दुनिया की 6 रेल यात्राएं जिन्‍हें आप कभी भुला नहीं पाएंगे

रेलवेज को हमारे देश की लाइफलाइन कहा जाता है क्योंकि रेलवे देश के इकनॉमिक लाइफ को बाइंड करता है. रेलवेज भारत में ट्रांसपोर्टेशन का मुख्य साधन है. ट्रेन से यात्रा करना एक मेजिकल अनुभव है. खूबसूरत व्यूज, नए लोगों से मिलना, कुछ घंटों से दिन तक ट्रेन में बिताना बहुत ही सुखद होता है. ऐसी कई रेल यात्राएं हैं, जो आपने भारत में की होंगी और आपके लिए यादगार बन गयी होंगी. लेकिन, आज हम बात करने वाले हैं पूरी दुनिया की उन रेल यात्राओं के बारे में, जिन्हें करने के बाद आप उन्हें कभी भुला नई पाएंगे.

दुनिया की कुछ यादगार ट्रेन जर्नीज

दुनिया भर में रेलवेज को आसान, कम्फर्टेबल, सुरक्षित और सस्ता साधन माना जाता है. आइए जानते हैं वर्ल्ड की सबसे यादगार ट्रेन जर्नीज के बारे में:

  1. ग्लेशियर एक्सप्रेस, स्विट्रजलैंड 

यह ट्रेन जर्नी स्विट्रजलैंड में दो सबसे खूबसूरत माउंटेन रिसॉर्ट्स को कनेक्ट करती है. ग्लेशियर एक्सप्रेस स्विस एल्प्स के खूबसूरत दृश्यों को एन्जॉय करने का सबसे अच्छा तरीका है. एक दिन के ट्रिप में 91 टनल्स और 291 ब्रिजेज से यह ट्रेन गुजरती है.

 2. द ट्रान्ज़ेलपाइन, न्यूजीलैंड

यह ट्रेन राइड न्यूजीलैंड के साउथ आइलैंड के साथ-साथ चलती है. इससे आप दक्षिण एल्प्स के बर्फ से ढके माउंटेन्स के नजरों को देखने का मजा ले सकते हैं. यह ट्रेन देश के सबसे बेहतरीन टनल्स, लेक्स और रेनफॉरेस्ट्स से हो कर गुजरती है.

3. वेस्ट हाइलैंड लाइन स्कॉटलैंड

वेस्ट हाइलैंड लाइन स्कॉटलैंड के वाइल्ड, वेस्टर्न कोस्ट को एक्सपीरियंस करने का सबसे अच्छा तरीका है. इससे आप देश के सबसे अच्छे दृश्यों के बीच में से ट्रेवल कर सकता है. इस ट्रेन का सफर आपको पूरी लाइफ याद रहेगा.

4. ट्रांस-साइबेरियन रेलवे, रूस

ट्रांस-साइबेरियन रेलवे दुनिया के सबसे लम्बे ट्रेन रूट्स में से एक है. इसकी शुरुआत मास्को में वेस्ट्वर्ड टर्मिनस से होती है. इसके सात दिनों के सफर में आप लार्जेस्ट लेक के साथ-साथ कई अन्य नजारों का भी मजा ले सकते हैं.

 5. द रीयूनिफिकेशन एक्सप्रेस, वियतनाम 

कुछ ट्रेन लुभावने दृश्यों से हो कर गुजरती है जैसे ऐतिहासिक शहरों से. रीयूनिफिकेशन एक्सप्रेस दक्षिण पूर्व एशिया के सबसे पसंदीदा रेलवे में से एक है। इस ट्रेन के माद्यम से हो ची मिन्ह से हनोई तक जाते हुए आप बेहतरीन एटमॉस्फेयर और एक अविश्वसनीय यात्रा का आनंद ले सकते हैं.

6. गोल्डन चेरियट, इंडिया

इस ट्रेन में बैठ कर आपको ऐसा लगेगा जैसे आप सोने के सुनहरे रथ पर बैठे हैं. यह ट्रेन दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे कर्नाटक, गोवा, केरल, तमिलनाडु और पांडिचेरी को कनेक्ट करती है. यह एक एक आरामदायक ट्रेन है जिसमें आप तीन दिन या छह दिन के विकल्पों को चुन सकते हैं. यह रेल यात्रा आपके मन में ऐसी चाप छोड़ेगी जिसे आप पूरी उम्र नहीं भुला पाएंगे.

Mother’s Day Special: जब बन रही हों दूसरी मां

दूसरी शादी का मतलब सौतेली मां बनना भी है. सौतेली मां शब्द के साथ जुड़ी है, एक नकारात्मक छवि. स्त्री जितने भी प्रयास कर ले, खुद को इस छवि से मुक्त कराना उस के लिए आसान नहीं होता. नई मां को बच्चे दुश्मन के रूप में देखते हैं. ऐसा करने में उन की सगी मां (यदि जिंदा है) और मृत है तो रिश्तेदार चिनगारी छोड़ने का काम करते हैं. उसे ताने दिए जाते हैं. रहरह कर याद दिलाया जाता है कि बच्चे उस के अपने नहीं हैं. घरपरिवार के लिए लाख त्याग करने के बावजूद उसे सराहना नहीं मिलती. बच्चों के कारण पति के साथ उसे पूरी प्राइवेसी भी नहीं मिल पाती. लोगों की सहानुभूति भी सदैव बच्चों के साथ ही होती है. ऐसी महिला की मन:स्थिति कोई नहीं समझता.

बदलता ट्रैंड

चुनौतियां कितनी भी हों, आज बहुत सी लड़कियां अपनी मरजी से विवाहित पुरुषों से शादी कर रही हैं. वैसे भी आजकल कैरिअर की वजह से बड़ी उम्र में शादी करने का रिवाज चल पड़ा है. इस के अलावा दहेज या तलाक भी दूसरी शादी की वजह बन सकता है. कई बार प्रेम में पड़ कर लड़कियां शादीशुदा पुरुषों को जीवनसाथी चुनती हैं. बात जो भी हो, सौतेली मां की भूमिका अपनेआप में काफी चुनौतीपूर्ण है. इसे सफलतापूर्वक स्वीकार करने के लिए जरूरी है कुछ बातों का ध्यान रखना:

जरूर कर लें छानबीन

समस्याओं से बचने और अच्छा रिश्ता बनाने के लिए पहले से उस परिवार के बारे में छानबीन करें.

यह पता करें कि पहली पत्नी से अलगाव की वजह क्या थी. तलाक, मौत या कोई और वजह? तलाक हुआ तो क्यों और यदि मौत हुई तो कैसे?

पति से पूछें कि पुरानी पत्नी का स्वभाव कैसा था? बच्चों को किस तरह रहने की आदत है? उन्हें कौन सी बातें अच्छी लगती हैं? किन बातों से भय लगता है वगैरह.

नए घर के तौरतरीकों और रीतिरिवाजों की जानकारी पहले से लें.

बच्चों से मिलें

बच्चों के साथ समय बिताएं, उन की कमियों, समस्याओं, गुणअवगुणों को जानने का प्रयास करें. उन की मानसिक स्थिति और उन्हें सुकून देने वाली बातों को समझें. उन से दोस्ताना व्यवहार रखें ताकि शादी के बाद वे आसानी से आप को अपना लें.

मैरिज काउंसलर, कमल खुराना कहते हैं, ‘‘सौतेली मां के रूप में घर में ऐडजस्ट करना कितना कठिन होगा, यह काफी हद तक इस बात पर भी निर्भर करता है कि बच्चा कितना बड़ा है. छोटे बच्चे सिर्फ प्यारदुलार की भाषा समझते हैं और आसानी से नई मां को अपना लेते हैं, पर कुछ बड़े हो चुके बच्चे या टीनएजर्स के लिए जीवन में आए इनबदलावों को स्वीकार करना उतना आसान नहीं होता. उन का संवेदनशील मन रिश्तों के नए समीकरण समझने में वक्त लेता है. उन के दिल पर पुरानी मां की यादें पूरी तरह हावी रहती हैं. ऐसी परिस्थिति में जरूरी है कि आप बच्चे को मानसिक रूप से तैयार होने के लिए वक्त दें और उस की सहमति मिलने के बाद ही शादी करें.’’ सौतेली मां बनने के बाद आप को सम्मान मिले, इस के लिए जरूरी है कि पहले दिन से ही आप घर में अनुशासन और एकदूसरे के प्र्रति सम्मान की भावना डेवलप करें. आप बड़ों को सम्मान दें, बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करें, तभी बदले में आप वैसे ही व्यवहार की आशा कर सकती हैं.

आपसी समझ मजबूत करें :

शादी के बाद सब से महत्त्वपूर्ण है बच्चे के साथ आपसी समझ मजबूत करना. हंसीमजाक का माहौल बनाए रखें. यदि उन्होंने आप से अपनी कोई बात शेयर की है और पापा को न बताने का आग्रह किया है, तो वादा कर के निभाएं जरूर.

धैर्य जरूरी :

जिंदगी संघर्ष का नाम है. फिर आप जिस रिश्ते को निभा रही हैं, उस की तो बुनियाद ही समझौते से जुड़ी है, इसलिए अपना मनोबल कभी नीचा न होने दें. बच्चों द्वारा दिखाई जा रही उपेक्षा को व्यक्तिगततौर पर न लें.

मानसिकता समझें :

मैरिज काउंसलर कमल खुराना कहते हैं, ‘‘किसी टेढ़ी या अजीब परिस्थिति में बच्चे की प्रतिक्रिया देख कर बच्चे की सोच समझी जा सकती है. यदि वह उद्दंड या रूखा व्यवहार करता है तो जरूरी है कि आप उस के हृदय की गहराइयों में झांकें और वजह जानने का प्रयास करें, न कि बच्चे को अपशब्द कहें, आवेश में कभी भी बच्चे को डांटने या सौतेला कह कर दुत्कारने से आप दोनों के रिश्ते में गहरी दरार आ सकती है. इसलिए बच्चे के साथ व्यवहार करते वक्त उस की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखें. तभी आप उस के दिल में जगह बना सकेंगी.’’

क्या न करें

बच्चों की सगी मां बनने का प्रयास न करें और न ही उस की जगह लेने की बात सोचें. अपनी अलग जगह बनाएं.

बच्चों के सामने उन की मां के लिए बुराभला न कहें और न ईर्ष्या रखें.

अपने बच्चे हैं तो उन से सौतेले बच्चों की तुलना करने या अपने बच्चों को ज्यादा महत्त्व देने से बचें.

कभी भी अपना निर्णय बच्चों पर थोपने का प्रयत्न न करें.

यदि पति और बच्चे पुरानी मां से मिलते हैं तो आप गुस्सा न करें.

बच्चों के चक्कर में पति की उपेक्षा न करें.

यह न सोचें कि मेरा सौतेला बच्चा कभी भी मुझे प्यार नहीं करेगा. शुरुआत में संभव है वह आप से नफरत करे पर वक्त के साथ सब बदल जाता है.

भ्रांतियां और उन की असलियतें

भ्रांति : सौतेली मां बच्चे के प्रति कठोर होती है.

असलियत : जहां तक अनुशासन की बात है, सौतेली मां तुलनात्मक रूप से कम कठोर होती है. वह बच्चे के साथ उदार रवैया रखती है ताकि बच्चा उस से घुलमिल सके.

भ्रांति :  सौतेली मां हो या बाप, निभाना एक सा कठिन होता है.

असलियत : यह सच नहीं है. दरअसल सौतेली मां को सौतेले बाप से ज्यादा परेशानियां झेलनी पड़ती हैं. बच्चों के दिमाग में और समाज में भी सौतेली मां की छवि दुष्ट महिला के रूप में अंकित है. ऐसे में उसे बच्चों की तरफ से ज्यादा रूखा और विरोधपूर्ण व्यवहार सहना पड़ता है. वैसे भी औरतें रिश्तों से ज्यादा जुड़ती हैं. रिश्तेनाते व भावनाएं उन के जीवन में अहम स्थान रखती हैं. इसलिए जब यह सपना टूटता है तो उन्हें ज्यादा दुख होता है.

भ्रांति : यदि आप का सौतेला बच्चा आप को नापसंद कर रहा है तो इस का मतलब है आप कुछ गलत कर रही हैं.

असलियत : ऐसा नहीं है. दरअसल बात उलटी होती है. आप जितना नर्म बनेंगी और बच्चे का खयाल रखने का प्रयास करेंगी, बच्चा उतना ही बुरा व्यवहार कर अपना विरोध जताने लगेगा ताकि आप उस की मां का स्थान न लें. खासकर शुरुआत में ऐसा ज्यादा होता है. इसलिए खुद को दोषी नहीं समझना चाहिए.

भ्रांति : बच्चे से रिलेशन के लिए सिर्फ मां जिम्मेदार है.

असलियत : सौतेली मां व बच्चे का रिलेशन कैसा है, इस के लिए पति, रिश्तेदार और ऐक्सपार्टनर भी जिम्मेदार हैं. पति को चाहिए कि बच्चों के आगे अपनी स्थिति साफ करें. उन्हें बताएं कि अब हम सब एक परिवार के हैं और अपनी नई पत्नी को सपोर्ट करें. रिश्तेदारों को भी नई मां और बच्चे के बीच मधुर रिश्ता कायम करवाने का प्रयास करना चाहिए.

भ्रांति : सौतेली मां को अपने बजाय बच्चों की खुशी का खयाल रखना चाहिए.

असलियत : हर वक्त बच्चों की चिंता करने और उन पर ऐनर्जी खर्च करने से बेहतर है, थोड़ा अपनी खुशियों का भी खयाल रखा जाए. कुछ वक्त घर और बच्चों से दूर अपने लिए बिताएं. इस से तनाव से मुक्ति मिलेगी और जीवन में नया उजाला फैलेगा.

भ्रांति : सौतेली मां और बच्चे के रिश्ते की असलियत तुरंत पता लग जाती है.

असलियत : ऐसा नहीं है. बुरी इमेज की धारणा होने की वजह से नई मां को समायोजन करने में वक्त लग जाता है.

भ्रांति : सौतेली मां बच्चे के लिए बुरी है.

असलियत : ऐसा नहीं है, हकीकत तो यह है कि घर का सूनापन बच्चे के लिए ज्यादा बुरा है.

भ्रांति : सगी मां का स्थान लिया जा सकता है.

असलियत : नई मां बच्चे के कितने भी करीब आ जाए पर एक दीवार उन के बीच रह ही जाती है, क्योंकि बच्चा यह स्थान किसी को नहीं दे सकता और ऐसा प्रयास करना भी नहीं चाहिए.              

1 हेमामालिनी-धर्मेंद्र

बौलीवुड की ड्रीमगर्ल ने 1980 में हीमैन धर्मेंद्र से शादी की. इस से पहले धर्मेंद्र की शादी प्रकाश कौर के साथ 1954 में हो चुकी थी. उन से धर्मेंद्र के 4 बच्चे थे. पर ‘शोले’ के सैट पर भड़की प्रेम की आग में, सामाजिक बंधनों की परवाह न कर धर्मेंद्र ने पहली पत्नी के रहते हेमा से दूसरी शादी की.

2 शबाना आजमी-जावेद अख्तर

शबाना ने शायर, संगीतकार और स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख्तर को अपना जीवनसाथी चुना, जो पहले से शादीशुदा और 2 बच्चों के पिता थे. पहली पत्नी, हनी ईरानी से तलाक लेने के बाद जावेद अख्तर ने 1984 में शबाना से शादी की.

3 जयाप्रदा-श्रीकांत

जयाप्रदा ने 1986 में प्रोड्यूसर श्रीकांत नहाटा से प्रेमविवाह किया. श्रीकांत पूर्वविवाहित, 3 बच्चों के पिता थे. उन्होंने अपनी पहली पत्नी चंद्रा को तलाक नहीं दिया. जयाप्रदा ने श्रीकांत को उन की पहली पत्नी और बच्चों के साथ स्वीकार किया.

4 स्मिता पाटिल-राज बब्बर

स्मिता पाटिल ने पूर्वविवाहित राज बब्बर से शादी की थी. राज बब्बर की पहली पत्नी नादिरा जहीर थीं. उन दोनों के 2 बच्चे भी थे. पर राज बब्बर ने स्मिता से शादी करने के लिए पहली पत्नी को छोड़ दिया.

5 महिमा चौधरी-बौबी मुखर्जी

महिमा ने 2 बच्चों के पिता आर्किटैक्ट बौबी मुखर्जी से शादी की.

6 करीना कपूर-सैफ अली खान

अपनी बड़ी बहन करिश्मा के नक्शेकदम पर चलती हुई करीना कपूर भी शादीशुदा सैफ अली खान के साथ शादी की है. सैफ अपने से बड़ी उम्र की अदाकारा अमृता सिंह के साथ 13 साल की शादीशुदा जिंदगी बिता चुके हैं और उन दोनों के बच्चे भी हैं. वहीं अब करीना से उनका बेटा तैमूर और दूसरा बेटा भी हुआ है.

Mother’s Day Special: अकेलेपन और असामाजिकता के शिकार सिंगल चाइल्ड

7 साल का आर्यन घर का इकलौता बच्चा है. वह न नहीं सुन सकता. उस की हर जरूरत, हर जिद पूरी करने के लिए मातापिता दोनों में होड़ सी लगी रहती है. उसे आदत ही हो गई है कि हर बात उस की मरजी के मुताबिक हो. हालात ये हैं कि घर का इकलौता दुलारा इस उम्र में भी मातापिता की मरजी के मुताबिक नहीं, बल्कि मातापिता उस की इच्छा के अनुसार काम करने लगे हैं. कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि हद से ज्यादा लाड़प्यार और अटैंशन के साथ पले इकलौते बच्चों में कई तरह की समस्याएं जन्म लेने लगती हैं. ‘एक ही बच्चा है’ यह सोच कर पेरैंट्स उस की हर मांग पूरी करते हैं. लेकिन यह आदत आगे चल कर न केवल अभिभावकों के लिए असहनीय हो जाती है बल्कि बच्चे के पूरे व्यक्तित्व को भी प्रभावित करती है.

इसे मंहगाई की मार कहें या बढ़ती जनसंख्या के प्रति आई जागरूकता या वर्किंग मदर्स के अति महत्त्वाकांक्षी होने का नतीजा या अकेले बच्चे को पालने के बोझ से बचने का रास्ता? कारण चाहे जो भी हो, अगर हम अपने सामाजिक परिवेश और बदलते पारिवारिक रिश्तों पर नजर डालें तो एक ही बच्चा करने का फैसला समझौता सा ही लगता है. आज की आपाधापी भरी जिंदगी में ज्यादातर वर्किंग कपल्स एक ही बच्चा चाहते हैं. ये चाहत कई मानों में हमारी सामाजिकता को चुनौती देती सी लगती है. न संयुक्त परिवार और न ही सहोदर का साथ, एक बच्चे के अकेलेपन का यह भावनात्मक पहलू उस के पूरे जीवन को प्रभावित करता है.

खत्म होते रिश्तेनाते

एक बच्चे का चलन हमारी पूरी पारिवारिक संस्था पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है. अगर किसी परिवार में इकलौता बेटा या बेटी है तो उस की आने वाली पीढि़यां चाचा, ताऊ और बूआ, मौसी, मामा के रिश्ते से हमेशा के लिए अनजान रहेंगी.  समाजशास्त्री भी मानते हैं कि सिंगल चाइल्ड रखने की यह सोच आगे चल कर पूरे सामाजिक तानेबाने के लिए खतरनाक साबित होगी. पारिवारिक माहौल के बिना वे जीवन के उतारचढ़ाव को नहीं समझ पाते और बड़े होने पर अपने ही अस्तित्व से लड़ाई लड़ते हैं. बच्चों को सभ्य नागरिक बनाने में परिवार का बहुत बड़ा योगदान होता है. संयुक्त परिवारों में 3 पीढि़यों के सदस्यों के बीच बच्चों का जीवन के सामाजिक और नैतिक पक्ष से अच्छी तरह परिचय हो जाता है.

कितने ही पर्वत्योहार हैं जब अकेले बच्चे व्यस्तता से जूझते पेरैंट्स को सवालिया नजरों से देखते हैं. घर में खुशियां बांटने और मन की कहने के लिए हमउम्र भाईबहन का न होना बच्चों को भी अखरता है. इतना ही नहीं, सिंगल चाइल्ड की सोच हमारे समाज में महिलापुरुष के बिगड़ते अनुपात को भी बढ़ावा दे रही है क्योंकि आमतौर पर यह देखने में आता है कि जिन कपल्स का पहला बच्चा बेटा होता है वे दूसरा बच्चा करने की नहीं सोचते. समग्ररूप से यह सोच पूरे समाज में लैंगिक असमानता को जन्म देती  है.

शेयरिंग की आदत न रहना

आजकल महानगरों के एकल परिवारों में एक बच्चे का चलन चल पड़ा है. आमतौर पर ऐसे परिवारों में दोनों अभिभावक कामकाजी होते हैं. नतीजतन बच्चा अपना अधिकतर समय अकेले ही बिताता है. ऐसे माहौल में पलेबढ़े बच्चों में एडजस्टमैंट और शेयरिंग की सोच को पनपने का मौका ही नहीं मिलता. छोटीछोटी बातों में वे उन्मादी हो जाते हैं. अपनी हर चीज को ले कर वे इतने पजेसिव रहते हैं कि न तो किसी के साथ रह सकते हैं और न ही किसी दूसरे की मौजूदगी को सहन कर सकते हैं. वे हर हाल में जीतना चाहते हैं. यहां तक कि खिलौने और खानेपीने का सामान भी किसी के साथ बांट नहीं सकते. ऐसे बच्चे अकसर जिद्दी और शरारती बन जाते हैं.

अकेला बच्चा होने के चलते मातापिता का उन्हें पूरा अटैंशन मिलता है. वर्किंग पेरैंट्स होने के चलते अभिभावक बच्चे को समय नहीं दे पाते. उस की हर जरूरी और गैरजरूरी मांग को पूरा कर के अपने अपराधबोध को कम करने की राह ढूंढ़ते हैं. बच्चे अपने साथ होने वाले ऐसे व्यवहार को अच्छी तरह से समझते हैं जिस के चलते छोटी उम्र में ही वे अपने पेरैंट्स को इमोशनली ब्लैकमेल भी करने लगते हैं. अगर उन की जिद पूरी नहीं होती तो वे कई तरह के हथकंडे अपनाने लगते हैं.

गैजेट्स की लत

इसे समय की मांग कहें या दूसरों से पीछे छूट जाने का डर, अभिभावक अपने इकलौते बच्चों को आधुनिक तकनीक से अपडेट रखने की हर मुमकिन कोशिश करते नजर आते हैं. कामकाजी अभिभावकों को ये गैजेट्स बच्चों को व्यस्त रखने का आसान जरिया लगते हैं. यही वजह है कि अकेले बच्चों की जिंदगी में हमउम्र साथियों और किस्सेकहानी सुनाने वाले बुजुर्गों की जगह टीवी, मोबाइल और लैपटौप जैसे गैजेट्स ने ले ली है. आज के दौर में इन इकलौते बच्चों के पास समय भी है और एकांत भी. बडे़ शहरों में आ बसे कितने ही परिवार हैं जिन में कुल 3 सदस्य हैं. साथ रहने और खेलने को न किसी बड़े का मार्गदर्शन और न ही छोटे का साथ. नतीजतन, वे इन गैजेट्स का इस्तेमाल बेरोकटोक मनमुताबिक ढंग से करते रहते हैं. उन का काफी समय इन टैक्निकल गैजेट्स को एक्सैस करने में ही बीतता है. अकेले बच्चे घंटों इंटरनैट और टीवी से चिपके रहते हैं. धीरेधीरे ये गैजेट्स उन की लत बन जाते हैं और ऐसे बच्चे लोगों से घुलनेमिलने से कतराने लगते हैं.

‘एन इंटरनैशनल चाइल्ड ऐडवोकेसी और्गनाइजेशन’ की एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि इंटरनैट पर बहुत ज्यादा समय बिताने वाले बच्चों में सामाजिकता खत्म हो जाती है. नतीजतन, उन के शारीरिक और मानसिक संवेदनात्मक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. इतना ही नहीं, मनोचिकित्सकों ने तो इंटरनैट की लत को मनोदैहिक बीमारी का नाम दिया है. अकेले बच्चों को मिलने वाली मनमानी छूट कई माने में उन्हें जानेअनजाने ऐसी राह पर ले जाती है जो आखिरकार उन्हें कुंठाग्रस्त बना देती है.

समस्याएं और भी हैं

इकलौते बच्चे का व्यवहार और कार्यशैली उन बच्चों से बिलकुल अलग होती है जो अपने हमउम्र साथियों या भाईबहनों के साथ बड़े होते हैं. वर्किंग पेरैंट्स के व्यस्त रहने के कारण ऐसे बच्चे उपेक्षित और कुंठित महसूस करते हैं. कम उम्र में सारी सुखसुविधाएं मिल जाने के कारण ये जीवन की वास्तविकता और जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं समझ पाते. ऐसे बच्चे आमतौर पर आत्मकेंद्रित हो जाते हैं. अकेला रहने वाला बच्चा अपनी बातें किसी से नहीं बांट पाता. उसे अपनी भावनाएं शेयर करने की आदत ही नहीं रहती जिस के चलते ऐसे बच्चे बड़े हो कर अंतर्मुखी, चिड़चिड़े और जिद्दी बन जाते हैं और उन का स्वभाव उग्र व आक्रामक हो जाता है.

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि अकेले पलेबढ़े बच्चे सामाजिक नहीं होते और उन्हें हर समय अटैंशन व डिपैंडैंस की तलाश रहती है. संपन्न और सुविधाजनक परवरिश मिलने के कारण इकलौते बच्चे जिंदगी की हकीकत से दूर ही रहते हैं. लाड़प्यार और सुखसुविधाओं में पलने के कारण वे आलसी और गैरजिम्मेदार बन जाते हैं. छोटेछोटे काम के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर रहने की आदत हो जाती है. आत्मनिर्भरता की कमी के चलते उन के व्यक्तित्व में आत्मविश्वास की भी कमी आ जाती है. एक सर्वे में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि अकेले रहने वाले बच्चों की खानपान की आदतें भी बिगड़ जाती हैं. यही वजह है कि अकेले बच्चों में मोटापे जैसी शारीरिक व्याधियां भी घर कर जाती हैं.

Mother’s Day Special: मां भी मैं पापा भी मैं

भारत में सिंगल मदर होना आसान नहीं है. पूरी हिम्मत दिखा कर सिंगल मदर बनने पर महिलाओं को अकसर चुभते सवालों का सामना करना पड़ता है. मसलन, बच्चे के पिता अब कहां हैं? आप लोग साथ क्यों नहीं हैं? अकेले बच्चा पालना बहुत मुश्किल है, सिर पर बाप का साया होना जरूरी है. इस के अलावा स्कूल में बच्चे के दाखिले के समय या कोई सरकारीगैरसरकारी फार्म भरते समय भी पिता का ही नाम पूछा जाता है. भारत में किसी लड़की का बिना शादी किए मां बनना अपराध माना जाता है.

अकेले बच्चा पालना आसान नहीं है. मांपिता दोनों की भूमिका निभानी पड़ती है. बच्चे की सारी जिम्मेदारी अकेले मां के कंधों पर होती है. घर से ले कर बच्चे की बेहतरी का फैसला मां को ही लेना होता है. कई बार ऐसी स्थितियों से जूझतेजूझते मां ओवर स्ट्रैस हो जाती है. ऐसे में जरूरी है कि ऐसी स्थितियों को पनपने का मौका ही न दिया जाए. यह आप के लिए, आप के बच्चे की परवरिश के लिए, आप के परिवार के लिए बेहद जरूरी है. अन्यथा तनाव स्वस्थ माहौल छीन लेगा और सिंगल मदर होने पर आप को अफसोस होगा.

फाइनैंस पर कंट्रोल

कम आय तनाव का अहम कारण होती है. सिंगल पेरैंटिंग के लिए अहम है कि आप को अपनी आय की सही तरीके से बजटिंग करनी आए. कारण आप की कमाई ही पैसे का एकमात्र स्रोत है. मसलन, मकान, बिजली, गैस, पानी आदि की अदायगी, बच्चे की ट्यूशन फीस आदि. यदि बजटिंग करने के बाद आय कम पड़ती है, तो आय के स्रोत बढ़ाने की सोचें. इस के लिए निश्चित आय के अलावा पार्टटाइम जौब, घर पर किराएदार रख कर, किसी कंपनी के लिए फ्रीलांस आदि का काम करें. इस से आप अपने बच्चे को बेहतर परवरिश दे पाएंगी. तब आप को घर की बेहतरी से ले कर बच्चे की हर जरूरत को पूरा करने के लिए मन मसोसना नहीं पड़ेगा.

बातें जारी रहें

आप के घरपरिवार में किसी प्रकार का फेरबदल होने वाला है, तो इस से बच्चे को अनजान न रखें. फेरबदल पर बच्चे की प्रतिक्रिया जानें अन्यथा वह अलगथलग महसूस करेगा.

सहयोग का इस्तेमाल

सिंगल मदर हो कर बच्चे की परवरिश करना आसान नहीं है. जब सारी जिम्मेदारियां आप के कंधे पर होंगी, तो तनाव होना स्वाभाविक है. ऐसे में अपने परिवार वालों व दोस्तों से जानें कि वे आप के लिए कैसे मददगार साबित हो सकते हैं. मसलन, स्कूल बस से बच्चे को पिक करना, रोजाना बच्चे को ट्यूशन या डांस क्लास छोड़ कर आना आदि. जब नौकरी करते हुए बच्चे को कहीं छोड़ने या लाने की जिम्मेदारी आप उठा तो लेंगी, लेकिन काम का हरजा कोई भी संस्थान बरदाश्त नहीं करेगा.

बच्चे को समय दें

बच्चे के लिए आप ही मां व पिता हैं. उसे पिता के प्यार की कमी महसूस न होने दें. बच्चे को ज्यादा से ज्यादा समय दें. उस के साथ खेलें, गानें सुनें, उस की बातें सुनें. याद रहे कि अच्छी परवरिश के लिए आर्थिक मजबूती के अलावा उसे समय देना भी नितांत जरूरी है.

अपने को समय दें

सिंगल मदर होने का यह मतलब नहीं कि आप की पर्सनल लाइफ खत्म हो गई है. सप्ताह में 1 दिन सिर्फ अपने लिए जीएं. अपनी पसंदीदा किताबें पढ़ें, फिल्म देखें, दोस्तों के साथ शौपिंग पर जाएं. अपने शौक को तरजीह दें. अन्यथा एक सी लाइफ से आप उकता जाएंगी.

स्पेस जरूरी है

सिंगल मदर होने के नाते आप का सारा फोकस बच्चे पर रहता है. बच्चा छोटा हो या बड़ा आप उस की हर जरूरत पूरी करने के लिए सदा तैयार रहती हैं. प्यार व अपनत्व की भावना इतनी असीम होती है कि बच्चा दब्बू बन जाता है. साथ ही आप बच्चे के प्रति ओवर पजैसिव हो जाती हैं. ऐसे में स्पेस देना बहुत जरूरी है ताकि बच्चा आत्मनिर्भर बन पाए. निश्चित दिनचर्या: बच्चे को जानकारी दें कि किस समय खाना है, सोना है, खेलना है, पढ़ना है, रोज रात को स्कूल की यूनिफौर्म अलमारी से निकालनी है, बैग सैट करना है आदि. इस से आप को थोड़ी राहत मिलेगी और बच्चे में काम करने की आदत पड़ेगी.

जानकारी अपडेट रखें: आप डाइवोर्सी हैं या सैपरेटेड पेरैंट अथवा सिंगल पेरैंट ऐसे में आप की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि बच्चे को अच्छी आदतों के साथ नियंत्रण में रखा जाए. इस के लिए आप सोशल साइट्स, विविध सर्च इंजन्स, लाइब्रेरी या दोस्तों से गुड पेरैंटिंग की जानकारी लें ताकि आप या बच्चे पर किसी भी प्रकार का तनाव हावी न हो.

बच्चे को बच्चा समझें: कभी न कभी सिंगल पेरैंट होने पर आप अकेला महसूस करती होंगी. इस के लिए बच्चे को कतई पार्टनर का सबस्टिट्यूट न समझें. कोशिश करें कि आप अपने आराम या सहानुभूति के लिए बच्चे पर आश्रित न हों वरना बच्चा मैंटली डैवलप नहीं हो पाएगा.

पौजिटिव रहें: आप का हमेशा सकारात्मक रहना बेहद जरूरी है. नन्ही जान का मूड आप के मूड से अच्छा या खराब होता है. आप खुश रहेंगी तो बच्चा भी हंसेगा, चहकेगा. आप दुखी रहें भी तो बच्चा भी गुस्सैल होते हुए यहांवहां गुस्सा निकालेगा. यह जान लें कि अपनी भावनाओं के प्रति ईमानदार होना जरूरी है. बच्चे को समझाएं कि बुरे समय के बाद अच्छा समय आता है.

अपने प्रति लापरवाही नहीं: अकेले बच्चे की परवरिश करना आसान नहीं है. कई तरह की दिक्कतों से रोजाना रूबरू होना पड़ता. कभी समाज के ताने आप को बेचैन करते होंगे, तो कभी औफिस रहते हुए बच्चे को बसस्टौप से लाने की चिंता तनावग्रस्त करती होगी. इन चिंताओं से दूर रहें. यदि आप चिंता में रहेंगी, तो बच्चे की परवरिश पर इस का बुरा असर पड़ेगा. स्ट्रैस से बचने के लिए ऐक्सरसाइज करें, संतुलित भोजन लें. आराम करें और डाक्टरी जांच नियमित करवाएं. आप फिट होंगी, तभी बच्चे की बेहतर केयर कर पाएंगी.

बेहतर चाइल्ड केयर टेकर खोजें: आप औफिस में हैं, पीछे से बच्चे की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी आप को किसी भरोसेमंद केयर टेकर या मेड को देनी होगी ताकि आप निश्ंिचत हो कर औफिस की जिम्मेदारियां निभा सकें. पलपल आप को यह चिंता न सताए कि बच्चे ने खाना खाया, होमवर्क किया या नहीं, बच्चा बिगड़ तो नहीं रहा. दोपहर में बच्चा समय से आराम करता है या नहीं आदि. बेहतरीन चाइल्ड केयरटेकर या फुलटाइम मेड की खोज आप फैं्रड सर्कल या भरोसेमंद प्लेसमैंट एजेंसी से करें. आप वर्किंग हैं तब केयरटेकर या फुलटाइम मेड नितांत आवश्यक है. कुछ पैसे बचाने के चक्कर में बच्चे को घर पर अकेला न छोड़ें. चाइल्ड केयरटेकर या मेड चाइल्ड केयर में दक्ष होनी चाहिए.

फ्रैंड्स की मदद लें: यदि आप के दोस्त अच्छे, नेक हैं, तो उन से गुजारिश करें कि वे आप की गैरहाजिरी में बीचबीच में बच्चे की खैरखबर लें.

आप की जिम्मेदारी: याद रहे बच्चे की सिंगल मदर आप हैं. ऐसे में बच्चे की परवरिश की जिम्मेदारी आप की है. इसे हमेशा याद रखें. बच्चे की जिम्मेदारी अपने मातापिता या भाईबहन पर न थोपें. हां, आप के अच्छे व्यवहार से वे आप के बच्चे की देखरेख आप की गैरहाजिरी में जरूर कर सकते हैं. आप के बच्चे के पालनपोषण की जिम्मेदारी आप की है, उन की नहीं.

बाहरी मदद लें: लोगों से रिश्ता अच्छा रखें ताकि समय पड़ने पर वे आप की मदद करने में पीछे न रहें. मसलन आप की तबीयत खराब है और बच्चे व घर की जिम्मेदारी आप नहीं निभा पा रहीं तो ऐसे में किसी से मदद लें. इस के लिए आप को व्यवहारकुशल बनना होगा.

कतई झूठ न बोलें : आप डाइवोर्सी हैं तो यह बात अपने बच्चे को जरूर बताएं. आप के बताने से बच्चा पूरा सच जान जाएगा. बाहरी लोगों से पता चलने पर उस के नन्हे दिल पर गहरी ठेस लगेगी. उस पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकता है.

Mother’s Day Special: जब फेल हो जाएं ओवरीज

भारत में 25% महिलाएं अनियमित माहवारी या माहवारी से जुड़ी समस्याओं से जूझ रही हैं. 90% मामलों में बीमारी के कारणों का पता नहीं चलता है.

मां बनने की उम्र पर आ कर किसी युवती को यह पता चले कि वह कभी मां नहीं बन सकती है, तो उस के लिए दुनिया मानो रुक सी जाती है. मां न बन पाने के लिए कई कारण जिम्मेदार होते हैं, जिन में से एक है ओवरीज का फेल हो जाना.

आइए, जानते हैं कि किन कारणों से यह समस्या पैदा होती है और क्या है इस से निबटने का तरीका:

पीओएफ यानी प्रीमैच्योर ओवरीज फेल

पीओएफ का मतलब है 40 की उम्र से पहले ओवरीज का सामान्य काम न करना. मतलब कि ओवरीज का सामान्य रूप से ऐस्ट्रोजन हारमोन का निर्माण न करना या नियमित रूप से अंडे का रिलीज न करना.

कई बार उम्र से पहले ओवरीज के फेल होने को मेनोपौज से जोड़ दिया जाता है, लेकिन ये स्थितियां भिन्न हैं. किसी महिला की ओवरीज फेल होती हैं तो उसे अनियमित माहवारी हो सकती है और वह गर्भधारण भी कर सकती है. उम्र से पहले मेनोपौज का अर्थ है कि माहवारी का स्थाई तौर पर रुक जाना. उस के बाद गर्भवती होना नामुमकिन होता है.

कैसे पहचानें इस अनचाहे खतरे को

अगर आप को अनियमित माहवारी, बहुत ज्यादा गरमी लगना व पसीना आने की शिकायत हो तो जल्द से जल्द किसी फर्टिलिटी सैंटर में जा कर अपनी जांच करवानी चाहिए. अगर ब्लड टैस्ट में आप का फौलिकल स्टिम्यूलेटिंग हारमोन 25% से ज्यादा है, तो आप को पीओएफ का खतरा है.

पीओएफ का कारण

पिछले कुछ समय से महिलाओं में उम्र से पहले ओवरीज फेल होने के मामले बढ़े हैं. हालांकि यह समस्या आनुवंशिक है, लेकिन पर्यावरण और जीवनशैली जैसेकि धूम्रपान, शराब का सेवन, लंबी बीमारी जैसे थायराइड व ओडेटो इम्यून बीमारियां, रेडियोथेरैपी या कीमोथेरैपी होना भी इस के मुख्य कारण हैं.

इसके अलावा टीबी भी उम्र से पहले ओवरीज फेल होने का कारण हो सकती है. भारत में 30 से 40 साल की आयुवर्ग में पीएफओ के मामले 0.1% हैं, लेकिन 25% महिलाएं अनियमित माहवारी या माहवारी के कई महीने तक न होने के बाद फिर से शुरू होने जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं.

युवतियां भी हो सकती हैं शिकार

कम उम्र की लड़कियां भी इस बीमारी की चपेट में आ सकती हैं. डा. शोभा गुप्ता बताती हैं कि आज का बदलता पर्यावरण और जीवनशैली के कारण शरीर में कई बदलाव आ रहे हैं. ऐसे में उम्र से पहले ओवरीज फेल होने के कई मामले देखने को मिल रहे हैं.

इस तरह की बीमारियों से बचने के लिए बेहतर है कि समय पर परिवार बढ़ाने के बारे में सोचें. साथ ही, अगर किसी भी तरह की दिक्कत आ रही हो तो मैडिकल जांच जरूर करवाएं. इस तरह की समस्या होने पर घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इस समस्या का भी चिकित्सा के क्षेत्र में समाधान है.

आईवीएफ तकनीक

एग डोनेशन तकनीक अपना कर बच्चे की चाहत को पूरा किया जा सकता है. एग डोनेशन का मतलब है ओवम को फ्रीज कर के रखना. इस से महिलाएं 35 की उम्र के बाद भी आईवीएफ तकनीक के जरीए गर्भधारण कर सकती हैं.

इस तकनीक में महिला को 14 दिन तक हारमोन के इंजैक्शन लगाए जाते हैं. उस के बाद उस के परिपक्व ओवम को फ्रीज किया जाता है. यह तकनीक उन दंपतियों के लिए वरदान है, जो कैरियर या किसी अन्य बीमारी जैसेकि उम्र से पहले ही ओवरीज के फेल होने से ग्रस्त हैं.

डा. शोभा गुप्ता बताती हैं, ‘‘आईवीएफ विशेषज्ञा होने के नाते मैं गर्भधारण में उम्र के महत्त्व को समझती हूं. लेकिन अगर किसी दंपती को इस में देरी करनी है, तो एग डोनेशन अच्छा समाधान है.’’

टैस्ट ट्यूब बेबी

टैस्ट ट्यूब बेबी को ले कर लोगों में अनेक जिज्ञासाएं होती हैं. जबलपुर के नौदरा ब्रिज स्थित आइडियल फर्टिलिटी के संचालक डा. दीपंकर बनर्जी ने बताया कि स्त्री की फैलोपियन ट्यूब यदि बंद हो अथवा अन्य कोई कारण हो, जिस से साधारण रूप से बच्चा नहीं हो सकता हो तो स्त्री के अंडों को बाहर निकाल कर उस के पति के शुक्राणु से शरीर के बाहर भ्रूण बनाते हैं और फिर स्त्री के गर्भ में बैठा देते हैं. यदि शुक्राणु निल (नहीं) हैं, तो शुक्राशय से शुक्राणु निकाल कर टैस्ट ट्यूब बेबी कर सकते हैं या फिर बंद नली को खोल सकते हैं. इस में किसी बैड रैस्ट की जरूरत नहीं पड़ती और न ही किसी तरह के औपरेशन की.

ऐसी महिलाएं, जिन की माहवारी बंद हो चुकी हो या बंद हो रही हो एवं बच्चा नहीं हो तो उन के लिए अंडदान करवा कर गर्भधारण करवा सकते हैं. एक टैस्ट ट्यूब बेबी पर खर्च करीब 90 हजार रूपया आता है. आजकल भ्रूण व शुक्राणु बैंकिंग तथा संग्रहण की भी सुविधा उपलब्ध है. डी.एन.ए. परीक्षण द्वारा अजन्मे बच्चे की थैलेसीमिया व सिकल सैल की पूर्ण जांच की जाती है.

– डा. शोभा गुप्ता

आईवीएफ विशेषज्ञा, मदर्स लैप आईवीएफ सैंटर से बातचीत पर आधारित

Mother’s Day 2023: मां को दें सेहत का तोहफा

हर मां अपने बच्चों के लिए दिनभर भागदौड़ करती है अपना ख्याल रखे बिना. और अगर आपकी मां बीमार पड़ जाए तो ऐसा लगता है कि आपके सारे काम रूक गए हो. इसीलिए आपकी हेल्थ के साथ-साथ आपकी मां की हेल्थ भी अच्छी होना जरूरी है. तो इस मदर्स डे अपनी मां की हेल्थ का ख्याल रखने के लिए आप उन्हें हेल्थ से जुड़े कुछ तोहफे गिफ्ट कर सकते हैं जो आपके मां की हेल्थ का ख्याल रखने के साथ-साथ उन्हें फिट भी बनाएगा.

  1. सुबह वौक के लिए गिफ्ट करें वौकिंग शूज 

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अगर आपकी मां को सुबह वौक पर जाना पसंद है, लेकिन वह डेली वियर के स्लीपर पहन कर जाती हैं, तो इस मदर्स डे आप अपनी मां को शूज यानी जूते गिफ्ट कर सकते हैं.

  1. योगा मैट यानी चटाई करें गिफ्ट

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सुबह योगा करने से हमारी हेल्थ अच्छी रहती है. हर कोई चाहता है कि वह थोड़ा समय निकालकर योगा करें और अगर आपकी मम्मी भी योगा करने की शौकीन है, लेकिन वह बिना योगा मैट के योगा करती हैं. तो इस मदर्स डे आप अपनी मम्मी को योगा मैट गिफ्ट कर सकते हैं, जिसे वह सुबह शाम योगा करने के लिए इस्तेमाल कर पाएंगी.

  1. हैल्थ वौच का है जमाना

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हेल्थ वौच से आप अपने डेली रूटीन और आप कितना वौक कर रहे हैं, आपकी हार्ट बीट कितनी है, इस पर ध्यान दे सकते हैं. यह आपकी मां के लिए एक बेस्ट गिफ्ट है, जिससे आप अपनी मां की हेल्थ का ख्याल बिना सामने रहे कर सकते हैं.

  1. नैक पिलो यानी गर्दन को आराम देने के लिए तकिया करें गिफ्ट

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अगर आपकी मां को गर्दन में दर्द की प्रौब्लम रहती हैं या आपकी मां वर्किंग वुमन है तो ये आपकी मां के लिए एक बेस्ट तोहफा होगा. इसे आप डेली लाइफ के लिए अपनी मां को गिफ्ट कर सकती हैं.

  1. घुटनों की प्रौब्लम के लिए गिफ्ट करें नी-पैड

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अक्सर बुढ़ापा आने के साथ ही कई बीमारियां बौडी को घेर लेती है. जिनमें घुटनों की प्रौब्लम बहुत सुनने को मिलती हैं. इसलिए अगर आपकी मां को भी घुटनों की प्रौब्लम है तो अपनी मां को नी पैड जरूर गिफ्ट करें.

Mother’s Day Special: पिता और बच्चे के बीच का सेतु है मां

बच्चे के लिए दूध की बोतल तैयार करना, उस का नैपी बदलना, उसे गोद में लिए ही शौपिंग करना, यहां तक कि फिल्म देखना, ये सब काम ज्यादातर मां ही करती है. इसीलिए बच्चे का मां के साथ अलग ही भावनात्मक रिश्ता होता है. लेकिन पिता के साथ बच्चे का भावनात्मक रिश्ता बनाने में मां ही मदद करती है. तभी पिता और बच्चा करीब आ पाते हैं. जरमनी के नैटवर्क औफ फादर्स के चेयरमैन हांस जार्ज नेल्स भी कहते हैं कि साझा अनुभव, रीतिरिवाज, साथ बिताया सप्ताहांत और बिना मां की मौजूदगी वाली साझी अभिरुचियां पिता और बच्चे को करीब लाने का आधार बनती हैं. पिता को बच्चे से जुड़ने के लिए सब से पहले उस की मां के साथ सहयोग करना होता है. मां के साथ किया गया सहयोग पिता को बच्चे से जुड़ने में मददगार साबित होता है. यह बहुत जरूरी होता है कि जब बच्चा छोटा होता है तब मां उस का खयाल रखने में पिता पर भरोसा करे. तब पिता बच्चे के साथ मां से थोड़ा अलग तरह का रिश्ता कायम कर पाता है.

बच्चे की छोटीबड़ी बात में पिता को भी हिस्सेदार बनाती है मां:

बच्चे का हर काम यानी उसे नहलाने से ले कर खिलानेसुलाने तक का काम मां ही करती है. इसीलिए पिता बच्चे से थोड़ा दूर ही रहता है और दूर से ही उसे देख मुसकराता रहता है. लेकिन धीरेधीरे मां ही पिता को भी थोड़ी जिम्मेदारी निभाना सिखाती है जैसे यदि मां नहाने जा रही है तो बच्चे को पिता को सौंप जाती है. शुरू में पिता झिझकता और शर्म महसूस करते हुए बच्चे को पकड़ता है, लेकिन फिर आदत होने लगती है और वह थोड़ाथोड़ा वक्त बच्चे को देने लगता है. शुरू में पिता बच्चे की पौटी से नाकभौं सिकोड़ता है और तुरंत बच्चे को मां को सौंप देता है. लेकिन धीरेधीरे मां बच्चे के पिता से नैपी आदि बदलने में हैल्प लेने लगती है, तो पिता को भी इस की आदत हो जाती है. पिता भी बच्चे के प्रति अपनी भावनात्मक जिम्मेदारी समझने लगता है और इस तरह वह बच्चे से पहले से ज्यादा जुड़ जाता है. इस से पिता और बच्चे के बीच की दूरी कम होती है. पिता और बच्चे के बीच एक रिश्ता बन जाता है. बच्चा पिता के करीब रहने लगता है.

पिता पर भी भरोसा करती है:

बच्चे को ले कर मां किसी पर भी जल्दी भरोसा नहीं करती है. वह बच्चे का हर काम खुद करती है. लेकिन पिता पर उसे भरोसा होता है इसलिए वह बच्चे के छोटेबड़े कामों में पिता की मदद लेना शुरू करती है जैसे किचन में कोई काम है तो बच्चे को पिता को सौंप देती है. इस से पिता को कुछ समय बच्चे के साथ अकेले बिताने के लिए मिलता है, तो बच्चे से लगाव बढ़ता है. पिता के मन में प्यार जगाती है मां: बच्चा 9 महीने मां के गर्भ में रहता है, इसलिए दुनिया में आने के बाद मां और बच्चे का एक अलग ही भावनात्मक रिश्ता होता है. लेकिन पिता से वह रिश्ता धीरेधीरे कायम होता है. शुरूशुरू में पिता को बच्चे को गोद में लेने से भी डर लगता है. लेकिन मां पिता को बच्चा संभालना सिखाती है, उस की नन्हीनन्ही शरारतों का जिक्र पिता से करती है, बच्चे से उसी तरह तोतली जबान में बात करती है और फिर उस का खुश होता चेहरा पिता को दिखाती है.

गलतफहमी दूर करती है मां:

बच्चा बड़ा हो या छोटा, कई बार पिता और बच्चे के बीच किन्हीं बातों को ले कर तनाव हो जाता है, क्योंकि अकसर पिता थोड़ा कठोर और कड़क स्वभाव का होता है. ऐसा होने की एक वजह यह भी है कि वह मां की तरह अपना प्रेम प्रदर्शित नहीं कर पाता. ऐसे में पिता के द्वारा किसी चीज के लिए मना कर देने पर बच्चे को लगता है कि पिता उस से प्यार नहीं करते. तब मां ही बच्चे को प्यार से समझाती है कि पिता के ऐसा करने की क्या वजह थी. वह बच्चे को यह भी समझाती है कि पिता उस से बहुत प्यार करते हैं. दूरी बढ़ जाए तो करीब लाती है मां: कई बार बड़े होते बच्चे और पिता के बीच किसी बात को ले कर अनबन हो जाए तो बच्चा और पिता दोनों ही एकदूसरे से मुंह बना लेते हैं. टीनऐजर बच्चे के साथ तो यह समस्या कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है. ऐसे में मां ही समझदारी दिखाते हुए दोनों का पौइंट औफ व्यू एकदूसरे के सामने रखती है और उन्हें समझाती है.

तब एकदूसरे से बात न करते हुए भी वे एकदूसरे का नजरिया समझ जाते हैं. बच्चे को यह भी पता लग जाता है कि पिता गलत नहीं हैं. वे बड़े हैं इसलिए उसे टोकते हैं और पिता भी जान जाता है कि बच्चे की उम्र ही ऐसी है. इसलिए नाराज हो कर मुंह फुलाने के बजाय बातचीत के जरीए समस्या का हल निकाला जाता है और इस का सारा श्रेय मां को ही जाता है. 

बच्चे की नजरों में पिता को रोल मौडल बनाती है मां:

पिता से बच्चे को मां ही जोड़ती है. वह बताती है कि पिता में क्या खूबियां हैं और कैसे उन्होंने अपने परिवार को जोड़ कर रखा है. वह पिता के बचपन के, उन की पढ़ाईलिखाई के, उन के खेलकूद आदि के बारे में बच्चे को बताती है. तब बच्चा पिता से उन की खूबियों और सफलता के बारे में प्रश्न करने लगता है और इस तरह पिता और बच्चे के बीच अच्छे मुद्दों को ले कर संवाद की शुरुआत होती है और वह पिता को पहले से भी ज्यादा सम्मान देने लगता है. पिता उस के रोल मौडल बन जाते हैं. उसे लगता है वह आज जो कुछ भी है पिता की वजह से ही है और उसे अपने पिता जैसा ही बनना है. 

Mother’s Day Special: मां बनने के लिए इनसे बचना है जरूरी

आजकल सैक्स के मामले में बढ़ती आजादी और 1 से ज्यादा पार्टनर की वजह से कई यौन संबंधी बीमारियां होने का डर रहता है. यौन परेशानियों को जल्द से जल्द पहचान कर डाक्टर के पास जाना आवश्यक हो जाता है. ऐसा न करने पर बांझपन जैसी बड़ी परेशानी का भी सामना करना पड़ सकता है.

पेल्विक इनफ्लैमेटरी डिजीज (पीआईडी)

यह ज्यादातर असुरक्षित संबंधों के कारण फैलने वाली बीमारी है. यह मैट्रो शहरों में चुपकेचुपके महिलाओं की इन्फर्टिलिटी का एक बड़ा कारण बन रही है. इस की चपेट में 15 से 24 साल तक की लड़कियां ज्यादा आ रही हैं. पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में हालांकि अभी इस का प्रसार कम है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस पर लगाम नहीं लगाई तो यह आने वाले समय में बड़ी दिक्कत में तब्दील हो सकती है. इस का असर नई पीढ़ी के मां बनने पर पड़ सकता है.

डा. अनुभा सिंह का कहना है कि यह एक हारमोनल डिसऔर्डर है. इस की सब से बड़ी पहचान है कि इस से अचानक वजन बढ़ने लगता है. माहवारी अनियमित हो जाती है. मुंहासों की समस्या और गंजापन भी हो सकता है. बच्चे पैदा करने की उम्र में लगभग 1 से 10 महिलाओं में यह समस्या देखने को मिलती है. फैलोपियन ट्यूब्स और प्रजनन से जुड़े अन्य अंगों में भी इस से सूजन आ सकती है. समय पर इलाज न कराने पर इस का नतीजा इनफर्टिलिटी के रूप में सामने आ सकता है.

यह बीमारी क्लैमाइडिया ट्रैकोमाइटिस नाम के बैक्टीरिया के कारण होती है. बड़े शहरों में सैक्स के मामलों में बढ़ती आजादी और 1 से ज्यादा पार्टनर इस के फैलने की सब से बड़ी वजह हैं. इस के अलावा साफसफाई का ध्यान न रखने, शराब या स्मोकिंग के कारण इम्यून सिस्टम के कमजोर पड़ने से भी इस का बैक्टीरिया महिलाओं को अपना निशाना बना सकता है.

मैट्रो शहरों में इस की चपेट में आने वाली महिलाओं का प्रतिशत 3 से 10 के बीच है. यह महिलाओं के सोशल स्टेटस और सैक्सुअल बिहेवियर पर काफी निर्भर करता है. 25 साल से कम उम्र की लड़कियों के इस की चपेट में आसानी से आने का कारण यह है कि उन की बच्चेदानी का मुंह इस उम्र तक सैक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज का सामना करने के लिए तैयार नहीं होता है. इस के कारण वे ऐसे रोगों की शिकार बन जाती हैं. यही बीमारियां बाद में पीआईडी की बड़ी वजह बनती हैं.

लक्षणों पर रखें नजर

पीआईडी की चपेट में आने पर वैजाइनल इरिटेशन हो सकती है. व्हाइट डिस्चार्ज की शिकायत हो सकती है. पेडू के निचले हिस्से में दर्द हो सकता है, बुखार आ सकता है व उलटियां भी हो सकती हैं. साथ ही माहवारी से पहले और बाद में शारीरिक संबंध कायम करते समय ब्लीडिंग हो सकती है. इस के कारण पेशाब करते समय जलन भी हो सकती है. कई महिलाओं में ऐसा कोई लक्षण नहीं भी हो सकता है.

कैसे पाएं छुटकारा

डा. अनुभा सिंह का कहना है कि पीआईडी के ज्यादा मामले मैट्रो शहरों में आते हैं. इस बीमारी की एक बड़ी वजह असुरक्षित यौन संबंध है. नई पीढ़ी को इस बात पर जागरूक करने की जरूरत है. इस बीमारी के प्रति लापरवाही आप को मां बनने के सुख से वंचित कर सकती है.

पीआईडी से जुड़े लक्षण महसूस होने पर डाक्टर से संपर्क करें. दवा के साथ ही नियमित चैकअप से इस का आसानी से इलाज संभव है. लापरवाही करने पर यह बीमारी पूरी प्रजनन प्रणाली को अपनी चपेट में ले सकती है. कुछ अन्य यौन बीमारियां भी हैं जो एकसमान घातक हैं जैसेकि:

ट्राइकोमोनिएसिस

अगर किसी महिला की योनि से लगातार 6 महीनों से स्राव होने के साथसाथ उस में खुजली होती है, पति के साथ संबंध बनाते वक्त दर्द होता है, पेशाब करते वक्त परेशानी होती है, तब तुरंत डाक्टर से संपर्क करें. यह ट्राइकोमोनिएसिस बीमारी हो सकती है. कई बार महिलाओं में प्रसव, मासिकधर्म व गर्भपात के समय भी संक्रमण होने का डर होता है.

अशिक्षा, गरीबी, शर्म के कारणों से अकसर महिलाएं प्रजनन अंगों के रोगों का उपचार कराने में हिचकिचाती हैं. प्रजनन अंगों के संक्रमण से एड्स जैसा खतरनाक रोग भी हो सकता है. कौपर टी लगवाने से भी प्रजनन अंगों में रोग के पनपने की आशंका रहती है. क्लैमाइडिया रोग ट्रैकोमाइटिस नामक जीवाणु से हो जाता है. यह रोग मुखमैथुन और गुदामैथुन से जल्दी फैलता है. कई बार इस बीमारी से संक्रमण गर्भाशय से होते हुए फैलोपियन ट्यूब्स तक फैल जाता है. समय पर उपचार नहीं होने पर एचआईवी होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

गोनोरिया

यह रोग महिलाओं में सूजाक, निसेरिया नामक जीवाणु से होता है. यह स्त्री के प्रजनन मार्ग के गीले क्षेत्र में आसानी से बड़ी तेजी से बढ़ता है. इस के जीवाणु मुंह, गले, आंखों में भी फैल जाते हैं. इस बीमारी में यौनस्राव में बदलाव होता है. पीले रंग का बदबूदार स्राव निकलता है. कई बार योनि से खून भी निकलता है.

गर्भवती महिला के लिए यह बहुत घातक रोग होता है. प्रसव के दौरान बच्चा जन्म नली से गुजरता है. ऐसे में मां के इस बीमारी से ग्रस्त होने पर बच्चा अंधा भी हो सकता है.

हर्पीज यह रोग हर्पीज सिंपलैक्स से ग्रस्त व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनाने से होता है. इस में 2 प्रकार के वायरस होते हैं. कई बार इस रोग से ग्रस्त स्त्रीपुरुष को मालूम ही नहीं पड़ता कि उन्हें यह रोग भी है. यौन अंगों व गुदा क्षेत्र में खुजली, पानी भरे छोटेछोटे दाने, सिरदर्द, पीठदर्द, बारबार फ्लू होना आदि इस के लक्षण होते हैं.

सैप्सिस

यह रोग ट्रेपोनेमा पल्लिडम नामक जीवाणु से पैदा होता है. योनिमुख, योनि, गुदाद्वार में बिना खुजली के खरोंचें हो जाती हैं. महिलाओं को तो पता ही नहीं चलता है. पुरुषों में पेशाब करते वक्त जलन, खुजली, लिंग पर घाव आदि समस्याएं हो जाती हैं.

हनीमून सिस्टाइटिस

नवविवाहिताओं में यूटीआई अति सामान्य है. इसे हनीमून सिस्टाइटिस भी कहते हैं. यह महिलाओं में मूत्रछिद्र, योनिद्वार और मलद्वार के पास स्थित होता है. यहां से जीवाणु आसानी से मूत्रमार्ग में पहुंच कर संक्रमण कर सकते हैं. करीब 75% महिलाओं में यूटीआई आंतों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण होता है. इस के अतिरिक्त अनेक अन्य प्रजाति के जीवाणु भी यूटीआई उत्पन्न कर सकते हैं.

करीब 40% महिलाएं इस से जीवन में कभी न कभी ग्रस्त हो जाती हैं. अगर बात लक्षणों की करें तो यूटीआई होने पर बारबार पेशाब आता है, पर पेशाब कुछ बूंद ही होता है. मूत्र से दुर्गंध आती है, मूत्र का रंग धुंधला हो सकता है. कभीकभी खून मिलने के कारण पेशाब का रंग गुलाबी, लाल या भूरा हो सकता है.

पति या पत्नी दोनों में से किसी को भी संक्रमण होने पर यौन संबंध बनाए जाते हैं तो यौन संबंधी परेशानी बढ़ सकती है. यदि उपचार नहीं कराया जाता है तो शरीर के अंगों में दर्द हो सकता है, बुखार हो सकता है. कुछ स्थितियों में संक्रमण मूत्राशय से ऊपर पहुंच कर संक्रमण कर सकता है.

प्रजनन अंग साफ व सुरक्षित रहें, इस के लिए जरूरी है कि आप अपने प्रजनन अंगों के बारे में जागरूक हों. उन में कोई भी तकलीफ हो तो तुरंत डाक्टर से सलाह लें.

-अनुभा सिंह

गायनोकोलौजिस्ट व आईवीएफ ऐक्सपर्ट, शांता आईवीएफ सैंटर से बातचीत पर आधारित

सुष्मिता सेन से लेकर नीना गुप्ता तक, सिंगल मदर की मिसाल हैं ये 10 बॉलीवुड एक्ट्रेस

मां, एक खूबसूरत एहसास जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. मां के बिना हम जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकते. इस रिश्ते का कोई दूसरा पर्याय नहीं. बेहद खास होता है ये रिश्ता. इसमें एक ऐसा एहसास, अपनापन और मिठास है, जो इसे औरों से अलग करता है. चाहे कुछ भी हो कैसी भी परिस्थिति हो वह मां ही है जो हमेशा हमारे साथ खड़ी होती है- हमारे सुख में, हमारे दुख में.

कुछ मामलों में जीवन में कई उतार चढ़ावों का अकेले सामना करने के बाद भी वह कमजोर नहीं बल्कि मजबूती से अपनी संतान के लिएखड़ी होती है. दुनिया के लिए वह कुछ भी हो लेकिन अपने बच्चों के लिए वह हमेशा दुनिया से लड़ने को तैयार होती है.

यह खूबसूरत एहसास, चुनौतियां या परिस्थितियां सिर्फ आम आदमी की जिंदगी तक ही सिमित नहीं है. हमारे सितारे भी इससे अछुते नहीं हैं. बॉलीवुड में ऐसी कई अभिनेत्रियां हैं जो सिंगल मदर हैं.

बॉलीवुड की ये अभिनेत्रियां सुपरस्टार होने के साथ ही सुपर मॉम भी साबित हुईं हैं. किसी ने खुद ही सिंगल मदर होने के एहसास को पाने की कोशिश की तो किसी को परस्थितियों से समझौता करना पड़ा. वजह कोई भी हो मगर इस एहसास में उन्होंने खुद के साथ अपने बच्चों को भी तराशा है.

तो आइए आज हम बॉलीवुड की कुछ ऐसी ही सिंगल मदर से आपको रूबरू कराते हैं.

1 सुष्मिता सेन

सिंगल मदर की लिस्ट में सुष्मिता सेन का नाम सबसे उपर है. मिस यूनिवर्स होने के साथ साथ वह एक जिम्मेदार मां भी हैं. सुष्मिता दो बच्चों की मां हैं. साल 2000 में उन्होंने अपनी पहली बच्ची रिनी और 2010 में दूसरी बेटी (अलीशा) को गोद लिया. सुष्मिता कई सिंगल मदर्स के लिए प्रेरणा हैं.

 

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2 नीना गुप्ता

बॉलीवुड में नीना गुप्ता की पहचान अभिनय के अलावा एक सिंगल मदर के रूप में भी है. नीना के लिए बेटी मसाबा को पालना कोई आसान काम नहीं था. नीना ने वेस्टंडीज के क्रिकेटर विव रिचर्ड के रिश्ते के दौरान माशाबा को जन्म दिया. उन्होंने विव से शादी नहीं की थी. हमारे समाज में बिन ब्याही मां के लिए बच्चे का पालन पोषण करना कितना मुश्किल होता है यह हम सब जानते हैं. लेकिन नीना ने इसे कर दिखाया और बेटी की अच्छी परवरिश कर उन्हें एक सफल फैशन डिजाइनर बनाया.

 

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3 रवीना टंडन

रवीना टंडन अपने दौर की सफल अभिनेत्री हैं. महज 21 साल की उम्र में उन्होंने दो बच्चियों को गोद लिया. 1994 में उन्होंने 11 साल की पूजा और 8 साल की छाया को गोद लिया था. रवीना ने इन बच्चों के देख भाल खुद की ओर उनको आगे बढ़ाया. इसके बाद 2004 में उन्होंने शादी कर ली. शादी के बाद रवीना दो और बच्चों की मां बनीं. आज रवीना के 4 बच्चे हैं. चारों को अच्छी परवरिश देने के लिए उन्होंने फिल्मों से ब्रेक ले लिया था. हाल ही में उन्होंने फिल्म मातृ से बॉलीवुड में वापसी की है.

4 करिश्मा कपूर

करिश्मा कपूर अपने समय की बेहतरीन अभिनेत्र‍ियों में शामिल हैं. बॉलीवुड अभिनेत्री करिश्मा कपूर ने व्यवसायी संजय कपूर से शादी की थी लेकिन बाद में दोनों का डिवॉर्स हो गया. अब करिश्मा दो बच्चों समायरा और कियान की सिंगल मदर हैं और उनकी परवरिश कर रही हैं.

5 अमृता सिंह

सैफ अली खान की एक्स वाइफ अमृता सिंह के दो बच्चे सारा और इब्राहिम हैं. सैफ-अमृता का डिवॉर्स हो चुका है और अमृता अब सिंगल मदर हैं. इसके लिए उन्होंने फिल्मों में काम से भी ब्रेक ले लिया. इन दिनों सारा बॉलीवुड में डेब्यू करने वाली हैं.

6 कोंकणा सेन शर्मा

बॉलीवुड में एक सिंगल मदर के रूप में कोंकणा काफी चर्चाओं में रहीं. कोंकणा ने रणवीर शौरी से शादी करने के बाद 2011 में बेटे हरुन को जन्म दिया. इसके बाद आपसी मनमुटाव के कारण दोनों का तलाक हो गया. तब से कोंकणा अकले ही अपने बच्चे की परवरिश कर रही हैं.

7 बबीता

करिश्मा और करीना कपूर की मां बबीता कपूर ने भी अपनी दोनों बेटियों को अकेले ही पाला है. इसके लिए उन्होंने अपने काम से भी दूरी बनाई और बेटियों को अच्छी परवरिश दी.

8 पूजा बेदी

पूजा बेदी दो बच्चों आलिया और उमर की सिंगल मदर हैं. अपने बिजनेसमैन पति फरहान इब्राहिम से तलाक के बाद दोनों बच्चों की परवरिश पूजा ने अकेले की है.

9 सारिका

80 के दशक में सारिका पहले से शादीशुदा अभिनेता कमल हसन के साथ रिलेशनशिप में थीं. सारिका ने श्रुति हसन को जन्म दिया जिसके बाद कमल ने अपनी पत्नी से तलाक लेने के बाद सारिका से शादी की. बाद में सारिका और कमल भी साल 2004 में अलग हो गएं. उसके बाद से सारिका सिंगल मदर हैं.

10 पूनम ढिल्लन

80 के दशक की बेहतरीन अभिनेत्री और पूर्व मिस इंडिया होने के साथ ही पूनम एक सफल मां भी हैं. फिल्म निर्माता अनिल ठाकरिया से शादी के बाद उन्होंने दो बच्चों को जन्म दिया. थोड़े समय बाद दोनों का तलाक हो गया. पति से रिश्तों में दरार आने के बाद से उन्होंने अकेले ही अपने बच्चों की परवरिश की. एक बिजनेस वुमेन होने के साथ ही पूनम फिल्म और टेलीविजन से भी जुड़ी हैं.

जीवन में उतार-चढ़ाव आम बात है. यूं कहें कि उतार-चढ़ाव ही जीवन है. जिंदगी के उतार-चढ़ाव के बीच इन अभिनेत्रियों ने मां और बच्चे के बीच का रिश्ता बखूबी निभाया और निभा रही हैं.

2018 Movie Review: मानवता की मिसाल को पेश करती केरला की असली कहानी

  • रेटिंगः पांच में से चार स्टार
  • निर्माताः वेणु कुन्नापिली,सी के पद्मकुमार और एंटो जोसेफ
  • लेखक: जूड एंथनी जोसेफ व अखिल पी धर्मजन
  • निर्देशकः जूड एंथनी जोसेफ
  • कलाकारः टोविनो थॉमस, इंद्रन्स, कुंचाको बोबन, अपर्णा बालमुरली, विनीत श्रीनिवासन, आसिफ अली, लाल, नारायण, तन्वी राम, शशिवाड़ा, कलैयारसन, अजु वर्गीज
  • अवधिः दो घंटे 35 मिनट
  • प्रदर्शन की तारीख: 5 मई 2023,सिनेमाघरों
  • भाषा: मलयालम, अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ

2018 में केरला राज्य भीशण बाढ़ के चलते तबाही का षिकार हुआ था.  ऐसी बाढ़ केरला वासियों ने कभी नही देखी थी. लेकिन केरल के हर नागरिक,धर्म जाति भुलाकर इस बाढ़ मंे एक दूसरे से हाथ मिलाकर मानवता की जो मिसाल पेश की थी,उसी मिसाल ,सच व केरल वासियों की सच्ची भावना को फिल्मकार जूड एंथनी जोसेफ फिल्म ‘‘2018ः एवरी वन इज हीरो’’ लेकर आए हैं,जो कि 5 मई को ही फिल्म ‘‘द केरला स्टोरी’’ के साथ ही प्रदर्षित हुई है.

फिल्म ‘‘2018ः एवरीवन इज हीरो’ मूलतः मलयालम भाषा में है,पर अंग्रेजी में सब टाइटल्स हैं. इस छोटे बजट की फिल्म ने चार दिन में ही सिर्फ केरला में तेरह करोड़ रूपए कमा कर एक इतिहास रच दिया है. इस फिल्म को देखने के बाद हर दर्षक इस फिल्म को ‘‘केरला की असली कहानी’’ बताते हुए इस हिंदी सहित दूसरी भाषाओं में डब कर प्रदर्षित करने की मांग करता नजर आ रहा है.  वैसे हकीकत यह है कि 2018 की भयानक त्रासदी में केरला राजय में हजारों मकान ध्वस्त हो गए थे,483 लोग मौत के मुंॅह में समा गए थे,पर यह त्रासदी केवल छोटी सी खबर मात्र बनकर रह गयी थी.  इस फिल्म को देखते हुए हमें मुंबई की 26 जुलाई 2005 की उस मूसलाधार की याद दिला देती है,जिसने दो दिनों के लिए शहर को पंगु बना दिया था. इन दो दिनों में हर मुंबईकर ने प्रकृति की क्रूर शक्ति का सामना किया था. तब सभी की भावनात्मक जुड़ाव उजागर हुई थी. लेखक-निर्देशक जूड एंथनी जोसेफ की ‘2018ः एवरी वन इज हीरो’ हमें केरल राज्य में अचानक आई बाढ़ के प्रति संवेदनशील बनाती है.

कहानीः

यह कहानी है केरला राज्य में 2018 में मूसलाधार बारिश के तौर पर आयी प्राकृतिक आपदा के साथ ही भारतीय सेना के असफल कैडेट अनूप (टोविनो थॉमस) के निस्वार्थ कृत्यों व वीरता की. फिल्म की कहानी किरदारो के परिचय से षुरू होती है,जिन्हे अहसास ही नही है कि उन पर कोई बहुत बड़ी आपत्ति आने वाली है. हम देखते है कि अनूप ‘भगवान के अपने देश’ से बाहर निकलने और संयुक्त अरब अमीरात में जाकर बसने की लालसा रखता है. सेना में असफल होने के बावजूद अनूप अपने गांव में बच्चों के बीच सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है. जबकि गांव के बुजुर्ग उसे पसंद कम करते हैं. कुछ दबंग मलयाली लड़के हिंदी फिल्म ‘बार्डर’ के गीत ‘‘संदेशे आते हैं. . ’उसे देखकर गाते हैं. लेकिन बाढ़ की विपदा के वक्त वही अनूप लोगों की जिंदगी बचाने के लिए अपनी जिंदगी की बाजी लगा देता है.  केरला पर बाढ़ की आपदा आने पर राज्य के गृह सचिव शाजी पुन्नूस ( कांचाको बोबन) क्षति को सीमित करने और बचाव के प्रयासों को सुविधाजनक बनाने के लिए अथक प्रयास करते हैं. जबकि उनकी गर्भवती पत्नी (शिवदा)और बेटी स्नेहा( देवानंद )अनूप की मदद से भारतीय वायु सेना सही वक्त पर अस्पताल पहुॅचाने में कामयाब होती है.  मछुआरे के बेटे निक्सन (आसिफ अली ) इस बात से आहत हैं कि कैसे उनकी गर्ल फ्रेंड के पिता ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया, जिससे उन्हें और उनके मछुआरे परिवार को शर्मिंदगी उठानी पड़ी.  अपने पिता के साथ झगड़ा होने पर वह उस क्षेत्र को छोड़ देता है,लेकिन वह संकट की घड़ी में वहां आकर ख्ुाद मछुआरा बन हर इंसान को सुरक्षित जगह पहुॅचाने,उनकी जिंदगी बचाने में लग जाता है.  फिल्म में तमिलनाड़ु के ट्क चलाने वाले सेतुपति(कलैया सरन ) को केरला से लगाव नही है. उसके इरादे खराब हैं. वह अपने ट्क में बारूद का सामान लेकर जा रहा होता है. बारिश में सारे साधन बंद हो जाने पर वह अनिच्छा से रमेशन (विनीत श्रीनिवासन )को अपने ट्क में यात्रा करने देता है. रमेशन व उसके मित्र किसी तरह अपनी शादी बचाने की उम्मीद में दुबई से वापस आया है.  संकट की घड़ी और दो अच्छे लोगों की कंपनी सेतुपति का दिल बदल देती है और वह सारा बारूद समुद्र में फेंक देता है.  राहत केंद्रों-अस्पतालों, स्कूलों, पूजा स्थलों में फंसी महिलाओं ,बच्चों व बूढ़ों की मदद करने में महिलाएं भी पीछे नही है.  केरला राज्य मे ंनई भर्ती हुई स्कूल षिक्षक मंजू (तन्वी राम ) भी अनूप की तरह दयालु है. स्कूल में पहले दिन ही वह बच्चों का विश्वास जीतने के लिए उनके लिए टॉफी लेकर आती है.

लेखन व निर्देशनः

एक कसी हुई पटकथा, सत्यपरक चरित्र चित्रण,कलाकारों का तार्किक अभिनय, बेहतरीन तकनीकीटीम के चलते फिल्म मनोरंजक होने के साथ ही देखने योग्य व सोचने पर मजबूर करती है. इस तरह के विशय पर पूरी संवेदनषीलता व मानवीय धरातल पर यथार्थ के साथ फिल्म को दर्षकों तक पहुॅचाना जूड एंथनी जोसेफ जैसे बिरले निर्देशक ही कर सकते हैं.  फिल्मकार जोसेफ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्हेाने विपदा के वक्त लोगों के संघर्षों को चित्रित करने के साथ ही जीवित बचे लोगों के प्रति सहानुभूति भी पैदा करते हैं. फिल्मकार ने समाज में मौजूद हर किरदार को बारीकी से पकड़कर अपनी फिल्म में पेश किया है. फिर चाहे वह नेकदिल अनूप हो या क्षुद्र और अहंकारी इंसान हो अथवा अपने परिवार के सदस्यों सहित कुछ लोगों के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखने वाले इंसान हो.  फिल्मकार जोसेफ इमानदारी के साथ यथार्थ के धरातल पर प्राकृतिक आपदा की इस कहानी को पेश करते हुए प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने में मानवीय भूमिका का जिक्र करने से परहेज नही करते हैं.  अपनी ‘ओहम षंाथी ओषान’’, ‘‘ओटी मुथासी गढा’ और ‘‘सारास’ जैसी सफल रोमांटिक हास्य फिल्मों की वजह से जूड एंथेनी जोसेफ की जो पहचान है,उसे देखते हुए उनसे किसी ने भी इस तरह की संवेदनषील,भावनात्मक,रोंगटे खड़े कर देने वाले दृष्यों वाली फिल्म की उम्मीद नही की थीं. पूरी फिल्म के दौरान वह लगभग पांच साल पहले हुई त्रासदी पर दोबारा गौर करने पर किसी को भी असहज या व्यथित महसूस नही कराते.  इतना ही नहीं वह पूरी फिल्म में राजनीतिक टिप्पणी करने से भी बचे हैं. जबकि हमने पढ़ा था कि बाढ़ की विनाशलीला के वक्त जिन मछुआरों ने मलियालियों की मदद की थी,बाद में जब उन्हे मदद की जरुरत पड़ी,तो उनके साथ दुब्र्यवहार किया गया.  जी हाॅ! केरला में मछुआरों की अपनी जिंदगी व महत्व है. फिल्म मछुआरों को महत्व देने से नही बचती,जिन्होने बाढ़ की विपदा के वक्त केरल की अपनी सेना की तरह काम किया था. वह परोपकारी बचाव कार्यों का नेतृत्व करते हुए कई मलयाली लोगों को बचा रहे थे. यहां तक कि जब सरकार के प्रयास विफल हो गए,तब मछुआरे आगे बढ़कर निःस्वार्थ भाव से लोगों की जिंदगी बचाते हैं.  फिल्म में एक दृष्य है जब दबंग लड़के अनूप को देखकर हिंदी फिल्म ‘बार्डर’ के गीत ‘‘संदेशे आते हैं. . ’उसे देखकर गाते हैं. यह दृष्य मणिरत्नम,ए आर रहमान सहित उन लोगों के मंुॅह पर तमाचा है,जो हिंदी भाषा के विरोध का राग अलापते रहते हैं.  अनूप के किरदार के माध्यम से फिल्मकार ने इस बात को रेखंाकित किया हैै कि भारतीय सशस्त्र बलों का सम्मान देश भर का हर नागरिक करता है और आर्मी का प्रषिक्षण कभी जाया नही जाता.  फिल्मकार ने इस बात को भी बड़ी खूबसूरती से चित्रित किया है कि आम समय में हम सभी किस तरह एक ध्रुवीकृत दुनिया में रहते हैं, लेकिन आपदा के समय में सभी सच्ची मानवीय भावना का परिचय देते हैं. विपदा के वक्त लोगों का जीवन बचाने के लिए हर इंसान व्यक्तिगत व सामाजिक पहचान से परे हो जाता है. लोग किस तरह से अपने हर आपसी मतभेद को भुलाकर एक दूसरे की मदद करने लगते हैं.  फिल्मकार जूड एंथनी जोसेफ राजनीति से परे एक दृष्टिकोण पेश करते हुए 2018 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और केंद्र सरकार द्वारा की गयी मदद व राहत कार्यों का उल्लेख करने से पीछे नही रहते. फिल्मकार ने विशेश समुदाय पर आत्म- आत्मनिरीक्षण करने का दायित्व डाला है. फिल्मकार ने जहां दक्षिणपंथियों को सूक्ष्म संदेश दिया है,वहीं वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष दलों की चापलूसी नहीं की है. फिल्म कुछ नौकरशाही पर सवाल भी उठाती है. फिल्म के पात्र राज्य के भीतर विभिन्न संस्कृतियों, वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं. फिल्म में एक दृष्य है जहां पादरी चर्च के दरवाजे पीड़ितों के लिए नहीं खोलना चाहता,पर अंततः वह ऐसा करता है. इस दृष्य के माध्यम से फिल्मकार ने यह संदेश दिया हे कि विनम्रता के साथ किसी का भी हृदय परिवर्तन किया जा सकता है.  फिल्म हर इंसान को हीरो बताते हुए त्रासदियाँ,नुकसान,आपदा की भयावहता और अंततः यथार्थवाद का एहसास कराने में सफल रहती हैं. बाढ़ की विपदा का चित्रण करते हुए फिल्मकार अनूप व मंजू के रिश्ते को ठीक से चित्रित नही कर पाए.  फिल्मकार की कमजोर कड़ी यह है कि केरल में मूसलाधार बारिश व बिजली गिरने के दौरान मच रही तबाही के बावजूद मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह सक्रिय हैं. षायद फिल्मकार ने लोगों की जिंदगी बचाने के एक साधन के तौर मोबाइल नेटवर्क को बाधित नही किया. इसी तरह फिल्मकार की कमजोर यह है कि उन्होने अपनी फिल्म में महिलाओं को कम महत्व दिया है. जबकि हमने पढ़ा है कि उस वक्त वहां कि हजारों महिलाओं ने भी वीरता व दयालुता के उदाहरा पेश किए थे. स्कूल षिक्षक मंजू के किरदार को ठीक से विकसित नहीं किया गया.  तूफानी मौसम में फंसे दो पोलिश पर्यटकों की उपस्थिति और स्थानीय लोगों द्वारा गर्मजोशी से दनका स्वागत किए जाने के दृष्यों से फिल्मकार ने केरल पर्यटन को बढ़ावा देने का काम किया है.  कैमरामैन अखिल जॉर्ज की तारीफ करनी पड़ेगी,जिन्होने बारिश,पीड़ितो व जमीन के नीचे दब गएउ माकन वगेरह के दृष्यों को अपनी कलात्मक खूबी से परदे पर उतारने के साथ ही इंसानी भावनाओं को भी कैमरे में कैद किया है.  एडीटर चमन चाको ने भी सही काम किया है. नोबिन पॉल का संगीत और विष्णु गोविंद की ऑडियोग्राफी भी शानदार माहौल बनाने में योगदान करती है.

अभिनयः

यूं तो फिल्म के सभी कलाकारों ने असाधारण अभिनय कौशल का प्रदर्शन किया हे. लेकिन सेना में असफल और अपने देश को छोड़कर संयुक्त अरब अमीरात में बसने की लालसा रखने वाला युवक बाढ़ की विपदा के वक्त हर समुदाय के लोगों की जिंदगी बचाते हुए हीरो बन जाने वाले अनूप के किरदार में टोविनो थामस का अभिनय षानदार है. वैसे भी 2012 में अभिनय कैरियर की षुरूआत करने वाले टोविनो थामस अब तक ‘ए बीसीडी’,‘चार्ली’,‘मिनाल मुरली’सहित तकरीबन 45 फिल्मों में अभिनय कर अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं.  टीवी रिपोर्टर एन मारिया के किरदार में अपर्णा बालमुरली भी लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचती हैं. छोटे किरदार में तन्वी राम अपनी उपस्थिति दर्ज कराने मे सफल रहती हैं. निकसन के किरदार में आसिफ अली भी अपने अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे हैं.

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