुम भी एक औरत हो, समझ सकती हो.’’

शीला के पति डाक्टर प्रेम भी तब तक वहां आ गए थे. उन्होंने कहा, ‘‘शीला, यह तुम क्या कर रही हो? हौस्पिटल फाइल में ही औपरेशन नोट्स रहने दो. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, पेशैंट के प्रति हमदर्दी का यह मतलब नहीं है कि तुम अस्पताल के नियम तोड़ दो.’’

‘‘तरीके से तो आप सही कह रहे हैं, पर इस नाबालिग बच्ची की नाजायज प्रैगनैंसी की खबर और लोगों के बीच फैल सकती है जिस से लड़की की बदनामी होगी. इस के भविष्य पर भी प्रतिकूल असर हो सकता है. मैं डाक्टर के साथ एक औरत भी हूं और इस लड़की का दर्द समझ सकती हूं.’’

फिर वे आशना के पिता से बोलीं, ‘‘मुझे आप की फाइल में सच लिखना पड़ेगा. यह फाइल आप की है, आप चाहें तो इसे नष्ट करें या रखें. आप की बेटी के हित में जितना मुझसे हो सकता था, मैंने वही किया है.’’

मां ने पूछा, ‘‘आशना भविष्य में मां बन सकती है या नहीं?’’

‘‘हां, बन सकती है. उस की एक फैलोपियन ट्यूब बिलकुल सही सलामत है.’’

‘‘पर इसके औपरेशन का दाग तो पेट पर रह जाएगा? शादी के बाद कहीं पति को कोई शक की संभावना तो नहीं रहेगी?’’

‘‘मैं ने लैप्रोस्कोपिक विधि से औपरेशन किया है. बहुत ही छोटा सा चीरा लगाया है. उस के पेट पर कोई बड़ा निशान नहीं रहेगा. जो है वह भी जल्दी भर जाएगा. आशना की शादी में अभी काफी समय बाकी है. मैं ने उस से बात की है. वह अपनी भूल पर शर्मिंदा है और बता रही थी कि अब वह पढ़ाई पर सीरियस होगी और एमए करने के बाद ही शादी करेगी.’’

आशना जब डिस्चार्ज हो कर घर आई तो उस ने मां से कहा, ‘‘अब मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रही… जी कर क्या करूंगी?’’

‘‘खबरदार जो ऐसी बेवकूफी की बातें दिमाग में लाई. इसे एक हादसा समझ कर भूल जाओ. आगे किसी से इस की चर्चा भी नहीं करना. पति से भी नहीं. मन लगा कर पढ़ोलिखो. हम तुम्हारी शादी धूमधाम से करेंगे.’’

फिर मां ने अपने पति से कहा, ‘‘आप अब आशना से इस बारे में कुछ न कहेंगे. मैंने उस से बात की है. वह अपनी भूल पर बहुत शर्मिंदा है. वह अब पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाएगी.

‘‘भला हो उस लेडी डाक्टर का जिस ने हमारी इज्जत बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.’’

इस घटना के 7 साल बाद आशना फिर डाक्टर शीला के अस्पताल में आई. इस बार वह शादीशुदा थी और अपने पति के साथ थी. वह गर्भवती थी और चैकअप के लिए आई थी. शीला ने उस के पति को बाहर इंतजार करने के लिए कहा और आशना को अंदर बुलाया.

डाक्टर शीला ने आशना से पूछा, ‘‘तुम्हारे पेट का दाग लगभग मिट गया है. अभी कौन सा महीना चल रहा है?’’

‘‘5वां महीना चल रहा है मैम.’’

चैक करने के बाद डाक्टर शीला बोलीं, ‘‘बच्चा एकदम ठीक है. बस अपने खानपान पर ध्यान देना और थोड़ा ऐक्टिव रहने की कोशिश करना. इस से नैचुरल प्रसव में आसानी होगी. कंप्लीट रैस्ट की कोई जरूरत नहीं है. तुम्हारे पति बाहर बेचैन हो रहे हैं, तुम से बहुत प्यार करते हैं न?’’

‘‘जी मैम, मैं ने अपने पास्ट की बात उन्हें नहीं बताई है. मैं तो आत्महत्या करने की सोच रही थी, आप ने मुझे मरने से बचा लिया और मेरा भविष्य भी संवार दिया. आप के आभार के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं,’’ और उस की आंखें भर आईं.

‘‘यह गुड न्यूज जल्दी से अपने पति को दो,’’ डाक्टर शीला बोलीं.

आशना कैबिन से बाहर निकली तो उस की आंखें अभी तक गली थीं. उस के पति ने पूछा  ‘‘क्या बात है आशना, सब ठीक है न? तुम्हारी आंखें गीली क्यों हैं?’’

‘‘ये खुशी के आंसू हैं… जच्चाबच्चा दोनों ठीक हैं. मिठाई खिलाना न भूलना आशना,’’ डाक्टर शीला ने कहा.

आशना और उस के पति दोनों ने हंस कर डाक्टर को थैंक्स कहा.

Hindi Fictional Story

Family Love Story: माय डैडी बेस्ट कुक

Family Love Story: “सुनो! पेपर सोप और सैनीटाईजर पर्स में रख लिया है ना… और मास्क मत उतारना… दूरी बनाकर ही अपना काम करना है और हाथ बार-बार धोती रहना…” दो दिन के लिए टूर पर जाती विजया को पति कैलाश बस में बिठाने तक हिदायतें दे रहा था.

“हाँ बाबा! सब याद रखूँगी… और तुम भी अपना और निक्कू का खयाल रखना… संतरा को टाइम पर आने को कह देना ताकि आप दोनों को खाने-पीने की परेशानी ना हो…” विजया ने भी अपनी हिदायतों का पिटारा खोल दिया. बस चल दी तो कैलाश हाथ हिलाकर विदा करता हुआ पार्किंग की तरफ बढ़ गया.

“स्कूल बंद होने के कारण बच्चों को घर में संभाले रखना कितना मुश्किल होता है… लेकिन कोई बात नहीं… दो दिन की ही तो बात है… संभाल लूँगा… फिर संतरा तो है ही…” मन ही मन सोचता… योजना बनाता… कैलाश घर की तरफ बढ़े जा रहा था. घर आकर देखा तो संतरा अपना काम निपटा रही थी.

“संतरा ना हो तो हम बाप-बेटे को दूध-ब्रेड से ही काम चलाना पड़े.” सोचते हुये कैलाश ने भी अपना टिफिन पैक करवाया और निक्कू को संतरा के पास छोडकर ऑफिस के लिए निकल गया.

“पापा! कार्टून चलाने दो ना.” रात को निक्कू ने कैलाश के हाथ से रिमोट लेने की जिद की.

“अभी ठहरो. आठ बजे हमारे प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं, उसके बाद.” कैलाश ने रिमोट वापस अपने कब्जे में कर लिया. मन मसोस कर निक्कू भी वहीं बैठकर भाषण समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगा.

“आज रात बारह बजे से पूरे देश में सम्पूर्ण लॉकडाउन किया जाएगा. समस्त देशवासियों से विनती है कि जो जहां है, वो वहीं रहकर इसमें सहयोग करे.” प्रधानमंत्री का उद्बोधन सुनते ही कैलाश के माथे पर पसीने की बूंदें छलछला आई. उसने तुरंत विजया को फोन लगाया.

“सुना तुमने! आज रात से पूरे देश में लॉकडाउन होने जा रहा है.” कैलाश के स्वर में चिंता थी.

“हाँ सुना! लेकिन तुम फिक्र मत करो. हमारा विभाग आवश्यक सेवाओं में शामिल है इसलिए ऑफिस बंद नहीं होगा.” विजया ने पति को आश्वस्त करने की कोशिश की.

“वो सब तो ठीक है लेकिन लॉकडाउन में तुम वापस कैसे आओगी?” कैलाश ने उत्तेजित होते हुये कहा.

“देखते हैं. कुछ न कुछ उपाय तो करना ही पड़ेगा. तुम फिक्र मत करो. बस! अपना और निक्कू का खयाल रखना. गुड नाइट.” कहते हुये विजया ने फोन काट दिया लेकिन कैलाश की चिंता दूर नहीं हुई. पूरी रात करवट बदलते-बदलते बीती. सुबह फोन की घंटी से आँख खुली. देखा तो संतरा का फोन था.

“साहब! हमारे मोहल्ले में एक आदमी कोरोना का मरीज निकला है. आसपास कर्फ़्यू लगा दिया गया है. मैं नहीं आ सकूँगी.” संतरा की बात सुनते ही कैलाश की नींद उड़ गई. वह फौरन बिस्तर से बाहर आया और निक्कू के कमरे में गया. निक्कू अभी तक सो रहा था. उसके चेहरे पर मासूमियत बिखरी थी. कैलाश को उस पर प्यार उमड़ आया.

“कितना बेपरवाह होता है बचपन भी.” कैलाश ने निक्कू के बालों में हाथ फिरा दिया. निक्कू ने आँखें खोली.

“दूध कहाँ है?” निक्कू ने कहा तो कैलाश को याद आया कि निक्कू दूध पीने के बाद ही फ्रेश होने जाता है. वह रसोई की तरफ लपका. दूध गर्म करके उसमें चॉकलेट पाउडर मिलाया और निक्कू को दिया. पहला घूंट भरते ही निक्कू ने मुँह बिचका दिया.

“आज इसका टेस्ट अजीब सा हैं. मुझे नहीं पीना.” निक्कू ने गिलास उसे वापस थमा दिया. कैलाश ने रसोई में रखे दूध को सूंघा तो उसमें से खट्टी-खट्टी गंध आ रही थी.

“उफ़्फ़! रात में दूध को फ्रिज में रखना भूल गया. विजेता ही ये सब काम निपटाती है इसलिए दिमाग में ही नहीं आया.” सोचते हुये कैलाश कुछ परेशान सा हो गया और दूध की व्यवस्था के बारे में सोचने लगा.

भाषण में कहा गया था कि आवश्यक दुकानें खुली रहेंगी. याद आते ही  कैलाश ने तुरंत गाड़ी निकाली और दूध पार्लर से दूध के पैकेट लेकर आया. घर पहुँचते ही मेल चेक किया तो पता चला कि आज से आधे कर्मचारी ही ऑफिस आएंगे. उसे आज नहीं कल ऑफिस जाना है. उसने राहत की सांस ली और दूध गर्म करने लगा. इस बीच मोबाइल पर अपडेट्स देखना भी चालू था. सर्रर्रर्र… से दूध उबल कर स्लैब पर बिखर गया तो कैलाश ने अपना माथा पीट लिया. मोबाइल एक तरफ रखकर वह रसोई साफ करने लगा.

“घर संभालना किसी मोर्चे से कम नहीं.” अचानक ही उसका मन विजया और संतरा के प्रति आदर से भर उठा.

“पापा! आज नाश्ते में क्या है?” निक्कू रसोई के दरवाजे पर खड़ा था.

“अभी तो ब्रेड-जैम से काम चला ले बेटा. लंच में बढ़िया खाना खिलाऊंगा.” कैलाश ने उसे किसी तरह राजी किया और ब्रेड पर जैम लगाकर निक्कू को नाश्ता दिया. दो-तीन ब्रेड खुद भी खाकर वह अपना लैपटाप लेकर बैठ गया और ऑफिस के काम को अपडेट करने लगा.

“पापा! खाने में क्या बनाओगे? आपको आता तो है ना बनाना?” निक्कू ने पूछा तो कैलाश सचमुच सोच में पड़ गया. उसे तो कुछ बनाना आता ही नहीं. बेचारी विजेता कितना चाहती थी कि कभीकभार वह भी रसोई में उसकी मदद करे लेकिन उसने तो अपने हिस्से का काम संतरा के सिर डालकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी.

कैलाश रसोई में घुसा. आटे का डिब्बा निकालकर परात में आटा साना और उसे गूंधने की कोशिश करने लगा. कभी आटे में पानी ज्यादा तो कभी पानी में आटा ज्यादा… किसी तरह पार पाई तो देखा कि इतना आटा तो वे दोनों पूरे सप्ताह भी खत्म नहीं कर सकेंगे.

“चलो ठीक ही है, रोज-रोज की एक्सर्साइज़ से मुक्ति मिली.” सोचते हुये कैलाश ने सिंक में अपने हाथ धोये और फ्रिज में से सब्जी निकालने लगा. लौकी… करेला… टिंडे… नाम सुनते ही निक्कू मना में सिर हिला रहा था. कैलाश भी खुश था क्योंकि उसे ये सब बनाना भी कहाँ आता था. किसी तरह आलू पर आकार बात टिकी तो कैलाश ने भी राहत की सांस ली.

धो-काटकर आलू कूकर में डाले. मसाले और थोड़ा पानी डालकर कूकर बंद कर दिया. सीटी पर सीटी बज रही थी लेकिन कैलाश को कुछ भी अंदाज नहीं था कि गैस कब बंद की जाये. थोड़ी देर में कूकर में से जलने की गंध आने लगी तो कैलाश ने भागकर गैस बंद कि. ठंडा होने पर जब कूकर खुला तो माथा पीटने के अलावा कुछ भी शेष नहीं था. सब्जी तो जली ही, कूकर भी साफ करने लायक नहीं बचा था. निक्कू का मुँह फूला सो अलग.

किसी तरह दो मिनट नूडल बना-खाकर भूख मिटाई गई लेकिन कैलाश ने ठान लिया था कि आज रात वह निक्कू को शाही डिनर जरूर करवाएगा.

शाम को जब विजया का फोन आया तो कैलाश ने झेंपते हुये दिन की घटना का जिक्र किया. सुनकर वह भी हँसे बिना नहीं रह सकी.

“अच्छा सुनो! उस खट्टी गंध वाले दूध का क्या करूँ?” कैलाश ने पूछा.

“एकदम सही समय पर याद दिलाया. तुम उसे गर्म करके उसमें एक नीबू निचोड़ दो. पनीर बन जाए तो उसके पराँठे सेक लेना.” विजेता ने आइडिया दिया तो कैलाश भी खुश हो गया. उसने विडियो कॉल पर विजेता की निगरानी में पनीर बनाया और उसे एक कपड़े में बांधकर कुछ देर के लिए लटका दिया. दो घंटे बाद जब पनीर का सारा पानी निकल गया तो विजया की मदद से उसने पनीर का भरावन भी तैयार कर लिया. अब शाम को कैलाश पूरी तरह से बेटे को शाही डिनर खिलाने के लिए तैयार था.

आटा तो दोपहर से गूँथा हुआ ही था, कैलाश ने खूब सारा भरावन भर के परांठा बेला और निक्कू की तरफ गर्व से देखते हुये उसे तवे पर पटक दिया.

“पापा! करारा सा बनाना.” निक्कू भी बहुत उत्साहित था. तभी कैलाश का फोन बजा और वह कॉल लेने चला गया. नेटवर्क कमजोर होने के कारण कैलाश फोन लेकर बालकनी में आ गया. बात खत्म करके जब वह रसोई में आया तो तवे से उठते धुएँ को देखकर घबरा गया. उसने भागकर पराँठे को पलटा लेकिन तवा बहुत गर्म था और जल्दबाज़ी में उसे चिमटा कहाँ याद आता। नतीजन! पराँठे को छूते ही उसका हाथ जल गया और हड़बड़ाहट में पनीर के भरावन वाला प्याला स्लैब से नीचे गिर गया.

“गई भैंस पानी में!” कैलाश ने सिर धुन लिया. निक्कू का मूड तो खराब होना ही था.

“पापा प्लीज! आपसे नहीं होगा. मम्मी को बुला लीजिये.” निक्कू रोने लगा. वह अब कैलाश के हाथ का बना कुछ भी अंटशंट नहीं खाना चाहता था. निक्कू को खुश करने के लिए कैलाश ने ऑनलाइन खाने की तलाश की लेकिन उसे नाउम्मीदी ही हाथ लगी.

तभी उसे याद आया कि ऐसी ही कई परिस्थितियों में विजया झटपट मटरपुलाव बना लिया करती है. निक्कू भी शौक से खा लेता है. कैलाश ने फटाफट चावल धोये और थोड़े से मटर छील लिये. गैस पर कूकर भी चढ़ा दिया लेकिन फिर वही समस्या… कूकर में पानी कितना डाले और कितनी देर पकाये…

तुरंत हाथ फोन की तरफ बढ़े और विजया का नंबर डायल हुआ लेकिन कैलाश ने तुरंत फोन काट दिया. वह बार-बार अपने अनाड़ीपन का प्रदर्शन कर उसे परेशान नहीं करना चाहता था. घड़ी की तरफ देखा तो अभी नौ ही बजे थे. उसने संतरा को फोन लगाया.

“अरे साब! पुलाव बनाना कौन बड़ा काम है. पहले घी डालकर लोंग-इलाइची तड़का लो फिर चावल और जितना चावल लिया, ठीक उससे दुगुना पानी डालो… मसाले डालकर दो सीटी कूकर में लगाओ और पुलाव तैयार…” संतरा ने हँसते हुये बताया तो कैलाश को आश्चर्य हुआ.

“ये औरतें भी ना! कमाल होती हैं… कैसे उँगलियों पर हिसाब रखती हैं.” कैलाश ने सोचा. लेकिन तभी उसे कुछ और याद आ गया.

“और मसाले? उनका क्या हिसाब है?” कैलाश ने तपाक से पूछा.

“मसलों का कोई हिसाब नहीं होता साब. आपका अपना स्वाद ही उनका हिसाब है. पहले अपने अंदाज से जरा कम मसाले डालिए, फिर चम्मच में थोड़ा सा लेकर चख लीजिये… कम-बेसी हो तो और डाल लीजिये.” संतरा ने उसी सहजता से बताया तो कैलाश को पुलाव बनाना बहुत आसान लगने लगा.

और हुआ भी यही. यह डिश उसकी उम्मीद से कहीं बेहतर बनी थी. खाने के बाद निक्कू के चेहरे पर आई मुस्कान देखकर कैलाश का आत्मविश्वास लौटने लगा.

अगले दिन कैलाश को ऑफिस जाना था. पूरा दिन निक्कू अकेला घर पर रहेगा यह सोचकर ही वह परेशान हो गया. उसने रात को सोने से पहले ही निक्कू को आवश्यक हिदायतें देकर उसे सावधानी से घर पर रहने के लिए समझा दिया था.

आज कैलाश अपने हर काम में अतिरिक्त सावधानी बरत रहा था. दूध गर्म करके निक्कू को उठाना… फिर वेज सैंडविच का नाश्ता और लंच के लिए आलू का परांठा… ये सब करने में उसने यू ट्यूब की पूरी-पूरी मदद ली. विजया जैसा उँगलियाँ चाटने वाला तो नहीं लेकिन हाँ! काम चलाऊ खाना बन गया था.

शाम को घर वापस आते हुये जब उसने एक परचून की दुकान खुली देखी तो गाड़ी रोक ली. मुँह पर मास्क लगाकर वह भीतर गया और एक पैकेट मैदा और आधा किलो छोले खरीद लिए. साथ ही इमली का छोटा पैकेट भी. कई बार विजया ने उससे ये सामान मंगवाया है जब वो छोले-भटूरे बनाती है.

“निक्कू को बहुत पसंद हैं. कल सुबह मुझे ऑफिस नहीं जाना है. निक्कू को सरप्राइज दूँगा. शाम तक विजया आ ही जाएगी.” मन ही मन खुश होता हुआ अपनी प्लानिंग समझाने और छोले-भटूरे बनाने की विधि पूछने के लिए उसने विजया को फोन लगाया.

“सॉरी कैलाश! हमें अभी वापस आने की परमिशन नहीं मिली. लगता है तुम्हें कुछ दिन और अकेले संभालना पड़ेगा.” विजया के फोन ने उसे निराश कर दिया. आँखों के सामने तवा… कड़ाही… भगोना… चकला और बेलन नाचने लगे. मन खराब हो गया लेकिन घर पहुँचते ही जिस तरह निक्कू उससे लिपटा, वह सारा अवसाद भूल गया.

“पापा! आज हम दोनों मिलकर खाना बनाएँगे. आप रोटी बनाना और मैं डिब्बे में से अचार निकालूँगा…” निक्कू ने हँस कर कहा तो उसे फिर से जोश आ गया.

“लेकिन मैं गोल रोटी नहीं बना सकता…” कैलाश ने मुँह बनाया.

“कोई बात नहीं. पेट में जाकर गोल हो जाएगी.” निक्कू खिलखिलाया तो कैलाश दुगुने जोश से भर गया. रात को दोनों ने आम के मीठे अचार के साथ पराँठे खाये. पराँठों की शक्ल पर ना जाया जाए तो स्वाद इतना बुरा भी नहीं था.

कैलाश ने रात को छोले भिगो दिये. सुबह दही डालकर भटूरे के लिए मैदा भी गूँध लिया. थोड़ा ठीला रह गया था लेकिन चल जाएगा. प्याज-टमाटर काटकर रख लिए. इमली को छानकर उसका गूदा अलग कर लिया. ये सारी तैयारी उसने निक्कू के जागने से पहले ही कर ली.अब छोले बनाने की रेसिपी देखने के लिये उसने यू ट्यूब खोला.

“छोला रेसिपी” टाइप करते ही बहुत सी लिंक स्क्रीन पर दिखाई देने लगी. सभी में सबसे पहला निर्देश था- “सबसे पहले नमक-हल्दी डालकर छोले उबाल लें.” यही तो सबसे बड़ी समस्या थी कि छोले कैसे उबालें… कितना पानी डाले… कितनी देर पकाये… कूकर को कितनी सीटी लगाए…

उसने विजया की अलमारी में से कुछ पत्रिकाएँ निकाली जिन्हें वह रेसिपी के लिये संभाल कर रखती है. उन्हीं में से एक में उसे छोले-भटूरे बनाने की रेसिपी मिल गई. कैलाश खुश हो गया लेकिन पहला वाक्य पढ़ते ही फिर से माथा ठनक गया. लिखा था- “सबसे पहले छोले उबाल लें.” यानी समस्या तो अब भी जस की तस थी.

“विजया को फोन लगाए बिना नहीं बैठेगा.” सोचकर उसने विजया को फोन लगाया.

“बहुत आसान है कैलाश! छोलों में दो उंगल ऊपर तक पानी डालो. फिर नमक-हल्दी डालकर दो चम्मच घी भी डाल देना. अब कूकर में प्रेशर आने दो. एक सीटी आते ही गैस को सिम कर देना. आधा घंटा पकने देना. छोले उबल जाएंगे.” विजया ने जिस सहजता से बताया उसे सुनकर कैलाश को लगा कि छोले बनाना सचमुच बहुत आसान है.

छोले उबल चुके थे. बाकी का काम रेसिपी बुक और यू ट्यूब की मदद से हो जाएगा. कैलाश ने गैस पर कड़ाही चढ़ा दी. एक तरफ रेसिपी बुक खुली थी, दूसरी तरफ यू ट्यूब पर विडियो चल रहा था. कैलाश उन्हें देख-पढ़कर पूरी तन्मयता से छोले बनाने में जुट गया.

तेल गरम होने पर पहले प्याज, लहसुन और अदरक का पेस्ट डाला फिर सब्जी वाले मसाले डालकर उन्हें अच्छी तरह से पकाया. उबले हुये छोले कड़ाही में डालते समय कैलाश के चेहरे पर मुस्कान तैर गई. पिछले घंटे भर की सारी घटनाएँ आँखों के सामने घूम गई.

इमली का गूदा डालकर जब कैलाश ने चम्मच में लेकर छोले चखे तो उसे यकीन ही नहीं हुआ कि वह भी इतने स्वादिष्ट छोले बना सकता है.

अब बारी थी भटूरे बनाने की. कैलाश ने रेस्टोरेंट जैसे बड़े-बड़े भटूरे बेलने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली. तभी उसे निक्कू की बात याद आ गई- “रोटी गोल नहीं बनी… कोई बात नहीं. पेट में जाकर गोल हो जाएंगी.” कैलाश मुस्कुरा दिया.

“बड़े भटूरे जरूरी तो नहीं… छोटों में भी वही स्वाद आएगा.” कैलाश ने एक छोटा सा भटूरा बेला और सावधानी से गर्म तेल में छोड़ दिया. कचोरी की तरह फूलकर भटूरा कड़ाही में नाचने लगा और इसके साथ ही कैलाश भी.

“तो आज हमारे निक्कू राजा के लिए एक खास सरप्राइज़ है.” कैलाश ने उसे दूध का गिलास थमा कर उठाया.

“क्या?” निक्कू ने पूछा.

“छोले-भटूरे.”

“तो क्या मम्मी आ गई?” निक्कू खुश हो गया.

“नहीं रे! पापा की  तरफ से है.” निक्कू बुझ गया. कैलाश मुस्कुरा दिया.

“निक्कू! सरप्राइज़ तैयार है.” कैलाश प्लेट में छोले-भटूरे लेकर खड़ा था. निक्कू को यकीन नहीं हो रहा था. वह खुशी के मारे उछल पड़ा. पहला कौर मुँह में डालने ही वाला था कि कैलाश बोला- “आहा! गर्म है… जरा आराम से.”

निक्कू खाता जा रहा था… उसकी आँखें फैलती जा रही थी… चेहरे पर संतुष्टि के भाव लगातार बढ़ते जा रहे थे और इसके साथ ही कैलाश के चेहरे की मुस्कान भी. उसने विजया को विडियो पर कॉल लगाई और उसे यह दृश्य दिखाया. वह भी हँस दी.

“पापा! आप एक अच्छे कुक बन सकते हो.” निक्कू ने अपनी उंगली और अंगूठे को आपस में मिलाकर “लाजवाब” का इशारा किया तो विडियो पर ऑनलाइन विजया ने तालियाँ बजकर बेटे की बात का समर्थन किया.

“तुम आराम से आना… हमारी फिक्र मत करना… हम मैनेज कर लेंगे…” कैलाश ने विजया से कहा. उसे आज परीक्षा में पास होने जैसी खुशी हो रही थी.

“माय डैडी इज द बेस्ट कुक.” निक्कू ने एक निवाला कैलाश के मुँह में डालकर कहा. स्वाद सचमुच लाजवाब था. कैलाश ने विजया की तरफ देखकर अपनी कॉलर ऊंची की और बाय करते हुये फोन काट दिया.

Family Love Story

Romantic Story: जीती तो मोहे पिया मिले, हारी तो पिया संग

Romantic Story: सियाने टक बिजनैस स्कूल हैनोवर से एमबीए किया तो भारी पैकेज के साथ गूगल ने उसे अपने यहां नौकरी दे कर उस के वीजा को ऐक्सटैंड करवा दिया. अब कुछ दिनों के लिए वह इंडिया जा रही थी. मगर इतना कुछ हासिल करने के बावजूद सिया के चेहरे पर गमों के बादल मंडरा रहे थे. आंसुओं के बोझ से पलकें सूज गई थीं. यह भी इत्तफाक ही था कि ठीक 2 साल पहले ही दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर अपनों से दूर होने का शोकाकुल मन इमिग्रेशन के लिए सिया के बढ़ते कदमों को बारबार पीछे खींच रहा था और आज वही मन उस से कितनी निर्दयता से आंखमिचौली करते हुए उसे आगे ही नहीं बढ़ने दे रहा था.

बोस्टन की गलियों में सैम की बांहों में बंधी वह अनमनी सी दिन भर घूमती रही. उस के मन में उमड़ रहे विरहवियोग के समंदर को शांत करता सैम हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ले कर स्टैनफोर्ड के चप्पेचप्पे में उसे घुमाता रहा. सिया के दुबलेपतले नाजुक शरीर को अपनी बांहों में भरते हुए सैम भर्राए कंठ से बोला, ‘‘मुझे ऐसे छोड़ कर मत जाओ सिया, मैं तुम्हारे बिना किसी आईने की तरह टूट कर बिखर जाऊंगा… जिसे तुम जानती तक नहीं उसी की होने के लिए लौट रही हो और जिस ने तुम्हें प्राणों से बढ़ कर चाहा उसे छोड़ रही हो.’’

सैम का इतना कहना था कि सिया किसी लता की तरह उस से लिपट गई. दोनों की आंखों से सावनभादो बरस रहे थे. सैम ने बांहों में भरी सिया को ला कर कार की पिछली सीट पर बैठा दिया. उसे आलिंगन में कसते हुए उस के अश्रुपूरित चेहरे पर चुंबनों की झड़ी लगा दी. सिया भी प्यार की इस बरसात में बिना किसी प्रतिवाद के भीगती रही. कभी न खत्म होने वाली जुदाई की घडि़यों से घबरा कर दोनों ने प्यार की मर्यादा की सरहद को पार कर लिया. दोनों को कहीं कोई पछतावा नहीं था. दोनों पूर्णता के एहसास में डूबउतरा रहे थे.

एकदूसरे को समर्पित हो कर दोनों का शोकाकुल मन ऊंची लहरों के जाने के बाद किसी समंदर की तरह शांत पड़ चुका था. परम संतुष्टि का एहसास संजोए अभीअभी शादी के बंधन में बंधे नए जोड़े की तरह दोनों घूमते रहे. मतवाला मन पंख लगा कर उड़ा जा रहा था. दोनों एकदूसरे में इतने खोए हुए थे कि हर बार उन की गाड़ी चारों ओर से घूम कर हाईवे पर आ कर रुक रही थी. यह बोस्टन शहर की अपनी विशेषता है.

सैम के गले में अपनी बांहों का हार पहनाते हुए सिया ने कहा, ‘‘सैम, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सारी जिंदगी इसी तरह गोलगोल घूमते रहें?’’ जवाब में सैम ने उसे बांहों में भर लिया. बड़ी जद्दोजहद के बाद दोनों ने अपने उतावलेपन पर काबू पाया. फिर सिया को बांहों में ही लिए भरे मन से सैम ने अपनी गाड़ी हवाईअड्डे की ओर मोड़ दी.

3 घंटे का रिपोर्टिंग टाइम बीत गया था. प्लेन के उड़ान भरने में घंटा भर रह गया था. सैम से गले मिल कर सिया सामान की ट्रौली के साथ झटके से आगे बढ़ तो गई मगर फिर उसी वेग से पीछे लौट कर सैम से लिपट गई. अश्रुपूरित नेत्रों से सिया ने सैम को बाय कहते हुए विदा ली. जब तक आंखों से वह ओझल नहीं हुई हाथ हिलाते हुए सैम उसे निहारता रहा. यह प्यार भी बड़ी खूबसूरत और अजीबोगरीब घटना होती है. जिस ने किया वह ठगा ही रह जाता है. कैसे प्यार के हजारों रंग मिल कर धनक बन कर, धड़कते दिलों में चुपके से उतर कर देश, जाति, धर्म, भाषा की सारी सरहदें चुटकियों में फांद जाते हैं.

‘उदास, बुझा हुआ सैम हैनोवर लौट रहा होगा,’ सोच सिया बेचैन हो उठी. 4 घंटे के सफर में उस के खयालों से शायद ही वह बाहर आ सकी. ‘यह भी बड़ा हसीन इत्तफाक है कि किसी दूसरे देश का वासी उस के सपनों का, अरे नहीं उस के जीवन का राजकुमार बन गया,’ सोच वह एक अजीब ठंड के एहसास से सिहर उठी. फिर शाल को ओढ़ते हुए सैम की छवि को कल्पना में साकार कर उठी कि काश, इस यात्रा में वह भी उस के साथ होता.

एक मीठी सी आह भर कर उस ने आंखें बंद कर लीं. सभी तरह से अनजान सैम चुपकेचुपके उस की धड़कन बन गया… 2 साल पहले के अतीत के सारे पन्ने 1-1 कर उस के समक्ष खुलते चले गए. डाइनिंगहौल में टेबल पर सजी केवल नौनवैज डिशेज को डबडबाई नजरों से देखती असहाय सी वैजिटेरियन सिया. सभी कितने आनंद से खाने का लुत्फ उठा रहे थे. सिया अपने कमरे में प्रवेश कर ही रही थी कि अचानक सैम वहां आ पहुंचा और फिर उसे डाइनिंगहौल में आने को विवश कर दिया.

बटर लगे ब्रैडपीस, दही और कुछ ताजे फलों के साथ सिया को प्लेट थमाई तो उस का मुरझाया चेहरा खिल उठा. दोनों के विषय एवं क्लासेज बिल्डिंग्स अलगअलग थीं फिर भी उस दिन के बाद से सैम उस की आवश्यकता बन कर उस की हर समस्या का समाधान बन गया. 1 साल बाद सभी स्टूडैंट्स होस्टल से बाहर कौटेज ले कर रहते हैं. 3 लड़कियों के साथ सिया के रहने की व्यवस्था सैम ने ही की. सिया के पैसे कम से कम खर्च हों, सैम को हर समय इस की चिंता रहती थी. उस भयानक रात को सिया कैसे भूल सकती है जब बर्फ का तूफान आया था. सारा हैनोवर अंटार्टिका बन गया था. बिजली के जाने से सब कुछ ठप हो गया था. आवागमन के सारे रास्ते बंद हो चुके थे.

इतनी ठंड और बर्फ की परवाह न करते हुए सैम सिया के खानेपीने के सामान के साथ उस के कौटेज आ गया था. उस तूफानी रात को सिया ने सैम को रोक लिया था. उस अंधेरी रात को दोनों ने टौर्च की रोशनी में बिताया था. बिजली की हर गरजना के साथ वह सहम कर सैम की हथेलियों को थाम लेती थी. ऐसा देश जहां सैक्स को भी और चीजों की तरह शारीरिक आवश्यकता समझा जाता है, उसी देश के एक फरिश्ते ने उसे आगोश में बांधे सारी रात गुजार दी पर कहीं असंयमित नहीं हुआ… मर्यादा की सीमा नहीं लांघी.

2 हफ्ते पहले सैम सिया को न्यूजर्सी ले गया था. ‘फारमर्स सन औफ गार्डन सिटी’ का कह कर स्वयं का परिचय देने वाले सैम के महल को सिया अपलक देखती रह गई. दरवाजे पर खड़ी चमचमाती 3-3 गाडि़यां, थोड़ी दूरी पर पार्क किया रिक्रीएशन व्हीकल, जो एक तरह से सारी सुविधाओं से सजा मोबाइल घर होता है, ट्रैक्टर, खेती करने के सारे औजार, स्टैबल में बंधे श्वेतश्याम रंग के तगड़े घोड़े, मुरगीखाना आदि को देख कर सिया को अपने देश के दीनहीन, भूखे किसान और उन के नंगधडं़ग बच्चे याद आ गए. कैसे लुटेरों के हाथों में देश चला गया है कि दिनोंदिन गरीबीबेकारी सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही है. सैम के मम्मीडैडी ने सिया को गले लगा कर प्यार किया. तीनों दिन तक उस की सुखसुविधा का खयाल अच्छी तरह रखने के लिए सैम को आगाह करते रहे. पर रात तक वे नीचे के लिविंग रूम में बैठ कर मूवी देखते रहते और फिर दोनों कितनी शालीनता से गुड नाइट कह अपनेअपने रूम में चले जाते. कोई ताकझांक नहीं.

राबर्ट वुड हौस्पिटल में मैडिसिन की पढ़ाई कर रही सैम की बहन एलिस भी मैमोरियल डे की छुट्टी पर घर आ गई थी. सिया और सैम को देख हंस कर उस ने परफैक्ट पेयर कहा. उस ने सिया को ढेर सारे परफ्यूम, लिपस्टिक और नेलपौलिश दी. सैम की मां ने भी फेयरी जैसे श्वेत परिधान के साथ धवल मोतियों का सैट मुसकराते हुए अंगरेजी में यह कहते हुए सिया को दिया, ‘‘सैम, तुम्हें बहुत चाहता है… हमेशा सुखी व खुश रहो.’’ सिया ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें देखा और फिर अपनी मिट्टी की परंपरा को निभाते हुए उन के पैरों को छू लिया. मैमोरियल डे के दिन सैम उसे न्यूयौर्क सिटी घुमाने ले गया. पूरा दिन दोनों एकदूसरे में बंधे घूमते रहे.

उस दिन हडसन नदी में अनगिनत बड़े जहाज आए थे. उन जहाजों पर कहीं विमान उतर रहे थे तो कहीं उड़ रहे थे जिन्हें देख कर सिया किसी बच्ची की तरह चहक उठी थी. सारे दर्शनीय स्थल देख कर दोनों थक गए थे. टाइम्स स्क्वायर में सड़क के किनारे बनी गैलरी में बैठ कर दोनों ने थिएटर का आनंद उठाया. वहीं पास के रेस्तरां में डिनर ले कर रौक फेलर सैंटर की विपरीत दिशा में बनी लोहे की बैंच पर बैठ गए.

रात को जब सिया को ठंड लगने लगी तो सैम ने उसे अपनी जैकेट के अंदर ले लिया. दोनों यों ही बैठे एकदूसरे के दिलों की धड़कनें सुनते रहे. सैम की उंगलियां जब सिया के बदन पर बिजली का करंट बन कर प्रवाहित होने लगीं तो वह जैकेट से बाहर आ गई. बड़ी मुश्किल से अपने बेताब मन को समझा सकी. ‘‘यू इंडियन बेबी,’’ कहते हुए सैम ने हंस कर उसे पास खींच लिया.

सड़क किनारे पार्किंग में लगी गाड़ी में दोनों ने सारी रात गुजारी थी. बहकते मन पर काबू पाना कितना मुश्किल लगा था.

मैसी मौल से सिया ने अपने मम्मीपापा, दिव्या व दिया के लिए ड्रैसेज लीं. उस के लाख मना करने के बावजूद सैम ने उन लोगों के लिए कितने उपहार खरीद दिए थे. सिया को तो उस ने अपनी पसंद की सारी चीजों से ढक दिया था.

आज जो भी घटित हुआ वह अचानक था, फिर भी कितना तसल्ली दे गया है मन को. जिसे मन से चाहा उस की समर्पिता भी हो गई. क्या हुआ जो अगर उस के म्ममीपापा अपनी सोच और पारिवारिक मर्यादा के लिए सैम को उस के जीवन में नहीं ला सके. वह अपने होंठों को सी लेगी. उफ तक नहीं करेगी. उन की इच्छा का मान रखते हुए वह राज से ब्याह कर लेगी. प्रीत की गली इतनी संकरी होती ही है कि जहां 2 दिल ही मुश्किल से समाते हैं तो तीसरे के समाने की गुंजाइश ही कहां रह जाती है. इस तन पर राज का अधिकार क्यों न हो जाए दुलहनियां तो सैम की ही रहेगी. अपनी समस्त पीड़ा को, मीठी कसक को आंसुओं से नहला आनंद उगा लेगी. जिस ने भी सच्ची प्रेम पगी इस चुनर को ओढ़ा उस के अंतर में ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोए…’ के बोल प्रतिध्वनि हो उठे.

अतीत को खंगालने में सारा समय सिया ने आंखों में ही बिता दिया. देह की सिहरन उसे आनंद की चरम सीमा पर ले आई थी. बीते पलों की खुमारी उसे खुल कर सांसें भी नहीं लेने दे रही थी. सैम तो नहीं पर उस के परिमल को अपने साथ ले कर आई थी जिसे महसूस कर के उस के प्रेम का मधु पी कर सच में बौरा उठा था सिया का कणकण. जहाज की लैंडिंग की घोषणा हो रही थी.

जैसे ही सिया हवाईअड्डे से बाहर आई दोनों छोटी बहनें दिव्या और दिया दौड़ कर उस से लिपट गईं. मम्मीपापा की छलक आई आंखों को देखते ही वे दौड़ कर दोनों से लिपट गई. ‘‘मां देखो न दीदी कितनी खिल गई है… राज जीजू कितने खुश होंगे दीदी को देख कर… दीदी की उपलब्धियों पर उन्हें कितना गर्व होगा,’’ दिव्या बोली.

‘‘अच्छा तो बड़ी बातें बनाने लगी है तू,’’ कहते हुए सिया बुदबुदाई, ‘‘अरे बावरी सैम जीजू कह.’’

दूसरे दिन ही राज अपने मम्मीपापा के साथ सिया के घर आ गया. उसे देख कर सिया खुश नहीं हुई तो उसे दुख भी नहीं हुआ. सब कुछ उस ने अपनी नियति पर छोड़ दिया था. उस के मम्मीपापा तो उन के समक्ष छिपे जा रहे थे. उन्होंने सिया की टक स्कूल की उपलब्धियों को उन्हें बताया जिन्हें सुन कर वे चुप हो गए. औपचरिकता के लिए भी उन्होंने सिया को बधाई नहीं दी. एकांत पाते ही राज ने सिया के समक्ष अपनी शंका जाहिर करते हुए कहा, ‘‘सुना है अमेरिका में लोग खुलेआम कहीं भी, किसी से भी सैक्स ऐंजौय कर लेते हैं… इतने लंबे समय में तुम ने कभी इस का आनंद लिया या नहीं? अगर नहीं लिया तो तुम परले दर्जे की बेवकूफ हो.

‘‘और कुछ नहीं तो लिप किस तो अवश्य दिया होगा जिसे कोई भी गले लगाते समय अंकित कर के होंठों पर मुहर लगा ही देता है. मुझे नहीं लग रहा है कि तुम इन सब से स्वयं को बचा पाई होगी. क्यों ठीक कहा न? कोई बात नहीं, जब मैं वहां जाऊंगा तो सूद सहित इस की भरपाई कर लूंगा,’’ कहते हुए उस ने सिया की उंगलियों को भींच दिया. दर्द से सिया के मुंह से कराह निकल गई. राज की ओछी मानसिकता पर, उस की गिरी सोच पर घृणा से सिया उस से हाथ छुड़ा कर भागी. कितना फर्क है सैम और राज की छुअन में… एक की जरा सी छुअन सारी ऋतुओं को पल भर में ही पावस और वसंत बना कर रख देती है तो दूसरे के स्पर्श से अनगिनत बिलबिलाते कीड़े उस के शरीर पर रेंग गए… कैसे इस लिजलिजे व्यक्ति के साथ अपना जीवन बिता पाएगी…

इंगेजमैंट से ले कर शादी का सारा इंतजाम सिया के पापा को करना था और ये सब किसी पांचसितारा होटल में होने की बात कह कर उन लोगों ने विदा ली. फेसटाइम कर के सिया ने सारी बातें सैम को बता कर अपने मन को हलका कर लिया था. जैसेजैसे इंगेजमैंट के दिन निकट आ रहे थे, राज के यहां से फरमाइशों की लिस्ट में कोई न कोई नई आइटम जुड़ती जा रही थीं. सिया के पापामम्मी चिंतित से लग रहे थे. उन की खुशियों का दायरा सिमटता जा रहा था.

जब उन्होंने कार की मांग रखी तो सिया के पापा उबल पड़े, ‘‘नहीं करनी हमें सिया की शादी इन लालचियों के यहां. मेरी प्रतिभाशाली बेटी के समक्ष कुछ भी तो नहीं है राज… एक मामूली इंजीनियर जो मेरी बेटी के बल पर अमेरिका जाएगा, फिर इस की मेहरबानियों से एच4 वीजा पर नौकरी करेगा.’’ ‘‘सच पापा,’’ कह कर सिया उन के गले लग गई.

तभी खुसरो की पंक्तियां उस के कानों में रस घोल गईं. ‘‘खुसरो बाजी प्रेम की लागी पी के संग, जीती तो मोहे पिया मिले, हारी तो पिया संग.’’

मारे खुशी के वह पूरी रात सैम से बातें करती प्रेम रस में भीगती रही. सैम से सभी आश्वासन पा कर सिया ने अगले दिन सैम के इतिहास से सभी घर वालों को अवगत करा दिया, जिसे सुन कर सभी सैम के बारे में जानने के लिए उत्सुक हो गए. फिर क्या था, फेसटाइम पर सैम से सभी ने जी खोल कर बातें कीं. सैम के आकर्षक व्यक्तित्व और शालीनता ने सभी को मोह लिया.

बेटी के शानदार चयन पर गौरवान्वित हो पापा और मम्मी की आंखें भर आईं.

दिव्या व दिया भी आगे की पढ़ाई अमेरिका में करेंगी. सैम से आश्वासन पा कर सभी भविष्य के सुनहरे सपनों में खो गए. सिया के लिए तो खुशियों की कायनात ही जमीं पर उतर आई थी. जो इश्क आसान नहीं था उसे सिया के धैर्य और अटल विश्वास ने प्राप्त कर लिया था. मीरा बन कर सैम की जोगिन तो हमेशा रहेगी तभी रुक्मिणी और सत्यभामा के जीवन को जी पाएगी.

3 हफ्ते के भीतर सैम अपने परिवार के साथ इंडिया आ गया. पहले रजिस्टर्ड मैरिज और फिर छेड़छाड़ वाली भारतीय परंपराओं वाली ऊटपटांग रस्मों व रिवाज से खूब धूमधाम से शादी हुई. भारतीय दूल्हा बना सैम सब का दुलारा बना हुआ था. उस की मम्मी, पापा और बहन की खुशियां सिया समेट नहीं पा रही थी. श्वेत परिधान और हीरेमोतियों के जेवरों से चमचमाती सिया और सैम के परिवार आपस में जुड़ गए. कहीं जाति, धर्म, देश का आडंबर नहीं था. एकदूसरे के घर के तौरतरीकों को मानसम्मान देते हुए दोनों परिवार खिल उठे थे.

फिर सैम और सिया ने अपना हनीमून अपने परिवार वालों के साथ भारत के सारे दर्शनीय स्थानों को घूमघूम कर मनाया. पंख लगा कर छुट्टी के दिन गुजर गए. अगले हफ्ते ही सिया और सैम को अपनी ड्यूटी जौइन करनी थी. हजारों खूबसूरत सपनों को पलकों में सजाए खुशी के आंसुओं को दामन में समेटे सिया वहां लौट गई जहां एक नया सूर्योदय उस के जीवन को आलोकित करने के लिए बेचैन था.

Romantic Story

Best Hindi Story: काला साया- कबतक हिन्दूमुसलमान के नाम पर लड़ते रहेंगे

Best Hindi Story: मेरा बचपन और युवावस्था का आरंभ लखनऊ में बीता, नवाबों के शहर की गंगाजमुनी तहजीब में. स्कूलकालेज में बिताए चुलबुले दिन, प्यारी सहेलियां अलका, मुकुल, लता, यास्मीन और तबस्सुम. हम सब मिल कर खूब मस्ती करते. साथसाथ हंसना, खेलना, खानापीना. कोई भेदभाव नहीं, हिंदूमुसलिम का भेदभाव कभी जाना ही नहीं.

18 वर्ष की होते ही मेरी शादी हो गई. मेरे पति टाटा नगर में इंजीनियर थे. सो, उन के साथ जमशेदपुर आ गई. जमशेदपुर साफसुथरा, हराभरा, चमकती सड़कों, कारखानों, मजदूरों, हर धर्म हर भाषा के लोगों और कालोनियों का शहर है. 24 घंटे बिजली, साफ पानी और यहां का साफ वातावरण मुझे भा गया. यहां का रहनसहन लखनऊ से भिन्न था. लोगों में फैशन की चमक नहीं थी, सादगी थी. कुछकुछ बंगाली संस्कृति की झलक थी.

एक बात बड़ी अजीब लगी यहां, मुसलिम और हिंदू बस्तियां अलगअलग थीं. इस का कारण था 1964 का दंगा, जिस के बाद डर के कारण मुसलमानों ने अपनी बस्तियां बनाईं. आजाद नगर एक बड़ी मुसलिम बस्ती है. हिंदू बस्तियां बनीं. शहर टाटा कंपनी के लिए बसाया गया. यहां काम करने वालों के लिए कालोनियां बनाई गई हैं. परंतु मुसलिम दंगों के डर से कालोनियों में कम रहते हैं.

सिनियोरिटी पौइंट्स पर मकान मिलता है. मुसलिम, कुछ इलाके हैं जहां रहना चाहते हैं. सो, वहां मकान के पौइंट्स बहुत हाई हो जाते हैं. अधिकतर लोगों को बस्तियों में ही रहना पड़ता है. आजाद बस्ती मुझे पसंद नहीं आई, पतली गलियां, खुली नालियां, कूड़े के ढेर, मच्छर, कुछ गांव का सा माहौल, कुछ खपरैल के और कुछ पक्की छत वाले घर. हम लोगों ने शहर के साक्ची इलाके में किराए का घर ले लिया. यह अच्छी कालोनी थी. अड़ोसपड़ोस अच्छा था. दाएं दक्षिण भारतीय, बांए पंजाबी, सामने बंगाली यानी पूरा भारत था.

सभी से दोस्ती हो गई. पंजाबी परिवार से कुछ ज्यादा. उन के घर में चाचाचाची और उन के बेटीबेटे रहते थे. शाम को हम लोग लौन में उन के लड़केलड़की और महल्ले के लोगों के साथ बैडमिंटन खेलते. मेरे पति के औफिस के दोस्तों के घर मेरा जानाआना रहता. होलीदीवाली और ईद साथ ही मानते. बहुत अच्छा समय बीतता.

डिलीवरी के समय मैं लखनऊ गई. मेरे यहां जुड़वां बेटियां हुईं. लखनऊ में सब ने कहा कि एक बच्ची यहीं रहने दो. 2 बच्चे कैसे पालोगी? सब जानते थे कि मैं घरगृहस्थी के मामले में कमजोर हूं. पर मैं दोनों को ले कर जमशेदपुर आ गई. यहां एक 70 साल की बूढ़ी आया मिल गईं जिन्हें हम बूआ कहते थे. वे और मैं बच्चे संभालते और काम वाली घर का काम कर देती.

बच्चियां अब बैठने लगी थीं. यह बात 1979 की है. अचानक शहर का माहौल बिगड़ने लगा. रामनवमी आने वाली थी. कट्टरपंथियों ने सभा की, भड़काऊ भाषण दिए. उसी के बाद से शहर में अनकही सी घुटन शुरू हो गई. हर वर्ष जिस रास्ते से रामनवमी का जुलूस निकलता था उस से न निकल कर एक मसजिद के सामने से जुलूस निकालने की मांग की गई. प्रशासन राजी नहीं था. सद्भावना कमेटियां बनीं. कई मुसलिम आगे आए कि जिस रास्ते से चाहें, ले जाएं ताकि शांति बनी रहे. एक थे प्रोफैसर जकी अनवर. वे धरने पर बैठ गए कि जुलूस मसजिद के सामने से ले जाएं, हम साथ हैं. प्रशासन और हिंदुओं के बीच खींचातानी चलती रही. उस में दोनों ओर से भड़काने वाले प्रचार शुरू हो गए और दंगा होने की आशंका बढ़ गई.

हमारी पड़ोस वाली चाचीजी ने हम लोगों को समझाया, समय बड़ा खराब चल रहा है, जाने क्या हो? तुम लोग बच्चों के साथ आजाद नगर चले जाओ.

उन की बात सुन कर लगा, सच में कुछ गड़बड़ है. वे अनुभवी थीं, 1964 का दंगा देखे हुए थीं. अकसर दंगे के किस्से सुनाती थीं. हर नुक्कड़ पर रामनवमी के जुलूस को ले कर चर्चा होने लगी. शहर में तनाव बहुत बढ़ गया. दोनों ओर के दागी व संदिग्ध लोग पकड़े जाने लगे. सुबह होतेहोते कालोनी में जो 2-4 मुसलिम थे, सब अपने मित्रोंरिश्तेदारों के घर सुरक्षित जगह जा चुके थे. हम कहां जाएं? हमारा तो कोई रिश्तेदार नहीं, न किसी बस्ती में कोई दोस्त.

लखनऊ के एक फर्नीचर वाले हमारे परिचित थे. एक बार उन के घर भी गए थे हम लोग. उन्हीं के घर चले गए. वहां हमारे जैसे कई परिवार थे. मुझे अब तक डर नहीं लगा था क्योंकि मैं ने कभी दंगा देखा नहीं था. सो, कल्पना भी नहीं कर पाई. यहां आ कर डर लगने लगा. सहमेसहमे चेहरे, रोते बच्चे. औरतेंबच्चे अंदर, मर्द बाहर.

बड़े आंगन वाला मकान, कई कमरे जिन में सब भाई रहते थे. उन सब भाइयों के रिश्तेदार और दोस्त यहां शरणार्थी थे. केवल इसी घर में नहीं, हर घर में यही हाल था. हम लोग जल्दी में कोई सामान नहीं लाए. बस, बच्चों के नैपी, कपड़े, टौवेल आदि एक झबिया में रख लिए थे. बच्चों के दूध बनाने का सामान रख लिया था. पर दूध का पाउडर खत्म हो गया था, यह ध्यान नहीं दिया. सोचा था, रामनवमी का झंडा निकल जाएगा तो शाम तक घर आ ही जाएंगे.

जिस मसजिद से जुलूस निकलना था, वह पास ही थी. सड़क के दूसरी ओर झुंड के झुंड सड़क तक जाते, हालात का जायजा लेने. बस्ती के अंदर आने वाले सभी रास्तों पर लोगों की भीड़. सड़क पर पुलिस का पहरा था.

झोपड़ा मसजिद के सामने से जुलूस निकल गया, यह खबर आई तो जान में जान आई. तभी खबर आई कि जुलूस मेन रोड पर मसजिद के सामने रुक गया है और पकड़े गए लोगों को छोड़ने की मांग की जा रही है. तभी हल्ला हुआ कि जुलूस पर किसी ने पत्थर फेंका है और दोनों ओर से मारपीट, पत्थर, गोली चल पड़ीं, पुलिस ने गोली चलाई.

लोग घायल हो कर आने लगे. डाक्टर के यहां जगह भर गई तो लोगों के बरामदों में मरहमपट्टी होने लगी.

हरहर महादेव और अल्लाहो अकबर के नारे गूंजने लगे. डर के मारे मेरे पैर कांपने लगे. मैं दोनों बच्चियों को अपने सीने से चिपकाए रोने लगी. लगता था भीड़ घर में घुस आएगी, बच्चे छीन लेगी, मेरे साथ क्या करेगी? मेरे पति को मार डालेगी, जाने क्याक्या बुरेबुरे खयाल आने लगे.

पुलिस फायरिंग और धरपकड़ पर जुलूस वापस हुआ. पूरे शहर में दंगे भड़क गए. जो लोग छिटपुट थे, वे मारे गए. घर लूटे और जलाए गए. लोगों को कैंपों में ले जाया गया. करीब के सिटी कालेज में कैंप लगा. जिन को निकाला जा सका, निकाल लिया गया, वरना मारे गए. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 108 लोग मारे गए. शायद इस से अधिक मरे हों. दुकाने लूटी गईं.

जकी अनवर, जो धरने पर बैठे थे कि जुलूस जिस रास्ते से चाहे जाए, हम साथ हैं, वे भी मारे गए. उन के घर में उन्हें काट कर उन के घर के कुएं में डाल दिया गया. एक एंबुलैंस में औरतोंबच्चों को भर कर कैंप ले जाया जा रहा था, रास्ते में हिंदू बस्ती में रोक कर जला दिया गया, कोई नहीं बचा. भारी त्रासदी. घरों में घुस कर मारा गया. धर्म के नाम पर लोगों को धर्म के रखवाले ऐसा भड़काते हैं कि अल्लाहभगवान का नाम ले कर एकदूसरे को मार देते हैं. इंसानियत कहां चली जाती है? जिसे देखा नहीं, उस के नाम पर जीतेजागते लोगों को मारा जाने लगता है.

जिन बच्चों ने वह दंगा देखा, उन के विकास में एक काला साया सदा उन के साथ रहेगा. कैसे किसी पर भरोसा करेंगे? जिन्होंने भुगता, वे कैसे भुलाएंगे? फिर और अलगअलग बस्तियां बनेंगी, खाई और गहरी होगी.

कर्फ्यू लग गया, घरघर तलाशी ली जाने लगी और जवान लड़के पकड़े जाने लगे. घरों में यदि कोयला तोड़ने का चापड़ भी मिला तो वह हथियार समझा गया.

दूसरे दिन यह हुआ कि यह घर, जिस में हम लोग थे, बहुत आगे था. अगर भीड़ आएगी तो पहले यहीं हमला हो सकता है. इसलिए औरतों और बच्चों को बस्ती में अंदर के घरों में भेज दिया जाए. हम लोग भी उस घरवालों के साथ उन के मिलने वालों के घर शरण लेने चल पड़े. वहां काफी लोग पहले से ही थे. बड़ा सा आंगन था. गाय, बकरी, मुरगी कुआं पूरा गांव का माहौल था. कमरे तो पहले ही भर गए थे, हम लोग बरामदे में चटाई डाल कर बैठ गए. पति हमें छोड़ कर जाने लगे तो मैं रो पड़ी. वे समझाने लगे, बस रात की बात है, कल तक सब ठीक हो जाएगा, फिर चलेंगे.

उस जमाने में मोबाइल तो था नहीं. उस घर में फोन भी नहीं था. अब हम दोनों अलग थे. रातभर हरहर महादेव और अल्लाहो अकबर के नारे लगते रहे. मैं डर के मारे कांपती रही. बच्चों का दूध समाप्त हो गया था. घर वालों ने एकएक रोटी सब को दी. बच्चों को पानी में डुबो कर रोटी खिलाई. इतने लोग कई दिनों से थे, सो राशन भी समाप्त हो रहा था. दंगे में धर्म के प्रति आस्था बढ़ जाती है, जिसे देखो नमाज पढ़ रहा या तस्बीह पढ़ रहा. मैं डर के मारे सब भूल गई, क्या पढ़ूं? अपने को इतना असहाय कभी नहीं पाया था. मन करता कैसे इस शहर से भाग कर लखनऊ चली जाऊं.

सुबह हुई, सारा दिन बीत गया, मेरे पति नहीं आए. मेरा रोरो कर बुरा हाल था. शहर से लुटेपिटे लोग आजाद नगर आने लगे और जो आता, दुखभरी कहानी सुनाता.

खाना बनना बंद हो गया. राशन खत्म हो गया. शहर से लाने का सवाल नहीं था. बस्ती में डिमांड इतनी थी कि राशन खत्म हो गया. कर्फ्यू लगा रहा, नारे लगते रहे. फिर दिन का कर्फ्यू कुछ देर के लिए खुलने लगा.

2 दिन हो गए, मेरे पति का कोई पता नहीं था. मैं ने रोरो कर अपना बुरा हाल कर लिया था. अस्पताल और थाने में कोई खबर नहीं थी. औरतें मुझे तसल्ली देने लगीं, जाने दो, अगर नहीं आए तो शहीद हुए, जन्नत में जाएंगे. यहां कितनों के शौहरबेटे मारे गए हैं, सब को देखो. मेरे आंसू सूख गए थे, निढाल हो गई थी.

क्या होगा मेरा? मेरे बच्चों का? कैसे लखनऊ जाऊंगी? लखनऊ से संपर्क नहीं हो पा रहा था. आज कर्फ्यू में 2 घंटे की ढील दी गई. मेरे पति आ गए. उन को देख कर इतनी खुशी, इतना हौसला आ गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं. ये हमारे घर गए थे कुछ सामान लाने, स्थिति देखने, पर कर्फ्यू में फंस गए. चाची ने छिपा कर रखा था. फिर मौका देख कर जब कर्फ्यू हटा तब आ पाए.

एक लड़का 15 साल का होगा, कर्फ्यू खुलने पर अपनी मां से जिद कर के अपना घर देखने, नहाने चला गया, फिर नहीं आया. जिन पड़ोसियों को वह चाचा, अंकल कहता था, उन्होंने दौड़ादौड़ा कर मार डाला. लाश भी नहीं मिली. धर्म ने इतना अंधा बना दिया?

एक थे अहमद साहब. हमारे पीछे वाली लाइन में रहते थे. उन के बीवीबच्चे सुरक्षित बस्ती में चले गए. वे जिद कर के रह गए कि हमारे पड़ोसी बहुत अच्छे हैं, कुछ नहीं होगा. भीड़ ने मार दिया. पड़ोसी चाह कर भी कुछ न कर सके. हर दिन ऐसे ही समाचार आते. कुछ अफवाहें भी माहौल गरम रखतीं.

भारी जानमाल के नुकसान के बाद रैपिड ऐक्शन फोर्स आई और फ्लैगमार्च किया. लोगों में आत्मविश्वास आने लगा. कैंपों में सुविधाएं पहुंचाई गईं. पर हर जगह हाल बहुत बुरा था. टौयलेट एक, और लोग सौ. उलटी आ जाती थी. खाने की कमी. बच्चों को पानी में बिसकुट डुबो कर खिलाती. अगर किसी के पास कुछ खाने को आ जाता तो वे आसपास बैठी महिलाओं को देतीं. सब एकदूसरे के दुख में साझी थे. न कोई छोटा न बड़ा. कैंपों से लोग अपने गांवशहर जाने लगे. ट्रेनों में भीड़ बहुत हो गई. माहौल धीरेधीरे शांत होने लगा.

पता चला, साक्ची में, जिस घर में हम लोग रहते थे, वह भी जला दिया गया. मेरे पति देख कर आ गए. हम लोग बच गए. अगर चाची न होतीं तो हम लोग भी न बचते. आग शांत होने लगी, कब्रें सूखने लगीं. घर जल गए, लोग मर गए. किसी ने बेटा खोया, किसी ने बाप, कोई परिवार समाप्त हो गया.

जिन की दुकानें जलीं, रोजीरोटी गई. नौकरी वाले डर के मारे ड्यूटी नहीं जाते. रात की ड्यूटी वाले तो महीनों नहीं गए. उन का वेतन कटता. आर्थिक तंगी. बच्चों की किताबें जल गईं. बिना किताबों के बोर्ड परीक्षा दी. पढ़ाई का नुकसान. रोज कमानेखाने वालों की दिहाड़ी का नुकसान. सब से बड़ा नुकसान इंसानियत का हुआ. हिंदूमुसलिम दोनों का एकदूसरे से भरोसा उठ गया. आजाद नगर जैसी बस्तियां और बन गईं.

मेरी सुखद यादों पर एक काला साया पड़ गया. हम लोग किसी तरह लखनऊ आ गए. मगर कब तक लखनऊ में रहते, रोजीरोटी के कारण फिर वापस जमशेदपुर जाना पड़ा. इस बार शहर में नहीं, आजाद नगर बस्ती में किराए पर रहने लगे. गंदगी, मच्छर, लाइट का जाना, पानी का न आना, कुएं से पानी खींचना, सब के साथ ऐडजस्ट करना पड़ा. काश, यह धर्म न होता, सब इंसान होते, न हिंदू न मुसलमान.

Best Hindi Story

Social Story: स्टे ऑर्डर- सभी लोग वकील के पास क्यों पहुंचे

Social Story: नगर निगम के अतिक्रमण हटाओ दस्ते का सहायक अभियंता और अन्य कर्मचारी आखिरकार इस ब्लाक में भी आ गए. पिछले 3-4 दशकों से ब्लाक के फ्लैटों में रहने वाले निवासियों ने थोड़ाथोड़ा कर के अवैध निर्माणों का एक सिलसिला बना दिया था. ऊपरी आदेशों से इन की पहचान कर सब को गिराना था.

ज्यादातर अतिक्रमण भूतल पर था. एक फ्लैट के मकान मालिक ने अतिक्रमण किया तो देखादेखी दूसरों ने भी कर डाला. सरकारी प्रौपर्टी थी, कौन पूछता. मगर कभीकभी नगर निगम नींद से जाग जाता था. संबंधित अधिकारियों को अपनी और दूसरे कर्मचारियों की जेब गरम करने की जरूरत पड़ जाती तब दोचार दिन तक अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया जाता. जब भेंटपूजा हो जाती तब अभियान ठंडा पड़ जाता था.

इसी घटनाक्रम में कई ब्लाकों के नवयुवा वकील बड़े वकीलों की मातहती में वकालत करने लगे. तब उन्होंने कभीकभी आ पड़ने वाली ऐसी आपदा का प्रबंध करने का एक तरीका सुझाया. सारे ब्लाक वाले मिल कर संयुक्त आवेदन करें और मजिस्ट्रेट के पास दलील दें कि ऐसा कब्जा काफी समय से चला आ रहा था. पूरी सुनवाई किए बिना नगर निगम को किसी निर्माण कार्य को इस तरह गिराने का अधिकार नहीं है. तब यथास्थिति यानी अदालत से ‘स्टे’ का आदेश मिल गया था. सभी ब्लाक वालों के जिम्मे मात्र 75 रुपए का खर्च आया था.

तब यह 75 रुपए वाला ‘स्टे आर्डर’ का फार्मूला यानी युक्ति अन्य चालू और भ्रष्ट वकीलों ने भी पकड़ ली थी. तब एक मिलीभगत के अंतर्गत थोड़ेथोड़े समय के अंतर पर नगर निगम कभी किसी ब्लाक में, कभी किसी कालोनी में अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाता. निवासी इकट्ठे हो, 75 रुपए वाला ‘स्टे आर्डर’ ले लेते थे. वकीलों को एकमुश्त भारी फीस मिल जाती. ‘स्टे आर्डर’ बरकरार रखने के साथ लंबी तारीख पड़ फाइल मुकदमों में लग जाती.

मजिस्ट्रेट भी एक रूटीन के तौर पर ऐसे मुकदमे निबटाता था. सरकारी पक्ष की ओर से कोई दबाव नहीं पड़ा था, इसलिए लंबे अरसे तक पैंडिंग लिस्ट में रह कर ऐसे मुकदमे या तो खारिज हो जाते या फिर कोई नया जोशीला विधायक या नगर पार्षद चुनावी वादों में ये मुकदमे खत्म करवा देता था.

इस बार का अतिक्रमण हटाओ अभियान जरा जोशीले उच्चाधिकारी द्वारा चलाया गया था. रिश्वत या सिफारिश की गुंजाइश नहीं थी. अतिक्रमण हटाना निश्चित था.

दीनदयालजी सूर्य परायणी ब्राह्मण थे. उन का भूतल पर 2 कमरों का एक प्लाट था. पूजापाठ करते थे. दूसरों की देखादेखी उन्होंने सरकारी जमीन पर अच्छाखासा कब्जा कर मंदिर बना डाला था और मंदिर में सर्वमंगलकारी हनुमान सहित दूसरे देवीदेवताओं की मूर्तियां स्थापित कर दीं थीं. पौ फटते ही श्रद्धालु भक्तों का जो तांता लगता उस से मंदिर में चढ़ावे के रूप में अच्छी आमदनी हो जाती थी.

मगर अब अतिक्रमण अभियान में यह मंदिर भी आ गया था. 75 रुपए वाला ‘स्टे आर्डर’ अब नहीं मिल सकता था. वैसे तो मंदिर का चढ़ावा हर रोज सैकड़ों में  था पर पर्वों में यह चढ़ावा हजारों में हो जाता था. मंदिर ढह जाता तो चढ़ावे की कमाई भी जाती रहती. मंदिर में आने वालों में नगर निगम के कर्मचारी भी थे. मगर सरकारी आदेश तो आखिर सरकारी आदेश ही था.

सरकारी दस्ता पहले ही आ कर पैमाइश कर गया था और लोगों को नोटिस थमा गया था. 7 दिन में अतिक्रमण हटा दें वरना बुलडोजर या जे.सी.बी. मशीन द्वारा नाजायज कब्जा ढहा दिया जाएगा.

दूसरे ब्लाक के लोगों के पास भी ऐसे नोटिस आए थे. 75 रुपए वाला जमाना अब नहीं था. तब जमीनजायदाद चंद सौ रुपए गज की थी, अब गज में नहीं प्रति वर्गफुट में कई हजार रुपए की कीमत थी.

फिर सरकारी जमीन या प्रौपर्टी सरकारी ही थी. कोई न कोई पंगा खड़ा हो सकता था. क्या करें? पंडितजी अकेले क्या कर लेते? अन्य किसी के पास अपने अवैध कब्जे को जायज ठहराने का कोई तर्क नहीं था.

लेदे कर उन्हीं के पास तर्क था कि इस मंदिर को सभी कालोनीवासियों ने अपने भगवान की पूजापाठ के लिए बनाया था, उसे न ढहाया जाए.

ब्लाक के सभी निवासी एकसाथ जमा हो पंडितजी के साथ एक नामी वकील के पास पहुंचे. ‘‘यों किसी निर्माण को नहीं हटाया जा सकता. सारी कार्यवाही पूरी करनी पड़ती है. सैकड़ों लोगों के आज और कल का सवाल है,’’ अधेड़ वकील ने रौब भरे स्वर में दलील दी.

‘‘मगर कल सुबह नगर निगम अपना बुलडोजर ले कर आ रहा है,’’ एक साहब ने कहा. ‘‘मजाल नहीं हो सकती किसी की. मेरे होते हुए आप को छूने की भी,’’ वकील ने तैश से कहा. ‘‘अब हम क्या करें?’’ सभी ने समवेत स्वर में कहा.

‘‘सब को ‘स्टे आर्डर’ लेना होगा.’’ ‘‘क्या खर्च पड़ेगा?’’ ‘‘हर एक के लिए 5 हजार रुपए, जमा खर्च अलग.’’ ‘‘मगर अब तक तो 75 रुपए था. एक  ‘स्टे आर्डर’ का.’’ ‘‘जनाब, वह 10-20 साल पहले का रेट है. तब जमीन 100 रुपए गज थी. अब प्रति वर्गगज नहीं प्रति वर्गफुट के हिसाब से भी जगह नहीं मिलती,’’ वकील साहब की दलील में दम था.

‘‘हमारे इन निर्माण कार्यों को कोई छुएगा तो नहीं?’’ एक साहब ने शंका भरे स्वर में पूछा. ‘‘आप तसल्ली रखें. मैं जिम्मेदारी लेता हूं,’’ वकील ने दृढ़ स्वर में कहा. थोड़ी देर में 5 हजार रुपए जमा व 1 हजार रुपए खर्च प्रति नाजायज कब्जे के हिसाब से 60 हजार रुपए वकील साहब को 10 वकालतनामों के साथ मिल गए थे. उस में से नगर निगम के कर्मचारियों को उन का तय हिस्सा पहुंच गया. 5 हजार रुपए वाला आम ‘स्टे आर्डर’ अब 50 हजारी हो गया था.

पंडितजी के मंदिर में आज ज्यादा भक्त आए थे. नगर निगम का कोई कर्मचारी अतिक्रमण हटाने जो नहीं आया था. ब्लाक के सभी लोग और मंदिर के पुजारी निश्चिंत थे. कभी 75 रुपए वाला ‘स्टे आर्डर’ अब 5 हजारी होने पर भी उन्हें अखर नहीं रहा था.

इस घटना के अगले दिन 10 बजतेबजते एक जे.सी.बी. मशीन और कुदाली, फावड़े लिए अनेक मजदूर और नगर निगम के कर्मचारी आ पहुंचे. कालोनी में जो लोग वकील के पास गए थे वे सभी उन को देख कर सकपका गए.

‘‘हम ने वकील से बात की थी. उन्होंने कहा था कि हम को ‘स्टे आर्डर’ मिल चुका है,’’ मंदिर और अन्य अवैध निर्माण को गिराने आए नगर निगम के कर्मचारियों से पंडितजी ने कहा.

‘‘दिखाइए, कहां है आप का ‘स्टे आर्डर’?’’ सहायक अभियंता ने स्थिर स्वर में कहा. ‘‘हमारे वकील साहब के पास है.’’ ‘‘ले कर आइए.’’‘‘थोड़ा समय लग सकता है.’’ ‘‘कोई बात नहीं, हम इंतजार कर सकते हैं. अभी 10 बजे हैं. आप दोपहर 3-4 बजे तक हमें ‘स्टे आर्डर’ दिखा दें,’’ सहायक अभियंता ने गंभीरता से कहा.

सभी ब्लाक निवासी समेत पंडितजी वकील साहब की कोठी में स्थित दफ्तर में पहुंचे. ‘‘आप कहते हैं कि ‘स्टे आर्डर’ मिल चुका है जबकि नगर निगम का अतिक्रमण दस्ता हमारे सिर पर आ चुका है,’’ पंडितजी ने तनिक गुस्से में कहा. ‘‘आप धैर्य रखें. मैं अपने मुंशी और सहायक वकील से पूछता हूं,’’ पुराने घाघ वकील ने कुटिलता से मुसकराते हुए कहा.

थोड़ी देर तक वकील साहब फोन पर अपने मुंशी और सहायक वकील से बात करते रहे. फिर उन्होंने मुसकराते हुए कहा, ‘‘ऐसा है, कोर्ट में कल काम थोड़ा ज्यादा था. जज साहब सुनवाई नहीं कर पाए. अब कल सुनवाई होगी और कल शाम को ‘स्टे आर्डर’ मिल जाएगा.’’

इस पर सब के चेहरे लटक गए. फिर शर्माजी बोले, ‘‘नगर निगम के कर्मचारी सिर पर खड़े हैं.’’ ‘‘उन से कह दो, कल शाम तक मोहलत दे दें.’’3 बजे सहायक अभियंता और दलबल फिर आ पहुंचा. ‘‘हमारे वकील साहब ने कहा है कि ‘स्टे आर्डर’ की कापी कल मिलेगी,’’ शर्माजी के स्वर में घबराहट थी.

सहायक अभियंता मुसकराया और बोला, ‘‘कल किस समय तक मिल जाएगा?’’ ‘‘शाम तक मिल जाएगा.’’ ‘‘ठीक है हम परसों सुबह आएंगे,’’ दलबल वापस चला गया. सभी ब्लाक निवासी सहायक अभियंता के व्यवहार से हैरान थे. यों कोई सरकारी काम में मोहलत नहीं देता था.

अगले दिन सुबह पंडितजी और ब्लाक के दूसरे निवासी कोर्ट परिसर में जा पहुंचे. उन में से कई पहली बार अदालत आए थे. अब तक 75 रुपए वाला ‘स्टे आर्डर’ बिन अदालत आए मिल जाता था. मगर अब 5 हजारी भी नहीं मिला था.

अदालत परिसर में वकील साहब अपने बैठने के स्थान पर पसरे थे. न्यायालय भी कई दर्जन थे. इमारत भी कई मंजिला थी. दोपहर बाद पेशी थी. सभी को उम्मीद थी कि आज पहली पेशी पर ‘स्टे आर्डर’ हो जाएगा. बाद की बाद में देखी जाएगी.

न्यायाधीश अंदर चैंबर में आराम फरमा रही थीं. रीडर फाइलें अंदर ले जाता था और संक्षिप्त आदेश ले आता. तारीख दे आसामी से 100-150 पाने का इशारा करता. अब 10-20 रुपए में कुछ नहीं होता था.

शर्माजी और ब्लाक निवासियों के मुकदमों की सुनवाई आरंभ हुई. मैडम कुरसी पर आ विराजीं. ‘‘आप का सरकारी जमीन पर कब्जा करने का आधार क्या है?’’ ‘‘जी, उस पर एक मंदिर बना हुआ है. पूजापाठ तो सब का मौलिक अधिकार है. उस को गिराना नाजायज है.’’

‘‘यह तो कोई कारण नहीं है. पूजापाठ निजी मामला है. घर में भी हो सकता है. अन्य सभी के पास क्या कारण हैं?’’ ‘‘जी, खुली जगह से अवांछित तत्त्व प्रवेश कर जाते हैं,’’ दूसरे ने कहा, ‘‘इसलिए, सुरक्षा के लिए किसी ने दरवाजा, बाड़ या जंगला लगा रखा है.’’

‘‘यह कोई कारण नहीं है. अपने घर या संपत्ति पर कोई बाड़, दरवाजा या जंगला लगाओ, सरकारी संपत्ति पर कब्जा किस बात का है,’’ मैडम के इस सवाल पर पुराना घाघ वकील भी सकपका गया. उस को कोई जवाब न सूझा. मुकदमा खारिज हो गया. 75 रुपए वाले ‘स्टे आर्डर’ के समान 5 हजारी ‘स्टे आर्डर’ नहीं मिल पाया. पहली ही पेशी में मुकदमा खारिज होने से सब हैरान थे.

नियत समय पर अतिक्रमण हटाओ दस्ता आ पहुंचा. ‘‘यह हनुमान मंदिर है,’’ पंडितजी की आमदनी का साधन जा रहा था. उन का बौखलाना स्वाभाविक था.‘‘कोई बात नहीं है,’’ सहायक अभियंता ने कहा, ‘‘हम भुगत लेंगे, आप मूर्तियां और अन्य सामान हटा लें.’’

चंद मिनटों में जे.सी.बी. मशीन ने अपना काम कर दिया. सारा ब्लाक फिर से साफसुथरा और खुला हो गया. ब्लाक के रहने वालों को यह समझ में नहीं आया था कि रिश्वत और पहुंच का सिलसिला कैसे असफल हो गया और महाबली हनुमान भी उन की रक्षा को आगे क्यों नहीं आए? अब उस जगह पर नगर निगम वालों की सुंदर पार्क और सामुदायिक केंद्र बनाने की योजना है.

Social Story

Crime Story: रक्षक-भक्षक

Crime Story: जीबी रोड दिल्ली की बदनाम जगहों में से एक है. रेड लाइट एरिया. तमाम कोठे, कोठा मालकिनें और देहव्यापार में लगी सैक ड़ों युवतियां यहां इस एरिया में रहती हैं. मैं सेन्ट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) में सब इंस्पेक्टर के तौर पर तैनात थी. ट्रेनिंग पूरी हुए अभी छह महीना ही हुआ था. नई ज्वाइनिंग थी. एक रोज दिल्ली मेट्रो में सफर के दौरान एक लड़की लेडीज कोच में बेहोश हो गई थी. रात नौ बजे का वक्त था. उस लड़की को संभालने के लिए जो दो लोग आगे बढ़े उनमें एक मैं थी और दूसरी वंदना. तब मैं वंदना को जानती नहीं थी. वह तो उस रोज उस मेट्रो मे मेरी सहयात्रि भर थी. उस बेहोश लड़की को लेकर हम कोच से बाहर आए. तब तक मेट्रो कर्मचारी भी पहुंच गए थे.

काफी देर बाद उस लड़की को होश आया. मैं और वंदना तब तक उसके साथ ही रहे. उसका पता पूछ कर हम रात के ग्यारह बजे ऑटो से उसके घर तक छोड़ने गए. वापसी में मैंने पहली बार वंदना से उसका नाम पूछा था और उसने मेरा. फिर पता चला कि वह एक पत्रकार है, आगरा से दिल्ली आयी है, किसी पत्रिका में काम करती है. वंदना मुझे बहुत कुछ अपनी तरह ही लगी. मेरी ही उम्र की थी. हिम्मती, बेखौफ, तेज, मददगार और मिलनसार. हमारी दोस्ती हो गई. फोन पर लम्बी-लम्बी बातें होतीं. छुट्टी मिलती तो दोनों साथ ही शॉपिंग भी करते और फिल्में भी देखते थे.

उस रोज हम रेस्त्रां में बैठे इडली-सांभर खा रहे थे कि अचानक वंदना ने मुझे जीबी रोड चलने का न्योता दे दिया. पुलिस में होते हुए भी मुझे एकबारगी झिझक लगी, मगर फिर मैंने हामी भर दी. पूछा, ‘किस लिए जाना है? क्या स्टोरी करनी है?’

उसने कहा, ‘वहां मेरा एक जासूस है, जब भी वहां कोई नई लड़की या लड़कियों का झुंड आता है, वह मुझे खबर दे देता है. पता चला है कल रात नेपाल से काफी लड़कियां आई हैं, जिनमें से बहुत सी नाबालिग हैं.’
‘अच्छा…’ मुझे आश्चर्य हुआ, ‘लोकल पुलिस को पता है?’ मैंने पूछा.

‘पता तो होगा, सब उनकी नाक के नीचे ही होता है.’ वंदना ने जवाब दिया. मुझे उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ, उससे कोफ्त भी हुई कि क्या समझती है ये पुलिस को? मैंने गुस्से में कहा, ‘अगर वहां ऐसा कुछ हुआ है तो पुलिस अब तक कार्रवाई कर चुकी होगी.’

वंदना ने इडली खाते हुए इत्मिनान से जवाब दिया, ‘पुलिस कुछ नहीं करती है, कल चल कर देख लेना. मुझे भी बस स्टोरी करनी है, बौस ने कहा है इसलिए… मैं भी उन पर लिख कर क्या उखाड़ लूंगी, जब सिस्टम ही काम नहीं करता.’

वंदना की बातों ने मुझे खीज से भर दिया था. ये तो सरासर आरोप लग रहा है वर्दी पर. कैसे सहन होता. ट्रेनिंग के दौरान सत्य, न्याय, देशभक्ति, कानून, साहस, वीरता के ढेरों पाठ पढ़े थे, ये लड़की तो उनके पन्ने फाड़ने पर तुली है. बड़ी पत्रकार बनी फिर रही है, कल तो इसके साथ जाना ही होगा.

हम दूसरे दिन दोपहर में वहां पहुंच गए. वंदना के कहने पर मैंने सलवार-सूट और दुपट्टा ओढ़ा हुआ था, जबकि आमतौर पर मैं जींस टीशर्ट ही पहनती हूं, या वर्दी में रहती हूं. वंदना ने एक कोठे के नीचे पहुंच कर किसी को फोन किया. थोड़ी देर में एक दुबला-पतला आदमी आया और वंदना से बोला, ‘मुंह ढंक लीजिए, यहां आप मेरी रिश्तेदार हैं.’

वंदना ने तुरंत अपने दुपट्टे को मुंह पर लपेट लिया, बस आंखें खुली रखीं. मुझे इशारा किया तो मैंने भी वैसा ही किया. वह आदमी हमें लेकर ऊपर कोठे पर चढ़ गया. हम वहां काफी देर एक कमरे में जमीन पर बिछी दरी पर बैठे रहे. वहां तमाम लड़कियां थीं. हर तरफ पर्दे जैसे पड़े थे. ग्राहक आते और लड़कियां उनके साथ पर्दे के पीछे चली जातीं. काफी देर हो गई. मैं बैठे-बैठे उक्ता रही थी. शाम हो चुकी थी. वंदना धीरे-धीरे उस आदमी से बातें कर रही थी. वह इसी कोठे में रहता था. नाम था इदरीस. तभी मैंने छह लड़कियों को अंदर आते देखा. लड़कियां छोटी थीं. यही कोई बारह से पंद्रह वर्ष के बीच की. उनके साथ चार आदमी भी थे. वे सभी अंदर आते ही एक-एक लड़की के साथ पर्दे के पीछे लोप हो गए. दो लड़कियां बच गईं, जो मेरे सामने ही आकर बैठ गईं. मैं हैरानी से देख रही थी.

वंदना की बात बिल्कुल सच थी. लड़कियां वाकई नाबालिग थीं. नेपाली थीं. यहां इस कोठे के नीचे ही सटी हुई पुलिस चौकी है, क्या उन्हें अपने एरिया में आने वालों के बारे में पता नहीं लगा होगा? आखिर कैसे ये नाजायज काम यहां आराम से चल रहा है? यह सवाल मेरे मन में उथल-पुथल मचा ही रहा था कि दरवाजे से दो वर्दीधारी भीतर घुसे. कंधे पर चमचमाते बैच बता रहे थे कि दोनों सब इंस्पेक्टर रैंक के थे. मेरे शरीर में अचानक करेंट दौड़ गया. विजयी मुस्कान चेहरे पर आ गई. लो आ गए कानून के रखवाले छापा मारने…
वंदना ने मेरे हाथ पर हाथ रख कर दबाया. खामोश रहने का इशारा दिया. मेरे अंदर जैसे कुछ टूट गया. तड़ाक… तड़ाक… धम्म…. चेहरा निस्तेज हो गया… सामने बैठी दोनों नाबालिग बच्चियां उन दोनों वर्दी वालों के साथ पर्दे के पीछे लोप हो गईं.

Crime Story

Hindi Love Story: सरिता- क्या पूरा हुआ देव का प्यार

Hindi Love Story: वह ठीक मेरे सामने से गुजरी. एकदम अचानक. मन में बेचैनी सी हुई. उस ने शायद देख लिया था मुझे. लेकिन अनदेखा कर के पल भर में बिलकुल नजदीक से निकल गई. जैसे अजनबी था मैं उस के लिए. कोई जानपहचान ही न हो. इस जन्म में मिले ही न हों कभी. मेरा कोई अधिकार भी न था उस पर कि आवाज दे कर रोक सकूं

और पूछूं कि कैसी हो? क्या चल रहा है आजकल? उस ने भी शायद बात करना नाजायज समझा हो. शायद इस तरह आमनेसामने से निकलने पर उसे लग रहा हो जैसे कोई गुनाह हो गया हो उस से. आज का दिन उस के लिए बुरा साबित हुआ हो. कहां से टकरा गए? क्यों, कैसे देख लिया?

यही वह लड़की थी. लड़की पहले थी अब तो वह महिला थी शादीशुदा. किसी की पत्नी. लेकिन जब मेरी पहली मुलाकात हुई थी उस समय वह लड़की थी. एक सुंदर लड़की, जो मुझ से मिलने के लिए बहाने तलाशती थी. मुझे देखे बिना उसे चैन न आता था.

हम कभी पार्क में, कभी रैस्टोरैंट में, कभी क्लब में तो कभी सिनेमाहाल में मिलते.

धीरेधीरे प्यार परवान चढ़ने लगा. प्रेम के पंख लगते ही हम उड़ने लगे. आसमान की सैर करने लगे. जब मौका मिलता मोबाइल पर बातें करते. एकदूसरे को एसएमएस करते रहते. दोनों दुनिया से बेखबर प्यार में डूबे रहते. बहुत थे उसे देखने वाले. बहुत थे उस के चाहने वाले. लेकिन वह केवल मेरे साथ थी, मेरी थी. वह मुझ से बेइंतहा प्रेम करती थी. देखता तो मैं उसे रहता था. लेकिन मेरे देखने से क्या होता है? ताजमहल को हजारों लोग देखते हैं. बात तो तब थी जब वह मुझे देखे.

कालेज शुरू हो चुका था. वह प्रथम वर्ष में थी और मैं द्वितीय वर्ष में. जैसाकि रिवाज चला आया है कालेजों में नए छात्रों की खिंचाई करना. उन्हें परेशान करना. अपमानित करना. प्रताडि़त करना. इसे परिचय का नाम देने वालों को पता नहीं था कि बाद में यह कुरीति बन कर गंभीर अपराध का रूप धारण कर लेगी.

जब सीनियर छात्रों ने उस से कहा कि वह आई लव यू कहे तो उस ने इनकार कर दिया. लड़कों ने उसे घेर कर बियर पीने को कहा. उस ने इनकार कर दिया. लड़कों ने कहा कि वह अपनी सलवार या कमीज दोनों में से कोई एक उतार दे. उस ने मना कर दिया. सीनियर छात्रों ने इसे अपना अपमान समझा. उन्होंने उस के गालों पर तमाचे मारना शुरू कर दिया. फिर तमाचों की चोट से वह तिलमिला कर चीखने लगी.

सभी सीनियर लड़के बारीबारी आते और जोरदार थप्पड़ मार कर हंसते हुए निकल जाते. उस की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी. मेरा नंबर भी आया. मैं ठीक उस के सामने था. वह डर, क्रोध, अपमान से थरथरा रही थी. मैं उस के नजदीक से निकल गया बिना उसे तमाचा मारे. फिर सीनियर छात्रों ने उसे जबरदस्ती बियर पिला दी. उस के कपड़े फाड़ने की कोशिश की. वह अपमान व पीड़ा से बिलखती हुई वहीं बैठ कर रोने लगी. फिर बियर से उस का सिर भारी होने लगा. उस का चेहरा मेरी नजरों के सामने घूमा. मैं वापस वहीं पहुंचा, जहां उस की रैगिंग हो रही थी. वहां कोई नहीं था. वह बेसुध पड़ी हुई थी. मैं उसे अस्पताल ले गया. उस के मोबाइल से उस के घर का नंबर ले कर उन्हें इतला दी.

उस के पिता शहर के बड़े उद्योगपति थे. हालात मालूम होने पर उन्होंने पुलिस को इतला दी. लड़की के पिता के पास धनबल, राजनीतिक बल था. उन्होंने कालेज की ईंट से ईंट बजा दी. इस से पहले कि लड़कों पर कोई कानूनी काररवाई होती, उन्होंने लड़की से अस्पताल में जा कर माफी मांग ली. बात खत्म हो गई.

उस के पिता ने मेरा शुक्रिया अदा किया. जब छोटी औकात वाले का शुक्रिया अदा किया जाता है तो उसे शुक्रिया के रूप में कुछ रुपए दिए जाते हैं, यह कह कर कि रख लो प्यार से दे रहा हूं. मेरी मना करने की हिम्मत नहीं हुई. न चाहते हुए भी लेने पड़े. एक करोड़पति आदमी, आलीशान कोठी. गेट पर दरबान. लाइन से खड़ी महंगी चमचमाती गाडि़यां. मैं उन के व्यक्तित्व के आगे दब गया था. अगर कालेज के लड़कों को उस के पिता की औकात के बारे में पता होता तो भूल कर भी यह गलती न करते. अब सब उस से संबंध बनाने का प्रयास करने लगे. लेकिन उस ने मुझे देखा उस नजर से, जिस नजर से इस उम्र में हर कोई चाहता है कि उसे देखा जाए. वह मुझे कालेज कैंटीन में ले जाती. यदि मैं पहले से किसी दोस्त के साथ बैठा होता तो वह आ कर कहती ऐक्सक्यूजमी, क्या मैं बैठ सकती हूं? क्या आप हमें अकेला छोड़ सकते हैं? मेरे दोस्त शर्मिंदगी, गुस्से से उठ कर चले जाते.

‘‘हैलो, मैं सरिता,’’ उस ने हाथ बढ़ाया.

‘‘मैं, देव,’’ मैं ने हाथ बढ़ाया.

2 हाथ मिले. आंखें चार हुईं. धड़कनों की गति बढ़ी. कुछ और नजदीकियां बढ़ीं और पास आए. गले मिलने लगे तो धमनियों में रक्त का संचार बढ़ने लगा. कालेज की ओर से पिकनिक टूर हुआ. मैं अपनी आर्थिक स्थिति के चलते जाने को राजी न था. उस ने अपनी तरफ से मेरी फीस अदा की और मुझे यह कह कर ले गई कि पिकनिक तो बहाना है. हमें एकदूसरे के साथ समय बिताने का मौका मिलेगा.

सभी छात्र हिल स्टेशन का लुत्फ उठाते रहे. लेकिन हम दोनों बांहों में बांहें डाले

अपनी ही दुनिया में खोए रहे. प्यारमुहब्बत के वादे करते रहे. हम दोनों एकदूसरे के दिल की गहराइयों में उतर चुके थे.

उस ने कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करती हूं. तुम्हारे बिना जी नहीं सकती.’’

‘‘प्यार तो मैं भी तुम से करता हूं, लेकिन इस प्यार का अंजाम क्या होगा?’’ मैं ने कहा.

‘‘वही जो हर प्यार का होता है.’’

‘‘मैं गरीब हूं.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘अपने पिता से पूछ कर देखना.’’

‘‘यार, प्यार मैं ने किया. शादी मुझे करनी है. जीवन मेरा है. जीना मुझे है. इस में मेरे पिता का क्या लेनादेना?’’

‘‘यह भी पिता से पूछ कर देखना.’’

वह चिढ़ गई. मैं ने उसे मनाने का हर जतन किया. उसे फिल्मी शेरोशायरी सुनाई. प्रेम भरे गीत सुनाए. उस से लिपट गया. उस के गालों को चूमा. उस से माफी मांगी. वह खिलखिला पड़ी. स्वच्छ, पवित्र बहती नदी की तरह. अपने नाम की तरह.

हमारी मुलाकातें बढ़ती गईं. हमारा प्यार बढ़ता गया. कालेज में सब को पता था हमारे प्यार के बारे में. सब जलते थे हमारे प्यार से.

एक दिन सरिता ने कहा, ‘‘मुझे अपने घर के लोगों से मिलवाओ.’’

मैं डर गया. क्या सोचेगी? कहीं मेरी गरीबी का मजाक तो नहीं उड़ाएगी? किस से मिलवाऊं घर में? गरीब महल्ले में 1-2 कमरे का कच्चा मकान. जवानी की दहलीज लांघ चुकी कुंआरी बहन, जिस की शादी दहेज के कारण न हो सकी. विधवा बूढ़ी मां, जिस के मन में ढेरों बोझ, चेहरे पर झुंझलाहट और मुंह में कड़वे बोल थे. क्या कहेगी मां कि मेहनत, मजदूरी कर के पढ़ाने के लिए भेजा और बहन की शादी करने के बजाय खुद इश्क कर रहा है. अपनी शादी की योजना बना रहा है.

खैर, सरिता नहीं मानी. मैं उसे घर ले गया. वह बहन से मिली. मां से मिली. प्यार से बातें हुईं. चायनाश्ता भी. लेकिन सरिता के जाने के बाद मां ने मुझ से कुछ कहा तो नहीं, लेकिन खफाखफा सी नजर जरूर आईं. उन का अनकहा मैं समझ गया. मुझे नौकरी तलाश कर घर चलाना है. मुझे हर हाल में बहन की शादी करनी है. यह मेरा दायित्व है. बाकी सब बाद में. पढ़ाई के साथसाथ में नौकरी के फार्म भी भर रहा था. तैयारी भी कर रहा था नौकरी की. लेकिन हर जगह से नाउम्मीदी, असफलता. घर में घुटन सी होती. पढ़ाई से मन हटने लगा था. लेकिन मेरे हाथ में कुछ न था. मेरे पास एक सीधा रास्ता यह था कि सरिता से शादी कर के घरजमाई बन कर अपनी गरीबी से मुक्ति पा लेता. लेकिन आत्मसम्मान आड़े आता रहा.

सरिता करोड़पति पिता की इकलौती बेटी थी. वह प्यार के खुमार में महल से झोपड़े में आने को तैयार थी. वह मुझे झोपड़े से महल में ले जाने को भी राजी थी. लेकिन मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं और क्या न करूं? मैं कैसे एक कलकल बहती पावन, शुद्ध साफ नदी का रुख मोड़ कर उसे अपनी गरीबी के दलदल में ले आऊं? कितने दिन रह पाएगी? कैसे उन अभावों को सह पाएगी? क्यों लूं मैं उस से इतनी बड़ी कुरबानी? कैसे मैं उस के घर जा कर अपने जमीर को मार कर उस की अमीरी में अपना मुंह छिपा लूं? क्या सोचेगी मेरी बूढ़ी मां, जिस के पास पूंजी के नाम पर सिर्फ मैं था?

‘‘तुम्हारी समस्या क्या है?’’ सरिता ने पूछा, ‘‘मैं सब में राजी हूं. या तो तुम निकलो अपनी गरीबी से या फिर मुझे ले चलो अपनी गरीबी में. मुझे सिर्फ तुम्हारा साथ चाहिए. जगह जो भी हो. महल हो या झोंपड़ा. जहां तुम वहां मैं. तुम्हारे बिना मुझे महल स्वीकार नहीं.’’

मैं चुप रहा.

‘‘तुम बोलते क्यों नहीं?’’ सरिता ने झल्ला कर कहा.

‘‘मेरे पास बोलने को कुछ नहीं है. मुझे समय चाहिए.’’

समय का काम है गुजरना. समय गुजरता रहा. कालेज पूरा हो चुका था. मैं नौकरी के लिए प्रयास करता रहा. सफलता तो जैसे मेरी दुश्मन थी. सरिता मुझ से मिलती रहती. फोन पर बात करती रहती. गुजरते वक्त के साथ मैं टूट रहा था और सरिता शादी की जिद पर अड़ी थी, जोकि उस के प्यार का हक था.

सरिता का कालेज भी समाप्त हो चुका था. मेरी दुविधा को खत्म करने के लिए सरिता ने अपने पिता से बात की. एक दिन सरिता ने कहा, ‘‘पापा ने घर पर बुलाया है. उन्हें कुछ बात

करनी है.’’

मैं उस विशाल कोठी के सामने खड़ा था. दरबान ने हिकारत के भाव से गेट खोला. विदेशी कुत्ते भूंक रहे थे. मुझे लगा जैसे मेरी गरीबी को दुतकार रहे हों.

विशाल कोठी के बाहर सरिता के पिता बैठे चाय की चुसकियां ले रहे थे.

मैं पहुंचा. उन्होंने बैठने को कहा. उन्होंने नौकर को इशारा किया. नौकर फौरन चाय ले कर आ गया. उन्होंने नौकर को जाने को कहा. अब मैं इस विशाल व्यक्तित्व के सामने खौफ खाए बैठा था. मुझे डर नहीं था, लेकिन मैं अपनी औकात से वाकिफ था.

उन्होंने अपनी रोबदार आवाज में कहा, ‘‘क्या चाहते हो?’’

‘‘जी, कुछ भी तो नहीं,’’ मैं ने अचकचा कर कहा.

‘‘सरिता से शादी करने की हिम्मत है?’’

‘‘जी, नहीं.’’

‘‘घरजमाई बन सकते हो?’’

‘‘जी, नहीं.’’

‘‘फिर, आगे क्या सोचा है?’’

मैं चुप रहा.

‘‘शादी तुम कर नहीं सकते. नौकरी तुम्हें मिल नहीं रही. घर की जिम्मेदारियां निभाते जीवन गुजर जाएगा. मेरी बेटी का क्या होगा? उसे मना कर दो. क्यों उस का वक्त बरबाद मेरा मतलब जीवन खराब कर रहे हो?’’

मैं फिर चुप रहा.

‘‘तुम्हारा आत्मविश्वास डगमगा चुका है देव. चलो, एक समझौता करते हैं. सौदा चाहो तो सौदा समझ लो.’’

मैं नजरें झुकाए शांत बैठा था. एक नजर सरिता के पिता को देखता और फिर नजरें झुका लेता.

‘‘मैं अपने दोस्त की कंपनी में तुम्हें नौकरी दिलवा सकता हूं. सुपरवाइजर की पोस्ट खाली है. अच्छी तनख्वाह है. तुम्हारी बहन की शादी के लिए लोन भी दिलवा सकता हूं. बदले में तुम्हें सरिता को छोड़ना होगा.’’

मुझे नौकरी मिल गई. बहन की शादी के लिए पैसा भी. बूढ़ी मां का बोझ उतर गया.

सरिता ने अपने पिता से पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘उस ने अपनी जिम्मेदारी और प्यार में से जिम्मेदारी को चुन लिया है. तुम उसे भूल जाओ. न वह घरजमाई बन कर रहने लायक है और न ही वैसा दामाद जैसा मुझे चाहिए था, पूर्ण समर्पित तुम्हारे प्रति. वह वैसा नहीं है और न ही वह तुम्हें अपनी गरीबी में रखने को राजी है. तुम रह भी नहीं पाओगी. वह जानता है.’’

सरिता मेरे पास आई. उस ने अपना गुस्सा मुझ पर उतारा, ‘‘क्यों किया था

प्यार? क्यों किए थे झूठे वादे? तुम फरेबी निकले. मुझे नहीं पता था कि कालेज में मुझे थप्पड़ न मारने वाला लड़का मुझे बहोशी की हालत में अस्पताल ले जाने वाला वह दिलेर लड़का बेकारी और कर्त्तव्यों के बोझ से इतना दब जाएगा कि अपने प्यार से बच कर भाग निकलेगा.’’

मैं चुप रहा तो मेरी चुप्पी ने उसे तोड़ दिया. वह कलकल बहती पवित्र नदी का शुद्ध जल आज मेरे सितम, मेरी चुप्पी से रुक सा गया था. मानों किसी बड़े बांध में बंध कर उस का प्रवाह रुक गया हो. उस उमड़तीघुमड़ती नदी का पानी मटमैला सा हो चुका था.

‘‘तुम ने मेरा सौदा कर दिया. मुझे बेच दिया अपने कर्त्तव्यों की आड़ में. मुझे कालेज की रैगिंग के वे चांटे, वे कहकहे, वह अपमान उतना भारी नहीं लगा जितनी तुम्हारी खामोशी. तुम अपनी गरीबी, अपनी जिम्मेदारियों, अपनी बेकारी में अपने प्यार को हार चुके हो,’’ और वह चली गई.

आज वर्षों बाद जब सरिता इतने नजदीक से अचानक गुजरी तो यों गुजर गई मानों मैं उस के लिए दुनिया से गुजर गया हूं या शायद दुनिया का सब से गुजरा व्यक्ति था. तभी तो उस ने पल भर रुकना, मेरी तरफ देखना भी गंवारा न समझा.

उस के पीछे उस का पति था. मेरा कालेज का दोस्त. रैगिंग मास्टर.

समर मुझे देख कर रुक गया. बोला, ‘‘अरे देव, तुम यहां कैसे? कैसे हो?’’

‘‘मैं ठीक हूं अपनी कहो,’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं भी ठीक हूं. पर तुम यहां कैसे?’’ समर ने पूछा.

‘‘भाई समर मैं यहां कपाडि़या से मिलने आया था. पौलिसी के संबंध में वरना इस बड़े और महंगे होटल में मेरी क्या औकात आने की.’’

वह हंसा, ‘‘मैं ही कपाडि़या हूं. मैं ने ही बुलाया था.’’

मैं भौचक्का रह गया. कहा, ‘‘तुम तो समर राठी हो… क्यों मजाक…’’

उस ने मेरी बात काट कर, ‘‘चलो, कौफी पीते हुए बातें करते हैं.’’

मैं एजेंट था. क्लाइंट के पीछे चलना मेरी मजबूरी, मेरी रोजीरोटी थी.

समर ने कौफी मंगवाई. मैं ने फार्म निकाला. मैं उस के बताए अनुसार फार्म भरता गया. नौमिनेशन में सरिता कपाडि़या का नाम आते ही पल भर के लिए हाथ रुक गया.

उस ने हंसते हुए बताया, ‘‘तुम्हारी चुप्पी से सरिता कटी पतंग की तरह हो गई थी. मैं भी मध्यमवर्ग का था. मुझे भी पैसा, ऐशोआराम की जिंदगी चाहिए थी. यों समझ ले कि वह कटी पतंग मैं ने लूट ली. मैं उस के जीवन में आया. उसे प्रेम, दिलासा, अपनापन दिया. उस का दिल बहलाया. वह पहले से टूटी हुई थी. मुझ से जल्दी जुड़ गई. उस के पिता ने शर्त रखी कि तुम्हें घरजमाई बनना होगा. अपना सरनेम चेंज करना होगा. मैं जो चाहता था वह मुझे मिल गया. मैं पूरी तरह कपाडि़या हो कर सरिता और उस के पिता के कहने पर चला. आज मैं कपाडि़या सेठ हूं.’’

तभी सरिता आ गई. उस ने मुझे उचटती निगाह से देखा. मैं ने उसे देख कर पहलू बदला. उस ने कुछ भी पीने से इनकार कर दिया और समर से पूछा, ‘‘ये यहां कैसे?’’

‘‘बहुत दिनों से पौलिसी लेने के लिए फोन कर रहा था. यह मुझे नहीं पहचान पाया. मैं पहचान गया. मैं ने सोचा चलो दोस्त की मदद हो जाएगी.’’

सरिता ने व्यंग्य से कहा, ‘‘कैसे पहचान पाते. तुम ने अपनी जात ही बदल ली,’’ फिर हंसते हुए कहा, ‘‘प्रेम तो कोई तुम से करना सीखे. प्रेम में क्या जाति, क्या धर्म? पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनेआप को बदल ही नहीं पाते.’’

समर ने कहकहा लगाया. इस कहकहे में वह अपना अपमान छिपा गया. उस ने मुझ से पूछा, ‘‘देव, घर में सब कैसे हैं?’’

‘‘ठीक हैं.’’

‘‘मेरा मतलब तुम्हारी पत्नी, बच्चे?’’

‘‘मैं ने अपनी जिम्मेदारी के कारण शादी नहीं की. विधवा बहन के 2 बच्चों का पालनपोषण कर रहा हूं. सुपरवाइजरी की नौकरी छोड़ दी… वह नौकरी मुझे एहसान लगने लगी थी. किसी का कर्ज, कोई सौदा. फिर एलआईसी में एजेंट बन गया. अब दिनरात ग्राहक तलाशता हूं.’’

सरिता की आंखें भर आईं. फिर आंसुओं को रोकते हुए कहा, ‘‘जो लोग जीवन में सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाते, जो लोग जीवन में बड़े फैसले नहीं कर पाते, उन का कुछ नहीं हो सकता.’’

समर को लगा कि कहीं पुराना पे्रम फिर से हिलोरें न मारने लगे. अत: उस ने उठते

हुए कहा, ‘‘अच्छा देव, हमें चलना है. चलो सरिता.’’

देव अपनी फाइल व कागजात समेटने लगा. समर और सरिता बाहर निकल गए.

सरिता यों चल रही थी समर के साथ मानो अंत में हर नदी का अंजाम ही हो खारे सागर में मिल कर मरना. उस ने अपनी नियत स्वीकार ली थी.

देव की एक चुप्पी ने सरिता के जीवन में ऐसा बांध बना दिया कि उसे फिर से कलकल करते बहने के लिए किसी समर रूपी सागर में पनाह लेनी पड़ी. यह जानते हुए भी कि समर ने शादी उस की दौलत की खातिर की है. गंगोतरी की गंगा खारे पानी में मिल कर विलीन हो चुकी थी. उस की सरिता मर चुकी थी. सरिता के मरने में उस का भारी योगदान था. देव की सरिता, समर की सरिता. सागर में विलीन सरिता. उस की चुप्पी से अधूरी, अतृप्त, उदास सरिता.

Hindi Love Story

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें