Long Story in Hindi: गोल्डन कलर की झनी सी स्लीवलैस वन पीस में मालविका का मखमली गोरा लचीला बदन सुदेश की आंखों को फिसलने के लिए खुला आमंत्रण दे रहा था. सुदेश इस की उपेक्षा क्यों ही करता, वह काम के बीच मालविका का थाह भी लेता चल रहा था. मालविका उस की फिल्म की नई हीरोइन थी और वह इस फिल्म का डाइरैक्टर प्रौड्यूसर अपना हक मानता था. ‘‘सर शौट रैडी है,’’ शूटिंग स्टूडियो में सभी कर्मचारियों, अभिनेता और चरित्र भूमिका निभाने वालों की आपाधापी के बीच असिस्टैंट परवेज ने सुदेश के पास आकर कहा.
सुदेश ने मालविका को ताड़ते हुए परवेज से पूछा, ‘‘इस नई लड़की की उम्र कितनी है?’’ ‘‘शायद 25 की होगी सर.’’ ‘‘अब तक कहां थी? मतलब क्या करती थी?’’ ‘‘सर बाहर लखनऊ से है, ग्रैजुएट होने के बाद मुंबई आ गई थी, 3 साल से सीरियल और एड फिल्में कर रही थी.
‘‘इस के मातापिता?’’ ‘‘सर, लखनऊ में इस के पिता का टैक्स्टाइल का कारोबार है, भाई वही देखता है.’’ ‘‘ठीक है आज शाम मेरे होटल ले आना.’’ मुंबई के अंधेरी में मालविका एक कमरे का फ्लैट किराए पर ले कर रहती थी. 22 हजार किराया देती है, ग्लैमर की दुनिया में खुद को मैंटेन रखने के जो खर्चे हैं, मालविका उन्हीं में पस्त है, नई कार और अपना घर कैसे ले, जबकि खुद को विलासिता के शिखर पर ले जाने को मालविका प्रतिबद्ध है और यहां थोड़ेबहुत समझते के बूते अगर वह किसी पारस मणि को हाथ कर सके, जिस से वह जो छुए सोना हो जाय तो उस की तो दिन ही बदल जाएं. बस वह पारस मणि तो मिले. यहां तो सब बहती गंगा में हाथ धोकर चल देते हैं.
परवेज ने फोन कर के मालविका को रैडी रहने को कहा. यहां अलिखित भी बहुत कुछ होता है. यह जानी हुई बात है कि कोई अगर किसी की फिल्म में नईनई हीरोइन बनी हो और आगे उसे और भी काम पाना है तो जाहिर है उस की हर बात वह मानेगा. कार में सुदेश के बारे में मालविका को कई बातें पता चली. सुदेश के कई बिजनैस और बंगले हैं. कई होटल भी हैं, लेकिन अभी जहां मालविका जा रही है वह सुदेश का खास ठिकाना है. इस कई मंजिला होटल के ऊपरी हिस्से को सुदेश ने अपने लिए डिजाइन कराया है और जब भी किसी से खास तरीके से मिलना होता है वह यहीं बुलाता है.
‘‘सुदेशजी की वाइफ को पता होता है कि वे इस तरह यहां…’’ मालविका के इशारे को समझते हुए परवेज ने कहा, ‘‘मालविकाजी मैं बस काम से काम रखता हूं. इतना तो नहीं पता मुझे, लेकिन हां 25 साल सुदेशजी की शादी के हो गए, उन की पत्नी खुद बुटीक चलाती हैं, 2 बड़े बेटे विदेश में हैं तो पति को नहीं जानती होंगी, ऐसी बात होगी क्या? बाकी इतना बता दूं सुदेशजी को खुश रखने के लिए उन की किसी बात को काटिएगा नहीं और पूछपरख ज्यादा मत करिएगा. बाकी वे खुश हो गए तो आप के दिन फिर जाएंगे,’’ और फिर परवेज सुदेश की सूट के बाहर मालविका को छोड़ चला गया. सकुचाई सी मालविका ने सुदेश पर एक नजर डाली. उस के बारे में सुनसुन कर उसे जितना डर लगा था, अब उसे देखने के बाद वह डर तो खत्म हो ही गया, बल्कि वो मालविका को थोड़ा अच्छा भी लगा.
शूटिंग के दौरान उस ने ध्यान नहीं दिया था, पर अब दे रही थी. दरअसल, यह भी एक स्त्री मनोविज्ञान है कि जब पुरुष देखने में ठीक, कपड़ों में अच्छा, शारीरिक रूप से गठीला और स्टाइलिश लगे तो अपरिचित होने के बावजूद उस के पास स्त्रियां खुद को सहज महसूस करती हैं और उन के साथ बातचीत आगे बढ़ाने में उन्हें सुविधा होती है. इस पर उस के अंदरूनी स्वभाव को परखने की जहमत उठाने से पहले ही अगर वह पुरुष खुद को व्यवहार में और भी मजेदार और कोमल साबित कर दे तो कहना ही क्या.
सामान्य स्त्रियां अकसर पुरुषों पर भरोसा कर के सुरक्षित और खुशी महसूस करती हैं. मालविका ने देखा 5 फुट 10 इंच हाइट में सुदेश ऊपर कहे मुताबिक अच्छा ही दिख रहा था. जब इतनी अकूत संपति का मालिक और उम्र के 54 वर्ष में भी स्टाइल और जलवे थे तो और क्या चाहिए. मालविका अपने लैवेंडर कलर की शिफौन गाउन में जादू की परी दिख रही थी और सुदेश पर वह छा गई थी. सुदेश के अहम से तने चेहरे की मांसपेशियां धीरेधीरे मुसकान और नशे में बदल गईं.
बातचीत का दौर चलता रहा, पेय और खानेपीने की चीजें आईं, लेकिन मालविका को एक ही चिंता लगी थी कि यह तो शरीर के धरातल पर आएगा ही, लेकिन कब रात के 12 बज चुके थे और मालविका थक चुकी थी. यद्यपि निमंत्रण पा कर वह पूरी तैयारी के साथ ही आई थी ताकि एक गलती की वजह से उस के कैरियर और शरीर पर कोई आंच न आए. मगर कहां? सुदेश ने तो अब तक मालविका के हाथ पकड़ने और गालों को छूने के सिवा कुछ भी नहीं कहा. क्या यह पूरी रात रोकना चाहता है.
मालविका के दिल की बातें अब चेहरे पर शिकन बन झलकने लगी थीं. सुदेश मन पढ़ने में उस्ताद था. पूछा, ‘‘घर जाओगी मालविका? चलो छोड़ दूं तुम्हें.’’ मालविका को लगा कहीं सुदेश रोष में न आ गया हो, फिर तो फिल्म की हीरोइन का रोल उस के हाथ से गया. ‘‘नहींनहीं, आप जब तक चाहें मैं रुकूंगी,’’ मालविका ने परेशान होते हुए कहा. सुदेश ने उस के होंठों को अपने होंठों से जकड़ लिया और मालविका कुछ देर शांत बैठी रही. सुदेश ने उसे हाथ पकड़ कर उठाते हुए कहा, ‘‘चलो आज रात हो रही है, तुम्हें घर पहुंचा दूं, कल मिल रही हो न?’’ ‘‘जी.’’ ‘‘अरे, जी क्या लगा रखी है. हां सुदेश, कहो. एक दिन का रिश्ता थोड़े ही है जान. तुम मेरे दिल की मलिका बन गई हो. हम अब से साथ रहें तो तुम्हें कोई दिक्कत?’’ ‘‘नहीं,’’ मालविका को शायद पारस मणि मिल चुका था.
वह सुदेश के सीने से जा लगी. मालविका का पहला प्रोजैक्ट सुदेश के साथ पूरा हो चुका था और यह फिल्म इतनी हिट रही कि सुदेश ने मालविका को 2 कमरे वाला एक फ्लैट गिफ्ट कर दिया. इस फ्लैट के साथ ही मालविका की सुदेश के साथ लिव इन जर्नी भी शुरू हो गई. मालविका के घर वाले अपने जीवन और कैरियर में व्यस्त थे, मां को कभीकभार वीडियोकौल में अपना चेहरा दिखा देती मालविका तो सब शांत रहते. 2 साल से ऊपर गुजर गए थे, मालविका का सुदेश के साथ और सुदेश के अनुसार रहते हुए. लेकिन सुदेश अपनी तरह से अपनी जिंदगी जी रहा था और मालविका के साथ रहते हुए भी उस के जीने के अंदाज में खास फर्क नहीं था.
इधर मालविका में अब छटपटाहट भर रही थी. सुदेश उसे जिस तरह अपने कंट्रोल में रखता उस से उस की रचनात्मकता और प्रोफैशन दोनों बंद पड़ गए थे. वह हिम्मत करके सुदेश की गैरमौजूदगी में दूसरे लोगों के साथ अलग प्रोजैक्ट पर काम करने के लिए जाने लगी. उस दिन सुदेश रात बहुत देर से आया. मालविका को सुबह शूटिंग के लिए निकलना था. इधर सुदेश बिस्तर पर मालविका से लिपटा पड़ा था, उधर मालविका का बारबार फोन बज रहा था.
मालविका ने खुद को छुड़ाकर फोन रिसीव किया. सुदेश थोड़ा अलसाए से स्वर में पूछा, ‘‘कौन है?’’ ‘‘सुदेश मुझे निकलना पड़ेगा एक शूटिंग के लिए.’’ ‘‘मतलब? हफ्तेभर बाद मैं भागा हुआ आया और तुम इस तरह.. नहीं मालू. तुम नहीं जा रही हो कहीं. तुम्हें तो बता दिया है न कि मेरे सिवा और कहीं काम करना नहीं है तुम्हें?’’ ‘‘मुझे जाना है सुदेश. तुम्हारा जब प्रोजैक्ट शुरू होगा मैं तब तुम्हारे साथ ही करूंगी. अभी खाली हूं, उन के साथ डील हो चुकी है.’’ ‘‘किस के साथ काम कर रही हो?’’ सुदेश ने थोड़ा चिढ़ कर पूछा. ‘‘आलेखजी डाइरैक्टर, नवलकिशोर का प्रोडक्शन. बुरा मत मानो सुदेश. मैं जल्दी वापस…’’ ‘‘मना कर रहा हूं तो मत जाओ,’’ कह करवट ले कर सुदेश सो गया और मालविका निकल कर दौड़ीभागी शूटिंग स्पौट पहुंची. शूटिंग में सभी व्यस्त दिखे. तभी असिस्टैंट ने आ कर कहा, ‘‘मैडम, आप का शूट अभी नहीं है. डाइरैक्टर सर ने कहा है जब आप का रहेगा आप को बता देंगे. आज जा सकती हैं.’’ ‘‘मतलब. इतनी बार फोन कर के बुलाया गया और अभी कहते हैं शूटिंग नहीं है? आलेखजी से मिलवा दीजिए.’’ ‘‘मैडम वे आप से नहीं मिल पाएंगे. आप को आज लौट जाना चाहिए,’’ असिस्टेंट इतना बोल कर चला गया.
मालविका वापस लौटते हुए बहुत कुछ समझ चुकी थी. बेशक यह सुदेश का ही काम होगा, उस ने मालविका से नाम पूछ ही लिया था. जब वापस आई तो सुदेश जाने के लिए तैयार हो रहा था. मालविका खुद को रोक नहीं पाई और पूछा, ‘‘तुम ने उन्हें फोन कर के मुझे काम से निकालने को कहा?’’ ‘‘जब मैं ने तुम्हें कहा है कि मेरी अगले फिल्म में तुम ही हीरोइन हो, तो तुम्हे हर दरवाजे पर मुंह मारने की क्या जरूरत है?’’ ‘‘कब दोगे काम? 3 महीने से ऊपर खाली बैठी हूं. मैं एक प्रोफैशनल हूं. अकेले आप का ही काम क्यों करूं? कितनी बार आप से कहा शादी कर के घर बसा लो, फिर सिर्फ आप के ही प्रोडक्शन में करती. मगर आप को तो 10 के बिस्तर पर जाने से ही फुरसत नहीं. फिल्म कब बनाएंगे और शादी…’’
अभी मालविका अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि सुदेश ने कस कर उस के गाल पर थप्पड़ जड़ दिया और उस के बाल पकड़ कर दीवार में धक्का दे दिया. मालविका चोट खा कर जमीन पर गिर पड़ी. ‘‘एक मौका और देता हूं या तो शांति से घर पर रहो या सड़क पर फेंके जाने के लिए तैयार रहो,’’ कड़कती आवाज में सुदेश कह कर दनदनाता निकल गया. मालविका धीरेधीरे उठ खड़ी हुई, लेकिन उस के पैरों तले जमीन खिसक गई थी. उस ने उस असिस्टैंट को फोन लगाया. कहा, ‘‘क्या आप लोगों को सुदेश ने मना किया है मुझे काम देने से?’’ ‘‘मैडम, आप फोन मत करिए, हम आप से काम नहीं कराएंगे, हां कुछ ऐसा ही समझ लें, हमें झंझट नहीं चाहिए. नमस्ते.’’
मालविका के लिए अभिनय एक जनून था, अपना कैरियर खुद अपने दम पर बनाने के लिए उस ने कितना संघर्ष किया था और आज सुदेश की रखैल बन कर खुद को तमाम कर दे, यह नहीं हो सकता. शुक्र मनाया उस ने कि रात सुदेश वापस नहीं आया, शायद सुदेश को भरोसा था कि अकेला छोड़ देने पर मालविका घबरा कर और कहीं कोई आसरा न पा कर सुदेश के पास आत्मसमर्पण कर देगी. देर रात तक मालविका ने अपने सारे कौंटैक्ट्स खंगाल डाले. अचानक उसे राघवजी का नंबर मिला, जो उस ने किसी पार्टी में लिया था. सुबह 5 बजे वह तैयार हुई.
एक सी ग्रीन स्लीवलैस ब्लाउज और सफेद जौर्जेट की नैट वाली साड़ी, हलका सा टच अप फेस पर, कानों में डायमंड के 2 छोटे नग, स्टैप में गहरे लट वाले बाल खुले हुए. जब वह कैब से राघवजी के घर के सामने पहुंची, तब सुबह के 6 बज रहे थे और राघवजी मौर्निंग वाक से लौट कर दौड़तेहांफते अपने घर में घुस रहे थे. मालविका उन के सामने जा कर खड़ी हो गई. राघवजी की उम्र कोई 40 के आसपास थी. हाइट सामान्य, रंग गहरा, आंखों में चश्मा, क्लीन शेव और आत्मविश्वास से भरपूर चेहरा. मालविका को देख उन की आंखों में एक चमक भर गई परिचय और कारण जानने के बाद वे उसे अपने साथ घर के अंदर ले गए.
राघव काफी खुश थे. कहा, ‘‘देखो मालविका. मैं प्रोडक्शन और कैमरे का काम ज्यादा देखता हूं. मेरी हिंदी ज्यादा अच्छी नहीं. मेरा सब काम मेरा आदमी लोग देखता. तुम्हारे जैसा एक नया हीरोइन मांगता था मैं. तुम पक्का है. सुदेश का डर नहीं करने का. उस को मैं संभाल लेगा. तुम अपना इधर ही रहने का. शादी नई बनाया मै. इधर ही आराम से रहने का, ऊपर मंजिल में तुम्हारा कमरा तुम अभी देख लो और अपना सामान पैक कर के अभी आ जाओ.
शाम को शूटिंग के लिए मेरे साथ चलने का.’’ अभी मालविका को जो चाहिए था उस से अधिक ही मिल गया. सुदेश वापस आ गया था और कमरे में सो रहा था, लेकिन उस के कान दरवाजे पर लगे थे. मालविका के पास भी चाबी रहती थी, दूसरे कमरे से जब खटपट की आवाजें आईं, तो सुदेश सतर्क हो कर उठ बैठा. उस ने भांप लिया कि मालविका आई है.
अब मालविका अपने कमरे में आ कर कुछ सामान निकालने लगी और सूटकेस तैयार करने लगी तो सुदेश उस पर कंट्रोल जमाने के लिए उसे पीछे से आ कर जकड़ लिया, ‘‘अरे गुस्सा थूको जानेमन. नई फिल्म की कहानी सुनाने आज ही आ रहा है एक राइटर. तुम चली कहां फिल्म छोड़ कर?’’ मालविका सुदेश के पुरानी टैक्टिस जानती थी. सबकुछ झठ था उस का.
उस ने खुद को छुड़ा कर अपने दोनों सूटकेसों को पकड़ा और जातेजाते कहा, ‘‘बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं रही. रास्ते मैं ने अलग कर लिए हैं. तुम्हारी गुलाम अब नहीं रही.’’ दरवाजे से निकलते हुए उस के शब्द मालविका के कानों में पड़े, ‘‘देखता हूं.’’ राघव अपने काम से काम रखता और अपनी यूनिट के लोगों के साथ उस का व्यवहार दोस्ताना और प्रोफैशनल दोनों था. इस की फिल्मों में मालविका ने लगातार काम किया. फिल्में हिट हुईं, नाम, पैसा खूब कमाया. जिस मुकाम तक उसे पहुंचना था, लगातार पहुंचती रही, अपना बंगला और कार तक ले ली. राघव के आगे अब तक भले ही सुदेश की न चली लेकिन वह हार मानने वाला बंदा नहीं था.
एक बार एक पार्टी में एक हुस्न परी 19 साल की सुंबूल नाम की लड़की से राघव की मुलाकात हुई और उसे देखते ही राघव बुरी तरह उस का कायल हो गया. उस की एक बहुत पुरानी कहानी रखी थी, जिस की नायिका हुबहू इस सुंबूल की तरह थी. राघव ने तुरंत पता किया और उस लड़की के पिता से बात की. बेटी के पिता राघव की फिल्म में बेटी के काम करने को ले कर राजी हो गए. इस के बाद से राघव मालविका को भूलते चले गए. मालविका को पता चला नई हीरोइन और नई फिल्म के बारे में.
मालविका के लिए सुदेश के कारण दूसरे बैनर में काम पाना कठिन था और राघव भी कोई संपर्क न रखें, काम न पूछें तो स्वाभाविक ही था मालविका खबर लेती. मालविका अंदर की बात पता चली जो राघव को भी मालूम नहीं थी. दरअसल, सुदेश ने ही मालविका को हटाने के लिए इस नई लड़की सुंबूल को आगे कराया था. मालविका भले ही अभी 30 की हो रही थी लेकिन इतने में ही अगर वह घर बैठ जाए तो अपनी हाई प्रोफाइल लाइफ कैसे मैंटेन करेगी? उस ने अपनी फोन बुक पलटनी शुरू किया, कौंटैक्ट्स काम के मिले अगर तो काम बने.
एक वास्तुशास्त्र के ज्योतिष जो फिल्मी दुनिया में अपनी खूब पैठ रखते थे, उन का नंबर मिला. डूबते को तिनका ही काफी. सो घुमा दिया फोन. बी.एस. साहब का बहुत बड़ा रत्नों का भी व्यापार था और वास्तु ज्योतिष का भी व्यवसाय. पिछली किसी पार्टी में उन से मुलाकात के बाद मालविका ने उन का नंबर जुटा रखा था. बी.एस. साहब ने भी मालविका का नंबर सेव रखा था.
बातचीत से शुरू होते हुए मुलाकातों का सिलसिला फिर उन से होते हुए एक प्रतिष्ठित नामी धर्माचार्य से मालविका की जानपहचान गहरी होती गई. मालविका अब डरडर कर जीने से आजिज आ चुकी थी. संपर्क इन से बढ़े तो उस ने भी खुद को अब एक खेमे में शामिल पाया और इस से उस का अकेलापन दूर होने लगा. काफी मेलजोल के बाद इन लोगों ने मालविका को अपने दल का हिस्सा बना लिया. ये लोग छोटेबड़े शहरों में जा कर प्रवचन देते, वास्तु और ज्योतिष के नाम पर आम जनता का विशाल मजमा लगता, करोड़ों की कमाई का जरीया खुलता, रत्न और वास्तु का व्यापार भी जोरों पर चलता.
अब जब मालविका को फिल्मों में काम मिलना बंद हो गया तो इन लोगों ने मालविका के साथ मिल कर एक प्लान बनाया. बनारस के एक विशाल हौल में ठसाठस भीड़ जुटी कुरसियां थी. सामने दरी पर महिलाओं की अत्यधिक भीड़. कुरसियां भर जाने के बाद लोग कतारों में खड़े. एक अति सुंदर स्त्री गेरुआ साड़ी और फुल स्लीव के गेरुआ ब्लाउज में ध्यानमग्न भीड़ के सामने सुसज्जित मंच पर अपने सिंहासन पर बैठी थी. उस स्त्री के सिर के बाल माथे के ऊपर रुद्राक्ष माला के साथ जूड़े में बंधे थे.
पास ही एक टेबल पर कमंडल में जल रखा था. एक मध्यम आकार के ताम्र पात्र में लाल धागों की भरमार थी और हरेक लाल धागे में एक ताबीज बंधा था. इस के अलावा कागज की चिट भी एक गेरुआ झले में रखी थीं. 2 चौबीसपच्चीस साल के लड़के उस स्त्री की दोनों ओर खड़े थे. वे एकएक कर नाम पुकार रहे थे और एक परिवार के लोग एक बार में मंच पर आ रहे थे. वह स्त्री मिलने वाले को लाल धागे वाला ताबीज देती, जल छिड़कती, जिस के लिए ऐंट्री के वक्त ही एक अच्छी रकम वसूली जा चुकी थी.
इस के अलावा अगर कोई ज्यादा रोना रोता तो उसे वह कागज की चिट थमा देती, जिस में वास्तु और ज्योतिष के फोन नंबर थे, साथ में हिदायत दे देती कि इन्हें फोन करते ही उन लोगों की बाकी समस्या तुरंत दूर हो जाएगी. यह सब पीछे खड़ा एक 30 साल का लड़का देख रहा था. अचानक वह भीड़ से उठ कर मंच के सामने आ कर खड़ा हो गया और जोर से पुकार कर कहा ‘‘मालविका मैं तनय. तुम से मिलना है. मालविका.’’ नाम सुनते ही उस स्त्री ने अचंभित हो अपनी आंखें खोल दीं.
अब तक 2 उन के ही लोग तनय को हाथ पकड़ कर खींचने लगे. मंच पर विराज स्त्री ने अपने पास खड़े एक युवक को पास बुला कर उस के कान में कुछ कहा. लड़का जल्दी तनय के पास आ कर उसे हाथ पकड़ कर किनारे से चलते हुए एक दरवाजे से बाहर ले गया और पास की एक दूसरी बिल्डिंग में ले जा कर एक अति आधुनिक सुसज्जित कमरे के सोफे पर बैठा कर कहा कि जब तक मां माहेश्वरी आएं वह यहीं इंतजार करे. लगभग 2 घंटे इंतजार के बाद वह स्त्री आई. उस ने एक बार तनय की ओर दृष्टि डाली और एक दरवाजे से अंदर चली गईं.
आधे घंटे बाद जब बाहर आई तो तनय उस के रूप यौवन और वेशभूषा देख अवाक रह गया. कौन कह सकता है कि यह मौडर्न स्टाइलिश स्त्री कुछ देर पहले तक एक संयासिनी के वेश में थी. पीले रंग की स्लीवलैस ढीली सी कुरती और ढीले से प्लाजो में हलके मेकअप के साथ वह गजब ढा रही थी. खुले लंबे बालों की कुछ घुंघराली लटें उस की मादकता और बढ़ा रही थीं. ‘‘कैसे इधर तनय? अचानक मैं कैसे याद आई?’’ स्त्री ने अनायास कहा. मालविका, तुम मां माहेश्वरी कब बन गईं. क्यों बनीं तुम तो फिल्मी दुनिया की नामचीन हीरोइन हो. ‘‘थी, थी तनय. अब मैं मां माहेश्वरी हूं.
कहानी लंबी है, तुम कहां रहते हो, यहां कैसे आए?’’ ‘‘मालविका मेरी एक अर्जी है, अगर रख लोगी तो मेरा आना सार्थक हो जाएगा. यहां से लगभग 40 किलोमीटर दूर एक गांव है जहां से मैं मिलने आया हूं तुम से, तुम मेरे गांव चलो, बस एक बार चल कर देखो, फिर तुम से और कुछ नहीं मागूंगा.’’ ‘‘ठीक है तनय, जाना तो चाहती हूं मैं, लेकिन कुछ लोग हैं, जो मुझे छोड़ेंगे नहीं.’’ ‘‘क्यों तुम क्या उन की कैदी हो? उन के कब्जे में हो?’’ ‘‘पहले तो सोचा ऐसा नहीं था, लेकिन मैं उन से कहे बिना कुछ भी नहीं कर सकती.’’ ‘‘फिर तो तुम उन की गुलाम हो मालविका.
आओ चलो यहां से इन के चंगुल से मैं तुम्हे मुक्ति का स्वाद दूंगा.’’ मालविका तनय की ओर गहरी दृष्टि से देख रही थी. अचानक उस के चेहरे पर कुछ अलगअलग किस्म के भाव आए. बोली, ‘‘तनय, तुम हिम्मत कर पाओगे? अगर मैं तुम्हें उन के सामने ले जा कर कहूं कि तुम मेरे प्रेमी हो, मुझे यहां आया देख तुम बहुत उम्मीद ले कर आए हो और मुझे अपने साथ ले जाना चाहते हो, हम वयस्क हैं, अगर शादी करने का कहें तो वे मना नहीं कर पाएंगे, तुम आखिर तक उन के सामने खड़े रह पाओगे?’’ ‘‘रह पाऊंगा, मालविका. तुम अभी जो कर रही हो यह एक तरह से आम जनता के प्रति धोखा है.
मैं सच में नहीं चाहता तुम यह सब करो. चलो कहां चलना है. जिन से मिलना है उन से मिलने की सूरत निकालो.’’ उन की इतनी बड़ी कमाई की लुटिया डुबो कर मालविका चली जाए, वे स्वीकार तो नहीं पाते, लेकिन तनय ने अपने एक वकील दोस्त को भी साथ बात करने को बुला लिया था. मालविका थी तो जिद्दी, जो अड़ गई तो अड़ गई. आखिर वे दोनों तनय के गांव की ओर चल पड़े.
एक कैब में पीछे की सीट पर मालविका और तनय बैठे थे. मालविका ने तनय की ओर देखा. तनय दूर कहीं खोया सा ताक रहा था. ‘‘तनय? क्या से क्या हो गया. मैं माफी चाहती हूं तुम से, सुना था, तुम्हारी तो शादी हो गई थी 4 साल पहले? तुम बुरा मत मानना तनय. मैं ने बस वहां से निकलने के लिए यह बहाना बनाया, तुम्हारी बीवी को ये सब मत कहना, मैं उस की नजर में गिरना नहीं चाहती, उस से दोस्ती चाहती हूं बस.’’ ‘‘हूं,’’ तनय के इस संक्षिप्त उत्तर पर मालविका ने उस की ओर देखा.
वह अब भी कहीं खोया था. तनय गांव का ही हो कर रह गया था. इकौनोमिक्स और ऐग्रीकल्चर की पढ़ाई के बाद गांव में ही फार्म हाउस कैटल रियरिंग और खेतीबाड़ी. पूरी तरह रमा था वह, अपना खेत भी दिखाता चल रहा था, लहलहाती फसल, गांव के सुकून भरे तालाब, विचरते हंस और खिले जलपद्म. शाम होने को आ रही थी, सूरज आकाश से धीरेधीरे नीचे खिसक रहा था.
मालविका कुछ उदास सी लग रही थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि तनय की बीवी से कैसे क्या कहेगी. घर आ गया था, पुरातन घर को अब विशाल बंगले का रूप दिया गया था, सामने बहुत बड़ा बगीचा और खिले हुए फूलों के बीच बड़ा सा झला. घर में घुसते ही एक 3 साल की मासूम प्यारी बच्ची दौड़ती हुई आई और तनय से लिपट गई. तनय ने उसे गोद में उठा लिया और पूछा, ‘‘दादी कहां हैं?’’ मालविका गौर कर रही थी सबकुछ. तनय मालविका को अंदर एक हौल से होते हुए कमरे में ले गया.
वहां एक सुंदर स्त्री का फोटो टंगा था जिस में माला डाली गई थी. ‘‘तनय, कौन है?’’ मालविका मन ही मन सहम रही थी. तनय ने कहा, ‘‘सही सोच रही हो मालविका यह मेरी जीवनसंगिनी, मेरी इशू की मां. वह नहीं रही. मेरी मां यानी इशू की दादी ही इशू को संभालती हैं.’’ ‘‘तनय, मै शब्दों से यह अफसोस व्यक्त नहीं कर सकती,’’ कह मालविका ने इशू की ओर हाथ बढ़ाया, बच्चे मन की परख रखते हैं, वह तुरंत मालविका के गोद में चली गई. शाम की चाय बाहर बरामदे में रखी गई. इशू की दादी लगभग 60 की होंगी, लेकिन बातव्यवहार, कामकाज में उन की स्फूर्ति मालविका को अच्छी लगी.
उन्होंने मालविका को चाय बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बेटा, मुझे उम्मीद है तुम मेरी बातों का बुरा नहीं मानोगी.’’ ‘‘नहीं. कहिए.’’ तनय और मालविका दोनों ही मन ही मन थोड़ा डरे, लेकिन जाहिर नहीं होने दिया. ‘‘बेटा देखो, वह जाता हुआ सूरज साक्षी है, यह पल एक संधि क्षण है जब पुराने के बाद नए के उदय का इंगित देता हुआ सूरज चला जा रहा है. एक बीता, दूसरा आने वाला है, इस संधि क्षण में तनय और तुम्हारे बीते कल के बाद एक नया कल आ सकता है, अगर तुम दोनों मुझे यह खुशी देना चाहो तो.
शाम का यह समय दिन के बाद रात और फिर नई सुबह का इशारा देता है. यह एक संधि क्षण है, एक योग क्षण, जो बहुत कुछ जोड़ सकता है. ‘‘अब दोनों एकसाथ हो जाओ बच्चो. क्या ऐसा मुमकिन है? मेरी इशू की सुरक्षा और उन्नति के लिए?’’ तनय ने मां को देखा और कहा, ‘‘मां, तुम यह क्यों बोल रही हो? मालविका मेरी अच्छी दोस्त है, एक दिन के लिए घूमने आई है.’’ मालविका ने तनय की ओर बिना देखे तनय की मां से कहा, ‘‘मां, मैं तनय को चाहती थी, लेकिन तनय ने कभी मेरी ओर ध्यान नहीं दिया और मैं उसे भुला कर अपने कैरियर के लिए मुंबई चली गई.
मेरी जिंदगी में बहुत तूफान आए, अगर तनय सुनना चाहे तो मैं बता दूंगी, लेकिन तनय को अपनी जिंदगी में पा कर मैं शायद अपने सारे दुख भुला दूं. साथ बोनस में आप और इशू मिलो तो मैं परिपूर्ण हो जाऊंगी. लेकिन तनय का मैं नहीं जानती मां.’’ तनय ने मालविका की ओर देख कर कहा, ‘‘मैं तुम्हारे सारे तूफान अपने सिर ले लूंगा, लेकिन साझ करने के लिए, कैफियत नहीं चाहिए मालविका.’’ इशू की दादी दौड़ कर अंदर से मिठाई ले आईं. कहा, ‘‘आज इतने दिनों बाद मेरे घर उत्सव है, जाऊं खाने की तैयारी करूं. कल से कितने काम हैं.’’
एक इस संधि क्षण में अब तनय और मालविका बगीचे के झले में साथ बैठे थे, इशू मालविका के गोद में थी. मालविका ने कहा, ‘‘इशू, मुझे मां कहना.’’ इशू ने कहा, ‘‘मां.’’ तनय ने मालविका के हाथ को कस कर अपनी हथेली में बंद कर लिया.
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