तभी वहां मौली आ गई. उसे देख कर वह बोली, ‘‘दी, तुम ने कभी बताया नहीं तुम्हारा कोई बौयफ्रैंड भी है?’’
‘‘कैसी बात करती हो मौली यह मेरा बौयफ्रैंड नहीं है.’’
‘‘झूठ बोल रही है तुम्हारी दी. यह भी मु?ो प्यार करती है लेकिन कहने से डरती
है. इस के मन में पता नहीं क्या है जिस से यह उबर नहीं पा रही है.’’
‘‘दी, तुम किस्मत वाली हो जो तुम्हें इतना चाहने वाले दोस्त मिले हैं. आज के जमाने में रिश्ते कपड़ों की तरह हो गए हैं. इस्तेमाल करो और फेंक दो. दी मु?ो लगता है तुम्हें इन्हें सम?ाना और कुछ वक्त देना चाहिए.’’
‘‘तुम कुछ नहीं सम?ाती मौली.’’
‘‘दी, मैं इतनी छोटी भी नहीं हूं. मु?ा से भी कई युवा दोस्ती करना चाहते हैं. देख रही हूं ये तुम्हारे लिए दूसरे शहर से यहां आए हैं. कोई किसी के लिए इतना वक्त नहीं निकालता जितना इन्होंने निकाला है. होश में आओ दी और इन्हें पहचानने की कोशिश करो. कब तक इसी तरह खुद से भागती रहोगी?’’
‘‘मैं भी यही सम?ा रहा हूं. जिंदगी में हादसे होते रहते हैं. उन का हिस्सा बन जाना कहां की सम?ादारी है? जो बीत गया उसे भूलने की कोशिश करो. जिंदगी को खुले दिल से अपना लो तो वह जन्नत बन जाती है.’’
‘‘आप ठीक कहते हैं. बड़ी मम्मी के चले जाने का दी पर बहुत बड़ा असर पड़ा है और उस के बाद वह किसी को अपना नहीं सकी.
सब दी को खुश देखना चाहते हैं लेकिन यह अपनी ही दुनिया में रहती है,’’ मौली बोली तो पाली को लगा जैसे किसी ने उस की चोरी पकड़ ली हो.
पहली बार पाली को एहसास हुआ कि वह मम्मी की मौत को भुला नहीं पाई और खो जाने के डर से कभी किसी को अपने जीवन का हिस्सा न बन सकी.
‘‘मैं तुम्हारे फोन का इंतजार करूंगा पाली और तब तक इसी शहर में रहूंगा जब तक तुम
मेरे प्यार को स्वीकार नहीं कर लेती,’’ कह कर वह चला गया. मौली और पाली भी चुपचाप घर चली आईं.
दोनों की बातों ने आज पाली को ?ाक?ार कर रख दिया था. पहली बार वह अपना आत्मविश्लेषण करने के लिए मजबूर हो गई. उसे लगा मौली ठीक कहती है. यह तो खुशी की बात है कि उसे इतने अच्छे पापा, नई मम्मी और छोटी बहन के रूप में मौली मिली लेकिन उस ने कभी उन्हें दिल से स्वीकार ही नहीं किया. दोस्त और प्रेमी के रूप में भी पार्थ जैसा हैंडसम लड़का उस के जीवन में आना चाहता है और वह उसे नकारते चली जा रही थी.
सारी रात पाली सो नहीं सकी. मौली उस की बेचैनी को महसूस कर रही थी लेकिन कुछ कह कर उस के विचारों की डोर को तोड़ना नहीं चाहती थी. सुबह वह देर से उठी.
मौली ने पूछा, ‘‘दी, तबीयत तो ठीक है?’’
‘‘हां ठीक हूं. रात देर तक नींद आई… सुबह आंख लग गई.’’
‘‘दी, बुरा मत मानना पार्थ बहुत अच्छ हैं. उन्हें अपना लो. मु?ो यकीन है वे कभी शिकायत का मौका नहीं देंगे.’’
‘‘तुम ठीक कहती हो मौली. मैं ही स्वार्थी हो गई थी. खोने के डर से मैं कभी किसी को अपना ही नहीं सकी. कुदरत न करे कभी किसी बच्चे को मांबाप के बगैर रहना पड़े.’’
‘‘बीमारी पर किसी का बस नहीं है. बड़ी मम्मी को पापा ने बचाने की बहुत कोशिश की थी लेकिन उन का साथ इतना ही लिखा था. वे तुम्हें छोड़ कर चली गईं. उसी का बदला तुम पूरी दुनिया से ले रही हो और वह भी अपनेआप से लड़ कर.’’
‘‘तुम ठीक कह रही हो. मैं खुद इस बात
को नहीं सम?ा सकी. बस अंदर एक खालीपन था. लगता था उसे मम्मी के अलावा कोई नहीं
भर सकता. उसी ने मु?ो सब से दूर कर दिया.’’
‘‘अभी भी देर नहीं हुई है दी. तुम्हें पार्थ को अपना लेना चाहिए.’’
‘‘तुम उस का नाम कैसे जानती हो?
मैं ने तो कभी उस का जिक्र भी नहीं किया?’’ पाली बोली तो मौली खिलखिला कर हंसने
लगी.
‘‘दी, तुम्हें भले ही यह जिंदगी अपनी
लगती रही हो लेकिन उस पर हमारा भी उतना
ही हक है दी. यही सोच कर पार्थ परसों मु?ा
से मिले थे. वे तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जानना चाहते थे. मैं ही किसी अजनबी को बताने में हिचक रही थी. कल उन के कहने पर ही मैं कौफीहाउस आई थी.’’
‘‘तो यह सब तुम्हारी शरारत थी.’’
‘‘मु?ो भी एक हैंडसम जीजू चाहिए
इसीलिए मैं ने पार्थ का साथ दिया,’’ मौली बोली.
यह सुन पाली भी हंसने लगी. पहली बार उस ने उसे खिलखिलाते हुए देखा.
‘‘देर किस बात की है दी? पार्थ को फोन मिलाइए और मिलने के लिए बुला लो. मैं भी देखना चाहती हूं तुम कैसे अपने प्यार का इजहार करती हो?’’
‘‘सच कहूं कुदरत ने मु?ा से मम्मी छीन कर बहन के रूप में तुम्हें लौटा दिया. एक तुम ही हो जिसे मैं अपना सम?ाती हूं.’’
‘‘सब अपने हैं दी. तुम मम्मी से बात कर के तो देखो उन्होंने कभी हम दोनों में कोई भेद नहीं किया. वे बहुत अच्छी हैं.’’
‘‘जानती हूं उन्हें खोने के डर से मैं उन के पास कभी गई ही नहीं. सोचती थी कहीं तुम्हें भी मेरी जैसी स्थिति से न गुजरना पड़े.’’
‘‘ऐसा कभी नहीं होगा दी,’’ कह कर मौली पाली से लिपट गई.
दोपहर में पाली ने पार्थ को फोन कर मिलने के लिए बुला लिया. पार्थ की खुशी का ठिकाना न था. वह निर्धारित समय से पहले कौफीहाउस पहुंच गया.
आज पाली बिलकुल बदली हुई थी. उस का चेहरा खुशी से चमक रहा था. खुले बाल और टाइट जींस में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.
आते ही पाली ने पार्थ का हाथ पकड़ लिया और बोली, ‘‘चलो, घूमने चलते हैं. आज मैं अपना समय इस जगह पर नहीं तुम्हारे साथ किसी खुली जगह बिताना चाहती हूं.’’
दोनों एकदूसरे के हाथ में हाथ डाले कौफीहाउस से बाहर चले गए. मौली उन्हें दूर तक जाते हुए देखती रही और दी के सुनहरे भविष्य की कल्पना में खो गई.