लेखिका – भव्या डोरे
Koneru Humpy: कोनेरू हम्पी ने अपने कंधों पर डाली हुई धारीदार स्लेटी जैकेट को जरा सा कस लिया. सामने रखे शतरंज के क्रीम रंग के मुहरों को उन्होंने विधिवत ढंग से व्यवस्थित किया. उन की प्रतिद्वंद्वी महाराष्ट्र की 19 वर्षीय प्रतिभाशाली दिव्या देशमुख अपनी घुमावदार कुरसी पर हलके से झूलती हुई इंतजार कर रही थीं. दिव्या टाइमर सैट करने के लिए आगे बढ़ीं. दोनों महिलाओं ने एकदूसरे से हाथ मिलाया.

जुलाई, 2025 में जार्जिया अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ के महिला विश्व कप की मेजबानी कर रहा था. पहली बार 2 भारतीय खिलाड़ी फाइनल में आमनेसामने थीं. 3 दिनों तक लगातार बराबरी के मुकाबलों के बाद हम्पी और दिव्या आखिरी बार आमनेसामने भिड़ीं थीं.

मैच शुरू हुआ. हम्पी ने क्वीन्स गैम्बिट  खेला. उन्होंने रानी के सामने रखे प्यादे को आगे बढ़ाया, एक ऐसी चाल जो बोर्ड के केंद्र पर नियंत्रण बनाने की कोशिश थी. लगभग 15 मिनट में दिव्या ने उन्हें मात दे दी. भारत की पहली और सब से वरिष्ठ महिला ग्रैंडमास्टर ने भारत की नवीनतम और सब से युवा ग्रैंडमास्टर के खिलाफ आखिरी मैच में गलती कर दी थी.

2 महीने बाद विजयवाड़ा स्थित अपने घर में मुझ से बात करते हुए 38 वर्षीय हम्पी ने उस हार पर विचार किया. इस दौरान उन्होंने एक साधारण सफेद कुरता और छोटी बिंदी लगाई हुई थी. पीछे एक हलके रंग का परदा लहरा रहा था.

‘‘निश्चित रूप से यह एक कठिन और चुनौतीपूर्ण मुकाबला था,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘इस स्तर पर बने रहने के लिए आप को युवाओं के खिलाफ संघर्ष करना पड़ता है क्योंकि उन के पास बहुत ऊर्जा होती है, वे हमारी पीढ़ी की तुलना में अधिक तैयार और बेहतर प्रशिक्षित हैं.’’

तजरबे की झलक

हम्पी की बातों में 3 दशक से ज्यादा के तजरबे की झलक है. उन्होंने 1993 में प्रतिस्पर्धात्मक शतरंज खेलना शुरू किया था. तब वे लगभग 6 वर्ष की थीं. उस के 3 साल बाद उन्होंने अपना पहला राष्ट्रीय खिताब जीता. उस के बाद उन्होंने इस खेल की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक के रूप में अपनी पहचान बनाई. 2002 में अपने 15वें जन्मदिन के सिर्फ 1 महीने बाद हम्पी भारत की पहली महिला ग्रैंडमास्टर बनीं. उस समय दुनिया की सब से युवा ग्रैंडमास्टर. 2003 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार मिला जो देश के शीर्ष खेल सम्मानों में से एक है. 2007 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया जो देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है. तब मैं अपने चरम पर थी उन्होंने कहा, ‘‘निश्चित रूप से मेरा चरम अब पीछे छूट चुका है.’’

2014 में हम्पी ने दसरी अन्वेश से विवाह किया. वे प्रशिक्षण से इलैक्ट्रिकल इंजीनियर हैं और एक उद्योगपति के बेटे. 2 साल बाद गर्भावस्था के कठिन समय में हम्पी ने शतरंज की बिसात से दूरी बना ली.

भले ही हम्पी ने कुछ समय के लिए अपनी रफ्तार कम की हो, उन की कहानी किसी अधूरे रह गए कैरियर की नहीं है. यह संतुलित सधे धैर्य की है. 2018 में शतरंज में अपनी वापसी के बाद उन्होंने कई बड़ी हारों का सामना किया है और मेहनत से मिली जीतों का जश्न भी मनाया है. एक समय ऐसा भी आया जब वे चेस को लगभग छोड़ने वाली थीं.

‘‘मैं तो छोड़ने का सोच ही रही थी क्योंकि मैं केवल शतरंज नहीं खेलना चाहती हूं अगर मैं पर्याप्त प्रतियोगी नहीं हूं या फिर सफल नहीं हूं. अगर में खेल रही हूं तो फिर मुझे कुछ हासिल करना होगा, किसी के लिए प्रेरणा बनना ही होगा,’’ उन्होंने मुझ से कहा.

‘‘हालांकि मां बनने से हम्पी की प्राथमिकताओं का विस्तार हुआ है लेकिन खेल के प्रति उन का समर्पण अभी भी बना हुआ है. अब वे अपने कैरियर के दूसरे पड़ाव में हैं. अनुभव और आत्मविश्वास से भरी हुईं.’’

विश्व चैंपियन

पिछले कुछ वर्षों में हम्पी ने प्रभावशाली जीतें हासिल की हैं, जिन में महिलाओं के रैपिड शतरंज में विश्व चैंपियन का खिताब शामिल है. यह खेल का एक तेज गति वाला प्रारूप है. यह खिताब उन्होंने 2019 और 2024 में 2 बार जीता. उन के अलावा सिर्फ एक और महिला हैं जिन्होंने 2 बार यह खिताब जीता है. 2008 के बाद हम्पी  की रैंकिंग शीर्ष 5 से नीचे कभी नहीं गई.

न्यूज पब्लिकेशन हम्पी की वापसी का वर्णन करने के लिए अकसर अतिशयोक्ति भरे सनसनीखेज शब्दों का सहारा लेते हैं. सनसनीखेज, प्रेरणादायक, चकित कर देने वाला. लेकिन उन की उपलब्धियों को परिस्थितियों से अलग कर के नहीं देखा जा सकता.

‘‘ज्यादातर मामलों में बच्चों के पालनपोषण की जिम्मेदारी और मानसिक श्रम मां के हिस्से ही आता है और पेशेवर रूप से काम करते हुए ऐसा करने का मतलब होता है एक साथ कई काम करना.’’

पत्रकार जेनिया डी कुन्हा ने स्पोर्ट्स पब्लिकेशन ईएसपीएन के लिए गए एक लेख में कहा, ‘‘2 बार की विश्व चैंपियन बनते हुए ऐसा करना? इस के लिए जबरदस्त जुझारूपन की जरूरत पड़ती है.’’

पहले हम्पी किसी मैच में ड्रा करने वाली होती तो वे ‘जीतने के लिए जरूरत से ज्यादा जोर लगातीं,’ वे याद करती हैं. लेकिन जब वे खेल में वापस लौटीं, ‘‘मुझे अपनी ताकत समझ में आई, कहां दबाव डालना है और कहां रुकना है,’’ वे बताती हैं, ‘‘इस ब्रेक ने मेरी शतरंज को एक नए दृष्टिकोण से देखने में मदद की. मैं पूरी तरह से तरोताजा थी, मेरा दिमाग बिलकुल साफ था.’’

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ओएनजीसी के कर्मचारी और दोहा एशियन गेम्स के गोल्ड मैडल विजेता दिल्ली में (जनवरी 2007), कोनेरू हम्पी ने 2006 में ओएनजीसी जॉइन किया. Pic : PRAKASH SINGH/AFP/Getty Images

मेहनत से बनाई पहचान

हम्पी के पिता अशोक कोनेरू अपनी बेटी को हमेशा से किसी खेल से जोड़ना चाहते थे. उन्होंने अपने पिता से टैनिस और शतरंज सीखा था. वे इंडियन ऐक्सप्रैस की एक कहानी में बताते हैं कि 90 के दशक की शुरुआत में जब हम्पी बड़ी हो रही थी, 2 बहनें वीनस और सेरेना विलियम्स वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त कर रही थीं. अशोक के लिए उन का उभार टेनिस की महिमा और पुरस्कार दोनों की संभावना का प्रमाण था.

‘‘इसीलिए मैं चाहता था कि वह (हम्पी) टैनिस खेले,’’ वे इंडियन ऐक्सप्रैस को बताते हैं. लेकिन, ‘‘जब मैं खेल का अध्ययन कर रहा था, हम्पी शतरंज की तरफ आकर्षित हो गई,’’ अशोक ने कहा, ‘‘तब मैं ने हम्पी से मेरे पिता को हराने के लिए कहा. वे क्लब स्तर के शतरंज खिलाड़ी थे, महज 8 साल की उम्र में उस ने उन्हें हरा दिया. उस के बाद मैं ने उस के खिलाफ खेलना शुरू किया. मैं टूरनामैंट स्तर का खिलाड़ी था. 11 साल की उम्र में वह मुझे भी हराने में सक्षम थी.’’

हम्पी ने जल्द ही घर से बाहर भी अपनी पहचान स्थापित कर ली. शतरंज खेलना शुरू करने के कुछ समय बाद ही उन्हें जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में भी सफलता मिली. इसी बीच अशोक ने भी अप्लाइड साइंस के प्रोफैसर की नौकरी छोड़ दी ताकि वे हम्पी को पूर्णकालिक रूप से प्रशिक्षित कर सकें और उन के साथ टूरनामैंट्स के लिए होने वाली यात्राओं में उन के साथ जा सकें.

मैनुअल एरान फ्रंटलाइन पत्रिका के लिए 1998 के एक लेख में बताते हैं, ‘‘हम्पी एक गंभीर श्रोता और कम बोलने वाली बच्ची है, लेकिन जब बात शतरंज के वैरिएशन को ले कर हो तो वह खुल कर बात करती है.’’

मैनुअल भारत के पहले अंतर्राष्ट्रीय मास्टर थे, जिन का चैन्नई की समृद्ध शतरंज संस्कृति की नींव रखने में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है. हालांकि हम्पी केवल 10 वर्ष की थी, लेकिन बहुत धैर्य के साथ खेलती थी. मैनुअल ने टिप्पणी की, ‘‘वह कभी जल्दबाजी में आक्रमण नहीं करती. पहले वह अपने मुहरों से बिसात बिछाती है और जब समय सही होता है तब वार करती है.’’

इस समय तक हम्पी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रही थीं. पत्रकार सूजन निनान ने ईएसपीएन में लिखा कि उन के पिता का यह फैसला कि वे हम्पी को किशोरावस्था की शुरुआत से ही लड़कों के टूरनामैंट में दाखिला दिलाएंगे. इस ने हम्पी को तेजी से आगे बढ़ने में मदद की. शतरंज उन गिनेचुने खेलों में से एक है जहां पुरुष और महिलाएं एक ही टूरनामैंट में एकदूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं.

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कोनेरू हम्पी ने अपनी स्ट्रैंथ को समझ कर यह सीखा कि कहां जोर लगाना है और कहां रुक जाना है. Pic : K Bhaskar/The The India Today Group/Getty Images

आत्मविश्वास को मजबूती

हम्पी ‘‘अंडर-12 लड़कों के एशियाई टूरनामैंट 1999 में इकलौती लड़की थीं, जिसे उन्होंने जीता था. अगले साल उन्होंने अंडर-14 लड़कों का टूरनामैंट जीता,’’ सूजन ने लिखा.

इन जीतों से हम्पी के आत्मविश्वास को मजबूती मिली. उस दौर में उन्हें लगता था कि बिसात पर सच में उन की टक्कर की महिला प्रतिद्वंद्वियां बहुत कम हैं.

‘‘मुझे महिला प्रतियोगिता में जीतने की बजाय पुरुषों के खिलाफ जीतने पर ज्यादा आत्मविश्वास महसूस होता था,’’ हम्पी ने मुझ से कहा, ‘‘मुझे ऐसा करने से अधिक खुशी मिलती थी क्योंकि मैं कहीं ज्यादा कठिन प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ खेल रही थी.’’

हम्पी का रास्ता स्पष्ट था. उन्होंने शतरंज के अलावा कभी किसी दूसरे कैरियर के बारे में सोचा भी नहीं. कभी स्कूल पूरा नहीं किया, कभी सामान्य बचपन का अनुभव नहीं किया. लेकिन उन्हें इस का कोई पछतावा नहीं है.

‘‘अगर मैं सफल नहीं होती तो शायद मुझे ऐसा महसूस होता, लेकिन चूंकि मैं ने सफलता देखी है और दुनिया के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की है, मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ,’’ वे कहती हैं.

लैंगिक भेदभाव ने हम्पी के उभार की धार को कुछ धीमा किया. 2002 में भारत की पहली महिला ग्रैंडमास्टर का खिताब हासिल करने के तुरंत बाद वे एक ऐसे दौर में पहुंच गईं जिसे वे दु:स्वप्न जैसा कहती हैं. पुरुष खिलाडि़यों ने उन की आलोचना की और क्षमताओं को कम आंका. उन्होंने याद किया.

तब वे 15 वर्ष की थी, ‘‘उस के बाद कुछ प्रतियोगिताओं में मुझे सफलता नहीं मिली,’’ हम्पी ने मुझ से कहा.

साल 2003 में हम्पी ने नागपुर में होने वाली एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में क्वालिफायर स्तर की श्रेणी में भाग लेने का निर्णय लिया, जबकि वे अपनेआप ही उच्च श्रेणी में प्रवेश कर सकती थीं. वे अपने आलोचकों को चुप कराना चाहती थीं. बताया जाता है कि उन्होंने करीब 300 पुरुष खिलाडि़यों के समूह में प्रतिस्पर्धा की. उन्होंने याद किया कि अंतिम

और सब से अहम बाजियों में से एक के दौरान देखने वालों की भीड़ उमड़ आई थी. हम्पी के प्रतिद्वंद्वी ने मैच को ड्रा पर समाप्त करने की पेशकश की, लेकिन वे अड़ी रहीं. यह मैच वे जीतना चाहती थीं.

‘‘बाद में मैं एक बहुत बुरी स्थिति में पहुंच गई थी, जहां से वह प्रतिद्वंद्वी मुझे मात दे सकता था,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘लेकिन अंत में किसी तरह मैं ने वह मैच जीत लिया. वह टूरनामैंट में दूसरे स्थान पर रही. मुझे लगता है उस के बाद से अब तक मुझे आलोचना का सामना नहीं करना पड़ा है,’’ वे हंसती हैं.

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कोनेरू के पिता अशोक ने जहां अपनी जौब छोड़ कर उन्हें कोचिंग देना शुरू किया, वहां उन की मां लता उन्हें प्रोत्साहित करती रहीं. Photo by K Bhaskar/The The India Today Group / Getty Images

चुनौतियां भी कम न थीं

अन्य चुनौतियां भी थीं जैसे प्रायोजकों की कमी. शुरुआत में बैंक औफ बड़ौदा ने लगभग 6-7 वर्षों तक हम्पी को प्रायोजित किया था, उन्होंने याद किया. लेकिन अचानक ही सब रुक गया. ठीक उसी समय जब 2002 में वे ग्रैंडमास्टर बनी थीं.

‘‘मेरी जगह उन्होंने एक क्रिकेटर को ब्रैंड ऐंबैसेडर रख लिया,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘तो उन सालों में कोई स्पौंसरशिप नहीं थी.’’

अशोक सहायता के लिए कौरपोरेट को लगातार पत्र लिखते, लेकिन बदले में मिलती एक शालीन चुप्पी, उन्होंने एक समाचार रिपोर्ट में याद किया.

2006 तक हम्पी ने ‘औयल ऐंड नैचुरल गैस कौरपोरेशन’ (ओएनजीसी) में एक पर्सनल ऐडमिनिस्ट्रेटर की नौकरी कर ली. उन्हें प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए जाने की अनुमति थी, बस शर्त यह थी कि वे इस के लिए शीर्ष प्रबंधन को सूचित करेंगी.

इसी बीच हम्पी ने लगातार मेहनत जारी रखी. अक्तूबर, 2007 में उन्होंने ईएलओ रेटिंग सिस्टम में 2,606 के आंकड़े को भी छुआ. यह आंकड़ा शतरंज खिलाड़ी की मजबूती को उस के प्रतिद्वंद्वी से मुकाबले में प्रदर्शन के आधार पर मापा जाता है. हम्पी से पहले केवल एक महिला ने 2,600 की सीमा को पार किया था. उसी साल अशोक को द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला, जो उत्कृष्ट खेल प्रशिक्षकों को सम्मानित करने के लिए दिया जाता है. 2009 में हम्पी ने अपने कैरियर के अब तक के सब से ऊंचे ईलो रेटिंग 2,623 का आंकड़ा हासिल किया.

2009 में हम्पी ने महिला ग्रैंड प्रिक्स प्रतियोगिता भी जीती. यह अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ द्वारा आयोजित टूरनामैंटों की एक शृंखला है. कोनेरू हम्पी ने भारतीय महिला शतरंज के लिए वही काम किया है जो सानिया मिर्जा ने भारतीय महिला टैनिस और साइना नेहवाल ने भारतीय महिला बैडमिंटन के लिए किया है.

न्यू इंडियन ऐक्सप्रैस की एक रिपोर्ट में हम्पी  की प्रशंसा करते हुए लिखा गया कि वे लगातार मानकों को ऊंचा और ऊंचा करती जा रही हैं.

2014 में हम्पी ने अन्वेश से शादी के ठीक बाद यात्रा की हनीमून के लिए नहीं बल्कि शारजाह में होने वाले महिला ग्रैंड प्रिक्स में खेलने के लिए.

हम्पी भले ही टैनिस नहीं खेलीं लेकिन उन का सानिया मिर्जा और सेरेना विलियम्स से एक सा?ा पहलू था- तीनों ने मातृत्व के बीच कमाल की वापसी की.

खेल और परिवार

शतरंज का खेल अपने खिलाडि़यों से उतनी शारीरिक मांग नहीं करता जितनी कि कई अन्य खेल करते हैं. लेकिन फिर भी किसी भी पेशे की तरह ब्रेक एक खिलाड़ी की प्रतिस्पर्धात्मक धार धीमी कर सकता है. इसलिए हरकोई जल्दी और अपनी शर्तों पर वापसी नहीं कर पाता. गर्भावस्था के दौरान हम्पी ने शतरंज से दूरी बना ली. वे प्रसवपूर्व जटिलताओं से जू?ा रही थीं और डाक्टरों ने भी 5वें महीने के बाद बैड रैस्ट की सलाह दी.

‘‘मैं शतरंज देखने के लिए भी बहुत उत्सुक नहीं थी. मैं परिवार के साथ आराम करते हुए समय बिताना चाहती थी,’’ उन्होंने याद किया, ‘‘मुझे उस का कोई पछतावा नहीं है. मैं उस समय को बहुत खुशनुमा समय के रूप में याद करती हूं.’’

जहां हम्पी के लिए यह सिर्फ एक विराम था, खेल से कोई बड़ी दूरी नहीं. वे जानती थीं कि वे वापस लौटेंगी. बस यह पता नहीं था कि कब. 2017 में बेटी आहना के जन्म के तुरंत बाद निमंत्रण आने शुरू हो गए. लेकिन हम्पी तैयार नहीं थीं. 2018 में जब उन की बेटी लगभग 1 साल की थी, उन्होंने खेल में वापस लौटने के लिए सावधानीपूर्ण कदम उठाए.

‘‘यह सबकुछ एकदूसरे के सहयोग पर निर्भर करता है,’’ हम्पी ने मुझ से कहा, ‘‘मैं बहुत खुश हूं कि मेरे मातापिता भी उसी शहर में रहते हैं जहां मैं हूं. मेरे पति भी बहुत सहयोगी हैं. सहयोग की भावना के बिना बच्चे को छोड़ कर किसी भी पेशे में वापस लौट पाना मुश्किल होता है क्योंकि एक मां के तौर पर आप को यह महसूस होना चाहिए कि आप का बच्चा सुरक्षित और सहज है.’’

हम्पी की मां लता ने भले ही कभी शतरंज न खेला हो लेकिन वे अच्छी तरह जानती थीं कि उन की बेटी के लिए इस खेल के क्या माने हैं.

‘‘मेरी मां हमेशा मेरे कैरियर पर नजर रखती हैं और मुझे प्रोत्साहित करती रहती हैं,’’ हम्पी ने खेल पत्रिका स्पोर्ट स्टार से कहा, ‘‘वे यह सुनिश्चित करती हैं कि मैं अपने खेल पर पर्याप्त समय दे पाऊं. शादी के बाद मुझे खाना बनाने और घर के दूसरे कामों में काफी समय देना पड़ता था लेकिन वे मुझे लगातार याद दिलाती रहती हैं कि यह सब मेरी प्रैक्टिस की कीमत पर न हो.’’

किसी भी टूरनामैंट के लिए अकसर 15 से 20 दिनों तक की यात्रा करनी पड़ती है. जब हम्पी यात्रा पर जाती थीं तो उन के मातापिता आहना की देखभाल करते थे. शुरूशुरू में यह दूरी मुश्किल होती थी. हम्पी जब वापल लौटती थीं तो आहना कई दिनों तक उन से ही लिपटी रहती थी. लेकिन अब यह दूरी कुछ हद तक सहज हो गई है. वे बारबार फोन काल या छोटीछोटी चीजें के जरीए इस फासले को दूर कर लेती हैं.

महत्त्वपूर्ण मुकाम

हम्पी ने अपनी वापसी के लिए 2018 के चेस ओलिंपियाड को चुना जोकि अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ द्वारा हर 2 साल में आयोजित कराई जाने वाली एक टीम प्रतियोगिता है. यह फैसला उन्हें इसलिए सही लगा क्योंकि इस में वे भारत का प्रतिनिधित्व करने जा रही थीं. प्रतियोगिता से 1 महीना पहले ही उन्होंने अभ्यास शुरू कर दिया ताकि अपनी प्रतिस्पर्धात्मक धार वापस पा सकें. लेकिन टीम का प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा. भारत कुल मिला कर 8वें स्थान पर रहा.

उसी साल नवंबर में हुए एक और टूरनामैंट में हम्पी दूसरे दौर से ही बाहर हो गईं. परिणाम प्रभावशाली नहीं थे, उन्होंने बताया. लेकिन 2019 में हम्पी फिर से अपनी लय में वापस आने लगीं. सितंबर में उन्होंने रूस के स्कोल्कोवो में आयोजित ‘वूमंस ग्रैंड प्रिक्स’ में जीत हासिल की. कुछ महीनों बाद मोनाको में हुए अगले ग्रैंड प्रिक्स इवेंट में उन्होंने रजत पदक हासिल किया. इन प्रतियोगिताओं में जीतने वाले खिलाडि़यों को उच्च स्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए क्वालिफाई करने का मौका मिलता है.

साल के अंत में हम्पी ने अपने कैरियर का एक महत्त्वपूर्ण मुकाम हासिल किया. उन्होंने पहली बार ‘वूमंस वर्ल्ड रैपिड चेस चैंपियनशिप’ का खिताब जीता. जीतों का सिलसिला जारी रहा. फरवरी, 2020 में हम्पी ने कैरन्स कप का खिताब जीता, जिसे दुनिया की सब से ज्यादा प्रतिस्पर्धी महिला शतरंज प्रतियोगिताओं में से एक माना जाता है.

मातृत्व ने हम्पी को सिर्फ एक नया नजरिया ही नहीं दिया बल्कि परिस्थितियों के हिसाब से उन की ढलने की क्षमता को और ज्यादा मजबूत किया.

‘‘पहले जब मैं किसी अलग टाइम जोन में जाती थी तब मु?ो ठीक से नींद नहीं आती थी, जिस का असर मेरे खेल पर तुरंत दिखाई पड़ता था,’’ उन्होंने बताया, ‘‘लेकिन मां बनने के बाद मैं इन चीजों की आदी हो गई हूं.’’

हम्पी की ही तरह उन का खेल भी एक नई ऊंचाई पर पहुंचा. पिछले 5 सालों में शतरंज की लोकप्रियता दुनियाभर में तेजी से बढ़ी है.

रूस और चीन का दबदबा

शतरंज के इस अप्रत्याशित उभार का एक सिरा जुड़ता है कोविड-19 महामारी से. जब लोग अपने घरों में कैद थे और बाहरी दुनिया से कटे हुए थे, तब उन्होंने औनलाइन शतरंज में सुकून और मानसिक राहत पाई. इस की लोकप्रियता को और बढ़ावा दिया लोकप्रिय संस्कृति के एक तत्त्व ने. अक्तूबर, 2020 में नैटफ्लिक्स पर ‘द क्वीन्स गैम्बिट’ नामक एक सीरीज रिलीज हुई जो एक युवा प्रतिभाशाली महिला शतरंज खिलाड़ी की उथलपुथल भरी यात्रा पर आधारित थी. रिपोर्टों के अनुसार, इस सीरीज को 1 महीने के भीतर 62 मिलियन घरों में देखा गया. तब से ले कर अप्रैल 2022 तक दुनिया के सब से बड़े औनलाइन शतरंज समुदाय चेस.कौम के मासिक उपयोगकर्ताओं की संख्या 8 मिलियन से बढ़ कर लगभग 17 मिलियन तक पहुंच गई.

भारत में एक तीसरा प्रेरक कारक भी काम कर रहा था. यह देश अब उस खेल में उभर रहा था, जिस पर पारंपरिक रूप से रूस और चीन का दबदबा रहा था. 2009 में भारत में कुल 20 ग्रैंडमास्टर थे. इस साल नवंबर तक यह संख्या बढ़ कर 91 तक पहुंच गई. पिछले वर्ष भारत की महिला और पुरुष दोनों टीमों ने शतरंज ओलिंपियाड में ऐतिहासिक रूप से पहली बार स्वर्ण पदक जीते. अक्तूबर, 2025 तक दुनिया के शीर्ष 100 खिलाडि़यों में 12 भारतीय थे, वहीं शीर्ष 100 महिला खिलाडि़यों में 7 भारतीय थीं.

इस का मतलब यह भी है कि आज के उभरते शतरंज खिलाड़ी असाधारण प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं.

‘‘मेरे समय से तुलना करें तो अब 14 या 15 साल की उम्र ही किसी भी खिलाड़ी का शिखर माना जाता है,’’ हम्पी कहती हैं, ‘‘अगर आप 12 या 13 साल की उम्र तक ग्रैंडमास्टर नहीं बनते हैं तो आप इसे पेशेवर कैरियर के तौर पर नहीं ले सकते.’’

परिणामस्वरूप कम उम्र के खिलाड़ी अधिक तेज और बेहतर तैयारी के साथ आते हैं. उन्हें अभ्यास के लिए पहले से ज्यादा अवसर उपलब्ध हैं. चाहे वे टूरनामैंट हों या औनलाइन प्रतियोगिताएं.

‘‘निश्चित रूप से युवा खिलाडि़यों के पास ज्यादा ज्ञान और तैयारी होती है क्योंकि वे शतरंज पर ज्यादा समय बिताते हैं,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘वे मु?ा से ज्यादा खेल रहे हैं, इसलिए उन के साथ प्रतिस्पर्धा करना काफी चुनौतीपूर्ण है.’’

वे मानती हैं कि उन का अनुभव ही उन की सब से बड़ी ताकत है. वर्षों तक तराशी हुई समझ और खेल पर गहरी पकड़.

हम्पी कहती हैं कि वे अब चयनात्मक हो गई हैं और पहले की तुलना में कम टूरनामैंट खेलती हैं. उन की प्राथमिकता वे प्रतियोगिताएं हैं जो उन्हें विश्व चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई करने में मदद करें. वे देर रात तक चलने वाले औनलाइन टूरनामैंट्स से भी बचती हैं.

जोखिम भी कम नहीं

हम्पी ने 2024 में लगभग 8 टूरनामैंट खेले. इस साल अब तक उन्होंने 5 टूरनामैंट खेले हैं और कुछ और बाकी हैं. वहीं युवा खिलाड़ी आमतौर पर एक ही अवधि में दर्जनभर टूरनामैंट खेलते हैं. अब वे ओपन सर्किट से भी दूर हो चुकी हैं, जिस में पुरुष और महिला दोनों खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं.

हालांकि हम्पी ने पुरुषों और महिलाओं के खेलने के तरीकों में कुछ अंतर जरूर बताए लेकिन उन्होंने इन फर्कों को ताकत के रूप में देखा.

‘‘महिलाएं जो खेलती हैं, उस में बहुत चयनात्मक होती हैं खासकर ओपनिंग्स में लेकिन जो भी वे खेलती हैं, उस के लिए वे बहुत गहराई से और अच्छी तरह तैयार होती हैं,’’ उन्होंने कहा, ‘‘वहीं पुरुष खिलाडि़यों का ओपनिंग रेपर्टौयर कहीं ज्यादा व्यापक होता है लेकिन वे ज्यादा जोखिम भी लेते हैं.’’

आज महिलाओं का शतरंज भी पहले की तुलना में ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो गया है. इस का दर्शक वर्ग भी पहले से कहीं ज्यादा बड़ा है. इतिहास में सब से ज्यादा देखे गए 5 महिला मैचों में से 4 तो पिछले 2 साल में ही खेले गए. लेकिन अभी भी बहुत कम टूरनामैंट ऐसे हैं, जहां पुरुषों और महिलाओं के लिए पुरस्कार राशि समान हो. उदाहरण के लिए इंटरनैशनल चेस फेडरेशन (स्नढ्ढष्ठश्व) ने जार्जिया में हुई महिला विश्वकप की विजेता के लिए 50 हजार डौलर की पुरस्कार राशि रखी थी, जबकि ओपन कैटेगरी जहां पुरुष और महिला दोनों खेलते हैं के विजेता के लिए 1 लाख, 20 हजार डौलर का पुरस्कार तय किया गया था.

पहले की तुलना अलग रख दें तो अब स्थिति काफी बेहतर है,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘हमारे पास आमंत्रित टूरनामैंट नहीं होते थे और इनाम राशि भी अच्छी नहीं थी. 5 या 6 हजार यूरो को ही अच्छा माना जाता था,’’ उन्होंने याद किया, ‘‘आज आमंत्रित महिला टूरनामैंट में 30 से 40 हजार यूरो सामान्य हैं. इस हिसाब से सुधार हुआ है. लेकिन पुरुष खिलाडि़यों की तुलना में यह काफी कम है.’’

बुरा वक्त भी रहा

पिछले वर्ष हम्पी काफी बुरे दौर से गुजरीं. नार्वे में एक टूरनामैंट में उन्होंने अंतिम से दूसरे स्थान पर अपना सफर समाप्त किया और जल्द ही अगले टूरनामैंट में भी हार गईं. क्या यह अंत की शुरुआत थी? मायूस हो कर, उन्होंने अपने पति और मातापिता से कहा कि वे अब खेल छोड़ने को तैयार हैं. लेकिन यह निर्णय उन्हें सही नहीं लगा.

‘‘किसी न किसी समय हर खिलाड़ी नीचे आता ही है और उसे खेल से बाहर होना पड़ता है,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘मैं सोच रही थी कि मैं अपनी पूरी क्षमता कैसे दिखा सकती हूं और इस हालात से खुद को कैसे बाहर निकाल सकती हूं.’’

दिसंबर, 2024 में जब हम्पी ने न्यूयौर्क में महिला विश्व रैपिड शतरंज चैंपियनशिप में भाग लिया, तब उन्हें खिताब की मजबूत दावेदार नहीं माना जा रहा था. हालांकि वे 2019 में यह खिताब जीत चुकी थीं. वे अपना पहला मैच हार गईं. लेकिन फिर कुछ बदला. उन्होंने अगले 3 मैच ड्रा किए और 7 मैच जीते.

आखिरी राउंड से पहले हम्पी और अन्य 6 फाइनलिस्ट के अंक समान थे. फाइनल मुकाबले में हम्पी ने इंडोनेशियाई खिलाड़ी आइरीन सुकंदर को हराया और सभी प्रतिस्पर्धी खिलाडि़यों में सब से ज्यादा अंक हासिल किए. इस जीत ने उन का नजरिया बदल दिया.

‘‘इस ने मुझे दोबारा शतरंज खेलने के लिए प्रेरित किया और मुझे लगा कि मैं फिर से खेलना चाहती हूं,’’ वे याद करती हैं.

अपनी वापसी के 7 वर्षों बाद हम्पी शायद और अधिक विचारशील हो गई हैं लेकिन जीतने की भूख अभी भी उतनी ही तीव्र है. हार का दर्द लंबे समय तक बना रहता है. शतरंज के मुहरे पैक हो जाने के बाद भी.

‘‘यह मेरे साथ तब तक रहता है जब तक मैं फिर से नहीं जीत जाती,’’ हम्पी ने हंसते हुए कहा, ‘‘कुछ मैच ऐसे हैं जो मुझे अभी तक परेशान करते हैं यहां तक कि 2011 के पुराने खेल भी.

‘‘यह आसान नहीं है. मैं अभी भी सीख रही हूं कि इसे कैसे संभालना है,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘लेकिन संयोग से अपने परिवार और बेटी के कारण घर लौटते ही मैं आराम महसूस करती हूं. जब मैं घर होती हूं तो पूरी तरह उन के साथ होती हूं और जब मैं खेल में होती हूं तो इस दूसरी दुनिया को पूरी तरह बंद कर देती हूं.’’

समय मिलने पर क्या करती हैं?

घर पर हम्पी की कार्यक्रम काफी लचीला है. उन की दिनचर्या में लगभग 1 घंटा शारीरिक गतिविधियों जैसे जौगिंग या योग और 5-6 घंटे शतरंज का अभ्यास शामिल है. यह तब है जब पास में अगर कोई प्रतियोगिता आने वाली हो.

‘‘लेकिन जब कोई टूरनामैंट नहीं होता तो मैं बहुत सख्त नहीं रहती,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘अगर मुझे समय मिलता है तो मैं देखती हूं वरना प्राथमिकता अपनी बेटी के साथ समय बिताने की होती है.’’

आहना उस उम्र से बड़ी हो गई है जब उन की मां ने शतरंज खेलना शुरू किया था लेकिन अब तक आहना ने इस खेल में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

हम्पी शतरंज के बाहर भी खुशी तलाशती हैं. वे फिल्में देखती हैं, परिवार के साथ समय बिताती हैं, ध्यान करती हैं और बोर्ड गेम खेलती हैं. ‘द क्वीन्स गैम्बिट’ जिस में सफेद मुहरे वाला खिलाड़ी क्वीन का प्यादा दो घर आगे बढ़ा कर केंद्र पर नियंत्रण करता है. एक ऐसी रणनीति है जिसे हम्पी अकसर इस्तेमाल करती हैं जैसे उन्होंने जार्जिया में दिव्या के खिलाफ मैच में किया था. लेकिन उन्होंने नैटफ्लिक्स की यह सीरीज नहीं देखी है.

‘‘मैं सीरीज देखने की शौकीन नहीं हूं क्योंकि एक बार शुरू कर दूं तो मुझे इस की लत पड़ जाती है,’’ हम्पी ने मुझ से कहा.

अगर कभी उन की अपनी कहानी स्क्रीन पर दिखाई जाए तो वे बौलीवुड अभिनेत्री तापसी पन्नू को अपना किरदार निभाते हुए देखना पसंद करेंगी.

इस वर्ष दिसंबर में हम्पी ग्लोबल चेस लीग और वर्ल्ड रैपिड और ब्लिट्ज चैंपियनशिप में खेलेंगी. रिटायरमैंट अभी उन की योजना में नहीं है. वे एक समय सोचती थीं कि अपनी बेटी के 10 साल की उम्र में खेल छोड़ देंगी. यह अहम मोड़ अब 2 साल दूर है. हम्पी के रुकने या धीरे होने का कोई संकेत नहीं दिखता है.

‘‘अगर आप का टूरनामैंट खराब रहा या आप अपने सब से खराब प्रदर्शन पर खेल रहे हैं लेकिन आप सिर्फ एक मैच जीतते हैं तो भी आप को वापस आने और अपनी ताकत दिखाने की ललक रहती है,’’ हम्पी ने कहा, ‘‘एक जीत यह दिखाती है कि आप अभी भी जीतने में सक्षम हैं. मुझे लगता है कि यही मुझे खेल के प्रति प्रेरित रखता है.’’

Koneru Humpy

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