सोशल मीडिया आजकल युवाओं के लिए आपस में बातचीत करने, नई चीजें सीखने, अपनी राय बनाने और दुनिया को समझने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बन चुका है. इस में सोचने वाली बात यह है कि सोशल मीडिया का प्रयोग आज के यूथ हर परिस्थिति में करने लगे हैं, जिस में सही जानकारी का अभाव होता है और भावनाएं क्रीऐट की जाती हैं, जो वास्तविकता से कोसों दूर होती है, जिसे समझ लेना जरूरी है.
मुंबई की फोर्टिस अस्पताल के क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट दीक्षा अथवानी कहती हैं कि सोशल मीडिया के एल्गोरिदम की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है. सोशल मीडिया प्लेटफौर्म ऐसे कंटेंट को बारबार दिखाने के लिए बनाए गए हैं, जो लोगों का ध्यान ज्यादा समय तक बनाए रखती है. अगर कोई युवा बारबार डर, विवाद, शरीर की बनावट, अपराध या किसी अन्य भावनात्मक विषय से जुड़े वीडियो देखता है, तो उसे उसी तरह का और कंटेंट दिखाया जाता है. इस से धीरेधीरे उस व्यक्ति के अंदर दुनिया को देखने का नजरिया वास्तविकता से अलग हो सकता है।
मसलन, अगर कोई किशोर हिंसा से जुड़े कई वीडियो लगातार देखता है, तो उसे लग सकता है कि ऐसी घटनाएं हर जगह हो रही हैं, जबकि वास्तव में ये घटनाएं समाज की पूरी तसवीर का केवल एक छोटा हिस्सा ही होता है.
नकारात्मक प्रभाव
लगातार निगेटिव या इमोशनल कंटेंट देखने से व्यक्ति के मूड पर काफी असर पड़ता है, चिंता बढ़ सकती है और पहले से मौजूद डर और मजबूत हो सकते हैं. इतना ही नहीं, सोशल मीडिया लोगों को लगातार दूसरों से अपनी तुलना करने के लिए भी प्रेरित करता है.
इसलिए अधिकतर युवा अपने रूपरंग, दोस्तों, उपलब्धियों या जीवनशैली की तुलना दूसरों की उन तसवीरों और वीडियो से करने लगते हैं, जिन्हें उन्होंने सोचसमझ कर सोशल मीडिया पर साझा किया है, जैसे कोई छात्र अगर अपने दोस्तों को लगातार छुट्टियों, पढ़ाई में सफलता या सामाजिक कार्यक्रमों की तसवीरें पोस्ट करते देखता है, तो उसे लग सकता है कि बाकी सभी उस से बेहतर जीवन जी रहे हैं, जबकि असल में वह अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की तुलना किसी और की जिंदगी के सिर्फ चुने हुए अच्छे पलों से करा रहा होता है.
क्या कहती है रिसर्च
हालांकि, यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाला हर युवा मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का सामना करेगा. शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध काफी जटिल है. इस का असर इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस तरह का कंटेंट देख रहा है. सोशल मीडिया का इस्तेमाल किस तरीके से कर रहा है, उस की व्यक्तिगत परिस्थितियां क्या हैं और उस के वास्तविक जीवन में रिश्ते और सामाजिक जुड़ाव कैसे हैं क्योंकि सोशल मीडिया पर किसी बात को बारबार देखने से हमारा दिमाग उसे सच मानने लगता है, जिसे इल्यूसूरी ट्रुथ इफैक्ट (Illusory Truth Effect) कहते हैं. इस से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कमजोर होती है, मानसिक थकान बढ़ती है और बारबार वही विचार आने से तनाव या बेचैनी होने लगती है.
वैज्ञानिक रूप से जब आप कोई न्यूज पढ़ते, सुनते या देखते हैं, तो आप का मस्तिष्क सेंसरी रिसेप्टर्स, इलैक्ट्रिकल सिग्नल्स और न्यूरोट्रांसमिटर्स के एक जटिल नेटवर्क के जरीए उस जानकारी को प्रोसेस करता है. इस तरह से यह पूरी प्रक्रिया मुख्य रूप से 4 चरणों में पूरी होती है.
भारत में सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से होने वाले साइबर अपराधों में लगातार भारी उछाल देखा जा रहा है. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और ‘भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र’ (I4सी) की नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, देश में दर्ज होने वाले कुल साइबर अपराधों में से एक बहुत बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स (जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सऐप) के जरीए अंजाम दिया जा रहा है.
यूथ की संख्या अधिक
सोशल मीडिया अपराधों को अंजाम देने वाले अपराधियों में सब से बड़ी संख्या युवाओं खासकर 18 से 30 वर्ष के व्यक्तियों की है, लेकिन डिजिटल अरेस्ट और बड़े संगठित घोटालों के पीछे वयस्क और पेशेवर अपराधी सक्रिय होते है.
गंभीर और संगठित वित्तीय अपराधों को वयस्क संचालित करते हैं, जबकि तकनीक की समझ रखने वाले युवा इस के मुहरे या छोटे स्तर के अपराधी बनते हैं.
इतना ही नहीं, सोशल मीडिया की अधिकतर जानकारी हकीकत नहीं होती है, जिसे यूथ सही मान लेते हैं, मसलन युवा सोशल मीडिया पर स्वास्थ्य से जुड़े दावे, सैलिब्रिटीज के बारे में अफवाहें, राजनीतिक विचार या सनसनीखेज खबरें छोटे वीडियो और पोस्ट के जरीए देखते हैं। जब ऐसी जानकारी पूरे विश्वास के साथ और बारबार सामने आती है, तो बिना जांचे भी वह सच लगने लगती है.
पढ़ने पर जोर देना जरूरी
मनोवैज्ञानिक दीक्षा आगे कहती हैं कि मातापिता की भूमिका यहां महत्त्वपूर्ण है। बच्चों से सिर्फ यह कि फोन रख दो, इतने रील्स मत देखो कहने के बजाय पेरैंट्स उन से इस बारे में बात कर सकते हैं कि वे सोशल मीडिया पर क्या देख रहे हैं. अगर बच्चा कहता है कि सब लोग कह रहे हैं कि यह सच है, तो मातापिता जवाब दे सकते हैं कि चलो देखते हैं कि यह जानकारी आई कहां से है.
इस तरह रोजमर्रा के सोशल मीडिया इस्तेमाल को बच्चों में खुद सोचने और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने के अवसर में बदला जा सकता है.
इतना ही नहीं यूथ को पढ़ने पर जोर देना चाहिए, ताकि सोशल मीडिया पर सिर्फ एक तरह का कंटेंट देखने के बजाय अलगअलग तरह की जानकारी पढ़ें और समझें.
किताबें, अखबार, पत्रिकाएं, जो विश्वसनीय और विस्तार से लिखे गए होते हैं, उन्हें पढ़ने से दिमाग को एक अलग तरह से सोचने का मौका मिलता है. इस से लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बेहतर हो सकती है, किसी विषय को उस के पूरे संदर्भ में समझने में मदद मिलती है और अलगअलग विचारों को जानने का अवसर मिलता है.
एक आसान शुरुआत यह हो सकती है कि हर दिन 15 से 20 मिनट सोशल मीडिया से अलग कुछ पढ़ने की आदत बनाई जाए और धीरेधीरे इस समय को बढ़ाया जाए.
इस प्रकार सोशल मीडिया आज की तारीख में एक समस्या बन कर उभर रही है, जिसे न तो बंद किया जा सकता है और न ही इसे कम किया जा सकता है, ऐसे में जरूरी है कि देखने से अधिक पढ़ने पर ध्यान केंद्रित युवाओं को करना चाहिए, ताकि वे खुद समझ सकें कि क्या सही और क्या गलत है.
