Mother’s Day Special: उसका निर्णय- क्या थी मां के फैसले की वजह

‘‘मैंहोस्टल नहीं जाऊंगी,’’ कह कर पैर पटकती किश्ती अपने कमरे के अंदर घुस गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. अचला घबरा कर बेटी को मनाने दौड़ीं. बहुत मनाने के बाद किश्ती ने दरवाजा खोला.

‘‘बेटी, इस समय तुम्हारा होस्टल जाना बहुत जरूरी है. औफिस में मेरा काम बहुत बढ़ गया है. मुझे देर तक वहां रुकना पड़ता है और फिर तुम्हारे पापा को अकसर औफिस के काम से बाहर जाना पड़ता है. ऐसे में तुम्हें घर में अकेला नहीं छोड़ सकते हैं,’’ मां ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘तो तुम अपनी नौकरी छोड़ दो,’’ किश्ती चीख पड़ी.

अभी तो उस ने 7वीं पास की है और घर से निकालने की तैयारी शुरू हो गई. 12वीं के बाद जब कोई कोर्स करेगी तब शौक से जाएगी. पर मां उसे जबरदस्ती कैदखाने में अभी से क्यों भेज रही है. घर में कितना मजा आता है, जैसा मन चाहे वैसा करो. सुना है होस्टल में टीवी भी देखने को नहीं मिलता. उस के पापा भी इस समय शहर में नहीं हैं, नहीं तो रोरो कर उन से अपने मन की करवा लेती. किश्ती को मां पर बहुत गुस्सा आ रहा था. मां के आगे वह बहुत रोई भी, पर मां नहीं पिघलीं.

कई बैगों में जरूरत का सामान रख कर अचला किश्ती को छोड़ने होस्टल चली गईं. दूर खड़ी किश्ती मां को होस्टल में फौर्म भरते देख रही थी. आज उसे मां दुश्मन लग रही थीं. न जाने किस गलती की सजा दे रही थीं. उसे मां से नफरत सी हो गई. उस ने तय कर लिया कि वह अब मां से कभी बात नहीं करेगी. पापा से मां की हर बात की शिकायत करेगी. मां ने लौटते समय किश्ती को गले लगाया तो वह छिटक कर दूर हो गई. न उस ने मां के चेहरे को देखा न ही मां के लौटते बोझिल कदमों को.

किश्ती होस्टल के कमरे में रहने आ गई.

3 पलंग के कमरे में सब की अलमारी व टेबल अलगअलग थी. किश्ती बैग से धुली साफ चादर पलंग पर बिछा कर बैठी ही थी कि तभी बगल में खड़ी आंचल बोली, ‘‘मैं तुम से लंबी हूं और पलंग पर खड़ी हो कर छत छू सकती हूं.’’

इस से पहले कि किश्ती कुछ कहती, वह चप्पलें पहन कर किश्ती के पलंग पर खड़ी हो कर छत छूने लगी.

‘‘तुम ने मेरी चादर गंदी कर दी,’’ किश्ती गुस्से से बोली.

‘‘तो क्या हुआ,’’ कह कर किश्ती को धक्का दे कर आंचल पलंग से नीचे उतर गई. किश्ती जमीन पर कुहनी के बल जा गिरी. वह दर्द से वह कराह उठी. क्या यहां रोजरोज ऐसे ही दर्द सहना पड़ेगा या फिर चुप रह कर ये सब देखना पड़ेगा? क्यों किया मां ने ऐसा? मां ने वापस जा कर किश्ती को कई बार फोन किया पर उस ने फोन नहीं उठाया.

रात 11 बजे फिर से मां का फोन आया तो किश्ती फोन पर ही चिल्लाई, ‘‘मुझे अकेले यहां मरने दो,’’ और फोन काट दिया.

15 दिन बाद पापा होस्टल आए. गोरे, स्मार्ट, हीरो जैसे दिखने वाले पापा उसे कितना प्यार करते हैं. किश्ती ने रोरो कर मां की एकएक बात की शिकायत की. उस को पूरा विश्वास था कि पापा उस को तुरंत अपने साथ घर ले जाएंगे, पर पापा ने ऐसा नहीं किया.

पापा बोले, ‘‘किश्ती बेटा, मां ने सही निर्णय लिया है. मुझे अकसर घर से बाहर जाना पड़ता है और तेरी मां न नौकरी छोड़ सकती है और न ही तुम्हें घर में अकेला रख सकती है.’’

पापा बहुत सारा खाने का सामान दे कर उसे होस्टल में छोड़ कर चले गए. किश्ती समझ गई कि अब उसे हमेशा यहीं रहना है. अपने घर से दूर, अपनों से दूर. पर अब उस का अपना है कौन? कोई भाईबहन भी तो नहीं जिस से मन की बात साझा कर सके वह.

किश्ती धीरेधीरे होस्टल के वातावरण में अपनेआप को ढालने लगी. पापा के गले झूलने वाली चुलबुली किश्ती अब नन्ही सी उम्र में गंभीर हो गई थी. पढ़ने और खेल में अव्वल आने से होस्टल में उस की धूम मच गई थी. इतना सब होने पर भी मां के प्रति नफरत कम नहीं हुई थी. वह छुट्टियों में घर जाती तो मां से बेरुखी दिखाती.

आज किश्ती 11वीं की परीक्षा दे कर घर आई थी. तभी पापा भी टुअर से लौट

कर घर आए थे. मां को तो औफिस से फुरसत ही नहीं थी. पापा शाम को किश्ती को ले कर एक समारोह में गए. अब वह समझदार हो गई थी. एक किनारे की कुरसी पर अकेले बैठी किश्ती अतिथियों को देख कर उन के मन के भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी. उस के पास रखी खाली कुरसी पर एक बहुत सुंदर, शालीन महिला आ कर बैठ गई. किश्ती को बहुत समय बाद कोई अपना सा लगा. फिर तो बातों का सिलसिला ऐसा चला कि जैसे सदियों की दोस्ती हो.

‘‘क्या नाम है तुम्हारा?,’’ उस महिला ने पूछा.

‘‘किश्ती, और आप का?’’

‘‘सहेली…’’ दोनों खिलखिला पड़ीं. पास खड़ी उन की प्यारी सी बच्ची भी बिना कुछ समझे हंसने लगी.

‘‘घर आना,’’ कह कर सहेली ने पता दे दिया.

किश्ती की छुट्टियां समाप्त होने पर वह वापस होस्टल आ गई. इस बार वह होस्टल यह तय कर के आई थी कि 12वीं के बाद होस्टल नहीं जाएगी. अब वह बड़ी हो गई है. मां उसे जबरदस्ती नहीं भेज सकती. मां उसे इंजीनियर बनाना चाहती थी. नहीं मानेगी अब वह मां की कोई भी बात. नफरत करती है उन से. 12वीं की परीक्षा पूरी होने पर किश्ती वापस घर आ गई. अपनी मरजी से उस ने पत्रकारिता में प्रवेश ले लिया. मां नौकरी में व्यस्त थीं. पापा 15 दिन में एक बार घर आते और फिर जल्दी चले जाते. दिनभर किश्ती पढ़ाई करने में लगी रहती. रात में मां के प्रति नफरत की आग लिए अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लेती और देर रात तक जागती रहती.

मगर आज कई दिनों के बाद किश्ती का मन किसी अपने से बात करने का हुआ तो पिछले साल समारोह में मिलीं सहेली के घर चली गई. साफसुथरा सजा हुआ घर था, हर कोना व्यवस्थित तरीके से और नई साजसज्जा से गुलजार था. सहेली दिल खोल कर उस से मिलीं. उस की पसंद का खाना बनाया. दोनों ने खूब सारी बातें कीं. ऐसा प्यार ही तो वह मां से चाहती थी. चिंकी इधरउधर उछलकूद कर रही थी. अंधेरा घिरने लगा था.

किश्ती अपने घर जाने के लिए खड़ी ही हुई थी कि तभी डोरबैल बजी, ‘‘तुम 2 मिनट रुको, मेरे पति आए हैं, मिल कर जाना,’’ कह कर सहेली गेट खोलने चली गईं.

एक स्मार्ट व्यक्ति के गाड़ी से उतरते ही चिंकी उन से लिपट गई. औफिस बैग उन्होंने सहेली को प्यारभरी मुसकान दे कर पकड़ा दिया. किश्ती ने शीशे से देखा तो उस के पैरों के नीचे की जमीन कांपने लगी. उसे देख कर विश्वास ही नहीं हो रहा था. यह तो उस के पापा थे.

शीशे को हाथ से पोंछ कर आंख गड़ा कर देखा, उस की आंखें बिलकुल ठीक देख रही हैं. यह तो उस के पापा हैं. तो क्या पापा ने मां को छोड़ दूसरी शादी कर ली? किश्ती तुरंत कमरे के दूसरे दरवाजे से छिप कर तेजी से निकल गेट के बाहर आ गई. उसे लग रहा था कि वह भंवर में अंदर तक डूबती जा रही थीं. अब वह किस से नफरत करे, मां से या पापा से? हांफती हुई किश्ती घर आ कर मां के सामने खड़ी हो गई. उन के सामने रखे कंप्यूटर का मुंह घुमा कर, अपनी आंखों में धधकती चिनगारी लिए. मां उस का यह रूप पहले भी कई बार देख चुकी थीं. वे शांत रहीं.

‘‘मां सचसच बताओ पापा कहां हैं?’’

अचला को इस प्रश्न की आशा नहीं थी. वे कमरे से बाहर जाने लगीं तो किश्ती दरवाजा घेर कर खड़ी हो गई, ‘‘मैं बड़ी हो गई हूं. एकएक बात मुझे बिलकुल सच बताओ, नहीं तो किसी भी अनहोनी को देखने के लिए तैयार हो जाओ.’’

अचला बेटी की धमकी सुन कांप सी गईं. बोली, ‘‘आओ बैठो, मैं सब बताऊंगी, सबकुछ सचसच…’’

दोनों पलंग पर आमनेसामने बैठ गईं. उस वक्त मुजरिम थीं उस की मां अचला और न्यायाधीश थी किश्ती.

‘‘तुम्हारे पापा नंदिता से प्रेम करते थे. वह आकर्षक थी. घरेलू भी थी. मेरे

सामने जब इन्होंने डाइवोर्स के कागज रखे तब मैं ने यह शर्त रखी कि किश्ती को इस बात का कभी पता नहीं चलना चाहिए वरना वह टूट जाएगी. जब वह होस्टल जाएगी तब पापा बन कर ही उन्हें वहां जाना होगा और जब वह छुट्टियों में घर आएगी तब उन्हें भी घर पर आते रहना होगा. और हां, मैं ने उन्हें डाइवोर्स नहीं दिया. उन से कह दिया कि वे जहां जाना चाहें जा सकते हैं. मेरी तरफ से मुक्त हैं. उन्होंने मुझे छोड़ा है, मैं ने उन्हें नहीं. तुम घर पर रहती तब कभी न कभी तुम्हें पता चल ही जाता, इसलिए तुम्हें बहुत मजबूरी में मैं ने दिल पर पत्थर रख कर होस्टल भेजा और साथ में तुम्हारी नफरत भी सही. तुम मुझ से नफरत करती रही और मैं नंदिता से.’’

किश्ती मां की बातें सुन कर सन्न रह गई थी. मां के प्रति किए अपने रूखे व्यवहार के कारण आज वह अपनेआप को गुनहगार समझ रही थी.

‘‘मां मुझे माफ कर दो,’’ कह कर वर्षों से अनछुए रिश्तों को पिघलाती किश्ती मां से लिपट कर फूटफूट कर रो पड़ी, ‘‘मां, आज तुम भी रो कर अपने मन में जमा गुबार निकाल दो. बहुत पत्थर हो गई हो तुम.’’

मांबेटी के मिलन का कोई साक्षी था तो वह एकमात्र समय, जो शाम से रात और रात से सुबह तक के परिवर्तन को देख रहा था.

सुबह की चाय किश्ती मां को पलंग पर ही पकड़ाती थी. फिर कुछ बातें और फिर अपनेअपने कार्यक्षेत्र में कूद जाना. यही दोनों की दिनचर्या थी. आज किश्ती ने चाय मां के सामने रख कर अखबार उठाया तो निगाह पहले पन्ने के कोने में छपे समाचार पर पड़ी, ‘सड़क दुर्घटना में महिला की मौत…’

तसवीर देख कर वह बुरी तरह चौंक उठी. यह तो नंदिता थीं. उस ने अखबार मां के सामने रख दिया. मां ने खबर पढ़ कर बिना चाय पीए कप एक किनारे सरका दिया.

‘‘मां तुम वहां जाओगी क्या?’’

‘‘नहीं, जिस जगह जाने से दिल और दिमाग दोनों को तकलीफ हो वहां नहीं जाना चाहिए.’’

मां और किश्ती दोनों के मन में उथलपुथल चल रही थी. पर दोनों ही मौन थीं. कुछ घटनाओं के एहसास में शब्द मौन हो जाते हैं.

नंदिता की मौत की खबर को 8 दिन हो गए थे. आज मां औफिस से जल्दी आ गई थीं. किश्ती मां से किसी बात पर परामर्श कर रही थी. शाम ढल रही थी. तभी दरवाजे पर एक पुरुष की आकृति उभरी. एक विक्षिप्त सा, थकाहारा आदमी. किश्ती ने नजर उठाई, अरे, यह तो पापा हैं. क्या हाल हो गया है इन का. वे कस कर दरवाजा पकड़े थे कि कहीं गिर न जाएं. उन के पीछे प्यारी चंचल चिंकी डरीसहमी खड़ी थी. उस का चेहरा पीला पड़ा था. उस के होंठ फटे हुए थे.

पापा ने धीमी आवाज में बोलना शुरू किया, ‘‘अचला, यह चिंकी है. इस की मां मर गई है. यह बहुत बीमार है. क्या तुम कुछ दिनों के लिए इसे अपने साथ रख लोगी? इस की तबीयत ठीक होते ही इसे होस्टल में छोड़ दूंगा.’’

इस से पहले कि मां कुछ बोलतीं किश्ती निर्णायक की भूमिका में खड़ी हो गई. वह इस छोटी सी बच्ची के मन में नफरत की नई चिनगारी जन्म नहीं लेने देगी.

‘‘नहीं, चिंकी कहीं नहीं जाएगी. यह यहीं रहेगी हमारे साथ. और हां, आप चाहें तो आज भी हमारे साथ रह सकते हैं.’’

पापा ने प्रश्नात्मक निगाहों से मां की तरफ देखा. मां का मौन रहना हां की स्वीकृति दे रहा था. किश्ती साफ देख रही थी कि उस के निर्णय से इस घर से नफरत के बादल छंटने शुरू हो गए.

Mother’s Day Special: बच्चों की परवरिश बनाएं आसान इन 7 टिप्स से

अकसर कामकाजी महिलाएं अपराधबोध से ग्रस्त रहती हैं. यह अपराधबोध उन्हें इस बात को ले कर होता है कि पता नहीं वे अपने कैरियर की वजह से घर की जिम्मेदारियों का ठीक से निर्वाह कर पाएंगी या नहीं. उस पर यह अपराधबोध तब और बढ़ जाता है जब वे अपने दुधमुंहे बच्चे के हाथ से अपना आंचल छुड़ा कर काम पर जाती हैं. तब उन्हें हर पल अपने बच्चे की चिंता सताती है. एकल परिवारों में जहां पारिवारिक सहयोग की कतई गुंजाइश नहीं होती है, वहां तो नौबत यहां तक आ जाती है कि उन्हें अपने बच्चे या कैरियर में से किसी एक का चुनाव करना पड़ता है और फिर हमारे समाज में बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी मां पर ही होती है इसलिए मां चाहे कितने भी बड़े पद पर आसीन क्यों न हो, चाहे उस की तनख्वाह कितनी भी ज्यादा क्यों न हो समझौता उसे ही करना पड़ता है. ऐसे में होता यह है कि यदि वह अपने बच्चे की परवरिश के बारे में सोच कर अपने कैरियर पर विराम लगाती है, तो उसे अपराधबोध होता है कि उस ने अपने कैरियर के लिए कुछ नहीं किया. यदि वह बच्चे के पालनपोषण के लिए बेबीसिटर (दाई) पर भरोसा करती है, तो इस एहसास से उबरना मुश्किल होता है कि उस ने अपने कैरियर और भविष्य के लिए अपने बच्चे की परवरिश पर ध्यान नहीं दिया. ऐसे में एक कामकाजी महिला करे तो करे क्या?

इस का कोई तयशुदा जवाब नहीं हो सकता ह. इस मामले में हरेक की अपने हालात, इच्छाओं और प्राथमिकताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है. यों भी मां बनना किसी भी लड़की की जिंदगी का बड़ा बदलाव होता है. कुछ लड़कियां ऐसी भी होती हैं जो किसी भी तरह मैनेज कर अपनी जौब करना चाहती हैं तो कुछ ऐसी भी होती हैं जो किसी भी कीमत पर अपने बच्चे पर ध्यान देना चाहती हैं. वनस्थली विद्यापीठ में ऐसोसिएट प्रोफैसर डा. सुधा मोरवाल कहती हैं, ‘‘मां बनने के बाद मैं ने अपना काम फिर से शुरू किया. चूंकि मुझे पारिवारिक सहयोग मिला था, इसलिए मेरे कैरियर ने फिर से गति पकड़ ली. हालांकि शुरुआती दौर में मुझे थोड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था और बच्चे को अपना पूरा समय न दे पाने का अपराधबोध होता था. पर हां, घर के कामकाज का बोझ मुझ पर कभी भी ज्यादा नहीं पड़ा.’’

डा. सुधा के उलट मीना मिलिंद को अपनी जौब छोड़नी पड़ी, क्योंकि उस के बच्चे को संभालने वाला कोई नहीं था और वह यह भी नहीं चाहती थी कि उसे बच्चे को ले कर कोई गिल्ट हो. मगर काम छोड़ने की कसक भी कम नहीं थी. बच्चे के छोटे होने की वजह से वे अभी तक जौब शुरू नहीं कर पाईं, क्योंकि वे एकल परिवार में रह

ट्रैवल के दौरान रखें इन 12 बाथरूम एटिकेट्स का ध्यान

बच्चों के स्कूल की छुट्टियां प्रारम्भ होते ही हम सभी के घूमने के प्लान्स बनने प्रारम्भ हो जाते हैं. यूं तो आजकल वर्ष भर ही अभिभावक घूमने के प्लान बनाते रहते हैं. हम चाहे ट्रेन, बस, अपने वाहन या फ्लाइट से जाएं अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए वाशरूम का प्रयोग तो करते ही हैं. यात्रा सम्पन्न हो जाने के बाद हम होटल, रिजॉर्ट, होम स्टे या अपने किसी रिश्तेदार के यहां रुकें वाशरूम का यूज तो किया ही जाता है. अक्सर वाशरूम को बस हम यूज भर करते हैं उसे यूज करते समय किसी बात का ध्यान रखने की जरूरत नहीं समझते परन्तु वाशरूम कहीं का भी हो बच्चे ही नहीं बड़ों को भी कुछ बाथरूम एटिकेट्स का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है

  1. वाशरूम का प्रयोग करने के बाद फ्लश अवश्य चलाएं ताकि आपके बाद आने वाले को किसी भी प्रकार की दुर्गंध न सहनी पड़े.

2. यात्रा के दौरान सेनेटरी पैड या बच्चों के डायपर को कहीं भी फेंकने के स्थान पर डस्टबिन में डालें और यदि डस्टबिन बाथरूम में नहीं है तो इन्हें पेपर में रोल करके प्लास्टिक बैग में डालकर किसी ऐसी  सुनसान जगह पर फेंकें जहां पर कुत्ते तथा अन्य जानवर नोंच खसोंट न कर सकें.

3. होटल के वाशरूम में नहाने के बाद प्रयोग के लिए उपलब्ध कराए गए तौलियों को फर्श, गंदे पैर या बच्चों की पॉटी पोंछने के लिए प्रयोग न करें.

4. वाशरूम के प्रयोग के लिए अलग स्लीपर का प्रयोग करें ताकि बाहर की गंदगी बाथरूम में न जा सके.

5. वेस्टर्न टॉयलेट सीट का प्रयोग करते समय पहले सीट की रिंग और कवर को ऊपर कर दें तब ही प्रयोग करें.

6. किसी रिश्तेदार के वाशरूम को प्रयोग करने के बाद वाइपर चला दें ताकि बाथरूम सूख जाए.

7. प्रयोग करने के बाद टॉयलेट रोल से सीट की रिंग को अच्छी तरह पोंछ दें ताकि आपके बाद वाला बन्दा सहज होकर वाशरूम का प्रयोग कर सके.

8. शैम्पू के सैशे, बालों के गुच्छे, टूथपेस्ट और टूथब्रश के खाली डिब्बों और रैपर को बाथरूम में इधर उधर फेंकने के स्थान पर डस्टबिन में ही डालें.

9. बाथटब का यदि प्रयोग कर रहे हैं तो यूज करने के बाद पानी पूरा निकाल दें और गंदे पैरों से उसमें घुसने से बचें.

10. समुद्र के बीच से आने के बाद आपके पूरे पैर रेत से भरे होते हैं ऐसे में सीधे बाथरूम में घुसने के स्थान पर पहले शावर से रेत साफ करें फिर बाथरूम में जाएं.

11. वाशरूम में फोन पर बहुत लंबी बातचीत करने के स्थान पर प्रयोग करके तुरंत बाहर आये ताकि दूसरे लोग भी वाशरूम का प्रयोग कर सकें.

12. यूरिनल के दौरान महिलाएं सुनिश्चित करें कि वे सीट पर अच्छी तरह बैठ जाएं और पुरुष सीट से बहुत दूर न खड़े हों.

Mother’s Day Special: मां बेटी के बीच मनमुटाव के मुद्दे

मांबेटी का रिश्ता दुनिया के खूबसूरत रिश्तों में से एक होता है. बेटी होती है मां की परछाई और इस परछाई पर मां दुनियाभर की खुशियां वार देना चाहती है. एक औरत जब मां बनती है और खासकर बेटी की मां बनती है तो उसे लगता है एक बेटी के रूप में वह अपना जीवन फिर से जी सकेगी. मांबेटी के प्यारभरे रिश्ते में भी कई बार तल्खियां उभर आती हैं. मांबेटी के रिश्ते में तल्खियां विवाह से पहले या विवाह के बाद कभी भी हो सकती हैं.

1 शादी से पहले के मनमुटाव

मां के हिसाब से बेटी का समय पर न उठना, दिनभर मोबाइल में लगे रहना, ऊटपटांग कपड़े पहनना आदि अनेक ऐसे छोटेमोटे विषय हैं जिन पर मांबेटी के बीच आमतौर पर खींचातानी होती रहती है. ऐसा होना हर मांबेटी के बीच आम है. लेकिन कई बार कुछ मसले ऐसे हो जाते हैं जिन के कारण मांबेटी के बीच मनमुटाव इस कदर बढ़ जाता है कि वे एकदूसरे से बात करना भी नहीं पसंद करतीं या फिर बेटी, मां से अलग रहने का भी निर्णय ले लेती है.  मुझे पसंद नहीं तुम्हारा बौयफ्रैंड :  22 वर्षीया सान्या एमबीए की स्टूडैंट है. वह अपने कालेज के एक ऐसे लड़के को पसंद करती है जिसे उस की मां नापसंद करती है. मां नहीं चाहती कि सान्या उस लड़के के साथ कोई भी संपर्क रखे. लेकिन सान्या के दिलोदिमाग पर तो वह लड़का इस कदर छाया हुआ है कि वह मां की कोईर् बात सुनने को ही तैयार नहीं है. आएदिन की इस लड़ाईझगड़े से तंग आ कर सान्या ने अलग फ्लैट ले कर रहना शुरू कर दिया है.

2 नौकरी बन जाए विवाद का विषय: 

28 वर्षीया रिया कौल सैंटर में नौकरी करती है, वह भी नाइट शिफ्ट की. उस की मां को यह जौब बिलकुल पसंद नहीं है क्योंकि इस नौकरी की वजह से रिया के आसपड़ोस वाले उस की मां को तरहतरह की बातें सुनाते रहते हैं.

रिया की मां ने कई बार उस से कहा है कि वह यह नौकरी छोड़ दे लेकिन चूंकि रिया को इस नौकरी से कोई दिक्कत नहीं है, सो, वह छोड़ना नहीं चाहती. इस बात पर दोनों की अकसर बहस होती रहती है. आएदिन की बहस से परेशान हो कर रिया ने अपने औफिस के पास के एक पीजी में रहना शुरू कर दिया है. उसे लगता है कि रोज की किचकिच से यही बेहतर है.  विवाह के बाद बेटी अपनी ससुराल चली जाती है. ऐसे में मांबेटी के बीच प्यार और अपनापन कायम रहना चाहिए लेकिन कुछ मामलों में शादी के बाद भी मांबेटी के बीच का मनमुटाव जारी रहता है. बस, विवाद के कारण बदल जाते हैं.

3 लेनदेन से उपजा मनमुटाव 

विधि की शादी एक संपन्न घर में हुई है. वह जब भी मायके  आती है तो मां से अपेक्षा करती है उसे वही ऐशोआराम, वही सुखसुविधाएं मायके में भी मिलें जो ससुराल में मिलती हैं. लेकिन चूंकि विधि के मायके की आर्थिक स्थिति सामान्य है, सो, उसे वहां वे सुविधाएं नहीं मिल पातीं.  नतीजतन, जब भी विधि मायके आती है, मां से उस की बहस हो जाती है. इस के अलावा विधि को अपनी मां से हमेशा यह शिकायत भी रहती है कि वे उस की ससुराल वालों के स्टेटस के हिसाब से लेनेदेन नहीं करतीं, जिस की वजह से उसे अपनी ससुराल में सब के सामने नीचा देखना पड़ता है. विधि की मां अपनी हैसियत से बढ़ कर विधि की ससुराल वालों को लेनादेना करती है लेकिन विधि कभी संतुष्ट नहीं होती और दोनों के बीच खींचातानी चलती रहती है.

4 संपत्ति विवाद भी है कारण 

पति के गुजर जाने के बाद स्वाति की मां अपने बेटे रोहन के साथ रहती हैं. रोहन ही उन की सारी जरूरतों का ध्यान रखता है और उन की तरफ से सारे सामाजिक लेनदेन करता है. आगे चल कर कोई प्रौपर्टी विवाद न हो, इसलिए स्वाति की मां ने वसीयत में अपनी सारी जमीनजायदाद रोहन के नाम कर दी. स्वाति को जब इस बात का पता चला तो वह अपनी मां से संपत्ति में हिस्से के लिए लड़ने आ गई. उस का कहना था कि जमीनजायदाद  में उसे बराबरी का हिस्सा चाहिए जबकि स्वाति की मां का कहना था कि उस की शादी में जो लेनादेना था, वह उन्होंने कर दिया और वैसे भी, अब रोहन उन की पूरी जिम्मेदारी संभालता है तो वे प्रौपर्टी रोहन के नाम ही करेंगी. इस बात पर गुस्सा हो कर स्वाति ने मां से बोलचाल बंद कर दी और घर आनाजाना भी बंद कर दिया.

5 मां के संबंधों से बेटी को शिकायत

अनन्या के पिताजी को गुजरे 4 वर्ष हो गए हैं. वह अपनी ससुराल में मस्त है. मां कालेज में नौकरी करती हैं. जहां उन के संबंध कालेज के सहकर्मी से हैं. यह बात अनन्या को बिलकुल पसंद नहीं. अनन्या को लगता है पिताजी के चले जाने के बाद मां ने उस पुरुष से संबंध क्यों रखे हैं.  वह कहती है, ‘मां के इन संबंधों से समाज और ससुराल में उस की बदनामी हो रही है.’ जबकि अनन्या की मां का कहना है कि उम्र के इस पड़ाव के अकेलेपन को वह किस तरह दूर करे. अगर ऐसे में कालेज का उक्त सहकर्मी उस की भावनाओं व जरूरतों का ध्यान रखता है तो उस में बुरा क्या है. बस, यही बात मांबेटी के बीच मनमुटाव का कारण बनी हुई है. इस स्थिति में अनन्या को अपनी मां के अकेलेपन की जरूरत को समझना चाहिए और व्यर्थ ही समाज से डर कर मां की खुशियों की राह में रोड़ा नहीं बनना चाहिए. बेटी को मां की जरूरतों से ज्यादा अपनी प्रतिष्ठा की फिक्र है. वह तो मां को बुत बना कर बाहर खड़ा कर देना चाहती है जो आदर्श तो कहलाए पर आंधीपानी और अकेलेपन को रातदिन सहे.

Mother’s Day Special: अमेरिकन बेटा- क्या मां को समझ पाया डेविड

9ईवा टूट चुकी थी. उस का ट्यूमर लास्ट स्टेज पर था और वह चंद महीनों की मेहमान थी.

रीता एक दिन अपनी अमेरिकन मित्र ईवा से मिलने उस के घर गई थी, रीता भारतीय मूल की अमेरिकन नागरिक थी. वह अमेरिका के टैक्सास राज्य के ह्यूस्टन शहर में रहती थी. रीता का जन्म अमेरिका में ही हुआ था. जब वह कालेज में थी, उस की मां का देहांत हो गया था. उस के पिता कुछ दिनों के लिए भारत आए थे, उसी बीच हार्ट अटैक से उन की मौत हो गई थी.

रीता और ईवा दोनों बचपन की सहेलियां थीं. दोनों की स्कूल और कालेज की पढ़ाई साथ हुई थी. रीता की शादी अभी तक नहीं हुई थी जबकि ईवा शादीशुदा थी. उस का 3 साल का एक बेटा था डेविड. ईवा का पति रिचर्ड अमेरिकन आर्मी में था और उस समय अफगानिस्तान युद्ध में गया था.

शाम का समय था. ईवा ने ही फोन कर रीता को बुलाया था. शनिवार छुट्टी का दिन था. रीता भी अकेले बोर ही हो रही थी. दोनों सखियां गप मार रही थीं. तभी दरवाजे पर बूटों की आवाज हुई और कौलबैल बजी. अमेरिकन आर्मी के 2 औफिसर्स उस के घर आए थे. ईवा उन को देखते ही भयभीत हो गई थी, क्योंकि घर पर फुल यूनिफौर्म में आर्मी वालों का आना अकसर वीरगति प्राप्त सैनिकों की सूचना ही लाता है. वे डेविड की मृत्यु का संदेश ले कर आए थे और यह भी कि शहीद डेविड का शव कल दोपहर तक ईवा के घर पहुंच जाएगा. ईवा को काटो तो खून नहीं. उस का रोतेरोते बुरा हाल था. अचानक ऐसी घटना की कल्पना उस ने नहीं की थी.

रीता ने ईवा को काफी देर तक गले से लगाए रखा. उसे ढांढ़स बंधाया, उस के आंसू पोंछे. इस बीच ईवा का बेटा डेविड, जो कुछ देर पहले कार्टून देख रहा था, भी पास आ गया. रीता ने उसे भी अपनी गोद में ले लिया. ईवा और रिचर्ड दोनों के मातापिता नहीं थे. उन के भाईबहन थे. समाचार सुन कर वे भी आए थे, पर अंतिम क्रिया निबटा कर चले गए. उन्होंने जाते समय ईवा से कहा कि किसी तरह की मदद की जरूरत हो तो बताओ, पर उस ने फिलहाल मना कर दिया था.

ईवा जौब में थी. वह औफिस जाते समय बेटे को डेकेयर में छोड़ जाती और दोपहर बाद उसे वापस लौटते वक्त पिक कर लेती थी. इधर, रीता ईवा के यहां अब ज्यादा समय बिताती थी, अकसर रात में उसी के यहां रुक जाती. डेविड को वह बहुत प्यार करती थी, वह भी ईवा से काफी घुलमिल गया था. इस तरह 2 साल बीत गए.

इस बीच रीता की जिंदगी में प्रदीप आया, दोनों ने कुछ महीने डेटिंग पर बिताए, फिर शादी का फैसला किया. प्रदीप भी भारतीय मूल का अमेरिकन था और एक आईटी कंपनी में काम करता था. रीता और प्रदीप दोनों ही ईवा के घर अकसर जाते थे.

कुछ महीनों बाद ईवा बीमार रहने लगी थी. उसे अकसर सिर में जोर का दर्द, चक्कर, कमजोरी और उलटी होती थी. डाक्टर्स को ब्रेन ट्यूमर का शक था. कुछ टैस्ट किए गए. टैस्ट रिपोर्ट्स लेने के लिए ईवा के साथ रीता और प्रदीप दोनों गए थे. डाक्टर ने बताया कि ईवा का ब्रेन ट्यूमर लास्ट स्टेज पर है और वह अब चंद महीनों की मेहमान है. यह सुन कर ईवा टूट चुकी थी, उस ने रीता से कहा, ‘‘मेरी मृत्यु के बाद मेरा बेटा डेविड अनाथ हो जाएगा. मुझे अपने किसी रिश्तेदार पर भरोसा नहीं है. क्या तुम डेविड के बड़ा होने तक उस की जिम्मेदारी ले सकती हो?’’

रीता और प्रदीप दोनों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. उन्होंने ऐसी परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी. तभी ईवा बोली, ‘‘देखो रीता, वैसे कोई हक तो नहीं है तुम पर कि डेविड की देखभाल की जिम्मेदारी तुम्हें दूं पर 25 वर्षों से

हम एकदूसरे को भलीभांति जानते हैं. एकदूसरे के सुखदुख में साथ रहे हैं, इसीलिए तुम से रिक्वैस्ट की.’’

दरअसल, रीता प्रदीप से डेटिंग के बाद प्रैग्नैंट हो गई थी और दोनों जल्दी ही शादी करने जा रहे थे. इसलिए इस जिम्मेदारी को लेने में वे थोड़ा झिझक रहे थे. तभी प्रदीप बोला, ‘‘ईवा, डोंट वरी. हम लोग मैनेज कर लेंगे.’’

ईवा ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘थैंक्स डियर. रीता क्या तुम एक प्रौमिस करोगी?’’ रीता ने स्वीकृति में सिर हिलाया और ईवा से गले लगते हुए कहा, ‘‘तुम अब डेविड की चिंता छोड़ दो. अब वह मेरी और प्रदीप की जिम्मेदारी है.’’

ईवा बोली, ‘‘थैंक्स, बोथ औफ यू. मैं अपनी प्रौपर्टी और बैंक डिपौजिट्स की पावर औफ अटौर्नी तुम दोनों के नाम कर दूंगी. डेविड के एडल्ट होने तक इस की देखभाल तुम लोग करोगे. तुम्हें डेविड के लिए पैसों की चिंता नहीं करनी होगी, प्रौमिस.’’

रीता और प्रदीप ने प्रौमिस किया. और फिर रीता ने अपनी प्रैग्नैंसी की बात बताते हुए कहा, ‘‘हम लोग इसीलिए थोड़ा चिंतित थे. शादी, प्रैग्नैंसी और डेविड सब एकसाथ.’’

ईवा बोली, ‘‘मुबारक हो तुम दोनों को. यह अच्छा ही है डेविड को एक भाई या बहन मिल जाएगी.’’

2 सप्ताह बाद रीता और प्रदीप ने शादी कर ली. डेविड तो पहले से ही रीता से काफी घुलमिल चुका था. अब प्रदीप भी उसे काफी प्यार करने लगा था. ईवा ने छोटे से डेविड को समझाना शुरू कर दिया था कि वह अगर बहुत दूर चली जाए, जहां से वह लौट कर न आ सके, तो रीता और प्रदीप के साथ रहना और उन्हें परेशान मत करना. पता नहीं डेविड ईवा की बातों को कितना समझ रहा था, पर अपना सिर बारबार हिला कर हां करता और मां के सीने से चिपक जाता था.

3 महीने के अंदर ही ईवा का निधन हो गया. रीता ने ईवा के घर को रैंट पर दे कर डेविड को अपने घर में शिफ्ट करा लिया. शुरू के कुछ दिनों तक तो डेविड उदास रहता था, पर रीता और प्रदीप दोनों का प्यार पा कर धीरेधीरे नौर्मल हो गया.

रीता ने एक बच्चे को जन्म दिया. उस का नाम अनुज रखा गया. अनुज के जन्म के कुछ दिनों बाद तक ईवा उसी के साथ व्यस्त रही थी. डेविड कुछ अकेला और उदास दिखता था. रीता ने उसे अपने पास बुला कर प्यार किया और कहा, ‘‘तुम्हारे लिए छोटा भाई लाई हूं. कुछ ही महीनों में तुम इस के साथ बात कर सकोगे और फिर बाद में इस के साथ खेल भी सकते हो.’’

रीता और प्रदीप ने डेविड की देखभाल में कोई कमी नहीं की थी. अनुज भी अब चलने लगा था. घर में वह डेविड के पीछेपीछे लगा रहता था. डेविड के खानपान व रहनसहन पर भारतीय संस्कृति की स्पष्ट छाप थी. शुरू में तो वह रीता को रीता आंटी कहता था, पर बाद में अनुज को मम्मी कहते देख वह भी मम्मी ही कहने लगा था. शुरू के कुछ महीनों तक डेविड की मामी और चाचा उस से मिलने आते थे, पर बाद में उन्होंने आना बंद कर दिया था.

डेविड अब बड़ा हो गया था और कालेज में पढ़ रहा था. रीता ने उस से कहा कि वह अपना बैंक अकाउंट खुद औपरेट किया करे, लेकिन डेविड ने मना कर दिया और कहा कि आप की बहू आने तक आप को ही सबकुछ देखना होगा. रीता भी डेविड के जवाब से खुश हुई थी. अनुज कालेज के फाइनल ईयर में था.

3 वर्षों बाद डेविड को वेस्टकोस्ट, कैलिफोर्निया में नौकरी मिली. वह रीता से बोला, ‘‘मम्मी, कैलिफोर्निया तो दूसरे छोर पर है. 5 घंटे तो प्लेन से जाने में लग जाते हैं. आप से बहुत दूर चला जाऊंगा. आप कहें तो यह नौकरी जौइन ही न करूं. इधर टैक्सास में ही ट्राई करता हूं.’’

रीता ने कहा, ‘‘बेटे, अगर यह नौकरी तुम्हें पसंद है तो जरूर जाओ.’’

प्रदीप ने भी उसे यही सलाह दी. डेविड के जाते समय रीता बोली, ‘‘तुम अब अपना बैंक अकाउंट संभालो.’’

डेविड बोला ‘‘क्या मम्मी, कुछ दिन और तुम्हीं देखो यह सब. कम से कम मेरी शादी तक. वैसे भी आप का दिया क्रैडिट कार्ड तो है ही मेरे पास. मैं जानता हूं मुझे पैसों की कमी नहीं होगी.’’

रीता ने पूछा कि शादी कब करोगे तो वह बोला, ‘‘मेरी गर्लफ्रैंड भी कैलिफोर्निया की ही है. यहां ह्यूस्टन में राइस यूनिवर्सिटी में पढ़ने आई थी. वह भी अब कैलिफोर्निया जा रही है.’’

रीता बोली, ‘‘अच्छा बच्चू, तो यह राज है तेरे कैलिफोर्निया जाने का?’’

डेविड बोला, ‘‘नो मम्मी, नौट ऐट औल. तुम ऐसा बोलोगी तो मैं नहीं जाऊंगा. वैसे, मैं तुम्हें सरप्राइज देने वाला था.’’

‘‘नहीं, तुम कैलिफोर्निया जाओ, मैं ने यों ही कहा था. वैसे, तुम क्या सरप्राइज देने वाले हो.’’

‘‘मेरी गर्लफ्रैंड भी इंडियन अमेरिकन है. मगर तुम उसे पसंद करोगी, तभी शादी की बात होगी.’’

रीता बोली, ‘‘तुम ने नापतोल कर ही पसंद किया होगा, मुझे पूरा भरोसा है.’’

इसी बीच अनुज भी वहां आया. वह बोला, ‘‘मैं ने देखा है भैया की गर्लफ्रैंड को. उस का नाम प्रिया है. डेविड और प्रिया दोनों को लाइब्रेरी में अनेक बार देर तक साथ देखा है. देखनेसुनने में बहुत अच्छी लगती है.’’

डेविड कैलिफोर्निया चला गया.

उस के जाने के कुछ महीनों बाद

ही प्रदीप का सीरियस रोड ऐक्सिडैंट हो गया था. उस की लोअर बौडी को लकवा मार गया था. वह अब बिस्तर पर ही था. डेविड खबर मिलते ही तुरंत आया. एक सप्ताह रुक कर प्रदीप के लिए घर पर ही नर्स रख दी. नर्स दिनभर घर पर देखभाल करती थी और शाम के बाद रीता देखती थीं.

रीता को पहले से ही ब्लडप्रैशर की शिकायत थी. प्रदीप के अपंग होने के कारण वह अंदर ही अंदर बहुत दुखी और चिंतित रहती थी. उसे एक माइल्ड अटैक भी पड़ गया, तब डेविड और प्रिया दोनों मिलने आए थे. रीता और प्रदीप दोनों ने उन्हें जल्द ही शादी करने की सलाह दी. वे दोनों तो इस के लिए तैयार हो कर ही आए थे.

शादी के बाद रीता ने डेविड को उस की प्रौपर्टी और बैंक डिपौजिट्स के पेपर सौंप दिए. डेविड और प्रिया कुछ दिनों बाद लौट गए थे. इधर अनुज भी कालेज के फाइनल ईयर में था. पर रीता और प्रदीप दोनों ने महसूस किया कि डेविड उतनी दूर रह कर भी उन का हमेशा खयाल रखता है, जबकि उन का अपना बेटा, बस, औपचारिकताभर निभाता है. इसी बीच, रीता को दूसरा हार्ट अटैक पड़ा, डेविड इस बार अकेले मिलने आया था. प्रिया प्रैग्नैंसी के कारण नहीं आ सकी थी. रीता को 2 स्टेंट हार्ट के आर्टरी में लगाने पड़े थे, पर डाक्टर ने बताया था कि उस के हार्ट की मसल्स बहुत कमजोर हो गई हैं. सावधानी बरतनी होगी. किसी प्रकार की चिंता जानलेवा हो सकती है.

रीता ने डेविड से कहा, ‘‘मुझे तो प्रदीप की चिंता हो रही है. रातरात भर नींद नहीं आती है. मेरे बाद इन का क्या होगा? अनुज तो उतना ध्यान नहीं देता हमारी ओर.’’

डेविड बोला, ‘‘मम्मी, अनुज की तुम बिलकुल चिंता न करो. तुम को भी कुछ नहीं होगा, बस, चिंता छोड़ दो. चिंता करना तुम्हारे लिए खतरनाक है. आप, आराम करो.’’

कुछ महीने बाद थैंक्सगिविंग की छुट्टियों में डेविड और प्रिया रीता के पास आए. साथ में उन का 4 महीने का बेटा भी आया. रीता और प्रदीप दोनों ही बहुत खुश थे. इसी बीच रीता को मैसिव हार्ट अटैक हुआ. आईसीयू में भरती थी. डेविड, प्रिया और अनुज तीनों उस के पास थे. डाक्टर बोल गया कि रीता की हालत नाजुक है. डाक्टर ने मरीज से बातचीत न करने को भी कहा.

रीता ने डाक्टर से कहा, ‘‘अब अंतिम समय में तो अपने बच्चों से थोड़ी देर बात करने दो डाक्टर, प्लीज.’’

फिर रीता किसी तरह डेविड से बोल पाई, ‘‘मुझे अपनी चिंता नहीं है. पर प्रदीप का क्या होगा?’’ डेविड बोला, ‘‘मम्मी, तुम चुप रहो. परेशान मत हो.’’  वहीं अनुज बोला, ‘‘मम्मा, यहां अच्छे ओल्डएज होम्स हैं. हम पापा को वहां शिफ्ट कर देंगे. हम लोग पापा से बीचबीच में मिलते रहेंगे.’’

ओल्डएज होम्स का नाम सुनते ही रीता की आंखों से आंसू गिरने लगे. उसे अपने बेटे से बाप के लिए ऐसी सोच की कतई उम्मीद नहीं थी. उस की सांसें और धड़कन काफी तेज हो गईं.

डेविड अनुज को डांट रहा था, प्रिया ने कहा, ‘‘मम्मी, जब से आप की तबीयत बिगड़ी है, हम लोग भी पापा को ले कर चिंतित हैं. हम लोगों ने आप को और पापा को कैलिफोर्निया में अपने साथ रखने का फैसला किया है. वहां आप लोगों की जरूरतों के लिए खास इंतजाम कर रखा है. बस, आप यहां से ठीक हो कर निकलें, बाकी आगे सब डेविड और मैं संभाल लेंगे.’’

रीता ने डेविड और प्रिया दोनों को अपने पास बुलाया, उन के हाथ पकड़ कर कुछ कहने की कोशिश कर रही थी, उस की सांसें बहुत तेज हो गईं. अनुज दौड़ कर डाक्टर को बुलाने गया. इस बीच रीता किसी तरह टूटतीफूटती बोली में बोली, ‘‘अब मुझे कोई चिंता नहीं है. चैन से मर सकूंगी. मेरा प्यारा अमेरिकन बेटा.’’ इस के आगे वह कुछ नहीं बोल सकी.

जब तक अनुज डाक्टर के साथ आया, रीता की सांसें रुक चुकी थीं. डाक्टर ने चैक कर रहा, ‘‘शी इज नो मोर.’’

Mother’s Day Special: कंगारू केयर से प्रीमेच्योर बेबी को बचाएं, कुछ ऐसे

भारत एक ऐसा देश है, जहाँ हर साल, विश्व की तुलना में सबसे अधिक प्रीमेच्योर जन्म लेने वाले बच्चे की मृत्यु होती है, इसकी वजह गर्भधारण के बाद से मां को सही पोषण न मिलना, गर्भधारण के बाद भी मां का वजनी काम करना, प्रीमच्योर बच्चा जन्म लेने के बाद आधुनिक तकनीकी व्यवस्था का अस्पताल में न होना आदि कई है. इसके अलावा कुछ प्रीमेच्योर बच्चे एक महिना ही जीवित रह पाते है. ऐसे में कंगारू केयर नवजात शिशु के लिए वरदान से अधिक कुछ भी नहीं है.

तकनीक है आसान

इस बारें में नियोनेटोलॉजी चैप्टर, इंडियन एकेडेमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स के नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. नवीन बजाज ‘इंटरनेशनल कंगारू केयर अवेयरनेस डे’ पर कहते है कि कंगारू केयर प्रीमेच्योर और नवजात शिशुओं के देखभाल की एक तकनीक है. अधिकतर जिन शिशुओं का जन्म समय से पहले होने पर वज़न कम हो, उनके लिए कंगारू केयर का प्रयोग किया जाता है. इसमें बच्चे को माता-पिता के खुले सीने से चिपकाकर रखा जाता है, जिससे पैरेंट की त्वचा से शिशु की त्वचा का सीधा संपर्क होता रहता है, जो बहुत प्रभावशाली होने के साथ-साथ प्रयोग में भी आसान होता है और शिशु का स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है. इस तकनीक को समय से पहले या समय पूरा होने के बाद पैदा हुए सभी बच्चों की अच्छी देखभाल के लिए कंगारू केयर लाभकारी होता है.

जरुरी है स्वस्थ और हायजिन होना

इसके आगे डॉ.नवीन कहते है कि कंगारू केयर तकनीक से शिशु की देखभाल के लिए सबसे सही व्यक्ति उसकी मां होती है, लेकिन कई बार कुछ वजह से मां बच्चे को कंगारू केयर नहीं दे पाती, ऐसे में पिता या परिवार का कोई भी करीबी सदस्य, जो बच्चे की जिम्मेदारी सम्हाल सकें, मसलन भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी, चाची, मौसी, बुआ, चाचा आदि में से कोई भी बच्चे को कंगारू केयर देकर मां की जिम्मेदारी का कुछ भाग बाँट सकते है. इसके अलावा कंगारू केयर दे रहे व्यक्ति को स्वच्छता के कुछ सामान्य मानकों का पालन करना आवश्यक होता है, जैसे हर दिन नहाना, साफ़ कपड़ें पहनना, हाथों को नियमित रूप से धोकर स्वच्छ रखना, हाथों के नाख़ून कटे हुए और साफ़ होना आदि बहुत जरूरी होता है.

कब शुरू करें कंगारू केयर

डॉक्टर का मानना है कि कंगारू केयर या त्वचा से त्वचा का संपर्क तकनीक की शुरूआत बच्चे के जन्म से ही करनी चाहिए और आगे पूरी पोस्टपार्टम अवधि तक इसे जारी रखा जा सकता है. इस तकनीक की इस्तेमाल की अवधि शुरूआत में कम रखनी चाहिए. पहले 30 से 60 मिनट, इसके बाद धीरे-धीरे मां को इसकी आदत पड़ जाने इस तकनीक के इस्तेमाल का आत्मविश्वास मां में आ जाने पर जितना हो सकें, उतने लंबे समय के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. खास कर कम वज़न के शिशुओं के लिए कंगारू केयर की अवधि जितनी ज़्यादा हो, उतनी अच्छी होती है, बच्चे को कंगारू केयर देते हुए मां खुद भी आराम कर सकती है या आधा लेटकर सो सकती है.

कंगारू केयर की प्रक्रिया

मां के स्तनों के बीच शिशु को रखना चाहिए, उसका सिर एक तरफ झुका हो, ताकि उसे साँस लेने में आसानी हो. बच्चे का पेट मां के पेट के ऊपरी भाग से चिपका हो, हाथ और पैर मुड़े हुए हो. शिशु को बेस देने के लिए स्वच्छ, सूती कपड़ा या कंगारू बैग का इस्तेमाल किया जा सकता है. समय से पहले पैदा हुए या कम वज़न के बच्चों की देखभाल के लिए कंगारू केयर की शुरूआत हुई, लेकिन समय पूरा होकर पैदा हुए या सही वज़न के बच्चों के लिए भी यह तकनीक लाभकारी है.

पिता और कंगारू केयर का संपर्क

डॉक्टर बजाज आगे कहते है कि माताओं की तरह, पिता भी त्वचा से त्वचा का संपर्क तकनीक से बच्चे की देखभाल कर सकते है. यह शिशु और पिता दोनों के लिए फायदेमंद है. पिता के लिए कुछ प्रमुख लाभ यह है कि वे बच्चे की देखभाल अच्छी तरह से कर सकेंगे और अपने आप को असहाय महसूस नहीं करेंगे. इससे शिशु और पिता के बीच अपनापन बढ़ता है और बच्चे की देखभाल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा पाने की ख़ुशी पिता को मिलती है, ये तकनीक पिता को बच्चे के भूख और तनाव के संकेतों को समझने में भी मदद करती है. जब पिता कंगारू केयर दे रहे हो, तब मां आराम कर सकती है और बच्चे की अच्छी देखभाल के लिए अपनी ऊर्जा और उत्साह को बनाए रख सकती है. कंगारू केयर के फायदे निम्न है,

• शिशु की अच्छी देखभाल और उसमें अपनेपन का एहसास स्टाब्लिश करने का यह सबसे बेहतरीन तरीका है. इस तकनीक से देखभाल किए गए बच्चों का अपने मातापिता के साथ जुड़ाव काफी करीबी रहता है,
• त्वचा से त्वचा का संपर्क होने से मस्तिष्क के विकास और भावनात्मक संबंधों के निर्माण को बढ़ावा मिलता है, आँखों से आँखों का कॉन्टैक्ट होते रहने से, प्यार, अपनापन और विश्वास से सामाजिक प्रतिभा का भी विकास होने में मदद मिलती है,
• इस तकनीक के इस्तेमाल से स्तनपान को भी बढ़ावा मिलता है, बच्चा और मां दोनों के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है, इसके अलावा बच्चे के पोषण और विकास में स्तनपान का योगदान महत्वपूर्ण होता है,
• साथ ही सर्दियों में कम वज़न के बच्चों में बच्चे के शरीर के तापमान को स्थिर रखा जाता है,
• इस तकनीक से देखभाल किए गए बच्चों का वज़न अच्छे से बढ़ता है, वे लंबे समय तक शांत सोते हैं, जागने पर भी शांत रहते हैं और रोते भी कम है.
• इसके अलावा कंगारू केयर तकनीक से देखभाल किए जाने वाले बच्चें ज़्यादा स्वस्थ, ज़्यादा होशियार होते हैं और अपने परिवार के प्रति उनके मन में ज़्यादा अपनापन होता है. यह तकनीक शिशु के साथ-साथ मां, परिवार, समाज और पूरे देश के लिए लाभकारी है.
इसलिए वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनजेशन और चिकित्सकों ने सलाह दी है कि सभी बच्चों के लिए कंगारू केयर तकनीक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, ताकि बच्चे का विकास सही तरीके से हो सकें.

Mother’s Day Special: मां को दें स्किन केयर से जुड़ा ये तोहफा

एक मां अपने बच्चे की खुशी के लिए क्या कुछ नहीं करती. कभी उस के लिए अपनी नींद से समझता करती है, तो कभी उस के लिए खुद भूखी रह जाती है. उस के कहीं बाहर जाने पर उस के इंतजार में बैठी रहती है. बच्चे की एक डिमांड पर वह अपनी सारी थकान को भूल कर उस की डिमांड को पूरा करने में जुट जाती है.

दुनियाभर से उस के लिए फाइट करने में भी पीछे नहीं रहती. उस की खुशी के लिए अपनी सारी खुशियां कुरबान करने के लिए तैयार हो जाती है.

भले ही हम मां को बहुत कुछ नहीं दे सकते, लेकिन मदर्स डे एक बेटी होने के नाते आप अपनी मां की इनर ब्यूटी की तरह आउटर ब्यूटी को बैस्ट ब्यूटी ट्रीटमैंट्स गिफ्ट में दे कर निखार सकती हैं क्योंकि वह खुद को हमेशा टिपटौप तो रखना पसंद करती है, लेकिन परिवार व बच्चों से हमेशा घिरी रहने के कारण खुद को संवारने पर ध्यान ही नहीं देती है. ऐसे में आप के ये गिफ्ट्स मां के चेहरे पर मुसकान लाने के काम करेंगे. तो आइए जानते हैं कैसे:

1 फेशिअल केयर बौक्स

अपने चेहरे को निखारना व अपनी खूबसूरती की तारीफ बटोरना हर मौम को अच्छा लगता है. लेकिन घरपरिवार में बिजी रहने के चक्कर में व पैसों के कारण हमेशा खुद की स्किन से समझता कर ही लेती हैं. ऐसे में आप उन्हें इस मदर्स डे पर फेशियल केयर बौक्स गिफ्ट कर के उन के होंठों पर मुसकान लौटाने के साथसाथ उन के चेहरे की खोई रौनक को भी लौटा सकती हैं क्योंकि इस बौक्स में होता है फेशियल क्लींजर, टोनर, पैक से ले कर नाइट ट्रीटमैंट क्रीम तक और सन प्रोटैक्शन देने वाला सनस्क्रीन भी जो उन की स्किन को क्लीन, डैड स्किन को रिमूव करने के साथसाथ फेस पर ग्लो तो लाएगा ही, साथ ही स्किन पर एजिंग को भी कम करने का काम करता है.

नाइट क्रीम स्किन को लंबे समय तक हाइड्रेट रखने के साथसाथ स्किन सैल्स को रिपेयर करने का भी काम करती है. ऐसे में आप मार्केट से फौरैस्ट ऐसैंशियल की फेशियल केयर किट, जस्ट हर्ब की फेशियल केयर, मामा एअर्थ की किट खरीद सकती हैं. ये बजट में होने के साथसाथ स्किन पर काफी अमेजिंग असर भी दिखाने का काम करती हैं.

2 एम टू पीएम स्किन केयर रूटीन

एक मां पैसों की बचत के लिए अपने डेली स्किनकेयर रूटीन से समझता कर लेती है. उसे लगता है कि इस से भले ही ज्यादा नहीं, लेकिन थोड़ीबहुत बजट तो होगा ही. इस के लिए वह फेसवाश की जगह फेस पर साबुन को भी अप्लाई करने में झिझकती नहीं है. जबकि बढ़ती उम्र में स्किन की खास केयर की जरूरत होती है.

साबुन का ऐल्कलाइन नेचर फेस के नैचुरल मौइस्चर को चुरा कर फेस को ड्राई बनाने का काम करता है, जिस से फेस फलेकी यहां तक कि स्किन पर ब्रेकाउट्स तक हो जाते हैं, जबकि फेसवाश स्किन के पीएच लैवल को बैलेंस में रखने का काम करता है और अगर उस में ह्यलुरोनिक ऐसिड हो, फिर तो स्किन की ड्राइनैस दूर होने के साथसाथ फाइन लाइंस व झर्रियों की समस्या भी जल्दी दूर हो जाती है, साथ ही इस के बाद विटामिंस व ह्यलुरोनिक ऐसिड रिच फेस क्रीम स्किन को मौइस्चराइज करने के साथसाथ स्किन को ब्राइट बनाने का भी काम करती है.

ऐसे में आप इन इनग्रीडिएंट्स से युक्त फेसवाश व फेस क्रीम के मार्केट में मिलने वाले ब्रैंडेड पैक्स को मौम को गिफ्ट दे कर उन को स्किन की केयर का खास गिफ्ट दे सकती हैं.

3 कोलेजन मास्क

हमारे शरीर की तरह हमारी स्किन को भी सुपर फूड की जरूरत होती है. ऐसे में आप की मौम की स्किन के लिए कोलेजन मास्क सुपर फूड है. कोलेजन हमारी स्किन का मेन स्ट्रक्चर है, जो प्रोटीन का बना होता है और इस के बेहतर संतुलन से ही हमारी स्किन टाइट, ग्लोइंग और एजिंग से बची रहती है. लेकिन मौम्स इस बात को भूल जाती हैं कि बढ़ती उम्र व स्किन की केयर नहीं करने के कारण स्किन अपना कोलेजन खोने लगती है, जिस से वह समय से पहले बूढ़ी दिखने लगती है.

ऐसे में कोलेजन मास्क आप की मां की स्किन से गंदगी व डैड स्किन सैल्स को रिमूव कर के स्किन को क्लीयर व सौफ्ट बनाने का काम करता है, साथ ही ब्लड सर्कुलेशन को भी इंप्रूव करने में मददगार होता है. इस से स्किन टाइट भी होती है, जो स्किन पर एजिंग को कम कर के व आंखों के आसपास के डार्कसर्कल्स को रिमूव कर के उसे यंग दिखाने का काम करती है.

इस स्पैशल डे मौम को दें कोलेजन मास्क गिफ्ट में ताकि आप की मौम अंदर व बाहर दोनों जगह से हमेशा यंग बनी रहें. इस के लिए आप मार्केट से इनटुर कोलेजन फेशियल मास्क, द डर्मा कंपनी का कोलेजन मास्क व इसी तरह आप को और भी ब्रैंडेड कंपनी के कोलेजन फेस मास्क मिल जाएंगे, जिन्हें दे कर आप अपनी मौम की स्किन को फिर से यंग बना सकती हैं.

4 फेस सीरम

आप मां को फेस सीरम जैसा यूजफुल ब्यूटी प्रोडक्ट गिफ्ट दें क्योंकि यह आसानी से स्किन में अब्सौर्ब होने के साथ इजी टू यूज मी है. लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि आप की मौम को किस तरह की स्किन प्रौब्लम है. जैसे अगर स्किन में कोलेजन और इलास्टिक ब्रैंड को टूटने से बचाने के लिए उन के लिए ऐसा सीरम लें, जिस में रेटिनोल व ऐंटीऔक्सीडैंट्स मौजूद हों.

वहीं फ्री रैडिकल्स डैमेज की समस्या के लिए कौफी इन्फुसेड सीरम गिफ्ट में दें और अगर उन के चेहरे पर दागधब्बे व पिगमैंटेशन की समस्या हो, तो विटामिन सी युक्त सीरम गिफ्ट में दें. इसी के साथ अगर उन का चेहरा हमेशा ड्राईड्राई रहता है तो उन्हें ह्यालूरोनिक ऐसिड युक्त सीरम गिफ्ट में दें.

5 लिपस्टिक किट

अकसर हम सभी ने देखा है कि मौम के पास 1 या फिर ज्यादा से ज्यादा 2 लिपस्टिक ही होती हैं, जिन्हें वे हर पार्टी, फंक्शन में रिपीट करती हैं. बहुत बार तो वे सस्ते के चक्कर में ब्रैंड को भी इग्नोर कर के लोकल ब्रैंड की लिपस्टिक खरीद लेती हैं, जिस से उन्हें उन की पसंद का शेड तो मिल जाता है, लेकिन इस से उन के लिप्स पर कई बार टैनिंग तक हो जाती है.

लेकिन फिर भी वे इसे इग्नोर कर देती हैं. ऐसे में आप इस मदर्स डे पर उन्हें लिपस्टिक किट गिफ्ट कर सकती हैं, जिस में मैट, ग्लौसी हर तरह की लिपस्टिक हो ताकि जब मन करे वे अपनी ड्रैस के साथ मैच कर लगा लें. साथ ही ब्रैंडेड लिपस्टिक उन के लिप्स की ड्राइनैस व पिगमैंटेशन को भी कम करने का काम करती है यानी साथसाथ लिप ट्रीटमैंट भी मिल जाता है. यही नहीं वे इन्हें लिप्स पर लगाने के साथसाथ चिक्स को भी हाईलाइट कर सकती हैं. इस के लिए लैक्मे, स्विस ब्यूटी, नायका, शुगर कौस्मैटिक, जस्ट हर्ब्स जैसे ब्रैंड्स चूज कर सकती हैं.

यकीन मानिए इतने स्पैशल डे पर ये गिफ्ट पा कर वे खुशी से झम उठेंगी और आप भी उन की खुशी को देख कर मुसकराए बिना नहीं रह पाएंगी.

6 हेयर ट्रीटमैंट के लिए हेयर किट

मौम्स अपने बच्चों की केयर में तो कोई भी लापरवाही नहीं बरतती हैं, लेकिन जब उन की अपनी केयर की बात आती है तो वे सब से ज्यादा लापरवाह हो जाती हैं जैसे प्रौपर डाइट नहीं लेने की वजह से, प्रदूषण, सूर्य की हानिकारक किरणों की वजह से हेयर फौल की समस्या के साथसाथ बालों का मौइस्चर भी खत्म होने के कारण बाल डल व बेजान लगने लगते हैं, जो उन की सुंदरता को कम करने का काम करते हैं. फिर भी वे एक ही शैंपू पर टिकी रहती हैं ताकि बजट न बिगड़ जाए  या फिर यह सोचती हैं कि उन्हें देखने वाला ही कौन है, जो इतनी केयर करें.

ऐसे में आप उन्हें हेयर ट्रीटमैंट गिफ्ट में दे कर उन की खोई सुंदरता को लौटा सकती हैं. इस के लिए आप उन्हें हेयर मास्क गिफ्ट करने के साथसाथ हेयर किट भी दे सकती हैं, जिस में यूजफुल इनग्रीडिएंट्स से बने शैंपू, कंडीशनर, स्क्रब, हेयर मास्क आदि हों, जो उन के बालों को फुल केयर देने का काम करते हैं. शैंपू, कंडीशनर के साथसाथ स्क्रब व हेयर मास्क बालों की केयर के लिए बहुत ही जरूरी प्रोडक्ट है क्योंकि जहां स्क्त्रब स्कैल्प से गंदगी व डैड स्किन को रिमूव करता है, वहीं हेयर मास्क बालों को मजबूती देने के साथसाथ उन्हें सौफ्ट, शाइनी व मौइस्चराइज करने का काम भी करता है.

ऐसे में आप उन्हें एम कैफीन, मामाएअर्थ, वाओ जैसे ब्रैंड्स के हेयर प्रोडक्ट्स गिफ्ट में दे कर उन के बालों को घर बैठे केयर दे कर खूबसूरत बना सकती हैं.

7 रिंकल क्रीम

उम्र बढ़ने के साथसाथ आंखों के नीचे काले घेरे होने के साथसाथ चेहरे पर झर्रियां व फाइन लाइंस की समस्या देखने को मिलती है, जो सुंदरता में तो कमी लाने का काम करती ही है, साथ ही केयर के आभाव में हमारी मौम को समय से पहले बूढ़ा दिखाने का भी काम करती है.

ऐसे में चीजों में इतनी अधिक घिरी रहने के कारण कई बार वे घरेलू नुसखों को भी अपने फेस पर अप्लाई करने में लापरवाही करने लगती हैं. ऐसे में आप उन की सुंदरता व जवानी को फिर से जवां बनाए रखने के लिए उन्हें इस खास दिन पर  रिंकल क्रीम गिफ्ट कर सकती हैं, जिस के बारे में अकसर आप से पूछती होंगी या फिर आप के रिंकल क्रीम के बारे में जिक्र करने पर वे उस का प्राइस पूछ कर चुप हो जाती होंगी. ऐसे में यह गिफ्ट उन के लिए खास होगा क्योंकि उन की बेटी ने उन का इतना ध्यान जो रखा है.

Mother’s Day Special: प्यार का पलड़ा- जब तनु ने जीता सास का दिल

सास की बिगड़ती स्थिति को देख कर तनु दुखी थी. वह मांजी को भरपूर सुख और आराम देना चाहती थी पर घर में काम इतना अधिक रहता था कि वह चाह कर भी मांजी की सेवा के लिए पूरा समय नहीं निकाल पाती थी.

जब से एक दुर्घटना में आभा के पैर की हड्डी टूटी, वह सामान्य नहीं हो पाई थीं. चूंकि आपरेशन द्वारा पैर में नकली हड्डी डाली गई थी जो उन्हें जबतब बेचैन कर देती और वह दर्द से घंटों कराहती रहतीं. कहतीं, ‘‘बहू, डाक्टरों ने मेरे पैर में तलवार तो नहीं डाल दी, बड़ी चुभ रही है.’’

दोनों बेटे उन्हें विश्वास दिलाते कि वे उन के पैर का आपरेशन दोबारा से करा देंगे, चाहे कितना भी रुपया क्यों न लग जाए.

आभा झुंझला उठतीं, ‘‘मेरे बूढ़े जिस्म को कितनी बार कटवाओगे. साल भर से यही कष्ट तो भोग रही हूं. पहले दुर्घटना फिर आपरेशन, कब तक बिस्तर पर पड़ी रहूंगी.’’

डाक्टर से जब उन की परेशानी बताई जाती तो वे आश्वासन देते कि उन का आपरेशन संपूर्ण रूप से सफल हुआ है, उन्हें धीरेधीरे सहन करने की आदत पड़ जाएगी.

आभा बेंत के सहारे धीरेधीरे चल कर अपने बेहद जरूरी काम निबटातीं, परंतु उन का हर काम बड़ी मुश्किल से होता था.

वह रसोईघर में जाने का प्रयास करतीं तो छोटी बहू तनु उन्हें सहारा दे कर वापस उन के बिस्तर पर ले आती और थाली परोस कर उन्हें वहीं बिस्तर पर दे जाती.

बेटे कहते, ‘‘मां, 2 बहुओं के होते हुए तुम्हें रसोई में जाने की क्या जरूरत है.’’

आभा दुखी स्वर में  कहतीं, ‘‘कब तक बहुओं पर बोझ बनी रहूंगी.’’

बेटों ने मां की सेवा करने के लिए एक नौकरानी की व्यवस्था कर दी. परंतु बड़ी बहू लीना के काम ही इतने अधिक हो जाते कि नौकरानी को आभा की तरफ ध्यान देने की फुरसत ही नहीं मिल पाती थी.

लीना चाहे कुछ भी करे, उस के खिलाफ बोलने की हिम्मत पूरे घर में किसी के अंदर नहीं थी क्योंकि वह धनी घर से आई थी. घर में आधुनिक सुविधाओं के साधन फ्रिज, रंगीन टेलीविजन और स्कूटर आदि सामान अपने साथ लाई थी. नकद रुपए भी इतने मिले थे कि छत पर बड़ा कमरा उसी से बना था.

घर के लोगों के दब्बूपन का भरपूर लाभ लीना उठा रही थी. वह घर के कामों में हाथ न बंटा कर अधिकांश समय ऊपर  अपने कमरे में रहती थी और नौकरानी लीना को पुकार कर ऊपर ही अपने लिए चाय, बच्चों का दूध मंगाती रहती.

तनु ने नौकरानी पर सख्ती बरती, ‘‘तुम्हें मांजी की सेवा करने के लिए रखा गया है तो वही करो, फालतू का काम क्यों करती हो.’’

लीना तनु की बात से चिढ़ गई. तनु का मायका उस के मुकाबले कुछ भी नहीं था, फिर जब घर के लोग कुछ नहीं कहते तो वह कल की आई छोकरी कौन होती है मुंह चलाने वाली.

लीना ने ऊपर से ही लड़ना शुरू कर दिया कि छोटे बच्चों का साथ होने के कारण नौकरानी की जरूरत उसे अधिक है न कि मांजी को.

घर में फूट न पड़े इस डर से मांजी ने सब से कह दिया कि वह बगैर नौकरानी के अपना काम चला लेंगी, उन का काम ही कितना होता है.

तनु को सास में अपनी मां नजर आती. वह उन्हें घिसटघिसट कर पूजा का कमरा धोते व कपड़े धोते देखती तो दुखी हो जाती.

वह जेठानी से भी लगाव रखती और पूरे परिवार की एकता बनाए रखने का भरसक प्रयास करती थी.

मगर लीना की नजरों में तनु उसी दिन से आंख की किरकिरी बन गई थी. वह उस के खिलाफ बोलने का मौका ताकती और जब मौका मिलने पर बोलना शुरू करती तो उस की सातों पुश्तों को कोस डालती.

तनु फिर भी शांत बनी रह कर अपनेआप को सामान्य बनाए रखने की कोशिश करती रहती.

रवि कहता, ‘‘तुम ने भाभी के खिलाफ बोल कर उन से दुश्मनी पाल ली, जब भैया कुछ नहीं कहते तो तुम ने क्यों कहा?’’

‘‘मुझ से मांजी का कष्ट देखा नहीं जाता. फिर नौकरानी मांजी के लिए रखी गई थी.’’

‘‘इस घर के मालिक हम नहीं, भैयाभाभी हैं. वे जो चाहें कर सकते हैं,’’ रवि ने अपनी लाचारी दिखाई. यद्यपि वह मां को बहुत चाहता था पर उन के सुखआराम के लिए कुछ कर भी तो नहीं सकता था क्योंकि उस का वेतन बहुत साधारण था.

वह मां से आराम करने को कहता, पर वह पूरे दिन बिस्तर पर पड़ी ऊब जातीं.

वह दुर्घटना से पहले की अपनी दिनचर्या में अब भी उसी प्रकार जीना चाहती थीं.

एक दिन रवि ने अपनी मां को पूजाघर की सफाई करते देखा तो सख्ती दिखाते हुए बोला, ‘‘मां, मिट्टीपत्थर के इस भगवान पर फालतू का विश्वास करना छोड़ दो. तुम ने इन की इतनी अधिक पूजा की, इन पर आंख मूंद कर भरोसा किया फिर भी यह तुम्हारे साथ होने वाला हादसा नहीं रोक पाए.’’

‘‘तू हमेशा नास्तिकों जैसी बातें करता है. यह क्यों नहीं सोचता कि दुर्घटना में मेरी जान बच गई, भगवान की कृपा न होती तो मैं मर जाती.’’

‘‘तुम फालतू की अंधविश्वासी हो.’’

आभा के ऊपर बेटेबहुओं के समझाने का कोई असर नहीं पड़ता था. वह पैर के दर्द से कराहती हुई घिसट कर बालटी भर पानी से गणेशजी की तांबे से बनी प्रतिमा को रेत से मांज कर धोतीं और आरती उतार कर लड्डुओं का भोग लगातीं, तब जा कर भोजन का कौर उन के गले से नीचे उतरता था.

तनु को अटपटा लगता कि ऐसे तो मांजी का कष्ट और अधिक बढ़ जाएगा.

एक दिन तनु दरवाजे के बाहर खड़े ठेले वाले से सब्जी खरीद रही थी कि तभी उस की नजर एक लड़की पर पड़ी. लड़की ने फटेपुराने कपड़े पहने हुए थे और नौकरानी जैसी लग रही थी.

तनु ने पुकारा तो वह लड़की उस के नजदीक चली आई. पूछताछ करने पर पता लगा कि उस का नाम माया है और वह कुछ घरों में बरतन, कपड़े धोने व सफाई का काम करती है.

तनु ने उस से 200 रुपए महीने पर मांजी का पूरा काम करना तय कर लिया और सख्ती से ताकीद कर दी कि वह घर के किसी अन्य सदस्य के बहकावे में आ कर मांजी का काम नहीं छोड़ेगी.

माया ने उसी दिन से मांजी का काम करना शुरू कर दिया. उन का कमरा धोया, बिस्तर की चादर बदली और पैरों की मालिश की.

मांजी छोटी बहू का अपने प्रति प्रेम देख कर खुशी से गद्गद हो उठीं और देर तक बहू को आशीर्वाद देती रहीं तथा उस की प्रशंसा करती रहीं.

सास द्वारा तनु की प्रशंसा सुन कर बड़ी बहू लीना जलभुन कर राख हो गई और कहे बिना नहीं चूकी कि छोटी ने अपने पास से 200 रुपए महीने नौैकरानी पर खर्च कर के कोई तीर नहीं मार लिया. वह क्या घर के लिए कम खर्च कर रही है. पूरे दिन की नौकरानी तो उसी के पैसों की है.

तनु जेठानी की बात का बुरा न मान कर उसे समझाती रही कि दीदी हम दोनों मांजी की बेटियों के समान हैं. उन की किसी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए.

लीना बदले की आग में झुलसती रही. उसे बुरा लगता कि सास ने तनु की रखी नौकरानी की जितनी प्रशंसा की उस से आधी भी कभी उस के मायके से मिले दहेज की नहीं की थी.

लीना चिढ़ती रही और तनु को नीचा दिखाने की ताकझांक में लगी रही.

सास का स्नेह तनु के तनमन में हिलोरें भर देता. उस ने पति से कह दिया कि वह अपने खर्चें में से कटौती कर के माया का वेतन चुकाती रहेगी. कम से कम सास को आराम तो मिल रहा है.

धीरेधीरे माया आभा के साथ सगी बेटी जैसी घुलमिल गई. वह रसोई में जा कर उन के लिए चाय व फुलके बना लाती, खिचड़ी बना कर अपने हाथ से खिला देती.

एक बार माया को किसी काम के सिलसिले में 4 दिन की छुट्टी लेनी पड़ गई तो आभा की परेशानी अधिक बढ़ गई. अब तो उन्हें अपने हाथों पानी की बालटी उठाने की आदत भी छूट चुकी थी, ऐसे में पूजाघर की सफाईधुलाई किस प्रकार से की जाए. तनु की भी हालत ऐसी नहीं थी कि वह कुछ काम कर सके क्योंकि वह गर्भावस्था में चक्कर और उलटियों से परेशान थी, फिर डाक्टर ने उसे वजन उठाने के लिए मना कर रखा था.

मां की परेशानी को देख कर बेटों ने उन के पूजाघर में ताला लगाते हुए कह दिया, ‘‘कभी 2-4 दिन गणेशजी को भी आराम कर लेने दो. माया आएगी तो सफाईधुलाई कर लेना.’’

पूजाघर में ताला डाले अभी तीसरा दिन ही बीता था कि उस बंद कमरे से आती बदबू के कारण घर में बैठना कठिन हो गया. शायद कोई चूहा मर कर सड़ गया था.

मां की चिंता व बेचैनी देख कर बेटों ने पूजाघर की चाबी मां को थमा दी और अपने काम पर चले गए.

गणेशजी की प्रतिमा से चिपके सड़े चूहे के जिस्म पर रेंगते कीड़ों को देख कर किसी की भी हिम्मत पूजाघर की सफाई करने की नहीं हुई, ऐसी गंदगी को कौन हाथ लगाए.

घर के लोगों ने जब जमादार को बुला कर चूहा फिंकवाने की बात की तो मांजी बिदक गईं और बोलीं, ‘‘हमारे पूजाघर में जमादार के जाते ही उस की पवित्रता नष्ट हो जाएगी. जमादार तो साक्षात चांडाल का रूप होता है.’’

वह बेटों पर क्रोधित होती रहीं कि यदि वे पूजाघर में ताला बंद नहीं करते तो वहां चूहा नहीं मरता.

बेटे कहते रहे, ‘‘तुम थाली भरभर कर लड्डू गणेशजी को भोग लगाती हो तभी पूजाघर में इतने अधिक चूहे हो गए हैं. और यह कैसे भगवान हैं जो चूहों से अपनी रक्षा नहीं कर पाए तो अपने भक्तों की रक्षा कैसे करेंगे?’’

मां और बेटों में सड़े चूहे को ले कर वादविवाद चलता रहा पर आभा किसी भी प्रकार नीच जाति के आदमी से गणेशजी की प्रतिमा का स्पर्श कराने को तैयार नहीं हुईं.

पूरा दिन घर के लोग पुरानी नौैकरानी को डांटडपट कर मरा चूहा उठाने को तैयार करते रहे पर वह कहती रही कि यह काम माया का है, वही करेगी.

अगले दिन सुबह माया आई तो सभी ने चैन की सांस ली. वह आते ही पूजाघर की सफाई में जुट गई. उस ने तुरतफुरत चूहा उठा कर फेंक दिया और गणेशजी की प्रतिमा को पहले तो रेत से रगड़रगड़ कर साफ किया फिर साबुन लगा कर नहलाया. फिनायल डाल कर पूजाघर की धुलाई की व कई अगरबत्तियां जला कर गणेशजी के सामने रख दीं.

आभा मुग्ध भाव से माया को देखती रहीं और उस के काम की सराहना कर के बारबार प्रशंसा करती रहीं.

माया सफाई का काम पूरा कर के 2 गिलासों में चाय डाल कर ले आई. एक मांजी को थमा दिया और दूसरा अपने मुंह से लगा कर चाय पीती हुई लापरवाही से बोली, ‘‘अम्मां, क्यों हमारी इतनी तारीफ करती हो, मरा हुआ चूहा हम नहीं फेंकेंगे तो कौन फेंकेगा. सफाई करना तो हमारा खानदानी काम है. हमारे दादा म्युनिसिपैलिटी के सफाई कर्मचारी थे. मां अस्पताल में मरीजों की गंदगी फेंकती हैं. पिता व चाचा मुरदाघर की लाशें ढोते हैं.’’

माया के मुंह से उस के खानदान के बखान को सुन कर मांजी की बोलती बंद होने लगी. वह लड़खड़ाती जबान से पूछने लगीं, ‘‘माया, तेरी जाति क्या है?’’

‘‘हम बाल्मीकि हैं, मांजी,’’ माया ऐसे बोली जैसे कितनी बड़ी पंडापुरोहित हो.

‘‘बाल्मीकि यानी कि जमादार?’’

‘‘हां, अम्मां, आप चाहे जो कह लो, वैसे हम हैं तो बाल्मीकि. आप ने रामायण में पढ़ा होगा कि बाल्मीकि के आश्रम में सीता माता रही थीं, उनके लवकुश वहीं पैदा हुए थे.’’

माया की बातें आभा के कानों से टकरा कर वापस लौट रही थीं. एक ही बात उन की समझ में आ रही थी कि माया अछूत कन्या है और उन के पूजाघर की सफाई अब तक उसी के हाथों से हो रही थी.

‘‘हाय, सबकुछ अपवित्र हो गया,’’ मांजी कराह उठी थीं.

तनु रसोईघर से माया की तरफ लपकी कि किसी प्रकार से इसे चुप करा सके, पर माया तो न जाने क्याक्या उगल चुकी थी और सकपकाई जड़ पड़ी मांजी से वह पूछ रही थी, ‘‘क्या हुआ, अम्मां?’’

लीना को आज बदला चुकाने का अवसर मिला था. फटाक से आ कर उस ने माया के गाल पर जोर से तमाचा जड़ दिया.

‘‘कलमुंही, कैसी भोली बन रही है, पूछ रही है क्या हुआ. अरे, क्या नहीं हुआ? तू ने मांजी का सारा धर्म भ्रष्ट कर दिया. गलती तो सारी छोटी बहू की है, जानबूझ कर घर में जमादारिन को ले आई,’’ लीना डांटने के अंदाज में बोली.

तनु भय से थरथर कांप रही थी. कितनी बड़ी गलती हो गई उस से, वह माया को काम पर रखने से पहले उस की जाति पूछना भूल गई थी.

वह सास के पैर पकड़ कर रोने लगी, ‘‘मांजी, मुझे माफ कर दीजिए. बहुत बड़ी गलती हो गई है मुझ से.’’

माया भी रो रही थी. बड़ी बहू ने इतनी जोर से तमाचा मारा था कि उस का गाल लाल हो गया था. उस पर उंगलियों के निशान उभर आए थे.

‘‘अच्छा, अब हम चलें अम्मां, हम से गलती हो गई. हम ने मरा चूहा फेंक कर गलती की, अपने खानदान की प्रशंसा कर के गलती की, हम अपनी गलती की माफी मांगते हैं, अम्मां. हमें अपनी पगार भी नहीं चाहिए,’’ माया उठ कर दरवाजे की तरफ चल दी.

मांजी को जैसे होश आया. लपक कर माया का हाथ कस कर थाम लिया और बोलीं, ‘‘अम्मां को किस के सहारे छोड़ कर जा रही है. अभी मेरा आखिरी वक्त नहीं आ गया कि तू छोड़ कर चल दी. और छोटी बहू, तुम से कोई गलती नहीं हुई है. यह रोना बंद करो और जा कर मुंह धो लो.’’

‘‘क्या? मांजी…आप…’’ तनु आश्चर्य से अटकअटक कर बोली. उस की समझ में मांजी का यह बदला हुआ रूप नहीं आ रहा था.

बाजी उलटी पड़ती देख लीना चुपचाप ऊपर चली गई.

माया की रुलाई फिर से फूट पड़ी थी पर यह खुशी के आंसू थे.

‘‘अम्मां, तुम ने मुझे माफ कर दिया, मैं ने तुम्हरा पूजाघर अपवित्र कर दिया था?’’ माया को जैसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उस की नौकरी बनी रहेगी.

‘‘किसी ने कुछ अपवित्र नहीं किया,’’ मांजी निर्णयात्मक स्वर में बोलीं, ‘‘अपवित्रता तो मेरे मन में थी जो अब हमेशा के लिए निकल चुकी है. जा बेटी, माया, तू रसोईघर में जा कर अपने हाथों से मेरे लिए व अपने लिए रोटी सेंक कर ले आ. आज हम दोनों एकसाथ बैठ कर  खाना खाएंगे.’’

माया दौड़ती हुई रसोईघर में चली गई.

मांजी तनु से कह रही थीं, ‘‘आज से सारी छुआछूत बंद. इस माया ने बेटी से बढ़ कर मेरी सेवा की है, जरा सी बात पर क्या इसे निकाल दूंगी. और अगर यह चली गई तो मैं जीऊंगी कैसे. मेरी सेवा, मेरी देखभाल कौन करेगा? छोटी बहू, तुम्हारी यह खोज मेरे लिए बहुत लाभदायक साबित हुई है. माया ने मेरी बेटी की कमी पूरी कर दी.’’

तनु मन ही मन मुसकरा रही थी. जेठानी चाहे कितनी कोशिश कर ले, मांजी के प्यार का पलड़ा उसी की तरफ भारी रहेगा.

Mother’s Day Special: सरप्राइज- मां और बेटी की अनोखी कहानी

family story in hindi

अगर यह लक्षण दिख रहे हैं तो आपको भी हो सकता है राजा बेटा सिंड्रोम

“आशु बेटा किचन में क्या कर रहा है ?यह तेरा काम नहीं। चल बाहर आ मैं बना कर देती हूं तुझे मैगी”, सीमा ने अपने बेटे से कहा.

सीमा के पास ही बैठी उसकी बचपन की सखी ने हैरानी से सीमा की तरफ देखा और टोका,” क्या कर रही है यह तू? अगर वह किचन में अपने लिए मैगी बना रहा है तो बनाने दो इसमें हर्ज क्या है?”

दरअसल हर मां बाप अपने बच्चे से बहुत ज्यादा प्रेम करते हैं. लेकिन जैसा कि हम सब जानते हैं कि अति हर चीज की बुरी होती है. वैसे ही आपका प्यार भी आपके बच्चे के लिए नुकसानदायक हो सकता है. खासकर मां का लगाव बेटे से कुछ ज्यादा ही होता है. अगर आप अपने बच्चे के सारे काम खुद करती हैं और उन्हें हल्की सी भी आंच नहीं आने देती हैं तो इसका मतलब है आपको भी राजा बेटा सिंड्रोम हो गया है. आइए जानते हैं इस सिंड्रोम के कुछ लक्षण.

आप उसे हर लग्जरी प्रदान कर रही हैं

ऐसी मां अपने बेटे की इच्छाओं और जिद्द से इनकार नहीं कर सकतीं. वे अपने बच्चे को खुश रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश करती है- चाहे उसके लिए महंगे से महंगे खिलौने खरीदना हो या फिर देर रात उसका पसंद का खाना सिर्फ इसलिए बनाना हो क्योंकि वह ऐसा चाहता है. ऐसी मां अपने बेटे के लिए हर काम करती हैं चाहे फिर वह कमरे को अच्छी तरह रखना हो या कुछ भी और शायद ही उसे घर के किसी काम को करने के लिए परेशान करती हों.

 बच्चे को किचन में नहीं जाने देती हैं

ऐसी मां के बेटों को रसोई घर में जाने की जरूरत नहीं है. इस वजह से वह कुछ भी बनाना नहीं सीखते हैं। वे इंडिपेंडेंट होने से काफी दूर रहते हैं और हमेशा भोजन के लिए अपनी माँ या फिर अपनी पत्नी पर निर्भर रहते हैं. अगर वे खाना पकाने को बुरा या फिर ये समझे कि ये काम सिर्फ लेडीज का है तो आश्चर्य नहीं होगा.

 अपने बेटे के वैवाहिक जीवन में दखल देना

ऐसी मां अपने बेटे को अपने से अलग नहीं देख पाती हैं – भले ही वह विवाहित क्यों न हो। वे अपनी बहू से पूछती रहती होंगी कि क्या उनके बेटे को लंच भोजन के समय पर खिलाया गया था या नहीं, उसे खाने के लिए क्या दिया और इसी तरह के ढेरों सवालों से वह अपनी बहु को असुरक्षित महसूस करवाती हैं. ऐसा भी हो सकता है कि वे अपनी बहू की भूख के बारे में उतना ध्यान न दें जितना अपने बेटे पर देती हैं.

 उसकी गलतियों या बुरे कामों को नज़रअंदाज़ करना

सभी बच्चे गलतियाँ करते हैं कुछ बच्चे ऐसी गलतियां करते हैं जो उनके आसपास दूसरों को चोट पहुँचा सकती हैं. यह माता-पिता की एक बड़ी जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चे को इतना हमदर्द होना सिखाएं कि वह  केवल अपने बारे में ही नहीं बल्कि दूसरों के बारे में भी सोचे. लेकिन, यदि मां अपने बेटे के गलत व्यवहार को नजरंदाज करती हैं, तो आप केवल उसे और गलतियां जारी रखने के लिए प्रेरित करेंगी और बच्चा इस बात की परवाह नहीं करेगा कि वह किसी और की भावनाओं को ठेस पहुँचा रहा है या नहीं.

 वह अपने फैसले खुद नहीं ले पाएगा

ऐसे बच्चों की माताओं के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल होता है कि उनका छोटा लड़का अब बड़ा हो गया है और इतना स्मार्ट है कि वह खुद की देख रेख खुद कर सके और जब चीजें मुश्किल हों तो खुद की रक्षा कर सके. इसका रिज़ल्ट, वे हमेशा इस बारे में चिंता करती रहती है  कि वह कहां है और हो सकता है कि वे हर समय उसे फोन करती रहें. यदि वह उनकी बुद्धिमता के लिए उनसे सलाह किए बिना कोई फैसला लेता है तो वे नाराज हो सकती हैं. जरूरत से ज्यादा प्यार और दुलार भी बच्चे को बिगाड़ सकता है. इसलिए ऐसी स्थिति में खुद को फंसाने से बचें.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें