Short Story in Hindi: पेशी- क्या थी न्यायाधीश के बदले व्यवहार की वजह?

लेखक- डा. नंदकिशोर चौरसिया

Short Story in Hindi: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, शिवपुर में डा. राजेश इकलौते चिकित्सक हैं. आज वे बहुत जल्दी में हैं क्योंकि उन्हें सरकारी गवाह के तौर पर गवाही देने के लिए 25 किलोमीटर दूर शाहगांव की अदालत में जाना है.

डा. राजेश ने चिकित्सालय में 2-4 मरीज देखे, फिर सिस्टर को बुला कर कहा, ‘‘सिस्टर, मैं शाहगांव कोर्ट जा रहा हूं, आप मरीजों को दवाएं दे दीजिएगा, कोई अधिक बीमार हो तो रेफर कर दीजिएगा.’’

डा. राजेश बाइक से शाहगांव के लिए चल दिए, वे ठीक 11 बजे न्यायालय पहुंच गए. न्यायालय के बाहर सन्नाटा था. कुछ पक्षी, विपक्षी और निष्पक्षी लोग, चायपान की दुकान में चायपान कर रहे थे.

डा. राजेश ने सोचा कि बयान हो जाए तभी खाना खाऊंगा और 1 बजे तक शिवपुर पहुंच जाऊंगा. इसलिए वे सीधे न्यायालय के कक्ष में चले गए. न्यायालय के कक्ष में 1-2 बाबू और 1 पुलिस वाला फाइलें उलटपलट रहे थे. डा. राजेश ने पुलिस वाले को समन दिखा कर उस को पदोन्नत करते हुए कहा, ‘‘चीफ साहब, मेरा बयान शीघ्र करा दें, अपने अस्पताल में मैं अकेला हूं.’’

‘‘साहब अभी चैंबर में हैं, उन के आने पर बात कर लीजिएगा,’’ पुलिस वाले ने

डा. राजेश से कहा.

डा. राजेश कक्ष में पड़ी एक बैंच पर बैठ गए. उन्होंने देखा कि न्यायाधीश की टेबल पर एक लैपटौप रखा है और टेबल के दोनों छोर पर एकएक टाइपिंग मशीन रखी थी. न्यायाधीश महोदय की कुरसी के पीछे की दीवार पर हृष्टपुष्ट और मुसकराते हुए गांधीजी की तसवीर टंगी थी. तसवीर के  गांधीजी अदालत की ओर न देख कर बाहर खिड़की की ओर देख रहे थे. तसवीर पर 4-5 माह पुरानी, सूखी फूलों की एक माला टंगी थी. केवल जज साहब की कुरसी के ऊपर पंखा चल रहा था. तब डा. राजेश ने न्यायालय के सेवक से कहा, ‘‘भाई, गरमी लग रही है, पंखा चला दो.’’

सेवक तपाक से बोला, ‘‘इन्वर्टर का कनैक्शन केवल साहब के लिए है.’’

कमरे के सारे लोग पसीनापसीना हो रहे थे. पक्षीविपक्षी (वादी, प्रतिवादी) अपने वकीलों के साथ आ कर बाबू से बात कर रहे थे, वे शायद अगली पेशी की सुविधाजनक तारीख ले रहे थे.

बाबू लोग फाइलें व कागज ले कर साहब के कक्ष में आजा रहे थे. फिर जज साहब के कक्ष से डिक्टेशन और टाइपिंग की आवाजें आने लगीं. वे शायद कोई फैसला लिखवा रहे थे. अब तक 1 बज गया था. डा. राजेश गरमी और अनावश्यक बैठने के कारण विचलित हो कर सोचने लगे कि जैसे उन्होंने अपराध किया हो. उन के मन में बचाव पक्ष के वकील के प्रश्नों, तर्कों, वितर्कों का भय और चिंतन भी था. तभी सेवक, साहब की टेबल पर 1 गिलास पानी रख गया.

साहब कुरसी पर आए. उन के चेहरे पर शासन और अभिजात्य की आभा प्रदीप्त थी. उन्होंने दो घूंट पानी पिया, कुछ फाइलें देखीं. तभी लोक अभियोजक, कुछ वकील और कुछ वादीप्रतिवादी आ गए. साहब ने जब तक फैसला सुनाया तब तक भोजनावकाश हो गया था.

भोजनावकाश के बाद जज साहब आए तब डा. राजेश ने विनती की, ‘‘सर, मैं डा. राजेश हूं, मेरा बयान हो जाए तो अच्छा है.’’

न्यायाधीश महोदय ने उन का समन देखा, फाइल देखी. उन्होंने प्रतिवादी को आवाज लगवाई परंतु तब तक प्रतिवादी का वकील नहीं आया था. तब जज साहब ने कहा, ‘‘डाक्टर साहब, थोड़ा और रुकें, आप को प्रमाणपत्र तो पूरे दिन का ही दिया जाएगा.’’

प्रतिवादी ने वकील को बुलवाया, वह करीब 4 बजे आया. वकील ने फाइल देख कर कहा कि डाक्टर ने तो वादी को कोई चोट ही नहीं लिखी, इसलिए बयान की कोई आवश्यकता नहीं है. डाक्टर को कोर्ट आने का प्रमाणपत्र दिया गया. डा. राजेश खिन्न मन से, भुनभुनाते हुए वापस शिवपुर लौट गए.

न्यायाधीश महोदय अवकाश के बाद शाहगांव लौट रहे थे. शिवपुर के पास ही दिन के 3 बजे उन की गाड़ी का ऐक्सीडैंट हो गया. उन के साथी को कई जगह चोट आई और सिर से खून बहने लगा. साथी को ले कर जज साहब शिवपुर अस्पताल आए पर अस्पताल में ताला लगा था. डाक्टर के आवास में भी ताला लगा था. अस्पताल का सेवक दौड़ कर सिस्टर को बुला लाया.

जज साहब ने सिस्टर को डांटते हुए कहा, ‘‘अस्पताल क्यों बंद है, डाक्टर कहां है?’’

सिस्टर ने धीरे से बताया, ‘‘सर, अस्पताल तो 1 बजे बंद हो जाता है और डाक्टर साहब तो पेशी पर गए हैं.’’

जज साहब ने सिस्टर से कहा, ‘‘फोन कर के तुरंत डाक्टर को बुलाओ.’’

सिस्टर ने डाक्टर को फोन लगाया और रिंग जाने पर उस ने फोन जज साहब को दे दिया.

उधर से आवाज आई, ‘‘हैलो.’’

‘‘मैं, सिविल जज, आप के अस्पताल से बोल रहा हूं. मेरे साथी को काफी चोट लगी है.’’

‘‘सर, मैं अभी आप के कोर्ट में ही हूं, जितनी देर में मैं आऊंगा उतनी देर में तो आप शाहगांव आ जाएंगे, फिर यहां पर सुविधा भी अधिक है,’’ डा. राजेश ने विनयपूर्वक  कहा.

जज साहब जब तक साथी को ले कर शाहगांव आए तब तक काफी खून बह चुका था. 2 यूनिट खून देने के बाद साथी को होश आया.

न्यायालय में आ कर जज साहब ने स्टाफ को निर्देशित किया कि अगर कोई चिकित्सक गवाही को आए तो यथाशीघ्र उस का बयान करा कर उसे जाने दिया जाए क्योंकि अस्पताल में बहुत से मरीज उस की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं.

Short Story in Hindi

Crime Story: दो खजूर- मुस्तफा क्या साबित करना चाहता था?

Crime Story: बगदाद के बादशाह मीर काफूर ने अपने विश्वासी सलाहकार आसिफ मुस्तफा को बगदाद का नया काजी नियुक्त किया, क्योंकि निवर्तमान काजी रमीज अबेदिन अब बूढ़े हो चले थे और उन्होंने बादशाह से गुजारिश की थी कि अब उन का शरीर साथ नहीं दे रहा है इसलिए उन्हें राज्य के काजी पद की खिदमत से मुक्त कर दें. बगदाद राज्य का काजी पद बहुत महत्त्वपूर्ण और जिम्मेदारी भरा होता था. बगदाद के काजी पद पर नियुक्ति की खुशी में आसिफ मुस्तफा ने एक जोरदार दावत दी. उस दावत में उस के मातहत राज्य के सभी न्यायिक दंडाधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी आमंत्रित थे. राज्य के लगभग सभी सम्मानित व्यक्ति भी दावत में उपस्थित थे.

सब लोग दावत की खूब तारीफ कर रहे थे, क्योंकि वहां हर चीज मजेदार बनी थी. आसिफ मुस्तफा सारा इंतजाम खुद देख रहा था. सुरीले संगीत की धुनें वातावरण को और भी रसमय बना रही थीं. अचानक आसिफ मुस्तफा को ध्यान आया कि उस ने एक चीज तो मंगवाईर् ही नहीं. आजकल खजूर का मौसम चल रहा है. अत: उस फल का दावत में होना जरूरी है. बगदाद में पाया जाने वाला अरबी खजूर बहुत स्वादिष्ठ होता है. दावतों में भी उसे चाव से खाया जाता है.

आसिफ ने अपने सब से विश्वसनीय सेवक करीम को बुलाया और उसे सोने का एक सिक्का देते हुए कहा, ‘‘जल्दी से बाजार से 500 अच्छे खजूर ले आओ.’’ बगदाद में खजूर वजन के हिसाब से नहीं बल्कि संख्या के हिसाब से मिलते थे. सेवक फौरन रवाना हो गया. थोड़ी देर बाद लौटा तो उस के पास खजूरों से भरा हुआ एक बड़ा थैला था.

आसिफ मुस्तफा ने कहा, ‘‘थैला जमीन पर उलटो और मेरे सामने सब खजूर गिनो.’’

करीम अपने मालिक के इस आदेश पर दंग रह गया. वह सोच भी नहीं सकता था कि उस का मालिक उस जैसे पुराने विश्वसनीय सेवक पर इस तरह शक करेगा. सब मेहमान भी हैरत से आसिफ की तरफ देखने लगे.

करीम ने फल गिनने शुरू किए. जब गिनती पूरी हुई तो वह थरथर कांपने लगा. खजूर 498 ही थे. आसिफ बिगड़ कर बोला, ‘‘तुम ने बेईमानी की है. तुम ने 2 खजूर रास्ते में खा लिए हैं. तुम्हें इस जुर्म की सजा अवश्य मिलेगी.’’

करीम ‘रहमरहम…’ चिल्लाता रहा, लेकिन आसिफ मुस्तफा जरा भी नहीं पसीजा. उस ने सिपाहियों को आदेश दिया कि करीम को फौरन गिरफ्तार कर लिया जाए. आसिफ के इस बरताव से सारे मेहमान हक्केबक्के थे कि इतनी सी बात पर एक पुराने वफादार सेवक को सजा देना कहां का इंसाफ है.

आसिफ ने आदेश दिया, ‘‘करीम की पीठ पर तब तक कोड़े बरसाए जाएं, जब तक वह अपना अपराध कबूल न कर ले.’’ उस के आदेश का पालन किया जाने लगा. करीम की चीखें शामियाने में गूंजने लगीं. जब पिटतेपिटते करीम लहूलुहान हो गया तो उस ने चिल्ला कर कहा, ‘‘हां, मैं ने 2 खजूर चुरा लिए, 2 खजूर चुरा लिए. मीठेमीठे खजूर देख कर मेरा जी ललचा गया था. मैं अपराध कबूल करता हूं. मुझे छोड़ दो.’’

उस की इस बात पर मेहमानों में खुसुरफुसुर होने लगी कि अब ईमानदारी का जमाना नहीं रहा. जिसे देखो, वही बेईमानी करता है. किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, वफादार सेवक पर भी नहीं. सभी करीम को कोस रहे थे, जिस की वजह से दावत का मजा किरकिरा हो गया था. तभी आसिफ मुस्तफा ने कहा, ‘‘सिपाहियो, खोल दो इस की जंजीरें.’’

जंजीरें खोल दी गईं. करीम को आसिफ के सामने पेश किया गया. सारे मेहमान चुपचाप देख रहे थे कि अब आसिफ मुस्तफा उस के साथ क्या व्यवहार करता है. सब का विचार था कि करीम ने अपराध स्वीकार कर लिया है इसलिए इसे बंदीगृह में भेज दिया जाएगा या नौकरी से निकाल दिया जाएगा. लेकिन इस के बाद आसिफ मुस्तफा अपनी जगह से उठ कर करीम के पास आया. उस के शरीर से रिसते खून को अपने रूमाल से साफ किया. उस की मरहमपट्टी की और दूसरे साफ कपड़े पहनाए. सभी आश्चर्य करने लगे कि यह क्या तमाशा है. जब करीम रहम की भीख मांग रहा था, तब तो उस की पुरानी वफादारी का लिहाज नहीं किया और अब कबूल चुका है तो उस की मरहमपट्टी हो रही है.

आसिफ मुस्तफा ने करीम से माफी मांगी. फिर मेहमानों से कहने लगा, ‘‘मैं जानता हूं करीम बेकुसूर है. इस ने कोई अपराध नहीं किया. यह देखिए,’’ उस ने अपने कुरते की आस्तीन में से 2 खजूर निकाल कर कहा, ‘‘ये हैं वे 2 खजूर जिन्हें मैं ने पहले ही फुरती से निकाल लिया था. ऐसा मैं ने इसलिए किया था कि आप को बता सकूं कि लोगों को कठोर दंड दे कर जुर्म कबूल करवाना कितनी बड़ी बेइंसाफी है, लेकिन ऐसा हो रहा है.

हमारा काम अपराधियों का पता लगाना और उन के अपराध के लिए उन्हें सजा देना है न कि किसी भी निर्दोष को मार कर उसे चोर साबित करना.’’ सभी आसिफ मुस्तफा की इस सच्ची बात पर वाहवाह कर उठे. उन्हें विश्वास हो गया कि आसिफ वाकई काजी के पद के योग्य है. उस के कार्यकाल में किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलेगी और कुसूरवार बच नहीं पाएगा.

Best Hindi Stories: अरविंद संग अनीता

Best Hindi Stories: ‘‘हैलो…    हां सुनो.’’

‘‘हां बोलो.’’

‘‘बारात बड़ी धूमधाम से निकल गई है.’’

‘‘क्या? जरा जोर से कहो कुछ सुनाई नहीं दे रहा.’’

‘‘अरे मैं बोल रहा हूं कि बरात निकल

गई है.’’

‘‘अच्छा. इतने शोरशराबे में तुम्हारी अवाज ठीक से सुनाई नहीं दे रही थी.’’

‘‘यहां सब बहुत मस्ती कर रहे हैं. सब बैंड वाले से अपनीअपनी फरमाइश कर उसे परेशान कर रहे हैं.’’

तभी घोड़ी चढ़े दूल्हे राजा का किसी ने फोन झपटा.

‘‘हैलो मैं सविता भाभी बोल रही हूं. देवरानीजी. आज के लिए मेरे देवरजी को छोड़ दो, फिर कल से तो आप के ही हो कर रह जाएंगे. जल्दी मिलते हैं नमस्ते.’’

‘‘अरविंद भैया, यह संभालो अपने शरारती चीकू को और यह फोन अब अपने भैया से ही वापस लेना. हम सब को थोड़ा जश्न मनाते तो देख लो.. उस के बाद तो आप का ही ढोल बजना है,’’ सविता भाभी आज अलग ही मूड में थीं.

खुश वह भीतर से इसलिए भी थीं क्योंकि उन्हें अपनी शादी में पहना हुआ वह 9 किलोग्राम का जोड़ा आज भी बिना अल्टर किए फिट हो रहा था. वे सच में आज किसी दुलहन से कम नहीं लग रही है. वे अपने 4 साल के बेटे को उन की घोड़ी में चढ़ा इठलाते हुए उन का फोन ले उड़ीं.

अरविंद मुसकराता बच्चों से ले कर बूढ़ों तक सब का एकसाथ जबरदस्त उत्साह देख प्रफुल्लित होने लगा.

‘‘चीकू आज क्या है पता है?’’

‘‘आज मेरी शादी है,’’ चीकू अपने चाचा से कहने लगा.

‘‘चीकू, आज तेरी नहीं मेरी शादी है.’’

‘‘नहीं मेरी है… मम्मी से पूछ लो…’’ चीकू ये कह रोंआसा सा होने लगा.

‘‘अच्छा अच्छा ठीक है तेरी ही शादी है. अब तो खुश हो जा.’’

बड़ी मुश्किल से चीकू का मूड ठीक हुआ और बैंड वाले ने ‘आज मेरी यार की शादी है…’ गाना शुरू कर दिया. इसे सुन अरविंद के सारे दोस्त खूब नाचने लगे और वही वीडियो वाला उन सब के हावभाव कैद करने में दिलोजान से जुट गया.

‘दीदी तेरा देवर दीवाना…’ ने जहां रोजमर्रा की भागदौड़ में हैरानपरेशान रहने वाली सभी भाभियों को अपनीअपनी सास को नजरअंदाज कर, साड़ी को कमर में कस ठुमके पर ठुमके लगाने शुरू कर दिए. वहीं ‘मेहंदी लगा के रखना…’ पर सभी नएपुराने जोड़े रोमांटिक हो एकसाथ रंग बिखेरने लगे.

पर हर गाने पर बच्चा पार्टी का कोई मुकाबला नहीं. वे छोटेछोटे हीरो कोई धुन बजी नहीं की कि पूरी ताकत से हाथपैर बिना तालमेल के हिलाते.

उन सब के हर्षोउल्लास देख घोड़ी पर बैठे दोनों दूल्हों अरविंद और चीकू को बड़ा मजा आ रहा था. अरविंद की छोटी बूआ पीछे भीड़ के साथ हौलेहौले छिप कर चलते दूल्हे के पिताजी व अपने भाई को खोज कर खींच कर सभी के बीच ले आई.

वे न न करते रह गए पर सब की जिद्द के सामने कभी न ठुमकने वाले अपने पिताजी को दोनों हाथ ऊपर कर बेफिक्री में गोलमोल घूमते हुए देख अरविंद भावविभोर हो उठा.

वीडियो वाला इन खूबसूरत पलों को भी कैद करने में सफल रहा. बरात में सब से आगे बाल कलाकार व युवावर्ग, उन के पीछे बैंड वाले. उस के पीछे घोड़ी पर बैठे अरविंद और चीकू, उन के पीछे बरात के साथ चलते 50 वर्ष के ऊपर बराती और उन के पीछे एक वीआईपी गाड़ी भी चल रही थी, जिस में ताईजी और बड़े फूफा, जिन्हें शुगर तो पहले से थी ही ऊपर से अभीअभी घुटनों के नए औपरेशन का दर्द. उफ, वे किसे कितनी ज्यादा तकलीफ है की प्रतिस्पर्धा करते आराम से भीतर विराजमान बैठे थे.

‘‘अरे पिंकी, रिंकू कहां रह गईं. बरात द्वार पर आ गई. जरा अनु को देख आओ. वह तैयार हुई कि नहीं…’’ दुलहन की मां सुषमा ने चिंतित हो अपनी दोनों भतीजियों से कहा.

वे सिर से पैर तक रंगीन चमकदार कपड़े पहन सजीं. अपनाअपना घाघरा नजाकत से कुछ इंच उठा अपने सुनहरे सैंडल की टकटक करतीं अपनी दीदी के कमरे की ओर बढ़ गईं.

‘‘अनीता दीदी आप तैयार हो गई?’’ भीतर बैठी अनीता के कानो में पिंकीरिंकू की बांसुरी सी आवाज पड़ी.

‘‘हां 1 मिनट रुको फोटोग्राफर फोटो ले

रहे हैं.’’

‘‘दीदी हमें भी देखना है, हमें भी देखना है,’’ वे खुशी से उछलती हुई कहने लगीं.

‘‘भैया जरा दरवाजा खोल कर इन्हें आने देना.’’

कभी कुरसी पर बैठ, कभी आडे़तिरछे खड़े हो, कभी गजरा पकड़े मेहंदी देखते. अनीता को मुसकराते पोज देते मारते देख पिंकीरिंकू कहीं अपनीअपनी शादी के सपनों में गोते मारने लगीं.

‘‘तुम किसी काम से आई थीं?’’ अनीता ने अपने फोटो सैशन के बीच में पूछा.

‘‘अरे हां दीदी, वह बरात आ चुकी है हम वही बताने आई थीं.’’

‘‘उफ, इतनी देर से क्यों नहीं बताया? भैया आप खत्म करो बस हो गया,’’ अनीता अपनेआप को आईने में निहारते हुए जल्दीजल्दी चुन्नी, मेकअप ठीक करने लगी.

बाहर से किसी ने दरवाजे को खटखटाते हुए कहा, ‘‘दीदी जल्दी करो… जीजाजी स्टेज पर पहुंच गए हैं…’’

‘‘हां, बस हो गया. चलो…’’ शरमाती, घबराती अनीता बारबार अपनी सहेलियों से एक ही सवाल पूछती रही. ‘‘मैं अच्छी तो दिख रही हूं न? मैं अच्छी तो दिख रही हूं न?’’

2-4 बार, ‘हां तू बहुत सुंदर दिख रही है…’ सुनने के बाद अचानक अनीता का आत्मविश्वास बढ़ गया.

अनीता की सहेलियां, भाईबहन बड़े प्रेम से उसे धीरेधीरे खुले आसमान के नीचे हरे लौन में, हौलेहौले चलती पवन के बीच, लाल कालीन से गुजरते, उसे फूलों से सजे स्टेज की ओर बढ़ाने लगे.

वहीं डीजे वाले बाबू ने उन्हें आते देख अपनी धुन झट से बदल कर ‘बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है…’ बजाया.

यह सुन वरवधू दोनों ओर के वीडियो व फोटोग्राफर अरविंद को अकेला छोड़ तुरंत अनीता की तरफ भागे.

एक उसे आहिस्ताआहिस्ता चलने को कहने लगा तो दूसरा थोड़ा ऊपर देखो थोड़ा ओर बसबस थोड़ा सा नीचे कहने लगा.

लड़की के पिता केशवजी दूर से बेटी को दुलहन सजी देख अपने जज्बातों पर काबू न कर पाए और वे अपने दिल पर हाथ रख कुरसी पर धम्म से बैठ गए.

‘मेरी बेटी इतनी सी थी. कैसे इतनी जल्दी बड़ी हो गई. आज बाप का आंगन छोड़ कर अपने पिया के घर चली जाएगी मेरी बच्ची,’ मन ही मन सोच वे रोंआसे हो गए.

अपनी लाडली अनु को आज ऐसे देख कर उन की हालत जरूर ऐसी होनी है, यह उन की पत्नी बरसों पहले से जानती थी.

‘‘आप अपनेआप को संभालो. इसी शहर में तो विदा हो रही है. देखना उस का एक पैर मायके और दूसरा ससुराल में होगा,’’ सुषमाजी उन के कंधे को थपथपाते हुए कहने लगीं.

‘‘आज तुम्हारे बाबूजी को नमन सुषमा. एक बाप के लिए कितना कठिन पल होता है. अपने कलेजे के टुकड़े को किसी और को सौंपना.’’

‘‘यह तो विधि का विधान है… हर पिता को करना होता है. अब चलिए आंसू पोंछो खुशी का मौका है. ऐसे उदास होना अच्छा लगता है क्या?’’

स्टेज पर थर्मोकोल पर बने दिल आकार पर तीर चीरते के बीच लिखित, ‘अरविंद संग अनीता’ की सजावट के सामने खड़ी नवजोड़ी स्टेज पर आतेजाते मेहमानों के साथ फोटो खिंचवा रही थी तो चीकू बारबार उन के बीच घुसने की कोशिश कर रहा था.

चीकू को संभालने के लिए सविता भाभी को बुलवाया गया. वे उसे आइसक्रीम का लालच दे स्टेज से अखिरकार उतारने में कामयाब रहीं. फिर भी चीकू कई फोटो में खुद को कैद कराने में सफल रहा.

फोटोग्राफर के कहे अनुसार मोहक अंदाज में एक के बाद एक फोटो खिंचवाता रहा. इन पलों में नवजोड़ा अपनेआप को किसी सैलिब्रिटी से कम नहीं समझ रहा था.

जिन्हें जाने की जल्दी थी वे एक कुरसीटेबल पर बैठे रजिस्टरपैन थामे समाज के वरिष्ठ की ओर अपनाअपना लिफाफा लिए बढ़ते चले गए. उन में उतना ही नेग था जितना कि केशवजी द्वारा उन के यहां की शादी में दिया गया था. उस का रिकौर्ड उन सभी के पास ऐसे ही शादी वाले रजिस्टर में लिखा हुआ था.

जो शादी का भरपूर आनंद उठाने आए थे वे बरात आने के पहले ही आधे व्यंजनों का स्वाद चख चुके थे और अब उन की प्लानिंग एक राउंड और मारने की थी.

जो पहली बार केशवजी के किसी समारोह में शामिल हुए थे वे अपने लिफाफे की राशि शादी पर किए हुए खर्च को देख बढ़ातेघटाते रहे और अधिकतर मेहमान जिनके सभी बच्चों की शादियों निबट गई थीं वे अपने घर की शादियों में मिले उपहार जिन में अधिकांश ठंडे पानी की बोतल, हौट केस सैट, डिनर सेट इत्यादि को उसी पैकिंग की हटाई गई टेप को फिर से लगा कर नजाकत से अपना नाम बड़ी कलाकृति से लिख कर दूल्हेदुलहन को टीका लगा कर गिफ्ट दे मुसकराते फोटो खिंचवाते आगे बढ़ते गए.

अब यही प्रथा अरविंदअनीता अन्य की शादियों में करते दिखाई देंगे. संपूर्ण शादी के उपहारों के बीच शायद ही कुछ ऐसे तोहफे होंगे जिन्हें सच में उन की शादी के लिए विशेष खरीदा गया होगा और जो उन के किसी काम के होंगे.

एक दिन की चमकदमक के लिए अपनी सालों की जमापूंजी स्वाहा करने वाले दोनों पक्ष, अपने करीबियों को आधी रात नवदंपती को 7 फेरे लेते देख, उन्हें ऊंघते और शादी में कमियां गिनाते गौर से देखतेसुनते रहे. सुबह हुई, बेटी विदा हुई. दोनों के मांबाप ‘कुदरत ने सब अच्छे से निबटा दिया,’ कह उसे धन्यवाद देते रहे.

अगले दिन दोनों घरों के सभी मेहमानों के चले जाने के बाद एक एकांत कमरे में घर के भरोसेमंद को पूरे नेग का कुल निकालने की जिम्मेदारी सौंपी गई जो अपनेआप में बड़े सम्मान की बात होती है. फिर उसी राशि से अधिकतम शादी के बचे खर्च का भुगतान किया जाता है.

कुछ दिनों बाद उन की शादी का अल्बम और वीडियो हाथों में पहुंच गया, जिसे सब बड़े चाव से उन सभी खूबसूरत यादों को बारबार देख कर ताजा करने का क्रम महीनों चलाते रहे. अब आगे घर आने वाले मेहमानों को चाय के साथ अलबम भी परोसा जाना निश्चित है.

सच में भारतीय शादियों की अपनी अलग खट्टीमीठी कहानियां होती हैं. कितने अनगिनत रिश्ते दूर के रिश्तेदारों द्वारा दूसरों की शादियों में ही तय किए जाते हैं. कई युवाओं के दिल भी आपस में मिल जाते हैं. सालों न मिलने वाले रिश्तेदारप्रियजन शादी का एक निमंत्रणपत्र पा कर प्रफुल्लित हो उठते हैं. इसीलिए तो शादी किसी उत्सव से कम कहां कहलाती है. ऐसी कई बातें हमें अपनीअपनी शादी की आजीवन स्मरण रहती हैं, जो कभी गुदगुदाती है तो कभी जिन से हम बिछड़ गए होते हैं उन की तसवीरें हमें रुलाती भी हैं. आप अपनी शादी का कोई खूबसूरत वाकेआ हम से जरूर साझ करिएगा.

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Social Story: मार्बल- खनक के साथ कौन-सी घटना घटी

Social Story: खनक बहुत देर तक शून्य में ताक रही थी. आज फिर उसे बहुत देर तक उसकी मम्मी समझ रही थी क्योंकि आज फिर उस के लिए रिश्ता आया था.

खनक बैंक में नौकरी करती थी वहीं पर गर्व अपना बैंक अकाउंट खुलवाने आया था. खनक की उदासीनता गर्व को बहुत भा गई थी. गर्व ने अब तक अपने चारों ओर बस झनझन बजती लड़कियों को ही देखा था, जो हवा से भी तेज बहती थी. ऐसे में खनक की चुप्पी, उदासीनता, सादगी भरा शृंगार सभी कुछ गर्व को अपनी ओर खींच रहा था. इधरउधर से पता कर के गर्व ने खनक का पता खोजा और एक तरह से अपने परिवार को ठेल कर भेज ही दिया.

खनक के मम्मीपापा जानते थे कि खनक का जवाब न ही होगा मगर गर्व जैसा अच्छा रिश्ता बारबार नहीं आएगा इसलिए खनक की मम्मी खनक को समझ रही थी, ‘‘खनक बेटा क्या प्रौब्लम है, कब तक तुम शादी से भागती रहोगी. बचपन में हुई एक छोटी सी बात को तुम कब तक सीने से लगा बैठी रहोगी?’’

खनक अपनी मम्मी को गहरी नजरों से देखते हुए बोली, ‘‘छोटी सी बात मम्मी… मेरा पूरा वजूद छलनी हो गया है और आप को छोटी सी बात लग रही.’’

खनक की मम्मी बोली, ‘‘बेटा, अगर मैं तब चुप्पी न लगाती तो मेरा मायका सदा के लिए मुझ से छूट जाता.’’

खनक मन ही मन सोच रही थी कि और जो एक घुटन भरा तूफान सदा के लिए मेरे अंदर कैद हो गया है उस का क्या. आज भी खनक को जून की वह काली शाम रहरह कर याद आती है. खनक अपनी नानी के घर गई हुई थी. मामी भी अपने मायके गई हुई थी. मगर खनक का ममेरा भाई हर्ष नहीं गया था क्योंकि उस के कालेज के ऐग्जाम चल रहे थे. खनक तब 12 साल की और हर्ष 20 साल का था. खनक को हर्ष से बातें करना बड़ा पसंद था क्योंकि हर्ष उस की बातें बड़े आराम से सुनता था और कभीकभी उस की तारीफ भी कर देता था, जो खनक के लिए उस उम्र में नई बात थी. खनक सदा हर्ष के आसपास बनी रहती थी. हर्ष जब मन करता खनक को एकाध धौल भी जमा देता था. कभीकभार उस के हाथ सहला देता था जो खनक को अजीब लगने के साथसाथ रोमांचित भी करता था.

एक दिन खनक की नानी सत्संग में गई हुई थी. मामा औफिस के काम से गए हुए थे. खनक और हर्ष घर पर अकेले थे. हर्ष ने उस शाम खनक के लिए उस की पसंदीदा मैगी बनाई और फिर न जाने कैसे हर्ष ने खनक को किस कर दिया.

खनक को थोड़ा अजीब लगा, मगर वह कुछ समझ नहीं पाई. फिर हर्ष और खनक बिस्तर पर लेट कर बात करने लगे. खनक छोटी थी मगर उस की छठी इंद्री उस से कह रही थी कि कुछ ठीक नहीं है इसलिए जैसे ही खनक बाहर जाने लगी तो हर्ष ने उस का हाथ पकड़ लिया और बिस्तर पर गिरा दिया. खनक एकाएक घबरा गई पर तब तक हर्ष के अंदर का जानवर जाग उठा था. खनक बस छटपटाती रही मगर कुछ न कर पाई. जब तक हर्ष को होश आया तब तक काफी देर हो चुकी थी. खनक का दर्द और डर के कारण बुरा हाल था.जब खनक की नानी आई तो वहां का नजारा देख कर सिर पकड़ कर बैठ गई. उन्होंने हर्ष को 3-4 तमाचे जड़ दिए और खनक को अपने साथ कमरे में बंद कर लिया.

अगले दिन सुबहसवेरे ही खनक की मम्मी आ गई. खनक अपनी मम्मी के गले लग कर खूब रोई. मम्मी उस के सिर पर धीमेधीमे हाथ फेर रही थी.

तभी नानी फुसफुसाते हुए बोली, ‘‘यह बात बस नहीं खत्म कर दे, हर्ष को मैं ने अच्छे से डांट लगा दी है. इस बात को इधरउधर करने की जरूरत नहीं है. कल को खनक की ही बदनामी होगी. फिर अगर तू अपने भाभी से बात करेगी तो वह कभी इस बात पर विश्वास नहीं करेगी. तेरे और तेरे भाई का रिश्ता जरूर टूट जाएगा और सच कहूं तो असलियत क्या है किसे पता. दोनों ही उम्र के उस नाजुक दौर से गुजर रहे हैं. हो सकता है खनक भी बहक गई हो मगर फिर डर गई हो.’’

खनक बारबार सोच रही थी कि क्या उस की मम्मी भी उस पर विश्वास नहीं कर रही है. मगर इस पूरे प्रकरण में किसी ने खनक के बारे में नहीं सोचा. खनक की नानी को अपने पोते हर्ष के भविष्य और अपने बुढ़ापे की चिंता थी. खनक की मम्मी को अपने मायके की इज्जत की, उन्हें लग रहा था कि अगर यह बात ससुराल तक पहुंची तो मायके की बदनामी के साथसाथ उन का रिश्ता भी मायके से टूट जाएगा जो वह नहीं चाहती थी. खनक उस समय इतनी छोटी थी कि उसे लग रहा था कि शायद वही गलत है, शायद उसे ही हर्ष से बात नहीं करनी चाहिए थी.

बहरहाल जो भी हो चिडि़या जैसी चहचहाती और फुदकती हुई खनक उस दिन के बाद से मार्बल जैसी ठंडी और पत्थर बन गई थी. उस समय वह इतनी छोटी थी कि अपनी नानी या मम्मी से कोई सवालजवाब नहीं कर पाई थी. मगर इस घटना ने उस के अंदर की भावनाओं को पथरीला बना दिया था. खनक अपने पापा की छाया से भी बचने लगी थी.

खनक की मम्मी इस बात को यह कह कर टाल देती, ‘‘खनक बड़ी हो रही है… यह नौर्मल है.’’

खनक हर समय एक वहम में रहती थी. उसे किसी पर विश्वास नहीं था, इसलिए उस का कोई दोस्त भी नहीं था.

खनक ने अपनी सारी ऊर्जा उस घटना के बाद पढ़ाई में लगा दी थी. जब खनक कालेज के प्रथम वर्ष में थी तो उस के आगेपीछे लड़कों की लंबी लाइन थी, मगर उस की उदासीनता देख कर ही कालेज में उस का नाम मार्बल पड़ गया था. संगमरमर की तरह खूबसूरत, शांत मगर पथरीली और ठंडी.

खनक को काउंसलर की जरूरत थी मगर खनक की मम्मी काउंसलर के बजाय खनक के लिए पंडितों के चक्कर काटने लगी थी. कभी शांति पाठ तो कभी सिद्धि पाठ मगर कोई भी पाठ या कोई भी पूजा खनक के घाव पर मलहम नहीं लगा पा रही थी.

खनक अपने में सिमटती चली गई, सब के साथ हो कर भी वह अकेली और उदासीन रहती थी.बस पहले उस की पढ़ाई और अब उस का काम उस को सुकून देता था. पहले पढ़ाई के कारण और फिर नई नौकरी के कारण मार्बल शादी से इनकार करती रही पर अब उस के पास कोई कारण नहीं रह गया था सिवा इस के कि उस का मन नहीं है.

उस घटना के बाद से मार्बल का अपने ननिहाल से नाता टूट गया था, मगर मां के कारण उसे वहां की खबरें मिलती रहती थीं. हर्ष की शादी हो गई थी और उस के पास एक बेटी भी थी. बहुत बार मार्बल का मन किया कि वह सबकुछ जा कर हर्ष की बीबी को बता दे. मगर घुटने के अलावा खनक कुछ नहीं कर पाई थी.

शाम को जब खनक औफिस से घर आई तो गर्व अपने परिवार के साथ पहले से ही बैठा था. खनक की इस बार कुछ नहीं चल पाई, गर्व न जाने क्यों खनक के मन को भी भा गया था. मगर खनक गर्व से कुछ छिपाना नहीं चाहती थी.

गर्व और खनक का रिश्ता तय हो गया था. खनक की मम्मी इस शादी को जल्द से जल्द करना चाहती थी. खनक विवाह से पहले 3 बार गर्व से मिली थी और तीनों ही बार जब भी खनक ने अपने अतीत की बात बतानी चाही तो गर्व ने बोल दिया, ‘‘तुम्हारे और मेरे बीच में बस आज रहेगा जो बेहद खूबसूरत है.’’

खनक गर्व से जितनी बार शादी से पहले मिली, उस के व्यवहार से खनक का डर काफी कम हो गया. उस ने पहली बार किसी लड़के को अपनी जिंदगी में शमिल किया था, मार्बल की ठंडक धीरेधीरे कम हो रही थी. ऐसा लग रहा था मार्बल अब सुंदर मूर्ति का रूप ले रही है जिस में गर्व ने जान डाल दी है.

पूरे परिवार में हंसीखुशी का माहौल था. खनक ने फिर से खनखनाना शुरू कर दिया था. विवाह संपन्न हो गया और पहले के कुछ दिन ऐसे ही बीत गए. गर्व को आभास था कि खनक थोड़ी सैंसिटिव है, इसलिए उस ने शुरुआत के कुछ दिनों तक नजदीकी के लिए कोई जल्दबाजी नहीं करी. उस ने 1 हफ्ते बाद घूमने के लिए टिकट करा रखे थे. खनक बेहद खुश थी. उस रात गर्व और खनक दोनों ने ड्रिंक लिया, मगर ड्रिंक करने के बाद गर्व एकाएक नजदीकी के लिए आतुर हो उठा.

खनक ने प्यार से कहा, ‘‘गर्व मैं अभी तैयार नहीं हूं.’’

गर्व लड़खड़ाती आवाज में बोला, ‘‘क्यों पहले भी तो तुम्हारे संबंध रहे होंगे और मैं तो तुम्हारा पति हूं,’’ यह कह कर वह खनक के ऊपर बल का प्रयोग करने लगा.

खनक की घिग्घी बंध गई और न जाने उस के हाथ में कैसे एक ब्रास का गुलदस्ता आ गया जो उस ने गर्व के सिर पर दे मारा.

गर्व दर्द से तिलमिला उठा. खनक घबरा गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि उस ने सही किया या गलत. अगली सुबह गर्व ने खनक से समान बांधने के लिए कह दिया. पूरे रास्ते गर्व ने खनक से कोई बात नहीं करी. गर्व और खनक को इतनी जल्दी लौटा देख कर सब का माथा ठनक गया.

गर्व ने मगर एक झूठी कहानी बता कर सब का मुंह तो बंद कर दिया मगर उन के रिश्ते में तनाव के बादल ऐसे घिरे जैसे जम से गए. गर्व चाहे कितना भी खनक को पसंद करता हो मगर उस की भी कुछ जरूरतें थी. खनक का उस से दूर रहना और नजदीक आते ही पत्थर बन जाना सबकुछ उसे तनाव दे रहा था.

उधर खनक भी शादी को बचाने के लिए कोशिश कर रही थी. मगर रात होते ही वह बेचैन हो उठती थी. हर रात उसे सजा जैसी महसूस होती थी. उधर गर्व को ऐसा लगता था मानो खनक कोई औरत नहीं है बल्कि एक ठंडा पत्थर है मार्बल की तरह.

गर्व को समझ नहीं आ रहा था कि वह मार्बल के साथ पूरा जीवन कैसे गुजारेगा. दोनों पढ़ेलिखे थे. अगर वे चाहते तो आराम से एक डाक्टर और काउंसलर के पास जा सकते थे मगर हमारे समाज में आज भी सैक्स को ले कर इतना खुलापन नहीं है, इसलिए दोनों एकदूसरे से खुल कर बात नहीं कर पा रहे थे.

मार्बल बहुत बार कोशिश करती मगर उस की जबान तक बात ही नहीं आ पा रही थी.

उधर गर्व को समझ नहीं आ रहा था कि क्या उस का कोई दोष है या खनक उस से प्यार ही नहीं करती है.

गर्व ने जब यह बात अपने एक बेहद नजदीकी दोस्त के साथ शेयर करी तो उस ने उस की मर्दानगी पर ही ताना कसा कि वह अपनी बीवी को काबू में नहीं कर पाया है. मार्बल जब अपने घर गई और उस ने अपनी मम्मी को यह बात बताई तो वे भी डाक्टर को नहीं, ज्योतिषियों को चुना.

जन्मपत्री देखते हुए आनंदमणि पंडितजी ने खनक को मूंगा और सोमवार का व्रत बता दिया.

इसी आंखमिचौली में 3 माह बीत गए. गर्व और खनक के बीच दूरियां बढ़ती चली गईं. 4 माह के पश्चात गर्व ने खनक को बोल दिया कि वह इस तरह से वो आगे की जिंदगी नहीं बिता सकता है, खनक एक बार शांति से अपने घर जा कर सोच ले कि उसे करना क्या है?

गर्व ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, ‘‘मुझे नहीं पता खनक कि गलती किस की है, मगर तुम्हारा मार्बल जैसा ठंडापन मुझे बेहद नर्वस कर देता है. हो सकता हैं मैं तुम्हारे अंदर वह प्यार जगाने में नाकामयाब रहा हूं, मगर इस तरह तो हम जिंदगी नहीं गुजार पाएंगे.’’

खनक फिर से पुरानी उदासीन खनक बन गई थी जिस की रुनझन कहीं खो गई थी. घर आ कर खनक बेहद रोई. अपनी मम्मी के गले लग कर खनक बोली, ‘‘मम्मी, मेरा यह अभिशाप, मेरा यह नाम मार्बल शायद मेरे जीवन का सत्य बन गया है.’’

खनक बोली, ‘‘मम्मी वह रात मेरी जिंदगी में एक अंधी सुरंग बन कर रह गई है, जो खत्म ही नहीं हो रही है. जब भी गर्व मेरे करीब आने की कोशिश करता है मैं मार्बल जैसी ठंडी और पत्थर बन जाती हूं. मैं गर्व को अपनी सचाई बताना चाहती हूं मम्मी मगर फिर आप का और पापा का रिश्ता सामने आ जाता है. मेरी सचाई से आप और पापा के रिश्ते में दरार आ जाएगी.’’

खनक की मम्मी खनक की बात सुन कर बुत सी बन कर बैठ गई. वह काली रात खनक के भविष्य को इतना काला कर देगी, मां ने सपने में भी नहीं सोचा था. अब अगर वह यह सच अपने पति को बता देगी तो न जाने क्या होगा, मगर खनक उस के भविष्य का क्या.

क्या एक मां हो कर इतनी स्वार्थी हो सकती, पहले अपने मायके का मोह और अब अपनी शादी का मोह. पूरी रात न खनक और न ही उस की मम्मी सो पाई.

अगले दिन जब खनक औफिस के लिए तैयार हो रही थी तो उस की मम्मी ने खनक से कहा, ‘‘आज औफिस मत जा, हम दोनों बात करेंगे और बाहर ही लंच भी कर लेंगे.’’

खनक और उस की मम्मी शायद जीवन में पहली बार इतना पारदर्शी हो कर बातचीत कर रही थीं. खनक का दर्द था कि उस की मां ने उस के लिए कभी स्टैंड नहीं लिया. यह सच है कि खनक की मम्मी उस रात में जो भी हुआ वह उसे रोक नहीं सकती थी, मगर मां की चुप्पी, सब से इस बात को छिपाना के कारण खनक अंदर से संवेदनहींन हो गई है. काश, हर्ष को भी उसी दर्द से गुजरना पड़े, जिस से वह गुजर रही है, मगर हर्ष से तो किसी ने आज तक इस बात का जिक्र भी नहीं किया. उस के मम्मीपापा को भी नहीं पता कि उन के बेटे ने कैसे उस की आत्मा को रौंद कर पत्थर बना दिया है.

अभी खनक ये सब बातें कर ही रही थी कि गर्व आ कर बैठ गया. खनक की मम्मी ने धाराप्रवाह उस रात की आपबीती गर्व को बता दी और फिर बोली, ‘‘बेटा, इस सब के लिए खनक नहीं मैं जिम्मेदार हूं, मेरे ही कारण खनक तुम से कुछ कह नहीं पा रही थी.’’

खनक गर्व को देख कर सुबकने लगी और बोली, ‘‘गर्व, पहली बार मुझे किसी पुरुष के साथ अपनेपन का अनुभव हुआ है, मगर मैं कुछ भी जानबूझ कर नहीं करती हूं.’’

गर्व खनक के हाथों को सहलाते हुए बोला, ‘‘इतने सालों तक इतना दर्द अकेले ही पीती रही हो? खनक को ज्योतिषों या व्रत की नहीं खुल कर बोलने की जरूरत है.’’

खनक की मम्मी बोली, ‘‘बेटा, जो सच था उसे कहने का साहस मैं आज कर पाई हूं.’’

खनक ने खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘गर्व, शादी से पहले मैं परिवार की बदनामी के कारण तुम्हें कुछ नहीं बता पाई थी. मगर तुम्हें पूरा हक है कि तुम्हें जो खुशी दे वही फैसला करो. गलती मेरी है, तुम क्यों अपनी खुशियों के साथ सम?ाता करोगे.’’

गर्व खनक और उस की मम्मी से बोला, ‘‘मुझे थोड़ा समय चाहिए कोई भी फैसला करने से पहले. मगर मेरा जो भी फैसला होगा, उस का आप या आप के परिवार पर कोई असर नहीं होगा.’’

खनक को इतने सालों बाद ऐसा लगा जैसे उस के अंदर कुछ पिघल रहा है. गर्व को समझ नहीं आ रहा था.

Social Story

Raj Kapoor: जब शो मेन ने महज एक गाने को सुन कर बनाया पूरी फिल्म

Raj Kapoor: एक समय वह भी था जब कुछ दिग्गज फिल्म निर्माण के दौरान क्रिएटिविटी के चलते दिमाग से ज्यादा दिल से काम लेते थे. एक बार जो चीज उन को भा गई फिर वह उस को किसी भी तरह नहीं छोड़ते थे और बाद में उन की वही खोज पूरी दुनिया पसंद करती थी.

ऐसा ही कुछ एक इंटरव्यू के दौरान रणधीर कपूर ने बताया कि उन के पिता राज कपूर ने कैसे सिर्फ एक गाना सुनने के बाद इतना मोहित हो गए कि उस गाने को आधार बना कर न सिर्फ फिल्म की कहानी लिख दी, बल्कि उस कहानी पर एक सुपरहिट फिल्म भी बनाई. फिल्म का नाम था ‘राम तेरी गंगा मैली’, जिस में राज कपूर ने पहाड़ों से आई एक लड़की मंदाकिनी को हीरोइन बना दिया था।

कौन सा गाना था वह

रणधीर कपूर ने बताया कि एक बार मेरे पिताजी ने एक फंक्शन में संगीतकार रविंद्र जैन द्वारा गाया गीत ‘एक राधा, एक मीरा, दोनों ने शाम को चाहा…’ सुना. यह गाना मेरे पिताजी राज कपूर साहब को इतना पसंद आया कि उन्होंने रविंद्र जैन को घर में बुला कर अपनी पूरी फैमिली को वही गाना सुनाने के लिए बोला। उस के बाद पिताजी ने मुझे उस दौरान ₹25,000 का चेक रविंद्र जैन को देने के लिए कहा.

रणधीर ने आगे बताया कि बाद में मेरे पिता राज कपूर साहब ने रविंद्र जैन से कहा कि वह यह गाना अपनी फिल्म में लेंगे। मामला इतने में ही खत्म नहीं हुआ, राज कपूर साहब रविंद्र जैन के साथ 1 हफ्ते के लिए गायब हो गए और जब वे वापस लौटे तो उन्होंने रविंद्र जैन से और कई गाने गवाए जो वे अपनी फिल्म में लेने वाले थे। जब पिताजी राज साहब से पूछा गया कि इस फिल्म की कहानी क्या है तो उन्होंने रविंद्र जैन का गाना ‘एक राधा एक मीरा…’  को आधार बना कर फिल्म की कहानी लिखने का निर्णय लिया.

हिट रही फिल्म

रणधीर आगे कहते हैं कि राज कपूर साहब ने ही इस फिल्म की कहानी लिखी, जिस का नाम था ‘राम तेरी गंगा मैली’, जिस में हीरोइन यानि मंदाकिनी हीरो को राधा की तरह प्यार करती थी, तो दूसरी हीरोइन मीरा की तरह। इसी बेस पर फिल्म बनी।

रविंद्र जैन के सारे गाने इस फिल्म में इस्तेमाल किए गए और पिता राज कपूर ने ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसी फिल्म का निर्माण किया, जिसे आज भी एक बेहतरीन फिल्म के लिए याद किया जाता है और आज भी इस फिल्म के गाने बेहद लोकप्रिय हैं.

Raj Kapoor

Synotiz Pain Relief Oil: दर्द को कहें अलविदा

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Red Lipstick: हर लड़की के लिए परफेक्ट है रेड लिपस्टिक

Red Lipstick: कई लड़कियों को लगता है रेड कलर की लिपस्टिक मुझ पर कहां अच्छी लगेगी वो तो सुन्दर और खूब गोरी स्किन टाइप वाली लड़कियों पर ही अच्छी लगती होगी. लेकिन बात गलत है. रेड कलर का गोरे रंग से कोई लेना देना नहीं है. बल्कि कई लड़कियों को यह पता ही नहीं होता कि रेड कलर में भी बहुत से शेड्स आते हैं जो हर तरह की स्किन कलर वाली लड़कियों पर सूट करते हैं. बस आपको उन शेड्स के बारे में और रेड लिपस्टिक के बारे में थोड़ी जानकारी पहले से होनी चाहिए, तो आइए जानें –

रेड लिपस्टिक कई तरह के शेड्स में आती हैं, जो हर स्किनटोन पर अच्छी लगती हैं आइये जाने कैसे होते हैं वे शेड्स –

ब्लू-टोन्ड रेड्स (Blue-Toned Reds)

अगर आपका रंग बहुत गोरा है, गेहुंआ या फिर सांवला तो यकीन मानिए यह लिपस्टिक आपके लिए है. इस लिपस्टिक से आपका फेस ही नहीं बल्कि आपके दांत भी चमकेंगे. ये शेड्स नीले रंग के अंडरटोन वाले होते हैं. इनमें भी कई टोन आते है जैसे-

रूबी रेड (Ruby Red): ये एक क्लासिक, सच्चा लाल रंग है.

क्रिमसन (Crimson): इसमें हल्का नीला या बैंगनी रंग का अंडरटोन होता है.

चेरी रेड (Cherry Red): ये हल्का और चमकदार लाल रंग होता है. गहरा लाल शेड होने के कारण यह गेहुंआ और सांवले स्किन टोन पर बेहद खूबसूरत लगता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह हर मौके और किसी भी आउटफिट के साथ मैच होने वाला एक वर्सेटाइल शेड है. अगर आप इसे सैटिन फिनिश में लगाती हैं तो होंठ ज्यादा जूसी और फ्रेश दिखते हैं.

बेरी रेड (berry red) ये शेड हल्का गुलाबी रंगत लिए हुए होता है. यह शेड गोरे, गेहुंआ और सांवली स्किन टोन पर सूट करता है. यह एक ट्रेंडी और मॉडर्न लुक देता है जो बेहद आकर्षक लगता है. इसे लिप लाइनर के साथ इस्तेमाल करने से होंठ पूरी तरह से डिफाइंड दिखते हैं जिससे लुक और भी शानदार लगता है.

ऑरेंज-टोन्ड रेड्स (Orange-Toned Reds)

जैसे कि इसके नाम से ही पता चल रहा है इनमे नारंगी रंग का अंडरटोन होता है. ये बहुत ज्यादा गोर लोगों पर कम अच्छे लगती है. लेकिन जिनका रंग थोड़ा दबा हुआ या सांवला होता है उनके लिए यह ठीक रहती है.

कोरल रेड (Coral Red): यह हल्का, नारंगी रंग का लाल शेड है. अगर आपका रंग गोरा है तो यह कलर आप पर अच्छा लगेगा. वैसे यह रेड शेड गोरी और मीडियम स्किन टोन के लिए सबसे बढ़िया है. यह आपके चेहरे को एक जिंदादिल और जवां लुक देता है.

पॉपी (Poppy): पॉपी मतलब लोलीपॉप जैसा नारंगी रंग के साथ एक चमकीला लाल शेड.

टेराकोटा (Terracotta): यह भूरे और नारंगी रंग का मिक्स शेड है।

ऑरेंज-रेड (गर्म अंडरटोन के साथ).

ब्रिक रेड- यह गहरा ब्राउनिश रेड शेड गेहुंआ और सांवली स्किन टोन पर बोल्ड और क्लासी लुक देता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह आपको भीड़ से अलग दिखाता है.शाम की पार्टी या किसी खास इवेंट के लिए यह एक आइडियल चॉइस है.

डीप रेड्स (Deep Reds)

ये शेड्स काफी डार्क और बोल्ड होते हैं जो पार्टीज़ के लिए परफेक्ट होते हैं. यह कलर हर तरह की स्किन टोन पर खूब फबता है.

बरगंडी (Burgundy): यह एक गहरा लाल रंग है जो गहरे रंग की त्वचा के लिए उपयुक्त है. इसमें भूरा या बैंगनी रंग का अंडरटोन होता है.

वाइन (Wine) : यह अंगूरी रंग का गहरा लाल शेड है.

मार्साला (Marsala) : इसमें भूरे और लाल रंग के अंडरटोन होते हैं.

रूबी रेड (rubi) यह गहरा लाल रंग होता है.

सही शेड चुनने के लिए आप अपनी त्वचा के अंडरटोन (warm, cool, or neutral) का भी ध्यान रख सकते हैं.

अपनी स्किन टोन के हिसाब से शेड्स चुनें –

गोरी त्वचा (Fair Skin) : गोरी त्वचा पर हल्के और चमकीले लाल शेड्स अच्छे लगते हैं. कोरल रेड और चेरी रेड जैसे शेड्स आपके चेहरे को फ्रेश लुक देते हैं.

गेहुंआ त्वचा (Medium/Wheatish Skin) यह भारत में सबसे आम स्किन टोन है और इस पर ज्यादातर लाल शेड्स अच्छे लगते हैं। क्लासिक रेड, वाइन रेड और क्रिमसन जैसे शेड्स आपको बोल्ड और खूबसूरत लुक दे सकते हैं.

सांवली त्वचा (Dusky Skin) सांवली त्वचा पर गहरे और बोल्ड लाल शेड्स बहुत जंचते हैं. बरगंडी, वाइन रेड और डीप ब्राउनिश रेड जैसे शेड्स आपके लुक को एक क्लासिक और स्टाइलिश टच देते हैं.

इस तरह अपने स्किन टोन को धयान में रखकर ही लिपस्टिक चुनें. जैसे की रुबी रेड शेड क्लासिक रेड है जो हर गोरी स्किन वाली लड़की को जंचती है. यदि आपका रंग गेहुआं है तो आप पर थोड़ा ब्राइट और अंडर टोन वाला रेड रंग का लिपस्टिक खिल सकता है जो आपको ग्लैमरस और बोल्ड लुक दे सकता है. आपकी त्वचा सांवली त्वचा है तो ब्रिक रेड्स या बरगंडी वाले मैट फिनिश आपको बोल्ड लुक देगा. इसी तरह अपनी स्किन टोन के अनुसार रेड लिपस्टिक के कलर चुने.

रेड लिपस्टिक लगाते समय इन बातों का धयान रखें-

मैट फिनिश या ग्लॉसी फिनिश लिपस्टिक में से चूज करें

इसके साथ ही फिनिश पर ध्यान देना जरूरी है कि यह मैट फिनिश है या ग्लॉसी. अगर आप बोल्ड, लंबे समय तक चलने वाले और क्लीन लुक के लिए तैयार हो रही हैं, तो मैट लिपस्टिक चुनें. मैट लिपस्टिक लंबे समय तक टिकी रह सकती है. लेकिन अगर आपके होंठ रूखे हैं या आप फ्रेश, ब्राइट और भरे हुए लुक की तलाश में हैं, तो ग्लॉसी लिपस्टिक चुनें. क्रीम फिनिश लिपस्टिक सॉफ्ट और होंठों को मॉइश्चराइजिंग रखने में मदद कर सकती है.

लिप्सिटक का ब्रांड भी देखें

आप लिपस्टिक खरीदते समय ब्रांड और इसकी क्वालिटी का जरूर ख्याल रखें, क्योंकि लोकल लिपस्टिक आपकी त्वचा को नुकसान पहुंचा सकती है। मैक लिपस्टिक अपने हाई-क्वालिटी फ़ॉर्मूले और अलग-अलग शेड्स के लिए जानी जाती है. इनका आइकॉनिक शेड ‘रूबी वू (Ruby Woo)’ दुनिया भर में मशहूर है और यह एक क्लासिक ब्लू-टोन्ड रेड है जो ज़्यादातर स्किन टोन पर अच्छा लगता है. इसी तरह मेबेलिन एक बजट-फ्रेंडली ब्रांड है जो अच्छी क्वालिटी की लिपस्टिक देता है. इनकी ‘सुपरस्टे मैट इंक (SuperStay Matte Ink)’ रेंज की रेड लिपस्टिक बहुत पसंद की जाती है. यह भारतीय ब्रांड अपने बोल्ड और पिगमेंटेड शेड्स के लिए जाना जाता है. इनकी ‘मैट एज ए हेल लिक्विड लिपस्टिक (Matte As Hell Crayon Lipstick)’ रेंज की रेड लिपस्टिक बहुत ही अच्छी है.

Occasion के अकॉर्डिंग ही चुने रंग

हर Red Shade हर मौके के लिए नहीं होता, इसलिए यह ध्यान दें कि आप ऑफिस के लिए लाल Lipstick ले रही हैं तो थोड़ा लाइट रेड लें और वही पार्टी के लिए लेना हो तब आप ब्राइट या डीप रेड शेड ले सकती हैं.

Red Lipstick

Love Story: दीमक- अविनाश के प्यार में क्या दीपंकर को भूल गई नम्रता?

Love Story: ऐंटी टर्माइट का छिड़काव हो रहा था. उस की अजीब सी दुर्गंध सांसों में घुली जा रही थी. एक बेचैनी और उदासी उस फैलते धुएंनुमा स्प्रे के कारण उस के भीतर समा रही थी. उफ, यह नन्ही सी दीमक किस तरह जीवन की गति में अवरोध पैदा कर देती है. हर चीज अस्तव्यस्त…कमरे, रसोई, हर अलमारी और पलंगों को खाली करना पड़ा है…खूबसूरत कैबिनटों पर रखे शोपीस, किताबें सब कुछ इधरउधर बिखरा पड़ा है.

हर 2-3 महीने में यह छिड़काव कराना जरूरी होता है. जब दिल्ली से फरीदाबाद आए थे तो किसे पता था कि इस तरह की परेशानी उस की जिंदगी की संगति को ही बिगाड़ कर रख देगी. अगर अपना मकान बनाना एक बहुत बड़ी सिरदर्दी और टैंशन का काम लगता है तो बनाबनाया मकान लेने की चाह भी चैन छीनने में कोई कसर नहीं छोड़ती है.

जब उस में आ कर रहो तभी छूटी हुई खामियां जैसे छिपी दरारें, दरकती दीवारें आदि 1-1 कर सामने आने लगती हैं. पर इस जमाने में दिल्ली में 600 गज की कोठी खरीदना किसी बहुत बड़े सपने से कम नहीं है और आसपास एनसीआर इतने भर चुके हैं कि वहां भी कीमत आसमान छू रही है. ऐसे में फरीदाबाद का विकल्प ही उन के पास बचा था जहां बजट में कोठी मिल गई थी. तब तो यही सोचा था कि फरीदाबाद कौन सा दूर है, इसलिए यह कोठी खरीद ली थी.

हालांकि वह दिल्ली छोड़ कर आना नहीं चाहती थी, पर उस के पति दीपंकर की जिद थी कि उन्हें स्टेटस को मैंटेन करने के लिए कोठी में रहना ही चाहिए. आखिर क्या कमी है उन्हें. पैसा, पावर और स्टेटस सब है उस का सोसायटी में. फिर जब कारें घर के बाहर खड़ी हैं तो दिल्ली कौन सी दूर है. रोजरोज दिल्ली आनेजाने के झंझट के बारे में सोच उस के माथे पर शिकन उभर आई थी, पर बहस करने का कोई औचित्य नहीं था.

‘‘मैडम, हम ने स्प्रे कर दिया है, पर 3 महीने बाद आप को फिर करवाना होगा. दीमक जब एक बार फैल जाती है, तो बहुत आसानी से पीछा नहीं छोड़ती है जब तक कि पूरी तरह अंदर तक फैली उस की सुरंगें नष्ट न हो जाएं. दीमक लकड़ी में एक के बाद एक सुरंग बनाती जाती है. बाहर से पता नहीं चलता कि लकड़ी को कोई नुकसान पहुंच रहा है, पर उसे वह अंदर से बिलकुल खोखला कर देती है. अच्छा होगा कि आप साल भर का कौंट्रैक्ट हमारी कंपनी के साथ कर लें. फिर हम खुद ही आ कर स्प्रे कर जाया करेंगे. आप को बुलाने का झंझट नहीं रहेगा,’’ स्मार्ट ऐग्जीक्यूटिव, अपनी कंपनी का बिजनैस बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था.

यहीं आने पर पता चला था फरीदाबाद में मेहंदी की खेती होती है, इसलिए दीमक बहुत जल्दी जगहजगह लग जाती है. स्प्रे की गंध उसे अभी भी अकुला रही थी. लग रहा था जैसे उलटी आ जाएगी. भीनीभीनी मेहंदी की सुगंध कितनी भाती है, पर जब उस की वजह से दीमक फैलने लगे, तो उस की खुशबू ही क्या, उस का रंग भी आंखों को चुभने लगता है. एक नन्ही सी दीमक किस तरह से घर को खोखला कर देती है. ठीक वैसे जैसे छोटीछोटी बातें रिश्ते की मजबूत दीवारों को गिराने लगती हैं. वे इतनी खोखली हो जाती हैं कि उस शून्यता और रिक्तता को भरने के लिए पूरी जिंदगी भी कम लगने लगती है.

‘‘ठीक है, आप कौंट्रैक्ट तैयार कर लें. पेपर तैयार कर कल आ जाएं. मैं इस समय बिजी हूं,’’ वह किसी भी तरह से उसे वहां से टालने के मूड में थी.

हर तरफ सामान बिखरा हुआ था और उसे शाम को अवनीश से मिलने जाना था. मेड को हिदायतें दे कर वह थोड़ी देर बाद ही सजधज कर बाहर निकल गई. अवनीश से मिलने जाना है तो ड्राइवर को नहीं ले जा सकती, इसलिए खुद ही दिल्ली तक ड्राइव करना पड़ा. जब से अवनीश उस की जिंदगी में आया था, उस की दुनिया रंगीन हो गई थी. शादी को 2 साल हो गए हैं, पर दीपंकर से उस की कभी नहीं बनी. रोमांस और रोमांच तो जैसे क्या होता है, उसे पता तक नहीं है. वह तो शुरू से ही बिंदास किस्म की रही है. घूमनाफिरना, पार्टियां अटैंड कर मौजमस्ती करना उस की फितरत है. दीपंकर के पास तो कभी उस के लिए टाइम होता ही नहीं है, बस पैसा कमाने और अपने बिजनैस टूअर में बिजी रहता है. हमेशा एक गंभीरता सी उस के चेहरे पर बनी रहती है.

दूसरी तरफ अवनीश है. स्मार्ट, हैंडसम और उसी की तरह मौजमस्ती करना पसंद करने वाला. हमेशा हंसता रहता है. उस की हर बात पर ध्यान देता है जैसे उसे कौन सा कलर सूट करता है, उस का हेयरस्टाइल आज कैसा है या कब उस ने कौन से शेड की लिपस्टिक लगाई थी. यहां तक कि उसे यह भी पता है कि वह कौन सा परफ्यूम पसंद करती है. दीपंकर को तो यह भी पता नहीं चलता कि कब उस ने नई ड्रैस खरीदी है या कौन सी साड़ी में वह ज्यादा खूबसूरत लगती है. हां, पैसे देने में कभी कटौती नहीं करता न ही पूछता कि कहां खर्च  कर रही हो?

‘‘हाय मेरी जान, बला की खूबसूरत लग रही हो…कितनी देर लगा दी. तुम्हारा इंतजार करतेकरते सूख गया मैं,’’ अवनीश की इसी अदा पर तो मरती है वह.

‘‘ट्रैफिक प्रौब्लम… ऐनी वे बताओ आज का क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘शाम ढलने को है, प्रोग्राम क्या होना चाहिए, तुम ही सोचो,’’ अवनीश ने उसे आंख मारते हुए कहा तो वह शरमा गई.

अवनीश अकेला था और कुंआरा भी. अपने दोस्त के साथ एक कमरा शेयर कर के रहता था. दोनों के बीच आपस में पहले से ही तय था कि जब वह नम्रता को वहां ले जाएगा तो वह देर आएगा. अवनीश की बांहों से जब नम्रता मुक्त हुई तो बहुत खुश थी और अवनीश तो जैसे हमेशा उसे पा लेने को आतुर रहता था.

‘‘तुम ने मुझे दीवाना बना दिया है नम्रता. अच्छा आजकल सेल चल रही है, क्या खयाल है तुम्हारा कल कुछ शौपिंग करें?’’

‘‘मेरे होते हुए तुम्हें सेल में खरीदारी करने की क्या जरूरत?’’ कह नम्रता निकल गई और अवनीश उस के लाए हुए परफ्यूम को लगाने लगा.

‘‘सही मुरगी हाथ लगी है तेरे. बहुत ऐश कर रहा है,’’ अवनीश के दोस्त ने परफ्यूम से महकते कमरे में घुसते हुए कहा.

‘‘तू क्यों जल रहा है? फायदा तो तेरा भी होता है. मेरी सारी चीजों का तू भी तो इस्तेमाल करता है?’’ अवनीश बेशर्मी से मुसकराया.

अगले दिन नम्रता ने अवनीश के लिए ढेर सारी शौपिंग की. कुछ और भी खरीदना है, कह कर उस ने नम्रता से उस का क्रैडिट कार्ड ले लिया. वह जानता था कि नम्रता अपने पति को पसंद नहीं करती है, इसलिए उस की भावनाओं का खूब फायदा उठा रहा था.

पति से नाखुश होने के कारण उस के अंदर संवेदनशीलता की कमी बनी रहती थी, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि अवनीश से उस का साथ छूटे. उसे डर लगा रहता था कि कहीं वह शादी न कर ले. कभीकभी भावुक हो वह उस के सामने रो भी पड़ती थी.

3 महीने बाद जब फिर से ऐंटीटर्माइट स्प्रे करने कंपनी के लोग आए, तो उन्होंने कहा लकड़ी को गीला होने से बचाना चाहिए. उसे पता चला कि  दीमक नमी वाले स्थानों में अधिक पाई जाती है. जहां कहीं भी गली हुई लकड़ी मिलती है, वह तुरंत वहां अपनी पैठ बना लेती है. उस ने तो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया था कि अवनीश धीरेधीरे उस के जीवन में पैठ बना कर उसे खोखला बनाता जा रहा है.

‘‘तुम्हारे पति की बहुत पहुंच है, उन से कह कर मेरे बौस का यह काम करवा दो न,’’ अवनीश ने एक दिन नम्रता के गालों को चूमते हुए कहा तो वह बोली, ‘‘तुम ने कह दिया, समझो हो गया. दीपंकर मेरी कोई बात नहीं टालते हैं. अच्छा चलो आज लंच किसी बढि़या होटल में करते हैं.’’

नम्रता सोचती थी कि अवनीश की वजह से उस की जिंदगी में बहार है…तितली की तरह उस के चारों ओर मंडराती रहती. उस के मुंह से अपनी प्रशंसा सुन बादलों में उड़ती रहती. दूसरी ओर अवनीश की मौज थी. उस का शरीर, पैसा और हर तरह की ऐश की मौज लूट रहा था.

जब नम्रता ने बताया के दीपंकर बिजनैस ट्रिप पर हफ्ते भर के लिए सिंगापुर जा रहा है, तो उस ने भी नम्रता से किसी हिल स्टेशन पर जाने के लिए प्लेन का टिकट बुक कराने के लिए कहा. दोनों ने वहां बहुत ऐंजौय किया, पर पहली बार उसे अवनीश का खुले हाथों से पैसे खर्चना अखरा.

वह समझ ही नहीं पा रही थी कि अवनीश नामक दीमक उस के और दीपंकर के रिश्ते के बीच आ उसे भुरभुरा कर रहा है. उसे क्या पता था कि दीमक अपना घर बनाने के लिए लकड़ी को खोखला नहीं करती है, बल्कि लकड़ी को ही चट कर जाती है और इसीलिए उस के लग जाने का पता नहीं चलता, क्योंकि वह अपने पीछे किसी तरह का बुरादा तक नहीं छोड़ती है. जब तक लकड़ी का वजूद पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाता, दीमक लगने का एहसास तक नहीं हो पाता है. आसानी से उस का पता नहीं लगाया जा सकता, इसलिए उस से छुटकारा पाना भी कभीकभी असंभव हो जाता है. यहां तक कि उसे हटाने के लिए जो छिड़काव किया जाता है, वह उसे भी अपने में समा लेती और अधिक जहरीली हो जाती है.

कुछ दिनों से वह महसूस कर रही थी कि अवनीश की मांगें निरंतर बढ़ती जा रही हैं. जबतब उस का क्रैडिट कार्ड मांग लेता. दीपंकर उस से कहता नहीं है, पर कभीकभी लगता कि मेहनत से कमाए उस के पैसे वह अवनीश पर लुटा कर अच्छा नहीं कर रही है. दीपंकर की सौम्यता और उस पर अटूट विश्वास उसे अपराधबोध से भरने लगा था. माना अवनीश बहुत रोमांटिक है, पर दीपंकर ने कभी यह एहसास तो नहीं कराया कि वह उस से प्यार नहीं करता है. उस का केयर करना क्या प्यार नहीं है और अवनीश है कि बस जब भी मिलता है किसी न किसी तरह से पैसे खर्चवाने की बात करता है. क्या यह प्यार होता है? नहीं अवनीश उसे प्यार नहीं करता है. उस ने कहीं पढ़ा था कि दीमक घास के ऊपर या नमी वाली जमीन पर एक पहाड़ी सी भी बना लेती है जो दूर से देखने में बहुत सुंदर लगती है और एहसास तक नहीं होता कि उसे छूने भर से हाथों में एक अजीब सी सिहरन तक दौड़ सकती है.

पास जा कर देखो तब पता लगता है कि असंख्य दीमक उस के अंदर रेंग रही है और तब एक लिजलिजा सा एहसास मन को घेर लेता है.

उसे समझ नहीं आ रहा था कि उस के मन और शरीर पर हावी होती जा रही अवनीशरूपी दीमक पर वह किस स्प्रे का छिड़काव करे… दीपंकर को धोखा देने के कारण मन लकड़ी के बुरादे सा भुरभुरा और खोखला होता जा रहा है…क्षणक्षण कुछ दरक जाता है…न जाने मन के कपाट इस सूरत में कितने समय तक बंद रह सकते हैं. डरती है वह कहीं कपाट खुल गए तो संबंधों की कड़ी ही न ढीली पड़ जाए. जब मजबूती न रहे तो टूटने में बहुत देर नहीं लगती किसी भी चीज को…फिर यह तो रिश्ता है.

नम्रता को एहसास हुआ कि अपने पति की कमियों और रिश्ते से नाखुश होने के कारण उस के भीतर से जो संवेदनाओें का बहाव हो रहा है, उस की नमी में दीमक ने अपना घर बना लिया है. अवनीश के सामने उस ने दिल के दरवाजे खोल दिए हैं उस ने भी तो…उस की आंसुओं की आर्द्रता से मिलती नमी में पनपने और जगह बनाने का मौका मिल रहा है उसे.

अचानक उसे महसूस हुआ कि दीमक उस के घर में ही नहीं, उस की जिंदगी में भी लगी हुई है. धीरेधीरे वह किस तरह बिखर रही है…बाहर से सब सुंदर और अच्छा लगता है, पर अंदर ढेरों सुरंगें बनती जा रही हैं, जिन्हें बनने से अभी न रोका गया तो बाहर आना मुश्किल हो जाएगा. दीमक उस के जीवन को किसी बुरादे में बदल दे, उस से पहले ही हर जगह छिड़काव कराना होगा.

‘‘दीमक कुछ ज्यादा ही फैल रही है, आप तुरंत किसी को भेजें. मुझे इसे पूरी तरह से हटाना है,’’ नम्रता ने घर में स्प्रे करवाने के लिए कंपनी में समय से पहले ही फोन कर उन्हें आने को कहा.

‘‘पर मैडम, अभी तो स्प्रे किए 2 ही महीने हुए हैं, 3 महीने बाद इसे करना होता है.’’

‘‘आप ऐक्स्ट्रा पैसे ले लेना. दीमक और फैल गई, तो सब बिखर जाएगा. आज ही भेज दो आदमी को, दीमक फैल रही है,’’ फोन तो कब का कट चुका था, पर वह लगातार बुदबुदा रही थी, ‘‘दीमक को फैलने से रोकना ही होगा.’’

उस के मोबाइल पर अवनीश का फोन आने लगा था. यह पहली बार हुआ था जब उस ने दूसरी घंटी भी बजाने दी थी. फिर तो रिंग होती ही रही. मोबाइल हाथ में ही था. जब उसे अहसास हुआ तो 10 मिनट बीत चुके थे. अवनीश की 5 मिस्ड काल्स थीं. उस ने मोबाइल साइलैंट मोड पर कर दिया और कपड़ों की अलमारी से कपड़े निकालने लगी, जो कपड़े अवनीश के साथ खरीदे थे उन में तो बुरी तरह दीमक लग चुकी थी. उन्हें बाहर ले जा कर जला डालना ही ठीक होगा.

Love Story

Hindi Fictional Story: जिस गली जाना नहीं- क्या हुआ था सोम के साथ

Hindi Fictional Story: अवाक खड़ा था सोम. भौचक्का सा. सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी हो जाएगा उस के साथ. जीवन कितना विचित्र है. सारी उम्र बीत जाती है कुछकुछ सोचते और जीवन के अंत में पता चलता है कि जो सोचा वह तो कहीं था ही नहीं. उसे लग रहा था जिसे जहां छोड़ कर गया था वह वहीं पर खड़ा उस का इंतजार कर रहा होगा. वही सब होगा जैसा तब था जब उस ने यह शहर छोड़ा था.

‘‘कैसे हो सोम, कब आए अमेरिका से, कुछ दिन रहोगे न, अकेले ही आए हो या परिवार भी साथ है?’’

अजय का ठंडा सा व्यवहार उसे कचोट गया था. उस ने तो सोचा था बरसों पुराना मित्र लपक कर गले मिलेगा और उसे छोड़ेगा ही नहीं. रो देगा, उस से पूछेगा वह इतने समय कहां रहा, उसे एक भी पत्र नहीं लिखा, उस के किसी भी फोन का उत्तर नहीं दिया. उस ने उस के लिए कितनाकुछ भेजा था, हर दीवाली, होली पर उपहार और महकदार गुलाल. उस के हर जन्मदिन पर खूबसूरत कार्ड और नए वर्ष पर उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक सुखसंदेश. यह सत्य है कि सोम ने कभी उत्तर नहीं दिया क्योंकि कभी समय ही नहीं मिला. मन में यह विश्वास भी था कि जब वापस लौटना ही नहीं है तो क्यों समय भी खराब किया जाए. 10 साल का लंबा अंतराल बीत गया था और आज अचानक वह प्यार की चाह में उसी अजय के सामने खड़ा है जिस के प्यार और स्नेह को सदा उसी ने अनदेखा किया और नकारा.

‘‘आओ न, बैठो,’’ सामने लगे सोफों की तरफ इशारा किया अजय ने, ‘‘त्योहारों के दिन चल रहे हैं न. आजकल हमारा ‘सीजन’ है. दीवाली पर हर कोई अपना घर सजाता है न यथाशक्ति. नए परदे, नया बैडकवर…और नहीं तो नया तौलिया ही सही. बिरजू, साहब के लिए कुछ लाना, ठंडागर्म. क्या लोगे, सोम?’’

‘‘नहीं, मैं बाहर का कुछ भी नहीं लूंगा,’’ सोम ने अजय की लदीफंदी दुकान में नजर दौड़ाई. 10 साल पहले छोटी सी दुकान थी. इसी जगह जब दोनों पढ़ कर निकले थे वह बाहर जाने के लिए हाथपैर मारने लगा और अजय पिता की छोटी सी दुकान को ही बड़ा करने का सपना देखने लगा. बचपन का साथ था, साथसाथ पलेबढ़े थे. स्कूलकालेज में सब साथसाथ किया था. शरारतें, प्रतियोगिताएं, कुश्ती करते हुए मिट्टी में साथसाथ लोटे थे और आज वही मिट्टी उसे बहुत सता रही है जब से अपने देश की मिट्टी पर पैर रखा है. जहां देखता है मिट्टी ही मिट्टी महसूस होती है. कितनी धूल है न यहां.

‘‘तो फिर घर आओ न, सोम. बाहर तो बाहर का ही मिलेगा.’’

अजय अतिव्यस्त था. व्यस्तता का समय तो है ही. दीवाली के दिन ही कितने रह गए हैं. दुकान ग्राहकों से घिरी है. वह उस से बात कर पा रहा है, यही गनीमत है वरना वह स्वयं तो उस से कभी बात तक नहीं कर पाया. 10 साल में कभी बात करने में पहल नहीं की. डौलर का भाव बढ़ता गया था और रुपए का घटता मूल्य उस की मानसिकता को इतना दीनहीन बना गया था मानो आज ही कमा लो सब संसार. कल का क्या पता, आए न आए. मानो आज न कमाया तो समूल जीवन ही रसातल में चला जाएगा. दिनरात का काम उसे कहां से कहां ले आया, आज समझ में आ रहा है. काम का बहाना ऐसा, मानो एक वही है जो संसार में कमा रहा है, बाकी सब निठल्ले हैं जो मात्र जीवन व्यर्थ करने आए हैं. अपनी सोच कितनी बेबुनियाद लग रही है उसे. कैसी पहेली है न हमारा जीवन. जिसे सत्य मान कर उसी पर विश्वास और भरोसा करते रहते हैं वही एक दिन संपूर्ण मिथ्या प्रतीत होता है.

अजय का ध्यान उस से जैसे ही हटा वह चुपचाप दुकान से बाहर चला आया. हफ्ते बाद ही तो दीवाली है. सोम ने सोचा, उस दिन उस के घर जा कर सब से पहले बधाई देगा. क्या तोहफा देगा अजय को. कैसा उपहार जिस में धन न झलके, जिस में ‘भाव’ न हो ‘भाव’ हो. जिस में मूल्य न हो, वह अमूल्य हो.

विचित्र सी मनोस्थिति हो गई है सोम की. एक खालीपन सा भर गया है मन में. ऐसा महसूस हो रहा है जमीन से कट गया है. लावारिस कपास के फूल जैसा जो पूरी तरह हवा के बहाव पर ही निर्भर है, जहां चाहे उसे ले जाए. मां और पिताजी भीपरेशान हैं उस की चुप्पी पर. बारबार उस से पूछ रहे हैं उस की परेशानी आखिर है क्या? क्या बताए वह? कैसे कहे कि खाली हाथ लौट आया है जो कमाया उसे वहीं छोड़ आ गया है अपनी जमीन पर, मात्र इस उम्मीद में कि वह तो उसे अपना ही लेगी.

विदेशी लड़की से शादी कर के वहीं का हो गया था. सोचा था अब पीछे देखने की आखिर जरूरत ही क्या है? जिस गली अब जाना नहीं उधर देखना भी क्यों? उसे याद है एक बार उस की एक चाची ने मीठा सा उलाहना दिया था, ‘मिलते ही नहीं हो, सोम. कभी आते हो तो मिला तो करो.’

‘क्या जरूरत है मिलने की, जब मुझे यहां रहना ही नहीं,’ फोन पर बात कर रहा था इसलिए चाची का चेहरा नहीं देख पाया था. चाची का स्वर सहसा मौन हो गया था उस के उत्तर पर. तब नहीं सोचा था लेकिन आज सोचता है कितना आघात लगा होगा तब चाची को. कुछ पल मौन रहा था उधर, फिर स्वर उभरा था, ‘तुम्हें तो जीवन का फलसफा बड़ी जल्दी समझ में आ गया मेरे बच्चे. हम तो अभी तक मोहममता में फंसे हैं. धागे तोड़ पाना सीख ही नहीं पाए. सदा सुखी रहो, बेटा.’

चाची का रुंधा स्वर बहुत याद आता है उसे. उस के बाद चाची से मिला ही कब. उन की मृत्यु का समाचार मिला था. चाचा से अफसोस के दो बोल बोल कर साथ कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी. इतना तेज भाग रहा था कि रुक कर पीछे देखना भी गवारा नहीं था. मोहममता को नकार रहा था और आज उसी मोह को तरस रहा है. मोहममता जी का जंजाल है मगर एक सीमा तक उस की जरूरत भी तो है. मोह न होता तो उस की चाची उसे सदा खुश रहने का आशीष कभी न देती. उस के उस व्यवहार पर भी इतना मीठा न बोलती. मोह न हो तो मां अपनी संतान के लिए रातभर कभी न जागे और अगर मोह न होता तो आज वह भी अपनी संतान को याद करकर के अवसाद में न जाता. क्या नहीं किया था सोम ने अपने बेटे के लिए.

विदेशी संस्कार नहीं थे, इसलिए कह सकता है अपना खून पिलापिला कर जिसे पाला वही तलाक होते ही मां की उंगली पकड़ चला गया. मुड़ कर देखा भी नहीं निर्मोही ने. उसे जैसे पहचानता ही नहीं था. सहसा उस पल अपना ही चेहरा शीशे में नजर आया था.

‘जिस गली जाना नहीं उस गली की तरफ देखना भी क्यों?’

उस के हर सवाल का जवाब वक्त ने बड़ी तसल्ली के साथ थाली में सजा कर उसे दिया है. सुना था इस जन्म का फल अगले जन्म में मिलता है अगर अगला जन्म होता है तो. सोम ने तो इसी जन्म में सब पा भी लिया. अच्छा ही है इस जन्म का कर्ज इसी जन्म में उतर जाए, पुनर्जन्म होता है, नहीं होता, कौन जाने. अगर होता भी है तो कर्ज का भारी बोझ सिर पर ले कर उस पार भी क्यों जाना. दीवाली और नजदीक आ गई. मात्र 5 दिन रह गए. सोम का अजय से मिलने को बहुत मन होने लगा. मां और बाबूजी उसे बारबार पोते व बहू से बात करवाने को कह रहे हैं पर वह टाल रहा है. अभी तक बता ही नहीं पाया कि वह अध्याय समाप्त हो चुका है.

किसी तरह कुछ दिन चैन से बीत जाएं, फिर उसे अपने मांबाप को रुलाना ही है. कितना अभागा है सोम. अपने जीवन में उस ने किसी को सुख नहीं दिया. न अपनी जन्मदाती को और न ही अपनी संतान को. वह विदेशी परिवेश में पूरी तरह ढल ही नहीं पाया. दो नावों का सवार रहा वह. लाख आगे देखने का दावा करता रहा मगर सत्य यही सामने आया कि अपनी जड़ों से कभी कट नहीं पाया. पत्नी पर पति का अधिकार किसी और के साथ बांट नहीं पाया. वहां के परिवेश में परपुरुष से मिलना अनैतिक नहीं है न, और हमारे घरों में उस ने क्या देखा था चाची और मां एक ही पति को सात जन्म तक पाने के लिए उपवास रखती हैं. कहां सात जन्म तक एक ही पति और कहां एक ही जन्म में 7-7 पुरुषों से मिलना. ‘जिस गली जाना नहीं उस गली की तरफ देखना भी क्यों’ जैसी बात कहने वाला सोम आखिरकार अपनी पत्नी को ले कर अटक गया था. सोचने लगा था, आखिर उस का है क्या, मांबाप उस ने स्वयं छोड़ दिए  और पत्नी उस की हुई नहीं. पैर का रोड़ा बन गया है वह जिसे इधरउधर ठोकर खानी पड़ रही है. बहुत प्रयास किया था उस ने पत्नी को समझाने का.

‘अगर तुम मेरे रंग में नहीं रंग जाते तो मुझ से यह उम्मीद मत करो कि मैं तुम्हारे रंग में रंग जाऊं. सच तो यह है कि तुम एक स्वार्थी इंसान हो. सदा अपना ही चाहा करते हो. अरे जो इंसान अपनी मिट्टी का नहीं हुआ वह पराई मिट्टी का क्या होगा. मुझ से शादी करते समय क्या तुम्हें एहसास नहीं था कि हमारे व तुम्हारे रिवाजों और संस्कृति में जमीनआसमान का अंतर है?’

अंगरेजी में दिया गया पत्नी का उत्तर उसे जगाने को पर्याप्त था. अपने परिवार से बेहद प्यार करने वाला सोम बस यही तो चाहता था कि उस की पत्नी, बस, उसी से प्रेम करे, किसी और से नहीं. इस में उस का स्वार्थ कहां था? प्यार करना और सिर्फ अपनी ही बना कर रखना स्वार्थ है क्या?

स्वार्थ का नया ही अर्थ सामने चला आया था. आज सोचता है सच ही तो है, स्वार्थी ही तो है वह. जो इंसान अपनी जड़ों से कट जाता है उस का यही हाल होना चाहिए. उस की पत्नी कम से कम अपने परिवेश की तो हुई. जो उस ने बचपन से सीखा कम से कम उसे तो निभा रही है और एक वह स्वयं है, धोबी का कुत्ता, घर का न घाट का. न अपनों से प्यार निभा पाया और न ही पराए ही उस के हुए. जीवन आगे बढ़ गया. उसे लगता था वह सब से आगे बढ़ कर सब को ठेंगा दिखा सकता है. मगर आज ऐसा लग रहा है कि सभी उसी को ठेंगा दिखा रहेहैं. आज हंसी आ रही है उसे स्वयं पर. पुन: उसी स्थान पर चला आया है जहां आज से 10 साल पहले खड़ा था. एक शून्य पसर गया है उस के जीवन में भी और मन में भी.

शाम होते ही दम घुटने लगा, चुपचाप छत पर चला आया. जरा सी ताजी हवा तो मिले. कुछ तो नया भाव जागे जिसे देख पुरानी पीड़ा कम हो. अब जीना तो है उसे, इतना कायर भी नहीं है जो डर जाए. प्रकृति ने कुछ नया तो किया नहीं, मात्र जिस राह पर चला था उसी की मंजिल ही तो दिखाई है. दिल्ली की गाड़ी में बैठा था तो कश्मीर कैसे पहुंचता. वहीं तो पहुंचा है जहां उसे पहुंचना चाहिए था.

छत पर कोने में बने स्टोररूम का दरवाजा खोला सोम ने. उस के अभाव में मांबाबूजी ने कितनाकुछ उस में सहेज रखा है. जिस की जरूरत है, जिस की नहीं है सभी साथसाथ. सफाई करने की सोची सोम ने. अच्छाभला हवादार कमरा बरबाद हो रहा है. शायद सालभर पहले नीचे नई अलमारी बनवाई गई थी जिस से लकड़ी के चौकोर तिकोने, ढेर सारे टुकड़े भी बोरी में पड़े हैं. कैसी विचित्र मनोवृत्ति है न मुनष्य की, सब सहेजने की आदत से कभी छूट ही नहीं पाता. शायद कल काम आएगा और कल का ही पता नहीं होता कि आएगा या नहीं और अगर आएगा तो कैसे आएगा.

4 दिन बीत गए. आज दीवाली है. सोम के ही घर जा पहुंचा अजय. सोम से पहले वही चला आया, सुबहसुबह. उस के बाद दुकान पर भी तो जाना है उसे. चाची ने बताया वह 4 दिन से छत पर बने कमरे को संवारने में लगा है.

‘‘कहां हो, सोम?’’

चौंक उठा था सोम अजय के स्वर पर. उस ने तो सोचा था वही जाएगा अजय के घर सब से पहले.

‘‘क्या कर रहे हो, बाहर तो आओ, भाई?’’

आज भी अजय उस से प्यार करता है, यह सोच आशा की जरा सी किरण फूटी सोम के मन में. कुछ ही सही, ज्यादा न सही.

‘‘कैसे हो, सोम?’’ परदा उठा कर अंदर आया अजय और सोम को अपने हाथ रोकने पड़े. उस दिन जब दुकान पर मिले थे तब इतनी भीड़ थी दोनों के आसपास कि ढंग से मिल नहीं पाए थे.

‘‘क्या कर रहे हो भाई, यह क्या बना रहे हो?’’ पास आ गया अजय. 10 साल का फासला था दोनों के बीच. और यह फासला अजय का पैदा किया हुआ नहीं था. सोम ही जिम्मेदार था इस फासले का. बड़ी तल्लीनता से कुछ बना रहा था सोम जिस पर अजय ने नजर डाली.

‘‘चाची ने बताया, तुम परेशान से रहते हो. वहां सब ठीक तो है न? भाभी, तुम्हारा बेटा…उन्हें साथ क्यों नहीं लाए? मैं तो डर रहा था कहीं वापस ही न जा चुके हो? दुकान पर बहुत काम था.’’

‘‘काम था फिर भी समय निकाला तुम ने. मुझ से हजारगुना अच्छे हो तुम अजय, जो मिलने तो आए.’’

‘‘अरे, कैसी बात कर रहे हो, यार,’’ अजय ने लपक कर गले लगाया तो सहसा पीड़ा का बांध सारे किनारे लांघ गया.

‘‘उस दिन तुम कब चले गए, मुझे पता ही नहीं चला. नाराज हो क्या, सोम? गलती हो गई मेरे भाई. चाची के पास तो आताजाता रहता हूं मैं. तुम्हारी खबर रहती है मुझे यार.’’

अजय की छाती से लगा था सोम और उस की बांहों की जकड़न कुछकुछ समझा रही थी उसे. कुछ अनकहा जो बिना कहे ही उस की समझ में आने लगा. उस की बांहों को सहला रहा था अजय, ‘‘वहां सब ठीक तो है न, तुम खुश तो हो न, भाभी और तुम्हारा बेटा तो सकुशल हैं न?’’

रोने लगा सोम. मानो अभीअभी दोनों रिश्तों का दाहसंस्कार कर के आया हो. सारी वेदना, सारा अवसाद बह गया मित्र की गोद में समा कर. कुछ बताया उसे, बाकी वह स्वयं ही समझ गया.

‘‘सब समाप्त हो गया है, अजय. मैं खाली हाथ लौट आया. वहीं खड़ा हूं जहां आज से 10 साल पहले खड़ा था.’’

अवाक् रह गया अजय, बिलकुल वैसा जैसा 10 साल पहले खड़ा रह गया था तब जब सोम खुशीखुशी उसे हाथ हिलाता हुआ चला गया था. फर्क सिर्फ इतना सा…तब भी उस का भविष्य अनजाना था और अब जब भविष्य एक बार फिर से प्रश्नचिह्न लिए है अपने माथे पर. तब और अब न तब निश्चित थे और न ही आज. हां, तब देश पराया था लेकिन आज अपना है.

जब भविष्य अंधेरा हो तो इंसान मुड़मुड़ कर देखने लगता है कि शायद अतीत में ही कुछ रोशनी हो, उजाला शायद बीते हुए कल में ही हो.

मेज पर लकड़ी के टुकड़े जोड़ कर बहुत सुंदर घर का मौडल बना रहा सोम उसे आखिरी टच दे रहा था, जब सहसा अजय चला आया था उसे सुखद आश्चर्य देने. भीगी आंखों से अजय ने सुंदर घर के नन्हे रूप को निहारा. विषय को बदलना चाहा, आज त्योहार है रोनाधोना क्यों? फीका सा मुसकरा दिया, ‘‘यह घर किस का है? बहुत प्यारा है. ऐसा लग रहा है अभी बोल उठेगा.’’

‘‘तुम्हें पसंद आया?’’

‘‘हां, बचपन में ऐसे घर बनाना मुझे बहुत अच्छा लगता था.’’

‘‘मुझे याद था, इसीलिए तो बनाया है तुम्हारे लिए.’’

झिलमिल आंखों में नन्हे दिए जगमगाने लगे. आस है मन में, अपनों का साथ मिलेगा उसे.

सोम सोचा करता था पीछे मुड़ कर देखना ही क्यों जब वापस आना ही नहीं. जिस गली जाना नहीं उस गली का रास्ता भी क्यों पूछना. नहीं पता था प्रकृति स्वयं वह गली दिखा देती है जिसे हम नकार देते हैं. अपनी गलियां अपनी होती हैं, अजय. इन से मुंह मोड़ा था न मैं ने, आज शर्म आ रही है कि मैं किस अधिकार से चला आया हूं वापस.

आगे बढ़ कर फिर सोम को गले लगा लिया अजय ने. एक थपकी दी, ‘कोई बात नहीं. आगे की सुधि लो. सब अच्छा होगा. हम सब हैं न यहां, देख लेंगे.’

बिना कुछ कहे अजय का आश्वासन सोम के मन तक पहुंच गया. हलका हो गया तनमन. आत्मग्लानि बड़ी तीव्रता से कचोटने लगी. अपने ही भाव याद आने लगे उसे, ‘जिस गली जाना नहीं उधर देखना भी क्यों.

Hindi Fictional Story

Moral Story: सास बिना ससुराल, बहू हुई बेहाल

Moral Story: बचपन में एक लोक गीत ‘यह सास जंगल घास, मुझ को नहीं सुहाती है, जो मेरी लगती अम्मां, सैयां की गलती सासू मुझ को वही सुहाती है…’ सुन कर सोचा शायद सास के जुल्म से तंग आ कर किसी दुखी नारी के दिल से यह आवाज निकली होगी. कालेज में पढ़ने लगी तो किसी सीनियर को कहते हुए सुना, ‘ससुराल से नहीं, सास से डर लगता है.’ यह सब देखसुन कर मुझे तो ‘सास’ नामक प्राणी से ही भय हो गया था. मैं ने घर में ऐलान कर दिया था कि पति चाहे कम कमाने वाला मिले मंजूर है, पर ससुराल में सास नहीं होनी चाहिए. अनुभवी दादी ने मुझे समझाने की कोशिश की कि बेटी सुखी जिंदगी के लिए सास का होना बहुत जरूरी होता है, पर मम्मी ने धीरे से बुदबुदाया कि चल मेरी न सही तेरी मुराद तो पूरी हो जाए.

शायद भगवान ने तरस खा कर मेरी सुन ली. ग्रैजुएशन की पढ़ाई खत्म होते ही मैं सासविहीन ससुराल के लिए खुशीखुशी विदा कर दी गई. विदाई के वक्त सारी सहेलियां मुझे बधाई दे रही थीं. यह कहते हुए कि हाय कितनी लकी है तू जो ससुराल में कोई झमेला ही नहीं, राज करेगी राज.

लेकिन वास्तविक जिंदगी में ऐसी बात नहीं होती है. सास यानी पति की प्यारी और तेजतर्रार मां का होना एक शादीशुदा स्त्री की जिंदगी में बहुत माने रखता है, इस का एहसास सब से पहले मुझे तब हुआ जब मैं ने ससुराल में पहला कदम रखा. न कोई ताना, न कोई गाना, न कोई सवाल और न ही कोई बवाल बस ऐंट्री हो गई मेरी, बिना किसी झटके के. सच पूछो तो कुछ मजा नहीं आया, क्योंकि सास से मिले ‘वैल्कम तानों’ के प्लाट पर ही तो बहुएं भावी जीवन की बिल्डिंग तैयार करती हैं, जिस में सासूमां की शिकायत कर सहानुभूति बटोरना, नयनों से नीर बहा पति को ब्लैकमेल करना, देवरननद को उन की मां के खिलाफ भड़काना, ससुरजी की लाडली बन कर सास को जलाना जैसे कई झरोखे खोल कर ही तो जिंदगी में ताजा हवा के मजे लिए जा सकते हैं.

क्या कहूं और किस से कहूं अपना दुखड़ा. अगले दिन से ही पूरा घर संभालने की जिम्मेदारी अपनेआप मेरे गले पड़ गई. ससुरजी ने चुपचाप चाभियों को गुच्छा थमा दिया मुझे. सखियो, वही चाभियों का गुच्छा, जिसे पाने के लिए टीवी सीरियल्स में बहुओं को न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. कहते हैं न कि मुफ्त में मिली चीज की कोई कद्र नहीं होती. बिलकुल ठीक बात है, मेरे लिए भी उस गुच्छे को कमर में लटका कर इतराने का कोई क्रेज नहीं रहा. आखिर कोई देख कर कुढ़ने वाली भी तो होनी चाहिए.

मन निराशा से भर उठता है कभीकभी तो. गुस्से और झल्लाहट में कभी बेस्वाद खाना बना दिया या किसी को कुछ उलटापुलटा बोल दिया, तो भी कोईर् प्रतिक्रिया या मीनमेख निकालने वाला नहीं है इस घर में. कोई लड़ाईझगड़ा या मनमुटाव नहीं. अब आप सब सोचो किसी भी खेल को खेलने में मजा तो तब आता है जब खेल में द्वंद्वी और प्रतिद्वंद्वी दोनों बराबरी के भागीदार हों. एकतरफा प्रयास किस काम का? अब तो लगने लगा है लाइफ में कोई चुनौती नहीं रही. बस बोरियत ही बोरियत.

एक बार महल्ले की किसी महान नारी को यह कहते सुना था कि टीवी में सासबहू धारावाहिक देखने का अलग ही आकर्षण है. सासबहू के नित्य नए दांवपेच देखना, सीखना और एकदूसरे पर व्यवहार में लाना सचमुच जिंदगी में रोमांच भर देता है. उन की बातों से प्रभावित हो कर मैं ने भी सासबहू वाला धारावाहिक देखना शुरू कर दिया. साजिश का एक से बढ़ कर एक आइडिया देख कर जोश से भर उठी मैं पर हाय री मेरी किस्मत आजमाइश करूं तो किस पर? बहुत गुस्सा आया अपनेआप पर. अपनी दादी की बात याद आने लगी मुझे. उन्होंने मुझे समझाने की कोशिश की थी कि बेटा सास एक ऐसा जीव है, जो बहू के जीवनरूपी स्वाद में चाटमसाले का भूमिका अदा करता है, जिस से पंगे ले कर ही जिंदगी जायकेदार बनाईर् जा सकती है. काश, उस समय दादी की बात मान ली होती तो मजबूरन दिल को यह न गाना पड़ता, ‘न कोई उमंग है, न कोई तरंग है, मेरी जिंदगी है क्या, सासू बिना बेरंग है…’

मायके जाने का भी दिल नहीं करता अब तो. क्या जाऊं, वहां बैठ कर बहनें मम्मी से जहां अपनीअपनी सास का बखान करती रहती हैं, मुझे मजबूरन मूक श्रोता बन कर सब की बातें सुननी पड़ती हैं. बड़ी दीदी बता रही थीं कि कैसे उन की सास ने एक दिन चाय में कम चीनी डालने पर टोका तो दूसरे दिन से किस तरह उन की चाय में डबल चीनी मिला कर उन्होंने उन का शुगर लैवल बढ़ा दिया. लो अब पीते रहो बिना चीनी की चाय जिंदगी भर. मूवी देखने की शौकीन दूसरी बहन ने कहा कि मैं ने तो अपनी सास को सिनेमाघर में मूवी देखने का चसका लगा दिया है. ससुरजी तो जाते नहीं हैं, तो एहसान जताते हुए मुझे ही उन के साथ जाना पड़ता है मूवी देखने. फिर बदले में उस दिन रात को खाना सासू अम्मां ही बनातीं सब के लिए तथा ससुरजी बच्चों का होमवर्क करवाते हैं. यह सब सुन कर मन में एक टीस सी उठती कि काश ऐसा सुनहरा मौका मुझे भी मिला होता.

अब कल की ही बात है. मैं किट्टी पार्टी में गई थी. सारी सहेलियां गपशप में व्यस्त थीं. बात फिल्म, फैशन, स्टाइल से शुरू हो कर अंतत: पति, बच्चों और सास पर आ टिकी. 4 वर्षीय बेटे की मां मीनल ने कहा, ‘‘भई मैं ने तो मम्मीजी (सास) से ऐक्सचेंज कर लिया है बेटों का. अब उन के बेटे को मैं संभालती हूं और मेरे बेटे को मम्मीजी,’’ सुन कर कुढ़ गई मैं.

सुमिता ने मेरी तरफ तिरछी नजर से देखते हुए मुझे सुनाते हुए कहा, ‘‘सुबह पति और ससुरजी के सामने मैं अपनी सास को अदरक और दूध वाली अच्छी चाय बना कर दे देती हूं फिर उन के औफिस जाने के बाद से घर के कई छिटपुट कार्य जैसे सब्जी काटना, आटा गूंधना, चटनी बनाना, बच्चों को संभालने में दिन भर इतना व्यस्त रखती हूं कि उन्हें फुरसत ही नहीं मिलती कि मुझ में कमी निकाल सकें. शाम को फिर सब के साथ गरमगरम चाय और नमकीन पेश कर देती हूं बस.’’

उस के इतना कहते ही एक जोरदार ठहाका लगाया सारी सखियों ने.

बात खास सहेलियों की कि जाए तो पता चला कि सब ने मिल कर व्हाट्सऐप पर एक गु्रप बना रखा है, जिस का नाम है- ‘सासूमां’ जहां सास की खट्टीतीखी बातें और उन्हें परास्त करने के तरीके (मैसेज) एकदूसरे को सैंड किए जाते हैं, जिस से बहुओं के दिल और दिमाग में दिन भर ताजगी बनी रहती है, पर मुझ जैसी नारी को उस गु्रप से भी दूर रखा गया है अछूत की तरह. पूछने पर कहती हैं कि गु्रप का मैंबर बनने के लिए एक अदद सास का होना बहुत जरूरी है. मजबूरन मनमसोस कर रह जाना पड़ा मुझे.

अपनी की गई गलती पर पछता रही हूं मैं, मुझे यह अनुभव हो चुका है कि सास गले की फांस नहीं, बल्कि बहू की सांस होती है. बात समझ में आ गई मुझे कि सासबहू दोनों का चोलीदामन का साथ होता है. दोनों एकदूसरे के बिना अधूरी और अपूर्ण हैं. कभीकभी दिल मचलता है कि काश मेरे पास भी एक तेजतर्रार, दबंग और भड़कीली सी सास होती पर ससुरजी की अवस्था देख कर यह कहने में संकोच हो रहा है कि पापा एक बार फिर घोड़ी पर चढ़ने की हिम्मत क्यों नहीं करते आप?

नई लड़कियों और अविवाहित सखियो, मेरा विचार बदल चुका है. अब दिल की जगह दिमाग से सोचने लगी हूं मैं कि पति चाहे कम कमाने वाला हो पर ससुराल में एक अदद सास जरूर होनी चाहिए. जय सासूमां की.

Moral Story

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