Hindi Social Story: छंटनी- क्या थी रीता की असलियत

Hindi Social Story: शादी से पहले सुधा के मन में हजार डर बैठे थे, सास का आतंक, ससुर का खौफ, ननदों का डर और देवर, जेठ से घबराहट, पर शादी के बाद लगा बेकार ही तो वह डरतीघबराती थी. ससुराल में सामंजस्य बनाना इतना मुश्किल तो नहीं.

वैसे सुधा बचपन से ही मेहनती थी, शादी हुई तो जैसे सब को खुश करने का उस में एक जुनून सा सवार हो गया. सब से पहले जागना और सब के बाद सोना. सासननदों के हिस्से के काम भी उस ने खुशीखुशी अपने सिर ले लिए थे. जब रोजमर्रा की जिंदगी में यह हाल था तो रीतानीता की शादी का क्या आलम होता. रातरात जाग कर उन की चुनरियां सजाने से मेहंदी रचाने तक का काम भी सुधा ने ही किया.

औरों के लिए रीतानीता की शादी 2-4 दिन की दौड़धूप भले ही हो पर सुधा के लिए महीनों की मेहनत थी. एकएक साड़ी का फाल टांकने से ले कर पेटीकोट और ब्लाउज तक उसी ने सिले. चादरें, तकिया, गिलाफ और मेजपोश जो उस ने भेंट में दिए उन को भी जोड़ लें तो सालों की मेहनत हो गई, पर सुधा को देखिए तो चेहरे पर कहीं शिकन नहीं. सहजता से अपनापन बांटना, सरलता से देना, सुंदरता से हर काम करना आदि सुधा के बिलकुल अपने मौलिक गुण थे.

रीता, सुधा की हमउम्र थी इसलिए उस से ज्यादा दोस्ती हो गई. सुधा की आड़ में रीता खूब मटरगश्ती करती. सहेलियों के साथ गप्पें लड़ाती फिल्में देखती और सुधा उसे डांट पड़ने से बचा लेती. सुधा जब मैले कपड़ों के ढेर से जूझ रही होती तो कभीकभी रीता उस के पास मचिया डाल कर बैठ जाती और उसे देखी हुई फिल्म की कहानी सुनाती. यह सुधा के मनोरंजन का एकमात्र साधन था.

रीता की शादी के समय सुधा के ससुर भी जीवित थे. पर इस शादी की लगभग सारी ही जिम्मेदारी सुधा और उस के पति अजीत के ऊपर रही. अजीत को फैक्टरी में नौकरी मिलते ही पिता अपनी दुकान से यों पीछा छुड़ाने लगे जैसे अब उन के ऊपर कोई जिम्मेदारी ही न हो. जब मन होता दुकान पर बैठते, जब मन होता ताला डाल कर घूमने निकल जाते. रिश्तेदारों के यहां आनाजाना भी वह बहुत रखते.

कभीकभी अजीत कहता भी,  ‘पिताजी, रिश्तेदारों के यहां ज्यादा नहीं जाना चाहिए,’ तो उन को डांट पड़ती कि तुम मुझ से ज्यादा दुनियादारी समझते हो क्या? और जाता हूं तो उन पर बोझ नहीं बनता, जितना खाता हूं उस से ज्यादा उन पर खर्च करता हूं, समझे.

अजीत को चुप होना पड़ता. पिता ने बाहर हाथ खोल कर खर्च किया और बेटी की शादी में पूजा, पंडितजी और अपने रिश्तेदारों की विदाई के खर्च के अलावा सारा खर्च अजीत पर डाल दिया. अजीत और सुधा ने मां से बात की तो उन्होंने तटस्थता दिखा दी, ‘‘मुझे कोई मतलब नहीं. अजीत जाने अजीत का बाप जाने. मैं कमाती तो हूं नहीं कि मुझ से पूछते हो,’’ कहतेकहते मां ने अपनी मोटी करधनी अजीत को सौंप दी.

करधनी से रीता के कुछ गहने तो बन गए पर उस का मुंह सूज गया. उस के चेहरे की सूजन तभी उतरी जब सुधा ने अपना इकलौता गले का हार उस के गले में पहना दिया. इस शादी में रीता की मांग पूरी करतेकरते ही अजीत की जमा पूंजी खत्म हो गई. बाकी सबकुछ कर्ज ले कर किया गया. कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी से बचतेबचते पिता तो दुनिया से ही चले गए और मां ने अपना मंगलसूत्र अजीत के हाथों में रख दिया. वह मंगलसूत्र सुधा ने नीता के गले में डाला, बेचा नहीं.

अजीत एक दक्ष तकनीशियन था.  आय अच्छी थी. कर्ज चुकाने में वह चूकता नहीं था लेकिन घर के लिए उसे बहुत सी कटौतियां करनी पड़तीं. गौरव व सौरभ के जन्म पर सुधा को ठीक से पोषण नहीं मिल पाया लेकिन उस ने कभी इस की कोई शिकायत नहीं की.

अजीत की मां जैसी तटस्थ थीं अंत तक वैसी ही बनी रहीं. नीता की शादी तय भी नहीं हुई थी और मां दुनिया से चली गईं. अब तो सुधा और अजीत को ही सब करना था. रीता की शादी का कर्ज चुका ही था कि नीता की शादी के लिए कर्ज लेना पड़ा और नीता को विदा कर के कमर सीधी भी न की थी कि फैक्टरी में कर्मचारियों की छंटनी होने लगी.

अजीत को भरोसा था अपने काम पर, अपनी मेहनत पर. उसे विश्वास था, छंटनी की सूची में उस का नाम कभी नहीं होगा. पर एक दिन वह भी आया जब अजीत को भी घर बैठना पड़ा. तमाम खींचतान और प्रयासों के बाद आखिर फैक्टरी बंद हो गई तो फिर कैसा ही कर्मचारी क्यों न हो उस की नौकरी बचती कैसे.

नौकरी जाने का सदमा अजीत के अंदर इस कदर बैठा कि उस ने बिस्तर पकड़ लिया. सुधा के तो मानो पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई. उस के सामने स्कूल जाते सौरभ, गौरव थे तो बिस्तर पर पड़े अजीत को भी उसे ही खड़ा करना था. रातदिन जुट कर उस ने अजीत को अवसाद के कुएं से निकालने के प्रयास किए. इसी बीच नीता को सरकारी नौकरी मिल गई थी. सुधा के लिए यह डूबते को तिनके का सहारा था.

कर्ज की एक किस्त और सौरभगौरव की फीस उस ने अपने कंगन बेच कर भरी थी. नीता मिलने आई तो सुधा ने उस के आगे सारी बातें रख दीं. नीता 4 दिन रही थी और जाते हुए बोली, ‘‘ठीक है, भाभी, तुम्हारी हालत सही नहीं है इसलिए विदाई की साड़ी और मिठाई मैं अपने पैसों से खरीद लूंगी और यह 100 रुपए भी रखो सौरभ, गौरव के लिए, मेरी ओर से कुछ ले लेना.’’

सुधा ने रुलाई रोकते हुए 100 का नोट ले लिया और आशा भरे स्वर में कहा, ‘‘नीता, इस बार के वेतन से हो सके तो कुछ भेज देना. तुम तो जानती हो हम कर्ज में डूबे हैं. तुम्हारे भैया संभलें तो ही कुछ कर सकेंगे ना.’’

‘‘देखूंगी भाभी,’’ नीता ने अनमनी सी हो कर कहा.

उस कठिन समय में सुधा ने अपनी अंगूठियां और झुमके भी बेचे और एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान से घर पर काम लाना भी शुरू कर दिया. फैक्टरी से बकाया पैसा मिलतेमिलते 6 महीने लग गए. इस बीच सुधा ने एक कमरा किराए पर उठा दिया और अपनी सारी गृहस्थी डेढ़ कमरों में ही समेट ली. इन सारे प्रयासों से जैसेतैसे दो समय पेट भर रहा था और बच्चे स्कूल से निकाले नहीं गए थे.

सत्र पूरा होते ही सुधा ने सौरभ, गौरव को पास के एक सस्ते स्कूल में डाल दिया. बच्चों के लिए यह एक बड़ा झटका था पर वे समझदार थे और अपने मातापिता के कष्ट को देखतेसमझते पैदल स्कूल आतेजाते और नए वातावरण में सामंजस्य बनाने की भरपूर कोशिश करते.

नौकरी छूटने के 6 महीने के बाद जो रकम फैक्टरी की ओर से अजीत को मिली वह नीता की शादी का कर्ज चुकाने में चली गई. नीता के पास अच्छा घरवर था. सरकारी नौकरी थी पर उस ने 100 रुपए खर्च करने के बाद 6 महीने में पीछे पलट कर भी नहीं देखा.

रीता सर्दियों में 2 दिन के लिए आई थी. सुधा को फटापुराना कार्डिगन पहना देख कर अपना एक कार्डिगन उस के लिए छोड़ गई थी और सौरभगौरव के लिए कुछ स्केच पेन और पेंसिलरबड़ खरीद कर दे गई थी.

रीता के पति पहले अकसर अपने व्यापार के सिलसिले में आते और कईकई दिनों तक अजीत, सुधा के घर में बेहिचक बिना एक पैसा खर्च किए डटे रहते थे. वह भी इन 6 महीनों में घर के दरवाजे पर पूछने नहीं आए. सुधा मन ही मन सोचती रहती, क्या रीता के पति इस बीच एक बार भी यहां नहीं आए होंगे? आए होंगे जरूर और 1-2 दिन होटल में रुक कर अपना काम जल्दीजल्दी पूरा कर के लौट गए होंगे. यहां आने पर हमारे कुछ मांग बैठने का खतरा जो था.

अजीत से छिपा कर सुधा ने हर उस रिश्तेदार को पत्र डाला जो किसी प्रभावशाली पद पर था या जिन के पास मदद करने लायक संपन्नता थी. ससुर अकसर बड़प्पन दिखाने के सिलसिले में जिन पर खूब पैसा लुटाया करते थे वे संबंधी न कभी पूछने आए और न ही उन्होंने पत्र का उत्तर देने का कष्ट उठाया.

सुधा को अपनी ठस्केदार चाची सास याद आईं जो नीता की शादी के बाद 2 महीने रुक कर गई थीं. सुधा से खूब सेवा ली, खूब पैर दबवाए उन्होंने और सौरभ, गौरव का परीक्षाफल देख कर बोली थीं, ‘‘मेरे होनहारो, बहुत बड़े आदमी बनोगे एक दिन पर इस दादी को भूल न जाना.’’

सुधा ने उन्हें भी पत्र लिखा था कि चाचीजी, अपने बड़े बेटे से कह कर सौरभ के पापा को अपनी आयुर्वेदिक दवाओं की फैक्टरी में ही फिलहाल कुछ काम दे दें. कुछ तो काम करेंगे, कुछ तो डूबने से हम बचेंगे. पर पत्र का उत्तर नहीं आया.

अजीत की बूआ तीसरेचौथे साल भतीजे के घर आतीं और कम से कम महीना भर रह कर जाती थीं. जाते समय अच्छीखासी विदाई की आशा भी रखतीं और फिर आदेश दे जातीं, ‘‘अब की जाड़ों में मेरे लिए अंगूर गुच्छा बुनाई के स्वेटर बुन कर भेज देना. इस बार सुधा, आंवले का अचार जरा बढ़ा कर डालना  और एक डब्बा मेरे लिए भिजवा देना.’’

इन बूआजी को सुधा ने पत्र भेजा कि अपने कंपनी सेक्रेटरी दामाद और आफीसर बेटे से हमारे लिए कुछ सिफारिश कर दें. इस समय हमें हर तरह से मदद की जरूरत है. बूआ का पोस्ट कार्ड आया था. अपनी कुशलता के अलावा बेटे और दामाद की व्यस्तता की बात थी पर न किसी का पता दिया था न फोन नंबर और न उन तक संदेश पहुंचाने का आश्वासन.

6 महीने में सब की परीक्षा हो गई. कितने खोखले निकले सारे रिश्ते. कितने स्वार्थी, कितने संवेदनहीन. सुधा सूरज निकलने तक घर के काम निबटा कर सिलाई मशीन की खड़खड़ में डूब जाती. जब घर पर वह अकेली होती तभी पत्र लिखती और चुपके से डाल आती.

कई महीने के बाद अजीत ने काम करना शुरू किया. मनोस्थिति और आर्थिक स्थिति के दबाव में उसे जो पहला विकल्प मिला उस ने स्वीकार कर लिया. घर आ कर जब उस ने सुधा को बताया कि वह रायल इंटर कालिज का गार्ड बन गया है तो सुधा को बड़ा धक्का लगा. चेहरे पर उस ने शिकन न आने दी लेकिन मन में इतनी बेचैनी थी कि वह रात भर सिलाई मशीन पर काम करती रही और सुबह निढाल हो कर सो गई.

नींद किसी अपरिचित स्वर को सुन कर खुली. कोठरी से निकल कर कमरे में आई तो कुरसी पर एक लड़के को बैठा देखा. तखत पर बैठे अजीत के चेहरे पर चिंता की रेखाएं गहराई हुई थीं.

‘‘सुधा, यह विशाल है. छोटी बूआ की ननद की देवरानी का बेटा. बी.ए. की प्राइवेट परीक्षा देगा यहीं से.’’

सुधा चौंकी, ‘‘यहीं से मतलब?’’

‘‘मतलब आप के घर से,’’ वह लड़का यानी विशाल बिना हिचकिचाहट के बोला.

सुधा पर रात की थकान हावी थी. उस पर सारे रिश्तेदारों द्वारा दिल खट्टा किया जाना वह भूली नहीं थी. उस का पति 2 हजार रुपए के लिए गार्ड बना सारे दिन खड़ा रहे और रिश्तेदारों के रिश्तेदार तक हमारे घर को मुफ्तखोरी का अड्डा बना लें. पहली बार उस ने महसूस किया कि खून खौलना किसे कहते हैं.

‘‘तुम्हारी परीक्षा में तो लंबा समय लगेगा, क्यों?’’ सुधा ने तीखी दृष्टि से विशाल की ओर देखा.

‘‘हां, 1 महीना रहूंगा.’’

‘‘तुम्हें हमारा पता किस ने दिया?’’

‘‘आप की बूआ सासजी ने,’’ लड़का रौब से बोला, ‘‘उन्होंने कहा कि मेरे मायके में आराम से रहना, पढ़ना, परीक्षा देना, तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी.’’

‘‘उन्होंने हम से तो कुछ नहीं पूछा था. भला महीने भर कोई मेरे घर में रहेगा तो मुझे परेशानी कैसे न होगी? डेढ़ कमरे में हम 4 लोग रहते हैं और बूआजी ने तो तुम से यह भी नहीं कहा होगा कि मेरा भतीजा और उस का परिवार भूखों मरने की हालत में हैं. वह क्यों कहेंगी? उन के लिए भतीजे का घर एक आराम फरमाने की जगह है, बस.’’

लड़का अवाक् सा सुधा को देख रहा था. अजीत भी विस्मित था. उस ने सुधा का यह रूप पहले कभी नहीं देखा था. वह सोच ही रहा था कि सुधा उठ कर अंदर चली गई. थोड़ी देर में सुधा चाय ले कर आई और विशाल के चाय खत्म करते ही बोली, ‘‘सुनो विशाल, हम खुद बहुत परेशानी में हैं. हम तुम्हें अपने साथ 1 महीने तो क्या 1 दिन भी नहीं रख सकते.’’

अजीत उठ कर अंदर चला गया. विशाल उलझन में भरा हुआ सुधा को देख रहा था. सुधा उसे इस तरह अपनी तरफ देखते थोड़ी पिघल उठी, ‘‘बेटा, तुम पढ़नेलिखने वाले बच्चे हो. अभी हमारी परेशानियों और कष्टों को क्या समझोगे, पर मैं हाथ जोड़ती हूं, तुम अपने रहनेखाने की व्यवस्था कहीं और कर लो.’’

विशाल को उठ कर जाना पड़ा. उस  के जाते ही अजीत सुधा के पास आ बैठा और बोला, ‘‘सुधा, मुझे तुम से यह उम्मीद न थी.’’

‘‘पर यह जरूरी था, अजीत. हम सौरभ, गौरव की रूखी रोटी में से क्या कटौती कर सकते हैं. क्या बूआ हमारी स्थिति नहीं जानतीं? मैं ने उन्हें पत्र लिखा था, उन्होंने उत्तर तक नहीं दिया. तुम्हें भी समझना चाहिए कि मौके पर सब कैसे बच रहे हैं. मदद को कोई नहीं आया, और न ही कोई आएगा. तुम नाराज क्यों होते हो?’’

‘‘नाराज नहीं हूं. मैं तो यह कह रहा हूं कि तुम ने कितनी सरलता से सुलझा दिया मामला. वरना हम पर नए सिरे से कर्ज चढ़ना शुरू हो गया होता.’’

‘‘नहीं, अजीत, अब ऐसा नहीं होगा  कि जो चाहे जब चाहे चला आए और पैर पसार कर पड़ा रहे.’’

‘‘अच्छा, अगर बूआ लड़ने आ गईं तो क्या करोगी?’’

‘‘जो मुझे करना चाहिए वही करूंगी. पहले प्यार से समझाने की कोशिश करूंगी, नहीं समझेंगी तो अपनी बात कहूंगी. अपने बच्चों की मां हूं, उन का भलाबुरा तो मैं ही देखूंगी. अजीत हमें छंटनी करनी होगी…अपनेपरायों की छंटनी. दूर के रिश्तेदार ही नहीं पास वालों को भी तो आजमा कर देखा. बूआ क्या दूर की रिश्तेदार होती है? या चाची या मामी? ऐसे लोगों से आगे अब मैं नहीं निभा पाऊंगी.’’

‘‘तुम ने जितनी कठिन परिस्थितियों में मेरा साथ निभाया है इस के बाद तो मैं यही कहूंगा कि तुम लाखों में एक हो, क्योंकि मेरे गार्ड बन जाने पर भी तुम ने कोई खराब प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की.’’

‘‘यह थोड़े दिन की बात है, अजीत. वहां गेट पर खड़ेखड़े ही तुम निराश न होना. सोचना क्याक्या संभव है. कहांकहां तुम्हारी योग्यता का उपयोग हो सकता है. उस के अनुसार प्रयास करना. देखना, एक दिन तुम जरूर सफल होगे और हमारी गाड़ी फिर से पटरी पर आ जाएगी.’’

अजीत गार्ड की ड्यूटी देने के बाद बचे समय में उपयुक्त नौकरी के लिए भागदौड़ भी करता रहता. सुधा और बच्चों का पूरा सहयोग उसे मिल रहा था. अजीत और सुधा की कमाई के साथ किराए का पैसा जोड़ कर फैक्टरी के वेतन का आधा भी मुश्किल से हो पाता पर बच्चों की दुर्दशा नहीं होगी, उन्हें इतना विश्वास हो गया था. तभी एक दिन घर के आगे एक चमचमाती कार दिखी और उस से लकदक रीता उतरी. सुधा ने लपक कर रीता को गले लगाया और पूछा, ‘‘कार कब खरीदी?’’

रीता का मुंह फूला हुआ था. अंदर जाते ही वह भैया पर बरस पड़ी, ‘‘तुम ने मेरी भी नाक कटा कर रख दी, अपनी तो खैर कटाई ही कटाई.’’

‘‘कैसे कट गई तुम्हारी नाक?’’ अजीत ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘अरे, क्या जरूरत थी तुम्हें उस स्कूल में गार्ड बनने की? जानते हो वहां मेरे चाचाससुर का पोता पढ़ता है. उस ने हमारी शादी के फोटोग्राफ देखते हुए तुम्हें पहचान लिया. सब के बीच में वह बोला, ‘यह तो अपने स्कूल का गार्ड है.’ तुम्हें गार्ड ही बनना था तो कहीं और बनते. स्कूलों की कमी है क्या?’’

‘‘तो तुम भी कह देतीं कि यह फोटो वाला भाई तो मर चुका है. वह गार्ड कैसे बन सकता है? उस का भूत गार्ड बन गया हो तो बन गया हो,’’ रीता का गुस्सा और तिरस्कार भरा चेहरा देख अजीत भी उबल पड़ा था.

‘‘बुरी बातें न बोलो, अजीत,’’ सुधा ने डांटा.

‘‘मेरा खून खौल रहा है, सुधा. मुझे बोलने दो. यही बहन है जिस की फरमाइशें पूरी करने में मैं ने अपनी सारी जमापूंजी लुटा दी. आज मेरा पैसा मेरे पास होता तो काम आता कि नहीं? पिताजी ने अपनी जिम्मेदारी मेरे सिर डाल दी और इसे भी शर्म नहीं आई. रीता, तुम बड़ी इज्जतदार हो तो अपने घर में रहो, मुझ गरीब के घर क्यों आती हो. अब जा कर कह देना अपने रिश्तेदारों से कि मेरा भाई मर गया.’’

रीता भाई को आंखें तरेर कर देख रही थी.

‘‘भाभी, समझा लो भैया को,’’ आंखें तरेर कर रीता बोली, ‘‘अब मुझे ज्यादा गुस्सा न दिलाएं.’’

‘‘अब भी तुम गुस्सा दिखाने की बेशर्मी करोगी, रीता,’’ सुधा ने आश्चर्य से कहा, ‘‘सब रिश्तेदार आजमाएपरखे मैं ने, कठिन समय में सब झूठे निकले. पर तुम से मेरा मन इतना अंधा मोह रखता था कि तुम्हारी सारी बेरुखी के बावजूद भी मैं तुम से कभी नाराज नहीं हो पाई. इतने लंबे संघर्ष और कष्ट के बावजूद तुम्हारे भैया ने कभी तुम्हें नहीं कोसा और तुम ही यह भाषा बोल रही हो. अभी तो तुम्हारे भैया ने ही कहा था, अब मैं भी कह रही हूं कि समझ लो हम मर गए तुम्हारे लिए, समझी? जितना तुम अपनी विदाई में फुंकवाओगी उतने में हम अपने बच्चों के लिए नए कपड़ेजूते खरीद लाएंगे. सारी कटौती मेरे बच्चों के लिए ही क्यों हो? अब बैठीबैठी मुंहबाए क्या देख रही हो. यहां से उठो और अपनी कार में बैठो. अपने घर जाओ और इज्जतदारों की तरह रहो. हम गरीबों को अपना रिश्तेदार समझो ही मत.’’

रीता पैर पटक बड़बड़ाती चली गई, ‘‘मेरी बला से, भाड़ में जाओ सब. भीख मांगो दरवाजेदरवाजे जा कर, यही बाकी रह गया है.’’

‘‘निश्ंिचत रहो, तुम्हारे दरवाजे पर मांगने नहीं आएंगे,’’ अजीत अंदर से चीखा.

‘‘शांत हो जाओ, अजीत. अच्छा हुआ कि हमारा अंधा मोह टूट गया. देख लिया अपनों को. अपनी प्रतिष्ठा के आगे उन्हें हमारे पेट का भी कोई महत्त्व नहीं दिखता. हम भूखे मर जाएं पर उन की इज्जत न घटे. अच्छा है कि अपनेपरायों की छंटनी हो रही है. उठो, तुम्हें आज इंटरव्यू देने जाना है. नहाधो कर तरोताजा हो जाओ. अगर यह नौकरी तुम्हें मिल गई तो साथ ही रूठी हुई बहन भी मिल जाएगी.’’

‘‘टूटे हुए रिश्तों की डोरियां अगर जुड़ती भी हैं तो उन में गांठ पड़ जाती है. तुम ने इतने लंबे समय तक मुझ में कुंठा की गांठ नहीं पड़ने दी, अब दूसरी गांठों की भी बात मत करो.’’

‘‘नहीं करूंगी, मेरे लिए तुम से बढ़ कर कोई नहीं है. तुम खुश रहो मेरे बच्चे सुखी रहें, मैं बस यही चाहती हूं, और मैं हमेशा इसी कोशिश में लगी रहूंगी.’’

‘‘तुम ने इस गार्ड का मन सुकून से भर दिया है और अब इस का मन बोलता है कि यह कल के दिन से फिर नई जगह पर नए सिरे से तकनीशियन होगा. अपने हुनर और मेहनत के बलबूते, आत्म- विश्वास और आत्मसम्मान से भरापूरा.’’

‘‘तथास्तु’’, सुधा ने वरद मुद्रा बनाई और अजीत मुसकराता हुआ इंटरव्यू के लिए तैयार होने लगा.

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Hindi Fictional Story: खरीदारी- क्यों हैरान रह गया चंद्रमोहन

Hindi Fictional Story: प्रात: के 9 बज रहे थे. नाश्ते आदि से निबट कर बिक्री कर अधिकारी चंद्रमोहन समाचारपत्र पढ़ने में व्यस्त था. निकट रखे विदेशी टेपरिकार्डर पर डिस्को संगीत चल रहा था, जिसे सुन कर उस की गरदन भी झूम रही थी.

तभी उस की पत्नी सुमन ने निकट बैठते हुए कहा, ‘‘आज शाम को समय पर घर आ जाना.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘कुछ खरीदारी करने जाना है.’’

‘‘कोशिश करूंगा. वैसे आज 1-2 जगह निरीक्षण पर जाना है.’’

‘‘निरीक्षण को छोड़ो. वह तो रोज ही चलता है. आज कुछ चीजें खरीदनी जरूरी हैं.’’

‘‘मैं ने अभी 3-4 दिन पहले ही तो खरीदारी की थी. पूरे एक हजार रुपए का सामान लिया था,’’ चंद्रमोहन ने कहा.

‘‘तो क्या और किसी चीज की जरूरत नहीं पड़ती?’’ सुमन ने तुनक कर कहा.

‘‘मैं ने ऐसा कब कहा? देखो, सुमन, हमारे घर में किसी चीज की कमी नहीं है. ऐश्वर्य के सभी साधन हैं हमारे यहां, फ्रिज, रंगीन टेलीविजन, वीसीआर, स्कूटर तथा बहुत सी विदेशी चीजें. नकद पैसे की भी कमी नहीं है. दोनों बच्चे भी अंगरेजी स्कूल में पढ़ रहे हैं.’’

‘‘वह तो ठीक है. जब से चंदनगढ़ में बदली हुई है मजा आ गया है,’’ सुमन ने प्रसन्न हृदय से कहा.

‘‘हां, 2 साल में ही सब कुछ हो गया. जब हमलोग यहां आए थे तो हमारे पास कुछ भी नहीं था. बस, 2-3 पुरानी टूटी हुई कुरसियां, दहेज में मिला पुराना रेडियो, बड़ा पलंग तथा दूसरा सामान. यहां के लोग गाय की तरह बड़े सहनशील और डरपोक हैं. चाहे जैसे दुह लो, कभी कुछ नहीं कहते,’’ चंद्रमोहन बोला.

तभी दरवाजे पर लगी घंटी बजी.

सुमन ने दरवाजा खोला. सामने खड़े व्यक्ति ने अभिवादन कर पूछा, ‘‘साहब हैं?’’

‘‘हां, क्या बात है?’’

‘‘उन से मिलना है.’’

‘‘आप का नाम?’’

‘‘मुझे सोमप्रकाश कहते हैं.’’

कुछ क्षण बाद सुमन ने लौट कर कहा, ‘‘आइए, अंदर चले आइए.’’

चंद्रमोहन को बैठक में बैठा देख कर सोमप्रकाश ने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और प्लास्टिक के कागज में लिपटा एक डब्बा मेज पर रख दिया.

सुमन दूसरे कमरे में जा चुकी थी.

‘‘कहिए?’’ चंद्रमोहन ने पूछा.

‘‘मैं सोम एंड कंपनी का मालिक हूं. अभी हाल ही में आप ने हमारी फर्म का निरीक्षण किया था लेकिन जितने माल की बिक्री नहीं हुई उस से कहीं अधिक की मान ली गई है. अगर आप की कृपादृष्टि न हुई तो मैं व्यर्थ में ही मारा जाऊंगा. आप से यही प्रार्थना करने आया हूं,’’ सोमप्रकाश ने दयनीय स्वर में कहा.

‘‘मैं तुम जैसे व्यापारियों को बहुत अच्छी तरह जानता हूं. जितना माल बेचते हो उस का चौथाई भी कागजात में नहीं दिखाते, और इस तरह दो नंबर का अंधाधुंध पैसा बना कर टैक्स की चोरी कर के सरकार को चूना लगाते हो. तुम लोगों की वजह से ही सरकार को हर साल बजट में घाटा दिखाना पड़ता है,’’ चंद्रमोहन ने बुरा सा मुंह बना कर कहा.

सोमप्रकाश अपमान का कड़वा घूंट पी कर रह गया. आखिर वह कर ही क्या सकता था. उस ने कमरे में दृष्टि डाली. हर ओर संपन्नता की झलक दिखाई दे रही थी. फर्श पर महंगा कालीन बिछा था. वह कहना तो बहुत कुछ चाहता था परंतु गले में मानो कुछ अटक सा गया था. बहुत प्रयत्न कर के स्वर में मिठास घोल कर बोला, ‘‘साहब, मैं आप की कुछ सेवा करना चाहता हूं. ये 2 हजार रुपए रख लीजिए. बच्चों की मिठाई के लिए हैं.’’

‘‘काम तो बहुत मुश्किल है, फिर भी जब तुम आए हो तो मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हारा काम बन जाए.’’

‘‘आप की बहुत कृपा होगी. जब आप निरीक्षण पर आए थे तो मैं वहां नहीं था. मुझे रात ही पता चला तो सुबह होते ही मैं आप के दर्शन करने चला आया,’’ सोमप्रकाश बोला और उठ कर बाहर चला गया.

चंद्रमोहन ने सुमन को बुला कर कहा, ‘‘लो, भई, ये रुपए रख लो, अभी एक असामी दे गया है.’’

सुमन रुपए उठा कर दूसरे कमरे में चली गई.

कुछ देर बाद दरवाजे की घंटी फिर बज उठी.

चंद्रमोहन ने दरवाजा खोला. सामने एडवोकेट प्रेमलाल को खड़ा देख चेहरे पर मुसकान बिखेर कर बोला, ‘‘अरे, आप. आइए, पधारिए.’’

प्रेमलाल कमरे में आ कर सोफे पर बैठ गया.

‘‘सब से पहले यह बताइए कि क्या लेंगे. ठंडा या गरम?’’ चंद्रमोहन ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, मैं अभी नाश्ता कर के आ रहा हूं.’’

‘‘फिर भी, कुछ तो लेना ही होगा,’’ कहते हुए चंद्रमोहन ने सुमन को चाय लाने का संकेत किया.

प्रेमलाल की जरा ज्यादा ही धाक थी. बिक्री कर के वकीलों की संस्था में उस की बात कोई न टालता था. इस बार इस संस्था के अध्यक्ष पद के लिए खड़ा हो रहा था. उस के निर्विरोध चुने जाने की पूरी संभावना थी.

चंद्रमोहन ने पूछा, ‘‘कहिए, कैसे कष्ट किया?’’

कल आप ने विनय एंड संस का निरीक्षण किया था. वहां से कुछ कागजात भी पकड़े गए. उस निरीक्षण की रिपोर्ट बदलवाने और आप ने जो कागजात पकड़े हैं उन्हें वापस लेने आया हूं.

‘‘आप के उन लोगों से कुछ निजी संबंध हैं क्या? उस फर्म में बहुत हेराफेरी होती है. वैसे भी ये व्यापारी टैक्स की बहुत चोरी करते हैं. यों समझिए कि खुली लूट मचाते हैं. यदि ये ईमानदारी…’’

‘‘ईमानदारी…’’ हंस दिया प्रेमलाल, ‘‘यह शब्द सुनने में जितना अच्छा लगता है, व्यवहार में उतना ही कटु है. ऐसा कौन व्यक्ति है जो सचमुच ईमानदारी से काम कर रहा हो? आखिर दुकानदार कैसे ईमानदार रह सकता है, जब सरकार उस पर तरहतरह के टैक्स लगा कर उसे स्वयं इन की चोरी करने के लिए प्रेरित करती है. अब आप अपने को ही लीजिए. आप का गिनाचुना वेतन है, फिर भी आप हर महीने हजारों रुपए खर्च करते हैं. क्या आप कह सकते हैं कि आप स्वयं ईमानदार हैं?’’

चंद्रमोहन खिसियाना सा हो कर रह गया.

‘‘हमाम में हम सब नंगे हैं. जिसे आप ने अभी बेईमानी कहा उस में हम सब का हिस्सा है. जब सरकार ने ही बिना सोचेसमझे व्यापारियों पर इतने टैक्स लाद रखे हैं तो वह बेचारा भी क्या करे?’’

तभी सुमन चाय ले कर आ गई.

चाय की चुसकी ले कर प्रेमलाल ने जेब से एक हजार रुपए निकाल कर मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘भई, यह काम आज शाम तक कर दीजिएगा. देखिए, कुछ इस ढंग से चलिए कि सभी का काम चलता रहे, अगर मुरगी ही न रही तो अंडा कैसे हासिल होगा? और हां, वे कागजात…’’

‘‘दे दूंगा,’’ मना करने का साहस चंद्रमोहन में नहीं था.

‘‘हां, एक बात और. कल मुझे एक दुकानदार ने एक शिकायत की थी.’’

‘‘कैसी शिकायत?’’

‘‘यह कि आप का चपरासी रामदीन दुकानदारों से यह कह कर सामान ले जाता है कि साहब ने मंगवाया है. कल आप ने कुछ सामान मंगवाया था क्या?’’

‘‘नहीं तो…’’

‘‘तो अपने चपरासी पर जरा ध्यान रखिए. कहीं ऐसा न हो कि मजे वह करता  रहे और मुसीबत में आप फंस जाएं.’’

‘‘ठीक है. मैं उस नालायक को ठीक कर दूंगा,’’ चंद्रमोहन ने रोष भरे स्वर में कहा.

शाम को चंद्रमोहन ने गांधी बाजार में एक दुकान के आगे अपना स्कूटर खड़ा किया और फिर सुमन व दोनों बच्चों के साथ उस दुकान की ओर बढ़ा.

काउंटर पर खड़े दुकानदार  ने चंद्रमोहन को देख कर क्षण भर के लिए बुरा सा मुंह बनाया, मानो उसे कोई बहुत कड़वी दवा निगलनी पड़ेगी. वह चंद्रमोहन की आदत से परिचित था. पहले भी

2-3 बार चंद्रमोहन सपरिवार उस की दुकान पर आ चुका था और उसे मजबूरन सैकड़ों का माल बिना दाम लिए चंद्रमोहन को देना पड़ा था.

यद्यपि चंद्रमोहन ने उस सामान के दाम पूछे थे, पर दुकानदार जानता था कि अगर उस ने दाम लेने की हिमाकत की तो चंद्रमोहन उस का बदला उस का बिक्री कर बढ़ा कर लेगा. इसलिए दूसरे ही क्षण उस ने चेहरे पर जबरदस्ती मुसकान बिखरते हुए कहा, ‘‘आइए, साहब…आइए.’’

‘‘सुनाइए, क्या हाल है?’’

‘‘आप की कृपा है, साहब. कहिए क्या लेंगे, ठंडा या गरम?’’ न चाहते हुए भी दुकानदार को पूछना पड़ा.

‘‘कुछ नहीं, रहने दीजिए.’’

‘‘नहीं साहब, ऐसा कैसे हो सकता है? कुछ न कुछ तो लेना ही होगा.’’ दुकानदार ने नौकर को 4 शीतल पेय की बोतलें लाने को कहा.

सुमन बोली, ‘‘मुझे लिपस्टिक और शैंपू दिखाइए.’’

दुकानदार ने कई तरह की लिप-स्टिक दिखाए हैं. सुमन उन में से पसंद करने लगी.

शीतल पेय पी कर लिपस्टिक, शैंपू, सेंट, स्प्रे, टेलकम, ब्रा तथा अन्य सामान बंधवा लिया था.

‘‘कितना बिल हो गया?’’ चंद्रमोहन ने पूछा.

लगभग 300 रुपए का सामान हो गया था. फिर भी दुकानदार मुसकरा कर बोला, ‘‘कैसा बिल, साहब? यह तो आप ही की दुकान है. कोई और सेवा बताएं?’’

‘‘धन्यवाद,’’ कहता हुए चंद्रमोहन अपने परिवार के साथ दुकान से बाहर निकल आया.

कुछ दुकानें छोड़ कर चंद्रमोहन सिलेसिलाए कपड़ों की दुकान पर आ धमका. दुकानदार वहां नहीं था. उस का 15 वर्षीय लड़का दुकान पर खड़ा था, तथा 2 नौकर भी मौजूद थे.

‘‘इस दुकान के मालिक किधर हैं?’’ चंद्रमोहन ने पूछा.

‘‘किसी काम से गए हैं,’’ लड़के ने उत्तर दिया.

‘‘कब तक आएंगे?’’

‘‘पता नहीं, शायद अभी आ जाएं.’’

‘‘ठीक है, तुम इन दोनों बच्चों के कपड़े दिखाओ.’’

नौकर बच्चों के सूट दिखाने लगा. 2 सूट पसंद कर बंधवा लिए गए.

‘‘कितना बिल हुआ?’’ चंद्रमोहन ने पूछा.

‘‘230 रुपए.’’

‘‘तुम हमें पहचानते नहीं?’’

‘‘जी नहीं,’’ लड़के ने कहा.

‘‘खैर, हम यहां के बिक्री कर अधिकारी हैं. जब दुकान के मालिक आ जाएं तो उन्हें बता देना कि चंद्रमोहन साहब आए थे और ये दोनों सूट पसंद कर गए हैं. वह इन्हें घर पर ले कर आ जाएंगे. क्या समझे?’’

‘‘बहुत अच्छा, कह दूंगा,’’ लड़का बोला.

चंद्रमोहन दुकान से बाहर निकल आया और सुमन से बोला, ‘‘ये दोनों सूट तो घर पहुंच जाएंगे. लड़के का बाप होता तो ये अभी मिल जाते. अच्छा, अब और भी कुछ लेना है?’’

‘‘हां, कुछ क्राकरी भी तो लेनी है.’’

‘‘जरूर. हमें कौन से पैसे देने हैं,’’ कहता हुआ चंद्रमोहन क्राकरी की एक दुकान की तरफ बढ़ा.

देखते ही दुकानदार का माथा ठनका. वह चंद्रमोहन की आदत को अच्छी तरह जानता था. पहले भी कभी चंद्रमोहन, कभी उस की पत्नी और कभी उस का चपरासी बिना पैसे दिए सामान ले गया था. फिर भी दुकानदार को मधुर मुसकान के साथ उस का स्वागत करना पड़ा, ‘‘आइए, साहब, बड़े दिनों बाद दर्शन दिए.’’

‘‘कैसे हैं आप?’’

‘‘बस, जी रहे हैं, साहब, बहुत मंदा चल रहा है.’’

‘‘हां, मंदीतेजी तो चलती ही रहती है.’’

‘‘कल आप का चपरासी रामदीन आया था, साहब. आप ने कुछ मंगाया था न?’’

‘‘हम ने, क्या ले गया वह?’’

‘‘एक दरजन गिलास.’’

चंद्रमोहन चपरासी की इस हरकत पर परदा डालते हुए बोला, ‘‘अच्छा वे गिलास…वे कुछ बढि़या नहीं निकले. वापस भेज दूंगा. अब कोई बढि़या सा टी सेट और कुछ गिलास दिखाइए.’’

चंद्रमोहन व सुमन टी सेट पसंद करने लगे.

तभी अचानक जैसे कोई भयंकर तूफान सा आ गया. बाजार में भगदड़ मचने लगी. दुकानों के दरवाजे तेजी से बंद होने लगे. 2-3 व्यक्ति चिल्ला रहे थे, ‘‘दुकानें बंद कर दो. जल्दी से चौक में इकट्ठे हो जाओ.’’

दुकानदार ने चिल्लाने वाले एक आदमी को बुला कर पूछा, ‘‘क्या हो गया?’’

‘‘झगड़ा हो गया है.’’

‘‘झगड़ा? किस से?’’

‘‘एक बिक्री कर अधिकारी से.’’

‘‘क्या बात हुई?’’

‘‘बिक्री कर विभाग के छापामार दस्ते का एक अधिकारी गोविंदराम की दुकान पर पहुंचा. 500 सौ रुपए का सामान ले लिया. जब उस ने पैसे मांगे तो वह अधिकारी आंखें दिखा कर बोला, ‘हम को नहीं जानता.’ दुकानदार भी अकड़ गया. बात बढ़ गई. वह अधिकारी उसे बरबाद करने की धमकी दे गया है. इन बिक्री कर वालों ने तो लूट मचा रखी है. माल मुफ्त में दो, नहीं तो बरबाद होने के लिए तैयार रहो. मुफ्त में माल भी खाते हैं और ऊपर से गुर्राते भी हैं.’’

‘‘दुकानें क्यों बंद कर रहे हो?’’ दुकानदार ने पूछा.

उस ने कहा, ‘‘बाजार बंद कर के जिलाधिकारी के पास जाना है. आखिर कब तक इस तरह हम लोगों का शोषण होता रहेगा? एक न एक दिन तो हमें इकट्ठे हो कर इस स्थिति का सामना करना ही होगा.

‘‘इन अफसरों की भी तो जांचपड़ताल होनी चाहिए. ये जब नौकरी पर लगते हैं तब इन के पास क्या होता है? और फिर 2-4 साल के बाद ही इन की हालत कितनी बदल जाती है. अब तुम जल्दी दुकान बंद करो. सब दुकानदार चौक में इकट्ठे हो रहे हैं. अब इन मुफ्तखोर अधिकारियों की सूची दी जाएगी. अखबार वालों को भी इन अधिकारियों के नाम बताए जाएंगे,’’ कहता हुआ वह व्यक्ति चला गया.

चंद्रमोहन को लगा मानो यह जलूस छापामार दस्ते के उस अधिकारी के विरुद्ध नहीं, स्वयं उसी के विरुद्ध जाने वाला है. वह भी तो मुफ्तखोर है. आज नहीं तो कल उस का भी जलूस निकलेगा. समाचारपत्रों में उस के नाम की भी चर्चा होगी. उसे अपमानित हो कर इस नगर से निकलना पड़ेगा. नगर की जनता अब जागरूक हो रही है. उसे अपनी यह आदत बदलनी ही पड़ेगी.

दुकानदार ने उपेक्षित स्वर में पूछा, ‘‘हां, साहब, आप फरमाइए.’’

चंद्रमोहन की हालत पतली हो रही थी. उस ने शुष्क होंठों पर जीभ फेर कर कहा, ‘‘आज नहीं, फिर कभी देख लेंगे. आज तो आप भी जल्दी में हैं.’’

‘‘ठीक है.’’ दुकानदार ने गर्वित मुसकान से चंद्रमोहन की ओर देखा और दुकान बंद करने लगा.

चंद्रमोहन दुकान से बाहर निकल कर चल दिया. उसे ग्लानि हो रही थी कि आज वह बहुत गलत समय खरीदारी करने घर से निकला.

‘बच्चू, बंद कर के जाओगे कहां? किसी और दिन सही. आखिर हमारी ताकत तो बेपनाह है,’ मन ही मन बुदबुदाते हुए उस ने कहा.

Hindi Fictional Story

Shanaya Kapoor: शनाया कपूर की फेल्ड लौंचिंग

Shanaya Kapoor: बौलीवुड की युवा ब्रिगेड में अगर किसी गर्ल गैंग की दोस्ती सब से ज्यादा चर्चा में रहती है तो वो शनाया कपूर, सुहाना खान, नव्या नवेली नंदा और अनन्या पांडे की है. इन्हें अपकमिंग स्टार्स बताया जा रहा है. इन की दोस्ती से जुड़ी फोटोज आएदिन इंस्टाग्राम पर छाई रहती हैं. इन की फ्रैंडशिप कमाल की है. ये अकसर पार्टी, घूमनाफिरना, मौजमस्ती साथ में करती हैं. ये चारों फिल्मी घरानों से आती हैं. इन्हें अच्छाख़ासा प्रिविलेज है कि ये जब चाहें फिल्मों में कदम रख सकती हैं.

इन में से अगर अमिताभ बच्चन की नवासी नव्या नवेली नंदा को छोड़ दिया जाए तो बाक़ी तीनों ने बौलीवुड में अलगअलग समय पर अपना डैब्यू कर लिया है. हां, भले उन के काम को अभी सराहा न गया हो, काम पर खूब किरकिरी हुई हो पर मौकों की कमियां उन के पास अभी भी नहीं हैं.

इन तीनों में से शनाया कपूर ने हाल ही में आई फिल्म ‘आंखों की गुस्ताखियां’ से डैब्यू किया है, जिस में उन के को-ऐक्टर विक्रांत मैसी रहे. शनाया एक समय अचानक मशहूर हुए ऐक्टर और अनिल कपूर के भाई संजय कपूर की बेटी है. भले संजय की झोली में ‘शक्ति’ और ‘दिलबर’ जैसी कुछेक अच्छी फिल्में आईं मगर वे फ्लौप ऐक्टर में ही गिने गए.

अब उन की बेटी शनाया फिल्मों में आई है. मगर उस के लिए पहली फिल्म का एक्सपीरियंस वैसा नहीं रहा जैसा नईनवेली जोड़ी अहान पांडे और अनीत पड्डा के लिए रहा. दोनों ने एक तरह से अपनी डैब्यू फिल्म ‘सैयारा’ में सिनेमा हौल पर हंगामा बरपा दिया. और करोड़ों रुपए डैब्यू फिल्म में ही कमा डाले. यही नहीं, खुद के नाम के आगे तमाम पीआर करवा कर इन्होंने जेनजी स्टार का टैग भी ले लिया.

हालांकि ऐसा करने वाले ये पहले डैब्यू सितारे नहीं रहे. इस से पहले कुमार गौरव, शाहनी आहूजा या इमरान खान जैसे ऐक्टर आए, हंगामा बरपाया मगर फिर फिल्म इंडस्ट्री से ही गायब हो गए.

जाहिर है, जिस तरह की शुरुआत अनीत पड्डा ने की, उसी तरह की शुरुआत हर नई ऐक्ट्रैस करना चाहती है, खासकर ऐसी ऐक्ट्रैस जिस पर नैपोकिड होने का ठप्पा लगा हो. उस के लिए दर्शकों के बीच अपनी इंडिपेंडैंट इमेज बनाना सब से ज्यादा जरूरी होता है. इस मामले में शनाया असफल साबित हुई. उस की पहली फिल्म न सिर्फ फ्लौप हुई बल्कि उस के हिस्से राशा थडानी जैसा ‘उई अम्मा…’ सरीखा आइटम सौंग भी नहीं आ पाया जिस से वह चर्चा में आ पाती.

शनाया की शुरुआत

वैसे तो अपनी फिल्म ‘आंखों की गुस्ताखियां’ से बौलीवुड में डैब्यू करने से पहले शनाया कपूर ने ‘गुंजन सक्सेना : द कारगिल गर्ल’ में बतौर असिस्टेंट डायरैक्टर काम किया था. मगर बतौर ऐक्ट्रैस, वह ‘आंखों की गुस्ताखियां’ में नजर आई.

शनाया की मां महीप कपूर ज्वेलरी डिजाइनर है. उस का एक छोटा भाई भी है जिस का नाम जहान कपूर है. 3 नवंबर साल 1999 में जन्मी शनाया ने अपनी स्कूली पढ़ाई मुंबई से की. उस ने इकोले मोंडिएल वर्ल्ड स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की है. इस स्कूल की केजी 1 की सालाना फीस 7 लाख रुपए बताई जाती है. यहां से एक और फिल्मी अभिनेत्री जाह्नवी कपूर ने भी अपनी पढ़ाई की है.

शनाया ने ग्रेजुएशन स्कूल औफ मैनेजमैंट स्टडीज औफ लंदन से किया है. रिपोर्ट्स की मानें तो उस ने ऐक्टिंग के साथ डांसिंग की ट्रेनिंग ली और बौलीवुड में बतौर असिस्टेंट डायरैक्टर काम करना शुरू कर दिया. इस के अलावा शनाया का रुमर्ड बौयफ्रैंड करण कोठारी को बताया जाता है जो मुंबई का बिसनैसमैन है.

अगर शनाया के नैटवर्थ की बात करें तो वह 8 करोड़ रुपए की संपत्ति की मालकिन है. इस में हैरानी नहीं कि यह उस की कमाईधमाई वाली संपत्ति नहीं बल्कि प्रिविलेज का हिस्सा है. इस प्रिविलेज का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बिना खुद को साबित किए उस के हिस्से पहली फ्लौप के बाद अपकमिंग प्रोजैक्ट्स में तेलुगू–मलयालयम फिल्म ‘वृषभ’ है जिस के 16 अक्टूबर को थिएटर्स में आने की चर्चा है. इस के अलावा ‘तू या मैं’ है, जो अगले साल रिलीज़ होगी. बताया जा रहा है कि कारन जौहर की फिल्म ‘बेधड़क’ में भी वह नजर आ सकती है.

दिखने में सुंदर मगर ऐक्टिंग में कच्ची

इस में कोई शक नहीं कि शनाया बेहद खूबसूरत ऐक्ट्रैस है और दोराय भी नहीं कि उसे यह खूबसूरती अपनी मां महीप कपूर से मिली है जो मात्र 42 साल की हैं. महीप कपूर आज भी शानदार दिखती हैं जिन्होंने 1994 में ‘निगोरी कैसी जवानी है’ में डैब्यू किया था और पहली फिल्म में बुरी तरह फ्लौप हो कर आगे फिल्मों का मोह छोड़ दिया था. जाहिर है, अपनी बेटी में अपना पुराना सपना जरूर देखा होगा.

शनाया कपूर की भी पहली फिल्म फ्लौप हुई. उस के को-एक्टर विक्रांत मैसी थे जो हाल में अपनी फिल्म ’12वीं फेल’ से काफी चर्चित हुए. मगर विक्रांत मैसी के अपोजिट फिल्म में होना यह भी दर्शाता है कि वह अपनी पहली फिल्म अपने अभिनय कौशल को दिखाने की जगह नैपोकिड के उस ठप्पे को मिटाने के लिए कर रही थी जो मीडिया या आम चलन में चर्चित हो गया है.

दरअसल, यह चलन देखा जा रहा है कि किसी स्टारकिड को लौंच करते हुए ध्यान रखा जाता है कि उस का को-एक्टर या ऐक्ट्रैस इंडस्ट्री से बाहर का हो, ताकि प्रिविलेज का तमगा हटाया जा सके या उस से बचा जा सके और लैवल ग्राउंड का नैरेटिव गढ़ा जा सके. यह सोचीसमझी मार्केटिंग स्ट्रेटजी का हिस्सा होता है क्योंकि यह तरीका भी होता है बौयकाट ट्रैंड को टैकल करने का.

बावजूद इस के, अपनी डैब्यू फिल्म में शनाया की ऐक्टिंग को ले कर कोई रिस्पौंस नहीं आया. अच्छी बात यह है कि ऐक्टिंग ख़राब हो, ऐसा नहीं दिखा मगर अच्छी हो, यह भी कहा नहीं जा सकता. हालांकि यह शनाया की पहली फिल्म है तो थोड़ा बेनिफेट औफ न्यू कमर के तौर पर मिलना चाहिए, मगर जिस तरह से बाकी स्टारकिड्स की तरह उस की लग्जरी लाइफ रही है तो वह बिना पीआर और मार्केटिंग के सफल हो, कहा नहीं जा सकता.

Shanaya Kapoor

Ambivalent Relationship में कहीं आप का रिश्ता भी तो नहीं बदल गया

Ambivalent Relationship: जिंदगी की भागदौड़ में कब हमारे रिश्तों में दरार आने लगती है हमें पता ही नहीं चलता. छोटीछोटी बातें राई का पहाड़ बनने लगती हैं. कभी पार्टनर एकदूसरे पर प्रेम और लगाव न्योछावर करते हैं तो कभी पलभर में ही अपने पार्टनर की शक्ल तक देखना नापसंद कर देते हैं.

ऐसे में रिश्ता खुशियों भरा कम व तनावपूर्ण ज्यादा होता जाता है, जोकि न सिर्फ शारारिक, बल्कि मानसिक रूप से भी पीड़ादायक सिद्ध होता है.

इस परिस्थिति का एक कारण रिश्ते में विश्वास की कमी होना भी है. ऐसा रिश्ता सिर्फ पतिपत्नी का ही नहीं, बल्कि किसी के साथ भी हो सकता है फिर चाहे भाईबहन, मातापिता, दोस्त कोई भी हो.

बात यदि लाइफ पार्टनर की करें तो यह जीवनभर के लिए कड़वा अनुभव होता है क्योंकि यह एक दीर्घकालिक संबंध है. इस रिश्ते में 2 लोग एकदूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं, जिन के बीच न सिर्फ प्रेम बल्कि टकराव, संघर्ष जैसी भावनाएं भी मौजूद होती हैं. लेकिन जब प्रेम कम और टकराव रिश्ते में घर करने लगें तो समझ लें कि रिश्ता ऐंबिवेलेंट रिलेशनशिप की तरफ जा रहा है, जिसे समय रहते समझ लिया जाए तो रिश्ता टूटने व टौक्सिक होने से बचाया जा सकता है.

ऐंबिवेलेंट रिलेशनशिप

यह एक ऐसा रिश्ता है जिस में व्यक्ति के मन में एक ही व्यक्ति के प्रति मिश्रित भावनाएं होती हैं. जैसे कि पलभर में ही प्रेम और घृणा का एकसाथ होना या कभी पार्टनर की और आकर्षित होना तो दूसरे ही पल उसे अस्वीकृत करना. ऐसी दोहरी भावनाएं व्यक्ति के मन में उलझन और तनाव पैदा करती हैं.

कारण को समझें

  • पार्टनर के बीच में संवाद की कमी का होना जिस कारण एकदूसरे की बातों को सही से समझ नहीं पाते.
  • दोनों की सोच और प्राथमिकताएं एकदूसरे से अलग होना.
  • पार्टनर से अत्यधिक अपेक्षा रखना.
  • बचपन की परवरिश में अस्थिर स्नेह या असुरक्षित परवरिश का प्रभाव का होना.

प्रभाव

  • अत्यधिक मानसिक तनाव, चिंता और डिप्रैशन जैसी स्थिति की संभावना बढ़ जाती हैं.
  • रिश्ते में विश्वास व भावनात्मक रूप से जुड़ाव कम होना.
  • रिश्ते से बाहर निकलने के बारे में सोचना लेकिन पार्टनर को खोने का डर भी साथ में बने रहना.

समाधान

  • गुस्सा शांत होने पर एकदूसरे से खुल कर बात करें.
  • अत्यधिक अपेक्षाओं को हावी न होने दें. रिश्ते में सामंजस्य लाने का प्रयास करें.
  • ममता और वातसल्य निरंतरता में बनाए रखें.
  • एकदूसरे की खामियों को नजरअंदाज करने की आदत डालें.
  • काउंसलिंग या थेरैपी की सहायता लें.
  • आत्मविश्वास में कमी न आने दें.
  • एकदूसरे के साथ क्‍वालिटी टाइम बिताएं.
  • एकदूसरे के प्रति सम्मान की भावना बनाए रखें.

Ambivalent Relationship

Credit Card EMI: क्रैडिट कार्ड की ईएमआई मायाजाल में न फंसे

Credit Card EMI: फैस्टिव सीजन आ चुका है और हर शौपिंग प्लेटफौर्म पर ईएमआई पर सामान लेने के औफरों की लाइन लग गई है. लेकिन जरा संभल कर कहीं ये औफर आप की पौकेट पर रितेश की तरह भारी न पड़ जाएं. रितेश 28 साल का एक आईटी प्रोफैशनल था. नई जौब लगी थी, सैलरी भी अच्छी थी और सपनों की लिस्ट भी लंबी. कुछ ही महीनों में उस ने एक ब्रैंडेड लैपटौप, आईफोन और स्मार्ट टीवी खरीद लिया. हर बार खरीदारी के बाद उस के मोबाइल पर मैसेज आता, कन्वर्ट दिस इन टू ईएमआई (Convert this into EMI) रितेश को लगता कि वाह, कितना आसान है…महंगे प्रोडक्ट्स भी बस ₹2-3 हजार महीना दे कर मिल जाते हैं.

धीरेधीरे उस के क्रेडिट कार्ड पर 5-6 ईएमआई चलने लगीं. महीने की सैलरी आते ही आधी रकम ईएमआई और क्रेडिट कार्ड बिल चुकाने में चली जाती. एक दिन अचानक कार खरीदने का मन हुआ, लेकिन बैंक ने लोन रिजैक्ट कर दिया क्योंकि उस का क्रेडिट यूटिलाइजेशन बहुत हाई था.

रितेश सोच में पड़ गया कि आखिर मैं ने ऐसी कौन सी गलती कर दी? मैं तो ईएमआई की सुविधा ले रहा था, फिर भी मेरी फाइनैंशियल स्थिति इतनी खराब क्यों हो गई?

यही सवाल असल में हम सब को सोचना चाहिए. आखिर क्रेडिट कार्ड कंपनियां बारबार ईएमआई का मैसेज क्यों भेजती हैं? क्यों ईएमआई को इतना सुविधाजनक बना कर दिखाया जाता है?

आज की लाइफस्टाइल में क्रेडिट कार्ड सिर्फ पेमैंट का साधन नहीं, बल्कि एक ऐसा टूल बन गया है जिस से बैंक और फाइनैंशियल कंपनियां सब से ज्यादा मुनाफा कमाती हैं. आप ने भी नोटिस किया होगा कि जैसे ही आप बड़ी खरीदारी करते हैं, तुरंत आप के फोन पर मैसेज आता है, ‘कन्वर्ट इन टू ईएमआई.’

नैट बैंकिंग में पौपअप खुलता है या कौल सैंटर से फोन आ जाता है. अब सवाल यह है कि कंपनियां बारबार ईएमआई पर इतना जोर क्यों देती हैं? असल वजह सिर्फ ग्राहक की सुविधा नहीं, बल्कि इस के पीछे छिपा है कंपनियों का बड़ा बिजनैस मौडल.

आइए, इसे आसान भाषा में समझते हैं :

ईएमआई कंपनियों का सब से बड़ा बिजनैस मौडल ईएमआई यानि सीधी भाषा में कहें तो बड़ी रकम को छोटेछोटे मासिक हिस्सों में चुकाने की सुविधा.

कंपनियां इसे एक सुविधा की तरह बेचती हैं, लेकिन असल में यह उन के लिए रैगुलर इनकम का जरीया है, जिस के साथ ब्याज और प्रोसेसिंग फीस जुड़ी होती है, जिस से कंपनियां मोटा मुनाफा कमाती हैं.

ग्राहक को ज्यादा खर्च करने के लिए प्रेरित करना

  • मान लीजिए कि किसी के पास तुरंत ₹40,000 नहीं है, तो वह लैपटौप नहीं खरीदेगा. लेकिन अगर वही ईएमआई पर ₹3,500 महीने में मिल रहा है तो ग्राहक आसानी से खरीद लेगा.
  • मतलब ईएमआई ग्राहक को अपनी भविष्य की कमाई आज खर्च करने पर मजबूर करती है.
  • इस से ग्राहकों की खरीदारी बढ़ती है और कंपनी की ट्रांजैक्शन वैल्यू भी.

ब्याज और चार्जेस है असली कमाई

  • नो कौस्ट ईएमआई (No Cost EMI) सुन कर लगता है कि सब मुफ्त है. लेकिन असलियत यह है कि ब्याज को प्रोडक्ट की कीमत में ही जोड़ दिया जाता है.
  • साधारण ईएमआई पर 12% से 18% सालाना तक ब्याज लगता है. ऊपर से प्रोसेसिंग फीस, जीएसटी और लेट पेमैंट चार्ज अलग.
  • अगर कोई ग्राहक पेमैंट मिस करे तो पैनाल्टी से कंपनियों की कमाई और दोगुनी हो जाती है.

ग्राहक लंबे समय तक जुड़ा रहता है

  • ईएमआई के बाद ग्राहक 6, 9 या 12 महीनों तक कंपनी से बंधा रहता है.
  • जब तक किस्तें पूरी नहीं होतीं, ग्राहक कार्ड बंद नहीं कर सकता.
  • इस दौरान ग्राहक कार्ड का इस्तेमाल करता रहता है और कंपनी को लगातार फायदा मिलता है.

ईएमआई सस्ता दिखाने का मनोवैज्ञानिक खेल

  • मार्केटिंग में एक बड़ा ट्रिक है, बड़ी रकम को छोटे हिस्सों में तोड़ दो.
  • ₹50,000 देख कर ग्राहक घबरा जाता है, लेकिन ₹4,500/माह देख कर उसे आसान लगता है.
  • इसी सोच के कारण लोग ईएमआई चुनते हैं और धीरेधीरे कर्ज का बोझ बढ़ जाता है.

मर्चेंट और कंपनी की पार्टनरशिप

  • अमेजन, फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफौर्म ईएमआई औफर क्यों देते हैं? क्योंकि इस में मर्चेंट और कंपनी दोनों का फायदा होता है.
  • मर्चेंट को बिक्री मिलती है, कंपनी को ब्याज और फीस.
  • यह एक विनविन (win-win) मौडल है, जिस में ग्राहक ही ज्यादा बोझ उठाता है.

रिवौल्विंग क्रेडिट (Revolving Credit) की आदत डालना

  • क्रेडिट कार्ड ईएमआई का सब से खतरनाक पहलू यही है कि यह ग्राहकों को रिवौल्विंग क्रेडिट की आदत डाल देता है.
  • ग्राहक पूरा बकाया नहीं चुकाता, बस मिनिमम अकाउंट भरता है.
  • बाकी रकम कैरी फौरवर्ड (carry forward) हो जाती है और उस पर भारी ब्याज जुड़ता है.
  • ईएमआई इस हैबिट को और पक्का कर देती है.

कंपनियों का रिस्क कम करना

  • बड़ी रकम को किस्तों में बांटने से डिफौल्ट का रिस्क घट जाता है.
  • अगर ग्राहक बीच में चूक भी जाए तो लेट फीस, ब्याज और पैनाल्टी से कंपनियों की कमाई चलती रहती है.
  • यानि रिस्क भी कम, फायदा भी पक्का.

डेटा कलैक्शन और मार्केटिंग

  • जब आप ईएमआई लेते हैं, तो आप के खर्च का पूरा डेटा कंपनी के पास जाता है.
  • आप ने क्या खरीदा, कितने में खरीदा, समय पर पेमैंट किया या नहीं, सब रिकौर्ड होता है.
  • इसी डेटा से आप को नए औफर, लोन और प्रोडक्ट्स टारगेट किए जाते हैं.

लग्जरी लाइफस्टाइल की तरफ धकेलना

  • कंपनियां चाहती हैं कि ग्राहक अपनी आय से ज्यादा खर्च करे.
  • ईएमआई देख कर लोग लग्जरी प्रोडक्ट्स तुरंत खरीद लेते हैं.
  • पहले जो चीजें सालों की बचत से मिलती थीं, आज ईएमआई देख कर तुरंत ले ली जाती हैं.
  • यह मौडल लोगों को धीरेधीरे कर्ज की आदत डाल देता है.

ईएमआई क्यों जरूरी है, संक्षेप में जानिए

  • ब्याज और फीस से भारी मुनाफा.
  • ग्राहक की खर्च क्षमता बढ़ाना.
  • ग्राहक को लंबे समय तक जोड़े रखना.
  • मर्चेंट और कंपनी दोनों का फायदा.
  • रिवौल्विंग क्रेडिट की आदत.
  • डेटा और नई सेवाओं की बिक्री.

ग्राहक के लिए सीख

 

  • ईएमआई कई बार नुकसानदेह नहीं होती. अगर इमरजैंसी है या बहुत जरूरी खर्च है, तब ईएमआई काम आ सकती है. लेकिन इसे सोचसमझ कर इस्तेमाल करना चाहिए.

 

  • नो कौस्ट ईएमआई में भी छिपे चार्ज हो सकते हैं.

 

  • कई ईएमआई साथ चलने लगें तो पूरा बजट बिगड़ जाता है.

 

  • याद रखें, ईएमआई का मतलब है भविष्य की कमाई आज खर्च करना.

 

  • क्रेडिट कार्ड कंपनियां ईएमआई जोर देती हैं क्योंकि यह उन के लिए सब से बड़ा कमाई का जरीया है.

 

  • ईएमआई आप को आसान लगती है लेकिन असल में यह कंपनियों की ऐसी रणनीति है जिस में ब्याज, चार्जेस और लौयल्टी आदि सब कुछ एकसाथ हासिल होता है.

 

तो अगली बार जब आप के कार्ड पर ईएमआई का मैसेज आए, तो जरूर सोचिए कि यह सचमुच आप की सुविधा है या मुनाफे का खेल.

Credit Card EMI

Breakup At Night: ब्रेकअप रात को ही क्यों हैवी फील होता है?

Breakup At Night: आप ने कभी नोटिस किया है कि जब भी ब्रेकअप होता है, दिन में हम थोड़ाबहुत संभाल लेते हैं, लेकिन जैसे ही रात आती है, सब कुछ भारी क्यों लगने लगता है? ऐसा क्यों होता है? दिल यों बैठने क्यों लगता है और क्यों हम बारबार पुराने चैट्स खोलते हैं, पुराने पलों को याद करते हैं या फिर उस इंसान की प्रोफाइल तक जा पहुंचते हैं जिसे छोड़ने का या खोने का दर्द अभी तक गया नहीं? ऐसा होने के कई कारण हैं.

रात की शांति में मन की आवाज ज्यादा तेज सुनाई देती है

दिन में हमारे पास बहुतकुछ करने को होता है. कालेज जाना, औफिस का काम, दोस्तों से मिलना, बाहर जाना, ट्रैफिक, शोरशराबा. लेकिन जैसे ही रात होती है, सब शांत हो जाता है. और जब बाहर की आवाजें कम हो जाती हैं तब हमारे अंदर की आवाजें तेज हो जाती हैं.

यादें, बातें, लड़ाइयां सबकुछ फिर से जेहन में ताजा हो जाता है

अनुष्का का ब्रेकअप हुआ था 2 महीने पहले. दिन में वह अपने औफिस और जिम में बिजी रहती थी, लेकिन रात को जब वह अकेले अपने कमरे में होती तो रोके न रुकती. वह कहती है, दिन में सब ठीक लगता है, पर रात में ऐसा लगता है जैसे सबकुछ टूट गया हो.

थकावट से हैवी होते इमोशन

जब हम थके होते हैं तो हमारी मानसिक ताकत कम हो जाती है. हम उतने मजबूत नहीं रह पाते जितने दिन में रहते हैं. और अगर ब्रेकअप के बाद हमारी नींद भी डिस्टर्ब हो रही है तो दिमाग थक चुका होता है. ऐसे में इमोशन्स का बहाव और भी ज्यादा होता है.

नींद हमारे दिमाग को रीसैट करने का काम करती है. लेकिन जब हम रातरातभर जाग कर आंसू बहाते हैं, तो वह रीसैट नहीं हो पाता. उलटा, दिमाग और भी डिस्टर्ब हो जाता है.

रात का समय वह होता है जब हम उसे मैसेज करते थे, कौल करते थे, गुडनाइट कहते थे, प्यारी और रोमांटिक इमोजी भेजते थे. वह जो हमारा सब से पर्सनल टाइम था वही अब सबसे ज्यादा खाली लगने लगता है.

अंकुर और नताशा का ब्रेकअप 3 साल की रिलेशनशिप के बाद हुआ. अंकुर कहता है, “हम रोज रात 11 बजे कौल पर होते थे. अब वो टाइम आते ही मोबाइल देखता हूं, फिर रख देता हूं. नींद ही नहीं आती.”

दरअसल, सभी दिनभर काम में बिजी होते हैं तो ढंग से उन में बात नहीं हो पाती लेकिन रात में कोई जरूरी काम नहीं होते इसलिए उस वक्त दोनों ही फ्री हो कर एकदूसरे से बात करते हैं. ऐसे में ब्रेकअप के बाद यही समय सब से ज्यादा हर्ट होता है.

सोशल मीडिया पर सबकुछ दिखता है लेकिन कुछ भी मिलता नहीं

रात को जब हम खाली होते हैं तो हम सब से ज्यादा स्क्रौल करते हैं. और वहीं से फिर शुरू होती है एकदूसरे से कंपेयर करने की धुन. कोई कपल रील बना रहा है, कोई पहाड़ों में घूम रहा है, कोई पार्टनर की बात कर रहा है. ऐसे में अपना दर्द और ज्यादा गहरा लगने लगता है. ये सोचने लगते हैं कि हम ही क्यों अकेले रह गए.

सोशल मीडिया रात को इमोशनल ट्रैप बन जाता है- बाहर से ग्लैमरस, अंदर से दर्द बढ़ाने वाला.

दिल और दिमाग के बीच लड़ाई

दिन में हमारा दिमाग थोड़ा लौजिकल तरीके से सोचता है- ‘उस ने सही नहीं किया’, ‘यह रिश्ता अब सही नहीं था’ वगैरह. लेकिन रात को दिल हैवी हो जाता है — ‘वो कैसा होगा?’, ‘क्या मुझे मिस करता होगा?’, ‘क्या दोबारा बात करनी चाहिए?’ मुश्किल तब और ज्यादा बढ़ जाती है जब फिजिकल रिलेशन बन जाते हैं तो रात में वो पल ज्यादा याद आते हैं.

यह वही टाइम होता है जब हम पुरानी चैट्स पढ़ते हैं, पुराने फोटोज देखते हैं,  या फिर उस की प्रोफाइल स्टौक करते हैं.

रात अकेलेपन को ज्यादा बड़ा दिखाती है

जब दिनभर लोग हमारे आसपास होते हैं तो अकेलापन कम महसूस होता है. लेकिन जैसे ही अंधेरा होता है और कमरे में अकेले होते हैं, तो वह अकेलापन दसगुना बढ़ जाता है. और ब्रेकअप के बाद तो यह और भी बुरा फील होता है.

यादों का फ्लैशबैक ज्यादातर रात में चलता है

रात को अकसर हमारी आंखों के सामने वो सारी चीजें चलती हैं, जैसे पहली मुलाकात, पहली डेट, लड़ाइयां, आखिरी कौल, आखिरी मैसेज आदि. दिमाग जैसे औटो प्लेमोड में चला जाता है और हम उस दर्द में वापस चले जाते हैं जिस से बाहर आने की कोशिश कर रहे थे.

ब्रेकअप के बाद सिर्फ इंसान नहीं जाता, साथ में उस की मौजूदगी से जुड़ी आदतें भी चली जाती हैं. जैसे, रात को उस की आवाज सुन कर सोना, उस का गुडनाइट मैसेज या फोन पर चैट करते हुए सो जाना ये सब जब अचानक बंद हो जाता है तब वह खालीपन और भी ज्यादा चुभता है.

हम सब से ज्यादा खुद से बातें रात को करते हैं

रात को हम खुद से सवाल करते हैं, ‘क्या मेरी गलती थी?’, ‘क्या मैं ने सबकुछ किया?’, ‘क्या वह लौटेगा?’ और इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता. जवाब न मिलने की ही बेचैनी हमारे दुख को और गहरा कर देती है.

क्या किया जाए?

अब सवाल यह उठता है क्या हम रातों को यों ही भारी महसूस करते रहें या कुछ कर सकते हैं?

* रूटीन सैट करें : रात को सोने का एक फिक्स टाइम बनाएं. मोबाइल ले कर बेड पर न जाएं.

* मैसेज व प्रोफाइल चैक करना बंद करें : जितना ज्यादा आप उसे देखते रहेंगे, उतना ही भूल नहीं पाएंगे.

* कुछ पौजिटिव पढ़ें या सुनें : पौडकास्ट, बुक्स या रिलैक्सिंग म्यूजिक से रात को शांत बनाया जा सकता है.

* एक्सप्रैस करें : कुछ भी मन में आए तो लिखिए डायरी में या नोट्स ऐप में या किसी जिगरी दोस्त से शेयर करें.

रातों का भारीपन कोई नई बात नहीं है, यह बहुत नैचुरल है. जब प्यार छूटता है, तो दिल को वक्त लगता है संभलने में. और रात वो वक्त होता है जब हम अपने खुद के सब से करीब होते हैं, इसलिए ब्रेकअप की चुभन सब से ज्यादा तब ही महसूस होती है.

Breakup At Night

Genz New Trend: नौकरी के लिए लिंक्डइन नहीं, डेटिंग ऐप्स बना नया रास्ता

Genz New Trend: नौकरी की तलाश की बात करते हैं, तो दिमाग में सब से पहले आता है रिज्यूमे बनाना, एचआर को मेल भेजना या लिंक्डइन, इंडीड जैसी ऐप्स में जा कर प्रोफाइल अपडेट करना. लेकिन आजकल एक नया ट्रैंड सामने आ रहा है, जिसे जान कर कोई भी चौंक सकता है. नौकरी के लिए युवा अब लिंक्डइन छोड़ कर डेटिंग ऐप्स का सहारा ले रहे हैं.

जी हां, अब बंबल, टिंडर और हिंज जैसी ऐप्स सिर्फ डेटिंग तक सीमित नहीं रहीं. युवा प्रोफैशनल्स इन्हें नैटवर्किंग और कैरियर कनैक्शन के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. यह बदलाव सोशल मीडिया के बदलते यूज पैटर्न, जेनरेशन जेड की सोच के नए तरीकों को साफ दिखाता है.

नैना, जो कि एक ग्राफिक डिजाइनर है, ने लौकडाउन के दौरान बंबल पर एक लड़के से बात शुरू की. बात करतेकरते उसे पता चला कि वह लड़का एक क्रिएटिव एजेंसी में काम करता है और उस की कंपनी में ग्राफिक डिजाइनर की जरूरत है. नैना ने अपने काम के कुछ सैंपल भेजे और कुछ हफ्तों में उसे जौब मिल गया.

नैना कहती है, “बंबल पर मैं डेटिंग के लिए नहीं, लोगों से बात करने और टाइम पास करने के लिए थी. पर सोचा नहीं था कि वहां से नौकरी भी मिल सकती है.”

यह एक तरह से जानपहचान बनाने का जरिया है, जिस का फायदा कैरियर में भी हो रहा है. जैसे, पहले के समय में होता था जब लोग जानपहचान का सहारा ले कर कहीं काम पर लग जाया करते थे या अप्रोच करते थे.

 डेटिंग ऐप्स: अब सिर्फ डेटके लिए नहीं

अब डेटिंग ऐप्स सिर्फ रोमांटिक पार्टनर ढूंढ़ने की जगह नहीं रह गई हैं. यहां लोग दोस्त बना रहे हैं, प्रोफैशनल कनैक्शन खोज रहे हैं, उसी हिसाब से अपने मैच की प्रिफरैंस देखते हैं जो उन के कैरियर में मददगार हो सकता है और कई बार वहां लोग बिजनैस आइडियाज तक डिस्कस कर रहे होते हैं.

इस की खास वजहें हैं

कम फौर्मेलिटी : लिंक्डइन पर बात शुरू करना कई बार किसी इंटरव्यू जैसा लगता है. फौर्मल भाषा पर प्रोफैशनल टोन. कई बार डेटिंग ऐप्स पर लोग अधिक खुल कर बात करते हैं. आमतौर पर दोस्ती हो ही जाती है. खासकर, यंग लड़कियां इन ऐप्स को अपने फायदे के लिए भुना सकती हैं. ये ऐप्स न सिर्फ कौन्फिडैंस देती हैं बल्कि अपनी पहचान छिपा कर लड़कों के साथ घुलनेमिलने का मौका भी देती है.

बायो में बदलती सोच : अब लोग टिंडर या बंबल की बायो में ‘लुकिंग फौर क्रिएटिव कोलैब’ जैसे प्रोफैशनल हिंट डालने लगे हैं. ऐसा ही इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफौर्म पर होता है. यूथ अपनी प्रोफैशनल आइडैंटिटी को भी डालते हैं. इस से वे बताते हैं कि कैरियर पौइंट औफ व्यू से वे किस दिशा में बढ़ रहे हैं.

कम कंपीटिशन वाला माहौल : लिंक्डइन पर एक जौब पोस्ट पर सैकड़ों एप्लिकेशन होती हैं. डेटिंग ऐप्स पर कोई जब कहता है, ‘हे, आई एम रनअप अ स्टार्टअप’ तो उस से सीधे बातचीत का मौका बनता है, बिना किसी भीड़ के.

फटाफट कनैक्शन : डेटिंग ऐप्स का इंटरफेस सुपरफास्ट है. दो मिनट में स्वाइप कर के किसी से कनैक्ट हो जाओ. लिंक्डइन पर तो जौब ढूंढने में घंटों लग जाते हैं, वह भी तब जब कोई रिस्पौंस दे. हां, लिंक्डइन प्रोफैशनल है और जौब्स की अधिकतर पोस्ट वहीँ होती हैं. कंपनी के एचआर डायरैक्ट वहां से एप्लिकैंट को शौर्टलिस्ट करते हैं. मगर लिंक्डइन में अप्रोच नहीं चलता. लेकिन डेटिंग ऐप्स में ऐसी कंपनियों में काम करने वाले कईयों होते हैं. उन से जानपहचान बन जाती है.

आदित्य एक सौफ्टवेयर डैवलपर है, जो अपने स्टार्टअप आइडिया के लिए कोफाउंडर ढूंढ़ रहा था. उस ने हिंज पर अपनी प्रोफाइल में लिखा- “Coder by profession, looking to build something exciting. DM if you’re into tech & startups.”

हफ्तेभर में ही उसे एक लड़की का मैसेज आया जो प्रोडक्ट डिजाइनर थी और उसी तरह का आइडिया सोच रही थी. अब दोनों ने मिल कर एक ऐप लौंच कर दी है.

आदित्य हंसते हुए कहता है, “प्यार तो नहीं मिला, लेकिन पार्टनर जरूर मिल गया वह भी प्रोफैशनल वाला.”

 क्या यह ट्रैंड आगे बढ़ेगा

जेनजी और मिलेनियल्स उन प्लेटफौर्म्स पर जाना पसंद करते हैं जहां वे खुद को एक्सप्रैस कर सकें, बायो मजेदार रख सकें और बातचीत में कोई दबाव न हो. आज का यूथ प्रोफैशनली नहीं लिख सकता. अब ऐसा भी नहीं रहा कि उन के स्कूलों में प्रोफैशनल लैटर लिखना सिखाया जा रहा हो. वह अपने स्लैंग में लिखता है. प्रोफैशनल चीजों के लिए यूथ एआई भरोसे है. वह एआई को कमांड देता है और झटपट लैटर, मेल या ड्राफ्ट लिखवा लेता है.

डेटिंग ऐप्स धीरेधीरे इस ट्रैंड को समझ रही हैं. बंबल ने ‘बंबल बिज’ और ‘बंबल बीएफएफ’ जैसे सैक्शन लौंच किए हैं, जो खासतौर पर नैटवर्किंग और फ्रैंडशिप के लिए हैं.

 कुछ बातें जो ध्यान रखने वाली हैं

* आप डेटिंग ऐप पर सिर्फ प्रोफैशनल नैटवर्किंग चाहते हैं, तो अपने बायो में यह साफसाफ लिखें.

* सीमा बना कर रखें. ये प्लेटफौर्म डेटिंग के लिए बनाए गए हैं, इसलिए बातचीत में प्रोफैशनल और पर्सनल का फर्क समझना जरूरी है.

आज की जेनरेशन प्रोफैशनल कनैक्शन के लिए अलग रास्ते खोज रही है. वह सिर्फ ‘डिग्री और सीवी’ पर भरोसा नहीं करती, बल्कि ‘इंप्रैशन और बातचीत’ को भी उतना ही महत्त्व देती है.

जब वे लिंक्डइन पर भीड़ देख कर निराश होते हैं, तो ऐसे प्लेटफौर्म्स की ओर मुड़ जाते हैं जहां उन्हें इंसान के तौर पर जाना जाए, न कि सिर्फ एक प्रोफाइल या स्किल के रूप में.

और शायद यही वजह है कि डेटिंग ऐप्स, जो कभी सिर्फ ‘डेट खोजने’ के लिए बनाए गए थे, अब कैरियर बिल्डिंग का एक अनोखा रास्ता बनते जा रहे हैं खासकर उन के लिए जो क्रिएटिव फील्ड में कुछ करना चाहते हैं.

नौकरी पाने या नैटवर्किंग करने के लिए रास्ते अब सिर्फ औफिस या कौर्पोरेट मीटिंग तक सीमित नहीं हैं. जहां कभी प्यार के लिए राइट स्वाइप किया जाता था, आज वहां कैरियर के नए दरवाजे भी खुल रहे हैं.

इस बदलते ट्रैंड को देख कर कह सकते हैं– “Swipe right for opportunity”.

Genz New Trend

Maternity Wear खरीदते समय रखें इन बातों का ध्यान

Maternity Wear: प्रैगनैंसी एक ऐसा दौर होता है जिस से अधिकांश महिलाएं कभी न कभी गुजरती ही हैं. पहले महीने से ले कर 9वें महीने तक महिलाओं के शरीर में अनेक बदलाव होते हैं जिस से उन के सभी आउटफिट्स धीरेधीरे छोटे और तंग होने लगते हैं.

यों तो आजकल बाजार में भांतिभांति के मैटरनिटी वियर उपलब्ध हैं पर इन्हें खरीदते समय कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है ताकि पूरे 9 महीने तक आप आराम से इन का उपयोग कर सकें.

आइए, जानते हैं कुछ टिप्स जो मैटरनिटी वियर खरीदते समय आप के लिए काफी मददगार साबित होंगे :

कंफर्ट और सपोर्ट है सब से जरूरी

चूंकि गर्भावस्था के दौरान शरीर में अनेक बदलाव होते हैं, जिस के कारण शरीर का आकार भी थोड़ा बढ़ जाता है. मैटरनिटी वियर चूंकि एक पर्टिकुलर कैटेगरी को ध्यान में रख कर बनाए जाते हैं, इसलिए इन की कीमत काफी अधिक होती है. इसलिए इन्हें खरीदते समय किसी भी प्रकार का समझौता न करें.

ढीलेढाले कपड़े खरीदें ताकि एक तो पूरे 9 महीने आप इन्हें उपयोग कर सकें और जिन्हें पहन कर आप को कंफर्ट फील हो. इस अवस्था में बहुत मूड स्विंग्स होते हैं इसलिए प्योर कौटन के ऐसे कपड़े खरीदें जिन में आप को कंफर्ट फील हो.

मौसम के अनुकूल हो फैब्रिक

गरमियों में प्योर कौटन और लिनेन, सर्दियों में मुलायम ब्लैंडेड फैब्रिक से बने कपड़ों का चयन करें ताकि आप इन में खुद को कंफर्टेबल फील कर सकें. इस दौरान आप के ब्रैस्ट, कमर और पेट का आकार समय के साथसाथ बढ़ता है इसलिए स्ट्रेचेबल फैब्रिक से बने कपड़ों का चयन करें ताकि शरीर के हिसाब से वे स्ट्रेच हो सकें. सिंगल जर्सी, लायक्रा और स्पेंडैक्स फैब्रिक से बने कपड़े चुनें. ये काफी स्ट्रेचेबल होते हैं.

डिजाइन पर भी दें ध्यान

इस दौरान बहुत अधिक टाइट फिटिंग वाले कपड़े पहनने से बचें क्योंकि इन में बढ़े हुए पेट का उभार अलग से दिखने लगता है जो दिखने में बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता. दूसरे, अधिक कसे कपड़ों में आप को घबराहट भी हो सकती है. खुली बाजुओं वाली ए लाइन और अंपायर कट ड्रैसेज, ढीलेढाले टौप्स और फुललैंथ अनारकली ड्रैसेज आप पर खूब फबेंगी.

लेयरिंग से दिखें स्टाइलिश

इस दौरान आप लेयरिंग से खुद को स्टाइलिश दिखाएं. मसलन वन पीस ड्रैस के साथ एक लंबा श्रग, सूट के साथ जैकेट और किसी भी टौप के साथ फ्लाई सा श्रग आप की पर्सनैलिटी में चार चांद लगा देगा.

सपोर्टिव हों इनरवियर

आजकल बाजार में भांतिभांति के प्रैगनैंसी इनरवियर उपलब्ध हैं. आप अपनी पसंद और साइज के अनुसार इन का चयन कर सकती हैं. ये सामान्य इनरवियर की अपेक्षा काफी चौड़े, स्ट्रेचेबल तो होते ही हैं साथ ही ऐक्स्ट्रा सपोर्ट के लिए इन के स्ट्रेप भी काफी चौड़े होते हैं. इस से स्किन पर स्ट्रेप के निशान नहीं पड़ते, शरीर को सपोर्ट मिलता है और कमर आदि में दर्द नहीं होता.

ट्राई करें ये ड्रैसेज

सलवार कमीज और साड़ी की अपेक्षा ढीली फिटिंग वाले लोअर टीशर्ट या फुललैंथ गाउन पहनें. इस से शरीर को काफी आराम मिलेगा. यदि सलवार कमीज ही पहनना चाहती हैं तो रैडीमेड की अपेक्षा बाजार से फैब्रिक खरीद कर ढीलेढाले कुरते और इलास्टिक वाली सलवार बनवाएं ताकि आप की कमर और पेट को पर्याप्त आराम मिल सकें.

ब्रैस्ट फीडिंग का रखें ध्यान

डिलिवरी हो जाने के बाद आप को बच्चे को फीड कराना होता है, इसलिए आउटफिट खरीदते समय इस बात का भी ध्यान रखें. आप फ्रंट ओपन या कमर तक के ओपन आउटफिट चुन सकती हैं.

रखें इन बातों का ध्यान

  • मैटरनिटी वियर किसी अच्छी ब्रैंड के ही खरीदें ताकि इन की क्वालिटी अच्छी रहे और धुलने के बाद श्रिंक न हों और रंग भी न छोड़ें.
  • चूंकि इस दौरान शरीर का आकार धीरेधीरे बढ़ता है, इसलिए भले ही आप प्रैगनैंसी के शुरू में ही अपने लिए आउटफिट खरीदें पर साइज बड़ा ही खरीदें ताकि पूरी प्रैगनैंसी में आप इन का प्रयोग कर सकें.
  • एकदम बारीक और प्लेन फैब्रिक की अपेक्षा प्रिंटेड और होजरी जैसे मोटे फैब्रिक को चुनें क्योंकि पतले फैब्रिक की अपेक्षा मोटे फैब्रिक पेट के उभार को अच्छे से कवर कर लेते हैं.
  • फ्रंट पैनल वाले डिजाइन और स्ट्रेचेबल फैब्रिक के आउटफिट इस समय के लिए एकदम परफैक्ट रहते हैं क्योंकि ये पेट के उभार को कवर कर लेते हैं.
  • ये आउटफिट्स काफी महंगे होते हैं, इसलिए इन्हें हमेशा अपने बजट को ध्यान में रख कर ही खरीदें. साथ ही शौप पर ही ट्राई भी करें ताकि बाद में रिटर्न या ऐक्सचैंज का चक्कर न रहे.

Hindi Social Story: सहारा- कौन बना अर्चना के बुढ़ापे का सहारा

Hindi Social Story: ‘‘अर्चना,’’ उस ने पीछे से पुकारा.

‘‘अरे, रजनीश…तुम?’’ उस ने मुड़ कर देखा और मुसकरा कर बोली.

‘‘हां, मैं ही हूं, कैसा अजब इत्तिफाक है कि तुम दिल्ली की और मैं मुंबई का रहने वाला और हम मिल रहे हैं बंगलौर की सड़क पर. वैसे, तुम यहां कैसे?’’

‘‘मैं आजकल यहीं रहती हूं. यहां घडि़यों की एक फैक्टरी में जनसंपर्क अधिकारी हूं. और तुम?’’

‘‘मैं यहां अपने व्यापार के सिलसिले में आया हुआ हूं. मेरी पत्नी भी साथ है. हम पास ही एक होटल में ठहरे हैं.’’

2-4 बातें कर के अर्चना बोली, ‘‘अच्छा…मैं चलती हूं.’’

‘‘अरे रुको,’’ वह हड़बड़ाया, ‘‘इतने  सालों बाद हम मिले हैं, मुझे तुम से ढेरों बातें करनी हैं. क्या हम दोबारा नहीं मिल सकते?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ कहते हुए अर्चना ने विजिटिंग कार्ड पर्स में से निकाला और उसे देती हुई बोली, ‘‘यह रहा मेरा पता व फोन नंबर. हो सके तो कल शाम की चाय मेरे साथ पीना और अपनी पत्नी को भी लाना.’’

अर्चना एक आटो-रिकशा में बैठ कर चली गई. रजनीश एक दुकान में घुसा जहां उस की पत्नी मोहिनी शापिंग कर तैयार बैठी थी.

‘‘मेरीखरीदारी हो गई. जरा देखो तो ये साडि़यां ज्यादा चटकीली तो नहीं हैं. पता नहीं ये रंग

मुझ पर खिलेंगे

या नहीं,’’ मोहिनी बोली.

रजनीश ने एक उचटती नजर मोहिनी पर डाली. उस का मन हुआ कि कह दे, अब उस के थुलथुल शरीर पर कोई कपड़ा फबने वाला नहीं है, पर वह चुप रह गया.

मोहिनी की जान गहने व कपड़ों में बसती है. वह सैकड़ों रुपए सौंदर्य प्रसाधनों पर खर्चती है. घंटों बनती-संवरती है. केश काले करती है, मसाज कराती है. नाना तरह के उपायों व साधनों से समय को बांधे रखना चाहती है. इस के विपरीत रजनीश आगे बढ़ कर बुढ़ापे को गले लगाना चाहता है. बाल खिचड़ी, तोंद बढ़ी हुई, एक बेहद नीरस, उबाऊ जिंदगी जी रहा है वह. मन में कोई उत्साह नहीं. किसी चीज की चाह नहीं. बस, अनवरत पैसा कमाने में लगा रहता है.

कभीकभी वह सोचता है कि वह क्यों इतनी जीतोड़ मेहनत करता है. उस के बाद उस के ऐश्वर्य को भोगने वाला कौन है. न कोई आसऔलाद न कोई नामलेवा… और तो और इसी गम में घुलघुल कर उस की मां चल बसीं.

संतान की बेहद इच्छा ने उसे अर्चना को तलाक दे कर मोहिनी से ब्याह करने को प्रेरित किया था. पर उस की इच्छा कहां पूरी हो पाई थी.

होटल पहुंच कर रजनीश बालकनी में जा बैठा. सामने मेज पर डिं्रक का सामान सजा हुआ था. रजनीश ने एक पैग बनाया और घूंटघूंट कर के पीने लगा.

उस का मन बरबस अतीत में जा पहुंचा.

कालिज की पढ़ाई, मस्तमौला जीवन. अर्चना से एक दिन भेंट हुई. पहले हलकी नोकझोंक से शुरुआत हुई, फिर छेड़छाड़, दोस्ती और धीरेधीरे वे प्रेम की डोर में बंध गए थे.

एक रोज अर्चना उस के पास घबराई हुई आई और बोली, ‘रजनीश, ऐसे कब तक चलेगा?’

‘क्या मतलब?’

‘हम यों चोरी- छिपे कब तक मिलते रहेंगे?’

‘क्यों भई, इस में क्या अड़चन है? तुम लड़कियों के होस्टल में रहती हो, मैं अपने परिवार के साथ. हमें कोई बंदिश नहीं है.’

‘ओहो…तुम समझते नहीं, हम शादी कब कर रहे हैं?’

‘अभी से शादी की क्या जल्दी पड़ी है, पहले हमारी पढ़ाई तो पूरी हो जाए…उस के बाद मैं अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटाऊंगा फिर जा कर शादी…’

‘इस में तो सालों लग जाएंगे,’ अर्चना बीच में ही बोल पड़ी.

‘तो लगने दो न…हम कौन से बूढ़े हुए जा रहे हैं.’

‘हमारे प्यार को शादी की मुहर लगनी जरूरी है.’

‘बोर मत करो यार,’ रजनीश ने उसे बांहों में समेटते हुए कहा, ‘तनमनधन से तो तुम्हारा हो ही चुका हूं, अब अग्नि के सामने सिर्फ चंद फेरे लेने में ही क्या रखा है.’

‘रजनीश,’ अर्चना उस की गिरफ्त से छूट कर घुटे हुए स्वर में बोली, ‘मैं…मैं प्रेग्नैंट हूं.’

‘क्या…’ रजनीश चौंका, ‘मगर हम ने तो पूरी सावधानी बरती थी…खैर, कोई बात नहीं. इस का इलाज है मेरे पास, अबार्शन.’

‘अबार्शन…’ अर्चना चौंक कर बोली, ‘नहीं, रजनीश, मुझे अबार्शन से बहुत डर लगता है.’

‘पागल न बनो. इस में डरने की क्या बात है? मेरा एक दोस्त मेडिकल कालिज में पढ़ता है. वह आएदिन ऐसे केस करता रहता है. कल उस के पास चले चलेंगे, शाम तक मामला निबट जाएगा. किसी को कानोंकान खबर भी न होगी.’

‘लेकिन जब हमें शादी करनी ही है तो यह सब करने की जरूरत?’

‘शादी करनी है सो तो ठीक है, लेकिन अभी से शादी के बंधन में बंधना सरासर बेवकूफी होगी. और जरा सोचो, अभी तक मेरे मांबाप को हमारे संबंधों के बारे में कुछ भी नहीं मालूम. अचानक उन के सामने फूला पेट ले कर जाओगी तो उन्हें बुरी तरह सदमा पहुंचेगा.

‘नहीं, अर्चना, मुझे उन्हें धीरेधीरे पटाना होगा. उन्हें राजी करना होगा. आखिर मैं उन की इकलौती संतान हूं. मैं उन की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता.’

‘प्यार का खेल खेलने से पहले ही यह सब सोचना था न?’ अर्चना कुढ़ कर बोली.

‘डार्ल्ंिग, नाराज न हो, मैं वादा करता हूं कि पढ़़ाई पूरी होते ही मैं धूमधड़ाके से तुम्हारे द्वार पर बरात ले कर आऊंगा और फिर अपने यहां बच्चों की लाइन लगा दूंगा…’

लेकिन शादी के 10-12 साल बाद भी बच्चे न हुए तो रजनीश व अर्चना ने डाक्टरों का दरवाजा खटखटाया था और हरेक डाक्टर का एक ही निदान था कि अर्चना के अबार्शन के समय नौसिखिए डाक्टर की असावधानी से उस के गर्भ में ऐसी खराबी हो गई है जिस से वह भविष्य में गर्भ धारण करने में असमर्थ है.

यह सुन कर अर्चना बहुत दुखी हुई थी. कई दिन रोतेकलपते बीते. जब जरा सामान्य हुई तो उस ने रजनीश को एक बच्चा गोद लेने को मना लिया.

अनाथाश्रम में नन्हे दीपू को देखते ही वह मुग्ध हो गई थी, ‘देखो तो रजनीश, कितना प्यारा बच्चा है. कैसा टुकुरटुकुर हमें ताक रहा है. मुझे लगता है यह हमारे लिए ही जन्मा है. बस, मैं ने तो तय कर लिया, मुझे यही बच्चा चाहिए.’

‘जरा धीरज धरो, अर्चना. इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं. एक बार अम्मां व पिताजी से भी पूछ लेना ठीक रहेगा.’

‘क्योें? उन से क्यों पूछें? यह हमारा व्यक्तिगत मामला है, इस बच्चे को हम ही तो पालेंगेपोसेंगे.’

‘फिर भी, यह बच्चा उन के ही परिवार का अंग होगा न, उन्हीं का वंशज कहलाएगा न?’

यह सुन कर अर्चना बुरा सा मुंह बना कर बोली, ‘वह सब मैं नहीं जानती. तुम्हारे मातापिता से तुम्हीं निबटो. यह अच्छी रही, हर बात में अपने मांबाप की आड़ लेते हो. क्या तुम अपनी मरजी से एक भी कदम उठा नहीं सकते?’

रजनीश के मांबाप ने अनाथाश्रम से बच्चा गोद लेने के प्रस्ताव का जम कर विरोध किया इधर अर्चना भी अड़

गई कि वह दीपू को गोद ले कर ही रहेगी.

‘‘रजनीश…’’ मोहिनी ने आवाज दी, ‘‘खाना खाने नीचे, डाइनिंग रूम में चलोगे या यहीं पर कुछ मंगवा लें?’’

यह सुन कर रजनीश की तंद्रा टूटी. एक ही झटके में वह वर्तमान में लौट आया. बोला, ‘‘यहीं पर मंगवा लो.’’

खाना खाते वक्त रजनीश ने पूछा, ‘‘कल शाम को तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘सोच रही थी यहां की जौहरी की दुकानें देखूं. मेरी एक सहेली मुझे ले जाने वाली है.’’

‘‘ठीक है, मैं भी शायद व्यस्त रहूंगा.’’

रजनीश ने अर्चना को फोन किया, ‘‘अर्चना, हमारा कल का प्रोग्राम तय है न?’’

‘‘हां, अवश्य.’’

फोन का चोंगा रख कर अर्चना उत्तेजित सी टहलने लगी कि रजनीश अब क्यों उस से मिलने आ रहा है. उसे अब मुझ से क्या लेनादेना है?

तलाकनामे पर हुए हस्ताक्षर ने उन के बीच कड़ी को तोड़ दिया था. अब वे एकदूसरे के लिए अजनबी थे.

‘अर्चना, तू किसे छल रही है?’ उस के मन ने सवाल किया.

रजनीश से तलाक ले कर वह एक पल भी चैन से न रह पाई. पुरानी यादें मन को झकझोर देतीं. भूलेबिसरे दृश्य मन को टीस पहुंचाते. बहुत ही कठिनाई से उस ने अपनी बिखरी जिंदगी को समेटा था, अपने मन की किरिचों को सहेजा था.

उस का मन अनायास ही अतीत की गलियों में विचरने लगा.

उसे वह दिन याद आया जब नन्हे दीपू को ले कर घर में घमासान शुरू हो गया था.

उस ने रजनीश से कहा था कि वह दफ्तर से जरा जल्दी आ जाए ताकि वे दोनों अनाथाश्रम जा कर बच्चों में मिठाई बांट सकें. आश्रम वालों ने बताया है कि आज दीपू का जन्मदिन है.

यह सुन कर रजनीश के माथे पर बल पड़ गए थे. वह बोला, ‘यह सब न ही करो तो अच्छा है. पराए बालक से हमें क्या लेना.’

‘अरे वाह…पराया क्यों? हम जल्दी ही दीपू को गोद लेने वाले जो हैं न?’

‘इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं.’

‘तुम जल्दीबाजी की कहते हो, मेरा वश चले तो उसे आज ही घर ले आऊं. पता नहीं इस बच्चे से मुझे इतना मोह क्यों हो गया है. जरूर हमारा पिछले जन्म का रिश्ता रहा होगा,’ कहती हुई अर्चना की आंखें भर आई थीं.

यह देख कर रजनीश द्रवित हो कर बोला था, ‘ठीक है, मैं शाम को जरा जल्दी लौटूंगा. फिर चले चलेंगे.’

रजनीश को दरवाजे तक विदा कर के अर्चना अंदर आई तो सास ने पूछा, ‘कहां जाने की बात हो रही थी, बहू?’

‘अनाथाश्रम.’

यह सुन कर तो सास की भृकुटियां तन गईं. वह बोली, ‘तुम्हें भी बैठेबैठे पता नहीं क्या खुराफात सूझती रहती है. कितनी बार समझाया कि पराई ज्योति से घर में उजाला नहीं होता, पर तुम हो कि मानती ही नहीं. अरे, गोद लिए बच्चे भी कभी अपने हुए हैं, खून के रिश्ते की बात ही और होती है,’ फिर वह भुनभुनाती हुई पति के पास जा कर बोली, ‘अजी सुनते हो?’

‘क्या है?’

‘आज बहूबेटा अनाथाश्रम जा रहे हैं.’

‘सो क्यों?’

‘अरे, उसी मुए बच्चे को गोद लेने की जुगत कर रहे हैं और क्या. मियांबीवी की मिलीभगत है. वैद्य, डाक्टरों को पैसा फूंक चुके, पीरफकीरों को माथा टेक चुके, जगहजगह मन्नत मान चुके, अब चले हैं अनाथाश्रम की खाक छानने.

‘न जाने किस की नाजायज संतान, जिस के कुलगोत्र का ठिकाना नहीं, जातिपांति का पता नहीं, ला कर हमारे सिर मढ़ने वाले हैं. मैं कहती हूं, यदि गोद लेना ही पड़ रहा है तो हमारे परिवार में बच्चों की कमी है क्या? हम से तो भई जानबूझ कर मक्खी निगली नहीं जाती. तुम जरा रजनीश से बात क्यों नहीं करते.’

‘ठीक है, मैं रजनीश से बात करूंगा.’

‘पता नहीं कब बात करोगे, जब पानी सिर से ऊपर हो जाएगा तब? जाने यह निगोड़ी बहू हम से किस जन्म का बदला ले रही है. पहले मेरे भोलेभाले बेटे पर डोरे डाले, अब बच्चा गोद लेने का तिकड़म कर रही है.’

रजनीश अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर निढाल पड़ गया. अर्चना उस के पास खिसक आई और उस के बालों में उंगलियां चलाती हुई बोली, ‘क्या बात है, बहुत थकेथके लग रहे हो.’

‘आज अम्मां व पिताजी के साथ जम कर बहस हुई. वे दीपू को गोद लेने के कतई पक्ष में नहीं हैं.’

‘तो फिर?’

‘तुम्हीं बताओ.’

‘मैं क्या बताऊं, एक जरा सी बात को इतना तूल दिया जा रहा है. क्या और निसंतान दंपती बच्चा गोद नहीं लेते? हम कौन सी अनहोनी बात करने जा रहे हैं.’

‘मैं उन से कह कर हार गया. वे टस से मस नहीं हुए. मैं तो चक्की के दो पाटों के बीच पिस रहा हूं. इधर तुम्हारी जिद उधर उन की…’

‘तो अब?’

‘उन्होंने एक और प्रस्ताव रखा है…’

‘वह क्या?’ अर्चना बीच में ही बोल पड़ी.

‘वे कहते हैं कि चूंकि तुम मां नहीं बन सकती हो. मैं तुम्हें तलाक दे कर दूसरी शादी कर लूं.’

‘क्या…’ अर्चना बुरी तरह चौंकी, ‘तुम मेरा त्याग करोगे?’

‘ओहो, पूरी बात तो सुन लो. दूसरी शादी महज एक बच्चे की खातिर की जाएगी. जैसे ही बच्चा हुआ, उसे तलाक दे कर मैं दोबारा तुम से ब्याह कर लूंगा.’

‘वाह…वाह,’ अर्चना ने तल्खी से कहा, ‘क्या कहने हैं तुम लोगों की सूझबूझ के. मेरे साथ तो नाइंसाफी कर ही रहे हो, उस दूसरी, निरपराध स्त्री को भी छलोगे. बिना प्यार के उस से शारीरिक संबंध स्थापित करोगे और अपना मतलब साध कर उसे चलता करोगे?’

‘और कोई चारा भी तो नहीं है.’

‘है क्यों नहीं. कह दो अपने मातापिता से कि यह सब संभव नहीं. तुम पुरुष हम स्त्रियों को अपने हाथ की कठपुतली नहीं बना सकते. क्या तुम से यह कहते नहीं बना कि मैं ने शादी से पहले गर्भ धारण किया था? यदि तुम ने अबार्शन न करा दिया होता तो…’ कहतेकहते अर्चना का गला भर आया था.

‘अर्चना डियर, तुम बेकार में भावुक हो रही हो. बीती बातों पर खाक डालो. मुझे तुम्हारी पीड़ा का एहसास है. दूसरी तरफ मेरे बूढ़े मांबाप के प्रति भी मेरा कुछ कर्तव्य है. वे मुझ से एक ही चीज मांग रहे थे, इस घर को एक वारिस, इस वंश को एक कुलदीपक.’

‘तो कर लो दूसरी शादी, ले आओ दूसरी पत्नी, पर इतना बताए देती हूं कि मैं इस घर में एक भी पल नहीं रुकूंगी,’ अर्चना भभक कर बोली.

‘अर्चना…’

‘मैं इतनी महान नहीं हूं कि तुम्हारी बांहों में दूसरी स्त्री को देख कर चुप रह जाऊं. मैं सौतिया डाह से जल मरूंगी. नहीं रजनीश, मैं तुम्हें किसी के साथ बांटने के लिए हरगिज तैयार नहीं.’

‘अर्चना, इतना तैश में न आओ. जरा ठंडे दिमाग से सोचो. यह दूसरा ब्याह महज एक समझौता होगा. यह सब बिना विवाह किए भी हो सकता है पर…’

‘नहीं, मैं तुम्हारी एक नहीं सुनूंगी. हर बात में तुम्हारी नहीं चलेगी. आज तक मैं तुम्हारे इशारों पर नाचती रही. तुम ने अबार्शन को कहा, सो मैं ने करा दिया. तुम ने यह बात अपने मातापिता से गुप्त रखी, मैं राजी हुई. तुम क्या जानो कि तुम्हारी वजह से मुझे कितने ताने सहने पड़ रहे हैं. बांझ…आदि विशेषणों से मुझे नवाजा जाता है. तुम्हारी मां ने तो एक दिन यह भी कह दिया कि सवेरेसवेरे बांझ का मुंह देखो तो पूरा दिन बुरा गुजरता है. नहीं रजनीश, मैं ने बहुत सहा, अब नहीं सहूंगी.’

‘अर्चना, मुझे समझने की कोशिश करो.’

‘समझ लिया, जितना समझना था. तुम लोगों की कूटनीति में मुझे बलि का बकरा बनाया जा रहा है. जैसे गायगोरू के सूखने पर उस की उपयोगिता नहीं रहती उसी तरह मुझे बांझ करार दे कर दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका जा रहा है. लेकिन मुझे भी तुम से एक सवाल करना है…’

‘क्या?’ रजनीश बीच में ही बोल पड़ा.

‘समझ लो तुम मेें कोई कमी होती और मैं भी यही कदम उठाती तो?’

‘अर्चना, यह कैसा बेहूदा सवाल है?’

‘देखा…कैसे तिलमिला गए. मेरी बात कैसी कड़वी लगी.’

रजनीश मुंह फेर कर सोने का उपक्रम करने लगा. उस रात दोनों के दिल में जो दरार पड़ी वह दिनोंदिन चौड़ी होती गई.

रजनीश ने दरवाजे की घंटी बजाई तो एक सजीले युवक ने द्वार खोला.

‘‘अर्चनाजी हैं?’’ रजनीश ने पूछा.

‘‘जी हां, हैं, आप…आइए, बैठिए, मैं उन्हें बुलाता हूं.’’

अर्चना ने कमरे में प्रवेश किया. उस के हाथ में ट्रे थी.

‘‘आओ रजनीश. मैं तुम्हारे लिए काफी बना रही थी. तुम्हें काफी बहुत प्रिय है न,’’ कह कर वह उसे प्याला थमा कर बोली, ‘‘और सुनाओ, क्या हाल हैं तुम्हारे? अम्मां व पिताजी कैसे हैं?’’

‘‘उन्हें गुजरे तो एक अरसा हो गया.’’

‘‘अरे,’’ अर्चना ने खेदपूर्वक कहा, ‘‘मुझे पता ही न चला.’’

‘‘हां, तलाक के बाद तुम ने बिलकुल नाता तोड़ लिया. खैर, तुम तो जानती ही हो कि मैं ने मोहिनी से शादी कर ली. और यह नियति की विडंबना देखो, हम आज भी निसंतान हैं.’’

‘‘ओह,’’ अर्चना के मुंह से निकला.

‘‘हां, अम्मां को तो इस बात से इतना सदमा पहुंचा कि उन्होंने खाट पकड़ ली. उन के निधन के बाद पिताजी भी चल बसे. लगता है हमें तुम्हारी हाय लग गई.’’

‘‘छि:, ऐसा न कहो रजनीश, जो होना होता है वह हो कर ही रहता है. और शादी आजकल जन्म भर का बंधन कहां होती है? जब तक निभती है निभाते हैं, बाद में अलग हो जाते हैं.’’

‘‘लेकिन हम दोनों एकदूसरे के कितने करीब थे. एक मन दो प्राण थे. कितना साहचर्य, सामंजस्य था हम में. कभी सपने में भी न सोचा था कि हम एकदूसरे के लिए अजनबी हो जाएंगे. और आज मैं मोहिनी से बंध कर एक नीरस, बेमानी ज्ंिदगी बिता रहा हूं. हम दोनों में कोई तालमेल नहीं. अगर जीवनसाथी मनमुताबिक न हो तो जिंदगी जहर हो जाती है.

‘‘खैर छोड़ो, मैं भी कहां का रोना ले बैठा. तुम अपनी सुनाओ. यह बताओ, वह युवक कौन था जिस ने दरवाजा खोला?’’

यह सुन कर अर्चना मुसकरा कर बोली, ‘‘वह मेरा बेटा है.’’

‘‘ओह, तो तुम ने भी दूसरी शादी कर ली.’’

‘‘नहीं, मैं ने शादी नहीं की, मैं ने तो केवल उसे गोद लिया है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘हां, रजनीश, यह वही बच्चा दीपू है, अनाथाश्रम वाला. तुम से तलाक ले कर मैं दिल्ली गई जहां मेरा परिवार रहता था. एक नौकरी कर ली ताकि उन पर बोझ न बनूं, पर तुम तो जानते हो कि एक अकेली औरत को यह समाज किस निगाह से देखता है.

‘‘पुरुषों की भूखी नजरें मुझ पर गड़ी रहतीं. स्त्रियों की शंकित नजरें मेरा पीछा करतीं. कई मर्दों ने करीब आने की कोशिश की. कई ने मुझे अपनी हवस का शिकार बनाना चाहा, पर मैं उन सब से बचती रही. 1-2 ने विवाह का प्रलोभन भी दिया, पर जहां मन न मिले वहां केवल सहारे की खातिर पुरुष की अंकशायिनी बनना मुझे मंजूर न था.

‘‘इस शहर में आ कर अपना अकेलापन मुझे सालने लगा. नियति की बात देखो, अनाथाश्रम में दीपू मानो मेरी ही प्रतीक्षा कर रहा था. इस ने मेरे हृदय के रिक्त स्थान को भर दिया. इस के लालनपालन में लग कर जीवन को एक गति मिली, एक ध्येय मिला. 15 साल हम ने एकदूसरे के सहारे काट दिए. इस आशा में हूं कि यह मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा, यदि नहीं भी बना तो कोई गम नहीं, कोई गिला नहीं,’’ कहती हुई अर्चना हलके से मुसकरा दी.

लेखक- रमणी मोटाना

Hindi Social Story

Hindi Fictional Story: टेढ़ी दुम

Hindi Fictional Story: कालेज के दिनों में मैं ज्यादातर 2 सहेलियों के बीच बैठा मिलता था. रूपसी रिया मेरे एक तरफ और सिंपल संगीता दूसरी तरफ होती. संगीता मुझे प्यार भरी नजरों से देखती रहती और मैं रिया को. रही रूपसी रिया की बात तो वह हर वक्त यह नोट करती रहती कि कालेज का कौन सा लड़का उसे आंखें फाड़ कर ललचाई नजरों से देख रहा है. कालेज की सब से सुंदर लड़की को पटाना आसान काम नहीं था, पर उस से भी ज्यादा मुश्किल था उसे अपने प्रेमजाल में फंसाए रखना. बिलकुल तेज रफ्तार से कार चलाने जैसा मामला था. सावधानी हटी दुर्घटना घटी. मतलब यह कि आप ने जरा सी लापरवाही बरती नहीं कि कोई दूसरा आप की रूपसी को ले उड़ेगा.

मैं ने रिया के प्रेमी का दर्जा पाने के लिए बहुत पापड़ बेले थे. उसे खिलानेपिलाने, घुमाने और मौकेबेमौके उपहार देने का खर्चा उतना ही हो जाता था जितना एक आम आदमी महीनेभर में अपने परिवार पर खर्च करता होगा. ‘‘रिया, देखो न सामने शोकेस में कितना सुंदर टौप लगा है. तुम पर यह बहुत फबेगा,’’ रिया को ललचाने के लिए मैं ऐसी आ बैल मुझे मार टाइप बातें करता तो मेरी पौकेट मनी का पहले हफ्ते में ही सफाया हो जाता.

मगर यह अपना स्पैशल स्टाइल था रिया को इंप्रैस करने का. यह बात जुदा है कि बाद में पापा से सचझूठ बोल कर रुपए निकलवाने पड़ते. मां की चमचागिरी करनी पड़ती. दोस्तों से उधार लेना आम बात होती. अगर संगीता ने मेरे पीछे पड़पड़ कर मुझे पढ़ने को मजबूर न किया होता तो मैं हर साल फेल होता. मैं पढ़ने में आनाकानी करता तो वह झगड़ा करने पर उतर आती. मेरे पापा से मेरी शिकायत करने से भी नहीं चूकती थी.

‘‘तू अपने काम से काम क्यों नहीं रखती है?’’ मैं जब कभी नाराज हो उस पर चिल्ला उठता तो वह हंसने लगती थी. ‘‘अमित, तुम्हें फेल होने से

बचा कर मैं अपना ही फायदा कर रही हूं,’’ उस की आंखों में शरारत नाच उठती थी. ‘‘वह कैसे?’’

‘‘अरे, कौन लड़की चाहेगी कि उस का पति ग्रैजुएट भी न हो,’’ हम दोनों के आसपास कोई न होता तो वह ऐसा ही ऊलजलूल जवाब देती. ‘‘मुझे पाने के सपने मत देखा

कर,’’ मैं उसे डपट देता तो भी वह मुसकराने लगती. ‘‘मेरा यह सपना सच हो कर रहेगा,’’ अपने मन की इच्छा व्यक्त करते हुए उस की आंखों में मेरे लिए जो प्यार के भाव नजर आते, उन्हें देख कर मैं गुस्सा करना भूल जाता और उस के सामने से खिसक लेने में ही अपनी भलाई समझता.

कालेज की पढ़ाई पूरी हुई तो मैं ने रिया से शादी करने की इच्छा जाहिर कर दी.

उस ने मेरी हमसफर बनने के लिए तब अपनी शर्त मुझे बता दी, ‘‘अमित, मैं एक बिजनैसमैन की पत्नी बन कर खुश नहीं रह सकूंगी और तुम अब अपने पापा का बिजनैस में हाथ बंटाने जा रहे हो. मेरा हाथ चाहिए तो आईएएस या पुलिस औफिसर बनो. एमबीए कर के अच्छी जौब पा लोगे तो भी चलेगा.’’ उस की इन बातों को सुन कर मेरा मन एक बार को बैठ ही गया था.

मगर प्यार में इंसान को बदलने की ताकत होती है. मैं ने आईएएस की परीक्षा देने का हौसला अपने अंदर पैदा किया. कई सारी किताबें खरीद लाया. अच्छी कोचिंग कहां से मिलेगी, इस बारे में पूछताछ करनी शुरू कर दी. संगीता को जब यह जानकारी मिली तो हंसतेहंसते उस के पेट में बल पड़ गए. बोली, ‘‘अमित, क्यों बेकार के झंझट में पड़ रहा है… देख, जो इंसान जिंदगी भर दिल्ली में रहा हो,

क्या उसे ऐवरैस्ट की चोटी पर चढ़ने के सपने देखने चाहिए?’’ उस की ऐसी बातें सुन कर मैं उसे भलाबुरा कहने लगता तो वह खूब जोरजोर से हंसती.

वैसे संगीता ने मेरी काबिलीयत को सही पहचाना था. सिर्फ 2 हफ्ते किताबों में सिर खपाने के बाद जब मुझे चक्कर से आने लगे तो आईएएस बनने का भूत मेरे सिर से उतर गया. ‘‘ज्यादा पढ़नालिखना मेरे बस का नहीं है, रिया. बस, मेरी इस कमजोरी को नजरअंदाज कर के मेरी हो जाओ न,’’ रिया से ऐसी प्रार्थना करने से पहले मैं ने उसे महंगे गौगल्स गिफ्ट किए थे.

‘‘ठीक है, यू आर वैरी स्वीट, अमित,’’ नया चश्मा लगा कर उस ने इतराते हुए मेरी बनने का वादा मुझ से कर लिया. इस वादे के प्रति अपनी ईमानदारी उस ने महीने भर बाद अमेरिका में खूब डौलर कमा रहे एक सौफ्टवेयर इंजीरियर से चट मंगनी और पट शादी कर के दिखाई.

उस ने मेरा दिल बुरी तरह तोड़ा था. मैं ने दिल टूटे आशिक की छवि को ध्यान में रख फौरन दाढ़ी बढ़ा ली और लक्ष्यहीन सा इधरउधर घूम कर समय बरबाद करने लगा.

संगीता ने जब मुझे एक दिन यों हालबेहाल देखा तो वह जम कर हंसी और फिर मेरा एक नया कुरता फाड़ कर

मेरे हाथ में पकड़ा दिया और फिर बोली, ‘‘इसे पहन कर घूमोगे तो दूर से भी कोई पहचान लेगा कि यह कोई ऐसा सच्चा आशिक जा रहा है जिस का दिल किसी बेवफा ने तोड़ा है. तुम्हारे जैसे और 2 मजनू तुम्हें सड़कों पर घूमते नजर आएंगे. उन को भी रिया ने प्यार में धोखा दिया है. एक क्लब बना कर तुम तीनों सड़कों की धूल फांकते इकट्ठे घूमना शुरू क्यों नहीं कर देते हो?’’ संगीता के इस व्यंग्य पर मैं अंदर तक तिलमिला उठा. वह उस दिन सचमुच ही रिया के 2 अन्य आशिकों से मुझ को मिलवाने भी ले गई. उन में से एक रिया का पड़ोसी था और दूसरा उस के मौसेरे भाई का दोस्त. उस रूपसी ने जम कर हम तीनों को उल्लू बनाया, इस बात को समझते ही मैं ने दिल टूटने का मातम मनाना फौरन बंद किया और नया शिकार फांसने की तैयारी करने लगा.

अगले दिन बनसंवर कर जब मैं घर से बाहर निकलने वाला था तभी संगीता मुझ से मिलने मेरे घर आ पहुंची. बोली, ‘‘मुझ से अच्छी लड़की तुम्हें कभी नहीं और कहीं नहीं मिलेगी, हीरो. वैसे अभी तक सुंदर लड़कियों के हाथों बेवकूफ बनने से दिल न भरा हो तो फिर किसी लड़की पर लाइन मारना शुरू कर दो. मेरी तरफ से तुम्हें ऐसी मूर्खता करने की इजाजत है और सदा रहेगी,’’ संगीता ने कोई सवाल पूछे बिना मेरी नीयत को फौरन पढ़ लिया तो यह बात मुझे सचमुच हैरान कर गई. ‘‘मैं कल ही तेरे मम्मीपापा को समझाता हूं कि वे कोई सीधा और अच्छा सा लड़का देख कर तेरे हाथ पीले कर दें,’’ और फिर उस से किसी तरह की बहस में उलझे बिना मैं बाहर घूमने निकल गया.

संगीता के मातापिता ने उस के लिए अच्छा लड़का फौरन ढूंढ़ लिया. उस लड़के को मेरे मम्मीपापा ने भी पास कर दिया तो महीने भर बाद ही मेरी उस के साथ सगाई हो गई और उस के अगले हफ्ते वह दुलहन बन कर हमारे घर

आ गई. मेरे दोस्तों ने मुझे इस रिश्ते के लिए मना करने को बहुत उकसाया था, पर मैं चाहते हुए भी इनकार नहीं कर सका.

‘‘मेरी शादी तुम्हारे साथ ही होगी,’’ संगीता प्यार भरे अपनेपन व आत्मविश्वास के साथ यह बात कहती थी और अंत में उस का कहा ही सच भी हुआ. इस में कोई शक नहीं कि वह मुझे बहुत प्यार करती है और मेरी सच्ची शुभचिंतक है. बहुत ध्यान रखती है वह मेरा. वह ज्यादा सुंदर तो नहीं है पर उस के पास सोने का दिल है. उस का सब से बड़ा गुण है मेरी किसी भी गलती पर नाराज होने के बजाय सदा हंसतेमुसकराते रहना. उस की हंसी में कुछ ऐसा है, जो मुझे उसी पल तनावमुक्त कर शांत और प्रसन्न कर जाता है. वह मुझे दिल से अपना पसंदीदा हीरो मानती है.

मगर मेरी दुम शादी के बाद भी टेढ़ी की टेढ़ी ही रही है. सुंदर लड़कियों पर लाइन मारने का कोई मौका मैं अब भी नहीं चूकता हूं पर संगीता की नजरों से अपनी इन हरकतों को बचा पाना मेरे लिए संभव नहीं. ‘‘फलांफलां युवती के साथ चक्कर चलाने की कोशिश कर रहे हो न?’’ वह मेरी हरकतों को पढ़ लेने के बाद जब भी मुसकराते हुए यह सवाल सीधासीधा मुझ से पूछती है तो मैं झूठ नहीं बोल पाता हूं.

‘‘ऐसे ही जरा हंसबोल कर टाइम पास कर रहा था,’’ चूंकि वह मेरी फ्लर्ट करने की आदत के कारण मुझ से कभी लड़तीझगड़ती नहीं है, इसलिए मैं उसे सच बात बता देता हूं. ‘‘अपनी हौबी को टाइम पास करना मत कहोजी. अब लगे हाथ यह भी बता दो कि किस चीज को गिफ्ट करने का लालच दे कर उसे अपने जाल में फंसाने की कोशिश कर रहे थे, रोमियो के नए अवतारजी?’’

वह मेरी लड़की पटाने की तरकीबों को शुरू से ही पहचानती है. ‘‘उस का मनपसंद सैंट,’’ मैं झेंपी सी हंसी हंसते हुए सचाई बता देता.

‘‘उस पर क्यों रुपए बरबाद करते हो, स्वीटहार्ट. मैं मौजूद हूं न लड़कियों को गिफ्ट करने की तुम्हारे अंदर उठने वाली खुजली को मिटाने के लिए. कल चलते हैं मेरा मनपसंद

सैंट खरीदने.’’ ‘‘तुम्हारे पास पहले से ही सैंट की दर्जनों बोतलें हैं,’’ मैं हलका सा विरोध करता तो वह खिलखिला कर हंस पड़ती.

‘‘सैंट ही क्यों, तुम्हारी लड़कियों को दाना डालने की आदत के चलते मेरे पास कई सुंदर ड्रैसेज भी हैं, ज्वैलरी भी, 3 रिस्ट वाच, 2 जोड़े गौगल्स और न जाने कितनी महंगी चीजें इकट्ठी हो गई हैं, मेरे धन्ना सेठ. मैं तो अकसर कामना करती हूं कि लड़कियों से फ्लर्ट करने के मामले में वह तुम्हारी टेढ़ी दुम कभी सीधी

न हो.’’ ‘‘यार, अजीब औरत हो तुम जो अपने पति को दूसरी औरतों के साथ फ्लर्ट करता देख कर खुश होती है,’’ मैं चिढ़ उठता तो उस का ठहाका आसपास की दीवारों को हिला जाता.

शादी के बाद कभीकभी मैं संगीता से मन ही मन बहुत नाराज हो उठता था. मुझे लगता था कि स्वतंत्रता से जीने की राह में वह मेरे लिए बहुत बड़ी रुकावट बनी हुई है. फिर एक पार्टी में कुछ ऐसा घटा जिस ने मेरा यह नजरिया ही बदल दिया.

उस रात मैं पहले बैंक्वेट हौल में प्रवेश कर गया, क्योंकि संगीता अपनी किसी सहेली से बात करने को दरवाजे के पास रुक गई थी.

जब संगीता ने अंदर कदम रखा तब मेरे कानों में उस की प्रशंसा करता पुरुष स्वर पहुंचा, ‘‘क्या स्मार्ट लेडी है, यारो… यह कोई टीवी कलाकार या मौडल है क्या?’’

इन जनाब ने ये बातें अपने दोस्तों से कही थीं. उस रात मैं ने भी संगीता को जब ध्यान से देखा तो मुझे सचमुच उस का व्यक्तित्व बहुत स्मार्ट और प्रभावशाली लगा. उस के नैननक्श तो ज्यादा सुंदर कभी नहीं रहे थे, पर अपने लंबे कद, आकर्षक फिगर और अपने ऊपर खूब फबने वाली साड़ी पहनने के कारण वह बहुत जंच

रही थी. मैं ने आगे बढ़ कर बड़े गर्व के साथ संगीता का हाथ पकड़ा तो उन पुरुषों की आंखों में मैं ने ईर्ष्या के भाव पैदा होते साफ देखे.

‘‘तुम बहुत सुंदर लग रही हो,’’ मैं ने दिल से संगीता की ऐसी तारीफ शायद पहली बार

करी थी. ‘‘ये सब तुम से मिले गिफ्ट्स का कमाल है. वैसे आज अपनी बीवी पर कैसे लाइन मार रहे हो, अमित?’’ उस का चेहरा फूल सा खिल

उठा था. ‘‘दुनिया तुम पर लाइन मारने को तैयार है, तो मैं ने सोचा कि मैं ही क्यों पीछे रहूं.’’

‘‘बेकार की बात मत करो,’’ उस का एकदम से शरमाना मेरे मन को बहुत भाया. उस रात मुझे अपनी पत्नी के साथ फ्लर्ट करने का नया और अनोखा अनुभव मिला. मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि किसी अन्य युवती से फ्लर्ट करने के मुकाबले यह ज्यादा सुखद और आनंददायक अनुभव रहा.

आजकल मेरी जिंदगी बहुत बढि़या कट रही है. पत्नी को प्रेमिका बना लेने से मेरे दोनों हाथों में लड्डू हैं. भरपूर मौजमस्ती के साथसाथ मन की शांति भी मिल रही है. मेरे साथ झगड़ने से परहेज कर के और मुझे प्यार की नाजुक डोर से बांध कर संगीता ने मेरी टेढ़ी दुम को सीधा करने में आखिर कामयाबी पा ही ली है.

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