लव जिहाद षडयंत्र सिद्धांत

लव जिहाद पर काफी कट्टरवादियों का खून खौलने लगता है चाहे लव जिहाद की घटना उन के घर से 200 किलोमीटर दूर क्यों न हुई हो भगवाई पब्लिसिटी गैंग ने इस कदर माहौल को बिगाड़ दिया है कि आजकल प्रेम करने से पहले धर्म और जाति पूछनी होती है और लडक़ा अगर मुसलिम हो तो आसमान टूट पड़ता है.

यह बीमारी अब मुसलमानों में भी शुरू हो गई है, दिल्ली में 10 जुलाई को 20 साल के ङ्क्षहदू लडक़े की हत्या कर दी गई क्योंकि उस ने एक मुसलिम लडक़ी से पे्रम करने की हिम्मत दिखा दी थी. अररिया, बिहार, का राजकुमार का एक मुसलिम लडक़ी से प्रेम हो गया तो लडक़ी के रिश्तेदारों ने उस की हत्या लवजिहाद के तरीके से कर डाली.

धर्म के नाम पर प्रेम को अब इस तरह गंदला कर डाला गया है कि युवा दिनों के डर लगने लगा है कि उन्होंने यदि कदम कहीं आगे बढ़ा लिए तो मौत का ही सामना न करना पड़े.

भारतीय जनता पार्टी इस तरह की हत्याओं को खूब समर्थन देती है जबकि उन के चुराए हुए आदर्श नेता सुभाष चंद्र बोस ने खुए एक जापानी लडक़ी से शादी कर ली थी जब वे द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों में जापान में थे. अगर लव जिहाज बुरा है, अगर अपने धर्म से दूसरे से प्रेम करना हिंदू संस्कारों के खिलाफ है, अगर जाति तोड़ कर विवाह करना गलत है तो न केवल कई भारतीय जनता पार्टी के नेता, कितने ही भाजपा के भगवा लपेट में आ जाएंगे. पुराण उन मामलों से भरे पड़े हैं जिन में एक जाति के महापुरुषों ने दूसरी में शादी की थी और बच्चे भी पैदा किए थे. धर्म ने इस तरह अंधा बना रखा है कि बिना जांचे परखे आज के महंत, गुरू, पादरी, मुल्ला जो कहें वही पत्थर की लकीर हो जाता है और कुछ लोग इस लकीर को घर करने वालों को दंड देने पर उतारू हो जाते हैं.

दिल्ली के शहजाद बाग जैसी घटनाएं अब सारे देश में होने लगी हैं और प्रेम को बदनाम करने वाले ने इतना डर फैला दिया है कि जब हत्या हो रही होती है तो आसपास के लोग चुपचाप खड़े हो कर देखते हैं, कोई बीच में नहीं पड़ता. सभी को डर होता है कि मारने वाले अगर लोग पार्टी से जुड़े होंगे तो वे तो बच जाएंगे और बीच बचाव या बचाने वाले थानों, अदालतों के चक्कर में फंस जाएंगे.

आज का समाज यह बोडकास्ट कर रहा है कि प्रेम करना है तो पहले पंड़ों, मौलवियों, पादरियों, ग्रंथियों से पूछो, उन्हें चढ़ावा चड़ाओ और फिर ‘आईलवयू’, ‘आई लव यू टू बोलो.’

मुझे कैंसर से डर लगता है, कैंसर से बचने के लिए मैं क्या कर सकती हूं?

सवाल

मुझे कैंसर से बहुत डर लगता है. लेकिन सब कहते हैं जिस को कैंसर होना है तो हो कर ही रहेगा. क्या इस से बचने के लिए हम कुछ नहीं कर सकते हैं?

जवाब

यह सही है कि कैंसर एक बहुत गंभीर और जानलेवा स्वास्थ्य समस्या है. कैंसर किसी को किसी भी उम्र में हो सकता है. लेकिन यह सही नहीं है कि इस से बचने के लिए आप कुछ नहीं कर सकते. कुछ उपाय हैं जिन के द्वारा आप कैंसर के खतरे को काफी कम कर सकते हैं जैसे कैंसर से होने वाली कुल मौतों में से एकतिहाई धूम्रपान के कारण होती हैं. इस के अलावा खानपान की गलत आदतें, वजन अधिक होना और शारीरिक सक्रियता की कमी भी कैंसर के प्रमुख रिस्क फैक्टर है.

विश्वभर में हुए कई शोधों में यह बात सामने आई है कि कैंसर के कुल मामलों में से 25 से 30त्न स्वस्थ्य व पोषक भोजन का सेवन कर के, शारीरिक रूप से सक्रिय रह कर और मोटापे का शिकार न हो कर बचे रह सकते हैं.

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परिवार के 2 लोग और एक परिचित कैंसर से जूझ रहे हैं. पूरे विश्वभर में कैंसर के मामले भयावह तरीके से बढ़ रहे हैं. मैं जानना चाहती हूं कि इस के कारण क्या हैं?

जवाब

आधुनिक जीवनशैली और खानपान की बदली आदतों ने कैंसर का खतरा बढ़ दिया है. आज फास्ट और जंक, प्रोसैस्ड फूड का चलन बढ़ गया है जिस में कैलोरी की मात्रा काफी अधिक और पोषकता कम होती है. गैजेट्स के बढ़ते चलन ने शारीरिक सक्रियता को काफी कम कर दिया है जिस के परिणामस्वरूप उर्जा का असंतुलन हो जाता है. विश्वभर में मोटापा एक महामारी की तरह फैल रहा है जो कैंसर का एक बड़ा रिस्क फैक्टर है. अनिद्रा और तनाव का बढ़ता स्तर भी इस समस्या को और बढ़ा रहा है. –डा. देनी गुप्ता

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आज भी कायम है रेखा की खूबसूरती

मशहूर एक्ट्रेस रेखा की सुंदरता का कौन दीवाना नहीं है, वह जितनी बेहतरीन अदाकारा हैं उतनी ही वह खूबसूरत भी हैं. हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई खूबसूरत अभिनेत्रियां हुई , लेकिन रेखा जैसी खूबसूरत शायद ही कोई हो. वह उम्र के जिस पड़ाव पर हैं, उस वक्त लोगों को झुर्रियां तक आ जाती हैं, लेकिन आज भी वह यंग दिखती हैं. आज की खूबसूरत हिरोइनों को भी देती हैं टक्कर. हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हाल ही में अभिनेत्री रेखा ने कुछ फोटो शूट्स करवाएं हैं. जिन्हें देखकर आप भी कहेंगे वाह क्या अदा है. इन तस्वीरों में रेखा इतनी ग्लैमरस लग रही हैं कि कोई कह ही नहीं सकता की ढलती उम्र के साथ उनकी खूबसूरती ढल गई.

 

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इंस्टाग्राम पर छाई रेखा की तस्वीरों को लोग खूब पसंद कर रहे हैं. इन तस्वीरों में रेखा किसी महारानी या बेगम से कम नहीं लग रही हैं. उनकी ये खूबसूरती देखते बन रही है. गोल्डन कलर के लहंगे और साड़ी में जैसे कोई अप्सरा ही आसमान से उतर आई ऐसा लग रहा है. एक तस्वीर में सर पर मोर जैसा मुकुट है, जो बेहद खूबसूरत लग रहा है. ज्वैलरी ने तो खूबसूरती में और भी चार चांद लगा दिए. चेहरे पर चमक और तेज, होंठों पर गाढ़े मरून कलर की लिपस्टिक तो जैसे क्या ही कहें अब.

मशहूर मैग्जीन वोग के लिए था फोटोशूट

दरअसल ये फोटोशूट मशहूर मैग्जीन वोग के लिए था, जिसके कवर पेज पर रेखा बिखेरे खूबसूरती के जलवे. रेखा की इन तस्वीरों को देखकर उनके फैन्स तरह-तरह के कमेंट्स कर रहे हैं. एक फैन ने लिखा कि- SHE IS QUEEN OF BOLLYWOOD, रेखा की जगह कोई नहीं ले सकता. और देखा जाए तो ये सच भी है. बॉलीवुड में रेखा की अलग ही छाप है. एक जानकारी के मुताबिग वोग दुनिया की सबसे प्रसिद्ध फैशन पत्रिका है. वोग पहली बार 1892 में एक साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में प्रकाशित हुआ था जो धीरे-धीरे एक फैशन पत्रिका में बदल गया. फैशन की दुनिया में वोग का बहुत बड़ा नाम है और ये लगभग 23 देशों तक फैला है. इसके 11 मिलियन से भा ज्यादा ग्राहक हैं. इस पत्रिका में दुनिया के कई प्रमुख फैशन डिजाइनर जुड़े हैं.

 

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रेखा का फिल्मी करियर

रेखा ने अपने 40 सालों के लंबे करियर में लगभग 180 से उपर फिल्मों में काम किया है. करियर के दौरान  कई दमदार रोल किए, इसके अलावा कई आर्ट फिल्मों मे भी काम किया. रेखा के करियर का ग्राफ बहुत बार नीचे भी गिरा लेकिन उन्होंने खुद को इससे उबारा और अपनी अदाकारी से सभी का दिल जीता. रेखा को तीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार, दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का और एक बार सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का अवॉर्ड मिल चुका है. जिसमें उनकी कई मुख्य फिल्में शामिल हैं जैसे- खून भरी मांग, सिलसिला, खूबसूरत. फिल्म उमराव जान के लिए रेखा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेश्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. 2010 में पद्मश्री सम्मान भी मिला.

गठबंधन: भाग 2-क्यों छिन गया कावेरी से ससुराल का प्यार

कावेरी के 7 फेरों से पहले भी सुखमय भविष्य और मन को बांधने के प्रतीक के रूप में गठबंधन की रस्म अदा की गई थी. लेकिन हुआ क्या? उदित के कंधे पर लटके दुपट्टे में बंधा गोल सिक्का कैसे तिरस्कार की टेढ़ीमेढ़ी आकृति में बदल गया, वह जान ही नहीं सकी.

दूर्वा उसे हराभरा खुशहाल जीवन कहां दे सकी? वह तो कंटीली  झाडि़यां ही चुभा रही है. हलदी का सुनहरा रंग जीवन में चढ़ने की आशा पूरी होती, उस से पहले ही विषाद ने अपने रंग बिखेर दिए थे उस पर. फूल सा उस का चेहरा जैसे खिलने से पहले ही मुर झाया सा लगने लगा था. अक्षत चावल के धवल दाने पति के अटूट प्रेम और सुखशांति देने के स्थान पर एक बो झ सा औपचारिक रिश्ता ही तो दे पाए थे उसे.

मानसिक शांति तो अब एक सपना सी लगने लगी है. गठबंधन ने दोनों के मन को तो नहीं बांधा. हां, कावेरी के पांवों में जंजीर जरूर बंध गई थी, जिसे न तो वह तोड़ पा रही थी और न ही अपने अस्तित्व को यों कैद में देख पा रही थी.

डोरबैल बजने से कावेरी सोच के दलदल से बाहर आ गई. दरवाजा खोला तो सामने नमन को देख मुर झाया मन खिल सा गया.

नमन उस के पड़ोस में ही रहता था. दोनों की दोस्ती पुरानी थी. वे एक ही स्कूल में पढ़े थे. बाद में उच्च शिक्षा के लिए नमन बैंगलुरु चला गया था. एमबीए करने के बाद नोएडा स्थित एक विदेशी कंपनी में बतौर मैनेजर वह कार्य कर रहा था. नमन का एक पैर पोलियो के कारण बेहद कमजोर था. उस पैर में वह कैलीपर पहन कर रखता था, तभी उस का चलनाफिरना संभव हो पाता था.

नमन के मन में कावेरी के लिए विशेष स्थान था, लेकिन इस का कारण कावेरी का अप्रतिम सौंदर्य या उस का पढ़ाई में अव्वल होना नहीं था. इस का कारण तो कावेरी का मन के प्रति सम्मान और स्नेही व्यवहार था, जो सहानुभूति से नहीं, मित्रता की सुगंध से सुवासित था.

विवाह के बाद कावेरी का मायके में आना कम होने लगा तो नमन से मिलनाजुलना बंद सा हो गया, लेकिन कावेरी की मित्रता जैसे ऊर्जा बनी हमेशा नमन का हाथ पकड़े साथसाथ चला करती थी.

नमन आया तो कावेरी पहले के रंग में रंग गई. बातों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा था. पुराने दोस्त, स्कूल व कालेज के टीचर्स और मौसम का मिजाज सबकुछ समा गया था उन की बातचीत के मध्य.

कावेरी अपना दर्द मन में ही रख नमन का दिल नहीं दुखाना चाहती थी, लेकिन वह भूल गई थी कि नमन जैसा अंतरंग मित्र उस की मुसकान देख कर ही अनुमान लगा लेगा कि वह दिल से निकली खुशनुमा मुसकराहट है या हंसी का जामा पहने हुए गहन पीड़ा.

कुछ देर की बातचीत के बाद नमन अचानक पूछ बैठा, ‘‘कावेरी, हम क्या अपने पुराने दिनों को ही याद करते रहेंगे या अपनी नई जिंदगी के किस्से भी शेयर करेंगे?’’

कावेरी को लगा जैसे चोरी पकड़ी गई हो. बोली, ‘‘मेरी जिंदगी तो वही, किसी भी शादीशुदा स्त्री की जिंदगी जैसी ही… सासससुर, पति, जिम्मेदारियां बस और क्या? तुम ही कुछ बताओ न,’’ कह कर उस ने पलकें  झुका लीं.

‘एक खूबसूरत जिंदादिल औरत पति से दूर बैठी हो और एक बात भी उस के बारे में न करे… अजीब लग रहा है मु झे. मैं गलत नहीं हूं तो तुम बहुत कुछ दबाए बैठी हो अपने अंदर. कावेरी, मन की गिरह खोल दो प्लीज.’

नमन की स्नेहभरी गुहार कावेरी के दिल से आंखों तक पहुंच आंसू बन कर  झर झर बहने लगी. अपनी सभी आहत अनुभूतियों को उस ने 1-1 कर नमन के समक्ष खोल कर रख दिया. नमन की सहानुभूति घावों पर मरहम का काम कर रही थी.

कावेरी की आपबीती सुन कुछ सोचता हुआ सा नमन बोला, ‘‘कावेरी, क्या तुम्हें पूरा विश्वास है कि उदित ने तुम दोनों की रिपोर्ट्स को ले कर सच बोला है तुम से?’’

‘‘मतलब? उदित ने औनलाइन देखी थीं रिपोर्ट्स. अपनी मरजी से थोड़े ही कहा था.’’

‘‘लेकिन तुम ने तो नहीं देखीं, फिर प्रिंट्स भी नहीं निकलवाए उस ने. कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम नहीं वह…’’

नमन की बात बीच में ही काट कर कावेरी बोल उठी, ‘‘विश्वास तो नहीं हो रहा कि उदित इतना बड़ा  झूठ बोल सकता है. वह गुस्सैल जरूर है, लेकिन धोखेबाज भी…?’’ बेचैन हो वह सोच में डूब गई.

उसे चिंतित देख नमन ने उस का ध्यान दूसरी ओर लगाने के उद्देश्य से चुटकुले सुनाने शुरू कर दिए. एक बार फिर हंसीमजाक का दौर चल पड़ा. इस बीच सुधांशु का जयपुर पहुंच कर फोन आ गया. नमन वहां आया हुआ है यह जान कर कावेरी के लिए चिंतित सुधांशु को राहत सी मिली. नमन से उन्होंने रात में कावेरी के पास ही रुकने का अनुरोध कर किया.

रात के 1 बजे दोनों की उनींदी आंखों ने बातचीत की गति पर थोड़ा विराम लगा  ही दिया. सोने से पहले नमन हौले से मुसकरा कर बोला, ‘‘कावेरी, एक बात कहना चाहता हूं. हम कितने वक्त बाद मिले हैं. इस के बाद न जाने कब मिल पाएं. तुम्हें कोई तकलीफ न हो तो 1-1 कौफी हो जाए. हां, लेकिन कौफी मैं बनाऊंगा. तुम रुको न यहीं, मैं बस यों गया और यों आया.’’

कावेरी मित्र के आग्रह को टाल नहीं सकी.  अपने पिता के कमरे में जा कर कावेरी नमन के सोने का प्रबंध करने लगी. नमन कौफी ले कर आया तो पहला घूंट भरते ही बोली, ‘‘कमाल की कौफी बनाते हो नमन, तुम्हारी होने वाली वाइफ से रश्क सा हो रहा है मु झे,’’ कहते हुए कावेरी खिलखिला कर हंस पड़ी और फिर वहीं बैड पर पैर फैला कर चैन से बैठ कौफी का आनंद लेने लगी.

नमन ने उसे अपने मोबाइल में उन लड़कियों के फोटो दिखाए, जहां उस के रिश्ते की बात चल रही थी. कावेरी से उस की पसंद की लड़की चुनने को कह कर वह वाशरूम चला गया.

थकी हुई कावेरी वहीं बैड पर लेटी तो पता ही नहीं चला कि कब आंख लग गई.

सुबह अलार्म बजने पर ही कावेरी की नींद खुली. हड़बड़ा कर बिस्तर से उठ वह कमरे से बाहर निकली. नमन बालकनी में खड़ा गुलाबी आसमान पर बिखरी छटा निहार रहा था. इस से पहले कि वह रात के विषय में कोई सवाल करती, नमन स्वयं ही बोल उठा, ‘‘रात को जब मैं चेंज कर अंकल के कमरे में वापस आया तो तुम गहरी नींद में थीं. तुम्हें उठाना मैं ने ठीक नहीं सम झा और तुम्हारे कमरे में जा कर सो गया.’’

चाय पी कर नमन वापस चला गया. जब तक सुधांशु लौटे नहीं नमन प्रतिदिन कावेरी से मिलने आता रहा. सुधांशु लौटे तो कावेरी जैसे नन्ही सी बच्ची बन गई. वह यह देख कर बहुत प्रसन्न थी कि इतने कम समय के लिए जयपुर जाने पर भी पापा यह नहीं भूले थे कि लाख की चूडि़यां कावेरी को बहुत पसंद हैं.

ंगबिरंगी चूडि़यों और कंगनों के साथ ही पापा गुलाबी और पीले रंग में रंगा, गोटापत्ती के काम वाला एक सुंदर लहंगा भी लाए थे. कितना खुश देखना चाहते थे वे कावेरी को, चाह कर भी कावेरी सुधांशु को अपना दुख नहीं बता पाई.

वह जानती थी कि उस के मां न बन पाने पर ससुराल वालों का उसे दोष देना पापा को बहुत कष्ट पहुंचाएगा. अपनी पीड़ा भीतर ही दबा पापा के स्नेह को पलपल महसूस करती कावेरी के 10 दिन बातें करते और हंसतेहंसाते कब बीत गए, पता ही नहीं चला उसे.

वापसी के दिन नाश्ता करने वह टेबल पर बैठी ही थी कि उबकाई आने  लगी. उबकाई के साथ ही चक्कर भी आ रहा था. सुधांशु उसे घर के पास ही डाक्टर सुजाता के क्लीनिक पर ले गए.

डाक्टर सुजाता ने जांच कर दवा के साथ कुछ टैस्ट भी लिख दिए. टैस्ट के लिए सैंपल्स दे कावेरी घर आ कर दवा खा आराम करने लेट गई. दोपहर को नमन कावेरी से मिलने आया तो साथ में उस की पसंद का ढोकला भी लाया.

कावेरी की पसंदीदा दुकान का ढोकला उस पर पापा और नमन का साथ, कावेरी भूल ही गई कि वह बीमार है. तीनों की बातों और ठहाकों से घर गूंज उठा.

शाम होतेहोते कावेरी की तबीयत बिलकुल ठीक हो गई. सुधांशु चाहते थे कि वह अगले दिन तक रुक जाए, लेकिन कावेरी ने जाना ही उचित सम झा, क्योंकि उदित सुबह ही सिडनी से अपने घर लौट चुका था.

डाक्टर सुजाता के क्लीनिक पर रिपोर्ट्स औनलाइन देखने की सुविधा नहीं थी और स्वास्थ्य में सुधार के कारण कावेरी को रिपोर्ट लेना आवश्यक भी नहीं लग रहा था, इसलिए वह कैब बुक करवाने लगी.

नमन और सुधांशु का मानना था कि रिपोर्ट एक बार देखनी जरूर चाहिए. कावेरी को लौटने में देर न हो जाए, इसलिए नमन ने कहा कि वह क्लीनिक से रिपोर्ट ले कर उस का फोटो खींच कावेरी को व्हाट्सऐप पर भेज देगा. कैब बुला कर पापा और नमन से विदा ले वह टैक्सी में बैठ कर चली गई.

सोच का विस्तार: रिया के फोन से कैसे गायब हुई सुरेश की खुशी

मृगमरीचिका एक अंतहीन लालसा: भाग 1-मीनू ने कैसे चुकाई कीमत

‘‘मम्मा आज मैं अपनी नई वाली बोतल में पानी ले जाऊंगी,’’ नन्ही खुशी चहकते हुए मुझ से बोली. ‘‘ओके,’’ कहते हुए मैं ने उसे स्कूल के लिए तैयार किया.

‘‘मीनू पार्लर की लिस्ट मैं सतीश को दे आया था. 11-12 बजे तक सामान पहुंचा देगा. तुम चैक कर लेना,’’ ऋ षभ ने नाश्ता करते हुए कहा. ठीक है आप चिंता न करें, ‘‘मैं ने कहा, फिर खुशी और ऋ षभ के चले जाने के बाद मैं आरामकुरसी पर निढाल हो गई. यह तो अच्छा था कि ऋ षभ के औफिस के रास्ते में ही खुशी का स्कूल पड़ता था और वे उसे स्कूल ड्रौप करते हुए अपने औफिस निकल जाते थे वरना तो उसे स्कूल छोड़ने भी मुझे ही जाना पड़ता. दोपहर 1 बजे तक उस का स्कूल होता था. तब तक मैं अपने सभी काम निबटा कर उसे ले आती थी. तभी अचानक किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया. मैं ने दरवाजा खोला, तो सामने पड़ोसिन ममता हांफती हुई दिखाई दी.

‘‘क्या हुआ? कहां से भागतीदौड़ती चली आ रही है?’’ मैं ने पूछा, क्योंकि मैं उसे अच्छी तरह जानती थी कि उसे तिल का ताड़ बनाना बहुत अच्छी तरह आता है. ‘‘यार बुरी खबर है. मयंक की बीवी ने आत्महत्या कर ली.’’

‘‘क्या? क्या कह रही है तू?’’ ‘‘हां यार सभी सकते मैं हैं,’’ वह बोली और फिर पूरी बात बताने लगी.

उस के जाने के बाद मेरे दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया. उफ पूजा ने यह क्या कर लिया. अपने 2 साल के बच्चे को यों छोड़ कर… लेकिन वह तो प्रैगनैंट भी थी. मतलब उस ने नन्ही सी जान को भी अपनी कोख में ही दफन कर लिया. आखिर ऐसा उस ने क्यों किया… मैं जानती थी, फिर भी हैरान थी. दिमाग में बहुत से प्रश्न हथौड़े की तरह चलते जा रहे थे… मयंक को तो मैं अच्छी तरह जानती थी. उस की शादी में नहीं गई थी, लेकिन लोगों से सुना अवश्य था कि बहुत खूबसूरत व समझदार है उस की पत्नी. बाद में तो यह तक सुनने में आया था कि बातबात पर वह पत्नी को मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना देता है. उसे उस के मायके नहीं जाने देता. यहां तक कि उस के मातापिता के लिए अपशब्द भी कहता है.

एक बार एक आयोजन में उस की पत्नी से मुलाकात हुई थी, तो आंखों में आंसू भर कर उस ने मुझ से यही 2 शब्द कहे थे कि दीदी, काश हम भी आप की तरह खुशहाल होते. हां खुशहाल ही तो थी मैं कि मयंक के चंगुल से बच निकली थी. वाकई अगर ऋ षभ ने न संभाला होता, तो मैं कतराकतरा हो कर कब की टूट कर बिखर गई होती. सोचतेसोचते मेरा मन अतीत की गहराइयों में विचरने लगा…

‘‘भाभी यह रंग आप पर बहुत खिल रहा है,’’ कुछ गहरे गुलाबी रंग की साड़ी पहन कर घर के बाहर सब्जी खरीदते समय किसी ने मुझे पीछे से आवाज दी. हम नएनए ही शिफ्ट हुए थे. मयंक हमारे पड़ोसी का लड़का था. 23-24 की उम्र में उस का शारीरिक सौष्ठव कमाल का था.

जी थैंक्स, कह कर मैं अपनी ओर एकटक निहारते मयंक को देख थोड़ी असहज हो गई. मयंक ने कहना जारी रखा, ‘‘सच कुछ लोगों को कुदरत ने फुरसत में बनाया होता है और आप उन में से एक हो?’’

‘‘यह कुछ ज्यादा नहीं हो गया क्या?’’ मैं कहते हुए हंस दी. अंदर आ कर खुद को शीशे में निहारते हुए मैं खुद भी बुदबुदा उठी कि सच में कुदरत ने मुझे फुरसत में बनाया है. दूध सी मेरी काया और उस पर तीखे नैननक्श मेरी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं. उस पर कपड़ों का मेरा चुनाव लोगों के बीच मुझे चर्चा का विषय बना देता था.

वैसे तो ऐसी तारीफें सुनने की मुझे आदत सी पड़ गई थी, लेकिन मयंक द्वारा की गई तारीफ से मुझ में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई. उस का मेरी आंखों में गहरे झांक कर देखना फिर अर्थपूर्ण तरीके से मुसकराना मुझे अच्छा लगा. सच कहूं तो उस के शब्दों से ज्यादा उस की मोहक मुसकान ने मुझे लुभाया. पड़ोसी होने के नाते गाहेबगाहे उस से मेरी मुलाकात होती रहती थी. उस वक्त खुशी बहुत छोटी थी और मेरे पार्लर के भी ढेर सारे काम होते थे. ऐसे में कभीकभी मैं झुंझला उठती थी. एक दिन मैं ऋषभ से अपनी परेशानी का रोना ले कर बैठी ही थी कि मयंक आ गया. बातों ही बातों में उस ने मुझे मदद की पेशकश की, जिसे मुझ से पहले ऋ षभ ने स्वीकार कर लिया.

अब मयंक तकरीबन रोज मेरे छोटेमोटे कामों में हाथ बंटाने के लिए आने लगा. उस की गाड़ी पर बैठतेउतरते समय जब कभी मेरा हाथ उस से टच होता तो वह बड़ी ही शरारत से मुसकरा उठता. मन ही मन उस की यह शरारत मुझे अच्छी लगती, पर ऊपर से मैं उसे बनावटी गुस्से से देखती तो झट से सौरी बोल कर अपना मुंह घुमा लेता. धीरेधीरे मुझे उस के साथ की आदत पड़ गई.

उधर ऋ षभ की प्राइवेट जौब थी. वे देर रात घर आते थे. कई बार तो उन्हें औफिस के काम से शहर के बाहर भी रहना होता था. वैसे भी ऋ षभ मेरे लिए एक बोरिंग इंसान थे, जिन्हें मेरी खूबसूरती से ज्यादा औफिस की फाइलों से प्यार था. हां, मेरी और खुशी की जरूरतों का वे पूरा ध्यान रखते थे.

पर उम्र का जोश कहें या वक्त की कमजोरी, मेरा चंचल मन इतने भर से संतुष्ट नहीं था या यों कह लें कि मयंक ने किसी शांत झील की तरह पड़ी मेरी सोई हुई कामनाओं को अपने आकर्षण के जादू का पत्थर फेंक जगा दिया था. मयंक की छेड़छाड़, जानेअनजाने उस का छू जाना, उस का जोशीला साथ अब मुझे रोमांचित करने लगा था. मयंक तो पहले से ही बेपरवाह और दुस्साहसी किस्म का इंसान था,

मेरे मौन में उस ने मेरी रंजामंदी शायद महसूस कर ली थी. अब अधिकतर वह मेरे साथ ही रहने लगा.

खुशी को स्कूल छोड़ना व लाना, जब मैं पार्लर में व्यस्त रहूं तो उसे पार्क घुमाना, मेरे पार्लर का सामान लाना, शौपिंग में मेरी मदद करना आदि काम वह खुशीखुशी करता था. ऋ षभ के शहर से बाहर रहने पर भी वह हमारा बहुत खयाल रखता था. मैं उस जगह नई थी और ऋषभ किसी से सीधे मुंह बात भी नहीं करते थे, इसलिए लोगों की निगाहें हमें देख कर भी अनदेखा करती थीं. हालांकि पार्लर में कई महिलाएं हमारे बीच क्या चल रहा है, इस खबर को जानने के लिए उत्सुक नजर आती थीं, लेकिन मैं मस्त हो कर अपना काम करती थी. लेकिन इतना तय था कि मैं और खुशी दोनों ही मयंक के मोहपाश में बंधी जा रही थीं. खुशी तो बच्ची थी पर मैं बड़ी हो कर भी बहुत नादान.

ऐसी ही एक शाम ऋ षभ चेन्नई में थे. मैं और मयंक पार्लर का कुछ सामान लेने गए थे. खुशी को मैं ने ऋ षभ की रिश्ते में लगने वाली एक मौसी (जो हमारे घर के पास ही रहती थीं) के यहां छोड़ दिया था. बाजार से लौटते हुए हमें देर हो चुकी थी. बारिश और हलकी फुहारों ने हमें कुछ भिगो भी दिया था. उस की गाड़ी से उतरते समय तेज ब्रेक लगने के कारण मैं उस से जा चिपकी और मेरे दोनों हाथ उस के कंधों पर जा टिके. वाकई यह बहुत खूबसूरत सुखानुभूति थी, जिस ने मुझे रोमांचित कर दिया. बहरहाल ताला खोल कर हम अंदर आ गए. ‘‘मयंक अब तुम जाओ. काफी देर हो चुकी है. मैं खुशी को ले कर आती हूं,’’ मेरे कहने पर भी वह सोफे पर बैठा रहा.

‘‘अगर रात यहीं रुक जाऊं तो?’’ उस की आंखों में फिर वही शरारत थी. चाह कर भी उसे इनकार न कर सकी. मौसम की खुमारी कहें या गीले तन की खुशबू, हम दोनों ही बहकने लगे. मयंक ने मेरा हाथ खींच कर मुझे सोफे पर बैठा लिया. पूरी रात न मुझे खुशी की याद रही न अपने पत्नीधर्म की.

रात के उस व्यभिचार के बाद भी मैं सुबह बड़े ही सहज भाव से उठी और खुद को तरोताजा महसूस किया. मयंक के साथ ने जैसे जीवन में एक उमंग भर दी थी. उस वक्त मेरे मन में कोई अपराधबोध या आत्मग्लानि नहीं थी. मैं बहुत खुश थी और खुशी को मौसी के घर से यह बहाना कर के ले आई कि रात बहुत हो चुकी थी तो मैं ने आप को डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा. मौसी ने फौरन मेरी बात पर विश्वास भी कर लिया. अपने सभी काम समय पर निबटा कर पार्लर खोलते वक्त मैं यही सोचने लगी कि ऋ षभ तो कल आने वाले हैं यानी आज रात भी… और मैं सुर्ख होने लगी. जल्दी से सारे काम निबटाने के बाद उम्मीद के मुताबिक अंधेरा होते ही मयंक आ गया. खुशी को सुला कर हम दोनों एक बार फिर प्यार में डूब गए. मुझे पता नहीं था कि मेरी यह खुमारी आगे क्या गुल खिलाने वाली है.

‘मिस टीन इंटरनेशनल प्रिंसेस’ स्वीजल मारिया फुर्टार्डो ने ब्यूटी के बारें में क्या कहा, पढ़े इंटरव्यू

ब्यूटी आउटर नहीं होती, अंदर से आती है, जो रंग रूप नहीं, बल्कि स्वभाव, बातचीत का तरीका, जो सबका दिल जीत सके, काइंड हार्टेड हो, सबको सम्मान दे सकें आदि जरुरी है, कहती है 18 वर्ष की सुंदरी स्वीज़ल मारिया फुर्टार्डो ने साउथ अमेरिका के पेरू में हुए मिस टीन यूनिवर्सल 2023 ‘मिस टीन इंटरनेशनल प्रिंसेस’ का ख़िताब जीतकर इंडिया को गर्वान्वित किया है.

इसमें 14 देशों की सुंदरियों ने भाग लिया था, जिसमे जीत हासिल करना आसान नहीं था. इसके अलावा उन्होंने ‘मिस टीन यूनिवर्सल’ और ‘बेस्ट कॉस्टयूम अवार्ड’ के टाइटल को भी जीता है. स्वीज़ल को डांस, पेंटिंग, आर्ट एंड क्राफ्ट पसंद करती है. उसे फैशन मेनिया है और हर तरह के नए सुंदर कपड़ों को पहनना पसंद करती है. वह फूडी है, उसे दाल, चावल और फिश फ्राई पसंद है, लेकिन मुंबई की पांव भाजी उसे बहुत पसंद है.

अपने अनुभव को शेयर करती हुई स्वीज़ल कहती है कि मैं इस कॉम्पिटिशन के लिए पेरू गयी थी, वहां मैं कोलंबिया की एक प्रतियोगी से मिली, जहाँ उन्होंने कोलंबिया की कल्चर के बारें में बात की. वहां से लाई कॉफ़ी बीन्स का सेवन किया, ये मेरे लिए बहुत ही सुंदर अवसर था, जहाँ मुझे अलग-अलग देशों से आये सभी से मिलने और उनके खान-पान रहन-सहन के बारें में जानकारी मिली, जिसे मैंने एन्जॉय किया है.

खूबसूरत और हंसमुख स्वीज़ल कर्नाटक के बेंगलुरु की रहने वाली है. ब्यूटी पीजेंट की दुनिया में आने से पहले उन्होंने फैशन इंडस्ट्री में कदम रखा और वर्ष 2021 में बेंगलुरु में हुए इग्नाइट इंडिया मेराकी फैशन कम्पटीशन की विनर बनी. वहां उन्हें रियल खूबसूरती के लिए फ्रेश फेस ऑफ़ इग्नाइट इंडिया 2021 का ख़िताब मिला. इसके बाद दिल्ली में हुए स्टार एंटरटेनमेंट प्रोडक्शन में भाग लिया, जहाँ वह मिस सुपर मॉडल इंडिया की सेकेण्ड रनर अप चुनी गई.

इसी जीत से उन्हें मिस टीन यूनिवर्सल में इंडिया 2023 में जाने की प्रेरणा मिली. स्वीज़ल ने इंटरनेशनल पेजेंट के लिए काफी मेहनत की है. आगे वह मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स में जाने की तैयारी कर रही है. साथ ही सेकेण्ड इयर कॉमर्स में ग्रेजुएशन कर रही है.

इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा के बारें में स्वीज़ल कहती है कि मैंने बचपन से ही ब्यूटी के क्षेत्र में जाने का सपना देखा है, जिसमे पेजेंट क्वीन बनने की मेरी इच्छा भी सालों से है. मैं जब तीसरी कक्षा में थी और फैशन कॉम्पिटिशन हुआ था, उस समय मुझे सुंदर पोशाक पहनकर रैंप पर चलना बहुत अच्छा लगा था. जब मैं 7वीं कक्षा में थी तो भी मैंने एक किड शो में भाग लिया और जीत गई, इससे मेरे अंदर प्रेरणा जगी और मुझे ये सब करना अच्छा लगने लगा था, लेकिन थोड़ी बड़ी होने पर मेरी पढाई अधिक हो गई और मैं कुछ समय तक पढ़ाई की ओर मन लगाई.

बोर्ड की परीक्षा के बाद मैंने मिस टीन इंडिया के लिए तैयारी की और मिस टीन इंडिया का ख़िताब मिला. मुझे पता चल गया कि मुझे रैंप पर चलना, अच्छे पोशाक पहनना, कैमरे के आगे आना, प्रश्न उत्तर का सेशंस फेस करना आदि सब पसंद है और मुझे इसी क्षेत्र में ही जाना चाहिए. इसके बाद से मैंने इस फील्ड को सीरियसली लेना शुरू किया और एक के बाद एक प्रतोयोगिताओं में भाग लेना शुरू कर दिया. इंटरनेशनल लेवल पर इस ख़िताब को जीतना मेरे लिए एक प्राउड मोमेंट है, बहुत अच्छा महसूस हो रहा है.

इसके आगे स्वीज़ल कहती है कि पहले के किसी भी प्रतियोगिता के लिए मैंने कभी ट्रेनिंग नहीं ली, पर इस इंटरनेशनल पेजेंट के लिए मैंने मुंबई जाकर ट्रेनिंग लिया. इसमें इतने लोगों के सामने बात करना यानि कम्युनिकेशन स्किल्स को बढ़ाना जरुरी था, जिसे मैंने रोज घंटों आईने के आगे खड़ी होकर प्रैक्टिस किया. इसके अलावा रैंप पर चलने का तरीका, कैमरा फेस करना, सुबह 6 बजे उठकर जिम जाकर फिटनेस ट्रेनिंग लेना, आदि कई किये है.

इस ट्रेनिंग के बाद मेरी जिंदगी काफी बदली है, पहले मैं एक नार्मल लड़की थी. अब मैं ग्रूम हो चुकी हूँ और इस अवार्ड के बाद लोग मुझे पहचानने लगे है, अधिक से अधिक लोग मुझे सोशल मीडिया पर फोलो कर रहे है, ये मुझे प्रसिद्धि देने के साथ-साथ, मेरी सोशल हेल्प को भी समझते है, जो मैं मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए करती हूँ.

स्वीज़ल का कहना है कि मैं आगे किसी बड़ी टाइटल को जीतना चाहती हूँ, मसलन मिस यूनिवर्स या मिस वर्ल्ड, जिसके लिए मेरी तैयारी जारी है. अगर मुझे कोई भी ख़िताब मिलता है, तो मैं अनाथ, मानसिक रूप से बीमार और गरीब बच्चों के लिए कुछ अच्छा करना चाहती हूँ, क्योंकि मुझे बच्चों से बहुत प्यार है. मैं ऐसे कई एनजीओज के साथ जुडी भी हुई हूँ, जो इन जरूरतमंद बच्चों के लिए काम करती है. इन छोटे बच्चों के लिए कुछ करना बहुत जरुरी है, क्योंकि उनकी ख़ुशी मेरी ख़ुशी है. मैं सभी से अपील करती हूँ कि जिसे भी समय मिले, इन बच्चों से मिलकर, उनके साथ समय बिताएं, ये समाज के लिए एक बड़ी सहयोग है.

मिस टीन स्वीज़ल को पारिवारिक सहयोग हमेशा मिला है, वह कहती है कि जब मैं छोटी थी, मैंने माँ से अपनी इच्छा बताई, तो उन्होंने बहुत सपोर्ट किया. मैं इसके लिए खुद को बहुत लकी मानती हूँ, क्योंकि उन्होंने हर समय मेरा साथ दिया है. वे अब मेरी कामयाबी से बहुत खुश है. मैं अपने पेरेंट्स की अकेली संतान हूँ.

फिल्मों में काम करने की इच्छा स्वीज़ल रखती है और हंसती हुई कहती है कि अगर मुझे किसी मीनिंग फुल स्क्रिप्ट में काम करने का मौका मिले तो मैं अवश्य हिंदी फिल्म में काम करना चाहती हूँ. मेरे हिसाब से फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं, कोई भी क्षेत्र आसान नहीं होता, कही भी काम आसानी से नहीं मिलता, संघर्ष हमेशा चलता रहता है. सही मंच कहीं भी मिले, मुझे काम करने में ऐतराज नहीं. मेरा सभी टीनएज से मेसेज है कि जीवन में कोई भी काम आसान नहीं होता, कुछ भी जल्दी नहीं मिलता, हर क्षेत्र में कामयाबी के लिए मेहनत, लगन और धीरज की जरुरत होती है, कभी आलसी न बनें, क्योंकि अभी समय है, जब आप मेहनत से अपनी मंजिल पा सकते है.

अनुपमा की जिंदगी में तूफान बनेंगी डिंपल, अनु की तस्वीर देख भड़की मालती देवी

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ को टीआरपी में नंबर वन बनाने के लिए मेकर्स खूब प्रयास कर रहे है. ‘अनुपमा’ के नए-नए ट्विस्ट और टर्न्स को देखकर दर्शकों का सिर चकरा गया है. जहां एक तरफ अनुपमा ने अपनी ममता के चक्कर में अमेरिका का सपना तोड़ दिया, वहीं दूसरी ओर मालती देवी ने उसकी जिंदगी बर्बाद करने का फैसला किया है. बीते एपिसोड में देखने को मिला कि मालती देवी अनुपमा की जिंदगी बर्बाद करने की चेतावनी देती है.

डिंपल को मिले ताने

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि डिंपल सभी के बीच आएगी और उसको हर कोई सुनाने लग जाएगा. लेकिन डिंपी खुद को साबित करने में लगी रहेगी. इसी बीच डिंपल, बापूजी से कहेगी- ‘ये सब ज्ञान अनुपमा को दो उसी की वजह से ये सब हो रहा है’. वहीं कपाड़िया हाउस में अनु को स्पेशल फील कराने के लिए की पूरी तैयारी होती है.

 

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जब अनुपमा ने अखबार पढ़ा

सीरियल में छोटी अनु डांस के बाद भावुक हो जाती है. अनुपमा उसे खुश करती है. ये सब देखकर अनुज और किंजल खुश हो जाते है. वहीं दूसरी ओर गुरु मां, अनुपमा के सामान के बीच उसकी फोटो देख लेती है, जिससे उन्हें गुस्सा आ जाता है और वह कहती है अनुपमा की सारी खुशियां छीन लेगी. दूसरी तरफ पार्टी के बीच अनुपमा की नजर अखबार पर जाती है वह उस पर अपनी खबर पढ़ लेती है. वह न्यूज आर्टिकल देखकर हैरान हो जाती है.

अनुपमा की जिंदगी में तूफान बनेंगी डिंपल

अनुपमा में देखने को मिलेगा कि डिंपल मीडिया के सामने अनुपमा के खिलाफ बयान दे देगी. वह मीडिया वालों को बताएगी कि अनुपमा ने मालती देवी का कॉन्ट्रैक्ट तोड़ा है, जिससे मालती देवी का अच्छा-खासा नुकसान हुआ है. ऐसे में मालती देवी उसपर मुकदमा भी कर सकती हैं. इस बात के लिए बा और तोषू सहित घर के बाकी सदस्य डिंपल को जमकर खरी-खोटी सुनाते हैं.

‘Drishyam 2’ एक्ट्रेस इशिता दत्ता बनीं मां, 8 साल पहले हुई थी शादी

टीवी से शुरुआत करके बॉलीवुड में अपनी जगह बनाने वाली ‘दृश्यम 2’ एक्ट्रेस इशिता दत्ता और एक्टर वत्सल सेठ के घर में किलकारियां गूंजी है. दरअसल एक्ट्रेस इशिता दत्ता और वत्सल सेठ के घर में नन्हा मेहमान आया है. इशिता दत्ता ने कुछ दिनों पहले ही इंस्टाग्राम स्टोरी शेयर की थी, जिसमें उन्होंने प्रेग्नेंसी से जुड़ा अपडेट दिया था. इशिता दत्ता का कहना था कि प्रेग्नेंसी का आखिरी महीना बिल्कुल भी आसान नहीं होता है. बेटे के जन्म के लिए इशिता दत्ता और वत्सल सेठ को फैंस की तरफ से कई सारी बधाइयां मिल रही हैं.

इशिता ने बेटे को दिया जन्म

‘दृश्यम 2’ एक्ट्रेस इशिता दत्ता ने बहुत ही प्यारे बेटे को जन्म दिया है. वहीं सूत्रों के हवाले से पता चला है कि बेबी और मां दोनों ही स्वस्थ है. कहा जा रहा है इशिता को शुक्रवार तक अस्पताल से डिस्चार्ज हो जाएंगी. घर में नन्हा मेहमान आने से परिवार में खुशी का ठिकाना नहीं.

प्रेग्नेंसी की घोषणा 31 मार्च की

एक्ट्रेस इशिता दत्ता और वत्सल सेठ ने 31 मार्च को इस बात की घोषणा की थी कि उनके घर नन्हा मेहमान आने वाला है. इशिता दत्ता की बेबी शावर से जुड़ी तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुई थीं, जिसमें काजोल ने भी शिरकत की थी. इसके साथ ही कुछ दिन पहले ही बांग्ली अंदाज में बेबी शावर हुआ था जिसकी वीडियो एक्ट्रेस ने सोशल मीडिया पर शेयर की थी.

 

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एक्ट्रेस नें कहा पहला 3 महीना काफी मुश्किल था लेकिन इस हालत में मैंने काम करना नहीं छोड़ा था. इशिता ने अपनी अपकमिंग मूवी की शूटिंग प्रेग्नेंसी तक पूरी की थी.

 

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इशिता दत्ता ने प्रेग्नेंसी को लेकर कहा था कि, “पहला तीन महीना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन उस दौरान ही मुझे 16 से 17 फ्लाइट्स लेनी पड़ी. लेकिन मेरे डॉक्टर ने बहुत ख्याल रखा और इस बात की भी पुष्टि की कि सबकुछ ठीक रहे.”

फंदों की सतरंगी दुनिया

फदों की दुनिया भी बड़ी अजीब होती है. अगर हम गौर से देखें तो इस संसार का हर प्राणी किसी न किसी फंदे के शिकंजे में फंसा हुआ नजर आएगा. कोई अपनी बीवी के फंदों से दुखी है, तो कोई प्रेमिका के प्यार में गरदन फंसा कर कसमसा रहा है, जो न छोड़ती है न ही शादी कर रही है. इतना ही नहीं, कोई पैसे की मारामारी में फंसा है, तो कोई दोस्त की गद्दारी में. कोई बौस की चमचागीरी में, तो कोई नेता या पुलिस की दादागीरी में.

फंदों का एक बहुत बड़ा अखाड़ा हमारी राजनीति को भी कहा जा सकता है. गरदन तक जुल्म की दुनिया में डूबे लोगों को सालों के इंतजार के बाद कानून गले में फंदा पहनाने का हुक्म सुना पाता है. पर वोट की शतरंज बिछाए नेताओं को ऐसे लोगों से सहानुभूति हो जाती है. वे फांसी के फंदे में भी फंदा फंसा अपनी वोट की राजनीति कर जाते हैं यानी उन्हें छुड़ा लेते हैं.

इस प्रसंग में एक और किस्म के प्राणियों का यदि जिक्र न किया तो यह चर्चा बेजान नजर आएगी. वे हैं हमारी हाउस मेकर बहनें, जिन्हें सर्दियों के आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है. सितंबर में जरा सर्द हवाएं चलीं नहीं कि उन का ऊन, सलाइयों और फंदों का सफर शुरू हो जाता है.

इस में पहले पिछले साल के आधेअधूरे छोड़े स्वैटरों पर काम शुरू होता है, फिर नए ऊनों के लिए बाजार का रुख किया जाता है. जल्दीजल्दी रसोई और घर का काम निबटाया जाता है और वे ले कर बैठ जाती हैं ऊन और सलाइयां. कभी घरों की छतों पर महफिल जमती है, तो कभी किसी की धूप वाली बालकनी में.

बुनाई के साथ ये गृहिणियां एकदूसरे से बहुत से टिप्स भी बांट लेती हैं. जैसे, मटर के छिलकों की रैसिपी, कई चीजों के दाम, कहां मिलेंगी महंगाई के जमाने में कौन सी चीजें सस्ती. सारी जानकारियां बिलकुल सच्ची और फ्री में. साथ में सुखदुख और महल्ले की अपडेट खबरें, जो किसी अखबार या न्यूज चैनल पर किसी को नहीं मिल सकतीं और सब से कमाल की बात यह कि यह सब चलता रहता है और हाथ की सलाइयां बिना रुके फंदों पर फंदे पिरोती जाती हैं. शायद इसे ही कहते हैं एक पंथ दो काज.

बुनाई का फंदा जिस को भा गया, उस की मनोदशा ही कुछ अजीबोगरीब हो जाती है. उस का रातदिन ऐसी कल्पनाओं के संसार में खोया रहता है कि कौन से रंग में कौन सा कौंबिनेशन खूब जमेगा, रजनी की बहू को सर्दियों में बच्चा होगा, उस के लिए अभी से 1-2 बेबी सैट तैयार करने हैं. वहां रजनी की ननद भी जरूर आएगी. बुनाई और स्वैटर बनाने में तो वह ऐक्सपर्ट है.

मैगजीन वगैरह में भी उस के बनाए स्वैटरों के डिजाइन निकलते हैं और जिस महफिल में वह जाती है, बुनाई पूछने और प्रशंसा करने वालों से घिरी रहती है. उस के स्वैटर से मेरे स्वैटर किसी तरह से कम नहीं होने चाहिए. इसी सोच और उधेड़बुन में काफी समय निकल जाता है. यह स्पर्धा और ईर्ष्या भी अजीब चीज होती है. कभी आगे बढ़ाती है तो कभीकभी दिल को जला कर भी रख देती है.

उर्मिलाजी अपनी बालकनी से पड़ोस में नई बसी फैमिली में एक छोटे बच्चे को रोजाना देखती थीं. वह नएनए डिजाइन के स्वैटर पहने चहक रहा होता. अब कैसे एकदम अनजान लोगों से मित्रता बढ़ाई जाए और उस पर भी एकदम से स्वैटर का डिजाइन पूछना काफी ‘भद्दा’ लगता है. पर अपने पर कंट्रोल भी तो नहीं होता. खैर, किसी तरह नए पड़ोसी से बच्चे के बहाने मेलजोल बढ़ा लिया और अवसर मिलते ही छेड़ दी सलाई और फंदों की बातें.

पड़ोसिन भी एक नंबर की बुनक्कड़ निकलीं. दोनों के विचार मिले तो ऊन और सलाइयां तो जैसे हाथों में भागने लगीं. बस जल्दी से रसोई और जरूरी दैनिक कार्य निबटाए और बुनाई का काम शुरू. कभीकभी तो यह काम कंपीटिशन जैसा हो जाता और हाथ की हड्डियां दर्द होने लगतीं. घर वालों से दर्द की बात कहने पर डांट और सहनी पड़ती. फिर भी बुनाई का सफर मुश्किलों से जू?ाते हुए अनवरत जारी रहता. सचमुच बुनाई को जिन्होंने हौबी बना लिया, उन्हें तो हर हालत में इस से जुड़ा कुछ न कुछ करते रहना होता है.

रंजना को एक इंटरव्यू देने जाना था. वह अपने हाथ का बुना लेटैस्ट बुनाई वाला स्वैटर पहन कर वहां गई. वहां इंटरव्यू टीम की एक महिला की नजर उस पर गई तो रंजना की काफी तारीफ हुई. साइंस स्टूडैंट हो कर भी उस की बुनाई में ऐसी सफाई और निपुणता देख सभी वाहवाह कर उठे. पता नहीं रंजना को वह जौब मिलेगी या नहीं पर यह जान कर उसे बहुत अच्छा लगा कि हाथ की बुनाई के कद्रदान सभी जगह बैठे हैं.

छोटे बच्चों के लिए हाथ से बुने प्यारे व आकर्षक रंगबिरंगे स्वैटर का रिवाज सदियों से हमारी हाउस मेकर बहनों के कारण आज भी कायम है. जो लोग बुनाई नहीं कर सकते, वे ईर्ष्यावश ये कमैंट्स करते देखे गए हैं कि हमारे बच्चे तो हाथ के बुने स्वैटर पहनते ही नहीं, इसलिए हमें इतनी मेहनत करने और आंखें लगाने की क्या जरूरत है? फिर बाजार में एक से बढ़ कर एक सुंदर डिजाइन वाले स्वैटर मिल जाते हैं, तो क्यों न हम उन्हें खरीदें.

पर आज भी जिन के घरों में मम्मी, दादी, नानी, मौसी, ताई या कोई और हाथ की बुनाई की कला में सिद्धहस्त है, उन घरों के किशोर बच्चे बड़े शौक से उन के हाथ के बुने स्वैटर पहन कालेज, जौब और कई बार तो फंक्शन में भी जाते हैं और बड़े गर्व से सब को बताते भी हैं कि यह उन की मां, बूआ, दादी या किसी और ने उन्हें जन्मदिन पर बना कर दिया है.

ऐसे उपहार में 1-1 फंदे में गुंथीबुनी होती हैं देने वाले की सच्ची, कोमल, लगाव भरी भावनाएं और लेने वाला जब भी उस स्वैटर को सर्द हवाओं में पहनता है तो देने वाले की नेह भरी गरमाहट के फंदों की गिरफ्त में आए बिना नहीं रह पाता.

आप भी इन सर्दियों में ऐसे मधुर, रंगीन धागों के फंदों में अपना दिल जरूर फंसाएं और बुनतेबुनते प्यार बढ़ाएं.

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