Mother’s Day Special: Eco फ्रेंडली और सस्टेनेबल सूती डायपर का करें इस्तेमाल

कुछ सालों पहले माँ अपने बच्चे को घर पर बनी हुई सूती कपडे की लंगोटी पहनाती थी, जिसे बच्चे के जन्म होने के पहले से ही परिवार की महिलाएं सिलना शुरू कर देती थी, क्योंकि सूती कपड़ों का बच्चे की कोमल त्वचा पर किसी प्रकार के इन्फेक्शन का न होने से है,लेकिन इन डायपर के साथ समस्या थी,बच्चे के मल या पेशाब होने पर बार-बार धोकर सुखाना पड़ता था.

इसके बाद बाजार में कई कंपनियों के डायपर्स उतारने की वजह से एक खास वर्ग ही इसका प्रयोग कर सका, क्योंकि ये डायपर्स काफी महंगे होते है. समय के साथ डायपर की मांग बढ़ी और डायपर्स के दाम में भी कमी आई. आज की माएं सुविधा के लिए बच्चों को जन्म के बाद से ही डायपर पहनाती है, क्योंकि डायपर पहना देने से बिस्तर और कपडे ख़राब नहीं होता और बच्चा ख़ुशी से खेल सकता है. डायपर बच्चे के मल और पेशाब को सोखकर उसे सूखा होने का एहसास करवाती है, लेकिनबाजार में मिलने वाले डायपर में प्लास्टिक और केमिकल से बच्चे के शरीर पर कई बार रैशेज आ जाने से माँ परेशान भी हो जातीहै.

कम प्रयोग प्लास्टिक और कैमिकल का

कई बार रैशेज इतना अधिक हो जाता है कि बच्चा डायपर पहन नहीं पाता,ऐसा अधिकतर अत्यधिक नमी, ऊमसऔर गर्मी वाले स्थानों पर होता है. इसलिए ये डायपर जितना मुश्किल बच्चों को पहनने में होता है, उतना ही इसमें प्रयोग किये गए केमिकल और प्लास्टिक पर्यावरण के लिए हानिकारक होते है. एक शोध में यह पता चला है कि एक होता  की लगभग 2 टन डायपर को गलने में 500 साल लगते है. इसके अलावा इससे निकलने वाले कैमिकल से कैंसर या अन्य कई बीमारियोंका खतरा रहता है और धीरे-धीरे ये कचरा जमीन के एक बड़े हिस्से में फ़ैल जाती है. इससे बचने के लिए सूती डायपर्स का प्रयोग करना आज सभी पसंद कर रहे है. पहले ये डायपर्स केवल विदेशों में मिलता था, लेकिन समय के साथ कई कंपनियां इस क्षेत्र में आकर आपना योगदान दे रही है.

खोज सूती कपडे की इको फ्रेंडली डायपर

इस बारें में सुपरबॉटम्स की फाउंडर पल्लवी उटगी कहती है कि जब मेरा बेटा कबीर हुआ तो मेरे परिवार के बड़ों ने डिस्पोजेबल डायपर्स न पहनाकर अधिकतर लंगोटी पहनाने की सलाह दी. मैंने भी बेटे को घर पर बनी सूती नैपी पहनाई, क्योंकि डॉक्टर की सलाह भी यही थी, ताकि बच्चे की स्किन पर किसी प्रकार का रैशेज न हो.हालाँकि डिस्पोजेबल डायपर्स बच्चे को पहनाना आसान होता है, जबकि लंगोट पहनाने से बार-बार गीला होने पर बदलना पड़ता है,ऐसे में मैं चाहती थी कि कोई ऐसा प्रोडक्ट मुझे मिले, जो बच्चे की त्वचा को किसी बीमारी से बचाने के साथ-साथ उसे पहनाना सुविधाजनक और इको फ्रेंडली भी हो. मै अच्छी क्वालिटी की सूती कपडे की डायपर को खोजने लगी. पता चला कि ये केवल विदेशों में ही मिलता है. फिर मैंने इस पर जानकारी हासिल करनी शुरू की. वर्ष 2013 से बेटे के जन्म के बाद से ही करीब 2 साल तक इस बारें में मैंने रिसर्च किया और तैयार प्रोडक्ट को मैं बेटे पर प्रयोग करती रही, उससे जो परिणाम मिले,उन्हें मैं रिकॉर्ड में रखती गयी. इस प्रकार वर्ष 2016 में सुपरबॉटम्स का जन्म बहुत कम पूंजी के साथ हुआ. इस काम में पति सलिल ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं शुरू में एक कोर्पोरेट कंपनी की मार्केटिंग में काम करती थी. मेटरनिटी लीव के दौरान मेरे पास कुछ समय बच जाता था. मैंने उस समय का उपयोग इको-फ्रेंडली क्लॉथ डायपर के लिए किया. इसे बनाने में ट्रायल और समय लगा. उस दौरान मैंने बेटे, ऑफिस और सुपरबॉटम्स को साथ-साथकिया, जो बहुत मुश्किल था. मैंने जॉब छोड़कर, अपनी कंपनी में लग गयी.

होती है चुनौती

इसके आगे पल्लवी कहती है कि जब कोई नयी प्रोडक्ट मार्केट में आती है, उसे लोगों को समझाना मुश्किल होता है, ग्राहक को लगता है कि अगर ये काम न करें, तो उनके पैसे बेकार होंगे और बच्चे की नीद ख़राब होगी, इसलिए मैंने अपनी नेटवर्क में कई ट्रायल किये, जिसमें मैंने पहले फ्री में डायपर दिया, जिससे वे इसका प्रयोग कर इसकी उपयोगिता समझ सकें. अभी भी किसी पेरेंट्स के डायपर खरीदने पर एक महीने प्रयोग में लाने के बाद भी उन्हें अच्छा न लगे,तो मैं यूज्ड किये डायपर भी ले लेती हूँ. इसके अलावा मॉम्स की एक नेटवर्क है. 10 हैप्पी मदर्स आज ब्रांड की एम्बेसेडर बन चुकी है, क्योंकि ये महिलाएं घर बैठे कुछ काम कर पैसा कमाना चाहती है. इसके अलावा करीब 80 मदर्स की एक नेटवर्क बनाई है, जो इस इको- फ्रेंडली डायपर्स के बारें में पेरेंट्स को शिक्षित करती है. करीब 2 लाख से भी अधिक महिलाएं इस उत्पाद के साथ जुड़ चुकी है. इसके साथ-साथ सोशल मीडिया का भी मैंने सहारा लिया है. इसमें मैंने उस काम को किया, जो बड़े ब्रांड नहीं कर पाते है. मैंने पर्सनल लेवल पर मदर्स से बात की और उनकी मांग को प्रोडक्ट में शामिल करने की कोशिश की, जो उन मदर्स को अच्छा लगता है. देश के अलावा विदेश में जैसे सिंगापुर और मलयेशिया में भी इको-फ्रेंडली डायपर की मांग है.

सही प्रोडक्ट और सही सर्विस

पल्लवी का कहना है कि इस कॉटन डायपर के बारें में सबको जागरूक कर ब्रांड को ग्रो करना ही सबसे बड़ी चुनौती पल्लवी के लिए थी, वह कहती है कि मेरी मदर टू मदर का जो जुड़ाव सोशल मीडिया के द्वारा थी, उसका मैंने सदुपयोग किया. उन्हें प्रोडक्ट के बारें में जानकारी दी. करीब 60 महिलाओं ने मेरे प्रोडक्ट का यूज़ अपने बच्चे के लिए किया है और उन्हें इस पर विश्वास है. सही प्रोडक्ट और सही सर्विस होने की वजह से मैं आगे बढ़ पायी.

फायदा हुआ माँ होना

इस काम को बेटे के साथ काम करना आसान नहीं था. मैंने शुरू से बेटे को साथ लेकर ही प्लानिंग की है. मेरे हर रूटीन में वह शामिल होता है. एक प्लानिंग पहले से करनी पड़ती है, जिससे किसी प्रकार की समस्या काम में नहीं आती. माँ होने की वजह से प्रोडक्ट की छोटी-छोटी बारीकियों को समझना मेरे लिए आसान होता है, क्योंकि कई बार छोटी चीज भी बच्चे के लिए बड़ी हो सकती है. इसके अलावा एक माँ दूसरी माँ की जरूरतों को समझ सकती है. मेरे साथ जितनी भी महिलाएं है वे इस डायपर का प्रयोग कर चुकी है, ऐसे में किसी नई फीचर का प्रोडक्ट में शामिल करना भी आसान होता है.

घरेलू महिलाएं भी कर सकती है रोजगार

इतना ही नहीं, घरेलू महिलायें जो ऑफिस जाकर काम नहीं कर सकती और खुद का कुछ इनकम चाहती है, उनके लिए ये एक बेहतर आप्शन है, क्योंकि ये एक सही प्रोडक्ट है और इसे प्रयोग करने वाला हमेशा खुश रहता है. इसलिए इस प्रोडक्ट के साथ काम करना आसान होता है और घर बैठे वे अच्छा कमाती है. कई महिलाएं इससे जुड़ने के लिए फ़ोन करती है. इस व्यवसाय से जुड़ना बहुत आसान है और ये मुफ्त है. एक छोटा टेस्ट प्रोडक्ट से जुडी जानकारी के लिए लिया जाता है. इससे उनकी रूचि और सीरियसनेस को देखा जाता है और उन्हें ट्रेनिंग दी जाती है. इसके बाद वे शुरू व्यवसाय कर सकती है, केवल वेबसाइट पर दिए गए फॉर्म को भरना होता है. ये रियूजेबल डायपर है और बच्चे को पहनाना भी आसान है. ये रात में 12 घंटे और दिन में 5 से 6 घंटे के बाद धोना पड़ता है. इसे आप मशीन में या हाथ से धो सकते है. इसमें प्रयोग किया जाने वाला कपडा आर्गेनिक सूती का होता है. उसके ऊपर ड्राई फील होने के लिए एक कपडा डाला जाता है. इस प्रकार एक डायपर 300 बार धोकर प्रयोग किया जा सकता है. 3 डायपर लेने पर जन्म से लेकर 3 साल तक प्रयोग किया जा सकता है. इसमें जरुरत के अनुसार दिए गए बटन को साइज़ के अनुसार कर फ्लैप को बंद करना होता है. ये डायपर दूसरेडिस्पोजेबल डायपर्ससे करीब 75 प्रतिशत सस्ता पड़ता है.

काम को आगे बढ़ाने के लिए पल्लवी की एक ड्रीम होती है, जिसमें अगर वह 100 डायपर्स के टार्गेट पर 300 डायपर्स बेच लेती है, तो आगे 1000 का टार्गेट होता है. इसमें  प्रेरणा महिलाओं द्वारा मिली डायपर की फीडबैक पर निर्भर करता है.हर महीने प्लानिंग से पहले महिलाओं द्वारा दिए सलाह को भी शामिल किया जाता है. पल्लवी के खुश रहने का मन्त्र, जो जीवन मिला है,उसमें खुश रहना. वह इसी तरह से लाइफ को जीना पसंद करती है.

Mother’s Day Special: तुम्हें सब है पता मेरी मां

जब मिस वर्ल्ड का ताज किसी प्रतियोगी से सिर्फ एक प्रश्न दूर हो और उस प्रश्न के जवाब में प्रतियोगी एक मां को सब से ज्यादा सैलरी पाने का हकदार बताए और साथ ही मां की गरिमा को और बढ़ाते हुए यह भी कहे कि मां के वात्सल्य की कीमत कैश के रूप में नहीं, बल्कि आदर और प्यार के रूप में ही अदा की जा सकती है और जब उस के इस जवाब पर खुश हो कर विश्व भी अपनी सहमति की मुहर लगा कर उसे ‘ब्यूटी विद ब्रेन’ मानते हुए ‘मिस यूनिवर्स’ का ताज पहना देता है तो यकीनन उस की कही बात उस के ताज की ही तरह महत्त्वपूर्ण हो जाती है.

मानुषी छिल्लर के जवाब से शतप्रतिशत सहमत होने में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है. सचमुच मां का काम अतुल्य है. एक मां एक दिन में ही अपने बच्चे के लिए आया, रसोइया, धोबी, अध्यापिका, नर्स, टेलर, मोची, सलाहकार, काउंसलर, दोस्त, प्रेरक, अलार्मघड़ी और न जाने ऐसे कितने तरह के कार्य करती है, जबकि घर से बाहर की दुनिया में इन सब कार्यों के लिए अलगअलग व्यक्ति होते हैं.

एक विलक्षण शक्ति

मां बनते ही मां के कार्यक्षेत्र का दायरा बहुत विकसित हो जाता है, किंतु निश्चित रूप से मां को ‘संपूर्ण और सम्माननीय मां’ उस के वे दैनिक कार्य नहीं बनाते, बल्कि एक मां को महान उस की वह आंतरिक शक्ति बनाती है, जो उसे एक ‘सिक्स्थ सैंस’ के रूप में मिली होती है, जिस के बल पर मां बच्चे के अंदर इस हद तक समाहित हो जाती है कि अपने बच्चे की हर बात, हर पीड़ा, हर जरूरत, उस की कामयाबी और नाकामयाबी हर बात को बिना कहे केवल उस का चेहरा देख कर ही भांप लेती है.

मां का कर्तव्य केवल अपने बच्चों की जरूरतों को पूरा करना ही नहीं होता, बल्कि मां की और भी बहुत सी जिम्मेदारियां होती हैं. अपने बच्चों को समझना, जानना और उन पर विश्वास करना, उन का उचित मार्गदर्शन और चरित्र निर्माण कर के उन्हें एक अच्छा इंसान बनाना भी मां की जिम्मेदारियों में शामिल होता है.

जहां एक तरफ मां का भावनात्मक संबल किसी भी बच्चे का सब से बड़ा सहारा होता है, वहीं दूसरी तरफ मां के विश्वास और मार्गदर्शन में वह शक्ति होती है, जिस से वह अपने बच्चे को फर्श से अर्श तक पहुंचा सकती है.

बच्चे को योग्य बनाती है मां

जहां एक तरफ अब्राहम लिंकन की मां ने घोर आर्थिक तंगी के बावजूद अब्राहम लिंकन को चूल्हे के कोयले से अक्षर ज्ञान कराया और उन्हें अमेरिका के राष्ट्रपति के पद पर पदासीन होने योग्य बनाया, वहीं दूसरी तरफ जब महान वैज्ञानिक थौमस एडिसन को उन के स्कूल टीचर ने ‘ऐडल्ट चाइल्ड’ कह कर उन्हें हतोत्साहित किया तब उन की मां ने एड

Mother’s Day Special: और प्यार जीत गया

देवयानीको समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? जिस दोराहे पर 25 साल पहले वह खड़ी थी, आज फिर वही स्थिति उस के सामने थी. फर्क सिर्फ यह था कि तब वह खुद खड़ी थी और आज उस बेटी आलिया थी. उस का संयुक्त परिवार होने के बावजूद उसे रास्ता सुझाने वाला कोई नहीं था. पति सुमित तो परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ से दबे रहने वाले शख्स थे. उन से तो कोई उम्मीद करना ही बेकार था. शादी के बाद से आज तक उन्होंने कभी एक अच्छा पति होने का एहसास नहीं कराया था. घंटों कारोबार में डूबे रहना उन की दिनचर्या थी. प्यार के 2 बोल सुनने को तरस गई थी वह. घर के राशन से ले कर अन्य व्यवस्थाओं तक का जिम्मा उस पर था. वह जब भी कोई काम कहती सुमित कहते, ‘‘तुम जानो, रुपए ले लो, मुझे डिस्टर्ब मत करो.’’

संयुक्त परिवार में देवयानी को हमेशा अग्नि परीक्षा देनी पड़ती. भाइयों और परिवार में सुमित के खुद को उच्च आदर्श वाला साबित करने के चक्कर में कई बार देवयानी अपने को कटघरे में खड़ा पाती. तब उस का रोमरोम चीत्कार उठता. 25 वर्षों में उस ने जो झेला, उस में स्थिति तो यही थी कि वह खुद कोई निर्णय ले और अपना फैसला घर वालों को सुनाए. इस वक्त देवयानी के एक तरफ उस का खुद का अतीत था, तो दूसरी तरफ बेटी आलिया का भविष्य. उसे अपना अतीत याद हो गया. वह स्कूल के अंतिम वर्ष में थी कि महल्ले में नएनए आए एक कालेज लैक्चरर के बेटे अविनाश भटनागर से उस की नजरें चार हो गईं. दोनों परिवारों में आनाजाना बढ़ा, तो देवयानी और अविनाश की नजदीकियां बढ़ते लगीं. दोनों का काफी वक्त साथसाथ गुजरने लगा. अत्यंत खूबसूरत देवयानी यौवन की दहलीज पर थी और अविनाश उस की ओर जबरदस्त रूप से आकर्षित था. वह उस के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता. अत्यंत कुशाग्र अविनाश पढ़ाई में भी देवयानी की मदद करता और जबतब मौका मिलते ही कोई न कोई गिफ्ट भी देता. वह अविनाश के प्यार में खोई रहने के बावजूद अपनी पढ़ाई में अव्वल आ रही थी. दिन, महीने, साल बीत रहे थे. देवयानी स्कूल से कालेज में आ गई. वह दिनरात अविनाश के ख्वाब देखती. उस के घर वाले इस सब से बेखबर थे. उन्हें लगता था कि अविनाश समझदार लड़का है. वह देवयानी की मदद करता है, इस से ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन उन का यह भ्रम तब टूटा, जब एक रात एक अजीब घटना हो गई. अविनाश ने देवयानी के नाम एक लव लैटर लिखा और एक पत्थर से बांध कर रात में देवयानी के घर की चारदीवारी में फेंका. उसी वक्त देवयानी के पिता वहां बने टौयलेट में जाने के लिए निकले. अचानक पत्थर आ कर गिरने से वे चौंके और देखा तो उस पर कोई कागज लिपटा हुआ था. उन्होंने उसे उठाया और वहीं खड़े हो कर पढ़ने लगे. ज्योंज्यों वे पत्र पढ़ते जा रहे थे. उन की त्योरियां चढ़ती जा रही थीं.

देवयानी के पापा ने गली में इधरउधर देखा, कोई नजर नहीं आया. गली में अंधेरा छाया हुआ था, क्योंकि स्ट्रीट लाइट इन दिनों खराब थी. उस वक्त रात का करीब 1 बज रहा था और घर में सभी सदस्य सो रहे थे. उन्हें अपनी बेटी पर गुस्सा आ रहा था, लेकिन इतनी रात गए वे कोई हंगामा नहीं करना चाहते थे. वे अपने बैडरूम में आए उन की पत्नी इस सब से बेखबर सो रही थी. वे उस की बगल में लेट गए, लेकिन उन की आंखों में नींद न थी. उन्हें अपनी इस लापरवाही पर अफसोस हो रहा था कि देवयानी की हरकतों और दिनचर्या पर नजर क्यों नहीं रखी? खत में जो कुछ लिखा था, उस से साफ जाहिर हो रहा था कि देवयानी और अविनाश एकदूसरे के प्यार में डूबे हैं. देवयानी के पापा फिर सो नहीं पाए. रात भर उन्होंने खुद पर नियंत्रण किए रखा, लेकिन जैसे ही देवयानी उठी उन के सब्र का बांध टूट गया. वह अपनी छोटी 2 बहनों और 2 भाइयों के साथ चाय पी रही थी कि उसे पापा का आदेश हुआ कि चाय पी कर मेरे कमरे में आओ. ‘‘ये क्या है देवयानी?’’ उस के आते ही अविनाश का खत उस की तरफ बढ़ाते हुए उन्होंने पूछा.

‘‘क्या है पापा?’’ उस ने कांपती आवाज में पूछा और फोल्ड किए हुए खत को खोल कर देखा, तो उस का कलेजा धक रह गया. अविनाश का खत, पापा के पास. कांप गई वह. गला सूख गया उस का. काटो तो खून नहीं.

‘‘क्या है ये…’’ पापा जोर से चिल्लाए.

‘‘पा…पा…,’’ उस के गले से बस इतना ही निकला. वह समझ गई कि आज घर में तूफान आने वाला है. बुत बनी खड़ी रह गई वह. घबराहट में कुछ बोल नहीं पाई और आंखों से अश्रुधारा बह निकली. ‘‘शर्म नहीं आती तुझे,’’ पापा फिर चिल्लाए तो मां भी कमरे में आ गईं.

‘‘क्या हुआ? क्यों चिल्ला रहे हो सुबहसुबह?’’ मां ने पूछा.

‘‘ये देख अपनी लाडली की करतूत,’’ पापा ने देवयानी के हाथ से खत छीनते हुए कहा.

‘‘क्या है ये?’’

‘‘खुद देख ले ये क्याक्या गुल खिला रही है. परिवार की इज्जत, मानमर्यादा का जरा भी खयाल नहीं है इस को.’’ मां ने खत पढ़ा तो उन का माथा चकरा गया. वे धम्म से बैड पर बैठ गईं.’’ ‘‘यह क्या किया बेटी? तूने बहुत गलत काम किया. तुझे यह सब नहीं करना चाहिए था. तुझे पता है तू घर में सब से बड़ी है. तूने यह नहीं सोचा कि तेरी इस हरकत से कितनी बदनामी होगी. तेरे छोटे भाईबहनों पर क्या असर पड़ेगा. उन के रिश्ते नहीं होंगे,’’ मां ने बैड पर बैठेबैठे शांत स्वर में कहा तो देवयानी खुद को रोक नहीं पाई. वह मां से लिपट कर रो पड़ी. पापा के दुकान पर जाने के बाद मां ने देवयानी को अपने पास बैठाया और बोलीं, ‘‘बेटा, भूल जा उस को. जो हुआ उस पर यहीं मिट्टी डाल दे. मैं सब संभाल लूंगी.’’

‘‘नहीं मां, हम दोनों एकदूसरे को बहुत प्यार करते हैं,’’ देवयानी ने हिम्मत जुटा कर मां से कहा.

‘‘नहीं बेटा, इस प्यारव्यार में कुछ नहीं धरा. वह तेरे काबिल नहीं है देवयानी.’’ ‘‘क्यों मां, क्यों नहीं है मेरे काबिल? मैं ने उसे 2 साल करीब से देखा है. वह मेरा बहुत खयाल रखता है. बहुत प्यार करता है वह भी मुझ से.’’ ‘‘बेटा, वे लोग अलग जाति के हैं. उन का खानपान उन के जिंदगी जीने के तरीके हम से बिलकुल अलग है,’’ मां ने देवयानी को समझाने की कोशिश की.

‘‘पर मां, अविनाश मेरे लिए सब कुछ बदलने को तैयार है. उस के मम्मीपापा भी बहुत अच्छे हैं,’’ देवयानी मां से तर्कवितर्क कर रही थी. ‘‘और तूने सोचा है कि तेरे इस कदम से तेरे छोटेभाई बहनों पर क्या असर पडे़गा? रिश्तेदार, परिवार वाले क्या कहेंगे? नहीं देवयानी, तुम भूल जाओ उस को,’’ मां ने फैसला सुनाया. पापा ने कड़ा फैसला लेते हुए देवयानी की शादी दिल्ली के एक कारोबारी के बेटे सुमित के साथ कर दी. लेकिन वह अविनाश को काफी समय तक भुला नहीं पाई. शादी के बाद वह संयुक्त परिवार में आई तो ननदों, जेठानियों और बच्चों के बड़े परिवार में उस का मन लगता गया. एक बेटी आलिया और एक बेटे अंकुश का जन्म हुआ, तो वह धीरेधीरे अपनी जिम्मेदारियों में खो गई. लेकिन अविनाश अब भी उस के दिल के किसी कोने में बसा हुआ था. उसे कसक थी कि वह अपने प्यार से शादी नहीं कर पाई.

देवयानी अपने अतीत और वर्तमान में झूल रही थी. उस की आंखों में नींद नहीं थी. उस ने घड़ी में टाइम देखा. 3 बज रहे थे. पौ फटने वाली थी. उस के बगल में पति सुमित सो रहे थे. आलिया और अंकुश अपने रूम में थे.देवयानी को आलिया और तरुण के बीच चल रहे प्यार का एहसास कुछ दिन पूर्व ही हुआ था, आलिया के सहपाठी तरुण का वैसे तो उन के घर आनाजाना था, लेकिन देवयानी ने इस तरफ कभी ध्यान नहीं दिया. वह एक मध्यवर्गीय परिवार से वास्ता रखता था. उस के पापा एक बैंक में मैनेजर थे. हैसियत के हिसाब से देखा जाए, तो उस का परिवार देवयानी के परिवार के सामने कुछ भी नहीं था. लेकिन आजकल स्कूलकालेज में पढ़ने वाले बच्चे जातपांत और गरीबीअमीरी से ऊपर उठ कर स्वस्थ सोच रखते हैं. तरुण ने आलिया के साथ ही बीकौम किया और एक यूनिवर्सिटी में प्रशासनिक विभाग में नौकरी लग गया था. जबकि आलिया अभी और आगे पढ़ना चाहती थी.

उस दिन आलिया बाथरूम में गई हुई थी. तभी उस के मोबाइल की घंटी बजी. देवयानी ने देखा मोबाइल स्क्रीन पर तरुण का नाम आ रहा था. उस ने काल को औन कर मोबाइल को कान पर लगाया ही था कि उधर से तरुण की चहकती हुई आवाज आई, ‘‘हैलो डार्लिंग, यार कब से काल कर रहा हूं, कहां थीं?’’

देवयानी को समझ में नहीं आया कि वह क्या बोले तो बस सुनती रही. तरुण बोले जा रहा था. ‘‘क्या हुआ जान, बोल क्यों नहीं रहीं, अभी भी नाराज हो? अरे यार, इस तरह के वीडियो चलते हैं आजकल. मेरे पास आया, तो मैं ने तुझे भेज दिया. मुझे पता है तुम्हें ये सब पसंद नहीं, सो सौरी यार.’’

‘‘हैलो तरुण, मैं आलिया की मम्मी बोल रही हूं. वह बाथरूम में है.’’

‘‘ओह सौरी आंटी, वैरी सौरी. मैं ने सोचा. आलिया होगी.’’ ‘‘बाथरूम से आती है, तो कह दूंगी,’’ कहते हुए देवयानी ने काल डिसकनैक्ट कर दी. लेकिन उस के मन में तरुण की काल ने उथलपुथल मचा दी. उस से रहा नहीं गया तो उस ने आलिया के माबोइल में वाट्सएप को खोल लिया. तो वह आलिया के बाथरूम से निकलने से पहले इसे पढ़ लेना चाहती थी. दोनों ने खूब प्यार भरी बातें लिख रही थीं और आलिया ने तरुण के साथ हुई एकएक बात को लंबे समय से सहेज कर रखा हुआ था. दोनों बहुत आगे बढ़ चुके थे. देवयानी को 25 साल पहले का वह दिन याद हो आया, जब उस के पापा ने अविनाश का लिखा लव लैटर पकड़ा था. सब कुछ वही था, जो उस के और अविनाश के बीच था. प्यार करने वालों की फीलिंग शायद कभी नहीं बदलती, जमाना चाहे कितना बदल जाए. एक फर्क यह था कि पहले कागज पर दिल की भावनाएं शब्दों के रूप में आकार लेती थीं, अब मोबाइल स्क्रीन पर. तब लव लैटर पहुंचाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते थे, अब कितना आसान हो गया है.

देवयानी कई दिनों से देख रही थी कि आलिया के खानेपीने, सोनेउठने की दिनचर्या बदल गई थी. अब उसे समझ आ रहा था कि आलिया और तरुण के बीच जो पक रहा था, उस की वजह से ही यह सब हो रहा था. देवयानी ने फैसला किया कि वह अपनी बेटी की खुशियों के लिए कुछ भी करेगी. उस ने आलिया से उसी दिन पूछा, ‘‘बेटी, तुम्हारे और तरुण के बीच क्या चल रहा है?’’

‘‘क्या चल रहा है मौम?’’ आलिया ने अनजान बनते हुए कहा.

‘‘मेरा मतलब प्यारव्यार.’’

‘‘नहीं मौम, ऐसा कुछ भी नहीं है.’’

‘‘मुझ से झूठ मत बोलना. मैं तुम्हारी मां हूं. मैं ने तुम्हारे मोबाइल में सब कुछ पढ़ लिया है.’’

‘‘क्या पढ़ा, कब पढ़ा? यह क्या तरीका है मौम?’’

‘‘देखो बेटा, मैं तुम्हारी मां हूं, इसलिए तुम्हारी शुभचिंतक भी हूं. मुझे मां के साथसाथ अपनी फै्रंड भी समझो.’’

‘‘ओके,’’ आलिया ने कंधे उचकाते हुए कहा, ‘‘मैं तरुण से प्यार करती हूं. हम दोनों शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘लेकिन बेटा क्या तुम उस के साथ ऐडजस्ट कर पाओगी? तरुण तो मुश्किल से 20-25 हजार रुपए महीना कमाता होगा. क्या होगा इतने से.’’

‘‘मौम आप टैंशन मत लें. हम दोनों ऐडजस्ट कर लेंगे. शादी के बाद मैं भी जौब करूंगी,’’ आलिया ने कहा.

‘‘तुम्हें पता है जौब क्या होती है, पैसे कहा से, कैसे आते हैं?’’

‘‘हां मौम, आप सही कह रही हैं. मुझे अब तक नहीं पता था, लेकिन अब सीख रही हूं. तरुण भी मुझे सब बताता है.’’

‘‘हम कोई मदद करना चाहें उस की… उस को अच्छा सा कोई बिजनैस करा दें तो…?’’

‘‘नहीं मौम, तरुण ऐसा लड़का नहीं है. वह कभी अपने ससुराल से कोई मदद नहीं लेगा. वह बहुत खुद्दार किस्म का लड़का है. मैं ने गहराई से उसे देखासमझा है.’’

‘‘पर बेटा परिवार में सब को मनाना एकएक बात बताना बहुत मुश्किल हो जाएगा. कैसे होगा यह सब…?’’ मां ने आलिया के समक्ष असमर्थता जताते हुए कहा.

‘‘मुझे कोई जल्दी नहीं है मां… मैं वेट करूंगी.’’ देवयानी के समक्ष अजीब दुविधा थी. वह बेटी को उस का प्यार कैसे सौंपे? पहली अड़चन पति सुमित ही थे. फिर उन के भाई यानी आलिया के चाचाताऊ कैसे मानेंगे? तरुण व आलिया परिवारों के स्टेटस में दिनरात जैसा अंतर था. फिर भी देवयानी ठान चुकी थी कि यह शादी करवा कर रहेगी. उस ने अपने स्तर पर भी तरुण और उस के परिवार के बारे में पता लगाया. सब ठीक था. सब अच्छे व नेकदिल इंसान और उच्च शिक्षित थे. कमी थी तो बस एक ही कि धनदौलत, कोठीबंगला नहीं था. एक रात मौका देख कर देवयानी ने सुमित के समक्ष आलिया की शादी की बात रखी, ‘‘वह शादी लायक हो गई है, आप ने कभी ध्यान दिया? उस की फैं्रड्स की शादियां हो रही हैं.’’

‘‘क्या जल्दी है, 1-2 साल बाद भी कर सकते हैं. अभी तो 24 की ही हुई है.’’

‘‘24 की उम्र कम नहीं होती सुमित.’’

‘‘तो ठीक है, लेकिन अब रात को ही शादी कराएंगी क्या उस की? मेरी जेब में लड़का है क्या, जो निकाल कर उस की शादी करवा दूंगा?’’

‘‘लड़का तो है.’’

‘‘कौन है?’’

‘‘तरुण, आलिया का फ्रैंड. दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं. अच्छी अंडरस्टैंडिंग है दोनों में.’’

‘‘वह बैंक मैनेजर का बेटा,’’ सुमित उखड़ गए, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या देवयानी?’’

‘‘बिलकुल नहीं हुआ है. जो कह रही हूं बहुत सोचसमझ कर दोनों के हित के लिए कह रही हूं. वह आलिया को खुश रखेगा, बस इतना कह सकती हूृं.’’ देवयानी ने उस रात अपने पति सुमित को तकवितर्क और नए जमाने की आधुनिक सोच का हवाला दे कर अपने पक्ष में कर लिया. उसे लगा एक बड़ी बाधा उस ने पार कर ली है. अब बारी थी परिवार के अन्य सदस्यों के समक्ष दीवार बन कर खड़ा होने की. उस ने अपनी  सास, देवर और जेठानियों के समक्ष अपना मजबूत पक्ष रखा. उस ने यह भी कहा कि अगर आप तैयार न हुए, तो वह घर से भाग कर शादी कर लेगी तो क्या करोगे? फिर तो चुप ही रहना पड़ेगा. और अगर दोनों बच्चों ने कुछ कर लिया तो क्या करोगे? जीवन भर पछताओगे. इस से तो अच्छा है कि हम अपनी सहमति से दोनों की शादी कर दें. और एक एक दिन वह आ गया जब आलिया और तरुण की शादी पक्की हो गई. शादी वाले दिन जब आलिया अग्नि के समक्ष तरुण के साथ फेरे ले रही थी अग्नि से उठते धुएं ने देवयानी की आंखों से अश्रुधारा बहा दी. इस अश्रुधारा में उसे अपने पुराने ख्वाब पूरे होते हुए नजर आए. उसे लगा कि 25 साल बाद उस का प्यार जीत रहा है.

एक गलती

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं संकर्षण को क्या जवाब दूं कि उस का पिता कौन है? संकर्षण मेरा बेटा है, पर उस के जीवन की भी अजब कहानी रही. वह मेरी एक गलती का परिणाम है जो प्रकृति ने कराई थी. मेरे पति आशीष के लंदन प्रवास के दौरान उन के बपचन के मित्र गगन के साथ प्रकृति ने कुछ ऐसा चक्र चलाया कि संकर्षण का जन्म हो गया. कोई सोच भी नहीं सकता था कि गगन या मैं आशीष के साथ ऐसी बेवफाई करेंगे. हम ने बेवफाई की भी नहीं थी बस सब कुछ आवेग के हाथों घटित हो गया था.

मुझे आज भी अच्छा तरह याद है जब गगन की पत्नी को हर तरफ से निराश होने के बाद डाक्टर के इलाज से गर्भ ठहरा था. पर पूर्ण समय बाद एक विकृत शिशु का जन्म हुआ, जो अधिक देर तक जिंदा न रहा. होटल के कमरे में थके, अवसादग्रस्त और निराश गगन को संभालतेसंभालते हम लोगों को झपकी आई और कब हम लोग प्रकृति के कू्रर हाथों के मजाक बन बैठे समझ ही नहीं पाए. फिर संकर्षण का जन्म हो गया. मैं ने उसे जन्म देते ही गगन और उन की पत्नी को उसे सौंप दिया ताकि यह राज आशीष और गगन की पत्नी को पता न चले. गगन की पत्नी अपनी सूनी गोद भरने के कारण मेरी महानता के गुण गाती और आशीष मेरे इस त्याग को कृतज्ञता की दृष्टि से देखते.

हां, मेरे मन में जरूर कभीकभी अपराधबोध होता. एक तो संकर्षण से अपने को दूर करने का और दूसरा आशीष से सब छिपाने का. पर इसी में सब की भलाई थी और सबकुछ ठीकठाक चल भी रहा था. गगन और उन की पत्नी संकर्षण को पा कर खुश थे. वह उन के जीवन की आशा था. मेरे 2 बच्चे और थे कि तभी वह घटना घटी.

संकर्षण तब 10 वर्ष का रहा होगा. वह, गगन और उन की पत्नी कार से कहीं से लौट रहे थे कि उन की कार का ऐक्सिडैंट हो गया. गगन की पत्नी की घटना स्थल पर ही मौत हो गई. गगन को भी काफी चोटें आईं. हां, संकर्षण को 1 खरोंच तक नहीं आई.

काफी दिन हौस्पिटल में रहने के बाद गगन स्वस्थ हो गए पर दुनिया से विरक्त. एक दिन उन्होंने मुझे और आशीष को बुला कर कहा, ‘‘मैं ने अपनी सारी संपत्ति संकर्षण के नाम कर दी है. अब मैं संन्यास लेने जा रहा हूं. मेरी खोजखबर लेने की कोशिश मत करना.’’

हम लोगों ने बहुत समझाने की कोशिश की पर संकर्षण को हमारे हवाले कर के एक दिन वे घर छोड़ कर न जाने कहां चले गए. आशीष को गगन के जाने का गम जरूर था, पर संकर्षण अब हमारे साथ रहेगा, यह जान कर वे बहुत खुश थे. उन के अनुसार हम दोनों ने इतने दिन पुत्रवियोग सहा. तब से आज तक 10 साल बीत गए थे, लेकिन संकर्षण हम लोगों के साथ था.

हालांकि जब से उसे पता चला था कि गगन और उन की पत्नी, जिन के साथ वह इतने वर्ष रहा, उस के मातापिता नहीं हैं, मातापिता हम लोग हैं, तो वह हम से नाराज रहता. कहता, ‘‘आप लोग कैसे मातापिता हैं, जो अपने बच्चे को इतनी आसानी से किसी दूसरे को दे दिया? अगर मैं इतना अवांछनीय था, तो मुझे जन्म क्यों दिया था?’’

अपने बड़े भाईबहन से भी संकर्षण का तालमेल न बैठ पाता. उस की रुचि, सोच सब कुछ उन से अलग थी. उस की शक्ल भी गगन से बहुत मिलती थी. कई बार अपने दोनों बच्चों से इतनी भिन्नता और गगन से इतनी समरूपता आशीष को आश्चर्य में डाल देती. वे कहते, ‘‘हैरत है, इस का सब कुछ गगन जैसा कैसे है?’’

मैं कहती, ‘‘बचपन से वहीं पला है… व्यक्ति अपने परिवेश से बहुत कुछ सीखता है.’’

आशीष को आश्चर्य ही होता, संदेह नहीं. मैं और गगन दोनों ही उन के संदेह की परिधि के बाहर थे. यह सब देख कर मुझे खुद पर और क्षोभ होता था और मन करता था आशीष को सबकुछ सचसच बता दूं. लेकिन आशीष क्या सच सुन पाएंगे? इस पर मुझे संदेह था. वैसे संकर्षण आशीष की ही भांति बुद्धिमान था. केवल उस के एक इसी गुण से जो आशीष से मिलता था, आशीष का पितृत्व संतुष्ट हो जाता, पर संकर्षण उस ने तो अपने चारों तरफ हम लोगों से नाराजगी का जाल बुन लिया और अपने को एकाकी करता चला गया. पता नहीं यह कारण था अथवा कोई और संकर्षण अब बीमार रहने लगा. अस्थमा जैसे लक्षण थे. मर्ज धीरेधीरे बढ़ता गया.

हम लोग अब तक कोचीन में सैटल हो गए थे, पर कोचीन में ही नहीं बाहर भी अच्छे डाक्टर फेल हो गए. हालत यह हो गई कि संकर्षण कईकई घंटे औक्सीजन पर रखा जाता. मैं और आशीष दोनों ही बड़े परेशान थे.

अंत में ऐक्सपर्ट डाक्टरों की टीम की एक मीटिंग हुई और तय किया गया कि यह अल्फा-1 ऐंटीट्राइप्सिन डिजीज नामक बीमारी से पीडि़त है, जोकि जेनेटिक होती है और इस के  लक्षण अस्थमा से मिलतेजुलते हैं. हालांकि यह बीमारी 30 साल की उम्र के बाद होती है पर शायद संकर्षण को समय से पहले हो गई हो और इस के लिए पिता का डीएनए टैस्ट होना है ताकि यह तय हो सके कि वह उसी बीमारी से पीडि़त है और उस का सही इलाज हो सके. आशीष का डीएनए टैस्ट संकर्षण से मेल नहीं खाया. मेल खाता भी कैसे? आशीष अगर उस के पिता होते तब न.

आशीष तो डीएनए रिपोर्ट आते ही बिना मेरी ओर देखे और बिना संकर्षण की बीमारी की परवाह किए कार स्टार्ट कर घर चले गए. संकर्षण की आंखों में उठते मेरे लिए नफरत के भाव और उस का यह प्रश्न करना कि आखिर मेरे पिता कौन हैं, मुझे अंदर तक झकझोर गया. मैं तो अपराधी की तरह कटघरे में खड़ी ही थी, गगन को संकर्षण की नजरों से गिराने की इच्छा न हुई अत: मैं चुप रही.

संकर्षण बोला, ‘‘आज तक मैं अपने को अवांछनीय समझता रहा जिस के मातापिता उसे बड़ी आसानी से किसी और की गोद में ऐसे डाल देते हैं, जैसे वह कोई निर्जीव वस्तु हो. पर आज पता चला कि मैं अवांछनीय होने के साथसाथ नाजायज औलाद भी हूं, अपनी चरित्रहीन मां और पिता की ऐयाशी की निशानी. आप ने आशीष अंकल को भी इतने दिन तक अंधेरे में रखा, जबकि मैं ने देखा है कि वे आप पर कितना विश्वास करते हैं, आप को कितना चाहते हैं.’’ मैं ने विरोध करना चाहा, ‘‘बेटा ऐसा नहीं है.’’

‘‘मत कहिए मुझे बेटा. इस से अच्छा था मैं बिना यह सत्य जाने मर जाता. कम से कम कुछ भ्रम तो बना रहता. अब हो सके तो कृपा कर के मेरे पिता का नाम बता दीजिए ताकि मैं उन से पूछ सकूं कि अपने क्षणिक सुख के लिए मुझे इतनी बड़ी यातना क्यों दे डाली, जिस से निकलने का भी मुझे कोई रास्ता नहीं दिख रहा है,’’ संकर्षण बोला.

फिर उस ने अपनी सारी दवाएं उठा कर फेंक दीं और जो कुछ उस के खाने के लिए आया था उसे भी हाथ नहीं लगाया. मैं उसे असहाय सी खड़ी देख रही थी. मैं ने डरतेडरते आशीष को फोन मिलाया.

आशीष बोले, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘संकर्षण ने दवाएं फेंक दी हैं और खाना भी नहीं खा रहा है,’’ मैं ने कहा.

आशीष झल्ला कर बोले, ‘‘तो मैं क्या करूं?’’ और फोन काट दिया.

मैं ने संकर्षण को समझाने की कोशिश की ‘‘प्लीज, ऐसा मत करो. ऐसे तो तुम्हारी तबीयत और खराब हो जाएगी. तुम ठीक हो जाओ. मैं तुम्हारे सारे प्रश्नों के उत्तर दूंगी, अभी तुम मेरी बात समझ नहीं पाओगे.’’

‘‘क्या नहीं समझ पाऊंगा? इतना बच्चा नहीं हूं मैं. आप क्या बताएंगी? यही न कि मेरी कोई गलती नहीं थी. मैं  रेप का शिकार हुई थी. कम से कम यही बता दीजिए ताकि आप के प्रति मेरी नफरत कुछ कम हो सके, वरना इस नफरत से मेरे अंदर ज्वालीमुखी धधक रहा है.’’

मैं कैसे कह दूं यह, जबकि मुझे पता है कि मेरे साथ कोई रेप नहीं हुआ था और न ही हम दोनों अपने पार्टनर के प्रति बेवफा थे. यह बिलकुल सत्य है कि उस एक घटना के अलावा हम लोगों के मन में कभी एकदूसरे के प्रति और भाव नहीं आए. हम एकदूसरे का उतना ही आदर करते रहे जितना इस घटना के पहले करते थे, पर इस बात को संकर्षण समझ पाएगा भला? संकर्षण ही क्या आशीष भी इस बात को समझ पाएंगे क्या?

मेरा ऐसा सोचना गलत भी न था. तभी तो 2 दिन बाद आशीष ने मुझ से पूछा, ‘‘संकर्षण के पिता गगन ही हैं न?’’

मैं ने कहा, ‘‘पहले मेरी बात तो सुनिए.’’

‘‘मुझे और कुछ नहीं सुनना है, तुम मुझे केवल यह बताओ के संकर्षण के पिता गगन ही है न?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां.’’

यह सुनते ही आशीष जैसे पागल हो गए. मुझ पर चिल्लाए, ‘‘नीच हो तुम लोग. जिन पर मैं ने जिंदगी भर विश्वास किया, उन्हीं लोगों ने मुझे धोखा दिया. मुझे इस की आदतें, शक्ल गगन से मिलती लगती थी, पर फिर भी मैं कभी संदेह न कर सका तुम दोनों पर…मेरे इस विश्वास का यह सिला दिया… तुम ने क्यों किया ऐसा?’’ और फिर गुस्से से आशीष ने मेरी गरदन पकड़ते हुए आगे कहा, ‘‘जी तो कर रहा है, तुम्हें मार का जेल चला जाऊं ताकि फिर कोई पत्नी पति को धोखा देने से पहले 10 बार सोचे, पर तुम इतनी नीच हो कि तुम्हें मारने का भी मन नहीं कर रहा है. उस से तुम्हारी तुरंत मुक्ति हो जाएगी जबकि मैं यह नहीं चाहता. मेरी इच्छा है तुम तिलतिल कर मरो,’’ और फिर आशीष ने मेरी गरदन छोड़ दी.

उधर संकर्षण अपने पिता का नाम जानने की जिद लगाए बैठा था. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उसे गगन का नाम कैसे बता दूं…मुझे पता था कि वह उन की बहुत इज्जत करता है. उन के साथ बिताए सारे सुखद क्षणों की स्मृतियां संजोए हुए है. अगर वे भी उस से छिन गईं तो कैसे जीएगा, कुछ समझ में नहीं आ रहा था. इधर कुआं तो उधर खाई. न बताने पर तो वह केवल अवसादग्रस्त है, बताने पर कहीं अपनी जान ही न दे दे. दवा न खाने और अवसादग्रस्त होने से संकर्षण की हालत 2 दिनों में और ज्यादा बिगड़ गई. उसे मानोवैज्ञानिक चिकित्सा की आवश्यकता पड़ गई. इधर गगन का कुछ भी पता न था. वे क्या कर रहे हैं, कहां हैं, किसी को कोई जानकारी न थी.

एक दिन मैं ने डरतेडरते आशीष से कहा, ‘‘गगन का पता लगाइए वरना संकर्षण का इलाज नहीं हो पाएगा.’’

‘‘मैं कैसे पता लगाऊं? तुम अनपढ़ हो क्या?’’ और फिर पैर पटकते हुए चले गए.

कुछ समझ में नहीं आ रहा था. पलपल अपनी आंखों के सामने अपने बच्चे को मरता देख रही थी. जिंदगी में अनजाने में हुई एक गलती का इतना बड़ा दुष्परिणाम होगा, सोचा न था. फिर मैं ने सारे संबंधियों, दोस्तों को ई-मेल किया, ‘‘संकर्षण बहुत बीमार है. उस की बीमारी डीएनए टैस्ट से पता चलेगी. अत: गगन जहां कहीं भी हों तुरंत संपर्क करें.’’ अंजन और अमिता भी संकर्षण को देखने आ गए थे. वीकैंड था वरना रोज फोन से ही हालचाल पूछ लेते थे. आज की जिंदगी में इनसान इतना व्यस्त रहता है कि अपनों के लिए ही समय नहीं निकाल पाता है. आते ही थोड़ा फ्रैश होने के बाद अमिता और अंजन दोनों ने एकाएक पूछा, ‘‘क्या बात है मम्मीपापा, आप दोनों बहुत परेशान नजर आ रहे हैं?’’

आशीष यह प्रश्न सुन कर वहां से उठ कर चले गए.

‘‘मम्मी इन्हें क्या हुआ?’’ अंजन ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं बेटा, संकर्षण की ही बीमारी को ले कर हम परेशान हैं.’’

‘‘यह बीमारी का तनाव आप लोगों के चेहरे पर नहीं है. कुछ और बात है…हम लोग इतने बच्चे भी नहीं हैं कि कुछ समझ न सकें. सच बात बताइए शायद हम लोग कोई हल निकाल सकें.’’

मुझे बच्चों की बातों से कुछ आशा की किरण नजर आई, लेकिन फिर मन में संदेह हो गया कि जब आशीष कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं, तो बच्चे क्या खाक मेरी बात समझेंगे? फिर बताना तो पड़ेगा ही, सोच मैं ने बच्चों को सारी बात बता दी. आज की पीढ़ी शायद हम लोगों से ज्यादा समझदार है. सारी स्थिति का विश्लेषण करती है और फिर कोई निर्णय लेती है.

वे दोनों कुछ देर के लिए एकदम गंभीर हो गए, फिर अमिता बोली, ‘‘तभी हम लोग समझ नहीं पाते थे कि संकर्षण हम लोगों से इतना भिन्न क्यों है? हम लोग इस का कारण उस की परवरिश मानते थे पर सच तो कुछ और ही था.’’ फिर अंजन बोला, ‘‘पर कोई बात नहीं. सारी परिस्थितियों को देखते हुए अंकल और आप को इतना दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता है. हां, गलती आप की सिर्फ इतनी है कि आप ने यह बात इतने दिनों तक पापा से छिपा कर उन का विश्वास तोड़ा है, जो वे आप और अंकल पर करते थे. आप को यह बात उसी समय पापा को बता देनी चाहिए थी.’’

अमिता बोली, ‘‘भैया, तुम भी कैसी बात करते हो. क्या पापा आज जिस बात को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं उसे उस समय सहजता से सुन लेते?’’

अंजन बोला, ‘‘सुन लेते, इस समय उन्हें ज्यादा धक्का इस बात का लगा है कि मम्मी ने यह सच उन से इतने दिनों तक छिपाया.’’

‘‘तुम गलत कह रहे हो. अगर मम्मी न छिपातीं तो यकीनन दोनों परिवारों का विघटन हो जाता. पापा और आंटी दोनों ही इस बात को सहजता से न ले पाते.’’

अंजन बोला, ‘‘शायद तुम ठीक कह रही हो, मम्मी ने ठीक ही किया. चलो, हम लोग पापा को समझाते हैं और संकर्षण को भी.’’

‘‘मम्मी, आप संकर्षण के पास हौस्पिटल जाओ हम लोग थोड़ी देर में आते हैं.’’ मेरे हौस्पिटल जाने के बाद अंजन आशीष के पास जा कर बोला, ‘‘मम्मी ने हम लोगों को सारी बात बता दी है. अब आप यह बताइए कि आप को मम्मी की किस बात पर अधिक गुस्सा है, मम्मी और अंकल के बीच जो कुछ हुआ उस पर अथवा उन्होंने यह बात आप से छिपाई उस पर?’’

‘‘दोनों पर.’’

‘‘अधिक किस बात पर गुस्सा है?’’

‘‘बात छिपाने पर.’’

‘‘अगर वे उस समय सच बता देतीं तो क्या आप मम्मी और अंकल को माफ कर देते?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो कितनी जिंदगियां बरबाद हो जातीं, यह आप ने कभी सोचा है? यह सत्य आज पता चला है. तब भी संकर्षण, आप और मम्मी मानसिक यंत्रणा से गुजर रहे हैं जबकि आप को मम्मी और अंकल पर कभी शक तक नहीं हुआ. इतना तो तय है कि वह क्षणिक गलती मात्र थी. उस गलती की आप मम्मी को और स्वयं को इतनी बड़ी सजा कैसे दे सकते हैं?’’

आशीष बोले, ‘‘पता नहीं. दिमाग तो तुम्हारी बात मान रहा है, पर दिल नहीं.’’

‘‘दिल को समझाएं. पापा, देखिए मम्मी कितनी परेशान हैं.’’

मैं हौस्पिटल में अमिता और अंजन का बेसब्री से इंतजार कर रही थी. ऐसा लग रहा था मेरी परीक्षा का परिणाम निकलने वाला है. तभी अमिता और अंजन मुझे आते दिखाई दिए. पास आए तो मैं ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘धैर्य रखें समय लगेगा,’’ अंजन ने कहा और फिर संकर्षण से बोला, ‘‘क्या हालचाल है?’’

संकर्षण ने बिना उन लोगों की ओर देखे कहा, ‘‘ठीक हूं.’’

अमिता और अंजन ने मुझे घर जाने को कहा. बोले, ‘‘आप घर जा कर आराम करिए हम लोग संकर्षण के पास हैं.’’अमिता और अंजन के समझाने और मनोचिकित्सक के इलाज से संकर्षण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वह दवा लेने लगा. साथ ही यह भी पता चला कि उस की बीमारी जेनेटिक न हो कर उस दवा की ऐलर्जी है, जो दवा वह खा रहा था. हालांकि उस द वा से ऐलर्जी के चांसेज .001% होते हैं, पर संकर्षण को थी. कारण पता चल जाने पर उस का इलाज सही होने लगा और वह स्वस्थ होने लगा. आशीष भी ऊपर से सामान्य दिखने लगे.

संकर्षण को हौस्पिटल से छुट्टी मिल गई. उसे घर ले जाने का समय आ गया. हम सभी बहुत बड़े चक्रवात से निकल आए थे. घर जाने से पूर्व आशीष हौस्पिटल का बिल भरने गए थे और मैं मैडिकल स्टोर से संकर्षण की दवा खरीदने. तभी गेट पर मुझे संन्यासी की वेशभूषा में एक आदमी मिला जो मुझे देख कर बोला, ‘‘संकर्षण कैसा है?’’ मैं ने चौंक कर उस की ओर देखा तो पता चला कि वह संन्यासी कोई और नहीं गगन ही हैं.

‘‘ठीक है, आप इतने दिनों तक कहां थे?’’

वे बोले, ‘‘यह सब न पूछिए. आप का ई-मेल पूरे ग्रुप में घूम रहा है. पता चला तो चला आया. आशीष सब कुछ जान गए होंगे? क्या प्रतिक्रिया रही उन की? मैं तो उन से नजरें मिलाने के काबिल भी न रहा. संकर्षण की जिंदगी का सवाल नहीं होता तो मैं यहां कभी न आता. चलिए डाक्टर से कह कर डीएनए टैस्ट करवा लूं.’’

‘‘नहीं, अब उस की कोई जरूरत नहीं है. उस की बीमारी जेनेटिक नहीं थी.’’

‘‘क्या संकर्षण भी जान गया है कि मैं उस का पिता हूं?’’

‘‘हां.’’

‘‘संकर्षण को कब तक हौस्पिटल से छुट्टी मिलेगी? कितना समय लगेगा उस के ठीक होने में?’’

‘‘अब संकर्षण बिलकुल ठीक है. बस थोड़ी कमजोरी है. आज हम लोग उसे घर ले जा रहे हैं.’’

‘‘ठीक है फिर मैं चलता हूं,’’ कह कर गगन जाने को तैयार हो गए.

मैं ने कहा, ‘‘संकर्षण से मिलेंगे नहीं?’’

‘‘नहीं, जो उथलपुथल इस सत्य को जान कर आप सभी की जिंदगी में मची होगी और किसी प्रकार सब कुछ शांत हुआ होगा, वह सब मुझे देख कर पुन: होने की संभावना है. वैसे भी मैं मोहमाया का परित्याग कर चुका हूं और एक एनजीओ में गांव के बच्चों के लिए काम कर रहा हूं. संकर्षण को मेरा प्यार कहिएगा और आशीष से कहिएगा कि हो सके तो मुझे क्षमा कर दें,’’ इतना कह कर वे वहां से चले गए. मैं उन्हें जाते हुए तब तक देखती रही जब तक नजरों से ओझल नहीं हो गए.

Mother’s Day Special: मां और मोबाइल- वैदेही जी ने मोबाइल से क्या किया?

‘‘मेरा मोबाइल कहां है? कितनी बार कहा है कि मेरी चीजें इधरउधर मत किया करो पर तुम सुनती कहां हो,’’ आफिस जाने की हड़बड़ी में मानस अपनी पत्नी रोमा पर बरस पड़े थे.

‘‘आप की और आप के बेटे राहुल के कार्यालय और स्कूल जाने की तैयारी में सुबह से मैं चकरघिन्नी की तरह नाच रही हूं, मेरे पास कहां समय है किसी को फोन करने का जो मैं आप का मोबाइल लूंगी,’’ रोमा खीझपूर्ण स्वर में बोली थी.

‘‘तो कहां गया मोबाइल? पता नहीं यह घर है या भूलभुलैया. कभी कोई सामान यथास्थान नहीं मिलता.’’

‘‘क्यों शोर मचा रहे हो, पापा? मोबाइल तो दादी मां के पास है. मैं ने उन्हें मोबाइल के साथ छत पर जाते देखा था,’’ राहुल ने मानो बड़े राज की बात बताई थी.

‘‘तो जा, ले कर आ…नहीं तो हम दोनों को दफ्तर व स्कूल पहुंचने में देर हो जाएगी…’’

पर मानस का वाक्य पूरा हो पाता उस से पहले ही राहुल की दादी यानी वैदेहीजी सीढि़यों से नीचे आती हुई नजर आई थीं.

‘‘अरे, तनु, मेरे ऐसे भाग्य कहां. हर घर में तो श्रवण कुमार जन्म लेता नहीं,’’ वे अपने ही वार्त्तालाप में डूबी हुई थीं.

‘‘मां, मुझे देर हो रही है,’’ मानस अधीर स्वर में बोले थे.

‘‘पता है, इसीलिए नीचे आ रही हूं. तान्या से बात करनी है तो कर ले.’’

‘‘मैं बाद में बात कर लूंगा. अभी तो मुझे मेरा मोबाइल दे दो.’’

‘‘मुझे तो जब भी किसी को फोन करना होता है तो तुम जल्दी में रहते हो. कितनी बार कहा है कि मुझे भी एक मोबाइल ला दो, पर मेरी सुनता ही कौन है. एक वह श्रवण कुमार था जिस ने मातापिता को कंधे पर बिठा कर सारे तीर्थों की सैर कराई थी और एक मेरा बेटा है,’’ वैदेहीजी देर तक रोंआसे स्वर में प्रलाप करती रही थीं पर मानस मोबाइल ले कर कब का जा चुका था.

‘‘मोबाइल को ले कर क्यों दुखी होती हैं मांजी. लैंडलाइन फोन तो घर में है न. मेरा मोबाइल भी है घर में. मैं भी तो उसी पर बातें करती हूं,’’ रोमा ने मांजी को समझाना चाहा था.

‘‘तुम कुछ भी करो बहू, पर मैं इस तरह मन मार कर नहीं रह सकती. मैं किसी पर आश्रित नहीं हूं. पैंशन मिलती है मुझे,’’ वैदेही ने अपना क्रोध रोमा पर उतारा था पर कुछ ही देर में सब भूल कर घर को सजासंवार कर रोमा को स्नानगृह में गया देख कर उन्होंने पुन: अपनी बेटी तान्या का नंबर मिलाया था.

‘‘हैलो…तान्या, मैं ने तुम से जैसा करने को कहा था तुम ने किया या नहीं?’’ वे छूटते ही बोली थीं.

‘‘वैदेही बहन, मैं आप की बेटी तान्या नहीं उस की सास अलका बोल रही हूं.’’

‘‘ओह, अच्छा,’’ वे एकाएक हड़बड़ा गई थीं.

‘‘तान्या कहां है?’’ किसी प्रकार उन के मुख से निकला था.

‘‘नहा रही है. कोई संदेश हो तो दे दीजिए. मैं उसे बता दूंगी.’’

‘‘कोई खास बात नहीं है, मैं कुछ देर बाद दोबारा फोन कर लूंगी,’’ वैदेही ने हड़बड़ा कर फोन रख दिया था. पर दूसरी ओर से आती खनकदार हंसी ने उन्हें सहमा दिया था.

‘कहीं छोकरी ने बता तो नहीं दिया सबकुछ? तान्या दुनियादारी में बिलकुल कच्ची है. ऊपर से यह फोन. स्थिर फोन में यही तो बुराई है. घरपरिवार को तो क्या सारे महल्ले को पता चल जाता है कि कहां कैसी खिचड़ी पक रही है. मोबाइल फोन की बात ही कुछ और है…किसी भी कोने में बैठ कर बातें कर लो.’ उन की विचारधारा अविरल जलधारा की भांति बह रही थी कि अचानक फोन की घंटी बज उठी थी.

‘‘हैलो मां, मैं तान्या. मां ने बताया कि जब मैं स्नानघर में थी तो आप का फोन आया था. कोई खास बात थी क्या?’’

‘‘खास बात तो कितने दिनों से कर रही हूं पर तुम्हें समझ में आए तब न. अरे, जरा अक्ल से काम लो और निकाल बाहर करो बुढि़या को. जब देखो तब तुम्हारे यहां पड़ी रहती है. कब तक उस की गुलामी करती रहोगी?’’

‘‘धीरे बोलो मां, कहीं मांजी ने सुन लिया तो बुरा मानेंगी.’’

‘‘फोन पर हम दोनों के बीच हुई बात को कैसे सुनेगी वह?’’

‘‘छोड़ो यह सब, शनिवाररविवार को आप से मिलने आऊंगी तब विस्तार से बात करेंगे. जो जैसा चल रहा है चलने दो. क्यों अपना खून जलाती हो.’’

‘‘मैं तो तेरे भले के लिए ही कहती हूं पर तुम लोगों को बुरा लगता है तो आगे से नहीं कहूंगी,’’ वैदेही रोंआसे स्वर में बोली थीं.

‘‘मां, क्यों मन छोटा करती हो. हम सब आप का बड़ा सम्मान करते हैं. यथाशक्ति आप की सलाह मानने का प्रयत्न करते हैं पर यदि आप की सलाह हमारा अहित करे तो परेशानी हो जाती है.’’

‘‘लो और सुनो, अब तुम्हें मेरी बातों से परेशानी भी होने लगी. ठीक है, आज से कुछ नहीं कहूंगी,’’ वैदेही ने क्रोध में फोन पटक दिया था और मुंह फुला कर बैठ गई थीं.

‘‘क्या हुआ, मांजी, सब ठीक तो है?’’ उन्हें दुखी देख कर रोमा ने प्रश्न किया.

‘‘क्यों? तुम्हें कैसे लगा कि सब ठीक नहीं है?’’ वैदेही ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ही पूछ लिया.

‘‘आप का मूड देख कर.’’

‘‘मैं सब समझती हूं. छिप कर मेरी बातें सुनते हो तुम लोग. इसीलिए तो मोबाइल लेना चाहती हूं मैं.’’

‘‘मैं ने आज तक कभी किसी का फोन वार्त्तालाप नहीं सुना. आप को दुखी देख कर पूछ लिया था. आगे से ध्यान रखूंगी,’’ रोमा तीखे स्वर में बोली और अपने काम में व्यस्त हो गई.

वैदेही बेचैनी से तान्या के आने की प्रतीक्षा करती रही कि कब तान्या आए और कब वे उस से बात कर के अपना मन हलका करें पर जब सांझ ढलने लगी और तान्या नहीं आई तो उन का धीरज जवाब देने लगा. मानस सुबह से अपने मोबाइल से इस तरह चिपका था कि उन्हें तान्या से बात करने का अवसर ही नहीं मिल रहा था.

‘‘मुझे अपनी सहेली नीता के यहां जाना है, मांजी. मैं सुबह से तान्या दीदी की प्रतीक्षा में बैठी हूं पर लगता है कि आज वे नहीं आएंगी. आप कहें तो मैं थोड़ी देर के लिए नीता के घर हो आऊं. उस का बेटा बीमार है,’’ रोमा ने आ कर वैदेही से अनुनय की तो वे मना न कर सकीं.

रोमा को घर से निकले 10 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि तान्या ने कौलबेल बजाई.

‘‘लो, अब समय मिला है तुम्हें मां से मिलने आने का? सुबह से दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठी हूं. आंखें भी पथरा गईं.’’

‘‘इस में टकटकी लगा कर बैठने की क्या बात थी, मां?’’ मानस बोल पड़ा, ‘‘आप मुझ से कहतीं मैं तान्या दीदी से फोन कर के पूछ लेता कि वे कब तक आएंगी.’’

‘‘लो और सुनो, सुबह से पता नहीं किसकिस से बात कर रहा है तेरा भाई. सारे काम फोन कान से चिपकाए हुए कर रहा है. बस, सामने बैठी मां से बात करने का समय नहीं है इस के पास.’’

‘‘क्या कह रही हो मां. मैं तो सदासर्वदा आप की सेवा में मौजूद रहता हूं. फिर राहुल है, रोमा है जितनी इच्छा हो उतनी बात करो,’’ मानस हंसा.

‘‘2 बेटों, 2 बेटियों का भरापूरा परिवार है मेरा पर मेरी सुध लेने वाला कोई नहीं है. यहां आए 2 सप्ताह हो गए मुझे, तान्या को आज आने का समय मिला है.’’

‘‘मेरा बस चले तो दिनरात आप के पास बैठी रहूं. पर आजकल बैंक में काम बहुत बढ़ गया है. मार्च का महीना है न. ऊपर से घर मेहमानों से भरा पड़ा है. 3-4 नौकरों के होने पर भी अपने किए बिना कुछ नहीं होता,’’ तान्या ने सफाई दी थी.

‘‘इसीलिए कहती हूं अपने सासससुर से पीछा छुड़ाओ. सारे संबंधी उन से ही मिलने तो आते हैं.’’

‘‘क्या कह रही हो मां, कहीं मांजी ने सुन लिया तो गजब हो जाएगा. बहुत बुरा मानेंगी.’’

‘‘पता नहीं तुम्हें कैसे शीशे में उतार लिया है उन्होंने. और 2 बेटे भी तो हैं, वहां क्यों नहीं जा कर रहतीं?’’

‘‘जौय और जोषिता को मांजी ने बचपन से पाल कर बड़ा किया है. अब तो स्थिति यह है कि बच्चे उन के बिना रह ही नहीं पाते. दोचार दिन के लिए भी कहीं जाती हैं तो बच्चे बीमार पड़ जाते हैं.’’

‘‘तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को कठपुतली बना कर रखा है उन्होंने. जैसा चाहते हैं वैसा नचाते हैं दोनों. सारा वेतन रखवा लेते हैं. दुनिया भर का काम करवाते हैं. यह दिन देखने के लिए ही इतना पढ़ायालिखाया था तुम्हें?’’

‘‘किसी ने जबरदस्ती मेरा वेतन कभी नहीं छीना है मां. उन के हाथ में वेतन रखने से वे लोग भी प्रसन्न हो जाते हैं और मेरे सासससुर भी वह पैसा अपनी जेब में नहीं रख लेते बल्कि उन्हें हमारे पर ही खर्च कर देते हैं. जो बचता है उसे निवेश कर देते हैं. ’’

‘‘पर अपना पैसा उन के हाथ में दे कर उन की दया पर जीवित रहना कहां की समझदारी है?’’

‘‘मां, आप क्यों तान्या दीदी के घर के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करती हैं,’’ इतनी देर से चुप बैठा मानस बोला था.

‘‘अरे, वाह, अपनी बेटी के हितों की रक्षा मैं नहीं करूंगी तो कौन करेगा. पर मेरी बेटी तो समझ कर भी अनजान बनी हुई है.’’

‘‘मां, मैं आप के सुझावों का बहुत आदर करती हूं पर साथ ही घर की सुखशांति का विचार भी करना पड़ता है.’’

‘‘वही तो मैं कह रहा हूं. अपनी समस्याएं क्या कम हैं, जो आप तान्या दीदी की समस्याएं सुलझाने लगीं? और मां, आप ने तो दीदी के आते ही अपने सुझावों की बमबारी शुरू कर दी. न चाय, न पानी…कुछ तो सोचा होता,’’ मानस ने मां को याद दिलाया.

‘‘रोमा अभी तक लौटी नहीं जबकि उसे पता था कि तान्या आने वाली है. फोन करो कि जल्दी से घर आ जाए.’’

‘‘फोन करने की जरूरत नहीं है. वह स्वयं ही आ जाएगी. उस की मां आई हुई हैं, उन से मिलने गई है.’’

‘‘मां आई हुई हैं? मुझ से तो कह कर गई है कि नीता का बेटा बीमार है. उसे देखने जा रही है.’’

‘‘उसे भी देखने गई है. कई दिनों से सोच रही थी पर जा नहीं पा रही थी. नीता के घर के पास रोमा के दूर के रिश्ते के मामाजी रहते हैं. वे बीमार हैं और रोमा की मम्मी उन्हें देखने आई हुई हैं.’’

‘‘ठीक है, सब समझ में आ गया. मां से मिलने जा रही हूं यह भी तो कह कर जा सकती थी, झूठ बोल कर जाने की क्या आवश्यकता थी. रोमा अपना फोन तो ले कर गई है?’’

‘‘हां, ले गई है.’’

‘‘ला, अपना फोन दे तो मैं उस से बात करूंगी.’’

‘‘क्या बात करेंगी आप? वह अपनेआप आ जाएगी,’’ मानस ने तर्क दिया.

‘‘फोन कर दूंगी तो जल्दी आ जाएगी. तान्या आई है तो खाना खा कर ही जाएगी न…’’

‘‘आप चिंता न करें मां, मैं खाना नहीं खाऊंगी. आप को जो खाना है मैं बना देती हूं,’’ तान्या ने उन्हें बीच में ही टोक दिया.

‘‘फोन तो दे मानस, रोमा से बात करनी है,’’ वैदेही जिद पर अड़ी थीं.

‘‘एक शर्त पर मोबाइल दूंगा कि आप रोमा से कुछ नहीं कहेंगी. बेचारी कभीकभार घर से बाहर निकलती है. दिनभर घर के काम में जुटी रहती है.’’

‘‘ठीक है, रोमा को कुछ नहीं कहूंगी, उस की मां से बात करूंगी. कहूंगी आ कर मिल जाएं. बहुत लंबे समय से मिले नहीं हम दोनों.’’

मां को फोन थमा कर मानस और तान्या रसोईघर में जा घुसे थे.

‘‘हैलो रोमा, तुम नीता के बीमार बेटे से मिलने की बात कह कर गई थीं. सौदामिनी बहन के आने की बात तो साफ गोल कर गईं तुम,’’ वैदेही बोलीं.

‘‘नहीं मांजी, ऐसा कुछ नहीं था. मुझे लगा, आप नाराज होंगी,’’ रोमा सकपका गई.

‘‘लो भला, मांबेटी के मिलने से भला मैं क्यों नाराज होने लगी? सौदामिनी बहन को फोन दो जरा. उन से बात किए हुए तो महीनों बीत गए,’’ वैदेहीजी का अप्रत्याशित रूप से मीठा स्वर सुन कर रोमा का धैर्य जवाब देने लगा था. उस ने तुरंत फोन अपनी मां सौदामिनी को थमा दिया था.

‘‘नमस्ते, सौदामिनी बहन. आप तो हमें भूल ही गईं,’’ उन्होंने उलाहना दिया.

‘‘आप को भला कैसे भूल सकती हूं दीदी, पर दुनिया भर के पचड़ों से समय ही नहीं मिलता.’’

‘‘तो यहां तक आ कर क्या हम से मिले बिना चली जाओगी? मेरा तो सब से मिलने को मन तरसता रहता है. इसीलिए बच्चों से कहती हूं एक मोबाइल ला दो, कम से कम सब से बात कर के मन हलका कर लूंगी.’’

रसोईघर में भोजन का प्रबंध करते मानस और तान्या हंस पड़े थे, ‘‘मां फिर मोबाइल पुराण ले कर बैठ गईं, लगता है उन्हें मोबाइल ला कर देना ही पड़ेगा.’’

‘‘मैं ने भी कई बार सोचा पर डरती हूं अपना मोबाइल मिलते ही वे हम भाईबहनों का तो क्या, अपने खानेपीने का होश भी खो बैठेंगी.’’

‘‘मुझे दूसरा ही डर है. फोन पर ऊलजलूल बात कर के कहीं कोई नया बखेड़ा न खड़ा कर दें.’’

‘‘जो भी करें, उन की मर्जी है. पर लगता है कि अपने अकेलेपन से जूझने का इन्होंने नया ढंग ढूंढ़ निकाला है.’’

‘‘चलो, तान्या दीदी, आज ही मां के लिए मोबाइल खरीद लाते हैं. इन का इस तरह फोन के लिए बारबार आग्रह करना अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘चाय तैयार है. चाय पी कर चलते हैं, भोजन लौट कर करेंगे,’’ तान्या ने स्वीकृति दी थी.

‘‘मैं रोमा और जीजाजी दोनों को फोन कर के सूचित कर देता हूं कि हम कुछ समय के लिए बाहर जा रहे हैं.’’

‘‘कहां जा रहे हो तुम दोनों?’’ वैदेही ने अपना दूरभाष वार्त्तालाप समाप्त करते हुए पूछा.

‘‘हम दोनों नहीं, हम तीनों. चाय पियो और तैयार हो जाओ, आवश्यक कार्य है,’’ मानस ने उन का कौतूहल शांत करने का प्रयत्न किया.

वे उन्हें मोबाइल की दुकान पर ले गए तो उन की प्रसन्नता की सीमा न रही. मानो कोई मुंह में लड्डू ठूंस दे और उस का स्वाद पूछे.

वैदेहीजी के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे लंबे समय से अपने मनपसंद खिलौने के लिए मचलते बच्चे को उस का मनपसंद खिलौना मिल गया हो.

उन्होंने अपनी पसंद का अच्छा सा मोबाइल खरीदा जिस से अच्छे छायाचित्र खींचे जा सकते थे. घर के पते आदि का सुबूत देने के बाद उन के फोन का नंबर मिला तो उन का चेहरा खिल उठा.

‘‘आप को अपना फोन प्रयोग में लाने के लिए 24 घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी,’’ सेल्समैन ने बताया तो वे बिफर उठीं.

‘‘यह कौन सी दुकान पर ले आए हो तुम लोग मुझे? इन्हें तो फोन चालू करने में ही 24 घंटे लगते हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं है, मां जहां आप ने इतने दिनों तक प्रतीक्षा की है एक दिन और सही,’’ तान्या ने समझाना चाहा.

‘‘तुम नहीं समझोगी. मेरे लिए तो एक क्षण भी एक युग की भांति हो गया है,’’ उन्होंने उत्तर दिया.

घर पहुंचते ही फोन को डब्बे से निकाल कर उस के ऊपर मोमबत्ती जलाई गई. फिर बुला कर सब में मिठाई बांटी, मानो मोबाइल का जन्म उन्हीं के हाथों हुआ था और उस के चालू होने की प्रतीक्षा की जाने लगी.

यह कार्यक्रम चल ही रहा था कि रोमा, सौदामिनी और अपने मामा आलोक बाबू के साथ आ पहुंची.

वैदेही का नया फोन आना ही सब से बड़ा समाचार था. उन्होंने डब्बे से निकाल कर सब को अपना नया मोबाइल फोन दिखाया.

‘‘कितना सुंदर फोन है,’’ राहुल तो देखते ही पुलक उठा.

‘‘दादी मां, मुझे भी दिया करोगी न अपना मोबाइल?’’

‘‘कभीकभी, वह भी मेरी अनुमति ले कर. छोटे बच्चों पर नजर रखनी पड़ती है न सौदामिनी बहन.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ सौदामिनी ने सिर हिला दिया था.

‘‘सच कहूं, तो आज कलेजा ठंडा हो गया. यों तो राहुल को छोड़ कर सब के पास अपनेअपने मोबाइल हैं. पर अपनी चीज अपनी ही होती है. आयु हो गई है तो क्या हुआ, मैं ने तो साफ कह दिया कि मुझे तो अपना मोबाइल फोन चाहिए ही. मैं क्या किसी पर आश्रित हूं? मुझे पैंशन मिलती है,’’ वे देर तक सौदामिनी से फोन के बारे में बातें करती रही थीं.

कुछ देर बाद सौदामिनी और आलोक बाबू ने जाने की अनुमति मांगी थी.

‘‘आप ने फोन किया तो लगा कि यहां तक आ कर आप से मिले बिना जाना ठीक नहीं होगा,’’ सौदामिनी बोलीं.

‘‘यही तो लाभ है मोबाइल फोन का. अपनों को अपनों से जोड़े रखता है,’’ वैदेही ने उत्तर दिया.

‘‘चिंता मत करना. अब मेरे पास अपना फोन है. मैं हालचाल लेती रहूंगी.’’

‘‘मैं भी आप को फोन करती रहूंगी. आप का नंबर ले लिया है मैं ने,’’ सौदामिनी ने आश्वासन दिया था.

हाथ में अपना मोबाइल फोन आते ही वैदेही का तो मानो कायाकल्प ही हो गया. उन का मोबाइल अब केवल वार्त्तालाप का साधन नहीं है. उन के परिचितों, संबंधियों और दोस्तों के जवान बेटेबेटियों का सारा विवरण उन के मोबाइल में कैद है. वे चलताफिरता मैरिज ब्यूरो बन गई हैं. पहचान का दायरा इतना विस्तृत हो गया है कि किसी का भी कच्चा चिट्ठा निकलवाना हो तो लोग उन की ही शरण में आते हैं.

‘‘इस बुढ़ापे में भी अपने पांवों पर खड़ी हूं मैं. साथ में पैंशन भी मिलती है,’’ वे शान से कहती हैं. और एक राज की बात. उन के पास अब एक नहीं 5 मोबाइल फोन हैं जो पहले दूरभाष पर उन के लंबे वार्त्तालाप का उपहास करते थे अब उसी गुण के कारण उन का सम्मान करने लगे हैं.

Mother’s Day Special: आधुनिक मांएं- चुनौतियों से डरना क्यों

हमारे देश में 50 फीसदी कामकाजी मांओं को महज 30 साल की उम्र में अपने बच्चों की देखभाल करने के लिए नौकरी छोड़नी पड़ती है. अशोका यूनिवर्सिटी के ‘जैनपैक्ट सैंटर फौर वूमंस लीडरशिप’ ने ‘प्रिडिकेमैंट औफ रिटर्निंग मदर्स’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की जो कामकाजी मांओं की चुनौतियों पर कराई गई एक स्टडी के आधार पर तैयार की गई है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मां बनने के बाद महज 27 फीसदी महिलाएं ही अपने कैरियर को आगे बढ़ा पाती हैं और वर्कफोर्स का हिस्सा बनी रहती हैं. यानी मां बनते ही 73 फीसदी महिलाएं जौब करना छोड़ देती हैं.

प्रोफैशनल सोशल साइट लिंक्डइन ने हाल ही में एक रिपोर्ट पब्लिश की है जिस के अनुसार भारत में 10 से 7 महिलाएं नौकरी छोड़ने पर विचार कर रही हैं. लिंक्डइन द्वारा सा?ा की गई रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के नौकरी छोड़ने की सब से बड़ी वजह वर्कप्लेस पर पक्षपात, तनख्वाह में कटौती और काम में फ्लैक्सिबिलिटी की कमी है.

इस रिपोर्ट के लिए करीब 2,266 महिलाओं से बातचीत की गई. इस में महिलाओं के कामकाज और उन से जुड़ी चुनौतियों पर फोकस किया गया. इस रिसर्च से पता चला है कि कोरोना महामारी ने महिलाओं के काम पर बहुत बुरा असर डाला है. इस महामारी के बाद अब देश में करीब 10 से 7 महिलाएं यानी करीब 83त्न महिलाएं औफिस में ज्यादा फ्लैक्सिबल तरीके से काम करना पसंद करने लगी हैं.

क्यों नहीं कर पाती महिलाएं नौकरी

फ्लैक्सिबिलिटी की कमी के कारण महिलाएं नौकरी छोड़ रही हैं. सर्वे के अनुसार करीब 70त्न महिलाएं पहले ही नौकरी छोड़ चुकी हैं या छोड़ने पर विचार कर रही हैं. इस के साथ ही वे उस तरह की नौकरी के औफर्स भी रिजैक्ट कर रही हैं जहां उन्हें काम करने के फ्लैक्सिबल आवर्स नहीं मिलते.

सर्वे में 5 में से 3 महिलाओं ने यह माना है कि वर्कप्लेस पर फ्लैक्सिबिलिटी से पर्सनल लाइफ और काम के बीच बैलेंस बनाने में आसानी होती है. इस से महिलाओं को कैरियर में आगे बढ़ने में मदद मिलती है. इस के साथ ही यह उन की अच्छी मैंटल हैल्थ के लिए भी जरूरी है. इन सभी चीजों से वे आगे भी नौकरी आसानी से कर पाती हैं. अगर यह सुविधा नहीं मिलती है तो परिवार की जिम्मेदारियों की वजह से उन के लिए जौब कंटिन्यू कर पाना कठिन हो जाता है.

चुनौतियों से भरी होती है जिंदगी

एक स्त्री को अपने जीवन में जन्म से ले कर बुढ़ापे तक कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है खासकर कामकाजी मांओं के लिए ये चुनौतियां ज्यादा ही कठिन होती हैं. उन्हें घर में बच्चों और बड़ेबुजुर्गों की देखभाल के साथ पति और घर के दूसरे लोगों से भी रिश्तों में तालमेल बैठाना होता है और फिर बाहर जा कर औफिस भी संभालना होता है.

वर्कप्लेस पर चुनौतियां

21वीं सदी में महिलाएं हर कार्यक्षेत्र में अपना लोहा मनवा चुकी हैं. फिर चाहे वह फाइनैंस सेक्टर हो, एअरफोर्स हो या कोई अन्य क्षेत्र पुरुषों के साथ वे कंधे से कंधा मिला कर काम कर रही हैं और सफलताएं भी हासिल कर रही हैं. लेकिन इस का मतलब यह कतई नहीं है कि महिलाएं अपने कार्यक्षेत्र में पूरी तरह से बाधाओं से परे हैं और उन्हें पुरुषों के समान ही बराबर का अवसर भी हासिल हो रहा है.

कामों के बीच तालमेल बैठाना

एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है कि महिला चाहे तो घर बसा भी दे और चाहे तो घर उजाड़ भी दे. इस कहावत से भले ही फौरी तौर पर महिलाओं की ताकत का बखान नजर आता है पर हकीकत में यह महिलाओं की काबिलीयत और अहमियत को सिर्फ परिवार बसाने तक में सीमित करती है. यानी यहां भी हमें यही सम?ाया जा रहा है कि किसी भी महिला की सफलता तब सिद्ध होगी जब वह अपने परिवार को अच्छी तरह संभाले.

परवरिश पर सवाल:

एक महिला सब से पहले एक मां होती है और अपने बच्चों को वह हमेशा खुद से आगे रखती है. इस के लिए वह हर तरह की चुनौतियों का सामना भी करती है. मगर इस के बावजूद उस की परवरिश पर सवाल उठाए जाते हैं. अगर वह कहीं चूक जाए तो उसे हर तरह से गलत साबित कर दिया जाता है. हमेशा से परवरिश से जुड़े सारे सवाल महिलाओं से ही पूछे जाते हैं. समय भले ही बदला हो लेकिन अभी भी हम पितृसत्ता वाले समाज में रहते हैं जहां हमेशा महिलाओं को पुरुषों से कमतर आंका जाता है और उन के ऊपर दोहरी जिम्मेदारी लादी जाती है.

मगर सवाल यह है कि क्या परिवार सिर्फ महिला से ही बनता है? क्या बच्चे सिर्फ महिला की ही जिम्मेदारी होते हैं? क्या घर के कामों में पुरुषों की कोई भागीदारी नहीं होनी चाहिए?

इन सवालों पर हमारा समाज कहता है कि बच्चे ज्यादा वक्त मां के साथ गुजारते हैं. मां ही उन्हें अच्छाबुरा सिखाती है. मगर आज के समय में यह सिचुएशन भी बदल चुकी है. बच्चों का आधे से ज्यादा वक्त स्कूल और ट्यूशन में चला जाता है तो वहीं मांएं भी आजकल नौकरीशुदा हैं. ऐसे में उन का पूरा दिन वैसे ही औफिस में गुजर जाता है. ऐसे में यह कहना सही नहीं है कि बच्चे सब से ज्यादा वक्त मां के साथ गुजारते हैं.

हमें सम?ाना होगा कि घर बसाने और बच्चे पैदा करने में महिला और पुरुष दोनों की समान भागीदारी है. बच्चों की परवरिश का जिम्मा भी दोनों का होना चाहिए न कि केवल मां का. इसलिए अब से जब भी बात परवरिश की आए तो सिर्फ महिलाओं से नहीं बल्कि पुरुषों से भी सवाल होने चाहिए. समानता के लिए पुरुषों की भूमिकाओं को तय करना भी बेहद जरूरी है तभी महिलाओं के जीवन की चुनौतियों में कमी आएगी.

महिलाओं के साथ हिंसा

आज महिलाएं एक तरफ सफलता के नएनए आयाम गढ़ रही हैं तो वहीं दूसरी तरफ कई महिलाएं जघन्य हिंसा और अपराध का शिकार भी हो रही हैं. उन को पीटा जाता है, उन का अपहरण किया जाता है, उन के साथ बलात्कार किया जाता है, उन्हें जला दिया जाता है या फिर उन की हत्या कर दी जाती है.

भारत आज भी महिलाओं के लिए दुनिया में सब से असुरक्षित स्थानों में से एक है. रोज महिलाओं के खिलाफ हिंसा के समाचार आते हैं. अकसर महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा भी होती है जिसे कई बार वे अपनी नियति मान लेती हैं. महिलाओं की सुरक्षा के लिए तमाम कानून खासकर घरेलू हिंसा कानून 2005 होने के बावजूद देश में हर 3 महिलाओं में से 1 महिला घरेलू हिंसा की शिकार हो रही है. 2022 में राष्ट्रीय महिला आयोग ने घरेलू हिंसा के 6,900 मामले दर्ज किए. अपने बड़ेबुजुर्गों को देख कर परिवार का लड़का अपनी बहन या पत्नी पर हाथ उठाना अपना अधिकार मान लेता है और उस के दिमाग में यह विचार मजबूत होता है कि महिलाएं उस से कमतर हैं.

हम कभी यह नहीं सोचते हैं कि आखिर वे कौन सी महिलाएं हैं जिन के साथ हिंसा होती है या उन के साथ हिंसा करने वाले लोग कौन हैं? हिंसा का मूल कारण क्या है और इसे खत्म कैसे किया जाए? हम में से अधिकांश लोग कभी भी इन प्रश्नों पर विचार नहीं करते हैं. इस के विपरीत हम जब भी किसी महिला के साथ हिंसा की खबर देखते या सुनते हैं तो उस हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने के बजाय अपने घर की महिलाओं, बहनों और बेटियों पर तरहतरह के प्रतिबंध लगा देते हैं.

नौकरी से जुड़ी चुनौतियां

योग्यता के बावजूद नौकरी से दूरी:  भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन देश के कार्यबल में महिलाओं की संख्या उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिए. महिलाएं काम तो करना चाहती हैं लेकिन उन के सामने एक नहीं कई चुनौतियां हैं. इस वजह से कई दफा उन की योग्यता का उपयोग नहीं हो पाता.

‘सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकौनौमी’ के नए आंकड़ों के अनुसार कई प्रोफैशन ऐसे हैं जिन में महिलाओं की हिस्सेदारी नाममात्र की है. यही कारण है कि योग्यता के बावजूद सिर्फ 9त्न महिलाओं के पास काम है या वे काम की तलाश जारी रखे हुए हैं.

प्रैगनैंसी, बच्चों का जन्म, बच्चों की देखभाल, वृद्धों की देखभाल, पारिवारिक समर्थन की कमी और औफिस का माहौल जैसी कई बातें हैं जो महिलाओं को बाहर का रास्ता दिखाती हैं और बड़े रोल निभाने से रोकती हैं.

प्रैगनैंसी:

प्रैगनैंसी एक महिला के जीवन का अति महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है. इस दौरान न चाहते हुए भी उस के कैरियर को धक्का पहुंचता है. वह इस समय हर तरह के काम नहीं कर सकती. उसे कई तरह की सावधानियां रखनी होती हैं और बहुत सी शारीरिक परेशानियां भी ?ोलती हैं. जब वह डिलिवरी लीव पर जाती है तो उस दौरान उस के पीछे औफिस में कई बार बहुत कुछ बदल चुका होता है.

उस की तरक्की का अवसर सिमट सकता है और हो सकता है कि उस के जूनियर को आगे बढ़ने का अवसर मिल गया हो. बच्चा जब कुछ महीनों का होता है उस समय बच्चे को संभालने के साथ औफिस संभालना एक टफ जौब होता है. बच्चे की चिंता उसे काम में मन लगने नहीं देती.

प्रैगनैंसी के बाद शारीरिक परेशानियां

एक स्टडी के अनुसार 2त्न महिलाएं बच्चे के जन्म के 2 साल बाद तक भी गंभीर पीठ दर्द से गुजरती हैं. वहीं 38त्न महिलाएं प्रैगनैंसी के 10 से 12 साल बाद भी यूरिन लीकेज ?ोलती हैं. यही नहीं मां बनने के बाद अकसर महिलाएं बौडी शेमिंग भी ?ोलती हैं. बच्चा होने के बाद वजन कंट्रोल करना आसान नहीं होता. इस वजह से वे मोटी हो जाती हैं. ऐसे में उन महिलाओं को ज्यादा प्रौब्लम आती है जिन्हें औफिस में प्रेजैंटेबल दिखना जरूरी है या फिर मौडलिंग, ऐक्टिंग जैसे काम जहां खूबसूरती और फिगर बनाए रखना उन की पहली चुनौती होती है.

समान वेतन

अकसर महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम सैलरी दी जाती है. एक महिला को काम की प्रकृति पर भी ध्यान देना होता है. अगर बच्चे छोटे हैं तो उसे वैसा काम ही ढूंढ़ना होता है जिसे वह आसानी से निभा सके और शाम होने के बाद घर पहुंच सके. इस वजह से भी कई दफा उसे वेतन से सम?ाता करना होता है.

यौन उत्पीड़न

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अभी भी एक समस्या है. अगर किसी महिला के साथ कुछ ऐसा होता है तो वह इस की जानकारी मैनेजमैंट को देती है. मैनेजमैंट इस की जांच भी करता है. लेकिन कई जगहों पर मैनेजमैंट या ऊंचे पोजिशन के लोग इन बातों को दबा देते हैं और महिला को नौकरी तक से हाथ धोना पड़ जाता है.

श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी कम

विश्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं ने 2021 में भारत के कार्यबल का 23 फीसदी से कम प्रतिनिधित्व किया जो 2005 में लगभग 27 फीसदी थी. वहीं इस की तुलना में बंगलादेश में 32 फीसदी और श्रीलंका में 34.5 फीसदी है.

बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य और महिलाओं के हित में बने कानूनों के बावजूद एकतिहाई से भी कम भारतीय महिलाएं काम कर रही हैं या सक्रिय रूप से काम की तलाश कर रही हैं. इस कमी के कई कारण हो सकते हैं जैसे शादी, बच्चे की देखभाल और सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं व आनेजाने की दिक्कत आदि.

उदाहरण के लिए 32 साल की दीपा साहनी के पास 2 मास्टर डिगरियां हैं. वह प्राइवेट जौब करती थीं. बाद में उन्होंने वही किया जो लाखों भारतीय महिलाएं हर साल करती हैं. उन की शादी हुई और बच्चे हुए तो उन्होंने अपना कैरियर छोड़ दिया. सब से बड़ा कारण औफिस की संस्कृति थी जहां दूसरे कर्मचारी 8 बजे तक और उस से भी ज्यादा देर तक औफिस में खुशी से रहने के लिए तैयार थे जबकि वह ऐसा नहीं कर सकती थीं.

वे कहती हैं, ‘‘मेरे लिए 6 से 8 बजे तक का समय बेहद कीमती है. यही वह समय होता है जब मैं अपने परिवार के साथ बैठ कर कुछ बात करती हूं. इस वजह से मैं समय पर घर आ जाती थी और कभी मैनेजमैंट की फैवरिट नहीं बन सकी.’’

मैकिंजी कंसल्टिंग फर्म की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक मैनेजमैंट स्तर पर ऐसे कई परिवर्तन किए जा सकते हैं जो इन समस्याओं को सुधार सकते हैं जैसे लैंगिक आधार पर प्रशिक्षण, सामाजिक सुरक्षा, बच्चे की देखभाल के लिए लचीले काम के घंटे और कार्यस्थल तक पहुंचने के लिए सुरक्षित और सुलभ परिवहन की सुविधा जरूरी है. ये सुविधाएं कामकाजी महिलाओं की संख्या को बढ़ा सकती हैं और देश की जीडीपी में 2025 तक अरबों डालर जोड़ सकती हैं.

कामकाजी महिलाओं पर कोविड का असर

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के ‘सैंटर फौर सस्टेनेबल ऐंप्लौयमैंट’ की एक रिपोर्ट में पाया गया कि कोविड-19 के बाद पुरुषों की तुलना में महिलाओं की नौकरी खोने की संभावना अधिक थी और कार्यबल में लौटने की संभावना कम थी.

बच्चे को समय न दे पाने की गिल्ट

आजकल की महंगाई वाली जिंदगी में रोज एक नई चुनौती का सामना करने के लिए पुरुष के साथ स्त्री को भी घरगृहस्थी चलाने के लिए काम करना पड़ता है. मगर कामकाज के चक्कर में महिला अपने बच्चों को पूरा समय नहीं दे पाती, जिस के कारण बच्चे अकेलापन और खालीपन सा महसूस करते हैं.

एक बच्चे को बस अपने मातापिता के साथ समय बिताना और उन का प्यार पाना होता है. जरूरत के समय मातापिता का साथ न पाने के कारण बच्चों में कई प्रकार की कुंठा पनपने लगती है. वे चिड़चिड़े, गुसैल और उदंड भी होने लगते हैं. इस बात को ले कर मां के दिल में गिल्ट की भावना रहती है. वह न पूरे मन से औफिस का काम कर पाती है और न ही घर में सारा समय दे पाती है.

न्यू मदर्स की चुनौतियां

मां बनना किसी भी महिला के लिए जिंदगी की सब से बड़ी सौगात हो सकती है. साथ ही मां बनते ही हर महिला के ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी आ जाती है. न्यू मदर्स के सामने कई चुनौतियां भी आती हैं. अनुभव की कमी और मन में अनजाना डर, उल?ान और सही सपोर्ट न मिलने के कारण ये चुनौतियां और भी गंभीर महसूस हो सकती हैं.

थकान और नींद की कमी

मां को नींद की कुरबानी देनी पड़ सकती है. बच्चे के सोनेजागने के रूटीन के अनुसार मांओं को भी जागना और सोना पड़ता है. इस से उन की नींद पूरी नहीं हो पाती. वहीं कई महिलाएं जिन्हें दिन में सोने की आदत नहीं होती या घर के कामों में हाथ बंटाना होता है फिर औफिस जाना होता है उन के लिए नींद की कमी एक बड़ी समस्या बन कर उभरती है.

अच्छी मां न बन पाने का पश्चात्ताप

नई मांओं को लगातार अपने आसपास के लोगों से सलाह, टिप्स और शिकायतें सुनने को मिलती रहती हैं जिस से उन पर लगातार खुद को अच्छी मां साबित करने का दबाव बढ़ता ही जाता है. इस से उन के मन में गिल्ट और जिंदगी में तनाव बढ़ता जाता है जो मां और बच्ची दोनों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता.

मां बनना आसान नहीं होता. एक मां को अपनी खूबसूरत फिगर, आकर्षण और सेहत को दांव पर लगा कर बच्चे को जन्म देना होता है. अपने बढ़ते वजन, त्वचा पर दिखने वाले स्ट्रैच मार्क्स और हेयर फौल जैसी समस्याओं से न्यू मदर्स को अकसर तनाव, दुख, उदासी और निराशा महसूस हो सकती है. उन्हें अपने शरीर को देख कर दुख हो सकता है और कई बार महिलाएं अपने शरीर से भी नफरत करने लगती हैं.

कैरियर और सोशल लाइफ

बच्चे की देखभाल और अस्तव्यस्त दिनचर्या के बीच महिलाएं ज्यादातर समय घर में ही बिताती हैं और अपने दोस्तों, परिवार वालों या कलिग्स के साथ उन का मेलजोल या बातचीत भी बंद हो जाती है. इस से उन की सोशल लाइफ पूरी तरह खत्म होने का डर भी उन के अंदर पनप सकता है और उन्हें धीरेधीरे अकेले रह जाने का डर सताता है.

मानसिक समस्याएं

पोस्टपार्टम डिप्रैशन एक ऐसी स्थिति है जिस का सामना बहुत सी महिलाओं को चाइल्डबर्थ के बाद करना पड़ सकता है. बौलीवुड अभिनेत्री समीरा रेड्डी पोस्टपार्टम डिप्रैशन से गुजरने की बात स्वीकार कर चुकी हैं. वहीं अन्य कई मशहूर सेलेब्स ने भी इस बारे में कई बार खुल कर बात की है.

बच्चा होने के बाद अकसर पति पत्नी में दूरियां बढ़ जाती हैं. किसी भी कपल के लिए मांबाप बनना किसी सपने के सच होने जैसा होता है. नन्हे के आने के बाद कपल्स की दुनिया बदल जाती है और साथ ही बदल जाता है हस्बैंड और वाइफ के बीच का रिश्ता भी. महिला का सारा ध्यान और समय नन्हे को संभालने में चला जाता है. थकान या पोस्ट प्रैगनैंसी हैल्थ प्रौब्लम्स भी रहती हैं. इस वजह से वह पति के साथ वक्त बिताने के बारे में सोच ही नहीं पाती. इस से पतिपत्नी के बीच रोमांस कम हो जाता है. ऐसे में पति के साथ दूरियां बढ़ने से रोकना और बच्चे को अकेले संभालना बहुत बड़ी चुनौती होती है.

मगर पुरुष चाहे तो महिला को अपना सहयोग दे कर अटैचमैंट बढ़ा सकता सकता है.

करीना कपूर खान ने अपनी दूसरी प्रैगनैंसी के बाद एक किताब लौंच की जिस में उन्होंने प्रैगनैंसी और मदरहुड से जुड़ी कई महत्त्वपूर्ण बातें लिखीं. ‘करीना कपूर खान की प्रैगनैंसी बाइबल’ नाम की इस बुक में सैफ ने कहा कि करीना और उन के बड़े बेटे तैमूर अली खान के जन्म के बाद करीना और उन का रिश्ता भी अचानक से पूरी तरह बदल गया. अब वे पहले से ज्यादा अटैच्ड महसूस करते हैं.

बच्चे की देखभाल जैसे महत्त्वपूर्ण काम में अगर पति अपनी पत्नी को सपोर्ट करे तो महिला अपने लिए और पति के लिए समय निकाल सकती है. यही नहीं इस तरीके से दोनों एकसाथ अधिक समय बिताएंगे और बौंडिंग भी स्ट्रौंग बनेगी.

महिलाएं कैसे करें चुनौतियों का सामना

महिलाएं टैक सेवी बनें:

कल की दबीसहमी सी हाउसवाइफ आज की कौन्फिडैंट होममेकर या औफिस की बौस बन चुकी है. आधुनिक भारतीय स्त्री के इस बदलाव की एक वजह यह है कि अपनी चुनौतियों के लिए उस ने खुद को बहुत अच्छी तरह तैयार किया है. घरेलू उपकरणों की सुविधाओं ने स्त्रियों के कामकाज के तरीके को व्यवस्थित और आसान बना दिया है. पहले घर की सफाई और कुकिंग के लिए उन्हें बहुत ज्यादा वक्त देना पड़ता था, लेकिन अब उन का यह काम कुछ ही घंटों में निबट जाता है.

कंप्यूटर और इंटरनैट ने जीवन को और भी आसान बना दिया है. चाहे बिजली का बिल चुकाना हो या ट्रेन का टिकट बुक कराना हो ये सारे काम घर बैठे मिनटों में कर सकती हैं. जरूरी है कि महिलाएं टैक सेवी बनें और अपनी जिम्मेदारियां कुशलता से और कम समय में निभाना सीखें. इस से उन की सफलता के रास्ते खुलेंगे.

चुनौतियों से घबराएं नहीं

इस दुनिया में सफल होने के लिए अकसर इंसान को एक कठिन रास्ते से गुजरना होता है भले ही वह स्त्री हो या पुरुष. यह बात अलग है कि स्त्रियों के जीवन में चुनौतियां अधिक मिलती हैं. किसी भी महिला को चाहिए कि वह अपनी रुचि को सम?ो और फिर तय करे कि वह आगे क्या करना चाहती है. अपने परिवार को सम?ाए कि आप क्या और क्यों करना चाहती हैं और फिर उस के अनुसार अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में काम करे.

एक बार जब स्त्री अपनी सफलता की यात्रा शुरू कर देती है तो पीछे मुड़ कर नहीं देखती भले ही रास्ते में कितनी भी चुनौतियां क्यों न आएं. ये चुनौतियां कहीं न कहीं आप के जीवन को बेहतर बनाती हैं. आप चुनौतियां पार कैसे करती हैं यह आप पर डिपैंड करता है. यह आप का नजरिया है कि आप उन्हें मुसीबत मान लें या मजेदार ढंग से उन्हें पार कर आगे बढ़ जाएं.

स्त्री आपस में सहयोगी बनें

सैलिब्रिटी मेकअप आर्टिस्ट और रिलेशनशिप ऐक्सपर्ट आश्मीन मुंजाल कहती हैं कि महिलाएं शक्ति हैं और जिस के पास शक्ति है उस के पास चुनौतियां भी ज्यादा आएंगी, जबकि महिलाओं को यही नहीं पता होता कि वे शक्ति हैं. इस वजह से वे पिट जाती हैं. मगर जब वे अपनी शक्ति पहचान लेंगी तब उन चुनौतियों से बहुत आसानी से निबट सकती हैं. यही नहीं बल्कि जिस दिन औरतें एक हो जाएंगी और एकदूसरे को सपोर्ट करेंगी उस दिन उन्हें चुनौतियों का सामना करने और आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता.

Mother’s Day Special: देश की 70 % मांओं के लिए आज भी मुश्किल है ब्रेस्ट फीडिंग

क्या मांओं के लिए स्तनपान जितना स्वाभाविक काम लगता है उतना है? क्या उन्हें इस काम में मुश्किलें आती हैं? स्तनपान को लेकर उन्हें जरूरी सहयोग मिलता है? स्तनपान को लेकर उनकी एक्सपेक्टेशन क्या है? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब खोजने के लिए लेकर मौमस्प्रेसो ने मेडेला के साथ एक औनलाइन सर्वे किया है. इस सर्वे का विषय है ‘ स्तनपान को लेकर भारतीय माओं के सामने चुनौतियां’. यह सर्वे 25-45 साल की 510 शहरी और कस्बाई माओं पर किया गया.

सर्वे का उद्देश्य यह जानना था कि स्तनपान के दौरान कामकाज की जगहों, घर या सार्वजनिक स्थलों पर माएं किन किन चुनौतियों का सामना करती हैं.    उन्हें मेडिकल, व्यवहारिक और सहयोग के स्तर पर कैसा माहौल मिलता है. माओं के लिए स्तनपान की प्रक्रिया को सुलभ बनाने के लिए एक बहस शुरू करना.

स्तनपान को लेकर हुए इस सर्वे में जो तथ्य सामने आए उसमें ज्यादातर मौम्स का उत्साहवर्धन करने वाले नहीं थे. आइये जानते हैं सर्वे में सामने आई प्रमुख चुनौतियां:

  • 70 % से भी ज्यादा माएं स्तनपान के दौरान मुश्किल हालातों का सामना करती हैं.
  • 34.7 % माओं को स्तनपान के शुरुआती दिनों में ड्राइनेस के कारण स्तनों में कट या क्रैक का सामना करना पड़ता है.
  • करीब31.8 % माएं लंबे समय तक स्तनपान कराने,  कई बच्चों को बार-बार स्तनपान कराने और आधी रात में बच्चों के जागने पर बहुत ज्यादा थक जाती हैं.
  • 26.61 % माएं स्तनपान के दौरान बच्चों द्वारा काटने को लेकर परेशान होती हैं.
  • 22.7 % माओं को दूध न आने से जुड़ी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं.
  • 17.81 % माओं को सार्वजनिक जगहों जैसे बाजार,मौल्स और मेट्रो स्टेशनों आदि में स्तनपान को लेकर जरूरी इंतेजाम न होने के चलते मुश्किल पेश होती है.
  • 17.42 % माएं मां बनने के बाद पैदा हुए तनाव यानी पोस्टपार्टम का शिकार हो जाती हैं.
  • 38% माओं को मां बनने के शुरुआती दिनों में स्तनपान कराते समय दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. खासतौर पर अस्पतालों में माओं को स्तनपान कराने का अनुभव सबसे कड़वा लगता है.
  • करीब 64% स्तनपान के दिनों में अपने परिवार का सहयोग हासिल कर पाती हैं.
  • महज 37% माएं यह स्वीकार करती हैं कि स्तनपान को लेकर उनके पति सहयोगात्मक रवैया अपनाते हुए उनके साथ मजबूती से खड़े रहते हैं. जाहिर है यह प्रतिशत बेहद कम है.
  • सिर्फ 2.4 % माओं को अपने कामकाज की जगहों, यानी औफिस/वर्कप्लेस में सहयोगात्मक माहौल मिलता है. यह बड़ा निराशाजनक आंकड़ा है.
  • परिवार, पति के सहयोग के बावजूद सिर्फ30 % माएं ही पारिवारिक जरूरतों और औफिस के बीच तालमेल बिठा पाती हैं.

हालांकि यह राहत भरी बात है कि स्तनपान के दौरान इतनी चुनैतियों के बावजूद 78% माओं ने अपने बच्चों को पिछले साल स्तनपान कराया. जब हमने उनसे स्तनपान कराने के पीछे के कारणों को लेकर सवाल पूछे तो कई दिलचस्प और खुशनुमा जवाब मिले. इन जवाबों में टौप 4 जवाब थे:  करीब 98.6 % माएं अपने बच्चों को उनकी बेहतर सेहत के लिए स्तनपान कराना पसंद करती हैं.  जबकि 73.4% माएं बच्चों के साथ घनिष्ट लगाव के चलते स्तनपान कराती हैं.  वहीं 57.5% मौम्स पाने स्वास्थ्य लाभ के लिए बच्चों को स्तनपान कराती हैं.  और आखिर में 39.7% मौम्स गर्भावस्था के बाद अपने बढ़े हुए वजन को कम करने के लिए स्तनपान कराती हैं.

हालात बदलने की जरूरत है
स्तनपान करना हर बच्चे का और कराना हर मां का पहला हक है. लेकिन आज भी हमारे देश की ज्यादातर माओं को यह काम कराना मुश्किल भरा लगता है तो  गलती समाज, परिवार की है. हम उन्हें इस से जुड़ी आधारभूत सुविधाओं को न तो घर पर मुहैया करा पाते हैं और न ही दफ्तर या सार्वजनिक जगहों पर. स्तनपान शुरुआती दिनों में मां और बच्चे के लिए लाभप्रद होता लेकिन समस्या यह है कि शुरुआती सप्ताहों में ही माओं को इसे लेकर दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं.

बच्चे के जन्म के बाद मौम्स को अपनी लाइफ में कई बड़े बदलाओं को एडजस्ट करना पड़ता है. ऐसे में उनको जरूरत होती है अपने आसपास के लोगों के हरसंभव सपोर्ट की. चाहे वो परिवार के सदस्य हों, बौस हो या सहकर्मी.

Mother’s Day Special: मेरी मां के नाम

इस बात को लगभग 1 साल हो गया लेकिन आज भी एक सपना सा ही लगता है. अमेरिका के एक बड़े विश्वविद्यालय, यूनिवर्सिटी औफ ह्यूस्टन के बोर्ड के सामने मैं इंटरव्यू के लिए जा रही थी. यह कोई साधारण पद नहीं था और न ही यह कोई साधारण इंटरव्यू था. लगभग 120 से ज्यादा व्यक्ति अपने अनुभव और योग्यताओं का लेखाजोखा प्रस्तुत कर चुके थे और अब केवल 4 अभ्यर्थी मैदान में चांसलर का यह पद प्राप्त करने के लिए रह गए थे.

मुझे इस बात का पूरा आभास था कि अब तक न तो किसी भी अमेरिकन रिसर्च यूनिवर्सिटी में किसी भारतीय का चयन चांसलर की तरह हुआ है और न ही टैक्सास जैसे विशाल प्रदेश ने किसी स्त्री को चांसलर की तरह कभी देखा है. इंटरव्यू में कई प्रश्न पूछे जाएंगे. हो सकता है वे पूछें कि आप में ऐसी कौन सी योग्यता है जिस के कारण यह पद आप को मिलना चाहिए या पूछें कि आप की सफलताएं आप को इस मोड़ तक कैसे लाईं?

इस तरह की चिंताओं से अपना ध्यान हटाने के लिए मैं ने जहाज की खिड़की से बाहर अपनी दृष्टि डाली तो सफेद बादल गुब्बारों की तरह नीचे दिख रहे थे. अचानक उन के बीच एक इंद्रधनुष उभर आया. विस्मय और विनोद से मेरा हृदय भर उठा…अपनी आंखें ऊपर उठा कर तो आकाश में बहुत इंद्रधनुष देखे थे लेकिन आंखें झुका कर नीचे इंद्रधनुष देखने का यह पहला अनुभव था. मैं ने अपने पर्स में कैमरे को टटोला और जब आंख उठाई तो एक नहीं 2 इंद्रधनुष अपने पूरे रंगों में विराजमान थे और मेरे प्लेन के साथ दौड़ते से लग रहे थे.

आकाश की इन ऊंचाइयों तक उठना कैसे हुआ? कैसे जीवन की यात्रा मुझे इस उड़ान तक ले आई जहां मैं चांसलर बनने का सपना भी देख सकी? किसकिस के कंधों ने मुझे सहारा दे कर ऊपर उठाया है? इन्हीं खयालों में मेरा दिल और दिमाग मुझे अपने बचपन की पगडंडी तक ले आया.

यह पगडंडी उत्तर प्रदेश के एक शहर फर्रुखाबाद में शुरू हुई जहां मैं ने अपने बचपन के 18 साल रस्सी कूदते, झूलाझूलते, गुडि़यों की शादी करते और गिट्टे खेलते बिता दिए. कभी अमेरिका जाने के बारे में सोचा भी नहीं था, वहां के आकाश में उड़ने की तो बात ही दूर थी. बचपन की आवाजें मेरे आसपास घूमने लगीं :

‘अच्छा बच्चो, अगर एक फल वाले के पास कुछ संतरे हैं. अब पहला ग्राहक 1 दर्जन संतरे खरीदता है, दूसरा ग्राहक 2 दर्जन खरीदता है और तीसरा ग्राहक सिर्फ 4 संतरे खरीदता है. इस समय फल वाले के पास जितने संतरे पहले थे उस के ठीक आधे बचे हैं. जरा बताओ तो कि फल वाले के पास बेचने से पहले कितने संतरे थे?’ यह मम्मी की आवाज थी.

‘मम्मी, हमारी टीचर ने जो होमवर्क दिया था, उसे हम कर चुके हैं. अब और नहीं सोचा जाता,’ यह मेरी आवाज थी.

‘अरे, इस में सोचने की क्या जरूरत है? यह सवाल तो तुम बिना सोचे ही बता सकती हो. जरा कोशिश तो करो.’

सितारों वाले नीले आसमान के नीचे खुले आंगन में चारपाइयों पर लेटे सोने से पहले यह लगभग रोज का किस्सा था.

‘जरा यह बताओ, बच्चो कि अमेरिका के राष्ट्रपति का क्या नाम है?’

‘कुछ भी हो, हमें क्या करना है?’

‘यह तो सामान्य ज्ञान की बात है और सामान्य ज्ञान से तो सब को काम है.’

फिर किसी दिन होम साइंस की बात आ जाती तो कभी राजनीति की तो कभी धार्मिक ग्रंथों की.

‘अच्छा, जरा बताओ तो बच्चो कि अंगरेजी में अनार को क्या कहते हैं?’

‘राज्यसभा में कितने सदस्य हैं?’

‘गीता में कितने अध्याय हैं?’

‘अगले साल फरवरी में 28 दिन होंगे या 29?’

हम कार में हों या आंगन में, गरमी की दोपहर से बच कर लेटे हों या सर्दी की रात में रजाई में दुबक कर पड़े हों, मम्मी के प्रश्न हमारे इर्दगिर्द घूमते ही रहते थे. न हमारी मम्मी टीचर हैं, न कालिज की डिगरी की हकदार, लेकिन ज्ञान की प्यास और जिज्ञासा का उतावलापन उन के पास भरपूर है और खुले हाथों से उन्होंने मुझे भी यही दिया है.

एक दिन की बात है. हमसब कमरे में बैठे अपनाअपना होमवर्क कर रहे थे. मम्मी हमारे पास बैठी हमेशा की तरह स्वेटर बुन रही थीं. दरवाजे की आहट हुई और इस से पहले कि हम में से कोई उठ पाए, पापा की गुस्से वाली आवाज खुले हुए दरवाजे से कमरे तक आ पहुंची.

‘कोई है कि नहीं घर में, बाहर का दरवाजा खुला छोड़ रखा है.’

‘तुझ से कहा था रेनु कि दरवाजा बंद कर के आना, फिर सुना नहीं,’ मम्मी ने धीरे से कहा लेकिन पापा ने आतेआते सुन लिया.

‘आप सब इधर आइए और यहां बैठिए, रेशमा और टिल्लू, तुम दोनों भी.’ पापा गुस्से में हैं यह ‘आप’ शब्द के इस्तेमाल से ही पता चल रहा था. सब शांत हो कर बैठ गए…नौकर और दादी भी.

‘रेनु, तुम्हारी परीक्षा कब से हैं?’

‘परसों से.’

‘तुम्हारी पढ़ाई सब से जरूरी है. घर का काम करने के लिए 4 नौकर लगा रखे हैं.’ उन्होंने मम्मी की तरफ देखा और बोले, ‘सुनो जी, दूध उफनता है तो उफनने दीजिए, घी बहता है तो बहने दीजिए, लेकिन रेनु की पढ़ाई में कोई डिस्टर्ब नहीं होना चाहिए,’ और पापा जैसे दनदनाते आए थे वैसे ही दनदनाते कमरे से निकल गए.

मैं घर की लाड़ली थी. इस में कोई शक नहीं था लेकिन लाड़ में न बिगड़ने देने का जिम्मा भी मम्मी का ही था. उन का कहना यही था कि पढ़ाई में प्रथम और जीवन के बाकी क्षेत्रों में आखिरी रहे तो कौन सा तीर मार लिया. इसीलिए मुझे हर तरह के कोर्स करने भेजा गया, कत्थक, ढोलक, हारमोनियम, सिलाई, कढ़ाई, पेंटिंग और कुकिंग. आज अपने जीवन में संतुलन रख पाने का श्रेय मैं मम्मी को ही देती हूं.

अमेरिका में रिसर्च व जिज्ञासा की बहुत प्रधानता है. कोई भी नया विचार हो, नया क्षेत्र हो या नई खोज हो, मेरी जिज्ञासा उतावली हो चलती है. इस का सूत्र भी मम्मी तक ही पहुंचता है. कोई भी नया प्रोजेक्ट हो या किसी भी प्रकार का नया क्राफ्ट किताब में निकला हो, मेरे मुंह से निकलने की देर होती थी कि नौकर को भेज कर मम्मी सारा सामान मंगवा देती थीं, खुद भी लग जाती थीं और अपने साथ सारे घर को लगा लेती थीं मानो इस प्रोजेक्ट की सफलता ही सब से महत्त्वपूर्ण कार्य हो.

मैं छठी कक्षा में थी और होम साइंस की परीक्षा पास करने के लिए एक डिश बनाना जरूरी था. मुझे बनाने को मिला सूजी का हलवा और वह भी बनाना स्कूल में ही था. समस्या यह थी कि मुझे तो स्टोव जलाना तक नहीं आता था, सूजी भूनना तो दूर की बात थी. 4 दिन लगातार प्रैक्टिस चली…सब को रोज हलवा ही नाश्ते में मिला. परीक्षा के दिन मम्मी ने नापतौल कर सामान पुडि़यों में बांध दिया.

‘अब सुन, यह है पीला रंग. सिर्फ 2 बूंद डालना पानी के साथ और यह है चांदी का बरक, ऊपर से लगा कर देना टीचर को. फिर देखना, तुम्हारा हलवा सब से अच्छा लगेगा.’

‘जरूरी है क्या रंग डालना? सिर्फ पास ही तो होना है.’

‘जरूरी है वह हर चीज जिस से तुम्हारी डिश साधारण से अच्छी लगे बल्कि अच्छी से अच्छी लगे.’

‘साधारण होने में क्या खराबी है?’

‘जो काम हाथ में लो, उस में अपना तनमन लगा देना चाहिए और जिस काम में इनसान का तनमन लग जाए वह साधारण हो ही नहीं सकता.’

आज लोग मुझ से पूछते हैं कि आप की सफलता के पीछे क्या रहस्य है? मेरी मां की अपेक्षाएं ही रहस्य हैं. जिस से बचपन से ही तनमन लगाने की अपेक्षा की गई हो वह किसी कामचलाऊ नतीजे से संतुष्ट कैसे हो सकता है? उस जमाने में एक लड़के और एक लड़की के पालनपोषण में बहुत अंतर होता था, लेकिन मेरी यादों में तो मम्मी का मेरे कोट की जेबों में मेवे भर देना और परीक्षा के लिए जाने से पहले मुंह में दहीपेड़ा भरना ही अंकित है.

मेरी सफलताओं पर मेरी मम्मी का गर्व भी प्रेरणादायी था. परीक्षा से लौट कर आते समय यह बात निश्चित थी कि मम्मी दरवाजे की दरार में से झांकती हुई चौखट पर खड़ी मिलेंगी. जिस ने बचपन से अपने कदमों के निशान पर किसी की आंखें बिछी देखी हों, उसे आज जीवन में कठिन से कठिन मार्ग भी इंद्रधनुष से सजे दिखते हों तो इस में आश्चर्य कैसा? इस का श्रेय भी मैं अपनी मम्मी को ही देती हूं.

मैं 18 वर्ष की थी कि जिंदगी में अचानक एक बड़ा मोड़ आ गया. अचानक मेरी शादी तय हो गई और वह भी अमेरिका में पढ़ रहे एक लड़के के साथ. जब मैं ने रोरो कर घर सिर पर उठा दिया तो मम्मी बोलीं, ‘बेटा, शादी तो होनी ही थी एक दिन…कल नहीं तो आज सही. तुम्हारे पापाजी जो कर रहे हैं, सोचसमझ कर ही कर रहे हैं.’

‘सब को अपनी सोचसमझ की लगती है. मेरी सोचसमझ कोई क्यों नहीं देखता. मुझे पढ़ना है और बहुत पढ़ना है. अब कहां गया उफनता हुआ दूध और बहता हुआ घी का टिन?’

‘तुम्हें पढ़ना है और वे लोग तुम्हें जरूर पढ़ाएंगे.’

‘आज तक पढ़ाया है किसी ने शादी के बाद जो वे पढ़ाएंगे? कौन जिम्मेदारी लेगा मेरी पढ़ाई की?’

‘मैं लेती हूं जिम्मेदारी. मेरा मन है… एक मां का मन है और यह मन कहता है कि वे तुझे पढ़ाएंगे और बहुत अच्छे से रखेंगे.’

मुझे पता था कि यह सब बहलाने की बातें थीं. मेरा रोना तभी रुका जब मेरा एडमिशन अमेरिका के एक विश्व- विद्यालय में हो गया. मम्मी के पत्र बराबर आते रहे और हर पत्र में एक पंक्ति अवश्य होती थी, ‘यह सुरेशजी की वजह से आज तुम इतना पढ़ पा रही हो…ऊंचा उठ पा रही हो.’ जिंदगी का यह पाठ कि ‘हर सफलता के पीछे दूसरों का योगदान है,’ मम्मी ने घुट्टी में घोल कर पिला दिया है मुझे. इसीलिए आज जब लोग पूछते हैं कि ‘आप की सफलता के पीछे क्या रहस्य है?’ तो मैं मुसकरा कर इंद्रधनुष के रंगों की तरह अपने जीवन में आए सभी भागीदारों के नाम गिना देती हूं.

‘‘वी आर स्टार्टिंग अवर डिसेंट…’’ जब एअर होस्टेस की आवाज प्लेन में गूंजी तो मैं अतीत से वर्तमान में लौट आई. खिड़की से बाहर झांका तो इंद्रधनुष पीछे छूट चुके थे और नीचे दिख रहा था अमेरिका का चौथा सब से बड़ा महानगर- ह्यूस्टन. मेरा मन सुबह की ओस के समान हलका था, मेरा मस्तिष्क सभी चिंताओं से मुक्त था.

ठीक 8 घंटे के बाद चांसलर और प्रेसीडेंट का वह दोहरा पद मुझे सौंप दिया गया था. मैं ने सब से पहले फोन मम्मी को लगाया और अपने उतावलेपन में सुबह 5 बजे ही उन्हें उठा दिया.

‘‘मम्मी, एक बहुत अच्छी खबर है… मैं यूनिवर्सिटी औफ ह्यूस्टन की प्रेसीडेंट बन गई हूं.’’

?‘‘फोन जरा सुरेशजी को देना.’’

‘‘मम्मी, आप ने सुना नहीं क्या, मैं क्या कह रही हूं.’’

‘‘सब सुना, जरा सुरेशजी से तो बात कर लूं.’’

मैं ने एकदम अनमने मन से फोन अपने पति के हाथ में थमा दिया.

‘‘बहुतबहुत बधाई, सुरेशजी, रेनु प्रेसीडेंट बन गई. मैं तो यह सारा श्रेय आप ही को देती हूं.’’

हमेशा दूसरों को प्रोत्साहन देना और श्रेय भी खुले दिल से दूसरों में बांट देना – यही है मेरी मां की पहचान. आज उन की न सुन कर, अपनी हर सफलता और ऊंचाई मैं अपनी मम्मी के नाम करती हूं.

लेखिका- रेनू खटोर

Mother’s Day Special: कैसे बचें एजिंग इफेक्ट से?

खूबसूरत दिखने की चाहत हर किसी का अरमान होता है,फिर चाहे कोई भी उम्र हो? जैसे-जैसे उम्र बढ़ने लगती है उसका सबसे पहला इफेक्ट आपके चेहरे पर ही दिखाई देता है. बढ़ती उम्र के असर को कम करने के लिए आप मार्केट के प्रॉडक्ट्स का इस्तमाल शुरू कर देते हैं. लेकिन, क्या आप इन उत्पादों के साइड इफेक्ट्स से वाकिफ हैं? स्किन पर आए एजिंग इफेक्ट को आप प्रॉपर डाइट, भरपूर नींद और एक्सरसाइज करके भी कम कर सकते हैं. आइए, जानते है कुछ ऐसे ही सुपरफुड्स के बारे में.

1.कॉफी

इंस्टेंट ग्लो के लिए कॉफी सबसे उत्तम प्रॉडक्ट है. एक शोध के मुताबिक कॉफी में मौजूद कम्पाउंड्स त्वचा को कैंसर से बचाते हैं और आपको लंबे समय तक जवान रखते हैं. कॉफी में मौजूद कैफीन से स्किन डलनेस दूर होती है जो आपकी स्किन में निखार लाती है. कॉफी के बीज स्किन पर रगड़ने से डेड सेल्स खत्म हो जाऎंगे और स्किन कोमल हो जाती है.

2.अनार

अनार के उपयोग से झुर्रियों और रूखेपन को कम किया जा सकता है. इसमें विटामिन सी होता है जो मिडल एज की महिलाओं के लिए बहुत फायदेमंद होता है. अनार में एंथोसियानिन्स तत्व होता है,जो कोलैजेन के उत्पादन को रोकता है. अनार के प्रयोग से स्किन स्मूथ और कसी हुई रहती है.

3.तरबूज

तरबूज के प्रयोग से आप सूरज की अल्ट्रा वॉयलेट किरणों से बच सकते है. तरबूज में लाइकोपिन एंटी-ऑक्सीडेंट कंपाउंड होता है. रिसर्च के अनुसार टमाटर की बजाय तरबूज में 40 प्रतिशत ज्यादा फाइटो केमिकल होता है, जो एसपीएफ 3 के बराबर होता है. ये आपकी स्किन पर सन्सक्रीन का काम करता है.

4.अखरोट

अखरोट में ओमेगा-3 फैटी एसिड बालों को हाइड्रेटेड रखता है और विटामिन इ बालों को डेमेज होने से बचाता है. बालों को इन्हीं दोनों तत्वों से फायदा मिलता है. उम्र बढ़ने के साथ-साथ बाल भी झड़ने लगते है.अखरोट के प्रयोग से इस समस्या से निजात मिलता है. इसमें मौजूद कॉपर आपके बालों को असमय सफेद होने से बचाता है क्योंकि यह आपके बालों के नेचुरल कलर को बनाए रखता है.

Mother’s Day Special: मां के लिए नाश्ते में बनाएं हेल्दी और टेस्टी मूंग दाल ढोकला

ढोकला गुजरात का फेमस डिश है. यूं तो ढोकला बेसन से बनाया जाता है, लेकिन आज हम आपको मूंग दाल का ढोकला बनाने की रेसिपी बता रहे हैं. मूंग दाल ढोकला फ्राई नहीं होता है. जानें इसे बनाने की विधि.

हमें चाहिए-

  • मू्ंगदाल
  • बेसन
  • दही
  • हरी मिर्च
  • शक्कर
  • नमक
  • तेल
  • फ्रूट सॉल्ट
  • सरसो
  • तिल
  • हिंग
  • हल्दी पाउडर
  • घिसा हुआ नारियल
  • धनिया पत्ता

बनाने का तरीका

सबसे पहले पीली मूंग दाल को तीन से चार घंटे तक पानी में भीगो लें. इसके बाद उसका पानी निकाल कर हटा दें. अब भींगे हुए मूंग में हरी मिर्च डालकर अच्छी तरह पीस लें. अब इसमें नमक, थोड़ी सी शक्कर हींग थोड़ा सा तेल हल्दी पाउडर थोड़ा सा बेसन और दही डाल कर अच्छी तरह से मिला लें.

अब इस पूरे मिश्रण में फ्रूट सॉल्ट डालें. अब इसे हल्के हाथों से मिला लें. अच्छी तरह से मिला लेने के बाद एक थाली में तेल लगाकर सारा मिश्रण उसमें डाल दें. अब इसे स्टीम (भाप) पर पकने के लिए रख दें. इसे 10 से 12 मिनट तक भाप पर पकने के लिए छोड़ दें. 10 मिनट बाद इसके निकाल लें. आपका ढ़ोकला तैयार हो चुका है.

अब इसे छौंक लगा लें. इसके लिए एक पैन में तेल गर्म कर लें. इसमें सरसों, तिल, हींग, अगर तीखा खाना हो तो थोड़ी हरी मिर्च डाल दें. अब इसे अच्छी तरह पकाने के बाद ढोकले के उपर फैलाकर डाल दें और अंत में हरे धनिये पत्ते के साथ घिसा हुआ नारियल डाल दें और चटनी के साथ सर्व करें.

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