जैसे को तैसा: भाग 1- भावना लड़को को अपने जाल में क्यों फंसाती थी

‘‘अमन,कहां हो तुम? बाय द वे जहां भी हो, मुझे आ कर मिलो अभी, इसी वक्त,’’ फोन पर और्डर देते हुए भावना बोली.

मगर अमन ने यह कहते हुए आने से मना कर दिया कि उस के घर पर कुछ मेहमान आने वाले हैं, तो वह अभी उस से मिलने नहीं आ सकता है.

‘‘ओके… फिर मैं ही आ जाती हूं तुम्हारे घर.’’

‘‘नहीं… तुम यहां मत आना, प्लीज,’’

अमन ने रिक्वैस्ट की, ‘‘ठीक है मैं ही आता हूं.’’

‘‘यह हुई न बात,’’ अपना मुंह गोल कर भावना ने फोन पर ही अमन को बड़ा सा चुम्मा दिया और यह कह कर फोन रख दिया कि उसे इंतजार करना जरा भी नहीं पसंद, इसलिए वह जल्दी आ जाए.

अब अमन को सम   झ नहीं आ रहा था कि वह घर से निकले तो कैसे क्योंकि अगर उस की मां छाया पूछेंगी कि वह कहां जा रहा है तो क्या बहाना बनाएगा? लेकिन जाना तो पड़ेगा वरना उस भावना का कोई भरोसा नहीं कि यहां पहुंच जाए. अपने मन में सोच अमन उठ खड़ा हुआ.

‘‘मां, एक जरूरी काम है, बस थोड़ी देर में आता हूं,’’ बोल कर अमित घर से निकलने ही लगा कि छाया ने उसे रोका, ‘‘पर जा कहां रहा है? अरे, घर पर मेहमान आने वाले हैं और तुम…’’

‘‘हां मां, पता है मु   झे. लेकिन मैं बस थोड़ी देर में आता हूं,’’    झल्लाता सा अमन घर से निकल गया. छाया कुछ और पूछतीं उस से पहले वह गाड़ी स्टार्ट कर पलभर में ओ   झल हो गया.

दरअसल, आज शाम रागिनी अमन की मंगेतर के भैयाभाभी अमन से मिलने उस के घर आने वाले हैं. वे लोग चाहते हैं कि अगर हफ्ता 10 दिनों में ही अमन और रागिनी की शादी हो जाए, तो बहुत अच्छा रहेगा. रागिनी का भाई राकेश गूगल कंपनी में सीओओ है और वे अपने परिवार सहित यहां इंडिया आए हुए हैं. राकेश की सास की हार्ट सर्जरी हुई है इसलिए वे लोग उन्हें देखने आए थे. चूंकि राकेश की पत्नी अपने मातापिता की एकलौती संतान है, इसलिए अपने मातापिता की सारी जिम्मेदारी उन की ही है. इंडिया आने के लिए राकेश को बड़ी मुश्किल से महीनेभर की छुट्टी मिल पाई थी, इसलिए अब वह सोच रहा है कि अगर रागिनी और अमन की शादी इधर ही हो जाए, तो फिर उन्हें तुरंत छुट्टी ले कर यहां नहीं आना पड़ेगा और उन का समय और पैसा दोनों बच जाएंगे.

वैसे सोच तो वे ठीक ही रहे थे क्योंकि उतनी दूर 7 समंदर पार से जल्दीजल्दी छुट्टी ले कर आना कोई बच्चों का खेल थोड़े ही है. आनेजाने में पैसे भी बहुत खर्च हो जाते हैं और बच्चों की पढ़ाई भी रुकती है. लेकिन राकेश का आना व्यर्थ ही गया क्योंकि अमन से उस की भेंट ही नहीं हो पाई. छाया ने कई बार उसे फोन भी लगाया यह पूछने के लिए कि वह कब आ रहा है. लेकिन अमन का फोन नहीं लग रहा था, इसलिए हार कर वे लोग वापस चले गए. रागिनी छाया की सब से प्रिय सहेली की बेटी है. 2 साल पहले ही वह अमेरिका से कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स कर के लौटी है. अभी वह दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में बहुत ही अच्छे पैकेज पर जौब कर रही है.

पिछले साल ही एक शादी समारोह में रागिनी और अमन की मुलाकात हुई थी जो धीरेधीरे प्यार में बदल गई. लड़की जानीपहचानी, पढ़ीलिखी और सुंदर है और सब से बड़ी बात कि दोनों एकदूसरे को पसंद करते हैं, यह सोच कर दोनों परिवारों ने भी इस रिश्ते को मंजूरी दे दी और कुछ मेहमानों की मौजूदगी में दोनों की सगाई कर दी गई. लेकिन शादी की डेट 6 महीने बाद का पड़ा क्योंकि अमन ऐसा चाहता था. इसलिए राकेश अमन से बात करना चाह रहा था. मगर बात ही नहीं हो पाई.

मेहमानों के जाने के बाद भी छाया ने अमन को कई बार फोन लगाया. लेकिन हर बार उस का फोन ‘आउट औफ कवरेज’ ही बता रहा था. छाया को परेशान देख कर ब्रजकिशोर अमन के पापा ने कहा भी कि हो सकता उस का फोन डिस्चार्ज हो गया होगा, इसलिए नहीं लग रहा होगा. लेकिन छाया इस बात से परेशान थी कि थोड़ी देर का बोल कर गया यह लड़का घंटों से कहां गायब है? कहीं वह किसी मुसीबत में तो नहीं फंस गया.

छाया को काफी परेशान देख कर ब्रजकिशोर ने फिर सम   झाया कि बेकार में चिंता करने से क्या होगा? होगा कोई जरूरी काम. आ जाएगा न.  लेकिन छाया कैसे कहे अपने पति से कि ऐसा अकसर ही हो रहा है. रात देखता है न दिन… किसी का फोन आते ही दौड़ पड़ता है एकदम से. और फोन आने पर वह इतना घबरा क्यों जाता है? एक मां अपने बच्चे की हर सांस को पहचानती है, तो क्या अमन की आंखों का डर उसे नहीं सम   झ में आएगा? लेकिन पूछने पर वह कुछ बताता भी तो नहीं है न. या हो सकता है

उस के औफिस में कोई टैंशन हो और उस के बौस का फोन आया हो? नहींनहीं, ऐसा कैसे हो सकता है क्योंकि अभी परसों ही तो उस के बौस से छाया की मुलाकात हुई थी. वे तो अमन की कितनी बढ़ाई करने लगे कि अमन बहुत ही मेहनती लड़का है. फिर किस बात की टैंशन है उसे? खुद से ही सवालजवाब करती हुई छाया ने अभी अपनी आंखें    झपकाई ही कि कौल बज उठी. अमन ही था.

रात के करीब साढ़े 11 बजे अमन को घर आया देख कर छाया का पारा 7वें आसमान पर चढ़ गया. अब गुस्सा तो आएगा ही न, मेहमान आ कर चले गए और यह लड़का अब आ रहा है. क्या सोच रहे होंगे वे लोग कि कितना लापरवाह लड़का है. छाया ने तो किसी तरह कोई बहाना बना कर उन्हें सम   झा दिया कि अचानक से अमन के औफिस से फोन आ गया इसलिए जाना पड़ा, आता ही होगा बस. मगर इस लड़के ने तो हद ही कर दी. बस आता हूं, कह कर घंटों बाद लौटा है. आखिर गया कहां था? कुछ बताता भी तो नहीं है.

‘‘आखिर चल क्या रहा है तुम्हारे दिमाग में?’’ गुस्से से नाक फुलाती जब छाया ने सवाल किया तो अमन यह बोल कर अपने कमरे में

चला गया कि वह बहुत थक गया है, सुबह बात करेगा. यह भी नहीं पूछा उस ने कि रागिनी के भाईभाभी आए थे तो क्या बातें हुईं या उस के बारे में क्या कुछ पूछ रहे थे वे लोग? बस आया और सीधे अपने कमरे में चला गया. खाना भी तो नहीं खाया उस ने.

‘‘देख, अगर तेरे दिल में कोई बात है तो अभी बता दे. मेरे कहने का मतलब है अगर

तुम्हें कोई और लड़की पसंद आ गई हो तो बोल दे, मैं मना कर दूंगी उन्हें,’’ छाया ने स्पष्ट शब्दों में बोला.

‘‘आप बेकार में क्यों मेरा दिमाग खा रही हो मां,’’ अमन    झल्लाया सा बोला, ‘‘क्या चाहती हैं आप बोलिए न? अरे, कोई जरूरी काम आ पड़ा था इसलिए चला गया न तो इस में कौन सी बड़ी आफत आ गई जो आप इतना सुना रही हैं?’’

अमन के तेवर देख छाया हैरान रह गई क्योंकि पहले कभी उस ने अपनी मां से इस तरह से बात नहीं की थी.

‘‘प्लीज, आप जाइए यहां से, मु   झे सोने दीजिए,’’ कह कर अमन ने लाइट औफ कर दी. छाया कुछ पल वहीं खड़ी रही, फिर कमरे से बाहर निकल कर सोचने लगी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अमन को कोई दूसरी लड़की पसंद आ गई हो और अब वह रागिनी से शादी नहीं करना चाहता है? नहींनहीं, अगर ऐसा होता, तो वह सगाई ही क्यों करता रागिनी के साथ. मैं भी न बेकार में उलटासीधा सोचने लगती हूं. हो सकता है इसे औफिस की ही कोई टैंशन हो. अपने खुले बालों को मुट्ठी में लपेट कर जूड़ा बनाते हुए छाया ने पलट कर देखा, तो अमन दीवार की तरफ मुंह किए सो रहा था. इसलिए वह धीरे से दरवाजा बंद कर वहां से चली आई.

अपनी मां से इस तरह बात करना अमन को जरा भी अच्छा नहीं लगा. लेकिन वह भी क्या करे क्योंकि वह अपनी मां से    झूठ नहीं बोल सकता था और छाया सच सुन नहीं पाती. इसलिए उसे अपनी मां से ऐसे रूखे स्वर में बात करनी पड़ी ताकि वह बारबार उस से सवाल न करे. रागिनी को भी उस ने फोन पर ऐसे ही दोटूक शब्दों में जवाब दे कर चुप करा दिया था कि अभी उन की शादी नहीं हुई है, जो वह उस पर इतना हक जता रही है. रागिनी को अमन की बात का बुरा तो लगा था पर उस ने जताया नहीं. लेकिन अमन को यह भी नहीं हुआ कि वापस फोन कर उसे एक बार सौरी बोल दें. उलटे रागिनी ने ही उसे फोन कर हालचाल पूछा था.

रागिनी भले ही अमेरिका से पढ़लिख कर लौटी है और इतनी बड़ी कंपनी में जौब कर रही है, लेकिन उस में घमंड नाममात्र का भी नहीं है. ‘डाउन टू अर्थ’ है वह. उस की इसी अदा पर तो अमन फिदा हो गया था. रागिनी अमीरीगरीबी, जातिधर्म में कोई भेद नहीं करती है. वह तो सड़क पर भीख मांग रहे बच्चे को भी गोद में उठा कर दुलार करने लगती है. जब भी समय मिलता है वह अपनी मेड के बच्चों को बैठा कर पढ़ाती है. हर संडे वह ब्लाइंड्स बच्चों को भी पढ़ाने जाती है. जब उस की मेड का पति शराब पी कर उसे मारतापीटता था, तब रागिनी ने उसे ऐसी डांट लगाई थी कि उस ने अपनी पत्नी के साथ बदसलूकी करना छोड़ दिया.

रागिनी जबतब अपनी मेड की पैसों से

भी मदद करती रहती है. हालांकि उस की यह मदद सामान्य बात है. पर उसे यह सामाजिक सरोकार की भावना अपनी मां और दादी से विरासत में मिली है. वैसे बेतरतीब इंसान तो अमन भी नहीं है. वह भी लोगों की मदद करने में विश्वास रखता है और उस के इसी विश्वास का नतीजा है कि आज वह इतनी बड़ी मुसीबत में फंस चुका है.

भेडि़या: भाग 1- मीना और सीमा की खूबसूरती पर किसकी नजर थी

‘‘अरे, सुन. क्या नाम है तेरा?’’

‘‘चमेली,’’ पास से गुजरती स्त्री ने पलट कर देखा.

‘‘तेरा नाम जसोदा है न?’’ चमेली ने भी उसे पहचान लिया था.

दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकराईं.  जसोदा मतलब की बात पर आ गई, ‘‘वह मैं इसी हफ्ते 2 महीने के लिए गांव जाऊंगी. मेरे पास 3 कोठियों का काम है. तीनों में बरतन,    झाड़ूपोंछा और कपड़े धोने का काम करती हूं. पूरे 10 हजार का काम है. एक कोठी की डस्टिंग भी है. उस के 3 हजार अलग से हैं. बोल, काम पकड़ेगी?’’

‘‘यानी 13 हजार,’’ चमेली हिसाब लगा

रही थी.

‘‘सुन, 2 महीने बाद आ कर काम वापस ले लूंगी,’’ जसोदा बोली.

‘‘ठीक है, अपना नंबर दे दे. घर पहुंच कर बताती हूं. हां, कोठी वाली से कल बात करा देना.’’

दोनो ने नंबरों का आदानप्रदान किया. मोबाइल अपनेअपने ब्लाउज में घुसेड़े और उसी तरह मुसकराती हुई विपरीत दिशा में मुंड़ गईं.

चमेली सोचने लगी कि पिछली 2 कोठियां छोड़ कर नई कोठियां पकड़ने की बात तो वह  पहले से ही सोच रही थी. जिन कोठियों में काम कर रही है वे सभी घर से दूर पड़ती हैं. काफी पैदल चलना पड़ता है.

चमेली का गणित फिर चालू हो गया. कोठियों के काम से मिली तनखा में से 3 हजार का राशनपानी, 1 हजार    झुग्गी का किराया. अगले महीने गांव में देवर की शादी है. हजार तो भेजने ही पड़ेंगे. गांव वाले घर की छत भी पक्की करानी है. इस के लिए भी 3 हजार महीने का जमा करती हूं. यहां भी कौन से महल में रह रही है. यह तो ठेकेदार के हाथपैर जोड़े तो 15?15 की जगह दे दी. मीना और सीमा 2 बेटियां हैं. लड़कियां बड़ी हो रही हैं. कोने की    झुग्गी है डर लगा रहता है… फिर भी कुछ तो है.

कैसा नसीब ले कर पैदा हुई है, चमेली… 15 साल पहले बसेसर का हाथ पकड़ कर यहां मुंबई आउटर पर आ गई थी. तब यह हाईवे के दोनों ओर जंगल ही जंगल था. जंगल काट कर कोई बहुत बड़ी बिल्डिंग बननी थी. बिल्डर ने 3-4 और भी ठेके ले लिए थे. सो बसेसर 10-12 साल ठेकेदार से जुड़ा रहा.

एक रोज बसेसर की टांग पर पत्थर गिर गया. पैर की हड्डी टूट गई. उस का काम छूट गया.

बेटे ने साफ कह दिया, ‘‘मैं ईंटगारे का काम कतई नहीं करूंगा.’’

पहले तो चमेली कुली का काम करती थी. पर तब बात और थी. बसेसर का काम छूटने पर  चमेली को भी काम छोड़ना पड़ा. ठेकेदार की नियत खराब थी.

चमेली जिन कोठियों में काम करने जाती है ज्यादातर कोठियों की छत बसेसर ने ही डाली है. पर खुद वह    झुग्गी में रहता है, जिस की दीवारें तो हैं पर छत बल्लियों पर टिके तिरपाल की है. तेज आंधी में कई बार तिरपाल उड़ चुका है. जानती है यहां लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं. पर क्या करे? यहां सिर्फ एक ही लालच है लड़कियां पढ़ जाएंगी तो अच्छा घरवार मिल जाएगा. गांव चली गई तो रोटी के लाले पड़ जाएंगे. लड़कियां भी किसी काने, कुबड़े या बूढ़े के साथ बैठा दी जाएंगी. 10वीं कर लेंगी तो कोई न कोई कोठी वाली मेमसाब या साहब के औफिस में लग जाएंगी. लड़का भी ढंग का मिल जाएगा. बस इसी लालच में यहां पड़ी है.

अल सुबह बेटियों के साथ निकल जाती है. स्कूल में लड़कियों को छोड़ती हुई कोठियों की तरफ मुड़ जाती है. कोठियों कहें या कंकरीट का जंगल कहें. कभी मीलों तक घना जंगल था. जहां अब कोठियों है वहां कभी जंगली जानवरों का वास था. लेकिन प्रकृति की खूबसूरत संपदा को बड़ी बेरहमी से उखाड़ फेंका इन भूखे बिल्डरों ने. सिर्फ कुछ रुपयों की खातिर.

आज भी ऊंची इमारतों के पीछे खेत हैं और उन के पीछे घना जंगल है, जिस में आज भी जंगली जानवर खेत पार कर के कोठियों के पीछे लगे कंटीले तारों के पास या सर्विस लेन के आसपास देखे जाते हैं.

ये जानवर, पता नहीं क्या सोचते होंगे हम मनुष्यों के बारे में?

संभवतया सोचते होंगे कि कितना दुस्साहसी और निर्दयी है रे मनुष्य. किसी का रैनबसेरा उजाड़ कर अपने लिए घर बना लिया? लानत है ऐसी मानवता पर.

इन्हीं ऊंची इमारतों के पास लेबर बस्ती है. बस्ती में रहने वाले लोगों की संख्या जानते हैं कितनी होगी?

खेत पार बसे घने जंगल के जानवर जमा कोठियों और फ्लैटों में रहने वाले लोगों की संख्या में जोड़ लो और उस का 4 गुना कर दो. इतनी जनसंख्या है लेबर बस्ती की.

ज्यादातर फ्लैट और कोठियों खाली पड़ी हैं. जंगल में भी जानवर नहीं के बराबर रह गए हैं.

लेबर बस्ती में रहने वाले वही लोग हैं जिन्होंने अपने अन्नदाता के एक इशारे पर पूरी की पूरी प्राकृतिक संपदा को काटने में जरा देर नहीं लगाई और देखतेदेखते जमीन पर ऊंचेऊंचे टावर और कोठियों खड़ी कर दीं.

और अपने लिए? एक कमरे का मकान भी न जुटा सके. बस कच्ची सी    झुग्गी है जिस पर छत तो है नहीं. इसी में गरमी, सर्दी व बरसात सब बिताते हैं. छोडि़ए ये सब.

जरा इन कोठियों में    झांक कर देखें. कौन रहता है? क्या होता है यहां और कैसेकैसे लोग रहते हैं. कोठी नं 25. इस में वृद्ध पतिपत्नी रहते हैं. दोनों सारी सर्दी बालकनी में धूप सेंकते हैं.

घर के गेट पर नेम प्लेट लगी है ब्रिगेडियर अमन. इस जोड़े को धूप में बैठ कर चिल्ड बियर पीने का बहुत शौक है. कई बार पड़ोसी भी साथ देने और ठहाके लगाने आ जाते हैं. गरमियों में यही महफिल देर शाम को शुरू हो कर देर रात तक चलती है. कभीकभी 40 नंबर वाले कर्नल रमन भी साथ देने आ जाते हैं.

कर्नल और ब्रिगेडियर दोनों कई साल तक एक ही यूनिट में साथसाथ थे. हां, रिटायर भी एकसाथ हुए. दोनों के बच्चे कैलिफोर्निया में रहते हैं. बच्चे 2-3 सालों में बूढ़े मांबाप पर    झूठे प्यार की बारिश करने चले आते हैं.

ब्रिगेडियर के घर में 2 आया, 1 खानसामा, 2 लैब्रेडोर कुत्ते और एक भूरी आंखों वाली बिल्ली है. सब के ऊपर लंबी नुकीली मूंछों वाला मुस्तैद नेपाली चौकीदार है यानी घर में 2 लोगों की देखभाल के लिए 6 जीव?

26 नंबर कोठी खाली है. 27 नंबर में सान्याल रहतीं. तलाकशुदा है. घर में इवेंट्स और्गेनाइज करती है.

28 नंबर की शीला सान्याल के साथ बियर पीती है. साथ में दोनों मिल कर किट्टी पार्टी, ताश पार्टी बगैरा भी और्गेनाइज करती हैं. दोनों का गुजारा चल जाता है.

चमेली अब तक इन घरों में काम नहीं करती. हां जसोदा जा रही है तो 2 महीनों के लिए तो ये घर उसे मिलेंगे ही.

चमेली को सान्याल का काम इसलिए भी आकृष्ट कर रहा है क्योंकि सान्याल हर शनिवार को पार्टी रखती है. पार्टी बेशक देर रात तक चलती हो पर जानती है कमाई अच्छीखासी होती है. हर हफ्ते हजार रुपए कमाई.

चमेली खुश है. हिसाब बराबर है. जसोदा की दोनों कोठियों के काम को हां कर देगी. घर पहुंचते ही जसोदा को ‘हां’ कह दी.

हेल्दी टिफिन हेल्दी किड्स कॉम्पटीशन

हेल्दी टिफिन बच्चों को हेल्दी रखने में सहायक होते हैं. हालांकि खाने में स्वाद और स्वास्थ्य दोनों को संतुलित करना मुश्किल है. ये एक ऐसी समस्या है, जिसका मदर्स हमेशा से समाधान निकालने की कोशिश में लगी रहती हैं. टिफिन सिर्फ हेल्दी फूड सर्व करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसे साफ हेल्दी लंच बौक्स में परोसना भी जरूरी होता है. एंटी बैक्टीरियल एक्सो, सिर्फ सफाई नहीं करता, बल्कि गंदे बर्तनों पर 10 सेकंड में 700 पर्सेंट बढ़ने वाले बैक्टीरिया का खात्मा भी करता है और लंच बौक्स को साफ करके टिफिन बौक्स को भी हेल्दी बनाता है.

आइए आपको बताते हैं कुछ मजेदार रेसिपीज के बारे में…

  1. मटर टिक्की

4 आलुओं को मैश कर मैदामिला कर मिश्रण बना लें. अब पैन में तेल गरम कर हींग, जीरा, प्याज, अदरक भूनें. साथ ही इसमें उबले मटर, अमचूर पाउडर, गरम मसाला व नमक मिला कर अच्छी तरह से भूनें. आलू और मैदा वाले मिश्रण में थोड़ा सा नमक मिला कर चिकना गूंध लें. अब इसकी नीबू के आकार की लोइयां बना लें. फिर 1 लोई को हथेली पर रख कर फैलाएं. अब इस पर 1 बड़ा चम्मच मटर का मिश्रण रख कर बंद करके इसे टिक्की का आकार दें. इसी तरह सारी टिक्कियां बना लें. अब तवे पर तेल को गरम करके टिक्कियों को धीमी आंच पर सुनहरा होने तक सेंकें, मटर टिक्की तैयार है. इसे हरी चटनी, सौंठ और दही के साथ सर्व करें.

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2. टोफू टिक्का मसाला

ग्राम टोफू को टुकड़ों में काट लें. इसके बाद आधा कप शिमलामिर्च, 1 टमाटर और 1 प्याज को भी इसी तरह टुकड़ों में काट लें. अब 1 बाउल में थोड़ा दही, 1 हरीमिर्च का पेस्ट, 1 छोटा चम्मच अदरकलहसुन का पेस्ट, 1 बड़ा चम्मच भुना हुआ जीरा पाउडर, आधा छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर, एकचौथाई छोटा चम्मच चाटमसाला, 1 छोटा चम्मच नमक, थोड़ी सी कटी हुई धनियापत्ती और 1 बड़ा चम्मच के करीब औयल डालकर इसे अच्छे से मिक्स करें. अब इस मिश्रण में कटा टोफू, प्याज, टमाटर, शिमलामिर्च डालकर अच्छे से कोट करके इसे 2 घंटे के लिए फ्रिज में सैट होने के लिए रख दें. अब सभी टुकड़ों को स्किवर में लगा कर तेज आंच पर सेंकें और फि प्लेट में निकाल कर हरी चटनी के साथ गरमगरम सर्व करें.

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रेसिपी भेजने की अंतिम तिथि: 25 अक्टूबर 2023

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गांठ खुल गई- भाग 1 : क्या कभी जुड़ पाया गौतम का टूटा दिल

श्रेया से गौतम की मुलाकात सब से पहले कालेज में हुई थी. जिस दिन वह कालेज में दाखिला लेने गया था, उसी दिन वह भी दाखिला लेने आई थी.

वह जितनी सुंदर थी उस से कहीं अधिक स्मार्ट थी. पहली नजर में ही गौतम ने उसे अपना दिल दे दिया था.

गौतम टौपर था. इस के अलावा क्रिकेट भी अच्छा खेलता था. बड़ेबड़े क्लबों के साथ खेल चुका था. उस के व्यक्तित्व से कालेज की कई लड़कियां प्रभावित थीं. कुछ ने तो खुल कर मोहब्बत का इजहार तक कर दिया था.

उस ने किसी का भी प्यार स्वीकार नहीं किया था. करता भी कैसे? श्रेया जो उस के दिल में बसी हुई थी.

श्रेया भी उस से प्रभावित थी. सो, उस ने बगैर देर किए उस से ‘आई लव यू’ कह दिया.

वह कोलकाता के नामजद अमीर परिवार से थी. उस के पिता और भाई राजनीति में थे. उन के कई बिजनैस थे. दौलत की कोई कमी न थी.

गौतम के पिता पंसारी की दुकान चलाते थे. संपत्ति के नाम पर सिर्फ दुकान थी. जिस मकान में रहते थे, वह किराए का था. उन की एक बेटी भी थी. वह गौतम से छोटी थी.

अपनी हैसियत जानते हुए भी गौतम, श्रेया के साथ उस के ही रुपए पर उड़ान भरने लगा था. उस से विवाह करने का ख्वाब देखने लगा था.

कालांतर में दोनों ने आधुनिक रीति से तनमन से प्रेम प्रदर्शन किया. सैरसपाटे, मूवी, होटल कुछ भी उन से नहीं छूटा. मर्यादा की सारी सीमा बेहिचक लांघ गए थे.

2 वर्ष बीत गए तो गौतम ने महसूस किया कि श्रेया उस से दूर होती जा रही है. वह कालेज के ही दूसरे लड़के के साथ घूमने लगी थी. उसे बात करने का भी मौका नहीं देती थी.

बड़ी मुश्किल से एक दिन मौका मिला तो उस से कहा, ‘‘मुझे छोड़ कर गैरों के साथ क्यों घूमती हो? मुझ से शादी करने का इरादा नहीं है क्या?’’

श्रेया ने तपाक से जवाब दिया, ‘‘कभी कहा था कि तुम से शादी करूंगी?’’

वह तिलमिला गया. किसी तरह गुस्से को काबू में कर के बोला, ‘‘कहा तो नहीं था पर खुद सोचो कि हम दोनों में पतिपत्नी वाला रिश्ता बन चुका है तो शादी क्यों नहीं कर सकते हैं?’’

‘‘मैं ऐसा नहीं मानती कि किसी के साथ पतिपत्नी वाला रिश्ता बन जाए तो उसी से विवाह करना चाहिए.

‘‘मेरा मानना है कि संबंध किसी से भी बनाया जा सकता है, पर शादी अपने से बराबर वाले से ही करनी चाहिए. शादी में दोनों परिवारों के आर्थिक व सामाजिक रुतबे पर ध्यान देना अनिवार्य होता है.

‘‘तुम्हारे पास यह सब नहीं है. इसलिए शादी नहीं कर सकती. तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि अब मेरा पीछा करना बंद कर दो, नहीं तो अंजाम बुरा होगा.’’

श्रेया की बात गौतम को शूल की तरह चुभी. लेकिन उस ने समझदारी से काम लेते हुए उसे समझाने की कोशिश की पर वह नहीं मानी.

आखिरकार, उसे लगा कि श्रेया किसी के बहकावे में आ कर रिश्ता तोड़ना चाहती है. उस ने सोचा, ‘उस के घर वालों को सचाई बता दूंगा तो सब ठीक हो जाएगा. परिजनों के कहने पर उसे मुझ से विवाह करना ही होगा.’

एक दिन वह श्रेया के घर गया. उस के पिता व भाई को अपने और उस के बारे में सबकुछ बताया.

श्रेया अपने कमरे में थी. भाई ने बुलाया. वह आई. भाई ने गौतम की तरफ इंगित कर उस से पूछा, ‘‘इसे पहचानती हो?’’

श्रेया सबकुछ समझ गई. झट से अपने बचाव का रास्ता भी ढूंढ़ लिया. बगैर घबराए कहा, ‘‘यह मेरे कालेज में पढ़ता है. इसे मैं जरा भी पसंद नहीं करती. किंतु यह मेरे पीछे पड़ा रहता है. कहता है कि मुझ से शादी नहीं करोगी तो इस तरह बदनाम कर दूंगा कि मजबूर हो कर शादी करनी ही पड़ेगी.’’

वह कहता रहा कि श्रेया झूठ बोल रही है परंतु उस के भाई और पिता ने एक न सुनी. नौकरों से उस की इतनी पिटाई कराई कि अधमरा हो गया. पैरों की हड्डियां टूट गईं.

किसी पर किसी तरह का इलजाम न आए, इसलिए गौतम को अस्पताल में दाखिल करा दिया गया.

थाने में श्रेया द्वारा यह रिपोर्ट लिखा दी गई, ‘घर में अकेली थी. अचानक गौतम आया और मेरा रेप करने की कोशिश की. उसी समय घर के नौकर आ गए. उस की पिटाई कर मुझे बचा लिया.’

थाने से खबर पाते ही गौतम के पिता अस्पताल आ गए. गौतम को होश आया तो सारा सच बता दिया.

सिर पीटने के सिवा उस के पिता कर ही क्या सकते थे. श्रेया के परिवार से भिड़ने की हिम्मत नहीं थी.

उन्होंने गौतम को समझाया, ‘‘जो हुआ उसे भूल जाओ. अस्पताल से वापस आ कर पढ़ाई पर ध्यान लगाना. कोशिश करूंगा कि तुम पर जो मामला है, वापस ले लिया जाए.’’

उन्होंने सोर्ससिफारिश की तो श्रेया के पिता ने मामला वापस ले लिया.

अस्पताल में गौतम को 5 माह रहना पड़ा. वे 5 माह 5 युगों से भी लंबे थे. कैलेंडर की तारीखें एकएक कर के उस के सपनों के टूटने का पैगाम लाती रही थीं.

उसे कालेज से निकाल दिया गया तो दोस्तों ने भी किनारा कर लिया. महल्ले में भी वह बुरी तरह बदनाम हो चुका था. कोई उसे देखना नहीं चाहता था.

श्रेया के आरोप पर किसी को विश्वास नहीं हुआ तो वह थी इषिता. वह उसी कालेज में पढ़ती थी और गौतम की दोस्त थी. वह अस्पताल में उस से मिलने बराबर आती रही. उसे हर तरह से हौसला देती रही.

गौतम घर आ गया तो भी इषिता उस से मिलने घर आती रही. शरीर के घाव तो कुछ दिनों में भर गए पर आत्मसम्मान के कुचले जाने से उस का आत्मविश्वास टूट चुका था.

मन और आत्मविश्वास के घावों पर कोई औषधि काम नहीं कर रही थी. गौतम ने फैसला किया कि अब आगे नहीं पढ़ेगा.

परिजनों तथा शुभचिंतकों ने बहुत समझाया लेकिन वह फैसले से टस से मस

नहीं हुआ.

इस मामले में उस ने इषिता की भी नहीं सुनी. इषिता ने कहा था, ‘‘ पढ़ना नहीं चाहते हो तो कोई बात नहीं. क्रिकेट में ही कैरियर बनाओ.’’

‘‘मेरा आत्मविश्वास टूट चुका है. कुछ नहीं कर सकता. इसलिए मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो,’’ उस ने दोटूक जवाब दिया था.

वह दिनभर चुपचाप घर में पड़ा रहता था. घर के लोगों से भी ठीक से बात नहीं करता था. किसी रिश्तेदार या दोस्त के घर भी नहीं जाता था. हर समय चिंता में डूबा रहता.

अभिनेत्री दिलनाज़ ईरानी ने इंडस्ट्री के किस उठा-पटक की बात की, पढ़ें इंटरव्यू

हिंदी फिल्मों में अभिनय करने वाली खूबसूरत, समार्ट और हंसमुख एक्ट्रेस दिलनाज़ ईरानी मुंबई की है. उन्होंने मॉडलिंग और थिएटर से अभिनय की शुरुआत की. मुंबई से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन से आठवीं स्तर की परीक्षा भी पूरी की है. बॉलीवुड में आने से पहले उन्होंने चार साल तक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर भी काम किया है.

उन्हें बचपन से ही अभिनय का शौक था. उन्होंने स्कूल और कॉलेज में आयोजित नाटकों और मॉडलिंग में कई बार भाग लिया. फैशन पत्रिकाओं के लिए भी उन्होंने कई बार एक मॉडल के रूप में काम किया है. इसके अलावा उन्होंने एक म्यूजिक वीडियो और म्यूजिक शो में वीजे के रूप में भी काम किया है. असल जिंदगी में दिलनाज़ छोटे बाल रखती है और जींस टी शर्ट पहनती है.

दिलनाज़ ने बॉलीवुड में फिल्म ‘68 पेजेस’ से डेब्यू किया है. इसमें उन्होंने नेहा का किरदार निभाया था. फिल्म एचआईवी और एड्स के बारे में ज्ञान बढ़ाने के लिए थी. इस फिल्म का प्रीमियर केरल के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ था, जिसमे उनके अभिनय को काफी तारीफ मिली. इसके बाद उन्होंने फिल्म ‘जोधा अकबर’ में सपोर्टिंग एक्ट्रेस के रूप में अभिनय किया. फिल्मों के अलावा दिलनाज़ ने कुछ धारावाहिकों में भी काम किया है. उनकी एक तमिल वेब सीरीज ‘माथागम’ के बाद फिल्म ‘सुखी’ रिलीज हो चुकी है, जिसमे उन्होंने अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के साथ अभिनय किया है, उन्होंने अपनी जर्नी को खास गृहशोभा के साथ शेयर किया.

तमिल वेब शो ‘माथागम’ में दिलनाज़ ने एक यंग बंगाली पुलिस कमिश्नर शायन्तिका बिस्वास की भूमिका निभाई है, जो बहुत ही चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि मुंबई की दिलनाज़ को तमिल बोलना पड़ा. तमिल भाषा के साथ थोड़ी बांग्ला भी बोलना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने ससुराल वालों की सहयोग लिया,क्योंकि वे कोलकाता से है, इससे अभिनय में आसानी हुई. इसके अलावा तमिल भाषा के लिए उन्हें  कोच से तमिल सीखनी पड़ी. ये सीरीज कई भाषाओँ में है , लेकिन इसकी शूटिंग तमिल में हुई है. ये एक सच्ची कहानी पर आधारित वेब सीरीज है.

अभी उनकी फिल्म ‘सुखी’ भी चार दोस्तों की कहानी है, जो अपने परिवार और बच्चे के साथ इतनी व्यस्त हो जाती है कि उन्हें खुद के लिए वक़्त निकलना मुश्किल होता है. सेल्फ लव उनमें नहीं है. वह कहती है कि मैं इसमें एक कॉर्पोरेट वुमन की भूमिका निभा रही हूँ. इसमें सभी महिला दोस्त मिलकर आपस में एक नई जिंदगी जी रही है, जिसकी इच्छा उन्होंने कभी नहीं की है. ये रियलिटी है, महिलाओं की, जिसे बहुत ही सुंदर तरीके से दिखाने की कोशिश की गई है.

मिली प्रेरणा

दिलनाज़ आगे कहती है कि बचपन में कभी पुलिस ऑफिसर, तो कभी एस्ट्रोनोट्स, तो कभी फायरमैन आदि बनने की इच्छा होती थी, लेकिन एक दिन मैंने सोचा कि अगर मैं एक्टर बनूँ, तो इन सारी चीजो को अभिनय के माध्यम से कर सकती हूँ. मैंने एक्टिंग सीखी, और इस क्षेत्र में आई, लेकिन मैं स्टडी में भी काफी अच्छी थी. मेरी माँ टीचर रही है. मेरे परिवार को और मुझे इंडस्ट्री के बारें में जानकारी नहीं थी और इंडस्ट्री में स्टार किड्स को ही चांस मिलता है, ऐसे में मेरे पेरेंट्स ने मुझे इंडस्ट्री में काम करने को मुश्किल समझा और मेरे स्टडी को आगे बढाने की सलाह दी. मैंने वही किया और मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, लेकिन मैं शुरू से नाटकों में अभिनय किया करती थी, जिसमे बमन ईरानी, रजत कपूर आदि थे, उनके साथ काम करने का अवसर मिलता रहा. 16 साल की उम्र से मैंने प्रोफेशनल थिएटर करना शुरू कर दिया था.

मिला ब्रेक

एक्ट्रेस कहती है कि एक्टिंग मैंने कम उम्र से ही शुरू कर दिया था. डिग्री पूरी करने के बाद कैंपस प्लेसमेंट भी मिल गया, लेकिन अभिनय मेरा पैशन था. धीरे-धीरे टीवी पर छोटे -छोटे अभिनय मिलने लगे. मैं एक ग्लैडराग मॉडल होने की वजह से मॉडलिंग भी शुरू हो गई. फिर मैंने एक साल की छुट्टी जॉब से लेकर अभिनय में उतरी और अब ये 15 साल अभिनय में बीत गए है. मुझे अभी तक बड़ी ब्रेक नहीं मिली, लेकिन मुझे इंडस्ट्री के सभी जानते है, क्योंकि मैंने थिएटर, टीवी शोज और वेब सीरीज में काम किया है. फिल्म इंडस्ट्री वाले भी जोधा अकबर से पहचानने लगे थे. वेब सीरीज की वजह से लोग अधिक जानने लगे है.

मिला परिवार का सहयोग

दिलनाज़ के परिवार का सहयोग पहले नहीं था, बहुत कुछ उन्हें सुनने को मिला, क्योंकि वह एक अच्छी जॉब से एक साल की छुट्टी ले रही थी, पर बहुत अधिक मना उन्होंने नहीं किया, क्योंकि उन्हें लगा कि वह एक साल बाद फिर से जॉब पर आ जाउंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वह कहती है कि मेरे पति कइजात गडा कोलकाता के पारसी परिवार से है और एक म्यूजिक डायरेक्टर है. थिएटर के दौरान उनसे मुलाकात हुई, प्यार हुआ और शादी की.

किये संघर्ष

इंडस्ट्री में संघर्ष के बारें में पूछने पर दिलनाज़ कहती है कि रिजेक्शन आज भी होता है. डायरेक्टर के तीन से चार तरीके होते है, जिसमे उनसे मिलना, स्क्रिप्ट देखना और अपनी भूमिका को समझना, लेकिन कई बार सब कुछ सही होने के बाद भी रिजेक्शन होता है. आज भी ऑडिशन होते है, लुक टेस्ट वे करते है, लेकिन कई बार वे बताते भी नहीं है कि मेरा रिजेक्शन हुआ है. 15 से 20 साल बाद आज भी एक काम मिलना कठिन होता है. जब मैं न्यू कमर थी तो मुश्किलें और अधिक थी, एक एक्ट्रेस बनने के लिए बहुत स्ट्रोंग होना पड़ता है. एक्टिंग करना कठिन नहीं, लेकिन उसके साथ – साथ रिजेक्शन, फैल्यौर आदि को सम्हालना अधिक मुश्किल होता है. सालों की मेहनत के बाद भी कई बार फिल्म फ्लॉप हो जाती है. उस वक्त उसे स्वीकार करना पड़ता है.

इंटिमेट सीन्स करने में नहीं हर्ज़

दिलनाज़ का कहना है कि वेब सीरीज में इंटिमेट सीन्स को करने में मुझे कोई समस्या नहीं, कहानी में अगर उस बात की डिमांड है, तो मैं कर सकती हूँ. मजे के लिए गन्दी भाषा, सीन्स को डाल देना मुझे पसंद नहीं. मार्केटिंग के लिए वे कुछ भी वेब में डालने से परहेज नहीं करते और मुझे वो पसंद नहीं.

एक्टिंग के अलावा मुझे और कुछ पसंद नहीं, क्योंकि एक्टिंग से मैं अभी तक पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाई हूँ. एक बार कुछ बड़ा काम करने के बाद मैं कुछ दूसरा काम करने के बारें में सोच सकती हूँ. मैं हर नए चरित्र की जिंदगी में घुसना बहुत पसंद करती हूँ. किसी दूसरे की जिंदगी को जीने का थ्रिल मुझे अच्छा लगता है.

रियल लाइफ में दिलनाज़ एनर्जेटिक, उत्साही स्वभाव की है, लेकिन बहुत शाय नेचर की है. वह कहती है कि सेट पर काफी सारे लोग होने पर मैं शाय हो जाती हूँ. मेरा सपना है कि मैं हमेशा कुछ अच्छा काम करूँ, ताकि दर्शक मेरे अभिनय से प्रभावित हो सकें.

सम्हालना पड़ता है खुद को  

इंडस्ट्री की अच्छी बात का जिक्र करती हुई दिलनाज़ कहती है कि इंडस्ट्री जितना प्यार हमें देती है, वह किसी और इंडस्ट्री में संभव नहीं. यहाँ दर्शक का प्यार बहुत होता है, लेकिन वही इंडस्ट्री जब किसी को गिराती है तो एक सेकेण्ड में नीचे कर देती है, इसे काफी लोग सह नहीं पाते, जितनी ऊंचाई पर ये ले जा सकती है उतना ही नीचे ये गिरा भी सकती है.

महिलाओं से दिलनाज़ का कहना है कि आप खुद से प्यार अवश्य करें, तभी आप दूसरों से प्यार कर सकते है.

अभिनेत्री राइमा सेन से जाने उनकी खूबसूरती का राज, पढ़ें इंटरव्यू

हिंदी और बांग्ला फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्री मुनमुन सेन की बेटी राइमा सेन एक बहुत ही खुबसूरत, हंसमुख, शालीन और मृदुभाषी अभिनेत्री है. उनका चेहरा बंगाल की लिजेंड अभिनेत्री और उनकी नानी सुचित्रा सेन की तरह है, इसलिए उन्हें हमेशा शालीन और शांत भारतीय नारी की भूमिका ही फिल्मों या वेब सीरीज में मिला करती है, जिसे वह करना पसंद करती है.

फ़िल्मी माहौल में पली और बड़ी हुई राइमा सेन शुरू से अभिनय के अलावा कुछ दूसरा काम करने के बारें में नहीं सोचा था. 17 साल की उम्र में उन्होंने हिंदी फिल्म ‘गॉडमदर’ में काम शुरू किया था. उनका फ़िल्मी जीवन कमोवेश सफल रहा, लेकिन उनके निजी जीवन में सफलता नहीं मिली, उनका नाम व्यवसायी वरुण थापर, अभिनेता कुनाल कपूर और राजनेता कलिकेश नारायण सिंह देव के साथ जुड़े, पर उन्होंने किसी को भी अपना जीवन साथी न बनाकर, काम को अधिक महत्व दिया. उनकी हिंदी फिल्म ‘द वैक्सीन वार’ रिलीज हो चुकी है, उन्होंने अपनी जर्नी के बारें में ज़ूम पर बात की, पेश है कुछ खास अंश.

राइमा इस फिल्म को लेकर बहुत उत्साहित हूँ, क्योंकि बहुत दिनों बाद उन्होंने बड़े पर्दे के लिए काम किया है. इसमें पेंडेमिक के समय वैक्सीन की खोज को दिखाया गया है, जिसमें महिला वैज्ञानिकों की मेहनत, लगन और अचीवमेंट को सेलिब्रेट करने को प्रमुखता दी गई है. वह कहती है कि ये इंडिया की पहली बायो साइंस फिल्म है. मैंने इसमें एक साइंस जर्नालिस्ट की स्ट्रोंग भूमिका निभाई है. मैंने इस किरदार को ईमानदारी से निभाने की कोशिश की है.

साइंस जर्नालिस्ट की अभिनय के लिए राइमा ने कई तैयारियां की है. राइमा कहती है कि इस फिल्म में कई बड़े – बड़े आर्टिस्ट मेरे साथ काम कर रहे है, ऐसे में मेरी एक्टिंग सही हो, उसकी कोशिश की है. मैंने कई वर्कशॉप किये है, अभिनेत्री पल्लवी जोशी से कई टिप्स लिए है.

क्या ये फिल्म दर्शकों को हॉल तक ला पायेगी? राइमा कहती है कि कोविड के बाद से थिएटर हॉल में जाना लोगों में कमी आई है, लेकिन फिल्म का इम्पैक्ट ही दर्शकों को हॉल तक ला सकती है. बाकी फिल्म से अलग अगर कोई विषय हो, तो लोग अवश्य देखना पसंद करेंगे. मैं खुद भी किसी फिल्म को हॉल में देखने तब जाती हूँ , जब लोग उसकी काफी तारीफ करते है. नहीं तो मैं टीवी पर ही फिल्में देखती हूँ.

करती हूँ मेहनत  

एक्टिंग में रियलिटी को लाने के लिए राइमा बहुत मेहनत करती है. वह कहती है कि मैं खुद को लकी मानती हूँ, कि मुझे हमेशा अच्छे कलाकारों और निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला है. मैंने कभी एक्टिंग सीखा नहीं है. 17 साल की उम्र में जब मैं अभिनय करने आई थी, तो बंगाल में मेरे ऊपर बहुत बड़ा प्रेशर, तुलना, आशाएं बहुत थी. एक्टिंग के बारें में मुझे कुछ मालूम नहीं था, लेकिन मैंने बहुत मेहनत की है. मैंने ऑन द जॉब सब कुछ सीखा है, जिसमे मैंने हर निर्देशक और टीम की सभी से कुछ न कुछ सीखा है. उस समय मैं बहुत घबरा गयी थी, क्योंकि सुचित्रा सेन की नातिन और मेरी पहली फिल्म ‘गॉडमदर’ अभिनेत्री शबाना आज़मी के साथ थी, लोगों ने मुझे बहुत कुछ भला-बुरा कहा, लेकिन ‘चोखेर बाली’ फिल्म के बाद लोगों ने मुझे राइमा सेन नाम से माना.

अभिनय पहली पसंद

राइमा आगे कहती है कि अभिनय के अलावा मैं अभी कुछ नहीं कर रही हूँ. मैं पहले डांस सीखती थी, अब किताब पढ़ती हूँ, टीवी देखती हूँ. एक डॉग और परिवार के साथ रहती हूँ, अभी कई ऑफर्स है, इसलिए अभिनय पर अभी अधिक ध्यान दे रही हूँ. इसके अलावा खुद को अपडेट करने के लिए वर्कशॉप करती रहती हूँ. मैं मुंबई और कोलकाता दोनों जगहों पर रहती हूँ, मैं लॉकडाउन में पेरेंट्स के साथ रहती थी. कोविड ने सभी को रिलेशनशिप, लाइफ और डेथ के महत्व को समझाया है. अभी मैं कोलकाता में रहती हूँ और जरुरत के अनुसार मुंबई आती हूँ. कोविड से पहले लोग परिवार को छोड़कर पैसे और कैरियर के लिए कही भी चले जाते थे. लॉकडाउन के बाद से सबको समझ में आया है कि परिवार और स्वास्थ्य सबसे जरुरी है. मुझे अभी परिवार को छोड़कर अधिक दिनों तक कहीं जाने में भी डर लगता है.

परिवार की सीख

राइमा आगे कहती है कि मेरे पिता इंडस्ट्री से नहीं थे, उन्होंने कभी मुझे ये समझने नहीं दिया कि मैं सुचित्रा सेन की नातिन और मुनमुन सेन की बेटी हूँ. हमने एक साधारण जीवन जीया है, जिसमे जरुरत के अनुसार टैक्सी और ऑटों से भी सफ़र कर सकते है. उन्होंने हमें स्टार चिल्ड्रेन महसूस करने का मौका नहीं दिया. वह सीख मुझे मिली है. माँ का सहयोग हमेशा रहा है, उन्हें इंडस्ट्री के बारें में सारी जानकारियाँ है, जिसे वे शेयर करती रहती है, मेरे किसी काम की वह आलोचक भी माँ ही है.

खूबसूरती का राज

राइमा की खूबसूरती की राज के बारें में पूछने पर वह हंसती हुई कहती है कि इसमें मैं माता-पिता को धन्यवाद देती हूँ, उनकी जींस मुझे और मेरी बहन रिया को मिली है, किसी को कुछ लगाने की जरुरत नहीं. साधारण खान पान और नीद पूरी करने पर स्किन में चमक रहती है. खूबसूरती हमेशा अंदर से आती है और इसके लिए नियमित घरेलू खान – पान और वर्कआउट करना जरुरी होता है. इसके अलावा मैं बहुत फूडी हूँ, डाइट नहीं करती और हर तरह के व्यंजन खाती हूँ. इसलिए समय मिलने पर सप्ताह में 3 से 4 दिन जिम में अवश्य चली जाती हूँ.

इंडियन टैक्सटाइल को ग्राहकों की जरूरत

फैशन और उस की दुनिया हर साल बदलती रहती है और इसे आकार देते हैं डिजाइनर्स, जिस का लाभ विलुप्त होने वाली कला और छोटेछोटे कारीगरों को भी होता है. असम, गुजरात, बंगाल, राजस्थान आदि सभी राज्यों से अलगअलग कारीगरी की अद्भुत मिसाल देखने को मिल सकती है, जिस में खादी सिल्क, रा सिल्क, सूती आदि गरमी के हिसाब से पहने जाने वाली पोशाकें होती हैं. ऐथनिक पोशाकें जिन्हें डिजाइनर मोटिफ्स, कढ़ाई फ्लेयर्स के अलावा आधुनिक गहनों से गौर्जियस लुक दे रहे हैं अब भी लोकप्रिय हैं.

अधिकतर कपड़े स्थानीय पहनावे को देखते हुए पहने जाएं तो बदन को बहुत आराम मिलता है. आम महिलाएं इन्हें पहन कर सहज रहती हैं. आज की युवतियां पारंपरिक परिधान के साथ मौडर्न लुक को अधिक प्राथमिकता देती हैं. वे वस्त्रों की ऐस्थैटिक वैल्यू को देखते हुए कंफर्ट पर भी ध्यान देती हैं. गुजरात के कच्छ की शिल्पकारी भी बहुत उम्दा होती है, जिस में वहां का पारंपरिक क्राफ्ट आरी, मुक्को, नेरण, राबारी, सूफ आदि शामिल होता है.

लाजवाब खूबसूरती

असम की मेखला चादोर असम की खूबसूरती को दिखाते हुए असम सिल्क के बारे में लोग जानते हैं पर बहुत कम लोग ही असम सिल्क को अच्छी तरह पहचानते हैं. लोग एक तरह की डिजाइन को देख कर ऊब जाते हैं इसलिए हमेशा नया खोजते हैं. नई मोटिफ्स और डिजाइन से मेखला चादोर पर बहुत ऐक्सपैरीमैंट हो रहे हैं. कुछ पोशाक साड़ी की तरह दिखती हैं और उन्हें पहनना भी बहुत आसान है.

बड़ी चुनौती तो बुनकरों की होती है, जिन्हें बहुत कम पैसा मेखला बुनने के बाद मिलता है. इसलिए उन के परिवार के लोग इस काम से निकल कर नौकरी करने लगे हैं. मेखला हैंडलूम प्रोडक्ट है और 1 को बनाने में 35 से 40 दिन लगते हैं.

आकर्षक डिजाइन

बायोडीग्रेडेबल फाइबर और हैंडलूम के कपड़ों का प्रयोग पोशाकों में करना पर्यावरण के लिए अब जरूरी है. नैचुरल फाइबर और नैचुरल फैब्रिक से ही काम है. ये सिंथैटिक का मुकाबला न कर पाएं पर वक्त की जरूरत है. इस के लिए बुनकर, डाई करने वाले, कढ़ाई करने वाले सभी को उन का सही दाम मिलना जरूरी है. ये सारे बुनकर रिमोट एरिया में होते हैं, वहां तक ट्रैवल करना मुश्किल होता है. फिर उन्हें डिजाइन के बारे में समझना और उस क गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए ट्रेनिंग देना कठिन होता है. इसीलिए ऐथनिक ड्रैसें दिखने में फीकी लगती हैं और महंगी होती हैं पर समाज को इस की जरूरत है.

अब इंडियन रूट्स को ध्यान में रखते हुए साड़ी और आधुनिक स्टाइलिश कपड़े डिजाइन हो रहे हैं पर उतारे खादी के ऊपर गोल्डन जरी की कढ़ाई के साथ जा रहे हैं. कऊ, बर्ड और फ्लौवर्स के मोटिफ्स के साथ औरगैंजा के ब्लाउज काफी आकर्षक लगते हैं.

शाम के नाश्ते में बनाएं पनीर मेयो फ्रेंकी रोल

शाम को ऑफिस से लौटने पर चाय के साथ कुछ नाश्ता करने का मन होता है या फिर बच्चों को कुछ ऐसा खाने को चाहिए होता है जो हैल्दी भी हो साथ ही झटपट बन भी जाये. शाम को कुछ छोटा मोटा खा लेने से डिनर के समय एकदम से भूख नहीं लगती. परन्तु सबसे बड़ी समस्या होती है कि बनाया क्या जाये जो सभी को पसंद भी आ जाये और पौष्टिक भी हो. फ्रेंकी रोल एक ऐसा रोल है जिसे आप आसानी से बना तो सकते ही है साथ ही आप अपनी आवश्यकतानुसार सब्जियों को एड रिमूव भी कर सकते हैं.

भारत में फ्रेंकी रोल की उत्पत्ति 1960 के दशक में हुई थी जिसका उद्देश्य था कि एक इस प्रकार की डिश का निर्माण करना जिसे मुंबई की भागमभाग वाली जिन्दगी में हाथ में पकडकर भागते दौड़ते खाया जा सके. इस रोल को चपाती में भांति भांति की सब्जियों को भरकर बनाया जाता है और तब से लेकर आज तक यह काफी लोकप्रिय खाद्य पदार्थ हो चुका है आज हम इसी प्रकार का एक रोल आपको बनाना बता रहे हैं जिसे आप बहुत आसानी से बना सकते हैं तो आइये देखते हैं कि इसे कैसे बनाया जाता है-

कितने लोगों के लिए  6

बनने में लगने वाला समय  30 मिनट

मील टाइप  वेज

सामग्री(कवर के लिए)

1. गेहूं का आटा  1 कप

 2. मैदा 1 टीस्पून

 3. नमक 1/2 टीस्पून

 4. अजवाइन  1/8 टीस्पून

 5. दही 1 टेबलस्पून

सामग्री (फिलिंग के लिए)

1. पनीर 250 ग्राम

  2. नमक  स्वादानुसार

 3. बारीक कटी हरी मिर्च   4

 4. बारीक कटा प्याज  1

 5. बारीक कटा हरा धनिया  1 टीस्पून

 6. अमचूर पाउडर 1/4 टीस्पून

  7. चिली फ्लेक्स  1/4 टीस्पून

   8. बारीक कटी शिमला मिर्च  1 टेबलस्पून

    9. किसी गाजर  1 टीस्पून

   10. कोर्नफ्लोर  1 टेबलस्पून

   11. तेल  तलने के लिए

सामग्री( रोल के लिए)

1. शेजवान चटनी 1 टीस्पून

 2. मेयोनीज  1 टीस्पून

 3. लम्बाई में कटा पत्ता गोभी  1/2 कप

 4. प्याज के छल्ले  6

5. सिल्वर फॉयल    रोल करने के लिए

 6. घी  1 टीस्पून

विधि

कवर की समस्त सामग्री को एक साथ मिलाकर पानी की सहायता से रोटी के आटे जैसा गूँथकर 20 मिनट के लिए ढककर रख दें. पनीर को हाथो से क्रम्बल करके एक बाउल में डालें. अब इसमें फिलिंग की समस्त सामग्री को डालकर अच्छी तरह मिलाएं. आवश्यकतानुसार इतना पानी मिलाएं कि मिश्रण अच्छी तरह  बंधने लगे अब इस मिश्रण से 2 इंच लम्बे रोल बनाकर मध्यम आंच पर सुनहरा होने तक डीप फ्राई करके बटर पेपर पर निकाल लें. रोटी के आटे से चकले पर पतली रोटी बेलकर तवे पर केवल आटे के रंग बदलने तक सेंकें. इसी प्रकार सारी चपाती तैयार कर लें.

अब मेयोनीज और शेजवान सौस को एक कटोरी में मिला लें और इस तैयार मिश्रण को रोटी पर अच्छी तरह फैलाएं. रोटी के एक किनारे पर पनीर का रोल रखकर हाथ से हल्का सा चपटा कर दें ताकि वह रोटी में अच्छी तरह चिपक जाये. अब रोल के ऊपर कता पत्ता गोभी और प्याज रखें और रोल को अंदर की तरफ दबाते हुए रोल बनाएं. नानस्टिक तवे पर घी लगाकर तैयार रोल को हल्का सा सुनहरा होने तक सेंककर सर्व करें.

करें ये भी प्रयोग

उपरोक्त फ्रेंकी के अतिरिक्त आप फ्रेंकी बनाते समय निम्न प्रयोग करके इसे मनचाहा बना सकतीं हैं

  • कवर बनाते समय आप सादा गेहूं के स्थान पर मल्टीग्रेन आटे का प्रयोग कर सकतीं हैं.
  • कवर के आटे में पालक, चुकन्दर और धनियाफ्रूट की प्यूरी डालकर इसे और अधिक हैल्दी बना सकतीं हैं.
  • कवर में शकर और कोको पाउडर मिलाकर आप फ्रूट्स की फिलिंग डालकर बच्चों का फेवरिट फ्रेंकी बना सकतीं हैं.
  • फिलिंग में भी आप पनीर के स्थान पर मिक्स वेज और आलू का प्रयोग कर सकतीं हैं.
  • मेयोनीज और शेजवान चटनी के स्थान पर धनिया की हरी चटनी और इमली की मीठी चटनी का प्रयोग भी आसानी से किया जा सकता है.

इकोफ्रेंडली दिवाली डेकोरेशन चाहते हैं तो घर में अभी लगाएं ये पौधे

दिवाली का त्यौहार आते ही सभी के मन में साज सज्जा का ख्याल आने लगता हैं हर कोई चाहता ही की  कोई भी  मेहमान उसके घर में आए तो उसके घर कि सजावट की  तारीफ हो. जिस के चलते हम लोग बहुत से प्लास्टिक से बने डेकोरेशन का सामान अपने घर में  लें आते हैं और जाने अनजाने में ही इतना ज्यादा प्लास्टिक का प्रयोग करते हैं कि दिवाली तो मन जाती हैं लेकिन  प्लास्टिक का कचरा भी बढ़ जाता है जिसे  रिसाइकिल  करना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है तो क्यों  ना इस त्यौहार अपने घर को सजाने के साथ साथ अपनी प्रकृति को भी सुन्दर बनाने का प्रयास करे.

प्लास्टिक को ना करते हुए असली फूलों  व झालरों से सजावट करें जो आपको आपकी प्रकृति से  तो जोड़ेंगी ही बल्कि आपके घर को सोंधी सोंधी  खुशबू से महकाएँगी भी. तो इसके लिर जरूरी हैं कि आप अपने घर के गार्डन में  ये कुछ फूलों के पौधे अभी से लगा दें जिससे कि आपको बाजार से खरीदने कि आवश्यकता ही ना पड़े और आपकी जेब भी ढीली होने से बची रहे  बस जरूरत है तो पहलें से थोड़ी सी  तैयारी कि इसके लिए आपको बस यहां बताए गए इन खूबसूरत और जल्दी उगने वाले पौधों को गार्डन में लगाना है.

गेंदा का पौधा

त्योहारों में गेंदे के फूलों का इस्तेमाल पूजा से लेकर सजावट के लिए खूब किया जाता है. इस  समय में लगाए जाने वाले गेंदा फूल के पौधों में नवरात्रि, दिवाली और छठ आदि जैसे त्योहारो के समय फूल आने लगते हैं. ऐसे में समय रहते इन पौधों को लगाने से आप बजार से महंगे फूल खरीदने से बच सकते हैं साथ ही अपने अनुसार जिस तरह कि डिज़ाइन कि माला या झालर बनाना चाहें वो बना सकते हैं. गेंदा के पौधों से अवांछित कीट भी दूर रहते  हैं  जिससे अन्य पौधे भी अच्छे से ग्रो कर पाते हैं. इसके लिए अपने  गार्डन की मिट्टी ले रहें हैं तो पहले उस मिट्टी को 2 से 4 दिन  के लिए धूप में रख देना चाहिए जिसे  मिट्टी रोगाणुमुक्त हो जाए और आप जल्दी ही सुन्दर फूल पा सकें

स्नैपड्रैगन का पौधा

स्नैपड्रैगन (एंटीरहिनम) फ्लावर प्लांट एक अच्छा विकल्प है,जिसे आप अपने होम गार्डन में आसानी से लगा सकते हैं और दिवाली तक ढेरो खूबसूरत फूल पा सकते हैं  ये चमकीले फूल पूरे ठंडे मौसम में खिलते हैं. ये फूल वाले पौधे होम गार्डन की मिट्टी में या कंटेनरों मेंआसानी से लगा सकते हैं यह फूल देखने में लटकन की तरह होते हैं. जोकि  कई अलग अलग रंगों में खिलते हैं इन्हें आप होम डेकोर के  साथ साथ सुन्दर बुके के रूप में भी तैयार कर सकते  हैं.

वर्बेना का पौधा

यह कई अलग अलग रंगों मे खिलता है व आपके गार्डन को महकाता है यह एक सजावटी फूल वाला झाड़ीदार बारहमासी पौधा है,इसे ज्यादा देखभाल की भी आवश्यकता नहीं होती है।  इस आकर्षक सुगंध वाले फ्लावर प्लांट को आप अपने टेरेस गार्डन या घर की बालकनी में हैंगिंग पॉट्स या बास्केट में भी लगा सकते हैं यह फूल गुच्छे में आता है  जोकि फ्लावर पोट में लगा हुआ बेहद खूबसूरत तो लगता ही है  व आपके घर को सुगन्धित भी करता है यह पौधा कम पोषक तत्वों वाली मिट्टी में भी उगाया जा सकता है, घर पर इस पौधे को लगाने के लिए आप सामान्य मिट्टी में जैविक खाद तथा वर्मी कम्पोस्ट मिलाकर लगा सकते है जिससे इसकी ग्रोथ जल्दी व बेहतर होंगी.

गुलदाउदी

गुलदाउदीरंग बिरंगे फूलों वाला पौधा है  जिसे मम्स प्लांट भी कहा जाता है, इसके लिए 5-6 घंटे कि धूप काफ़ी होती है इसलिए इसे सूरज कि रौशनी में बालकनी में भी लगाया जा सकता है यदि छत पर लगाना  चाहते है तो कम धूप वाली जगह पर आसानी  से ग्रोथ कर जाएगा गार्डन या फिर बालकनी में खिलने के बाद ये बहुत खूबसूरत दिखते हैं.

साल्विया का पौधा

यह एक  बारहमासी फूल वाला प्लांट है, जिसकी कुछ किस्में जड़ी-बूटी के रूप में ग्रो करती हैं. यह फ्लावर प्लांट मिंट फैमिली लैमियासी का पौधा है. अगर आप साल्विया के सुंदर व आकर्षक फूलों को अपने घर में लगाना चाहती हैं तो ठीक तरह से सूखी हुई, दोमट मिट्टी का प्रयोग करें लेकिन इस तरह कि उपजाऊ मिट्टी उपलब्ध नहीं है, तो रेडीमेड पॉटिंग सोइल  का उपयोग कर सकते हैं, ऐसी मिट्टी में यह पौधा जल्दी उगता हैं  इस फूल को सेज के नाम से भी जाना जाता है. लाल रंग का  साल्विया लोगो कि पहली पसंद माना जाता है.

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