Drama Story: बंद खिड़की- मंजू का क्या था फैसला

Drama Story: ‘‘मौसी की बेटी मंजू विदा हो चुकी थी. सुबह के 8 बज गए थे. सभी मेहमान सोए थे. पूरा घर अस्तव्यस्त था. लेकिन मंजू की बड़ी बहन अलका दीदी जाग गई थीं और घर में बिखरे बरतनों को इकट्ठा कर के रसोई में रख रही थीं.

अलका को काम करता देख रचना, जो उठने  की सोच रही थी ने पूछा, ‘‘अलका दीदी क्या समय हुआ है?’’

‘‘8 बज रहे हैं.’’

‘‘आप अभी से उठ गईं? थोड़ी देर और आराम कर लेतीं. बहन के ब्याह में आप पूरी रात जागी हो. 4 बजे सोए थे हम सब. आप इतनी जल्दी जाग गईं… कम से कम 2 घंटे तो और सो लेतीं.

अलका मायूस हंसी हंसते हुए बोलीं, ‘‘अरे, हमारे हिस्से में कहां नींद लिखी है. घंटे भर में देखना, एकएक कर के सब लोग उठ जाएंगे और उठते ही सब को चायनाश्ता चाहिए. यह जिम्मेदारी मेरे हिस्से में आती है. चल उठ जा, सालों बाद मिली है. 2-4 दिल की बातें कर लेंगी. बाद में तो मैं सारा दिना व्यस्त रहूंगी. अभी मैं आधा घंटा फ्री हूं.’’ रचना अलका दीदी के कहने पर झट से बिस्तर छोड़ उठ गई. यह सच था कि दोनों चचेरी बहनें बरसों बाद मिली थीं. पूरे 12 साल बाद अलका दीदी को उस ने ध्यान से देखा था. इस बीच न जाने उन पर क्याक्या बीती होगी.

उस ने तो सिर्फ सुना ही था कि दीदी ससुराल छोड़ कर मायके रहने आ गई हैं. वैसे तो 1-2 घंटे के लिए कई बार मिली थीं वे पर रचना ने कभी इस बारे में खुल कर बात नहीं की थी. गरमी की छुट्टियों में अकसर अलका दीदी दिल्ली आतीं तो हफ्ता भर साथ रहतीं. खूब बनती थी दोनों की. पर सब समय की बात थी. रचना फ्रैश हो कर आई तो देखा अलका दीदी बरामदे में कुरसी पर अकेली बैठी थीं.

‘‘आ जा यहां… अकेले में गप्पें मारेंगे…. एक बार बचपन की यादें ताजा कर लें,’’ अलका दीदी बोलीं और फिर दोनों चाय की चुसकियां लेने लगीं.

‘‘दीदी, आप के साथ ससुराल वालों ने ऐसा क्या किया कि आप उन्हें छोड़ कर हमेशा के लिए यहां आ गईं?’’

‘‘रचना, तुझ से क्या छिपाना. तू मेरी बहन भी है और सहेली भी. दरअसल, मैं ही अकड़ी हुई थी. पापा की सिर चढ़ी लाडली थी, अत: ससुराल वालों की कोई भी ऐसी बात जो मुझे भली न लगती, उस का जवाब दे देती थी. उस पर पापा हमेशा कहते थे कि वे 1 कहें तो तू 4 सुनाना. पापा को अपने पैसे का बड़ा घमंड था, जो मुझ में भी था.’’

दीदी ने चाय का घूंट लेते हुए आगे कहा, ‘‘गलती तो सब से होती है किंतु मेरी गलती पर कोई मुझे कुछ कहे मुझे सहन न था. बस मेरा तेज स्वभाव ही मेरा दुश्मन बन गया.’’

चाय खत्म हो गई थी. दीदी के दुखों की कथा अभी बाकी थी. अत: आगे बोलीं, ‘‘मेरे सासससुर समझाते कि बेटा इतनी तुनकमिजाजी से घर नहीं चलते. मेरे पति सुरेश भी मेरे इस स्वभाव से दुखी थे. किंतु मुझे किसी की परवाह न थी. 1 वर्ष बाद आलोक का जन्म हुआ तो मैं ने कहा कि 40 दिन बाद मैं मम्मीपापा के घर जाऊंगी. यहां घर ठंडा है, बच्चे को सर्दी लग जाएगी.’’ मैं दीदी का चेहरा देख रही थी. वहां खुद के संवेगों के अलावा कुछ न था.

‘‘मैं जिद कर के मायके आ गई तो फिर नहीं गई. 6 महीने, 1 वर्ष… 2 वर्ष… जाने कितने बरस बीत गए. मुझे लगा, एक न एक दिन वे जरूर आएंगे, मुझे लेने. किंतु कोई न आया. कुछ वर्ष बाद पता लगा सुरेश ने दूसरा विवाह कर लिया है,’’ और फिर अचानक फफकफफक कर रोने लगीं. मैं 20 वर्ष पूर्व की उन दीदी को याद कर रही थी जिन पर रूपसौंदर्य की बरसात थी. हर लड़का उन से दोस्ती करने को लालायित रहता था. किंतु आज 35 वर्ष की उम्र में 45 की लगती हैं. इसी उम्र में चेहरा झुर्रियों से भर गया था.

मुझे अपलक उन्हें देखते काफी देर हो गई, तो वे बोलीं, ‘‘मेरे इस बूढ़े शरीर को देख रही हो… लेकिन इस घर में मेरी इज्जत कोई नहीं करता. देखती नहीं मेरे भाइयों और भाभियों को? वे मेरे बेटे आलोक और मुझे नौकरों से भी बदतर समझते हैं. पहले सब ठीक था. पापा के जाते ही सब बदल गए. भाभियों की घिसी साडि़यां मेरे हिस्से आती हैं तो भतीजों की पुरानी पैंटकमीजें मेरे बेटे को मिलती हैं. इन के बच्चे पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं और मेरा बेटा सरकारी स्कूल में. 15 वर्ष का है आलोक 7वीं में ही बैठा है. 3 बार 7वीं में फेल हो चुका है. अब क्या कहूं,’’ और दीदी ने साड़ी के किनारे से आंखें पोंछ कर धीरे से आगे कहा, ‘‘भाई अपने बेटों के नाम पर जमीन पर जमीन खरीदते जा रहे हैं, पर मेरे बेटे के लिए क्या है? कुछ नहीं. घर के सारे लोग गरमी की छुट्टियों में घूमने जाते हैं और हम यहां बीमार मम्मी की सेवा और घर की रखवाली करते हैं.

‘‘तू तो अपनी है, तुझ से क्या छिपाऊं… जवान जोड़ों को हाथ में हाथ डाल कर घूमते देखती हूं तो मनमसोस कर रह जाती हूं.’’

मैं दीदी को अवाक देख रही थी, किंतु वे थकी आवाज में कह रही थीं, ‘‘रचना, आज मैं बंद कमरे का वह पक्षी हूं जिस ने अपने पंखों को स्वयं कमरे की दीवारों से टक्कर मार कर तोड़ा है. आज मैं एक खाली बरतन हूं, जिसे जो चाहे पैर से मार कर इधर से उधर घुमा रहा है…’’  आज मैं अकेलेपन का पर्याय बन कर रह गई हूं.’’

दीदी का रोना देखा न जाता था, किंतु आज मैं उन्हें रोकना नहीं चाहती थी. उन के मन में जो था, उसे बह जाने देना चाहती थी. थोड़ी देर चुप रहने के बाद अलका दीदी आगे बोलीं, ‘‘सच तो यह है कि मेरी गलती की सजा मेरा बेटा भी भुगत रहा है… मैं उसे वह सब न दे पाई जिस का वह हकदार था… न पिता का प्यार न सुखसुविधाओं वाला जीवन… कुछ भी तो न मिला. सोचती हूं आखिर मैं ने यह क्या कर डाला? अपने साथ उसे भी बंद गली में ले आई… क्यों मैं ने उस की खुशियों की खिड़की बंद कर दी,’’ और फिर दीदी की रुलाई फूट पड़ी. उन का रोना सुन कर 2-3 रिश्तेदार भी आ गए. पर अच्छा हुआ जो तभी बूआ ने किचन से आवाज लगा दी, ‘‘अरी अलका, आ जल्दी… आलू उबल गए हैं.’’

दीदी साड़ी के पल्लू से अपनी आंखें पोंछते हुए उठ खड़ी हुईं. फिर बोली, ‘‘देख मुझे पता है कि तू भी अपनी मां के पास आ गई है, पति को छोड़ कर. पर सुन इज्जत की जिंदगी जीनी है तो अपना घर न छोड़ वरना मेरी तरह पछताएगी.’’ अलका दीदी की बात सुन कर रचना किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई. यह एक भयानक सच था. उसे लगा कि राजेश और उस के बीच जरा सी तकरार ही तो हुई है. राजेश ने किसी छोटी से गलती पर उसे चांटा मार दिया था, पर बाद में माफी भी मांग ली थी. फिर रचना की मां ने भी उसे समझाया था कि ऐसे घर नहीं छोड़ते. उस ने तुझ से माफी भी मांग ली है. वापस चली जा. रचना सोच रही थी कि अगर कल को उस के भैयाभाभी भी आलोक की तरह उस के बेटे के साथ दुर्व्यवहार करेंगे तो क्या पता मेरे साथ भी दीदी जैसा ही कुछ होगा… फिर नहीं… नहीं… कह कर रचना ने घबरा कर आंखें बंद कर लीं और थोड़ी देर बाद हीपैकिंग करने लगी. अपने घर… यानी राजेश के घर जाने के लिए. उसे बंद खिड़की को खोलना था, जिसे उस ने दंभवश बंद कर दिया था. बारबार उन के कानों में अलका दीदी की यह बात गूंज रही थी कि रचना इज्जत से रहना चाहती हो तो घर अपना घर कभी न छोड़ना.

Drama Story

Fictional Story: अकेला छोड़ दो मुझे

Fictional Story; आजसुरेखा बहुत उदास थी. होती भी क्यों नहीं, जिसे इतना चाहा उसी ने धोखा दे दिया था. सुरेखा ने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर औंधे मुंह लेट गई. बारबार उस के कानों में नीरज की बातें गूंज रही थीं. कितनी आसानी से कह दिया था नीरज ने कि वह निहारिका से प्यार करने लगा है.

सुरेखा ने तड़प कर पूछा था, ‘‘यही बात तुम कुछ दिन पहले तक मुझ से कहा करते थे न नीरज. अब क्या हो गया? मुझ से मन भर गया?’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं सुरेखा. पसंद मुझे तुम भी हो, मगर यदि मेरे पास 2 औप्शन हों, एक निहारिका और दूसरी तुम तो जाहिर है कि मैं निहारिका को ही चुनूंगा. यह बात तुम भी समझ सकती हो. निहारिका एक अविवाहित और स्मार्ट लड़की है जबकि तुम विधवा हो. फिर मैं उसे पसंद क्यों न करूं? हकीकत को समझो प्लीज. सच स्वीकार करो सुरेखा. अगर मैं तुम्हें प्यार करता हूं तो इस का एहसान मानो,’’ नीरज ने बेशर्मी के साथ कहा.

‘‘ठीक है नीरज आज से इस एहसान को अपने पास रखना प्लीज. मेरी तरफ देखना भी मत. कोई फोन मत करना. आज से मेरा और तुम्हारा कोई नात नहीं है. गुडबाय,’’ कह कर सुरेखा चली आई.

उस के मन में तूफान उठ रहा था. अगर वह विधवा है, उस के पति निलय की आकस्मिक मौत हो गई, तो इस में उस की क्या गलती? क्या अब उसे किसी पुरुष का सच्चा प्यार हासिल नहीं हो सकता? क्या कोई उस का हमसफर नहीं बन सकता? अपनी जिंदगी में एक पुरुष की कमी वह बहुत शिद्दत से महसूस करती थी. बच्चों के भरोसे जिंदगी कैसे जी सकती है? आखिर उन की शादी होगी और वे अपनीअपनी दुनिया में व्यस्त हो जाएंगे. फिर कौन देखेगा उसे? एक टीस उस के मन को हमेशा सालती रहती थी.

निलय से सुरेखा की शादी करीब 15 साल पहले हुई थी. निलय एक प्राइवेट  कंपनी में काम करता था और सुरेखा से बहुत प्यार करता था. सुरेखा की जिंदगी बहुत खुशहाल थी. 2 प्यारेप्यारे बच्चे भी हुए. बेटा सुजय जो अब 14 साल का था और बेटी शिवानी जो 12 साल की हो गई थी. शादी के 10 साल बाद ही अचानक निलय की मौत हो गई. उस वक्त बच्चे छोटे थे.

निलय की मौत के बाद करीब एकडेढ़ साल सुरेखा को खुद को संभालने में लगे. वह ज्यादातर वक्त निलय की यादों में खोई रहती थी. बाकी समय बच्चों को संभालने में गुजर जाता. फिर धीरेधीरे बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त होने लगे तब उसे कसक सी महसूस होने लगी. उसे लगता जैसे उसे दोबारा शादी कर लेनी चाहिए. जिंदगी में एक पुरुष की जरूरत बहुत ज्यादा महसूस होने लगी थी.

उसी दौरान शुभंकर नाम का टीचर उस के बच्चों को पढ़ाने के लिए आने लगा. शुभंकर काफी खुशमिजाज इंसान था. जानेअनजाने सुरेखा की आंखें उस से टकराने लगीं. आंखोंआंखों में कहानी आगे बढ़ने लगी. सुरेखा शुभंकर के लिए चायनाश्ता ले कर जाती और फिर वहीं पास में बैठ कर बच्चों की पढ़ाई देखने के बहाने शुभंकर को देखती रहती. धीरेधीरे दोनों के बीच हंसीमजाक भी होने लगा. अब सुरेखा को जिंदगी में खुशियों की एक नई वजह मिल गई थी. अभीअभी सुरेखा ने सपने देखने शुरू ही किए थे कि बच्चे विलेन बन कर सामने आ गए.

‘‘मम्मा हमें शुभंकर सर से अब नहीं पढ़ना,’’ दोनों बच्चों ने एक सुर में कहा.

‘‘ऐसा क्यों?’’ सुरेखा ने चौक कर पूछा.

‘‘क्योंकि वे पढ़ाते कम और आप से बातें ज्यादा करते हैं.’’

‘‘अरे बेटा यह उन के पढ़ाने का तरीका है. तुम लोगों को काम देने के बाद मुझ से बात करते हैं न फिर इस में समस्या क्या है,’’ सुरेखा ने पूछा.

‘‘मम्मा वे टीचर हैं तो पढ़ाना ही उन का काम है, न कि गप्पें मारना और फिर हमें वहे अच्छे भी नहीं लगते.’’

‘‘पर मुझे तो अच्छे लगते हैं. अच्छा एक बात बताओ, अगर शुभंकर सर तुम्हारे पापा बन जाए तो क्या वे तुम्हें अच्छे लगने लगेंगे?’’ सुरेखा ने घुमा कर बड़ी सावधानी से अपने मन की बात कही और बच्चों का दिल टटोलना चाहा.

वे एकदम से भड़क उठे,’’ कभी नहीं मम्मी. सोचना भी मत. हमें शुभंकर सर जैसा पापा तो बिलकुल भी नहीं चाहिए. कभी नहीं.’’

‘‘पर ऐसा क्यों? क्या कमी है उन में? इतने खुशमिजाज हैं, हमेशा हंसाते रहते हैं, तुम लोगों को पढ़ा भी दिया करेंगे. पैसे भी नहीं देने पड़ेंगे,’’ सुरेखा ने समझाना चाहा.

‘‘क्या मम्मा आप हमें बच्चे समझते हो? अब हम नासमझ नहीं हैं. सब समझ में आता है मम्मा. आप हमें बहलाने की कोशिश न करो. हमें शुभंकर सर बिलकुल भी पसंद नहीं हैं. आप उन के प्यार में हो तो आप को कोई कमी नहीं लग रही. पर मुझ से पूछो, न उठनेबैठने का ढंग, न कपड़े पहनने का तरीका, अजीब से लटकेझटके से आ जाते हैं और आप को अच्छे लगते हैं. दोस्तों के बीच हमारी नाक कट जाएगी मम्मी. लोग हमारा कितना मजाक उड़ाएंगे कि टीचर ही पापा बन गया. नहीं मम्मी तुम सोचना भी मत. कभी नहीं वरना हम बात नहीं करेंगे आप से. आप को पता नहीं स्कूल में बच्चे झक्की सर कह कर उन का मजाक उड़ाते हैं,’’ सुजय ने आवेश में कहा.

बेटे की बात सुन कर सुरेखा कुछ कह न सकी. उसे सच में पता नहीं था कि उस के बच्चे इतने बड़े हो गए हैं. इस घटना के बाद उस ने शुभंकर के बारे में सोचना छोड़ दिया.

शुभंकर के अलावा सुरेखा की जिंदगी में रवीश भी आया था. रवीश निलय का कुलीग था और अकसर सुरेखा का हालचाल पूछने के बहाने मिलने चला आता था. शुरूशुरू में वह अकसर ग्रैच्युटी और पीएफ आदि के डौक्यूमैंट्स के सिलसिले में उस से मिलने आता था. धीरेधीरे रवीश सुरेखा को अच्छा लगने लगा.

रवीश भले ही शादीशुदा था, मगर कहते हैं न कि जब किसी पर दिल आ जाता है तो फिर इंसान कोई भी परवाह नहीं करता. यही हाल सुरेखा का भी था. उस का साथ पा कर सुरेखा खुद को सुरक्षित और खुश महसूस करती थी. इसलिए वह भी अब रवीश को बहानेबहाने से बुलाने लगी थी. कभी शौपिंग करने के लिए तो कभी किसी और काम के लिए वह रवीश को ही याद करती. सास भी कुछ कहती नहीं थी क्योंकि सुरेखा का दुख बहुत ज्यादा था और रवीश की संगत से यह दुख कुछ कम होने लगा था. उस वक्त बच्चे भी छोटे थे. धीरेधीरे दोनों के बीच का आकर्षण बढ़ने लगा. अब वे काम के अलावा भी सिर्फ मिलने के लिए बाहर जाने लगे. अकसर छिपछिप कर भी मिलने लगे.

एक समय ऐसा भी आया जब रवीश अपनी बीवी को तलाक दे कर सुरेखा से शादी करने को तैयार था. सुरेखा ने दबी जबान से सास को इन्फौर्म किया कि वह रवीश से शादी कर उसे अपना हमसफर बनाना चाहती है.

सास एकदम से बिगड़ गईं और बोली, ‘‘नहीं बहू उस की जाति अलग है. कहां वह बढ़ई और कहां हम राजपूत. यह बात सोचना भी मत कि कभी मैं तेरी शादी उस से करवाने की सोच सकती हूं. अपनी जाति में तुम्हें कोई अच्छा लड़का मिलता है तो भले ही सोचा जा सकता है और फिर वह विवाहित भी है. इसलिए उस की तरफ से अपने मन को बिलकुल हटा लो.’’

सुरेखा ने उस समय भी सास की बात मान कर रवीश से किनारा कर लिया था.

इस बीच सुरेखा के घर के सामने वाले फ्लैट में एक नया परिवार आया था. बूढ़े मांबाप  के अलावा घर में एक प्रौढ़ और 12 साल की एक लड़की थी. सुरेखा का समझते देर नहीं लगी कि वह प्रौढ़ अपनी बेटी और मांबाप के साथ रहने आया है. दोनों के ही मकान फर्स्ट फ्लोर पर थे. घर की सफाई आदि करते बरबस ही उस की नजरें सामने के घर की तरफ उठ जाती थीं. प्रौढ़ व्यक्ति कभी किचन में खाना बना रहा होता तो कभी फोन पर बातें करता हुआ बालकनी तक आ जाता.

एक दिन मौका मिलने पर सुरेखा ने उस से बात शुरू की. उस ने बताया कि वह विधुर है. पत्नी की एक हादसे में मौत हो गई थी. उस ने अपना नाम प्रताप चंद्र बताया. अब सुरेखा अकसर ही उस से बातें करने लगी थी. कई बार जब वह घर में कुछ नया बनाती तो प्रताप के घर दे आती. प्रताप भी कोई न कोई रैसिपी सीखने के बहाने उस के घर आने लगा. अकसर वे बालकनी में खड़े हो कर भी एकदूसरे से दुनियाजहान की बातें करते. प्रताप काफी इंटैलिजैंट था. वह पेशे से इंजीनियर था, मगर उस का सामान्य ज्ञान भी कमाल का था.

कितनी ही रोचक बातें सुना कर वह सुरेखा का मन लगाए रखता था. प्रताप की बेटी अकसर उस के घर खेलने आने लगी. दोनों परिवारों के बीच मेलजोल बढ़ा तो वे साथ में घूमने जाने लगे. प्रताप और सुरेखा भी एकदूसरे के करीब आने लगे थे.

तब एक दिन सुरेखा ने अपने मन  की बात सास को बताई, ‘‘मां कैसा हो यदि मैं प्रताप से शादी कर लूं?’’

‘‘बेटा मैं भी यह बात काफी समय से सोच रही हूं, मगर एक ही शंका है मन में…’’

‘‘वह क्या मांजी?’’

‘‘देख बेटा शादीब्याह के मामले में कुंडलियां देखनी जरूरी होती हैं खासकर तब जबकि उस की बीवी की हादसे में मौत हुई. मैं एक बार उस की कुंडली देख कर दिल की तसल्ली करना चाहती हूं,’’ सास ने कहा.

‘‘ठीक है मांजी.’’

अगले ही दिन वह प्रताप की कुंडली ले आई. सास ने अपने पंडित को  कुंडली दिखाई और फिर रिश्ते के लिए साफ मना करती हुई बोली, ‘‘बहू, पंडितजी बता रहे थे कि प्रताप की कुंडली में बहुत गहरा दोष है. उसे पत्नी सुख नहीं लिखा है. बेटा मैं नहीं चाहती कि उस से शादी कर उस की पत्नी की ही तरह कहीं तू भी… नहींनहीं बहू फिर इन बच्चों का क्या होगा?’’

‘‘पर मां आज के समय में ये सब बातें कौन मानता है?’’

‘‘मैं मानती हूं. तू इस शादी की सोचना भी मत,’’ सास ने एक बार फिर अपना फैसला सुना दिया.

सास के दबाव डालने पर सुरेखा ने प्रताप से शादी का विचार त्याग दिया. प्रताप को सुरेखा के इस फैसले से बहुत धक्का लगा. उस ने मेलजोल काफी कम कर दिया और 2 माह के अंदर ही किसी और से शादी भी कर ली. वह चैन से अपनी जिंदगी गुजारने लगा और इधर सुरेखा एक बार फिर अकेली रह गई. इस बात को कई साल हो गए. सुरेखा के दिल में एक पुरुष के साथ की जो चाह थी वह दम तोड़ चुकी थी. रहीसही कसर आज नीरज ने पूरी कर दी थी.

नीरज उस की फ्रैंड का कजिन था. फ्रैंड ने ही उसे नीरज से मिलवाया था. नीरज की पत्नी, शादी के 5-6 महीने बाद ही किसी और के साथ भाग गई थी और वह अकेला रह गया था. उसे भी पार्टनर की तलाश थी, इसलिए सुरेखा के साथ उस की ट्यूनिंग अच्छी बैठने लगी थी. वह नीरज के साथ 1-2 बार फिल्म देखने भी जा चुकी थी. दोनों घंटों प्यार की बातें करते.

इस बार सुरेखा ने तय किया था कि वह सीधा शादी कर के घर वालों को बताएगी. पर इस की नौबत ही नहीं आ सकी. इस से पहले ही दोनों के बीच में निहारिका नाम की एक स्टाइलिश सी लड़की ने ऐंट्री मारी और नीरज को चुरा लिया.

नीरज ने साफसाफ शब्दों में कह दिया था कि वह निहारिका को चुनेगा उसे नहीं क्योंकि वह एक विधवा है जबकि निहारिका खूबसूरत अविवाहित लड़की है.

अचानक सुरेखा फूटफूट कर रोने लगी. बहुत देर तक रोती रही. उसे  महसूस हो रहा था जैसे अकेला रहना ही उस की नियति बन चुकी है. बच्चों और सास के समझानेबुझाने से वह थोड़ी शांत हुई और नौर्मल होने की कोशिश करने लगी. मगर उस के चेहरे की हंसी पूरी तरह गायब हो गई थी. एक उदासी उस के चेहरे पर हमेशा पसरी रहती. वह डिप्रैशन का शिकार हो चुकी थी. अकसर कमरा बंद कर खामोश बैठी रहती.

बच्चे मां की इस हालत के लिए खुद को जिम्मेदार मान रहे थे. सास भी यह बात समझ रही थी कि यदि समय रहते सही फैसला ले लिया होता और उसे पुनर्विवाह कर लेने दिया होता तो आज उस की यह हालत नहीं होती. मगर अब वे केवल पछता सकते थे क्योंकि सुरेखा ने अपनी हंसी और खुशियों से हमेशा के लिए दूरी बना ली थी.

एक दिन सास ने प्यार से उस का माथा सहलाते हुए कहा, ‘‘चल बहू ठीक से तैयार हो जा. तुझे किसी से मिलवाना है.’’

‘‘किस से मांजी?’’ उदास स्वर में सुरेखा ने पूछा.

‘‘मेरी सहेली का भतीजा है. उस की भी बीवी मर चुकी है. तेरी शादी की बात चलाई है उस से. बहुत अ?च्छा लड़का है.’’

‘‘केवल विधुर या अच्छा होना ही काफी नहीं मां, आप ने उस की कुंडली देखी? 36 गुण  मिला लिए और उस की जाति देखी? आप ने बच्चों से पूछा? बच्चे मना तो नहीं कर रहे और पंडितजी ने कोई दोष तो नहीं बताया? फिर यह भी तो सोचो कि लोग क्या कहेंगे? मांजी आप जानती हो न मेरी शादी से पहले सैकड़ों सवाल आगे आ जाते हैं.

‘‘उन के जवाब ढूंढ़तेढूंढ़ते मैं थक चुकी हूं. मुझे शादी नहीं करनी. सुना मांजी मुझे नहीं करनी शादी. मेरी जिंदगी में अकेला रहना लिखा है. तभी तो कितने ही पुरुष मेरी जिंदगी में आए, मगर हर बार कोई न कोई सवाल सामने आता रहा और मेरा सपना टूटता रहा, मेरी जिंदगी को सूना करता रहा. अब मुझे इस झांसे में नहीं आना. नहीं करनी मुझे शादी. बस बहुत हो गया. प्लीज अकेला छोड़ दो मुझे,’’ कहतेकहते सुरेखा फूटफूट कर रो पड़ी.

Fictional Story

Hindi Short Story: जीने की इच्छा- कैसे अरुण ने दिखाया बड़प्पन

Hindi Short Story: ‘‘जल्दी करो मां. मुझे देर हो रही है. फिर ट्रेन में जगह नहीं मिलेगी,’’ अरुण ने कहा.

मां बोलीं, ‘‘तेरी गाड़ी तो 12 बजे की है. अभी तो 7 भी नहीं बजे हैं.’’

‘‘मां, तुम समझती क्यों नहीं हो. मैं यार्ड में ही जा कर डब्बे में बैठ जाऊंगा. प्लेटफार्म पर सभी जनरल डब्बे बिलकुल भरे हुए ही आते हैं,’’ अरुण बोला.

उन दिनों ‘श्रमजीवी ऐक्सप्रैस’ ट्रेन पटना जंक्शन से 12 बजे खुल कर अगले दिन सुबह 5 बजे नई दिल्ली पहुंचती थी. अरुण को एक इंटरव्यू के लिए दिल्ली जाना था. अगले दिन सुबह के 11 बजे दिल्ली के दफ्तर में पहुंचना था.

अरुण के पिता किसी प्राइवेट कंपनी में चपरासी थे. अभी कुछ महीने पहले ही वे रिटायर हुए थे. वे कुछ दिनों से बीमार थे. वे किसी तरह 2 बेटियों की शादी कर चुके थे. सब से छोटे बेटे अरुण ने बीए पास करने के बाद कंप्यूटर की ट्रेनिंग ली थी. वह एक साल से बेकार बैठा था.

अरुण 1-2 छोटीमोटी ट्यूशन करता था. उस के पास स्लीपर क्लास के भी पैसे नहीं थे, इसीलिए पटना से दिल्ली जनरल डब्बे में जाना पड़ रहा था.

मां ने कहा, ‘‘बस हो गया. मैं ने  परांठा और भुजिया एक पैकेट में पैक कर दिया है. तुम याद से अपने बैग में रख लेना.’’

पिता ने भी बिस्तर पर पड़ेपड़े कहा, ‘‘जाओ बेटे, अपने सामान का खयाल रखना.’’

अरुण मातापिता को प्रणाम कर स्टेशन के लिए निकल पड़ा. यार्ड में जा कर एक डब्बे में खिड़की के पास वाली सिंगल सीट पर कब्जा जमा कर उस ने चैन की सांस ली.

ट्रेन प्लेटफार्म पर पहुंची, तो चढ़ने वालों की बेतहाशा भीड़ थी. अरुण जिस खिड़की वाली सीट पर बैठा था, वह इमर्जैंसी खिड़की थी. एक लड़की डब्बे में घुसने की नाकाम कोशिश कर रही थी. उस लड़की ने अरुण के पास आ कर कहा, ‘‘आप इमर्जैंसी खिड़की खोलें, तो मैं भी डब्बे में आ सकती हूं. मेरा इस ट्रेन से दिल्ली जाना बहुत जरूरी है.’’

अरुण ने उसे सहारा दे कर खिड़की से अंदर डब्बे में खींच लिया. लड़की पसीने से तरबतर थी. दुपट्टे से मुंह का पसीना पोंछते हुए उस ने अरुण को ‘थैंक्स’ कहा. थोड़ी देर में गाड़ी खुली, तो अरुण ने अपनी सीट पर जगह बना कर लड़की को बैठने को कहा. पहले तो वह झिझक रही थी, पर बाद में और लोगों ने भी बैठने को कहा, तो वह चुपचाप बैठ गई.

तकरीबन 2 घंटे बाद ट्रेन बक्सर पहुंची. यह बिहार का आखिरी स्टेशन था. यहां कुछ लोकल मुसाफिरों के उतरने से राहत मिली. अरुण के सामने वाली सीट खाली हुई, तो वह लड़की वहां जा बैठी.

अरुण ने लड़की का नाम पूछा, तो वह बोली, ‘‘आभा.’’

अरुण बोला, ‘‘मैं अरुण.’’

दोनों में बातें होने लगीं. अरुण ने पूछा, ‘‘पटना में तुम कहां रहती हो?’’

आभा बोली, ‘‘सगुना मोड़… दानापुर के पास.’’

‘‘मैं बहादुरपुर… मैं पटना के पूर्वी छोर पर हूं और तुम पश्चिमी छोर पर. दिल्ली में कहां जाना है?’’

‘‘कल मेरा एक इंटरव्यू है.’’

‘‘वाह, मेरा भी कल एक इंटरव्यू है. बुरा न मानो, तो क्या मैं जान सकता हूं कि किस कंपनी में इंटरव्यू है?’’

आभा बोली, ‘‘लाल ऐंड लाल ला असोसिएट्स में.’’

अरुण तकरीबन अपनी सीट से उछल कर बोला, ‘‘वाह, क्या सुहाना सफर है. आगाज से अंजाम तक हम साथ रहेंगे.’’

‘‘क्या आप भी वहीं जा रहे हैं?’’

अरुण ने रजामंदी में सिर हिलाया और मुसकरा दिया. रातभर दोनों अपनीअपनी सीट पर बैठेबैठे सोतेजागते रहे थे. ट्रेन तकरीबन एक घंटा लेट हो गई थी. इस के बावजूद काफी देर से गाजियाबाद स्टेशन पर खड़ी थी. सुबह के 7 बज चुके थे. अरुण नीचे उतर कर लेट होने की वजह पता लगाने गया.

अरुण अपनी सीट पर बैठते हुए बोला, ‘‘गाजियाबाद और दिल्ली के बीच में एक गाड़ी पटरी से उतर गई है. आगे काफी ट्रेनें फंसी हैं. ट्रेन के दिल्ली पहुंचने में काफी समय लग सकता है.’’

आभा यह सुन कर घबरा गई. अरुण ने उसे शांत करते हुए कहा, ‘‘डोंट वरी. हम दोनों यहीं उतर जाते हैं. यहीं फ्रैश हो कर कुछ चायनाश्ता कर लेते हैं. फिर यहां से आटोरिकशा ले कर सीधे कनाट प्लेस एक घंटे के अंदर पहुंच जाएंगे.’’

दोनों ने गाजियाबाद स्टेशन पर ही चायनाश्ता किया. फिर आटोरिकशा से दोनों कंपनी पहुंचे. दोनों ने अलगअलग इंटरव्यू दिए. इस के बाद कंपनी के मालिक मोहनलाल ने दोनों को एकसाथ बुलाया.

मोहनलाल ने दोनों से कहा, ‘‘देखो, मैं भी बिहार का ही हूं. दोनों की क्वालिफिकेशंस एक ही हैं. इंटरव्यू में दोनों की परफौर्मेंस बराबर रही है, पर मेरे पास तो एक ही जगह है. अब तुम लोग बाहर जा कर तय करो कि किसे नौकरी की ज्यादा जरूरत है. मुझे बता देना, मैं औफर लैटर इशू कर दूंगा.’’

अरुण और आभा दोनों ने बाहर आ कर बात की. अपनीअपनी पारिवारिक और माली हालत बताई.

आभा की मां विधवा थीं. उस की एक छोटी बहन भी थी. वह पटना के कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में पार्ट टाइम नौकरी करती थी, पर उसे बहुत कम पैसे मिलते थे. परिवार को उसी को देखना होता था.

अरुण ने आभा के पक्ष में सहमति जताई. आभा को वह नौकरी मिल गई. मालिक मोहनलाल अरुण से बहुत खुश हुआ और बोला, ‘‘नौकरी तो तुम भी डिजर्व करत थे. मैं तुम से बहुत खुश हूं. वैसे तो किराया देने का कोई करार नहीं था. फिर भी मैं ने अकाउंटैंट को कह दिया है कि तुम्हें थर्ड एसी का अपडाउन रेल किराया मिल जाएगा. जाओ, जा कर पैसे ले लो.’’

अरुण ने पैसे ले लिए. आभा उसे धन्यवाद देते हए बोली, ‘‘यह दिन मैं कभी नहीं भूलूंगी. मिस्टर मोहनलाल ने मुझे बताया कि तुम ने मेरी खाितर बड़ा त्याग किया है.’’

दोनों ने एकदूसरे का फोन नंबर लिया और संपर्क में रहने को कहा.

अरुण जनरल डब्बे में बैठ कर पटना लौट आया. उस ने किराए का काफी पैसा बचा लिया था. मातापिता को जब पता चला कि उसे नौकरी नहीं मिली, तो वे दोनों उदास हो गए.

कुछ ही दिनों में अरुण के पिता चल बसे. अरुण किसी तरह 2-3 ट्यूशन कर अपना काम चला रहा था. जिंदगी से उस का मन टूट चुका था. कभी सोचता कि घर छोड़ कर भाग जाए, तो कभी सोचता गंगा में जाकर डूब जाए. फिर अचानक बूढ़ी मां की याद आती, तो आंखों में आंसू भर आते.

एक दिन अरुण बाजार से कुछ सामान खरीदने गया. एक 16-17 साल का लड़का अपने कंधे पर एक बैग लटकाए कुछ बेच रहा था. उस के एक पैर में पोलियो का असर था. लाठी के सहारे चलता हुआ वह अरुण के पास आ कर बोला, ‘‘भैया, क्या आप को पापड़ चाहिए? 10 रुपए का एक पैकेट है.’’

अरुण ने कहा, ‘‘नहीं चाहिए पापड़.’’

लड़के ने थैले से एक शीशी निकाल कर कहा, ‘‘आम का अचार है. चाहिए? पापड़ और अचार दोनों घर के बने हैं. मां बनाती हैं.’’ अरुण के मन में दया आ गई. उस के पास 5 रुपए ही बचे थे. उस ने लड़के को देते हुए कहा, ‘‘मुझे कुछचाहिए तो नहीं, पर तुम इसे रख लो.’’

अरुण ने रुपए उस के हाथ में पकड़ा दिए. दूसरे ही पल वह लड़का गुस्से से बोला, ‘‘मैं विकलांग हूं, पर भिखारी नहीं. मैं मेहनत कर के खाता हूं. जिस दिन कुछ नहीं कमा पाता, मांबेटे पानी पी कर सो जाते हैं.’’

इतना बोल कर उस लड़के ने रुपए अरुण को लौटा दिए. पर वह अरुण की आंखों में उम्मीद की किरण जगा गया. वह सोचने लगा, ‘जब यह लड़का जिंदगी से हार नहीं मान सकता है, तो मैं क्यों मानूं?’

अरुण के पास दिल्ली में मिले कुछ रुपए बचे थे. वह कोलकाता गया. वहां के मंगला मार्केट से थोक में कुछ जुराबें, रूमाल और गमछे खरीद लाया. ट्यूशन के बाद बचे समय में न्यू मार्केट और महावीर मंदिर के पास फुटपाथ पर उन्हें बेचने लगा.

इस इलाके में सुबह से ले कर देर रात तक काफी भीड़ रहती थी. अरुण की अच्छी बिक्री हो जाती थी.

शुरू में अरुण को कुछ झिझक होती थी, पर बाद में उस का इस में मन लग गया. इस तरह उस ने देखा कि एक हफ्ते में तकरीबन 7-8 सौ रुपए, तो कभी हजार रुपए की बचत होती थी.

इस बीच बहुत दिन बाद उसे आभा का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘अगले हफ्ते मेरी शादी होने वाली है. कार्ड पोस्ट कर दिया है. तुम जरूर आना और मां को भी साथ लाना.’’

अरुण मां के साथ आभा की शादी में सगुना मोड़ उस के घर गया. आभा ने अपनी मां, बहन और पति से उन्हें मिलवाया और कहा, ‘‘मैं जिंदगीभर अरुण की कर्जदार रहूंगी. मुझे नौकरी अरुण की वजह से ही मिली थी.’’

शादी के बाद आभा दिल्ली चली गई. अरुण की दिनचर्या पहले जैसी हो गई.

एक दिन आभा का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘मेरे पति गुड़गांव की एक गारमैंट फैक्टरी में डिस्पैच सैक्शन में हैं. फैक्टरी से मामूली डिफैक्टिव कपड़े सस्ते दामों में मिल जाते हैं. तुम चाहो, तो इन्हें बेच कर अच्छाखासा मुनाफा कमा सकते हो.’’

अरुण बोला, ‘नेकी और पूछपूछ… मैं गुड़गांव आ रहा हूं.’

इधर अरुण उस पापड़ वाले लड़के का स्थायी ग्राहक हो गया था. उस का नाम रामू था. हर हफ्ते एक पैकेट पापड़ और अचार की शीशी उस से लिया करता था. अब अरुण महीने 2 महीने में एक बार दिल्ली जा कर कपड़े लाता और उन्हें अच्छे दाम पर बेचता.

धीरेधीरे अरुण का कारोबार बढ़ता गया. उस ने कंकड़बाग में एक छोटी सी दुकान किराए पर ले ली थी. बीचबीच में कोलकाता से भी थोक में कपड़े लाया करता. कारोबार बढ़ने पर उस ने एक बड़ी दुकान ले ली.

अरुण की शादी थी. उस ने आभा को भी बुलाया. वह भी पति के साथ आई थी. अरुण ने उस पापड़ वाले लड़के को भी अपनी शादी में बुलाया था.

शादी हो जाने के बाद जब अरुण अपनी मां के साथ मेहमानों को विदा कर रहा था, अरुण ने आभा को उस की मदद के लिए थैंक्स कहा.

आभा ने कहा, ‘‘अरे यार, नो मोर थैंक्स. हिसाब बराबर. हम दोस्त  हैं.’’

फिर अरुण ने रामू को बुला कर सब से परिचय कराते हुए कहा, ‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, इस लड़के की वजह से हूं. मैं तो जिंदगी से निराश हो चुका था. मेरे अंदर जीने की इच्छा को इस स्वाभिमानी मेहनती रामू ने जगाया.’’

तब अरुण रामू से बोला, ‘‘मुझे अपनी दुकान में एक सेल्समैन की जरूरत है. क्या तुम मेरी मदद करोगे?’’

रामू ने हामी भर कर सिर झुका कर अरुण को नमस्कार किया.

अरुण बोला, ‘‘अब तुम्हें घूमघूम कर सामान बेचने की जरूरत नहीं है. मैं ने यहां के विधायक को अर्जी दी है तुम्हें अपने फंड से एक तिपहिया रिकशा देने की. तुम उसे आसानी से चला सकते हो और आजा सकते हो.’’

अरुण, आभा, रामू और बाकी सभी की आंखें खुशी से नम थीं. तीनों एकदूसरे के मददगार जो बने थे.

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Family Kahani: जहर का पौधा- भाभी का मन कठोर था

Family Kahani: बहुत ज्यादा थक गया था डाक्टर मनीष. अभीअभी भाभी का औपरेशन कर के वह अपने कमरे में लौटा था. दरवाजे पर भैया खड़े थे. उन की सफेद हुई जा रही आंखों को देख कर भी वह उन्हें ढाढ़स न बंधा सका था. भैया के कंधे पर हाथ रखने का हलका सा प्रयास मात्र कर के रह गया था. टेबललैंप की रोशनी बुझा कर आरामकुरसी पर बैठना उसे अच्छा लगा था. वह सोच रहा था कि अगर भाभी न बच सकीं तो भैया जरूर उसे हत्यारा कहेंगे. भैया कहेंगे कि मनीष ने बदला निकाला है. भैया ऐसा न सोचें, वह यह मान नहीं सकता. उन्होंने पहले डाक्टर चंद्रकांत को भाभी के औपरेशन के लिए बुलाया था. डाक्टर चंद्रकांत अचानक दिल्ली चले गए थे. इस के बाद भैया ने डाक्टर विमल को बुलाने की कोशिश की थी, पर जब वे भी न मिले तो अंत में मजबूर हो कर उन्होंने डाक्टर मनीष को ही स्वीकार कर लिया था.

औपरेशनटेबल पर लेटने से पहले भाभी आंखों में आंसू लिए भैया से मिल चुकी थीं, मानो यह उन का अंतिम मिलन हो. उस ने भाभी को बारबार ढाढ़स दिलाया था, ‘‘भाभी, आप का औपरेशन जरूर सफल होगा.’’ किंतु भीतर ही भीतर भाभी उस का विश्वास न कर सकी थीं. और भैया कैसे उस पर विश्वास कर लेते? वे तो आजीवन भाभी के पदचिह्नों पर चलते रहे हैं.

डाक्टर मनीष जानता है कि आज से 30 वर्ष पहले जहर का जो पौधा भाभी के मन में उग आया था, उसे वह स्नेह की पैनी से पैनी कुल्हाड़ी से भी नहीं काट सका. वह यह सोच कर संतुष्ट रह गया था कि संसार की कई चीजों को मानव चाह कर भी समाप्त करने में असमर्थ रहता है. जहर के इस पौधे का बीजारोपण भाभी के मन में उन की शादी के समय हुआ था. तब मनीष 10 वर्ष का रहा होगा. भैया की बरात बड़ी धूमधाम से नरसिंहपुर गई थी. उसे दूल्हा बने भैया के साथ घोड़े पर बैठने में बड़ा आनंद आ रहा था. आने वाली भाभी के प्रति सोचसोच कर उस का बालकमन हवा से बातें कर रहा था. मां कहा करती थीं, ‘मनीष, तेरी भाभी आ जाएगी तो तू गुड्डो का मुकाबला करने के काबिल हो जाएगा. यदि गुड्डो तुझे अंगरेजी में चिढ़ाएगी तो तू भी भाभी से सारे अर्थ समझ कर उसे जवाब दे देना.’ वह सोच रहा था, भाभी यदि उस का पक्ष लेंगी तो बेचारी गुड्डो अकेली पड़ जाएगी. उस के बाद मन को बेचारी गुड्डो पर रहरह कर तरस आ रहा था.

भैया का ब्याह देखने के लिए वह रातभर जागा था और घूंघट ओढ़े भाभी को लगातार देखता रहा था. सुबह बरात के लौटने की तैयारी होने लगी थी. विवाह के अवसर पर नरसिंहपुर के लोगों ने सप्रेम भेंट के नाम पर वरवधू को बरतन, रुपए और अन्य कई किस्मों की भेंटें दी थीं. बरतन और अन्य उपहार तो भाभी के पिताजी ने दे दिए थे किंतु रुपयों के मामले में वे अड़ गए थे. इस बात को मनीष के पिता ने भी तूल दे दिया था. भाभी के पिता का कहना था कि वे रुपए लड़की के पिता के होते हैं, जबकि मनीष के पिता कह रहे थे कि यह भी लोगों द्वारा वरवधू को दिया गया एक उपहार है, सो, लड़की के पिता को इस पर अपनी निगाह नहीं रखनी चाहिए.

बात बढ़ गई थी और मामला सार्वजनिक हो गया था. तुरंत ही पंचायत बैठाई गई. पंचायत में फैसला हुआ कि ये रुपए वरवधू के खाते में ही जाएंगे. इस फैसले से भाभी के पिता मन ही मन सुलग उठे. उस समय तो वे मौन रह गए, किंतु बाद में इस का बदला निकालने का उन्होंने प्रण कर लिया.

उन की बेटी ससुराल से पहली बार 4 दिनों के लिए मायके आई तो उन्होंने बेटी के सामने रोते हुए कहा था, ‘बेटा, तेरे ससुर ने जिस दिन से मेरा अपमान किया है, मैं मन ही मन राख हुआ जा रहा हूं.’

भाभी ने पिता को सांत्वना देते हुए कहा था, ‘पिताजी, आप रोनाधोना छोडि़ए. मैं प्रण करती हूं कि आप के अपमान का बदला ऐसे लूंगी कि ससुर साहब का घर उजड़ कर धूल में मिल जाएगा. ससुरजी को मैं बड़ी कठोर सजा दूंगी.’ इस के पश्चात भाभी ने ससुराल आते ही किसी उपन्यास की खलनायिका की तरह शतरंज की बिसात बिछा दी. चालें चलने वाली वे अकेली थीं. सब से पहले उन्होंने राजा को अपने वश में किया. भैया के प्रति असाधारण प्रेम की जो गंगा उन्होंने बहाई, तो भैया उसी को वैतरणी समझने लगे. भैया ने पारिवारिक कर्तव्यों की उपेक्षा सी कर दी.

मनीष को अच्छी तरह याद है कि एक बार वह महल्ले के बच्चों के साथ गुल्लीडंडा खेल रहा था. गुल्ली अचानक भाभी के कमरे में घुस गई थी. वह गुल्ली उठाने तेजी से लपका. रास्ते में खिड़की थी, उस ने अंदर निगाह डाली. भाभी एक चाबी से माथे पर घाव कर रही थीं. जब वह दरवाजे से हो कर अंदर गया तो भाभी सिर दबाए बैठी थीं. उस ने बड़ी कोमलता से पूछा, ‘क्या हुआ, भाभी?’ तब वे मुसकरा कर बोली थीं, ‘कुछ नहीं.’ वह गुल्ली उठा कर वापस चला गया था.

लेकिन शाम को सब के सामने भैया ने मनीष को चांटे लगाते हुए कहा था, ‘बेशर्म, गुल्ली से भाभी के माथे पर घाव कर दिया और पूछा तक नहीं.’ भाभी के इस ड्रामे पर तो मनीष सन्न रह गया था. उस के मुंह से आवाज तक न निकली थी. निकलती भी कैसे? उम्र में बड़ी और आदर करने योग्य भाभी की शिकायत भैया से कर के उसे और ज्यादा थोड़े पिटना था. भैया घर के सारे लोगों पर नाराज हो रहे थे कि उन की पत्नी से कोई भी सहानुभूति नहीं रखता. सभी चुपचाप थे. किसी ने भी भैया से एक शब्द नहीं कहा था. इस के बाद भैया ने पिताजी, मां और भाईबहनों से बात करना छोड़ दिया था. वे अधिकांश समय भाभी के कमरे में ही गुजारते थे.

इस के बाद एक सुबह की बात है. भैया को सुबह जल्दी जाना था. भाभी भैया के लिए नाश्ता तैयार करने के लिए चौके में आईं. चौके में सभी सदस्य बैठे थे, सभी को चाय का इंतजार था. मनीष रो रहा था कि उसे जल्दी चाय चाहिए. मां उसे समझा रही थीं, ‘बेटा, चाय का पानी चूल्हे पर रखा है, अभी 2 मिनट में उबल जाएगा.’ उसी समय भाभी ने चूल्हे से चाय उतार कर नाश्ते की कड़ाही चढ़ा दी. मां ने मनीष के आंसू देखते हुए कहा, ‘बहू, चाय तो अभी दो मिनट में बन जाएगी, जरा ठहर जाओ न.’

इतनी सी बात पर भाभी ने चूल्हे पर रखी कड़ाही को फेंक दिया. अपना सिर पकड़ कर वे नीचे बैठ गईं और जोर से बोलीं, ‘मैं अभी आत्महत्या कर लेती हूं. तुम सब लोग मुझ से और मेरे पति से जलते हो.’ इतना सुन कर भैया दौड़ेदौड़े आए और भाभी का हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गए. वे भी चीखने लगे, ‘मीरा, तुम इन जंगलियों के बीच में न बैठा करो. खाना अपने कमरे में ही बनेगा. ये अनपढ़ लोग तुम्हारी कद्र करना क्या जानें.’

भैया के आग्रह पर 4-5 दिनों बाद ही घर के बीच में दीवार उठा दी गई. सारा सामान आधाआधा बांट लिया गया. इस बंटवारे से पिताजी को बहुत बड़ा धक्का लगा था. वे बीमार रहने लगे थे. उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र लिख दिया था.

भैया केंद्र सरकार की ऊंची नौकरी में थे. अच्छाखासा वेतन उन्हें मिलता था. मनीष को याद नहीं है कि विवाह के बाद भैया ने एक रुपया भी पिताजी की हथेली पर धरा हो. पिताजी को इस बात की चिंता भी न थी. पुरानी संपत्ति काफी थी, घर चल जाता था. एक दिन भाभी के गांव से कुछ लोग आए. गरमी के दिन थे. मनीष और घर के सभी लोग बाहर आंगन में सो रहे थे. अचानक मां आगआग चिल्लाईं. सभी लोग शोर से जाग गए. देखा तो घर जल रहा था. पड़ोसियों ने पानी डाला, दमकल विभाग की गाडि़यां आईं. किसी तरह आग पर काबू पाया गया. घर का सारा कीमती सामान जल कर राख हो गया था. घर के नाम पर अब खंडहर बचा था. भैया के हिस्से वाले घर को अधिक क्षति नहीं पहुंची थी. पिताजी ने कमचियों की दीवार लगा कर किसी तरह घर को ठीक किया था. मां रोती रहीं. मां का विश्वास था कि यह करतूत भाभी के गांव से आए लोगों की थी. पिताजी ने मां को उस वक्त खामोश कर दिया था, ‘बिना प्रमाण के इस तरह की बातें करना अच्छा नहीं होता.’

साहूकारी में लगा रुपया किसी तरह एकत्र कर के पिताजी ने मनीष की दोनों बहनों का विवाह निबटाया था. उस समय मनीष 10वीं कक्षा का विद्यार्थी था. मां को गठियावात हो गया था. वे बिस्तर से चिपक गई थीं. पिताजी मां की सेवा करते रहे. मगर सेवा कहां तक करते? दवा के लिए तो पैसे थे ही नहीं. मनीष को स्कूल की फीस तक जुटाना बड़ा दुरूह कार्य था, सो, पिताजी ने, जो अब अशक्त और बूढ़े हो गए थे, एक जगह चौकीदारी की नौकरी कर ली.

भाभी को उन लोगों पर बड़ा तरस आया था. वे कहने लगीं, ‘मनीष, हमारे यहां खाना खा लिया करेगा.’ मां के बहुत कहने पर मनीष तैयार हो गया था. वह पहले दिन भाभी के घर खाने को गया तो भाभी ने उस की थाली में जरा सी खिचड़ी डाली और स्वयं पड़ोसी के यहां गपें लड़ाने चली गईं. उस दिन वह बेचारा भूखा ही रह गया था.

मनीष ने निश्चय कर लिया था कि अब वह भाभी के घर खाना खाने नहीं जाएगा. इस का परिणाम यह निकला कि भाभी ने सारे महल्ले में मनीष को अकड़बाज की उपाधि दिलाने का प्रयास किया. मां कई दिनों तक बीमार पड़ी रहीं और एक दिन चल बसीं. मनीष रोता रह गया. उस के आंसू पोंछने वाला कोई भी न था.

पिताजी का अशक्त शरीर इस सदमे को बरदाश्त न कर सका. वे भी बीमार रहने लगे. अचानक एक दिन उन्हें लकवा मार गया. मनीष की पढ़ाई छूट गई. वह पिताजी की दिनरात सेवा करने में जुट गया. पिताजी कुछ ठीक हुए तो मनीष ने पास की एक फैक्टरी में मजदूरी करनी शुरू कर दी. लकवे के एक वर्ष पश्चात पिताजी को हिस्टीरिया हो गया. उसी बीमारी के दौरान वे चल बसे. मनीष के चारों ओर विपत्तियां ही विपत्तियां थीं और विपत्तियों में भैयाभाभी का भयानक चेहरा उस के कोमल हृदय पर पीड़ाओं का अंबार लगा देता. उस ने शहर छोड़ देना ही उचित समझा.

एक दिन चुपके से वह मुंबई की ओर प्रस्थान कर गया. वहां कुछ हमदर्द लोगों ने उसे ट्यूशन पढ़ाने के लिए कई बच्चे दिला दिए. मनीष ने ट्यूशन करते हुए अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. प्रथम श्रेणी में पास होने से उसे मैडिकल कालेज में प्रवेश मिल गया. उसे स्कौलरशिप भी मिलती थी.

फिर एक दिन मनीष डाक्टर बन गया. दिन गुजरते रहे. मनीष ने विवाह नहीं किया. वह डाक्टर से सर्जन बन गया. फिर उस का तबादला नागपुर हो गया यानी वह फिर से अपने शहर में आ गया. मनीष ने भैया व भाभी से फिर से संबंध जोड़ने के प्रयास किए थे किंतु वह असफल रहा था. भाभी घायल नागिन की तरह उस से अभी भी चिढ़ी हुई थीं. उन्हें दुख था तो यह कि उन्होंने जिस परिवार को उजाड़ने का प्रण लिया था, उसी परिवार का एक सदस्य पनपने लगा था.

मनीष को भाभी के इस प्रण की भनक लग गई थी किंतु इस से उसे कोई दुख नहीं हुआ. उस के चेहरे पर हमेशा चेरी के फूल की हंसी थिरकती रहती थी. उस ने सोच रखा था कि भाभी के मन में उगे जहर के पौधे को वह एक दिन जरूर धराशायी कर देगा. मनीष को संयोग से मौका मिल भी गया था. भाभी के पेट में एक बड़ा फोड़ा हो गया था. उस फोड़े को समाप्त करने के लिए औपरेशन जरूरी था. यह संयोग की ही बात थी कि वह औपरेशन मनीष को ही करना पड़ा.

वह जानता था कि यदि औपरेशन असफल रहा तो भैया जरूर उस पर हत्या का आरोप लगा देंगे. वह अपने कमरे में बैठा इसी बात को बारबार सोच रहा था. उसी वक्त मनीष के सहायक डाक्टर रामन ने कमरे में प्रवेश किया. ‘‘हैलो, सर, मीराजी अब खतरे से बाहर हैं,’’ रामन ने टेबललैंप की रोशनी करते हुए कहा.

‘‘थैंक्यू डाक्टर, आप ने बहुत अच्छी खबर सुनाई,’’ मनीष ने कहा, ‘‘लेकिन आगे भी मरीज की देखभाल बहुत सावधानी से होनी चाहिए.’’ ‘‘ऐसा ही होगा, सर,’’ डाक्टर रामन ने कहा.

‘‘मीराजी के पास एक और नर्स की ड्यूटी लगा दी जाए,’’ मनीष ने आदेश दिया. ‘‘अच्छा, सर,’’ डाक्टर रामन बोला. एक सप्ताह में मनीष की भाभी का स्वास्थ्य ठीक हो गया. हालांकि अभी औपरेशन के टांके कच्चे थे लेकिन उन के शरीर में कुछ शक्ति आ गई थी. मनीष भाभी से मिलने के लिए रोज जाता था. वह उन्हें गुलाब का एक फूल रोज भेंट करता था.

एक महीने बाद भाभी को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. मनीष भैयाभाभी को टैक्सी तक

छोड़ने गया. सारी राह भैया अस्पताल की चर्चा करते रहे. भाभी कुछ शर्माई सी चुपचुप रहीं. मनीष ने कहा, ‘‘भाभीजी, मेरी फीस नहीं दोगी.’’

‘‘क्या दूं तुम्हें?’’ भाभी के मुंह से निकल पड़ा. ‘‘सिर्फ गुलाब का एक फूल,’’ मनीष ने मुसकराते हुए कहा.

घर पहुंचने के कुछ दिनों बाद ही भाभी के स्वस्थ हो जाने की खुशी में महल्लेभर के लोगों को भोज दिया गया. भाभी सब से कह रही थीं, ‘‘मैं बच ही गई वरना इस खतरनाक रोग से बचने की उम्मीद कम ही होती है.’’ लेकिन भाभी का मन लगातार कह रहा था, ‘मनीष ने अस्पताल में मेरे लिए कितना बढि़या इंतजाम कराया. मैं ने उसे बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी किंतु उस ने मेरा औपरेशन कितने अच्छे ढंग से किया.’

भाभी बारबार मनीष को भुलाने का प्रयास करतीं किंतु उस की भोली सूरत और मुसकराता चेहरा सामने आ जाता. वे सोचतीं, ‘आखिर बेचारे ने मांगा भी क्या, सिर्फ एक गुलाब का फूल.’ आखिर भाभी से रहा नहीं गया. उन्होंने अपने बाग में से ढेर सारे गुलाब के फूल तोड़े और अपने पति के पास गईं.

‘‘जरा सुनिए, आज के भोज में सारे महल्ले के लोग शामिल हैं, यदि मनीष को भी अस्पताल से बुला लें तो कैसा रहेगा वरना लोग बाद में क्या कहेंगे?’’ ‘‘हां, कहती तो सही हो,’’ भैया बोले, ‘‘अभी बुलवा लेता हूं उसे.’’

एक आदमी दौड़ादौड़ा अस्पताल गया मनीष को बुलाने, लेकिन मनीष नहीं आ सका. वह किसी दूसरे मरीज का जीवन बचाने में पिछली रात से ही उलझा हुआ था. मनीष ने संदेश भेज दिया कि वह एक घंटे बाद आ जाएगा. किंतु मरीज की दशा में सुधार न हो पाने के कारण मनीष अपने वादे के मुताबिक भोज में नहीं पहुंच सका. भाभी द्वारा तोड़े गए गुलाब जब मुरझाने लगे तो भाभी ने खुद अस्पताल जाने का निश्चय कर लिया.

भोज में पधारे सारे मेहमान रवाना हो गए, तब भाभी ने मनीष के लिए टिफिन तैयार किया और गुलाब का फूल ले कर भैया के साथ अस्पताल की ओर रवाना हो गईं. अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि मनीष एक वार्ड में पलंग पर आराम कर रहा है. उस ने मरीज को अपना स्वयं का खून दिया था, क्योंकि तुरंत कोई व्यवस्था नहीं हो पाई थी और मरीज की जान बचाना अति आवश्यक था.

भाभी को जब यह जानकारी मिली कि मनीष ने एक गरीब रोगी को अपना खून दिया है तो उन के मन में अचानक ही मनीष के लिए बहुत प्यार उमड़ आया. भाभी के मन में वर्षों से नफरत की जो ऊंची दीवार अपना सिर उठाए खड़ी थी, एक झटके में ही भरभरा कर गिर पड़ी. उन के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘मनीष वास्तव में एक सच्चा इंसान है.’’

भाभी के मुंह से निकली इस हलकी सी प्रेमवाणी को मनीष सुन नहीं सका. मनीष ने तो यही सुना, भाभी कह रही थीं, ‘‘मनीष, तुम्हारी भाभी ने तुम्हारे लिए कुछ भी अच्छा नहीं किया. लेकिन आश्चर्य है, तुम इस के बाद भी भाभी की इज्जत करते हो.’’ ‘‘हां, भाभी, परिवाररूपी मकान का निर्माण करने के लिए प्यार की एकएक ईंट को बड़ी मजबूती से जोड़ना पड़ता है. डाक्टर होने के कारण मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी भाभी के मन में कहीं न कहीं स्नेह का स्रोत छिपा है.’’

‘‘मुझे माफ कर दो, मनीष,’’ कहते हुए भावावेश में भाभी ने मनीष का हाथ पकड़ लिया. उन की आंखों में आंसू छलक आए. वे बोलीं, ‘‘मैं ने तुम्हारा बहुत बुरा किया है, मनीष. मेरे कारण ही तुम्हें घर छोड़ना पड़ा.’’ ‘‘अगर घर न छोड़ता तो कुछ करगुजरने की लगन भी न होती. मैं यहां का प्रसिद्ध डाक्टर आप के कारण ही तो बना हूं,’’ कहते हुए मनीष ने अपने रूमाल से भाभी के आंसू पोंछ दिए.

देवरभाभी का यह अपनापन देख कर भैया की आंखें भी खुशी से गीली हो उठीं.

Family Kahani

Sad Story: गलती की सजा- कौनसी गलती कर बैठा था विजय

Sad Story: जब विजय ने किसी की बात नहीं मानी, तो दोस्त रमेश को उसे सम झाने की जिम्मेदारी दी गई. रमेश ने उसे बहुत सम झाया, पर वह टस से मस न हुआ.

दरअसल, विजय ने राज्य लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा दी थी. उस का नतीजा अभी एक दिन पहले आया था. इस परीक्षा में वह कामयाब रहा था. इस के बाद मुख्य परीक्षा थी.

विजय का मानना था कि उसे परीक्षा के लिए जीजान से तैयारी करनी होगी. अगर वह उस में कामयाब रहा, तो इंटरव्यू में उसे कामयाबी पाने का पूरा यकीन था.

इस तरह विजय डिप्टी कलक्टर बन सकता था. इतने बड़े पद पर पहुंचने का यह मौका वह खोना नहीं चाहता था.

दोस्त रमेश ने सम झाया कि शादी के बाद भी मुख्य परीक्षा की तैयारी आसानी से की जा सकती है. उस की पत्नी के होने से तैयारी में मदद मिलेगी, नुकसान नहीं होगा. पर विजय ने कहा, ‘‘शादी के बाद न चाहते हुए भी मेरा ध्यान बंट जाएगा. हां, मैं तुम्हारी बात मानते हुए इतना कर सकता हूं कि परीक्षा के बाद तक के लिए इस शादी को टाल देता हूं. 3 महीने बाद परीक्षा होगी. परीक्षा के बाद मैं शादी कर लूंगा. तब तक के लिए लड़की वालों को रुकने के लिए कहो.’’

वैसे, उन की जाति में लड़केलड़कियों की शादी जल्दी ही हो जाती थी. विजय और जो लड़की पसंद की गई थी, दोनों की जाति के मुखिया देर होने पर खुसुरफुसुर करने लगे थे.

आखिरकार थक कर लड़की वालों को यह संदेश भिजवाया गया कि शादी को कुछ दिनों के लिए टाल दिया जाए.

लड़की वालों को यह बात बहुत बुरी लगी. उन्होंने शादी की पूरी तैयारी कर ली थी. अब तक बहुत सारे रुपए खर्च हो चुके थे.

लड़की के पिता ने कहा, ‘‘ठीक है, पर जो नुकसान हुआ है, उस की भरपाई लड़के वालों को करनी होगी.’’

लड़की ने जब यह सुना, तो उस ने कहा, ‘‘मु झे ऐसे लोगों से रिश्ता नहीं जोड़ना है, इसलिए लड़के वालों से नुकसान की भरपाई कराइए और मु झे भी कुछ दिनों के लिए यों ही छोड़ दीजिए.’’

विजय के परिवार वालों को लड़की वालों के खर्च में हुए नुकसान की भरपाई करनी पड़ी.

इस शादी से छुटकारा पा कर विजय ने जीजान से परीक्षा की तैयारी की, पर उसे कामयाबी नहीं मिली.

उसी समय प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों की भरती शुरू हुई. हालांकि यह नियमित नौकरी नहीं थी और तनख्वाह बहुत ही कम थी, पर खर्च चलाने के लिए विजय ने इस नौकरी के लिए आवेदन दिया. उस का चयन पास के ही प्रखंड के एक प्राथमिक विद्यालय में हो गया.

विजय को विद्यालय की वह नौकरी करते हुए तकरीबन डेढ़ साल बीत गए. इस बीच उस ने फिर से राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा का इश्तिहार देखा. ओबीसी का आरक्षण भी था. उस ने भी इस के लिए आवेदन कर दिया.

पिछली बार विजय परीक्षा में नाकाम रहा था, इसलिए इस बार वह अच्छी तरह तैयारी करना चाहता था.

तभी विजय को उस के साथी शिक्षकों ने बताया कि उसी प्रखंड की बीडीओ यानी प्रखंड विकास पदाधिकारी, जो एक औरत हैं, का चयन पिछली बार के राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में हुआ था. अगर वह चाहे तो उन से परीक्षा से संबंधित टिप्स ले सकता है. वे ऐसी पदाधिकारी हैं, जो सब की मदद करती हैं. वे परीक्षा की तैयारी से संबंधित उचित सलाह भी देती हैं.

राज्य लोक सेवा आयोग के नियमों के मुताबिक विजय इस बार की परीक्षा के बाद कभी बैठ नहीं सकता था, क्योंकि अगली बार से उस की उम्र इस परीक्षा के लिए ज्यादा हो जाएगी, इसलिए वह परीक्षा की तैयारी में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था. अपने साथी शिक्षकों की सलाह मान कर वह बीडीओ से मिलने पहुंचा.

बीडीओ के चैंबर के बाहर नेमप्लेट को देख कर उसे विश्वास नहीं हुआ, ‘विनिता कुमारी’.

‘कहीं यह वही तो नहीं, जिस से मेरी शादी होने वाली थी? यह भी राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में बैठने वाली थी. इस के रिजल्ट के बारे में तो मु झे पता भी नहीं चला था. हो सकता है कि यह कोई और हो,’ इसी तरह सोचते हुए वह चैंबर में दाखिल होने लगा और बोला, ‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं मैडम?’’

‘‘हां, आइए,’’ अंदर से आवाज आई.

विजय ने देखा, वह विनिता ही थी. दोनों एकदूसरे को देख कर थोड़ी देर के लिए ठिठके, फिर विनिता ने ही हालात को संभालते हुए पूछा, ‘‘बैठिए, यहां कैसे आना हुआ?’’

विनिता को यहां देख कर विजय की हालत काटो तो खून नहीं जैसी हो गई थी. उसे कुछ बोलते नहीं बन रहा था.

उस ने हड़बड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी से मिलने आया था, तो सोचा कि नए प्रखंड विकास पदाधिकारी से भी मिल लूं. यहां पर देखा कि आप हैं…’’

‘‘क्या मु झे देख कर आप को अच्छा नहीं लगा?’’ विनिता ने जानबू झ कर पूछा.

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है,’’ विजय ने जवाब दिया.

‘‘वैसे, आप का शुक्रिया. अगर आप ने शादी के लिए मना नहीं किया होता, तो मैं भी शायद अपनी शादीशुदा जिंदगी में रम जाती और इस मुकाम को हासिल नहीं कर पाती.

‘‘आप के मना करने के बाद मैं ने अपना ध्यान और समय लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा में लगाया और मु झे उस में कामयाबी मिली. इस कामयाबी के बाद मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और इंटरव्यू में भी कामयाबी के बाद मेरा चयन इस पद के लिए हो गया,’’ विनिता ने कहा.

‘‘मु झ से गलती हो गई थी,’’ विजय ने शर्मिंदा होते हुए कहा.

‘‘आप भी मुख्य परीक्षा की तैयारी कर रहे थे. क्या हुआ आप का?’’ विनिता ने पूछा.

‘‘मु झे कामयाबी नहीं मिली. उस के बाद मैं ने प्राथमिक शिक्षक भरती के लिए आवेदन किया, जिस में मेरा चयन हो गया और अब मैं इसी प्रखंड के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक हूं,’’ विजय ने कहा.

‘‘अच्छी बात है. कोई भी पद या काम छोटा या बड़ा नहीं होता. वैसे, मेरे लायक कोई सेवा हो तो बताइएगा. हाल ही में फिर से लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा के लिए इश्तिहार निकला था. क्या आप ने फार्म भरा है?’’?विनिता ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा.

‘‘हां, पर शिक्षक के रूप में नियमित रूप से काम करते हुए इस की तैयारी करना बड़ा मुश्किल होगा. अगले महीने प्रारंभिक परीक्षा है. इस परीक्षा में तो आसानी से कामयाबी मिल जाएगी, पर उस के तकरीबन 2 महीने बाद मुख्य परीक्षा होगी.

‘‘उस के लिए कम से कम 2 महीने की छुट्टी चाहिए. इस के लिए मैं ने आवेदन भी दे दिया है, पर इतनी छुट्टी मिल पाएंगी, इस की उम्मीद कम ही है.’’

‘‘मुझे आप की मदद कर के बहुत खुशी मिलेगी. मैं आप की छुट्टी के लिए प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी से अनुरोध करूंगी. मु झे पूरा भरोसा है कि वे मेरी बात मान लेंगे और आप को 2 महीने की छुट्टी मिल जाएगी,’’ विनिता ने कहा.

विजय को कुछ बोलते नहीं बन रहा था, इसलिए उस ने कहा, ‘‘अगर तैयारी के लिए 2 महीने की छुट्टी मिल गई, तो आप की बड़ी मेहरबानी होगी.’’

‘‘क्यों नहीं, मैं आप के लिए इतना तो कर ही सकती हूं. वैसे भी बहुत एहसान है आप का मु झ पर. मेरा भी तो फर्ज बनता है कि मैं आप के लिए कुछ करूं,’’ विनिता ने कहा.

विजय पहले से ही शर्मिंदगी महसूस कर रहा था. विनिता की इस बात पर उस ने चुप रहना ही बेहतर सम झा. थोड़ी देर चुप रहने के बाद उस ने जाने की इजाजत मांगी.

घर लौटते हुए विजय बहुत पछता रहा था. वह मन ही मन सोच रहा था, ‘काश, मैं ने इस से शादी की होती तो हो सकता है कि मु झे भी कामयाबी मिल जाती. इस लड़की से तो मु झे परीक्षा की तैयारी में मदद ही मिलती. नुकसान तो होता नहीं?’

अब विजय को पिछली कोशिश में कामयाबी न मिलने का उतना अफसोस नहीं था, जितना कि विनिता से शादी नहीं करने के उस के गलत फैसले का था. पर, अब बहुत देर हो चुकी थी. अब आखिरी कोशिश में उसे किसी भी कीमत पर कामयाबी हासिल करनी है.

विनिता ने तैयारी के लिए 2 महीने की छुट्टी दिलाने की सिफारिश करने का भरोसा दिलाया ही है, इसलिए अब उसे पूरे मन से तैयारी में जुट जाना चाहिए.

अगले दिन विद्यालय पहुंचाने पर प्रिंसिपल ने बताया कि बीडीओ साहिबा की सिफारिश पर उस की छुट्टी मंजूर कर ली गई है.

प्रिंसिपल ने फिर कहा, ‘‘सुना है कि आप ने बीडीओ साहिबा पर कभी बहुत एहसान किया था, इसलिए उन्होंने आप की मदद की है. आखिर क्या एहसान किया था आप ने, जरा हमें भी बताइए?’’

विजय ने  झेंपते हुए कहा, ‘‘मु झे खुद नहीं पता कि मैं ने कब उन के लिए क्या किया था. अच्छे अफसर ऐसे ही लोगों की मदद किया करते हैं. वैसे, सच पूछा जाए तो एहसान तो उन्होंने मु झ पर अब किया है, जिस का कर्ज चुकाना भी मेरे लिए आसान नहीं होगा.’’

उसी समय बीडीओ साहिबा का काफिला स्कूल में आया. प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी के साथ स्कूल के निरीक्षण के लिए विनिता वहां पहुंची थीं.

कार से उतरते ही उन्होंने विजय से कहा, ‘‘विजय बाबू, पिछली बार पता नहीं आप ने कैसी कोशिश की थी, पर इस बार आप की कोशिश में कमी नहीं होनी चाहिए. मेरी शुभकामना है कि इस बार आप को कामयाबी जरूर मिले.’’

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए विनिता बोली, ‘‘जिसे खुद पर भरोसा नहीं होता, वही दूसरों पर भरोसा नहीं कर पाता. जिसे खुद पर भरोसा होता है, उसे अपने साथियों पर भी भरोसा होता है. ऐसे लोग नए साथियों को पा कर जोश से भर जाते हैं. उन के लिए कामयाबी की राह और आसान हो जाती है, इसलिए सब से पहले खुद पर भरोसा करना ज्यादा जरूरी है. इस से कोई भी राह आसान हो जाती है.

‘‘पिछली बार शायद आप को अपनेआप पर भरोसा नहीं था, इसलिए आप को कामयाबी नहीं मिली. अगर आप को कामयाबी मिल जाएगी, तो आप ने जो मुझ पर एहसान किया है, उस का भी कर्ज चुक जाएगा, इसलिए मैं ने आप पर भरोसा कर के आप को छुट्टी दिलवाने में मदद की है. इस बार यह भरोसा मत तोड़ दीजिएगा.’’

विजय ने कहा, ‘‘सम झदार लोग एक बार गलती करते हैं, बारबार नहीं.’’

विजय ने अगले 2 महीने की छुट्टी का फायदा उठा कर खूब तैयारी की. इस तैयारी का उसे फल भी मिला. उस ने मुख्य परीक्षा व इंटरव्यू में भी कामयाबी हासिल की और उस का चयन प्रशासनिक सेवा के लिए हो गया.

विजय इस खबर को सुनाने के लिए सब से पहले विनिता के पास पहुंचा. उस के चैंबर में पहुंच कर विजय ने कहा, ‘‘मेरा चयन प्रशासनिक सेवा के लिए हो गया है. इस में आप की मदद का भी अच्छा योगदान है. अगर आप ने छुट्टी दिलाने में मदद नहीं की होती तो मु झे यह कामयाबी नहीं मिलती.’’

‘‘बहुतबहुत बधाई. वैसे, मैं ने आप की कोई मदद नहीं की. मैं ने पहले भी आप से कहा है कि आप के एहसान का कर्ज चुकाया है.

‘‘जरा सोचिए, अगर आप ने शादी के लिए मना नहीं किया होता और मेरी शादी आप के साथ हो गई होती, तो क्या होता. शादीशुदा लड़की के लिए अभी भी किसी प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करना बड़ा मुश्किल होता है. परिवार की जिम्मेदारियों के बाद उस के पास खुद के लिए भी समय नहीं बचता है.

‘‘लेकिन, ऐसा मर्दों के साथ नहीं होता. वे सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो कर केवल परीक्षा पर अपना ध्यान दे कर तैयारी कर सकते हैं. घर में किसी ने खाना खाया है या नहीं, घर की सफाई हुई है या नहीं, इन सब बातों से उन्हें कोई लेनादेना नहीं होता.

‘‘इस तरह की जिम्मेदारियां औरतों को उठानी पड़ती हैं और मेरी शादी हो गई होती, तो शायद मु झे भी तैयारी के लिए कम समय मिलता. और मैं आज इस पद पर नहीं पहुंच पाती, इसलिए मु झे लगा था कि जो हुआ अच्छा ही हुआ और आप के द्वारा शादी के लिए मना करने को मैं ने आप का मु झ पर एक एहसान ही माना. अब आप को कामयाबी मिल चुकी है. अब मु झे भी सुकून मिला.’’

विजय ने कहा, ‘‘इस तरह मत कहिए. मैं ने जो गलती की थी, उसे अब मैं सुधारना चाहता हूं. अगर आप को बुरा न लगे तो मु झ से शादी कर मेरी पिछली गलती को सुधारने का मौका देने की कृपा करें.’’

‘‘नहीं, कभी नहीं…’’ विनिता ने रूखे लहजे में जवाब दिया, ‘‘आप ने कैसे सोच लिया कि मैं आप से शादी करने के लिए तैयार हो जाऊंगी.

‘‘आप को याद होगा कि सगाई के बाद आप ने शादी के लिए मना किया था. एक बार जिस ने मना किया था, उसी से शादी कर के मैं अपने स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती. आप के एहसान का कर्ज चुका दिया. अब आप जा सकते हैं.’’

विजय चुपचाप नजरें  झुकाए विनिता के चैंबर से बाहर निकल गया. उसे यह उम्मीद नहीं थी कि कामयाबी हासिल करने के बाद भी इस तरह से उसे दुत्कार दिया जाएगा. उस के लिए यह किसी सजा से कम नहीं थी. पर उसे यह भी एहसास हो गया कि उस ने जो गलती की थी, उस के बदले यह सजा कम ही थी.

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Love Story: बट स्टिल आई लव हिम

Love Story: ‘‘बटस्टिल आई लव हिम, बट स्टिल आई लव हिम, बट आई…’’  मंजू के ये शब्द तीर की तरह मेरे कानों में चुभ रहे थे. मैं यह सोच कर हैरान थी कि शहर की जानीमानी डाक्टर मंजू सिंह, जो प्रतिदिन न जाने कितने लोगों के दुखदर्द मिटाती है, खुद कितने गहरे दर्द में डूबी है और उस से उबरना भी नहीं चाहती है. पुरानी यादों के पन्ने

1-1 कर के मेरी आंखों के सामने फड़फड़ाने लगे…

हम दोनों बचपन की गहरी सखियां, एक ही महल्ले में रहती थीं तथा ही कक्षा में पढ़ती थीं. हमारी मित्रता उस दिन हुई जब बस में एक बड़ी दीदी ने मुझे सीट से उठा दिया और स्वयं उस पर बैठ गई.

यह देख मंजू उन से भिड़ गई, ‘‘दीदी, आप ने उस की सीट ले ली. वह इतना भारी बैग टांग कर कैसे खड़ी रहेगी?’’

दीदी के धमकाने पर उस ने कंडक्टर से शिकायत कर के मुझे मेरी सीट दिलवा कर ही दम लिया और फिर हम मित्रता की डोर से ऐसे बंधे जो समय के साथ और मजबूत हो गई.

इस घटना के बाद से हम बच्चों के बीच मंजू दबंग गर्ल के नाम से मशहूर हो गई. वह स्कूल की हर गतिविधि में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती. उस की संगत के प्रभाव से मुझे भी

कुछ अवसर प्राप्त हो जाते थे. अपने नैसर्गिक सौंदर्य, नेतृत्व क्षमता, अभिनय कौशल व वाकपटुता से वह सब की चहेती थी. जो उस से ईर्ष्या करते थे, वे भी मन ही मन उस की प्रशंसा करते थे.

फर्स्ट ईयर तक पहुंचतेपहुंचते न जाने कितने लड़के उस पर जान छिड़कने लगे. हर कोई उसे अपनी गर्लफ्रैंड बनाने के लिए आतुर रहता पर वह किसी को घास नहीं डालती.

मैं उसे छेड़ती, ‘‘मंजू, क्या तुझे कोई

भी पसंद नहीं आता? किसी का तो दिल रख लिया कर.’’

वह मुझे समझाती, ‘‘प्यारव्यार के लिए तो सारी जिंदगी पड़ी है, मुझे तो पापा की तरह प्रसिद्ध डाक्टर बनना है.’’

हम दोनों साथसाथ पढ़ते. कभी वह मेरे घर आ जाती, कभी मैं उस के घर चली जाती. हम दोनों को संयोगवश एक ही मैडिकल कालेज में प्रवेश भी मिल गया. वहां पहुंचते ही वह सभी शिक्षकों व जूनियरसीनियर विद्यार्थियों की लाडली बन गई.

कालेज के वार्षिकोत्सव में मंजू राधा बनी और सुधीर कृष्ण. सुधीर में न जाने कैसा सम्मोहन था कि मंजू उस की ओर खिंचती चली गई. मैं उस का प्यार व समय बंट जाने पर स्वयं को जितना अकेला महसूस कर रही थी, उस से अधिक चिंता मुझे इस बात की थी कि जब उस के घर वालों को पता चलेगा तो क्या होगा. सुधीर यादव था और वह परंपरावादी क्षत्रिय परिवार की.

जब तक कालेज में थे किसी को कुछ नहीं पता चला पर एमबीबीएस पूरा होने के बाद जब उस के विवाह की चर्चा शुरू हुई तब मंजू ने डरतेडरते मां को सुधीर के बारे में बताया. उस के बाद तो मानों घर में विस्फोट हो गया. सब ने उसे समझाने का बहुत प्रयास किया पर उस ने दृढ़तापूर्वक अपना निर्णय सुना दिया कि वह शादी करेगी तो सिर्फ सुधीर से वरना जीवन भर विवाह नहीं करेगी.

सारे प्रयास विफल होने के बाद उस के पापा ने एक सादे विवाह समारोह में उसे बिदा कर उस से सदा के लिए मुंह मोड़ लिया. मां कभीकभी हालचाल पूछ लेती थी. मैं भी एक एनआरआई से विवाह होने के बाद आस्ट्रेलिया चली गई पर हम सदैव फेसबुक, व्हाट्सऐप से संपर्क में बने रहते.

मैं जब भी इंडिया आती उस से जरूर मिलती. वह भी 2 बार आस्ट्रेलिया घूमने आई.

15 वर्ष कब बीत गए पता ही नहीं चला. जब मैं इंडिया आई तो हर बार की तरह इस बार भी मां व परिवार के अन्य लोगों से मिलने के बाद कानपुर से सीधे मुंबई उस के पास पहुंची. मंजू और सुधीर के स्वागत में इस बार पहले जैसा उत्साह व गर्मजोशी नजर नहीं आई. सुधीर आवश्यक काम बता कर बाहर चला गया तो मनीष भी अपने कुछ जानपहचान वालों से मिलने चले गए.

उस के चेहरे पर छाई उदासीनता का कारण जानने के लिए जब मैं ने उसे कुरेदा तो थोड़ी नानुकुर के बाद उस के सब्र का बांध टूट गया. वह मेरे गले लग फफकफफक कर बच्चों की तरह रो पड़ी.

थोड़ा दिल हलका होने के बाद उस ने मुझे बताया, ‘‘सुधीर का उस के नर्सिंगहोम की एक नर्स के साथ अफेयर चल रहा है. पहले तो पूछने पर कहता था कि मैं बेवजह उस पर शक करती हूं पर अब वह ढीठ हो गया है. कहता है कि, तुम्हें जो करना है कर लो, जहां जाना है जाओ, पर मैं उसे नहीं छोड़ सकता.’’

यह सुन कर तो जैसे मुझ पर वज्रपात ही हो गया. मुझे कालेज का वह जमाना याद

आ गया कि कैसे सुधीर मंजू से दोस्ती करने के लिए दीवानों की तरह उस के पीछेपीछे घूमता रहता था और किस प्रकार से मंजू ने सब का विरोध सह कर उस से विवाह किया था.

मैं ने उसे समझाया कि यदि वह शहर का प्रतिष्ठित चाइल्ड स्पैशलिस्ट है तो तू भी प्रसिद्ध गाइनोकोलौजिस्ट. तू पढ़ीलिखी, आत्मनिर्भर नारी है, तेरी समाज में अलग पहचान है, तू अपनी

व अपने बच्चों की देखभाल करने में सक्षम है.

तू ऐसे बेवफा, चरित्रहीन इंसान को छोड़ क्यों नहीं देती?

वह रोते हुए बोली, ‘‘मम्मीपापा से दूर हो कर मैं ने जीवन में अपनों के प्यार एवं संरक्षण का महत्त्व जाना. आज भी मेरा मन मायके जाने को तरसता है. मायके के दरवाजे मेरे लिए बंद नहीं हैं, पर मेरी भूल मेरे स्नेह पर ज्यादा भारी पड़ती है. पापा के आशीर्वाद के लिए उठे हाथ मेरे सिर तक पहुंचतेपहुंचते रुक जाते हैं. मां के आलिंगन में भी वह गरमाहट महसूस नहीं होती जो प्रांजू को गले लगाते समय होती है. अपना घर अब मुझे अपना नहीं लगता. तुझे याद है न पापा ने कैसे धूमधाम से प्रांजू की शादी की थी.

घर व संपत्ति का बंटवारा करते समय मां ने मुझे बुलाया और कहा, ‘‘पापा अपनी संपत्ति तुम दोनों बहनों के बीच बांटना चाहते हैं, आ जाओ.’’

मैं ने मां से कहा, ‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए. बस मुझे अपना आशीर्वाद दे दो. पर मां के बहुत जोर देने पर मैं कानपुर चली गई. वहां पहुंच कर देखा पापा ने वह नर्सिंगहोम, जिस में वे अपनी जगह सदा अपनी डाक्टर बेटी को बैठा हुआ देखना चाहते थे, वह घर जिस से मेरी यादें जुड़ी थीं, सब प्रांजू व देवेश के नाम कर दिया था. मुझे उन्होंने कैश, जेवर व प्लाट्स दिए थे. यह देख मैं अपने कमरे की दीवारों से चिपक कर फूटफूट कर रोई थी. मन में आया कि कह दूं कि पापा मुझे कुछ नहीं चाहिए. बस आप मेरे पहले वाले पापा बन कर मुझे गले लगा लो, अपनी मंजू को माफ कर दो.

‘‘जड़ से विच्छिन्न शाखा के समान स्वयं को अकेला महसूस कर रही थी. फिर सोचा दोष तो मेरा ही है. मैं ने ही उन के मानसम्मान, भरोसे और सपनों को धूमिल किया था. भौतिक संपदा तो उन्होंने बराबर बांटी पर स्नेह नहीं. श्वेता, तू नहीं जानती कि अपनों से अलग होना व उन की उपेक्षा सहना कितनी पीड़ा पहुंचाता है.

‘‘सुधीर मुझ से प्यार नहीं करता, वह मेरे साथ रहना भी नहीं चाहता पर मैं उस के बिना नहीं रह सकती. आई हैव लौस्ट माई लव बट स्टिल आई लव हिम, बट स्टिल आई लव हिम. उस के बिना मैं जी नहीं पाऊंगी. उसे अपने बच्चों के साथ हंसताखेलता देख कर, उन की परवाह करते देख कर ही मैं खुश हो लेती हूं. अपना न होते हुए भी अपना होने के एहसास के साथ जी लेती हूं,’’ कहने के बाद वह मेरे कांधे पर सिर रख कर बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगी.

हम ने सुधीर को समझाने की कोशिश की पर वह न समझा. मैं दुखी मन से अपने घर लौट आई, पर उस के ये शब्द अब भी मेरे कानों को पिघला रहे हैं, ‘‘बट स्टिल आई लव हिम, बट स्टिल आई लव हिम…’’

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Genz Slang Terms: रिलेशनशिप में जेनजी द्वारा प्रयोग होने वाले शब्द

Genz Slang Terms: पटना से एमबीए की पढ़ाई करने मुंबई आई उर्मि को मुंबई की लाइफस्टाइल बहुत पसंद आई. यहां खानपान से ले कर आसपास के लोगों के मिलनसार व्यवहार ने उसे बहुत प्रभावित किया. पढ़ाई के दौरान उस की मुलाकात अपने बैचमेट सुनील से हुई. बातोंबातों में उर्मि का झुकाव सुनील की तरफ होने लगा. धीरेधीरे उन की दोस्ती गहरी हो गई. दोनों कई बार साथसाथ घूमने जाने लगे. करीब 6 महीने बाद जब उर्मि ने सुनील से पूछा कि आखिर वे दोनों कर क्या रहे हैं, तो सुनील का जवाब था, “फ्लीटिंग…”

उर्मि को इस शब्द का अर्थ पता नहीं था. वह हंस कर वहां से निकल गई. उसे लगा था कि सुनील शायद डेटिंग कहेगा, लेकिन उस ने तो एक अलग ही शब्द बताया. उर्मि औनलाइन जा कर इस का अर्थ पता की तो वह समझ पाई कि सुनील उस के साथ एक अच्छा समय बिता रहा है. इस में किसी का किसी पर कोई पाबंदी नहीं है, जब तक मन करो साथ घूमोफिरो और जब मन हो कहीं निकल जाओ. यानि सुनील किसी रिश्ते की पाबंदी में नहीं रहना चाहता. सुनील की इस बात से उर्मि को धक्का तो लगा, क्योंकि उस का सपना सुनील के साथ रिश्ते को आगे बढ़ाने का था, लेकिन धीरेधीरे उर्मि ने सुनील से दूरी बना ली और अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने लगी.

जेन जी के रिश्तों पर टेक्नोलौजी का प्रभाव

असल में तेजी से बढ़ती टेक्नोलौजी और बदलते कल्चर की वजह से अब डेटिंग की दुनिया में भी बहुत बदलाव आया है. पहले लोग सच्चा प्यार ढूंढ़ते थे और अगर मिल जाएं, तो जीवनभर उस के साथ रहने की कोशिश करते थे. कई बार समाज और परिवार की बंदिशों की वजह से उस इंसान से शादी नहीं हो पाती थी, लेकिन उस के दिल में उस व्यक्ति के लिए प्यार हमेशा रहता था. वहीं, आज के डिजिटल युग में प्यार भी सोशल मीडिया पर होने लगा है और डेटिंग भी ऐप्स के जरीए होने लगी है. आज के समय जब एक लड़कालड़की एकदूसरे से प्यार करते हैं, तो उसे डेट कहा जाता है, लेकिन जेन जी ने डेटिंग को भी कई तरह के शब्दों के साथ जोड़ दिया है.

आजकल की डेटिंग लाइफ पहले के सारे डेटिंग लाइफ से अलग है, जिस में उन के द्वारा प्रयोग किए जाने वाले शब्द बहुतों को पता तक नहीं होते. यहां हम उन्हीं शब्दों के बारे में बताने वाले हैं, जिन्हें हर किसी को चाहे लड़का हो या लड़की जान लेना जरूरी है:

सिचुऐशनशिप

सिचुऐशनशिप एक ऐसा रिलेशनशिप टर्म है, जो जेन जी के बीच दोस्ती और कमिटेड रोमांटिक पार्टनरशिप के बीच एक ग्रे एरिया में मौजूद रिलेशनशिप को बताता है. इस में बिना इमोशंस के फिजिकल इंटीमेसी हो सकती है.

सिचुऐशनशिप में आप किसी रिश्ते में बंधे नहीं होते हैं और न ही डेट कर रहे होते हैं. इस में अकसर एकसाथ समय बिताना, बातें करना और फिजिकल इंटीमेट होना शामिल होता है.

घोस्टिंग

जेन जी सब से अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं. उन्हें प्यार भी सोशल मीडिया पर ही मिल जाता है, जिसे उन्होंने न कभी देखा होता है और न ही कभी मिले होते हैं. उस से वे लगातार चैट और कौल कर के बात करते हैं और अचानक से एक दिन वह इंसान बिना कुछ बताए गायब हो सकता है. आप उसे सोशल मीडिया पर केवल ढूंढ़ते रह जाते हैं.

जौंबिंग

अगर कोई व्यक्ति जिस ने आप को पहले घोस्ट कर दिया था, अचानक महीनों या सालों बाद वापस आ कर मैसेज या कौल करने लगे, तो इसे जौंबिंग कहा जाता है.

फ्लीटिंग

जब कोई सिर्फ टाइमपास के लिए किसी के साथ रिलेशनशिप में आता है, तो इस स्थिति को फ्लीटिंग कहा जाता है.

ब्रेडक्रंबिंग

ब्रेडक्रंबिंग एक ऐसा शब्द है, जिस का मतलब है कि किसी इंसान के साथ थोड़ाथोड़ा कम्युनिकेशन कर के उसे बांध कर रखना. लेकिन कभी भी किसी रिलेशनशिप के लिए पूरी तरह से कमिटमैंट नहीं करना. अगर कोई इंसान आप के सोशल मीडिया पोस्ट पर कमैंट या मीम भेजता है, लेकिन सीरियस रिलेशनशिप की प्लानिंग नहीं करता है, तो हो सकता है वह आप को ब्रेडक्रंबिंग कर रहा हो.

बेंचिंग

बेंचिंग का मतलब होता है, जब कोई इंसान आप को किनारे रख कर दूसरे औप्शन की तलाश करता है. वह कभीकभी आप को मैसेज या कौल कर देता है और आप जब उस से मिलने की बात करते हैं, तो वह कोई बहाना मार देता है. वह आप के साथ कमिटेड नहीं है, लेकिन आप को बैकअप के रूप में रखता है.

कफिंग सीजन

कफिंग सीजन अक्तूबर में शुरू होता है और वैलेंटाइन डे के आसपास खत्म हो जाता है. इस रिलेशनशिप टर्म में सिंगल लोग ठंड के महीनों को बिताने के लिए शौर्ट टर्म रोमांटिक पार्टनर की तलाश करते हैं. वे सर्दियों भर पार्टनर के साथ फिजिकल इंटीमेट होते हैं और बाद में म्यूचुअली अलग भी हो जाते हैं.

थर्स्ट ट्रैप

यह एक सोशल मीडिया पोस्ट या इमेज है, जिसे लोगों का ध्यान खींचने के लिए डिजाइन किया जाता है. आमतौर पर यह काफी अट्रैक्टिव और फ्लर्ट करने वाली होती है और लोग इस पर रिएक्शन भी देते हैं. जेन जी अपना कौन्फिडेंस बढ़ाने, किसी क्रश का ध्यान खींचने, ट्रांसफौर्मेशन करने पर इस तरह से पोस्ट करते हैं.

स्लो फेड

इस रिलेशनशिप टर्म में अचानक से लोग कम्युनिकेशन को बंद नहीं करते हैं, बल्कि धीरेधीरे समय के साथ कम्युनिकेशन बंद करते हैं. जब तक रिलेशनशिप उन का म्यूचुअली खत्म नहीं हो जाता है, तब तक वे बातचीत करते रहते हैं.

कैटफिशिंग

इस शब्द का मतलब है कि जब कोई इंसान सोशल मीडिया या डेटिंग ऐप्स पर किसी दूसरे की फोटो और दूसरे की डिटेल्स का इस्तेमाल कर के दोस्ती या रिलेशनशिप में आता है, तब उसे कैट फिशिंग कहते हैं. इस में सचाई पता चलने के बाद इमोशनल ब्रेकडाउन होता है.

और्बिटिंग

और्बिटिंग तब होती है, जब किसी इंसान के साथ आप पहले रिलेशनशिप में थे, लेकिन अब ब्रेकअप हो चुका है. हालांकि वह इंसान आप से सोशल मीडिया के जरीए जुड़ा हुआ है और आप की स्टोरीज और पोस्ट को लाइक कर रहा है.

डिफाइन द रिलेशनशिप

इस शब्द का प्रयोग तब किया जाता है, जब दोनों साइड्स को आपस में बातचीत करनी होती है और चीजें शौर्टआउट करनी होती हैं. इस कम्युनिकेशन के लिए सही समय और सही स्थान को चुनना पड़ता है. इस में अपने इमोशन और ऐक्सपेक्टेशन के बारे में ईमानदार होना पड़ता है और किसी भी रिजल्ट के लिए हमेशा तैयार रहना होता है.

इस प्रकार आज के नेटिजंस की दुनिया में, जहां रोमांस अकसर इमोजीस से बंधा होता है, जहां जैनरेशन जेड ने प्यार की भाषा को नए सिरे से परिभाषित किया है, जिसे समझने के लिए सभी यूथ को तैयार रहना पड़ेगा, ताकि वे किसी से दोस्ती करने से पहले उन की मनोदशा को आसानी से समझ लें और उन्हें किसी गलतफहमी का शिकार न होना पड़े, जो उन्हें बाद में मानसिक रूप से पीड़ा दे सकती है, बल्कि हर परिस्थिति में वे खुद को संभालने में सक्षम हो जाएं.

Genz Slang Terms

Combination Skin: कौंबिनेशन स्किन की देखभाल कैसे करें

Combination Skin: क्या आप की भी स्किन कहीं ड्राई तो कहीं औयली रहती है? दरअसल, कुछ लोगों की स्किन न पूरी तरह ड्राई होती है और न ही पूरी तरह औयली. कभी यह मौसम के हिसाब से बदलती रहती है, तो कभी चेहरे का कुछ हिस्सा औयली और कुछ ड्राई होता है. इस त्वचा को कौंबिनेशन स्किन कहा जाता है.  इस में एक सामान्य पैटर्न होता है जैसेकि नाक और फोरहेड की स्किन औयली होती है. गालों की स्किन सैंसिटिव होती है और साथ ही बाकि चेहरे की स्किन ड्राई होती है यानि आमतौर पर टीजोन (माथा, नाक और ठोड़ी) में अधिक तेल होता है जबकि गालों पर त्वचा सूखी रहती है.

कौंबिनेशन स्किन की समस्या विशेषरूप से यंग ऐज में देखने को मिलती है क्योंकि हार्मोनल चेंज के कारण सीबम ग्रंथियों का असंतुलन बढ़ जाता है. इस का इलाज करने के लिए सही स्किन केयर रूटीन का पालन करना जरूरी होता है.

नैशनल लाइब्रेरी औफ मैडिसिन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकतर कौंबिनेशन स्किन टाइप वाले लोगों को पता ही नहीं होता कि उन की स्किन का टाइप कौंबिनेशन है. ऐसे लोगों को अपनी स्किन की देखभाल के लिए उपयुक्त प्रोडक्ट्स का चयन करना महत्त्वपूर्ण है, जिस में फेसवाश, मोइस्चराइजर, ऐक्सफोलिएशन और सनस्क्रीन का उपयोग शामिल है.

कैसे पहचानें कौंबिनेशन स्किन है

-अगर आप की टीजोन औयली रहती है, लेकिन गाल ड्राई होते हैं.

-चेहरे पर कुछ जगह पिंपल्स होते हैं, जबकि बाकी जगह रूखी रहती है.

-स्किन सीबम और ड्राईनैस के बीच बैलेंस नहीं रहती.

-मेकअप लंबे समय तक नहीं टिकता. अगर ऐसा है तो समझ लें कि आप की कौंबिनेशन स्किन है

कौंबिनेशन स्किन की देखभाल कैसे करें

क्लींजिंग : आप को अपनी स्किन को रोजाना क्लींज करना चाहिए. ऐसा क्लींजर का उपयोग करें जो आप के औयली टी जोन को मैटीफाय करे. साथ ही आप के गाल और अंडरआई एरिया को ज्यादा ड्राई भी न करे. दिनभर की धूलमिट्टी,औयल और मेकअप को हटाना बेहद जरूरी है. इस के लिए एक माइल्ड फेस क्लींजर लें जो आप की स्किन टाइप के अनुसार हो. चेहरे पर हलके हाथों से मसाज करते हुए लगाएं और फिर गुनगुने पानी से धो लें. साफ त्वचा आगे के प्रोडक्ट्स को बेहतर तरीके से सोखती है.

टोनर या स्क्रब लगाएं

अगर आप की स्किन टाइप कौंबिनेशन है तो आप को स्क्रब भी जरूर करना चाहिए. इस से हाइड्रेट रहती है और डार्क स्पौट्स कम होते हैं. टोनर स्किन टोनिंग में मदद करता है जिस से स्किन में औयल कंट्रोल रहता है. टोनर का इस्तेमाल करने के लिए एक कौटन पैड लें और उस पर टोनर लगा लें. इस के बाद थपथपाते हुए उस टोनर को पुरे फेस पर अप्लाई करें.

ऐक्सफोलिएशन : हफ्ते में कम से कम 2 बार स्किन को ऐक्सफोलिएट जरूर करें. इस के लिए आप फिजिकल या कैमिकल स्क्रब इस्तेमाल कर सकते हैं. इस से स्किन पोर्स भी खुल जाते हैं और स्किन क्लीन रहती है. अगर आप को ऐक्ने, पिंपल्स की समस्या है तो यह स्टेप आप को अवाइड करना चाहिए.

मोइस्चराइजर : स्किन को हाइड्रेट रखना भी जरूरी होता है. आप इस के लिए बाजार में मिलने वाली अच्छे मोइश्चराइजर क्रीम का इस्तेमाल कर सकते हैं. कौंबिनेशन स्किन के लिए कोई लाइट और औयल फ्री मोइस्चराइजर इस्तेमाल करें. इस से स्किन हाइड्रेट और मोइस्चराइजर रहेगी. साथ ही स्किन में औयल प्रोडक्शन भी कंट्रोल रहता है. इस से स्किन टी जोन एरिया से भी हाइड्रेट रहेगी. मोइस्चराइजर ऐसा होना चाहिए, जो तेजी से स्किन में मिल जाए. इस मोइश्चराइजर को रूखी त्वचा पर अच्छे से लगाएं. यह आप को त्वचा की दिक्कतों जैसे इरिटेशन और टाइटनैस से बचाएगा.

सनस्क्रीन : आज के समय में सनस्क्रीन लगाना बहुत जरूरी है. हमारी स्किन सूरज की किरणों से बहुत ज्यादा डैमेज हो जाती है. अगर आप अपनी स्किन को झुर्रियों, डार्क स्पौटस और स्किन कैंसर से बचाना चाहते हैं, तो सनस्क्रीन का प्रयोग अपनी स्किन पर जरूर करें. ऐक्सपर्ट्स की सलाह है कि कम से कम बिल्टइन ब्रौड स्पैक्ट्रम एसपीएफ 30 युक्त डेली मोइस्चराइजर का प्रयोग करना ही चाहिए.

सूरज की किरणों के संपर्क में जाने से आधे घंटे पहले सनस्क्रीन लगाना चाहिए और इसे हर 2 घंटे के बाद दोबारा लगाना चाहिए.

सीरम या नाइट क्रीम से दें पोषण : अब बारी है स्किन को गहराई से हाइड्रेट और रिपेयर करने की. अपनी स्किन टाइप के अनुसार कोई अच्छा सीरम या नाइट क्रीम चुनें जिस में हाइड्रेटिंग और ऐंटी एजिंग गुण हों. इसे चेहरे पर लगा कर हलके हाथों से मसाज करें और रातभर के लिए छोड़ दें.

कौंबिनेशन स्किन के लिए कुछ ऐसे प्रोडक्ट यूज करें

क्लिन 3 फेसवाश : अगर आप को बहुत महंगा फेसवाश नहीं चाहिए तो यह आप के लिए अच्छा है. डेड स्किन और कौंबिनेशन स्किन के लिए यह बहुत अच्छा है. ऐक्ने की प्रौब्लम भी इस से दूर हो सकती है.

सेटाफिल (Cetaphil) फोमिंग फेसवाश : यह काफी जैंटल फेसवाश है जो हर तरह की स्किन टाइप पर असर कर सकता है. यह काफी ज्यादा फोम बनाता है और अगर आप के चेहरे पर बहुत ज्यादा पोर्स दिखते हैं तो यह एक अच्छा औप्शन साबित हो सकता है. स्किन पोर्स को मिनिमाइज करने और उन की सफाई करने के लिए यह फेसवाश अच्छा साबित हो सकता है.

इनिसफ्री (Innisfree) ग्रीन टी फोम क्लींजर : अगर आप की कौंबिनेशन स्किन में टी जोन काफी औयली रहता है, लेकिन गालों की स्किन फ्लैकी है तो यस आप के लिए काफी अच्छा साबित होगा. इस की रेंज भी ठीक है पर क्वांटिटी काफी कम है. अगर आप को पसंद आता है तो आप इसे रिपीट कर सकते हैं. अगर आप की स्किन सैंसिटिव है तो यह उस पर भी अच्छा काम करता है.

स्किन डाइट कंपनी बीटरूट मोइस्चराइजर : यह एक हाइड्रेटिंग फौर्मूला है जो चुकंदर के अर्क के साथ पूरी तरह से मिश्रित होता है और जोजोबा और एवोकैडो तेल जैसे आवश्यक तेलों से समृद्ध होता है. यह तेल आप की त्वचा को चमकदार बनाने, त्वचा की बनावट में सुधार करने और इसे पूरे दिन हाइड्रेटेड रखने में मदद करता है. यह चिकनाई रहित और चिपचिपा नहीं है और त्वचा को तुरंत कोमलता प्रदान करता है. कौंबिनेशन स्किन के लिए यह काफी अच्छा है क्योंकि यह लंबे समय तक हाइड्रेशन प्रदान करता है और सब से अच्छी बात यह है कि यह मेकअप बेस के नीचे बहुत अच्छी तरह से सेट हो जाता है.

डा. शेथ्स सेरामाइड और विटामिन सी ब्राइटनिंग औयल फ्री मोइस्चराइजर : यह बहुत हलका और गैर चिपचिपा फौर्मूला है जो कौंबिनेशन स्किन के लिए बैस्ट है. यह मोइस्चराइजर पोषण से भरपूर है. इसलिए यह अल्ट्रा स्मूद चमक देता है और मुलायम त्वचा प्रदान करता है. सेरामाइड कौंप्लेक्स और विटामिन सी से समृद्ध यह मोइस्चराइजर स्किन की सभी प्रौब्लम को दूर करता है.

मोइस्चराइजर में मौजूद विटामिन सी त्वचा को चमकदार बनाता है और मुंहासों को रोकने में मदद करता है और काले दागधब्बे को भी हटाता है.

थ्योरी बैरियर रिपेयर मोइस्चराइजर : यह सेरामाइड्स और फैटी एसिड से समृद्ध है, जो न केवल त्वचा को तुरंत हाइड्रेशन प्रदान करता है बल्कि बैरियर रिपेयर फंक्शन को भी तेज करता है. कौंबिनेशन स्किन वाले लोगों के लिए यह एक आदर्श विकल्प है क्योंकि यह त्वचा को रूखा बनाता है और गहन पोषण प्रदान करता है.

Combination Skin

Family Story in Hindi: ठंडक का एहसास

Family Story in Hindi: हमारे चाचाजी अपनी लड़की के लिए वर खोज रहे थे. लड़की कालेज में पढ़ाती थी. अपने विषय में शोध भी कर रही थी. जाहिर है लड़की को पढ़ालिखा कर चाचाजी किसी ढोरडंगर के साथ तो नहीं बांध सकते. वर ऐसा हो जिस का दिमागी स्तर लड़की से मेल तो खाए. हर रोज अखबार पलटते, लाल पैन से निशान लगाते. बातचीत होती, नतीजा फिर भी शून्य.

‘‘वकीलों के रिश्ते आज ज्यादा थे अखबार में…’’ चाचाजी ने कहा.

‘‘वकील भी अच्छे होते हैं, चाचाजी.’’

‘‘नहीं बेटा, हमारे साथ वे फिट नहीं हो सकते.’’

‘‘क्यों, चाचाजी? अच्छाखासा कमाते हैं…’’

‘‘कमाई का तो मैं ने उल्लेख ही नहीं किया. जरूर कमाते होंगे और हम से कहीं ज्यादा समझदार भी होंगे. सवाल यह है कि हमें भी उतना ही चुस्तचालाक होना चाहिए न…हम जैसों को तो एक अदना सा वकील बेच कर खा जाए. ऐसा है कि एक वकील का पेशा साफसुथरा नहीं हो सकता न. उस का अपना कोई जमीर हो सकता है या नहीं, मेरी तो यही समझ में नहीं आता. उस की सारी की सारी निष्ठा इतनी लचर होती है कि जिस का खाता है उस के साथ भी नहीं होती. एक विषधर नाग पर भरोसा किया जा सकता है लेकिन इस काले कोट पर नहीं. नहीं भाई, मुझे अपने घर में एक वकील तो कभी नहीं चाहिए.’’

चाचाजी के शब्द कहीं भी गलत नहीं थे. वे सच कह रहे थे. इस पेशे में सचझूठ का तो कोई अर्थ है ही नहीं. सच है कहां? वह तो बेचारा कहीं दम तोड़ चुका नजर आता है. एक ‘नोबल प्रोफैशन’ माना जाने वाला पेशा भी आज के युग में ‘नोबल’ नहीं रह गया तो इस पेशे से तो उम्मीद भी क्या की जा सकती है.

दोपहर को हम धूप सेंक रहे थे तभी पुराने कपड़ों के बदले नए बरतन देने वाली चली आई. उम्रदराज औरत है. साल में 2-3 बार ही आती है. कह सकती हूं अपनी सी लगती है. बरतन देखतेदेखते मैं ने हालचाल पूछा. पिछली बार मैं ने 2 जरी की साडि़यां उसे दे दी थीं. उस की बेटी की शादी जो थी.

‘‘शादी अच्छे से हो गई न रमिया… लड़की खुश है न अपने घर में?’’

‘‘जी, बीबीजी, खुश है…कृपा है आप लोगों की.’’

‘‘साडि़यां उसे पसंद आई थीं कि नहीं?’’

फीकी सी हंसी हंस गरदन हिला दी उस ने.

‘‘साडि़यां तो थानेदार ने निकाल ली थीं बीबीजी. आदमी को अफीम का इलजाम लगा कर पकड़ लिया था. छुड़ाने गई तो टोकरा खुलवा कर बरतन भी निकाल लिए और सारे कपड़े भी. पुलिस वालों ने आपस में बांट लिए. तब हमारा बड़ा नुकसान हो गया था. चलो, हो गया किसी तरह लड़की का ब्याह, यह सब तो हम गरीबों के साथ होता ही रहता है.’’

उस की बातें सुन कर मैं अवाक् रह गई थी. लोगों की उतरन क्या पुलिस वालों ने आपस में बांट ली. इतने गएगुजरे होते हैं क्या ये पुलिस वाले?

सहसा मेरे मन में कुछ कौंधा. कुछ दिन पहले मेरी एक मित्र के घर कोई उत्सव था और उस के घर हूबहू मेरी वही जरी की साड़ी पहने एक महिला आई थी. मित्र ने मुझे उस से मिलाया भी था. उस ने बताया था कि उस के पति पुलिस में हैं. तो क्या वह मेरी साड़ी थी? कितनी ठसक थी उस औरत में. क्या वह जानती होगी कि उस ने जिस की उतरन पहन रखी है, उसी के सामने ही वह इतरा रही है.

‘‘कौन से थाने में गई थी तू अपने आदमी को छुड़ाने?’’

‘‘बीबीजी, यही जो रेलवे फाटक के पीछे पड़ता है. वहां तो आएदिन किसी न किसी को पकड़ कर ले जाते हैं. जहान के कुत्ते भरे पड़े हैं उस थाने में. कपड़ा, बरतन न निकले तो बोटियां चबाने को रोक लेते हैं. मां पसंद आ जाए तो मां, बेटी पसंद आ जाए तो बेटी…’’

‘‘कोई कुछ कहता नहीं क्या?’’

‘‘कौन कहेगा और किसे कहेगा. उस से ऊपर वाला उस से बड़ा चोर होगा. कहां जाएं हम…बस, उस मालिक का ही भरोसा है. वही न्याय करेगा. इनसान से तो कोई उम्मीद है नहीं.’’

आसमान की तरफ देखा रमिया ने तो मन अजीब सा होने लगा मेरा. क्या कोई इतना भी नीचे गिर सकता है. थाली की रोटी तोड़ने से पहले इनसान यह तो देखता ही है कि थाली साफसुथरी है कि नहीं. लाख भूखा हो कोई पर नाली की गंदगी तो उठा कर नहीं खाई जा सकती.

रमिया से ऐसा कहा तो उस की आंखें भर आईं.

‘‘पेट की भूख और तन की भूख मैलीउजली थाली नहीं देखती बीबीजी. हम लोगों की हाय उन्हें दिनरात लगती है. अब देखना है कि उन्हें अपने किए की सजा कब मिलती है.’’

उस थानेदारनी के प्रति एक जिज्ञासा भाव मेरे मन में जाग उठा. एक दिन मैं अपनी उसी मित्र से मिलने गई. बातोंबातों में किसी बहाने उस का जिक्र छेड़ दिया.

‘‘उस की साड़ी बड़ी सुंदर थी. मेरी मां के पास भी ऐसी ही जरी की साड़ी थी. पीछे से उसे देख कर लग रहा था कि मेरी मां ही खड़ी हैं. कैसे लोग हैं…इस इलाके में नएनए आए हैं…वे कोई नई किट्टी शुरू कर रही थीं और कह रही थीं कि मैंबर बनना चाहें तो…तुम कैसे जानती हो उन्हें?’’

‘‘उन का बेटा मेरे राजू की क्लास में है. ज्यादा जानपहचान नहीं करना चाहती हूं मैं…इन पुलिस वालों के मुंह कौन लगे. अब राजू ने बुला लिया तो मैं क्या कहती. तुम किट्टी के चक्कर में उसे मत डालना. ऐसा न हो कि उस की किट्टी निकल आए और बाकी की सारी तुम्हें भरनी पड़े. उस की हवा अच्छी नहीं है. शरीफ आदमी नहीं हैं वे लोग. औरत आदमी से भी दो कदम आगे है. मुंह पर तो कोई कुछ नहीं कहता पर इज्जत कोई नहीं करता.’’

अपनी मित्र का बड़बड़ाना मैं देर तक सुनती रही. अपने राजू की उन के बेटे के साथ दोस्ती से वे परेशान थीं.

‘‘कापीकिताब लेने अकसर उस का लड़का आता रहता है. एक दिन राजू ने मना किया तो कहने लगा कि शराफत से दे दो, नहीं तो पापा से कह कर अंदर करवा दूंगा.’’

‘‘क्या सच में ऐसा…?’’

मेरी हैरानी का एक और कारण था.

‘‘इन पुलिस वालों की न दोस्ती अच्छी न दुश्मनी. मैं तो परेशान हूं उस के लड़के से. अपनी कुरसी का ऐसा नाजायज फायदा…समझ में नहीं आता कि राजू को कैसे समझाऊं. बच्चा है कहीं कह देगा कि मेरी मां ने मना किया है तो…’’

एक बेईमान इनसान अपने आसपास कितने लोगों को प्रभावित करता है, यह मुझे शीशे की तरह साफ नजर आ रहा था. एक चरित्रहीन इनसान अपनी वजह से क्याक्या बटोर रहा है. बदनामी और गंदगी भी. क्या डर नहीं लगता है आने वाले कल से? सब से ज्यादा विकार तो वह अपने ही लिए संजो रहा है. कहांकहां क्याक्या होगा, जब यही सब प्रश्नचिह्न बन कर सामने खड़ा होगा तब उत्तर कहां से लाएगा.

सच है, अपने दंभ में मनुष्य क्याक्या कर जाता है. पता तो तब चलता है जब कोई उत्तर ही नहीं सूझता. वक्त की लाठी में आवाज नहीं होती और जब पड़ती है तब सूद समेत सब वापस भी कर देती है.

कहने को तो हम सभ्य समाज में रहते हैं और सभ्यता का ही कहांकहां रक्त बह रहा है, हमें समझ में ही नहीं आता. अगर दिखाई दे भी जाए तो हम उस से आंखें फेर लेते हैं. बुराई को पचा जाने की कितनी अच्छी तरह सीख मिल चुकी है हमें.

गरीब बरतन वाली की पीड़ा और उस जैसी औरों पर गिरती थानेदार की गाज ने कई दिन सोने नहीं दिया मुझे. क्या हम पढ़ेलिखे लोग उन के लिए कुछ नहीं कर सकते? क्या हमारी मानसिकता इतनी नपुंसक है कि किसी का दुख, किसी की पीड़ा हमें जरा सा भी नहीं रुलाती? अगर ऊंचनीच का भेद मिटा दें तो एक मानवीय भाव तो जागना ही चाहिए हमारे मन में. अपने पति से इस बारे में बात की तो उन्होंने गरदन हिला दी.

समाज इतना गंदा हो चुका है कि अपनी चादर को ही बचा पाना आज आसान नहीं रहा. दिन निकलता है तो उम्मीद ही नहीं कर सकते कि रात सहीसलामत आएगी कि नहीं. फूंकफूंक कर पैर रखो तो भी कीचड़ की छींटों से बचाव नहीं हो पाता. क्या करें हम? अपना मानसम्मान ही बचाना भारी पड़ता है और किसी को कोई कैसे बचाए.

मेरे पति जिस विभाग में कार्यरत हैं वहां हर पल पैसों का ही लेनदेन होता है. पैसा लेना और पैसा देना ही उन का काम है. एक ऐसा इनसान जिसे दिनरात रुपयों में ही जीना है, वही रुपए कब गले में फांसी का फंदा बन कर सूली पर लटका दें पता ही नहीं चल सकता. कार्यालय में आने वाला चोर है या साधु…समझ ही नहीं पाते. कैसे कोई काम कर पाए और कैसे कोई अपनी चादर दागदार होने से बचाए?

आज ईमानदारी और बेईमानी का अर्थ बदल चुका है. आप लाख चोरी करें, जी भर कर अपना और सामने वाले का चरित्रहनन करें. बस, इतना खयाल रखिए कि कोई सुबूत न छोड़ें. पकड़े न जाएं. यहीं पर आप की महानता और समझदारी प्रमाणित होती है. कच्चे चोर मत बनिए. जो पकड़ा गया वही बेईमान, जो कभी पकड़ा ही न जाए वह तो है ही ईमानदार, उस पर कैसा दोष?

इसी कुलबुलाहट में कितने दिन बीत गए. ‘कबिरा तेरी झोपड़ी गल कटियन के पास, करन गे सो भरन गे तू क्यों भेया उदास’ की तर्ज पर अपने मन को समझाने का मैं प्रयास करती रही. बुराई का अंत कब होगा…कौन करेगा…किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा था मुझे.

एक शाम मुझे जम्मू से फोन आया :

‘‘आप के शहर में कर्फ्यू लग गया है. क्या हुआ…आप ठीक हैं न?’’ मेरी बहन का फोन था.

‘‘नहीं तो, मुझे तो नहीं पता.’’

‘‘टीवी पर तो खबर आ रही है,’’ बहन बोली, ‘‘आप देखिए न.’’

मैं ने झट से टीवी खोला. शहर का एक कोना वास्तव में जल रहा था. वाहन और सरकारी इमारतें धूधू कर जल रही थीं. रेलवे स्टेशन पर भीड़ थी. रेलों की आवाजाही ठप थी.

एक विशेष वर्ग पर ही सारा आरोप आ रहा था. शहर के बाहर से आया मजदूर तबका ही मारकाट और आगजनी कर रहा था. एसएसपी सहित 12-15 पुलिसकर्मी भी घायल अवस्था में अस्पताल पहुंच चुके थे. मजदूरों के एक संगठन ने पुलिस पर हमला कर दिया था. मैं ने झट से पति को फोन किया. पता चला, उस तरफ भी बहुत तनाव है. अपना कार्यालय बंद कर के वे लोग बैठे हैं. कब हालात शांत होेंगे, कब वे घर आ पाएंगे, पता नहीं. बच्चों  के स्कूल फोन किया, पता चला वे भी डी.सी. के और्डर पर अभी छुट्टी नहीं कर पा रहे क्योंकि सड़कों पर बच्चे सुरक्षित नहीं हैं. दम घुटने लगा मेरा. क्या सभी दुबके रहेंगे अपनेअपने डेरों में. पुलिस खुद मार खा रही है, वह बचाएगी क्या?

अपनी सहेली को फोन किया. कुछ तो रास्ता निकले. उस का बेटा राजू भी अभी स्कूल में ही है क्या?

‘‘क्या तुम्हें कुछ भी पता नहीं है? कहां रहती हो तुम? मैं ने तो राजू को स्कूल जाने ही नहीं दिया था.’’

‘‘क्यों, तुम्हें कैसे पता था कि आज कर्फ्यू लगने वाला है?’’

‘‘उस थानेदार की खबर नहीं सुनी क्या तुम ने? सुबह उस की पत्नी और बेटे का अधकटा शव पटरी पर से मिला है. थानेदार के भी दोनों हाथ काट दिए गए हैं. भीड़ ने पुलिस चौकी पर हमला कर दिया था.’’

काटो तो खून नहीं रहा मुझ में. यह क्या सुना रही है मेरी मित्र? वह बहुत कुछ और भी कहतीसुनती रही. सब जैसे मेरे कानों से टकराटकरा कर लौट गया. जो सुना उसे तो आज नहीं कल होना ही था. सच कहा है किसी ने, अपनी लड़ाई सदा खुद ही लड़नी पड़ती है.

रमिया की सारी बातें याद आने लगीं मुझे. हम तो उस के लिए कुछ नहीं कर पाए. हम जैसा एक सफेदपोश आदमी जो अपनी ही पगड़ी बड़ी मुश्किल से बचा पाता है किसी की इज्जत कैसे बचा सकता है. यह पुलिस और मजदूर वर्ग की लड़ाई सामान्य लड़ाई कहां है, यह तो मानसम्मान की लड़ाई है. सब को फैलती आग दिखाई दे रही है पर किसी को वह आग क्यों नहीं दिखती जिस ने न जाने कितनों के घर का मानसम्मान जला दिया?

थानेदारनी और उस के बच्चे का अधकटा शव तो अखबार के पन्नों पर भी आ जाएगा, उन का क्या, जिन की पीड़ा अनसुनी रह गई. क्या करते गरीब लोग? तरीका गलत सही, सही तरीका है कहां? कानून हाथ में ले लिया, कानून है कहां? सुलगती आग एक न एक दिन तो ज्वाला बन कर जलाती ही.

‘‘शुभा, तू सुन रही है न, मैं क्या कह रही हूं. घर के दरवाजे बंद रखना, सुना है वे घरों में घुस कर सब को मारने वाले हैं. अपना बचाव खुद ही करना पड़ेगा.’’

फोन रख दिया मैं ने. अपना बचाव खुद करने के लिए सारे दरवाजेखिड़कियां तो बंद कर लीं मैं ने लेकिन मन की गहराई में कहीं विचित्र सी मुक्ति का भाव जागा. सच कहा है उस ने, अपना बचाव खुद ही करना पड़ता है. अपनी लड़ाई हमेशा खुद ही लड़नी पड़ती है. यह आग कब थमेगी, मुझे पता नहीं, मगर वास्तव में मेरी छाती में ठंडक का एहसास हो रहा था.

Family Story in Hindi

पक्की सहेलियां: किराएदार पंखुड़ी के आने क्यों डर गई थी विनिता?

पति निशांत की प्रमोशन और स्थानांतरण के बाद विनिता अपने 5 वर्षीय बेटे विहान को ले कर हजारीबाग से रांची आ गई. महत्त्वाकांक्षी निशांत को वहां की पौश कालोनी अशोक नगर में कपंनी द्वारा किराए का मकान मिला था, जिस में रांची पहुंचते ही वे शिफ्ट हो गए. मकान बड़ा, हवादार और दोमंजिला था. नीचे मकानमालिक रहते थे और ऊपर विनिता का परिवार.

मकान के पार्श्व में बने बड़े गैरेज के ऊपर भी एक बैडरूम वाला छोटा सा फ्लैट बना था, जो खाली पड़ा था. उस फ्लैट को ऊपरी मंजिल से इस तरह जोड़ा गया था कि दोनों फ्लैटों में रहने वाले आनेजाने के लिए कौमन सीढि़यों का उपयोग कर सकें.

रांची आते ही निशांत ने विहान का ऐडमिशन एक अच्छे स्कूल में करवा कर

औफिस जौइन कर लिया. स्कूल ज्यादा दूर नहीं था पर विनिता को स्कूटी चलाना न आने के कारण निशांत को अपनी कार से औफिस जाते समय विहान को स्कूल छोड़ना और लंच टाइम में आते वक्त उसे वापस लाना पड़ता था. कुछ दिनों तक तो ठीक चला पर नई जगह, नया पद और जिम्मेदारियां, इन सब ने निशांत को धीरेधीरे काफी व्यस्त कर दिया. अब निशांत सुबह 9 बजे निकल जाता और शाम के 7-8 बजे तक ही लौट पाता था, वह भी बिलकुल थका हुआ.

एक दिन निशांत ने विनिता से कहा, ‘‘तुम स्कूटी चलाना क्यों नहीं सीख लेतीं? कम से कम विहान को स्कूल पहुंचाने व लाने का तथा दूसरे छोटेमोटे काम तो कर ही सकती हो.’’

‘‘अरे मुझे क्या जरूरत है स्कूटी सीखने या बाहर के काम करने की. ये काम तो मर्दों के होते हैं, मैं तो घर में ही भली,’’ विनिता बोली.

मजबूरन विहान के लिए निशांत ने औटोरिकशा लगवा दिया. उस के बाद निशांत ने इस संबंध में कोई बात नहीं की. घरेलू और मिलनसार स्वभाव की विनिता खुद को घरगृहस्थी के कामों में ही व्यस्त रखती थी. लगभग डेढ़दो महीने उसे अपने घर को सुव्यवस्थित करने में लग गए. मकानमालकिन की मदद से अच्छी बाई मिल गई, तो विनिता ने चैन की सांस ली. विहान के स्कूल से आने के बाद अब वह उसी के साथ व्यस्त रहती.

घर सैट हो गया तो विनिता ने पासपड़ोस में अपनी पहचान बनानी शुरू करनी चाही पर छोटी जगह से आई विनिता को यह पता नहीं था कि ज्यादातर पौश कालोनी में रहने वाले पड़ोसियों का संबंध सिर्फ हायहैलो और स्माइल तक ही सीमित रहता है. कारण, वे सभी अपनेआप में हर तरह की सुविधा से आत्मनिर्भर होते हैं. 1-2 लोगों के साथ दोस्ती भी हुई पर सिर्फ औपचारिक तौर पर. अत: घर का काम खत्म होने पर जब कभी उसे खाली समय मिलता तो या तो वह टीवी देखती या फिर दिल बहलाने के लिए नीचे मकानमालिक के घर चली जाती.

मकानमालिक बुजुर्ग दंपती थे, जिन के बच्चे विदेश में बसे थे. वे साल में 6 महीने विदेश में ही रहते थे अपने बच्चों के पास. गृहकार्य में दक्ष विनिता कभी कुछ विशेष खाना बनाती तो नीचे जरूर भेजती. नए किराएदार निशांत और विनीता के व्यवहार से बुजुर्ग दंपती बहुत संतुष्ट थे. उन तीनों को अपने बच्चों की तरह प्यार करने लगे थे. ये दोनों भी उन्हें आंटीअंकल कह कर बुलाने लगे. ज्यादातर संडे को छुट्टी होने के कारण चारों कभी ऊपर तो कभी नीचे एकसाथ चाय पी लिया करते थे.

ऐसे ही एक संडे की शाम को निशांत और विनिता नीचे आंटीअंकल के साथ चाय पी रहे थे. तभी अंकल ने पूछा, ‘‘बेटा, आप दोनों को अभी छुट्टी ले कर घर तो नहीं जाना है?’’

निशांत ने कहा, ‘‘नहीं अंकल, अभी अगले 6-7 महीने तो सोच भी नहीं सकता, क्योंकि औफिस का बहुत सारा काम पूरा करना है मुझे.’’

विनिता से रहा नहीं गया तो उस ने पूछ लिया, ‘‘मगर अंकल आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘वह इसलिए कि हम दोनों निश्चिंत हो कर कुछ महीनों के लिए अपने बच्चों से मिलने विदेश उन के पास जा सकें,’’ आंटी ने कहा तो विनिता मन ही मन घबरा गई.

घर आ कर भी विनिता सोचती रही कि इन दोनों के जाने के बाद तो घर सूना हो जाएगा, वह बिलकुल अकेली हो जाएगी. भले ही वह रोज नहीं मिलती उन से, पर कम से कम उन की आवाजें तो आती रहती हैं उस के कानों में.

सोते समय निशांत ने विनिता को सीरियस देखा तो पूछ लिया, ‘‘क्या बात है,

आंटीअंकल के जाने से तुम परेशान क्यों हो रही हो?’’

विनिता ने अपने दिल की बात बताई तो निशांत को भी एहसास हुआ कि वाकई इतने बड़े घर में विनिता अकेली हो जाएगी.

थोड़ी देर बाद विनिता ने कहा, ‘‘निशांत, क्यों न आंटीअंकल को गैरेज वाले फ्लैट में एक किराएदार रखने की सलाह दी जाए, जिस से उन को इनकम हो जाएगी और हम लोगों का सूनापन दूर हो जाएगा.’’

निशांत को विनिता की बात जंच गई. अगले दिन औफिस जाते वक्त निशांत ने जब अंकल से इस बात की चर्चा की तो उन्होंने न केवल किराएदार रखने वाली उन की बात का स्वागत किया, बल्कि नया किराएदार ढूंढ़ने का जिम्मा भी निशांत को ही सौंप दिया.

3-4 दिनों के बाद शाम के समय विनिता नीचे आंटीअंकल के पास बैठी हुई निशांत का इंतजार कर रही थी. तभी चुस्त कपड़े, हाई हील पहने और बड़ा सा बैग कंधे से लटकाए एक आधुनिक सी दिखने वाली लड़की कार से उतर गेट खोल कर अंदर दाखिल हुई. आते ही उस ने बड़ी संजीदगी से पूछा, ‘‘माफ कीजिएगा, क्या उमेशजी का यही घर है?’’

‘‘जी हां, बताइए क्या काम है? मैं ही हूं उमेश,’’ अंकल बोले.

‘‘गुड ईवनिंग सर, मैं पंखुड़ी,’’ कह कर उस ने अंकल से हाथ मिलाया. फिर कहने लगी, ‘‘आज निशांत से पता चला कि आप के घर में एक फ्लैट खाली है किराए के लिए. मैं उसी सिलसिले में आई हूं.’’

‘अच्छा तो यह फैशनेबल सी लड़की किराएदार बनने आई है,’ सोच संकोची स्वभाव की विनिता उठ कर ऊपर जाने लगी. तभी अंकल ने अपनी पत्नी और विनिता से उस का परिचय करवाया. पंखुड़ी ने दोनों की तरफ मुखातिब होते हुए ‘हैलो’ कहा. फिर अंकल से बातचीत करने और फ्लैट देखने चली गई. बड़ा अटपटा लगा विनिता को कि उम्र में इतनी छोटी होने पर भी कितने आराम से उस ने सिर्फ हैलो कहा. कम से कम वह उसे न सही आंटी को नमस्ते तो कह सकती थी, उन की उम्र का लिहाज कर के. खैर, उसे क्या. उस ने मन ही मन सोचा.

अंकल से बात करते समय विनिता ने सुना कि पंखुड़ी एक मल्टी नैशनल कंपनी में ऐग्जीक्यूटिव पद पर है. वह अंकल से कह रही थी, ‘‘देखिए मेरे वर्किंग आवर्स फिक्स नहीं हैं, शिफ्टों में ड्यूटी करनी पड़ती है. मेरे आनेजाने का समय भी कोई निश्चित नहीं है, कभी देर रात आती हूं तो कभी मुंह अंधेरे निकल जाती हूं. कभीकभी तो टूअर पर भी जाना पड़ता है 2-3 दिनों के लिए. आप को कोई आपत्ति तो नहीं?

‘मैं इस बात को पहले ही पूछ लेना चाहती हूं, क्योंकि अभी जहां मैं रह रही हूं उन्हें इस बात पर आपत्ति है… लोग लड़की के देर रात घर आने को सीधे उस के करैक्टर से जोड़ कर देखते हैं… एकदम घटिया सोच,’’ कह कर वह चुप हो गई.

इस के बाद क्या हुआ, यह पता नहीं. विनिता वहां से अपने घर चली आई. उसे वह लड़की बहुत तेजतर्रार और बिंदास लगी.

उस शाम निशांत काफी देर से घर लौटा. खापी कर तुरंत सो गया. पंखुड़ी के बारे में पूछने का मौका ही नहीं मिला विनिता को. अगले शनिवार की शाम जब देर रात विनिता परिवार सहित शौपिंग कर के लौटी तो देखा खाली पड़े फ्लैट की लाइट जल रही है. शायद कोई नया किराएदार आ गया है. नीचे सीढ़ी का दरवाजा बंद कर के विनिता हैलो करने की नीयत से मिलने गई तो देखा ताला लगा था.

रात करीब 12 बजे घंटी की आवाज से विनिता की नींद खुली. उस ने निशांत को

उठाया और नीचे यह सोच कर भेजा कि अंकलआंटी को कुछ जरूरत तो नहीं?

थोड़ी देर में निशांत वापस आया और सोने लगा तो विनिता ने पूछा, ‘‘कौन था?’’

निशांत ने कहा, ‘‘अंकल की नई किराएदार पंखुड़ी.’’

विनिता ने तुरंत कहा, ‘‘निशांत, तुम कोई घरेलू, समझदार, किराएदार नहीं ढूंढ़ सकते थे अंकल के लिए? वक्तबेवक्त आ जा कर हमें डिस्टर्ब करती रहेगी. अंकल तो चले जाएंगे अपने बच्चों के पास, पर साथ रहना तो हम दोनों को ही है.’’

नींद से भरा निशांत उस समय बात करने के मूड में नहीं था. गुस्से से बोला, ‘‘अरे वह पढ़ीलिखी नौकरी करने वाली लड़की है. वह कब जाए या कब आए इस से हमें क्या फर्क पड़ेगा भला? आज पहला दिन है, अपने साथ सीढ़ी के दरवाजे की चाबी ले जाना भूल गई थी वह,’’ कह कर वह गहरी नींद में सो गया.

विनिता को निशांत का इस तरह बोलना बहुत बुरा लगा. उस दिन पंखुड़ी पर और भी गुस्सा आया. मृदुभाषी और समझदार स्वभाव की विनिता पति की व्यस्तता को समझती थी. उसे इस बात से कोई शिकायत नहीं रहती कि निशांत देर से घर क्यों आता है, बल्कि पति के आने पर मुसकराते हुए वह उसे गरमगरम चाय पिलाती ताकि उस की थकान मिट जाए.

अगली सुबह सब थोड़ी देर से उठे. चाय बनाने लगी तो विनिता को पंखुड़ी का ध्यान आया. उस ने निशांत से पूछे बगैर उस के लिए भी चाय बना दी और दरवाजा खटखटा कर चाय पहुंचा आई. उनींदी आंखों से पंखुड़ी ने दरवाजा खोल कप ले कर थैंक्स कह झट दरवाजा बंद कर लिया.

विनिता सकपका गई. कोई तमीज नहीं कि 2 मिनट बात ही कर लेती. शायद नींद डिस्टर्ब हो गई थी उस की. सारा दिन घर बंद रहा. सो रही होगी, शाम को सजधज

कर पंखुड़ी चाय का कप वापस करने विनिता के पास आई. वैसे तो वह विनिता से मिलने आई थी, पर सारा समय निशांत और विहान से ही इधरउधर की बातें करती रही.

विनिता के पूछने पर कि चाय बनाऊं तुम्हारे लिए पंखुड़ी ने कहा, ‘‘थैंक्स, मैं चाय नहीं पीती.’’ ‘चाय की जगह जरूर यह कुछ और पीती होगी यानी बोतल वाली चाय’ विनिता ने सोचा. फिर यह पूछने पर कि किचन में खाना बनाना अभी शुरू किया या नहीं. पंखुड़ी तपाक से बोली, ‘‘अरे, किचन का झमेला मैं नहीं रखती. कौन कुकिंग करे? समय की बरबादी है. बाहर ही खाती हूं या पैक्ड खाना मंगवा लेती हूं.’’

थोड़ी देर बाद उस ने अपनी कार निकाली और चली दी कहीं घूमने. जाते वक्त हंसते हुए कहा, ‘‘डौंट वरी निशांत आज मैं चाबी साथ लिए जा रही हूं.’’ इस बात पर निशांत और पंखुड़ी ने एक जोरदार ठहाका लगाया, पर पता नहीं हंसमुख स्वभाव वाली विनिता को हंसी क्यों नहीं आई.

रात को सोते समय विनिता ने निशांत से कहा, ‘‘हाय, कैसी है यह पंखुड़ी… लड़कियों वाले तो लक्षण ही नहीं हैं इस में. सारे काम मर्दों वाले करती है, शादी कर के कैसे घर बसाएगी यह? ऐसी ही लड़कियों की ससुराल और पति से नहीं बनती है. पति दुखी रहता है या तलाक हो जाता है. एक मैं थी कालेज पहुंचतेपहुंचते सिलाईकढ़ाई के अलावा घरगृहस्थी का भी सारा काम सीख लिया था?’’

निशांत ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘वह खाना बनाना नहीं जानती है, यह कौन सी बुराई हुई उस की? देखती नहीं कितनी स्मार्ट, मेहनती, आत्मनिर्भर और औफिस के कामों में दक्ष है वह… दुखी सिर्फ इस जैसी लड़की के पति ही क्यों, दुखी तो उन

घरेलू पत्नियों के पति भी हो सकते हैं, जो इस आधुनिक जमाने में भी खुद को बस घर की चारदीवारी में ही कैद रखना पसंद करती हैं. छोटेमोटे कामों के लिए भी पूर्णतया पिता, पति, भाई या बेटे पर निर्भर… बदलते समय के साथ ये खुद नहीं बदलती हैं उलटे जो बदल रहा है उस में भी कुछ न कुछ खोट निकालती रहती हैं.’’

विनिता ने निशांत का इशारा समझ लिया था कि पूर्णतया निर्भर होने वाली बात किसे इंगित कर के कही जा रही है. इस के अलावा निशांत द्वारा पंखुड़ी की इतनी तारीफ करना उसे जरा भी नहीं सुहाया. दिल ने हौले से कहा कि सावधान विनिता. ऐसी ही लड़कियां दूसरों का घर तोड़ती हैं. आजकल जब देखो निशांत पंखुड़ी की तारीफ करता रहता है.

कुछ दिनों बाद आंटीअंकल विदेश चले गए. पंखुड़ी अपनी दुनिया में मस्त और विनिता अपनी गृहस्थी में. मगर जानेअनजाने विनिता पंखुड़ी की हर गतिविधि पर ध्यान देने लगी थी कि कब वह आतीजाती है या कौन उसे ले जाने या छोड़ने आता है. ऐसा नहीं था कि पंखुड़ी को इस बात का पता नहीं था. वह सब समझती थी पर जानबूझ कर उसे इगनोर करती, क्योंकि उस के दिमाग में था कि विनिता जैसी हाउसवाइफ के पास कोई काम नहीं होता दिन भर सिवा खाना बनाने और लोगों की जासूसी करने के.

इस तरह आपस में हायहैलो होते हुए भी एक अदृश्य सी दीवार खिंच गई थी दोनों में.

2 नारियां, पढ़ीलिखी, लगभग समान उम्र की पर बिलकुल विपरीत सोच और संस्कारों वाली. एक के लिए पति, बच्चा और घरगृहस्थी ही पूरी दुनिया थी तो दूसरी के लिए घर सिर्फ रहने और सोने का स्थान भर.

एक बार विनिता ने पंखुड़ी को पिछले 24 घंटों से कहीं आतेजाते नहीं देखा. पहले

सोचा कि उसे क्या, वह क्यों चिंता करे पंखुड़ी की? उस की चिंता करने वाले तो कई लोग होंगे या फिर आज कहीं जाने के मूड में नहीं होगी स्मार्ट मैडम. पर जब दिल नहीं माना तो बहाना कर के विहान को भेज दिया यह कह कर कि जाओ पंखुड़ी आंटी के साथ थोड़ी देर खेल आओ. मगर कुछ ही देर में विहान दौड़ता हुआ आया और बोला, ‘‘मम्मी… मम्मी… मैं कैसे खेल सकता हूं आंटी के साथ, उन्हें तो बुखार है.’’

बुखार का नाम सुनते ही विनिता तुरंत पंखुड़ी के घर पहुंच गई. घंटी बजाई तो अंदर से धीमी आवाज आई, ‘‘दरवाजा खुला है. अंदर आ जाइए.’’

अंदर दाखिल होने पर विनिता ने देखा कि पंखुड़ी कंबल ओढ़े बिस्तर पर बेसुध पड़ी है. छू कर देखा तो तेज बुखार से बदन तप रहा था. चारों तरफ निगाहें दौड़ाईं, सारा घर अस्तव्यस्त दिख रहा था. एक भी सामान अपनी जगह नहीं. तुरंत भाग कर अपने घर आई, थर्मामीटर और ठंडे पानी से भरा कटोरा लिया और वापस पहुंची पंखुड़ी के पास. बुखार नापा, सिर पर ठंडे पानी की पट्टियां रखनी शुरू कीं. थोड़ी देर बाद बुखार कम हुआ और जब पंखुड़ी ने आंखें खोलीं तो विनिता ने पूछा, ‘‘दवाई ली है या नहीं?’’

पंखुड़ी ने न कहा और फिर इशारे से बताया कि दवा कहां रखी है? विनिता ने उसे बिस्कुट खिला दवा खिलाई और फिर देर तक उस का सिर दबाती रही. जब पंखुड़ी को थोड़ा आराम हुआ तो विनिता अपने घर लौट गई. आधे घंटे बाद वह ब्रैड और गरमगरम सूप ले कर पंखुड़ी के पास लौटी. उस के मना करने पर भी उसे बड़े प्यार से खिलाया. इस तरह पंखुड़ी के ठीक होने तक विनिता ने उस का हर तरह से खयाल रखा.

पंखुड़ी विनिता की नि:स्वार्थ सेवा देख शर्मिंदा थी. उसे अपनी इस सोच पर अफसोस हो रहा था कि विनिता जैसी हाउसवाइफ के पास कोई काम नहीं होता सिवा जासूसी करने और खाना पकाने के. अगर विनिता ने समय पर उस का हाल नहीं लिया होता तो पता नहीं उसे कितने दिनों तक बिस्तर पर रहना पड़ता.

खैर, इस के बाद विनिता के प्रति पंखुड़ी का नजरिया बदल गया. अब जब भी विनिता के घर आती तो निशांत, विहान के साथसाथ विनिता से भी बातें करती. विनिता की संगति में रह कर अब उस ने अपने घर को भी सुव्यवस्थित रखना शुरू कर दिया था.

आजकल निशांत पहले से भी ज्यादा व्यस्त रहने लगा था. फिर एक दिन चहकता हुआ घर आया. चाय पीते हुए निशांत बता रहा था कि उस के काम से खुश हो कंपनी की तरफ से उसे फ्रांस भेजा जा रहा है प्रशिक्षण लेने के लिए. अगर वह अपने प्रशिक्षण में अच्छा करेगा तो अनुभव हासिल करने के लिए परिवार सहित 2 साल तक उसे फ्रांस में रहने का मौका भी मिल सकता है.

पति की इस उपलब्धि पर विनिता बहुत खुश हुई, लेकिन यह सुन कर कि प्रशिक्षण के दौरान निशांत को अकेले ही जाना है, उस का कोमल मन घबरा उठा. निशांत के बिना अकेले कैसे रह पाएगी वह विहान को ले कर? घर में भी कोई ऐसा फ्री नहीं है, जिसे 3 महीनों के लिए बुला सके. विनिता ने निशांत को बधाई दी फिर धीरे से कहा, ‘‘अगर फ्रांस जाना है तो हम दोनों को भी अपने साथ ले चलो वरना मैं तुम्हें अकेले नहीं जाने दूंगी, क्या तुम ने तनिक सोचा है कि तुम्हारे जाने के बाद यहां मैं अकेले विहान के साथ कैसे रह पाऊंगी 3 महीने?’’

भविष्य के सुनहरे ख्वाब देखने में डूबे निशांत को विनिता की यह बात जरा भी नहीं भाई. झल्लाते हुए कहा, ‘‘यह तुम्हारी समस्या है मेरी नहीं. कितनी बार कहा कि समय के साथ खुद को बदलो, नईनई जानकारी हासिल करो. बाहर का काम

निबटाना सीखो पर तुम ने तो इन कामों को भी औरतों और मर्दों के नाम पर बांट रखा है.

‘‘अब दिनरात मेहनत करने के बाद यह अवसर हाथ आया है तो क्या तुम्हारी इन बेवकूफियों के चक्कर में मैं इसे हाथ से गंवा दूं? हरगिज नहीं. अगर तुम अकेली नहीं रह सकती तो अभी चली जाओ विहान को ले कर अपनी मां या मेरी मां के घर. मेरी तो जिंदगी ही बरबाद हो गई ऐसी पिछड़ी मानसिकता वाली बीवी पा कर,’’ और फिर फ्रैश होने चला गया.

विनिता का दिल धक से रह गया. पति के इस कटु व्यवहार से उस की आंखों से आंसू बहने लगे. लगा उस की तो बसीबसाई गृहस्थी उजड़ जाएगी. साथ ही यह भी महसूस होने लगा कि निशांत भी क्या करे बेचारा, उस के कैरियर का सवाल है. दिल ने कहा इस स्थिति की जिम्मेदार भी काफी हद तक वह खुद ही है.

अब यह बात उस की समझ में आ चुकी थी कि वर्तमान समय में हाउसवाइफ को सिर्फ घर के अंदर वाले काम ही नहीं, बल्कि बाहर वाले जरूरी काम भी आने चाहिए. आज पढ़ीलिखी होने के बावजूद अपने को असफल, हीन और असहाय समझ रही थी. कारण घर के बाहर का कोई काम वह करने के लायक नहीं थी. इतनी बड़ी खुशी मिलने पर भी पतिपत्नी में तनाव उत्पन्न हो गया था.

अगले दिन चाय पीते समय पंखुड़ी भी वहां पहुंच गई. आते ही जोश के साथ निशांत को बधाई दी और पार्टी की मांग करने लगी.

निशांत का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था. उस ने कहा, ‘‘अरे कैसी बधाई और कैसी पार्टी पंखुड़ी? मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा इस जिंदगी में कभी.’’

पंखुड़ी को निशांत की बात कुछ समझ नहीं आई. विनिता ने बात छिपानी चाही कि इस बिंदास लड़की से बताने का क्या फायदा, उलटे कहीं इस ने जान लिया तो खूब हंसी उड़ाएगी मेरी, पर गुस्से में निशांत ने अपनी सारी परेशानी पंखुड़ी को सुना

डाली.

विनिता तो मानो शर्म के मारे धरती के अंदर धंसी जा रही थी. मगर सारी बात ध्यान से सुनने के बाद पंखुड़ी हंसने लगी और फिर हंसतेहंसते ही बोली, ‘‘डौंट वरी निशांत, यह भी कोई परेशानी है भला? इस का समाधान तो कुछ दिनों में ही हो जाएगा. आप अपनी पैकिंग और मेरी पार्टी की तैयारी शुरू कर दीजिए.’’

निशांत हैरान सा पंखुड़ी का मुंह देखने लगा. विनिता की तरफ मुखातिब होते हुए पंखुड़ी ने कहा, ‘‘घबराने की कोई बात नहीं विनिता. अगर कुछ सीखने का पक्का निर्णय कर लिया हो तो आज से ही मैं तुम्हें इंटरनैट का काम सिखाना शुरू कर सकती हूं और निशांत के जाने के पहले धीरेधीरे बाहर के सारे काम भी मैं सिखा दूंगी,’’ और फिर अपना लैपटौप लेने अपने घर चली गई.

विनिता सन्न थी अपनी संकीर्ण सोच पर. जिस पंखुड़ी को वह तेजतर्रार और दूसरों का घर तोड़ने वाली लड़की समझती थी, वह इतनी जिम्मेदार और उसे ले कर इतनी संवेदनशील होगी, इस की तो कल्पना भी विनिता ने नहीं की थी.

मिनटों में पंखुड़ी वापस आ गई. अपना लैपटौप औन करते हुए बोली, ‘‘विनिता मैं तुम्हारी गुरु तो बनूंगी, पर एक शर्त है तुम्हें भी गुरु बनना पड़ेगा मेरी.’’

विनिता के मुंह से निकला, ‘‘भला वह क्यो?’’

पंखुड़ी ने कहा, ‘‘देखो, तुम्हें देख कर मैं ने भी अपना घर बसाने का फैसला कर लिया है, पर घरगृहस्थी के काम में मैं बिलकुल जीरो हूं. मैं ने महसूस किया है अगर आज के जमाने में हाउसवाइफ के लिए बाहर का काम सीखना जरूरी होता है तो उसी तरह सफल और शांतिपूर्ण घरगृहस्थी चलाने के लिए वर्किंग लेडी को भी घर और किचन का थोड़ाबहुत काम जरूर आना चाहिए. अगर तुम चाहो तो अब हम

दोनों एकदूसरे की टीचर और स्टूडैंट बन कर सीखनेसिखाने का काम कर सकती हैं. मैं तुम्हें बाहर का काम करना सिखाऊंगी और तुम मुझे किचन और घर संभालना.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं. यह भी कोई पूछने की बात है?’’ खुश हो कर विनिता ने पंखुड़ी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘पर मेरी भी एक शर्त है कि यह सीखनेसिखाने का काम हम दोनों स्टूडैंटटीचर की तरह नहीं, बल्कि पक्की सहेलियां बन कर करेंगी.’’

‘‘मंजूर है,’’ पंखुड़ी बोली.

फिर एक जोरदार ठहाका लगा, जिस में इन दोनों के अलावा निशांत की आवाज भी शामिल थी. माहौल खुशनुमा बन चुका था.

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