फिल्मों में अंधविश्वास को लेकर क्या कहते हैं निर्देशक विक्रम भट्ट

‘जनम’, ‘मदहोश’, ‘गुलाम’, ‘राज’, ‘आवारा पागल दीवाना’,  ‘फुटपाथ’, ‘एतबार’, ‘जुर्म’, ‘हंटेड थ्री डी’ व ‘1921’सहित लगभग 36 फिल्मों का निर्देशन कर चुके विक्रम भट्ट सिनेमा जगत में अक्सर नए नए प्रयोग करते रहे हैं. अब वह एक नया प्रयोग करते हुए वच्र्युअल प्रोडक्शन तकनीक की पहली फिल्म ‘‘ जुदा हो के भी’’ लेकर आए हैं. अक्षय ओबेराय, एंद्रिता रे व मेहेरझान मझदा के अभिनय से सजी फिल्म 15 जुलाई को सिनेमाघरों में पहॅुच रही है. .

प्रस्तुत है विक्रम भट्ट से एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश. .

अपने अब तक के कैरियर में आपने सिनेमा में कई प्रयोग किए हैं. अब आप भारत की पहली वच्र्युअल फिल्म ‘‘जुदा हो के भी ’’लेकर आ रहे हैं. इस वच्र्युअल फार्मेट का ख्याल कैसे आया?

-वच्र्युअल फार्मेट कोविड काल के लॉक डाउन की देन है. जब लॉक डाउन हुआ, तो सब कुछ बंद हो गया. फिल्मों की शूटिंग भी एकदम बंद हो गयी. जैसे ही लॉक डाउन में थोड़ी सी ढील मिली, तब भी काफी मुश्किलें थीं. क्यांेकि कई तरह की बंदिशे थीं. आप डांसर का उपयोग नही कर सकते. रात में शूटिंग नही कर सकते. . वगैरह वगैरह. . . तो यह चिंता की बात थी. सब कुछ थोड़ा सा सामान्य हुआ कि तभी कोविड की दूसरी लहर आ गयी. सब कुछ अनिश्चितता की स्थिति थी. कोई कह रहा था कि कोविड के हालात अगले तीन वर्ष तक रहेंगंे. . कोई छह साल तक रहने का दावा कर रहा था. कोई कह रहा था कि यह तो कई वर्षों तक चलेगा. तो मैं और मेरे बॉस यानी कि महेश भट्ट साहब सोचने पर मजबूर हो गए कि यदि यही हालात रहेंगे, तो हम फिल्में कैसे बनाएंगे. तभी हमें वच्र्युअल फार्मेट के बारे में पता चला. इसमें हम अपनी मर्जी से अपनी दुनिया बना सकते हैं.  इसकी दुनिया भी हमारी रोजमर्रा की दुनिया जैसी ही लगती है. लेकिन उस दुनिया में आप अपने किरदारों@ कलाकारों को रखकर फिल्म बना सकते हैं. तो मुझे यह बहुत रोचक लगा. लेकिन इसके लिए मुझे काफी सीखना पड़ा. पहले मैने बेसिक कोर्स किया. फिर मैने लाइटिंग का कोर्स किया. फिर आर्किटेक्चर का कोर्स किया. फिर हमने इस फार्मेट को थोड़ा थोड़ा वेब सीरीज में उपयोग करके देखा कि हम इस तकनीक पर फिल्म बना सकते हैं अथवा नहीं. . . . वेब सीरीज में हमें मन माफिक परिणाम मिले. तब हमने सोचा कि अब हम पूरी फिल्म को ही ‘वच्र्युअल फार्मेट’ पर बनाएंगे. उसी का परिणाम है मेरी नई फिल्म ‘‘जुदा हो के भी’’.

आपको पता होगा कि रिषि कपूर के अभिनय वाली फिल्म ‘कर्ज’ का एक गाना भी कुछ इसी तरह से फिल्माया गया था, जिसमें लोकेशन को ट्ाली के माध्यम से खींचा गया था.

-जी हॉ! आप फिल्म ‘कर्ज’ के गाने‘एक हसीना थी’ की बात कर रहे हैं. आप इसे एक उदाहरण तो कह सकते हैं. यह तो एक बैक प्रोजेक्शन है. हम वच्र्युअल फार्मेट में कुछ ऐसा ही करते हैं. लेकिन उसमें अलग अलग चीजे होती हैं. फिल्म ‘कर्ज’ में जो था, रिषि कपूर साहब स्क्रीन पर आ गए थे. मगर यदि आपको लांग शॉट लेना है, एकदम अंदर ले जाना हो तब तो आपको उनको परदे के अंदर डालना होगा. तो यह बहुत सारी चीजे हैं जो कि होती हैं. इसके लिए सीखना आवश्यक होता है. और मैं हूं ही ऐसा जो हमेशा कुछ नया सीखना चाहता है. मुझे हमेशा कुछ नया सीखने, नए नए प्रयोग करने मे मजा आता है. मैने ‘हंटेड’ नामक थ्री डी फिल्म भी बनायी. अब वच्र्युअल फार्मेट पर ‘जुदा होके भी’ बनायी. मैं तो यह कहॅंूगा कि हम लोग यह कर पाए. यह फिल्म जिस तरह से चाहते थे, उस तरह से बना पाए, उसी में हमारी बहुत बड़ी जीत है.

फिल्म ‘‘जुदा हो के भी’’ की कहानी या कॉसेप्ट का बीज कहां से मिला?

-मेरे दिमाग में इस फिल्म के बीज के आने की भी कहानी है. कुछ वर्ष पहले मेरी एक दोस्त थी, जो कि एक रिश्ते से गुजर रही थी. एक लड़का उसे परेशान कर रहा था. मेरी दोस्त को शक हुआ कि शायद यह लड़का उस पर काला जादू कर रहा है. और उसका इस्तेमाल कर रहा है. तो हम लोग एक बाबा के पास गए. बाबा ने हमें समझाया कि एक विद्या है ‘वशीकरण’. वशीकरण एक ऐसी विद्या या विधि कह लीजिए, जिसके जरिए आप किसी को भी वश में कर सकते हैं. इस विद्या के बल पर किसी की सोच को भी वश में किया जा सकता है. मेरे लिए यह मानना बहुत मुश्किल हुआ. मगर बाबा ने कहा कि ऐसा होता है. उनसे लंबी बातचीत चली. बातचीत के दौरान मैने उनसे सवाल किया कि वशीकरण को लेकर आपके पास किस तरह के केस आते हैं. उसने जो कुछ बताया उससे मेरे दिमाग की बत्ती जल गयी. उसने कहा कि नब्बे प्रतिशत केस लड़कियों, लड़कों व सेक्स के बारे में आते हैं. लोग उनके पास किसी लड़की या लड़के को वश में कराने या किसी महिला के पति  को वश में कराने के लिए जाते थे. या किसी पुरूष की पत्नी को वश में कराने. लोग किसी न किसी के साथ सोने@हमबिस्तर होने के लिए ही वशीकरण करवा रहे थे. बाबा ने बताया कि पैसे या धन दौलत के संबंध में लोग कम आते हैं, सबसे ज्यादा रूचि लोगों को इसी तरह की चीजों में रहती है.  लोग अपनी नौकरी लग जाए, इसके लिए भी उनके ेपास कम जाते थे. लोगों के दिमाग में यही सब ज्यादा था. उसी वक्त मैने सोचा कि यह तो फिल्म की रोचक कहानी है. अगर आपके प्यार को, आपके पति या पत्नी को या आपको किसी ने वश में कर लिया, और वह आपका कहाना छोड़कर उसका कहना मान रही है. तो ऐसे विलेन से आप अपने प्यार को बचाएंगे कैसे? यह अहम सवाल पैदा हुआ. मैने यही बात भट्ट साहब से कही. उन्होने मुढसे कहा कि अब सब कुछ मुझ पर छोड़ दो. कुछ दिनों बाद वह मेरे पास ‘जुदा होके भी’ की कहानी लेकर आए.

फिल्म ‘‘जुदा होके भी’’ में आपने ज्यादातर नए कलाकारों को ही चुना. कोई खास वजह?

-वास्तव में देखे तो फिल्म में अमन का किरदार निभा रहे अभिनेता अक्षय ओबेराय नए तो नही है. उन्हे फिल्म इंडस्ट्ी में काम करते हुए दस वर्ष हो चुके हैं. वह काफी फिल्में कर चुके हैं. एंद्रिता रे दक्षिण में काफी फिल्में कर चुकी हैं. वह कन्नड़ सुपर स्टार दिगंत की पत्नी है. मेहेरजान जरुर नए हैं. उन्होने बहुत ज्यादा काम नही किया है. लेकिन जब कहानी लिखी जाती है, तो एक चेहरा आपकी आॅंखांे के सामने नजर आने लगता है कि यह चेहरा मेरी कहानी के इस किरदार पर फिट बैठता है. इसे ही सही कास्टिंग कहा जाता है. अक्षय ओबेराय के साथ मैने एक वेब सीरीज ‘ईलीगल’ की थी. उसका काम देखकर मैंने उसके साथ दोबारा काम करने की बात कही थी. इसी तरह मेहेरजान के साथ भी मैने काम किया है. लेकिन एंद्रिता के साथ मैने काम नहीं किया था. पर मेरी बेटी कृष्णा ने एंद्रिता के साथ सीरियल ‘सनक’ में काम किया था. और मुझे उसका काम बहुत पसंद आया था. इसी तरह कड़ी से कड़ी जुड़ती गयी.

सुपर नेच्युरल पावर या आपने जैसे यह फिल्म ‘वशीकरण’ पर बनायी है तो लोग आरोप लगाते हैं कि आप अंधविश्वास फैला रहे हैं. इस पर क्या कहना चाहेंगें?

-बात विश्वास या अंधविश्वास की नही है. बात एकदम सरल है. यदि आप दिन में यकीन करते हैं, तो आप यह नही कह सकते कि रात नही होती. इसी तरह यदि आप ईश्वर में यकीन करते हैं तो आपको शैतान में ंभी विश्वास करना पड़ेगा. क्योंकि वही तो काउंटर प्वाइंट है. यदि आप कहते हंै कि मैं बहुत बड़ा कृष्ण भक्त हूॅं, तो कंस की मौजूदगी या दुर्याधन की मौजूदगी से कैसे इंकार कर सकते हैं. यदि कंस नही है तो फिर कृष्ण कैसे?तो इसमें अंधविश्वास क्या?यह दोनो ही बातें विश्वास की हैं. क्यांेकि मैं जानता हॅंू कि मेरा भगवान अंधेरे को मिटाएगा. वह काली शक्तियों कोमुझसे दूर रखेगा. यही तो मेरे भगवान हैं. उसी की शरण में मैं हॅूं. तो मेेरे हिसाब से यह अंधविश्वास नही है.

इसके अलावा कौन सी फिल्में कर रहे हैं?

-मैं एक फिल्म ‘खिलौने’ का निर्देशन कर रहा हॅूं. एक फिल्म ‘इंपॉसिबल है, शायद इसका नाम बदल जाए. . कई अन्य फिल्मों की भी योजना है. अपने लिए और दूसरों के लिए  वच्र्युअल प्रोडक्शन भी करना है.

जानें पुरुष मैनोपौज के लक्षण और इलाज

पुरुष रजोनिवृत्ति सुनने में भले नया व अजीबोगरीब लगता हो लेकिन यह महिलाओं की रजोनिवृत्ति से काफी अलग स्थिति होती है. इस के संकेत, लक्षण व आवश्यक इलाज बता रहे हैं विशेषज्ञ.

पुरुषों के लिए रजोनिवृत्ति शब्द का प्रयोग कभी कभी उम्र बढ़ने के कारण टेस्टोस्टोरोन का स्तर कम होने या टेस्टोस्टोरोन की जैव उपलब्धता में कमी बताने के लिए किया जाता है.

महिलाओं की रजोनिवृत्ति और पुरुषों में रजोनिवृत्ति 2 भिन्न स्थितियां हैं. हालांकि, महिलाओं में अंडोत्सर्ग (औव्यूलेशन) खत्म हो जाता है और हार्मोंस बनने भी कम हो जाते हैं और यह सब अपेक्षाकृत कम समय में होता है जबकि पुरुषों में हार्मोन बनना और टेस्टोस्टोरोन की जैव उपलब्धता कई वर्षों में कम होती है. जरूरी नहीं है कि इस के नतीजे स्पष्ट हों.

पुरुषों में रजोनिवृत्ति महिलाओं की अपेक्षा अचानक नहीं होती है. इस के संकेत और लक्षण धीरे-धीरे और सूक्ष्मतौर पर सामने आते हैं. पुरुषों के हार्मोन टेस्टोस्टोरोन के स्तर में कमी किसी भी सूरत में उस तेजी से नहीं होती है जिस तेजी से महिलाओं में होती है. हैल्थकेयर विशेषज्ञ इसे एंड्रोपौज, टेस्टोस्टोरोन डैफिशिएंसी या देर से

शुरू हुआ हाइपोगोनाडिज्म कहते हैं. हाइपोगोनाडिज्म का मतलब है पुरुषों के हार्मोन में इतनी कमी जो किसी उम्रदराज व्यक्त्ति के लिए भी कम हो.

संकेत और लक्षण

– मूड बदलना और चिड़चिड़ापन.

– शरीर में चरबी का पुनर्वितरण.

– मांसपेशियों की कमी.

– शुष्क व पतली त्वचा.

– हाइपर हाइड्रोसिस यानी अत्यधिक पसीना निकलना.

– एकाग्रता की अवधि कम होना.

– उत्साह कम होना.

– सोने में असुविधा यानी अनिद्रा या थकान महसूस होना.

– यौन इच्छा कम हो जाना.

– यौन क्रिया ठीक से न होना

उपरोक्त लक्षण भिन्न पुरुषों में अलगअलग हो सकते हैं और यह अवसाद से ले कर दैनिक जीवन व खुशी में हस्तक्षेप तक, कुछ भी हो सकता है. इसलिए, संबंधित कारण मालूम करना महत्त्वपूर्ण है और इसे दूर करने के लिए आवश्यक इलाज किया जाना चाहिए. कुछ लोगों की हड्डियां भी कमजोर हो जाती हैं. इसे औस्टियोपीनिया कहा जाता है.

कुछ मामलों में जब जीवनशैली या मनोवैज्ञानिक समस्या आदि जिम्मेदार नहीं लगते हैं, तो पुरुष रजोनिवृत्ति के लक्षण हाइपोगोनाडिज्म के कारण हो सकते हैं जब हार्मोन कम बनते हैं या बनते ही नहीं हैं. कभी-कभी हाइपोगोनाडिज्म जन्म से ही मौजूद होता है. इस से यौनारंभ देर से आने और अंडग्रंथि छोटा होने जैसे लक्षण हो सकते हैं. कुछेक मामलों में हाइपोगोनाडिज्म का विकास जीवन में आगे चल कर भी हो सकता है खासकर उन पुरुषों में जो मोटे हैं या जिन्हें टाइप 2 डायबिटीज है. इसे देर से हुआ  हाइपोगोनाडिज्म कहा जा सकता है और ऐसे पुरुष में रजोनिवृत्ति के लक्षण सामने आ सकते हैं.

हाइपोगोनाडिज्म देर से शुरू होने का पता आमतौर पर आप के लक्षणों और खून की जांच के नतीजों से पता चलता है. इस का उपयोग टेस्टोस्टोरोन का स्तर जानने के लिए किया जाता है. पुरुष रजोनिवृत्ति के लक्षण का सब से आम किस्म का उपचार जीवनशैली से संबंधित स्वास्थ्यकर विकल्प चुनना है. उदाहरण के लिए, आप का चिकित्सक आप को सलाह दे सकता है :

– पौष्टिक आहार लें

– नियमित व्यायाम करें

– पर्याप्त नींद लें

– तनाव मुक्त रहें

जीवनशैली से संबंधित ये आदतें सभी पुरुषों के लिए फायदेमंद हो सकती हैं. इन आदतों को अपनाने के बाद पुरुष, रजोनिवृत्ति के लक्षणों को महसूस करने वाले पुरुष अपने संपूर्ण स्वास्थ्य में सकारात्मक परिवर्तन देख सकते हैं. अगर आप अवसाद में हैं तो आप के चिकित्सक ऐंटी डिप्रैसैंट्स थेरैपी और जीवनशैली

में परिवर्तन की सलाह देंगे. हार्मोन रीप्लेसमैंट थेरैपी भी एक उपचार है. हालांकि इलाज के लिए मरीज के परिवार का कैंसर प्रोस्टेट का इतिहास और ब्लड पीएसए

की रिपोर्ट चाहिए होती है अगर डाक्टर को लगता है कि हार्मोन रीप्लेसमैंट थेरैपी से फायदा होगा.

बालों से जुड़ी प्रौब्लम का इलाज बताएं?

सवाल-

मैं 19 वर्षीय युवती हूं. मेरी समस्या यह है कि मैं ने पहले अपने बालों पर ब्लैक कलर यूज किया और अब कुछ समय से मेहंदी का प्रयोग कर रही हूं, जिस से बाल आधे काले और आधे लाल हो गए हैं. इस वजह से मैं किसी पार्टी में अपने बाल खुले नहीं रख पाती. कोई ऐसा उपाय बताएं जिस से मुझे कलर को दोबारा यूज न करना पड़े और मेहंदी से बालों का नैचुरल कलर आए?

जवाब-

बालों को एकजैसे कलर में लाने के लिए मेहंदी को रात भर भिगोए हुए आंवलों को उबाल कर उन के पानी में घोलिए और फिर उसे बालों में अच्छी तरह लगाइए. इस से बालों का रंग धीरेधीरे एकजैसा हो जाएगा और आप को कलर यूज नहीं करना पड़ेगा.

सवाल-

मेरी उम्र 30 वर्ष है. मैं अपने बालों की साफसफाई का विशेष ध्यान रखती हूं. फिर भी पिछले कुछ समय से मेरे बाल बड़ी संख्या में झड़ रहे हैं. रूखे, टूटते, बेजान बाल मुझे हीनभावना का एहसास कराते हैं. मैं बालों को रोजाना धोती हूं और ब्लो ड्रायर का इस्तेमाल करती हूं. उन्हें समेटे रखने के लिए रबड़बैंड लगाती हूं. मैं ऐसा क्या करूं जिस से मेरे बाल स्वस्थ, घने व मुलायम हो जाएं?

जवाब-

आप बालों को रोजाना धोना बंद करें. अगर बाल औयली हैं तो उन्हें हर तीसरे दिन धोएं और अगर ड्राई हैं तो हर चौथे दिन धोएं. बालों में ब्लोड्रायर व रबड़बैंड का प्रयोग न करें. इस से बाल रूखे होते हैं और टूटते हैं. हमेशा मुलायम रबड़बैंड ही लगाएं यानी जिस से बाल न खिंचें. अगर सिर की त्वचा औयली है तो लैमन या औरेंज बेस्ड शैंपू का प्रयोग करें और अगर ड्राई है तो ऐलोवेरा बेस्ड शैंपू का प्रयोग करें. बालों को नरममुलायम व चमकदार बनाने के लिए ऐलोवेरा के पल्प में मेथीदाने का पेस्ट, दही व औलिव औयल मिला कर हेयरपैक बनाएं. फिर उसे बालों में आधा घंटा लगाए रखें. बाद में शैंपू कर लें.

सवाल-

मैं 45 वर्षीय कामकाजी महिला हूं. मेरी समस्या यह है कि पिछले 2-3 महीनों से मेरी मांग यानी पार्टिंग के आसपास से बाल कम होने लगे हैं, इसलिए मुझे सीधी पार्टिंग की जगह साइड पार्टिंग करनी पड़ रही है. साथ ही बाल सफेद भी होने लगे हैं. सिर पर दाने से भी हो गए हैं जिन में खुजली होती है. कृपया मुझे इन परेशानियों से छुटकारा पाने का उपाय बताएं.

जवाब-

अगर सीधी पार्टिंग से वहां बालों की संख्या कम हो रही है तो पार्टिंग का स्थान बदलना ही ठीक है वरना वहां से बाल और कम होते जाएंगे. सफेद बालों की समस्या को दूर करने के लिए बालों में मेहंदी लगाएं. रही बात सिर के दानों की समस्या की तो नीम की पत्तियों को पानी में उबाल लें. फिर शैंपू करने के बाद इस पानी से बालों को रिंस करें. इस से यकीनन लाभ होगा.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

मसालों को ऐसे रखें सुरक्षित, अपनाएं ये 7 टिप्स

सभी व्‍यंजनों में मसाले सबसे महत्‍वपूर्ण तत्‍व होते हैं. ये सादे से दिखने वाले मसाले, किसी भी प्रकार के व्‍यंजन का ज़ायका बदल देते हैं. उनकी महक और ताजगी, हर डिश को लाजवाब बना देती है. हम घरों में हर दिन कई प्रकार के मसालों का इस्‍तेमाल करते हैं और कई मसाले ऐसे होते हैं जिन्‍हें कभी-कभार ही इस्‍तेमाल किया जाता है. ऐसे में सबसे बड़ी मुश्किल ये होती है कि इन मसालों को किस प्रकार सही तरीके से रखा जाएं कि इनमें सीलन न आ पाएं और इनकी महक और ताजगी भी बनी रहें.

आज हम आपको ऐसे कई तरीके बताएंगे, जिनसे आप मसालों को लम्‍बे समय तक सुरक्षित रख पायेंगे. सबसे पहले आपको यह जानना होगा कि किस प्रकार के मसालों को कितने दिनों तक स्‍टोर किया जा सकता है, जो कि निम्‍न प्रकार है.

– बीजों या छाल को 2 साल तक स्‍टोर किया जा सकता है.

– औषधि या फूलों को 1 साल तक स्‍टोर कर सकते हैं.

– जमीनी जड़ को 2 से 3 साल तक स्‍टोर किया जा सकता है.

इससे ज्‍यादा दिन तक रखने के बाद मसालों में अपने आप ही कीट या कीड़े हो जाते हैं जो आपके हेल्थ को हानि पहुंचाते हैं. आइए जानते हैं मसालों को सुरक्षित रखने के कुछ आसान तरीके:

1. हर्ब और मसालों को हमेशा सूखे स्‍थानों पर ही रखें. नमी वाली जगह पर रखने से इनमें गोलियां जैसी बन जाती हैं और कीड़े पड़ जाते हैं.

2. बहुत ज्‍यादा रोशनी वाली जगह पर मसालों को न रखें. रोशनी, मसालों के अंदर होने वाले ऑयल को ऑक्‍सीडाइज कर देता है जिसकी वजह से उनका वास्‍तविक ज़ायका बेकार हो जाता है.

3. पारदर्शी जार में मसालों को रखने से बेहतर है कि किसी डार्क जार में इन्‍हें रखें. इससे उनमें लाइट भी ज्‍यादा नहीं पड़ेगी.

4. कई लोगों को ऐसा लगता है कि फ्रिज में मसालों को रखने से वो कभी खराब नहीं होते हैं. यह एक मिथ है. फ्रिज में रखने से मसालों का फ्लेवर खत्‍म होने लगता है. लेकिन अगर आप इन्‍हें एयर-लॉक कंटेनर में रखकर फ्रिजर में डाल देते हैं तो मसाले ठीक रह सकते हैं.

5. पीसे हुए मसालों की अपेक्षा, खड़े मसालों को स्‍टोर करें. जरूरत के हिसाब से उन्‍हें पीसते रहें. खड़े मसाले इतनी जल्‍दी खराब नहीं होते हैं जितनी जल्‍दी पीसे हुए मसाले खराब हो जाते हैं. साथ ही ताजे पीसे हुए मसालों का ज़ायका भी लाज़बाव होता है.

6. वैक्‍यूम सील वाले पिंट जारों में मसालों को करके रखने से इनमें कीट नहीं होते हैं. बस इन्‍हें आपको किसी अंधेरे वाले स्‍थान पर रखना होता है. इसमें फ्रेशनेस बरकरार रहती है.

7. बहुत ज्‍यादा मसाले एक साथ न खरीदें. उन्‍हें बहुत बड़े जार में न रखें. छोटे और आवश्‍यकतानुसार जार में ही करके रखें. इससे उनका एरोमा बना रहेगा.

शादी के बाद धोखा देने के क्या होते हैं कारण

धोखा देना इंसान की फितरत है फिर चाहे वह धोखा छोटा हो या फिर बड़ा. अकसर इंसान प्यार में धोखा खाता है और प्यार में ही धोखा देता है. लेकिन आजकल शादी के बाद धोखा देने का एक ट्रेंड सा बन गया है. शादी के बाद लोग धोखा कई कारणों से देते हैं. कई बार ये धोखा जानबूझकर दिया जाता है तो कई बाद बदले लेने के लिए. इतना ही नहीं कई बार शादी के बाद धोखा देने का कारण होता है असंतुष्टि. कई बार तलाक का मुख्‍य कारण धोखा ही होता है. लेकिन ये जानना भी जरूरी है कि शादी के बाद धोखा देना कहां तक सही है, शादी के बाद धोखे की स्थिति को कैसे संभालें. क्या करें जब आपका पार्टनर आपको धोखा दे रहा है.

शादी के बाद धोखा देने के कारण

1. असंतुष्टि- कई बार पुरूष को अपनी महिला साथी से संभोग के दौरान असंतुष्टि होती है जिसके कारण वह बाहर की और जाने पर विविश हो जाता है और जल्दी ही वह दूसरी महिलाओं के करीब आ जाता है, नतीजन वो चाहे-अनचाहे अपनी महिला साथी को धोखा देने लगता है.

2. खुलापन- समाज में आ रहे खुलेपन के कारण भी पुरूष अपनी महिला साथी को धोखा देने से नहीं चूकता. दरअसल, समाज में खुलापन आने के कारण लोग खुली मानसिकता के हो गए हैं जिससे उन्हें विवाहेत्तर संबंध बनाने में भी कोई दिक्कत नहीं होती और महिलाएं भी बहुत बोल्ड हो गई हैं. इस कारण भी पुरूष अपनी महिला साथी का धोखा देते हैं.

3. संभावनाओं के कारण- आजकल विवाहेत्तर संबंध बनने की संभावनाएं अधिक हैं यानी विवाहेत्तर संबंध आसानी से बन जाते हैं. जिससे पुरूष अपनी पत्नी को धोखा देने लगते हैं, यह सोचकर कि उन्हें कुछ पता नहीं चलेगा.

4. आपसी वार्तालाप ना होना- पुरूष अकसर चाहते हैं कि वो अपनी पत्नी से खूब बातें करें और उनकी पत्नी भी अपनी बातें शेयर करें लेकिन जब आपसी वार्तालाप या संवाद की स्थिति खत्म हो जाती है तो रिश्तों में दरार आने और धोखा देने की संभावना अधिक बढ़ जाती है.

5. प्रयोगवादी होना- लोग आजकल नए-नए एक्सपेरिमेंट करते हैं. जब कोई पुरूष रिश्तों से उबने लगता है तो वह एक्सपेरिमेंट करने से नहीं चूकता. लेकिन जब पत्नी इसमें सहयोग नहीं देती तो पुरूष धोखा देने लगते हैं.

महिलाओं का शादी के बाद धोखा देने के कारण

1. अफेयर होना- आमतौर पर महिलाएं शादी के बाद पुरूषों को इसीलिए धोखा देने लगती हैं, क्योंकि उनका शादी से पहले किसी से अफेयर होता है या फिर उनका पहला प्रेमी उन्हें परेशान और ब्लैकमेल करता है जिससे वे धोखा देने पर मजबूर हो जाती हैं.

2. विश्वास ना होना- इसीलिए कुछ महिलाएं धोखा देने लगती हैंक्योंकि उनका पति उन पर विश्वास नहीं करता या फिर बिना किसी वजह शक करता है.

3. बोरियत होना- कई बार महिलाएं घर में रहकर या फिर एक ही तरह के रूटीन से बोर हो जाती हैं और अकेले रहते-रहते वे बाहर की और आकर्षित होती हैं. नतीजन कई बार उनके इससे विवाहेत्तर संबंध भी बन जाते हैं.

4. साथी से विचार ना मिलना- कई बार पति से विचार ना मिलना या फिर हर समय घर के झगड़े के कारण भी महिलाएं बाहर की ओर आकर्षित होती हैं.

इसके अलावा भी बहुत से कारण हैं जिससे महिलाएं और पुरूष शादी के बाद भी अपने साथी को धोखा देने लगती हैं.

Monsoon Special: फैमिली के लिए बनाएं हरियाली दाल पूरी

नाश्ते में आपने आलू पूरी तो कई बार बनाई होगी. लेकिन क्या आपने कभी हरियाली पूरी बनाकर खाई है. हरियाली पूरी हैल्दी और टेस्टी है, जिसे आसानी से फैमिली के लिए बनाकर खा सकते हैं.

सामग्री

1 कप गेहूं का आटा

1 कप उरद दाल आटा

11/2 कप मेथीपत्ती कटी हुई

1/2 कप आलू मैश किए

1 छोटा चम्मच अजवाइन

चुटकी भर हींग

2 छोटे चम्मच तेल

1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च

2 हरीमिर्चें कटी

तलने के लिए पर्याप्त तेल

नमक स्वादानुसार.

विधि

एक बड़ी ट्रे या परात में गेहूं का आटा, उरद का आटा, नमक और आलू मैश किए भी अच्छी तरह मिलाएं. अब इस में अजवाइन, लालमिर्च व हींग मिलाएं. मेथीपत्ती को 1/2 कप पानी में मिला कर पीसें. इस में हरीमिर्च भी पीस लें. इस पेस्ट और 2 छोटे चम्मच तेल आटे में मिलाएं. आवश्यकतानुसार पानी डालें और कड़ा आटा गूंध लें. ढक कर 10-15 मिनट के लिए रख दें. फिर बराबर 20 गोलियां बना कर गोल बेल लें. अब कड़ाही में तेल गरम कर पूरियों को तल लें. गरमगरम चटनी, आचार या फिर सब्जी के साथ परोसें.

‘सिंगल मदर समाज के लिए सौफ्ट टारगेट होती है- अनीता शर्मा

समाज की रूढि़यों को

जिस किसी को भी दिल्ली के आईटीओ इलाके का थोड़ा सा भी इतिहास पता हो, तो उसे यह भी जरूर याद होगा कि वहां की इमारतों के एक समूह में हिंदी, इंग्लिश, पंजाबी, उर्दू के कई नामचीन अखबार छपते थे. इस वजह से वहां पत्रकारों, संपादकों, फोटोग्राफरों सहित तमाम बुद्धिजीवियों का जमावड़ा लगा रहता था.

फिर समय का ऐसा फेर आया कि अखबार वाले वहां से दूसरी जगह शिफ्ट हो गए, पर उन्हीं इमारतों में से एक इमारत में उडुपी नाम का दक्षिण भारतीय व्यंजनों का एक कैफे आज भी मौजूद है.

हाल ही में उसी कैफे में अनीता वेदांत नाम की एक महिला से मुलाकात हुई जो दिखने में दूब जैसी नाजुक थीं, पर जब उन्होंने अपने ‘सिंगल मदर’ होने और 8 साल के बेटे वेदांत को अकेले पालने की दास्तान सुनाई तो उन में मुझे शमशीर की ऐसी धार दिखाई दी, जो समाज की रूढि़यों पर वार करने में जरा भी नहीं झिझकती है.

अनीता वेदांत का यह सफरनामा जानने से पहले इस ‘सिंगल मदर’ शब्द को जरा खंगाल लेते हैं, जो पिछले कुछ सालों में भारतीय शहरों में तेजी से गूंजने लगा है. ‘सिंगल मदर’ को आसान हिंदी में ‘एकल मां’ कहते हैं. इस का मतलब ऐसी मां से है जो अकेली अपने बच्चों का लालनपालन करती है, पर पति के जिंदा रहते हुए. वह तलाकशुदा हो सकती है या नहीं भी. कभीकभी तो शादीशुदा भी नहीं.

एक मिसाल हैं

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नीना गुप्ता ‘सिंगल मदर’ होने की शानदार मिसाल हैं. अपनी जवानी में वे वैस्टइंडीज के दिग्गज क्रिकेट खिलाड़ी विवियन रिचर्ड्स के प्यार में थीं, बिना शादी किए बेटी को पैदा किया और पालापोसा भी अकेले ही. आज उन की बेटी मसाबा गुप्ता देश की जानीमानी फैशन डिजाइनर हैं.

नीना गुप्ता देश की एक नामचीन कलाकार हैं, लेकिन हर ‘सिंगल मदर’ पैसे और रुतबे के लिहाज से मजबूत हो, ऐसा जरूरी नहीं है. संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 4.5 फीसदी घरों को ‘सिंगल मदर’ चला रही हैं, जिन की संख्या करीब 1.3 करोड़ है. रिपोर्ट के मुताबिक अनुमानित ऐसी ही 3.2 करोड़ महिलाएं संयुक्त परिवारों में भी रह रही हैं.

अब अनीता वेदांत पर फोकस करते हैं, जो नीना गुप्ता जितनी मशहूर तो नहीं हैं, पर हिम्मत में उन्हें पूरी टक्कर देंगी. चूंकि उडुपी कैफे में उस दिन अनीता वेदांत का 8 साल का बेटा वेदांत भी हमारे साथ था, तो उसे बिजी रखने के लिए उन्होंने फोन पर बच्चों के गाने लगा कर हैंड्स फ्री वेदांत के कान में लगा दिए थे. इस की एक वजह यह भी थी कि वे नहीं चाहती थीं कि वेदांत हमारी बातचीत को सुने, फिर कई तरह के सवाल करे.

शिक्षा बेहद जरूरी

अनीता वेदांत का नाम अनीता शर्मा है और वे दिल्ली में पैदा हुई थीं. अपनी शुरुआती पढ़ाईलिखाई उत्तर प्रदेश से करने के बाद वे दिल्ली आ गईं और आगे की पढ़ाई के लिए वहां दाखिला ले लिया. अपनी पोस्ट ग्रैजुएशन तक की पढ़ाईलिखाई उन्होंने दिल्ली से ही पूरी की थी. वे खेलों में भी काफी अच्छी थीं. उन्हें दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दिवंगत शीला दीक्षित के हाथों अवार्ड भी मिल चुका है.

शिक्षा को ले कर अनीता शर्मा का मानना है, ‘‘शिक्षा को अपने जीवन में उतारना बहुत ही जरूरी है. मैं ने भी यही किया. मेरे पिता ट्रक मैकैनिक हैं और मां गृहिणी, जिन्होंने हम 6 भाईबहनों का लालनपालन किया. चूंकि मैं शिक्षा से गहरे से जुड़ी थी तो मुझे लगता था कि किताबें हमें कभी झठ बोलना नहीं सिखाती हैं, कभी गलत चीजों को सहना नहीं सिखाती हैं, तो उन्हीं किताबों की बातों को मैं ने जीवन में भी उतारा.

‘‘फिर मेरे जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जो हर चीज में अव्वल रहने वाली अनीता के लिए टर्निंग पौइंट बन गया. 2010 में मैं ने 10वीं कक्षा पास की थी. उन्हीं दिनों हमारे एक करीबी रिश्तेदार के बेटे ने मेरे साथ 3 बार जबरदस्ती करने की कोशिश की. जब मैं ने अपने घर वालों को बताया तो वे उस रिश्तेदार की तरफ खड़े दिखाई दिए खासकर मेरी मां. समाज के नाम पर मुझे चुप रहने के लिए कहा गया. मैं ने काफी कोशिश की, पर मुझ से यह सब बरदाश्त नहीं हो पाया. तब मुझे बहुत ज्यादा अकेलापन महसूस हुआ और मैं ने अपना घर छोड़ दिया.

काम की तवज्जो

अनीता बताती हैं, ‘‘इस के बाद हालांकि मेरा कोई इरादा तो नहीं था, पर समाज के चुभते सवालों से छुटकारा पाने के लिए मैं ने लव मैरिज कर ली. उस समय मैं साढ़े 19 साल की थी और अपने एक दोस्त के घर जा कर उन्हें सब बताया तो उन्होंने मेरा संबल बनते हुए मुझ से शादी कर ली, पर शादी के दूसरे ही दिन मुझे उन के स्वभाव के बारे में पता चल गया.

‘‘दरअसल, हम दोनों घर का समान लेने के लिए बाजार गए थे और किसी आदमी के कमैंट पर मैं हंस दी, जो मुझ जैसी पढ़ीलिखी महिला के लिए एक सामान्य सी बात थी, पर मेरे पति को यह सब अच्छा नहीं लगा और फिर तो हमारे अगले 3 साल बड़े बुरे गुजरे. वे मेरी हर बात पर शक करते थे. शायद उन के दिमाग में यह बात थी कि जब इस के घर वालों ने इस का साथ नहीं दिया तो गलती इसी की रही होगी.

‘‘इस के बाद भी मैं ने रिश्ता निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. घर की आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए मैं ने एक स्कूल में टीचर की नौकरी कर ली. चूंकि मैं इंग्लिश में अच्छी थी, तो स्कूल वालों को मेरा पढ़ाने का तरीका पसंद आया. पहले साल में ही मुझे शिक्षक सम्मान मिला. धीरेधीरे मैं अपने काम में तो आगे निकल गई, पर पारिवारिक रिश्ते कहीं पीछे छूट गए.’’

तलाक ही एक रास्ता था

अनीता बताती हैं, ‘‘जब मैं दिल्ली के लक्ष्मी नगर के एक स्कूल में पढ़ाती थी, तो वहां की प्रिंसिपल से अपने टूटते रिश्ते के बारे में बताया. उन्होंने सलाह दी कि बेबी कर लो, उस के बाद रिश्ता पटरी पर आ जाएगा. मैं ने यह भी कर के देखा और 2013 में बेटा हो गया, पर उस के बाद दिक्कतें और ज्यादा बढ़ गईं. इसी तरह 2 साल और निकले, फिर मैं ने थकहार कर पति से तलाक मांग लिया.

‘‘मेरे पति ने मुझे तलाक देने से मना कर दिया. पर मुझे यह चिंता सता रही थी कि इस माहौल में हो सकता है कि अपने पिता को देख कर मेरा बेटा भी कल को मेरी इज्जत न करे.

क्या पता वह किसी भी महिला की इज्जत न

करे. लिहाजा, मार्च, 2017 में मैं ने अपने पति का घर भी छोड़ दिया और कानपुर गर्ल्स होस्टल चली गई.

‘‘कानपुर जाने की एक वजह यह भी थी कि मैं वहां से तलाक लेने की कार्यवाही कर सकती थी क्योंकि मेरे जेठ वहीं रहते हैं. लेकिन मेरे पति ने तलाक नहीं दिया और अब पिछले 5 सालों से मैं अकेली अपने बेटे को पाल रही हूं.’’

हम सब जानते हैं कि भारतीय समाज दकियानूसी रीतिरिवाजों से भरा है और अगर कोई महिला अकेली अपने बच्चे का लालनपालन कर रही होती है तो उसे ट्रोल करने वालों की तो जैसे लौटरी लग जाती है. गाहेबगाहे उस से जरूर पूछा जाता है कि बच्चे के पिता कहां हैं, वे क्या करते हैं, उन का नाम क्या है आदि.

अनीता शर्मा का बेटा अब 8 साल का हो गया है और स्कूल जाता है. जरा सोचिए, जब वह अपने आसपास के माहौल में तैरते सवालों को अपनी जबान देता होगा कि मम्मी हम पापा के साथ क्यों नहीं रहते हैं या दादादादी के घर क्यों नहीं जाते हैं, तो एक मां कैसे उन से जूझती होगी.

यह जो हमारे समाज की महिलाओं को जज करने की आदत है न, वह किसी को भी मन से तोड़ने में देर नहीं लगाती है. एकल मांएं तो ऐसे समाज के लिए सौफ्ट टारगेट होती हैं, जिन्हें ताने सुनाना लोग अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. वे खुद तो जैसेतैसे इस तरह के सवालों को झेल जाती हैं, पर जब उन के बच्चों को पोक किया जाता है, तो वह असहनीय हो जाता है.

गलत का साथ कभी नहीं

अनीता शर्मा के साथ भी यही हुआ. उन्होंने बताया, ‘‘जब से वेदांत थोड़ा समझदार हुआ है, वह अपने पापा का नाम मुझ से पूछता है. एक टीचर होने के नाते मैं बच्चों को किताबों की लिखी बातें समझती हूं कि हमारे लिए परिवार जरूरी होता है, पर अपने बेटे को इस बारे में जवाब नहीं दे पाती हूं तो बहुत परेशान हो जाती हूं. कभीकभी उसे डांट भी देती हूं, लेकिन साथ ही मुझे सुकून भी है कि मैं ने कभी गलत का साथ नहीं दिया. मेरे परिवार में किसी लड़की के साथ ऐसा होता है, उस के सामने मैं उदाहरण हूं. लेकिन मैं यह भी नहीं चाहूंगी कि कोई बेवजह अपना घर तोड़े.

‘‘सिंगल मदर पासपड़ोस के तानों से बचने के लिए घर के दरवाजे तो बंद कर सकती है, पर काम की जगह पर रह कर काम से तो मुंह नहीं मोड़ सकती है. ऐसा मेरे साथ भी हुआ है. स्कूल में जब मेरे काम की वजह से तरक्की हुई तो उसे भी शक की निगाह से देखा जाने लगा. अजीब तरह की राजनीति होने लगी, पर मैं ने अपने काम पर ही फोकस रखा.

‘‘आज मैं अपने स्कूल में टीचर होने के साथसाथ कोऔर्डिनेटर भी हूं. मैं बच्चों की कैरियर और इमोशनल काउंसलिंग करती हूं. अगर उन्हें कोई पर्सनल प्रौब्लम होती है तो वे कभी भी मुझ से साझ कर सकते हैं.’’

पुनर्मिलन- भाग 5: क्या हो पाई प्रणति और अमजद की शादी

सुबह परदों से छन कर आती सूर्य की किरणों के मद्धिम प्रकाश ने उसे सुबह होने का एहसास कराया कि तभी दरवाजे पर हुई आहट से वह अपने बैड पर उठ कर बैठ गई, देखा तो सामने उस की प्यारी सहेली सुनयना खड़ी थी. उन दोनों की मुलाकात ट्रेनिंग के दौरान भोपाल की प्रशासनिक अकादमी में हुई थी. वह म.प्र. पुलिस में एक अधिकारी थी और इंदौर में ही पोस्टेड थी. अमजद और प्रणति के बारे में उसे कुछ ज्यादा पता नहीं था.

वह आते ही प्रणति के गले लग गई. बोली, ‘‘और बता कैसा रहा जीजू से मिलन का अनुभव? क्या उपहार दिया उन्होंने? ससुराल में सब का व्यवहार कैसा है… अरे, मैं लगातार बोलती जा रही हूं तू भी तो कुछ बोल,’’ कह कर जब उस ने प्रणति की आंखों में झंका तो उस की आंखों में आंसू देख कर चौंक गई और घबरा कर बोली, ‘‘क्या हुआ प्रणू तू रो क्यों रही है… कुछ गड़बड़ हुआ है क्या… क्या जीजू… ने कुछ…’’

‘‘क्या बताऊं और क्या छिपाऊं मैं सोना,’’ कहते हुए अब तक की सारी दास्तां उस ने सुनयना के आगे बयां कर दी.

‘‘उफ, यह क्या हो गया…’’ सुनयना हैरत

से बोली.

‘‘मैं किसी भी कीमत पर विवाह को तैयार नहीं थी पर मातापिता की भावनाओं के आगे हम बेटियां हमेशा से मजबूर होती रही है. मुझे अपने लिए तनिक भी दुख नहीं है पर मांपापा को इस कटु सचाई से कैसे रूबरू कराऊं कुछ समझ ही नहीं आ रहा. क्या बीतेगी उन पर यह सब सुन कर… केवल समाज के झठे भय और जिद से इतनी जिंदगियां एकसाथ खत्म हो गईं… विवाह.’’

कुंडली मिलाने से नहीं सोना बल्कि आपसी समझदारी से सफल होते हैं…

और समझदारी

आपसी प्यार से जन्म लेती है,’’ कहतेकहते प्रणति सुनयना के

गले लग फूटफूट कर रो पड़ी.

कुछ देर सोचने के बाद सुनयना बोली, ‘‘मयंक ने तुझे हाथ तक नहीं लगाया इस का सीधा सा तात्पर्य है कि उस ने सिर्फ अपने मातापिता के अहं की शांति के लिए विवाह किया. जब मयंक ने इतनी ईमानदारी से अपने बारे में बता दिया है तो इस झठे रिश्ते को महज दिखावे के लिए ढोने से कोई मतलब नहीं… तुम दोनों आपसी सहमति से तलाक ले कर अपनीअपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाओ… मांपापा को इस स्थिति से अवगत कराना बहुत जरूरी है ताकि वे तुम पर वहां जाने के लिए दबाव न बनाएं. कभीकभी हमारे मातापिता अपनी जिद और अहंकार को ही सर्वोपरि मान लेते हैं. उन्हें लगता है वे जो कर रहे हैं बस वही सही है.’’

‘‘कौन से दबाव और अहंकार की बात कर रही हो बेटा… और क्या हमें बताना चाह रही हो…’’ दरवाजे पर प्रणति के पापा न जाने कब से खड़े थे सो उन की ओर देखते हुए बोले.

‘‘नहीं पापा कुछ नहीं, आइए बैठिए… कहां चले गए थे? आप मैं जब आई थी तो आप थे

ही नहीं,’’ कह कर वह पापा के गले लग फिर से रो पड़ी.

‘‘कुछ काम था… जैसे ही पूरा हुआ अपनी लाडली से मिलने चला आया,’’ कह कर पापा ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘चलो तुम लोग बात करो मैं चलता हूं,’’ कह कर पापा नीचे आ गए.

‘‘कुछ समय के बाद मौका देख कर सब बता देना और मयंक से बात कर के आपसी सहमति से तलाक की अर्जी दे दो… अबजब सब बिगड़ गया है तब इन को समझ आ जाएगा,’’ अच्छा अब मैं चलती हूं कह कर सुनयना ने उस से विदा ली.

कुछ दिनों के बाद जब ससुराल से सास का बुलावा आया तो प्रणति अपनी मम्मी से बोली, ‘‘मां, अभी 2-4 दिन और रुक कर जाऊंगी.. मैं ने मयंक से बात कर ली है वे आ जाएंगें मुझे लेने.’’

‘‘ठीक है जैसी तेरी मरजी,’’ कह कर मां अपने काम में लग गईं.

जब 1 माह तक भी न मयंक उसे लेने आया और न ही प्रणति ने जाने के बारे में कुछ कहा तो मां की अनुभवी नजरों में मानो कुछ खटकने सा लगा था. एक दिन उचित अवसर देख कर मां बड़े ही प्यार से बोली थीं, ‘‘बेटा सब ठीक तो है न? कब जाने का विचार है? कब आ रहे हैं दामादजी तुझे लेने.’’

‘‘मां कुछ भी ठीक नहीं हैं, मेरे और उन के बीच ऐसा कुछ भी नहीं हैं कि वे मुझे लेने आएं और मैं वहां जाऊं,’’ कह कर रोते हुए प्रणति ने सारी दास्तां मां को कह सुनाई.

इसी बीच न जाने कब पिताजी दरवाजे पर आ गए और उन्होंने भी सब सुन लिया.

प्रणति के चुप होते ही वे दहाड़े, ‘‘इस कर्नल के बच्चे को मैं देख लूंगा… मेरी बेटी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश की इस ने… मेरे साथ धोखा किया,’’ कह कर पिताजी अलमारी में से अपना रिवौल्वर ले आए. प्रणति और उस की मम्मी ने बड़ी मुश्किल से उन्हें संभाला. यद्यपि वह अपने पापा से कहना चाहती थी कि आप ने भी तो अपने दोस्त के साथ धोखा किया है, पर संस्कारों की बेडि़यों ने उस के मुंह पर मानो ताला लगा दिया.

इस के बाद मयंक और प्रणति ने आपसी सहमति से तलाक ले लिया. इस बीच प्रणति की ट्रेनिंग के बाद इंदौर में पोस्टिंग हो गई. इस घटना के बाद से पापामम्मी दोनों बीमार रहने लगे रहते तो वे भोपाल में ही थे पर अकसर प्रणति के पास आतेजाते रहते. अब वे मन ही मन प्रणति की बिखरी जिंदगी के लिए खुद को जिम्मेदार मान रहे थे, जो काफी हद तक सही भी था.

‘‘दीदी कितनी देर तक नहाती हो आप… बाहर आओ मेरा काम खत्म हो गया मैं जा रही हूं… खाना टेबल पर लगा दिया है,’’ कांता बाई की आवाज से उस की तंद्रा भंग हुई तो फटाफट वह बाहर निकली. सोमवार को औफिस पहुंच कर अभी उस ने अपना लैपटौप खोला ही था कि अमजद का फोन आ गया. उस ने प्रणति से आज मिलने का कंफर्मेशन लिया. अमजद के बारे में सोच कर वह मन ही मन मुसकरा उठी. तभी सहकर्मी रंजना ने उस के कैबिन में आ कर उसे चौंका दिया, ‘‘क्या बात है आज मैडम बड़ी खुश नजर आ रही हैं.’’

‘‘आ बैठ न मुझे तुझे एक बात बतानी है,’’ कह कर उस ने अमजद के बारे में रंजना को सब बता दिया.’’

रंजना चूंकि प्रणति के अतीत के बारे में सब जानती थी सो जोश में भर कर

बोली, ‘‘देख इसे तू कुदरत का दिया हुआ एक और मौका मान. अब मम्मीपापा को केवल सूचना दे कि तू अमजद से विवाह कर रही है. उन की परमीशन लेने की भी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि जरूरी नहीं कि हमारे बड़े हर बार सही निर्णय ही लें. ऐसे में हमें स्वयं निर्णय लेने का साहस करना चाहिए. बस अब तो तू जल्दी से अपनी गृहस्थी बसा,’’ रंजना खुशी के आवेश में कुछ और बोलती उस से पहले ही प्रणति बोली, ‘‘ओ मैडम इतने खयालीपुलाव मत पका अभी तक अमजद के बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं है.’’

‘‘तो आज पता कर लेना,’’ कह कर रंजना चली गई.

रैड लाइट- भाग 3: क्या बिगड़े बेटे को सुधार पाई मां

मिल्ड्रेड की आयु के 75 वर्ष पूरे होने पर उन की प्लैटिनम ऐनिवर्सरी के सम्मानस्वरूप सब बेटों ने मिल कर उन के पुराने जर्जर घर का पुनरुद्धार किया. बड़ी बेटी वीरता पदक प्राप्त आर्मी मेजर की विधवा है और आर्मी हौस्पिटल में औपरेशन रूम नर्स. उसे इंटीरियर डैकोरेशन का शौक है और उस ने घरों की रंगाईपुताई का प्रोफैशनल कोर्स भी कर रखा है. अपने युवा बेटेबेटी सहित वह मां के घर की ऊपरी मंजिल में बाकायदा किराया दे कर रहती है. कौन्सर्ट पियानिस्ट सब से छोटी, अविवाहित बेटी और सब से छोटा बेटा भी मां के साथ रहते हैं. बड़ी और छोटी, दोनों बेटियों, छोटे बेटे और नातीनातिन ने दोमंजिले पूरे घर के रखरखाव की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है. बड़ी बेटी ने बहुत शौक से घर के अंदरबाहर की पूरी पेंटिंग खुद की. छोटे बेटे और नाती ने छत की खपरैलें बदलीं. गरमी में घर के आगेपीछे लौन की घास काटना, पतझड़ में आसपास से उड़ कर जमा पत्तों के ढेर उठाना और जाड़ों में बर्फ साफ करना, ये सब वे लोग ही करते हैं. बेटियों, बहुओं की लाख कोशिशों के बावजूद घर की रोजमर्रा सफाई और थोड़ीबहुत बागबानी मिल्डे्रड स्वयं करती हैं.

जो बेटे अपनेअपने बीवीबच्चों सहित अलग रहते हैं वे भी रविवार को मिल्डे्रड के घर पर इकट्ठे हो कर एकसाथ घूमने जाते हैं जिस के बाद पूरा परिवार साथ बैठ कर लंच करता है. सारी खरीदफ रोख्त खुद ही कर के पूरा खाना मिल्ड्रेड अकेले बनाती हैं और खाने की मेज भी बिलकुल फौर्मल तरीके से सुबहसुबह सजा कर तैयार करती हैं. सालों के अपने नियम में सिर्फ इतनी ढील देने लगी हैं कि बेटियां, बहुएं खाने के बाद मेज और खाना समेटें और कौफी सर्व करें.फार्मर्स मार्केट से ताजे फल, सब्जी खरीदते समय मिल्ड्रेड बखूबी याद रखती हैं कि परिवार में किस को क्या पसंद है. कभी कच्ची, कभी पका कर पहुंचा भी आती हैं. उन की पैनी निगाहें भांप लेती हैं कि अत्यधिक व्यस्तता के  कारण किस के यहां धुला ई के कपड़ों का ढेर हो गया है, किस का फ्रिज साफ कर के चीजें ला कर स्टौक करना है. लाख मना करने पर भी नखशिख से सब दुरुस्त कर के ही लौटती हैं.

‘‘हैल्प योरसैल्फ ऐंड ऐंजौय’’ लिखे गत्ते के टुकड़े के पीछे खड़ी मिल्ड्रेड पर कैमरा क्लिक कर के सुमि उन से विदा लेती है.

लगभग 2 सप्ताह बाद मुलाकात में गौर्डन सुमि को अपने महल्ले में उसी उत्साह से फिर घुमाते हैं जितने चाव से पहली भेंट में अपना रैल्फ मैन्शन दिखाया था. अपनी रनिंग कमैंट्री के साथ टहलते हुए वे इस बार उसे इलाके के उस हिस्से में ले जाते हैं जहां अधिकांश घर तालाबंद हैं और एकाध में मरम्मत चल रही है. मिल्ड्रेड के घर जैसे तो नहीं लेकिन रहने काबिल बनाए गए एकमंजिले घर के दरवाजे पर गौर्डन दस्तक देते हैं. गौरवर्ण एक वृद्धा द्वार खोलती हैं और गौर्डन को देख कर खिल उठती हैं.

‘‘मीट कौंस्टेंस स्टेहमायेर,’’ गौर्डन सुमि से कहते हैं और गृहस्वामिनी से मिलवाते हैं. वृद्धा बड़े प्रेम से स्वागत करती हैं.

कौंस्टेंस को सुमि के प्रोजैक्ट के बारे में समझा कर गौर्डन पूछते हैं, ‘‘हाउ इज माय पिं्रसैस?’’ वृद्धा घर के पीछे लौन में पेड़ पर बंधे हैमौक की तरफ इशारा करती हैं, ‘‘लौस्ट इन हर म्यूजिक, ऐज औलवेज बट शी विल बी डिलाइटेड टू सी यू, औल्सो ऐज औल्वेज.’’ हैमौक के निकट खड़ी उसे हलकेहलके झोटे देती एक युवती का चेहरा सुमि को जानापहचाना सा लगता है.

‘‘आय विल लीव यू लेडीज टु टौक व्हाइल आई जौइन माय यंग फ्रैंड,’’ कहते हुए गौर्डन पीछे की तरफ बढ़ जाते हैं. कौंस्टेंस तलाकशुदा हैं, वयस्क पुत्रों और पुत्री की मां. ‘पिं्रसैस’ कौंस्टेंस की 25 वर्षीया बेटी है, गे्रटा, जो मानसिक तौर पर बाधित है. पति रिचर्ड स्टेहमायेर एक औल अमेरिकन ट्रक कंपनी के सीनियर ड्राइवर हैं जिस कारण उन्हें दूरदराज शहरोें तक जाना पड़ता था. कौंस्टेंस एक छोटे बिजनैस के लिए अकाउंटिंग करती थीं. हर महीने 2-2, 3-3 हफ्तों की पति की लंबी गैरहाजिरियों की वजह से घर का सारा दायित्व भी उन्हें अकेले ही संभालना पड़ता था. पिता का अंकुश न होने के कारण बेटे उद्दंड हो गए थे.

दोनों के जन्म के वर्षों बाद शरीर से स्वस्थ और बेहद खूबसूरत बेटी के आगमन की खुशी पर तुषारापात हुआ जब डाक्टरों ने बताया कि वह आजन्म मंदबुद्धि ही रहेगी. सब से बड़ा सदमा तो तब लगा जब रिचर्ड ने साफ इल्जाम लगाया कि मंदबुद्धि बच्ची उन की संतान हो ही नहीं सकती बल्कि उन की लंबी गैरहाजिरी में किसी के साथ कौंस्टेंस के अफेयर का नतीजा है. उन्हें तलाक चाहिए. उस समय डीएनए जैसे प्रमाण की जानकारी नहीं थी. बेटों को सदमे से बचाने के लिए कौंस्टेंस ने तलाक की कार्यवाही को लंबा नहीं खींचा. मामूली से सैटलमैंट में उन्हें घर तो मिला लेकिन बाधित बच्ची की चौबीसों घंटे देखभाल के लिए कौंस्टेंस को नौकरी छोड़नी पड़ी. खर्चे की किल्लत की वजह से आखिरकार घर भी बेचना पड़ा और फूड स्टैंप्स पर गुजर की नौबत आ गई. वैलफेयर हाउसिंग कौंप्लैक्स के तंग अपार्टमैंट में शरण लेनी पड़ी. वैलफेयर हाउसिंग यानी सबस्टैंडर्ड लिविंग कंडीशंस. दीवारों से पपड़ी बन उतरता पेंट, नलों से लीक होता पानी, आए दिन चोक होती नालियां. बदबूदार गलियारों में चूहे, काक्रोच, गालीगलौज वाला पड़ोस. गंदी गुडि़या सी ग्रेटा बावली घूमती, दीवारों से उतरती पपडि़यां चाटती और जहांतहां गंदगी करती. दलदल में फंसी कौंस्टेंस डिप्रैशन में डूबती गई थीं और खैरात पर पलने वालों की मानसिकता उन पर हावी होती गई. बिना मेहनत सरकार से जो भी खींच सको, भला. डिप्रैशन के लिए गोलियां लेतेलेते नौबत नशे तक आ गई थी.

हाउसिंग कौंप्लैक्स में मुद्दा उठा कि मकानमालिक सरकार से बस पैसे ऐंठते हैं और अपार्टमैंट्स के रखरखाव पर धेला नहीं खर्च करते. एक शातिर वकील ने मुद्दे को तूल दिया कि अपार्टमैंट्स की दीवारों पर मकानमालिक सस्ता पेंट करवाता है जिस में सीसा मिला होता है. घटिया पेंट बहुत जल्दी पपडि़यां बन कर उतरता है जिसे गे्रटा जैसे छोटे बच्चे अकसर मुंह में रख लेते हैं और बहुतों को मिरगी के दौरे पड़ने लगे हैं. ऐसे दौरे गे्रटा को भी पड़ने लगे तो कौंस्टेंस के दिमाग में खयाल कौंधा. वे शिकायती दल की प्रतिनिधि बन गईं और वकील की मदद से मकानमालिक व पेंट कंपनी, दोनों पर सामूहिक मुकदमा ठोंक दिया. अखबारों ने मामले को खूब उछाला. नतीजतन दावेदारों को भारी मुआवजा मिला जिस का लगभग आधा भाग वकील की जेब में गया. इलाके में सक्रिय राजनीतिक दल और सोशल डैवलपमैंट कमीशन ने हस्तक्षेप कर के सब दावेदारों को मकानमालिक के बेहतर हाउसिंग कौंप्लैक्स में अपार्टमैंट्स दिलवाए. पेंट कंपनी से भी भारी हर्जाना वसूल कर गे्रटा जैसे बाधित बच्चों के ताउम्र इलाज के लिए एक ट्रस्ट बनाया गया.

मां की अत्यधिक व्यस्तता और तंगदस्ती की वजह से बेटे बिलकुल बेकाबू हो गए. वयस्क होते ही बड़ा बेटा अलग रहने लगा. कद्दावर शरीर के बल पर उसे एक नाइट क्लब में बाउंसर यानी दंगाफसाद करने वालों से निबटने की नौकरी मिल गई. कुछ समय बाद वह कैलिफोर्निया चला गया जहां वह फिल्मों में स्टंटमैन है. अपनी डांसर बीवी के साथ एक  छोटीमोटी टेलैंट एजेंसी चला रहा है जो फिल्म और टीवी की दुनिया में मौका पाने को आतुर भीड़ के लिए छोटेमोटे रोल जुटाती है. छोटे बेटे ने जैसेतैसे हाईस्कूल पास किया और कम्युनिटी कालेज से अकाउंटिंग और कंप्यूटर कोर्सेज पूरे कर के एक कार डीलर के यहां अकाउंटैंट बन गया. काम में होशियार था. अच्छा वेतन और बोनस कमाने लगा तो मां और बहन को छोड़ कर वह भी अलग हो लिया. जो भी कमाता वह गर्लफ्रैंड्स, कैसीनो और पब में उड़ा देता. खर्चीली आदतें बढ़ती गईं तो कर्ज लेने लगा और आखिरकार गबन करते पकड़ा गया.

कौंस्टेंस को जबरदस्त झटका लगा. रिचर्ड को खबर की. वे मिलने तो आए लेकिन जमानत से हाथ खींच लिया. बड़े बेटे से मदद मांगी तो उस ने मां को खरीखरी सुनाईं कि यदि खैरात के बजाय ईमानदारी व इज्जत से बेटे पाले होते तो ऐसी नौबत ही क्यों आती? सजायाफ्ता बेटे से मिलने जेल गई तो उस ने मुंह फेर लिया और कड़वे शब्दों में आइंदा मिलने आने के लिए मना कर दिया. मां ने बेटे से मिलने जाना नहीं छोड़ा. भले ही वह बात न करता था लेकिन दूर बैठ उसे जीभर देख कर वे लौट आती थीं.अपने ही खून से ऐसे घोर अपमान से कौंस्टेंस हिल गईं. उन्होंने अपनी शेष जिंदगी का रुख मोड़ने का निश्चय किया और विपन्न स्थिति में अपने जैसे हताश लोगों की मानसिकता बदलने के इरादे से सोशल डैवलपमैंट कमीशन के प्रयासों से जुड़ने की ठान  ली. आर्थिक सहायता के दावेदारों को सही और वाजिब अर्जियां दाखिल करने में मदद करने लगीं. अब अपने हाउसिंग कौंप्लैक्स की मुखिया हैं और इलाके में सक्रिय राजनीतिक दल की कार्यकर्त्ता.

रैड लाइट- भाग 4: क्या बिगड़े बेटे को सुधार पाई मां

बेटों के दिए सदमे से उबरने का अप्रत्याशित अवसर भी प्रकृति ने दिया. बड़े बेटेबहू के यहां लंबे इंतजार के बाद संतान हुई जिस के बारे में उन्हें बहुत समय बाद पता लगा. वह भी तब जब बरसों बाद रिचर्ड को अचानक अपने सामने पाया. उन से जाना के दोनों का पहला पौत्र मंदबुद्धि जन्मा है. कौंस्टेंस पर लगाए लांछन के लिए शर्मिंदा रिचर्ड स्वयं को क्षमा नहीं कर पा रहे थे. बडे़ बेटे ने भी कहलवाया कि मां को घोर विपत्ति से अकेले जूझने को छोड़ देने के लिए वह उन्हें अपना मुंह दिखाने के काबिल नहीं है. बापबेटे ने मिल कर प्रायश्चित करने की याचना की और गौर्डन के महल्ले में एक तालाबंद घर कौंस्टेंस को खरीदवा कर उस का पुनरुद्धार कर डाला जिस में वे रहती हैं. संबंधों के बीच बरसों पुरानी गहरी दरार पटनी मुश्किल है लेकिन रिचर्ड अब लगभग हर महीने मिलने आते हैं. बड़े बेटे ने भी पत्नी और बच्चे के साथ आने की इच्छा प्रकट की है. पिता और दोनों भाई ग्रेटा के हितचिंतक बने रहें, कौंस्टेंस इस से ज्यादा कुछ नहीं चाहतीं. गुजारे लायक कमा लेती हैं. बढ़ती आयु के कारण गे्रटा की पूरी देखभाल अकेले करने में कठिनाई होने लगी तो उसे स्पैशल नीड्ज वालों के होम में डाल दिया जिस का खर्च ट्रस्ट उठाता है. बेटी की मैडिकल और रिक्रिएशनल जरूरतों के प्रति अब बेफिक्री है लेकिन वीकेंड पर उसे घर ले आती हैं और पड़ोस में रहने वाली सर्टिफाइड नर्सिंग असिस्टैंट कोर्स की स्टूडैंट्स में से किसी न किसी को मदद के लिए बुला लेती हैं. सुमि सोचती है कि तभी गे्रटा को झोटे देती युवती का चेहरा जानापहचाना लगा.

छोटे बेटे ने भी जिंदगी से सबक सीखा. जेलयाफ्ताओं को मिलने वाली शैक्षणिक सुविधा का लाभ उठा कर उस ने कंप्यूटर सौफ्टवेयर डैवलपमैंट में मास्टर्स कर लिया. अच्छे आचरण के लिएउस की सजा की मियाद घटा दी गई है और जल्दी ही रिहाई के बाद उसे वहीं जेल में एजुकेटर की नौकरी भी मिल जाएगी. भाई और पिता की तरह वह भी अपने व्यवहार के लिए शर्मिंदा है. पिछली विजिट में वे उसे अपने साथ आ कर रहने के लिए लगभग राजी कर आई हैं. सुमि सर्टिफाइड नर्सिंग असिस्टैंट कोर्स की स्टूडैंट्स से भेंट करने के बारे में गौर्डन से मशविरा करती है तो वे उसे कौंस्टेंस की मदद लेने की सलाह देते हैं. एक फोटो लेने और इंटरव्यू के लिए सुमि कौंस्टेंस से पूछती है तो वे चौंक कर पीछे लौन पर नजर डालती हैं, ‘‘अनेदर टाइम,’’ कह कर टाल देती हैं. असमंजस से भरी सुमि उन से विदा ले कर गौर्डन के साथ बाहर आ जाती है.

असाइनमैंट सबमिट करने की डैडलाइन से पहले सुमि गौर्डन को फोन करती है कि स्टोरी लगभग पूरी है, सिर्फ सर्टिफाइड नर्सिंग असिस्टैंट कोर्स की स्टूडैंट्स से इंटरव्यू और एकाध फोटो लेना बाकी है. वे कौंस्टेंस से मशविरा कर के वापस फोन करने का आश्वासन देते हैं. 2 दिन बाद वे सुमि को रैल्फ मैन्शन बुलाते हैं.वहां पहुंचने पर कौंस्टेंस भी मिलती हैं. गंभीर मुद्रा में वे सुमि से वचन लेती हैं कि जो कुछ भी उसे बताया जाएगा उसे वह अपने तक सीमित रखेगी, असाइनमैंट सबमिट करने से पहले उन्हें दिखाएगी और ऐसा भी हो सकता है कि वे स्टोरी के किसी अंश को सैंसर करना चाहें.

कौंस्टेंस बहुत मुलायम स्वर में कहना शुरू करती हैं कि मामला एक पुराने संभ्रांत महल्ले का है जो समय की मार से बुरी तरह घायल हुआ. उस के अच्छे समय की स्मृतियां संजोए गौर्डन, टायरोल और ऐग्नेस, मिल्ड्रेड और कौंस्टेंस जैसे कुछ लोग इलाके को रैड लाइट एरिया के नाम से बदनाम किए जाने से तिलमिलाए हुए हैं. इसीलिए समाज उद्धार पर कटिबद्ध सोशल डैवलपमैंट कमीशन से जुड़े हैं. सुमि की स्टोरी उन के प्रयास को बल देगी, इस आस्थावश सब ने उसे पूर्ण सहयोग दिया. अपने जीवन के अंतरंग पक्ष उस के साथ साझा किए. टायरोल और ऐग्नेस सर्टिफाइड नर्सिंग असिस्टैंट कोर्स की स्टूडैंट्स के महज मकानमालिक ही नहीं, सोशल डैवलपमैंट कमीशन द्वारा नियुक्त उन के अभिभावक भी हैं. वे युवतियां वयस्क हैं लेकिन उन के अतीत को एक रहस्य ही रहना होगा. वे बस बहुत कच्ची आयु से ही घोर प्रताड़ना और त्रासदी के भंवर में घिर कर आत्महत्या के कगार तक पहुंच गई थीं.

अवैध तरीकों से देश में लाई गई उन जैसी लड़कियां वेश्यावृत्ति करवाने वाले गिरोहों के चंगुल में फंसी गर्त में गिरती जाती हैं. कई मार दी जाती हैं या नशाखोरी अथवा एड्स की शिकार हो कर दर्दनाक मौत का शिकार बनती हैं. अलगअलग शहरों में पुलिस के छापों में पकड़ी गई ऐसी युवतियों को इमिग्रेशन वालों की सहायता से तत्काल नया रूपरंग, नई पहचान दे कर दूर भेज दिया जाता है और समाजसेवी संस्थाएं उन का पुनर्वास करती हैं.कौंस्टेंस के यहां पीछे बगीचे में गे्रटा को झूला झुलाती जो युवती सुमि को पहचानी सी लगी, वह प्योनी है. गौर्डन के साथ महल्ले में घूमते हुए सुमि ने दोमंजिले पोर्च में बैठी, बतियाती युवतियों के बीच उसे देखा होगा.

सर्टिफाइड नर्सिंग असिस्टैंट कोर्स पूरा होते ही इन युवतियों को फिर रीलोकेट कर दिया जाएगा ताकि उन के पिछले पदचिह्न मिटते रहें जब तक पिछला कोई भी सुराग बाकी न बचे. कार्सन दंपती का घर उन का स्थायी पुनर्वास नहीं, बल्कि एक कड़ी मात्र है. कुछ अन्यत्र कहीं नर्सिंग कालेज में डिगरी कोर्स पूरा करेंगी और आर्मी में जाएंगी. कुछ की अलगअलग शहरों में वृद्धों के नर्सिंग होम्स में नौकरी लगभग पक्की है. अन्य को शहरशहर घूमतेघूमते कोई ठिकाना मिल ही जाएगा जिस में वे बेखौफ रह सकेंगी. जिस घर में 10 युवतियां रहती हों उस का असामाजिक तत्त्वों की नजरों से बचना मुश्किल होता है. टायरोल और ऐग्नेस के घर के चक्कर लगाने वाली बिना पहचान की गाडि़यां पुलिस के विशेष सुरक्षा दस्ते की हैं. सुमि की स्टोरी को डिस्ंिटक्शन ग्रेड मिलता है. स्टोरी में सुमि ने यूनिवर्सिटी और सोशल डैवलपमैंट कमीशन के साझे इनीशिएटिव का संक्षिप्त वर्णन ही दिया जिस के तहत जरूरतमंद वर्ग छात्रवृत्तियों और रिहाइश जैसी अन्य सुविधाओं का लाभ उठा कर अपना भविष्य संवार रहा है. निष्ठावान निवासियों द्वारा इलाके की धूमिल छवि को सुधारने के लिए किए गए अथक प्रयासों के सजीव चित्रण के लिए जर्नलिज्म डिपार्टमैंट का अखबार उसे मुख्य फीचर बनाता है. शहर के प्रमुख दैनिक में उस का प्रचुर विवरण छपता है.

सुमि अखबार की कई प्रतियां गौर्डन, कौंस्टेंस, मिल्डे्रड और टायरोल के यहां पोस्ट कर देती है. यूनिवर्सिटी और सोशल डैवलपमैंट कमीशन की ओर से जर्नलिज्म डिपार्टमैंट का अखबार शहर के मुख्य दैनिक के साथ मुफ्त वितरित किया जाता है. ग्रैजुएशन डे पर सुमि को बधाई देने वालों में गौर्डन, कौंस्टेंस, मिल्ड्रेड, टायरोल और ऐग्नेस के साथ प्योनी और उस की साथिनें भी आती हैं. सब के साथ फोटो सुमि को बैस्ट अवार्ड लगता है. स्थानीय अखबार में सह संपादक सुमि अब डाउनटाउन के चप्पेचप्पे से वाकिफ हो चुकी है. विस्कौन्सिन एवेन्यू और ट्वैंटी फ ोर्थ स्ट्रीट का चौराहा पार करते हुए सुमि पुराने भय को याद कर के हंसे बिना नहीं रह पाती. उस इलाके में प्रौपर्टी डैवलपमैंट जोर पकड़ने लगा है और जमीन के भाव बढ़ रहे हैं

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