आखिरी बिछोह: भाग-1

होटलकी लिफ्ट में नित्या दिखी, तो अचानक बरसों बाद नित्या से मिलने के रोमांच से वह घिर गया. नित्या के शरीर में उम्र का भराव आ गया था. देह मांसल हो गई थी. कालेज की छरहरी लड़की से परिपक्व नित्या का व्यक्तित्व तुलनात्मक रूप से ज्यादा आकर्षक लग रहा था. लिफ्ट में 6 लोग थे. नित्या ने या तो उसे पहचाना नहीं या फिर उसे देख नहीं पाई. उसे देखने के रोमांच में डूबा वह जैसे नित्या से बात करना ही भूल गया. उसे तीसरी मंजिल पर जाना था. जब तक वह कुछ कहने का मन बनाता, तीसरी मंजिल आई गई और लिफ्ट

रुक गई. लिफ्ट का दरवाजा खुलते ही वह बाहर आ गया.

इन पलों में उस के दिमाग में इतने प्रश्न उमड़े कि उन की गिनती करना मुश्किल था. इन पलों में उस के दिमाग में इतने दृश्य चलायमान हुए कि उन्हें ठीक से देख पाना भी मुश्किल था. लिफ्ट से बाहर निकलते समय वह मात्र यह सोच रहा था कि नित्या किस मंजिल पर जाएगी

वह सोच ही रहा था कि नित्या भी लिफ्ट से बाहर आ गई. उस ने सोचा कि नित्या उसे देख कर रुकेगी पर वह उस पर नजर डाल कर आगे बढ़ गई. अपनी उपेक्षा से वह बेचैन हो गया, फिर उस ने मन को समझाया कि हो सकता है वह उसे पहचान न पाई हो. आखिर कितना लंबा

समय बीत गया है दोनों की मुलाकात को हुए.

वह नित्या के पीछेपीछे चल दिया. नित्या जा कर उस के कमरे के ठीक बगल वाले कमरे के सामने रुकी और फिर पर्स से चाबी निकाल कर दरवाजे का ताला खोलने लगी. नित्या उस के बगल वाले कमरे में रुकी है, यह जान कर उस के सवाल जैसे रुक गए. उस की बेचैनी कम हो गई. नित्या से मुलाकात का मौका अब बहुत करीब नजर आ रहा था. उस ने देखा कि नित्या दरवाजा नहीं खोल पा रही है.

उस का उतावलापन छलक गया. अत: उस ने उस के पास जा कर कहा, ‘‘कैन आई हैल्प यू?’’

नित्या ने पलट कर उस की ओर गुस्से में ऐसे देखा जैसे आम लड़की फ्लर्ट करने वाले पुरुष को देखती है.

वह एक पल के लिए सकुचा गया. फिर हड़बड़ाहट में कहा, ‘‘तुम ने मुझे पहचाना नहीं?’’

नित्या ने उस की ओर देखा और फिर दिमाग पर जोर देते हुए कहा, ‘‘अरे, अनुज… रियली सौरी. मेरे दिमाग में तो अभी तक तुम्हारी वही घुंघराले बालों वाले दुबलेपतले लड़के की छवि थी,’’ और फिर हंसने लगी.

अनुज ने दरवाजा खोला तो नित्या ने उसे कमरे के अंदर आने का निमंत्रण दिया. अनुज जैसे इस प्रतीक्षा में ही था. अत: चुपचाप नित्या के पीछेपीछे कमरे में आ गया.

नित्या आते ही पलंग पर पसर गई, ‘‘आज तो बहुत थक गई हूं. प्लीज, अनुज 2 कप चाय का और्डर दे दो.’’

अनुज ने रूम सर्विस पर चाय का और्डर दिया और फिर वह भी आराम से कुरसी पर बैठ गया. संवाद शुरू करने का कोई सिरा अनुज के हाथ नहीं आ रहा था. नित्या भी आंखें बंद कर पलंग पर थकान मिटा रही थी. कमरे में चाय आने तक चुप्पी छाई रही. चाय आते ही नित्या उठ कर पलंग पर बैठ गई. दोनों चाय पीने लगे.

अनुज ने यों ही संवाद शुरू करने की गरज से कहा, ‘‘मैं तो तुम से मुलाकात की उम्मीद ही खो चुका था.’’

नित्या ने जैसे उसे अनसुना करते हुए कहा, ‘‘मैं ने तो यह कल्पना भी नहीं की थी कि तुम इतनी बदली हुई काया के साथ मिलोगे. तुम तो आधे गंजे हो चुके हो, पेट भी अधेड़ों की तरह बाहर आ गया है. इस उम्र में भी तुम 40-50 के लगने लगे हो,’’ और फिर हंसने लगी.

अनुज झेंप गया और फिर अपना ध्यान इस ओर से हटाने के लिए चुपचाप चाय पीने लगा. नित्या की हंसी रुकने के बाद कुछ पलों तक खामोशी छाई रही. अनुज नित्या के मजाक से आहत हो गया था. उस ने इस स्थिति से उबरने के लिए प्रश्न किया, ‘‘लगता है तुम मुझे केवल मेरे घुंघराले बालों और खूबसूरत शरीर के लिए ही पसंद करती थीं.’’

‘‘तुम तो बुरा मान गए. शारीरिक सुंदरता मानवीय पसंद का महत्त्वपूर्ण फैक्टर है. सब से पहले किसी व्यक्ति का शारीरिक सौंदर्य ही देखा जा सकता है. हां, हम जिसे जान जाते हैं उस के आंतरिक सौंदर्य को भी देख पाते हैं. तब पसंद में आंतरिक सौंदर्य का तत्त्व भी प्रधानता से जुड़ जाता है. तुम तो मेरे पुराने मित्र हो. मैं ने तो एक मित्र के नाते तुम्हारी ईमानदार समीक्षा की थी,’’ नित्या ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘चलो, तुम्हें यह तो याद है कि हम कभी मित्र थे.’’

नित्या को लगा कि अनुज ज्यादा आहत हो गया है, इसलिए उस ने आगे कुछ नहीं कहा. वह केवल मुसकरा दी. यों तो दोनों के पास चर्चा करने के लिए एक लंबा अतीत था, जो उन्होंने साथ गुजारा था, पर न जाने क्यों दोनों के बीच खामोशी पसरी थी. अनुज की अकुलाहट बढ़ रही थी. वह किसी भी हालत में इस मुलाकात को इतनी औपचारिक चुप्पी के साथ नहीं बिताना चाहता था. अत: उस ने चुप्पी में सेंध लगाते हुए कहा, ‘‘भोपाल कैसे आना हुआ?’’

‘‘अपने ऐक्स हसबैंड की शादी में आई थी,’’ नित्या ने बिंदास अंदाज में कहा.

‘‘मजाक कर रही हो?’’

‘‘इस में मजाक क्या है? रुचिर से मेरा तलाक शादी के 2 साल बाद ही हो गया था. तुम्हें शायद जानकारी नहीं है. हां, इस दौरान हमारा संवाद भी नहीं हुआ. अगर बात होती तो यह बात मैं तुम्हें जरूर बताती. रुचिर ने मेरी सहेली ऋचा से शादी की. मुझे निमंत्रण दोनों ने दिया था और आग्रह भी बहुत किया था, इसलिए चली आई.’’

अनुज अवाक सा नित्या की ओर देखता रह गया. नित्या के चेहरे पर न उदासी थी और न ही आक्रोश था. उस के चेहरे से लग रहा था जैसे वह किसी खास रिश्तेदार की शादी अटैंड करने के बाद बहुत उत्साह के साथ वापस आई है.

अनुज कुछ कहना चाहता था पर उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे. फिर उस ने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा, ‘‘तुम ने भी अपनी शादी पर आग्रह किया था पर शायद मैं कमजोर पड़ गया था.

मेरे ख्वाबों में जो आए

तलाकशुदा अनुपा अपनी जिंदगी दोबारा शुरू करना चाहती थी, मगर जब मनीष नाम के शख्स से उस की शादी की बात चली तो फिर क्या हुआ कि उसे शादी से ही नफरत होने लगी. अनुपाबहुत देर तक जीवनसाथी की वैबसाइट पर कमल का प्रोफाइल चैक करती रही. कमल का 3 वर्ष पहले डाइवोर्स हुआ था और उस का 12 साल का बेटा था. अनुपा का खुद विवाह के 5 वर्षों के बाद ही अपने पति से अलगाव हो गया था, मगर डाइवोर्स की प्रक्रिया इतनी लंबी थी कि पूरे सात वर्ष लग गए. आज अनुपा 38 वर्ष कीहो चुकी थी.

मगर शरीर की बनावट के कारण वह 30 वर्ष से अधिक की नहीं लगती थी. घर में उस के भाई, बहन सब अपनीअपनी जिंदगी में व्यस्त थे. बूढ़े मातापिता को अनुपा के पास छोड़ कर वे अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर चुके थे. मम्मी, पापा भी जबतब सब रिश्तेदारों के सामने अनुपा की जिम्मेदारी का दुखड़ा रोते थे, मगर कौन किस की जिम्मेदारी उठा रहा है यह बस अनुपा ही जानती थी.

कभी मम्मी का डाक्टर से अपौइंटमैंट होता तो कभी पापा का. बड़ी बहन और छोटा भाई भी छुट्टियों में आ कर मम्मी, पापा की खैरखबर ले लेते थे, मगर अपनी प्राइवेसी में वे उन का दखल नहीं चाहते थे.

आज मम्मीपापा ने फिर से अनुपा के लिए एक रिश्ता ढूंढ़ कर रखा था. मगर अनुपा कैसे अपने मम्मीपापा को सम झाए कि वह दोबारा शादी के बंधन में नहीं बंधना चाहती. पहली शादी में वह सब पा चुकी थी. उस के बहुत से पुरुष मित्र थे और वह ऐसे ही हंसतेखेलते जिंदगी काटना चाहती थी.

आर्थिक रूप से अनुपा स्वभावलंबी थी. पहली शादी के टूटने के बाद, कोर्टकचहरी के चक्कर लगाने के कारण अब भावनात्मक रूप से भी स्वतंत्र थी और शारीरिक जरूरतों को पूरी करने के लिए उस के पास औप्शंस की कमी

नहीं थी.

मगर उसे हंसताखेलता देख कर अनुपा के परिवार को शक होने लगता था. परिवार अनुपा को शादी के खूंटे से बांधना चाहता था. अनुपा का प्रोफाइल उस के परिवार ने मैट्रिमोनियल साइट्स पर डाला हुआ था और कमल का इंट्रैस्ट वहीं आया था. अनुपा का मन नहीं था पर फिर भी मम्मीपापा के कारण अनुपा ने कमल से मिलना निश्चित कर लिया.

अनुपा ने शनिवार की शाम को कमल से मिलने के लिए चुना. उस ने आसमानी रंग की साड़ी पहनी थी और बाल खुले ही छोड़ दिए थे. छोटी सी बिंदी और हलकी लिपस्टिक में वह दिलकश लग रही थी.

अनुपा के मन में ढेर सारी बातें थीं. जब अनुपा ने रंगोली होटल का दरवाजा खोला तो कमल वहां पहले से ही बैठा था. कमल के

बराबर में एक 12 वर्ष के करीब का लड़का भी बैठा था.

अनुपा को देख कर कमल उठ गया. उस ने अनुपा को ठीक से देखा भी नहीं. पूरा समय अपने बेटे युग के बारे में ही बात करता रहा. अनुपा को ऐसा महसूस हुआ, कमल को अपने लिए बीवी नही, अपने बेटे युग के लिए एक केयरटेकर चाहिए. उसे लगा जैसे अगर थोड़ी देर वह और बैठी तो उस का दम घुट जाएगा.

कमल के जाते ही अनुपा ने अपने लिए एक ड्रिंक और्डर किया. पहले ड्रिंक के बाद उस का मन फूल सा हलका हो गया, दूसरे ड्रिंक के बाद अनुपा के ऊपर ऐसा नशा छाया कि वह उठ कर डांस करने लगी.

कुछ ही देर बाद एक आकर्षक नौजवान अनुपा के साथ थिरकने लगा. लगभग आधे घंटे बाद दोनों ने 1-1 ड्रिंक और लिया और फिर थिरकने लगे. लड़के का नाम कशिश था और वह सौफ्टवेयर कंपनी में प्रोजैक्ट मैनेजर था. अनुपा और कशिश लगभग 12 बजे तक साथ बैठे रहे. जब 12 बजे कशिश ने अनुपा को छोड़ा तो अनुपा के मम्मीपापा जगे हुए थे.

मम्मी चहकते हुए बोलीं, ‘‘कैसा रहा?’’

अनुपा बोली, ‘‘कुछ नहीं, उसे पत्नी नहीं अपने बच्चे के लिए मां चाहिए.’’

पापा बोले, ‘‘तो ठीक है न तुम्हें भी मां कहने वाला कोई मिल जाएगा.’’

अनुपा मुसकराते हुए बोली, ‘‘मु झे बेटा नहीं, जीवनसाथी चाहिए,’’ इस से पहले मम्मी कुछ बोलतीं, अनुपा ने दरवाजा बंद कर लिया.

कपड़े बदलते हुए कशिश के कौंप्लिमैंट्स याद कर के मन ही मन मुसकरा उठी थी.

आज की रात बेहद हसीन थी. अभी बैड पर

लेटी ही थी कि कशिश का मैसेज आ गया. वह अनुपा को दोपहर लंच के लिए इनवाइट कर

रहा था.

अनुपा जब अगले दिन लंच के लिए

तैयार हो रही थी तभी मम्मी बोलीं, ‘‘मु झे

थोड़ा जहर दे दे अनुपा, तू क्यों नहीं अपना घर बसाना चाहती है? क्या इस उम्र में तु झे कोई राजकुमार मिलेगा?’’

अनुपा बोली, ‘‘राजकुमार नहीं मम्मी हमसफर चाहिए और अगर नहीं मिला तो मैं ऐसे ही खुश हूं.’’

मम्मी कड़वाहट के साथ बोलीं, ‘‘न जाने कौन होगा तेरे ख्वाबों का राजकुमार.’’

रेस्तरां में कशिश पहले से ही बैठा था. लंच के बाद थोड़ी इधरउधर की बातें हुईं और फिर कशिश और अनुपा लौंगड्राइव के लिए निकल गए.

कार को एक सुनसान जगह पर रोक कर कशिश के हाथ धीरेधीरे अनुपा के शरीर के ऊपर रेंगने लगे. अनुपा ने पहले धीरे से मना किया, मगर जब कशिश के हाथ रुक ही नहीं रहे थे तो अनुपा ने कशिश का हाथ पकड़ कर जोर से  झटक दिया.

कशिश गुस्से में फुफकारते हुए बोला, ‘‘तुम्हारे जैसी बूढ़ी औरत के साथ मु झे मजा ही क्या आएगा.’’

अनुपा कार से उतरती हुई बोली, ‘‘तुम्हारे जैसे थर्डग्रेड लोफर के साथ किसी 20 साल की लड़की को भी मजा नही आएगा.’’

उस के बाद अनुपा ने वहीं से अजय को

कौल किया. अजय करीब 15 मिनट

बाद पहुंच गया. अजय अनुपा का फ्रैंड था या

यों कहें फ्रैंड से कुछ ज्यादा था. दोनों के पास जब भी समय होता तो वो लौंगड्राइव पर निकल जाते थे. अजय एक तरह से अनुपा का पार्टटाइम हसबैंड था.

अजय का भी अपनी पत्नी से कुछ वर्ष पहले अलगाव हो गया था. मगर अजय और अनुपा दोनों ही एक बार शादी का लड्डू चखने के बाद दोबारा उसे खा कर अपनी जिंदगी खराब नही करना चाहते थे.

अनुपा को कार में बैठाते हुए अजय

बोला, ‘‘आज क्या हो गया, किस के साथ

आई थी?’’

अनुपा आंखों में पानी भरते हुए बोली, ‘‘मु झे बूढ़ी बोल रहा था जब मैं ने उसे उस की सीमा लांघने को मना कर दिया तो.’’

अजय हंसते हुए बोला, ‘‘देखा  25 साल

के लड़के के लिए तो तू बूढ़ी ही होगी. मगर यह तुम ने बिलकुल सही किया और आगे से हर किसी पर इतनी जल्दी विश्वास करने की जरूरत नहीं है.’’

फिर अजय अनुपा को कौफी पिलाने के लिए ले गया. जब शाम 6 बजे अनुपा लौटी तो मम्मी गुस्से में भरी बैठी थीं और अनुपा को देखते ही बोलीं, ‘‘क्या सोच रखा है तुम ने? हम तेरे कारण अपना घरवार छोड़ कर बैठे हुए हैं. बहू की सेवा और पोतेपोतियों के साथ न खेल पा रहे हैं पर तू तो 16 साल की लड़की को भी मात कर रही है.’’

पहले अनुपा इन बातों पर आंखों में पानी भर लेती थी और पूरापूरा दिन घर में खुद को कैद कर के रखती थी. मगर जब वह धीरेधीरे डिप्रैशन में जाने लगी तो उस की एक सहकर्मी उसे काउंसलर के पास ले गई. वहीं अनुपा की अजय से मुलाकात हुई थी.

अजय के साथ धीरेधीरे अनुपा की गहरी दोस्ती हो गई थी. जब से अजय अनुपा की जिंदगी में आया था अनुपा का जिंदगी जीने

का नजरिया ही बदल गया था. अनुपा के परिवार और समाज की नजरों में अनुपा पथभ्रष्ठा हो

गई थी.

आज जब अनुपा दफ्तर से घर पहुंची तो उस की बड़ी दीदी शिखा आई हुई थी. शिखा अपने दूर के देवर का रिश्ता ले कर आई थी जिस की हाल ही में पत्नी की मृत्यु हो गई थी.

शिखा चहकते हुए बोली, ‘‘अनु, सब से अच्छी बात यह कि वह इसी शहर में रहता है तो न तु झे नौकरी बदलनी पड़ेगी और मम्मीपापा को भी तू आराम से देख पाएगी.’’

अनुपा को लगा ऐसी शादी के बाद तो उस की दोहरी जिम्मेदारी हो जाएगी, मगर अनुपा अपने परिवार को मना नहीं कर पाई थी.

शाम को जब अनुपा ने अजय को इस रिश्ते के बारे में बताया तो अजय बोला, ‘‘देख ले हो सकता है वह वाकई तुम्हारे काबिल हो.’’

शाम को शिखा का देवर मनीष अपने

परिवार के साथ आया. मनीष का

अपना व्यापार था और उस के 10 और 12 साल के दो बच्चे थे.

जब अनुपा तैयार हो कर आई तो मनीष लगातर अनुपा को क्षुधा भरी नजरों से घूर रहा था.

अनुपा इतने पुरुषों से मिल चुकी थी, मगर

मनीष की आंखें न जाने क्यों उसे असहज कर रही थी.

थोड़ी देर बाद मनीष ने शिखा से कहा, ‘‘भाभी, मैं अनुपा को थोड़ी देर घुमा कर ले आऊं क्या?’’

शिखा ने खुश होते हुए कहा, ‘‘क्यों नहीं.’’

कार में बैठते ही मनीष अनुपा से बोला, ‘‘तुम ऐसे क्यों छुईमुई सी

हुई जा रही हो? एक बार शादी

हो चुकी है…

और क्या तुम्हारे जीवन में कोई पुरुष नहीं है?’’

अनुपा को मनीष की बातें सुन कर  झुर झुरी सी हो गई थी. फिर धीरे से मनीष ने अनुपा की थाई पर हाथ रख दिया.

अनुपा का मन वितृष्णा से भर उठा. उस ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘मनीष कार रोक दो.’’

मनीष गुस्से में बोला, ‘‘सब पता है

तुम्हारी जैसी औरतों का… 36 जगह

मुंह मारने के बाद मेरे सामने सतीसावित्री बनने का नाटक कर रही है.’’

अनुपा बिना कोई जवाब दिए कार से उतर गई और सामने वाले कैफे में बैठ गई. बारबार अनुपा यही मनन कर रही थी कि क्या शादी वाकई उस के लिए जरूरी है, क्या वह ऐसे लोगों के साथ अपनी जिंदगी बिता सकती है?

जब शाम को अनुपा घर पहुंची तो शिखा दीदी गुस्से में बोली, ‘‘इतनी मुश्किल से मैं ने मनीष को मनाया था पर तुम्हें तो शायद चिडि़या की तरह हर डाली पर फुदकने की आदत पड़ गई है. तुम घोंसला कैसे बना सकती हो.’’

उधर मम्मीपापा का भी इमोशनल ड्रामा

शुरू हो गया था, ‘‘हम अपना घरद्वार छोड़े

बैठे हैं.’’

अनुपा ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मम्मीपापा आप कुछ दिनों के लिए दीदी या भाई के

यहां चले जाएं. आप मेरे बारे में चिंता न करें.

मैं अपनी जिंदगी अपने हिसाब से गुजारना

चाहती हूं.’’

अनुपा की बात सुन कर जहां मम्मी ने रोनाधोना शुरू कर दिया वहीं शिखा

दीदी ने एकाएक पैतरा बदल लिया, ‘‘अरे, तु झे मम्मीपापा अकेला कैसे छोड़ सकते हैं. अभी हम तु झे शादी के लिए फोर्स नही करेंगे पर अनुपा तेरे ख्वाबों के सपनों का राजकुमार तो अब इस उम्र में तो नहीं मिलेगा.’’

अनुपा हंसते हुए बोली, ‘‘दीदी, मेरे ख्वाबों में कोई राजकुमार नहीं आता है. मेरे ख्वाबों में बस मैं ही मैं हूं, जो हर दिन से कुछ नया सीख कर एक साहसी महिला के रूप में खुद को पहचान रही है.’’

‘‘कभी कोई ऐसा मिला जो मेरे साथ मेरे ख्वाब सा झा कर सकेगा तो जरूर शादी करूंगी.’’

शिखा दीदी और मम्मीपापा अनुपा की

बातें सुन कर उसे अजीब नजरों से देख रहे थे, मगर वे लोग भी तो अपनेअपने स्वार्थ के कारण मजबूर थे.

भाभी हमारे यहां ऐसे ही होता है

निधिकी शादी को 5 वर्ष हो चुके थे. सासससुर और पति नितिन के साथ उस ने बेहतर सामंजस्य बैठा लिया था, लेकिन उस की नकचढ़ी ननद निकिता अब भी मानती नहीं थी कि निधि उन के घर की परंपरा को निभा पा रही है.

अकसर निकिता किसी न किसी बात पर मुंह बना कर बोल ही देती, ‘‘भाभी, हमारे यहां ऐसा ही होता है.’’

उस की यही बात निधि को चुभती थी. शुरूशुरू में अपने कमरे में जा कर रोती भी थी. पति नितिन को भी बताया तो उन्होंने भी यह कह कर टाल दिया, ‘‘उस की बात को दिल से मत लगाओ, घर में सब से छोटी है, सब की प्यारी होने से थोड़ी मुंहफट हो गई है. अनसुना कर

दिया करो.’’

निधि को सम झ नहीं आता कि कोई उसे कुछ कहता क्यों नहीं है. क्या उसे दूसरे घर नहीं जाना है. परंतु सब ऐसे ही चलता रहा. न निधि ने बुरा मानना छोड़ा न ही निकिता ने उसे घर के रिवाज सिखाना.

आज निधि का बेटा पहली बार अपने स्कूल जा रहा था. सभी ऐसे उत्साहित थे जैसे कोई त्योहार हो. निधि ने उसे स्कूल यूनिफौर्म पहना कर तैयार कर दिया. उस के बाल कंघी कर रही थी तभी निकिता कटोरी में कुछ ले कर आई और चम्मच से उसे खिलाने लगी. धु्रव नानुकर कर रहा था. निधि ने भी बोल दिया, ‘‘दीदी बच्चा है, नहीं मन है उस का, स्कूल से आ कर खा लेगा.’’

निकिता तुनक गई, ‘‘भाभी, हमारे यहां ऐसा ही होता है. जब कोई पहली बार घर से बाहर किसी काम के लिए जाता है, मीठा दही खा कर ही जाता है.’’

निधि कुछ बोलती उस से पहले ही नितिन ने आ कर धु्रव को गोद में उठा लिया और अपनी उंगली में लगा कर मीठा दही उस के होंठों पर लगा दिया, ‘‘स्कूल को लेट हो रहा है,’’ कह कर धु्रव को ले कर चला गया.

निधि अपने कमरे में चली गई. निकिता अब भी बोले जा रही थी, ‘‘मैं ने क्या गलत कर दिया. भाई तो अब सबकुछ भूल गए हैं. पहली बार औफिस गए थे तब भी मीठा दही मु झ से ही मांग कर खा कर गए थे. उन का बेटा मेरा भी तो भतीजा है, क्या मैं उसे दही नहीं खिला सकती?’’

पापाजी ने उसे आवाज लगाई तब जा कर वह चुप हुई. निधि इन घटनाओं से बहुत आहत होती थी, परंतु कोई हल नहीं निकाल पाती.

संयोग से उसी दिन उस की मम्मी का

फोन आया. उन्होंने बताया कि उस का भाई और भाभी विदेश से वापस आने वाले हैं. भाई विदेश में ही नौकरी करता था. उस ने वहीं पर भारतीय मूल की एक लड़की से विवाह कर लिया था. शादी के बाद वे दोनों पहली बार घर वापस आ रहे थे.

मां चाहती थी कि पूरे रीतिरिवाज के साथ नई बहू का स्वागत किया जाए. इसीलिए उन्होंने निधि को घर बुलाया था. घर उसी शहर में था इसलिए नितिन उसी दिन शाम को निधि को उस के घर छोड़ आया.

अगले दिन भाईभाभी आ गए. दरवाजे पर उस के भाई विकास के साथ खड़ी

लड़की को देख कर निधि दंग रह गई. उस ने लाल रंग की साड़ी पहन रखी थी, सिर पर पल्लू ले रखा था और माथे पर लाल रंग की बड़ी सी बिंदी लगा रखी थी. किसी भी तरह से वह विदेशी लड़की नहीं दिख रही थी. मम्मीपापा तो उस की एक  झलक पर ही गदगद हो गए. निधि भी उस से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाई.

विकास बोला, ‘‘अरे भई अब घर के अंदर भी तो आने दो. क्या बाहर ही खड़े रखोगे.’’

निधि ने मुसकरा कर दोनों को अंदर आने का इशारा किया. घर की देहरी के अंदर रंगोली बना कर, चावलों से भरा एक कलश रखा था.

नई बहू ने पैर अंदर रखने से पहले उसे हाथ में उठा लिया.

निधि तुरंत उस के हाथ से कलश ले कर वापस उसी स्थान पर रख कर बोली, ‘‘भाभी हमारे यहां कलश को पैर से गिरा कर तब घर के अंदर प्रवेश करते हैं.’’

नई बहू ने मुसकरा कर वैसा ही किया और विकास के साथ अंदर आ गई. बाकी की रस्में पूरी करने के बाद सब ने खाना खाया और निधि मां के कमरे में सोने चली गई. मां अभी बाहर ही थीं. तभी भाभी कमरे में आईं. निधि के इशारा करने पर उस के पास ही बैठ गई. निधि का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘थैंक्यू, दीदी आप ने मु झे बताया कि घर के अंदर आने की रस्म कैसे की जाती है. मैं तो उलटा ही कर रही थी.’’

निधि हैरान थी कि भाभी इतनी अच्छी हिंदी भी बोल लेती हैं. भाभी ने निधि का हाथ पकड़ा तो उस की चेतना वापस आई, ‘‘दीदी जब तक मैं यहां हूं, आप को रुकना पड़ेगा. मु झे और भी बहुत कुछ जानना है आप के घर के रिवाजों के बारे में. अब यही मेरा भी घर है.’’

भाभी की बात से निधि को कुछ याद आया. उस का व्यवहार… जब निकिता उसे अपने घर

के बारे में कुछ बोलती थी तब उस ने कभी भी भाभी की तरह निकिता की बातों को सहजता से नहीं लिया.

निधि ने भाभी के हाथ पर हाथ रख कर कहा, ‘‘पूरी कोशिश करूंगी भाभी, आप के

जाने तक रुकने की. वैसे तो आप खुद बहुत सम झदार हो. कुछ दिन यहां रहोगी तो देख कर ही सब सीख जाओगी. अभी आप सो जाओ, कल बात करेंगे.’’

भाभी गुड नाइट बोल कर चली गई. निधि की आंखों में नींद नहीं थी. उस के सामने वे सभी घटनाएं घूम रही थीं जब उस की और निकिता की बहस होती थी.

अगले दिन निधि उठते ही फिर से आगे की रस्मों के विषय में मां से बात कर रही थी. तभी फोन की घंटी बज उठी. उस ने फोन अटैंड किया, निकिता का फोन था. निकिता कुछ बोलती उस से पहले ही निधि शुरू हो गई, ‘‘दीदी, मैं जानती हूं हमारे घर में बहुएं अधिक समय तक मायके में नहीं रुकती हैं पर 2 दिन नई भाभी के पास रुक रही हूं. आप वहां हो इसलिए मु झे अपने घर की चिंता नहीं है.’’

उधर से निकिता की खनकती हंसी सुनाई दी, ‘‘मैं कल आ रही हूं भाई के साथ आप को लाने के लिए. कोई बहाना नहीं चलेगा भाभी, हमारे यहां ऐसा ही होता है.’’

निधि भी हंसे जा रही थी, शायद 5 वर्ष में पहली बार खुल कर हंसी थी. निधि का पूरा दिन हंसते हुए ही बीता. अगले दिन नितिन, निकिता और धु्रव उसे घर वापस ले जाने के लिए आ गए. भाभी ने बहुत जल्दी की लेकिन नितिन निधि को साथ ले कर ही गए. इस बार पहली बार ससुराल जाते हुए निधि के मन पर कोई बो झ नहीं था. रास्ते में कार में बाते करते हुए सब खुश थे. निकिता बड़ी उत्सुकता से नई बहू की बातें सुन रही थी. निधि ने उसे छेड़ा, ‘‘अब शादी का अगला नंबर आप का ही है, निकिता दीदी. तभी इतने ध्यान से सब सुन रही हो.’’

‘‘ऐसा नहीं है भाभी, कुछ सोच रही थी,’’ निकिता ने निधि की बात का जवाब दिया.’’

हमें भी बताओ ऐसी कौन सी बात है,’’ निधि ने फिर छेड़ा.

निकिता ने बात को टालते हुए कहा, ‘‘अरे छोड़ो न भाभी. आप इन सब बातों को नहीं

मानती हो.’’

अब तो निधि की उत्सुकता और भी बढ़ गई, ‘‘आप बता कर तो देखो,’’ वह हंसते हुए बोली.

धु्रव कुछ खाने की जिद कर रहा था. नितिन ने कार को किनारे रोक दिया और धु्रव को ले कर सामने दुकान पर चला गया.

निकिता और निधि भी कुछ देर के लिए कार से बाहर आ गए. सामने देख कर निकिता अचानक बच्चे की तरह उछल पड़ी, ‘‘अरे भाभी यही वह जगह है जहां परसों सत्संग होने वाला है. 2 साल बाद देवीजी पधार रही हैं.

निधि को याद आ गया, ‘‘अच्छा वही, जिन से धु्रव के पहले जन्मदिन पर घर में सत्संग करवाया था.’’

निकिता ने आश्चर्य से निधि की ओर देख कर कहा, ‘‘आप को याद है? इस बार आप भी साथ में आना.’’

निधि ने बेमन से हां बोल दिया.

मम्मीजी की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए निधि को ही निकिता के साथ सत्संग में जाना पड़ा. निकिता सक्रियता से सब व्यवस्था देख रही थी. शहर के दूसरे लोग भी थे आयोजन में. सत्संग खत्म होने ही वाला था कि तेज आंधी चलने लगी. प्रवचन सुनने आए लोगों में अफरातफरी मच गई. सब जल्दी से निकलना चाहते थे. देखतेदेखते पंडाल पूरा खाली हो गया. आयोजक भी चले गए. नितिन कार ले कर बाहर ही खड़े थे इसलिए निकिता और निधि भी कार में बैठ कर घर आ गए.

 

थोड़ी देर बाद ही पुलिस स्टेशन से फोन आया कि कई औरतों के गहने और

आदमियों के पर्स गायब हो गए. सुबह होते ही पुलिस स्टेशन बुलाया. रात जैसेतैसे गुजरी. सुबह पुलिस स्टेशन में सभी आयोजक थे. निधि का नाम भी आयोजकों में था. पुलिस लगातार पूछताछ कर रही थी. उस का कहना था कि या तो देवीजी और उन के लोग या फिर आयोजक दोनों में से कोई इस लूट में शामिल है.

‘‘देवीजी कभी ऐसा नहीं कर सकती हैं. उन्होंने तो अपनी संपत्ति भी आश्रम को ही दे रखी है,’’ निधि ऊंचे स्वर में बोली.

पुलिस इंस्पैक्टर ने उसे शांत रहने की हिदायत देते हुए बताया कि देवीजी एक लंबी सजा काट चुकी औरत है. ठगी के केस में कई साल जेल में थी. जेल से छूट कर उस ने भगवान के प्रवचन दे कर ठगी शुरू कर दी थी. पुलिस को सूचना मिली थी, इसलिए सत्संग परिसर में पुलिसकर्मी साधारण कपड़े पहने घूम रहे थे.

सारा सामान देवीजी के शिष्यों के पास से ही बरामद कर लिया गया. निकिता घर पंहुची

तो मम्मीपापा की नजरों का सामना नहीं कर पा रही थी. उसे सामान्य होने में कई दिन लगे.

निधि पूरा समय उस के साथ थी और एक बदलाव महसूस कर रही थी कि निकिता अब बातबात पर बोलना भूल गई है कि भाभी हमारे यहां ऐसा ही होता है

Father’s day 2023: वह कौन थी- भाग 1

अमरनाथ ने अपने हाथ में पकड़े पत्र को एक बार फिर से पढ़ लेना चाहा. उन की बूढ़ी आंखों से आंसुओं की 2 बूंदें अपनेआप टपक कर पत्र पर फैल गईं.

पत्र में भेजे संदेश ने अमरनाथ को उन के भोगे हुए दिनों में बहुत पीछे तक ऐसा धकेल कर रख दिया था कि उन्हें लगा जैसे पत्र में लिखे हुए सारे के सारे अक्षर उन के जिस्म के चप्पेचप्पे से चिपक गए हों. अमरनाथ के लिए सब से अधिक तकलीफदेह जो बात थी वह यह कि पत्र लिखने वाली ने अपने जीवन में पत्र लिखा तो था, लेकिन उस को डाक में डालने का आदेश नर्सिंग होम की निदेशिका को अपने मरने के बाद ही दिया था. जब तक यह पत्र अमरनाथ को मिला इसे लिखने वाली इस संसार को अंतिम नमस्कार कर के जा चुकी थी.

खुद को किसी प्रकार संभालते हुए अमरनाथ ने एक बार फिर से पत्र को पढ़ा. पत्र के शुरू में उन का नाम लिखा था, ‘एमर.’

स्टैसी अमरनाथ को ‘अमर’ के स्थान पर ‘एमर’ नाम से ही संबोधित किया करती थी.

मैं जानती हूं कि मेरा यह अंतिम पत्र न केवल तुम्हारे लिए मेरा अंतिम नमस्कार होगा बल्कि शायद तुम को बहुत ज्यादा तकलीफ भी दे. जब चलते- चलते थक गई और दूर कब्रिस्तान की तनहाइयों में सोए लोगों की तरफ से मुझ को बुलाने की आवाजें सुनाई देने लगीं तो सोचा कि चलने से पहले तुम से भी एक बार मिल लूं. आमनेसामने न सही, पत्र के द्वारा ही.

तुम्हारे भारत लौट जाने के बाद मैं कितनी अधिक अकेली हो चुकी थी, यह शायद तुम नहीं समझ सकोगे. तुम क्या गए कि जैसे मेरा घर, मेरा बगीचा और घर की समस्त वस्तुएं तक वीरान हो गईं. ऐसा भी नहीं था कि मैं जैसे तुम्हारे वियोग में वैरागन हो गई थी अथवा तुम को प्यार करती थी. हां, तुम्हारी कमी अवश्य मुझ को परेशान कर देती थी. वह भी शायद इसलिए कि मैं ने तुम्हारे साथ अपने जीवन के पूरे 8 वर्ष एक ही छत के नीचे गुजारे थे.

जीवन के इतने ढेर सारे दिन हम दोनों ने किस रिश्ते से एकसाथ जिए थे? मैं आज तक इस रिश्ते को कोई भी नाम नहीं दे सकी हूं. अकसर सोचा करती थी कि हमारा आपस में कोई भी शारीरिक संबंध नहीं था. एक ही देश में जन्म लेने का भी कोई नाता नहीं था. मन और भावनाओं से भी प्रेमीयुगल की अनुभूति जैसा भी कोई रिश्ता हम नहीं बना सके थे. मैं कहां और तुम कहां, लेकिन फिर भी हम एकदूसरे के काम आए. आपस में साथसाथ बैठ कर हम ने अपनाअपना दुख बांटा, एक- दूसरे को जाना, समझा और परस्पर सहायता की. शायद इतना सबकुछ ही काफी होगा अपने परस्पर बनाए हुए उन बेनाम संबंधों के लिए, जिस के स्नेहबंधन की डोर का एक सिरा तुम थामे रहे और एक मैं पकड़े रही.

दुनिया का रिवाज है कि किसी एक को एक दिन डोर का एक सिरा छोड़ना ही पड़ता है. तुम अपनत्व की इस डोर का एक छोर पकड़े अपने वतन चले गए और मैं अपना सिरा थामे यहां बैठी रही. पर अब मैं इस स्नेह बंधन की डोर का एक छोर छोड़ कर जा रही हूं, इस विश्वास के साथ कि इनसान के स्नेहबंधन का सच्चा नाता तो उस डोर से जुड़ता है जो विश्वास, अपनत्व और निस्वार्थ इनसानियत के धागों से बुनी गई होती है.

कितनी अजीब बात है कि हम दोनों का जीवन एक सा लगता है. आपबीती भी एक जैसी है. हम दोनों के अपनेअपने खून के वे रिश्ते जो अपने कहलाते थे, वे भी अपने न बन सके और जिसे हम दोनों जानते भी न थे, जिस के बारे में कभी सोचा भी नहीं, उसी के साथ अपनी खोई और बिखरी हुई खुशियां बटोर कर हम ने अपना जीवन सहज कर लिया था.

पत्र पढ़तेपढ़ते अमरनाथ की आंखें फिर से भर आईं. जीवन से थके शरीर की बूढ़ी और उदास आंखों को अमरनाथ ने अपने हाथ से साफ किया और फिर सोचने लगे अपने जीवन के उस पिछले सफर के बारे में, जिस में वह कभी हालात के मारे हुए एक दिन स्टैसी के साथसाथ कुछ कदम चले थे.

अमरनाथ उस दिन कितने खुश थे जब उन का सब से बड़ा लड़का नीतेश अमेरिका जाने के लिए हवाई जहाज में बैठा था. नीतेश ने इंजीनियरिंग की थी सो उस को केवल थोड़ी सी अतिरिक्त पढ़ाई अमेरिका में और करनी पड़ी थी. और एक दिन अमेरिका की मशहूर कोक कंपनी में इंजीनियर का पद पा कर वहां हमेशा रहने के लिए अपना स्थान पक्का कर लिया. 2 साल के बाद नीतेश भारत से शादी कर के अपनी पत्नी नीता को भी साथ ले गया.

नीतेश के अमेरिका में व्यवस्थित होतेहोते उस के दोनों छोटे भाई रितेश और मीतेश भी वहां आ गए. उन्होंने भी भारत में आ कर शादी की और फिर अमेरिका में अपनी- अपनी घरगृहस्थी में व्यस्त हो गए.

अब अमरनाथ के पास केवल उन की एक लड़की रिनी बची थी. एक दिन उस का भी विवाह हुआ और वह भी अपने पति के घर चली गई. इस तरह घर में बच गए अमरनाथ और उन की पत्नी. वह किसी प्रकार जीवन की इस नाव की पतवार को संभाले हुए थे.

आराम और सहारे की तलाश करता अमरनाथ का बूढ़ा शरीर जब और भी अधिक थकने लगा तो उन्हें एक दिन एहसास हुआ कि लड़कों को विदेश भेज कर कहीं उन्होंने कोई भूल तो नहीं कर दी है.

एक दिन उन की पत्नी रात को सोने गईं और फिर कभी नहीं जाग सकीं. सोते हुए ही दिल का दौरा पड़ने से वह सदा के लिए चल बसी थीं. पत्नी के चले जाने के बाद अब अमरनाथ नितांत अकेले ही नहीं बल्कि पूरी तरह से असहाय भी हो चुके थे.

अपने अकेलेपन से तंग आ कर एक दिन अमरनाथ ने बच्चों को वापस भारत आने का आग्रह किया. तब आग्रह पर उन के लड़कों ने उन्हें जो जवाब दिया उस में विदेशी रहनसहन और पाश्चात्य रीति- रिवाजों की बू थी. जिस देश और समाज के वे अब बाशिंदे बन चुके थे उस में विवेक कम और झूठी प्रशंसा के तर्क अधिक थे. बच्चों की दलीलों को सुन कर अमरनाथ ने अपने किसी भी लड़के से दोबारा वापस भारत आने के लिए न तो कोई आग्रह किया और न ही कोई जिद.

अपने बच्चों की दलीलें और बातें सुन कर अमरनाथ ने चुप्पी साध लेना ही उचित समझा था. वह चुप हो गए थे और अपने तीनों लड़कों से बात तक करनी बंद कर दी. ऐसे में लड़कों का कोई पत्र आता तो वह उत्तर ही नहीं देते. फोन आता तो या तो उठाते ही नहीं और यदि कभी भूलेभटके उठा भी लिया तो ‘व्यस्त हूं, बाद में फोन करूंगा’ कह कर वह बात ही नहीं करते थे. अंत में उन के लड़कों को जब एहसास हो गया कि पिताजी उन के रवैए से नाराज हैं तो उन की कभीकभार आने वाली टेलीफोन की घंटियां भी सुनाई देनी बंद हो गईं.

यह सिलसिला बंद हुआ तो अमरनाथ की जिंदगी के कटु अनुभवों के गुबारों में स्वार्थी संतान की यादों और स्मृतियों की कसक अपनेआप ही धूमिल पड़ने लगी. उन्होंने हालात से समझौता कर के स्वयं को अपने ही हाल पर छोड़ दिया.

एक दिन अचानक ही उन का सब से छोटा लड़का मीतेश बगैर अपने आने की सूचना दिए घर आया तो वर्षों बाद संतान का मुख देखते ही अमरनाथ का सारा गुस्सा पलक झपकते ही हवा हो गया. उन्होंने सारे गिलेशिकवे भूल कर मीतेश को अपने सीने से लगा लिया. फिर जब मीतेश ने अपना भारत आने का सबब बताते हुए यह कहा कि वह उन को अमेरिका ले जाने के लिए भारत आया है, उन्हें बाकी जीवन के दिन अपने बच्चों के साथ व्यतीत करने चाहिए तो अमरनाथ ने अपने स्वाभिमान और जिद के सारे हथियार डाल दिए. और एक दिन मीतेश की सलाह पर उन्होंने अपनी कपड़े की दुकान और पुश्तैनी मकान बेच दिया. इस से जो पैसा मिला उसे बैंक में जमा कर दिया. इस तरह अमरनाथ एक दिन विदेश की उस भूमि पर सदा के लिए बसने आ गए जिस का बखान उन्होंने अब तक किताबों और टेलीविजन में देखा और पढ़ा था.

सिर्फ तुम: भाग 2- जब प्यार बन गया नासूर

यह स्थिति अकेले अनुपम के साथ ही हो, ऐसा नहीं था. मोनिका को भी प्रेम के अभाव ने विचलित करना शुरू कर दिया.बस यंत्रचालित जीवन रह गया था. सुबह उठना, ब्रेकफास्ट तैयार करना, दोपहर का खाना बना कर रख देना, अपनीअपनी सुविधा के अनुसार ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर अलगअलग करना, डिनर के बाद बैड पर अपनेअपने हिस्से में दुबक जाना. रोजाना का यही क्रम बन गया था, सबकुछ, भावविहीन क्रियाओं के साथ.

संवादहीनता से उपजी त्रासदी के बीच मोनिका का मन प्रेमभाव की संतुष्टि के लिए रातदिन छटपटा रहा था, उद्वेलित हो रहा था. कितना भी कृत्रिम बनो, मगर नैसर्गिक जरूरतों को मारना बहुत दुष्कर होता है. मोनिका के अंदर भी रहरह कर एक चाह उमड़ रही थी कि कोई ऐसा अपना हो जिस के कंधे पर सिर रख कर प्रेमसुख पा सके, अपनी भावनाओं को शेयर कर के जीवन में आई रिक्तता को भर सके. इस से वशीभूत उस का मन एक हमसफर को तलाशने लगा और सामने आ गया उस का अपना पीएचडी स्टूडैंट, उस से 2 वर्ष छोटा गौरव, जिस की ओर बढ़ते कदमों को वह रोक नहीं पा रही थी.

शनिवार को अवकाश था. घर के घुटनभरे परिवेश से मुक्त होने के लिए मोनिका नैनी ?ाल के किनारे ठंडी सड़क पर आ गई थी, गौरव से मिलने, पीएचडी पर डिस्कशन के बहाने. ?ाल के पास से गुजरती ठंडी सड़क किसी अकेले व्यक्ति, युवा प्रेमी जोड़ों एवं नवविवाहित पतिपत्नी के घूमने के लिए एकदम माफूल है. दुख के क्षणों में भी इस की धुंध में लिपटी नीरवता बहुत सुकून देती है. मोनिका के लिए भी यह सड़क कुछ ज्यादा ही जानीपहचानी हो गई थी. सड़क के किनारे गुलमोहर के पेड़ों के नीचे बेंत की लकड़ी से बनी बैंच पर बैठ कर उस ने दूर तक नजर डाली तो अनुपम के साथ बिताए कई पलों की यादें ताजा हो गईं…

अनुपम से मोनिका की पहली मुलाकात इसी ठंडी सड़क पर हुई थी. वह अनुपम, जो आज उस का पति है, पहले कभी उस का प्रेमी हुआ करता था.

बड़ा खूबसूरत शहर है नैनीताल. चारों तरफ पहाडि़यां और बीच में नैनीताल जिस

ने शहर को 2 भागों में बांट रखा है. इधर तल्लीताल और उधर मल्लीताल. मोनिका और अनुपम दोनों के घर तल्लीताल में थे और डिगरी कालेज, जहां वे पढ़ते थे, मल्लीताल में था. अनुपम के पिता सीनियर वकील थे और मोनिका के पिता उन के जूनियर. अनुपम और मोनिका के बीच प्रेम पनपने में दोनों के पिताओं के प्रोफैशनल कैरियर से ज्यादा ठंडी सड़क की खास भूमिका थी.

इसी सड़क पर आतेजाते ही तो उन के बीच नजदीकियां बढ़ी थीं. फिर एक दिन इसी जगह घने कुहरे के बीच दोनों ने एकदूसरे को प्रेमपाश में बंधनेबांधने की स्वीकृति दी थी. दोनों निकले तो थे कालेज जाने के लिए, लेकिन चल पड़े प्रेम की राह पर. उस दिन कुहरे के बीच बैंच पर बैठे दोनों घंटों ओवरकोट और शाल में छिपे आपस में लिपटे रहे थे.

‘‘कहीं अलग न हो जाएं, पोस्ट ग्रैजुएशन का आखिरी साल है हमारा,’’ भीगी पलकों के साथ मोनिका अनुपम के सीने में सिमट गई.

‘‘आखिरी साल है तो क्या हुआ, हमें तो आखिरी सांस तक साथ रहना है,’’ अनुपम ने भी मोनिका को जोर से आलिंगन में भींच लिया, ‘‘तुम परेशान मत हो… देखो, ऐसा करते हैं, फिलहाल हम दोनों पीएचडी में एडमिशन ले लेते हैं. 3 साल तक तो मिलना पक्का, अब तो खु़श.’’

‘‘मु?ा से कभी अलग मत होना अनु. अपने जीवन में किसी और को जगह मत देना प्लीज,’’ मोनिका की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

‘‘मेरे लिए तो सबकुछ तुम्हीं हो मोना,’’ कहते हुए अनुपम ने उस के माथे पर चुंबन जड़ दिया.

अनुपम के पीएचडी के सु?ाव ने मोनिका को जैसे नया जीवन दे दिया हो. बहुत देर तक दोनों एकदूसरे के प्रेमपाश में बंधे आनंद के सागर में डूबे रहे.

समय के साथसाथ उन के बीच प्रेम बढ़ता ही गया. इस की भनक जब दोनों के परिवारों को लगी तो परिपक्वता और बाधारहित संबंधों को परिणयसूत्र में बांधने में उन्होंने भी खुले मन से सहमति दे दी. सुखद संयोग कुछ ऐसा बना कि पीएचडी की डिगरी पूरी होते ही उन के जीवन 2 उपहारों से खिल उठे. न केवल वे विवाह के अटूट बंधन मे बंध गए, बल्कि कुछ समय बाद दोनों को उसी कालेज में सहायक प्राध्यापक का जौब भी मिल गया.

मोनिका के ससुराल में सासससुर, छोटा देवर और छोटी ननद से मिल कर बना परिवार था. परेशानी बस यही थी कि घर बहुत छोटा था. मोनिका और अनुपम सुबह साथ ही कालेज निकल जाते और शाम को लौटते. उस के बाद थकीहारी मोनिका को घर के काम में जुटना पड़ता. घर वाले नौकरानी रखने को राजी नहीं हुए. तर्क दिया कि उन के परिवार में ऐसा कभी हुआ ही नहीं और फिर 2 बच्चों का विवाह भी तो करना है.

मोनिका ने सोचा था, नए घर में अनुपम के प्रेमांकुर को हरेभरे पौधे का रूप दे देगी, लेकिन उस के सपने बिखरते चले गए, जिन्हें समेटने के लिए अब उस की कल्पना में था गौरव… आखिर कोई तो हो, जो सूखते जीवन को प्रेमरस से तृप्त कर सके. इस के लिए उस ने गौरव का साथ पाना चाहा, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद गौरव अभी तक उस का अपना नहीं हो सका था. इस का कारण था गौरव स्वयं अपनी एक क्लासमेट के प्रेमसागर में डूबा हुआ था.

मोनिका को इस का पता नहीं था, सो गौरव की ओर से मिल रही उपेक्षा के उपरांत भी वह उस के साथ एकतरफा प्रेम के मोहपाश से स्वयं को मुक्त नहीं कर पा रही थी. भले ही ठंडी सड़क का रोमांसभरा परिवेश प्रेमियों और नवविवाहितों के प्रेमालाप का बरसों से गवाह रहा हो, उस की ही तरह, लेकिन अब वह अकेली थी न तो पति साथ में था और न ही प्रेमी.

महिला उत्पीड़न: कपड़े छोटे या समाज की सोच!

झारखंड के दुमका शहर में 12वीं कक्षा की एक छात्रा को एक लड़के ने सिर्फ इसलिए जिंदा जला दिया क्योंकि लड़की ने लड़के के प्यार को न कर दिया. लड़की नाबालिक थी और लड़के ने उसे धमकी दी थी कि अगर उस ने उस से बात करने से मना किया तो वह उसे जान से मार डालेगा. जब लड़की ने उस की बात नहीं मानी तो लड़के ने उस के ऊपर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी. बुरी तरह से जली लड़की ने 5 दिन बाद दम तोड़ दिया.

हैरानी तो इस बात की हो रही थी कि आरोपी शाहरुख को जब पुलिस पकड़ कर ले जा रही थी तब उस की आंखों में दुख, पछतावा या हिचकिचाहट नहीं थी, बल्कि वह मुसकरा रहा था. वह सीना ताने ऐसे चल रहा था जैसे उस ने कोई जंग जीत ली हो. इस से तो यही लगता है कि पितृसत्तात्मक समाज में उसे भी बचपन से यही सीख मिली है कि वह पुरुष है तो उस की बात उस से कमजोर लोगों खासकर महिलाओं को माननी ही होगी.

लड़का दूसरे धर्म का था. लेकिन मामला यहां सिर्फ मजहब का नहीं, बल्कि यह था कि इनकार करने वाली लड़की थी और सुनने वाला लड़का. वैसे इस तरह के मसले पर सारे पुरुष हममजहब हो जाते हैं. पुरुष हिंसा का रास्ता इसलिए अपनाता है क्योंकि वह केवल इसी माध्यम से सबकुछ प्राप्त कर सकता है जिसे वह एक मर्द होने के कारण अपना हक सम झता है. ‘डर’ और ‘अंजाम’ जैसी फिल्में इसी सोच के इर्दगिर्द बनीं थी कि ‘तू हां कर या न कर, तू है मेरी किरण…’ ऐसे सिरफिरे लोगों को लगता है लड़की के न करने से क्या होता है. वह उसे चाहिए तो बस चाहिए और जब ऐसा नहीं हो पाता तो वह उस की जान लेने से भी नहीं हिचकिचाता है.

बदले की भावना?

‘नैशनल लाइब्रेरी औफ मैडिसन’ में पुरुषों की इसी रिजैक्शन सैंसिटिविटी पर कई स्टडीज की हैं, जो स्वीडन से ले कर बंगलादेश जैसे छोटेबड़े कई देशों में हुईं, जहां पाया गया कि रिजैक्शन के मामले में करीब सारे पुरुष एक ही पायदान पर खड़े हैं. औरत की न को कहीं न कहीं इसे पौरुष पर चोट मानते हैं और मन में बदला लेने की सोच बैठते हैं.

इसी साल अगस्त में गुजरात के बलसाड जिले से ऐसी ही एक घटना सुनने को मिली, जहां शादी का प्रस्ताव ठुकराने पर लड़के ने स्कूल में पढ़ने वाली एक छात्रा को चाकू से गोद दिया. बिहार के वैशाली में एक सनकी पागल प्रेमी ने इंटर में पढ़ने वाली एक छात्रा की इस कारण हत्या कर दी कि उस ने उस के प्यार को ठुकरा दिया. दिल्ली में एक लड़की ने प्रेमी के साथ संबंध बनाने से इनकार किया तो उस ने उसे गोली मार दी.

इसी साल 24 मार्च को शाम के समय पड़ोस की दुकान से शक्कर लेने गई 11 साल की लड़की को 3 लोगों ने उस के चेहरे पर गमछा डाल कर अगवा कर लिया और कब्रिस्तान ले जा कर सामूहिक दुष्कर्म किया. घर के आंगन में खेलने और स्कूल जाने की जगह वह बच्ची अपने गर्भ में शिशु लिए अपनी मां के साथ इंसाफ के लिए दरदर भटक रही है, लेकिन दोषियों को सजा दिलाने की जगह पुलिस उन्हें ही बचाने का प्रयास कर रही है.

असुरक्षित महिलाएं

हरियाणा में 30 साल की महिला जोकि अपने 9 वर्षीय बेटे के साथ सफर कर रही थी, उस ने जब एक शराबी की छेड़छाड़ का विरोध किया तो उस ने उसे गाड़ी से धक्का दे दिया जिस से उसे अपनी जान गंवानी पड़ी. इस घटना से उस के बेटे पर क्या असर हुआ होगा सोच कर ही रूह कांप उठती है. अब उस बेचारे बच्चे की जिंदगी का क्या होगा? दुख तो इस बात का होता है कि इस तरह की घटनाएं बस समाचारपत्रों तक ही सीमित हो कर क्यों रह जाती हैं? तभी तो ऐसे सनकी लोगों की हिम्मत बढ़ती जा रही है.

केरल की एक अदालत ने एक लेखक और एक्टिविस्ट सिविक चंद्रन को यौन उत्पीड़न के मामले में जमानत देते हुए कहा कि महिला खुद ऐसी पोशाक पहनी हुई थीं, जोकि यौन उत्तेजक थे. आंध्र प्रदेश के एक प्रमुख पुलिस और मंत्री का कहना था कि अगर महिलाओं को परेशान किया जाता है, उन के साथ छेड़छाड़ की जाती है, बलात्कार किया जाता है, तो वास्तव में यह उन की गलती है. महिलाएं हलके कपड़े पहन कर पुरुषों को बलात्कार के लिए उकसाती हैं.

पुरुषों की सोच

कुछ पुरुषों की सोच है कि महिलाएं बिना आस्तीन के टौप और टाइट जींस पहन कर बलात्कार को निमंत्रण देती हैं. लड़कियां कुछ अच्छे कपड़े पहन सकती हैं और जब उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता है तो क्यों न अच्छे कपड़े पहन कर भुगतान किया जाए. लड़कियों के टौप और टाइट जींस पहनने पर मर्दों को इतना एतराज है कि प्रमुख पुलिस और मंत्री को भी ये उत्तेजक कपड़े लगते हैं. मगर वहीं रणवीर सिंह के न्यूड वीडियो से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा.

26 मार्च, 1972 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के देसाई गंज पुलिस स्टेशन में 2 पुलिसकर्मियों ने 16 वर्षीय एक आदिवासी लड़की का बलात्कार किया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बारी कर दिया था जिस के कारण सार्वजनिक आक्रोश और विरोध भी हुआ था. ऐसी घटनाएं आज भी हो रही हैं जहां पुलिस में शिकायत करने गई लड़की का पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार किया जाता है, उसे मारापीटा जाता है. सवाल यह है क्या पुलिस महकमा और सरकार पुलिस थानों में मौजूदा इस तरह की विकृतियों से पूरी तरह से अनजान है?

घर में भी असुरक्षित

जब बलात्कार और यौन उत्पीड़न का विषय है तो महिलाओं की पोशाक कैसे प्रासंगिक है? छोटीछोटी बच्चियों का बलात्कार भी क्या उत्तेजक कपड़े पहनने की वजह से होता है? जो बूढ़ी महिलाएं बलात्कार की शिकार बनती हैं क्या वे भी उत्तेजिक कपड़े पहने होती हैं? वह 11 साल की गरीब बच्ची जो पड़ोस की दुकान से शक्कर लेने गई थी क्या उस ने भी भड़काऊ कपड़े पहने होंगे जिस से बलात्कारी का मन फिसल गया? बूढ़ी, बच्ची, जवान, अधेड़, मोटी, पतली, काली, गोरी, किसी भी जाति, पंथ या वर्ग की महिलाएं हों, वह सुरक्षित नहीं हैं इस देश में. यहां तक की महिलाएं अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं.

बिहार के मधेपुरा के तुलसीबाड़ी गांव में रात के समय जब एक महिला शौच करने निकली तो कुछ युवकों ने उसे दबोच लिया और उस के साथ दुष्कर्म करने की कोशिश करने लगे और जब वे लोग घटना को अंजाम देने में विफल रहे तो उलटे महिला पर ही चरित्रहीनता का आरोप लगाते हुए उस के साथ मारपीट करने लगे.

द्वापर युग में कौरवों की महारथियों से भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण की घटना के बाद भगवान कृष्ण ने उन की रक्षा की थी. लेकिन आज कहीं कोई कृष्ण दिखाई नहीं देता जो महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार से उन की रक्षा कर सके. आज जैसे पूरा समाज ही विकृति का शिकार हो गया है.

बढ़ती घटनाएं

इस तरह की घटनाएं न जाने रोज कितनी ही घटती होंगी, मगर कुछ ही सामने आ पाती हैं क्योंकि बदनामी के डर से महिलाएं चुप लगा जाती हैं. वैसे कुछ महिलाओं में चेतना जागी है और वे अपने अधिकारों के लिए आगे भी आ रही हैं. मगर बहुत सी ऐसी भी हैं जो अपने साथ हुए शोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठा पातीं.

देश में 82% शादीशुदा महिलाएं ऐसी हैं, जो पति की यौन हिंसा की शिकार बनती हैं. 6% शादीशुदा महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने जीवन में कभी न कभी यौन हिंसा  झेली है.

देश में 30% शादीशुदा महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने पति की शारीरिक या यौन हिंसा  झेली है. 70% महिलाएं खुद पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ बोल नहीं पातीं.

हमारे देश में घरेलू हिंसा जितनी विकराल है उतने ही सरल उस के माने हैं. भारतीय घरेलू हिंसा मतलब पतिपत्नी का प्यार क्योंकि हमारे समाज में इसे हिंसा थोड़े ही न कहा जाता है. अरे, यह तो पति का अपनी पत्नी पर हक है. लेकिन दुख तो इस बात का है कि अधिकतर भारतीय पत्नियों को यह नहीं पता होता है कि उन के साथ गलत हो रहा है.

रोज महिलाओं को थप्पड़ों, लातों, पिटाई, अपमान, धमकियों, यौन शोषण और ऐसी अनेक हिंसात्मक घटनाओं का सामना करना पड़ता है, फिर भी वे चुप रहती हैं. कोई कदम नहीं उठातीं, बल्कि उसी रिश्ते में बंधी रहती हैं. कारण, बच्चे, पैसों की कमी, घर की सपोर्ट न मिलना, अपने कानून के हक की जानकारी न होना, डर वगैरहवगैरह.

औरतों के मन में बचपन से ही यह कहावत बैठा दी जाती है कि लड़की की अर्थी ससुराल से ही उठती है.

धर्म भी है जिम्मेदार

वैदिक युग के बाद से नारी के स्वतंत्र अस्तित्व को कभी स्वीकार नहीं किया गया. ऐसी परिस्थितियां और विधान बनते चले गए कि वे पिता, भाई, पति, पुत्र के अधीन रहने को बाध्य रहीं. औरत के लिए पति का स्थान भगवान से भी ऊंचा माना गया है. पति को परमेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित किया गया जिस की चरणदासी बन आजीवन सेवा करना ही स्त्री का परम धर्म बन गया.

यह कहना गलत नहीं होगा कि धर्म की सब से बड़ी ग्राहक औरतें ही हैं और उन्हीं को सब से ज्यादा सताया जाता है. कभी सती के रूप में, कभी विधवाओं के लिए बनाए कठोर धार्मिक नियमों के रूप में, कभी देवदासी के रूप में और कभी विभिन्न धार्मिक एवं कर्मकांडों के रूप में. नारी को देश की आधी आबादी कहा गया है, लेकिन धर्म में इसी आधी आबादी की स्वतंत्रता की सीमा निश्चित की गई है.

अपनी सत्यता का सुबूत देने के लिए सीता को अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा था. लेकिन आज तक इतिहास में ऐसा कोई तथ्य नहीं मिलता जब किसी पुरुष ने किसी महिला के समक्ष ऐसा कोई साक्ष्य पेश किया हो जिस से उस की ईमानदारी और वफादारी का सुबूत मिलता हो. हर बार कसौटी पर महिलाओं को ही खरा उतरने का ठेका इस कुंठित व्यवस्था ने महिलाओं के लिए ही आरक्षित कर दिया.

शर्मिंदा करते हैं ये आंकड़े

देश में यौन शोषण के खिलाफ कड़े कानून के बावजूद नाबालिग लड़कियां हैवानियत की शिकार बन रही हैं. 2021 के ‘नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो’ के जो आंकड़े हैं, वे इंसानियत को शर्मसार कर देने वाले हैं. आंकड़ों के मुताबिक, औसतन हर दिन करीब 90 नाबालिग लड़कियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हुईं. नाबालिग लड़कियों से दुष्कर्म के मामले मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा हैं. इस के बाद महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक का नंबर आता है.

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, महिलाओं के लिए दिल्ली सब से खतरनाक शहर है. यहां महिला अपराध से जुड़े कुल 13,892 मामले सामने आए हैं. ‘ऐसिड सर्वाइवर्स ट्रस्ट इंटरनैशनल’ नाम के ब्रिटेन बेस्ड एनजीओ का डेटा बताता है कि पूरी दुनिया में हर साल 15 सौ से ज्यादा ऐसिड अटैक होते हैं और जिन में 99% शिकार महिलाएं होती हैं.

सभ्यता के आरंभ से ही मानव समाज के विकास में आधी आबादी का पूरा सहयोग रहा है और आज भी है. लेकिन आज हालात ये हैं कि उसी आधी आबादी पर अत्याचार, शोषण के लिए यह देश सब से खतरनाक देश बन गया है. ‘थौमसन रौयटर्स फाउंडेशन’ ने महिलाओं के मुद्दे पर 550 ऐक्सपर्ट्स का सर्वे जारी किया, जिस में घरेलू काम के लिए मानव तस्करी, जबरन शादी और बंधक बना कर यौन शोषण के लिहाज से भी भारत को खतरनाक बताया गया है.

सिर्फ खानापूर्ति

हमारे देश में हर साल महिला दिवस मनाया ही इसलिए जाता है कि कहीं न कहीं महिलाएं, बेटियां स्वतंत्र और सुरक्षित नहीं हैं. घर से निकलते हुए लड़कियां इस बात से नहीं डरतीं कि कोई गाड़ी आ कर उन्हें रौंद कर चली जाएगी, बल्कि इस डर से कांप उठती हैं कि किसी पागल, सनकी प्रेमी से पाला न पड़ जाए उन का, जो उन के सारे सपने अपने पैरों तले रौंद कर चला जाए. छोटेछोटे शहरों से अपने सपने पूरे करने निकली लड़की इस डर से उलटे पांव वापस लौट जाती है.

एक सर्वे में आए चौंकने वाले आंकड़ों के मुताबिक, 58 फीसदी लड़कियों ने माना कि वे सोशल मीडिया प्लेटफौर्म फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, व्हाट्सऐप और टिकटौक पर अपशब्द और उत्पीड़न का शिकार होती हैं. रिपोर्ट के अनुसार, 47 फीसदी लड़कियों को औनलाइन उत्पीड़न के साथसाथ शारीरिक और यौन हिंसा की भी धमकी दी गई, जबकि 59 फीसदी को सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर अपशब्द और अपमानजनक भाषा का सामना करना पड़ा है.

इतना ही नहीं, बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक और एलजीबीटीक्यू समुदायों की महिलाओं ने कहा कि उन की पहचान की वजह से उन्हें परेशान किया जाता है.

एक सर्वेक्षण में शामिल 11 फीसदी लड़कियों को अपने मौजूदा और पूर्व पार्टनर द्वारा परेशान किया जाता है. 21 फीसदी लड़कियों ने दोस्तों की ओर इशारा किया और 23 फीसदी ने माना कि उन्हें उत्पीडि़त करने वाले स्कूल और उन के वर्कप्लेस से हैं.

सर्वे के मुताबिक, सोशल मीडिया पर 36 फीसदी लड़कियों को अजनबियों द्वारा परेशान किया जाता है. वहीं 32 फीसदी को फेक आईडी सोशल मीडिया यूजर्स अपशब्द और अश्लील मैसेज भेजते हैं. इस के परिणामस्वरूप औनलाइन उत्पीड़न ने 42 फीसदी महिलाओं को तनावग्रस्त कर दिया है, साथ ही उन में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की कमी पैदा की है.

यही कारण है कि 5 में से 1 (19 फीसदी) लड़कियों ने सोशल मीडिया से दूरी बना ली है और कई लड़कियों ने इन प्लेटफौर्म का इस्तेमाल करना कम कर दिया. वहीं 10 में से 1 (12 फीसदी) ने खुद को अभिव्यक्त करने का दूसरा रास्ता चुन लिया.

सुरक्षा पर आंच

आज महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. चाहे घर हो, दफ्तर हो, बस, ट्रेन, सड़क, गली चौराहा हर जगह वे अपनेआप को असुरक्षित महसूस करती हैं. आज बेशक महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, सफलता की बुलंदियां छू रही हैं, चांद तक अपनी काबिलीयत का परचम लहरा रही हैं. इस के बावजूद उन की सुरक्षा पर आंच आ रही है तो इसलिए कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून सरकारी फाइलों की धूल चाट रहे हैं और सरकार कुंभकरण की नींद सो रही है.

आज भी बच्चा न पैदा कर पाने के कारण औरतों को बां झ सम झा जाना, दहेज के लिए जलाया जाना, डायन कह कर उस पर पत्थर बरसाने की बात सुनने, पढ़ने को मिलती रहती है और इस से यही लगता है कि महिलाओं की स्थिति में कोई ज्यादा सुधार नहीं हुआ है. यहां तक कि शादी टूटने के डर से लड़कियां सर्जरी तक करवा रही हैं ताकि दूल्हे के सामने यह साबित कर पाएं कि वे वर्जिन हैं.

लड़की वर्जिन ही चाहिए

एमबीए की छात्रा नताशा की शादी तय हो गई है. वह बहुत खुश है अपनी शादी से, लेकिन मन में एक डर बना हुआ है कि कहीं उस की बैस्ट फ्रैंड की तरह उस का पति भी शादी की पहली रात ही कैरेक्टरलैस बता कर उसे छोड़ न दे क्योंकि एनआरआई ससुराल वालों ने रिश्ता तय करते समय एक शर्त रखी थी कि उन्हें लड़की वर्जिन ही चाहिए.

नताशा की तरह कई ऐसी लड़कियां हैं जो शादी से पहले हाइमन की खतरनाक सर्जरी करा रही हैं ताकि साबित कर सकें कि वे कुंआरी हैं.

मगर यह सर्जरी इतनी जोखिमभरी है कि एक लड़की कोमा में चली गई. इस के बावजूद सर्जरी का ट्रैंड तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि वे जानती हैं कि सर्जरी से ही उन्हें कैरेक्टर सर्टिफिकेट मिलेगा. लेकिन लड़कों के लिए शादी से पहले ऐसी कोई शर्त नहीं होती. उन्हें किसी कैरेक्टर सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती.

कुछ सदियों पहले तेलुगु कवि बडेना ने पत्नी की भूमिका पर एक विजय गान लिखा था- ‘वो जो एक नौकर की तरह काम करती है, एक मां की तरह खाना खिलाती है, एक देवी की तरह दिखती है, एक वेश्या की तरह सुख देती है और पृथ्वी जैसी सहनशीलता रखती है’ 13वीं शताब्दी की एक कविता में गढे़ गए ये स्त्री गुण आधुनिक भारतीय समाज में इस कदर पसंद किए जाते हैं कि इस कविता का महिमामंडन आज भी टीवी सीरियलों, फिल्मों, गीतों और साहित्य में दिखाई दे जाता है, परंतु भारतीय महिलाओं के लिए ये सभी गुण उत्पीड़न के अलगअलग रूप हैं.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के अनुसार, जहां एक पुरुष हफ्तेभर में 42 घंटे काम करते हैं, वहीं एक हाउसवाइफ 112 घंटे काम करती हैं और घर से बाहर निकल कर नौकरी करने वाली महिलाएं 126 घंटे काम करती हैं यानी पुरुषों से करीब 3 गुना ज्यादा. यूएन वूमन के मुताबिक, कोरोनाकाल में लौकडाउन के दौरान महिलाओं का काम 17 गुना बढ़ गया यानी औरतें सब से ज्यादा काम करती हैं और सब से कम पैसा पाती हैं क्योंकि उन के द्वारा किए जा रहे श्रम का एक बड़ा हिस्सा बेगार है.

परिवार के लिए, पति के लिए, बच्चों के लिए, सासससुर के लिए उस श्रम का उसे कोई मूल्य नहीं मिलता. सब के लिए मुफ्त में अपनी हड्डियां गलाने वाली औरतों को काम के बदले भले ही एक धेला न मिलता हो, पर अन्नपूर्णा, देवी और महान औरत का दर्जा जरूर मिल जाता है.

भेदभाव की शिकार

कहने को तो महिलाओं को पुरुष के बराबर अधिकार मिला है, लेकिन असमानता आज भी समाज में कायम है. बराबरी पर कितने नारे आए और गए, लेकिन हालात में कुछ भी फर्क नहीं आया. आज भी महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक सम झा जाता है. और यही कारण है कि मताधिकार से ले कर, चुनाव लड़ने तक और पैतृक संपत्ति में बराबरी की हिस्सेदारी से ले कर समान वेतन के अधिकार तक हरेक मसले पर इंसाफ के लिए महिलाओं को लंबे संघर्ष करने पड़े हैं और कर भी रही हैं.

कहा जाता है कि आज की महिलाएं तो पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं. उन्हें भी हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया दिया जा रहा है मानो महिलाओं को उन का अधिकार नहीं, बल्कि खैरात दी जा रही हो.

हालात बड़े मुश्किल हैं और औरतों की कहानी बड़ी दुखद. लेकिन सवाल ये हैं कि यह कहानी बदले कैसे? जिस देश में महिलाओं को देवी का स्वरूप माना जाता है, नवरात्रि में कन्यापूजन विधान है, उन्हीं महिलाओं और बच्चियों के साथ उत्पीड़न, बलात्कार, हत्या की घटनाएं बढ़ती ही जा रहे हैं, तो आखिर क्यों?

यह कहना गलत न होगा कि महिलाओं के प्रति असमानता, अत्याचार, हत्या, बलात्कार जैसी हिंसाओं का कारण है देश की कमजोर कानून और न्यायिक व्यवस्था. आज कानून का डर नहीं रहा इसलिए अपराधी अपराध कर के निडर घूमते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि कुछ दिन सजा के बाद जमानत तो मिल ही जाएगी. इसलिए यहां के कानून प्रशासन को और सख्त होना पड़ेगा ताकि ऐसी हिंसात्मक घटनाएं बंद हों और अपराधी अपराध करने से पहले सौ बार सोचें. कानून व्यवस्था को और कई गुना अधिक सख्त होना पड़ेगा ताकि देश की महिलाओं, बच्चियों का शारीरिक और मानसिक शोषण न हो सके.

सख्त हो कानून

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों खासकर यौन शोषण के मामलों पर आवाज उठाने वाली एक्टिविस्ट योगिता भयाना कहती हैं कि सैंटर और राज्य की सरकारों को बेटियों के साथ किए जा रहे यौन अपराधों और अपराधियों पर सख्ती बरतनी चाहिए. जो भी अपराधी हो उन्हें पुलिस गिरफ्तार करने में देर न करे. कोर्ट रेप जैसे जघन्य अपराध के दोषियों को आसानी से बेल, परोल न दे. वरना देश की न्याय प्रणाली से बेटियों का आत्मविश्वास डगमगा जाएगा और कोई भी बेटी अपने साथ हुए अपराध के खिलाफ आवाज उठाने से डरेगी.

मगर मात्र कानून बनाने से ही समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी में भी सुधार की आवश्यकता है. महिलाओं को भी खुल कर अपनी बात रखनी होगी बिना डरे. आमतौर पर बदनामी के डर से काफी बड़ी संख्या में ऐसे मामले दर्ज ही नहीं हो पाते हैं खासतौर पर तब जब पीडि़ता को अपने पति, परिवार के सदस्य या किसी अन्य परिचित के खिलाफ शिकायत दर्ज करानी हो.

महिलाओं की सोच कि लोग क्या कहेंगे अपराधी के हौसलों को और बुलंद करने का काम करती है. महिलाओं की मौन स्वीकृति भी अपराध को बढ़ावा देती है, इसलिए चुप न रहें, अपने साथ हो रही हिंसा की रिपोर्ट करें. यदि आप कभी भी खतरा महसूस करें, तो तुरंत वूमंस हैल्पलाइन नंबर 1091/1090 पर कौल करें. इस के अलावा महिलाएं ‘नैशनल कमिश्नर फौर वूमन’ में अपनी बात रखना चाहें तो वे 0111-23219750 पर कौल कर सकती हैं.

बदलनी होगी मानसिकता

देश की आधी आबादी को अगर सच में पूरा हक दिलाना है तो लोगों को अपनी ओछी मानसिकता बदलनी होगी. मातापिता को सिर्फ अपनी बेटियों में ही नहीं, बल्कि बेटों में भी संस्कार भरने होंगे कि वे महिलाओं के साथ सम्मान से पेश आएं. उन की इज्जत करें.

शासनप्रशासन कितना भी कठोर क्यों न बना दिया जाए लेकिन जब तक पुरुष की मानसिकता और उसे बचपन में स्त्री मर्यादा के संस्कार नहीं सिखाए जाएंगे तब तक ऐसे कठोर कानून बनाने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. ऐसे लोग कानून का बस मजाक ही बनाते रहेंगे.

Summer Special: घर में बनाए टेस्टी वैजी अप्पे

गर्मियों में अक्सर बच्चों को खाना अच्छा नहीं लगता हैं. ऐसे में मांए बच्चों के लिए चिंतित हो जाती हैं आखिर बच्चों को क्या खिलाएं. तो अपने बच्चों के लिए घर में बनाए टेस्टी वैजी अप्पे.

वैजी अप्पे सामग्री

  1. 1 कप सूजी
  2. 1 कप दही
  3. 1 बड़ा चम्मच प्याज बारीक कटा
  4. 1 बड़ा चम्मच टमाटर बारीक कटा
  5. 1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती बारीक कटी
  6. 1/2 छोटा चम्मच हरीमिर्च बारीक कटी
  7. 1 छोटा चम्मच फ्रूट साल्ट
  8. नमक स्वादानुसार

विधि

फ्रूट साल्ट को छोड़ कर सारी सामग्री मिलाएं. आवश्यकतानुसार पानी मिलाते हुए गाढ़ा घोल बनाएं. फू्रट साल्ट मिला कर अप्पम मेकर में मिश्रण डालें और मंदी आंच पर पकाएं. फूल जाने पर अप्पे अप्पम मेकर से निकाल कर हरी चटनी के साथ परोसें.

2.पीनट पकौड़ा

        सामग्री

  1. 1 कप मूंगफली के दाने
  2. 1 बड़ा चम्मच बेसन
  3. 1 छोटे चम्मच अदरक बारीक कटा
  4. 1 छोटा चम्मच हरीमिर्च बारीक कटी
  5. 1 छोटा चम्मच धनियापत्ती बारीक कटी
  6. चुटकी भर हल्दी
  7. 1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर
  8. 1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर
  9. 1/2 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर
  10. तेल आवश्यकतानुसार
  11. नमक स्वादानुसार

विधि

मूंगफली के दाने व तेल छोड़ कर शेष सामग्री मिला लें. आवश्यकतानुसार पानी मिलाते हुए गाढ़ा घोल बना लें. कड़ाही में तेल गरम करें. मूंगफली के दानों को घोल में लपेट कर मध्यम आंच पर कुरकुरा होने तक तलें. हरी चटनी के साथ परोसें. पनीर टिक्का मसाला सामग्री. 1/2 कप पनीर मनचाहे आकार के टुकड़ों में कटा.  1/2 कप लाल व हरी शिमलामिर्च चौकोर टुकड़ों में कटी हुई. 1/2 कप प्याज कटा.  1/2 छोटे चम्मच अदरकलहसुन का पेस्ट.  1 कप हंग कर्ड,  1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर.  1/4 छोटा चम्मच गरममसाला 1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर.  1 छोटा चम्मच चाटमसाला.  2 बड़े चम्मच तेल,  1/2 छोटा चम्मच नीबू का रस.  नमक स्वादानुसार.

विधि एक बड़े बाउल में दही को फेंट कर नमक व सभी मसाले मिलाएं. अब इस में पनीर, शिमलामिर्च व प्याज डाल कर अच्छी तरह मिलाएं. इस मिश्रण को करने के लिए 4-5 घंटे फ्रिज में रख दें. अब तवे पर तेल डाल कर हलकी आंच पर भूरा होने तक सेंकें. ऊपर से नीबू निचोड़ दें. चटनी के साथ स्टार्टर के रूप में परोसें.

प्रेम पर भारी तुनकमिजाजी

आजकल कुनबे, परिवार एवं घर सिकुड़ते से जा रहे हैं. जहां पहले यदि बड़े कुनबे की बहू परिवार में आती थी तो उसे अच्छा माना जाता था क्योंकि बड़ा कुनबा इस बात की पहचान होता था कि सभी रिश्तेदारों में आपसी तालमेल अच्छा है. वे सभी एकदूसरे के साथ सुखदुख में खड़े भी होते थे. यह तालमेल बैठाना कोई आसान काम नहीं होता. नाजुक रिश्तों की डोर को मजबूत करने के लिए सभी की पसंदनापसंद का खयाल रखना अति आवश्यक होता है.

यह हर किसी के बस की बात नहीं कि वह डोर की मजबूती को बरकरार रख सके. इस के लिए ईमानदारी, वाणी पर संयम, मन में भेदभाव न होना, स्वार्थ से परे होना, धैर्यवान होना अदि कई गुण बेहद जरूरी है.

कई लोग जराजरा सी बात पर नाराज हो कर बैठ जाते हैं. उन्हें बारबार मनाओ, मनुहार करो तब वे पुन: साधारण व्यवहार करने लगते हैं. लेकिन ऐसे लोगों का कुछ पता ही नहीं चलता कि वे किस बात पर कब नाराज हो जाएं. या तो लोग उन की पदप्रतिष्ठा के कारण उन के सामने  झंक कर व्यवहार करते हैं या फिर रिश्तों को निभाने की मजबूरी. लेकिन लोग उन्हें दिल से कम ही पसंद करते हैं. व्यवहार सही रखें .

ऐसे ही उदाहरण यहां पेश हैं कि कैसे तुनकमिजाजी व्यवहार के कारण रिश्तों में खटास पैदा हो गई:

अमृता का विवाह दिल्ली के सी.ए. विपिन से हुआ. उन के ब्याह में फेरों के समय जब अमृता की चचेरी बहनों ने जूते छिपाई की रस्म के समय अपने होने वाले जीजा के जूते ढूंढ़ने चाहे तो वे नहीं मिले. मालूम हुआ कि जीजा का छोटा भाई जूतों को कमरे में रखने गया है. सालियों ने सोचा कमरे में भला कैसे दाखिल हों. सो अपने भाई को भी इस में शामिल किया और उस से कहा कि तुम कमरे से जूते बाहर ले आओ. जिस कमरे में जीजा का छोटा भाई जूतों के साथ बैठा था वह वहां गया और पूरे कमरे में नजर दौड़ाई.

इसी बीच नींद में ऊंघते जीजा के भाई को लगा कि न जाने कौन कमरे में घुस आया. सो उस ने आव देखा न ताव और वह उस पर टूट पड़ा. इस के बाद दोनों में खूब  झड़प हुई और फेरों के बीच दोनों पक्षों में कहासुनी हो गई. दूल्हा थोड़ा समझदार था जो दोनों पक्षों के बड़ों से माफी मांगता रहा. जैसेतैसे ब्याह संपन्न हुआ.

मगर जब वधू ब्याह कर ससुराल में पहुंची तो वहां भी उस पर तानों की झड़ी लग गई. नखरीले देवर ने यहां आ कर भी खूब तमाशा किया. भाईभाभी दोनों ने खूब माफी मांगी ताकि किसी भी तरह से परिवार में शांति बनी रहे, लेकिन देवर तो नाक चढ़ाए ही रहा.

उस का कहना था कि मेरी इज्जत नहीं की वधू पक्ष ने. उस के बाद देवर जबतब भाभी को ताने देता. सासननद ने भी मन में गांठ बांध ली. हर त्योहार, उत्सव या रोजमर्रा की जिंदगी कुछ न कुछ झगड़ा घर में लगा ही रहता. हार कर बड़े भाईभाभी परिवार से अलग हो गए.

साथी की उपेक्षा क्यों

अमेरिका से आए एक युगल दंपती में पति अपने काम में इतना मशगूल रहता कि पत्नी की तरफ ध्यान ही नहीं. छोटा सा बच्चा भी अपने पिता के पास समय की कमी के चलते सारा दिन मां के साथ ही चिपका रहता. इसी बीच पत्नी सीमा की सोसायटी में एक सहेली राधा बन गई. अच्छी बात यह थी कि दोनों के पतियों का व्यवहार एकसमान था. राधा के पति किसी एअर लाइन में कार्यरत थे और 3 शिफ्टों में काम पर जाया करते. उन का तो कोई फिक्स रूटीन ही नहीं था. सो राधा अपने 2 बच्चों के साथ उन के रूटीन से जैसेतैसे तालमेल बैठा लेती थी.

सीमा और राधा सहेलियां बन कर साथसाथ शौपिंग के लिए जातीं. दोनों के बच्चे भी हमउम्र होने पर साथ खेलते. यदि कभी बारिश हो तो बच्चे किसी एक के घर में ही खेलते. सीमा बहुत व्यवहारकुशल नजर आती थी. लेकिन कई दिनों से उस के व्यवहार में कुछ बदलाव नजर आ रहा था. राधा ने कई बार उस से बदलाव की वजह पूछी. किंतु सीमा कह देती कुछ नहीं हुआ आप को ऐसे ही कुछ महसूस हो रहा है, मैं तो वैसी की वैसी हूं.

कुछ ही दिनों में सीमा के बच्चे का जन्मदिन था और उस ने राधा को फौर्मल निमंत्रण भी न दिया. राधा सोचती रही कि आखिर क्या हुआ? फिर भी उस ने जन्मदिवस के एक दिन पहले सीमा को फोन किया और हंस कर पूछा कि आएं कि न आएं जन्मदिन की पार्टी में? सीमा भी हंस कर हक जता कर बोल दी कि चुपचाप आ जाना. आप को निमंत्रण की जरूरत है क्या?

खुद में बदलाव

हमेशा की तरह राधा समय से कुछ पहले ही सीमा के घर पहुंच गई ताकि वह उस की पार्टी की तैयारी में कुछ मदद करवा सके. जब वह वहां पहुंची तो पाया कि इस बार उन के समूह की अन्य महिलाएं पहले से वहां मौजूद थीं और बड़ी ही पैनी नजरों से राधा को देख रही थीं. ये वही महिलाएं थीं जो सीमा की व्यावहारिक खामियां ढूंढ़ कर राधा के समक्ष रखती थीं और राधा हर बार यह कह कर टाल देती थी कि हर इंसान अलग प्रकृति का होता है.

अब राधा को समझाते देर न लगी कि सीमा के व्यवहार में बदलाव क्यों आया. शायद इन महिलाओं ने सीमा के कान भी भरे हों. राधा ने सीमा को मनाने की बहुत कोशिश की, किंतु सीमा यह स्वीकारती ही नहीं थी कि उस के व्यवहार में कुछ बदलाव है.

अंत में राधा ने कह दिया कि सीमा हम 4 बरस से पक्की सहेलियां हैं. तुम मानो न मानो मैं तुम्हें और तुम्हारे व्यवहार को अच्छी तरह से समझाती हूं. अब राधा ने भी उस की मनुहार करना छोड़ दिया था. कुछ महीने बीते राधा के पति का तबादला हो गया. उस के बाद कभी राधा ने सीमा की सुध भी न ली. राधा से दूरी तो पहले ही बन ही चुकी थी. अब अकसर वह सोसायटी में अकेली नजर आती थी. यह बात राधा को अपनी अन्य सहेलियों से मालूम हुई. शायद धीरेधीरे सभी उस का व्यवहार समझा चुके थे.

खतरनाक अंजाम

ऐसा ही एक केस दिल्ली में आया जहां अखबारों की खबर के अनुसार हिमांशी गांधी के पिता लवेश गांधी ने पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई कि उन की बेटी ने अपने मित्रों के साथ मिल कर एक कैफे खोला था. आज उस का पहला दिन था और शाम को करीब 4 बजे उस के मित्र आयूष ने उस की मां को फोन किया और कहा कि हिमांशी और उस के मित्रों में किसी बात को ले कर खूब विवाद हुआ और उस के बाद वह नाराज हो कर कैफे से चली गई. तब से वे उसे बारबार फोन कर रहे हैं, लेकिन हिमांशी फोन नहीं उठा रही है और बाद में उस का फोन अनरीचेबल हो गया.

पुलिस ने उस की छानबीन की और 25 जून को एक महिला का शव यमुना में तैरता मिला. पुलिस ने हिमांशी के परिवार को इस की सूचना दी तो उस के परिवार वालों ने लाश देख कर पुष्टि की कि वह हिमांशी की ही लाश है.

उस के बाद पुलिस ने वहां का सीसी टीवी कैमरा चैक किया, जिस में करीब 3 बजे हिमांशी ब्रिज की रेलिंग पर चढ़ती हुई दिखाई दी. उस के बाद वह रेलिंग के बीच गैप्स में से यमुना में कूद गई और अपनी जान दे दी.

इस तरह के किस्से एवं हादसे यह बताते हैं कि कहीं न कहीं व्यवहार में तुनकमिजाजी का खमियाजा अंतत: स्वयं ही उठाना पड़ता है. किंतु ऐसे व्यवहार वाले लोगों से जुड़े रिश्तेदार एवं मित्र भी कहीं न कहीं इस का नुकसान उठाते हैं. फायदा कम नुकसान ज्यादा हो सकता है तुनकमिजाजी व्यवहार वाले लोग जब तक स्वयं का कुछ नुकसान न हो अपने इस व्यवहार की आड़़ में मजा उड़ाते हों कि सब लोग उन के लिए एक टांग पर खड़े रहें. वे रूठें तो दूसरे उन्हें मनाते रहें या सामने वाला नाराज न हो जाए इस डर से लोग उन की हर बात को मानें. जब तुनकमिजाजी या बारबार की नाराजी से डराधमका कर जिंदगी मजे में चले तो कोई अच्छा व्यवहार क्यों करे भला. तब तो किसी को न कोई डर न ही परवाह, हरकोई अपनी बात रखने की कोशिश तो करेगा ही.

ऊपर से तुनकमिजाजी व्यवहार का फायदा यह कि आप लड़ झगड़ कर हर जगह अपनी चला कर हर अच्छे काम का क्रैडिट भी स्वयं ही ले लेते हैं. सीधासादा व्यवहार रखें तो यह तो होने से रहा. मगर इस तुनकमिजाजी के नुकसान भी तो बहुत हैं. जरूरी नहीं कि आप को बारबार लोग मनाएंगे और मनुहार करेंगे. यदि सज्जन लोग आप के साथ हैं तो निश्चित रूप से आप की शुरुआती तुनकमिजाजी को वे इग्नोर कर आप से अच्छा व्यवहार रखने की कोशिश करते हैं. लेकिन जैसे ही वे समझाते हैं कि आप उन की सज्जनता का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं तो वे आप से किनारा भी करने लगते हैं और अंतत: आप स्वयं का नुकसान कर अकेले रह जाते हैं.

Health Tips: हार्ट का बदलते मौसम से क्या है कनैक्शन

एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सब से ज्यादा मौतें दिल की बीमारियों से होती हैं और जलवायु परिवर्तन से अधिक सर्दी और अधिक गरमी पड़ने पर इस का सीधा असर इंसान के दिल पर पड़ता है. आंकड़ों पर गौर करें तो स्ट्रोक, दिल, कैंसर और सांस की बीमारियों से दुनियाभर में होने वाली कुल मौतों की हिस्सेदारी दोतिहाई है.

अधिक गरमी को सहने की होती है क्षमता

इस बारे में नवी मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हौस्पिटल के कंसलटैंट कार्डियोलौजी डा. महेश घोगरे कहते हैं कि हमारे शरीर में अपने तापमान को नियंत्रित करने की प्राकृतिक क्षमता होती है. इस प्रक्रिया को थर्मोरैग्युलेशन कहा जाता है, जिसे हाइपोथैलेमस द्वारा नियंत्रित किया जाता है, मस्तिष्क का एक हिस्सा आंतरिक शरीर के तापमान को बनाए रखने के लिए थर्मोस्टेट के रूप में लगातार कार्य करता है.

व्यायाम या गरमी आदि के कारण जब शरीर का तापमान बढ़ जाता है तब हाइपोथैलेमस, पसीना और वासोडिलेशन या रक्तवाहिकाओं को चौड़ा कर के गरमी को बाहर निकालता है और शरीर को ठंडा करता है. ठंड के मौसम में जब शरीर का तापमान गिर जाता है तो हाइपोथैलेमस शरीर में गरमी को बचाने और शरीर को गरम करने के लिए शिवरिंग को ट्रिगर करता है और रक्तवाहिकाओं को संकुचित करता है. यह स्वचालित प्रक्रिया शरीर के एक स्थिर कोर तापमान को बनाए रखने में मदद करती है और यह सुनिश्चित करती है कि शरीर के अंग और प्रणालियां ठीक से काम करें.

तापमान का पड़ता है असर

डाक्टर आगे कहते है कि तापमान में अचानक बदलाव हृदय पर दबाव डाल सकता है. अत्यधिक तापमान में शरीर ठंडा या गर्म करने के लिए रक्त प्रवाह को त्वचा की ओर मोड़ा जाता है. इस से रक्त वाहिकाएं फैल या सिकुड़ जाती हैं, जिस से हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है. उदाहरण के तौर पर, गर्म मौसम में, शरीर को ठंडा करने के लिए त्वचा में रक्त पंप करने के लिए हृदय को अधिक मेहनत करनी पड़ती है, जिस से हृदय की गति और रक्तचाप बढ़ता है.

इस के अलावा अत्यधिक गरमी में थकावट और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है, साथ ही हृदय पर अतिरिक्त बो?ा भी पड़ता है. इस से दिल के दौरे, हृदय की धड़कन अनियमित होना और हार्ट फेल्योर की संभावना बढ़ सकती है.

इसी तरह ठंड के मौसम में हृदय को शरीर में गरमी बनाए रखने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिस से रक्तचाप बढ़ जाता है.

अध्ययनों में पता चला है कि बढ़ते तापमान और कार्डियोवैस्क्युलर वजहों से होने वाली मौतों के जोखिम के बीच एक लिंक है. अधिकतम कार्डियोवैस्क्युलर मौतें 35 से 42 डिग्री सैल्सियस के बीच के तापमान में होती हैं. हाल ही के एक अध्ययन में पाया गया है कि हर 100 कार्डिओवैस्क्युलर मौतों में से 1 मौत के केस में इस्केमिक हृदय रोग, स्ट्रोक, हार्ट फेल्योर या एरिथमिया का कारण अत्यधिक गरमी या ठंड हो सकता है.

डा. महेश का कहना है कि का जिन्हें कोरोनरी धमनी की बीमारी, हाइपरटैंशन या हार्ट फेल्योर आदि बीमारियां पहले से हैं, उन के लिए तापमान में अचानक बदलाव होना काफी ज्यादा खतरनाक हो सकता है. इस से हार्ट अटैक ट्रिगर हो सकता है या हार्ट फेल्योर के लक्षण बढ़ सकते हैं. अत्यधिक गरमी में पसीना ज्यादा आने से शरीर में से फ्लूइड कम हो सकता है, जिस से डिहाइड्रेशन और लो ब्लड प्रैशर हो सकता है. यह हृदय के लिए हानिकारक हो सकता है. बहुत ज्यादा ठंड में शरीर शौक में जा सकता है, जिस से रक्तवाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं, हृदय और अन्य अंगों में रक्त का प्रवाह कम हो जाता है.

सुबहसुबह दिल का दौरा

ज्यादातर हार्ट अटैक सुबह के समय आते हैं, इस गलतफहमी के पीछे का सच जान लेना भी आवश्यक है. यह सच है कि कुछ अध्ययनों के अनुसार सुबह के समय हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा होता है, लेकिन यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हुआ है. कुछ रिसर्च का मानना है कि यह शरीर की प्राकृतिक सर्कैडियन लय (यानी शारीरिक, मानसिक और व्यवहार के प्राकृतिक चक्र में परिवर्तन होना, जिस से शरीर 24 घंटे के चक्र में गुजरता है.

सर्कैडियन लय ज्यादातर प्रकाश और अंधेरे से प्रभावित होती है और मस्तिष्क के मध्य में एक छोटे से क्षेत्र द्वारा नियंत्रित होती है.) के कारण होता है, जो रक्त के क्लौट होने के तरीके को प्रभावित करती है. कुछ रिसर्चर मानते हैं कि सुबह में कोर्टिसोल और ऐड्रेनालाइन जैसे हारमोन का बढ़ना इस की वजह हो सकती है.

हृदयरोगियों को ये सावधानियां बरतनी चाहिए:

  •   सुबह भागदौड़ करने से बचें.
  • खुद को दिन के लिए तैयार होने के लिए पर्याप्त समय दें.
  • दवा निर्धारित समय पर लें.
  • संतुलित आहार और नियमित व्यायाम सहित अपनी जीवनशैली को स्वस्थ बनाए रखें.
  • किसी भी संभावित रिस्क से बचने के लिए हमेशा डाक्टर की सलाह लें. डाक्टर की सलाह के बिना.
  • अपने मन से दवा न लें वरना इस के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

Beauty tips: आईशैडो स्टिक, जो देती है आपकी आंखों को अट्रैक्टिव लुक

आजकल फैशन का दौर है जिसमें मेकअप को आजकल हर कोई यूज़ करता है. जब बिगिनर्स मेकअप करते है तो आईशैडो को आखिरी में सीखने की कोशिश करते है. ऐसा इसलिए क्योंकि आईशैडो को लगाना बेहद मुश्किल माना जाता है. आईशैडो को पाउडर या क्रीमी शेड्स को ब्रश से लगाना और उसे अच्छे से ब्लेंड करना काफी मुश्किल हो सकता है. जब तक कि ये अच्छी फिनिशिंग ना दे. लेकिन क्या आप जानते हैं  कि कुछ ऐसे प्रोडक्ट है जो थोड़े समय में भी आंखों के मेकअप लुक को अच्छा और लॉन्ग लास्टिंग बना सकते हैं. ये प्रोडक्ट अच्छे से आईशैडो को ब्लेंड कर सकते हैं जो आपको लंबे समय तक फ्लॉलेस लुक दे सकें. एक आईशैडो स्टिक से आप अपने मेकअप के साथ एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं.

तो आइए जानते हैं इन आईशैडो स्टिक के बारे में जो आपकी आंखों को अलग-अलग लुक दे सकती हैं-

जुलप ब्यूटी आईशैडो स्टिक डुओ

जब आपके पास ये क्यूट आईशैडो स्टिक हो तो आप हर दिन अपनी आंखों के लुक को चेंज कर सकते हैं. ये आपको मैट और शिमर आईशैडो के साथ एक अट्रैक्टिव आईलुक देता है. ये वाटरप्रूफ और क्रीज़-प्रूफ हैं, केवल उंगलियों के साथ आसानी से ब्लेंड हो जाता है और आपको एक अट्रैक्टिव आई लुक दे सकता है.

लूक्साजा 6 पीस मेटैलिक आईशैडो

लूक्साजा मेटैलिक आईशैडो 6 पीस के साथ आता है जो आपकी आंखों को पार्टी लुक देने के लिए अच्छे माने जाते है. यह आपकी आंखों को फ्लोटिंग ड्रैमेटिक आई मेकअप लुक देते हैं. इसमें पर्पल की अलग-अलग शेड्स है जो आप अपनी पसंद के हिसाब से यूज कर सकते हैं.

फोकालर 3 पीस क्रीम आईशैडो स्टिक

फोकालर ऑफर करता है 2-इन-1 आईशैडो पेन जो आईशैडो और आईलाइनर दोनों का काम करता है. ये स्टिक अच्छे कलर और लॉन्ग लास्टिंग आई लुक देता है. ये वाटरप्रूफ और ग्रीसप्रूफ है. ये आईशैडो स्टिक उन लोगों के लिए ज्यादा सूटेबल है जिन लोगों को पसीना ज्यादा आता है या जो गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में रहते हैं. ये आईशैडो स्टिक क्रीमी होने के कारण आंखों को बटर जैसा फिनिशिंग लुक देते है.

ओइलस 12  पीस आईशैडो स्टिक सेट

12 वैल्यू-फॉर-मनी आईशैडो स्टिक्स के सेट में आपको हर ड्रेस के साथ यूज करने के लिए कलर मिलता है. ये आपके मेकअप को अच्छा लुक देते हैं और लोंग लास्टिंग होने के कारण ये आपको पूरा दिन अट्रैक्टिव बनाए रखते है. इसमें सॉफ्ट ब्रश है जो कलर को आसानी से ब्लेंड कर सकते हैं.

वैनसनि 12 कलर्स आईशैडो स्टिक

ये डुअल ग्रेडिएंट आईशैडो स्टिक उन सबके लिए सूटेबल होती है जो लोग सुबह जल्दी ऑफिस या कॉलेज जाते हैं क्योंकि इसको यूज़ करना बेहद आसान होता है. इससे आपको कम समय में मनचाहा लुक मिल सकता है. इसे आप ऑन-द-गो टच-अप के लिए बैग में रख सकते हैं.

ऐलीयूप 11th ऑवर क्रीम आईशैडो स्टिक्स

ऐलीयूप की 11th ऑवर क्रीम आईशैडो स्टिक 6 वेरिएशंस में आती है. वाटरप्रूफ और स्मज-प्रूफ फॉर्मूला के साथ, ये  आईशैडो 11 घंटे से अधिक समय तक रहती हैं. इसके अलावा ये काफी ब्लेंडेबल होती है जो आपकी आंखों को अट्रैक्टिव लुक देती है. इसके साथ- साथ प्राकृतिक तेलों से बनी होने के कारण ये आपकी पलकों को लंबे समय तक हाइड्रेट रखने में भी मदद करती है.

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