‘‘अरे यार, लगता है यह सरस्वती टंकी का पूरा पानी खाली कर के ही बाहर निकलेगी.’’
‘‘क्यों परेशान हो रही हो रूपा. तुझे तो पता ही है, यह तो इस का रोज का काम है,’’ मेरी हालत पर तरस खाने की जगह ज्योत्सना मंदमंद मुसकरा रही थी.
‘‘हांहां क्यों नहीं, खुश हो ले तू. खुश होने का तु झे पूरा अधिकार है, आज मु झ से पहले नहा कर तूने बाजी जो मार ली है,’’ बाथरूम के अंदर से लगातार आने वाली सरस्वती के गाने की आवाज से मैं पहले ही चिढ़ी हुई थी ज्योत्सना की बातों ने मु झे और भी चिढ़ा दिया.
लखनऊ के गर्ल्स पीजी होस्टल में अपने कमरे के अटैच्ड बाथरूम के बाहर नहाने जाने के लिए काफी देर से इंतजार कर रही थी. गरमी और पसीने से मेरा बुरा हाल हुआ जा रहा था.
‘‘उफ, कितनी गरमी है, ऊपर से बिजली भी नहीं है. गरमी और पसीने से परेशान मैं खिड़की से लगे बिस्तर पर आ बैठी.
‘‘सरस्वती की बच्ची बाहर आ कर गाने का जितना भी रियाज करना है कर लेना. तुम्हारे ‘राग दीपक’ ने पूरे शहर का तापमान बढ़ा दिया है, सच में कितनी गरमी पड़ रही है यार, अरी ओ तानसेन की 5वीं औलाद निकलती है या नहीं,’’ गुस्से से मैं ने शैंपू का बोतल दरवाजे पर चला फेंकी.
‘‘शैंपू के लिए थैंक यू… और हां, तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं, तानसेन की बेटी सरस्वती ने राग दीपक नहीं ‘मेघ मल्हार’ गाया था. तौलिए में लिपटी हुई सरस्वती ने झटके से दरवाजा खोला और मेरे द्वारा फेंकी गई शैंपू की बोतल कैच कर के वापस बाथरूम का दरवाजा बंद कर लिया.
‘‘उफ, इतनी देर से यह बाथरूम में सिर्फ गाना गा रही थी,’’ मैं ने अपना सिर पकड़ लिया, ‘‘सच में, सिरदर्द है यह लड़की.’’
‘‘जस्ट चिल यार, इस की तो रोज की आदत है, जब तक बाथरूम में जीभर के गाना नहीं गा लेती इसे चैन नहीं मिलता, तू तो बस गाना ऐंजौय कर,’’ ज्योत्सना ने हंसते हुए कहा.
ज्योत्सना आईने के सामने बैठी साजशृंगार में व्यस्त थी. मैं ने नोटिस किया, मैडम आज कुछ अलग ही दिख रही है. ग्रीन कलर के प्रिंटेड कुरता सैट और मैचिंग इयररिंग्स में आज तो गजब ढा रही थी मैडम.
‘‘आज कहां बिजली गिराने का इरादा है?’’
‘‘यहीं, इसी कमरे में, बिजली के चले जाने से तू कितनी परेशान है न,’’ उस ने पिंक कलर की लिपस्टिक अपने होंठों पर लगाते हुए कहा.
कमरे से बाहर जाने के लिए ज्योत्सना जैसे ही दरवाजे के पास आई, मेरी नजर उस के सैंडलों पर पड़ी.
‘‘एक मिनट, रुकना तो जरा.’’
‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ ज्योत्सना ने बनावटी आश्चर्य दिखाते हुए कहा.
‘‘क्या हुआ की बच्ची,’’ मैं ने गुस्से में तेवर दिखाए.
‘‘क्या मैं जान सकती हूं कि मैडम ने बिना इजाजत मेरे सैंडल किस खुशी में पहने?’’
‘‘प्लीज यार रूपाली, बस आज के लिए अपने सैंडल पहनने दे मु झे. देख, मेरी ड्रैस से मैच कर रहे हैं ये. तू मेरी वाले पहन लेना, सिर्फ आज के लिए यार,’’ ज्योत्सना ने विनती के स्वर में कहा.
‘‘चल ठीक है पहन ले, तू भी क्या याद रखेगी,’’ मैं ने बड़ा दिल दिखाते हुए कहा.
‘‘वैसे आज क्या खास बात है, जो मैडम ने इतना शृंगार किया हुआ है… अच्छा, अब सम झी. तेरा लैपटौप फिर से खराब हो गया है, कितने बजे आ रहा है वह, तेरा लैपटौप ठीक करने?’’ मैं ने शरारत में हंसते हुए उस के कमर पर चुटकी काटी.
‘‘कुछ घंटों में, लेकिन क्या फायदा अपनी खड़ूस वार्डन मिस लल्ली है न निगरानी करने के लिए, गजब की खड़ूस है यार, पलभर के लिए भी वह हम दोनों को अकेला नहीं छोड़ती, जब तक वह मेरा लैपटौप ठीक करता है, वहीं बैठ कर हम पर नजर रखती है. सिर्फ नजरें ही चार हो पाती हैं,’’ ज्योत्सना ने ठंडी आह भरते हुए कहा.
‘‘तुम आकाश को मिलने के लिए कहीं बाहर क्यों नहीं बुलाती?’’
‘‘डरती हूं, उस बेचारे पर कहीं कोई मुसीबत न आ जाए, उस के लिए ही तो कानपुर छोड़ कर उस के पीछेपीछे मैं लखनऊ आ गई, मेरी ऊंची जाति का होना हम दोनों के बीच सब से बड़ी दीवार बन गया है. तू ही बता रूपा, आकाश यदि निचली जाति का है तो उस में उस का क्या कुसूर है? कसूर तो समाज का है न जिस ने उच्चनीच की दीवारें खड़ी कीं.’’
‘‘अरी ओ लड़कियो, बस 15 मिनट, ठीक 15 मिनट बाद पानी की सप्लाई बंद कर दी जाएगी. 15 मिनट में जिसे भी नहाना है नहा ले, बिजली की कट औफ के कारण मोटर चालू नहीं हो सकी है, टंकी में पानी कम है,’’ हमारे गर्ल्स पीजी होस्टल की वार्डन ने जब सीढि़यां चढ़ते हुए आवाज लगाई तो मैं बाथरूम की तरफ भागी. सरस्वती बाथरूम से बाहर आ चुकी थी. मैं सरस्वती के साथ ही कालेज के लिए निकलती थी. ज्योत्सना हम से सीनियर थी.
नहाने की बाद जब मैं बाहर आई तो देखा सरस्वती अभी भी अपनी सुरीली आवाज में कोई गीत गुनगुना रही थी.
‘‘कसम से तुम्हारी आवाज में जादू है. यार सरस्वती, जब तु झे गाने का इतना शौक है तो फिर मैडिकल लाइन में जाने के लिए अपना दिमाग क्यों खपा रही है, ऐसी भी क्या मजबूरी है.’’
‘‘छोड़ो, जाने दो रूपा, फिर कभी बताऊंगी. इस विषय पर मु झ से अभी कोई चर्चा मत करो,’’ सरस्वती की आंखों में आंसू भर आए.
लखनऊ के कृष्णा नगर में हमारा पीजी होस्टल था. होस्टल की दूसरी मंजिल पर हमारा कमरा था. पहली मंजिल में डाइनिंग एरिया के साथ रसोईघर और होस्टल वार्डन ललिता का बड़ा सा कमरा था. हम लड़कियां उन के पीठ पीछे उन्हें लली कह कर उन का मजाक उड़ाते थे. ललिता ने शादी नहीं की थी. शादी नहीं करने के पीछे उन का अपना व्यक्तिगत कारण था. 45 की उम्र में वह 25 की दिखने की कोशिश करती थी.
‘‘फिर से वही आलू की सब्जी,’’ नाश्ते की प्लेट को देखते ही मैं ने नाकभौं सिकोड़ लिए.
‘‘सिर्फ आलू की सब्जी नहीं है, आलूमटर की सब्जी है, तुम्हें मटर नहीं दिखाई दे रहे?’’ वार्डन ने ऊंचे स्वर में लगभग फटकार लगाते हुए कहा.
‘‘कहां है मटर. हमें तो नहीं दिख रहे,’’ सरस्वती ने चम्मच को कटोरे में गोलगोल घूमते हुए पूछा.
‘‘आलू भी कहां हैं, बस रस दिख रहा है जिस में न तो मिर्च है और न ही मसाला, मु झ से तो नहीं खाया जा रहा,’’ मैं ने गुस्से में प्लेट को आगे की तरफ सरका दिया.
‘‘यहां और भी लड़कियां रहती हैं उन में से तो किसी ने शिकायत नहीं की. सब ने बड़े चाव से खाना खाया, बस तुम्हीं दोनों के नखरे हैं. खाना है तो खाओ वरना भूखी रहो.’’
‘‘अचार मिल सकता है?’’ मैं ने प्लेट वापस अपनी तरफ खींचते हुए पूछा.
‘‘नहीं मिल सकता है, अचार खत्म हो गया है,’’ लली ने बड़ी बेरुखी से उत्तर दिया. बिना तीखा खाए ही मेरी आंखों में पानी भर आया. बड़े ही दुखी मन से हम दोनों ने नाश्ता जैसेतैसे खत्म किया और कालेज के लिए निकल पड़े.
आंखें भर आई थीं मेरी. आज मां के हाथों के बने लजीज खाने का स्वाद बहुत याद आ रहा था. सोच रही थी यह कैसी आजादी जिस में ढंग का खाना भी नहीं मिलता. इस से अच्छा तो हमारा बनारस ही था.
यह अलग बात है कि वहां मु झे कैदियों जैसी फीलिंग आती थी. पिताजी की सख्ती और उन के नियमकायदों ने पूरे घर को जेलखाने में तबदील कर दिया था.
मु झे अकसर मां पर हैरानी होती थी, आखिर वे पिताजी की इतनी अधिक ज्यादतियों को बरदाश्त क्यों करती हैं. मां को कहीं भी अकेले आनेजाने की इजाजत नहीं थी कि जो कुछ पहनतीं पिताजी की पसंद की पहनतीं. यहां तक कि खाना बनाने से ले कर खाने तक में पिताजी की ही पसंद होती. पिताजी के ही सिखाए हुए नियमकायदे को जीवन जीने का ढंग सम झतीं. मर्यादा के नाम पर उन के इर्दगिर्द ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी गई थी जिसे पार कर पाने की वे हिम्मत तक नहीं जुटा पाती थीं.
‘‘जरूरत से अधिक शिक्षा लड़कियों का दिमाग खराब कर देती है, अधिक पढ़ीलिखी लड़कियां न तो घर की रहती है न ही घाट की. बड़ेबुजुर्गों ने ऐसे ही नहीं कहा था कि लड़कियों को उतनी ही शिक्षा दो जितने में वे अपनी गृहस्थी संभाल सकें. देख लो पढ़ाने का नतीजा, 1 साल भी नहीं हुआ सुचिता ससुराल को छोड़ कर मायके आ गई, अपने पति से तलाक की मांग कर रही है, सत्यानाश हो ऐसी शिक्षा का. ये संस्कार दिए हैं हम ने,’’ पिताजी का क्रोधपूर्ण भाषण सुन कर मां सहम गई थीं, लेकिन मु झे बहुत तेज गुस्सा आया था.
‘‘अभि, मैं आज कालिज नहीं आ रही. प्लीज, मेरा इंतजार मत करना.’’
‘‘क्यों? क्या हुआ वेदश्री. कोई खास समस्या है?’’ अभि ने एकसाथ कई प्रश्न कर डाले.
‘‘हां, अभि. मानव की आंखों की जांच के लिए उसे ले कर डाक्टर के पास जाना है.’’
‘‘क्या हुआ मानव की आंखों को?’’ अभि की आवाज में चिंता घुल गई.
‘‘वह कल शाम को जब स्कूल से वापस आया तो कहने लगा कि आंखों में कुछ चुभन सी महसूस हो रही है. रात भर में उस की दाईं आंख सूज कर लाल हो गई है.
आज साढ़े 11 बजे का
डा. साकेत अग्रवाल से समय ले रखा है.’’
‘‘मैं तुम्हारे साथ चलूं?’’ अभि ने प्यार से पूछा.
‘‘नहीं, अभि…मां मेरे साथ जा रही हैं.’’
डा. साकेत अग्रवाल के अस्पताल में मानव का नाम पुकारे जाने पर वेदश्री अपनी मां के साथ डाक्टर के कमरे में गई.
डा. साकेत ने जैसे ही वेदश्री को देखा तो बस, देखते ही रह गए. आज तक न जाने कितनी ही लड़कियों से उन की अपने अस्पताल में और अस्पताल के बाहर मुलाकात होती रही है, लेकिन दिल की गहराइयों में उतर जाने वाला इतना चित्ताकर्षक चेहरा साकेत की नजरों के सामने से कभी नहीं गुजरा था.
वेदश्री ने डाक्टर का अभिवादन किया तो वह अपनेआप में पुन: वापस लौटे.
अभिवादन का जवाब देते हुए डाक्टर ने वेदश्री और उस की मां को सामने की कुरसियों पर बैठने का इशारा किया.
मानव की आंखों की जांच कर
डा. साकेत ने बताया कि उस की दाईं आंख में संक्रमण हो गया है जिस की वजह से यह दर्द हो रहा है. आप घबराइए नहीं, बच्चे की आंखों का दर्द जल्द ही ठीक हो जाएगा पर आंखों के इस संक्रमण का इलाज लंबा चलेगा और इस में भारी खर्च भी आ सकता है.
हकीकत जान कर मां का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. वेदश्री मम्मी को ढाढ़स बंधाने का प्रयास करती हुई किसी तरह घर पहुंची. पिताजी भी हकीकत जान कर सकते में आ गए.
वेदश्री ने अपना मन यह सोच कर कड़ा किया कि अब बेटी से बेटा बन कर उसे ही सब को संभालना होगा.
मानव जैसे ही आंखों में चुभन होने की फरियाद करता वह तड़प जाती थी. उसे मानव का बचपन याद आ जाता.
उस के जन्म के 15 साल के बाद मानव का जन्म हुआ था. इतने सालों के बाद दोबारा बच्चे को जन्म देने के कारण मां को शर्मिंदगी सी महसूस हो रही थी. वह कहतीं, ‘‘श्री…बेटा, लोग क्या सोचेंगे? बुढ़ापे में पहुंच गई, पर बच्चे पैदा करने का शौक नहीं गया.’’
‘‘मम्मा, आप ऐसा क्यों सोचती हैं.’’ वेदश्री ने समझाते हुए कहा, ‘‘आप ने मुझे राखी बांधने वाला भाई दिया है, जिस की बरसों से हम सब को चाहत थी. आप की अब जो उम्र है इस उम्र में तो आज की आधुनिक लड़कियां शादी करती दिखाई देती हैं…आप को गलतसलत कोई भी बात सोचने की जरूरत नहीं है.’’
गोराचिट्टा, भूरी आंखों वाला प्यारा सा मानव, अभी तो आंखों में ढेर सारा विस्मय लिए दुनिया को देखने के योग्य भी नहीं हुआ था कि उस की एक आंख प्रकृति के सुंदरतम नजारों को अपने आप में कैद करने में पूर्णतया असमर्थ हो चुकी थी. परिवार में सब की आंखों का नूर अपनी खुद की आंखों के नूर से वंचित हुआ जा रहा था और वे कुछ भी करने में असमर्थ थे.
‘‘वेदश्रीजी, कीटाणुओं के संक्रमण ने मानव की एक आंख की पुतली पर गहरा असर किया है और उस में एक सफेद धब्बा बन गया है जिस की वजह से उस की आंख की रोशनी चली गई है. कम उम्र का होने के कारण उस की सर्जरी संभव नहीं है.’’
15 दिन बाद जब वह मानव को ले कर चेकअप के लिए दोबारा अस्पताल गई तब डा. साकेत ने उसे समझाते हुए बताया तो वह दम साधे उन की बातें सुनती रही और मन ही मन सोचती रही कि काश, कोई चमत्कार हो और उस का भाई ठीक हो जाए.
‘‘लेकिन उचित समय आने पर हम आई बैंक से संपर्क कर के मानव की आंख के लिए कोई डोनेटर ढूंढ़ लेंगे और जैसे ही वह मिल जाएगा, सर्जरी कर के उस की आंख को ठीक कर देंगे, पर इस काम के लिए आप को इंतजार करना होगा,’’ डा. साकेत ने आश्वासन दिया.
वेदश्री भारी कदमों और उदास मन से वहां से चल दी तो उस की उदासी भांप कर साकेत से रहा न गया और एक डाक्टर का फर्ज निभाते हुए उन्होंने समझाया, ‘‘वेदश्रीजी, मुझे आप से पूरी हमदर्दी है. आप की हर तरह से मदद कर के मुझे बेहद खुशी मिलेगी. प्लीज, मेरी बात को आप अन्यथा न लीजिएगा, ये बात मैं दिल से कह रहा हूं.’’
‘‘थैंक्स, डा. साहब,’’ उसे डाक्टर का सहानुभूति जताना उस समय सचमुच अच्छा लग रहा था.
मानव की आंख का इलाज संभव तो था लेकिन दुष्कर भी उतना ही था. समय एवं पैसा, दोनों का बलिदान ही उस के इलाज की प्राथमिक शर्त बन गए थे.
पिताजी अपनी मर्यादित आय में जैसेतैसे घर का खर्च चला रहे थे. बेटे की तकलीफ और उस के इलाज के खर्च ने उन्हें उम्र से पहले ही जैसे बूढ़ा बना दिया था. उन का दर्द महसूस कर वेदश्री भी दुखी होती रहती. मानव की चिंता में उस ने कालिज के अलावा और कहीं आनाजाना कम कर दिया था. यहां तक कि अभि जिसे वह दिल की गहराइयों से चाहती थी, से भी जैसे वह कट कर रह गई थी.
डा. साकेत अग्रवाल शायद उस की मजबूरी को भांप चुके थे. उन्होंने वेदश्री को ढाढ़स बंधाया कि वह पैसे की चिंता न करें, अगर सर्जरी जल्द करनी पड़ी तो पैसे का इंतजाम वह खुद कर देंगे. निष्णात डाक्टर होने के साथसाथ साकेत एक सहृदय इनसान भी हैं.
दरअसल, साकेत उम्र में वेदश्री से
2-3 साल ही बड़े होंगे. जवान मन का तकाजा था कि वह जब भी वेदश्री को देखते उन का दिल बेचैन हो उठता. वह हमेशा इसी इंतजार में रहते कि कब वह मानव को ले कर उस के पास आए और वह उसे जी भर कर देख सकें. न जाने कब वेदश्री डा. साकेत के हृदय सिंहासन पर चुपके से आ कर बैठ गई, उन्हें पता ही नहीं चला. तभी तो साकेत ने मन ही मन फैसला किया था कि मानव की सर्जरी के बाद वह उस के मातापिता से उस का हाथ मांग लेंगे.
उधर वेदश्री डा. साकेत के मन में अपने प्रति उठने वाले प्यार की कोमल भावनाओं से पूरी तरह अनभिज्ञ थी. वह अभिजीत के साथ मिल कर अपने सुंदर सहजीवन के सपने संजोने में मगन थी. उस के लिए साकेत एक डाक्टर से अधिक कुछ भी न थे. हां, वह उन की बहुत इज्जत करती थी क्योंकि उस ने महसूस किया था कि डा. साकेत एक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी होने के साथसाथ नेक दिल इनसान भी हैं.
समय अपनी चाल से चलता रहा और देखते ही देखते डेढ़ वर्ष का समय कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. एक दिन फोन की घंटी बजी तो अभिजीत का फोन समझ कर वेदश्री ने फोन उठा लिया और ‘हैलो’ बोली.
‘‘वेदश्रीजी, डा. साकेत बोल रहा हूं. मैं ने यह बताने के लिए आप को फोन किया है कि यदि आप मानव को ले कर कल 12 बजे के करीब अस्पताल आ जाएं तो बेहतर होगा.’’
साकेत चाहता तो अपनी रिसेप्शनिस्ट से फोन करवा सकता था, लेकिन दिल का मामला था अत: उस ने खुद ही यह काम करना उचित समझा.
‘‘क्या कोई खास बात है, डाक्टर साहब,’’ वेदश्री समझ नहीं पा रही थी कि डाक्टर ने खुद क्यों उसे फोन किया. उसे लगा जरूर कोई गंभीर बात होगी.
‘‘नहीं, कोई ऐसी खास बात नहीं है. मैं ने तो यह संभावना दर्शाने के लिए आप के पास फोन किया है कि शायद कल मैं आप को एक बहुत बढि़या खबर सुना सकूं, क्योंकि मैं मानव को ले कर बेहद सकारात्मक हूं.’’
‘‘धन्यवाद, सर. मुझे खुशी है कि आप मानव के लिए इतना सोचते हैं. मैं कल मानव को ले कर जरूर हाजिर हो जाऊंगी, बाय…’’ और वेदश्री ने फोन रख दिया.
वेदश्री की मधुर आवाज ने साकेत को तरोताजा कर दिया. उस के होंठों पर एक मीठी मधुर मुसकान फैल गई.
मानव का चेकअप करने के बाद डा. साकेत वेदश्री की ओर मुखातिब हुए.
‘‘क्या मैं आप को सिर्फ ‘श्री…जी’ कह कर बुला सकता हूं?’’ डा. साकेत बोले, ‘‘आप का नाम सुंदर होते हुए भी मुझे लगता है कि उसे थोड़ा छोटा कर के और सुंदर बनाया जा सकता है.’’
‘‘जी,’’ कह कर वेदश्री भी हंस पड़ी.
‘‘श्रीजी, मेरे खयाल से अब मानव की सर्जरी में हमें देर नहीं करनी चाहिए और इस से भी अधिक खुशी की बात यह है कि एशियन आई इंस्टीट्यूट बैंक से हमें मानव के लिए योग्य डोनेटर मिल गया है.’’
‘‘सच, डाक्टर साहब, मैं आप का यह ऋण कभी भी नहीं चुका सकूंगी,’’ उस की आंखों में आंसू उभर आए.
डा. साकेत के हाथों मानव की आंख की सर्जरी सफलतापूर्वक संपन्न हुई. परिवार के लोग दम साधे उस की आंख की पट्टी खुलने का इंतजार कर रहे थे.
आगे पढ़ें- वेदश्री बिना किसी बोझ के बेहद…
जब राशि की आंखें खुलीं तो उस ने खुद को अस्पताल के बैड पर पाया. उसे शरीर में कमजोरी महसूस हो रही थी. इसलिए उस ने फिर आंखें मूंद लीं. जब उस ने अपने दिमाग पर जोर डाला तो उसे याद आया कि उस ने तो नींद की गोलियां खा कर अपनी जीवनलीला समाप्त करने की कोशिश की थी, लेकिन वह बच कैसे गई. तभी किसी की पदचाप से उस की तंद्रा भंग हुई. उस के सामने डाक्टर रंजना खड़ी थीं.
‘‘अब कैसी हो तुम?’’ वे उस का चैकअप करते हुए उस से पूछ बैठीं.
‘‘ठीक हूं डाक्टर,’’ वह धीमे स्वर में बोली.
फिर डाक्टर रंजना सामने खड़ी नर्स को कुछ हिदायतें दे कर चली गईं. लेकिन राशि न चाहते हुए भी अतीत के सागर में गोते खाने लगी और रोहन को याद कर के फूटफूट कर रो पड़ी. थोड़ी देर रो लेने के बाद उस का जी हलका हुआ और वह न चाहते हुए भी फिर से यादों के मकड़जाल में उलझ कर रह गई. फिर उसे अपने कालेज के मस्ती भरे दिन याद आने लगे जब वह और उस के 2 दोस्त रोहन और कपिल कालेज में मस्ती करते थे. रोहन मध्यवर्गीय परिवार का सुंदर नौजवान था और कपिल रईस परिवार का गोलमटोल युवक था. ‘मुझ से शादी करेगी तो मुनाफे में रहेगी,’ कपिल उसे अकसर छेड़ते हुए कहता, ‘मैं गोलू हूं तो क्या हुआ? पर देख लेना, जिस दिन तूने इस रिश्ते के लिए हामी भर दी, उस दिन से मेरी डाइटिंग चालू हो जाएगी.’
‘यह मुंह और मसूर की दाल,’ राशि कपिल का मजाक उड़ाते हुए कहती, ‘मैं अर्धांगिनी बनूंगी तो सिर्फ रोहन की, क्योंकि मेरे मन में तो उसी की तसवीर बसी हुई है.’ फिर मजाकमजाक में सभी जोर से हंस देते. पर कालेज खत्म होने के बाद राशि और रोहन अपने रिश्ते को ले कर काफी संजीदा हो उठे थे. लेकिन शादी से पहले जरूरी था कि रोहन अपने पैरों पर खड़ा हो जाए ताकि वह राशि का हाथ मांग सके. वैसे रोहन आगे बढ़ने के लिए हाथपांव तो मार रहा था, पर उसे सफलता नहीं मिल पा रही थी. सरकारी जौब पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना बहुत जरूरी था. अब 3 बहनों के इकलौते भाई के पास इतनी जमापूंजी तो थी नहीं कि वह प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अच्छी कोचिंग ले पाता. वैसे उस के पापा अपने स्तर पर उस की मदद को तो तत्पर रहते थे, पर बढ़ती महंगाई ने उन के हाथ बांध रखे थे.
तब ऐसे में राशि ने ही रोहन की मदद का बीड़ा उठा लिया था. वैसे तो राशि भी आगे पढ़ना चाहती थी और आगे बढ़ना चाहती थी पर रोहन की मदद के बाद इतना नहीं बच पाता था कि वह खुद भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सके. फिर उस ने खुद से समझौता कर लिया था और अपना कैरियर दांव पर लगाते हुए रोहन की सहायता करना उस ने अपना लक्ष्य बना लिया था. ‘तुम से यों हर वक्त पैसे लेना अखरता है मुझे, पर क्या करूं विवश हूं,’ रोहन अकसर उस से भरे मन से कहता. ‘तुम में और मुझ में कुछ फर्क है क्या?’ फिर वह उस की गले में बांह डालती हुई कहती, ‘जब अपना सारा जीवन ही तुम्हारे नाम कर दिया है तो अपने और पराए का फर्क बचा ही कहां है?’
फिर धीरेधीरे समय का पहिया घूमा. इधर संघर्षरत रोहन को सफलता मिली तो उधर कपिल अपने पापा के बिजनैस में सैटल हो गया. जब रोहन को पुणे की एक जानीमानी कंपनी में जौब मिली, तब सब से ज्यादा खुश राशि ही थी, जिस ने इस दिन के लिए न जाने कितने पापड़ बेले थे. उस ने न सिर्फ आर्थिक रूप से बल्कि हर तरह से रोहन की मदद की थी. जब रोहन पढ़ता तो वह सारी रात जाग कर उस का हौसला बढ़ाती. वह हमेशा अपने रोहन की सफलता की कामना करती थी. इसीलिए उसे जैसे ही पता चला कि रोहन की जौब लग गई है, वह बहुत खुश हो गई. रोहन को सामने देख खुशी के अतिरेक में मानो उस के तो होंठ सिल ही गए थे और आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे.
‘पगली, अब तो तेरे खुश होने का समय है,’’ रोहन शरारती अंदाज में बोला तो राशि शर्म से पानीपानी हो गई. तब उस ने आत्मसमर्पण सा कर दिया था. उस ने अपना सिर उस के कंधे से टिका दिया था. जिस दिन रोहन पुणे के लिए गया, उस दिन भी कमोबेश उस की यही स्थिति थी. अपनी मम्मी से कह कर उस ने रोहन के लिए नमकीन, अचार, हलवा और न जाने क्याक्या पैक करवा डाला था. ‘अरी, कम से कम यह तो बता कि इतना सब किस के लिए पैक करवा रही है,’ उस की मां सामान पैक करते वक्त लगातार उस से पूछती रहीं, पर वह जवाब में मंदमंद मुसकराती रही. ‘रोहन, यह सब सिर्फ तुम्हारे लिए है. अगर दोस्तों में बांटा तो मुझ से बुरा कोई नही होगा,’ राशि खाने के सामान से भरा बैग उसे थमाते हुए बोली थी.
‘जानेमन, तुम फिक्र न करो. यह बंदा ही सिर्फ इस सामान को खाएगा,’ फिर रोहन ने वह बैग राशि से ले कर अपने सामान के साथ रख लिया था. ‘मम्मीपापा से मिलने कब आओगे,’ लाख चाहते हुए भी राशि अपनी अधीरता उस से छिपा नहीं पाई थी. ‘पगली, पहले वहां जा कर सैटल तो होने दे मुझे. बस, फिर तुरंत आ कर तुझे तेरे परिवार से मांग लूंगा,’ फिर उस ने आगे बढ़ कर उस का माथा चूमते हुए कहा था, ‘बस, यह समझ ले कि मेरा तन पुणे जा रहा है, मन तो तेरे पास ही है, उस की हिफाजत करना.’ फिर ट्रेन चली गई थी और रोहन भी. तब वह न जाने कितनी देर स्टेशन पर ही खड़ी रह गई थी. जब तक ट्रेन उस की आंखों से पूरी तरह ओझल नहीं हो गई थी.
अब तो उस का किसी भी काम में मन नहीं लगता था. इधर वह रोहन की दुलहन का सपना अपनी आंखों में संजोए उस का बेसब्री से इंतजार कर रही थी तो उधर रोहन अब उस से कन्नी काटने लगा था. धीरेधीरे बढ़ रही उस की बेरुखी राशि को तोड़ने लगी थी. ऐसे में उस ने पुणे जा कर सारी बात जानने का मन बनाया. पर उस के जाने से पहले ही उसे माही मिल गई थी, जिस का चचेरा भाई संयोगवश रोहन की कंपनी में ही काम करता था. ‘अरे यार, तू जिस के साथ शादी कर सैटल होने का मन बना रही है, वह तो दगाबाज निकला. रोहन तो अब अपनी कंपनी के सीईओ की बेटी से इश्क फरमाने में लगा है. आखिर अपने परिवार की गरीबी दूर करने का इस से बढि़या विकल्प क्या होगा?’ फिर माही तो चली गई, लेकिन राशि… वह तो मानो दुख के सागर में डूबती चली गई. जिस पेड़ की शाखा के सहारे वह इस जिंदगी के सागर को पार लगाने की आस में थी, वह शाखा इतनी कच्ची निकलेगी, इस का उसे अंदाजा ही नहीं था.
वह क्या करे? इसी ऊहापोह में करीब एक महीना गुजर गया. इस बीच न तो उस ने रोहन से बात की और न ही रोहन का कोई फोन आया. तब फिर एक दिन जब वह अपने दिल से हार गई, तब उस ने ही उसे फोन लगाया.
‘हैलो, रोहन, कैसे हो?’
‘ठीक हूं.’
‘और तुम कैसी हो?’
‘मैं भी ठीक हूं.’
‘अच्छा रोहन, तुम दिल्ली कब आ रहे हो,’ राशि न चाहते हुए भी उस से पूछ बैठी. ‘‘अभी तो फिलहाल दिल्ली आने का कोई प्रोग्राम नहीं है, क्योंकि मैं तो अपना सारा परिवार यहां पुणे में शिफ्ट करने की सोच रहा हूं,’ इतना कह कर उस ने फोन काट दिया. रोहन ने तो उस से दोटूक बात कर के अपनी जिम्मेदारी से, अपने प्यार से मुंह मोड़ लिया, लेकिन खाली हाथ रह गई तो राशि. वह बहुत कोशिश करती थी, रोहन को भूलने की, पर उस का दिल हर समय उस की याद में ही धड़कता रहता था. सच, कितनी आसानी से रोहन ने उस से कह दिया कि वह अपना पूरा परिवार पुणे शिफ्ट करने की सोच रहा है, जबकि वह यह बात अच्छे से जानता है कि वह भी तो उस के परिवार का हिस्सा थी. रोहन के परिवार में शामिल होने के लिए ही तो उस ने इतने सारे यत्न किए थे. यहां तक कि अपना कैरियर भी दांव पर लगा दिया था, पर बदले में उसे क्या मिला?
वह फोन पर उस से यह सब कहना चाहती थी, पर चाह कर भी उसे फोन नहीं मिला पाई. रोहन जैसा मौकापरस्त इंसान अब उस की नफरत के काबिल भी नहीं था. रोहन की बेवफाई ने उसे भीतर तक तोड़ दिया था. तब उस ने खुद को आगे की पढ़ाई में झोंक दिया. हर समय हंसनेखिलखिलाने वाली राशि चुप्पी के खोल में सिमट कर रह गई थी. उस की यह खामोशी उस के मम्मीपापा के लिए भी कम दुखदाई नहीं थी, पर मौके की नजाकत को देखते हुए वे चुप ही रहते थे.
अपने दुख को दबाना जब राशि के लिए असहनीय हो गया, तब उस ने एक दिन नींद की ढेर सारी गोलियां खा कर अपना जीवन समाप्त करने की कोशिश की. लेकिन शायद अभी उसे और जीना था इसलिए बच गई. ‘‘बेटी, कैसी है तू अब?’’ मां की प्यार भरी आवाज सुन कर उस की तंद्रा भंग हो गई और वह अतीत से वर्तमान में लौट आई थी. जब मां का आत्मीयता भरा स्पर्श उसे अपने माथे पर महसूस हुआ तो वह सिसक पड़ी. ‘‘मेरी बेटी इतनी कमजोर निकलेगी, मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था,’’ मां के स्वर में तड़प का पुट था.
मां की यह बात उसे चुभ गई थी. अब उस ने रोतेरोते सारी बातें अपनी मां को बता दी थीं. सबकुछ जानने के बाद उस की मां का भी दिल भर आया था. फिर वे प्यार से उसे समझाते हुए बोलीं, ‘‘मैं मानती हूं कि जो कुछ भी तेरे साथ हुआ वह गलत था, पर बेटी, किसी मौकापरस्त इंसान के लिए अपना जीवन समाप्त करना भी तो समझदारी नहीं है. तुझे तो यह सोचना चाहिए कि तू ऐसे खुदगर्ज इंसान से बच गई जो सिर्फ अपने को ही महत्त्व देता है.’’ मां की प्यार भरी बातों ने उस के रिसते घाव पर मरहम का काम किया था. फिर वह हलके मन से सामने रखा सूप पीने लगी थी. तभी अचानक मां उस से बोलीं, ‘‘बेटा, एक बात कहूं?’’
‘‘हां, कहो न मां.’’
‘‘देख बेटी, पुरानी बातों को छोड़ कर आगे बढ़ने में ही समझदारी है. इस से पुरानी बातों का दंश कम हो जाता है.’’
‘‘वह तो ठीक है, पर…’’
‘‘अब परवर कुछ नहीं. बस, यह समझ ले कि एक बार तूने सूरत के आधार पर अपने जीवन का फैसला लिया था, अब तू सीरत को आधार बना कर आगे बढ़ जा.’’
‘‘लेकिन आप कहना क्या चाह रही हैं, मैं समझी नहीं,’’ राशि सूप का खाली कप अपनी मां को थमाते हुए बोली. ‘‘अरे, मैं तो उसी कपिल की बात कर रही हूं, जिसे तू गोलू कह कर छेड़ती थी,’’ मां फिर से संजीदा हो उठी थीं, ‘‘पता है, जब मैं ने तुझे बेहोश देखा, तब मैं समझ नहीं पाई थी कि क्या करूं? पहले तेरे पापा को फोन लगाया, लेकिन उन का फोन स्विच औफ जा रहा था. तब मैं ने परेशान हो कर तेरे एकदो दोस्तों को फोन लगाया. वे सभी पुलिस केस के डर से कन्नी काट गए. ‘‘फिर मैं ने गोलू को फोन लगाया. मेरे फोन करते ही वह तुरंत मेरे पास पहुंच गया. उस ने उस समय न सिर्फ तुझे संभाला बल्कि मुझे भी हिम्म्मत दी. अब बता, जो इंसान तेरी बेरुखी के बावजूद सिर्फ इंसानियत के नाते तेरी मदद को आगे आया, वह इंसान तारीफ के काबिल है या नहीं…’’
‘‘पर मां, अब तो शादी के नाम से ही नफरत हो गई है मुझे…’’ इतना कहतेकहते राशि फिर से रो पड़ी.
‘‘बेटा, धोखा रोहन ने दिया है तो उस की करनी की सजा तू क्यों भुगते? किसी और की गलती का पश्चात्ताप तू क्यों करे?’’ मां के स्वर में चिंता का पुट था. फिर न जाने उस के मन में अचानक क्या आया? उस ने तुरंत हां में सिर हिला दिया. उस की हां मिलते ही गोलू और उस की मां अस्पताल जा पहुंचे. ‘‘देख लेना बेटा, मैं दुनिया की हर खुशी दूंगी तुझे. बस, तू जल्दी से ठीक हो जा. तुझे ही अपने कमरे का सारा डैकोरेशन करना होगा,’’ गोलू की मां उस का माथा चूमते हुए बोलीं. फिर वह और उस की मां कमरे से बाहर चली गईं. उन के जाने के बाद कपिल राशि से मिलने आया.
‘‘मैं तो मरमिटा हूं तेरी हां पर. मैं ने तो पहली नजर में ही तुझे अपना दिल दे दिया था, लेकिन वहां तो… चल छोड़ उन बेकार की बातों को.
‘‘पर अब जब हम दोनों ने एक होने का फैसला कर लिया है, तो आज से तेरे सारे गम मेरे और मेरी सारी खुशियां तेरी,’’ मोटू राशि का हाथ थामते हुए बोला. गोलू की इस अदा पर राशि फिदा हो गई. अब उसे अपनी मां की कही बातों का अर्थ समझ में आने लगा था. सच, कितना फर्क है रोहन और कपिल की सोच में. एक वह निर्मोही रोहन है, जो अपनी मौकापरस्ती के कारण उसे लगभग भूल ही गया और दूसरी तरफ कपिल है, जो उस का झुकाव रोहन की तरफ होते हुए भी उसे अपना बनाने को तैयार है. सच में कपिल महान है जो इतना कुछ होने के बावजूद उस से सच्चा प्यार करता है. बस, कपिल की यही जिंदादिली भा गई थी उसे. उस का वर्तमान और भविष्य सुरक्षित रहेगा उस के साथ, इस की उम्मीद अब राशि के अंदर जाग चुकी थी. फिर अचानक ही कपिल उस से बोला, ‘‘थोड़े दिन बाद होली है. तुझे हमारे घर आना होगा, मेरे साथ होली खेलने,’’ कपिल उसे दोबारा बैड पर लिटाते हुए बोला.
‘‘हांहां, मैं जरूर आऊंगी,’’ राशि ने हां में अपना सिर हिला दिया.
‘‘यह हुई न बात, तो तू रंगेगी न, मेरे प्यार के रंग में?’’
‘‘हां, मेरे मोटू.’’ राशि के इतना कहते ही झट से मोटू ने एक प्यार भरा चुंबन उस के गाल पर अंकित किया और फिर शरमा कर बाहर निकल गया.
पुराने दौर के कलाकारों में पेंटल का नाम खास है. उन्होंने अपने कॉमिक अंदाज से कई फिल्मों को यादगार बनाया है. उनका रियल नाम कंवरजीत पेंटल वालिया है. फिल्म जगत में उन्हें पेंटल के नाम से जाना जाता है. पेंटल अब 75 साल के हो गए हैं और एक्टिंग की शिक्षा देते हैं. पेंटल ने लंबा समय हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में निकाला है और अभी भी काम में व्यस्त है, लेकिन उन्हें आज भी वह दिन याद है, जब वे पहली बार मायानगरी की तरफ रुख कर रहे थे. पेंटल अभी भी बहुत फिट है और फिटनेस का राज वे हर काम समय से करने को बताते है. उनका बेटा हितेन पेंटल है, जिसने कई फिल्मे की है और पिता के काम से बहुत प्रभावित है.
थी अभिनय की प्रतिभा
पंजाब में जन्मे पेंटल के भाई सरबजीत पेंटल थे, जिन्हें सभी गुफी पेंटल के नाम से जानते हैं, जो शकुनी मामा के किरदार निभाकर चर्चित हुये थे. पेंटल के पिताजी लाहौर में फिल्मों में बतौर सिनेमैटोग्राफर काम करते थे. भारत के विभाजन के कारण पेंटल के परिवार को विस्थापित होकर लाहौर से दिल्ली आना पड़ा. पेंटल के पिताजी को फिल्मी दुनिया का काम पता था, इसलिए वे मुंबई आये, पर उन्हें काम नहीं मिला और वे वापस दिल्ली लौट गए. दिल्ली आकर पेंटल के पिताजी ने एक फोटोग्राफी की दुकान खोली. दुकान में पासपोर्ट साइज फोटो और शादी विवाह की तस्वीरें खींचने का काम होता था. पेंटल का मन पढ़ाई लिखाई में नहीं लगता था. वह अपने पिताजी की दुकान में बैठकर दिनभर फोटोग्राफी की बारीकियां सीखा करते थे. इससे पेंटल के पिताजी को लगा कि उनके बेटे में अभिनय प्रतिभा है. उन्होंने अपने बेटे से कहा कि वे अभिनय में ट्रेनिंग लेकर आगे बढे और अपनी पहचान बनाए.
नहीं था पढ़ाई में मन
पेंटल ने एक इंटरव्यू में भी कहा है कि वे पढ़ाई में अच्छे नहीं थे, कई बार फेल हो जाया करते थे, लेकिन उन्हें एक्टिंग का बहुत शौक था. इसलिए उन्होंने एक्टिंग की पढ़ाई के लिए साल 1967 में फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया, पुणे में दाखिला लिया. जहाँ उन्हें 75 रूपये हर माह मिलता था, जिससे वे अपना खर्चा चलाते थे. साल 1969 में वे मुंबई एक्टिंग के लिए आये. पेंटल ने अपने फिल्मी कॅरियर में ‘जवानी दीवानी’, ‘रफू चक्कर’, ‘बावर्ची’, ‘पिया का घर’, ‘जंगल में मंगल’, ‘परिचय’, ‘हीरा पन्ना’, ‘सिक्के’, ‘सत्ते पे सत्ता’ जैसी कई खास फिल्मों में काम किया है. इतना ही नहीं उन्होंने सभी बड़े कलाकारों के साथ भी काम किया है.
एक्टिंग में रहे सफल
उन्होंने पढ़ाई में नहीं, लेकिन एक्टिंग की दुनिया में खूब नाम कमाया. एक वक्त ऐसा था जब हर दूसरी फिल्म में पेंटल का किरदार हुआ करता था. पेंटल ने फिल्मों के साथ ही टीवी की दुनिया में भी काफी नाम कमाया है. ‘विक्रम बेताल’, ‘श्श्श्श कोई है’, ‘महाभारत’ जैसे कई शोज उन्होंने किये है. उन्हें इस फ़िल्मी जर्नी से कोई मलाल नहीं, जो भी चाहा उससे कही अधिक उन्होंने काम किया है. उनके जीवन में उतार – चढ़ाव काफी आये, लेकिन उन्होंने हमेशा सकारात्मक सोच बनाए रखा, यही वजह है कि वे हमेशा खुश रहते है. अभी वे सोनी टीवी की शो मेहन्दी वाला घर में दादा की भूमिका निभा रहे है.
अलग – अलग भूमिका है पसंद
पेंटल ने हास्य किरदार से लेकर हर तरह की भूमिका निभाई है, लेकिन एक दादा की भूमिका निभाना उन्हें अच्छा लग रहा है. वे कहते है कि इस शो को करने की खास वजह एक पारिवारिक शो में काम करना है, जो मुझे बहुत पसंद है. मुझे लगता है कि इस शो को देखने के बाद नई जेनरेशन परिवार के साथ अवश्य जुड़ेंगे, क्योंकि परिवार के साथ जुड़े रहने से कितना फायदा होता है, कितना सकारात्मक उनकी दुनिया बनती है, उसके बारें में सोच सकेंगे. चार लोग भी जुड़ने पर भी मुझे ख़ुशी होगी.
करना पड़ता है एडजस्ट
पेंटल आगे कहते है कि संयुक्त परिवार की प्रथा अब खत्म हो चुकी है, एकल परिवार भी अब ख़त्म हो रहे है, क्योंकि काम के लिए बच्चे बाहर चले जाते है, ऐसे में पेरेंट्स अकेले रहने पर मजबूर होते है. इस बदलाव को कोई कुछ नहीं कर सकता, इसे अपनाना पड़ेगा. सबसे ट्रेजिक बात यह है कि बुजुर्ग पति – पत्नी में जो अकेला रह जाता है, उनके लिए जिंदगी को जीना थोडा कठिन हो जाता है. उससे भी उन्हें एडजस्ट करना पड़ता है. इतना ही नहीं आज के यूथ बच्चे भी पैदा करना नहीं चाहते, इससे वे जॉइंट फॅमिली के मजे को ले नहीं पाते. खुद ही बच्चा नहीं चाहते, इसकी वजह महंगाई है, दोनों को जॉब करना पड़ता है. पति – पत्नी के काम पर चले जाने के बाद बच्चे को देखने वाला कोई नहीं होता. इसलिए जॉइंट फॅमिली का कांसेप्ट लगभग ख़त्म हो चुका है.
इससे निकलने और खुश रहने की कला इन्सान के अंदर ही होती है, उसे खुद ही खोजना पड़ता है. वे कहते है कि परिस्थितियों से एडजस्ट कर खुश रहना आसान नहीं होता. बाहर से कोई आपको ख़ुशी नहीं दे सकता. हम सभी को खुशियाँ ढूँढनी पड़ेगी. आसपास के सबके साथ मिलकर रहना पड़ेगा, खुद को व्यस्त रखना पड़ेगा, सहना पड़ेगा, अपने अहम् को खत्म करना पड़ेगा आदि सभी चीजों में खुद को सामंजस्य बिठाने पर ही सब खुश रह सकेगे.
मिली अच्छी जर्नी
मुस्कराते हुए पेंटल कहते है कि मैंने जितना चाहा उससे कही अधिक मुझे मिला है, कोई चाह अब रही नहीं. मेरी केवल एक चाह है कि काम करते – करते ही मेरे प्राण निकले. जिंदगी ने बहुत सारे चीजे सीखा दी है. कई बार किराया न रहने की वजह से घर से निकाले गए, इधर – उधर घूमते रहे, फिर कही किसी ने जगह दिया, रात बिताई. जीवन में बहुत तनाव आये, लेकिन मैंने धैर्य के साथ उन्हें लिया और आगे बढ़ा. कई बार ऐसा लगा कि अब क्या होगा, लेकिन तब कोई ऐसा काम हाथ आया कि मैं उससे निकल गया. उन कठिन दिनों में मेरा परिवार और दोस्त सभी ने साथ दिया था. मेरी पत्नी और मेरे बच्चे मेरे लिए बड़ी स्ट्रेंथ रहे है.
वक्त का बदलाव
पहले और आज की कहानियों में अंतर के बारें में पूछने पर वे कहते है कि आज की फिल्मों में प्यार और मनोरंजन तकरीबन गायब हो गयी है, ये सब वक्त का बदलाव है और कुछ नहीं. मीडिया इतनी फैली है कि आज ये सबकी जेब में आ गई है. यूथ के पसंद की चीजे न बनाने पर वे इसे किसी दूसरी जगह अवश्य देख लेंगे. सब कमर्शियल हो चुका है, हर कोई पैसा कमाना चाहता है. ये एक दौर है, जो कुछ दिनों बाद खत्म हो जायेगा, फिर कोई नया दौर आएगा. आज के बच्चों में धैर्य की कमी अवश्य आई है, ऐसे में उनके आसपास रहने वालों को एडजस्ट भी करना पड़ रहा है. आज मैं खुद को एक शून्य की स्थिति में लाना चाहता हूँ, जिसमे न किसी चीज के बारें में अधिक ख़राब लगे, न किसी बात का तनाव लूँ, सभी से खुद को परे रखना चाहता हूँ. जो आया उसी में खुश रहना चाहता हूँ, जितनी चादर उतनी ही पैर फैलाना चाहता हूँ. अगर चादर छोटी हो तो पैरों को सिकोड़ लूँगा, बाहर निकलने नहीं दूंगा.
आती है याद
पेंटल ने सभी बड़े – बड़े निर्माता, निर्देशकों के साथ काम किया है. उनका कहना है कि मुझे राजकुमार कोहली, राज खोसला, एल बी प्रसाद, चेतन आनंद, ओमप्रकाश, प्राण, देवानंद आदि सभी याद आते है. ये सारे हीरे थे, सभी में एक अलग तरीके की चमक थी. मैं खुले दिल वाला इंसान हूँ, उनकी फिल्में देखकर मैं सबको आज मिस करता हूँ. वे अब नहीं है, लेकिन उनकी यादे मेरे दिल से नहीं गए है, क्योंकि मैं उनकी याद को अपने दिल में रखना चाहता हूँ.
घरेलू हिंसा की घटनाएं सालों से चली आ रही है, लेकिन इसमें कमी जितनी आनी चाहिए थी, उतनी नहीं आई है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन द्वारा प्रकाशित अनुमानों से संकेत मिलता है कि विश्व स्तर पर लगभग 3 में से 1 (30%) महिलाएं अपने जीवनकाल में या तो शारीरिक या सेक्सुअल इंटिमेट पार्टनर वायलेंस या नॉन पार्टनर सेक्सुअल वायलेंस की शिकार हुई हैं. इस हिंसा में से अधिकांश इंटिमेट पार्टनर वायलेंस है. दुनिया भर में, 15-49 वर्ष की उम्र की लगभग एक तिहाई (27%) महिलाएं, जो किसी रिश्ते में रही हैं, उन्हें ही अपने इंटिमेट पार्टनर के द्वारा किसी प्रकार की शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा है, जो उनके शारीरिक, मानसिक, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है और कुछ स्थितियों में एचआईवी होने का खतरा बढ़ सकता है.
असल में महिलाएं बाहर आकर अपने साथ हुए हिंसा को कहने से शर्माती है. पढ़े – लिखे समाज की महिलाएं ही इसकी अधिक शिकार हो रही है, इसलिए मेरी कोशिश है कि महिलाएं खुद अपने अधिकार को समझे, किसी भी हिंसा से बाहर निकलकर अपने अधिकार को लें और अच्छी जिंदगी जिये, कहती है 27 साल से काम कर रही साक्षी एनजीओ की सोशल वर्कर स्मिता भारती. उन्होंने घरेलू हिंसा और यौन उत्पीडन की शिकार महिलाओं के लिए विशाखा वर्सेज स्टेट ऑफ़ राजस्थान, साक्षी वर्सेज यूनियन ऑफ़ इंडिया पिटीशन दायर किया, जिसके तहत विशाखा गाइड लाइन्स 1997 में निकाला. इसके बाद पॉश (2013) और सेक्सुअल असाल्ट बिल (2010) पोक्सो (2012 )अमेनमेंट पास हुआ, जो महिलाओं के हित के लिए बनाया गया है. उनका उद्देश्य महिलाओं को घरेलू हिंसा का शिकार होना नहीं, बल्कि अधिकार के साथ जीना है. उनके इस काम में उनके दोनों बच्चे और दोस्त सभी साथ देते है.
मिली प्रेरणा
इस क्षेत्र में काम करने की प्रेरणा के बारें में पूछे जाने पर स्मिता बताती है कि मैं इस एनजीओ के साथ 1997 से जुडी हूँ. मैं खुद घरेलू हिंसा की शिकार थी, मेरे 12 साल की शादी शुदा जिंदगी में मैं डोमेस्टिक वायलेंस की शिकार थी. मुझे पता नहीं था कि इससे कैसे निकलना है, मैं सहती रही. मैं बहुत मुश्किल से दो बच्चों के साथ इस नर्क से निकल पाई थी. तब मुझे लगता था कि क्या ये मेरे साथ ही हो रहा है या दूसरी महिलाओं के साथ भी होता होगा. मुझे जानना था, बस यही मेरी शुरुआत रही. शादी से निकल कर पढ़ाई की, जॉब किया, आत्मनिर्भर बनी. इस दौरान मुझे परिवार और दोस्तों का साथ मिला और मुझे नहीं लगा कि मैं अकेली हूँ. मेरा उद्देश्य यह रहा है कि किसी भी महिला को घरेलू हिंसा चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक उसका सामना न करना पड़े और वे जान सके कि उन्हें कैसे उससे निकलना है.
मुश्किल था आगे बढ़ना
पति से अलग होकर स्मिता को बहुत संघर्ष करने पड़े, वह कहती है कि मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की, जॉब शुरू किया और साथ ही मैं एक लेखिका हूँ, मैं नाटक लिखती और स्टेज पर परफॉर्म करवाती हूँ उसमे मैं सोशल इश्यु को उपर लाने की कोशिश करती हूँ. उसमे मैं सबसे प्रश्न पूछती थी कि घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं हुई है या नहीं. इससे मुझे पता चलता रहता था कि ये निम्न वर्ग में नहीं, उच्च वर्ग में अधिक होता है, लेकिन कोई उसे कहता नहीं है, क्योंकि उन्हें शर्म आती है. साथ ही परिवार में लड़कियों को ये शिक्षा दी जाती है कि एक लड़की डोली में ससुराल आती है और अर्थी में बाहर जाती है ऐसे न जाने कितनी बाते उन्हें बचपन से सिखाई जाती है. अगर कोई लड़की उसका विरोध करती है तो उसे चुप करा दिया जाता है, या उसे गलत मानसिकता बताकर अलग कर दिया जाता है, जिससे कई महिलाएं आत्महत्या कर लेती है. एक स्टिग्मा महिलाओं के साथ लग जाती है, कि वे अच्छी स्वभाव की महिला नहीं. इसे तोड़ने के लिए मैंने कई नाटकों का मंचन किया, कॉलेजों में वर्कशॉप किये, कम्युनिटी में काम किया, लॉ मेकर्स के साथ काम किया, क्योंकि इसमें जेंडर बायेस्ट को करने वाले को डरना है और सहने वाले को जागरूक होना है.
घरेलू हिंसा की जड़े है गहरी
स्मिता आगे कहती है कि घरेलू हिंसा में कमी नहीं आई है, लेकिन जागरूकता महिलाओं की बढ़ी है, वे अत्निर्भर हो रही है. आज की लड़कियां समझ रही है कि उन्हें घरेलू हिंसा को सहना नहीं है और लड़के भी ये समझ चुके है कि जिसे वे अपनी मर्दानगी समझते थे, वह डोमेस्टिक वायलेंस है और इसका असर उन पर बुरा होगा. शिक्षा का जो सैलाब अभी आया है, जब जगह लोग जागरूक हो चुके है, लेकिन हिंसा कम नहीं हुई है, क्योंकि इसकी जड़े बहुत गहरी है. अगर ऐसे ही लोग जागरूक होते रहे, तो इसे कम होने में एक से दो पीढ़ी और लगेगी.
वजहों को समझना मुश्किल
स्मिता का कहना है कि वजह के बारें में बात करूँ तो, ये बहुत मुश्किल है, क्योंकि एक छोटी सी बात भी घरेलू हिंसा को बढ़ावा देती है, किसी का कही देर रात तक ऑफिस में काम करना, किसी को खाने में कुछ पसंद न आना आदि छोटी – छोटी वजहें होती है. मैं वजह से अधिक इसकी जागरूकता पर काम करती हूँ, मैंने प्रिवेंशन और प्रोहिविशन यानि रोकथाम और निषेधाज्ञा पर काम करना जरुरी समझा. पहले हमारे देश में घरेलू हिंसा पर कोई कानून नहीं था, उसे लाना जरुरी था. सेक्सुअल एसल्ट के कानून पहले बहुत हलके थे, कोई भी इसे करके आसानी से बच निकल जाता था, उसे कठिन बनाना जरुरी था.
इसके अलावा हिंसा की वजह पितृसत्तात्मक सोच या पुरुष प्रधान सोच को कहा जा सकता है, जहाँ किसी पुरुष के लिए महिलाओं की बातों को मानना असंभव होता है. कोई महिला कुछ कह सकती है या उसके विरोध का कोई अर्थ हो सकता है ये वे नहीं मानते. देखा जाय तो एक वर्ग खास है दूसरा कमजोर है, इसलिए उसकी आवाज को दबाया जा सकता है. इसमें कुछ हद तक महिलाएं भी जिम्मेदार होती है, उन्हें भी सोचना पड़ेगा कि उन्हें करना क्या है. छोटी – छोटी बातें, जैसे लड़कों का खाना बनाना, लड़कियों का बाहर जाकर कमाना, उनकी इच्छाओं को बनाए रखना आदि काई चीजे है, जिन्हें परिवार से शुरू करना पड़ेगा. किसी महिला के कहना न मानने पर पुरुष का हाथ उठ जाना, उससे भला – बुरा कहना आदि सभी को बंद करना पड़ेगा. ये सिर्फ शारीरिक और मानसिक ही नहीं आर्थिक और भावनात्मक भी है. इसके कई स्वरुप है, जिसे पहचानना महिलाओं को जरुरी है. इसके लिए उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलंबी होना पड़ेगा. इसमें दहेज़ एक लक्षण है, वजह नहीं.
सोच बदलने से हिंसा में आयेगी कमी
जस्टिस वर्मा ने एक बार कहा था कि एक वर्ग का अगर दूसरे वर्ग को घूरना बंद करा दे, तो बलात्कार ख़त्म हो जायेगा, क्योंकि इसमें एक इंसान को बोलकर एक सेक्सुअल ऑब्जेक्ट बना दिया जाता है. घूरने की वजह से एक इन्सान को एक व्यक्ति न समझ कर एक ऑब्जेक्ट बना दिया जाता है, तो उसके साथ कुछ भी वे कर सकते है, क्योंकि अब वह इन्सान नहीं रहा, एक ऑब्जेक्ट है. पितृसत्तात्मक सोच ही इसकी जड़ है.
निम्न वर्ग में घरेलू हिंसा कम
कुछ लोग मानते है कि निम्न वर्ग में घरेलू हिंसा अधिक होती है, क्या ये सच है? पूछने पर स्मिता कहती है कि घरेलू हिंसा सबसे अधिक मध्यम वर्ग, फिर उच्च वर्ग और अंत में निम्न वर्ग में होती है. निम्न वर्ग में महिलाएं हिंसा को कहने से शर्माती नहीं, बाकी वर्ग परिवार की सम्मान को ध्यान में रखते हुए कहने से हिचकिचाते है. वे इसके नीचे इतने दबे हुए है कि वे चुप रहना पसंद करते है.
मिलती है धमकियाँ
स्मिता के लिए इस काम को करना आसान नहीं होता, क्योंकि घरेलू हिंसा केवल पति – पत्नी के बीच में नहीं बल्कि परिवार के किसी भी सदस्य का किसी दूसरे सदस्य पर हिंसात्मक व्यवहार का करना है. वह कहती है कि कई बार मैं किसी को कुछ समझाने की कोशिश करती हूँ, लेकिन वे अपनी बातें शेयर नहीं करना चाहते. कई बार मुझे धमकियाँ भी मिलती है कि ये उनका पारिवारिक मामला है, मैं उसमे दखल न दूँ. मैं उन महिलाओं से सिर्फ ये कहना चाहती हूँ कि वे सिर्फ हिंसा करने वाले से ये प्रश्न पूछ ले कि वे ऐसा क्यों कर रहे है, वजह क्या है, तो उन्हें खुद ही पता चल जायेगा कि उन्हें करना क्या है.
किसी की अधिकार को कोई रोक नहीं सकता. एक थप्पड़ या खाना फेक देना भी एक बड़ी वजह हिंसा की हो सकती है. महिलाओं को अपने अधिकार को आगे बढ़कर लेना है, इसके लिए उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से आत्मनिर्भर होने की बहुत आवश्यकता है.
‘‘तोकान खोल कर सुन लो, आज से इस घर में या तो तुम रहोगी या मैं,’’ अपना आखिरी फैसला सुनाते हुए ये कमरे से बाहर निकलने लगे.
मैं भी गुस्से में तमतमाई तो थी ही सो अपना भी फैसला इन के कानों में डाल दिया, ‘‘अब आप ही इस घर में रहिए और अपने बच्चों को भी संभालिए. घर आप का है, आप को ही यहां रहने का अधिकार है, मैं ही…’’ इस के आगे चुप रह जाना पड़ा क्योंकि यह दरवाजे से बाहर जा चुके थे.
इन के जाते ही बड़ी कठिनाई से जबरदस्ती रोके हुए मेरे आंसू टपटप गिरने शुरू हो गए. पिछले दिनों तीनों बच्चे 1-1 कर बीमार पड़ गए थे. कई रातें जाग कर बितानी पड़ी थीं. घर में मेहमानों का तांता अलग से लगा हुआ था, काम करने वाली भी कई दिनों से नहीं आ रही थी,
उस पर गैस लाइन में कई दिनों से ब्रेक हो रहा था. सिलैंडर भी कई दिनों से खत्म था. वैसे मैं हर संकट को किसी न किसी तरह झेल लेती हूं किंतु बच्चों की बीमारी मु झे तोड़ देती है. इसी वजह से कई दिनों से मेरा मन बड़ा अनमना सा रहा.
आज कई दिनों के बाद 3 बच्चों को एकसाथ स्कूल भेज कर मु झे काफी राहत सी महसूस हो रही थी. रात को अपनाअपना स्कूल बैग ठीक करते हुए बच्चों ने कहा, ‘‘मां, कई दिनों से आप ने इडली और डोसा नहीं बनाया है. आज दालचावल जरूर भिगो दीजिएगा.’’
बच्चों का मन रखने के लिए मैं ने सोने से पहले दालचावल भिगो दिए थे. बच्चों के स्कूली जाने के पश्चात सुबह के जरूरी काम निबटा कर मैं ने सोचा कि गरमियों के दिन हैं, चलो पहले दालचावल पीस लूं, फिर नहाऊंगी.
कड़ी गरमी के बावजूद मैं मगन हो कर दाल पीस रही थी कि मु झे लगा कि इन्होंने मु झ से कुछ कहा है, पर साफ सम झ में नहीं आया, इसलिए पीसतेपीसते ही मैं ने पूछ लिया, ‘‘क्या आप ने कुछ कहा?’’ पर कोई उत्तर न मिलने पर मैं फिर दाल पीसने में व्सस्त हो गई.
ये नहाधो कर नीचे उतर रहे थे कि मु झे सुनाई पड़ा, ‘‘कोल्ड कहीं की…’’
बस इस ‘कोल्ड’ शब्द ने मेरे तनबदन में जैसे आग सी लगा दी. इतनी गरमी में मिक्सी के अभाव में दालचावल पीसतेपीसते गरमी के मारे बुरा हाल हो रहा था, ऊपर से यह ताना सुन कर गुस्से से खौल उठी, पर कुछ बोली नहीं. गुस्सा दबा कर पीसती हुई सोचने लगी कि ठीक है कि कई दिनों से बच्चों की बीमारी, मेहमाननवाजी तथा अपनी थकान व मानसिक परेशानी की वजह से इन का हक इन को नहीं दे सकी, पर इस का मतलब यह तो नहीं कि मु झे ‘कोल्ड’ या ‘ठंडी’ कह कर पुकारा जाए.
खैर, ये अपने क्रोध पर काबू पाने के लिए बैठक में मोबाइल निकाल कर कोई गेम खेलने लगे और मैं काम निबटा कर यह सोचती हुई नहाने चली गई कि जनाब से इतना भी नहीं होता कि बच्चों को इडलीडोसा चाहिए तो औनलाइन मंगा दें. नहीं, घर का बनाया ही शुद्ध होता है, कह कर टालना आदत है. समय अधिक हो गया था, इसलिए जल्दी से नहा कर मैं इन के लिए चाय तैयार करने के लिए रसोईघर में घुस गई. मु झे भी औफिस जाना था. पिछले दिनों कई बार छुट्टी भी और कई दिन वर्क फ्रौमहोम कर के काम चलाया.
अकसर मैं इन्हीं से डबलरोटी सेंकने को कह देती हूं, लेकिन आज गुस्से के मारे मैं ने ही टोस्टर का प्लग लगाया और डबलरोटी सेंकने लगी. ये भी चूंकि नाराज थे, इसलिए इन्होंने डबलरोटी सेंके बिना टुकड़ों पर ही जैम तथा मक्खन लगा कर खाना शुरू कर दिया.
मैं सिंके हुए स्लाइस को टोस्टर से बाहर निकाल ही रही थी कि ये मु झे चिढ़ाते हुए से बोले, ‘‘लगता है टैंपरेचर काफी चढ़ गया है… करीब कितनी डिगरी पर होगा?’’
बस इतना सुनते ही काफी देर से दबाया हुआ मेरा गुस्सा फट पड़ा, ‘‘अब मैं आप को ‘कोल्ड’ बन कर ही दिखा दूंगी. आप ने सम झा क्या है? कभी इनसान की मजबूरी भी सम झनी चाहिए. हर समय अपना ही स्वार्थ देखते रहो, यह भी कोई तरीका है? अब भी आप पर लड़कपन ही छाया रहता है, 3-3 बच्चों के बाप बन गए मगर पोर्न देखतेदेखते न जाने क्या हो जाता है. मु झ पर ही लागू करना चाहते हो…’’
मेरी बात बीच में काटते हुए ये तपाक से बोल पड़े, ‘‘अरे, इस में बुरा मानने की क्या बात है? जैसी तुम हो वैसा मैं ने कह दिया. जो वाइफ चौबीस घंटों में अपने पार्टनर को कुछ न दे सके, उसे और क्या कहा जा सकता है? जिसे तुम सैल्फिशनैस या प्लैजर की संज्ञा देती हो,
वह तो इनसानी जीवन की सब से बड़ी भूख है जिसे शांत किया ही जाना चाहिए. आखिर पतिपत्नी का रिश्ता बना किस लिए है? जानती हो, पेट के पश्चात यदि मनुष्य की कोई दूसरी प्रबल भूख है तो वह देह की ही भूख है. यह बात दूसरी है कि किसी में यह भूख कम होती है तो किसी में अधिक.’’
‘‘अच्छा, अब आप बस भी कीजिए.
आप की जहां यह भूख मिटे, वहां चले जाइए. मु झ से बात करने की आप को कतई जरूरत नहीं है. और हां, आज से आप नीचे सोएंगे और मैं ऊपर.’’
‘‘भई, हम तो ऊपर ही सोएंगे. हम इतनी आसानी से अपना हक छोड़ने वाले नहीं…’’
‘‘तो ठीक है, आप ऊपर ही सोइएगा, मैं ही नीचे सो जाऊंगी,’’ कहतेकहते मेरा गुस्सा काफी आगे बढ़ गया. पर इस बार इन्होंने जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं और इन की चुप्पी से मेरा क्रोध छलांग मार कर और भी आगे बढ़ गया. बोली, ‘‘देखो प्रशांत, एक बात कह देती हूं कि आप इस छोटी सी बात के लिए झगड़ा कर के मेरा मूड खराब कर रहे हैं, यह अच्छा नहीं है. जो आदमी अपनी पत्नी का रिस्पैक्ट नहीं करता, वह खुद भी किसी से रिस्पैक्ट नहीं पा पाता. शायद इसीलिए अपने बाबूजी की तरह आप भी तरक्की नहीं कर पाए हैं और जहां के तहां पड़े हैं.’’
आखिरी वाक्य शायद इन्हें भीतर तक आहत कर गया था, इसलिए इन का अब तक का सहज चेहरा एकदम से तमतमा उठा. जिस तरह कोई स्त्री अपने मायके पर लगाए गए आरोप को सहन नहीं कर पाती उसी प्रकार पुरुष अपने मैनहुड पर की गई सीधी चोट को सहन नहीं कर पाता. इसीलिए शायद ये भी बरदाश्त नहीं कर सके थे और क्रोध से बौखला कर उठ खड़े हुए.
तुनकमिजाजी अकसर औरतों का मर्ज बनाया जाता है. किट्टी पार्टी में एक की ऐब्सैंस में किसी ने उस के बारे में कुछ कह दिया तो अगली पार्टी में कहने वाली पर हंगामा मच जाता है. सास अकसर बहू को कहती है कि अपनी ससुराल की सब बातें खासतौर पर बुरी बातें, मायके में क्यों कह दीं और घर में जोर का झगड़ा खड़ा हो जाता है. यह नहीं परखा जाता कि जो कहा गया वह सच था या नहीं. सवाल होता है, कहा क्यों गया?
यही राजनीति में हो रहा है. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ रोपीट रहे हैं कि उन की नकल सांसदों ने संसद के बाहर क्यों उड़ाई. उन्हें
यह देश का, जाट समुदाय का अपमान लग रहा है. धनखड़ साहब जब एक के बाद एक सांसदों को संसद से हैडमास्टर की तरह निकाल रहे थे तो उन्हें खयाल क्यों नहीं आया कि सांसद चुपचाप ही नहीं जाएंगे? वे कुछ तो प्रतिक्रिया करेंगे. इस में हल्ला मचाने की जरूरत
क्या है?
यह तो सासबहू से भी ज्यादा खतरनाक है और सासबहू की एक शिकायत को सारे समुदाय के खिलाफ अपमान कहा जा सकता है. हो सकता है कि सासें राज्यसभा अध्यक्ष को समर्थन देते हुए कहें कि कानून बना दिया जाए कि एक सास की चुगली जंबूद्वीप की सारी सासों की चुगली मानी जाएगी.
इसी तरह तमिलनाडु के नेता दयानिधि मारन ने कहीं कह दिया कि उत्तर भारत के युवा केवल हिंदी जानते हैं इसलिए उन्हें दूसरे राज्यों में सिर्फ क्लीनिंग और कंस्ट्रक्शन का काम मिलता है. इस सच को जानते हुए भी बिहारी भड़क उठे कि अपमान सारे बिहार का हो गया, उन युवकों का नहीं जो क्लीनिंग का और कंस्ट्रक्शन का काम जम्मू कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक करते हैं. तेजस्वी यादव ने उसी तरह हल्ला मचाया है जैसे बहू के ससुर मचाते हैं कि बहू ने मायके में सही पोल खोल कर क्यों ससुराल का अपमान कर डाला.
इस से पहले हिंदू धर्म की दुकानें चलाने वाले कुछ लोग तमिलनाडु के ही उदयनिधि स्टालिन के कथन कि सनातन धर्म आतंकी है पर बिफर पड़े थे.
सच को न सुनने की आदत एक गलत आदत है पर हमारे यहां यह बहुत गहरी है क्योंकि यहां धर्म के नाम पर झूठ को सत्य मानने की आदत है और पूजापाठी समुदाय डरता है कि धर्म की पोल सच में न खुल जाए. सब धर्मग्रंथ झूठों के पुलिंदा हैं पर अगर यह सच कह दिया जाए तो बवाल शुरू हो जाता है.
भारतीय जनता पार्टी तो सच से सब से ज्यादा डरती है और संसद में से अगर सांसदों को निकाला गया है तो इसीलिए कि वह नहीं चाहती कि चुनावों के नजदीक सांसद सरकार की पोल खोलें. ज्यादातर तलाक के मुकदमों में भी शुरुआत पति और पत्नी के झूठों की पोल खोलने पर होती है. मारपीट, ताने इसी बात को ले कर होते हैं कि सच को छिपाया क्यों नहीं गया.
सर्दियों को सेहत बनाने वाला मौसम माना जाता है क्योंकि इन दिनों हमारी पाचन क्षमता काफी बढ़ जाती है. इन दिनों गर्म तासीर वाले खाद्य पदार्थ खाने की सलाह दी जाती है ताकि हमारा शरीर गर्म रह सके. आज हम लेकर आए है सर्दियों में स्नैक्स में बनाएं ये टेस्टी डिशेज. देखें रेसिपी
सामग्री
1 कप मक्के का आटा
1/4 कप मैदा
1 बड़ा चम्मच तेल
1/2 कप दही
1 बड़ा चम्मच हरी चटनी
1 बड़ा चम्मच सोंठ
1 उबला आलू
1 प्याज बारीक कटा
1 टमाटर बारीक कटा
1 हरीमिर्च बारीक कटी
1 छोटा चम्मच धनियापत्ती कटी
लालमिर्च पाउडर
तलने के लिए तेल
नमक स्वादानुसार.
विधि
मक्के के आटे और मैदे को छान कर नमक और तेल डाल कर गूंध लें. इसे पतला बेल कर तिकोने आकार में काट लें. गरम तेल में सुनहरा होने तक तलें. प्लेट में निकाल कर इस के ऊपर प्याज, टमाटर व आलू काट कर डालें. ऊपर से दही, चटनी, सोंठ और धनियापत्ती, हरीमिर्च और नमक डाल कर सर्व करें.
सामग्री
1 कप पोहा
1-1 बड़ा चम्मच लाल, पीली, व हरीमिर्च बारीक कटी
1 छोटा प्याज बारीक कटा
2 छोटी गाजर कसी
2 बड़े चम्मच कच्चा नारियल कसा
हरीमिर्च बारीक कटी
1 बड़ा चम्मच तेल
1 बड़ा चम्मच गाढ़ा दही
1/2 चम्मच सरसों
करीपत्ता द्य हरीमिर्च कटी
नमक स्वादानुसार.
विधि
पोहे को पानी से धो कर छलनी में पानी निकालने के लिए रखें. फिर इस में सभी शिमलामिर्च, प्याज, हरीमिर्च, कच्चा नारियल, गाजर, दही व नमक मिलाएं. अच्छी तरह मिला कर इस की छोटीछोटी बौल्स बनाएं. फिर स्टीमर में 10-12 मिनट स्टीम करें. कड़ाही में तेल गरम कर सरसों डालें. भुनने पर करीपत्ता और हरीमिर्च डाल कर पोहे की बौल्स डाल अच्छी तरह मिलाएं और फिर एक प्लेट में सजा कर चटनी के साथ परोसें.
सामग्री
1/2 कप साबूदाना
1/2 कप नारियल का दूध
3 बड़े चम्मच कंडैंस्ड मिल्क
थोड़े काजूबादाम के टुकड़े
थोड़े से कटे फल सेब, अनार, संतरा, पाइनऐप्पल.
विधि
साबूदाने को पानी में भिगो कर उबाल लें. छलनी में डाल कर ठंडे पानी से धो लें. एक कड़ाही में कंडैंस्ड मिल्क और नारियल का दूध डाल कर गरम करें. फिर साबूदाना डाल कर 1-2 मिनट तक चला लें. फिर कटे फल और काजूबादाम डाल कर परोसें.
सवाल
ठंड के मौसम में सर्दीजुकाम होना आम बात है. जुकाम में मरीजों की नाक बहती है. इस के कारण नाक से कान के बीच स्थित यूस्टेकियन ट्यूब में नाक से पानी चला जाता है. इस पानी के कारण मिडल इयर में संक्रमण हो जाता है. कई बार कफ के कारण ट्यूब ब्लौक हो जाती है. इस से कान का संक्रमण होने के साथ ही मरीज की सुनने की क्षमता भी कम हो जाती है. कानों में दर्द, भारीपन, मवाद, बुखार, कानों का बहना आदि सब इसी के लक्षण हैं. इस समस्या से बचने के लिए साफसफाई रखनी जरूरी है. आप को ज्यादा सर्दीजुकाम न हो इसलिए इस से पीडि़त लोगों से भी दूरी बनाएं. दूध में चीनी के बजाय 1 चम्मच शहद और 3 चम्मच अदरक का रस मिला कर पीएं समस्या गंभीर है तो डाक्टर से मिलें.
समस्याओं के समाधान ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर, डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा
पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.
स्रूस्, व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.