Movie Ticket Price: सिनेमा टिकट महंगे हैं, बहुत महंगे हैं, साथ में पौपकौर्न भी महंगे हैं, बहुत महंगे हैं. मुसीबत यह है कि आप सिनेमाहाल में अपने साथ अपना खाना भी नहीं ले जा सकते. फिर फिल्म इंडस्ट्री रोना रोती है कि चंद फिल्मों के अलावा बाकी सब को भारी नुकसान सहना पड़ता है और सरकार से दुहाई करती है कि सिनेमा उद्योग को टैक्सों, रैगुलेशनों से राहत भी दे और कुछ सब्सिडी भी दे.
कर्नाटक में सरकार ने कर्नाटक सिनेमा (रैगुलेशन अमैंडमैंट) एक्ट 2025 के अंतर्गत 200 रुपए का मैक्सीमम टिकट प्राइस तय कर दिया तो मल्टीप्लैक्स ऐसोसिएशन औफ इंडिया ने कनार्टक हाई कोर्ट में रिट पेश की, जिस से उसे स्टे मिल गया और यह राहत दर्शकों को नहीं मिली है. अब मामला अपीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट में है जहां स्टे को रखते हुए जजों ने कहा कि महंगा टिकट, महंगा पानी, महंगे पौपकौर्न सिनेमा इंडस्ट्री को मार डालेंगे, यह रैगुलेशन एक्ट नहीं. सिनेमा मालिकों का कहना था कि महंगे टिकट लोगों की चौइस है, वे चाहें तो फिल्म न देखें पर सिनेमा इंडस्ट्री को टैक्स देते हुए पैसा कमाने का मौलिक हक है.
असल में तो इंडस्ट्री पर जो भारीभरकम टैक्स लगा है वह हमेशा से फिल्मों को चूसता रहा है. इस पर टैक्स केवल क्राउड मैनेजमैंट का लगना चाहिए और वह भी लोकल पुलिस द्वारा. अतिरिक्त पुलिस फोर्स लगाने के लिए बाकी किसी को फूलतीफलती इंडस्ट्री को दोहने का कोई हक नहीं है.
फिल्म इंडस्ट्री प्योर ऐंटरटेनमैंट के लिए नहीं है, मदारी का तमाशा नहीं है. फिल्म का माध्यम किताबों की तरह एक सशक्त मीडियम, कुछ अलग कहने का है. दक्षिण में तो स्टार्स को भगवान की तरह पूजा जाता रहा है क्योंकि उन्होंने परदे पर आम आदमी की भावनाएं पेश की हैं. जो काम राजा राम नहीं कर पाए थे वे एनटी रामाराव, एमजी रामचंद्रन, जयललिता, विजय ने किया है. इस पर सरकारी कंट्रोल अपनेआप में गलत है.
एक फिल्म बनाना बहुत महंगा और पेचीदा काम है. इस में सैकड़ों लोग लगते हैं. मंच पर किए जाने वाले नाटकों से कहीं ज्यादा लंबा समय लगता है. नईनई तकनीक से सिनेमा महंगा हो रहा है और उसे न अपनाओ तो पिछड़ जाने का डर रहता है. इस की कीमत तो दर्शकों को देनी होगी पर सरकारें ऐंटरटेनमैंट टैक्स या जीएसटी या स्क्रीन सेस के नाम पर भरपूर कमाई करे यह अन्याय है. जनता पर सिनेमा मालिकों का टिकट महंगा करना या पौपकौर्न 500 के करना नहीं.
यह लूट ईर्ष्या की प्रतीक है. नेता और बाबू से ज्यादा पौपुलर कोई हो यह चिढ़ की निशानी है. दर्शकों को अपना फैसला करने दो. असल में तो सिनेमा इंडस्ट्री को बिना फिल्म की जांच किए सपोर्ट करना सरकार का काम है क्योंकि यह अभिव्यक्ति का मामला है. इस पर सैंसर बोर्ड बैठाना या टिकट के दाम तय करना नहीं.
Movie Ticket Price
