Fatty Liver और लिवर कैंसर में अंतर

Fatty Liver: 30 वर्षीय नीलिमा को जब पता चला कि उसे फैटी लीवर की डिजीज है, तो पहले उसे खुद पर विश्वास नहीं हुआ. उस ने दूसरे डाक्टरों से भी संपर्क किया, तो उन्होंने भी वही बात बताई और दवा के साथसाथ उस के लाइफस्टाइल में बदलाव के सुझाव दिए. 6 महीने दवा लेने के बाद नीलिमा ठीक हुई और उस ने बाहर के जंक फूड को लेना एकदम कम कर दिया.

असल में, आज के समय में नौन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. पहले यह बीमारी केवल वयस्कों में देखी जाती थी, लेकिन आज की लाइफस्टाइल में बच्चे और युवा भी इस के शिकार हो रहे हैं. यदि समय पर इस का इलाज न किया जाए, तो यह धीरेधीरे लिवर सिरोसिस और यहां तक कि लिवर कैंसर में भी बदल सकता है, जो चिंता का विषय है. इसलिए फैटी लिवर की समस्या का समय रहते इलाज करना बेहद जरूरी है.

नैशनल इंस्टीट्यूट औफ हैल्थ के अनुसार, पहले यह बीमारी बच्चों और युवाओं में 10 से 20 फीसदी हुआ करती थी, जो अब बढ़ कर 40% तक हो चुका है, जिस का मुख्य कारण चाइल्ड्हुड ओबेसिटी है.

इस बारे में मुंबई की ग्लेनइगल्स हौस्पिटल की हेपेटोलौजी और लिवर ट्रांसप्लांट मैडिसिन विभाग के निदेशक डा. अमित मंडोत कहते हैं कि यह आजकल लाइफस्टाइल वाली बीमारी हो गई है, जिस के बारे में सही जानकारी सभी के लिए आवश्यक है. इस के लक्षण, कारण और रोकथाम के बारे में जानकारी निम्न हैं :

डाक्टर आगे कहते हैं कि लिवर की समस्याएं हर उम्र के लोगों के लिए चिंता का विषय बन रहा है, लेकिन अकसर इन्हें गंभीर होने तक नजरअंदाज कर दिया जाता है. आज फैटी लिवर सब से आम लिवर की बीमारियों में से एक है, जो शराब न पीने वालों में भी पाया जाता है. शुरुआत में यह मामूली लग सकता है, लेकिन समय के साथ फैटी लिवर गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है, जैसेकि लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर. इस के लक्षण पहचान कर शुरुआती चरण में ही इलाज करना फायदेमंद साबित हो सकता है.

फैटी लिवर तब होता है जब लिवर में अत्यधिक चरबी जमा हो जाती है. यह 2 प्रकार के होते हैं :

  • अल्कोहोलिक फैटी लिवर.
  • नौन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD)

आज की खराब जीवनशैली और असंतुलित खानपान के कारण एनएएफएलडी ज्यादा आम है. इस के मुख्य कारण हैं- मोटापा, डायबिटीज, उच्च कोलेस्ट्रोल, बैठे रहने की आदत, तैलीय और मीठे भोजन का अधिक सेवन और कुछ दवाओं का लंबे समय तक उपयोग.

इस के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं :

 

  • थकान या कमजोरी.
  • दाईं तरफ ऊपरी पेट में हलका दर्द या भारीपन.
  • भूख न लगना.
  • वजन में कमी.

पौसिबल कौंप्लिकेशन :

  • लिवर में सूजन (स्टीटोहेपेटाइटिस)
  • फाइब्रोसिस (लिवर में निशान पड़ना)
  • सिरोसिस (लिवर का गंभीर नुकसान)
  • लिवर फेल होना या लिवर कैंसर वगैरह.

यहां यह बता दें कि हमेशा फैटी लिवर कैंसर में नहीं बदलता, अगर इस की गंभीरता अधिक हो, तो कैंसर हो सकता है, लेकिन समय से इलाज होने पर यह ठीक भी हो सकता है.

लिवर कैंसर है क्या

डा. अमित कहते हैं कि लिवर कैंसर तब होता है, जब लिवर में असामान्य कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं. इस का सब से आम प्रकार है हेपेटोसैलुलर कार्सिनोमा. यह लिवर में शुरू हो सकता है या शरीर के अन्य हिस्सों से फैल सकता है. इस के कारण हैं क्रोनिक हेपेटाइटिस बी या सी संक्रमण, सिरोसिस, अनुपचारित फैटी लिवर डिजीज, अत्यधिक शराब सेवन, लंबे समय तक लिवर को हुआ नुकसान और अफ्लाटौक्सिन जैसे जहरीले पदार्थों के संपर्क में आना.

लिवर कैंसर के लक्षण

  • दाईं तरफ ऊपरी पेट में दर्द.
  • वजन में कमी.
  • पेट में सूजन.
  • त्वचा और आंखों का पीला पड़ना (पीलिया)
  • भूख न लगना.
  • थोड़ा खाने के बाद ही पेट भरा हुआ लगना आदि.

यहां जान लें कि यदि समय पर इलाज न किया जाए, तो लिवर कैंसर अन्य अंगों में भी फैल सकता है, आंतरिक रक्तस्राव कर सकता है या लिवर फेल हो सकता है और बाद में इस का इलाज और कठिन हो जाता है. इसलिए समय पर जांच और इलाज करवाना बेहद जरूरी है.

फैटी लीवर और कैंसर का संबंध क्या है

फैटी लिवर और लिवर कैंसर का संबंध नौन अल्कोहोलिक फैटी लिवर धीरेधीरे सिरोसिस और अंत में लिवर कैंसर में बदल सकता है, क्योंकि फैटी लिवर की वजह से लिवर में लंबे समय तक सूजन पैदा करता है, जिस से फाइब्रोसिस और सिरोसिस हो जाता है. इस से लगातार होने वाला नुकसान असामान्य कोशिकाओं की वृद्धि का खतरा बढ़ाता है, जिस से लिवर कैंसर हो सकता है. जितना ज्यादा समय लिवर सूजन और नुकसान झेलता है, उतना ही कैंसर का खतरा बढ़ता जाता है.

लिवर की सुरक्षा और एनएएफएलडी (NAFLD) से बचाव के लिए जरूरी उपाय

 

  • वजन को नियंत्रित रखना.
  • ताजा फल, सब्जियां और साबुत अनाज वाले संतुलित आहार लेना.
  • जंक फूड, तैलीय, डब्बाबंद और प्रोसेस्ड फूड से बचना.
  • धूम्रपान और शराब का सेवन न करना.
  • यदि डायबिटीज, मोटापा या लिवर रोग का पारिवारिक इतिहास है, तो नियमित रूप से लिवर की जांच करवाते रहना चाहिए.

 

हालांकि फैटी लिवर का तुरंत कोई बड़ा असर नहीं दिखता, लेकिन लंबे समय में यह गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है. इसलिए जीवनशैली में बदलाव और नियमित स्वास्थ्य जांच लिवर कैंसर से बचाव करने और लिवर को सुरक्षित रखने में मदद कर सकते हैं.

 

यहां इस बात का ध्यान रखें कि ऐसी किसी भी बीमारी का आयुर्वेदिक या होमियोपैथिक इलाज न करें, इस से इलाज में देरी हो सकती है, जिस से बीमारी बढ़ सकती है. सही समय पर सही जांच और इलाज ही आप के लिवर को तंदुरुस्त बना सकता है.

Fatty Liver

Social Story: भोर की सुनहरी किरण- नंदिता की क्या थी सच्चाई

राइटर- रेखा शाह आरबी

Social Story: 22 वर्षीय नंदिता बहुत सुंदर थी. मगर उस के सुंदर चेहरे पर आज सुबह से ही ?ां?ालाहट और परेशानी नजर आ रही थी. वह आज बहुत परेशान थी. सुबह से बहुत सारा काम कर चुकी थीं. फिर भी बहुत सारा निबटाना था. कंप्यूटर पर बिल अपलोड करते हुए जब सुरेश जो इस बड़ी सी शौप में चपरासी था सब की देखभाल करना उसी की जिम्मेदारी थी. सब को पानी देना, कस्टमर को चायपानी पिलाना सब उस की जिम्मेदारी थी. सुरेश ने जब आ कर कहा कि नंदिताजी आप को बौस बुला रहे हैं तो नंदिता का मन किया कि सिर दीवार से टकरा कर अपना सिर फोड़ दे.

मन में एक भददी गाली देते हुए सोचने लगी कि कमीना जब तक 4 बार देख न ले उसे चैन नहीं पड़ता है. एक तो जब उस के कैबिन में जाओ लगता है नजर से ही खा जाएगा. उस की नजर, नजर न हो कर इंचीटेप बन जाती है और इंचइंच नापने लगता है… खूसट बुड्ढे को अपनी बीवी अच्छी नहीं लगती. सारी दुनिया की औरतें अच्छी लगती हैं और लड़कियां अच्छी लगती है… हां कुदरत ने दिल खोल कर दौलत दी है तो ऐयाशी सू?ोगी ही… एक को छोड़ो 4 भी रख सकता है… पैसे की कौन सी कमी है.

लेकिन भला हो इस की बीवी का जिस ने इस की चाबुक खींच कर रखी है… और उस के आगे इस की चूं नहीं निकलती है. नहीं तो अब तक न जाने कितनी लड़कियों की जिंदगी बरबाद कर चुका होता.’’

नंदिता यह सब सिर्फ सोच सकती थी. बोल नहीं सकती थी अत: उस ने सुरेश से कहा, ‘‘भैया, आप चलिए मैं आती हूं.’’

इस बड़ी से मौलरूपी दुकान की असली मालिक तो थी. औफिस में सभी जानते थे कि गौतम और सुनिधि की लवमैरिज थी.

घर वालों ने बेटी को गंवाने के डर से गरीब गौतम को तो स्वीकार कर लिया लेकिन उस की गरीबी को नहीं स्वीकार कर सके. अमीर मांबाप सुनिधि को इतनी धनसंपत्ति दे गए कि उस की भी गिनती शहर के अमीरों में होने लगी थी.

आकर्षण की एक अवधि होती है. उस के बाद हकीकत सामने आने ही लगती है. सुनिधि को बहुत जल्दी गौतम की रंगीनमिजाजी का पता चल गया. सुनिधि खानदानी लड़की थी. गौतम की लाख छिछोरी हरकतें जानती थी लेकिन फिर भी पति के रूप में उसे मानती थी. वह उस के बच्चों का पिता था.

मगर अपनी अमीरी की धौंस जमाने से भी बाज नहीं आती थी और यह सारी कहानी पूरा औफिस जानता था. मुंह पर कोई भले ही कुछ नहीं कहता था लेकिन पीठ पीछे खूब सब बातें करते थे.

वैसे गौतम कोई बुड्ढा इंसान नहीं था. वह तो नंदिता बस खुन्नस में उसे बूढ़ा कहा करती थी और वह भी अपने मन में. गौतम 50 के आसपास हैंडसम इंसान था. कम से कम अपनी बीवी से तो ज्यादा सुंदर था. उस की सुंदरता और बात करने की कला से ही तो सुनिधि ने उस से प्रभावित हो कर उस से शादी की थी और गौतम ने उस की रईसी से प्रभावित हो कर उस से शादी की थी, जिस के मजे वह अब ले रहा था.

नंदिता को आज चौथी बार बुलावा था. मन तो कर रहा था कि सीधे उस के कैबिन में जा कर उस के मुंह पर बोल आए कि कमीने बुड्ढे मु?ो नहीं करनी है तेरी नौकरी, रख अपनी नौकरी अपने पास. लेकिन वह जानती थी चाचा ने बड़ी मुश्किल से यहां पर रखवाया था और सैलरी भी अच्छीखासी मिल रही थी. बुड्ढे को बरदाश्त करना उस की मजबूरी थी. नंदिता को यहां पर काम करने में कोई दिक्कत नहीं थी बल्कि नौकरी भी काफी ऐशोआराम वाली थी. दिनभर दुकान की खरीदबिक्री के बिल कंप्यूटर पर अपलोड करते रहना. दुकान इलैक्ट्रौनिक उपकरणों की थी.

वैसे भी नंदिता का गणित बहुत अच्छा था. हिसाबकिताब रखते रखना जिस में उसे कोई दिक्कत नहीं आती थी. बस दिक्कत उस का बौस खड़ूस गौतम ही था, जिस की हर महिला पर गंदी नजर रहती थी. नंदिता तो फिर भी जवान थी, खूबसूरत थी.

खैर, उस ने लंबी सांस छोड़ कर अपने चेहरे का जियोग्राफी सही किया और स्माइल सजा कर उस ने कैबिन का दरवाजा नोक किया.

गौतम तो जैसे इंतजार में बैठा था. बत्तीसी दिखाते हुए बोला, ‘‘आओआओ नंदिता कुरसी पर बैठो.’’

नंदिता ने स्माइल पास करते हुए पूछा, ‘‘सर आप ने किस लिए बुलाया?’’

‘‘नंदिता तुम तो आते ही बस काम के पीछे पड़ जाती हो. काम तो होता ही रहेगा. अरे कभी हम काम के अलावा भी तो बातें कर सकते हैं… एकदूसरे के दोस्त बन सकते हैं… जिंदगी जीने के लिए होती है.’’

नंदिता उस के मन के भाव खूब सम?ा रही थी पर बिलकुल अनजान बनते हुए मासूम बन कर कहा, ‘‘हां सर लेकिन वह काम पैंडिंग पड़ा है उसे पूरा करना है.’’

‘‘अरे यार… कल पूरा कर लेना. आज कोई दुनिया खत्म होने नहीं जा रही.’’

गौतम को बहुत दिनों के बाद आज नंदिता अकेले मिली थी वरना जब भी आती तो कभी अपने साथ कलीग तो कभी कोई न कोई और आ ही जाता. इसलिए वह मौके का पूरा इस्तेमाल कर लेना चाहता था.

वह अपनी कुरसी से उठ कर नंदिता की कुरसी के पास आ गया और उस के कंधों पर अपने हाथ रख कर बोला, ‘‘नंदिता बहुत दिनों से मैं ने कोई फिल्म नहीं देखी. चलो किसी दिन फिल्म देखने चला जाए अकेले फिल्म देखने को जाने को मन ही नहीं करता है.’’

नंदिता ने अपने मन में गाली देते हुए कहा कि हरामखोर मैं तेरी बेटी की उम्र की हूं और तुझे मेरे साथ फिल्म देखनी है. अपनी बेटी के साथ चला जा या अपनी बीवी के साथ क्यों नहीं जाता है?

स्माइल पास करते हुए नंदिता बोली, ‘‘सर औफिस के बाद घर पर मुझे बहुत सारा काम रहता है. मुझे अपने भाई नवीन को पढ़ाना भी होता है. उस के ऐग्जाम आने वाले हैं इसलिए मैं नहीं जा सकती कृपया मुझे माफ करें.’’

नंदिता महसूस कर रही थी कि गौतम को स्माइल से ही चारों धाम प्राप्त हो गए हैं. लेकिन आखिर क्या करती रोजीरोटी का सवाल था वरना जवाब तो वह भी अपने तमाचे के द्वारा बहुत अच्छे से दे सकती थी अपने कंधों पर हाथ रखने के बदले पर नहीं दे सकती थी.

तब तक अचानक नंदिता की नजर  गौतम के सिर के ऊपर लगी हुई एलईडी पर चली गई, जिस में पूरे औफिस का सीसीटीवी कैमरा चलता था. नंदिता ने देखा बौस की बीवी सुनिधि आ रही है.

नंदिता की तो बांछें ही खिल गईं. मगर गौतम ने अभी तक अपनी बीवी को नहीं देखा था. इसीलिए बहुत तरंग में बात कर रहा था. उस की बीवी तो बीवी थी उसे नोक कर के आने की कोई जरूरत नहीं थी.

डाइरैक्ट वह औफिस के अंदर चली आई और नंदिता को वहां बैठा देख कर और उस के आगेपीछे चक्कर काटते गौतम को देख कर वह लालपीली हो गई. लेकिन उस ने नंदिता से कुछ नहीं कहा. इधर नंदिता का दिल कर रहा था कि उस को गले लगा कर उस के गाल चूम ले गौतम की बकवास से मुक्त दिलाने के लिए.

नंदिता बौस से इजाजत ले कर अपनी टेबल पर चली आई. लेकिन अंदर जो कुछ भी हो रहा था वह कुछ अच्छा नहीं हो रहा था. वह दूर बैठी टेबल से हावभाव देख कर बखूबी अंदाजा लगा रही थी और उस को मजा आ रहा था. जैसी करनी वैसी भरनी.

कुछ देर बाद उस की बीवी उस के कैबिन से निकली और उस की टेबल के पास से गुजरते हुए अपनी आंखों से अंगारे बरसाते हुए निकल गई. नंदिता अपने कंधे उचकाते हुए अपने मन में सोच रही थी कि मु?ो आप के इस बुड्ढे में मेरी कोई रुचि नहीं है. यह तो खुद ही कमीना है. मेरे पीछे पड़ा रहता है. अगर मजबूरी नहीं होती तो कब का इसे लात मार कर यहां से चली गई होती.’’

इन सब के बीच यह बात तो भूल हो गई कि आखिर गौतम ने बुलाया किसलिए था. चाहे गौतम लाख रंगीनमिजाज सही लेकिन कर्मचारियों से काम लेने के मामले में बहुत टाइट इंसान था और इस में कोई भेदभाव नहीं करता था चाहे लड़का हो या लड़की और यही उस की सफलता का भी राज था.

वैसे भी शाम के 4 बजने वाले थे और उस की शिफ्ट पूरी हो रही थी. उस ने सोच लिया कल जा कर गौतम  से जानकारी ले लूंगी.

उधर गौतम जब शाम को घर पहुंचा तो सुनिधि भरी हुई पड़ी थी. देखते ही गौतम पर भड़क उठी और चिल्लाने लगी, ‘‘गौतम अपनी हरकतों से बाज आ जाओ. बच्चे बड़े हो रहे हैं. क्यों चाहते हो कि मैं उन के सामने तुम्हें जलील करूं. अभी तक तो मैं तुम्हारी सारी हरकतों पर परदा डालती आ रही लेकिन ऐसा ही रहा तो

तुम न घर के रहोगे न घाट के. मुझे और मेरी जायदाद को संभालने के लिए मेरे पास मेरे बच्चे हैं. मु?ो तुम्हारी इतनी भी जरूरत नहीं है कि तुम्हारी छिछोरी हरकतें बरदाश्त करती फिरूं,’’ कहते हुए कमरे का दरवाजा जोर से बंद करते हुए वह चली गई.

इधर नंदिता घर पहुंची तो उसे बहुत भूख लग आई थी. अपनी मां सुमित्रा को कुछ बनाने के लिए कहने के बजाय खुद ही बनाने के लिए किचन में चली गई. किचन क्या थी रूम के ही एक पार्ट को डिवाइड कर के एक तरफ किचन और एक तरफ नंदिता का बिस्तर लगा था.

कुछ भारी बनाने का मन नहीं था. इसलिए उसने अपने लिए थोड़ा सा पोहे बना लिया और बना कर ज्यों ही खाने के लिए बैठी तब तक उस का छोटा भाई नवीन आ गया.

हाथमुंह धो कर नवीन नंदिता के पास ही आ कर बैठ गया और उसे पोहा खाते हुए देख कर बोला, ‘‘दीदी क्या बना कर खा रही हो? मुझे भी खिलाओ. मुझे भी भूख लगी है.’’

‘‘खाना है तुझे तो उधर से चम्मच ले कर आओ और इसी में बैठ कर खा लो. बेकार में और बरतन गंदे करने की जरूरत नहीं है,’’ नंदिता खातेखाते बोली.

दोनों भाईबहन एक ही प्लेट से खाने लगे. जब भी नंदिता नवीन को देखती थी उस के अंदर वात्सल्य उमड़ पड़ता था.

दिनभर लोगों की गंदी नजरों का सामना करते हुए दुनिया में एक यही मर्द जात थी जिस पर वह आंख मूंद कर भरोसा कर सकती थी वरना दुनिया तो अकेली लड़की के लिए भेडि़या बन जाती है.

आंखों से ही बलात्कार कर लेती है, जिसे नंदिता बहुत आसानी से महसूस कर लेती थी. नंदिता क्या दुनिया की सारी लड़कियां इस बात को महसूस कर लेती हैं कि कौन किस नजर से उन्हें देख रहा है. मगर कई बार देख कर भी अनजान बनना पड़ता है.

नंदिता को सोच में डूबा हुआ और चुपचाप खाते देख कर नवीन बोला, ‘‘क्या हुआ दीदी?’’

नंदिता बोली, ‘‘कुछ नहीं हुआ चुपचाप खा.’’

‘‘लेकिन दीदी मु?ो आप को कुछ बताना है.’’

‘‘हां तो बता क्या बात है?’’

‘‘दीदी मैं और मेरे दोस्त साहिल और समर तीनों लोग सोच रहे हैं की नौकरी लगना इतना आसान नहीं है… परीक्षा के बाद हम लोग मिल कर अपनी बड़ापाव और चाइनीज फूड वैन लगाएंगे. आजकल इस बिजनैस में बहुत कमाई है. पूरे परिवार का खर्च आराम के साथ चला लूंगा. सारी तैयारी हो चुकी है. बस आप से पूछना बाकी था.’’

‘‘और यह सब तुम ने कब सोचा?’’ नंदिता आश्चर्य मिश्रित स्वर में बोली.

‘‘यह तो हम लोगों ने बहुत पहले से सोचा था बस परीक्षा खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं,’’ नवीन खातेखाते बोला.

‘‘और पिकअप वैन कहां से लाओगे? वह तो बहुत महंगी मिलती है?’’

‘‘अरे दीदी उस की चिंता मत करो. हम लोग नई पिकअप नहीं लेंगे. साहिल के पापा पहले पिकअप चलाते थे जो अब जर्जर अवस्था में है लेकिन मरम्मत के बाद वह फूड वैन बनाने के काबिल हो जाएगी.’’

‘‘फिर भी कुछ तो खर्च आएगा. बरतन आदि की भी तो जरूरत पड़ेगी?’’

‘‘उन सब का इंतजाम हो चुका है. आप चिंता मत कीजिए. मैं तो बस इतना चाहता हूं कि जल्द से जल्द यह फूड वैन चालू हो जाए ताकि मैं आप और मां की जिम्मेदारी अच्छे से उठा लूं. उस के बाद आप के पास नौकरी करने की विवशता भी नहीं रहेगी.आपका मन करेगा तो कीजिएगा नहीं तो नहीं कीजिएगा.’’

‘‘तू ऐसा क्यों बोल रहा है?’’

तो नवीन रोष में आते हुए बोला, ‘‘दीदी, क्या मुझे पता नहीं है आप का मालिक कितना

घटिया आदमी है. जब मैं उस दिन आप के औफिस गया था तो वह आप को काफी गंदी नजरों से देख रहा था.’’

नंदिता नवीन के आगे निरुत्तर थी. वह उसे क्या बताती कि दुनिया के सारे मर्द गैरलड़की के लिए जानवर ही होते हैं. बहुत कम किसी की बहनबेटी को बहनबेटी समझते हैं.

‘‘ठीक है तुम्हारा काम शुरू हो जाएगा

तो मैं अपनी नौकरी के बारे में फिर से विचार करूंगी.’’

नवीन मुसकराते हुए चला गया.

नंदिता के मन में कहीं गहरे संतोष उतरने लगा. अब वह ज्यादा दिन मजबूर नहीं रहेगी और न किसी की गलत हरकतों को बरदाश्त करना पड़ेगा. इस सोच ने ही उस के चेहरे पर ढेर सारी मुसकराहट बिखेर दी. जैसे सवेरा होते ही आसमान में सूरज की सुनहरी किरणें फैल जाती हैं जैसे बादलों को चीर कर सूरज निकल आया हो.

Social Story

Best Hindi Story: प्रैशर प्रलय- पार्टी में क्या हुआ था

Best Hindi Story: ‘‘प्रैशर आया?’’ हाथी जैसी मस्त चाल से झूमते हुए अंदर आते ही जय ने पूछा. ‘‘अरे जय भैया आप को ही आया लगता है, जल्दी जाइए न वाशरूम खाली है,’’ प्रश्रय की छोटी बहन प्रशस्ति जोर से हंसी.

‘‘क्यों बिगाड़ता रहता है जय मेरे बेटे का सुंदर नाम. पहले ढंग से बोल प्रश्रय…’’ नीला, बेटे के नर्सरी के दोस्त संजय को आज भी दोस्त का सही नाम लेने के लिए सता कर खूब मजे लेती. बचपन में जय तोतला था तो उस के मुंह से अलग ही नाम निकलता. धीरेधीरे तो बोल जाता पर जल्दी में कुछ और ही बोल जाता. अब तो उस ने प्रश्रय को पै्रशर ही बुलाना शुरू कर दिया. अमूमन वह सीरियस बहुत कम होता. सीरियस होता तो भी प्रैशर सिंह ही पुकारता और प्रश्रय उसे तोतला. ‘‘अरे आंटीजी छोड़ो भी, कितनी बार कहा आसान सा नाम रख दो. इतना मुश्किल नाम क्यों रख दिया. अब हम ने सही नाम तो रख दिया प्रैशर सिन्हा… हा… हा… अरे मोदीजी की क्या खबर है. कुछ पता भी है, आज क्या नया इजाद कर डाला?’’

‘‘क्या?’’ सब का मुंह खुल गया, फिर कोई नई ‘बंदी’, ‘नोटबंदी’? सब सोच ही रहे थे कि वह मोदीजी… मोदीजी कहते हुए किचन में चला आया. ‘‘ओह… क्या जय भैया…’’ सब भूल ही जाते जय प्रश्रय की नईनवेली पत्नी मुदिता को मोदीजी कहना शुरू किया है.

‘‘अरे मुदिता भी नहीं कह पाता, सिंपल तो है. तो मोदीजी क्या भाभी ही कहा कर… कोई और भाभी तो है नहीं.’’ ‘‘मैं तो भैया मोदीजी ही कहूंगा, रोज नया ही कुछ देखने को मिल जाता है. कुछ नया फिर किया?’’ ‘‘किया है न तभी तो स्कूटी से प्रश्रय साथ दूध लेने गई है. बना रही थी हलवा उस में पानी इतना डाला कि वह लपसी बन गया. अब उसे सुधार कर फटाफट खीर बनाने का प्रोग्राम है. लो आ गए दोनों…’’ नीला मुसकरा कर बोलीं.

‘‘हमारे भैया भी तो महा कंजूस… कुछ वैस्ट नहीं करने देते…’’ ‘‘राम मिलाई जोड़ी… आगे नहीं बकूंगा वरना प्रैशर सिन्हा को प्रैशर आ जाएगा. बहुत मारेगा फिर…’’ कहते हुए उस ने प्रशस्ति के हाथ पर जोर से ताली मारी, हंसा और फिर उंगली से उसे चुप रहने का इशारा किया.

‘‘जल्दी भाभी… आप की नई ईजाद डिश ‘एग प्लस’ वह आमलेट में ब्रैड की फिलिंग वाले यम्मी नाश्ते से तो हमारा अभी आधा पेट ही भरा,’’ प्रशस्ति ने जानबूझ कर जबान होंठों पर फिराई, ‘‘आप चूक गए जय भैया उस स्पैशल नाश्ते को…’’ बहन प्रशस्ति छेड़ कर मुसकरा उठी. ‘‘क्याक्या वह ब्रैड में अंडे की स्टफिंग तो खाई है पर अंडे में ब्रैड की स्टफिंग? देखा तश्तरी, मैं ने सही नाम ही दिया है मोदीजी नमस्ते, मेरे लिए तो जरूर, जल्दी…’’ उस ने पेट सहलाते हुए भूखा होने का एहसास दिलाया.

मुदिता ने हंसते हुए प्रतिक्रिया दी, ‘‘मैं अभी सबकुछ, आप के लिए भी लाई…’’ और फिर किचन में चली गई. ‘‘क्यों मजाक बनाता है मेरी नईनवेली का तोतले? वह बुरा नहीं मानती. फिर इस का मतलब क्या?’’ प्रश्रय ने उस की पीठ पर हंसते हुए एक धौल जमा दी.

‘‘क्यों भई, प्रैशर सिन्हा तो प्रैशर में आ गया. तश्तरी तू उठ, उसे ठंडा हो कर बैठने

दे ढक्कन…’’ ‘‘लो अब एक और नामकरण मेरा… क्या है भैया,’’ वह रूठते हुए बोली.

‘‘ठीक ही तो है पर्यायवाची ही तो है तश्तरी का ढक्कन,’’ प्रश्रय हंस कर उसे सरकाते हुए बैठ गया.

‘‘यही तो काम होता है तश्तरी का,’’ दोनों हंसने लगे तो 15 साल की प्रशस्ति पीछे जा कर दोनों को हलकेहलके घूंसे बरसाने लगी. ‘‘अरे, रुकरुक ढक्कन… देख प्रैशर की तो डाई उतरने लगी है,’’ जय उस के बालों को निहारते हुए उन पर हाथ फिराने लगा.

‘‘अरे यार, मैं डाई लगाता कहां हूं जो छूटने लगेगी… पागल है क्या?’’ वह थोड़ा हैरानपरेशान हुआ, नवेली बहू मुदिता भी ध्यान लगा कर सुनने जो लगी थी. ‘‘बड़ी मार खाएगा, मेरी इज्जत का फालूदा क्यों निकालने पर लगा रहता है?’’

‘‘लो भई, प्रैशर सिन्हा तो जरा से में प्रैशर में आ गए.’’ ‘‘अबे समझ न, पैदा ही अच्छी डाई लगवा कर हुआ था, ऊपर वाले के सैलून से. अब और कितने सालों चलेगी आखिर. 30 का तू होने को आया…’’

‘‘ओए तू कितने का होने आया स्वीट सिक्सटीन?’’ वह चिढ़ कर बोला. ‘‘तुझे भी पता है शक्ल से तो स्वीट सिक्सटीन ही लगता है और दिल से ट्वैंटी वन और दिमाग से फोर्टी फोर…’’ कौलर ऊंचा करते हुए अकड़ से बोला.

‘‘मुझे तो तू हर तरह से फोर्टी फोर नहीं, फोरट्वैंटी लगता है.’’ ‘‘भई वकालत क्या यों ही चल जाएगी. इसीलिए तो ये विस्कर्स भी सफेद कलर कर रखे हैं कि लोग थोड़ा अनुभवी वकील समझें… वैसे मुझे तो तुझ से बढि़या डाई लगा कर भेजा है कुदरत ने और फिर प्रैशर सिन्हा तुझ से छोटा भी तो हूं,’’ बात मुदिता तक पहुंचाने के लिए वह तेज स्वर में बोला.

‘‘अच्छा?’’ मुदिता नाश्ते की ट्रे के साथ वहीं आ गई थी.

‘‘अच्छा क्या… केवल 4 दिनों का ही अंतर है महाराज. 1 ही महीना 1 ही साल दोनों पैदा हुए हैं…’’

‘‘तू फिर प्रैशर में आ गया, मजाक में भी सीरियस…’’ उस ने ऐसा चेहरा बनाया कि सभी हंस पड़े. फिर नाश्ते के लिए टेबल पर जा बैठे. मुदिता फिर कुछ लाने किचन में चली गई. तभी मुदिता का टेबल पर रखा मोबाइल बजने लगा.

‘‘देखना किस का है प्रश्रय… उठा लो, मैं आई.’’

‘‘दे भई,’’ प्रश्रय ने उसे मोबाइल पास करने को कहा. ‘‘गदाधर भीम…’’ कहते हुए उस ने मुसकरा कर मोबाइल उसे थमा दिया. मुदिता की बहन मुग्धा के नाम का सरलीकरण उस ने यही कर दिया था.

प्रश्रय ने उसे उंगली से चुप रहने का इशारा किया और बात करने लगा. ‘‘नमस्ते जीजू, जीजी कहां है? उस ने अपना मोबाइल जो मुझे दिया फिर उस में कुछ टाइप हो कर मेरे सिर को चला गया. अब मैं

क्या करूं. मेरा मूड बहुत औफ है जीजू, दीजिए उन को… अपना घटिया फोन मुझे हैल्प के लिए थमा दिया.’’ ‘‘देता हूं 1 सैकंड… किचन में है… पर अब क्या टाइप हो कर सैंड हो गया?’’

‘‘जीजू वह कैमिस्ट्री सर को मैं ने प्रश्न भेजने के लिए लिखा था ‘यू सैंड’

तो ई की जगह ए टाइप हो गया. फिर मैं ने ‘सौरी’ लिखा तो एस की जगह डब्ल्यू सैंड हो गया.’’ ‘‘क्याक्या मतलब…’’

‘‘यू सांड…वरी सर… अब क्या करूं जीजी के फोन ने तो कहीं का न छोड़ा… सर बहुत गुस्सा हो गए,’’ और उस का रोना शुरू हो गया. ‘‘अरे कौन वह विवेक शर्मा ही पढ़ाता है न तुम्हें…यहीं तो रहता है. मैं बात कर लूंगा. कोई गुस्सा नहीं रहेगा. अब रोना बंद करो और लो जीजी से बात करो.’’

‘‘सांड… वरी…’’ जय की हंसी छूट गई. वह पेट पकड़े हंसे जा रहा था. ‘‘मरवाएगा क्या पागल?’’

‘‘इसे बताया ही क्यों,’’ नीला के होंठों पर भी मुसकान खेलने लगी. ‘‘पहले ही बोला था मुझे दिया होता तो अब तक ठीक कर दिया होता,’’ जय किसी तरह हंसी कंट्रोल करते हुए बोला.

‘‘छांट कर ससुराल ढूंढ़ी है. सभी कलाकार हैं. हा… हा…’’ ‘‘ज्यादा मत हंस. तेरी भी शादी छांट कर ही करवाऊंगा, तोतले… जहां लड़की का तो ऐसा मुश्किल नाम होगा कि तू नाम ही सोचता रह जाएगा,’’ प्रश्रय जोर से हंसा.

‘‘ठीकवीक नहीं करना. से नया स्मार्ट फोन चाहिए अपने बर्थडे पर पहले ही वादा कर चुकी हूं. इसी 24 को तो है संडे को… मम्मी ने सब को बुलाया है. आप को भी आना है जय भैया… आंटी को भी लाना है,’’ मुदिता भी आ कर खाली सीट पर बैठ गई. ‘‘अरे बिलकुल. आप की आज्ञा शिरोधार्य.’’

‘‘यार, इतना महंगा फोन अभी बच्ची ही तो है… 11वीं क्लास कुछ होती है?’’ ‘‘लो प्रैशर सिन्हा का प्रैशर फिर बढ़ गया… अच्छा ही तो है रोजरोज गदाधर सायरन तुझे नहीं सुनना पड़ेगा.’’

‘‘अरे इतनी क्या कंजूसी. एक ही साली है, तेरी शादी के बाद उस का पहला जन्मदिन है. सही तो वादा किया है मुदिता ने,’’ नीला मुसकराई.

रविवार को मुदिता के घर जन्मदिन की खूब चहलपहल हो रखी थी. प्रश्रय और जय परिवार के साथ ठीक समय पर पहुंच गए. बर्थडे गर्ल मुग्धा बाकी मेहमानों को छोड़ उन की ओर लपकी और गिफ्ट का डब्बा मुदिता के हाथ से खींच लिया, ‘‘मेरा मोबाइल

है न…’’ ‘‘अरे रुकरुक, पहले सब से मिल… हम सब को विश तो कर लेने दे…’’

‘‘ओकेओकेओके… नमस्तेनमस्ते आंटी, आंटीजी, जीजू भैया दी… थैंकयू… थैंकयू… थैंकयू सब को,’’ उस ने गिफ्ट लेनेके उतावलेपन में इतनी जल्दीजल्दी कहा कि सभी हंस पड़े. ‘‘और मोहित कैसे हो यार? कैसी चल रही है तुम्हारी फाइनल ईयर की पढ़ाई? कभी तो मिलने आ जाया करो घर. कब हैं ऐग्जाम्स?’’ मोहित मुदिता का भाई जिसे जय मिसफिट, कभी लाल हिट कहता, घर भर में उसे वही तेज दिमाग व गोरा लगता था.

‘‘अरे छोड़ यार लाल हिट, सारे प्रश्न कौकरोचों को तुझे तो मार ही डालना है… आज के दिन भी पढ़ाई की बातें ही करेगा… बता आंटीअंकल कहां हैं? दोनों दिख नहीं रहे? नमकमिर्च… पेपरसाल्ट, मेरे अंकलआंटी तेरे मम्मीपापा रौनक कुछ कम लग रही है. मजा नहीं आ रहा,’’ जय ने कुतूहल से पूछा. तभी दोनों आ गए… सक्सेनाजी दोनों हाथों से पैंट संभालने में लगे हुए थे और गोलमटोल मैडम ने केक का डब्बा और एक पैकेट थामा हुआ था. सब से नमस्तेनमस्ते हुई पर दोनों की तूतू मैंमैं अभी भी चालू थी.

‘‘नाड़ा तेरा टूटा तो बैल्ट निकलवा मेरी आफत कर डाली. अब मेहमानों के सामने मेरी फजीहत… सब की तूही जिम्मेदार है…’’ ‘‘चुप करो अकेले तो कोई काम करते नहीं बनता. टेलर से ब्लाउज लेना न होता तो मैं जाती भी न आज तुम्हारे साथ.’’

‘‘तेरा सामान कौन लाता? कम खाया कर वरना नाड़ा न टूटता तेरा… वह तो शुक्र मना मेरा कि मैं ने तुम्हें अपनी बैल्ट मौके पर ही बांधने को दे दी.’’ ‘‘हांहां, क्यों नहीं. भूल गए पहली बार ससुराल कैसी पुरानी बैल्ट पहन कर पहुंच गए थे, जो पटाक से टूटी तो चुपके से मैं ने ही नाड़ा ला कर तुम्हारी इज्जत बचाई थी. बड़े हीरो की तरह शर्ट बिना खोंसे बाहर निकाल कर आए थे कि पुरानी बैल्ट दिखेगी नहीं… हां नहीं तो लो थामो अपना वालेट…’’

‘‘भगवान ने रात बनाई है वरना तो चौबीसों घंटे मुझ से लड़ाई ही करती रहो तुम…’’ मिसेज सक्सेना की साड़ी पर चमकती बैल्ट देख माजरा समझ सभी मुसकरा रहे थे. जय, प्रश्रय के कानों के पास मुंह ले जा कर बुदबुदा उठा, ‘‘राम मिलाए जोड़ी…’’

प्रश्रय ने उसे घूर कर देखा तो उस ने मुसकराते हुए अपने होंठों पर चुप की उंगली रख ली.

‘‘नमस्ते पापा,’’ प्रश्रय चरण छूने झुका था. ‘‘अरे रुकोरुको वरना हाथ उठा कर

आशीष दिया तो गड़बड़ हो जाएगी,’’ वे हंसे और बैठ गए.

‘‘हां अब ठीक है… खुश रहो,’’ उन्होंने दोनों हाथों से आशीर्वाद दिया.

‘‘भागवान, मौके की नजाकत समझो, जल्दी जा कर मेरी बैल्ट ला दो…’’ वे बैठ कर वालेट में नोट गिनगिन कर कुछ परेशान से दिखने लगे…

‘‘लगता है शौप में हजार के 2 नोट देने की जगह 3 नोट दे डाले मैडम ने. 10 होने चाहिए थे अब 9 ही हैं.’’ ‘‘अरे नहीं…’’

‘‘नमस्ते अंकल… लाइए मैं देखता हूं… होंगे इसी में, आंटीजी इतनी भी भुलक्कड़ नहीं… अरे, बहुत गड़बड़ कर दी है आप ने तभी तो… पिताजी की तसवीर उलटी रखेंगे तो क्या होगा. यह देखिए सारे पिताजी को सीधा कर दिया. अब गिन लीजिए पूरे हैं…’’ मिस्टर सक्सेना के साथ औरों का मुंह भी सोच में खुला रह गया था…

‘‘अरे पिताजी मतलब बापू, गांधीजी…’’ उस ने मुसकरा कर वालेट वापस थमा दिया, ‘‘अब गिनिए पूरे हैं ना?’’ ‘‘अच्छा ऐसा भी होता है क्या… मुझे तो मालूम ही नहीं था,’’ उन का मुंह अभी भी खुला हुआ था.

‘‘अरे पापा इस की तो मजाक करने की आदत है. आप को मालूम तो है…’’ प्रश्रय मुसकराया. ‘‘यह लो अपनी बैल्ट… मोहित जल्दी जा गाड़ी में मेरा चश्मा रह गया है उठा ला. नए चश्में के साथ मेरा फोटो सब से रोबदार आती है,’’ उन्होंने मिस्टर सक्सेना की ओर देखते हुए कहा.

‘‘मम्मी सिर पर लगा रखा है पहले देख तो लो…’’ ‘‘देखती कैसे इस की असली आंखें तो सर पर थीं…’’ मिस्टर सक्सेना चिढ़ कर चहक उठे.

‘‘आप भी न भाई साहब भाभी को छेड़ने का कोई मौका नहीं चूकते,’’ नीला मुसकराई. ‘‘सच में प्यारी सी हैं भाभीजी, चहकती

ही अच्छी लगती हैं,’’ जय की मम्मी शांता ने सहमति दर्शाई. ‘‘गजानन का हुक्म हो गया है, चलना ही पड़ेगा…’’ उन्होंने मुसकराते हुए जय, प्रश्रय की ओर देखा. हंसे तो हिल कर उन का शरीर भी साथ देने लगा.

‘‘जानते हो इन का असली नाम तो गजगामिनी था… नए नामकरण में क्या खाली तुम ही उस्ताद हो?’’ वह मुसकराए. ‘‘पर मैं कभी बुला ही नहीं पाया. इतने लंबे नाम से खाली गज कैसे कहता, मार ही डालती, तो गजानन पुकारने लगा,’’ वे ठठा कर हंस पड़े.

‘‘तभी तो आप के बिना माहौल जम नहीं रहा था.’’

‘‘बस 10-10 मिनट रुकिए, मम्मी वह वैशाली पहुंचने वाली है. 1 घंटा पहले एअरपोर्ट से निकली हैं… मुंबई से आ चुकी हैं. उस की दीदी और पापामम्मी भी साथ हैं… दी का कोई ऐग्जाम है. अभीअभी उस का फोन आया.’’

‘‘अरे वाह वैष्णवी… मेरी सहेली कितने सालों बाद हम मिलेंगे मम्मी…’’ मुदिता खुशी से चीखी और मम्मी के गले लिपट गई. डगमगा गया था संतुलन मम्मी का. किसी तरह मोटे शरीर को संभाला. ‘‘छोड़छोड़ मुदि, अभी तो मैं गिर जाती.’’

‘‘अच्छा… हिमांशु अंकल सपरिवार… सही मौके पर…’’ ‘‘तब तक आप लोग कुछकुछ खातेपीते रहो. कोल्ड ड्रिंक्स और लो, बहुत वैराइटी है…’’ गजगामिनी ने पास आ कर बोला.

शीतल बाल पेय बहुत हो लिया आंटीजी अब थोड़ा बड़ों का उष्णोदक मिल जाए तो… मीठा गरम पानी बढि़या… मतलब बींस पाउडर वाला या लीफ वाला…’’ ‘‘मतलब मम्मीजी कौफीचाय की तलब लग रही है इसे…’’ प्रश्रय ने मुसकराते हुए घबराई गजगामिनी को क्लीयर कर दिया.

‘‘आए, हय मैं तो घबरा ही गई कि कोई बीमारी हो गई क्या… अच्छाअच्छा मैं बनवाती हूं अभी,’’ वह मस्त लुढ़कती सी चली गई.

चाय का दौर चल ही रहा था कि मुग्धा की सहेली वैशाली, दीदी वैष्णवी, सुधांशु अंकल व ललिता आंटी आ गए. 3 साल पहले वे दिल्ली इसी कालोनी में रहते थे. बच्चों का स्कूल में भी साथ हो गया तो दोनों परिवारों में अच्छी दोस्ती हो गई थी. फिर सुधांशुजी का परिवार अहमदाबाद शिफ्ट हो गया. वहां प्रोफैसर पद

पर यूनिवर्सिटी में उन की नियुक्ति हो गई थी. सभी अपने पुराने दोस्तों से मिल कर प्रसन्न हो गए. सभी से उन का परिचय कराया जाने लगा. मुदिता वैष्णवी को ले कर प्रश्रय के पास

ले आई, ‘‘मिल, ये तेरे जीजाजी हैं, तू तो शादी में थी नहीं.’’

‘‘नमस्ते जीजाजी… मी वैष्णवी… हाऊ हैंडसम यू आर… हये बहुत लकी है मुदिता तू यार.’’

‘‘अब नजर न लगा मेरे पति को, क्या पता तू मुझ से भी लकी निकले, मुझ से सुंदर जो है.’’ ‘‘इन से मिलो ये हैं जय भैया. प्रश्रय के दोस्त बड़े मजाकिया स्वभाव के हैं. जानती हो प्रश्रय को ये प्रैशर सिन्हा और प्रश्रय इन्हें तोतला पुकारते हैं बचपन से.’’

‘‘हाय, माइसैल्फ वैष्णवी एलएलबी. मुदिता की टैंथ ट्वैल्थ की फ्रैंड,’’ वैष्णवी ने नमस्ते की. ‘‘नमस्ते, पर आप को बता दूं अब मैं तोतला बिलकुल नहीं हूं… वलना तोल्त में तेस तैसे ललता तिनियल लायल जो हूं.’’

वैष्णवी हंस पड़ी. ‘‘क्या मैं जान सकता हूं कौन सा मीठा साबुन चख कर आप आई हैं मुंबई से?’’

‘‘आप की उजली दंत कांति ने मुझे प्रश्न के लिए मजबूर कर दिया,’’ वह गंभीर होते

हुए बोला. ‘‘मीठा साबुन… मतलब?’’ वह सोचने लगी थी. साथ ही मुदिता भी. फिर बोली, ‘‘ओ गुड आप भी लौयर हैं. मेरी भी कानून में बहुत रुचि है, व्यक्ति को सिविलाइज्ड बनाता है कानून. इसीलिए मैं ने एलएलबी किया. अब सिविल जजी का ऐग्जाम ही देने आई हूं यहां.’’

‘‘अरे ठाट से वकालत कीजिए, ढेरों पैसे बनाइए, जजी में क्या रखा है? आप के पास जो केस आएगा समझो जीताजिताया है.’’ ‘‘वह कैसे?’’

‘‘ओ जय भैया, बातें बाद में बनाना. किस से बातें कर रहे हो… यह तो बताओ पहले… ‘वैष्णवी’ बोल के तो दिखाओ, तब मानेंगे हम वरना कुछ तो है बचपन का वह असर अभी भी हम तो यही कहेंगे… मालूम है अब बस आप नया नाम ही दे दोगे, चलो वही दे दो इसे भी,’’ वह मुसकराई.

‘‘मोदीजी माफी…’’ उस ने हंसते हुए हाथ जोड़ दिए. छोटी बहन वैशाली ने जय का प्रश्न सुन लिया था. पापा सुधांशु को पूछने भी चली गई. जहां पहले ही वैष्णवी की शादी के लिए सुधांशु और ललिता को चिंतित देख गजगामिनी नीला और जय की शादी के लिए परेशान शांता सभी अपने सुयोग्य ऐडवोकेट लड़के जय की तारीफ और उस के मजाकिया स्वभाव की भी चर्चा

किए बैठे थे. ‘‘ओ गौड मतलब मंजन टूथपेस्ट… मीठा साबुन? हा… हा… कोलगेट,’’ प्रोफैसर सुधांशु जवाब दे कर हंसे थे.

‘‘मुझे भी मिलाओ उस भैया से,’’ मुग्धा व वैशाली उसे बुलाने चलीं आईं. ‘‘चलचल हीरो बन रहा था न आज तेरी बात ही पक्की करवा देता हूं इसी वैष्णवी से… शांता आंटी की तेरी शादी की चिंता खत्म…

बेटा अब बोल के दिखा नाम या कोई और नाम रख,’’ प्रश्रय उस के कानों में फुसफुसा कर हंसे जा रहा था. वह जय को पकड़ कर वहां ले गया जहां सुधांशु और उस के ससुर मिस्टर सक्सेना पत्नियों के साथ बैठे थे.

हंसीमजाक चलता रहा. केक कटा, खानापीना, नाचगाना और

खूब मस्ती होती रही. बड़ों ने उसी बीच जय और वैष्णवी की रजामंदी ले कर उन की शादी भी तय कर दी. ‘‘जय भैया अब तो नाम लेना ही पड़ेगा, बोलिए वैष्णवी… या नाम बिगाडि़ए हमारे जैसा…’’

‘‘बेशोन दही या नवी मुंबई जो पसंद हो…’’ झट से बोल कर जय जोर से हंसा. सारे बच्चे, बड़े ‘बेशोन दही’ और ‘नवी मुंबई’ कह कर वैष्णवी को चिढ़ाने लगे. ये… ये… उस ने सोफे पर बैठे हुए एक कुशन से जय पर सटीक निशाना लगाया और फिर हंसते हुए कहा, ‘‘अरे ये जय नहीं प्रलय… और फिर कुशन में अपना मुंह छिपा लिया.’’

फिर तो सब का कुशन एकदूसरे पर फेंकने का खेल चल पड़ा. हुड़दंग का जंगल लौ अचानक वैष्णवी को सिविल लौ से और भी अच्छा लगने लगा था.

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Sad Story: तिलांजलि: क्यों धरा को साथ ले जाने से कतरा रहा था अंबर

लेखिका- प्रेमलता यदु

धरा और अंबर की शादी को अभी सप्ताह भर भी नहीं गुजरा था कि उस के लौटने का वक्त आ गया. उसे आज ही बैंगलोर के लिए निकलना था. वह बैंगलोर की एक आईटी कंपनी में कार्यरत था. वहीं धरा अभी अंबर को ठीक से देख भी नहीं पाई थी, देखती भी कैसे…? पूरा घर नातेरिश्तेदारों से जो भरा हुआ था. हर दिन कोई न कोई रस्म अब भी जारी थी, जो समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी. इधर इतनी भीड़भाड़ और शोरशराबे के बीच भला धरा कैसे अंबर से अपने मन की बात कह पाती. कैसे कहती कि मुझे यहां छोड़ कर मत जाओ… या मैं भी तुम्हारे संग चलूंगी.

उधर अंबर भी सारा दिन दोस्तयारों में घिरा रहता. रात को कमरे में आता भी तो धरा उस के गंभीर स्वभाव और संकोचवश कुछ कह नहीं पाती. वह अंबर से पूछना चाहती थी. उस ने ज्यादा दिनों की छुट्टी क्यों नहीं ली? लेकिन पूछ न सकी, वैसे तो अंबर और धरा का मधुर मिलन हो चुका था, लेकिन अब भी दोनों के बीच एक लंबा फासला था, जो धरा के लिए अकेले तय कर पाना संभव नहीं था. हमारे यहां की अरेंज मैरिज‌ में यह सब से बड़ी खासियत है या विडंबना…? मालूम नहीं… दिल मिले ना मिले, लेकिन शरीर जरूर मिल जाते हैं.

वैसे, धरा अंबर को उसी दिन से दिल ही दिल में चाहने लगी थी, जिस दिन से उस की और अंबर की शादी तय हुई थी. कालेज में यह बात सभी जानने लगे थे. यहां तक कि धरा के स्टूडेंट्स भी क‌ई बार उसे अंबर के नाम से छेड़ने लगते. धरा गर्ल्स कालेज के हिंदी विभाग में हिंदी साहित्य की असिस्टेंट प्रोफेसर थी.

अंबर कुछ कहे बगैर और धरा से बिना मिले ही चला गया. इतने भरेपूरे और चहलपहल वाले घर में भी धरा स्वयं को अकेला महसूस करने लगी. वह अंबर के फोन का इंतजार करती रही. अंबर का फोन भी आया, परंतु बाबूजी के मोबाइल पर, सब ने उस से बात की बस… धरा रह गई. सासू मां ने केवल इतना बताया कि अंबर कुशलतापूर्वक बैंगलोर पहुंच गया है. यह सुन धरा चुप रही.

दिन बीतते ग‌ए, धरा यहां बिजनौर, उत्तर प्रदेश में और अंबर वहां बैंगलोर में, दोनों अपनेअपने काम में व्यस्त रहने लगे, लेकिन धरा को हरदम अंबर से उस की यह दूरी खलने लगी. वह उस से मिलने और बातें करने को बेताब रहती, किंतु धरा के मोबाइल पर अंबर कभी फोन ही नहीं करता.

जब भी वह फोन करता, बाबूजी या सासू मां को ही करता. यदाकदा सासू मां धरा को फोन थमा देती, लेकिन सब के सामने धरा कुछ कह ही नहीं पाती, यह देख सासू मां और बाबूजी वहां से हट जाते. उस के बाद भी अंबर उस से कभी प्यारभरे दो शब्द नहीं कहता और धरा के मन में हिलोरें मार रहे प्रेम का सागर थम जाता.

अंबर का यह व्यवहार धरा की समझ से परे था. धरा अपनी ओर से पहल करती हुई जब कभी भी अंबर को फोन करती तो वह फोन ही नहीं उठाता, भूलेभटके कभी फोन उठा भी लेता तो कहता, “मैं मीटिंग में हूं. मैं अभी बिजी हूं.” और कभीकभी तो वह धरा को बुरी तरह से झिड़क भी देता. इन सब बातों की वजह से धरा के मन में उमड़तेघुमड़ते मनोभाव उसे चिंतित होने पर मजबूर करते, वह सोचती कोई भला इतना व्यस्त कैसे हो सकता है कि उस के पास अपनी नईनवेली पत्नी से बात करने तक का भी वक्त ना हो.

एक दिन तो हद ही हो गई, जब सासू मां ने कहा, “देखो बहू तुम बारबार अंबर को फोन कर के उसे परेशान ना किया करो. वहां वो काम करेगा या तुम से प्रेमालाप.”

ऐसा सुनते ही धरा तिलमिला उठी और उस दिन के उपरांत वह फिर दोबारा कभी अंबर को फोन नहीं की.

इन्हीं सब हालात के बीच हिचकोले खाती कालेज और गृहस्थी की गाड़ी चलती रही. अंबर अपनी मरजी से दोचार महीने में आता. 1-2 दिन रुकता और फिर वापस चला जाता, कभी धरा संग चलने की इच्छा जाहिर भी करती तो वह यह कह कर मना कर देता कि तुम साथ चलोगी तो यहां मांबाबूजी अकेले हो जाएंगे, उन की देखभाल कौन करेगा? और तुम्हारे कालेज से भी तुम्हें छुट्टी लेनी पड़ेगी.”

उस के आगे फिर धरा कुछ नहीं कहती. धरा अपनी नाकाम हो रही शादी को बचाने के लिए परिस्थितियों से समझौते करने लगी. उस का अधूरापन ही अब उस की नियति बन गई.

एक ही शहर में ससुराल और मायका होने के कारण छुट्टी वाले दिन कभीकभी धरा अपना अकेलापन दूर करने मायके चली जाती.

मां से जब भी वह अंबर के बारे में कुछ कहती, तो मां उलटा उसे ही समझाइश देने लगती, “कहती, अब जो है अंबर है और तुझे अपनी जिंदगी उसी के साथ ही गुजारनी है, इसलिए वह बेकार की बातों पर ध्यान ना दे, पूजापाठ करे, व्रत करे, भगवान में ध्यान लगाए, इसी में उस की भलाई और दोनों परिवारों का मान है.”

मां से यह सब सुन धरा मन मसोस कर रह जाती.

शादी के 2 साल बाद धरा की गोद हरी हो गई और उस ने सृजन को जन्म दिया. जिस ने धरा की जिंदगी के खालीपन को न‌ई उमंगों से भर दिया और धरा मुसकरा उठी. उस ने 6 महीने का कालेज से मातृत्व अवकाश भी ले लिया, लेकिन अंबर में अब भी कोई बदलाव नहीं था.

कुछ सालों के बाद धरा को कालेज की ओर से बैंगलोर में आयोजित हो रहे सेमिनार में मुख्य प्रवक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया. शादी के इतने साल बाद ही सही, कुछ दिनों के लिए तो उसे अंबर के साथ स्वतंत्र रूप से रहने को मिलेगा.

यह सोच कर वह मन ही मन पुलकित हो उठी.आंखों में प्रेम संजोए धड़कते दिल से अंबर को इत्तला किए बगैर सृजन के संग वह बैंगलोर जा पहुंची और जैसे ही उस ने डोर बेल बजाई…

अचानक मोबाइल का रिंग बज उठा, जिस से धरा की तंद्रा भंग हुई और वह वर्तमान में लौट आई.

सृजन का फोन था. फोन उठाते ही सृजन बोला, “मम्मी आप तैयार रहिए. बस, मैं कुछ ही देर में वहां पहुंच रहा हूं.”

सृजन के फोन रखते ही धरा अपना मोबाइल एक ओर रखती हुई होंठों पर हलकी सी मुसकान और नम आंखों के संग वहीं बिस्तर पर बैठी रही, उसे ऐसा लगा मानो उस ने जिंदगी की सब से अहम जंग जीत ली हो. यह उस की कड़ी मेहनत और संघर्ष का नतीजा था कि सृजन यूपीएससी उत्तीर्ण कर आईपीएस अधिकारी बन गया. वह उस मुकाम पर पहुंच गया, जहां वो सदा से ही उसे देखना चाहती थी. धरा के नयनों के समक्ष दोबारा एकएक कर फिर अतीत के पन्ने उजागर होने लगे.

उसे वह कठिन वक्त स्मरण हो आया, जब सृजन को ले वह अंबर के पास बैंगलोर पहुंची. वहां पहुंचने पर उस ने जो देखा उस के होश उड़ गए, उस के पैरों तले जमीन खिसक गई और इतने सालों का विश्वास क्षण भर में चूरचूर हो गया. अंबर की यहां अपनी एक अलग ही दुनिया थी, जहां धरा और सृजन के लिए कोई स्थान नहीं था.

धरा बोझिल मन से सेमिनार अटेंड कर बिजनौर लौट आई, लेकिन वह ससुराल ना जा अपने मायके आ गई. वह जिंदगी के उस दोराहे पर खड़ी थी, जहां एक ओर उस का आत्मसम्मान था और दूसरी ओर पूरे समाज के बनाए झूठे खोखले आदर्श, जिसे धरा के अपने ही लोग मानसम्मान का जामा पहनाए उसे स्त्री धर्म और मां के कर्त्तव्य का पाठ पढ़ा रहे थे.

विषम परिस्थिति में सब ने उस का साथ छोड़ दिया. यहां तक कि उस के अपने जिन से उस का खून का रिश्ता था, उन लोगों ने भी उस से मुंह मोड़ लिया. जिस घर में उस ने जन्म लिया, जहां वह खेलकूद कर बड़ी हुई, आज वही घर उस के लिए पराया हो ग‌या था.

धरा के पापा आराम कुरसी पर आंखों पर ऐनक चढ़ाए दोनों हाथों को बांधे, सिर झुकाए चुपचाप शांत भाव से बैठे सब देखसुन रहे थे और मां उन्हें उलाहना दिए जा रही थी, “और पढ़ाओ बेटी को, सुनो, क्या कह रही है वह. अपने ससुराल में अब वह नहीं रहेगी. अब क्यों बुत बने बैठे हो, नाक कटाने पर आमादा है तुम्हारी लाड़ली, उसे कुछ कहते क्यों नहीं?”

पूरा घर धरा को यह समझाने में लगा हुआ था कि परिवार को सहेजना और बनाए रखना हर नारी का परम धर्म है. स्त्री की पहचान और उस के बच्चे का उज्ज्वल भविष्य पति के संग हर परिस्थिति में समझौता करने में है.

उसी नारी की मान और पूछ होती है, जो अपने घर की दहलीज मृत्यु के उ‌परांत लांघती है, परंतु धरा ने तो जैसे हठ ही पकड़ ली थी कि वह अब ससुराल में किसी भी हाल में नहीं रहेगी.

धरा की सासू मां अपनी भौंहें मटकाती और हाथ नचाती हुई बोली, “औरत जात को इतना घमंड शोभा नहीं देता और कौन सा अंबर ने उस औरत के संग ब्याह रचा लिया है. साथ ही तो रह रहा है ना‌… तो क्या हुआ, मर्द ऐसा करते हैं? यहां तुझे किस बात की कमी है. तुम यहां हमारे साथ रहो, किसी को कुछ पता नहीं चलेगा और समाज में भी मानप्रतिष्ठा बनी रहेगी.”

अंबर को अपने किए पर जरा भी अफसोस नहीं था. वह पिता के रुप में सृजन का सारा खर्च उठाने को तैयार था, लेकिन वह अभी भी यही चाहता था कि धरा पहले की तरह उस के घर में उस के मातापिता के साथ रहे, उन की सेवा करे. जिस से समाज में उन का मान बना रहे, लेकिन इस बार धरा यह ठान चुकी थी कि वह किसी की नहीं सुनेगी, केवल अपने मन का ही करेगी.

धरा ना ससुराल लौटी और ना ही अपने मायके में रही. उस ने अकेले ही सृजन की परवरिश की. धरा पूर्ण रूप से अतीत में डूब चुकी थी, तभी डोर बेल बजी.

धरा के दरवाजा खोलते ही सृजन धरा से लिपटते हुए बोला, ” डियर मम्मा ये क्या है…? आप अभी तक तैयार नहीं हुईं… हमें बस थोड़ी ही देर में निकलना है.”

धरा मुसकराती हुई बोली, “बस अभी तैयार होती हूं आईपीएस साहब.”

सृजन की पोस्टिंग लखनऊ हो गई थी और वह चाहता था कि उस की मां धरा उस के साथ ही रहे. तभी सृजन का मोबाइल बजा, फोन उस के पिता अंबर का था.

सृजन के फोन रिसीव करते ही अंबर करुणा और याचना भरे शब्दों में कहने लगा, “बेटा अब मेरी सेहत ठीक नहीं रहती है. मैं अकसर बीमार रहने लगा हूं और अब बहुत अकेला भी हो गया हूं. तुम मुझे भी अपने साथ ले चलो.”

सृजन बोला, “पापा, आप चिंता ना करें. आप की दवाओं का सारा खर्च मैं उठा लूंगा. आप की देखभाल के लिए पूरी व्यवस्था कर दूंगा, लेकिन अब आप हमारी दुनिया का हिस्सा नहीं बन सकते. आप हमारे साथ नहीं रह सकते,” कहते हुए सृजन ने फोन धरा को थमा दिया.

धरा के फोन पर आते ही अंबर बोला, “धरा, अब भी हम पतिपत्नी हैं. हमारे बीच तलाक नहीं हुआ है.”

अंबर के ऐसा कहने पर धरा लंबी सांस लेती हुई बोली, “कानूनी तौर पर भले ही हमारा रिश्ता टूटा नहीं है. हम अब भी पतिपत्नी हैं, किंतु मानसिक रूप से तो यह रिश्ता कब का टूट चुका है. मैं तो काफी पहले ही इस रिश्ते को तिलांजलि और तुम्हारा परित्याग कर चुकी हूं. अब इसे जोड़ पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं.”

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Hindi Fictional Story: लौटते कदम

Hindi Fictional Story: जीवन में सुनहरे पल कब बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता है. वक्त तो वही याद रहता है जो बोझिल हो जाता है. वही काटे नहीं कटता, उस के पंख जो नहीं होते हैं. दर्द पंखों को काट देता है.

शादी के बाद पति का प्यार, बेटे की पढ़ाई, घर की जिम्मेदारियों के बीच कब वैवाहिक जीवन के 35 साल गुजर गए, पता ही नहीं चला.

आंख तो तब खुली जब अचानक पति की मृत्यु हो गई. मेरा जीवन, जो उन के आसपास घूमता था, अब अपनी ही छाया से बात करता है.

पति कहते थे, ‘सविता, तुम ने अपना पूरा वक्त घर को दे दिया, तुम्हारा अपना कुछ भी नहीं है. कल यदि अकेली हो गई तो क्या करोगी? कैसे काटोगी वो खाली वक्त?’

मैं ने हंसते हुए कहा था, ‘मैं तो सुहागिन ही मरूंगी. आप को रहना होगा मेरे बगैर. आप सोच लीजिए कि कैसे रहेंगे अकेले?’ किसे पता था कि उन की बात सच हो जाएगी.

बेटा सौरभ, बहू रिया और पोते अवि के साथ जी ही लूंगी, यही सोचती थी. जिंदगी ऐसे रंग बदलेगी, इस का अंदाजा नहीं था.

बहू के साथ घर का काम करती तो वह या तो अंगरेजी गाने सुनती या कान में लीड लगा कर बातें करती रहती. मेरे साथ, मुझ से बात करने का तो जैसे समय ही खत्म हो गया था.

कभी मैं ही कहती, ‘रिया, चल आज थोड़ा घूम आएं. कुछ बाजार से सामान भी लेना है और छुट्टी का दिन भी है.’

उस ने मेरे साथ बाहर न जाने की जैसे ठान ली थी. वह कहती, ‘मां, एक ही दिन तो मिलता है, बहुत सारे काम हैं, फिर शाम को बौस के घर या कहीं और जाना है.’

बेटे के पास बैठती तो ऐसा लगता जैसे बात करने को कुछ बचा ही नहीं है. एक बार उस से कहा भी था, ‘सौरभ, बहुत खालीपन लगता है. बेटा, मेरा मन नहीं लगता है,’ कहतेकहते आंखों में आंसू भी आ गए पर उन सब से अनजान वह बोला, ‘‘अभी पापा को गए 6 महीने ही तो हुए हैं न मां, धीरेधीरे आदत पड़ जाएगी. तुम घर के आसपास के पार्क क्यों नहीं जातीं. थोड़ा बाहर जाओगी, तो नए दोस्त बनेंगे, तुम को अच्छा भी लगेगा.’’

सौरभ का कहना मान कर घर से बाहर निकलने लगी. पर घर आ कर वही खालीपन. सब अपनेअपने कमरे में. किसी के पास मेरे लिए वक्त नहीं.

जहां प्यार होता है वहां खुद को सुधारने की या बदलने की बात भी खयाल में नहीं आती. पर जब किसी का प्यार या साथ पाना हो तो खुद को बेहतर बनाने की सोच साथ चलती है. आज पास्ता बनाया सब के लिए. सोचा, सब खुश हो जाएंगे. पर हुआ उलटा ही. बहू बोली, ‘‘मां, यह तो नहीं खाया जाएगा.’’

यह वही बहू है, जिसे खाना बनाना तो दूर, बेलन पकड़ना भी मैं ने सिखाया. इस के हाथ की सब्जी सौरभ और उस के पिता तो खा भी नहीं पाते थे.

सौरभ कहता, ‘‘मां, यह सब्जी नहीं खाई जाती है. खाना तुम ही बनाया करो. रिया के हाथ का यह खाना है या सजा?’’

जब रिया के पिता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी तब उसे दर्द से संभलने में मैं ने उस का कितना साथ दिया था. तब मैं अपने पति से कहती, ‘रिया का ध्यान रखा करो. पिता को यों अचानक खो देना उस के लिए बहुत दर्दनाक है. अब आप ही उस के पिता हैं.’

मेरे पति भी रिया का ध्यान रखते. वे बारबार अपनी मां से मिलने जाती, तो पोते को मैं संभाल लेती. उस की पढ़ाई का भी तो ध्यान रखना था न.

इतना कदम से कदम मिला कर चलने के बाद भी आज यह सूनापन…

एक दिन बहू से कहा, ‘‘रिया, कालोनी की औरतें एकदूसरे के घर इकट्ठी होती हैं. चायनाश्ता भी हो जाता है. पिछले महीने मिसेज श्वेता की बहू ने अच्छा इंतजाम किया था. इस बार हम अपने घर सब को बुला लें क्या?’’

सुनते ही रिया बोली, ‘‘मां, अब यह झमेला कौन करेगा? रहने दो न, ये सब. मैं औफिस के बाद बहुत थक जाती हूं.’’

मैं ने कहा, ‘‘आजकल तो सब की बहुएं बाहर काम पर जाती हैं, पर उन्होंने भी तो किया था न. चलो, हम नहीं बुलाते किसी को, मैं मना कर देती हूं.’’

उस दिन से मैं ने उन लोगों के बीच जाना छोड़ दिया. कल मिसेज श्वेता मिल गईं तो मैं ने उन से कहा, ‘‘मुझे वृद्धाश्रम जाना है, अब इस घर में नहीं रहा जाता है. अभी पोते के इम्तिहान चल रहे हैं, इस महीने के आखिर तक मैं चली जाऊंगी.’’

यह सुन कर मिसेज श्वेता कुछ भी नहीं कह पाई थीं. बस, मेरे हाथ को अपने हाथ में ले लिया था. कहतीं भी क्या?

सबकुछ तय कर लिया था. फिर भी जाते समय हमारे बच्चे को हम से कोई तकलीफ न हो, हम यही सोचते रहे. वक्त भी बड़े खेल खेलता है. वृद्धाश्रम का फौर्म ला कर रख दिया था. सोचा, जाने से पहले बता दूंगी.

आज दोपहर को दरवाजे की घंटी बजी. ‘इस समय कौन होगा?’ सोचते हुए मैं ने दरवाजा खोला तो सामने बहू खड़ी थी. मुझे देखते ही बोली, ‘‘मां, मेरी मां को दिल का दौरा पड़ा है. वे अस्पताल में हैं. मुझे उन के पास जाना है. सौरभ पुणे में है, अवि की परीक्षा है, मां, क्या करूं?’’ कहतेकहते रिया रो पड़ी.

‘‘तू चिंता मत कर. अवि को मैं पढ़ा दूंगी. छोटी कक्षा ही तो है. सौरभ से बात कर ले वह भी वहीं आ जाएगा.’’

4 दिनों बाद जब रिया घर आई तो आते ही उस ने मुझे बांहों में भर लिया. ‘‘क्या हो गया रिया, तुम्हारी मां अब कैसी है?’’ उस के इस व्यवहार के लिए मैं कतई तैयार नहीं थी.

‘‘मां अब ठीक हैं. बस, आराम की जरूरत है. अब मां ने आप को अपने पास बुलाया है. भाभी ने कहा है, ‘‘आप दोनों साथ रहेंगी तो मां को भी अच्छा लगेगा. वे आप को बहुत याद कर रही थीं.’’

रिया ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘मां, इस घर को आप ने ही संभाला है. आप के बिना ये सब असंभव था. यदि आप सबकुछ नहीं संभालतीं तो अवि के एक साल का नुकसान होता या मैं अपनी मां के पास नहीं जा पाती.’’

‘‘अपने बच्चों का साथ नहीं दिया तो यह जीवन किस काम का. चल, अब थोड़ा आराम कर, फिर बातें करेंगे.’’

अगले दिन सुबह जब रिया मेरे साथ रसोई में काम कर रही थी, तो हम दोनों बातें कर रहे थे. दोपहर में तो घर सूना होता है पर आज हर तरफ रौनक लग रही थी. सोचा, चलो, मिसेज श्वेता से मिल कर आती हूं.

उन के घर गई तो उन्होंने बड़े प्यार से पास बिठाया और बोलीं, ‘‘कल रात को रिया हमारे घर आई थी. मुझ से और मेरी बहू से पूछ रही थी कि हम ने अपने घर कितने लोगों को बुलाया और पार्टी का कैसा इंतजाम किया. इस बार तुम्हारे घर सब का मिलना तय कर के गई है. तुम्हें सरप्राइज देगी. तुम्हारे दिल का हाल जानती हूं, इसलिए तुम्हें बता दिया. बच्चे अपनी गलती समझ लें, यही काफी है. हम इन के बगैर नहीं

जी पाएंगे.’’

‘‘यह तो सच है, हम सब को एकदूसरे की जरूरत है. सब अपनाअपना काम करें, थोड़ा वक्त प्रेम को दे दें, तो जीवन आसान लगने लगता है.’’

मिसेज श्वेता के घर से वापस आते समय मुझे धूप बहुत सुनहरी लग रही थी. लगा कि आज फिर वक्त के पंख लग गए हैं.

Hindi Fictional Story

Family Story: सबकुछ है पर कुछ नहीं- राधिका को किस चीज की कमी थी

Family Story: ‘‘दीदी,जीजाजी कहा हैं? फोन भी औफ कर रखा है.’’

‘‘बिजी होंगे किसी मीटिंग में, तुम बैठो तो सही, क्या लोगे?’’

‘‘जीजाजी के साथ ही बैठूंगा अब दीदी. मां ने जीजाजी के लिए ये कुछ चीजें भेजी हैं. अच्छा मैं आता हूं अभी,’’ कह कर दिनेश अपनी बड़ी बहन राधिका, जो एक बड़े मंत्री की पत्नी थी, को बैग पकड़ा कर विशालकाय कोठी से बाहर निकल गया.

राधिका ने उत्साह से बैग खोल कर मां की भेजी हुई चीजों पर नजर डाली. सब चीजें उस के पति अमित की पसंद की थीं, उस की खुद की पसंद की एक भी चीज नहीं थी. मां ने सबकुछ अपने मंत्री दामाद के लिए भेजा था, अपनी बेटी के लिए कुछ भी नहीं.

अजीब सा मन हुआ राधिका का. ठंडी सांस लेते हुए बैग एक किनारे रख वहीं सोफे पर बैठ कर अमित के पीए को फोन मिलाया तो उस ने अमित को बता दिया.

‘‘हां बोलो, राधिका, क्या हुआ?’’ अमित

ने पूछा.

‘‘बस, यही याद दिलाना था कि कल सुजाता के स्कूल जाना है, कोई प्रोग्राम मत रखना और हां, दिनेश भी आया है.’’

‘‘हांहां, चलेंगे कल. अभी बिजी हूं बाद में बात करता हूं,’’ कह कर अमित ने फोन रख दिया.

बेटी सुजाता के स्कूल का वार्षिकोत्सव है कल. अमित को याद दिला दिया. वे चलेंगे यह बड़ी बात है नहीं तो अमित इतने व्यस्त रहते हैं कि राधिका ने उन से कोई उम्मीद रखनी छोड़ ही चुकी है… पता नहीं कल कैसे समय निकाल पाएंगे. हो सकता है सुजाता की लगातार जिद का असर हो… वैसे तो उसे आजकल यही लगता है कि कहने के लिए उस के पास सबकुछ है पर हकीकत में नहीं है.

राधिका के सारे रिश्तेदार, दोस्त, परिचित, पड़ोसी सब के लिए वह बस राज्य सरकार के एक मंत्री की पत्नी है. वह तरसती रहती है कि काश, किसी के दिल में उस के लिए, राधिका के लिए, कोई स्थान हो. वह हर तरफ  से अमित से काम निकलवाने वाले लोगों से घिरी रहती है. उस के अपने मायके वाले बस अमित की की ही जीवनशैली, पद, अधिकार में रुचि रखते हैं, उस की तथाकथित दोस्त, परिचित सिर्फ अमित की ही बात करना पसंद करते हैं.

उस के युवा बच्चे सुजाता और सुयश भी पिता के पद के अहंकार में डूबे मां की ममता को व्यर्थ की चीज समझते हैं. वह जब भी अपने बच्चों से उन के स्कूल, दोस्तों की बातें करना चाहती है तो बच्चों के अहं और दर्दभरे स्वर से उसे लगता ही नहीं कि वह अपने बच्चों से बात कर रही है. लगता है किसी मंत्री के घमंडी बच्चों से बात कर रही है. आजकल वह ज्यादातर चुप ही रहती है. किस से बात करें और क्या बात करे. सब की तो उस के मंत्री पति में ही रुचि है, उस का अपना तो कहीं कोई है ही नहीं… वह अपने विचारों में गुम थी. अमित और दिनेश अंदर आते दिखे. दिनेश ने आते हुए कहा, ‘‘देखो दीदी, जीजाजी को जबरदस्ती पकड़ कर ले आया हूं, अब साथ में लंच करेंगे,’’

आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी अमित मुसकराते हुए बोले, ‘‘देख लो राधिका, तुम्हारा भाई मुझे औफिस से जबरदस्ती उठा लाया है. बोला आप से मिलने ही तो आया हूं.’’

‘‘हां जीजाजी, मैं आप से ही मिलने आया था. दीदी का क्या है, उन से तो कभी भी मिल सकते हैं. दीदी, अब लंच लगवा दो.’’

अमित जब तक  फ्रैश हो कर आए खाना लग चुका था. तीनों खाने बैठे तो दिनेश ने कहा, ‘‘जीजाजी, मैं आज ही वापस चला जाऊंगा. बस आप याद रखना आप को मेरे दोस्त का काम करवाना ही पड़ेगा.’’

राधिका ने पूछा, ‘‘कौन सा काम दिनेश?’’

‘‘आप रहने दो दीदी, यह जीजाजी के बस का ही है, मैं ने उन्हें रास्ते में समझा दिया है सब.’’

अमित मुसकराते हुए खाना खाते रहे. थोड़ी देर में बच्चे भी आ गए, वे भी खाना खा कर सब के साथ बैठ गए.

सुजाता अगले दिन होने वाले स्कूल के प्रोग्राम के बारे में उत्साह से बताने लगी, ‘‘कल मेरे दोस्त भी तो देखें मेरे डैड क्या चीज हैं. एक मंत्री के जलवे मेरी टीचर्स भी तो देखें.’’

सुजाता खिलखिला रही थी, सुयश भी दिनेश से बातों में व्यस्त था. राधिका चुपचाप सब की बातें सुन रही थी.

दिनेश ने कहा, ‘‘जीजाजी, आप के लिए मां ने कुछ चीजें भेजी हैं, जरूर खाना.’’

अभी कुछ दिन पहले तक ऊंची जातियों के जो साथी बच्चों से कन्नी सी काटते थे, अमित के मंत्री बनते ही उन से दोस्ती बढ़ाने लगे थे.

‘‘अच्छा? उन्हें मेरा धन्यवाद कहना.’’

अमित की आकर्षक हंसी को निहारती रह गई राधिका कि अमित का संपूर्ण व्यक्तित्व कितना आकर्षक व प्रभावशाली है. हालांकि उन में थोड़ा सा गांव का टच आता है पर फिर भी कीमतों कपड़ों में वह छिप जाता है. कितनी मेहनत से पहुंचे हैं यहां तक और अब जब

जीवन में हर सुखसुविधा है तो उसे क्यों लगता

है उस के पास कुछ नहीं है. उस से अच्छी तो वह तब थी जब छोटे से घर में रहती थी और अमित उस के चारों और मंडराता थे. उस ने अपनी सोच को झटक दिया. अमित उठ खड़े हुए थे, ‘‘राधिका, आने में देर होगी, डिनर शायद घर न करूं.’’

उन के उठते ही दिनेश भी जाने के लिए खड़ा हो गया, तो राधिका बोल पड़ी, ‘‘दिनेश, तुम तो रुको… तुम तो बैठे ही नहीं मेरे पास.’’

‘‘नहीं दीदी, मैं भी निकलता हूं,’’ कह वह अमित के साथ ही निकल गया. बच्चे अपनेअपने रूम में चल गए, वह अकेली खड़ी रह गई, फिर वह भी अपने बैडरूम में चली गई.

अगले दिन सुजाता अमित और राधिका के साथ उस के स्कूल पहुंची. स्कूल के

गेट पर ही अमित का भव्य स्वागत हुआ. राधिका भी मुसकरा कर सब के अभिवादन का जवाब देती रही. ऐसे में उसे हमेशा महसूस होता था जैसे

वह कोई मशीन है या कठपुतली है अथवा

रोबोट, मन में कोई उमंग नहीं. बस, सब अमित को घेरने की कोशिश करते रहते थे और वह सजीधजी अपनी नकली मुसकराहट बिखरेती,

उन के साथ खड़े रहने की कोशिश करती रह जाती थी.

स्कूल में पता नहीं कितने बच्चों ने, कितनी टीचर्स ने अमित के साथ फोटो खिंचवाए. वहां सब उन के आसपास पहुंचने की कोशिश करते रहे. अमित का सुरक्षा घेरा आज अमित के कहने पर कुछ दूरी पर ही रहा. समारोह में आने के लिए उन्हें विशेष रूप से धन्यवाद कहा गया.

प्रोग्राम खत्म होने पर राधिका रोबोट की तरह उन के साथ चलती घर आ गई. घर आ कर देखा अमित की 2 चचेरी बहनें आई हुई थीं. राधिका उन की आवभगत में व्यस्त हो गई.

बड़े मंत्री की पत्नी बनना भी कांटों का ताज पहनना है यह वह भलीभांति समझ गई थी पर कुशल पत्नी की भांति वह बिना मीनमेख निकाले जानबूझ कर भी मक्खी निगल लेती थी. दिनरात के मेहमानों ने उस की नाक में दम कर रखा था. पहले भी लोग आते थे पर कम और उन के अपने स्तर के. अब तरहतरह के लोग आतेजाते थे.

कभी कोई आत्मीय इंटरव्यू के लिए चला आ रहा है तो कभी कोई अपना

ट्रांसफर रुकवाने. कभीकभी उस के जी में आता सब को निकाल बाहर करे पर भारतीय नारी और वह भी जिस के पुरखों ने कभी ऐश नहीं देखी हो, कभी ऐसा दुस्साहस कर सकती है खूब हंसहंस कर वह मेहमानों की आवभगत करती रहती है.

दोनों बहनें रेखा और मंजू अपनी सुसराल के किसी रिश्तेदार की फैक्टरी लगाने में आई अड़चनें दूर करवाने की बात कर रही थीं. अमित ने उन की बात सुन कर मदद करने का आश्वासन दिया.

रेखा और मंजू बहुत दिनों बाद आईर् थीं. राधिका ने सोचा आज कुछ देर बैठ कर उन से बातें करेगी पर अमित के उठते ही वे दोनों भी जल्दीजल्दी चाय समाप्त कर अमित के साथ ही निकलने के लिए उठ खड़ी हुईं. उन्हें भी सिर्फ अमित से ही मतलब था. राधिका का दिल फिर डूब गया. उसे लगने लगा उस के पास कोई बात करने वाला नहीं है जो कुछ उस की सुने, कुछ अपनी कहे. किसी आम औरत की तरह वह पासपड़ोस में बैठ कर गप्पें नहीं मार सकती थी.

एक बार किट्टी पार्टी जौइन की तो वहां भी हर सदस्य किसी न किसी काम की सिफारिश करता रहा तो राधिका ने वहां जाना भी बंद कर दिया. किसी समाजसेवा संस्था से जुड़ना चाहा तो वहां भी अमित की पुकार होती रहती. अब राधिका ने धीरेधीरे सब जगह जाना छोड़ दिया था.

मंत्री की पत्नी होने के सुखदुख पर वह मन ही मन गौर करती और किसी से शेयर न कर पाने की स्थिति में मन ही  मन अकेलेपन से घिरी रहती. कभी दिनबदिन व्यस्त होते अमित से मिले कभीकभार कुछ अंतगरंग पल उस की झोली में आ गिरते तो वह कई दिनों तक उन्हें सहेजे रहती.

एक दिन जब उस के बचपन की प्रिय सखी का फोन आया कि  वह किसी काम से लखनऊ आ रही है तो राधिका खिल उठी.

कामिनी ने छेड़ा, ‘‘मंत्री की पत्नी बन कर मिलेगी या सहेली बन कर?’’

हंस पड़ी राधिका, ‘‘तू आ कर खुद ही

देख लेना.’’

कामिनी आई तो राधिका के ठाटबाट देख कर हैरान रह गई. राधिका के गले लगते हुए बोली, ‘‘वाह, कभी सोचा था ऐसा वैभव देखेगी? चल, पूरा घर दिखा पहले.’’

घर था तो सरकारी बंगला. अमित के

कहने पर कई ठेकेदारों ने मुफ्त में उस का काया पलट कर दिया था. वह देखती रह गई कि कैसे

2 महीनों में रातदिन लगा कर खंडहर को महल बना दिया गया. बाहर काले ग्रेमइट पर खुदा था

-अमित कुमार मंत्री, राज्य सरकार.

राधिका ने उसे पूरा घर दिखाया. कामिनी ने खुले दिल से कोठी की भव्यता की प्रशंसा की. कामिनी किसी विवाह में शामिल होने आई थी और सीधी राधिका के पास ही आ गई थी. कामिनी और राधिका का बचपन रुड़की में एक ही गली में आमनेसामने के घरों में बीता था. दोनों के पिताओं के पास पैसा न था. छोटीछोटी नौकरियां ही तो करते थे. कामिनी फ्रैश होने चली गई तो राधिका को बीते समय की बहुत सी बातें याद आने लगी.

राधिका और कामिनी की कालेज की पढ़ाई भी साथ हुई थी, उसी कालेज में अमित उसे पसंद आ गया था. उस के पिता भी साधारण थे पर पिता और पुत्र दोनों राजनीति में सक्रिय थे.

राधिका और दोनों का साधारण सा विवाह हो गया था. स्टूडैंट राजनीति से शुरू कर मेन राजनीति में अपनी पकड़ बनाते चले गए थे अमित. पिछड़े वर्ग का होने के कारण हर पार्टीको उनकी जरूरत थी. वे मेधावी भी थे. एक मंत्री की पत्नी बन कर वह कभी गर्व से इतराती तो कभी अकेलेपन में अकुलाती, पति की व्यस्त दिनचर्या, नपीतुली बातचीत और संतुलित व्यवहार के साथ खुद को परिवेश में डालने की कोशिश में जीवन बीतता चला गया था.

कामिनी राधिका के ऐशोआराम पर मुग्ध थी. कामिनी का पति एक ऊंची

जाति का था. एमबीए में कामिनी से मिला था. राधिका जो बहुत कुछ बांटना चाहती थी अपनी बालसखी से, कुछ भी नहीं कह पाई. कामिनी खूब उत्साह से उस की घरगृहस्थी की तारीफ करने में ही व्यस्त रही.

खाने की टेबल पर शानदार लंच देख कर, नौकरों को इधर से उधर काम करते देख कामिनी ने चहकते हुए खाना शुरू किया, बोली, ‘‘राधिका, इतना वैभव, ऐशोआराम का हर साधन, योग्य पति, बच्चे, वाह, सबकुछ है न आज तेरे पास?’’ राधिका ने फीकी सी हंसी हंसते हुए मन ही मन कहा कि हां, सबकुछ है पर कुछ नहीं.’’

कामिनी ने उस के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘राधिका मैं समझ सकती हूं कि तुम पर क्या बीत रही होगी. साधारण घरों में बड़े हुए हम लोगों को प्यार चाहिए. यह वैभव, पैसा कचोटता है. मयंक के पास पैसा भी है और ऊंची जाति होने का गरूर भी. मैं भी कमाती हूं पर वह खुशी नहीं मिलती. मयंक ने कितनी बार कहा कि तुम से कह कर कोई काम करा दूं पैसा भी मिल जाएगा. पर मैं जानती हूं कि तुझे प्यारी सहेली चाहिए, पैसा नहीं. इतने साल में इसीलिए आने से कतराती रही कि न जाने तू कहीं बदल नहीं गई हो पर उस दिन स्कूल में हुए कार्यक्रम की रिपोर्ट टीवी में देखी तो तेरे चेहरे की बनावटी मुसकान के पीछे का दर्द में देख सकती थी. अब तो तू भंवरजाल में फस चुकी है… खुश रह.’’

राधिका ने कहा, ‘‘तू सही कहती है, कामिनी. इसी कुछ नहीं के साथ जीना पडे़गा वरना न वे बच्चे साथ रहेंगे, न भाई, न मांबाप.’’

Family Story

Hindi Short Story: दुश्चक्र- क्यों वंदना को बोझ लगने लगा श्याम

Hindi Short Story: स्कूल छूटने के बाद मैं साथी शिक्षिकाओं के साथ घर लौट रही थी, तभी घर के पास वाले चौराहे पर एक आवाज सुनाई दी, ‘बहनजी, जरा सुनिए तो.’

पहले तो मैं ने आवाज को अनसुना कर दिया यह सोच कर कि शायद किसी और के लिए आवाज हो लेकिन वही आवाज जब मुझे दोबारा सुनाई दी, ‘बहनजी, मैं आप से ही कह रहा हूं, जरा इधर तो आइए,’ तो इस बार मजबूरन मुझे उस दिशा में देखना ही पड़ा.

मैं ने देखा, चौराहे पर स्थित एकमात्र पान की दुकान वाला मुझे ही बुला रहा था. मुझे भी आश्चर्य हुआ कि पान की दुकान पर भला मेरा क्या काम? साथ की शिक्षिकाएं भी मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगीं, लेकिन जब मुझे स्वयं ही कुछ पता नहीं था तो मैं भला उन से क्या कहती? अत: उन सब को वहीं छोड़ कर मैं पान की दुकान पर पहुंच गई और दुकानदार से कुछ पूछती उस से पहले उस ने स्वयं ही बोलना शुरू कर दिया :

‘‘बहनजी, आप इस महल्ले में अभी नईनई ही आई हैं न?’’

‘‘जी हां, अभी पिछले महीने ही मैं ने गुप्ताजी का मकान किराए पर लिया है,’’ मैं ने उसे जवाब दे दिया फिर भी दुकानदार द्वारा बुलाने का कारण मेरी समझ में नहीं आया.

‘‘अच्छा, तो मिस्टर श्याम आप के पति हैं?’’ दुकानदार ने आगे पूछा.

‘‘जी हां, लेकिन आप यह सब पूछ क्यों रहे हैं?’’ अब उस दुकानदार पर मुझे खीज होने लगी थी.

‘‘कुछ खास बात नहीं है, मुझे तो आप को सिर्फ यह बताना था कि सुबह  आप के पति दुकान पर आए थे और सिगरेट के 2 पैकेट, 4 जोड़े पान और कोल्डडिं्रक की 1 बड़ी बोतल ले गए थे. उस वक्त शायद उन की जेब में पैसे नहीं थे या फिर वे अपना पर्स घर पर ही भूल गए थे. उन्होेंने आप का परिचय दे कर आप से रुपए ले लेने के लिए कहा था,’’ दुकानदार ने मुझे बुलाने का अपना प्रयोजन स्पष्ट किया.

मैं ने पर्स खोल कर 100 रुपए का एक नोट दुकानदार की ओर बढ़ा दिया. उस ने पैसे काट कर जो पैसे वापस दिए, उन्हें बिना गिने ही मैं ने पर्स में रखा और वहां से चल दी. रास्ते में सोचने लगी कि इस आदमी ने यहां भी उधार लेना शुरू कर दिया. मेरे कानों में दुकानदार के कहे शब्द अब भी गूंज रहे थे :

‘कुछ भी हो आदमी वे बड़े दिलचस्प हैं. बातों का तो जैसे उन के पास खजाना है. बड़े काम की बातें करते हैं. दिमाग भी उन्होंने गजब का पाया है. मेरी दुकान की तो बहुत तारीफ कर रहे थे. साथ ही कुछ सुझाव भी दे गए.’

‘दिमाग की ही तो खा रहा है,’ मन ही मन सोचा और शिक्षिकाओं के समूह से आ मिली.

‘‘क्यों? क्या बात हो गई? क्यों बुलाया था दुकानदार ने?’’ रीना मैडम ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस यों ही,’’ कहते हुए मैं ने बात को टाल दिया.

वे भी शायद घर पहुंचने की जल्दी में थीं, इसलिए किसी ने भी बात को आगे नहीं बढ़ाया. सब चुपचाप जल्दीजल्दी अपनेअपने घरों की ओर बढ़ने लगीं.

घर पहुंची तो देखा महाशय ड्राइंगरूम में सोफे पर लेट कर सिगरेट फूंक रहे थे. टेलीविजन चल रहा था और एक फैशन चैनल पर आधुनिक फैशन का ज्ञान लिया जा रहा था.

मुझे देखते ही श्याम बोले, ‘‘अच्छा हुआ यार, तुम आ गईं. मैं भी घर पर बैठेबैठे बोर हो रहा था. टेलीविजन भी कोई कहां तक देखे? फिर इस पर भी तो वही सब घिसेपिटे कार्यक्रम ही आते हैं.’’

जवाब में मैं ने कुछ भी नहीं कहा.

मेरी चुप्पी की ओर बिना कोई ध्यान दिए श्याम बोले, ‘‘सुनो, बहुत जोर की भूख लगी है. मैं सोच ही रहा था कि तुम आ जाओ तो साथ में भोजन करते हैं. अब तुम आ गई हो तो चलो फटाफट भोजन लगाओ, तब तक मैं हाथ धो कर आता हूं.’’

मेरा मन तो हुआ कि पूछ लूं, ‘क्या थाली ले कर खा भी नहीं सकते हो. सुबह स्कूल जाने से पहले ही मैं पूरा भोजन बना कर जाती हूं, क्या भोजन परोस कर खाना भी नहीं होता?’ लेकिन फालतू का विवाद हो जाएगा, यह सोच कर चुप रही.

‘‘क्या सोच रही हो?’’ मुझे चुप देख कर श्याम ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं,’’ मैं ने संक्षिप्त सा जवाब दिया.

अभी मैं आगे कुछ कहती, इस से पहले ही जैसे श्याम को कुछ याद आ गया, वह बोले, ‘‘अरे, हां यार, घर में कुछ पैसे तो रख कर जाया करो. आज तुम्हारे जाने के बाद मुझे सिगरेट के लिए पैसों की जरूरत थी. पूरा घर छान मारा पर कहीं भी एक पैसा नहीं मिला. मजबूरन नुक्कड़ वाली पान की दुकान से मुझे सिगरेट उधार लेनी पड़ी. अभी कुछ रुपए दे देना तो शाम को मैं उस के रुपए चुका आऊंगा.’’

‘‘आप का उधार मैं ने चुका दिया है,’’ मैं ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और भोजन गरम करने में लग गई.

भोजन करते समय श्याम एक बार फिर शुरू हो गए, ‘‘यार, वंदना, यह तो बहुत ही गलत बात है कि सारे पैसे पर्स में रख कर तुम स्कूल चली जाती हो. ए.टी.एम. कार्ड भी तुम्हारे ही पास रहता है. ऐसे में अचानक यदि मुझे रुपयों की जरूरत पड़ जाए तो मैं क्या करूं, किस से मांगूं? जरा मेरी हालत के बारे में भी तो सोचो. मैं यहां पर घर की रखवाली करूं, सारी व्यवस्थाएं करूं, तुम्हारी देखभाल करूं, तुम्हारी सुरक्षा की चिंता करूं. ऐसे में यदि मेरी ही जेब खाली हो तो मैं कैसे ये सबकुछ कर पाऊंगा. पैसों की आवश्यकता तो पगपग पर होती है. अरे, तुम्हारे लिए ही तो मैं यहां पड़ा हूं.’’

‘‘आप को कुछ भी करने की जरूरत नहीं है. क्या करना है, कैसे करना है, मुझे सब पता है. और हां, रुपयों की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. कोई रुपए मांगते हुए यहां घर तक नहीं आएगा. मुझे सब का हिसाब करना आता है,’’ मैं ने तिक्त स्वर में कहा.

पिछला अनुभव मुझे अच्छी तरह याद है कि उधार तो चुकेगा नहीं, उलटे दोबारा भुगतान अलग से करना पड़ जाएगा. रायपुर का एक किस्सा मुझे अच्छी तरह याद है कि किस तरह मुझे दुकानदारों के सामने शर्मिंदा होना पड़ता था. किस तरह एक ही बिल का मुझे 2 बार भुगतान करना पड़ता था. एक बार तो एक दुकानदार ने पूछ भी लिया था, ‘मैडमजी, यदि बुरा न मानें तो एक बात पूछ सकता हूं?’

‘पूछिए, गुप्ताजी क्या पूछना चाहते हैं आप?’ मुझे कहना पड़ा था क्योंकि गुप्ता किराना वाले के मुझ पर बहुत से एहसान थे.

‘मैडम, श्याम भाई कुछ करते क्यों नहीं? आप कहें तो मैं उन के लिए कहीं नौकरी की बात करूं?’ गुप्ताजी ने कुछ संकोच से पूछा था.

‘गुप्ताजी, बेहतर होगा ये सब बातें आप उन्हीं से कीजिए. उन के बारे में भला मैं क्या कह सकती हूं? अपने बारे में वे स्वयं ज्यादा अच्छी तरह से बता पाएंगे,’ कहते हुए मैं ने घर की तरफ कदम बढ़ा दिए थे.

‘‘कुछ ले नहीं रही हो, तबीयत खराब है क्या?’’ रुके हुए हाथ को देख कर श्याम ने पूछा.

‘‘कुछ विशेष नहीं, बस थोड़ा सिरदर्द है,’’ कह कर मैं किसी तरह थाली में लिया भोजन समाप्त कर के बिस्तर पर आ कर लेट गई. अतीत किसी चलचित्र की तरह मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था.

मातापिता और भाइयों के मना करने और सब के द्वारा श्याम के सभी दुर्गुणों को बताने के बावजूद मैं ने श्याम से प्रेम विवाह किया था. श्याम ने मुझे भरोसा दिलाया था कि शादी के बाद वह स्वयं को पूरी तरह से बदल लेगा और अपनी सारी बुराइयों को छोड़ देगा.

शादी के बाद जब श्याम ने मुझे नौकरी के लिए प्रोत्साहित किया तो श्याम की सोच पर मुझे गर्व हुआ था. श्याम का कहना था कि यदि हम दोनों नौकरी करेंगे तो हमारी गृहस्थी की गाड़ी और ज्यादा अच्छी तरह से चल निकलेगी. उस समय मुझे श्याम की चालाकी का जरा भी अनुभव नहीं हुआ था…लगा कि श्याम सच ही कह रहा है. यदि मैं पढ़ीलिखी हूं, प्रशिक्षित हूं तो मुझे अपने ज्ञान का सदुपयोग करना चाहिए. उसे यों ही व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए.

संयोग से हमारी शादी के कुछ दिनों बाद ही केंद्रीय विद्यालय समूह में नौकरी (शिक्षकों) की रिक्तियां निकलीं. श्याम के सुझाव पर मैं ने भी आवेदनपत्र जमा कर दिया. जिस दिन मुझे शिक्षिका की नौकरी मिली उस दिन मुझ से ज्यादा खुश श्याम था.

श्याम की आंखों की चमक ने मेरी खुशियों को दोगुना कर दिया था. मुझे तब ऐसा लगा था जैसे श्याम को पा कर मैं ने जिंदगी में सबकुछ पा लिया. मेरी जिंदगी धन्य हो गई. हां, एक बात मुझे जरूर खटकती थी कि मुझ से वादा करने के बाद भी श्याम ने अपनी सिगरेट और शराब की आदतें छोड़ी नहीं थीं. कई बार तो मुझे ऐसा लगता जैसे वह पहले से कहीं अधिक शराब पीने लगा है.

श्याम की नौकरी लगे मुश्किल से 8 महीने भी नहीं हुए थे कि अचानक एक दिन श्याम के आफिस से उस के निलंबन का पत्र आ गया. कारण था, शराब पी कर दफ्तर आना और अपने सहकर्मियों के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार करना. दफ्तर का काम न करना, लेकिन श्याम पर जैसे इस निलंबन का कोई असर ही नहीं पड़ा. उलटे उस पत्र के आने के बाद वह और अधिक शराब पीने लगा.

कभीकभी वह शराब के नशे में बड़बड़ाता, ‘करो, जो करना है करो. निलंबित करो चाहे नौकरी से निकालो या और भी कुछ बुरा कर सकते हो तो करो. यहां नौकरी की चिंता किसे है? अरे, चिंता करनी ही होती तो पत्नी को नौकरी पर क्यों लगवाता. चिंता तो वे करें जिन के घर में अकेला पति कमाने वाला हो. यहां तो मेरी पत्नी भी एक केंद्रीय कर्मचारी है. यदि मेरी नौकरी छूट भी गई तो एकदम सड़क पर नहीं आ जाऊंगा. मेरा घर तो चलता रहेगा. मैं नहीं तो पत्नी कमाएगी.’

वह दिन है और आज का दिन है. अकेली मैं कमा रही हूं. मुझे स्वयं ही नहीं मालूम कि कब तक अपने कंधों पर न केवल खुद का बल्कि अपने पति का भार भी ढोना पड़ेगा. अचानक मुझे अपने कंधों में दर्द का अनुभव होने लगा. दर्द के मारे मेरे कंधे झुकते चले गए.

Hindi Short Story

Festival Celebration: यूथ फैस्टिव सैलिब्रेशन

Festival Celebration: 24 वर्षीय नेहा आस्ट्रेलिया में नौकरी करती है, लेकिन हर दीवाली घर आती है ताकि सब के साथ मिल कर त्योहार मना सके. इस बार भी उस ने टिकट पहले से कर लिया है और आने वाली है क्योंकि इस दीवाली पर उस की बड़ी बहन भी अपने परिवार के साथ मुंबई आ रही है. इस में सब के साथ मिलना संभव हो सकेगा.

नेहा का हर साल त्योहार में मुंबई आने के पीछे का मकसद सब से मिलना होता है. इस से उस की पूरे परिवार और रिश्तेदारों के साथ अच्छी बौडिंग हो जाती है. घर आने के लिए उस की तैयारी भी उसे 2-3 महीने पहले से ही कर लेनी पड़ती है.

केवल नेहा ही नहीं बैंगलुरु में रहने वाला 25 वर्षीय संदीप भी हर साल दीवाली पर अपने पेरैंट्स और रिश्तेदारों से मिलने दिल्ली आता है, जिस की तैयारी वह काफी पहले से कर लेता है ताकि उसे वहां आने पर सैलिब्रेशन में किसी प्रकार की बाधा न हो, हर बार उसे घर जा कर बहुत अच्छा लगता है और खुद को रिजूविनेट कर वापस काम पर लौटता है. वह पिछले 10 सालों से घर से बाहर है क्योंकि उस ने पढ़ाई भी बैंगलुरु में ही की है और अब जौब भी वहीं करने लगा है.

परिवार के साथ होता था लगाव

असल में पहले लोगों में भाईचारे की भावना अधिक होती थी क्योंकि लोग साथ रहते थे और वहीं रोजीरोटी कमाते थे. घर से अधिक दूर जा कर काम करना किसी के वश में नहीं था, इसलिए परिवार के साथ लगाव ज्यादा होता था. सभी त्योहारों को वे परिवार के साथ मना सकते थे. सुविधाएं कम होती थीं लेकिन तब लोगों में आपसी मेल अधिक रहता था.

आधुनिकता ने की परिवार में दूरी

आधुनिकता के दौर में सुविधाएं बढ़ी हैं. लोग घरों से दूर जा कर अच्छे लाइफस्टाइल के लिए शिक्षा या जौब करने लगे हैं, इस से लोग आर्थिक रूप से मजबूत तो हुए लेकिन उन लोगों के पास समय की कमी होने लगी, जिस वजह से परिवार से दूरी बढ़ गई.

लोग काम के कारण परिवार से दूर रहने लगे हैं. यहां तक कि त्योहार भी परिवार के साथ मनाना मुश्किल होने लगा है. काम करने के लिए दूसरे शहर या देश में जाना पसंद कर रहे हैं. ऐसे में त्योहार पर भी परिवार के साथ समय नहीं बिता पाते. इसलिए त्योहारों की रौनक पिछले कुछ दशकों से कम होने लगी थी.

व्यवस्थित जीवन, समय की कमी लोगों को परिवार से दूर करती जा रही थी, जिस से हमारे त्योहार भी प्रभावित हुए हैं. लोग त्योहार भी परिवार के सदस्यों के साथ मिल कर नहीं बल्कि वीडियो काल के माध्यम से मनाने लगे थे, लेकिन इस सब में अच्छी बात यह हुई है कि पिछले कुछ सालों से हमारी नई पीढ़ी आर्थिक रूप से मजबूत हो चुकी है और कहीं से भी त्योहारों पर घर आना उस के लिए बो झ नही बनता.

बदली है युवाओं की सोच

आज के माहौल में युवाओं की सोच में काफी परिवर्तन दिख रहा है, आज के युवा त्योहारों को परिवार के साथ मनाना ही पसंद कर रहे हैं, इस की वजह उन का काफी समय तक अपने पेरैंट्स और रिश्तेदारों से अलग रहना और खुद को संभालना है. आज वे परिवार के महत्त्व को भी सम झने लगे हैं. यही वजह है कि त्योहारों में परिवार के सदस्यों का एकसाथ आना एक स्वाभाविक और बढ़ता हुआ ट्रेंड हो रहा है, जिसे यूथ आकर्षक मान रहे हैं जो लोगों को दैनिक जीवन की भागदौड़ से दूर ले जा कर भावनात्मक जुड़ाव और रिश्तों को मजबूत करने का अवसर देता है.

इस के अलावा यह आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी परिवार और प्रियजनों के साथ रहने की भारतीय संस्कृति को दर्शाता है और परिवार में एकता, प्रेम और मानसिक सुकून लाता है. त्योहार परिवार को साथ रखने और आपसी सा झेदारी बढ़ाने का एक संस्कार है यानी यह मधुर संबंधों की एक सौगात है.

त्योहार साथ मनाने के फायदे

तनाव से मुक्ति और मानसिक सुकून: रोजमर्रा की जिंदगी के तनाव और थकान से दूर रहने और परिवार के साथ समय बिताने का एक अच्छा मौका त्योहार देता है, जिस से तनाव कम होता है और मानसिक सुकून मिलता है. ऐसे समय में लोग शौपिंग कर के न सिर्फ अपनेआप को फ्रैश करते हैं बल्कि मानसिक रूप से भी तनावमुक्त होते हैं.

सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्त्व: हर त्योहार संस्कृति का एक अभिन्न अंग होता हैं जो परिवार को एकजुट करने और भाईचारे को बढ़ाने का काम करता है. लोग त्योहारों पर पुरानी यादों को ताजा करते हैं और उपहारों का आदानप्रदान करते हैं, इसीलिए सभी बेसब्री से त्योहार के मौसम का इंतजार करते हैं.

बड़ेबुजुर्गों से मिलना संभव होता है: त्योहारों पर परिवार के बुजुर्गों के साथ समय बिताना युवाओं को मानसिक सुकून देता है, जो उन्हें पारिवारिक मूल्यों और एकता का महत्त्व बताता है.

Festival Celebration

Eye Makeup: आंखें छोटी हैं, तो बड़ी कैसे दिखाएं

Eye Makeup:

मोटा आईलाइनर न लगाएं

ज्यादा मोटा लाइनर आंखों को और भी छोटा कर देता है या छोटा दिखाता है. इसलिए कोशिश करें कि आंखों में लाइनर थोड़ा पतला ही लगाएं ताकि आंखें हाइलाइट हो सकें.

विंग्ड आईलाइनर से आंखें बड़ी दिखती हैं

विंग्ड आईलाइनर से आंखें बड़ी दिखती हैं और मेकअप भी उभर कर आता है. इसे लगाने का भी एक तरीका है ताकि दोनों आंखों में एकसमान लाइनर लग सकें. लाइनर को आंख के कोने से शुरू करें और एक ही बार में बिना हाथ को हिलाए एक लाइन लाइनर से बनाएं और उसे बिना उठाए आंख के कोने तक खींचें. अब इस लाइनर को आंख के कोने से थोड़ा सा बाहर की तरफ खीचें जितना आप चाहें. अब जो लाइन खिंची है उस के अंदर लाइनर अच्छी तरह से भरें और एक अच्छी शेप आंख को दें. अब आप यह लाइनर कितना पतला और मोटा लगाना चाहती हैं यह आप पर निर्भर करता है.

अब दूसरी आंख पर भी यही प्रोसेस रिपीट करें. लेकिन नापें कि विंग को कितना बाहर निकालना है. यह दोनों आंखों में एक बराबर होना चाहिए. अगर दोनों विंग एकजैसी नहीं बनतीं तो कौटन स्वैब और मेकअप रिमूवर की मदद से उन्हें बैलेंस करें. परफैक्ट फिनिश के लिए विंग्ड लाइनर के साथ मसकारा और काजल का इस्तेमाल करें.

स्मज्ड आईलाइनर लगाएं

छोटी आंखों पर स्मज्ड लुक बहुत अच्छा लगता है. स्मज्ड आईलाइनर लगाने के लिए अपनी पलकों के पास आईलाइनर लगाएं, फिर उसे ब्रश या कौटन बड से जल्दी से स्मज कर लें. आप अपनी लोअर लैश लाइन पर भी हलका सा लाइनर लगा कर उसे स्मज कर सकती हैं. गहराई के लिए आप आईशैडो का इस्तेमाल कर सकती हैं. इसे छोटे ब्लेंडिंग ब्रश से लाइनर पर लगा कर रंग को गहरा और धुंधला कर सकती हैं. इस से आंखें बड़ी दिखेंगी.

ब्लैक नहीं व्हाइट आईलाइनर लगाएं

आंखों को बड़ा दिखाना चाहती हैं तो उस में व्हाइट लाइनर आप की काफी मदद कर सकता है. ब्लैक लाइनर से आंखें और भी छोटी लगेंगी इसलिए उस के बजाय व्हाइट, ब्राउन, ग्रीन, ब्लू लाइनर लगाएं. आप व्हाइट लाइनर को काजल की तरह लोअर लैश लाइन पर लगाएं. यह आप की आंखों को अंदर से बड़ा दिखाने में मदद करेगा. आप चाहें तो व्हाइट लाइनर को इनर साइड में अपर पार्ट पर लगा लें. यह लुक भी दिखने में अच्छा लगेगा.

ऊपर या नीचे में से एक जगह लगाएं लाइनर

अगर हम ऊपर और नीचे दोनों तरफ एकसाथ लाइनर लगाएंगे तो यह लुक हमारी आंखों को और भी ज्यादा छोटा दिखाएगा. इस के बजाय हमें ऊपर लाइनर लगाना चाहिए और नीचे हलका सा काजल लगाएं. इस से आंखें छोटी भी लगेंगी.

टाइटलाइनिंग लगाएं

टाइटलाइनिंग लगाने के लिए ऊपरी पलक को हलके से ऊपर उठाएं और अपनी पलकों की जड़ों के बीच में एक वाटरप्रूफ पेंसिल या जैल लाइनर लगाएं, नकि वाटरलाइन पर. यह पलकों की ऊपरी रेखा को मोटा और घना दिखाती है, जिस से आंखें बड़ी और अधिक खुली हुई दिखती हैं. नीचे की पालक लाइन पर वाइट या न्यूड आईलाइनर लगाएं ताकि आंखें ज्यादा ओपन दिखें.

कौर्नर में ब्राइटनिंग हाई लाइटर लगाएं

अपनी आंखों के कौर्नर को और भी ज्यादा बड़ा दिखाने और हाइलाइट करने के लिए वहां कोई भी शिमरी शेड लगाएं ताकि वह आंखों को एक अलग ही लुक दे सकें. अगर अंदर हल के कलर का शेड लगाया है तो बाहर ब्राइट कलर लगाएं.

आईब्रो का आर्क सही होना चाहिए

आंखों को बड़ा देखने में आईब्रो का भी अहम रोल है इसलिए ध्यान दें कि आईब्रो का आर्क सही होना चाहिए. दोनों एक सी ही शेप में होनी चाहिए.

आई लैश पर मसकारा लगाएं

आई लैश पर ऊपर नीचे मसकारा लगाने से पलके बड़ी लगेंगी जो आंखों को भी बड़ा करेंगी.

कंसीलर लगाएं

अगर आप की आंखों के नीचे डार्क सर्कल हैं तो आंखें सूजी हुए लगेंगी जिस से वे छोटी भी लगेंगी. इसलिए सब से पहले आंखों के नीचे के डार्क सर्कल को छिपाने के लिए वहां कंसीलर लगाएं. कंसीलर को आंखों के बाहरी हिस्से पर लगाएं. इस के बाद फाउंडेशन और कौंपैक्ट भी लगाएं. इस से भी आंखें बड़ी दिखती हैं.

आंखों की पलकों को कर्ल करें

आप बड़ी आंखें और अच्‍छा आई लुक पाने के लिए अपनी पलकों या लैशेज को कर्ल कर सकते हैं. इस से आप की आंखों के लुक में काफी बदलाव आएगा. पलकों को कर्ल करने से आप को अपनी आंखों को बङा दिखाने में भी मदद मिलेगी. आप अपनी पलकों पर मसकारा लगाएं और फिर उन्‍हें आई लैश कर्लर से पलकों को कर्ल करें. आप अपने निचले लैशेज में भी मसकारा लगाएं और इसे 3 से 4 बार कोट करें. इस के बाद आप अपनी आंखों पर ब्राउन या किसी और रंग का काजल लगा सकते हैं. इस के लिए अच्छे कर्लर का यूज करें.

Eye Makeup

Appliances For Diwali: दीवाली पर एक व्हाइट गुड्स तो बनता है

Appliances For Diwali: हर दीवाली आप एक ऐसी इलेक्ट्रौनिक चीज खरीदें जो सालोंसाल याद रहें. एक एअर फायर है, तो भी दूसरा ले लें. अब नए फीचर्स के साथ लें. एक रोज में इस्तेमाल किया और दूसरा मेहमानों के आने पर इस्तेमाल किया. इस तरह घर में कई नए अच्छी और उपयोगी चीजें इकठ्ठा हो जाएंगी, जिस से न सिर्फ लाइफ आसान हो जाएगी बल्कि हमारा अपना एक स्टैंडर्ड भी बनेगा कि हमारे घर जरूरत की हर चीज है और हम समय के साथ चलने वाले लोग हैं.

इलेक्ट्रौनिक आइटम से आप घर को मौडर्न बना सकते हैं

इलेक्ट्रौनिक उपकरण घर की सुंदरता बढ़ाते हैं और उसे एक आधुनिक रूप देते हैं. आप अपने लिविंगरूम को एक नए टीवी से सजा सकते हैं या अपनी किचन को एक नए उपकरण से अपग्रेड कर सकते हैं. आप अपनी जरूरत के हिसाब से घर में कोई भी नया इलेक्ट्रौनिक उपकरण ला कर घर को और भी आधुनिक और आरामदायक बना सकते हैं. अगर आप के घर में जरूरत की हर चीज होगी तो आप के घर आने वाला मेहमान भी आप की शानोशौकत देख कर आप का कायल हो जाएगा.

दीवाली पर डिस्काउंट और औफर काफी होते हैं

दीवाली जैसे त्योहारों के दौरान इलेक्ट्रौनिक कंपनियों द्वारा कई तरह की छूट और विशेष औफर्स दिए जाते हैं, जिस से आप अच्छी डील्स के साथ इलेक्ट्रौनिक सामान खरीद सकते हैं. यही सही समय होता है अपने घर में कुछ नए इलेक्ट्रौनिक आइटम खरीदने का. इस समय पर डिस्काउंट होता है तो आप के सीमित बजट में कुछ अच्छा आइटम भी आ सकता है. इस समय आप इन महंगी वस्तुओं को कम कीमत पर खरीद सकते हैं.

रोजमर्रा के काम को आसान बनाते हैं इलेक्ट्रौनिक आइटम्स

माइक्रोवेव ओवन खाने को जल्दी गरम करने या पकाने में मदद करता है, जिस से खाना बनाने में लगने वाला समय कम हो जाता है. वैक्यूम क्लीनर फर्श और कालीन की सफाई को बहुत आसान बनाते हैं. यह धूल और गंदगी को खींच लेता है, जिस से झाड़ू लगाने की मेहनत बचती है. डिश वौशर में मिनटों में सारे बर्तन बिना मेहनत किए साफ हो जाते हैं. इस तरह आधुनिक उपकरण समय बचाते हैं और घर के कामों को आसान बनाते हैं, जिस से आप के पास परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने का अधिक अवसर मिलता है.

दीवाली पर नए लौंच होते हैं

दीवाली से ठीक पहले कई कंपनियां अपने नए इलेक्ट्रौनिक आइटम्स लौंच करती हैं. इस से ग्राहकों को नवीनतम तकनीक और नए मौडल खरीदने का मौका मिलता है, जो अकसर विशेष दीवाली औफर के साथ आते हैं. ऐसा करने से लेटैस्ट मौडल की चीज इस समय कम कीमत में मिलने के चांस भी काफी ज्यादा होते हैं.

गिफ्ट देने के लिए भी इलेक्ट्रौनिक आइटम्स अच्छे रहते हैं

अगर आप की बेटी की नई शादीहुई है और उस की पहली दीवाली देनी है या फिर किसी की शादी है या फिर दीवाली के समय पर भी लोग एकदूसरे को तोहफे देते हैं, तो ऐसे में इलेक्ट्रौनिक गैजेट्स जैसे स्मार्टवाच, हेडफोन, और पोर्टेबल स्पीकर एक बेहतरीन और उपयोगी तोहफा होते हैं. ये आजकल की जीवनशैली के अनुरूप भी होते हैं.

दीवाली पर शौपिंग इलेक्ट्रौनिक्स की शौपिंग एक अच्छी इन्वेस्टमैंट भी है

समय के साथ खराब होने वाली चीजों को बदलने और घर के लिए एक नया और आधुनिक उपकरण खरीदने के लिए दीवाली एक अच्छा समय है. दीवाली की बिक्री के दौरान आप अपने बजट को ध्यान में रखते हुए अच्छी और उपयोगी चीजें खरीद सकते हैं. इस से आप बचत कर पाते हैं और अनावश्यक खर्च से बचते हैं.

औफिस से मिलने वाले बोनस का लाभ उठाएं

दीवाली के समय में कई औफिस में बोनस मिलता है. इस का लाभ भी आप घर के लिए नए चीज लेने में कर सकते हैं. इस से आप की पौकेट पर भी जोर नहीं पड़ेगा और हर साल इन दिनों में  नए इलेक्ट्रौनिक आइटम की भी ऐंट्री हो जाएगी.

वारंटी और सेवा

दीवाली के दौरान खरीदे गए उत्पादों पर अकसर लंबी वारंटी और बेहतर ग्राहक सेवा मिलती है, जो ग्राहकों के लिए फायदेमंद होती है.

मौडर्न इलेक्ट्रौनिक आइटम्स कौन से हैं

गेमिंग कंसोल (जैसे प्लेस्टेशन 5, ऐक्स बौक्स सीरीज X): ये हाई परफौर्मेंस वाले गेमिंग डिवाइस हैं जो बेहतरीन ग्राफिक्स और गेमप्ले का अनुभव देते हैं.

रोबोट वैक्यूम क्लीनर

यह बिना किसी की मदद के फर्श की सफाई कर सकते हैं. ​एआई (AI) की मदद से यह घर के नक्शे को सीखता है, ताकि फर्नीचर से न टकराए और हर कोने की सफाई कर सके.

पंखे के साथ सोलर कैप

एक और कूल समर गैजेट है- फैन के साथ सोलर कैप. इन कैप्स में पावर के लिए सौर पैनल्स के साथसाथ ऐडवांस फैन लगे होते हैं. कैब सूरज की रोशनी के संपर्क में आने के बाद अपनेआप चलने लगते हैं.

एआई संचालित स्मार्ट फैन

यह सिर्फ रिमोट से चलने वाले पंखे नहीं होते. इन में एआई आप के कमरे के तापमान, ह्यूमिडिटी यानि और आप की पसंद को समझता है. यदि आप रात में सो रहे हैं और कमरे का तापमान गिरता है, तो एआई संचालित पंखा अपनी गति को अपनेआप कम कर देगा. कुछ मौडलों में मोशन सेंसर भी होते हैं, जो यह पता लगा लेते हैं कि कमरे में कोई है या नहीं. यदि कोई नहीं है, तो वे बिजली बचाने के लिए अपनेआप बंद हो जाते हैं.

एआई संचालित एअर कंडीशनर

सैमसंग जैसी कंपनियों ने एआई विंडफ्री एसी (AC) लौंच किए हैं, जो आप के सोने के पैटर्न और बाहरी तापमान को समझ कर कमरे को आरामदायक रखते हैं. इन के इस्तेमाल से बिजली का बिल भी कम आता है.

डिशवौशर

यह एक ऐसा इलेक्ट्रौनिक उपकरण है जो बर्तनों को धोने के काम को बहुत आसान बना देता है. यह हमारी मेहनत और समय दोनों की बचत करता है, खासकर बड़े परिवारों या रेस्टोरैंट के लिए.

Appliances For Diwali

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