Gender Discrimination: हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में कोर्ट परिसर में एक महिला अधिवक्ता पर तेजाब फेंकने का मामला सामने आया. इस घटना में महिला बुरी तरह घायल हो गई. घायल महिला अधिवक्ता शशिबाला को तुरंत शहर के सरकारी अस्पताल में भरती कराया गया. घटना उस वक्त हुई जब शशिबाला रोजाना की तरह कोर्ट जा रही थी. तभी अचानक पीछे से 2 युवक अपने कुछ साथियों के साथ आए और शशिबाला पर तेजाब फेंक दिया. तेजाब फेंकने के बाद सभी आरोपी मौके से फरार हो गए. महिला वकील पर यह हमला इसलिए किया गया क्योंकि वह पहले से ही आरोपियों के खिलाफ 2 मुकदमे लड़ रही थी जिन में दहेज उत्पीड़न और छेड़छाड़ का मामला शामिल है.
‘नेशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो’ के अनुसार, 2021 में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के 450 से अधिक मामले दर्ज किए गए. कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल का नितांत अभाव है. महिलाओं को अकसर औफिस या कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न या हरासमैंट का सामना करना पड़ता है. अवांछित स्पर्श, अश्लील टिप्पणियां, सैक्सुअल एडवांटेज, अश्लील चुटकुले सुनाना, शारीरिक उत्पीड़न जैसेकि धक्का देना, थप्पड़ मारना या तेजाब फेंकना जैसी कितनी ही स्थितियों का सामना करना पड़ता है. वे कुछ कहें तो बात आगे बढ़ जाती है. चुप रहें तो काम करना कठिन हो जाता है.
जरा सोचिए
महिलाओं के साथ इस तरह की घटनाएं क्यों होती हैं? लड़कियों या महिलाओं के साथ इस तरह की वारदात को अंजाम देने वाले लोग कौन होते हैं? क्या ये क्रिमिनल हैं जिन्हें शुरू से क्राइम करने की आदत है? क्या ये सब कर के इन्हें कोई सैक्स सुख मिलता है? क्या ये लंबी प्लानिंग के बाद ऐसा करते हैं? नहीं ये ऐसा करने के लिए कोई प्लानिंग नहीं करते. किसी स्त्री को देख कर वासनावश या किसी स्त्री के किसी काम से उत्पन्न गुस्सा या स्त्री को उस की औकात दिखाने की तमन्ना या फिर अपनी मर्दानगी को दिखाने का बहाना, इन घटनाओं के पीछे बस ये ही कुछ कारण होते हैं.
ऐसा करने वाले लोग लोग क्रिमिनल नहीं होते. पढ़ेलिखे नौर्मल घरों से आते हैं. धर्म और पूजापाठ में गहरा विश्वास भी करते हैं. इस काम में उन्हें कोई सैक्स सुख भी नहीं मिलता. ऐसे काम अचानक में हड़बड़ी में और छिप कर किए जाते हैं. कई लोग भीड़ में भी करते हैं ताकि सब को दिखा सकें कि स्त्री उन की मरजी के विरुद्ध कुछ करे या आगे बढ़े तो उस का अंजाम क्या हो सकता है. वस्तुत: वे स्त्री को उस की औकात दिखाते हैं.
मगर यह प्रवृत्ति आती क्यों है? क्या यह नैचुरल है? दरअसल यह पावर गेम है. यह सिखाया गया है. परिवार, धर्म, शिक्षा व्यवस्था, प्रशासन और समाज बचपन से जैंडर के प्रति एक खास तरह का नजरिया देते हैं. एक नेरेटिव बनाई जाती है. लड़के और लड़कियों के वजूद का अंतर स्थापित किया जाता है.
डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर के बच्चों के दिमाग में 10 साल से भी कम उम्र में जैंडर स्टीरियोटाइप्स भर दिए जाते हैं. मतलब नन्ही सी उम्र में ही हम लड़कों को लड़का होना और लड़कियों को लड़कियां होना सिखा देते हैं. इस स्टडी का नाम ग्लोबल अर्ली एडोलिसेंट स्टडी था और उस में कहा गया कि हम अरबों रुपए टीनऐजर्स को लड़कालड़की की बराबरी का पाठ पढ़ाने में खर्च कर देते हैं जबकि यह भेद तो बच्चे 10 साल की उम्र से पहले से करना शुरू कर देते हैं.
भेदभाव की शुरुआत
इन की शुरुआत कौन करता है? बेशक खुद हमारा परिवार और हमारे पेरैंट्स. जब छोटे लड़के नेलपौलिश और बिंदी लगाते हैं तो परिवार के सदस्य उन का मजाक उड़ाते हैं और डांटतेडपटते हैं. लड़कियां बंदूक या कार चलाती हैं तो पेरैंट्स खुद उन के लिए गुडि़यां ले आते हैं. लड़कियों के पिंक कपड़े चुनते हैं, लड़कों के लिए नहीं. उन्हें ‘मैस्कुलिन’ रंग दिए जाते हैं. पिंक रंग लड़कियों से जोड़ते हैं तभी यौन आजादी और नो मतलब नो- यह सिखाने वाली फिल्म का नाम भी पिंक ही रख देते हैं. यह स्टीरियोटाइप हमारे खुद के बनाए हुए हैं.
जब किसी लड़के का बर्थडे हो तो परिवार के लोग कहेंगे कि लड़का है तो कार, रेसिंग कार, रोबोट, गन, वीडियो गेम गिफ्ट करेंगे. लड़की को बर्थडे गिफ्ट देना हो तो किचन सैट, गुडि़या, फ्रौक आदि दी जाती है. मौल में डौल्स पिंक कलर एरिया में मिलती हैं जबकि कार, बैट ब्लू एरिया में. लैंगिक भेदभाव हमारे जेहन में घुलामिला हुआ है. अब तो लड़कियों के टूथब्रश भी अलग दिखते हैं. टूथब्रश पर क्विन का हैड होगा या फिर पिंक कलर का होगा. दरअसल, बच्चे इस तरह के भेदभाव की सोच के साथ पैदा नहीं होते हैं. हम उन्हें जैंडर का भेदभाव बताते हैं.
आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि नन्ही लड़कियों के औनलाइन गेम्स के टिपिकल विजुअल्स और बैंकग्राउंड्स पिंक रंग से भरे पड़े हैं. लड़कियों के गेम्स भी ज्यादातर मेकअप, ड्रैसिंग और कुकिंग से जुड़े होते हैं. अगर आप 5 टौप औनलाइन गेम्स की साइट्स देखेंगे तो पाएंगे कि सभी के विषय औरतों की सदियों से चली आ रही भूमिकाओं पर ही आधारित हैं.
यही बात हमारी टैक्स्ट बुक्स भी सिखाती हैं. ऐक्शन एड की एक फैं्रच इंटर्न ने एनसीईआरटी की किताबों पर एक अध्ययन किया तो पाया कि हम कक्षा 2 से ही बच्चों को लड़केलड़की के कथित खांचों में बंद करने लगते हैं. अध्ययन में कक्षा 2 की ही किताबों में अधिकतर पुरुष हैड औफद फैमिली थे जबकि औरतें घरेलू काम करने वाली, बच्चों की देखभाल करने वाली. जौब करने वाली औरतों को भी नर्स, डाक्टर या टीचर के ही रोल में दिखाया गया है.
हम अगर अपने घरपरिवारों में गौर करें तो यही दिखेगा कि हमारे यहां बेटे को रोटी बनाने के लिए कभी प्रेरित नहीं किया जाता क्योंकि परिवार में रोटी बनाने, कपड़े धोने, साफसफाई करने का काम मम्मी यानी स्त्री करती है, पापा नहीं. पापा यानी पुरुष तो घर में मिक्सी और टीवी ठीक करते हैं. अपनी कार, मोटरसाइकिल धोते हैं. टैक्स रिटर्न जमा करते हैं. इनवैस्टमैंट प्लान करते हैं.
व्यवस्था है विचारधारा नहीं
कई ऐसी महिलाएं हैं जो नौकरीपेशा हैं लेकिन जब पैसों के लेनदेन, बैंक या शेयर बाजार में निवेश की बात आती है तो महिला नहीं उस का पति यह काम करता है. कई नौकरीपेशा महिलाएं यह भी नहीं जानतीं कि उन्हें पैसे किस तरह विड्रौल करने हैं. इस का कारण यह नहीं है कि महिलाएं कर नहीं सकतीं बल्कि इसलिए क्योंकि उन का ब्रेनवाश किया गया है. उन के दिमाग में ठूंस दिया गया है कि वे डौक्यूमैंट्स समझने, कैलकुलेशन करने और मैथ्स में कमजोर हैं. बैंक की बातें उन्हें समझ में नहीं आएंगी. उन्हें कहा जाता है कि तुम रहने दो. बड़ी होती लड़कियों से यह नहीं कहा जाता है कि खुद से अपना बैंक खाता खोलो, डौक्यूमैंट्स देखो, निवेश के बारे में जानो.
हमारा समाज पितृसत्तात्मक है. पितृसत्ता एक व्यवस्था है एक विचारधारा नहीं. इसे तोड़ने के बारे में हम खुद नहीं सोचते. इसे समाज, विज्ञान, इतिहास, साहित्य, संस्कृति और सब से खास विज्ञान के जरीए पुष्ट किया गया है. लड़कियों और लड़कों के दिमाग में ऐसा कोई बायोलौजिकल फर्क नहीं होता जो समाज में उन की भूमिकाओं को तय करता है. दिमाग से लड़की भी नैचुरल हंटर हो सकती है और लड़का नैचुरल होममेकर.
लड़कों और लड़कियों में जैंडर स्टीरियोटाइप भर कर हम उन का नुकसान करते हैं. डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार इस से हम लड़कियों को कमजोर बनाते हैं. हम उन्हें सिखाते हैं कि शरीर तुम्हारा मुख्य एसेट है. उसे बचाना जरूरी है. इस तरह लड़कियां पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर होती हैं. उन के शारीरिक और यौन हिंसा का शिकार होने की स्थितियां बनती हैं. उन के बाल विवाह, जल्दी मां बनने, एचआईवी और दूसरे यौन संक्रमणों का शिकार होने की आशंका होती है. हम लड़कों को भावुक नहीं बनाते. लड़कियों की इज्जत करना नहीं सिखाते. इस वजह से वे अकसर हिंसक बनते हैं और नशे का शिकार होते हैं.
झूठी मर्दानगी का मुखौटा पहनने के बावजूद कभीकभी उन का दिल इस कदर टूट कर बिखरता है या फिर निराशा हाथ लगती है कि वे भावनाओं को संभाल नहीं पाते. लड़कियों की तरह उन्हें रोना नहीं सिखाया जाता सो यह बेचारगी उन के अंदर घुटन भरती है और कई बार वे आत्महत्या करने को विवश होते हैं. कुल मिला कर समाज भी लड़कियों और लड़कों के बीच बचपन से भेदभाव कर के उन का ही नुकसान करता है.
पाबंदियों के बीच कुम्हलाता जीवन
लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है कि स्कूल से सीधे घर आना है. कभीकभार देर हो जाए तो बातें सुनाई जाती हैं, ताने दिए जाते हैं और कुछ लड़कियों की पिटाई भी होती थी. लेट होने पर पचासों सवाल पूछे जाते हैं कि कहां थी? किस के साथ थी? क्यों आने में देर हो गई? उम्र के साथसाथ जब लड़कियां बड़ी होती हैं तो इस तरह के सवालों के साथसाथ इन परंपराओं की बेडि़यों का दायरा भी बड़ा होता जाता है.
जैसे अगर लड़कियां बाजार जाएंगी तो भाई या पिता को ले कर ही जाएंगी वरना नहीं जाएंगी. अगर कभी अकेले या अपने दोस्तों के साथ गई भी हों तो शाम होने से पहले घर में उन की उपस्थिति दर्ज हो जानी चाहिए नहीं तो घर वाले कुछ बोलें या न बोलें पड़ोस वाले बेशर्म, बदचलन जैसे अनगिनत टैग से नवाज देंगे. लड़कियों पर लगी समय की पाबंदी के पीछे सोच थी कि कहीं लड़की भाग गई या उस के साथ ऊंचनीच हो गई तो परिवार की क्या इज्जत बचेगी? पर सवाल उठता है कि आखिर इन परंपराओं और सवालों का बो?ा सिर्फ लड़कियों पर क्यों डाला गया?
आज लड़कियां खेलकूद में भाग तो ले रही हैं लेकिन लड़कों की तुलना में उन की भागीदारी आउटडोर गेम्स में कम ही दिखती है. वे पढ़ाई तो करती हैं मगर नौकरी से ज्यादा इस सोच के साथ कि पढ़ने से अच्छे घर में शादी होगी. अगर हम इस के पीछे की मानसिकता को सम?ाने की कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि घरेलू दबाव, समाज द्वारा थोपी गई परंपरा, सुंदर दिखने की होड़, पितृसत्तात्मक सोच आदि ही इस के लिए जिम्मेदार हैं. यह सोच धीरेधीरे लड़कियों के दिमाग में घर कर जाती है जिस के परिणामस्वरूप वे इसी तरह जीने की आदी हो जाती हैं.
स्कूलकालेज की पाबंदियां
लड़कियों के होस्टल में 10 बजे के बाद ऐंट्री पर बैन लगा दिया जाता है. सुरक्षा के नाम पर रात 10 बजे के बाद लड़कियों को होस्टल में कैद कर के उन की सुरक्षा का ड्रामा क्यों किया जाता है? क्या कालेज, यूनिवर्सिटी जैसी जगहों पर जैंडर के आधार पर समय की पाबंदी लड़कियों को सशक्त कर पाएगी? देखा जाए तो लड़कियों के साथ हिंसा या किसी तरह की घटना इसलिए नहीं होती कि वे देर रात तक बाहर होती हैं बल्कि इस हिंसा के पीछे पितृसत्तात्मक सोच है. लड़कियों को ही कैद करना किस प्रकार का सामाजिक न्याय है? यह नियम लड़कों पर लागू नहीं होता.
नौकरी और शादी के बाद लागू होती पाबंदियां
शहरों में लड़कियों की उम्र 20-25 होते ही समय पर शादी कर लेने की नसीहत दी जाती है. कुछ लड़कियां शादी की नसीहत को मान लेती हैं, कुछ के साथ जोरजबरदस्ती की जाती है और कुछ इस नसीहत का विरोध कर के अपने पैरों पर खड़ा होने की जिद पकड़ लेती हैं. इस जिद को पूरा करने के लिए एक नए मुकाम की तलाश में महानगरों की ओर जाती हैं. इन महानगरों में भी उन की मुसीबतें कम नहीं होती हैं. एक के बाद एक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. फिर वे नौकरी कर के पैसा कमाना शुरू करती हैं लेकिन नौकरी करते हुए आजादी के ये चंद दिन ही होते हैं. 30-32 की उम्र के होते ही इन नौकरीपेशा लड़कियों पर शादी का दबाव आ जाता है.
जौब करने वाली लड़की की जब शादी हो जाती है तो उस की जिम्मेदारियां दोगुनी रफ्तार से बढ़ने लगती हैं. औफिस से छूटते ही घर पर जल्द से जल्द पहुंचने की बेचैनी रहती है क्योंकि देरी होने पर ससुराल वालों को जवाब देना पड़ता है. इस तरह पाबंदियों के साथ महिलाएं किसी तरह अपना जीवन ढोती हैं. बच्चों की परवरिश अच्छे से करने के लिए कई दफा अच्छी खासी नौकरी भी छोड़नी पड़ती है.
सोशल मीडिया पर मौजूद पितृसत्ता
आज के डिजिटल दौर में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मजाक में महिलाओं को कमजोर दिखाया जाना और होमोफोबिक बातों का खूब चलन है. कुछ समय पहले तक यह टैलीविजन और सिनेमा तक ही सीमित था. अब ऐसे संगीत, वीडियोज, रील्स और स्टैंड अप कौमेडी आदि के जरीए इंटरनैट पर परोसे जा रहे हैं. इन से आज की युवा महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा, रेप जोक्स और धमकियों को आम बात समझने लगे हैं. पुरुषों को सशक्त और आत्मनिर्भर दिखाया जाता है और महिलाओं को कमजोर, नाजुक और कामुक बताया गया. पुरुष वर्ग ने उस के शरीर को उपभोग की वस्तु की तरह सीमित कर दिया.
धर्म की देन
धर्म ने हमेशा स्त्री को दोयम दर्जा दिया है. स्त्री को पुरुष के पीछे चलने वाली अनुगामिनी का नाम दिया गया. ऐसे रीतिरिवाज बनाए गए जिन में पुरुषों की पूजा की जाए और स्त्रियां उन की दासी बन कर रहें. किसी भी धर्म की किसी भी कहानी में स्त्री को समान दर्जा नहीं दिया गया. धर्म ने हमेशा स्त्रियों के हाथ बांधे हैं और उन्हें कमतर दिखाया है. यही वजह है कि अधिक धार्मिक इंसान स्त्री के प्रति अधिक कठोर होता है. वह उसे अपने पांव की जूती सम?ाता है.
कैसे रोका जाए जैंडर के नाम पर भेदभाव
फ्रैंच लेखक सिमोन डि बिभोर अपनी पुस्तक ‘द सैकंड सैक्स’ में बताती हैं कि कोई भी औरत पैदाइशी औरत नहीं होती, वह बनाई जाती है. औरत होना क्या है यह बचपन से ही सिखाया जाता है. इसी तरह मर्द भी पैदाइशी मर्द नहीं होते उन्हें भी बनाया जाता है.
जैंडर सोशल कंस्ट्रक्ट है नैचुरल नहीं है. हम जिस समाज में रहते हैं वह सदियों से पितृसत्ता की मजबूत दीवारों पर खड़ा रहा है. ऐसी दीवारें जो पुरुषों को विशेषाधिकार देती हैं और महिलाओं को सीमाओं में बांध देती हैं. लैंगिक भेदभाव कोई एक दिन की समस्या नहीं बल्कि हमारी रोजमर्रा की सोच, व्यवहार और परवरिश में गहराई से बसी हुई एक परंपरागत सचाई है. अकसर इसे सिर्फ महिलाओं की समस्या सम?ा जाता है लेकिन असल में यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है.
इसे रोकने के लिए जरूरी है कि शिक्षा व्यवस्था को बदला जाए. इस के लिए इतिहास से ले कर गणित, साहित्य से ले कर विज्ञान, सभी को बदलना होगा. बच्चों को शुरुआत से ही बताना होगा कि औरतों को किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है. उन के योगदान को लगातार नकारा जाता है. लड़कियों का सशक्तीकरण ऐसे करना होगा कि कुछ बड़ा करती हुई लड़कियां हमें चुभे नहीं.
बेटों को संवेदनशील बनाने की जरूरत
घरपरिवार में बड़ेबुजुर्ग ही बोलते हैं कि तुम्हें बड़ा बनना है, ज्यादा से ज्यादा कमाना है, तुम पर परिवार की जिम्मेदारी है. तुम्हीं से हमारा खानदान आगे बढ़ेगा. वही लड़का जब अच्छे नंबर नहीं ला पाता या बेरोजगार होता है या उसे संतान नहीं होती या वह रिलेशनशिप निभाने में फेल हो जाता है तो उसे लगता है कि चह अच्छा पुरुष साबित नहीं हो पाया. यह बात वह सह नहीं पाता और कई दफा खुद को खत्म कर लेता है. उसे यह नहीं बताया जाता कि अगर कुछ हासिल नहीं हो पाया तो क्या करना चाहिए. दरअसल, पुरुषों को संवेदनशील बनाना होगा. उन्हें भी खुल कर अपनी ऐंग्जाइटी, घबराहट, खामियां या कमजोरियां बताने की आदत डलवानी होगी. उन्हें भी अपनी गलतियां स्वीकार करने की हिम्मत देनी होगी. यहां पुरुषत्व आड़े नहीं आना चाहिए. उन्हें सम?ाना होगा कि यदि वे गलत रास्ते पर हैं तो कोई लड़की या महिला भी उन्हें गाइड कर सकती है, उन्हें गलत कह सकती है या फटकार लगा सकती है.
बेटों को सिखाना होगा कि सहमति क्या है
कंसैंट यानी सहमति का पाठ बेटे को बचपन से ही पढ़ाया जाना चाहिए. ‘न’ नाम की चीज उन के कानों में घोलनी होगी. जब वे न सुनने लगेंगे तो उन्हें सम?ा में आएगा कि केवल इच्छा कर लेने से दुनिया में हर चीज नहीं मिलती. कई घरों में इकलौते लड़के की हर बात मानी जाती है. जब पेरैंट्स न कहेंगे तो उस का नजरिया बदलेगा. उसे महसूस होगा कि मेरी ही तरह दूसरों की भी भावनाएं हैं. वह औरतों के प्रति सम्मान दिखाना शुरू कर देगा. सम्मान करने की बात सिखाई जाती है, सम?ाई जाती है यह अपनेआप नहीं होता.
बेटा घर में बरतन साफ कर दे तो मां ही मना कर देती है. यह हर घर की बात है. जब कभी लड़का बरतन मांजता है तो मां ही मना कर देती है कि लड़के भला बरतन मांजते हैं? यानी कदमकदम पर मां और परिवार के लोग ही बेटे को बताते हैं कि फलां काम पुरुष और फलां काम महिला करती है. ट्रेनिंग घर से ही शुरू होनी चाहिए. ऐसा करने से ही काफी हद तक असमानता कम हो जाएगी. इस से उन में सैक्सुअल फ्रीडम भी आएगी.
लड़की क्यों नहीं बन सकती रोल मौडल
क्या हम बेटे से कभी कहते हैं कि सानिया मिर्जा की लगन और समर्पण देखो. क्या हम कभी कहते हैं कि बेटा तुम्हारी रोल मौडल यह लेडी स्पोर्ट्स पर्सन है या पौलिटिक्स, बिजनैस, मीडिया की यह महिला हस्ती है? लड़कों को स्ट्रौंग फीमेल रोल मौडल की जरूरत है. उन से न सिर्फ लड़कों को सीखने को मिलेगा बल्कि महिलाओं के प्रति आदर और सम्मान भी पैदा होगा. पेरैंट्स अपने बेटे को वैसी महिलाओं के बारे में बताएं जिन्होंने जीवन में उपलब्धि हासिल की है.
समय आ गया है कि हम अपने दिलोदिमाग से, अपने परिवार और समाज से इस भेदभाव की जड़ों को साफ कर दें और स्त्रीपुरुष के लिए एकसमान माहौल देने की व्यवस्था करें. तभी लड़कियों के साथसाथ लड़के भी एक बेहतर जिंदगी जी पाएंगे.
ऊंचे ओहदों पर औरतों की कमी
यूएन वूमन के आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में 113 देशों में कभी भी कोई महिला राज्य या सरकार के प्रमुख के रूप में काम नहीं कर पाई है और आज भी केवल 26 देशों का नेतृत्व कोई महिला कर रही है. 1 जनवरी, 2024 तक केवल 23त्न मंत्री पद महिलाओं के पास थे और 141 देशों में महिलाएं कैबिनेट मंत्रियों के एकतिहाई से भी कम हैं. 7 देशों में तो कैबिनेट में कोई भी महिला प्रतिनिधित्व नहीं करती है. ऐसे में महिलाओं को हर नेतृत्व पदों और सुविधाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ये अधिकार देने जरूरी हैं.
जब महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा तो उन का सशक्तीकरण होगा और धीरेधीरे समाज में भेदभाव भी कम होगा. इस से एक ऐसा समाज बनने की उम्मीद है जहां हर व्यक्ति को बराबरी और सम्मान के साथ जीने का अवसर मिलेगा.
भारत में लैंगिक असमानता दुनिया के कई देशों की तुलना में ज्यादा है. विश्व आर्थिक मंच की वैश्विक लैंगिक रिपोर्ट के अनुसार 2023 में भारत 146 देशों की संख्या में 127 वें स्थान पर है. भारत के कामकाजी क्षेत्रों और नेतृत्व पदों पर लैंगिक असमानता का अंदाजा इस से भी लगाया जा सकता है कि संसद में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ 14.72 फीसद है.
हालांकि स्थानीय जगहों में यह भागीदारी 44.4 फीसद है. आर्थिक असमानता का सब से अधिक सामना महिलाएं कर रही हैं. पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कम वेतन वाले रोजगार मिलते हैं. देश के अरबपतियों की सूची में मात्र 9 महिलाएं शामिल हैं. अगर विकास कार्यक्रमों से जुड़े कामों की बात करें तो इस में महिलाओं की भागीदारी 72 फीसद है. समाज में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए यह जरूरी है कि हम महिलाओं और सभी जैंडर के लोगों की समस्याओं और चुनौतियों को जानें और समझेंगे.
Gender Discrimination