हाई सोसायटी में भी तलाक लेना अब आम बात हो गई है. ऐसी महिलाएं जो अपने कार्यक्षेत्र में उच्च पदों पर पहुंच चुकी हैं, आर्थिक रूप से काफी सक्षम हैं, वे पारिवारिक बंधनों से मुक्त हो कर आजाद हवा में सांस लेने के लिए उतावली हैं. जहां पैसा है, पावर है वहां तलाक जल्दी और आसानी से मिल जाता है, मगर निम्न और मध्यवर्गीय तबके में तलाक लेना एक मुश्किल, लंबी और खर्चीली प्रक्रिया है.

यह लंबी, तनावपूर्ण और खर्चीली काररवाई पुरुषों पर उतना असर नहीं डालती, जितना स्त्रियों पर बुरा प्रभाव छोड़ती है. तलाक दिलाने का माध्यम बनने वाले वकील का खर्च, तमाम तरह के कानूनी दस्तावेज, बारबार अदालत में पड़ने वाली तारीखें, काउंसलिंग सैशन, घर और बच्चों के छूट जाने का डर स्त्री को बुरी तरह तोड़ देता है.

तारीख पर तारीख

कम पढ़ीलिखी और आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को वकीलों की फौज खूब बेवकूफ बनाती है. वकील के हत्थे चढ़ने के बाद शुरू हो जाता है अदालत में तारीख पर तारीख मिलने का सिलसिला. ज्यादातर पारिवारिक कोर्ट्स में वकील आपस में दोस्त होते हैं. वहां पतिपत्नी तलाक के लिए जिन्हें अपना वकील चुनते हैं, वे आपस में मिल जाते हैं और फिर दोनों पार्टियों से अच्छीखासी धनउगाही करते हैं.

वकीलों की कोशिश यही होती है कि केस लंबा खिंचे ताकि हर पेशी पर उन्हें फीस मिलती रहे. वहीं दस्तावेज तैयार करने के लिए भी वे अपने क्लाइंट से अच्छी धनराशि वसूलते हैं. कम पढ़ीलिखी, कानून की कम जानकार और सीधीसादी औरतें कभीकभी तो ऐसे वकीलों के चक्कर में फंस कर अपना सबकुछ गंवा बैठती हैं.

निशा और उस के पति अमित की शादी को 5 साल हो गए थे. उन का 3 साल का एक बेटा भी था. दोनों के वैवाहिक जीवन में शुरू से ही निशा की मां काफी दखलंदाजी करती थी. बेटी को अपने ससुराल वालों और पति के खिलाफ भड़काती रहती थी. निशा अपनी मां के बहकावे में आ कर अपने बेटे को अपने सासससुर से दूर रखती थी. उन्हें अपने बच्चे के साथ खानेखेलने भी नहीं देती थी. यह बात अमित को बुरी लगती थी और दोनों में अकसर इस बात को ले कर लड़ाई होती थी.

आखिरकार रोजरोज की खटपट से तंग आ कर अमित ने निशा से मुक्ति पाने के लिए तलाक लेने का फैसला कर लिया. उस ने पारिवारिक कोर्ट परिसर में बैठने वाले एक वकील को हायर किया और तलाक का वाद दाखिल कर दिया. निशा को तलाक का नोटिस मिला तो वह भी अपनी मां और भाई के साथ पारिवारिक कोर्ट पहुंची और उस ने भी एक वकील हायर कर लिया.

अमित और निशा के वकील आपस में दोस्त थे. अत: दोनों मिल गए और फिर उन्होंने कोर्ट में तारीख पर तारीख लेनी शुरू कर दी. पारिवारिक कोर्ट में भी दांपत्य रिश्ते को तोड़ने की अपेक्षा मिलाने पर ज्यादा विश्वास किया जाता है लिहाजा, जज ने मामले को काउंसलिंग में भेज दिया. अब काउंसलिंग की तारीखें पड़ने लगीं.

इस दौरान जहां दोनों की जेबों से अच्छीखासी धनराशि वकीलों पर खर्च होने लगी, वहीं निशा को बच्चे को ले कर मायके में भी रहना पड़ा. काउंसलिंग के दौरान उस की मां उस के साथ जाती थी, जो मामले को किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने ही नहीं देती थी. वह निशा के जरीए अमित पर उत्पीड़न का दोष लगवाती थी. निशा अपनी मां और वकील के बीच चकरघिन्नी बनी हुई थी.

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उस की मां जहां तलाक के एवज में निशा को अमित से अच्छीखासी धनराशि दिलवाने की साजिश में लगी हुई थी, वहीं उस का वकील भी इस बात का आश्वासन दे कर निशा  से अच्छीखासी रकम वसूल रहा था. फिर बच्चे की कस्टडी का मुकदमा दोनों ने अलग से फाइल किया. केस को चलते 2 साल बीत गए. इस बीच निशा की सारी जमापूंजी खत्म हो गई, यहां तक कि वकील की फीस, बच्चे की परवरिश और अपने जरूरी खर्चे में उस के सारे गहने भी बिक गए.

4 साल बाद निशा को तलाक तो मिल गया, बच्चे की कस्टडी भी किसी तरह मिल गई, मगर अमित से वह बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त नहीं कर पाई, जो उस के पूरे जीवन को सुचारु रूप से चला सके.

बच्चे को ठीक तरीके से पालने के लिए अब वह महल्ले के एक स्कूल में मिड डे मील बनाने का कार्य करती है. यही नहीं, बच्चे की कस्टडी भले ही निशा के पास हो, मगर कोर्ट ने महीने में 4 दिन पिता को बच्चे से मिलने का अवसर दिया है, जिस के लिए किसी पब्लिक प्लेस पर निशा को बच्चे को ले कर आना होता है, जहां 3-4 घंटे अमित बच्चे के साथ रहता है.

इस के लिए निशा को महीने में 4 दिन काम से छुट्टी लेनी पड़ती है. इस से उस की तनख्वाह कटती है.

निशा वहां अमित को सामने देख पूरा समय असहज रहती है. वह उस दिन को कोसती है जब उस ने मां की बातों में आ कर अमित से अलग होने का फैसला किया था. जबकि अमित उसे हमेशा खुश नजर आता था, बल्कि सच पूछें तो वह खुश ही है, क्योंकि निशा से तलाक लेने के बाद उस के घर में शांति आ गई है. रोजरोज की कलह खत्म हो गई है. निशा की मां और भाई की धमकियों से मुक्ति मिल गई है. निशा और बच्चे पर रोज होने वाला खर्च बचने लगा है. उसे तो हर महीने बस थोड़ा सा मैंटेनैंस का पैसा निशा के बैंक अकाउंट में डलवाना होता है.

महिलाओं की आर्थिक निर्भरता

दरअसल, भारत में ज्यादातर महिलाएं आर्थिक रूप से पुरुष पर ही निर्भर हैं. इसलिए तलाक के बाद उन की समस्याएं बहुत बढ़ जाती हैं. तलाक भावनात्मक स्तर पर महिलाओं को ही ज्यादा चोट पहुंचाता है और फिर उस के आर्थिक परिणाम भी कम गंभीर नहीं होते हैं. इमोशनल ट्रौमा की वजह से कई बार महिलाओं की सोच सही तरह से काम नहीं करती और न ही परिवार वाले उन्हें ठीक से सम झा पाते हैं. इसलिए वे तार्किक ढंग से फैसला नहीं ले पाती हैं और तलाक के बाद कई तरह की परेशानियों में घिर जाती हैं.

रजनी शिवाकांत ने जब अपने पति से शादी के 10 साल बाद अलग होने का फैसला किया, तब उस ने संपत्ति में से अपना हिस्सा नहीं मांगा, जिस पर दोनों का अधिकार था. रजनी वर्किंग वूमन थी और इस बात से ही संतुष्ट थी कि उस के पति ने उस का बेटा उस के पास ही रहने दिया. लिहाजा, रजनी ने उस संपत्ति की ओर देखा भी नहीं, जिस में वह घर भी शामिल था, जिस पर दोनों का बराबर का अधिकार था, क्योंकि घर खरीदने में उस के पति ने अपनी जमापूंजी के साथ उस की बचत के पैसे और उस के तमाम गहने बेच कर भी पैसे लगाए थे.

तब रजनी ने अपने आर्थिक पहलुओं की ओर कोई ध्यान नहीं दिया. लेकिन जब बेटे को ले कर अलग रहने के कारण उस पर भारी आर्थिक बो झ पड़ने लगा, तब उसे यह बात सम झ में आई कि सारी संपत्ति पति के पास छोड़ कर उस ने अच्छा नहीं किया. उसे लगा कि कम से कम वह उस घर में तो अपना हिस्सा मांग लेती जो दोनों ने मिल कर खरीदा था.

कानून के मुताबिक, अगर शादी के बाद कोई भी प्रौपर्टी खरीदी गई है, तो उस पर पत्नी का भी मालिकाना हिस्सा होता है. यह नियम तब भी लागू होता है, जब पत्नी ने एसेट खरीदने में आर्थिक मदद न दी हो. लेकिन रजनी के वकील ने कभी उसे इस बारे में कोई राय नहीं दी. वह तो उसे बस इतना सम झाता रहा कि बच्चा मिल गया है, यही बहुत बड़ी बात है. दरअसल, रजनी का वकील उस के पति के वकील से मिला था. उसे उधर से भी पैसा मिल रहा था. लिहाजा, प्रौपर्टी में हिस्से वाली बात या पति से मैंटेनैंस की मांग की ही नहीं गई.

तलाक के वक्त पति से बच्चे की परवरिश के लिए मुआवजे की मांग न करने के कारण अब रजनी को अपनी कमाई के बूते बच्चे की परवरिश में दिक्कत हो रही है. खासतौर पर तब, जब उसे बच्चे के साथ रहने के लिए अलग से घर किराए पर लेना पड़ा. अगर रजनी ने प्रौपर्टी में अपने हिस्से की मांग की होती, तो वह या तो अपने लिए नया घर खरीद सकती थी या फिर उसे सैटलमैंट के तौर पर पति से एकमुश्त बड़ी रकम मिली होती, जिसे बच्चे के नाम पर फिक्स कर के वह उस की चिंता से मुक्त हो सकती थी.

आसान नहीं प्रक्रिया

भारत में तलाक का प्रोसैस आसान नहीं है. इस में काफी दांवपेंच हैं. कई लूपहोल्स हैं, जो आमतौर पर महिलाओं को सम झ नहीं आते हैं. इसलिए जहां तलाक के लिए अपने अधिकारों और कानून की ठीक जानकारी जरूरी है, वहीं एक अच्छे और ईमानदार वकील की तलाश भी आवश्यक है. ऐसा कठिन निर्णय लेने की घड़ी में महिलाओं का भावनाओं में बहना उन की आगे की जिंदगी के लिए बहुत खतरनाक साबित होता है, इसलिए बहुत सोचसम झ कर कदम उठाने की जरूरत होती है.

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तलाक के मामलों में कोर्ट को भी व्यावहारिक होने की जरूरत है. अदालतों को सोचना चाहिए कि 2 या 10 साल तलाक के मामले चलने पर पतिपत्नी दोनों की जिंदगियां तबाह हो जाती हैं. इतना लंबा वक्त उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी तोड़ देता है.

वकीलों की बदमाशियों और दांवपेंच पर भी कोर्ट को नजर और नियंत्रण रखने की जरूरत है. उसे सोचना चाहिए कि जब 2 व्यक्तियों का दिल आपस में नहीं मिल रहा है, तो साथ रहने का कोई फायदा नहीं है. ऐसे में अगर उन्होंने तलाक का फैसला कर ही लिया है तो उन्हें जल्दी तलाक मिल जाना चाहिए. बेवजह 10-10 साल तक कोर्ट के चक्कर काटते रहने से वे दूसरी शादी करने और जिंदगी को फिर से शुरू करने के बारे में भी नहीं सोच पाते हैं.

भारत में तलाक के बाद पुरुषों की शादी तो 40-45 या 50 की उम्र में भी आसानी से हो जाती है, मगर महिलाओं की दूसरी शादी आसानी से नहीं होती है. ज्यादातर महिलाएं तलाक लेने के बाद पूरा जीवन एकाकी ही व्यतीत करती हैं. ऐसे में अदालतों को चाहिए कि तलाक की प्रक्रिया को एक तय समयसीमा में खत्म कर के दोनों को नई जिंदगी शुरू करने का अवसर प्रदान करें.

आमतौर पर पारिवारिक कोर्ट में तलाक की याचिका दायर करने के बाद अदालत दंपती को अपने रिश्ते को बचाने का एक और मौका देने के लिए 6 माह का समय और सलाह देता है. इन 6 महीनों में दंपती का मन बदल जाए और वे एकदूसरे के साथ रहने के लिए फिर से तैयार हों तो वे तलाक की याचिका वापस ले सकते हैं. लेकिन अगर 6 महीने की अवधि के बाद भी वे एकसाथ रहने के लिए तैयार नहीं हैं तो अदालत उन्हें उन की सुनवाई और जांच के बाद तलाक देती है. इस के बाद वे कानूनी तौर पर अलग हो जाते हैं. यह प्रक्रिया कभीकभी 6 महीने से ले कर 1 साल के भीतर खत्म हो जाती है तो कभीकभी बच्चे, प्रौपर्टी, क्रिमिनल ऐक्टिविटी आदि के कारण 10-10, 12-12 साल तक चलती रहती है.

तलाक के तरीके

देश में तलाक के 2 तरीके हैं- एक आपसी सहमति से तलाक और दूसरा एकतरफा अर्जी लगा कर. आपसी सहमति से तलाक प्राप्त करने की प्रक्रिया थोड़ी आसान है, लेकिन इस में अपने बच्चों की जिंदगी, कस्टडी, प्रौपर्टी जैसे मामलों को उन्हें आपस में निबटाना होता है वरना मामला कोर्ट में लंबा खिंच सकता है. आपसी सहमति में दोनों की राजीखुशी से संबंध खत्म होते हैं. इस में वादविवाद, एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप जैसी बातें नहीं होती हैं. इस वजह से इस बेहद अहम रिश्ते से निकलना अपेक्षाकृत आसान होता है.

आपसी सहमति से तलाक में कुछ खास चीजों का ध्यान रखना होता है. इस में गुजाराभत्ता सब से अहम है. पति या पत्नी में से एक अगर आर्थिक तौर पर दूसरे पर निर्भर है तो तलाक के बाद जीवनयापन के लिए सक्षम साथी को दूसरे को गुजाराभत्ता देना होता है. इस भत्ते की कोई सीमा नहीं होती है. यह दोनों पक्षों की आपसी सम झ और जरूरतों पर निर्भर करता है. इसी तरह से अगर शादी से बच्चे हैं तो उन की कस्टडी भी एक अहम मसला है. चाइल्ड कस्टडी शेयर्ड यानी मिलजुल कर या अलगअलग हो सकती है. कोई एक पेरैंट भी बच्चों को संभालने का जिम्मा ले सकता है, लेकिन दूसरे पेरैंट को उस की आर्थिक मदद करनी होती है.

आसानी से नहीं मिलता रास्ता

तलाक लेने से पहले कई बार सोच लें. तलाक का फैसला लेने के बाद वकील से मिल कर उस का आधार तय करें. जिस वजह से तलाक चाहते हैं उस के पर्याप्त सुबूत आप के पास होने चाहिए. साक्ष्यों की कमी से केस कमजोर हो सकता है और प्रक्रिया ज्यादा मुश्किल और लंबी हो जाएगी.

अर्जी देने के बाद कोर्ट की ओर से दूसरे पक्ष को नोटिस दिया जाता है. इस के बाद अगर दोनों पार्टियां कोर्ट में हाजिर हों तो कोर्ट की ओर से सारा मामला सुन कर पहली कोशिश सुलह की होती है. अगर ऐसा न हो तो कोर्ट में लिखित में बयान देना होता है. लिखित काररवाई के बाद कोर्ट में सुनवाई शुरू होती है. इस में मामले की जटिलता के आधार पर कम या ज्यादा वक्त लग सकता है.

हिंदू विवाह अधिनियम

हिंदुओं में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी इसे इसी रूप में बनाए रखने की चेष्टा की गई है, किंतु विवाह, जो पहले एक पवित्र एवं अटूट बंधन था, अधिनियम के अंतर्गत ऐसा नहीं रह गया है. यह विचारधारा अब शिथिल पड़ गई है. अब यह जन्मजन्मांतर का संबंध अथवा बंधन नहीं रह गया है, बल्कि विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर यह संबंध अधिनियम के अंतर्गत विघटित किया जा सकता है.

भारत की संसद द्वारा 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम पारित हुआ. इसी कालावधि में 3 अन्य महत्त्पूर्ण कानून पारित हुए-हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1955), हिंदू अल्पसंख्यक तथा अभिभावक अधिनियम (1956) और हिंदू ऐडौप्शन और भरणपोषण अधिनियम (1956). ये सभी नियम हिंदुओं की वैधिक परंपराओं को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से लागू किए गए थे. न्यायालयों पर यह वैधानिक कर्तव्य नियत किया गया कि हर वैवाहिक  झगड़े में प्रथम प्रयास सुलह कराने का करें. इस के लिए काउंसलर्स की व्यवस्था की गई. न्यायालयों को इस बात का अधिकार दे दिया गया है कि अवयस्क बच्चों की देखरेख एवं भरणपोषण की व्यवस्था करें.

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अधिनियम की धारा 10 के अनुसार न्यायिक पृथक्करण इन आधारों पर न्यायालय से प्राप्त हो सकता है. 2 वर्ष से अधिक समय से पति पत्नी अलग रह रहे हों, पति या पत्नी एकदूसरे को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताडि़त करे, 1 वर्ष से ज्यादा समय से कुष्ठ रोग हो, 3 वर्ष से अधिक रतिजरोग, विकृतिमन 2 वर्ष तथा परपुरुष अथवा परस्त्री गमन 1 बार में भी.

अधिनियम की धारा 13 के अनुसार, संसर्ग, धर्मपरिवर्तन, पागलपन (3 वर्ष), कुष्ट रोग (3 वर्ष), रतिज रोग (3 वर्ष), संन्यास, मृत्यु निष्कर्ष (7 वर्ष), पर नैयायिक पृथक्करण की डिक्री पास होने के 2 वर्ष बाद तथा दांपत्याधिकार प्रदान करने वाली डिक्री पास होने के 2 साल बाद ‘संबंधविच्छेद’ प्राप्त हो सकता है.

स्त्रियों को निम्न आधारों पर भी संबंधविच्छेद प्राप्त हो सकता है- द्विविवाह, बलात्कार, पुंमैथुन तथा पशुमैथुन. धारा 11 एवं 12 के अंतर्गत न्यायालय ‘विवाहशून्यता’ की घोषणा कर सकता है.

धारा 125 – दंड प्रक्रिया संहिता

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 के अंतर्गत पत्नी अपने पति से भरणपोषण पाने का दावा करती है. इस कानून के कुछ आधार हैं, जो अगर किसी महिला के भरणपोषण के दावे में मौजूद नहीं हैं तो फिर हो सकता है कि पति भरणपोषण देने के दायित्व से मुक्त हो जाए.

भरणपोषण राशि को निश्चित करने के लिए अदालत कई कारणों को ध्यान में रख कर अपना फैसला देती है. इस के अंतर्गत अदालत देखती है-

– भरणपोषण देने और मांगने वाले दोनों की आय और दूसरी संपत्तियां.

– भरणपोषण देने और मांगने वाले दोनों की कमाई के साधन.

– भरणपोषण मांगने वाले की उचित जरूरतें.

– यदि दोनों अलग रह रहे हैं तो उस के उचित कारण.

– भरणपोषण मांगने वाले उचित हकदारों की संख्या.

वह पत्नी भरणपोषण मांगने की हकदार नहीं है, जो परगमन में रह रही हो या वह बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है या आपसी सम झौते से अलग रह रही हो.

अनिल बनाम मिसेज सुनीता के केस में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह कह कर भरणपोषण के आवेदन को खारिज कर दिया था कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के अपने पति से दूर रह रही थी.

पति लेते हैं इस तर्क से प्रतिरक्षा

यदि पत्नी नौकरी कर रही है तो कई बार पति की ओर से यह तर्क  दे कर अपना बचाव किया जाता है कि पत्नी अपने भरणपोषण लायक स्वयं कमा रही है. दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 में भी कहा गया है कि पति उस पत्नी को भरणपोषण देगा जो खुद अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है. अगर पत्नी नौकरी करती है तो भरणपोषण के केस में पति की ओर से यह प्रतिरक्षा आमतौर पर ली जाती है कि पत्नी असमर्थ नहीं है जैसाकि अधिनियम में कहा गया है. यही नहीं, अलग रहने के दौरान बेरोजगार पति अपनी कमाऊ पत्नी से भरणपोषण की मांग कर सकता है.

भरणपोषण के केस में जिस पक्ष के पास पूर्ण तथ्य हैं और अदालत में अगर वे साबित किए जाते हैं तो फैसला उस के पक्ष में हो सकता है.

मुस्लिम  विवाह

मुस्लिम  विवाह (निकाह) मुस्लिम  पर्सनल लौ (शरीयत) के तहत होता है. शिया और सुन्नी समुदायों के लिए कई प्रावधान अलगअलग हैं.

मुस्लिम  विवाह में यह जरूरी है कि एक पक्ष विवाह का प्रस्ताव रखे और दूसरा उसे स्वीकार करे. इसे इजब व कबूल कहते हैं. प्रस्ताव और स्वीकृति लिखित और मौखिक दोनों प्रकार से हो सकती है. हनफी विचारधारा के मुताबिक सुन्नी मुस्लिम  विवाह 2 मुसलमान पुरुष गवाह या 1 पुरुष और 2 स्त्री गवाहों की मौजूदगी में होना जरूरी है. मुस्लिम  विवाह की वैधता के लिए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती है. कोई पुरुष अथवा महिला 15 वर्ष की उम्र होने पर विवाह कर सकती है. 15 साल से कम उम्र का पुरुष या महिला निकाह नहीं कर सकती है.

सुन्नी मुसलमान पुरुष पर दूसरे धर्म की महिला से विवाह करने पर पाबंदी है. लेकिन सुन्नी पुरुष यहूदी अथवा ईसाई महिला से विवाह कर सकता है. लेकिन सुन्नी मुसलमान महिला किसी अन्य धर्म के पुरुष से विवाह नहीं कर सकती है.

शिया मुसलमान गैरमुस्लिम  महिला से अस्थाई ढंग से विवाह कर सकता है, जिसे मुक्ता कहते हैं. शिया महिला गैरमुसलमान पुरुष से किसी भी ढंग से विवाह नहीं कर सकती है. वर्जित नजदीकी रिश्तों में निकाह नहीं हो सकता है.

मुस्लिम  पुरुष अपनी मां या दादी से, अपनी बेटी या पोती से, अपनी बहन से, अपनी भानजी, भतीजी, पोती या नातिन से, अपनी बूआ या चाची या पिता की बूआ या चाची से, मुंह बोली मां या बेटी से, अपनी पत्नी के पूर्वज या वंशज से शादी नहीं कर सकता है.

चाइल्ड मैरिज रेस्ट्रेन ऐक्ट 1929 के अंतर्गत 21 वर्ष से कम आयु के लड़के तथा 18 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह संपन्न कराना अपराध है. इस निषेध के भंग होने का भी मुस्लिम  विवाह की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं है.

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मुस्लिम  विवाह में तलाक

मुस्लिम  तलाक की 2 विधियां हैं – तलाकएसुन्ना (मान्य विधि) और तलाकउलबिद्दत (अमान्य विधि).

तलाकएसुन्ना (मान्य विधि)- अहसन पद्धति में पति 2ऋतुकालों (मासिकधर्म के बीच) की अवधि तुहर के बीच 1 बार तलाक देता है और इद्दत (तलाक के बाद के करीब 3 महीनों की अवधि) में पत्नी से शारीरिक संबंध नहीं बनाता है, तो इद्दत की अवधि खत्म होने पर तलाक हो जाता है.

हसन पद्धति में पति 3 तुहरों के दौरान 3 बार तलाक देने के अपने इरादे की घोषणा करता है और पत्नी से शारीरिक संबंध नहीं बनाता है तो तीसरी बार तलाक कहने के उपरांत विवाह विच्छेद हो जाता है.

तलाकउलबिद्दत (अमान्य विधि)- इस विधि में पति एक ही तुहर में मैं तुम्हें 3 बार तलाक देता हूं या 3 बार ‘मैं तुम्हें तलाक देता हूं’ कह कर तलाक दे सकता था. इस विधि को अब समाप्त कर इसे दंडनीय अपराध घोषित किया जा चुका है.

खुला- (पत्नी की ओर से तलाक) के द्वारा मुस्लिम  पत्नी अपने पति को तलाक दे सकती है. इस के लिए शर्त यह है कि पत्नी को पति से जो मेहर (इवद) मिली है, वह उसे लौटा दे. मुस्लिम  पत्नी अपने पति की रजामंदी से तलाक हासिल कर सकती है. मुस्लिम  पत्नी कुछ प्रतिफल के बदले भी तलाक हासिल कर सकती है. भविष्य में किसी घटना के होने या न होने की स्थिति में भी दंपती तलाक के लिए रजामंद हो सकते हैं.

स्पैशल मैरिज एक्ट

इस ऐक्ट के तहत किसी भी धर्म के लोग आपस में शादी के बंधन में बंध सकते हैं और इस के लिए उन्हें अपना धर्म बदलने की जरूरत नहीं है. दोनों का अपनाअपना धर्म शादी के बाद भी कायम रहता है. शादी चाहे किसी भी तरीके से हो, शादी के बाद पत्नी को तमाम कानूनी अधिकार मिल जाते हैं.

अगर लड़का और लड़की दोनों पहले से शादीशुदा न हों, दोनों बालिग हों और आपसी सहमति देने लायक मानसिक स्थिति में हों, तो वे स्पैशल मैरिज ऐक्ट 1954 के तहत शादी कर सकते हैं.

स्पैशल मैरिज ऐक्ट के तहत विदेशी लोग भी भारतीय लोगों से शादी कर सकते हैं. इस के लिए दोनों को इलाके के एडीएम औफिस में शादी की अर्जी दाखिल करनी होती है. इस अर्जी के साथ उम्र का सर्टिफिकेट लगता है और साथ ही यह ऐफिडैविट देना होता है कि दोनों बालिग हैं. दोनों की फिजिकल वैरिफिकेशन कर उन्हें 1 महीने बाद आने के लिए कहा जाता है.

इस दौरान नोटिस बोर्ड पर उन के बारे में सूचना चिपकाई जाती है अगर किसी को आपत्ति है तो बताए. नोटिस पीरियड के बाद गवाहों के सामने मैरिज रजिस्ट्रार उन से शपथ दिलवाते हैं और फिर शादी का सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है.

कैसे देते हैं तलाक की अर्जी

आपसी सहमति से तलाक की अपील तभी संभव है जब पतिपत्नी सालभर से अलगअलग रह रहे हों. पहले दोनों ही पक्षों को कोर्ट में याचिका दायर करनी होती है. दूसरे चरण में दोनों पक्षों के अलगअलग बयान लिए जाते हैं और दस्तखत की औपचारिकता होती है. तीसरे चरण में कोर्ट दोनों को 6 महीने का वक्त देता है ताकि वे अपने फैसले को ले कर दोबारा सोच सकें. कई बार इसी दौरान मेल हो जाता है और घर दोबारा बस जाता है. 6 महीने के बाद दोनों पक्षों को फिर से कोर्ट में बुलाया जाता है. इसी दौरान फैसला बदल जाए तो अलग तरह की औपचारिकताएं होती हैं. आखिरी चरण में कोर्ट अपना फैसला सुनाता है और रिश्ते के खात्मे पर कानूनी मुहर लग जाती है.

स्पैशल मैरिज ऐक्ट की जरूरी बातें

वर और वधू क्रमश: 21 और 18 वर्ष के होने चाहिए और मानसिक रूप से स्वस्थ होने चाहिए.

– समान या अलग धर्मो के प्रेमी इस ऐक्ट के तहत शादी कर सकते हैं और इस के लिए उन्हें अपना धर्म बदलने की आवश्यकता नहीं है.

– यह शादी कोर्ट में सब डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) या ऐडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा संपन्न कराई जाती है.

– इस ऐक्ट के तहत शादी कराने के लिए कोई पंडित, मौलवी या पादरी अथवा किसी धर्मग्रंथ की जरूरत नहीं पड़ती.

– इस के तहत विवाह के वक्त 3 गवाहों का होना अनिवार्य है.

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