अभी तो आप जवान हैं

48 साल की नेहा अक्सर ही जींस या शॉर्ट्स के साथ टी शर्ट पहन कर पार्कमें टहलने निकल जाती. कभी स्टाइलिश वनपीस पहन कर हमउम्र पुरुषों के दिलोंपर छुरियां चलाती. कभी अपने बच्चों की उम्र के लड़केलड़कियों के साथठहाके लगाती और गप्पें मारती. वह अपने से आधी उम्र की लड़कियों के साथ कईबार साइकिल या बाइक पर रेस भी लगाती. एक दिन तो वह अपनी बाहों में टैटूबनवा कर आई. उस की उम्र की महिलाएं उसे अजीब नजरों से देखतीं क्योंकिमोहल्ले की बाकी महिलाएं यह सब करने की सोच भी नहीं सकती थीं.नेहा अपने पति के साथ रहती थी और दोनों बेटे बेंगलुरु में जॉब कर रहे थे.

पति के जाने के बाद घर में ज्यादा काम नहीं रहता था सो वह अपनी जिंदगीअपनी मरजी से जी रही थी. वह योग और फिटनेस क्लासेस भी जाती थी. इस उम्रमें भी उस ने खुद को बहुत फिट और एक्टिव बना कर रखा हुआ था. उस की उम्रकी महिलाएं जहाँ उस से जलती और चिढ़ती थीं वहीँ पुरुष उसे तारीफ की नजरोंसे देखते. नेहा अपनी जिंदगी पूरे जोश और उत्साह के साथ जी रही थी. इस वजहसे उस के चेहरे पर भी उम्र की छाप नजर नहीं आती थी. उस के चेहरे कीग्लोइंग स्किन और स्वीट स्माइल से कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाताथा.

अक्सर ऐसा माना जाता है कि अधेड़ उम्र में लोगों का व्यवहार रूखा औरचिड़चिड़ा हो जाता है. जीवन के प्रति उत्साह कम हो जाता है और नकारात्मकसोच हावी होने लगती है. लेकिन सच तो यह है कि अधेड़ उम्र के लोग असल मेंअन्य उम्र के लोगों की तुलना में ज्यादा सकारात्मक होते हैं. एक हालियाशोध के अनुसार 40 से 60 साल की उम्र के लोग युवाओं और बुजुर्गों की तुलनामें कहीं ज्यादा सकारात्मक होते हैं.अमेरिका और नीदरलैंड में 30,000 लोगों पर किए गए शोध के मुताबिक़ अधेड़उम्र के लोग जीवन में अच्छी चीजें होने को ले कर ज्यादा सकारात्मक होतेहैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि अधेड़ लोग जो अपने जीवन में मूल्यों औरसंतुष्टि को ज्यादा कीमती समझते हैं वे अच्छी बातों पर ज्यादा ध्यानकेंद्रित करते हैं. जैसेजैसे लोग परिपक्व होते हैं वे अपने काम में अधिकसक्षम हो जाते हैं. सफलता उन के लिए थोड़ी आसान हो जाती है क्योंकि वेअपने जीवन के विभिन्न कार्यों में महारत हासिल कर लेते हैं. इसलिए वेअधेड़ उम्र तक पहुंचते ही अधिक आशावादी बनने लगते हैं. अधेड़ उम्र के लोगजीवन में आगे बढ़ने पर कम ध्यान केंद्रित करते हैं और जो वर्तमान मेंमौजूद है उसे खुशी से जीने को कोशिश करते हैं.

दरअसल उम्र कितनी भी हो मगर आप की जिंदगी खूबसूरत है यदि दिल में किसी केलिए प्यार और आँखों में सपने हों. कुछ करने का जज्बा और समय के साथ चलनेका हौसला हो. उम्र महज एक संख्या है और जिंदगी उन के लिए हर पल उत्सव हैजो खुद को जवान मानते हैं. आप का दिल जवान होना चाहिए सब कुछ दिलकश नजर आएगा. अगर आप ने अब तक जिंदगी को नहीं जिया बल्कि केवल घर और बच्चों कीसाजसंभाल में जिंदगी बिताती आई हैं तो अब भी समय है.

अपने अंदर कुछ नयापन और कुछ युवापन लाएं. अक्सर हम दूसरों से कहते फिरते हैं कि अब हड्डियों में दम नहीं या इस उम्र में फैशन कौन करे. बस अब तो समय बिताना है. कुछ करने की उम्र कहाँ रही. यह सोच ही बेमानी है. कुछ करने की उम्र तो अंतिम समय तक बाकी रहती है बस दूसरों से और खुद से यह कहना बंद करें कि अब उम्र ढल चुकी है. खुद को हमेशा जवान मानें तो हड्डियों में दम खुद आ जाएगा. नए फैशन के साथ चलें. कलरफुल और स्टाइलिश कपड़े पहनें. आकर्षक हेयर कट कराएं और वह सब करें जो आज का युवा कर रहा है या जो करना आप को पसंद है. आप को अपने अंदर बहुत एनर्जी और हैप्पीनेस महसूस होगी. जिंदगी की बोरियत और अकेलापन कहींदूर भाग जाएगा.

40 की उम्र के बाद महिलाएंअगर बात करें महिलाओं की तो अध्ययनों के मुताबिक़ 40 या 50 की उम्र के बादकी महिलाएं अपने लुक को ले कर सब से ज्यादा नाखुश रहती हैं. दरअसल इसउम्र के आसपास कई महिलाओं का वजन बढ़ना शुरू हो जाता है और वे यह माननेलगती हैं कि मैं अच्छी नहीं दिखती. यह नकारात्मक विश्वास उन के लिए खुशरहने और अपने बारे में अच्छा महसूस करने में एक बड़ी बाधा है. आज रंगरूपपर जोर देने के साथ अच्छा दिखने का दबाव ज्यादा है. जबकि भारतीय महिला कीदुनिया अपने परिवार के इर्द गिर्द केंद्रित रहती है.इस उम्र तक महिलाओं के बच्चे बड़े हो जाते हैं और कॉलेज या अपने करियरमें इतने व्यस्त हो गए हैं कि उन के पास मां के लिए बहुत कम समय है. पतिअपने करियर के लिए पूरी तरह समर्पित रहते हैं. किसी के पास महिला के लिएसमय नहीं होता. जिस महिला ने अपने परिजनों के लिए अपना करियर, खुशियां औरसेहत कुर्बान कर दी वही अकेलापन महसूस करने लगती है. इसलिए उस के जीवनमें एक खालीपन घर करने लगता है.

वैसे भी एक महिला का शरीर इस उम्र के दौरान भारी बदलाव से गुजरता है. वरजोनिवृत्ति की ओर बढ़ रही होती है. शरीर में काफी कुछ हार्मोनल परिवर्तनहोते हैं. सावधानी नहीं बरती गई तो महिलाएं भावनात्मक रूप से परेशान रहनेलगती हैं. वे चिंता और अवसाद से गुजर सकती हैं. कई बार जब पति पहले कीतरह प्यार का प्रदर्शन नहीं करते तो कई महिलाएं सोचती हैं कि उन के बढ़तेवजन और घटते आकर्षण के कारण ऐसा हो रहा है. इसी वजह से उन का पति अबउन्हें प्यार नहीं करता. इस आयु वर्ग की महिलाओं को अचानक लगने लगता हैकि उन के सपने और आकांक्षाएं अधूरी रह गई है.

इतना समय और ऊर्जा बच्चोंको पालने और अपने परिवारों की देखभाल में लगा कर उन्होंने जीवन में बहुतकुछ खो दिया है.अधिकांश भारतीय महिलाएं शादी करने के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के काबोझ उठाने में पूरी तरह फंसी रहती हैं. फिर जब 40 साल में पहुंचती है तोउन के बच्चे घोसला छोड़ने लगते हैं जिस से उसे खुद और अपने जीवन को करीबसे देखने का समय मिलता है. वह सोचती है कि उस ने क्या हासिल किया. उस नेअपने ऊपर अपने परिवार को प्राथमिकता दी थी और वजन बढ़ा लिया. अपने रंगरूप को नजरअंदाज कर दिया.मगर याद रखें रास्ते हमेशा खुले होते हैं. आप कैसी दिखती हैं, क्या करतीहैं, क्या हासिल कर सकती हैं, आप का अपने प्रति नजरिया कैसा है यह सब कुछआप के हाथ में है. आप को जीवन को नए ढंग से जीना चाहिए. नए नए प्रयोगकरने चाहिए.

आगे बढ़ना चाहिए. अपने आप को और अपनी प्रतिभा को निखारनाचाहिए. पहले खुद में बदलाव लाएं और फिर देखिए कि आप के साथ दुनिया कैसीबदली हुई नजर आती है. खुशी की तलाश दुख से निपटने का सब से अच्छा तरीकाहै. आप जैसी भी दिखती हैं उसे स्वीकार करें और अपने शरीर से प्यार करनासीखें. जो है उसे खूबसूरत बनाएं मगर उस का गम न करें. खुशी मन की अवस्थाहै. जिस तरह से हम दुनिया को देखते हैं वैसे ही दुनिया हमें देखती है. लोगों की परवाह न करेंकई बार लोगों की असंवेदनशील टिप्पणी आप को परेशान कर सकती है. कोई आप केऊपर कमेंट कर सकता है. पर इन सब से विचलित न हो. खुशी आप के अंदर ही है.आप को तय करना है कि आप इस ख़ुशी को अपने जीवन में कैसे उतारते हैं. एक नईशुरुआत करें. खुद में नयापन लाएं. कोई भी शारीरिक रूप से संपूर्ण नहीं.अपने आप से प्यार करें और खुद की सराहना करें.

इस उम्र में व्यायाम औरयोग अनिवार्य है. शरीर हार्मोनल परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा है और उन परिवर्तनों को संतुलित करने के लिए अधिक प्रयास की जरूरत है. जब आप वर्कआउट करती हैं, डांस करती हैं , ठहाके लगाती हैं तो फील गुड हार्मोन सेरोटोनिन रिलीज होता है. स्वस्थ आहार लें. कभी कभी जो मन करे वह खाएं और जिंदगी का मजा लें. अपनी भावनाओं को दबाएं नहीं. दूसरों से बात करें. ऐसा देखा गया दबी हुई भावनाएं कई तरह की बीमारियां उत्पन्न कर सकती. अधिक सामाजिक बने. बाहर जाएं. सकारात्मक और खुश लोगों के साथ रहे.

कभी भी अपने जीवन की तुलना अपने परिवार और दोस्तों से न करें. क्षमा करना सीखें. अच्छी बातों को याद रखें और अपमान भूल जाएं. आप को अपनी खुशी के लिए काम करना होगा. जब आप अपनी मदद करने के लिए निकलेंगे तो ऐसे लोगों का हुजूम दिखेगा जो आप पर व्यंग्य कसेगा या रोकना चाहेगा. उ पर ध्यान न दें. बुढ़ापे में भी फैशन के साथ चलें फैशनेबल बनें. जो दिल करे और खुद पर सूट करे वह पहनें. जींस, ट्रॉउज़र ,पटियाला ,पेंट्स ,वनपीस ,स्लीवलेस ,अनारकली ,टॉप, कुर्ते ,साड़ी यानी जो दिल करे वह पहनें. फैशन ट्रेंड अपनाएं. ब्राइट कलर्स भी ट्राई करें. गॉगल्स ,वाच, कैप या इयररिंग्स जो दिल को भाये उसे पहनें. यह न सोचें कि इस उम्र में क्या पहनना सही रहेगा या लोग क्या कहेंगे. जो आप के लुक को सूट करे और जो चीज़ें फैशन में हों उन्हें ट्राई करने से हिचकें नहीं.

अपने बचपन में लौटें

बचपन में क्या खूबसूरत दिन होते थे. स्कूल से आते ही बगीचे में तितली पकड़ने भाग गए . जब तक तितली हाथों में न आ जाए घर वापस नहीं लौटते थे चाहे जिस हाल में हो. जबकि आज हम किसी काम को शुरू करने से पहले ही हिम्मत हार देते हैं और सोचते हैं कि यह काम मुझ से नहीं होगा. बचपन के साथ दिल का वह विश्वास कहीं गायब हो जाता है. ऐसे लगता है जैसे उम्र बढ़ने के साथ जीवन से वह सारा उत्साह भी गायब हो गया. याद कीजिए बचपन में जहां लेट जाते थे वही नींद आ जाती थी. चिंता, तनाव और शक का कोई सवाल न था. दोस्तों के साथ खेलना, बातें शेयर करना. बड़ा से बड़ा दुख या समस्या दोस्तों से शेयर करना दिल को कितना सुकून देता था. आज अपने घर में अपने जीवनसाथी और बच्चों के साथ भी समस्या शेयर नहीं कर सकते. दोस्त के आगे कहीं नीचे न देखना पड़े इसलिए कोई भी समस्या उन्हें भी नहीं बताते.

आज उम्र के इस दौर में फिर से बचपन की तरफ लौटना जरूरी है. तभी जीवन में नयापन और सम्पूर्णता का अहसास होगा. बचपन में जिस प्रकार हम कभी हार नहीं मानते थे उसी प्रकार जीवन भर हार न मानने का प्रण करें. बचपन में हम किसी से भी कुछ मांग लेते थे. हमें शर्म बिल्कुल नहीं आती थी कि लोग क्या सोचेंगे. आज फिर से लोगों के बारे में सोचना छोड़ें और खुले दिल से दोस्तों के गले लगें. अपने मन की बातें शेयर करें. यह बिल्कुल न सोचें क वे क्या सोचेंगे. याद करें आप पिछली बार कब जोर से हंसे थे. ठहाका लगा कर हंसे आप को महीनों हो गए होंगे. जबकि बचपन में आप दिन में कई बार जोरजोर से हंसते थे. आज फिर छोटीछोटी बातों पर ठहाका लगाकर हंसें. उम्र पचपन का हो लेकिन दिल बचपन का होना जरूरी है. बचपन को साथ रखियेगा जिंदगी की शाम में, उम्र महसूस न होगी सफ़र के मुकाम में.

एक्टिव रहें

कानों में यदि बुढ़ापा या अधेड़ शब्द पहुंचे तो ज्यादातर लोगों के मन में खुद की एक तस्वीर उभरती है. झुर्रियों या झाइयों वाली सूरत , उदास नजर और थके से कदम. इस सोच से परे खुद को नया सा महसूस करें. उत्साह और फुर्ती से भरपूर. उम्र के साथ अपने शरीर की गतिविधियां घटाएं नहीं बल्कि एक्टिव रहे. अक्सर एक उम्र के बाद इंसान शरीर से ज्यादा काम लेना बंद कर देता है और उतनी शारीरिक गतिविधियां भी नहीं करता जितना उन्हें फिट रहने के लिए करना जरूरी है. यह उचित नहीं. जब तक डॉक्टर सलाह न दें बढ़ती उम्र में भी खूब चलें, पौधों को पानी डालें और वो सारी हल्कीफुल्की कसरतें करें जो आप के लिए संभव हों. इस से आप का वजन भी कंट्रोल में रहेगा और आप हेल्दी भी बनेंगे. आप का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा. जब आप घूमना शुरू करते हैं तो कई ऐसी चीजें देखते हैं जो आपने पहले नहीं देखी होती है.

यों रखें खाने को फ्रैश

चाहे बात हो बच्चों के स्कूल या कालेज का लंच पैक करने की या फिर हस्बैंड का टिफिन तैयार करने की अथवा पिकनिक या ट्रैवलिंग पर खाना पैक कर ले जाने की, हमेशा हमारे दिमाग में सबसे पहला नाम ऐल्यूमिनियम फौइल का ही आता है क्योंकि यह खाने को लंबे समय तक गरम रखने के साथसाथ उसे फ्रैश बनाए रखने का भी काम करता है. तभी तो टिफिन में खाने को पैक करने के लिए यह हर मां व हर घर की पसंद बन गया है. आपको फौइल हर घर की किचन में देखने को मिल ही जाएगा.

आइए, जानते हैं ऐल्यूमिनियम फौइल में खाना पैक करते समय हमें किन बातों का ध्यान रखें:

कैसे वर्क करता है

जैसाकि नाम से ही प्रतीत होता है कि ऐल्यूमिनियम फौइल ऐल्यूमिनियम से बना होता है, जिसमें परावर्तक गुण होने के कारण इसके अंदर औक्सीजन, मौइस्चर और बैक्टीरिया पहुंच नहीं पाते हैं, जिसके कारण खाने को लंबे समय तक गरम, फ्रैश व उसकी अरोमा को बनाए रखने में मदद मिलती है. ऐल्यूमिनियम फौइल में एक तरफ मैट फिनिश वाली साइड होती है और दूसरी तरफ शाइन वाली, जिसे देखते ही हम समझ जाते हैं कि मैट फिनिश वाली साइड को अंदर की तरफ रखना है और शाइन वाली को बाहर की तरफ ताकि खाने की हीट रिफ्लेट हो कर लौक हो जाए और अगर लाइट इस पर पड़े भी, तो भी वह रिफ्लेट हो कर बाहर ही रहे और खाने को अंदर से किसी भी तरह का कोई नुकसान न पहुंचाए. तभी तो इस में खाना लंबे समय तक फ्रैश व गरम बना रहता है.

क्या हैं इसके फायदे

लौंगलास्टिंग: इस की लौंगलास्टिंग प्रौपर्टी इसे खास बनाती है क्योंकि इस में बैक्टीरिया व मौइस्चर ऐंटर नहीं कर पाते, जिससे खाना सुरक्षित व लंबे समय तक फूड की क्वालिटी व फ्रैशनैस एकजैसी बनी रहती है. तभी तो टिफिन पैक करने में ऐल्यूमिनियम फौइल हर घर की पसंद बन गया है.

सौफ्ट: इस की खाने को सौफ्ट रखने वाली प्रौपर्टी लंबे समय तक खाने को सौफ्ट बनाने में मदद करती है. तभी तो अधिकांश घरों में ऐल्यूमिनियम फौइल के बिना खाने को पैक करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

पौकेट फ्रैंडली: यह अन्य तरह की पैकेजिंग के तरीके से सस्ता है, साथ ही इसे कैरी करना भी काफी आसान होता है. बस इसमें खाना पैक किया और आप बड़ी आसानी से इसे कैरी कर के कहीं भी ले जा सकते हैं.

जब करें फौइल का इस्तेमाल

अगर आप खाने को पैक करने के लिए ऐल्यूमिनियम फौइल का सही से इस्तेमाल नहीं करते हैं, तो यह न तो आपके खाने को गरम व फ्रैश रखेगा और साथ ही इसके कारण आपको कई दिक्कतों का भी सामना करना पड़ सकता है. इसलिए इसके इस्तेमाल से पहले इन बातों का जानना बहुत जरूरी है:

द्य आज हर किसी का लाइफस्टाइल बहुत बिजी हो गया है. ऐसे में हम हमेशा भागदौड़ व हमेशा जल्दबाजी में ही रहते हैं, जिसके कारण कई बार हम टिफिन पैक करते वक्त फौइल में गरमगरम खाना ही पैक कर देते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि फौइल पेपर में कभी भी बहुत गरम खाने को पैक नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके कारण ऐल्यूमिनियम फौइल मैल्ट हो कर आपके खाने में मिल जाता है, जो आपके स्वास्थ्य के लिए बिलकुल भी सही नहीं है. इसलिए थोड़ा रुक कर ही इसमें खाना स्टोर करना ठीक रहता है.

द्य मार्केट में आप को ढेरों ऐल्यूमिनियम फौइल पेपर मिल जाएंगे, लेकिन हमेशा फूड स्टोरेज के लिए अच्छी क्वालिटी का ही फौइल पेपर इस्तेमाल करना चाहिए.

द्य ऐल्यूमिनियम फौइल में विटामिन सी से भरपूर ऐसिडिक चीजें रखने से बचें क्योंकि ये ऐल्यूमिनियम के साथ रिएक्ट कर के औक्सीडाइज्ड हो जाते हैं. इससे चीजें जल्दी खराब होने के साथसाथ ये हैल्थ के लिए भी बिलकुल सही नहीं होता है, इसलिए इन चीजों को फौइल में रखने से बचें और सही तरीके से ऐल्यूमिनियम फौइल का इस्तेमाल कर के खाने को रखें फ्रैश व गरम.

नए साल में अभिनेत्री हरलीन सेठी कैसे जीना चाहती है, आइये जाने

हरलीन सेठी का जन्म 23 जून को मुंबई, महाराष्ट्र, भारत में पंजाबी माता-पिता के घर हुआ था. परिवार में उनके मम्मी पापा के अलावा एक भाई भी है, जिनका नाम करण सेठी है. उन्हें बचपन में अभिनय और नृत्य में गहरी रुचि थी. अपने सपने को पूरा करने के लिए, उन्होंने छोटी उम्र में अभिनय और नृत्य करना शुरू कर दिया.ग्लैमर की दुनिया उन्हें हमेशा से ही आकर्षित  करती थी, लेकिन इसके लिए अभिनय को जरुरी नहीं समझती थी. कला के क्षेत्र में कुछ करना चाहती थी. मुंबई की हरलीन ने समय के साथ-साथ  डायरेक्शन और प्रोड्यूसर बन अभिनय में आई और खुद को भाग्यशाली मानती है, क्योंकि उनकी इस यात्रा में उन्होंने हमेशा अपने परिवार को पाया है. गृहशोभा के लिए उन्होंने खास बातचीत की और अपनी जर्नी के बारें में बताई, जो बहुत रोचक थी, आइये जानते है, उनकी कहानी, उनकी जुबानी.

दिया अलग रूप

सोनी लाइव  पर उनकी वेब सीरीज काठमांडू कनेक्शन 2 रिलीज हो चुकी है, जिसमे हरलीन ने एक रॉ एजेंट की भूमिका निभाई है.  दूसरी सीजन में काम करने के  लिए हरलीन ने बहुत मेहनत किया है, क्योंकि पहले सीजन में उन्होंने अभिनय नहीं किया था. वह कहती है कि मैंने पहली वेब सीरीज देखी और अमित सियाल की भूमिका और संगीत बहुत पसंद आई थी, परिवार ने भी देखा था, आसपास के सभी ने इस शो की तारीफ़ की है. इसके अलाव इसमे काम करने वाले कलाकार भी बहुत अच्छे है,ऐसे में जब इसके अगले सीजन का ऑफर मिला तो मैंने ऑडिशन दिया और निर्देशक के साथ बैठकर थोड़ी चर्चा की, क्योंकि रॉ एजेंट्स बहुत सारे होते है, पर मुझे एक अलग और रियल रूप देना था. निर्देशक के साथ जो बातचीत हुई है, उसे ही साकार करना था, क्योंकि ये उनका विजन था. अलग-अलग लुक्स पर काम हुआ , क्योंकि रॉ एजेंट्स छुपकर रहते है. उन्हें पहचान पाना मुश्किल होता है. पहले की बॉलीवुड की इमेज मेरे दिमाग में थी, कई फिल्मे और कहानिया पढ़ी है, बस उसे देखते हुए मैंने एक अलग रूप दिया है.

ओरिजिनल चरित्र से थोड़ी मेल खाती

रॉ की भूमिका का केवल मेरे काम के साथ मेल खाता है, क्योंकि काम में मैं हमेशा प्रैक्टिकल एप्रोच रखती हूँ. इमोशन को सामने न लाकर काम पर फोकस्ड रहना, सबसे एक कदम आगे चलने की इच्छा दिमाग में रहती है और ये रॉ एजेंट भी करते है, उनकी आँखों से कोई छिप न पाए, इसकी कोशिश वे करते रहते है. देश को किसी प्रकार का खतरा न हो इस बारें में वे सतर्क रहते है.

मिली प्रेरणा और सहयोग

हरलीन कहती है कि एक्टिंग नहीं करनी है, ये  मैंने सोचा नहीं  था, क्योंकि मैने पर्दे के पीछे अस्सिस्टेंट डायरेक्टर और असिस्टेंट प्रोड्यूसर रह चुकी हूँ. एक्टिंग के बारें में न सोचने की खास वजह ये थी कि मैं टॉमबॉय टाइप की लड़की हूँ. बचपन में खेल-कूद में अधिक ध्यान था. अपना ख्याल कभी नहीं रखती थी. किसी प्रकार की चोट लगने से मैं घबराती नहीं थी. मस्ती खूब करती थी. एक्टिंग के लिए सुंदर कैसे दिखना है, पता नहीं था. परिवार का सहयोग रहा है, कभी एक्टर मुझे बनना नहीं था, क्योंकि उन्हें भी मेरे एक्टिंग को लेकर किसी प्रकार की उलझन नहीं थी. पहले फिल्मों में काम करने वालों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था. मेरे पेरेंट्स की सोच भी वैसी थी, क्योंकि परिवार का कोई भी इस फील्ड से नहीं था. उनकी हिचकिचाहट थी और मैंने भी उनको जानते हुए कोई बड़ा स्टेप नहीं लिया , पहले विज्ञापनों और छोटे-छोटे काम किये, ताकि वे सहज होकर मेरे साथ चल सकें. यहाँ तक पहुँचने में मैं पेरेंट्स का हाथ मानती हूँ, क्योंकि मैं उनके हाथ पकड़कर यहाँ तक पहुंची हूँ, ऐसा नहीं था कि मैं घर से भागकर अभिनय में गई और उन्हें मुझे लेकर किसी प्रकार की समस्या हो. मैं मुंबई की हूँ और मुझे पता नहीं था कि एक्टिंग में काम करना है या नहीं, ये तो धीरे-धीरे होते-होते यहाँ तक पहुंची है.

संघर्ष नहीं कह सकती

संघर्ष मैं नहीं कह सकती, क्योंकि मुझे शुरू से ही अभिनेत्री नहीं बनना था और मुझे खाने-पीने की समस्या नहीं हुई. जो भी काम मिला मैं करती गई, इससे मुझे आगे बढ़ने में आसानी हुई. काठमांडू कनेक्शन 2 में मेरे साथ को-स्टार लीजेंड थे, इससे काम करने से पहले थोडा सोचना पड़ा था. बड़े एक्ट्रेस के साथ काम करने पर खुद को भी उस लेवल तक लाना पड़ता है, उसमे कमी न हो इस बारें में हल्का डर रहा . इसके अलावा इसमें अलग लुक्स में एक्टिंग करना था, जो मेरे लिए आसान नहीं था. हर विग और लुक में मैं सुंदर नहीं लग रही थी, कई बार तो मुझे फैंसी ड्रेस की याद आ रही थी. मेरे निर्देशक मुझे बार-बार समझाते थे कि मैं एक छुपी हुई रॉ एजेंट हूँ जिसे सुंदर लगना जरुरी नहीं.

 

 

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मिला ब्रेक

मुझे एड एजेंसी में अभिनय करने के बाद से ब्रेक मिली है. मैंने ढाई साल तक बहुत सारें विज्ञापनों में काम किये है. इसके बाद एंकरिंग और छोटे -छोटे काम  भी किया है. विज्ञापन के जरिये मैं अभिनय में आई हूँ. इसलिए समय लगा,लेकिन अच्छा काम कर पायी. इंडस्ट्री में आज बहुत काम है, लड़कियों के लिए कहानियां लिखी जा रही है, लुक से अधिक टैलेंट पर ध्यान दिया जा रहा है. इसमें ये भी देखा जा रहा  है कि एक्टर्स कितना आसपास के बेहतरीन कलाकारों के साथ, जिन्होंने एक लम्बा समय अभिनय को दिया है, वहां पर खुद को फिट कर सकते  है और इसके लिए किसी भी अवसर को मेहनत के साथ पर्दे पर लाना मेरा मकसद होता है. मैंने पूरी कोशिश की है और अगले साल भी मैं लगन के साथ अच्छा काम करने के बारें में सोच रही हूँ, जिससे मेरे अलावा दर्शकों को भी एक मेसेज मेरी फिल्मों के ज़रिये मिले. जब मैंने शो ‘ब्रोकन बट ब्यूटीफुल’ की थी, तब मेरे चरित्र के द्वारा दर्शकों के मन बदले, उनके दिल को मेरी अभिनय ने छुआ, वही मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी.

 

 

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संकल्प नए साल का

गृहशोभा के लिए मेरा कहना है कि नए साल में वे अपने अंदर की खुशियों को ढूंढे, जो किसी काम या पैसे में नहीं मिलती. खुद को हमेशा स्पेशल समझे. खुद से हमेशा प्यार करें और दूसरों से भी प्यार करना सीखें. स्वास्थ्य का ध्यान महिला हो या पुरुष सभी रखें, ताकि आप जिंदगी में खुश रह सकें.

Anupama: बापूजी के फैसले से टूट जाएगा सारा परिवार, अलग हो जाएंगे अनुज-अनुपमा!

टीवी के टॉप सीरियल अनुपमा में रोजाना कुछ न कुछ ऐसा देखने को मिलता है, जिसे दर्शक शो से जुड़े रहते हैं और लगातार प्यार बरसाते रहते हैं. बीते एपिसोड में आपने देखा कि अनुज फट पड़ता है और कहता है कि जिस परिवार को मेरी कद्र नहीं, मुझे उसकी फिक्र नहीं. वो कहता है कि इस परिवार की परेशानियों में हमेशा में खड़ा रहा लेकिन तुम लोगों ने सिर्फ गलतियां ढूंढी, लेकिन मैं अनुपमा का पति हूं, अनुपमा नहीं. आज के एपिसोड में बापूजी वापस घर आ जाएंगे.

बा पर भड़केगी काव्या

आज के एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुज कहता है कि बीते कुछ दिनों से घर आने का मन ही नहीं कर रहा था क्योंकि यहां परिवार तो है लेकिन खुश शांति नहीं. आज हर घर में नए साल का स्वागत हो रहा है लेकिन यहां हम लड़ रहे हैं. मैंने हमेशा शाह हाउस की परेशानियों को अपना माना लेकिन इन लोगों ने मुझपर ही इल्जाम लगा दिया. काव्या भी अनुज की बात का समर्थन करती है और कहती है कि इस परिवार ने आज तक मुझे नहीं अपनाया. बा को फिर अपने खून से मतलब है. मैंने इस घर के लिए क्या कुछ नहीं किया लेकिन बदले में सिर्फ मैदे की कटोरी ही सुनने को मिला. वनराज काव्या को चुप कराने की कोशिश करता है लेकिन काव्या आज चुप होने के मुड में नहीं है. वो शाह परिवार के हर शख्स को सुनाती है और उसका साथ किंजल भी देती हैं.

 

 

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बापूजी सुनाएंगे बड़ा फैसला

तभी बाबूजी जी वापस आते है और बताते हैं कि वो रास्ता भटक गए थे. बाबूजी कहते है कि जितना अनुज ने मेरे लिए किया, उतना वनराज ने भी नहीं किया लेकिन तुम लोगों ने उसपर झूठे इल्जाम लगाए. इससे अच्छा मैं घर वापस ही नहीं आता. बाबूजी बा को चुप रहने के लिए कहते हैं और वनराज से कहते हैं कि तेरी बा की कही हर बात झूठी है.

टूटेगा काव्या के सब्र का बांध

‘अनुपमा’ में आगे दिखाया जाएगा कि अनुज शाह परिवार को अपने एहसान गिनाता है. इसी बीच काव्या भी शुरू हो जाती है और कहती है कि जब मैं आज तक इनकी अपनी नहीं हो पाई तो तुम क्या होगे. बा के लिए अपना खून अपना, बाकी सब पराए. काव्या बा के साथ-साथ पाखी और तोषू को भी ताना मारती है. वनराज उसे कई बार चुप कराने की कोशिश करता है, लेकिन वह उसे भी झाड़ देती है.

 

 

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अपने ससुराल की जमकर धज्जियां उड़ाएंगी काव्या और किंजल

रुपाली गांगुली स्टारर ‘अनुपमा’ में दिखाया जाएगा कि काव्या वनराज और बा को ताना मारती है कि इस घर में चार लोगों का ग्रुप बना हुआ है, जिसमें बहुएं कभी शामिल हो ही नहीं सकतीं और उसमें बहुओं को दबाया जाता है. काव्या कहती है कि मुझे बताने की जरूरत नहीं है कि वो लोग कौन हैं। किंजल भी उसका साथ देती है और अपने ससुराल को ‘टॉक्सिक’ बताती है. पारितोष उसे चुप कराने की कोशिश करता है, लेकिन वह उसका मुंह बंद कर देती है.

अर्चना को मारने के लिए दौड़े एमसी स्टेन, यह देखकर फूटेगा बिग बॉस का गुस्सा

बिग बॉस 16′ में वैसे तो आए दिन कोई न कोई बड़ा झगड़ा या हंगामा देखने को मिला है, लेकिन 3 जनवरी के एपिसोड में हंगामा हो गया. अर्चना गौतम और एमसी स्टेन के बीच गंदी लड़ाई छिड़ गई. मामला इस हद तक बढ़ गया कि दोनों ने एक-दूसरे के माता-पिता को लड़ाई में खींच लिया. घर में झाड़ू न लगाने को लेकर अर्चना और एमसी स्टेन का झगड़ा हुआ था, जो कैप्टेंसी टास्क के दौरान बढ़ गया. बात यहां तक ​​पहुंच गई कि एमसी स्टेन ने न सिर्फ खुद को बाथरूम में बंद कर लिया बल्कि अर्चना गौतम को थप्पड़ मारने को भी सोच लिया.

 

 

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अर्चना को थप्पड़ मारने जाएंगे स्टेन

दरअसल, बिग बॉस 16 का नया प्रोमो सामने आया है, जिसमें एमसी स्टेन खूब तोड़फोड़ मचाते नजर आ रहे हैं. बीते एपिसोड में देखा गया था कि अर्चना से लड़ाई के बाद एमसी स्टेन अपनी मंडली के पास बैठ जाते हैं. इस दौरान साजिद खान उन्हें समझाते हैं लेकिन स्टेन साफ बोलते हैं कि गलती उसकी भी है. वहीं, अब नए प्रोमो में देखने को मिल रहा है कि एमसी स्टेन अचानक उठ जाते हैं और बोलते हैं कि वह घर से वालंटियर एग्जिट लेंगे. यह बात सुनकर सब हैरान रह जाते हैं. इस दौरान वह घर में तोड़फोड़ करते हैं. तब अचानक ही साजिद बीच में बोल पड़ते हैं कि अगर बाहर ही जाना है तो अर्चना को एक थप्पड़ मार और बाहर हो जा. स्टेन भी इस बात को सुनकर आगे बढ़ जाते हैं और अर्चना के रूम में जाते हैं. तब शिव उन्हें रोकते हैं.

 

 

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बिग बॉस का फूटेगा गुस्सा

इस पूरे बवाल के बाद बिग बॉस 16 में एमसी स्टेन सारा सामान तोड़ते हुए नजर आएंगे, जिसके बाद बिग बॉस को बीच में आना होगा. बिग बॉस घर के सभी सदस्यों को गार्डन एरिया में लाइन से खड़ा करेंगे और सबसे पहले अर्चना-एमसी स्टेन को फटकार लगाएंगे. इसी बीच, बिग बॉस द्वारा घरवालों पर एक सख्त एक्शन भी लिया जाएगा, जिसके बाद घरवाले बिग बॉस को सॉरी बोलते हुए नजर आएंगे.

सेक्स में पति की जबरदस्ती

श्वेता खाना खाकर सोने चली गयी थी. उसका पति प्रदीप अभी घर नहीं लौटा था. पहले श्वेता रात के खाने पर पति का देर तक इंतजार करती थी. कुछ दिनों के बाद प्रदीप ने कहा कि अगर वह 10 बजे तक घर न आये तो खाने पर उसका इंतजार न करे. इसके बाद देर होने पर श्वेता खाना खाकर लेट जाती थी. इसके बाद भी उसको नंीद नहीं आ रही थी. वह अपने संबंधें के बारे में सोच रही थी. उसको लग रहा था जैसे वह पति की जबरदस्ती का शिकार हो रही है. प्रदीप ज्यादातर देर रात से घर लौटता था. इसके बाद कभी सेा जाता था तो कभी श्वेता को शारीरिक संबंध् बनाने के लिये मजबूर करने लगता था. नींद के आगोश में पहुच चुकी श्वेता को इस तरह संबंध बनाना अच्छा नहीं लगता था. कभी तो श्वेता को लगता जैसे पति प्यार न करके बलात्कार कर रहा हो.

श्वेता अपने को यह सोचकर समझाती कि पति की शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिये ही शायद शादी होती है. इसलिये उसको पति की जरूरतों को पूरा करना चाहिये. इस जोर जबरदस्ती में श्वेता को 4 साल के विवाहित जीवन में एक दो बार ही ऐसा लगा था कि प्रदीप प्यार के साथ भी संबंध् बना सकता था . ज्यादातर बार श्वेता जोरजबरदस्ती का ही शिकार बनी थी. इसका प्रभाव श्वेता के उफपर कुछ इस तरह पडा कि वह शारीरिक संबंधें से चिढने सी लगी. श्वेता और प्रदीप को एक बेटा था. श्वेता जब कभी अपनी सहेली से बात करती तो उसको पता चलता कि उनका पतिपत्नी का रिश्ता ज्यादा मजे में चल रहा है. श्वेता ने अपनी परेशानी सहेली शालिनी को बतायी . वह श्वेता को लेकर सेक्स कांउसलर के पास गयी.

सेक्स को लेकर बातचीत में रूखापन

कांउसलर ने बातचीत करके यह जानने की कोशिश की कि श्वेता की परेशानी क्या है ? श्वेता ने काउंसलर को बताया कि पति प्रदीप उस समय सेक्स संबंध् बनाने की कोशिश करता है जब उसका मन नहीं होता है. कई बार जब वह इसके लिये मना करती है तो जोरजबरदस्ती पर उतर आता है. इससे श्वेता को सेक्स संबंधे से ही मन हट गया है. काउसंलर रेखा पाण्डेय ने श्वेता को सलाह देते हुये कहा कि इस बारे में पति से आराम से बात करे. यह बातचीत सेक्स संबंधे के समय न करके बाद में की जाये. इसके लिये प्यार से पति को मनाने की कोशिश की जाये. अगर पति कभी नशे की हालत में इस तरह के सेक्स संबंध् बनाने का काम करते हो तो उनका नशा उतरने के बाद ही बात करे.

नशे की हालत में लोगो को बात समझ में नहीं आती उल्टे कभी कभी लडाई झगडे से मामला बिगड जरूर जाता है. पति हर समय गलत होता है यह भी नहीं मान लेना चाहिये. सेक्स पति कर जरूरत होती है. उसको इसके लिये टालना सही नहीं होता है. हो सकता है कि कभी आपका मन न हो इसके बाद भी आपको सकारात्मक रूख रखना चाहिये. सेक्स पति और पत्नी दोनो की जरूरत होती है. इसलिये इससे जुडी किसी भी परेशानी को हल करने के लिये आप दोनो को मिलकर ही सोंचना चाहिये. जब आप खुलकर एक दूसरे से बात करेगें तो तमाम सारी गलतपफहमियां अपने से दूर हो जायेगी. ज्यादातर पति पत्नी के साथ सेक्स को लेकर बातचीत कम करते है. जबरन सेक्स के चक्कर में रहते है. इस वजह से पति पत्नी के बीच दूरियां भी बढती है और पत्नी सैक्स को इन्जाव भी नहीं कर पाती है.

कम नहीं होती पत्नियों में बहानेबाजी

सेक्स दाम्पत्य जीवन की सबसे अहम चीज होती है. यह बात पति पत्नी दोनो को पता होती है. सवाल उठता है कि सेक्स संबंध् के लिये जबरदस्ती क्यो करनी पडती है. कभी पति पत्नी दोनो को कुछ ऐसी बीमारियां लग जाती है जिससे सेक्स संबंधें से मन उचट जाता है. ऐसे में बहुत ही ध्ैर्य और समझदारी की जरूरत होती है. सबसे पहले अपनी साथी की जरूरत को समझने की कोशिश करे. अगर कोई शारीरिक परेशानी है तो उसका इलाज किसी योेग्य डाक्टर से कराये. सेक्स की ज्यादातर बीमारियों की वजह मानसिक ही होती है. इसके लिये आपस में बात करे अगर बात न बने तो मनोचिकित्सक से भी बातचीत कर सकती है.

सेक्स के प्रति पत्नी की निगेटिव सोंच ही पति को कभी कभी जबरदस्ती करने के लिये मजबूर करती है. कुछ पत्नियां सेक्स को गंदा काम मानकर उससे संकोच करती है. अगर आप भी इसी तरह के विचार रखती है तो सही नहीं है. आपके इस तरह के विचार पति को जबरदस्ती करने के लिये उकसाते है. पति की जबरदस्ती से बचने के लिये इस तरह की निगेटिव मानसिकता से बचना चाहिये. इस मानसिकता के चलते न आप कभी खुश रह सकती है और न पति को खुश रख पायेगी. ऐसा करके आप कभी सेक्स का आनंद न ले पायेगी और न कभी आप अपने पति को ही यह सुख दे पायेगी.  जबरदस्ती से बचने के लिये सेक्स के प्रति अपनी सोंच को सकरात्मक बनाये.

बहाने बनाने से बचे

आमतौर पर पतियों को यह शिकायत होती है कि पत्नी बहाने बनाती है जिसके चलते जबरदस्ती करनी पडती है. इन शिकायतों में सबसे बडी शिकायत बच्चों के बडे होने , मूड ठीक न होने और घर में एकांत की कमी होना होता है. रमेश का कहना है कि मै जब भी अपनी पत्नी के साथ सेक्स करने की पहल करता था वह बच्चो और परिवार का बहाना कर टाल जाती थी. इसका मैने हल यह निकाला सप्ताह में एक बार पत्नी को लेकर आउफटिंग पर जाने लगा. इसके बाद पत्नी से हमारे संबंध् सही रूप से चलने लगे. अब पत्नी को यह अच्छा लगने लगा है. उसके साथ हमारे संबंध् सहज हो गये.

पत्नी के बहाना बनाने का असर यह होता है कि जब कभी पत्नी को हकीकत में कोई परेशानी होगी तब भी पति को लगेगा कि वह बहाना ही बता रही है. मूड न होने पर भी साथी को सहयोग देने की कोशिश करे इससे उसकी जबरदस्ती से बच सकती है. पति का समीप आना पत्नी की अंदर की भावनाओं को जगा देता है. इससे पत्नी भी उत्तजित हो जाती है. पति जबरदस्ती करने से बच जाता है. आपको मूड न हो तो उसको बनाया जा सकता है. आपको पति को बताना पडेगा कि मूड बनाने के लिये वह क्या करे.

समझदारी से सुखद संबंध

साथ रहते रहते पति पत्नी को एक दूसरे के बारे में बहुत सारी बातों का पता चल जाता है. शालिनी का कहना है कि जब उसके पति नहाने के बाद अच्छा सा परपयूम लगाकर सोने के लिये आते है तो उसको पता चल जाता है कि आज की रात वह कुछ चाहते है. रेखा कहती है कि उसके पति कोई न कोई बहाना बनाकर अपनी बात कह देते है. काउंसलर रेखा पांडेय कहती है कि इस तरह के लोगो के साथ समाजस्य बठाना आसान होता है. मुश्किल में वह लोग पत्नी को डालते है जो बिना किसी तैयारी के सेक्स संबंध् बनाने की कोशिश उस समय करते है जब पत्नी इसके लिये तैयार नहीं होती है. सुमन की कहानी से यह बात समझ में आ जाती है. सुमन का पति जब तक वह जागती थी अपना काम करता रहता था . जब वह सो जाती थी तब वह जबरदस्ती करने लगता था. ऐसे मामलो में पति को समझाकर ही काम चलाया जा सकता है.  पति पत्नी में ऐसे हालत से बचना चाहिये कि जबरन संबंध् बनाये जाये. अगर कभी पति जबरदस्ती करे तो आपको उन्दी से सहयोग देकर जबरदस्ती से बचना चाहिये. पति जबरदस्ती करे और आपने भी उसको उसी तरह से जवाब दिया तो संबंधे में दरार पड सकती है.

खामोशी की दीवार: बेटे ने कैसे जोड़ा माता-पिता का रिश्ता

रेखा और रमन की शादीशुदा जिंदगी को पूरे पैंतीस बरस हो गए थे. एक आम गृहस्थ जिस तरीके से जीवनभर रिश्तों में बंध कर अपनी गृहस्थी चाहेअनचाहे खींचते हैं, उसी तरह से उन्होंने भी अपनी जिंदगी घसीटी. कहने को तो वे  दोनों स्वभाव से सीधे और सरल थे, लेकिन जब भी वे एकसाथ होते पता नहीं क्यों उन दोनों को एकदूसरे में कोई अच्छाई दिखाई ही नहीं देती और वे एकदूसरे की कमियां गिनाने लगते. अन्य लोगों के साथ उन का व्यवहार बहुत अच्छा रहता.

रमन को शुरू से ही रेखा का हर किसी से खुल कर बात करना बहुत खटकता. किसी भी बाहर वाले से वह  जब इतमीनान से बात करती तो रमन को बहुत  बुरा लगता. वह अपनी मंशा उसे कई बार जता भी चुके थे, लेकिन रेखा अपनी आदत से मजबूर थी. जो कोई घर आता, वह उस के साथ आराम से बतियाने  लगती.

रमन इस बात को ले कर बहुत कुढ़ते और नाराज होते. रेखा थी कि उन की एक न सुनती. लोगों से बातें करने में उसे बहुत रस आता था. यही वजह थी कि वह जीवन में अपने लिए तनाव कम लेती और दूसरों को  देती ज्यादा थी.

रमन स्वभाव से अंतर्मुखी थे. उन्हे किसी से ज्यादा बोलना पसंद न था. वे अपने काम से काम रखना ज्यादा पसंद करते. एक रेखा ही थी, जिस से वह पहले दिल की बात कह लेते थे. अब पता नहीं क्यों उन्हें उस के किरदार पर शक होने लगा था. जब भी वे उन के सामने पड़ती अच्छी बात भी बहस पर जा कर खत्म होती. यह बात उन का बेटा आशु और बेटी रिया छुटपन में ही समझ गए थे कि मम्मीपापा दोनों स्वभाव से अच्छे होते हुए भी अपनीअपनी आदतों से मजबूर हैं.

वक्त गुजर रहा था. आशु और रिया बड़े हो गए. एमएससी करते ही रिया के लिए अच्छा रिश्ता आया तो रमन ने उस के हाथ पीले कर दिए. बी. टैक कर के आशु नौकरी के लिए शहर से बाहर चला गया था.

बिटिया के ससुराल जाते ही घर सूना हो गया. घर पर रेखा से बात करने वाला  अब कोई नहीं रह गया था. पहले वह रिया से बात कर मन हलका कर लेती थी. उन का घर ज्यादा बड़ा न था. कुल मिला कर इस घर में तीन बैडरूम थे. जब कोई घर पर आता तो आशु या रिया में से किसी को अपना बेडरूम उस के साथ साझा करना पड़ता.

रोज सुबह उठने से रात  सोतेसोते तक रेखा और रमन में नोंकझोंक होती ही रहती. कुछ समय बाद आशु की शादी हो गई और वह भी परिवार के साथ बेंगलुरु शिफ्ट हो गया.

अब घर पर केवल रेखा और रमन रह गए थे. उम्र के साथ उन की आदतें भी और पक्की हो गई थीं. आशु ने अपने कमरे में एक बड़ा सा टीवी लगा रखा था. दोपहर में उस की अनुपस्थिति में रमन उसी टीवी पर अपने पसंदीदा कार्यक्रम देखना पसंद करते.

जब आशु घर पर रहता तो रेखा और रमन को एकसाथ एक ही कमरे में बैठ कर टीवी देखना पड़ता. यहां पर भी अपने पसंद के प्रोगाम को ले कर दोनों में अकसर बहस हो जाती. रेखा को धारावाहिक देखना पसंद था तो रमन को खबरें. किसी तरह से बहुत बहस  करने के बाद आपस में सामंजस्य बिठा कर उन दोनों ने टीवी देखने का समय निश्चित कर लिया था कि रात 9 बजे तक रमन खबरें देखेंगे और उस के बाद रेखा अपने मनपसंद धारावाहिक.

आशु के बैंगलुरू जाने के बाद सूने घर में अब केवल दोनों की नोंकझोंक की आवाजें सुनाई देतीं. एक दिन रेखा बोली, “घर पर बच्चे  नहीं हैं. अब तुम आशु के कमरे में बैठ कर आराम से टीवी देख सकते हो.”

रमन ने घूर कर रेखा को देखा, तो वह बोली, “ऐसे क्यों घूर रहे हो?” “तुम से ऐसी समझदारी वाली बात की उम्मीद नहीं थी. वैसे, तुम यह इसीलिए कह रही हो, जिस से तुम्हें भी टीवी देखने में परेशानी न हो और मुझे भी.”

रमन उसी दिन से आशु के कमरे में बैठ कर आराम से टीवी देखने लगे और रेखा अपने कमरे में धारावाहिकों का आनंद लेती. धीरेधीरे रमन ने आशु के कमरे में अपना और  सामान भी व्यवस्थित कर दिया. कई बार टीवी देखतेदेखते वे वहीं सो जाते. रेखा रात ठीक 10 बजे टीवी और लाइट बंद कर के लेट जाती.

एक दिन रमन बोले, “मैं ने सोच लिया है कि अब मैं टीवी वाले कमरे में ही सोया करूंगा.” “क्यों ऐसी क्या बात हो गई, जो नौबत यहां तक आ गई?” रेखा ने पलट कर पूछा. “कई बार रात को देर तक क्रिकेट मैच चलता रहता है. उसे देखने में मुझे सोने में देर हो जाती है.”

“जैसा तुम्हें ठीक लगे. तुम ने जो सोच लिया है, वह तो कर के रहोगे,” रेखा बोली. रमन ने इस समय उस से उलझना ठीक नहीं समझा और अपना बिस्तर आशु के कमरे में शिफ्ट कर दिया.

इस घर पर रहने वाले दो लोगों ने अब अपने को अलगअलग कमरे में व्यवस्थित कर लिया था. इस की वजह से अब दोनों का एकदूसरे से सामना कम ही होता. रमन चाय नहीं पीते थे. रेखा सुबह उठ कर पहले अपने लिए चाय बनाती और आध्यात्मिक प्रवचन सुनते हुए उस का आनंद लेती और रमन बरामदे में बैठ कर मजे से अखबार पढ़ते.

सुबह मेज पर नाश्ता करने के लिए दोनों साथ बैठ कर नाश्ता करते. अब रमन ने रेखा के बनाए खाने में मीनमेख निकालना कम कर दिया था. रेखा नाश्ता करने के बाद अपने कामों में लग जाती और रमन टीवी पर व्यस्त हो जाते. दोपहर में खाने की मेज पर लंच करते हुए उन में कभी किसी बात को ले कर थोड़ीबहुत नोंकझोंक जरूर हो जाती, लेकिन अब उस में उतना तीखापन  नहीं रह गया था, जितना पहले हुआ करता था.

लंच के बाद वे फिर अपनेअपने कमरे में आ कर इतमीनान से टीवी देखते और आराम करते. कुछ ही महीने में उन दोनों को एकदूसरे से दूरी बना कर जिंदगी जीने की आदत सी पड़ गई. रेखा ज्यादा सुकून में थी. अब रमन उस की हर बात में दखलअंदाजी नहीं करते.  उन्हें अब इस बात से भी ज्यादा मतलब नहीं था कि वह अपने कमरे में बैठ कर फोन पर किस से बातें करती है? रमन को भी घर पर अपने लिए एक अलग जगह मिल गई थी जिस में वह अखबार पढ़ने, टीवी देखने और मोबाइल फोन के साथ बहुत खुश थे. पूरे सात महीने बाद आशु घर आया. उस ने देखा कि पापा ने उस का सामान ऊपर की मंजिल में दीदी के कमरे में शिफ्ट कर दिया था और खुद उस के कमरे में रह रहे थे.

यह देख कर आशु बोला, “पापा, आप ने बहुत अच्छा किया. कम से कम इसी बहाने इस घर के 2 कमरे तो आबाद रहते हैं.” “हां बेटा, मुझे भी लगा कि कमरे खाली पड़े हैं, तो क्यों न उस का सदुपयोग कर खुल कर रहा जाए?”

आशु ऊपर कमरे में जा कर सो गया. सुबह उठ कर उस ने महसूस किया कि घर में एकदम शांति थी. पहले जैसी बात होती तो सुबह उठते ही मम्मीपापा की जोरजोर की आवाजें सुनाई देतीं. आज पहली बार सुबह के समय घर पर एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था. बचपन से ले कर हमेशा इस घर में सुबह उठते ही  मम्मीपापा की आवाज सुनाई देने लगती थी. सो कर उठते ही वे दोनों बहस पर उलझे रहते. उन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं  की कि कोई उन के बारे में क्या सोचता है? लेकिन इस बार माहौल बिलकुल बदला हुआ था. मेज पर नाश्ता करते हुए भी मम्मीपापा एकदूसरे से उलझने के बजाय उसी से बात कर रहे थे. अब उन के लिए एकदूसरे की उपस्थिति कोई मायने नहीं रख रही थी.

आशु को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अचानक इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आ गया? नाश्ता करने के बाद पापा कमरे में जा कर टीवी देखने लगे. मम्मी भी थोड़ी देर उस से बात करने के बाद घर के कामों में व्यस्त हो गईं. जब उन्हें फुरसत मिली, तो वे अपनी पसंद का धारावाहिक देखने लगीं.

दोपहर में खाने पर वे तीनों साथ बैठे थे. आशु बोला, “मम्मी, अब घर कितना सूना लगता है.””हां बेटे, घर पर रौनक तो बच्चों से रहती है. तुम दोनों अब बाहर चले गए हो, तो घर भी सूना हो गया.” आशु के जी में आया कि कह दे, ‘मम्मी रौनक तो आप दोनों की बहस से रहती थी. अब आप लोग शांत हो गए हैं, तो घर की रौनक ही चली गई.’

असली बात मन में दबा कर वह बोला, “मैं और दीदी तो वैसे भी पढ़ाई में लगे रहते थे. हमें इतना सब बोलने की फुरसत कहां थी?” इस बार घर आ कर आशु ने महसूस किया कि पहले आपसी मतभेदों के बावजूद मम्मीपापा के मध्य हमेशा एक आत्मीयता का रिश्ता बना रहता था. नोंकझोंक के बावजूद आत्मीयता अपनी जगह पर बनी रहती थी.  इस सन्नाटे में वह भी कहीं गुम हो  गई थी. अब दोनों को एकदूसरे से ज्यादा।मतलब न था. केवल खाना खाने और किसी से मिलने जाने के लिए दोनों साथ उठतेबैठते, वरना वे दोनों अपनी अलग जिंदगी जी रहे थे और उसी में खुश भी लग रहे थे.

आशु ने होश संभालने पर कई बार महसूस किया था कि मम्मी के मन में हमेशा इस तरह की ही जिंदगी जीने की तमन्ना थी. आज  वह उसी जिंदगी का मजा ले रही थीं, पर उन्हें इस की कीमत भी चुकानी पड़ रही थी. इन सब में वह पापा से काफी दूर होती जा रही थीं.  दोनों अपने में खोए हुए थे. एकदूसरे की भावनाओं से अब उन्हें ज्यादा मतलब न था. पहले वह साथ बैठ कर बहस करते हुए आत्मीयता की बातें भी कर लिया करते थे. भले ही उन दोनों की बातों मे छत्तीस का आंकड़ा रहता, लेकिन वे एकदूसरे का भी पूरा खयाल रखते थे. मम्मी को जरा सा कुछ हो जाता, तो पापा बड़े परेशान हो जाते. पापा की तबीयत थोड़ा भी खराब होती, तो मम्मी बड़बड़ करते हुए भी उन्हें ढेरों नसीहतें दे डालती और उन की पूरी देखभाल करती थी.

अब उन के रिश्ते की ताजगी और गरमाहट कहीं खो गई थी और उस में बहुत ठंडापन आ गया था. जीवन के इस पड़ाव में जब उन्होंने एकदूसरे के सुखदुख का सब से ज्यादा खयाल रखना था, तब वे अपनीअपनी दुनिया में ज्यादा व्यस्त हो कर एकदूसरे के प्रति उदासीन हो गए थे.

आशु को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था. उस ने यह बात रोमा को भी बताई. दोनों ने इस बारे में विचार किया. बहुत सोचसमझ कर वह बोला, “मम्मी, मैं चाहता हूं कि आप दोनों कुछ दिन के लिए हमारे साथ रहें.”

“लेकिन बेटा, यहां घर छोड़ कर जाना भी तो ठीक नहीं है.””घर कौन से कोई उठा कर ले जाएगा. थोड़ा सामान है उस की देखभाल के लिए बगल में शर्मा आंटी से कह देंगे. वे कभीकभी घर खोल कर देख लेंगी. बाकी यहां ऐसा है भी क्या ?”

“अपना घर तो अपना होता है बेटे.””आप की बात सही है मम्मी. मेरा घर भी तो आप का ही घर है. बच्चे भी आप को मिस कर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि कुछ समय के लिए मेरे साथ चलें. मैं आप को ले जाने आया हूं.”

“यह बात तुम पहले बता देते, तो अच्छा रहता बेटे.””मैं आप को सरप्राइज देना चाहता था.”रेखा और रमन बेटे की बात को न टाल सके. उस ने एक हफ्ते की छुट्टी और बढ़ा ली और उस के बाद घर को ताला डाल कर आशु मम्मीपापा को ले कर बैंगलुरू आ गया. वहां  उस के पास 3 बैडरूम वाला फ्लैट था. एक कमरे में वह और उस की पत्नी रीमा, तो दूसरे में बच्चे ऊधम मचाते. आशु ने तीसरे बैडरूम में मम्मीपापा की व्यवस्था कर दी थी.

महीनों से खुले घर में स्वछंद रहने की आदत के बाद रेखा और रमन को यह कमरा बहुत छोटा लगा. पर यहां मजबूरी थी. वे बेटे से कुछ कह भी नहीं सकते थे. वे  अपने को इस कमरे में  किसी तरह एडजस्ट कर रहे थे. आशु ने  पूछा, “मम्मी कोई तकलीफ तो नहीं है?”

” नहीं बेटा. अपनों के बीच में कैसी तकलीफ? बच्चों के साथ बहुत अच्छा लग रहा है.””उन्हें भी आप का साथ बहुत अच्छा लगता है मम्मी.””बेटा, एक बात कहनी थी.””कहो ना पापा, यहां कोई परेशानी है?””मैं चाहता था कि एक टीवी इस कमरे में भी लगा देते. समय काटना आसान हो जाता.”

“पापा, यहां पर समय काटने की दिक्कत कहां है? बच्चे हैं, मैं और रीमा हैं और साथ में मम्मी. इतने लोगों के साथ कमरे में टीवी की जरूरत क्या है? बैठक में लगा तो है. आप जब मरजी हो, वहां पर बैठ कर टीवी देख सकते हैं.”

“वहां पर बच्चे अपने पसंद के कार्टून देखते रहते हैं.” “तो क्या हुआ? दिनभर आप टीवी देख लेना. शाम को बच्चे अपनी पसंद के प्रोगाम देख लेंगे. हम भी तो बचपन में ऐसा ही किया करते थे. क्यों मम्मी?”आशु बोला.

“तुम ठीक कहते हो बेटा. उस के बाद रमन ने आगे कुछ नहीं कहा. यही परेशानी रेखा को भी हो रही थी. वह रात को अपने पसंद के धारावाहिक बहुत मिस करती, लेकिन कुछ कह नहीं पा रही थी.

समय काटने के लिए शाम होते ही वे दोनों थोड़ी देर नीचे टहलने चले जाते और उस के बाद खाना खा कर रात को अपने कमरे में आ जाते. शुरुआत में दोनों को एक ही बैड पर एकदूसरे से काफी परेशानी हो रही थी. कभी रमन के खर्राटे तो कभी पेट की गैस रेखा को  परेशान कर रहे थे, लेकिन मजबूरी थी यहां पर इतनी जगह नहीं थी कि वह कहीं और जा कर सो पाती. यह बात वह बहू को भी नहीं कह सकती थी.

शाम के समय रमन को टीवी के बिना समय काटना मुश्किल हो रहा था. मजबूरन अब वे एकदूसरे से बातें कर के अपना समय गुजारने की कोशिश करने लगे. वर्षों की चिकचिक और आपसी बहस कुछ महीनों पहले लगभग खत्म हो गई थी. बेटेबहू के सामने वह फिर से उसी राह पर नहीं जा सकते थे. अब वे नए सिरे से शुरुआत कर एकदूसरे से अच्छी तरह बात करने की कोशिश कर रहे थे. बेटे के घर पर  लड़ने के लिए कोई मुद्दा भी न था.

रमन यहां बहू के बनाए खाने में कोई कमी भी नहीं निकाल सकते थे. बेटे के घर पर रहते हुए उन्हें काम की भी कोई परेशानी नहीं थी. आशु और रीमा उन्हें यहां कुछ काम न करने देते. बस यहां परेशानी एक ही बात की थी, वह थी समय काटने की. बच्चे दिन में थोड़ी देर उन के साथ बातें करते और खेलते. उस के बाद वे अपना होमवर्क निबटाते. आशु शाम को थकाहारा घर लौटता. थोड़ी देर मम्मीपापा के साथ बात कर के फिर वह अपने बीवीबच्चों के साथ अपना वक्त गुजारता.

रेखा और रमन को यहां आए हुए एक महीना हो गया था. उन्हें अपने पुराने घर की याद सताने लगी थी. एक दिन रमन ने दबी जबान में यह बात आशु से कह भी दी, “बेटा, हमें यहां आए बहुत समय हो गया है.” “कहां पापा… अभी एक महीना ही तो हुआ है.” “बेटा, एक महीने का समय कम नहीं होता भला.”

“जानता हूं पापा, पर इतना ज्यादा भी नहीं होता कि आप यहां हमारे साथ न रह सकें.” अब आगे बोलने की कोई गुंजाइश न थी. मजबूरन रमन और रेखा को यहां पर एक महीना और रहना पड़ा. इतने समय में रमन और रेखा आपसी मनमुटाव भुला कर एकसाथ एक कमरे में रहने के अभ्यस्त हो गए.

वे शाम को एकसाथ टहलते और साथ बैठ कर अपनी सुखदुख की बातें किया करते. यह देख कर आशु को बहुत अच्छा लगता. खाना खाने के बाद भी वे आपस में देर तक बतियाते रहते.

2 महीने बाद आशु उन्हें छोड़ने खुद घर आया. इतने समय बाद बच्चों और बेटेबहू से दूर जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था. आशु के पास ज्यादा छुट्टी नहीं थी. 2 दिन घर की साफसफाई में बीत गए थे. मम्मीपापा के साथ मिल कर उस ने सारा घर व्यवस्थित कर दिया था. जाने से पहले उस ने दोपहर में उन के लिए टीवी भी चालू करवा दिए थे. उन से विदा लेते समय उसे बहुत बुरा लग रहा था. आशु के परिवार के साथ 2 महीने बिताने के बाद अब रमन और रेखा को यहां अकेले रहने का अवसर मिल रहा था.

आशु की रात की ट्रेन थी. वह घर से खाना खा कर निकला था. आशु के जाते ही रमन अपने कमरे में आ गए और रेखा अपने. इतने समय बाद उन्होंने अपनेअपने कमरे में टीवी चलाए. आज अकेले टीवी देखने में रमन का मन नहीं लगा. जरा देर बाद टीवी बंद कर के वे रेखा के कमरे में आ गए और बोले, “आज बच्चों के बगैर बड़ा खराब लग रहा है.”

“तुम ठीक कह रहे हो. इस उम्र में परिवार का साथ बहुत जरूरी होता है. अब हमें उन के साथ ही रहना चाहिए.””तुम्हारी बात सही है, लेकिन जब तक हाथपैर चल रहे हैं, तब तक हमें उन के ऊपर पूरी तरह आश्रित नहीं होना चाहिए. उन्हें भी जिंदगी अपने ढंग से जीने का मौका देना चाहिए,” रमन बोले.

वे दोनों साथ बैठ कर आपस में बातें करने लगे, तो टीवी देखने का खयाल ही दिमाग से उतर गया. रेखा बोली, “घड़ी देखो, 10 बजने वाले हैं. अब हमें सो जाना चाहिए.”रमन उठ कर दूसरे कमरे में आ गए. थोड़ी देर में वे वापस रेखा के कमरे में आ गए.

” क्या हुआ?””अकेले कमरे में अच्छा नहीं लगा. क्या मैं भी यहीं सो जाऊं?””कैसी बातें करते हो? यह घर तुम्हारा है. इस में पूछने की क्या जरूरत है ?” रेखा बोली, तो रमन खुश हो गए और वहीं लेट गए. कुछ ही देर में उन के खर्राटे गूंजने लगे. अब रेखा को उन के खर्राटे जरा भी नहीं अखर रहे थे.

बैंगलुरू वापस आ कर आशु भी आश्वस्त हो गया था. उस ने मम्मीपापा के बीच खड़ी हो रही खामोशी की दीवार को तुरंत गिरा दिया. रेखा और रमन को अब एकदूसरे से कोई शिकायत न थी. इस उम्र में एकदूसरे से नजदीकियां उन्हें नई ऊर्जा दे रही थी.

प्यार पर पूर्णविराम: जब लौटा पूर्णिमा का अतीत

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पायरिया की वजह से मेरा एक दांत निकल गया, क्या मुझे नया दांत लगाना चाहिए?

सवाल

मेरी उम्र 70 साल है. पायरिया की वजह से मेरा एक दांत हिलने लगा और बाद में निकल गया. अब मुझे खाना खाने में परेशानी होती है. क्या नया दांत लगाया जा सकता है?

जवाब 

जी हांनया दांत 2 प्रकार से प्रतिस्थापित किया जा सकता है- रिमूवेबल पार्शियल डेंचर या फिक्स्ड प्रौस्थीसिस रिमूवेबल डैंचर प्लेट के साथ होता है जो अंदर की ओर से कवर करती है. इसे हर खाने के बाद निकाल कर साफ कर पहनना होता है व रात को उतार कर सोते हैं. फिक्स दांत ब्रिज या इंप्लांट की मदद से लगा सकते हैं. ब्रिज में 2 या अधिक स्वस्थ दांतों का सहारा ले कर एक प्रोस्थेटिक पुल प्रत्यारोपित करते हैं. डैंटल इंप्लांट एक कृत्रिम रूट है जिस की मदद से फिक्स दांत लगा सकते हैं.

Welcome 2023: नए साल का वेलकम करें इन 12 देसी लुक के साथ

नये साल में हर कोई भीड़ से अलग अपने अंदाज में सजना पसंद करता है. नए साल के जश्न को मनाने के लिए वेस्टर्न आउटफिट पहनना जरुरी नहीं. असल में कुछ लोगों को लगता है कि इंडियन आउटफिट उन्हें बोरिंग और देसी टाइप फील कराती है, लेकिन अगर आपने इंडियन आउटफिट को अच्छी तरह से कैरी किया है, तो सबकी नजर आपके परिधान से हटाना मुश्किल है. इस बारें में अविश्य डौट कौम के हैंडलूम एक्सपर्ट जवाहर सिंह बताते है कि वो दिन गए जब साड़ी को इंडियन ट्रेडिशनल ड्रेस में गिना जाता था. समय के साथ-साथ उसके पहनने के तरीके, स्टाइल,रंग और उसके मेकिंग में डिजाइनरों ने काफी परिवर्तन किया है. साड़ी को कई अलग अंदाज में भी पहना जा सकता है, यह आपको देसी दिवा का लुक दे सकती है.

 1. घाघरा के साथ लेयर

घाघरा के ऊपर साड़ी की एक लेयर बनाकर पहनने से ये फैंसी फ्यूजन साड़ी लुक नए साल के लिए बहुत ही आकर्षक लगती है. इसके लिए आप सिर्फ एक घाघरा ट्रंक से निकाले या खरीद लें. साड़ी को पल्लू के रूप में कमर के चारों तरफ से घुमाकर एडजस्ट करें और पिन से सेट कर लें.

2. इंडो वेस्टर्न धोती पेंट स्टाइल

इसे बोहेमियन ट्विस्ट के साथ अलग लुक दिया जा सकता है. इस स्टाइल को कैरी करना बहुत आसान होता है, इसके लिए मौडर्न लुक की एक साड़ी, धोती पैंट और एक क्रौप टाप की जरुरत होती है, साड़ी को धोती पैंट के इर्द-गिर्द घुमाकर सेंटर में लायें और प्लीट्स बनाकर अच्छी तरह से खोस लें, अधिक आकर्षक बनांने के लिए एक पतली बेल्ट कमर के चारों ओर बाँध लें.

3. पहने स्ट्रक्चर्ड ड्रेस

अगर आप पूरी तरह से एथनिक वियर नहीं पहनना चाहते है तो निराश होने की कोई जरुरत नहीं, बाजार में कुछ ऐसे बने बनाये डिजाइनर ड्रेस मिल जाते है जिसे आप आसानी से पहन सकती है. इसे अलग लुक देने के लिए फिटेड पैंट्स और हाफ साड़ी का सहारा ले सकती है, इसके अलावा मेटेलिक बेल्ट की सहायता से इसे एक्स्ट्रा स्टाइलिस्ट बना सकती है.

4. क्रौप टाप स्टाइल अपनाए

क्रौप टाप आजकल बहुत प्रसिद्ध है,साड़ी के साथ हैवी ब्लाउज पहनने का रिवाज अब कम हो चुका है,ऐसे में क्रौप टाप ट्विस्ट के साथ साड़ी पहनने से ड्रेस का लुक पूरी तरह से बदल जाता है, ब्लैक कलर की क्रौप टाप हर साड़ी के साथ अलग-अलग ढंग से पहना जा सकता है, इसके साथ कम से कम एक्सेसरीज का उपयोग करें.

5. दे अलग अंदाज नेहरु जैकेट के साथ

नेहरु जैकेट हर तरह के परिधान के साथ जैसे कि वेस्टर्न हो या इंडियन हर किसी के साथ नया लुक देती है. इसे साड़ी पहनने के बाद में या पहले किसी भी तरह से पहन सकती है, जाड़े के मौसम में इस स्टाइल को अपनाना अधिक उपयोगी होता है, अगर आप नेहरु जैकेट नहीं पहनना चाहती हैं तो कौलर वाले किसी शर्ट को भी पहनकर एक अलग लुक दे सकती है.

6. स्किनी जीन्स साड़ी ड्रेप

अगर आप कुछ अलग तरह की करना चाहती है तो अपने स्किनी जींस के साथ कंट्रास्ट साड़ी ले और जींस के उपर ड्रैप करें.

7. बेल्ट स्टाइल

नार्मल तरीके से साड़ी पहनने के बाद इसके उपर कमरबंद या बेल्ट का प्रयोग कर नया लुक दें.

8. नैक ड्रैप स्टाइल

इसके लिए साड़ी के पल्लू को गर्दन के चारो तरफ स्कार्फ के रूप में लपेट लें,ऐसी परिधान सर्दी के मौसम में काफी लाभदायक होता है, इस स्टाइल के लिए पल्लू को थोडा लम्बा रखना पड़ता है,इसके अलावा इस स्टाइल में स्कार्फ का भी प्रयोग किया जा सकता है.

9. मुमताज स्टाइल

ये स्टाइल रेट्रो जमाने का है,जिसमें अभिनेत्री मुमताज की फिल्म ‘राम और श्याम’ की साड़ी स्टाइल को कौपी किया जाता है,इसमें साड़ी के कई लेयर्स बनाकर अलग लुक दिया जाता है,ये देखने में आकर्षक होने के साथ-साथ ग्लैमरस भी होती है.

10. फ्रंट पल्लू स्टाइल

इसमें पल्लू को लेफ्ट में लेने के बजाय पीछे से लेकर राईट कंधे पर लिया जाता है.

11. मरमेड स्टाइल

इसमें लोअर पार्ट में प्लीट्स अधिक दिया जाता है, जिसका लुक मरमेड की पूंछ की तरह होता है,इसे पहनना कठिन है,पर अधिक टक्स और प्लीट्स के द्वारा इसे पहना जा सकता है.

12. पैंट स्टाइल

ये आसान,आरामदायक और अधिक फैशनेबल पहनावा नए साल के लिए अधिक उपयुक्त होता है,इसे कोई भी आसानी से कैरी कर सकता है.

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