मालिनी के कारण आर्यन से दूर होगी Imlie, लीप के बाद आएंगे नए ट्विस्ट

सीरियल इमली (Imlie) की कहानी में हाल ही में मालिनी यानी एक्ट्रेस मयूरी देशमुख की एंट्री हुई थी, जिसके चलते फैंस काफी खुश थे. वहीं अब शो का नया प्रोमो शेयर करते हुए सीरियल में लीप के बाद (Imlie Serial Leap) आने वाले अपकमिंग ट्विस्ट की झलक दिखा दी है, जिसके बाद फैंस काफी एक्साइटेड नजर आ रहे हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

आर्यन से दूर होगी इमली

अब तक आपने देखा कि मालिनी के प्लान के चलते इमली का एक्सीडेंट हो जाता है और उसके बच्चे की मौत हो जाती है, जिसके कारण आर्यन टूट जाता है. इसी के चलते अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि बच्चे की मौत का जिम्मेदार आर्यन, इमली को ठहराएगा, जिसके कारण दोनों के बीच लड़ाई होगी और आर्यन गुस्से में इमली को उसे छोड़ने के लिए कहेगा.

5 साल का आएगा लीप

 

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इमली के आर्यन से दूर होने के बाद सीरियल के मेकर्स 5 साल का लीप लेने वाले हैं, जिसका प्रोमो रिलीज हो चुका है. दरअसल, प्रोमो में इमली एक स्टिंग औपरेशन पर जाती दिख रही है, जिसमें एक छोटी सी बच्ची चीनी उसका साथ देती दिख रही है. वहीं खबरों की मानें तो इमली, मालिनी और आदित्य की बच्ची को मां बनकर पालेगी.

आर्यन की जिंदगी में होगी मालिनी की एंट्री

गलतफहमियों के कारण जहां आर्यन और इमली के बीच दूरियां बढ़ जाएंगी तो वहीं मालिनी इस बात का फायदा उठाती दिखेगी. खबरों की मानें तो इमली के चले जाने के बाद मालिनी, आर्यन की जिंदगी में आएगी और उसके साथ रहेगी. वहीं अनु यानी मालिनी की मां सुधर जाएगी.

बता दें, इमली के किरदार में नजर आने वाली एक्ट्रेस सुंबुल तौकीर खान (Sumbul Tauqeer Khan) 19 साल की हैं और वहीं सीरियल में वह 5 साल की चीनी की मां का किरदार निभाने वाली हैं, जिसके चलते फैंस काफी एक्साइटेड नजर आ रहे हैं.

हर कलाकार के लिए वच्र्युअल फार्मेट में शूटिंग करना फायदेमंद है- अक्षय ओबेराय

मूलतः भारतीय मगर अमरीका में जन्में व पले बढ़े अक्षय ओबेराय को 12 वर्ष की उम्र में ही अभिनय का शौक हो गया था. उन्होने अमरीका में रहते हुए एक फिल्म ‘‘अमरीकन चाय’’ में बाल कलाकार के रूप में अभिनय भी किया था. उन्होने अमरीका में रहते हुए अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण भी लिया. मगर अभिनय के क्षेत्र मे कैरियर बनाने के लिए वह अमरीका से मुंबई आ गए. उन्हे सबसे पहले सूरज बड़जात्या ने ‘राजश्री प्रोडक्शन’ की फिल्म ‘‘इसी लाइफ में’’ में लीड किरदार निभाने का अवसर दिया. अफसोस इस फिल्म ेने बाक्स आफिस पर पानी तक नही मांगा,जिसके चलते उनका संघर्ष लंबा ख्ंिाच गया. इसके बाद फिल्म ‘पिज्जा’ ने थोड़ी सी पहचान दिलायी. लेकिन शंकर रमण निर्देशित फिल्म ‘‘गुड़गांव’’ में नगेटिब किरदार निभाकर उन्होंने कलाकार के तौर पर बौलीवुड मेंं अपनी पहचान बनायी. उसके बाद उनका कैरियर हिचकोले लेते हुए लगातार आगे बढ़ता रहा. मगर ओटीटी प्लेटफार्म तो उनके लिए जीवन दायी साबित हुए. अब वह काफी व्यस्त हो गए हैं. इन दिनों भारत की पहली वच्र्युअल फिल्म ‘‘जुदा हो के भी ’’ को लेकर चर्चा में हैं. विक्रम भट्ट निर्देशित यह फिल्म 15 जुलाई को सिनेमाघरों में पहुॅची है.

प्रस्तुत है अक्षय ओबेराय से हुई बातचीत के अंश. . .

आपकी परवरिश अमरीका में हुई. आपने अभिनय का प्रशिक्षण भी अमरीका में ही लिया. फिर वहां पर फिल्मों में अभिनय करने की बनिस्बत आपने अभिनय को कैरियर बनाने के लिए बौलीवुड को क्यों चुना?

-देखिए,आप अच्छी तरह से जानते है कि मेरी जड़ें भारत में ही हैं. मेरे माता पिता काफी पहले अमरीका में सेटल होे गए थे और मेरा जन्म वहीं पर हुआ. मगर जब मैं बारह वर्ष का था,तभी से घर पर व स्कूल में अभिनय किया करता था. बॉलीवुड फिल्में बहुत देखता था. लेकिन मैं यह देख रहा था कि वहां की फिल्मों में स्क्रीन पर जो कलाकार नजर आ रहे थे,वह सभी गोरे लोग थे. मैं तो उनकी तरह दिखता नहीं था. मेरे घर का रहन सहन व भाषा सब कुछ पूरी तरह से भारतीय ही रहा. मेेरे माता पिता अस्सी के दशक में भारत से अमरीका गए थे,मगर वह भारतीय कल्चर को भी अपने साथ ले गए.  अमरीका में भी हमारे घर पर पूरी तरह से हिंदी भाषा और भारतीय कल्चर ही रहा.  और हिंदी फिल्में ही देखते थे. इसलिए अमरीकन की तरह सोच मेरे दिमाग में कभी आयी ही नहीं. मुझे लगा कि मेरे लिए हिंदी सिनेमा ही बेहतर रहेगा. इसलिए मैं मुंबई चला आया. बॉलीवुड में काम करते हुए मुझे दस वर्ष हो गए. मुझे लगता है कि यह मेरा सही निर्णय रहा. वहां रहकर शायद मैं उतना तो काम न कर पाता, जितना यहां कर पाया. यहां जितने विविधतापूर्ण किरदार निभाए,वह भी शायद वहां पर निभाने को न मिलते. मैने यहां पर फिल्म के अलावा ओटीटी प्लेटफार्म पर भी काफी अच्छा काम करने का अवसर पाया. शायद इस तरह का विविधतापूर्ण काम करने अवसर मुझे हालीवुड में न मिलता.

आपने 2010 में ‘राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म ‘‘इसी लाइफ में’’ से अपने अभिनय कैरियर की शुरूआत की थी. तब से अब तक के कैरियर को आप किस तरह से देखते हैं?

-मैं हमेशा अपने आपको ‘अभिनेता’ मानता था और मानता हूं. ‘ ‘स्टार ’ शब्द से मैं कभी इत्तफाक नहीं रखता. मैने ‘स्टार’ शब्द के पीछे कभी नहीं भागा. जैसा कि आपने भी कहा मैंने अमरीका में अभिनय की विधिवत शिक्षा ली. भारत आने के बाद मैने मकरंद देशपंाडे के साथ थिएटर किया. मेरी रूचि हमेशा अभिनय में रही. मेरी अब तक की अभिनय यात्रा में काफीउतार चढ़ाव रहे. मैेने असफलताएं भी काफी देखीं. इन सारी चीजों ने मुझे एक ‘अभिनेता’ बनाया है. कोई अभिनेता के तौर पर पैदा नही होता. अभिनेता को तराशा जाता है. हमें लगातार किरदारांे ंपर काम करना पड़ता है. अपनी संवाद अदायगी पर काम करना होता है. मसलन- एक डाक्टर अपने पहले आपरेशन में कुछ कमाल नही कर पाया होगा,पर बाद में वह दिग्गज सर्जन बनता है. यही बात अभिनय के क्षेत्र में भी लागू होती है. आप जितनी मेहनत करोगे, भाषा,संवाद अदायगी, चरित्र चित्रण, इमोशंस पर जितना काम करोगे,उतना ही बेहतरीन कलाकार बनते जाओगे. तो मुझे भी काम बहुत मिला. कुछ ऐसा बॉक्स आफिस पर उम्दा धमाल नही हुआ है. लेकिन उम्मीद है कि बहुत जल्द बाक्स आफिस पर धमाल भी होगा. मगर अब तक इन सारी चीजों ने मुझे मैच खेलने के लिए तैयार किया. इतने विविधातपूर्ण किरदार निभाने और इतना काम करने के बाद मैं महसूस करता हूं कि अब मैं अगले स्तर के लिए तैयार हूं.

आप अब तक के कैरियर में टर्निंग प्वाइंट्स क्या मानते हैं?

-शुरूआती तौर पर सूरज बड़जात्या जी ने मुझे फिल्म ‘इसी लाइफ में ’ लांच किया था,मगर फिल्म सफल नही हुई थी. सही मायनों में मेरा पहला टर्निंग प्वाइंट फिल्म ‘गुड़गांव’ रही. दूसरा टर्निंग प्वाइंट ‘पिज्जा’ रहा. ‘गुड़गांव’ को लोग कल्ट फिल्म मानते हैं. इस फिल्म को पत्रकारिता के स्कूल में पढ़ाया जा रहा है. मेरी परवरिश अलग माहौल में हुई. मेरे चेहरे के नयन नक्श भी कुछ अलग प्रकार के हैं. फिर भी फिल्म ‘गुड़गांव’ के शंकर रमण ने मुझे क विलेन के तौर पर देखा. इसके लिए मुझे हरियाणवी भाषा के लहजे को सीखना व पकड़ना पड़ा था. फिल्म ‘गुड़गांव’ के प्रदर्शन के बाद अचानक लोगों को मुझसे आपेक्षाएं होने लगी. लोगांे को अहसास हुआ कि इस बंदे में दम है. क्योकि इस फिल्म में मैंने जिस तरह का किरदार निभाया है,उसके ठीक विपरीत मैं निजी जीवन में नजर आता हूं और अलग तरह से ही बात करता हूं. इस फिल्म को कई फिल्मकारों ने देखा और मेरे अभिनय की तारीफ भी की. खैर,अब तो यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर मौजूद है और अब तो इसे काफी दर्शक मिल चुके हैं. फिर सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट ओटीटी प्लेटफार्म रहा. मैने ओटीटी पर ‘ईलीगल’, ‘इनसाइड एज’ और ‘हाई ’ तक हर वेब सीरीज के लिए प्रशंसा ही पायी. ओटीटी प्लेटफार्म से ही मुझे दर्शक मिले. पहले फिल्म इंडस्ट्ी के अंदर के लोग मुझे अच्छा कलाकार बताया करते थे. मगर ओटीटी के चलते अब आम दर्शक भी मुझे अच्छा एक्टर मानने लगा हैं. तो मैं अपने कैरियर में ‘गुड़गांव’ और ओटीटी इन दो को महत्वपूर्ण टर्निंग प्वाइंट मानता हूं.

आपकी कुछ फिल्मों की असफलता की वजह भी रही कि उन्हें ठीक से प्रमोट नहीं किया गया और उन्हे ठीक से रिलीज भी नहीं किया गया?

-आपने एकदम सही कहा. आप काफी लंबे समय से फिल्म पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं. आपको काफी अनुभव है. इसनिए आपका आकलन गलत तो नहीं हो सकता. सच तो यही है कि मुझे नही याद कि मेरी एक भी फिल्म ढंग से रिलीज हुई है. हर शुक्रवार को जब मेरी फिल्म रिलीज होती थी,तो पता ही नही चलता था कि मेरी फिल्म भी रिलीज हो रही है. पर जब फिल्म को अच्छे रिव्यू मिलते थे,तब कुछ चर्चा होती थी. अब तो खैर काफी प्लेटफार्म आ गए हैं. ‘गुड़गांव’,‘लाल रंग’, ‘कालाकांडी’ सहित मेरी कई अच्छी फिल्में रही हैं,जिनका न ठीक से प्रमोशन हुआ और न ही इन्हें ठीक से रिलीज किया गया. मेरी फिल्म की मार्केटिग का कभी भी बडा बजट नहीं रहा. इसे आप तकदीर भी कह सकते हो कि फिल्में ठीक ठाक रहीं.

माना कि ओटीटी पर आपको कलाकार के तौर पर अच्छी पहचान मिली,मगर वहां भी आप ठीक से प्रमोट नहीं हो पा रहे हैं?

-शायद यह मेरी भी कमजोरी है. मैं हमेशा काम,किरदार,कहानी,फिल्म पर फोकश करता हूं. रचनात्मक रूप से बहुत ज्यादा सचेत रहता हूं. काफी मेहनत करता हूं. पर अपने आपको बेचने में उतनी मेहनत नहीं करता. मैं सोशल मीडिया का भी शेर नही हूं. सोशल मीडिया का किंग नहीं हूं. मुझे सोशल मीडिया पर खुद को बनाए रखना भी नहीं आता. मैं फिल्मी पार्टियों में भी नही जाता. कुछ लोग ऐसे हैं जो कि मंदिर जाते हैं,तो वहां की सेल्फी लेकर पत्रकार को फोन करते हैं कि भाई इसे छपवा दे. मेरा दिमाग इस दिशा में जाता ही नहीं है. तो यह मेरी अपनी कमजोरी है. जबकि हर कलाकार को खुद को बेचना आना चाहिए. हम जानते हंै कि जो दिखता है,वही बिकता है. मुझे हमेशा लगता है कि मेरा काम बात करेगा और ऐसा होता है. लेकिन इसमें वक्त लगता है. मैने इस बात को अब अहसास किया कि दस वर्षों से अध्कि समय तक काम करने के बाद ओटीटी के चलते मुझे पहचान मिली. अब मैं जब सड़कों पर जाता हूं,तो लोग मुझे पहचानते हैं. अब लोग मुझसे एअरपोर्ट पर सेल्फी मांगने लगे हैं. मैने यह सब खुद को बेचकर नही खरीदा है. बल्कि मेरा काम बोल रहा है. यह मेरी अपनी मेहनत का परिणाम है. लेकिन यह समझ में आया कि मेहनत के बल पर इतना ही मिलेगा. स्टारडम के स्तर पर जाने के लिए आपको अपनी मार्केटिंग भी करनी पड़ेगी. यह मेरी कमजोरी है कि मैं सही ढंग से प्रमोट नही हो पाया,पर अब मैं इस पर भी ध्यान दॅंूगा.

वच्र्युअल फार्मेट पर पहली बार विक्रम भट्ट ने फिल्म ‘‘जुदा होके भी ’’बनायी है, जिसमें आप लीड किरदार में हैं. आपने इस फिल्म का हिस्सा बनना क्या सोचकर स्वीकार किया?

-मैने इस फिल्म से जुड़ना वच्र्युअल तकनीक के कारण स्वीकार नहीं किया. वच्र्युअल बहुत अलग तकनीक है. इससे सिनेमा में इजाफा ही होगा. मैने ‘जुदा होके भी’ को करने के लिए हामी भरी उसकी अलग वजह रही है. मैने अब तक जितनी भी फिल्में की या वेब सीरीज की,उन्हे अधिकांशतः शहरी दर्शकों ने ही देखा है. अति बुद्धिमान समझे जाने वाले दर्शको ने देखा है. ‘लाल रंग’ या ‘गुड़गांव’ जैसी फिल्में देश के कुछ हिस्से में ही चली. मसलन हरियाणा में चली. मैने अब तक हार्ट लाइन की एक भी फिल्म नही की. जब तक आप हार्टलाइन यानी कि देश के दिल की फिल्में नहीं करेंगे,तब तक लोगों के दिलों तक नहीं पहुंच सकते. और हार्ट लाइन की फिल्में बनाना भट्ट कैंप से बेहतर कोई नही जानता. भट्ट कैंप बहुत अच्छी तरह से समझते हैं कि हार्ट लाइन में किस तरह की फिल्में देखी जाती हैं. जब महेश भट्ट साहब और विक्रम भट्ट जी मेरे पास इस फिल्म का आफर लेकर आए थे,तो मैने उनसे साफ साफ कहा था कि आपको मेरे साथ जिस तरह की भी फिल्म बनानी है,बनाएं,क्योंकि मुझे उन दर्शकांे की तरफ फोकश करना है,जो वफादार है. या सिंगल थिएटर के जो दर्शक हैं  या जिन्हे आप हार्ट लाइन दर्शक कह लें.

आपके अनुसार फिल्म ‘‘जुदा हो के भी ’’ क्या है?

-यह वूंडेड यानी कि घायल लोगांे की कहानी है. उसने बहुत दर्द झेला है. इसमें मेरे किरदार अमन की कहानी है. जो बहुत बड़ा फिल्म स्टार रह चुका है. अब वह स्टार नही है. अब दिन भर दारू पीता है. उसने अपना बच्चा खोया हुआ है यानी कि जब उसका बेटा चार पांच वर्ष का था,तब उसकी मौत हो गयी थी. वह उसका दुःख लेकर जी रहा है. फिर कोई युवक उसकी बीबी को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है और अमन अपनी बीबी की खोज में जाता है. फिल्म की शुरूआत में अमन सब कुछ खो चुका है. फिर धीरे धीरे उसे जो कुछ पाना है,उसकी चुनौती को स्वीकार कर अंततः पा लेता है. तो इस फिल्म में अमन की कए लड़ाई है. अमन की एक यात्रा है.

आपने अमन के किरदार के साथ न्याय करने के लिए कोई होमवर्क किया?

-मैं अपनी हर फिल्म के लिए अलग अलग तरह से काफी होमवर्क करता हूं. जब हर इंसान अलग है. तो फिर हर फिल्म का किरदार भी अलग ही होता है. हर किरदार का लुक,उसके अहसास सब कुछ अलग होता है. इस फिल्म में मैने उसके भाषा के लहजे पर काम किया. वह कलाकार है,तो मैंंने पियानो बजाना सीखा.  भट्ट साहब की जो डायलाग बाजी होती है,उस पर काम किया कि मैं किस तरह भारी भरकम संवादों को बड़ी सहजता से पेश कर सकूंू.

एक कलाकार के लिए वच्र्युअल फार्मेट में शूटिंग करना कितना फायदेमंद है?

-मेरे लिए तो फायदेमंद है. देखिए,पांच करोड़ की लागत में बनी फिल्म हो या सौ करोड़ की लागत में बनी फिल्म हो,दर्शक को फिल्म देखने के लिए एक समान ही टिकट के दाम चुकाने होते हैं. ऐसे में दर्शक चाहता है कि वह बड़े बजट की फिल्में देखे. तेा वच्र्युअल फार्मेट में शूटिंग करने से कम खर्च में महंगी फिल्म बन जाती है. ऐसे में मेरे जैसे कलाकार के लिए,जिसकी बाक्स आफिस पर बड़ी पहुंच नही है,जो सौ करोड़ के बजट वाली फिल्म में लीड किरदार नही निभा सकता,उसके लिए वच्र्युअल फार्मेट वरदान ही है.  वच्र्युअल फार्मेट में शूट करके मैं दर्शकों को वही सब दे सकता हूं,जो दर्शक को सौ करोड़ की फिल्म में मिल रहा है.

किसी भी फिल्म को अनुबंधित करने के बाद अपनी तरफ से किस तरह की तैयारियां करना पसंद करते हैं?

-मुझे लगता है कि हर किसी को कलाकार बनना है. मगर वास्तव में बहुत कम लोगांे को अच्छा अभिनेता बनने का अवसर मिलता है. मैं हर दृश्य में ,चाहे वह फिल्म हो या ओटीटी हो या कोई तीस सेकंड की विज्ञापन फिल्म ही क्यांे न हो,मैं अपनी तरफ से उसमें पूरी जान डालता हूं. भट्ट साहब कहते है कि कलाकार को अपनी आत्मा सेट पर छोड़कर जाना चाहिए. वह सही कहते हैं. यदि आप किरदार में आत्मा नही छोडेंगे,तो परदे पर दर्शक को उसमें जान जीवंतता नजर ही नही आएगी. तो मेरी तरफ से यह कोशिश रहती है कि मेरे अंदर जितना भी हूनर है,वह सब उस किरदार में पिरो दूं. और मुझे अंदर से अहसास भी हो कि मैने अपनी तरफ से पूरा कामइमानदारी से किया है.

आपकी आने वाली दूसरी फिल्में कौन सी हैं?

-काफी हैं. इस वर्ष मैं बहुत काम कर रहा हूंू. एक फिल्म है ‘वर्चस्व’. जिसमें मेेरे साथ त्रिधा चैधरी व रवि किशन भी हैं. यह कोयले के खदान की नगरी की कहानी है. यह छोटे गांव के लड़के की कहानी है,जो कोयले की खदान में काम करता है,फिर वहां का स्थानीय डॉन बन जाता है. इसके अलावा एक फिल्म ‘‘गैस लाइट ’’ है. पवन कृपलानी निर्देशित इस फिल्म में सारा अली खान,चित्रांगदा सिंह व विक्रांत मैसे भी हैं.  फिल्म ‘एक कोरी प्रेम कथा’ में सोशल सटायर है. कुछ फिल्मों का ख्ुालासा अभी नही कर पा रहा हूं.

आपके शौक क्या हैं?

-बास्केट बाल देखता हूं. पढ़ता हूं. अपने बेटे के साथ वक्त बिताता हूं. मैं ऑटो बायोग्राफी व नॉन फिक्शन सहित सब कुछ पढ़ना पसंद करता हूं. मुझे लगता है कि हम जो कुछ पढ़ते हैं या देखते हैं,वह सब हमारे सब कॉशियस माइंड में अंकित रहता है और वह अनजाने ही किसी किरदार को निभाते समय मदद कर जाता है. किताबें पढ़ने से इंसान के तौर पर ग्रोथ होती है.

कोई ऐसी किताब पढ़ी हो,जिसे पढ़ते समय आपके मन में आया हो कि इस पर काम हो तो उससे आप जुड़ना चाहेंगें?

-अम्ब्रे ऐसी की एक किताब है . उनकी ऑटाबायोग्राफी है,जिसे मैने पढ़ा है और उनसे मैं बहुत प्रभावित हुआ हूं. मैं उनकी तरह सुंदर तो नहीं हूं. पर उस तरह का किरदार करने का अवसर मुझे मिल जाए,तो मजा आ जाएगा.

ड्राय स्किन की प्रौब्लम से कैसे छुटकारा पाएं?

सवाल-

मेरी स्किन बहुत जल्दी ड्राई हो जाती है और सौफ्ट भी नहीं रह पाती. क्या मुझे ज्यादा क्रीम अप्लाई करने की जरूरत है?

जवाब-

क्रीम के कम या ज्यादा इस्तेमाल से स्किन रूखी हो जाती है, यह बिलकुल गलत है. क्रीम की वजह से नहीं, बल्कि मौसम के अनुसार स्किन के भीतर खून का संचरण धीरे होने लगता है, जिस से शरीर का तापमान कम हो जाता है. शरीर का तापमान कम होने की वजह से शरीर से सीवम कम उत्पन्न होता है. यह सीवम तेलग्रंथियों से निकलता है, जो स्किन को मुलायम और चमकदार बनाने में सहायक होता है.

सर्दियों में सब से अधिक स्किन खराब होने लगती है. सर्दियों में हमारी स्किन की पहली परत पर असर पड़ता है. इस से हमारी स्किन की ऐपिडर्मिस में सिकुड़न आने लगती है, जिस के कारण स्किन में मौजूद कोशिकाएं टूटने लगती हैं. साथ ही सर्दियों में शरीर का तापमान कम होने लगता है, जिस के कारण सीवम गाढ़ा हो जाता है और वह स्किन की बाहरी परत पर नहीं आ पाता और स्किन सख्त हो जाती है. इसलिए आप को जरूरत है स्किन के अंदर ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाने की जो नियमित फेशियल और मालिश से बढ़ाया जा सकता है.

सवाल-

मैं ऐंटीएजिंग क्रीम यूज करती हूं, लेकिन उस के यूज करने के बाद स्किन अधिक ड्राई हो गई है. क्या स्किन ड्राई होने का कोईर् और भी कारण हो सकता है?

जवाब

स्किन ड्राई होने के कई कारण हैं, जिन में साबुन का अधिक इस्तेमाल करने, शरीर में पानी और फ्लूइड की कमी होने, स्किन को बहुत ज्यादा रगड़ने, बारबार धोने और स्क्रब करने से भी स्किन का मौइस्चर खत्म हो जाता है और स्किन रूखी हो जाती है. आप जिस ऐंटीएजिंग क्रीम को यूज कर रही हैं हो सकता है उस में रेटिनोल जैसे तत्त्व का उपयोग किया गया हो. क्रीम हमेशा बैंडेड ही यूज करें.

सवाल-

मेरे हाथों की स्किन बेजान और ड्राई दिखने लगी है. हमेशा हाथों को मुलायम बनाए रखने के खास टिप्स बताएं?

जवाब-

हाथों को सुंदर बनाए रखने के लिए स्क्रब करना बेहद जरूरी होता है. हाथों को स्क्रब करने से त्वचा से मृत कोशिकाएं हट जाती हैं और हाथ सुंदर दिखने लगते हैं. इस के बाद हाथों पर मौइश्चराइजर लगाना जरूरी होता है. इस से त्वचा पर मौइस्चर बना रहता है.

हाथों के लिए स्क्रब बनाने के लिए 1 मुट्ठी बादाम पीस कर पाउडर बना लें. उस में आधा छोटा चम्मच शहद डाल कर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट से हाथों को स्क्रब करें. चीनी, नमक और नारियल तेल से बना स्क्रब भी यूज कर सकती हैं.

इस स्क्रब को बनाने के लिए 1 चम्मच नारियल तेल और

1 चम्मच शहद को अच्छी तरह मिला लें. अब इस में एकचौथाई कप नमक और चीनी मिलाएं. अब इस में थोड़ा सा नीबू का रस मिला कर 30 सैकंड तक ब्लैंड करें. इस से हाथों पर स्क्रब करने से मृत कोशिकाएं हट जाती है.

मैं 5 फुट 3 इंच लंबी हूं और वजन 85 किलोग्राम है. मुझे किस तरह का डै्रसिंग स्टाइल अपनाना चाहिए ताकि मैं स्लिम दिखूं?

आप डार्क कलर के कपड़े पहनें. अगर आप को ब्लैक कलर पसंद है तो इस कलर की ड्रैस अपने वार्डरोब में जरूर रखें. पार्टी में जाना है और आप स्लिम दिखना चाहती हैं तो एक बार स्ट्राइप्स

ड्रैस जरूर ट्राई करें. यह हमेशा फैशन में रहती है और पतला दिखाती है. आप हाई वेस्ट जींस, पैंट, स्कर्ट कुछ भी ट्राई कर सकती हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Monsoon Special: बरसात के मौसम में इन से बचना है बेहद जरूरी

बरसात के मौसम में घर के बाहर पैर रखते ही कीचड़, नालों का गंदा पानी, कूड़े के ढेर से उठती सड़ांध से दिमाग खराब हो जाता है. बारिश की बूंदों से गरमी से राहत मिलती है लेकिन इस मौसम में पनपने वाली कई बीमारियों से बचना बेहद जरूरी है. आइए, जानते हैं दिल्ली के वरिष्ठ फिजिशियन व कार्डियोलौजिस्ट डा. के के अग्रवाल से कि इन बीमारियों से कैसे बचें.

1. लेप्टोस्पायरोसिस

इस बीमारी में बुखार आता है और आंखों में सूजन आती है. यह बीमारी जानवरों के मलमूत्र से फैलने वाले लेप्टोस्पाइश नामक बैक्टीरिया के कारण होती है. खासकर यह चूहों से होती है. चूहे जब पानी में या अन्य जगह पेशाब करते हैं तो आप के पैरों के माध्यम से, विशेषकर यदि आप के पैरों में घाव हैं तो, उस पेशाब के कीटाणु जिस्म में घुस जाते हैं. इस मौसम में जलभराव व बहते पानी के कारण यह संक्रमण पानी में मिल कर उसे दूषित कर देता है. इस वजह से इस बीमारी की आशंका अधिक रहती है.

बारिश के मौसम में नंगेपैर चलना ठीक नहीं रहता, हमेशा जूते, चप्पल, दस्ताने, चश्मा, मास्क आदि लगाएं. तालाबों, पूलों व नदियों आदि के  पास जाने, मृत जानवरों को छूने से बचें. घावों की नियमित साफसफाई करते रहें.

2. मलेरिया

बारिश की वजह से जगहजगह सड़कों व नालों में पानी जमा हो जाता है और गंदे पानी में मच्छर पनपने शुरू हो जाते हैं, जिन में से कुछ मलेरिया के भी मच्छर होते हैं. इस मौसम में दिल्ली में डेंगू व चिकनगुनिया, गुजरात में जिका और पूर्वोत्तर में मलेरिया का जबरदस्त आतंक रहता है.

मच्छर को घर में या बाहर पनपने न दें. छोटे व बड़े बरतन में पानी को ढक कर रखें. पानी की टंकी को बराबर साफ करते रहें. मांसपेशियों में दर्द और कंपकंपी के साथ बुखार आना मलेरिया के लक्षण हो सकते हैं.

3. डायरिया, टायफायड व जौंडिस

ये तीनों बीमारियां दूषित पानी पीने से होती हैं. इस मौसम में उबला पानी पिएं. अच्छी तरह पका हुआ खाना खाएं. सब्जी को छील कर या अच्छी तरह धो कर पकाएं और ठंडा खाना हमेशा गरम कर के ही खाएं.

सर्दीजुकाम, गले में खराश या बुखार हो तो टायफायड के लक्षण हो सकते हैं. उलटी, कमजोरी या फिर आंखों व हाथ के नाखूनों में पीलापन आना जौडिंस के लक्षण हैं.

4. स्नेक पौयजनिंग

बरसात में बिलों में पानी घुसने से अकसर सांप बाहर निकल आते हैं. यदि सांप काट ले तो तुरंत अस्पताल जाएं नजदीकी डाक्टर को दिखाएं. फिल्मों में जो दिखाया जाता है कि सांप काटने से मुंह से जहर खींच लेते हैं, ऐसा कतई न करें.

रिश्ते में प्यार के बदलते मायने

सच्चे प्रेम से खिलवाड़ करना किसी बड़े अपराध से कम नहीं है. प्रेम मनुष्य को अपने अस्तित्व का वास्तविक बोध करवाता है. प्रेम की शक्ति इंसान में उत्साह पैदा करती है. प्रेमरस में डूबी प्रार्थना ही मनुष्य को मानवता के निकट लाती है.

मुहब्बत के अस्तित्व पर सैक्स का कब्जा

आज प्रेम के मानदंड तेजी से बदल रहे हैं. त्याग, बलिदान, निश्छलता और आदर्श में खुलेआम सैक्स शामिल हो गया है.

प्रेम की आड़ में धोखा दिए जाने वाले उदाहरणों की शृंखला छोटी नहीं है और शायद इसी की जिम्मेदारी बदलते सामाजिक मूल्यों और देरी से विवाह, सच को स्वीकारने पर डाली जा सकती है. प्रेम को यथार्थ पर आंका जा रहा है. शायद इसी कारण प्रेम का कोरा भावपक्ष अस्त हो रहा है यानी प्रेम की नदी सूख रही है और सैक्स की चाहत से जलराशि बढ़ रही है.

विकृत मानसिकता व संस्कृति

आज के मल्टी चैनल युग में टीवी और फिल्मों ने जानकारी नहीं मनोरंजन ही परोसा है. समाज द्वारा किसी भी रूप में भावनाओं का आदर नहीं किया जाता.

प्रेम का मधुर एहसास तो कुछ सप्ताह तक चलता है. अब तन के उपभोग की अपेक्षा है.

क्षणिक होता मुहब्बत का जज्बा

प्रेम अब सड़क, टाकीज, रेस्तरां और बागबगीचों का चटपटा मसाला बन गया है. वर्तमान प्रेम क्षणिक हो चला है, वह क्षणभर दिल में तूफान ला देता है और अगले ही पल बिलकुल खामोश हो जाता है. युवा आज इसी क्षणभर के प्रेम की प्रथा में जी रहे हैं.

एक शोध के अनुसार, 86% युवाओं की महिला मित्र हैं, 92% युवक ब्लू फिल्म देखते हैं, तो 62% युवक और 38% युवतियों ने विवाहपूर्व शारीरिक संबंध स्थापित किए हैं.

यही है मुहब्बत की हकीकत

एक नई तहजीब भी इन युवाओं में गहराई से पैठ कर रही है, वह है डेटिंग यानी युवकयुवतियों का एकांत मिलन.

शोध के अनुसार, 93% युवकयुवतियों ने डेटिंग करना स्वीकार किया. इन में से एक बड़ा वर्ग डेटिंग के समय स्पर्श, चुंबन या सहवास करता है. इस शोध का गौरतलब तथ्य यह है कि अधिकांश युवक विवाहपूर्व यौन संबंधों के लिए अपनी मंगेतर को नहीं बल्कि किसी अन्य युवती को चुनते हैं. पहले इस आयु के युवाओं को विवाह बंधन में बांध दिया जाता था और समय आने तक जोड़ा दोचार बच्चों का पिता बन चुका होता था.

अमीरी की चकाचौंध में मदहोश प्रेमी

मृदुला और मनमोहन का प्रेम कालेज में चर्चा का विषय था. दोनों हर जगह हमेशा साथसाथ ही दिखाई देते थे. मनमोहन की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. वह मध्यवर्गीय परिवार से था, लेकिन मृदुला के सामने खुद को थोड़ा बढ़ाचढ़ा कर दिखाने की कोशिश में रहता था. वह मृदुला को अपने दोस्त की अमीरी और वैभव द्वारा प्रभावित करना चाहता था. दूसरी ओर आदेश पर भी अपना रोब गांठना चाहता था कि धनदौलत न होने पर भी वह अपने व्यक्तित्व की बदौलत किसी खूबसूरत युवती से दोस्ती कर सकता है.

लेकिन घटनाचक्र ने ऐसा पलटा खाया कि जिस की मनमोहन ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी. उस की तुलना में अत्यंत साधारण चेहरेमुहरे वाला आदेश अपनी अमीरी की चकाचौंध से मृदुला के प्यार को लूट कर चला गया.

मनमोहन ने जब कुछ दिन बाद अपनी आंखों से मृदुला को आदेश के साथ उस की गाड़ी से जाते देखा तो वह सोच में पड़ गया कि क्या यह वही मृदुला है, जो कभी उस की परछाईं बन उस के साथ चलती थी. उसे अपनी बचकानी हरकत पर भी गुस्सा आ रहा था कि उस ने मृदुला और आदेश को क्यों मिलवाया.

कालेज में मनमोहन की मित्रमंडली के फिकरों ने उस की कुंठा और भी बढ़ा दी.

प्रेम संबंधों में पैसे का महत्त्व

प्रेम संबंधों के बीच पैसे की महत्ता होती है. दोस्ती का हाथ बढ़ाने से पहले युवक की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रख कर निर्णय लेना चाहिए. प्रेमी का यह भय सही है कि यदि वह अपनी प्रेमिका को महंगे उपहार नहीं देगा तो वह उसे छोड़ कर चली जाएगी. कोई भी युवती अपने प्रेमी को ठुकरा कर एक ऐसा नया रिश्ता स्थापित कर सकती है, जिस का आधार स्वाभाविक प्यार न हो कर केवल घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने की चाह हो. युवकों को पैसे के अनुभव के बावजूद अपनी प्रेमिकाओं और महिला मित्रों को प्रभावित करने के लिए हैसियत से ज्यादा खर्च करना होगा.

प्रेम में पैसे का प्रदर्शन, बचकानी हरकत

छात्रा अरुणा का विचार है कि अधिकतर युवक इस गलतफहमी का शिकार होते हैं कि पैसे से युवती को आकर्षित किया जा सकता है. यही कारण है कि ये लोग कमीज के बटन खोल कर अपनी सोने की चेन का प्रदर्शन करते हैं. सड़कों, पान की दुकानों या गलियों में खड़े हो कर मोबाइल पर ऊंची आवाज में बात करते हैं या गाड़ी में स्टीरियो इतना तेज बजाते हैं कि राह चलते लोग उन्हें देखें.

हैसियत की झूठी तसवीर पेश करना घातक

अरुणा कहती है कि कुछ लोग प्रेमिका से आर्थिक स्थिति छिपाते हैं तथा अपनी आमदनी, वास्तविक आय से अधिक दिखाने के लिए अनेक हथकंडे अपनाते हैं. इसी संबंध में उन्होंने अपने एक रिश्तेदार का जिक्र किया जो एक निजी कंपनी में नौकरी करते थे. विवाह के तुरंत बाद उन्होंने पत्नी को टैक्सी में घुमाने, उस के लिए ज्वैलरी खरीदने तथा उसे खुश रखने के लिए इस कदर पैसा उड़ाया कि वे कर्ज में डूब गए. कर्ज चुकाने के लिए जब उन्होंने कंपनी से पैसे का गबन किया तो फिर पकड़े गए.

परिणामस्वरूप अच्छीखासी नौकरी चली गई. इतना ही नहीं, पत्नी भी उन की ऐसी स्थिति देख कर अपने मायके लौट गई. अगर शुरू से ही वह चादर देख कर पैर फैलाते, तो यह नौबत न आती.

समय के साथ बदलती मान्यताएं

मीनाक्षी भल्ला जो एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं, का कहना है कि प्यार में प्रेमीप्रेमिका दोनों ही जहां एकदूसरे के लिए कुछ भी कर गुजरने की भावना रखते हैं, वहीं अपने साथी से कुछ अपेक्षाएं भी रखते हैं.

व्यापार बनता आज का प्रेम

इस प्रकार के रवैए ने प्यार को एक प्रकार का व्यापार बना दिया है. जितना पैसा लगाओ, उतना लाभ कमाओ. कुछ मित्रों का अनुभव तो यह है कि जो काम प्यार का अभिनय कर के तथा झूठी भावुकता दिखा कर साल भर में भी नहीं होता, वही काम पैसे के दम पर हफ्ते भर में हो सकता है. अगर पैसे वाला न हो तो युवती अपना तन देने को तैयार ही नहीं होती.

नोटों की ऐसी कोई बौछार कब उन के लिए मछली का कांटा बन जाए, पता नहीं चलेगा. ऐसी आजाद खयाल या बिंदास युवतियों का यह दृष्टिकोण कि सच्चे आशिक आज कहां मिलते हैं, इसलिए जो भी युवक मौजमस्ती और घूमनेफिरने का खर्च उठा सके, आराम से बांहों में समय बिताने के लिए जगह का इंतजाम कर सके, उसे अपना प्रेमी बना लो.

पुनर्मिलन- भाग 6: क्या हो पाई प्रणति और अमजद की शादी

रात को अमजद और प्रणति पुन: होटल में थे. कौफी पीतेपीते अमजद गंभीर और सीधे सपाट स्वर में बोला, ‘‘प्रणति मैं आज भी तुम्हारा वही अमजद हूं 10 साल पहले वाला… पर क्या तुम भी… आज वही महसूस करती हो जो मैं करता हूं… मैं आज भी तुम्हारे साथ ही जिंदगी बिताना चाहता हूं.’’

‘‘तो क्या तुम ने अभी तक शादी नहीं की और मेरे बारे में तुम्हें क्या पता है? उस समय मैं ने तुम्हें कितने फोन लगाए पर सदैव स्विच्ड औफ ही आता रहा. ऐसा क्यों किया तुम ने अमजद. मुझे समझ नहीं आया… और आज फिर इस तरह का प्रस्ताव मेरी समझ से बाहर है,’’ प्रणति ने कुछ क्रोध और अचरज से अमजद की ओर देखते हुए कहा.

‘‘तो क्या तुम अभी तक समझती हो कि मैं तुम्हें अकेला छोड़ कर चला गया था?’’

‘‘तो और क्या समझ जा सकता है,’’ प्रणति ने आवेश से कहा.

‘‘देखो प्रणति तुम्हारे पापा उच्च अभिजात्यवर्गीय भावना से ओतप्रोत हैं और मेरा परिवार निम्न मध्यवर्गीय है सो दोनों के अंतर को तुम बहुत अच्छी तरह समझ सकती हो. 10 साल पहले तुम्हारी मयंक से शादी की बात अंकल ने स्वयं मुझ से मिल कर बताई थी और अपनी क्षत्रियता को जताते हुए तुम्हारे पास फटकने पर मुझे जान से मारने और मेरे परिवार को बरबाद करने तक की ताकीद की थी तो मेरे पास चुप रहने के अलावा और कोई चारा नहीं था पर तुम मेरा प्यार थी. तुम्हें याद होगा हम आखिरी बार उसी दिन मिले थे जब मैं ने तुम्हें प्रपोज किया था. उस के बाद हमारी जितनी बातें हुईं फोन पर ही. बाद के दिनों में जब तुम ने मेरा फोन उठाना बंद कर दिया था तो मैं समझ गया था कि अपने पापा के आगे तुम मजबूर हो और मैं ने उसी समय यूएस का प्रोजैक्ट ले लिया था.

तुम्हारे अलावा जिंदगी के हमसफर के रूप में मैं ने कभी किसी और की कल्पना ही नहीं की तो किसी और से विवाह करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. यूएस से कई बार तुम्हें फोन कर के बात करने की इच्छा हुई परंतु तुम्हारी विवाहित जिंदगी में कोई समस्या न उठ खड़ी हो इसलिए साहस नहीं कर पाया. यहां आ कर कालेज के कुछ दोस्तों से तुम्हारे बारे में पता चला तो मिलना सुनिश्चित किया.

‘‘क्या. पापा ने ऐसा किया था तुम्हारे साथ… और क्या सच में तुम ने अब तक शादी नहीं की? पापा इस समय मेरे पास ही आए हैं. मैं आज ही जा कर उन से ऐसा करने का कारण पूछूंगी,’’ प्रणति हैरत से बोली.

‘‘जब प्यार तुम से किया था तो शादी किसी और से कैसे करता. मैं जब तक कुछ सोच पाता तब तक तुम किसी और की हो गई थी तो फिर मैंने आजीवन विवाह न करने का फैसला ले लिया था पर अब तुम मिल गयी हो तो फिर से सोचा जा सकता है,’’ कह कर मुसकराते हुए अमजद ने उस के हाथ पर हाथ रख दिया.

प्रणति कुछ कह पाती उस से पूर्व उस के पर्स में रखा मोबाइल बज उठा. जैसे ही उस ने फोन उठाया तो घबराए स्वर में पापा बोले, ‘‘बेटा जल्दी घर आ जाओ मां बाथरूम में गिर गई है.’’

आननफानन में वे दोनों ऐंबुलैंस ले कर घर पहुंचे. देखा तो मां बेहोश पड़ी थीं. सिर में से काफी खून निकल रहा था. प्राथमिक चिकित्सा के बाद डाक्टर ने कुछ आवश्यक टैस्ट कराने के लिए कहा. पूरा समय अमजद प्रणति के साथ ही रहा. अगले दिन रिपोर्ट देखने के बाद डाक्टर बोले, ‘‘इन के सिर में काफी गहरी चोट है

और हमें तुरंत औपरेशन करना होगा. और हां

इन का खून काफी बह गया है तो हमें कम से

कम 2 यूनिट ए पौजिटिव खून की आवश्यकता भी होगी.’’

‘‘अब इस कोरोना टाइम में कौन अपना खून देने अस्पताल में आएगा… अब क्या होगा,’’ कहते हुए प्रणति के पापा रोने लगे.

‘‘अंकल आप चिंता मत कीजिए, यदि आप कहें तो मैं अपना खून देने को तैयार हूं मेरा ब्लड ग्रुप भी ए पौजिटिव है,’’ अमजद ने प्रणति के पापा को आश्वस्त करते हुए कहा.

अमजद की बात सुन कर वे बोले, ‘‘बेटा मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूं… चेहरा तो देखा हुआ ही लग रहा है पर कुछ याद नहीं आ रहा.’’

‘‘पापा यह अमजद है मेरा दोस्त जिसे आप ने धमकी दे कर यूएस जाने पर मजबूर कर दिया था,’’ प्रणति ने गुस्से से कहा मानो इतने समय से दबी भड़ास अपनाआपा खो बैठी हो.

‘‘पापा मैं ने अपने कई ग्रुप्स में ब्लड डोनेट के लिए मैसेज फौरवर्ड किया था पर कोरोना के कारण कोई भी यहां अस्पताल में आने को तैयार नहीं है और अमजद तो मुसलिम है तो उस का खून आप मम्मी को चढ़ाने नहीं देंगे. बताइए अब क्या करें?’’ प्रणति ने चिंतित स्वर में कहा.

प्रणति की बात का मानो उन पर कोई असर ही नहीं हुआ वे बस अपनी

नजरें नीची किए बैठे रहे. उन के उत्तर का इंतजार किए बिना प्रणति अमजद को ले कर डाक्टर के पास चली गई. 2 यूनिट खून ने मानो मम्मी को नया जीवन दे दिया था. औपरेशन भी सफल रहा था. जब तक मम्मी हौस्पिटल में रहीं अमजद प्रणति के साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़ा रहा.

1 सप्ताह बाद मां को घर भी वही अपनी गाड़ी में लाया. मम्मी को घर छोड़ कर जब वह जाने लगा तो पापा का कांपता स्वर उस के कानों में गूंजा, ‘‘हो सके तो मुझे माफ कर देना बेटा. मैं यह

भूल गया था कि धर्म और जाति का ढिंढोरा हम कितना भी पीटते रहें पर इंसान की रगों में बहने वाला खून केवल इंसानियत का ही तकाजा रखता है.’’

15 दिनों के बाद मम्मी ठीक हो गईं. फिर एक दिन शाम की चाय पर प्रणति से बोली, ‘‘बेटा क्या तू हमें बरसों पहले जिद में की गई गलती को सुधारने का एक मौका दे कर अमजद को हमारा दामाद बना सकती है? काश, हम पहले समझ गए होते कि खून और प्यार का कोई धर्म नहीं होता.’’

प्रणति ने जब अपने पापा की ओर देखा तो वे बोले, ‘‘तेरी मां बिलकुल सही कह रही है… बस एक मौका…’’

प्रणति खुश होते हुए मांपापा के गले लग गई. 1 सप्ताह बाद दोनों परिवारों के बड़ों की उपस्थिति में बरसों पूर्व जुदा हुए 2 प्रेमी कोर्ट में एकदूसरे को माला पहना कर एक हो रहे थे.

REVIEW: जानें कैसी है फिल्म ‘जुदा होके भी’

रेटिंगः ढाई स्टार

निर्माताः के सेरा सेरा, विक्रम भ्ज्ञट्ट प्रोडक्शन

लेखकः महेश भट्ट

निर्देशकः विक्रम भट्ट

कलाकारः अक्षय ओबेराय, एंद्रिता रे, मेहेरझान मझदा, जिया मुस्तफा,  रूशद राणा‘

अवधिः दो घंटे दो मिनट

गुलाम , राज सहित कई सफलतम फिल्मों के निर्देशक विक्रम भट्ट को सिनेमा जगत में नित नए सफल प्रयोग करने के लिए जाना जाता है. रामसे बंधुओं के बाद हॉरर फिल्मों को एक नई पहचान देने में विक्रम भट्ट का बढ़ा योगदान है. अब विक्रम भट्ट फिल्मों की शूटिंग की एक नई तकनीक ‘‘वच्र्युअल फार्मेट’’ लेकर आए हैं. इसी तकनीक वह पहली हॉरर के साथ प्रेम कहानी युक्त फिल्म ‘‘जुदा होके भी’’ लेकर आए हैं, जिसमें उन्होने वशीकरण का तड़का भी डाला है. वशीकरण एक ऐसी तांत्रिक क्रिया है, जिससे किसी भी इंसान व उसकी सोच को अपने वश में किया जा सकता है. मगर यह फिल्म कहीं से भी डराती नही है. विक्रम भट्ट का दावा है कि ‘वच्र्युअल तकनीक ही सिनेमा का भविष्य है. मगर फिल्म ‘जुदा हो के भी ’’ देखकर ऐसा नही लगता. विक्रम भट्ट के निर्देशन में बनी यह सबसे कमजोर फिल्म कही जाएगी.

कहानीः

कम उम्र में अपने बेटे राहुल की मृत्यु के बाद सफल गायक व संगीतकार अमन खन्ना (अक्षय ओबेरॉय) इस कदर टूट जाते हैं,  कि वह खुद को दिन रात शराब के नशे में डुबा कर अपना जीवन व कैरियर तहस नहस कर देते हैं. इस त्रासदी के परिणामस्वरूप मीरा (ऐंद्रिता रे) से उसकी शादी को भी नुकसान हुआ है. पिछले चार वर्षों से मीरा ही किताबें लिखकर या दूसरों की लिखी किताबांे का संपादन कर घर का खर्च चला रही है. पति अमन से मीरा की आए दिन तूतू में मैं होती रहती है. इसी बीच उत्तराखंड में बिनसार से सिद्धार्थ जयवर्धन (मेहरजान मज्दा) अपनी जीवनी लिखने के लिए मीरा को उत्तराखंड आने का निमंत्रण देते हैं. इसके एवज में वह मीरा को बीस लाख रूपए देने की बात कहते हैं. अमन नही चाहता कि मीरा उससे दूर जाए. मगर घर के आर्थिक हालात व पति के काम करने की बजाय दिन रात शराब मंे डूबे रहने के चलते मीरा कठोर मन से उत्तराखंड चली जाती है. उत्तराखंड के अति सुनसान इलाके बिनसार में पहुॅचने के बाद मीरा अपने आपको सिद्धार्थ जयवर्धन के मकड़जाल मे फंसी हुई पाती है. उधर उत्तराखंड में टैक्सी चलाने वाली रूही के अंधे पिता(रुशाद राणा),  अमन को सचेत करते है कि वह मीरा को बचा ले. अमन उत्तराखंड पहुॅचकर मीरा को अपने साथ ले जाना चाहता है. पर क्या होता है, इसके लिए फिल्म देखनी पड़ेगी.

लेखन व निर्देशनः

पिछले कुछ वर्षों से विक्रम भट्ट हॉरर फिल्में बनाते रहे हैं, जिनमें हॉरर में प्रेम कहानी हुआ करती थी. मगर इस बार उन्होने प्रेम कहानी में हॉरर को पिरोया है. इस फिल्म का निर्माण व निर्देशन विक्रम भट्ट ने महेश भट्ट के कहने पर किया है. ज्ञातब्य है कि बीस वर्ष पहले विक्रम भट्ट निर्देशित सफलतम सुपर नेच्युरल हॉरर फिल्म ‘‘राज’’ का लेखन महेश भट्ट ने किया था और अब ‘‘जुदा होके भी ’’ का लेखन महेश भट्ट ने किया है. मगर अफसोस  ‘जुदा होके भी ’’की कहानी व पटकथा काफी कमजोर ही नही बल्कि त्रुतिपूर्ण नजर आती है. फिल्म में टैक्सी चलाने वाली रूही व उसके अंधे पिता के किरदार ठीक से चित्रित ही नही किए गए. रूही के पिता अंधे होने के ेबावजूद सब कुछ कैसे देखे लेते हैं. उनके पास कौन सी शक्तियां हंै कि वह मंुबई में अमन के घर ही नहीं ट्ेन में भी अमन के पास पहुॅच जाते हैं? सब कुछ अस्पष्ट और अजीबो गरीब नजर आता है.  यह लेखक की कमजोर कड़ी है.

इस बार महेश भट्ट अपने लेखन से  प्रेम को वासना से अलग नही दिखा पाए. इसके अलावा फिल्म में जिन अलौकिक गतिविधियांे की बात की गयी है,  वह रोमांचक और डरावनी भी नहीं हैं. अजीबोगरीब फुसफुसाहट हर जगह गूंजती रहती है. मीरा कुछ भयानक चीजें जरुर देखती है,  लेकिन इससे दर्शक पर कोई असर नही पड़ता. कहानी में कोई ट्विस्ट भी नही है. कहानी एकदम सपाट धीरे धीरे चलती रहती है. यहां तक कि क्लायमेक्स में एक भयानक प्राणी के संग नायक अमन की लड़ाई भी प्रभाव पैदा करने मे विफल रहती है. दर्शक इस तरह के भयंकर प्राणी को इससे पहले विक्रम भट्ट की ही थ्री डी फिल्म ‘क्रिएचर’ मंे देख चुके हैं.

संवाद जरुर काफी भरी भरकम हैं. फिल्म वर्तमान में जीने की बात कहते हुए कहती है-‘‘जिंदगी बहुत सुंदर है, क्योंकि वह खत्म होती है. और हमें उन लोगों को छोड़ देना चाहिए, जो गुजर चुके हैं और वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. ’’

जहां तक निर्देशन का सवाल है तो जब पटकथा कमजोर हो , कुछ किरदार अस्पष्ट हों, तो निर्देशन कमजोर हो ही जाता है. इसके अलावा इस बार विक्रम भट्ट ने अपनी इस फिल्म को नई वच्र्युअल तकनीक पर फिल्माया है, जो कि जमी नही. इस तकनीक से फिल्म का बजट भी नही उभरता और बहुत कुछ बनावटी लगता है. इस हिसाब से ‘वच्र्युअल फार्मेट’ की तकनीक के भविष्य पर सवाल उठते हैं?उत्तराखंड की कड़ाके की ठंड में मीरा हमेशा शिफॉन  या नेट की ही साड़ी में नजर आती है, यह भी बड़ा अजीब सा लगता है.

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है तो अमन के किरदार में अक्षय ओबेराय ने बेहतरीन परफार्मेंस दी है. वह एक गम में डूबे इंसान की ज्वलंत भावनाओं और बेबसी को भी बहुत बेहतरीन तरीके से परदे पर उकेरा है. मीरा के किरदार में एंद्रिता रे काफी हद तक फिल्म को आगे ले जाती हैं. उनका अभिनय कई दृश्यों में काफी शानदार बन पड़ा है. सिद्धार्थ जयवर्धन के किरदार मेे महेरझान मझदा ने मेहनत काफी की है, मगर इस चरित्र को ठीक से लिखा नही गया. परिणामतः एक खूबसूरत चेहरे वाला विलेन उभरकर नही आ पाता. अंधे व्यक्ति के किरदार में रूशद राधा ने ठीक ठाक काम किया है, जबकि इस चरित्र को भी लेखक ठीक से उभार नही पाए. रूही के किरदार में जिया मुस्तफा के हिस्से करने को कुछ खास रहा ही नही.

रैड लाइट- भाग 2: क्या बिगड़े बेटे को सुधार पाई मां

तालाबंद घरों को फिर आबाद करने की एक स्कीम के तहत मेहनतकश लोग केवल एक डौलर में ऐसे घर खरीद सकते हैं, बशर्ते कि वे उन की मरम्मत कर के कम से कम 5 वर्ष तक अमनचैनपूर्वक उन में खुद रहने और नियम से प्रौपर्टी टैक्स भरने का कौंट्रैक्ट साइन करें. उद्यमी और साहसी नए प्रवासियों के लिए सुनहरा अवसर. ऐसे आबाद घरों से कानून और व्यवस्था में बेहतरी की भी उम्मीद है. संभ्रांत इलाकों में तो घरों को झाडि़यों वगैरा से घेरना लगभग अशिष्टता समझा जाता है लेकिन गौर्डन मजबूर हैं. नशाखोरों की टोलियां ऊंची आवाज में शोरशराबे के साथ किसी के भी घर के आगे हुल्लड़ मचाती मंडराती हैं. पुलिस बुलाओ, उन्हें भगाओ लेकिन अगली रात फिर वही तमाशा. झाडि़यों की सीमा खुराफातियों को कुछ हद तक थोड़ी दूर रखती है. गौर्डन अपने मैन्शन के आगे झाडि़यों की कतार का रोज सुबहसवेरे मुआयना करते हैं. चरसियों, नशाखोरों की रातभर की कारस्तानियों की निशानियां सिरिंजेज, सुइयां, कंडोम बीनते हैं वरना पड़ोस के छोटे बच्चे उन से डाक्टरडाक्टर खेलते हैं. कंडोम को नन्हे गुब्बारे समझ कर फुलाते हैं, उन में पानी भरभर कर एकदूसरे पर फेंकते हैं.

जर्जर हालत में कुछ घरों में सिंगल मदर्स अलगअलग बौयफ्रैंड्स से अपने बच्चों के साथ रह रही हैं. यह वह तबका है जो सरकार को दुधारी गाय मान कर उसे दुहे जाता है. ब्याह, शादी कर के तो आम गृहस्थी की तरह मेहनतमशक्कत से रोटी कमानी पड़ेगी. कोई बौयफ्रैंड अपनी संतान की परवरिश के लिए नियमित राशि दे तो भला, वरना अविवाहित मातापिता संतान को सरकार से मिलने वाले फूड स्टैंप्स और अन्य सहायता के सहारे पालते हैं. ऐसी मानसिकता वालों के कारण इलाके की छवि धूमिल होती है. गौर्डन अपनी दृष्टि घुमा कर सड़कपार कुछ दूरी पर उन घरों की ओर इशारा करते हैं जिन का हाल ही में पुनरुद्धार हुआ लगता है. एक घर के दोमंजिले पोर्च में स्विंगसोफे  या आरामकुरसी पर बैठी कुछ युवतियां मैगजीन पढ़ने या बातचीत करने में तल्लीन दिखती हैं. घर के मालिक अधेड़ आयु के निसंतान दंपती हैं, टायरोल और ऐग्नेस कार्सन. सोशल डैवलपमैंट कमीशन उन के घर की ऊपर मंजिल को किराए पर ले कर जरूरतमंदों के अस्थायी आवास के रूप में इस्तेमाल करता है. फिलहाल वहां रह रही युवतियां यूनिवर्सिटी के सर्टिफाइड नर्सिंग असिस्टैंट कोर्स की स्कौलरशिप स्टूडैंट्स हैं जो पार्टटाइम काम भी करती हैं, जिस की वजह से उन्हें वक्तबेवक्त जानाआना पड़ता है. यूनिवर्सिटी जानेआने के लिए वैन सर्विस है और काम के लिए वे बस से जातीआती हैं.

सुमि कुछ कहती नहीं, लेकिन उस ने अलग से यह भी सुना है कि उस इलाके में गाडि़यां दिन में कई चक्कर मारती हैं. उन में ‘जौन्ज’ यानी ग्राहक होते होंगे. इसी कारण इस इलाके के रैड लाइट एरिया होने की अफवाह धुएं से चिंगारी बनने लगी है. गौर्डन सुमि को महल्ले के दौरे पर ले चलते हैं. 100 गज ही आते हैं कि बस से उतर कर एक अधेड़ महिला थैलों से लदीफंदी सामने से आती दिखती है. गौर्डन आगे बढ़ कर कुछ थैले पकड़ लेते हैं और उन्हें उन के दरवाजे तक छोड़ आते हैं. बारबार थैंक्स कहतीकहती जब वे अंदर चली जाती हैं तब नीची आवाज में सुमि को उन के बारे में गौर्डन बताते हैं कि हो न हो, खून बेच कर आई हैं तभी खरीदारी के थैले अकेले पकड़े थीं. सरकारी फूड स्टैंप्स से ग्रोसरी खरीदने या फूड बैंक से मुफ्त सामान लाने के लिए वे बच्चों को साथ ले जाती हैं. ड्रग ऐडिक्ट बेटी डीटौक्स सैंटर में है. बेटी का बौयफ्रैंड फरार है. उस से और पिछले एकदो बौयफ्रैंड्स से बेटी के 5 बच्चे हैं जिन्हें ये पाल रही हैं. सब को नियम से स्कूल की बस पर चढ़ा कर आती हैं, तीसरे पहर बस स्टौप से लिवा कर लाती हैं और घर में अनुशासित रखती हैं ताकि अच्छी अभिभावक होने का सुबूत दे सकें और बच्चों को अलगअलग फौस्टर होम्ज में न भेजा जाए. इन का पति नशेबाज था, सो उस से तलाक लिया और घरों, दफ्तरों की सफाई के सहारे गुजारा किया. टूटीफूटी हालत में छोटा घर एक डौलर में मिल गया जिसे हैबिटैट वालों ने रहने लायक बना दिया.

बेटी इकलौती संतान है और उसी के बच्चों की वजह से इन्हें कई जगह काम छोड़ना पड़ा. सब से बड़ी नातिन 12 साल की हो जाए तब उस की निगरानी में उस के भाईबहन को कुछ समय के लिए छोड़ कर सफाई वगैरह का ज्यादा काम पकड़ लेंगी. फिलहाल तो स्टेट इमदाद पर गुजारा कर रही हैं लेकिन मजबूरीवश. वे जानती हैं कि इस तरह से पलने वाले बच्चे जीवनभर हीनभावना से ग्रस्त रहते हैं. जैसे और जितना बन पड़े बिन ब्याही मां के नाजायज बच्चों का भविष्य गर्त में जाने से बचाए रखना चाहती हैं गौर्डन और सुमि टहलतेटहलते आगे निकल आते हैं, तो एक पुराना दोमंजिला मकान दिखता है जिस का हाल ही में पुनरुद्धार हुआ लगता है. पोर्च में खड़ी एक अफ्रीकन अमेरिकी वृद्धा मुसकरा कर हाथ हिलाती हैं.

‘‘हाय,’’ गौर्डन गर्मजोशी से अभिवादन का उत्तर देतेदेते उन की तरफ बढ़ते हैं, ‘‘मीट माय न्यू फैं्रड,’’ कहते हुए सुमि का परिचय मिल्ड्रेड से करवाते हैं, ‘‘शी इज डूइंग अ स्टोरी औन अवर नेबरहुड.’’

मिल्ड्रेड की निगाहें अनायास उन घरों की तरफ जाती हैं जिन के कारण महल्ले की छवि धूमिल है, ‘ओहओह’ कहते ही तुरंत संभल जाती हैं.

‘‘कम इन, कम इन,’’ कहते हुए मिल्ड्रेड गौर्डन और सुमि के स्वागत में अपने पोर्च से नीचे उतर आती हैं. उन के साथ भीतर जाते हुए सुमि देखती है कि पोर्च में एक बैंच पर सामान से भरे कागज के खाकी थैले सजे हैं और उन के आगे गत्ते के टुकड़े पर लिखा है, ‘‘हैल्प योरसैल्फ ऐंड ऐंजौय.’’

‘‘आह, सो यू फाउंड गुड डील्ज ऐट द फार्मर्स मार्केट.’’

सुमि की ओर मुड़ कर गौर्डन समझाते हैं कि घर के पीछे अपने छोटे से किचन गार्डन में सागसब्जी उगाना और फार्मर्स मार्केट जा कर खेत से आई ताजी सागसब्जी, फल खरीदना मिल्ड्रेड की हौबी है. खुद तो पकातीखाती हैं ही, बुजुर्ग पड़ोसियों को भी भिजवाने के अलावा कागज के खाकी थैलों में डाल कर पोर्च में रख देती हैं ताकि कोई भी जरूरतमंद ले जाए.मिल्ड्रेड हारपोल रिटायर्ड नर्स हैं. इराक के साथ औपरेशन डेजर्ट स्टौर्म में पति की शहादत के बाद 7 बेटों और 2 बेटियों के पालनपोषण की

जिम्मेदारी अकेले नर्सिंग के सहारे संभालना कठिन था. पति की मृत्यु के बाद मिली राशि और मामूली पैंशन में  भी गुजारा न होता, सो सिलाई, बुनाई, कपड़ों पर इस्तरी और छोटीमोटी कैंटरिंग का काम भी ढूंढ़ा. ड्राईक्लीनिंग की दुकान खोली.

राशनपानी, सागसब्जी की भरसक उम्दा खरीदारी के हुनर के साथ मिल्डे्रड ने गृहस्थी सुचारु रूप से चलाई. बड़ बच्चों ने पढ़ाई के साथसाथ बिजनैस संभालने में हाथ बंटाना सिखाया. 50 साल से महल्ले के बच्चों की क्रौसिंग गार्ड हैं. सुबहशाम स्कूल बसस्टौप तक जिन बच्चों को सावधानी से सड़क पार करवा पहुंचाने/लाने जाती हैं उन में से एक भी कम होता है तो उस की कुशलक्षेम पूछने उस के घर पहुंच जाती हैं. यदि बच्चे की गैरहाजिरी का कारण अभिभावक का देर रात तक नशे में धुत रहने के बाद सुबह समय से न उठ पाना या ऐसी ही कोई गफलत होती है तो अभिभावक की भी अच्छी खबर लेती हैं. आज 7 बेटों में से एक आर्मी के ट्रांसपोर्ट डिवीजन का हैड इंजीनियर है, एक फिजिकल मैडिसन का डाक्टर. शेष 5 में कोई डैंटिस्ट है, कोई कंप्यूटर स्पैशलिस्ट, कोई म्यूजिक सिम्फनी का डायरैक्टर और कोई फुटबौल टीम का हैड कोच. सब से छोटे अविवाहित बेटे ने इंजीनियरिंग में मास्टर्स करने के बाद किसी नामी मैन्युफैक्चरिंग कंपनी में नौकरी के बजाय हाईस्कूल में फिजिक्स और मैथ्स पढ़ाना और स्पोर्ट्स कोचिंग करना पसंद किया है. मिल्ड्रेड की बहुएं भी प्रोफैशनल्स हैं. 2 सीनियर नर्सेज हैं, एक पब्लिक स्कूल सिस्टम में सीनियर पिं्रसिपल, एक म्यूजियम में सीनियर क्यूरेटर, एक स्पोर्ट्स मैडिसिन में थैरेपिस्ट व पति के साथ हैल्थ फिटनैस क्लीनिक की मालिक है और एक पुलिस औफिसर है.

विवादों के बारे में क्या कहते है Ram Gopal Varma, पढ़ें इंटरव्यू

निर्देशक राम गोपाल वर्मा हमेशा लीक से हटकर फिल्में बनाते है, उनकी फिल्मों में वायलेंस, रोमांस,एक्शन का भरपूर समावेश होता है. वे इसे आसपास की घटनाओं से प्रेरित फिल्में बनाते है. फिल्मों के निर्देशन के अलावा राम गोपाल स्क्रीन राइटर और प्रोड्यूसर भी है.हिंदी फिल्म शिवा, सत्या, रंगीला,भूत आदि उनकी चर्चित फिल्में है. हिंदी फिल्मों के अलावा उन्होंने तेलगू सिनेमा और टीवी में भी नाम कमाया है. सिविल इंजिनीयरिंग की पढ़ाई कर चुके राम गोपाल वर्मा को कभी लगा नहीं था कि वे एक दिन इतने बड़े निर्देशक बन जायेंगे. अच्छी फिल्में बनाने की वजह से उन्हें कई फिल्मों में पुरस्कार भी मिला है.

घबराते नहीं

राम गोपाल वर्मा हमेशा विवादों में रहते है, पर ऐसे कंट्रोवर्सी से वे घबराते नहीं और जो भी बात उन्हें सही नहीं लगती, वे तुरंत कह देते है. उन्हें कई बारट्वीट की वजह से लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा, लेकिन वे पीछे नहीं हटे. वे कानून को सर्वोपरि मानते है, डेमोक्रेसी में कानून जिस चीज को करने की इजाजत देती है, उसे करना पसंद करते है, बाकी को वे पर्सनल सोच बताते है. किसी प्रकार की फाइट भी कानून के साथ करे, आपस में नहीं, क्योंकि इससे आपसी मतभेद बढती है.

राम गोपाल ने अपना करियर वीडियो लाइब्रेरी से शुरू किया है, क्योंकि ये उनका सपना था और इसे उन्होंने हैदराबाद में खोला था. बाद में उन्होंने वीडियो कैफे भी खोला और वही से उन्हें दक्षिण की फिल्मों में काम करने का अवसर मिला. धीरे-धीरे वे प्रसिद्ध होते गए. अभी वे नामचीन निर्देशकों की श्रेणी में माने जाते है. फिल्म ‘सत्या’उनके जीवन की टर्निंग पॉइंट थी. राम गोपाल वर्मा का रिश्ता पहले उर्मिला मातोंडकर, अंतरा माली, निशा कोठारी, जिया खान आदि के साथ जुड़ने की वजह से भी वे सुर्खियों में रहते है.अभी उनकी फिल्म ‘लड़की- enter the girl dragon’ रिलीज हो चुकी है, अब उन्हें दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने की बारी है.

हुए प्रसिद्ध

प्रसिद्ध निर्देशक की कल्पना उन्होंने की थी या नहीं पूछे जाने पर वे कहते है कि हमेशा से मुझे एक फिल्म बनाने की बहुत इच्छा थी,जिसे मैं देखना चाहता हूँ, उससे अधिक मैंने कुछ भी नहीं सोचा था. आज की फिल्मों में माड़-धाड़, गली गलौज बहुत अधिक होती है, इस बारें में राम गोपाल वर्मा कहते है किफिल्म इंडस्ट्री एक बुक शॉप की तरह है, जहाँ कोई फॅमिली ड्रामा, कोई एक्शन तो कोई रोमांस की किताबें ले जाना पसंद करते है, इसलिए जिसे जो पसंद हो वे उसे देख सकते है. फिल्में जल्दी बनने की वजह तकनीक का अधिकतम विकास होना है. आज फिल्मों में VFX भी बहुत होता है. तकनीक की वजह से फिल्में भी जल्दी बनती  है.

मार्शल आर्ट सीखना है जरुरी

राम गोपाल कहते है कि मैंने WWCकार्यक्रम में महिलाओं की एक शो को देखा था, जिसमे लड़कियों की body को मसल्स के साथ स्ट्रोंग भी दिखाया जाता है, मुझेबहुत अच्छा लगा था.इस शो से प्रेरित होकर कई लड़कियों ने मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग लेने मार्शल आर्ट स्कूल में जाने लगी थी. ब्रूस ली की भी हाइट बहुत कम है, लेकिन उसकी मार्शल आर्ट इतनी अच्छी है कि बड़े-बड़े लोग भी उससे डर जाते है. इसके अलावा हर लड़की के बारें में हमारे समाज और परिवार में ये अवधारणा है कि वह कमजोर है, इसलिए लड़के उनके साथ छेड-छाड़, रेप, गन्दी आचरण आदि कुछ भी करने या कहने से डरते नहीं और बेचारी लड़की चुप रहती है. उसे कहीं जाने या अपने मन की पोशाक पहनने की आज़ादी नहीं होती,सभी उनपर आरोप लगाते रहते है, लेकिन परिवार और समाज उनके लिए कुछ नहीं करती, उन्हें सेल्फ प्रोटेक्शन की ट्रेनिंग नहीं दी जाती, लड़की है कहकर उसके लिए पाबंदियां लगा देते है,उसकी रहन-सहन, पोशाक आदि पर भी आरोप लगते है. इसलिए मैंने सोचा अगर किसी लड़की में साहस और मार्शल आर्ट को मिलाकर डाल दिया जाता है तो वास्तव में वह लड़की स्ट्रोंग होगी. मेरी फिल्म की चरित्र पूजा भालेकर भी ऐसी ही लेडी है, जिसका कोई कुछ बिगड़ नहीं सकता. आज हर लड़की को फिट रहने के साथ-साथ मार्शल आर्ट भी सिखने की जरुरत है.

मनोरंजन है जरुरी

राम गोपाल कहते है कि ऐसी फिल्मों को मनोरंजन के साथ बनाना मुश्किल होता है. फिल्म चाहे थिएटर हो या ओटीटी बजट मुख्य होता है. उसके अनुसार ही मैंने फिल्मे बनाई है, कई बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउसेस बड़ी बजट की फिल्में बनाते है और ओटीटी पर ही रिलीज करते है और उनकी मार्केटिंग भी महँगी होती है, ऐसे में आपने कितनी बजट की फिल्म बनाई और फिल्म ने कितनी कमाई की, इसे देखने की जरुरत है. मैं बहुत साल से इस कांसेप्ट पर काम कर रहा हूँ.

नेचुरल एक्टिंग है मुश्किल

मार्शल आर्ट की रियल एक्सपर्ट पूजा भालेकर को राम गोपाल ने इस फिल्म में लिया और उनकी ये डेब्यू फिल्म है, कितना मुश्किल था उनके साथ काम करना पूछने पर उनका कहना है कि एक्टिंग दो तरह के होते है, एक वे जो एन एस डी से ट्रेनिंग लेकर आते है और एक वे जो नेचुरल एक्टिंग करते है. हर व्यक्ति के पास मिनिमम एक्टिंग का टैलेंट होता है, क्योंकि किसी भी परिस्थिति में हम जब किसी से बात करते है, तो एक्टिंग ही बाहर आती है. कैमरे के सामने आने पर कलाकार सचेत हो जाते है. मैं कैसी दिख रही हूँ, संवाद कैसे बोल रही हूँ आदि को लेकर मन में द्वन्द चलता रहता है.मन के भाव कोचेहरे पर दिखाना भी एक कला है. पूजा ने वर्कशॉप में ही सिद्ध कर दिया था कि वह एक अच्छी एक्ट्रेस है. आँखों में मार्शल आर्ट के साथ संवाद को सही तरह से बोलने की कोशिश की है, मैंने उन्हें समझाया है कि इमोशन को एक्शन के साथ चेहरे पर लाना है, जिसे उन्होंने बहुत अच्छी तरह से किया. मुझे अधिक ट्रेनिंग नहीं देनी पड़ी.

राम गोपाल वर्मा आगे कहते है कि महिला सशक्तिकरण के ऊपर हमेशा फिल्में बनती है और इसमें एक लड़की पुरुष की तरह काम की है. हमारे देश में लड़कियों को समान अधिकार है, लेकिन लड़की को दबा कर रखने के लिए हमेशा पुरुष उसे कुछ करने से मना किया जाता है. जबकि लड़की भी अपने शरीर के हिसाब से सब कुछ कर सकती है. इसमें पहले मैं परिवार की जिम्मेदारी समझता हूँ.

छोटी अनु के आने से Anupama के बच्चों को होगी जलन! वनराज कहेगा ये बात

सीरियल अनुपमा में इन दिनों छोटी अनु की एंट्री से बवाल होता हुआ देखने को मिल रहा है. जहां एक तरफ अनुज के भैया-भाभी परेशान हैं तो वहीं अब वनराज और बा के साथ अनुपमा के बच्चों को भी जलन होते हुए दिखने वाली है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

शाह हाउस पहुंची छोटी अनु

 

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अब तक आपने देखा कि पाखी, पूरे शाह परिवार को अनुपमा और अनुज की गोद ली हुई बेटी के बारे में बताती है, जिसके बाद बा, परितोष और वनराज गुस्से में नजर आते हैं. वहीं शाह के रिएक्शन के लिए अनुपमा परेशान नजर आती है. इसी के साथ कपाड़िया हाउस में बरखा इस बात से डरती है कि अमेरिका से वापस आने की वजह अनुज को तो नहीं पता चल गई.

एक बार फिर अनुपमा पर बरसेगा वनराज

 

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अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि बापूजी और काव्या, छोटी अनु का खुश होकर वेलकम करेगें. हालांकि वनराज, बा और परितोष एक बार फिर अनुपमा पर बरसेंगे. हालांकि अनुज उसके साथ खड़ा होगा. दरअसल, वनराज, अनुपमा को दादी की उम्र में शादी और अब बच्चे की मां बनने पर ताना देता दिखेगा, जिसमें बा और तोषू उसका साथ देंगे. वहीं अंकुश, बरखा और अधिक को बताएगा कि मालविका ने सब कुछ अनुज के नाम कर दिया है, जिसे सुनकर बरखा भड़क जाएगी और छोटी अनु के आने से परेशान नजर आएगी.

अनुज को लेकर वनराज कहेगा ये बात

इसके अलावा आप देखेंगे कि वनराज की बातों को नजरअंदाज करके अनुपमा अपने बच्चों से बात करने जाएगी. जहां वह बच्चों का हाथ पकड़कर कहेगी वह उनका कभी हाथ ना छोड़ें. लेकिन तोशु कहेगा जब उसके इतने हाथ होंगे, तो एक या दो फिसल जाएंगे. वहीं पाखी और समर कहेंगे कि जब छोटी अनु ने अनुपमा को मम्मी कहा तो उन्हें जलन हुई. दूसरी तरफ, वनराज अपनी मां लीला को कहेगा कि अनुज एक बिजनेसमैन है क्योंकि उसने अपनी प्रौपर्टी में अनुपमा के बच्चों को हिस्सा न देने के लिए बच्चा ले आया. हालांकि वह कहेगा कि उसे और उसके बच्चों को अनुज की प्रौपर्टी की कोई जरुरत नहीं है.

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