Family Get Together: ग्रैंड फैमिली डिनर से होगा इमोशनल डिटौक्स

Family Get Together: आजकल हम सब बहुत बिजी हो गए हैं. सुबह से शाम तक या तो औफिस में काम या घर की टैंशन या बच्चों के स्कूल और ऐक्टिविटी की भागदौड़, ऊपर से ट्रैफिक, मीटिंग, मोबाइल और सोशल मीडिया. इस रेस में हम सब से जरूरी चीज अपने परिवार और रिश्तों को भूलते जा रहे हैं.

एक समय था जब दादीनानी के घर सब भाईबहन इकट्ठा होते थे. चचेरा, ममेरा, फुफेरा, सब रिश्तेदार शामिल होते थे. अब तो हालत यह है कि सालों तक कोई किसी से नहीं मिलता. कजिंस को फेसबुक या इंस्टा पर लाइक करते हैं, लेकिन असल में मिलना कब हुआ था याद भी नहीं.

रिश्ते अब फौरमैलिटी बनते जा रहे हैं

‘‘बूआजी कैसे हैं?’’

‘‘अरे क्या बताऊं, अभी 2 साल से तो मुलाकात ही नहीं हुई.’’

‘‘कब मिलेंगे?’’

‘‘बस देखो बच्चों की पढ़ाई है, तुम्हारे फूफा का औफिस, जल्द ही मिलेंगे डौंट वरी.’’

ऐसी बातें आजकल बहुत आम हैं. एक दौर था जब रिश्तेदारों के बिना त्योहार अधूरे लगते थे. अब अगर भाई की शादी भी होती है तो लोग वीडियो कौल से शामिल होते हैं. सबकुछ बस ‘काम खत्म करो और निकलो’ वाली सोच पर चलने लगा है. रिश्तों में जो मिठास और अपनापन हुआ करता था वह अब सिर्फ फौरमैलिटी बन कर रह गया है.

खून के रिश्तों का कोई मुकाबला नहीं

आजकल लोग सोशल क्लब, गु्रप्स और औनलाइन कम्युनिटी को ही अपने रिश्तों का दायरा मानने लगे हैं. रोटरी, लौयंस या राउंड टेबल जैसे क्लब में जाना बुरा नहीं है लेकिन यह मान लेना कि वहीं आप की दुनिया बस गई है गलतफहमी है.

ये सब रिश्ते समय और स्वार्थ पर टिके होते हैं. जब तक काम है साथ हैं वहीं आप के रिश्तेदार चाहे जैसे भी हों खून या शादी से जुड़े होते हैं और वक्त पड़ने पर सब से पहले वही साथ खड़े मिलते हैं. दोस्ती अपनी जगह है लेकिन परिवार और रिश्तेदारों से जुड़ाव कहीं ज्यादा गहरा होता है. इन से लड़ाई हो सकती है अनबन हो सकती है, लेकिन जब जरूरत पड़े तो भरोसा भी इन्हीं पर होता है. इसलिए सोशल नैटवर्किंग के चक्कर में अपने असली रिश्तों को मत भूलिए. जो रिश्ते बिना बनावटीपन के बने हैं उन्हीं की असली कीमत होती है.

ऐसे में ग्रैंड फैमिली डिनर क्यों जरूरी है

जब सब लोग सालों तक नहीं मिलते तो आपसी रिश्ते कमजोर हो जाते हैं. मनमुटाव हो तो सुलझाने का टाइम नहीं होता. प्यार हो तो जताने का मौका नहीं मिलता. ऐसे में ग्रैंड फैमिली डिनर या लंच एक ऐसा मौका बन सकता है जहां सब एक टेबल पर बैठें, खाना खाएं, और दिल से बातचीत करें.

यह सिर्फ एक ‘खाना’ नहीं होता बल्कि एक नौस्टैल्जिया का फ्लैशबैक भी होता है. जब सब एकसाथ मिलबैठ बचपन की पुरानी यादें ताजा करते हैं, भाईबहन एकदूसरे की खिंचाई करते हैं.

गुप्ता परिवार की परंपरा

दिल्ली में रहने वाले गुप्ता परिवार के 4 भाईबहन अलगअलग शहरों में रहते हैं. एक अमेरिका में, एक पुणे में, एक गुरुग्राम में और चौथी बहन दिल्ली में. पहले हर त्योहार पर सब साथ होते थे. लेकिन पिछले 6 सालों में वे साथ एक बार भी पूरे नहीं मिल पाए.

तब सब से बड़ी बहन सीमा ने एक आइडिया दिया कि हर साल जून में एक फैमिली गैटटुगैदर करेंगे. अब हर साल सब 1 हफ्ते के लिए अपनेअपने काम से छुट्टी ले कर मिलते हैं.

कभी मसूरी, कभी गोवा, कभी घर पर. जहां सब 15-16 लोग एकसाथ बैठते हैं, खाना खाते हैं, पुराने किस्से सुनते हैं और ढेरों हंसीठिठोली करते हैं.

सीमा कहती हैं, ‘‘यही एक वक्त होता है जब हम सब फिर से छोटे बच्चे बन जाते हैं.’’

यह सिर्फ मिलना नहीं हीलिंग भी है

जब हम किसी अपने के पास बैठते हैं तो कई सालों की थकान उतर जाती है. कोई पूछे कि कैसा चल रहा है? तो लगता है कि कोई वाकई जानना चाहता है.

फैमिली डिनर में ऐसी बातें होती हैं

कौन क्या कर रहा है, कौन किस से नाराज है, कौन किसे मिस करता है और फिर इन सब के बीच हंसी, रोना, मजाक और ढेर सारा प्यार भी होता है. यह एक इमोशनल डिटौक्स होता है.

जोर अनबन खत्म कराने पर नहीं साथ बैठने पर हो

परिवार में अगर 2 लोगों के बीच अनबन है तो इस का मतलब यह नहीं कि उन्हें पारिवारिक मिलन से दूर रखा जाए. हमें यह समझना चाहिए कि किसी की सब के साथ नहीं बन सकती, यह बिल्कुल सामान्य बात है. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि किसी को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए.

परिवार में कुछ ऐसे लोग तो जरूर होते हैं, जिन से मिलने की खुशी होती है, जिन से बात कर के दिल हलका लगता है.

पहले के समय में जब बच्चों की संख्या ज्यादा होती थी और शादियां अकसर जल्दी होती थीं तो न चाहते हुए भी सभी का मिलना हो ही जाता था. ऐसे मौकों पर दिल की दूरियां थोड़ी कम हो जाती थीं.

जरूरी नहीं कि जब भी कोई साथ आए, उस पर अनबन खत्म करने का दबाव बनाया जाए. बस इतना काफी है कि सब एक जगह हों, बिना किसी उम्मीद या जबरदस्ती के. यही धीरेधीरे रिश्तों को ठीक करने की शुरुआत बन सकता है.

बच्चों के लिए भी सीख

आजकल के बच्चे अपने कजिंस को ठीक से जानते भी नहीं. उन्हें सिर्फ स्कूल, मोबाइल गेम और नैटफ्लिक्स की दुनिया दिखती है. लेकिन जब वे दादी के हाथ का खाना, मामा के जोक्स, चाची की नाराजगी और बूआ के लाड से रूबरू होते हैं तो उन्हें असली फैमिली कनैक्शन का मतलब समझ में आता है.

नौकरी, पढ़ाई, या शादी के बाद लोग अलगअलग शहरों या देशों में बस जाते हैं. इस दूरी ने हमारे रिश्तों में भी एक तरह की खाई बना दी है. बच्चे अपने दादादादी की कहानियों से अनजान रहते हैं, और बड़ों को नई पीढ़ी की सोच समझने का मौका ही नहीं मिलता.

  एक तारीख तय कीजिए

कोई वीकैंड या छुट्टी. जरूरी नहीं होटल में हो, घर पर ही एक बड़ा खाना रखिए.

क्या परोसें ग्रैंड फैमिली डिनर में

– दादी के टाइम के स्पैशल पकवान जैसे आलू की पूरी, कढ़ी, पकौड़े, खीर.

– हर सदस्य की पसंद की एक आइटम: कोई बहन चाइनीज पसंद करती है तो एक कौर्न मंचूरियन भी रख दे.

– बच्चों के लिए कुछ स्पेशल: मैकरोनी, पिज्जा या आइसक्रीम.

यह खाना सिर्फ पेट के लिए नहीं दिल के लिए होता है क्योंकि लंच या डिनर गैदरिंग ही एक ऐसा औप्शन है जब सब एकसाथ बिना किसी अवसर के इकट्ठा हो सकते हैं.

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Festival Shopping: औनलाइन शौपिंग करते समय, किन बातों का धयान रखें

Festival Shopping: औनलाइन शौपिंग ने जहां शौपिंग को बहुत आसान बना दिया है, वहीं इस के बहुत से फायदे भी हैं. अगर समझदारी और ध्यान से शौपिंग न करी जाए तो इस के नुकसान भी बहुत हैं. अपनी बेवजह की लापरवाही के चलते आप मुश्किल में भी पढ़ सकते हैं. इसलिए त्योहारों के समय में खासतौर पर औनलाइन शौपिंग करते समय कुछ बातों का खयाल जरूर रखें :

वैबसाइट का यूआरएल चैक करें

यदि वैबसाइट के यूआरएल में सिक्योर मोड (https) में नहीं है, तो वहां से शौपिंग न करें. इस के आलावा फेक शौपिंग वैबसाइट के यूआरएल में ग्रामर की गलतियां होना आम बात है. अगर कोई शौपिंग ऐप है तो उस के डेवलपर के बारे में प्लेस्टोर पर जा कर पढ़ें.

टर्म ऐंड कंडीशन और रिटर्न पौलिसी को चैक कर लें

जहां पर आप को प्रोडक्ट की पिक्चर दिख रही है वहां पर आप को शौपिंग की पौलिसी के बारे  लिखा रहता है उस को पूरा खोल कर पढ़ें कि जो प्रोडक्ट आप मंगा रहे हैं वह अगर पसंद नहीं आया तो उस के रिटर्न करने की क्या पौलिसी है. इस तरह खरीदारी करने से पहले टर्म ऐंड कंडीशन और वारंटी पौलिसी को बारीकी से पढ़ना चाहिए.

हर लिंक को न खोलें

कई बार हमें अनजान नंबर से शौपिंग का कोई लिंक आता है, जिस में बहुत अच्छी ड्रैसेज होती हैं. लेकिन यह सिर्फ एक धोखा होता है. इसलिए किसी के द्वारा भेजे गए ऐसे किसी भी लिंक से शौपिंग न करें. कई कंपनियां फ्रौड भी होती हैं, जो मैसेज में एक लिंक भेजती है. जैसे ही लिंक को क्लिक करते हैं तो आप के सामाने बड़ेबड़े आइटम्स पर जबरदस्त छूट के औफर्स दिखाई देते हैं. औफर्स देख कर कुछ लोग इन वैबसाइट पर पेमेंट कर सामान का और्डर कर देते हैं. इसी का फायदा उठाते हुए ठग फ्रौड कर लेते हैं.

शौपिंग साइट की स्पेलिंग चेक करें

कई बार शौपिंग साइट की स्पेलिंग में एकआध नंबर का फर्क होता है, जिस पर हम ध्यान नहीं देते हैं और उसे ओरिजनल साइट समझ कर आगे बढ़ जाते हैं लेकिन यह फेक भी हो सकता है. इसलिए जिस भी वैबसाइट पर जा रहे हैं उस की स्पेलिंग अच्छी तरह से चैक करें.

ऐंटी वायरस जरूर रखें

अपने लैपटौप या मोबाइल में ऐंटी वायरस जरूर रखें. किसी अनजान ऐप को कभी डाउनलोड न करें. कई बार औनलाइन शौपिंग करते समय हम गलती से कुछ ऐसा क्लिक कर देते हैं जिस से लैपटौप में वायरस आ जाता है.

कैशऔन डिलिवरी चुनें

जब बात औनलाइन की आती है तो फ्रौड के तरीके काफी क्रिएटिव हो जाते हैं. वैसे तो फिशिंग स्कैम्स, फेक औफर्स और डिस्काउंट के नाम पर धोखाधड़ी सामान्य है, लेकिन ऐसे और भी कई तरीके हैं, जिन के माध्यम से लोगों को आजकल खूब लूटा जा रहा है. इन सब पर भी अपनी नजर बनाए रखें.

डेटा फार्मिंग से बचें

सोशल मीडिया या वैबसाइट पर अपने बैंक या कार्ड की जानकारी बिलकुल शेयर न करें. कई वैबसाइट व्यक्तिगत जानकारी इकट्ठा कर डेटा स्कैमर्स को बेच देती हैं, जिस से अनधिकृत ट्रांजैक्शन हो सकता है. कोई भी कितना ही बड़ा औफर क्यों न दे, कभी भी अपने बैंक डिटेल्स शेयर न करें.

फेक वेबसाइट से बचें

त्योहारों के समय कई सारे ऐसे ऐप और वैबसाइट देखने को मिलते हैं, जो फेक होते हैं. देखने में तो वे सही लगते हैं लेकिन असल में वे फ्रौड साइट्स होते हैं. इन फेक ई कौमर्स प्लेटफौर्म्स पर खूब सारा डिस्काउंट दिया जाता है. यहां तक कि 80% तक भी यहां छूट मिलती है. हालांकि जब सामान आप के पास डिलिवर होता है तो वह बेकार होता है या फिर वह होता ही नहीं है जिस के बारे में बताया होता है या प्रोडक्ट वह नहीं होता है जिस की पिक्चर दी गई होती है.

क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी से रहें सतर्क

त्योहारों में क्रेडिट कार्ड फ्रौड के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं. कभी भी अपने कार्ड की जानकारी किसी दुकानदार या अनजान व्यक्ति से साझा न करें. औनलाइन शौपिंग में अगर कोई व्यक्ति कौल कर आप से कार्ड नंबर, सीवीवी या ओटीपी पूछे तो समझ जाएं कि यह एक फ्रौड कौल है.

शौपिंग के वक्त क्वालिटी पर भी ध्यान दें

हम प्रोडक्ट की क्वालिटी चैक करने के लिए साइट पर मौजूद रिव्यू पर निर्भर करते हैं. कई बार यह रिव्यू फेक होते हैं जो पैसे दे कर कराए जाते हैं और आप उन के जाल में फंस जाते हैं. अगर आप कहीं रिव्यू देख रहे हैं तो इस बात पर ध्यान दें कि रिव्यू सिर्फ पोजिटिव ही न हो बल्कि कुछ लोगों ने नैगटिव रिव्यू भी दिया हो, तभी वह सही होगा.

फ्रौड होने पर शिकायत करें

अगर आप को किसी भी तरह के फ्रौड का अंदेशा हो तो इस की शिकायत साइबर थाने में करें. किसी भी तरह की धोखाधड़ी की शिकायत https://consumerhelpline.gov.in/ पर जा कर कर सकते हैं.

Festival Shopping

Family Story: निर्मल- क्या नई दुनिया में खुश थी गोमती

Family Story: आजकी सुबह भी कुछ उदासी भरी थी. मन बेहद बोझोल था. ऐसा लग रहा था कि उसे निकाल कर कहीं फेंक दूं और सब कुछ भुला कर निश्चिंत हो कर पड़ी रहूं. पूरी जिंदगी संघर्ष करते गुजर गई. एक समस्या खत्म होतेहोते दूसरी समस्या आ खड़ी होती थी. नौकरी पाने के लिए की गई भागदौड़, शेखर के साथ भाग कर शादी करना और उस के बाद शुरू हुए खत्म न होने वाले सवाल, कोर्टकचहरी की भागदौड़ और

आज मेरे ही घर में बुद्धिराज का मुझो फटकारना ये सारी बातें एकएक कर के आंखों के आगे तैरने लगी थीं.

‘‘तुम्हारा और करण का क्या रिश्ता है?

वह चंडाल चौकड़ी मेरे घर क्यों आई थी? उस करण के साथ कैसे चिपक रही थीं तुम…’’ शेखर के मुंह से आग बरस रही थी. पर उस से भी भयानक काम उस के हाथ कर रहे थे.

गोमती की लिखी कविताओं के पन्नों को वह एकएक कर जला रहा था. हर पन्ना जलाते वक्त वह कू्रर हंसी हंस रहा था.

गोमती यह देख कर तिलमिला उठी थी. वह उस के हाथपांव जोड़ने लगी थी. पर अपने पैरों पर गिरी गोमती को शेखर ने जोर से झोटक दिया.

‘‘मेरी बीवी पर नजर डालते हैं. एकएक की आंखें नोच लूंगा. कविता करने के लिए क्या मेरा ही घर नजर आता है?’’ देर तक गालीगलौज करने के बाद शेखर पांव पटकते हुए बैडरूम

में चला गया और फिर थोड़ी ही देर में खर्राटे भरने लगा.

पर उन्हें घर तक लाने वाला भी तो वही था. फिर ऐसा क्यों? उसे अच्छी तरह याद है जब उस के गांव में साहित्य मंच की शाखा खुलने वाली थी. तब मुंबई से साहित्य मंच के संस्थापक कवि माधव मानविंदे वहां स्वयं आने वाले थे. वहां उसे भी आमंत्रित किया गया था. उस वक्त साहित्य मंच की स्थापना की मीटिंग कहां की जाए, इस बाबत चर्चा चल रही थी. करण और पोटे साहब ने 1-2 नाम लिए पर उन की कुछ अपनी समस्याएं थीं.

‘‘गोमती दीदी, आप के घर में की जाए क्या?’’ करण के इस सवाल पर शेखर ने काफी उत्साह दिखाया.

‘‘हांहां, जरूरजरूर, हमें भी साहित्यिक लोगों के दर्शन हो जाएंगे…’’

यह सुन सभी ने खुशी से तालियां बजाईं. पर मेरे तो होंठ ही सिल गए थे.

‘‘पर हम दोनों भी तो नौकरी करते हैं. आप कहीं और मीटिंग रख लेंगे तो ज्यादा अच्छा होगा,’’ मैं ने बहुत ही रूखेपन से जवाब दिया.

‘‘पर आप के पति तो काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं,’’ विजया बोली.

‘‘मैं बिस्कुट के पैकेट्स ले आऊंगा. चाय बाहर से मंगा लेंगे,’’ करण बोला.

‘‘बिलकुल नहीं. आप घर में मेहमान बन कर आ रहे हो… कोई कुछ नहीं लाएगा. हम ही घर में गरमगरम पकौड़े बना देंगे. खा कर देखिएगा, उंगलियां चाटते रह जाएंगे. मैं कविता भले ही नहीं करता हूं, पर बीवी की कविताएं तो सुनता ही हूं,’’ शेखर बोला.

उस वक्त हर कोई शेखर की प्रशंसा कर रहा था. उस के बाद तो हर कार्यक्रम हमारे

ही घर होने लगा. मेरा विरोध खत्म हुआ और धीरेधीरे मेरी भी इस में रुचि बढ़ने लगी. पर शेखर नीरस होने लगा. उसे उन लोगों पर गुस्सा आने लगा. मेरी कविताओं की सभी प्रशंसा करने लगे. बाहर से भी मुझो कविताओं के औफर्स आने लगे. मैं भी औफिस से छुट्टी ले कर सम्मेलनों में भाग लेने लगी. शेखर का गुस्सा अब शक में बदलने लगा था. वह अब उन लोगों के साथ मेरा नाम जोड़ने लगा था. शराब पी कर गालीगलौज करना और मुझो से मारपीट करना उस की आदत बन गई थी. कभीकभी तो वह इतनी मारपीट करता कि पिटाई के निशान भी शरीर पर दिखाई देते.

रोजरोज के झोगड़े से तंग आ कर आखिर मैं ने शेखर से तलाक लेने का फैसला कर लिया. पर मेरी तनख्वाह इतनी ज्यादा नहीं थी. शेखर बैंक में अफसर था. मेरे 17 और 15 साल के बेटे बुद्धिराज और युवराज भी उस के साथ रहना पसंद कर रहे थे. वजह सिर्फ एक थी. जो शानशौकत और पैसा वह दे सकता था, वह मैं नहीं दे सकती थी. आज सचमुच रिश्तेनातों के कोई माने नहीं रह गए हैं. भावनात्मक तौर से भी उन्हें मेरी कोई कद्र नहीं थी. कोर्ट ने भी उन्हें शेखर के साथ ही भेज दिया. मैं 1 कमरे के छोटे से मकान में रहने आ गई. कुछ दिनों बाद मैं ने अपील कर के कोर्ट से बच्चों की कस्टडी मांगी तो 1 बेटे बुद्धिराज की कस्टडी मुझो सौंप दी गई. पर मैं उस की जरूरतें पूरी करने में असमर्थ थी. परिणामस्वरूप उस का चिड़चिड़ापन बढ़ता गया और एक दिन वह खुद ही मुझो छोड़ कर अपने पिता के पास चला गया.

एक दिन मेरा मार्केटिंग विभाग में ट्रांसफर हो गया. इस डिपार्टमैंट में जाने के लिए लोग क्याक्या कोशिशें नहीं करते, क्योंकि यहां की दहलीज लांघते ही पैसों की बरसात होती थी. पर इस विभाग में कमर कस कर काम करना पड़ता था, इसलिए मैं यह विभाग नहीं चाहती थी. पर मन के किसी कोने में मुझो भी पैसों की चाह थी. बड़ा घर चाहिए था. फिर शेखर को दुत्कार कर मेरे बच्चे मेरे पास वापस आएं, ऐसी चाह भी थी. इसलिए मैं कुछ भी करने को तैयार थी. पहले टैंडर को मंजूरी देते वक्त मुझको1 लाख का औफर मिला था. औफिस के बाहर एक पेड़ के नीचे रुपयों का वह बंडल लेते वक्त मेरे हाथ थरथरा रहे थे. फिर उस के बाद मैं ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. मैं ने नया घर खरीद लिया.

उधर शेखर के कुकर्मों का घड़ा भर गया था. उस के खिलाफ शिकायत हुई और उस की जांचपड़ताल शुरू हुई. उसे सस्पैंड कर दिया गया और उस के घर को सील कर दिया गया. दोनों बच्चे मेरे पास आ गए और फिर कभी उन्होंने मेरे आलीशान मकान से जाने का नाम नहीं लिया. एक बात तो समझो आ गई कि आज की पीढ़ी को रिश्तेनातों और भावनाओं की परवाह नहीं. केवल पैसा ही सब कुछ होता है.

बी.एससी. करते ही बुद्धिराज की अच्छी नौकरी लग गई. मैं अब भी शेखर को याद करती थी. अब भी मेरा मन उस से मिलने को करता था. एक बैंक मामले के बाद उस ने मुझो फोन किया था, ‘‘बैंक वाले शायद तुम्हारी जांच कर सकते हैं,’’ वकील की सलाह ले लो.’’

उस वक्त अपने किए पर पछतावा होने की बात भी उस ने कही थी और मुझो भी यह सलाह दी कि मैं ऐसे गैरकानूनी काम छोड़ दूं.

पर तब मैं ने कहा था, ‘‘मुझो तुम्हारी सलाह नहीं चाहिए,’’ और फोन पटक दिया था.

फिर मैं ने बुद्धिराज की उस की पसंद की लड़की निकिता से शादी करा दी. मेरे

घर में पैसों की बरसात हो रही थी. सुबह 9 से रात के 9 बजे तक मैं औफिस में ही पिसती रहती थी पर मेरे घर का कायाकल्प हो चुका था. रोज शाम को बुद्धिराज और निकिता की उन के दोस्तों के साथ शराब की पार्टियां चलने लगी थीं. इधर मुझो पर एक जांच कमेटी बैठा दी गई थी और मेरे एमडी ने 1 महीना घर बैठने की सलाह दी थी. पर बुद्धिराज के कहने पर मैं घर नहीं बैठी और मैं ने फिर से औफिस जौइन कर लिया. तब एमडी ने सीधे मेरा सस्पैंड और्डर निकाल दिया.

घर बैठने के बाद घर का सारा नजारा मेरे सामने आया. घर पर खाली बैठना मुझो मंजूर नहीं था और बच्चों की हरकतें मुझो से देखी नहीं जाती थीं, इसलिए मैं ने विनया के घर जाना शुरू कर दिया. वहां पर हम ने फिर से कविताएं पढ़नालिखना शुरू कर दिया. विनया ने मुझो नौकरी से रिजाइन कर देने की सलाह दी, क्योंकि रिजाइन करने के बाद प्रौविडैंट फंड के क्व35 लाख मुझो मिलते. उन्हें बैंक में जमा करने पर उन से मिलने वाले ब्याज से आराम से मेरा घर खर्च चलता. उस के बाद मैं आजादी से कहीं भी घूमफिर सकती थी. वर्ल्ड टूर कर सकती थी. मुझो काम की चिंता नहीं होती. न ही कोई बंधन होता. मैं अपनी सारी ख्वाहिशें पूरी कर सकती थी.

फिर मैं ने फैसला कर लिया. बैंक में मेरा और बुद्धिराज का जौइंट अकाउंट था. वहां जा कर मैं ने सारे पैसे निकालने चाहे तो मैनेजर ने बताया कि बुद्धिराज ने कब के सारे पैसे निकाल लिए हैं. इस बारे में बुद्धिराज से पूछने पर वह मुझो पर ही बिफर पड़ा और चिल्ला कर मुझो से कहने लगा कि बैंक जाने से पहले एक बार मुझो से क्यों नहीं पूछा? मैनेजर न जाने क्या सोचेगा.

उस की इस हरकत ने मुझो सोचने पर मजबूर कर दिया और एक ठोस निर्णय लेते हुए मैं ने बुद्धिराज, निकिता और युवराज को कमरे में बुला कर अपना फैसला सुना दिया कि मैं नौकरी से त्यागपत्र दे रही हूं. प्रौविडैंट फंड के जो रुपए मिलेगे उन्हें बैंक में जमा करा दूंगी. उन से मिलने वाले ब्याज से अपना खर्चा चलाऊंगी. आज के बाद न मैं किसी को कुछ दूंगी और न किसी से कुछ लूंगी. यह मेरा घर है. आज के बाद यहां शराब की पार्टियां नहीं चलेंगी. तुम सब को मेरी मरजी से रहना होगा. अगर मंजूर हो तो ठीक वरना तुम सब अपनी राह चुन सकते हो.

मेरी बात सुन कर तीनों सकते में आ गए और मैं मौर्निंग वाक के लिए निकल पड़ी.

Family Story

Crime Story: आखिर क्यों- अंधभक्ति के कारण बर्बाद हुई रोली की जिंदगी

Crime Story: रोली बहुत देर तक अपनी मम्मी की बात पर विचार करती रही. कुछ गलत तो नहीं कह रही थी उस की मम्मी. परंतु रोली को अच्छे से पता था कि शिखर और उस के मातापिता रोली की बात को पूरी तरह से नकार देंगे. तभी बाहर ड्राइंगरूम में शिखर ने न्यूज लगा दी. चारों तरफ कोरोना का कहर मचा हुआ था. हर तरफ मृत्यु और बेबसी का ही नजारा था, तभी पापाजी चिंतित से बाहर निकले और शिखर से बोले, ‘‘वरुण को कंपनी ने 2 महीने का नोटिस दे दिया है.‘‘

वरुण शिखर की बहन का पति था. शिखर बोला, ‘‘पापा, चिंता मत कीजिए, वरुण टैलेंटेड लड़का है. कुछ न कुछ हो जाएगा, मैं 1-2 जगह बात कर के देखता हूं.‘‘

रोली रसोई में चाय बनाते हुए सोच रही थी, ‘आज वरुण हैं तो कल शिखर भी हो सकता है,’ चाय बनातेबनाते रोली ने दृढ़ निश्चय ले लिया था.

जब सभी लोग चाय की चुसकियां ले रहे थे, तो रोली बोली, ‘‘अगले हफ्ते मेरठ वाले गुरुजी यहीं पर आ रहे हैं. मैं चाहती हूं कि हम भी अपने घर पर यज्ञ करवाएं.

‘‘यज्ञ करवाने के पश्चात न केवल हमारा परिवार कोरोना के संकट से बचा रहेगा, बल्कि शिखर की नौकरी पर भी कोई आंच नहीं आएगी.‘‘

‘‘बस 50,000 रुपए का खर्च है, पर ये कोरोना पर होने वाले खर्च से तो बहुत सस्ता है शिखर.”

रोली की सास अपनी पढ़ीलिखी बहू के मुंह से ये बात सुन कर हक्कीबक्की रह गईं और बोलीं, ‘‘रोली, ये तुम क्या कह रही हो? चारों तरफ कोरोना का कहर है और तुम ऐसे में घर में यज्ञ करवाना चाहती हो?‘‘

रोली तुनकते हुए बोली, ‘‘हां मम्मीजी, आप को तो मेरी सब चीजों से दिक्कत है.’‘

‘‘आप खुद जपतप करें सब ठीक, पर अगर मैं परिवार की भलाई के लिए कुछ करवाना चाहूं तो आप को उस में भी दिक्कत है.‘‘

रोली के ससुर बोले, ‘‘रोली बेटा, ऐसी बात नहीं है, पर ये संभव नहीं है.

‘‘तुम्हें तो मालूम ही है कि हम ऐसे भीड़ इकट्ठी नहीं कर सकते हैं.‘‘

शिखर उठते हुए बोला, ‘‘रोली, मेरे पास ऐसे यज्ञपूजन पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं और शायद हम अब कोरोना से बच भी जाएं, परंतु उस यज्ञ के कारण हमारा पूरा परिवार जरूर कोरोना के कारण स्वाहा हो जाएगा.‘‘

रोली गुस्से में पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई. रात के 8 बज गए, लेकिन रसोई में सन्नाटा था. शिखर कमरे में गया और प्यार से बोला, ‘‘रोली गुस्सा थूक दो, आज खाना नहीं खिलाओगी क्या?‘‘

रोली चिल्लाते हुए बोली, ‘‘क्यों नौकरानी हूं तुम्हारी और तुम्हारे मम्मीपापा की?‘‘

‘‘अपनी इच्छा से मैं घर में एक काम भी नहीं कर सकती, पर जब काम की बारी आती है तो बस वह ही याद आती है.’‘

शिखर रोली को प्यार से समझाता रहा, परंतु वह टस से मस नहीं हुई.

शिखर और उस के मम्मीपापा की सारी कोशिशें बेकार हो गई थीं. रोली की आंखों पर गुरुजी के नाम की ऐसी पट्टी बंधी थी कि वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी.

रोली के मन में कोरोना का डर इस कदर हावी था कि वह किसी भी तरह कोरोना के पंजे से बचना चाहती थी.

रोली की मम्मी उसे रोज फोन पर बताती कि कैसे गुरुजी ने अपने तप से रोली के मायके में पूरे परिवार को कोरोना से पूरी तरह सुरक्षित कर रखा है.

रोली की मम्मी यह भी
बोलतीं, ‘‘अरे, हम लोग न तो मास्क लगाते हैं और न ही सेनेटाइजर का प्रयोग करते हैं. बस गुरुजी की भभूति लगा लेते हैं.‘‘

‘‘सारी कंपनियों में छंटनी और वेतन में कटौती हो रही है, पर तेरे छोटे भाई का तो गुरुजी के कारण ऐसे संकट काल में भी प्रमोशन हो गया है.‘‘

आज गुरुजी रोली के शहर देहरादून आ गए थे. रोली को पता था कि शिखर गुरुजी का यज्ञ घर पर कभी नहीं कराएगा और न ही कभी पैसे देगा.

रोली ने गुरुजी के मैनेजर से फोन पर बात की, तो उन्होंने कहा, ‘‘आप यहीं पर आ जाएं. तकरीबन 500 भक्त और भी हैं. गुरुजी के भक्तों ने ही गुरुद्वारा रोड पर एक हाल किराए पर ले लिया है…

‘‘आप बेझिझक यहां चली आएं,‘‘ गुरुजी के मैनेजर ने कहा.

रोली मन ही मन खुश थी, परंतु 50,000 रुपयों का इंतजाम कैसे करे? वह यही सोच रही थी, तभी रोली को ध्यान आया कि क्यों न वह अपने मायके से मिला हुआ सेट इस अच्छे काम के लिए दान कर दे.

सुबह काम करने के बाद रोली तैयार हो गई और शिखर और उस के मम्मीपापा से बोली, ‘‘मैं 2 दिन के लिए गुरुजी के शिविर में जा रही हूं.‘‘

‘‘मैं ने पैसों का बंदोबस्त कर लिया है. परिवार की खुशहाली के लिए यज्ञ कर के मैं परसों तक लौट आऊंगी.‘‘

शिखर की मम्मी बोलीं, ‘‘रोली, होश में तो हो ना…‘‘

‘‘हम तुम्हें कहीं नहीं जाने देंगे. तुम्हें मालूम है ना कि ये महामारी है और इस का वायरस बड़ी तेजी से फैलता है.‘‘

रोली गुस्से में बोली, ‘‘आप भी भूल रही हैं मम्मी कि मैं एक बालिग हूं. आप को शायद मालूम नहीं है कि जिस तरह का व्यवहार आप मेरे साथ कर रही हैं, वो घरेलू हिंसा के दायरे में आता है. यह एक तरह की मानसिक और भावनात्मक हिंसा है.‘‘

शिखर ने अपने मम्मीपापा से कहा, ‘‘जब रोली ने कुएं में छलांग लगाने का निर्णय ले ही लिया है, तो आप उसे रोकिए मत.‘‘

शिखर बिना कुछ बोले रोली को उस हाल के गेट तक छोड़ आया. हाल के गेट पर भीड़ देख शिखर ने रोली से कहा, ‘‘रोली, एक बार और सोच लो.‘‘

रोली मुसकराते हुए बोली, ‘‘मैं तो गुरुजी को घर पर बुलाना चाहती थी, पर तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की जिद के कारण मैं यहां पर हूं.‘‘

रोली जैसे ही हाल के अंदर पहुंची, बाहर गेट पर खड़े युवकों ने उस का मास्क उतरवा दिया और फिर गंगाजल से उस के हाथ धुलवाए.

अंदर धीमाधीमा संगीत चल रहा था. रोली ने देखा कि तकरीबन 300 लोग वहां थे. हर कोई गुरुजी के आगे सिर झुका कर श्रद्धा के साथ दान कर रहा था.

रोली भी गुरुजी के आगे हाथ जोड़ते हुए बोली, ‘‘गुरुजी, मेरे पास तो बस ये गहने हैं देने के लिए.‘‘

गुरुजी शांत स्वर में बोले, ‘‘बेटी, दान से अधिक भाव का महत्व है. तुम जो भी पूरी श्रद्धा से भेंट करोगी, वह हमें स्वीकार है.‘‘

सात्विक भोजन, सात्विक माहौल, न कोई महामारी का डर और न ही चिंता. रोली को इतना हलका तो पहले कभी महसूस नहीं हुआ था. उस का गुस्सा भी काफूर हो गया था. अब तो रोली को अपने परिवार की बुद्धि पर तरस आ रहा था कि वो ऐसे अच्छे आनंदमय वातावरण से वंचित रह गए हैं.

पूरा दिन गुरुजी के प्रवचन और यज्ञ में बीत गया था. रात में जब रोली सोने के लिए कमरे में गई तो देखा कि उस छोटे से कमरे में 8 महिलाओं के बिस्तर लगे हुए थे.

रोली पहले तो हिचकिचाई, पर फिर उसे गुरुजी की कही हुई बात याद आई कि कैसे हम ने डरडर कर इस वायरस को अपने ऊपर हावी कर रखा है. ये वायरस मनुष्य को मनुष्य से दूर करना चाहता है. दरअसल, ऐसे पूजाहवन से ही इस महाकाल वायरस का सफाया हो जाएगा. ये ऊपर वाले का इशारा है हम मूर्ख मनुष्यों के लिए कि हम उन की शरण में जाएं. अगर विज्ञान कुछ करने में सक्षम होता, तो क्यों पूरे विश्व मे त्राहित्राहि मची रहती.

ये सब बातें याद आते ही रोली शांत मन से आंखें बंद कर के सो गई. सुबह 6 बजे रोली की आंखें खुलीं तो उसे लगा, जैसे वह रूई की तरह हलकी हो गई है.

गुरुजी को स्मरण कर के रोली ने सब से पहले अपनी मम्मी को फोन लगाया और फिर शिखर को फोन कर अपना हालचाल बताया.

अगला दिन भी भजन, प्रवचन और ध्यान में ऐसे बीत गया कि रोली को पता भी नहीं चला कि कब शाम हो गई. तकरीबन 500 लोग इस पूजा में सम्मलित थे, परंतु न तो कोई आपाधापी थी, न ही कोई घबराहट.

शाम के 7 बजे रोली ने गुरुजी को प्रणाम किया, तो गुरुजी ने उसे भभूति देते हुए कहा, ‘‘बेटी, ये भभूति तुम्हारी हर तरह से रक्षा करेगी.‘‘

जब रोली बाहर निकली तो देखा कि शिखर कार में बैठा उस की प्रतीक्षा कर रहा था.

रोली बिना कोई प्रतिक्रिया किए कार में बैठ गई. घर आ कर भी वह बेहद शांत और संभली हुई लग रही थी. रोली ने किसी से कुछ नहीं कहा और न ही उस के सासससुर ने उस से कुछ पूछा.

अगले रोज सुबहसुबह शिखर ने रोली को खुशखबरी सुनाई कि बहुत दिनों से जिस कंपनी में उस की बात अटकी हुई थी, वहां से बात फाइनल हो गई है. 1 अगस्त को उसे पूना में ज्वाइनिंग के लिए जाना है.

रोली नाचते हुए बोली, ‘‘ये सब गुरुजी की कृपा है.‘‘

शिखर बोला, ‘‘अरे वाह, मेहनत मैं करूं और क्रेडिट तुम्हारे गुरुजी ले जाएं.‘‘

जब से रोली गुरुजी के पास से आई थी, उस ने सावधानी बरतनी छोड़ दी थी. शिखर की नौकरी के कारण रोली का विश्वास और पक्का हो गया था.

और फिर एक हफ्ते बाद रोली को वह खुशखबरी भी मिल गई, जिस का पिछले 5 साल से इंतजार कर रही थी. वह मां बनने वाली थी. घर में ऐसा लग रहा था, चारों ओर खुशियों की बरसात हो रही है. रोली को पक्का विश्वास था कि देरसवेर ही सही, शिखर और उस का परिवार भी गुरुजी की भक्ति में आ जाएगा. पर, जब 5 दिन बाद रोली को बुखार हो गया, तो रोली के सासससुर और शिखर के होश उड़ गए थे. परंतु रोली ने कोई दवा नहीं ली, बल्कि गुरुजी के यहां से लाई भभूति चाट ली.

शिखर ने रोली को टेस्ट कराने के लिए भी कहा, परंतु रोली ने कहा, ‘‘मैं ने गुरुजी से फोन पर बात की थी. मुझे वायरल हुआ है. गुरुजी ने कहा है कि परसों तक सब ठीक हो जाएगा.‘‘

पर, उसी रात अचानक ही रोली को सांस लेने में दिक्कत होने लगी. रोली को महसूस हो रहा था, जैसे पूरे वातावरण में औक्सीजन की कमी हो गई हो.

शिखर रात में ही रोली को ले कर अस्पताल भागा. बहुत मुश्किलों से रोली को किसी तरह अस्पताल में दाखिला मिला. पुलिस ने पूछताछ की, तो एक के बाद एक लगभग 500 लोगों की एक लंबी कोरोना चेन बन गई.

गुरुजी का फोन स्विच औफ आ रहा था. यज्ञ में शामिल हुए परिवारों का जब कोरोना टेस्ट हुआ तो ऐसा लगा, कोरोना बम का विस्फोट हो गया है. जहां पहले शहर में बस गिनती के 50 मामले थे, वे अब सीधे 500 पार कर गए थे.

रोली शर्म के कारण आंख नहीं उठा पा रही थी. काश, उस ने शिखर और उस के परिवार की बात मान ली होती. रोली को अपने से ज्यादा पेट में पल रहे बच्चे की चिंता हो रही थी. उधर शिखर को रोली के साथसाथ अपने डायबिटिक मातापिता की भी चिंता हो रही थी. शिखर को समझ नहीं आ रहा था कि क्यों रोली की इस अंधभक्ति का नतीजा रोली के साथसाथ पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा. आखिर कब तक हम पढ़ेलिखे लोग भी अपनेआप को इस तरह अंधविश्वास के कुएं में धकेलते रहेंगे? आखिर क्यों हम आज भी हर समस्या का शार्टकट ढूंढ़ते हैं? आखिर क्यों…?

Crime Story

Hindi Parivarik Kahani: मर्यादा- आखिर क्या हुआ निशा के साथ

Hindi Parivarik Kahani: देर रात गए घर के सारे कामों से फुरसत मिलने पर जब रोहिणी अपने कमरे में जाने लगी तभी उसे याद आया कि वह छत से सूखे हुए कपड़े लाना तो भूल ही गई है. बारिश का मौसम था. आसमान साफ था तो उस ने कपड़ों के अलावा घर भर की चादरें भी धो कर छत पर सुखाने डाल दी थीं. थकान की वजह से एक बार तो मन हुआ कि सुबह ले आऊंगी, लेकिन फिर ध्यान आया कि अगर रात में कहीं बारिश हो गई तो सारी मेहनत बेकार चली जाएगी. फिर रोहिणी छत पर चली गई.

वह कपड़े उठा ही रही थी कि छत के कोने से उसे किसी के बात करने की धीमीधीमी आवाज सुनाई दी. रोहिणी आवाज की दिशा में बढ़ी. दायीं ओर के कमरे के सामने वाली छत पर मुंडेर से सट कर खड़ा हुआ कोई फोन पर धीमी आवाज में बातें कर रहा था. बीचबीच में हंसने की आवाज भी आ रही थी. बातें करने वाले की रोहिणी की ओर पीठ थी इसलिए उसे रोहिणी के आने का आभास नहीं हुआ, मगर रोहिणी समझ गई कि यह कौन है.

रोहिणी 3-4 महीनों से निशा के रंगढंग देख रही थी. वह हर समय मोबाइल से चिपकी या तो बातें करती रहती या मैसेज भेजती रहती. कालेज से आ कर वह कमरे में घुस कर बातें करती रहती और रात का खाना खाने के बाद जैसे ही मोबाइल की रिंग बजती वह छत पर भाग जाती और फिर घंटे भर बाद वापस आती.

रोहिणी के पूछने पर बहाना बना देती कि सहेली का फोन था या पढ़ाई के बारे में बातें कर रही थी. लेकिन रोहिणी इतनी नादान नहीं है कि वह सच न समझ पाए. वह अच्छी तरह जानती थी कि निशा फोन पर लड़कों से बातें करती है. वह भी एक लड़के से नहीं कई लड़कों से.

‘‘निशा इतनी रात गए यहां अंधेरे में क्या कर रही हो? चलो नीचे चलो,’’ रोहिणी की कठोर आवाज सुन कर निशा ने चौंक कर पीछे देखा.

‘‘चल यार, मैं तुझे बाद में काल करती हूं बाय,’’ कह कर निशा ने फोन काट दिया और बिना रोहिणी की ओर देखे नीचे जाने लगी.

‘‘तुम तो एकडेढ़ घंटा पहले छत पर आई थीं निशा, तब से यहीं हो? किस से बातें कर रही थीं इतनी देर तक?’’ रोहिणी ने डपट कर पूछा.

निशा बिफर कर बोली, ‘‘अब आप को क्या अपने हर फोन काल की जानकारी देनी पड़ेगी चाची? आप क्यों हर समय मेरी पहरेदारी करती रहती हैं? किस ने कहा है आप से? मेरा दोस्त है उस से बातें कर रही थी.’’

‘‘निशा, बड़ों से बातें करने की भी तमीज नहीं रही अब तुम्हें. मैं तुम्हारे भले के लिए ही तुम्हें टोकती हूं,’’ रोहिणी गुस्से से बोली.

‘‘मेरा भलाबुरा सोचने के लिए मेरी मां हैं. सच तो यह है कि आप मुझ से जलती हैं. आप की बेटी मेरे जितनी सुंदर नहीं है. उस का मेरे जैसा बड़ा सर्कल नहीं है, दोस्त नहीं हैं. इसीलिए मेरे फोन काल से आप को जलन होती है,’’ निशा कठोर स्वर में बोल कर बुदबुदाती हुई नीचे चली गई.

कपड़ों को हाथ में लिए हुए रोहिणी स्तब्ध सी खड़ी रह गई. उस की गोद में पली लड़की उसे ही उलटासीधा सुना गई.

रोहिणी की बेटी ऋचा निशा से कई गुना सुंदर है, लेकिन हर समय सादगी से रहती है और पढ़ाई में लगी रहती है.

रोहिणी बचपन से ही उसे समझती आई है और ऋचा ने बचपन से ले कर आज तक उस की बताई बात का पालन किया है. वह अपने आसपास फालतू भीड़ इकट्ठा करने में विश्वास नहीं करती. तभी तो हर साल स्कूल और कालेज में टौप करती आई है.

लेकिन निशा संस्कार और गुणों पर ध्यान न दे कर हर समय दोस्तों व सहेलियों से घिरे रहना पसंद करती है. तारीफ पाने के लिए लेटैस्ट फैशन के कपड़े, मेकअप बस यही उस का प्रिय शगल है और इसी में वह अपनी सफलता समझती है. तभी तो ऋचा से 2 साल बड़ी होने के बावजूद भी उसी की क्लास में है.

नीचे जा कर रोहिणी ने ऋचा के कमरे में झांक कर देखा. ऋचा पढ़ रही थी, क्योंकि वह पी.एस.सी. की तैयारी कर रही थी. रोहिणी ने अंदर जा कर उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और अपने कमरे में आ गई.

‘जिंदगी में हर बात का एक नियत समय होता है. समय निकल जाने के बाद सिवा पछतावे के कुछ हासिल नहीं होता. इसलिए जीवन में अपने लक्ष्य और प्राथमिकताएं तय कर लेना और उन्हीं के अनुसार प्रयत्न करना,’ यही समझाया था रोहिणी ने ऋचा को हमेशा. और उसे खुशी थी कि उस की बेटी ने जीवन का ध्येय चुनने में समझदारी दिखाई है. पूरी उम्मीद है कि ऋचा अपने लक्ष्य प्राप्ति में अवश्य सफल होगी.

अगले दिन ऋचा और निशा के कालेज जाने के बाद रोहिणी ने अपनी जेठानी से बोली कि निशा आजकल रोज घंटों फोन पर अलगअलग लड़कों से बातें करती है. आप जरा उसे समझाइए. लेकिन बदले में जेठानी का जवाब सुन कर वह अवाक रह गई.

‘‘करने दे रे, यही तो दिन हैं उस के हंसनेखेलने के. बाद में तो उसे हमारी तरह शादी की चक्की में ही पिसना है. बस बातें ही तो कर रही है न और वैसे भी सभी लड़के एक से एक अमीर खानदान से हैं.’’

रोहिणी को समझते देर नहीं लगी कि जेठानी की मनशा क्या है. वैसे भी उन्होंने निशा को ऐसे ढांचे में ही ढाला है कि अमीर खानदान में शादी कर के ऐश से रहना ही उस का एकमात्र ध्येय है. अमीर परिवार के इतने लड़कों में से वह एक मुरगा तो फांस ही लेगी.

रोहिणी को जेठानी की बात अच्छी नहीं लगी, लेकिन उस ने समझ लिया कि उन से और निशा से कुछ भी कहनासुनना बेकार है. वह ऋचा को उन दोनों से भरसक दूर रखने का प्रयत्न करती. वह नहीं चाहती थी कि ऋचा का ध्यान इन बातों पर जाए.

कई महीनों तक रोहिणी ऋचा की पढ़ाई को ले कर व्यस्त रही. उस ने निशा को टोकना छोड़ दिया और अपना सारा ध्यान ऋचा पर केंद्रित कर लिया. आखिर बेटी के भविष्य का सवाल है. रोहिणी अच्छी तरह समझती थी कि बेटी को अच्छे संस्कार दे कर बड़ा करना और बुरी सोहबत से बचा कर रखना एक मां का फर्ज होता है.

एक दिन रोहिणी ने निशा के हाथ में बहुत महंगा मोबाइल देखा तो उस का माथा ठनका. निशा और उस की मां की आपसी बातचीत से पता चला कि कुछ दिन पहले किसी हिमेश नामक लड़के से निशा की दोस्ती हुई है और उसी ने निशा को यह मोबाइल उपहार में दिया है.

जेठानी रोहिणी की ओर कटाक्ष कर के कहने लगीं कि लड़का आई.ए.एस. है. खानदान भी बहुत ऊंचा और अमीर है. निशा की तो लौटरी खुल गई. अब तो यह सरकारी अफसर की पत्नी बनेगी.

रोहिणी को इस बात पर बड़ी चिंता हुई. कुछ ही दिनों की दोस्ती पर कोई किसी पर इतना पैसा खर्च कर सकता है, यह बात उस के गले नहीं उतर रही थी.

उस ने अपने पति नीरज से बात की तो नीरज ने कहा, ‘‘मैं भी धीरज भैया को कह चुका हूं, लेकिन तुम तो जानती हो, वे भाभी और बेटी के सामने खामोश रहते हैं. तुम जबरन तनाव मत पालो. ऋचा पर ध्यान दो.

जब उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की चिंता नहीं है तो हम क्यों करें? समझाना हमारा काम था हम ने कर दिया.’’

रोहिणी को नीरज की बात ठीक लगी. उस ने तो निशा को भी अपनी बेटी समान ही समझा, पर अब जब मांबेटी दोनों अपने आगे किसी को कुछ समझती ही नहीं तो वह भी क्या करे.

अगले कुछ महीनों में तो निशा अकसर हिमेश के साथ घूमने जाने लगी. कई बार रात में पार्टियां अटैंड कर के देर से घर आती. उस के कपड़ों से महंगे विदेशी परफ्यूम की खुशबू आती.

कपड़े दिन पर दिन कीमती होते जा रहे थे. रोहिणी ने कभी ऋचा और निशा में भेद नहीं किया था, इसलिए उस के भविष्य के बारे में सोच कर उस के मन में भय की लहर दौड़ जाती. पर वह मन मसोस कर मर्यादा का अंशअंश टूटना देखती रहती. घर में 2 विपरीत धाराएं बह रही थीं.

ऋचा सारे समय अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहती और निशा सारे समय हिमेश के साथ अपने सुनहरे भविष्य के सपनों में खोई रहती. उस के पैर जमीन पर नहीं टिकते थे. उस के सुंदर दिखने के उपायों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही थी. वह ऋचा और रोहिणी को ऐसी हेय दृष्टि से देखती थी मानो हिमेश का सारा पैसा और पद उसी का हो.

ऋचा के बी.ए. फाइनल और पी.एस.सी. प्रिलिम्स के इम्तिहान हो गए, लेकिन आखिरी पेपर दे कर आने के तुरंत बाद ही वह अन्य परीक्षा की तैयारियों में जुट गई. उस की दृढ़ता और विश्वास देख कर रोहिणी और नीरज भी आश्वस्त थे कि वह पी.एस.सी. की परीक्षा में जरूर सफल हो जाएगी.

और वह दिन भी आ गया जब रोहिणी और नीरज के चेहरे खिल गए. उन के संस्कार जीत गए. ऋचा की मेहनत सफल हो गई. वह प्रिलिम्स परीक्षा पास कर गई और साथ ही बी.ए. में पूरे विश्वविद्यालय में अव्वल रही.

लेकिन इस खुशी के मौके पर घर में एक तनावपूर्ण घटना घट गई. निशा रात में हिमेश के साथ उस की बर्थडे पार्टी में गई. घर में वह यही बात कह कर गई कि हिमेश ने बहुत से फ्रैंड्स को होटल में इन्वाइट किया है. खानापीना होगा और वह 11 बजे तक घर वापस आ जाएगी. लेकिन जब 12 बजे तक निशा घर नहीं आई तो घर में चिंता होने लगी. वह मोबाइल भी रिसीव नहीं कर रही थी. रात के 2 बजे तक उस की सारी सहेलियों के घर पर फोन किया जा चुका था पर उन में से किसी को भी हिमेश ने आमंत्रित नहीं किया था. जिस होटल का नाम निशा ने बताया था नीरज वहां गया तो पता चला कि ऐसी कोई बर्थडे पार्टी वहां थी ही नहीं.

गंभीर दुर्घटना की आशंका से सब का दिल धड़कने लगा. रोहिणी जेठानी को तसल्ली दे रही थी पर उन के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. वे रोहिणी से नजरें नहीं मिला पा रही थीं. सुबह 4 बजे जब वे लोग पुलिस में रिपोर्ट करने की सोच रहे थे कि तभी एक गाड़ी तेजी से आ कर दरवाजे पर रुकी और तेजी से चली गई. कुछ ही पलों बाद निशा अस्तव्यस्त और बुरी हालत में घर आई और फूटफूट कर रोने लगी.

उस की कहानी सुन कर धीरज और उस की पत्नी के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. रोहिणी और नीरज अफसोस से भर उठे.

बर्थडे पार्टी का बहाना बना कर हिमेश निशा को एक दोस्त के फार्म हाउस में ले गया. वहां उस के कुछ अधिकारी आए हुए थे. उसने निशा से उन्हें खुश करने को कहा. मना करने पर वह गुस्से से चिल्लाया कि महंगे उपहार मैं ने मुफ्त में नहीं दिए. तुम्हें मेरी बात माननी ही पड़ेगी. उपहार लेते समय तो हाथ बढ़ा कर सब बटोर लिया और अब ढोंग कर रही हो. और फिर पता नहीं उस ने निशा को क्या पिला दिया कि उस के हाथपांव बेदम हो गए और फिर…

कहां तो निशा उस की पत्नी बनने का सपना देख रही थी और हिमेश ने उसे क्या बना दिया. हिमेश ने धमकी दी थी कि किसी को बताया तो…

रोहिणी सोचने लगी अगर मर्यादा का पहला अंश भंग करने से पहले ही निशा सचेत हो जाती तो आज अपनी मर्यादा खो कर न आती.

निशा के कानों में रोहिणी के शब्द गूंज रहे थे, जो उन्होंने एक बार उस से कहे थे कि मर्यादा भंग करते जाने का साहस ही हम में एकबारगी सारी सीमाएं तोड़ डालने का दुस्साहस भर देता है.

वाकई एकएक कदम बिना सोचेसमझे अनजानी राह पर कदम बढ़ाती वह आज गड्ढे में गिर गई थी.

Hindi Parivarik Kahani

Short Story: तुम्हारी मरजी- जब बीवी की मरजी का न खाना खाए पति

Short Story: रविवार की दोपहर का वक्त है, एक औसत मध्यवर्गीय परिवार का घर.

सुष्मिता: भई, कितनी बार कह चुका हूं कि आज रविवार दोपहर में खाने में क्या और्डर करना है., कम से कम यह तो बता दो.

‘‘अच्छा तुम कहो तो सांभरबड़ा और मसाला डोसा मंगा लेती हूं.’’

‘‘हां, यही और्डर कर दो,’’ भुनेंद्र ने कहा.

फिर सुष्मिता ने सांभरबड़ा और मसाला डोसा और्डर कर दिया.

शाम का समय

‘‘सुष्मिता, अब शाम का तो बता दो कि खाना क्या बनाऊं? सुबह तो तुम्हारी पसंद का सांभरबड़ा और मसाला डोसा खाया था. भई, सम?ा में नहीं आता कि कैसी होममेकर हो तुम. यह सब तुम्हारा काम है… मुझे इतनी सारी फाइलें देखनी हैं. तुम्हारी जौब में होमवर्क नहीं है, मेरी जौब में तो है. इन्हें आज ही निबटाना है मु?ो.’’

‘‘इन्हें तो जैसे घर से कोईर् मतलब ही नहीं है. जब देखो दफ्तर का काम,’’ सुष्मिता बड़बड़ाई.

मंगलवार की प्रात:

‘‘क्या औफिस के लिए खाने में कुछ तैयार है? मु?ो आज दफ्तर जरा जल्दी जाना है.’’

‘‘अभी कहां, मैं तो बस तुम से पूछने ही

आ रही थी कि  औफिस लंच के लिए कल के पिज्जा स्लाइस रखूं या फिर आलू के परांठे बनाऊं?

‘‘उफ, फिर वही ?ागड़ा. कुछ अपने दिमाग का भी इस्तेमाल किया करो. मु?ो तो तुम अगर तैयार हो तो वही दे दो नहीं तो मैं चला. आज कैंटीन में ही खा लूंगा.’’

‘‘ठीक है फिर कैंटनी में खा लेना…. तुम्हारी मरजी ही चलेगी.’’

शाम

‘‘आज तो घर आने में बड़ी देर कर दी, कहां भटक गए थे? 4 घंटे से अकेले घर में

पड़ी हूं.’’

‘‘दफ्तर में काम ज्यादा था. अच्छा, लाओ खाना, बड़े जोरो की भूख लगी है.’’

‘‘बस, अभी 5 मिनट में बना देती हूं. तुम्हारी पसंद की ही सब्जी बनाने के लिए रुकी हुई थी.’’

‘‘अच्छा तो कोफ्ते बना लो.’’

‘‘कोफ्तों में तो बहुत टाइम लगता है. बहुत भूख है तो शाही पनीर का रैडीमेड पैकेट रखा है. तुम्हारी मरजी हो तो खोल दूं?’’

बुधवार की सुबह

‘‘बताओ, आलूपालक की सब्जी बनाऊं या कद्दू की? तुम्हें ही बताना पड़ेगा… तुम्हारी मरजी से ही चलेगा न.’’

‘‘तो फिर आलू, शिमलामिर्च, पालक ही बना लो.’’

‘‘ठीक है तुम्हारी मरजी तो यही बना

देती हूं.’’

‘‘पर पालकआलू, शिमलामिर्च साफ करतेकरते तो बड़ी देर हो जाएगी. आप की बस न निकल जाए कहीं. ऐसा करती हूं ?ाटपट कद्दू काट कर छौंक देती हूं.’’

‘‘अच्छी बात है, फिर कद्दू ही बना लो.’’

‘‘ठीक तुम्हारी मरजी तो कद्दू ही बना

देती हूं.’’

शाम

‘‘क्या बात है आज तुम ने पूछा नहीं कि कौन सी सब्जी बनानी है? आज मेरी चटपटा खाना खाने की बड़ी इच्छा हो रही है. मसालेदार छोले बनाओ तो मजा आ जाए.’’

‘‘आज रमा के साथ चायपकौड़े खा कर आ रही हूं. थक गईर् हूं. सिर भी थोड़ा दुख रहा है. आज तुम ही अपने और मेरे लिए थोड़ी सी रैडीमेड नूडल्स बना लो.’’

‘‘अच्छा तो मैं टोस्ट से पैटी बना लेता हूं.’’

‘‘ठीक है तुम्हारी मरजी.’’

गुरुवार की प्रात:

‘‘आज क्या बनाऊं?’’

‘‘मेरे खयाल में कद्दू कैसा रहेगा? आता है न? वैसा बनाना जैसा मेरी मां बनाती है.’’

‘‘कद्दू, कल ही तो खाया था कद्दू. मु?ा से नहीं खाया जाता रोजरोज यह कद्दू. मैं तो आलूपरवल बनाने जा रही हूं.’’

‘‘ठीक है आलूपरवल बना लो.’’

‘‘तुम्हारी मरजी है न तो ?ाटपट बना लेती दूं वरना दोनों को देर हो जाएगी.’’

शाम

‘‘सुबह आलूपरवल में थोड़ा नमक क्या

तेज हो गया सारी सब्जी ही वापस ले आए.

इस महंगाई के जमाने में यह बरबादी ठीक है क्या? मैं ने उसी बची हुई सब्जी में टमाटर डाल कर मिक्सी में चला कर सूप बना दिया है.’’

‘‘तुम जानती हो, मु?ो परवल वैसे ही पसंद नहीं हैं. फिर भी सुबहशाम वही खिलाती हो.’’

‘‘लो तुम्हारी मरजी थी तो ही तो आलूपरवल बनाए थे.’’

शुक्रवार की प्रात:

‘‘जल्दी से बताओ, क्या सब्जी बनाऊं नहीं तो थोड़ी देर में ही हायतोबा मचाना शुरू कर दोगे?’’

‘‘भई, मेरी मरजी तो आज गोभीमटर की सब्जी खाने की है.’’

‘‘बड़ी शान से बोल दिया, गोभीमटर की सब्जी बनाओ. जानते हो इन दोनों का मौसम

नहीं है?’’ फिर बेमौसम सब्जी का भाव भी मालूम है?’’

‘‘तो फिर बैगन ही बना लो.’’

‘‘तुम तो सम?ाते ही नहीं, आजकल बैगन कड़वे आ रहे हैं. तुम्हारी मरजी हो तो मैं लौकी बना लेती हूं.’’

‘‘अच्छा, वही सही तुम ने मु?ा से पूछा

तो मैं ने बता दिया. लौकी भरवां बना सकती हो?’’

‘‘भरवां लौकी 2 जनों के लिए सिर्फ? न बाबा. मैं तो तुम्हारी मरजी की रसे की लौकी बना देती हूं.’’

शाम

‘‘कुछ बताओ तो सब्जी क्या बनेगी या कुछ बाहर से मंगाओगे?’’

‘‘ठीक सम?ो तो भरवां आलू बना लो.’’

‘‘तुम्हें तो हमेशा ?ां?ाट की चीजें ही

सू?ाती हैं. अब कौन बैठ कर मसाला पीसेगा?

मैं आलू यों ही काट कर भून लेती हूं या

तुम्हारी मरजी हो तो चनादाल मंगवा लूं?

वही और्डर कर देती हूं तुम्हारी मरजी की

ब्लैक दाल.’’

शनिवार की प्रात:

‘‘हरी सब्जी घर पर नहीं है.’’

‘‘आलू तो होंगे वही बना लो.’’

‘‘आलू हैं तो मगर खाली आलू की सब्जी खाने में बिलकुल मजा नहीं आता. मैं बेसन की पकौडि़यों की सब्जी बना लूं? तुम्हारी मां ने सिखाई थी.’’

‘‘ठीक है, वह भी चलेगा.’’

‘‘अच्छा तो तुम्हारी मरजी है तो पकौड़ी की सब्जी बना लेती हूं.’’

शाम

‘‘अब क्या बना रही हो?’’

‘‘हफ्ते में एक शाम तो मु?ो भी छुट्टी मिलनी चाहिए. आज कहीं बाहर चलें क्या?’’

‘‘हांहां… क्यों नहीं. एक नया जौयंट खुला है डिफैंस ऐनक्लेव में.’’

‘‘ठीक है तुम्हारी मरजी तो वहीं चलते हैं.’’

‘‘आज ब्रेकफार्स्ट क्या बनाऊं?’’

रविवार की प्रात:

‘‘आज छुट्टी के दिन तो चैन से सोने दो. सबेरे से ही खाने का राग अलापने लगती हो… जो चाहो बना लो.’’

शाम

‘‘आज मैं ने नमक, कालीमिर्च भर कर

शुद्ध घी में परवल बनाए हैं, देखो तो कैसे बने हैं?’’

?ां?ाला कर, ‘‘तुम्हें मालूम है कि मु?ो परवल पसंद नहीं हैं. फिर भी जानबू?ा कर बारबार परवल क्यों बनाती हो? आगे से घर में परवल नहीं बनने चाहिए.’’

‘‘रोज सुबहशाम तुम्हारी मरजी का खाना मिलता है. आज एक बार अपनी मरजी से परवल क्या बना लिए लगे चिल्लाने- इस घर में तो मेरी कुछ पूछ ही नहीं. अपनी पसंद की सब्जी तक नहीं बना सकती,’’  सुष्मिता की आंखों से टपाटप आंसू गिरने लगते हैं. भुनेंद्र हत्प्रभ उसे देखता रह जाता है.

Short Story

Best Hindi Story: कभी नहीं- क्या गायत्री को समझ आई मां की अहमियत

Best Hindi Story: ‘‘पहली नजर से जीवनभर जुड़ने के नातों पर विश्वास है तुम्हें?’’ सूखे पत्तों को पैरों के नीचे कुचलते हुए रवि ने पूछा.

कड़ककड़क कर पत्तों का टूटना देर तक विचित्र सा लगता रहा गायत्री को. बड़ीबड़ी नीली आंखें उठा कर उस ने भावी पति को देखा, ‘‘क्या तुम्हें विश्वास है?’’

गायत्री ने सोचा, उस के प्रेम में आकंठ डूब चुका युवा प्रेमी कहेगा, ‘है क्यों नहीं, तभी तो संसार की इतनी लंबीचौड़ी भीड़ में बस तुम मिलते ही इतनी अच्छी लगीं कि तुम्हारे बिना जीवन की कल्पना ही शून्य हो गई.’ चेहरे पर गुलाबी रंगत लिए वह कितना कुछ सोचती रही उत्तर की प्रतीक्षा में, परंतु जवाब न मिला.तनिक चौंकी गायत्री, चुप रवि असामान्य सा लगा उसे. सारी चुहलबाजी कहीं खो सी गई थी जैसे. हमेशा मस्त बना रहने वाला ऐसा चिंतित सा लगने लगा मानो पूरे संसार की पीड़ा उसी के मन में आ समाई हो.

उसे अपलक निहारने लगा. एकबारगी तो गायत्री शरमा गई. मन था, जो बारबार वही शब्द सुनना चाह रहा था. सोचने लगी, ‘इतनी मीठीमीठी बातों के लिए क्या रवि का तनाव उपयुक्त है? कहीं कुछ और बात तो नहीं?’ वह जानती थी रवि अपनी मां से बेहद प्यार करता है. उसी के शब्दों में, ‘उस की मां ही आज तक उस का आदर्श और सब से घनिष्ठ मित्र रही हैं. उस के उजले चरित्र के निर्माण की एकएक सीढ़ी में उस की मां का साथ रहा है.’एकाएक उस का हाथ पकड़ लिया गायत्री ने रोक कर वहीं बैठने का आग्रह किया. फिर बोली, ‘‘क्या मां अभी तक वापस नहीं आईं जो मुझ से ऐसा प्रश्न पूछ रहे हो? क्या बात है?’’

रवि उस का कहना मान वहीं सूखी घास पर बैठ गया. ऐसा लगा मानो अभी रो पड़ेगा. अपनी मां के वियोग में वह अकसर इसी तरह अवश हो जाया करता है, वह इस सत्य से अपरिचित नहीं थी.

‘‘क्या मां वापस नहीं आईं?’’ उस ने फिर पूछा.

रवि चुप रहा.‘‘कब तक मां की गोद से ही चिपके रहोगे? अच्छीखासी नौकरी करने लगे हो. कल को किसी और शहर में स्थानांतरण हो गया तब क्या करोगे? क्या मां को भी साथसाथ घसीटते फिरोगे? तुम्हारे छोटे भाईबहन दोनों की जिम्मेदारी है उन पर. तुम क्या चाहते हो, पूरी की पूरी मां बस तुम्हारी ही हों? तुम्हारे पिता और उन दोनों का भी तो अधिकार है उन पर. रवि, क्या हो गया है तुम्हें?’’

‘‘ऐसा लगता है, मेरा कुछ खो गया है. जी ही नहीं लगता गायत्री.  पता नहीं, मन में क्याक्या होता रहता है.’’

‘‘तो जा कर मां को ले आओ न. उन्हें भी तो पता है, तुम उन के बिना बीमार हो जाते हो. इतने दिन फिर वे क्यों रुक गईं?’’ अनायास हंस पड़ी गायत्री. धीरे से रवि का हाथ अपने हाथ में ले कर सहलाने लगी, ‘‘शादी के बाद क्या करोगे? तब मेरे हिस्से का प्यार क्या मुझे मिल पाएगा? अगर मुझे ही तुम्हारी मां से जलन होने लगी तो? हर चीज की एक सीमा होती है. अधिक मीठा भी कड़वा लगने लगता है, पता है तुम्हें?’’

रवि गायत्री की बड़ीबड़ी नीली आंखों को एकटक निहारने लगा.

‘‘मां तो वे तुम्हारी हैं ही, उन से तुम्हारा स्नेह भी स्वाभाविक ही है लेकिन वक्त के साथसाथ उस स्नेह में परिपक्वता आनी चाहिए. बच्चों की तरह मां का आंचल अभी तक पकड़े रहना अच्छा नहीं लगता. अपनेआप को बदलो.’’

‘‘मैं अब चलूं?’’ एकाएक वह उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘कल मिलोगी न?’’

‘‘आज की तरह गरदन लटकाए ही मिलना है तो रहने दो. जब सचमुच मिलना चाहो, तभी मिलना वरना इस तरह मिलने का क्या अर्थ?’’ एकाएक गायत्री खीज उठी. वह कड़वा कुछ भी कहना तो नहीं चाहती थी पर व्याकुल प्रेमी की जगह उसे व्याकुल पुत्र तो नहीं चाहिए था न. हर नाते, हर रिश्ते की अपनीअपनी सीमा, अपनीअपनी मांग होती है.

‘‘नाराज क्यों हो रही हो, गायत्री? मेरी परेशानी तुम क्या समझो, अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊं?’’

‘‘क्या समझाना है मुझे, जरा बताओ? मेरी तो समझ से भी बाहर है तुम्हारा यह बचपना. सुनो, अब तभी मिलना जब मां आ जाएं. इस तरह 2 हिस्सों में बंट कर मेरे पास मत आना.’’गायत्री ने विदा ले ली. वह सोचने लगी, ‘रवि कैसा विचित्र सा हो गया है कुछ ही दिनों में. कहां उस से मिलने को हर पल व्याकुल रहता था. उस की आंखों में खो सा जाता था.’   भविष्य के सलोने सपनों में खोए भावी पति की जगह एक नादान बालक को वह कैसे सह सकती थी भला. उस की खीज और आक्रोश स्वाभाविक ही था. 2 दिन वह जानबूझ कर रवि से बचती रही. बारबार उस का फोन आता पर किसी न किसी तरह टालती रही. चाहती थी, इतना व्याकुल हो जाए कि स्वयं उस के घर चल कर आ जाए. तीसरे दिन सुबहसुबह द्वार पर रवि की मां को देख कर गायत्री हैरान रह गई. पूरा परिवार समधिन की आवभगत में जुट गया.

‘‘तुम से अकेले में कुछ बात करनी है,’’ उस के कमरे में आ कर धीरे से मां बोलीं तो कुछ संशय सा हुआ गायत्री को.

‘‘इतने दिन से रवि घर ही नहीं आया बेटी. मैं कल रात लौटी तो पता चला. क्या वह तुम से मिला था?’’ ‘‘जी?’’ वह अवाक् रह गई, ‘‘2 दिन पहले मिले थे. तब उदास थे आप की वजह से.’’

‘‘मेरी वजह से उसे क्या उदासी थी? अगर उसे पता चल गया कि मैं उस की सौतेली मां हूं तो इस में मेरा क्या कुसूर है. लेकिन इस से क्या फर्क पड़ता है?

‘‘वह मेरा बच्चा है. इस में संशय कैसा? मैं ने उसे अपने बच्चों से बढ़ कर समझा है. मैं उस की मां नहीं तो क्या हुआ, पाला तो मां बन कर है न?’’ ऐसा लगा, जैसे बहुत विशाल भवन भरभरा कर गिर गया हो. न जाने मां कितना कुछ कहती रहीं और रोती रहीं, सारी कथा गायत्री ने समझ ली. कांच की तरह सारी कहानी कानों में चुभने लगी. इस का मतलब है कि इसी वजह से परेशान था रवि और वह कुछ और ही समझ कर भाषणबाजी करती रही.

‘‘उसे समझा कर घर ले आ, बेटी. सूना घर उस के बिना काटने को दौड़ता है मुझे. उसे समझाना,’’ मां आंसू पोंछते हुए बोलीं.

‘‘जी,’’ रो पड़ी गायत्री स्वयं भी, सोचने लगी, कहां खोजेगी उसे अब? बेचारा बारबार बुलाता रहा. शायद इस सत्य की पीड़ा को उसे सुना कर कम करना चाहता होगा और वह अपनी ही जिद में उसे अनसुना करती रही.

मां आगे बोलीं, ‘‘मैं ने उसे जन्म नहीं दिया तो क्या मैं उस की मां नहीं हूं? 2 महीने का था तब, रातों को जागजाग कर उसे सुलाती रही हूं. कम मेहनत तो नहीं की. अब क्या वह घर ही छोड़ देगा? मैं इतनी बुरी हो गई?’’

‘‘वे आप से बहुत प्यार करते हैं मांजी. उन्हें यह बताया ही किस ने? क्या जरूरत थी यह सच कहने की?’’

‘‘पुरानी तसवीरें सामने पड़ गईं बेटी. पिता के साथ अपनी मां की तसवीरें दिखीं तो उस ने पिता से पूछ लिया, ‘आप के साथ यह औरत कौन है?’ वे बात संभाल नहीं पाए, झट से बोल पड़े, ‘तुम्हारी मां हैं.’

‘‘बहुत रोया तब. ये बता रहे थे. बारबार यही कहता रहा, ‘आप ने बताया क्यों? यही कह देते कि आप की पहली पत्नी थी. यह क्यों कहा कि मेरी मां भी थी.’

‘‘अब जो हो गया सो हो गया बेटी, इस तरह घर क्यों छोड़ दिया उस ने? जरा सोचो, पूछो उस से?’’

किसी तरह भावी सास को विदा तो कर दिया गायत्री ने परंतु मन में भीतर कहीं दूर तक अपराधबोध सालने लगा, कैसी पागल है वह और स्वार्थी भी, जो अपना प्रेमी तलाशती रही उस इंसान में जो अपना विश्वास टूट जाने पर उस के पास आया था.उसे महसूस हो रहा होगा कि उस की मां कहीं खो गई है. तभी तो पहली नजर से जीवनभर जुड़ने के नातों में विश्वास का विषय शुरू किया होगा. कुछ राहत चाही होगी उस से और उस ने उलटा जलीकटी सुना कर भेज दिया. मातापिता और दोनों छोटे भाई समीप सिमट आए. चंद शब्दों में गायत्री ने उन्हें सारी कहानी सुना दी.

‘‘तो इस में घर छोड़ देने वाली क्या बात है? अभी फोन आएगा तो उसे घर ही बुला लेना. हम सब मिल कर समझाएंगे उसे. यही तो दोष है आज की पीढ़ी में. जोश से काम लेंगे और होश का पता ही नहीं,’’ पिताजी गायत्री को समझाने लगे.

फिर आगे बोले, ‘‘कैसा कठोर है यह लड़का. अरे, जब मां ही बन कर पाला है तो नाराजगी कैसी? उसे भूखाप्यासा नहीं रखा न. उसे पढ़ायालिखाया है, अपने बच्चों जैसा ही प्यार दिया है. और देखो न, कैसे उसे ढूंढ़ती हुई यहां भी चली आईं. अरे भई, अपनी मां क्या करती है, यही सब न. अब और क्या करें वे बेचारी?

‘‘यह तो सरासर नाइंसाफी है रवि की. अरे भई, उस के कार्यालय का फोन नंबर है क्या? उस से बात करनी होगी,’’ पिता दफ्तर जाने तक बड़बड़ाते रहे.

छोटा भाई कालेज जाने से पहले धीरे से पूछने लगा, ‘‘क्या मैं रवि भैया के दफ्तर से होता जाऊं? रास्ते में ही तो पड़ता है. उन को घर आने को कह दूंगा.’’

गायत्री की चुप का भाई ने पता नहीं क्या अर्थ लिया होगा, वह दोपहर तक सोचती रही. क्या कहती वह भाई से? इतना आसान होगा क्या अब रवि को मनाना. कितनी बार तो वह उस से मिलने के लिए फोन करता रहा था और वह फोन पटकती रही थी. शाम को पता चला रवि इतने दिनों से अपने कार्यालय भी नहीं गया.

‘क्या हो गया उसे?’ गायत्री का सर्वांग कांप उठा.

मां और पिताजी भी रवि के घर चले गए पूरा हालचाल जानने. भावी दामाद गायब था, चिंता स्वाभाविक थी. बाद में भाई बोला, ‘‘वे अपने किसी दोस्त के पास रहते हैं आजकल, यहीं पास ही गांधीनगर में. तुम कहो तो पता करूं. मैं ने पहले बताया नहीं. मुझे शक है, तुम उन से नाराज हो. अगर तुम उन्हें पसंद नहीं करतीं तो मैं क्यों ढूंढ़ने जाऊं. मैं ने तुम्हें कई बार फोन पटकते देखा है.’’

‘‘ऐसा नहीं है, अजय,’’ हठात निकल गया होंठों से, ‘‘तुम उन्हें घर ले आओ, जाओ.’’

बहन के शब्दों पर भाई हैरान रह गया. फिर हंस पड़ा, ‘‘3-4 दिन से मैं तुम्हारा फोन पटकना देख रहा हूं. वह सब क्या था? अब उन की इतनी चिंता क्यों होने लगी? पहले समझाओ मुझे. देखो गायत्री, मैं तुम्हें समझौता नहीं करने दूंगा. ऐसा क्या था जिस वजह से तुम दोनों में अबोला हो गया?’’

‘‘नहीं अजय, उन में कोई दोष नहीं है.’’

‘‘तो फिर वह सब?’’

‘‘वह सब मेरी ही भूल थी. मुझे ही ऐसा नहीं करना चाहिए था. तुम पता कर के उन्हें घर ले आओ,’’ रो पड़ी गायत्री भाई के सामने अनुनयविनय करते हुए.

‘‘मगर बात क्या हुई थी, यह तो बताओ?’’

‘‘मैं ने कहा न, कुछ भी बात नहीं थी.’’ अजय भौचक्का रह गया.

‘‘अच्छा, तो मैं पता कर के आता हूं,’’ बहन को उस ने बहला दिया.

मगर लौटा खाली हाथ ही क्योंकि उसे रवि वहां भी नहीं मिला था. बोला, ‘‘पता चला कि सुबह ही वहां से चले गए रवि भैया. उन के पिता उन्हें आ कर साथ ले गए.’’

‘‘अच्छा,’’ गायत्री को तनिक संतोष हो गया.

‘‘उन की मां की तबीयत अच्छी नहीं थी, इसीलिए चले गए. पता चला, वे अस्पताल में हैं.’’चुप रही गायत्री. मां और पिताजी का इंतजार करने लगी. घर में इतनी आजादी और आधुनिकता नहीं थी कि खुल कर भावी पति के विषय में बातें करती रहे. और छोटे भाई से तो कदापि नहीं. जानती थी, भाई उस की परेशानी से अवगत होगा और सचमुच वह बारबार उस से कह भी रहा था, ‘‘उन के घर फोन कर के देखूं? तुम्हारी सास का हालचाल…’’

‘‘रहने दो. अभी मां आएंगी तो पता चल जाएगा.’’

‘‘तुम भी तो रवि भैया के विषय में पूछ लो न.’’

भाई ने छेड़ा या गंभीरता से कहा, वह समझ नहीं पाई. चुपचाप उठ कर अपने कमरे में चली गई. काफी रात गए मां और पिताजी घर लौटे. उस समय कुछ बात न हुई. परंतु सुबहसुबह मां ने जगा दिया, ‘‘कल रात ही रवि की माताजी को घर लाए, इसीलिए देर हो गई. उन की तबीयत बहुत खराब हो गई थी. खानापीना सब छोड़ रखा था उन्होंने. रवि मां के सामने आ ही नहीं रहा था. पता नहीं क्या हो गया इस लड़के को. बड़ी मुश्किल से सामने आया.‘‘क्या बताऊं, कैसे बुत बना टुकुरटुकुर देखता रहा. मां को घर तो ले गया है, परंतु कुछ बात नहीं करता. तुम्हें बुलाया है उस की मां ने. आज अजय के साथ चली जाना.’’

‘‘मैं?’’ हैरान रह गई गायत्री.

‘‘कोई बात नहीं. शादी से पहले पति के घर जाने का रिवाज हमारी बिरादरी में नहीं है, पर अब क्या किया जाए. उस घर का सुखदुख अब इस घर का भी तो है न.’’

गायत्री ने गरदन झुका ली. कालेज जाते हुए भाई उसे उस की ससुराल छोड़ता गया. पहली बार ससुराल की चौखट पर पैर रखा. ससुर सामने पड़ गए. बड़े स्नेह से भीतर ले गए. फिर ननद और देवर ने घेर लिया. रवि की मां तो उस के गले से लग जोरजोर से रोने लगीं. ‘‘बेटी, मैं सोचती थी मैं ने अपना परिवार एक गांठ में बांध कर रखा है. रवि को सगी मां से भी ज्यादा प्यार दिया है. मैं कभी सौतेली नहीं बनी. अब वह क्यों सौतेला हो गया? तुम पूछ कर बताओ. क्या पता तुम से बात करे. हम सब के साथ वह बात नहीं करता. मैं ने उस का क्या बिगाड़ दिया जो मेरे पास नहीं आता. उस से पूछ कर बताओ गायत्री.’’ विचित्र सी व्यथा उभरी हुई थी पूरे परिवार के चेहरे पर. जरा सा सच ऐसी पीड़ादायक अवस्था में ले आएगा, किस ने सोचा होगा.

‘‘भैया अपने कमरे में हैं, भाभी. आइए,’’ ननद ने पुकारा. फिर दौड़ कर कुछ फल ले आई, ‘‘ये उन्हें खिला देना, वे भूखे हैं.’’

गायत्री की आंखें भर आईं. जिस परिवार की जिम्मेदारी शादी के बाद संभालनी थी, उस ने समय से पूर्व ही उसे पुकार लिया था. कमरे का द्वार खोला तो हैरान रह गई. अस्तव्यस्त, बढ़ी दाढ़ी में कैसा लग रहा था रवि. आंखें मींचे चुपचाप पड़ा था. ऐसा प्रतीत हुआ मानो महीनों से बीमार हो. क्या कहे वह उस से? कैसे बात शुरू करे? नाराज हो कर उस का भी अपमान कर दिया तो क्या होगा? बड़ी मुश्किल से समीप बैठी और माथे पर हाथ रखा, ‘‘रवि.’’

आंखें सुर्ख हो गई थीं रवि की. गायत्री ने सोचा, क्या रोता रहता है अकेले में? मां ने कहा था वह पत्थर सा हो गया है.

‘‘रवि यह, यह क्या हो गया है तुम्हें?’’ अपनी भूल का आभास था उसे. बलात होंठों से निकल गया, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझे तुम्हारी बात सुननी चाहिए थी. मुझ से ऐसा क्या हो गया, यह नहीं होना चाहिए था,’’ सहसा स्वर घुट गया गायत्री का. वह रवि, जिस ने कभी उस का हाथ भी नहीं पकड़ा था, अचानक उस की गोद में सिर छिपा कर जोरजोर से रोने लगा. उसे दोनों बांहों में कस के बांध लिया. उसे इस व्यवहार की आशा कहां थी. पुरुष भी कभी इस तरह रोते हैं. गायत्री को बलिष्ठ बांहों का अधिकार निष्प्राण करने लगा. यह क्या हो गया रवि को? स्वयं को छुड़ाए भी तो कैसे? बालक के समान रोता ही जा रहा था.

‘‘रवि, रवि, बस…’’ हिम्मत कर के उस का चेहरा सामने किया.

‘‘ऐसा लगता है मैं अनाथ हो गया हूं. मेरी मां मर गई हैं गायत्री, मेरी मां मर गई हैं. उन के बिना कैसे जिंदा रहूं, कहां जाऊं, बताओ?’’

उस के शब्द सुन कर गायत्री भी रो पड़ी. स्वयं को छुड़ा नहीं पाई बल्कि धीरे से अपने हाथों से उस का चेहरा थपथपा दिया.

‘‘ऐसा लगता है, आज तक जितना जिया सब झूठ था. किसी ने मेरी छाती में से दिल ही खींच लिया है.’’

‘‘ऐसा मत सोचो, रवि. तुम्हारी मां जिंदा हैं. वे बीमार हैं. तुम कुछ नहीं खाते तो उन्होंने भी खानापीना छोड़ रखा है. उन के पास क्यों नहीं जाते? उन में तो तुम्हारे प्राण अटके हैं न? फिर क्यों उन्हें इस तरह सता रहे हो?’’

‘‘वे मेरी मां नहीं हैं, पिताजी ने बताया.’’

‘‘बताया, तो क्या जुर्म हो गया? एक सच बता देने से सारा जीवन मिथ्या कैसे हो गया?’’

‘‘क्या?’’ रवि टुकुरटुकुर उस का मुंह देखने लगा. क्षणभर को हाथों का दबाव गायत्री के शरीर पर कम हो गया.

‘‘वे मुझ बिन मां के बच्चे पर दया करती रहीं, अपने बचों के मुंह से छीन मुझे खिलाती रहीं, इतने साल मेरी परछाईं बनी रहीं. क्यों? दयावश ही न. वे मेरी सौतेली मां हैं.’’

‘‘दया इतने वर्षों तक नहीं निभाई जाती रवि, 2-4 दिन उन के साथ रहे हो क्या, जो ऐसा सोच रहे हो? वे बहुत प्यार करती हैं तुम से. अपने बच्चों से बढ़ कर हमेशा तुम्हें प्यार करती रहीं. क्या उस का मोल इस तरह सौतेला शब्द कह कर चुकाओगे? कैसे इंसान हो तुम?’’ एकाएक उसे परे हटा दिया गायत्री ने. बोली, ‘‘उन्हें सौतेला जान जो पीड़ा पहुंची थी, उस का इलाज उन्हीं की गोद में है रवि, जिन्होंने तुम्हें पालपोस कर बड़ा किया. मेरी गोद में नहीं जिस से तुम्हारी जानपहचान कुछ ही महीनों की है. तुम अपनी मां के नहीं हो पाए तो मेरे क्या होगे, कैसे निभाओगे मेरे साथ?’’

लपक कर उस का हाथ पकड़ लिया रवि ने, ‘‘मैं अपनी मां का नहीं हूं, तुम ने यह कैसे सोच लिया?’’

‘‘तो उन से बात क्यों नहीं करते? क्यों इतना रुला रहे हो उन्हें?’’

‘‘हिम्मत नहीं होती. उन्हें या भाईबहन को देखते ही कानों में सौतेला शब्द गूंजने लगता है. ऐसा लगता है मैं दया का पात्र हूं.’’

‘‘दया के पात्र तो वे सब बने पड़े हैं तुम्हारी वजह से. मन से यह वहम निकालो और मां के पास चलो. आओ मेरे साथ.’’

‘‘न,’’ रवि ने गरदन हिला दी इनकार में, ‘‘मां के पास नहीं जाऊंगा. मां के पास तो कभी नहीं…’’

‘‘इस की वजह क्या है, मुझे समझाओ? क्यों नहीं जाओगे उन के पास? क्या महसूस होता है उन के पास जाने से?’’ एकाएक स्वयं ही उस की बांह सहला दी गायत्री ने. निरीह, असहाय बालक सा वह अवरुद्ध कंठ और डबडबाए नेत्रों से उसे निहारने लगा.

‘‘तुम्हें 2 महीने का छोड़ा था तुम्हारी मां ने. उस के बाद इन्होंने ही पाला है न. तुम तो इन्हें अपना सर्वस्व मानते रहे हो. तुम ही कहते थे न, तुम्हारी मां जैसी मां किसी की भी नहीं हैं. जब वह सच सामने आ ही गया तो उस से मुंह छिपाने का क्या अर्थ? वर्तमान को भूत में क्यों मिला रहे हो? ‘‘अब तुम्हारा कर्तव्य शुरू होता है रवि, उन्हें अपनी सेवा से अभिभूत करना होगा. कल उन्होंने तुम्हें तनमन से चाहा, आज तुम चाहो. जब तुम निसहाय थे, उन्होंने तुम्हें गोद में ले लिया था. आज तुम यह प्रमाणित करो कि सौतेला शब्द गाली नहीं है. यह सदा गाली जैसा नहीं होता. बीमार मां को अपना सहारा दो रवि. सच को उस के स्वाभाविक रूप में स्वीकार करना सीखो, उस से मुंह मत छिपाओ.’’

‘‘मां मुझे इतना अधिक क्यों चाहती रहीं, गायत्री? मेरे मन में सदा यही भाव जागता रहा कि वे सिर्फ मेरी हैं. छोटे भाईबहन को भी उन के समीप नहीं फटकने दिया. मां ने कभी विरोध नहीं किया, ऐसा क्यों, गायत्री? कभी तो मुझे परे धकेलतीं, कभी तो कहतीं कुछ,’’ रवि फिर भावुक होने लगा.

‘‘हो सकता है वे स्वाभाविक रूप में ही तुम्हें ज्यादा स्नेह देती रही हों. तुम सदा से शांत रहने वाले इंसान रहे हो. उद्दंड होते तो जरूर डांटतीं किंतु बिना वजह तुम्हें परे क्यों धकेल देतीं.’’

‘‘गायत्री, मैं इतना बड़ा सच सह नहीं पा रहा हूं. मैं सोच भी नहीं सकता. ऐ लगता है, पैरों के नीचे से जमीन ही सरक गई हो.’’

‘‘क्या हो गया है तुम्हें, इतने कमजोर क्यों होते जा रहे हो?’’कुछ ऐसी स्थिति चली आई. शायद उस का यही इलाज भी था. स्नेह से गायत्री ने स्वयं ही अपने समीप खींच लिया रवि को. कोमल बाहुपाश में बांध लिया.भर्राए स्वर में गिला भी किया रवि ने, यही सब सुनाने तुम्हारे पास भी तो गया था. सोचा था, तुम से अच्छी कोई और मित्र कहां होगी, तुम ने सुना नहीं. मैं कितने दिन इधरउधर भटकता रहा. मैं कहां जाऊं, कुछ समझ नहीं पाता?’’

‘‘मां के पास चलो, आओ मेरे साथ. मैं जानती हूं, उन्हीं के पास जाने को छटपटा रहे हो. चलो, उठो.’’

रवि चुप रहा. भावी पत्नी की आंखों में कुछ ढूंढ़ने लगा.

गायत्री तनिक गुस्से से बोली, ‘‘जीवन में बहुतकुछ सहना पड़ता है. यह जरा सा सच नहीं सह पा रहे तो बड़ेबड़े सच कैसे सहोगे? आओ, मेरे साथ चलो?’’ रवि खामोशी से उसे घूरता रहा.

‘‘देखो, आज तुम्हारी मां इतनी मजबूर हो गई हैं कि मेरे सामने हाथ जोड़े हैं उन्होंने. तुम्हें समझाने के लिए मुझे बुला भेजा है. तुम तो जानते हो, हम लोगों में शादी से पहले एकदूसरे के घर नहीं जाते. परंतु मुझे बुलाया है उन्होंने, तुम्हें समझाने के लिए. अपनी मां का और मेरा मान रखना होगा तुम्हें. मेरे साथ अपनी मां और भाईबहन से मिलना होगा और बड़ा भाई बन कर उन से बात करनी होगी. उठो रवि, चलो, चलो न.’’ अपने अस्तित्व में समाए बालक समान सुबकते भावी पति को कितनी देर सहलाती रही गायत्री. आंचल से कई बार चेहरा भी पोंछा.

रवि उधेड़बुन में था, बोला, ‘‘मां मेरे पास क्यों नहीं आतीं, क्यों नहीं मुझे बुलातीं?’’

‘‘वे तुम्हारी मां हैं. तुम उन के बेटे हो. वे क्यों आएं तुम्हारे पास. तुम स्वयं ही रूठे हो, स्वयं ही मानना होगा तुम्हें.’’

‘‘पिताजी मां को मेरे कमरे में नहीं आने देना चाहते, मुझे पता है. मैं ने उन्हें मां को रोकते सुना है.’’

‘‘ठीक ही तो कर रहे हैं. उन की भी पत्नी के मानसम्मान का प्रश्न है. तुम उन के बच्चे हो तो बच्चे ही क्यों नहीं बनते. क्या यह जरूरी है कि सदा तुम ही अपना अधिकार प्रमाणित करते रहो? क्या उन्हें हक नहीं है?’’

बड़ी मुश्किल से गायत्री ने उसे अपने शरीर से अलग किया. प्रथम स्पर्श की मधुर अनुभूतियां एक अलग ही वातावरण और उलझे हुए वार्त्तालाप की भेंट चढ़ चुकी थीं. ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार उसे छुआ है. साधिकार उस का मस्तक चूम लिया गायत्री ने. गायत्री पर पूरी तरह आश्रित हो वह धीरे से उठा, ‘‘तुम भी साथ चलोगी न?’’

‘‘हां,’’ वह तनिक मुसकरा दी.

फिर उस का हाथ पकड़ सचमुच वह बीमार मां के समीप चला आया. अस्वस्थ और कमजोर मां को बांहों में बांध जोरजोर से रोने लगा.

‘‘मैं ने तुम से कितनी बार कहा है, तुम मुझे छोड़ कर कहीं मत जाया करो,’’ उसे गोद में ले कर चूमते हुए मां रोने लगीं. छोटी बहन और भाई शायद इस नई कहानी से पूरी तरह टूट से गए थे. परंतु अब फिर जुड़ गए थे. बडे़ भाई ने मां पर सदा से ही ज्यादा अधिकार रखा था, इस की उन्हें आदत थी. अब सभी प्रसन्न दिखाई दे रहे थे.

‘‘तुम कहीं खो सी गई थीं, मां. कहां चली गई थीं, बोलो?’’

पुत्र के प्रश्न पर मां धीरे से समझाने लगीं, ‘‘देखो रवि, सामने गायत्री खड़ी है, क्या सोचेगी? अब तुम बड़े हो गए हो.’’

‘‘तुम्हारे लिए भी बड़ा हो गया हूं क्या?’’

‘‘नहीं रे,’’ स्नेह से मां उस का माथा चूमने लगीं.

‘‘आजा बेटी, मेरे पास आजा,’’ मां ने गायत्री को पास बुलाया और स्नेह से गले लगा लिया. छोटा बेटा और बेटी भी मां की गोद में सिमट आए. पिताजी चश्मा उतार कर आंखें पोंछने लगे.गायत्री बारीबारी से सब का मुंह देखने लगी. वह सोच रही थी, ‘क्या शादी के बाद वह इस मां के स्नेह के प्रति कभी उदासीन हो पाएगी? क्या पति का स्नेह बंटते देख ईर्ष्या का भाव मन में लाएगी? शायद नहीं, कभी नहीं.’

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Cakey makeup fix : केकी मेकअप को आसानी से करें फिक्स

कई बार हम मेकअप करने में समय भी बहुत लगाते हैं और मेहनत भी बहुत करते हैं लेकिन मेकअप करने के बाद हमे लगता है कि ये मेकअप तो केकी हो गया है जोकि देखने में बहुत भद्दा लग रहा है. ऐसे में समझ नहीं आता कि अब इतने कम टाइम में हम इसे कैसे सही करें और मेकअप करते समय ऐसा क्या करें कि मेकअप करने के बाद वह केकी ना लगें.

दरअसल, ऐसा तब होता है जब हमने मेकअप प्रोडक्ट को फेस पर अच्छे से ब्लैंड ना किया हो या फिर गर्मी में पसीने की वजह से भी वो केकी हो जाये या फिर अच्छे प्रोडक्ट ना होने की वजह से भी मेकअप में दरारे पढ़ जाती है. इसलिए आज हम आपको बताते हैं कि मेकअप को कैसे फिक्स करें कि वह केकी ना लगें.

सबसे पहले अपनी स्किन को हाइड्रेटेड करें

केकी मेकअप से बचने के लिए सबसे पहले आप अपनी स्किन को अच्छी तरह से हाइड्रेटेड करें. इसके लिए हमेशा एक हाइड्रेटिंग क्लींजर का यूज करें, जो आपकी त्वचा को रूखा नहीं बनाता हो. सौम्य क्लींजर में हाइलूरोनिक एसिड और सेरामाइड्स जैसे हाइड्रेटिंग तत्व होते हैं, जो त्वचा की प्राकृतिक नमी को बनाए रखने में मदद करते हैं. त्वचा से गंदगी, तेल और मेकअप को साफ करने के लिए इसे हर सुबह और शाम इस्तेमाल करें. यह रूटीन मेकअप करने से पहले भी अपनाएं.

स्किन को एक्सफ़ोलिएट करें

हफ़्ते में कम से कम एक बार, अपनी त्वचा और रोमछिद्रों में जमा मृत त्वचा कोशिकाओं से छुटकारा पाने के लिए अपने पसंदीदा एक्सफ़ोलिएटर का इस्तेमाल करें.  एक्सफ़ोलिएट करने से बेजान और रूखे धब्बों में सुधार, त्वचा की बनावट को चिकना करने और एक बेदाग बेस बनाने में मदद मिल सकती है.

चेहरे को क्लींज़र से धोएं

मेकअप लगाने से पहले हमेशा अपने चेहरे को किसी अच्छे क्लींज़र से धोएं ताकि अतिरिक्त गंदगी, तेल और अन्य अशुद्धियां  दूर हो जाए. इससे यह सुनिश्चित होगा कि आपके पास मेकअप लगाने के लिए एक ताज़ा बेस होगा.

प्राइमर भी जरूर यूज करें

कई बार हम मॉइस्चराइजर के बाद प्राइमर को मिस करके फाउंडेशन लगाने लगते हैं लेकिन यह तरीका सही नहीं है. क्यूंकि प्राइमर एक ऐसा मेकअप प्रोडक्ट है, जो मेकअप के बाद स्किन पर क्रीज और लाइनों को क्रिएट करने से बचाता है, जो केकी मेकअप के अहम कारण होते हैं. जबकि प्राइमर स्किन को स्मूद बनाए रखता है, जिससे मेकअप के लिए स्किन चिकनी बनी रहती है.

अब फाउंडेशन को सही ढंग से लगाएं

कई बार हम फाउंडेशन की मोटी परत ले लेते हैं और उसे अच्छे से ब्लैंड भी नहीं करते जिससे बाद में वह पैच बनता है और अच्छा नहीं लगता है. इसका सही तरीका है फाउंडेशन को तब तक अच्छी तरह ब्लैंड करते रहें जब तक वह पूरी तरह स्किन में ऑब्जर्व ना हो जाये. लेकिन फिर भी बाद में वह केकी दिखता है, तो उसे एक नम ब्लेंडर से अच्छी तरह ब्लैंड करें. फाउंडेशन अप्लाई करते वक़्त अंडरआई और टी-ज़ोन को बिल्कुल अवॉइड न करें.

मेकअप को ब्लेंडिंग करने का सही तरीका अपनाएं

केक जैसी फिनिश को रोकने के लिए सही तरीके से ब्लेंडिंग करना बहुत जरूरी है। बेस्ट रिजल्ट के लिए ब्लेंडिंग ब्रश या ब्यूटी ब्लेंडर का इस्तेमाल करें। इसके लिए ब्लेंडर को पानी में भिगोएं और उसे अच्छे से निचोड़े। इसके बाद उसे टिशू पेपर में रैप करके एक्स्ट्रा पानी निकाल दें और उस पर फाउंडेशन लगाकर अच्छे से चारों तरफ ब्लैंड करें. इसके लिए जॉ-लाइन से शुरू करके ऊपर की ओर बढ़ते हुए प्रेस मोशन का उपयोग करें.

मेकअप प्रोडक्ट अपनी स्किन के अनुसार ही लें

अपनी स्किन टाइप को समझकर फाउंडेशन और कंसीलर इस्तेमाल करना सबसे जरूरी है. अगर आपकी स्किन ड्राई है, तो मेकअप खराब होने या पपड़ी बनने की संभावना उतनी ही होगी. आपको हाइड्रेटिंग कॉम्पोनेंट्स वाले ब्यूटी प्रोडक्ट का इस्तेमाल करना चाहिए, जैसे कि हयालूरोनिक एसिड, सेरामाइड्स और शीया बटर.  इसी तरह अगर स्किन ऑयली है तो उसी के अनुसार प्रोडक्ट यूज़ करें.ऑयली स्किन के लिए मैट (Matte) फाउंडेशन या पाउडर चुनें और सूखी त्वचा के लिए ड्यूई (Dewy) या क्रीम-बेस्ड फाउंडेशन चुनें.

मेकअप के लिए सेटिंग स्प्रे जरूर यूज करें

मेकअप खत्म करने के बाद, पूरे चेहरे पर सेटिंग स्प्रे का इस्तेमाल करें. यह सभी परतों को एक साथ “मेल्ट” करता है और एक नैचुरल , फ्लॉलेस फिनिश देता है. सेटिंग स्प्रे त्वचा को हाइड्रेट करके नमी को लॉक करते हैं और मेकअप को चेहरे पर सेट रखते हैं.

केकी मेकअप को फिक्स कैसे करें

कई बार मेकअप हम अधिक अप्लाई कर लेते हैं, ऐसे में उसे सेट करने के लिए कुछ महिलाएं टिश्यू पेपर का इस्तेमाल करती हैं. इसके लिए आप स्पंज की मदद से ब्लश, कॉम्पैक्ट पाउडर, कंसीलर आदि को निकालने की कोशिश करें. इसके लिए एक साफ स्पंज लें और उसपर थोड़ा पानी स्प्रे करें और उसे तब तक ब्लेंड करें, जब तक कि मेकअप लाइट ना हो जाए. इसके बावजूद अगर फेस पर अधिक मेकअप लगा रहा है तो एक टिश्यू पेपर लें और ब्लेंडर को उससे कवर कर दें. अब इससे अपनी फेस को ब्लेंड करें और मेकअप सेट कर दें.

अपने चेहरे पर थोड़ा हाइड्रेटिंग फेशियल मिस्ट (Hydrating Facial Mist) या सेटिंग स्प्रे (Setting Spray) स्प्रे करें. इससे फाउंडेशन या पाउडर थोड़ा पिघलकर त्वचा के साथ मिल जाता है और केकीपन कम होता इसके लिए ध्यान रखें, चेहरा गीला नहीं, बस हल्का नम होना चाहिए.

अगर आपने बहुत ज़्यादा पाउडर लगा लिया है, तो एक ब्लॉटिंग पेपर (Blotting Paper) या एक साफ टिश्यू पेपर लें. इसे हल्के हाथ से उन जगहों पर दबाएं, जहां बहुत ज़्यादा पाउडर दिख रहा है. यह अतिरिक्त पाउडर को हटा देगा.

अगर आपकी त्वचा तैलीय है, तो मेकअप को केक जैसा दिखने से बचाने के लिए, फ़ाउंडेशन से पहले मैटीफ़ाइंग प्राइमर का इस्तेमाल करें ताकि तेल मेकअप में मिलकर केक जैसा न लगे.

Cooking Skills: नई पीढ़ी के बच्चों के लिए सेल्फ कुकिंग क्यों है जरूरी

Cooking Skills: हाल ही में कलर्स टीवी शो ‘बिग बौस 19’ में प्रतियोगी 61 वर्षीय कुनिका और 30 वर्षीय तानिया के बीच एक मुद्दे पर बहस हो गई. बहस इस बात पर हुई कि कुनिका ने तानिया को इस बात पर झाड़ दिया कि 30 साल की उम्र में भी उस की मां ने उस को खाना बनाना तक नहीं सिखाया. बात छोटी सी थी लेकिन मुद्दा बहुत गंभीर है कि अमीर हो या गरीब, एक लड़की को खाना बनाना आना कितना जरूरी है, इनफैक्ट लड़की ही नहीं एक नवयुवक को भी खाना बनाना आना कितना जरूरी है? 30 वर्षीय तान्या को खाना बनाना न आने पर कुनिका द्वारा बेइज्जती करना कितना सही है?

आज के जमाने में जबकि सबकुछ रैडीमेड मिलता है और बच्चे भी पढ़ेलिखे और काबिल हैं और इतना तो कमा लेते हैं कि बाहर से खाना और्डर कर के भी खाना खा सकते हैं, रैडीमेड रेडी टू कुक वाले कई सारे प्रावधान हैं. इस के अलावा तुरंत खाना मंगाने के लिए कई सारे फूड ऐप जैसे स्वीगी और जोमैटो जैसे ऐप्स भी हैं. इस के अलावा कई सारे होटल और ढाबे भी हैं जहां दिनरात खाना उपलब्ध रहता है. खानेपीने को ले कर इतनी सारी व्यवस्था होने के बावजूद एक लड़की या एक लड़के का खाना बनाना आना इतना जरूरी क्यों है? बड़ी उम्र के लोगों का ऐसा मानना क्यों है कि कम से कम लड़कियों को बेसिक खाना बनाना आना चाहिए या आज की मां का भी मानना है की बेटी ही नहीं बेटे को भी बेसिक खाना जैसे दाल, चावल, रोटी, सब्जी बनाना आना जरूरी है.

सिर्फ आम लोग ही नहीं कई बौलीवुड सितारे भी अपने यूट्यूब चैनल के जरीए लोगों को खाना बनाना सिखाते हैं जबकि उन के पास मेड की कमी नहीं होती, फिर भी वे खुद अपने घर वालों के लिए समय निकाल कर भी खाना बनाना क्यों पसंद करते हैं? सवाल यह भी उठाता है कि आज के समय में मांबाप और बुजुर्गों के हिसाब से बच्चों को कम से कम बेसिक खाना बनाना आना क्यों जरूरी है? बेसिक खाना न बनाना आने पर किनकिन मुश्किलों से गुजरना पड़ सकता है और अगर बच्चों या यंग जैनरेशन को खाना बनाना आता है तो उस के क्या फायदे हैं? पेश हैं, इसी सिलसिले पर एक नजर :

खाना बनाना भी एक कला

जिस को यह कला आती है वह न तो कभी खुद भूखा रहता है और न ही किसी को भूखा रहने देता है. कई युवा पीढ़ी के लोग खाना बनाने वालों को कमतर आंकते हैं. उन के हिसाब से जो लोग खाना बनाते हैं वे डाउन मार्केट और नौकर टाइप होते हैं. अमीर व पढ़ेलिखे, बड़ी पोस्ट पर काम करने वाले लोग खाना बनाना नहीं पसंद करते और न ही उन्हें खाना बनाना आता है क्योंकि यह काम उन का नहीं बल्कि नौकरों का है.

इसी धारणा के तहत सिर्फ लड़के ही नहीं बल्कि कई सारी लड़कियों को भी खाना बनाना नहीं आता. ऐसे में जब शादी के बाद या अकेले रहने पर खाना बनाने की नौबत आ जाती है तो इन लड़कियों को दिन में तारे नजर आने लगते हैं.

ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है. पिछले कुछ सालों में कोविड के दौरान जब हर किसी को घर में कैद होना पड़ा था, सारे होटल बंद थे और घरों में कोई आजा नहीं सकता था, उस दौरान जिनजिन लोगों को खाना बनाना नहीं आता था वह मुसीबत में थे और घर में फाके के दिन गुजार रहे थे और जिन लोगों को खाना बनाना आता था वे अच्छीअच्छी डिश बना कर लौकडाउन में भी मजे कर रहे थे.

खाना न मिलने पर जब विदेश में बच्चे मां के हाथ का खाना खाने को तरसे

पढ़ाई या नौकरी के लिए जब युवा विदेश जाते हैं तो उन को मां के हाथ का खाना याद आता है, क्योंकि जो स्वाद मां के हाथ के खाने में बच्चों को मिलता है वह फाइव स्टार होटल में भी नहीं मिलता.

हमारे देश में भले ही खाना बनाने को ले कर कई सारी सुविधाएं हैं जैसे मेड, होटल, ढाबे, खाना मंगवाने वाले ऐप आदि, लेकिन विदेश में अगर लड़का या लड़की शिक्षा के लिए या नौकरी करने के लिए जाता है, तो उसे खाने को ले कर बहुत सारी दिक्कतें हो जाती हैं क्योंकि अगर और्डर कर के बाहर से मंगवाते हैं तो बहुत महंगा होता है और विदेश में नौकरों का सिस्टम नहीं होता. वहां पर खुद ही नौकर बनना पड़ता है और सारे काम खुद ही करने पड़ते हैं. ऐसे में अगर खुद खाना बनाना नहीं आता तो भूखे रहने की नौबत आ जाती है.

वहीं अगर बेसिक खाना भी बनाना आता है जैसे खिचड़ी, दालचावल आदि तो यह खाना बना कर पेट तो भरा ही जा सकता है.

भारत में खाने वाली चीजों से ज्यादा मेकिंग और डिलिवरी की कीमत

गौरतलब है कि खाने के आइटम की कीमत इतनी ज्यादा नहीं होती जितनी की डिलीवरी और पैकिंग की होती है, जैसेकि खाना भेजने वाले डिलिवरी बौय की फीस, डिलिवरी करने के लिए आए लड़के की बाइक या स्कूटर में भरे जाने वाले पैट्रोल की कीमत भी ग्राहकों से वसूली जाती है. इस के अलावा खाना न तो पूरी तरह ताजा होता है और न ही स्वास्थ्य के लिए लाभदायक क्योंकि बाहर के खाने में सोडा, तेल और मसाला ज्यादा मात्रा में डाला जाता है जो सेहत के लिए हानिकारक होता है. वहीं अगर घर में खाना बनाने की कला आती है तो झटपट कुछ ही मिनटों में ताजा और स्वादिष्ठ खाना तैयार हो जाता है.

बौलीवुड सितारे भी खाना बनाने की कला का प्रचार करते नजर आते हैं

कहते हैं कि मां के हाथ का बना खाना में जो स्वाद होता है वह फाइव स्टार होटल के खाने में भी नहीं होता. इस के पीछे खास वजह यह है कि मां जब अपने बच्चों के लिए खाना बनाती है तो वह पूरे दिल से बनती है. यही वजह है कि बच्चों को अपनी मां के हाथ का बना कुछ भी खाना अच्छा लगता है. बौलीवुड सितारे भी जो अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं वे कितने ही व्यस्त क्यों न हों अपने बच्चों के लिए खुद अपने हाथों से खाना बनाते हैं, जैसे निर्माता, निर्देशक व कोरियोग्राफर फराह खान और कौमेडी क्वीन कहलाने वाली भारती सिंह भी अपने बच्चों के लिए खुद खाना बनाती हैं.

बौलीवुड के यह सेलेब्स खाना बनाने की कला को मेडिटेशन भी मानते हैं, क्योंकि कुछ समय के लिए ही सही जब हम खाना बनाने में व्यस्त होते हैं तो सारी टैंशन और दुख भूल जाते हैं और अपना पूरा ध्यान खाना बनाने में ही लगा देते हैं. शायद यही वजह है कि फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई सारे लोग आजकल यूट्यूब चैनल पर खाना बनाना सिखा रहे हैं और कई सैलिब्रिटीज मांएं भी अपने बच्चों को खाना बनाना सिखाती हैं ताकि किसी भी सिचुएशन में उन के बच्चों को भूखा न रहना पड़े.

इन बातों से यही निष्कर्ष निकलता है कि खाना बनाने की कला सभी को आनी चाहिए ताकि अच्छा खाना खाने के लिए किसी पर निर्भर न रहना पड़े और मौका पड़ने पर खुद अच्छा खाना बना कर खाया जा सके. फास्ट फूड या बाहर के खाने पर निर्भर न होना पड़े जो सेहत के लिए तो हानिकारक है ही, गंभीर बीमारियों के आगमन के लिए भी खतरे का संकेत है.

Cooking Skills

Dark Lips: डार्क लिप्स को पिंक में बदलना अब है आसान

Dark Lips: कौरपोरेट सैक्टर में काम करने वाली खूबसूरत निशा के होंठ हमेशा काले रहते हैं, जिस से निशा को हमेशा पिंक कलर की लिपस्टिक या लिपबाम लगाने पड़ते थे, क्योंकि निशा के दोस्तों को लगता था कि वह धूम्रपान करती है, जबकि निशा को किसी प्रकार के नशे की लत नहीं थी.

निशा ने कई घरेलू नुसखे अपनाए. फिर एक दिन वह किसी फ्रैंड की सलाह पर कौस्मेटिक्स सर्जन के पास गई और लिप लाइटनिंग लेजर ट्रीटमैंट करवाई. आज उसे गुलाबी होंठ पाने के लिए अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती. उस के होंठ प्राकृतिक रूप से गुलाबी दिखते हैं. वह इस मेकओवर से काफी खुश है.

क्या है लिप लाइटनिंग लेजर ट्रीटमैंट

असल में लिप लाइटनिंग लेजर ट्रीटमैंट एक कौस्मेटिक प्रक्रिया है, जिस में लेजर तकनीक का उपयोग कर के होंठों का रंग हलका किया जाता है. इस का उद्देश्य पिगमैंटेशन को कम करना और होंठों के प्राकृतिक गुलाबी या गुलाबी रंग को निखारना होता है, लेकिन यह लास्ट औप्शन होता है, मगर इस से पहले होंठ काले होने की वजह के बारे में जानना बहुत जरूरी है.

इस बारे में मुंबई की कोकिलाबेन धीरुबाई अंबानी के प्लास्टिक सर्जन डा. काजी गजवान अहमद कहते हैं कि गुलाबी होंठों की सुंदरता को हर लड़की पसंद करती है. होंठों का कालापन कई वजहों से होता है :

-प्रदूषण.

-सूर्य की हानिकारक किरणें.

-डिहाइड्रेशन.

-विटामिन बी12 या आयरन की कमी.

-जैनेटिक हार्मोनल बदलाव.

-धूम्रपान.

-कुछ दवाओं का सेवन आदि.

इस के अलावा, ऐलर्जी, सस्ती कौस्मेटिक उत्पादों के उपयोग से भी होंठ काले पङ सकते हैं. घरेलू नुसखे से इसे कम नहीं किया जा सकता है.

लाइफस्टाइल है जिम्मेदार

अधिकतर लड़कियां आउटडोर जौब या शूटिंग का काम करती हैं, तो उन का सन ऐक्स्पोजर अधिक होता है, साथ ही कैफीन के शौकीन या लिप को बाइट करने की आदत वालों के होंठ काले हो सकते हैं. कुछ को हार्मोनल बदलाव की वजह से पहले गुलाबी, बाद में होंठ पर ब्लैक पैचेस आ जाते हैं.

इस के अलावा होंठों की त्वचा पतली और नाजुक होती है. इस में औयल ग्लैंड्स नहीं होते और होंठ जल्दी ड्राई हो जाते हैं और आसानी से फटने लगते हैं. कई बार आप ने देखा होगा कि ठंड के मौसम में कभीकभी ऊपरी होंठ निचले होंठ की तुलना में अधिक डार्क हो जाता है, ऐसे में ऊपरी और निचला होंठ एकजैसा नहीं दिखता. कई बार ऐसे लिप्स पर लिपस्टिक लगाना मुश्किल हो जाता है.

बदलें जीवनचर्या को

इस के आगे डाक्टर कहते हैं कि होंठों को गुलाबी बनाने के लिए लिप लाइटनिंग लेजर सर्जरी है, लेकिन पहले लाइफस्टाइल को थोड़ा बदल कर देखना पड़ता है, जिस में स्मोकिंग को अवौइड करना, हाइड्रैशन को थोड़ा बढ़ा कर इसे ठीक करने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि प्राकृतिक रूप से इसे ठीक किया जा सके.

लिप्स के लिए मोइश्चराइजर का प्रयोग सब से अच्छा विकल्प होता है. इस के अलावा अच्छे लिपबाम, जिस में एसपीएफ 15 से 20 तक का हो, उस का प्रयोग हमेशा लिप्स पर करते रहना चाहिए, ताकि सन ऐक्सपोजर से लिप्स काले न पड़ जाएं. साथ ही कुछ मैडिकेटेड क्रीम होते हैं, जो डाक्टर की सलाह से लेना जरूरी होता है. ट्रोपिकल क्रीम से अगर लिप्स गुलाबी नहीं हुए, तो कैमिकल पीलिंग किया जाता है, इस से लिप्स की सुपरफिसियल लेयर निकल जाती है और अंदर की पिंक स्किन बाहर निकल आती है. यह प्रोसेस काफी इफैक्टिव होती है, इस का सहारा ले लेना चाहिए.

कैमिकल पील के बाद सन प्रोटेक्शन क्रीम का प्रयोग करना बहुत जरूरी होता है. नहीं तो फिर से होंठ काले पङ जाने का चांस रहता है.

लेजर सर्जरी का लें सहारा

इन सभी प्रोसेस से अगर कुछ फायदा नहीं होता है, तो लेजर सर्जरी का सहारा लेना पड़ता है. इस में लिप्स का अधिक उभरा होना, अनइवन होना या डार्क होना ठीक किए जाते हैं. लेजर सर्जरी और कैमिकल पील में थोड़ा डिसकम्फर्ट रहता है. सर्जरी से पहले सुपर फिसियल क्रीम लगा कर लिप्स को थोड़ी देर के लिए नम कर दिया जाता है, ताकि अधिक डिसकम्फर्ट न हो. यह कोई पैनफुल प्रक्रिया नहीं है और ओपीडी बेस्ड है और 2 से 3 घंटे में पूरा हो जाता है. इस के बाद इन्फैक्शन प्रिवेंट के लिए 4 से 5 दिन मैडिसीन दिया जाता है. 3 महीना सनस्क्रीन लगाना चाहिए और लिपबाम एसपीएफ वाला लगाना पड़ता है, ताकि फिर से लिप्स डार्क न हों.

डाक्टर कहते हैं कि लिप सर्जरी के बाद भी अधिक सन ऐक्सपोजर होने से फिर से लिप्स डार्क हो सकते हैं. इसलिए सावधानी बरतनी जरूरी है. आज की 20 से 40 साल की लड़कियां और लड़के सभी लिप्स के डार्कनैस को हटाने के लिए मेरे पास आते हैं. पहले केवल कलाकार ही आते थे, आम लोगों में जागरूकता नहीं थी, लेकिन आज की हर लड़की और लड़का अपने लुक को ले कर काफी जागरूक हैं और चेहरे पर आए किसी भी अनइवन को हटाना पसंद करते हैं, जो उन के पर्सनैलिटी को निखारता है. इस का खर्चा अधिक नहीं आता, ₹20 से 40 हजार के बीच में लिप लेजर सर्जरी हो जाया करती है.

न करें अनदेखा

इस सर्जरी को करवाते वक्त कुछ बातों का हमेशा ध्यान रखना आवश्यक होता है :

-जिन्हें किसी प्रकार की ऐलर्जी हो,

-ऐक्टिव इन्फैक्शन होने के चांसेस हों.

-मुंह के अंदर छाले हों, तो उसे ठीक कराने के बाद सर्जरी कराना आदि.

इस प्रकार डार्क लिप के किसी भी प्रोसेस को एक अच्छे और अनुभवी डाक्टर से कराएं, ताकि बाद में इन्फैक्शन का खतरा न हो और आप एक खूबसूरत पिंक लिप्स की हकदार बनें.

Dark Lips

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