‘‘मिस हैलन, तुम्हें तो पता है. कभीकभी बच्चे कितने निर्दयी हो जाते हैं. प्लेग्राउंड में मैं सदा ही रंगभेद का निशाना बनती रही. कानों में अकसर सुनाई देता, देखोदेखो, निग्गर (अफ्रीकन), पाकी (पाकिस्तानी), हाफकास्ट, बास्टर्ड वगैरावगैरा नामों से संबोधित किया जाता था. कभी कोई कहता, ‘उस के बाल और होंठ देखे हैं? स्पैनिश लगती है.’ ‘नहींनहीं, वह तो झबरी कुतिया लगती है.’ ‘स्पैनिश भाषा का तो इसे एक अक्षर भी नहीं आता.’ ‘फिर इंडियन होगी, रंग तो मिलताजुलता है.’ पीछे से आवाज आई, ‘जो भी है, है तो हाफकास्ट.’ ‘स्टूपिड कहीं का, आगे से कभी हाफकास्ट मत कहना, आजकल इस शब्द को गाली माना जाता है. मिक्स्ड रेस कहो.’ ‘तुम्हारा मतलब खिचड़ी निग्गर, पाकी, स्पैनिश और इंडियन या फिर स्ट्यू’ और सब जोर से खिलखिला कर हंस पड़े.
‘‘मुझे देखते ही उन के चेहरों पर अनेक सवाल उभरने लगते जैसे पूछ रहे हों- नाम इंडियन, किरण. बाल मधुमक्खी का छत्ता. रंग स्पैनिश जैसा. नाक पिंगपोंग के गेंद जैसी. होंठ जैसे मुंह पर रखे 2 केले. उन से फूटती है अंगरेजी. तुम्हीं बताओ, तुम्हें हाफकास्ट कहें या फोरकास्ट. सब के लिए मैं एक मजाक बन चुकी थी.
‘‘सभी मुझ जैसी उलझन को सुलझाने में लगे रहते. उन की बातें सुन कर अकसर मैं बर्फ सी जम जाती. रात की कालिमा मेरे अंदर अट्टहास करने लगती. उन के प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं थे. मैं स्वयं अपने अस्तित्व से अंजान थी. मैं कौन हूं? क्या पहचान है मेरी? मैं बिना चप्पू के 2 कश्तियों में पैर रख कर संतुलन बनाने का प्रयास कर रही थी, जिन का डूबना निश्चित था. ‘‘शुरूशुरू में हर रोज स्कूल जाने से पहले मैं आधा घंटा अपने तंग घुंघराले बालों को स्ट्रेटनर से खींचखींच कर सीधा करने की कोशिश करती. पर कभीकभी प्रकृति भी कितनी क्रूर हो जाती है. बारिश भी ऐनवक्त पर आ कर मेरे बालों का भंडा फोड़ देती. वे फिर घुंघराले हो जाते.’’
‘‘किरण, अब बस करो, पुरानी बातों को कुरेदने से मन भारी होता है,’’ वार्डन ने किरण को समझाते हुए कहा.
‘‘हैलन प्लीज, आज मुझे कह लेने दो. मेरे देखतेदेखते चिल्ड्रंस होम से कई बच्चों को होम मिल गए (फोस्टर होम जहां सामान्य परिवार के लोग इन बच्चों की देखरेख के लिए ले जाते हैं). कुछ बच्चे गोद ले लिए गए. मैं भी आशा की डोर थामे बैठी थी. इसी उम्मीद के साथ कि एक दिन मैं भी किसी सामान्य परिवार का सुख भोग सकूंगी. मेरा चेहरा तथा बाल देखते ही लोग भूलभुलैया में फंस जाते. तब मेरा नंबर एक सीढ़ी और नीचे आ जाता. मेरा होना ही मेरे लिए जहर बन चुका था. मेरी आंखों की मूक याचना कोई नहीं सुन सका. बिक्की को बहुत अच्छे फोस्टर पेरैंट्स मिल गए थे. हम दोनों ने वादा किया कि हर शनिवार को हम एकदूसरे से जरूर मिलेंगे. मुझे उस का जाना बेहद खला. मन ही मन मैं उस के लिए खुश थी कि अब उसे 24 घंटे अनुशासित जीवन नहीं जीना पड़ेगा. घड़ी के चारों ओर परिक्रमा नहीं करनी पड़ेगी.
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‘‘बिक्की तथा मेरा हर शनिवार को मिलना जारी रहा. आज शनिवार था. मैं ने मिलते ही उसे, खुशखबरी दे दी कि फीस्टरिंग बाजार में मेरा नंबर भी आ गया है. आज फोस्टर पेरैंट ने वार्डन से कौंटैक्ट किया था, अब वे मुझे गोद ले लेंगे. ‘‘हैलन, मेरे नए परिवार में जाने के इंतजार में दिन रेंग रहे थे. मानो वक्त की सुई वहीं थम गई हो. कुछ दिनों बाद वह दिन आ ही गया. फैसला मेरे हित में हुआ.
‘‘मेरे वनवास की अवधि पूरी होने वाली थी. वीकेंड में अपना सामान बांधे सहमेसहमे कदमों से मैं अपने नए सफर की ओर चल दी. पिछले 7 वर्षों से जो अपना घर था, उसे छोड़ते वक्त इस जीवन ने मुझे सुखदुख के अर्थ बहुत गहराई से समझा दिए थे. बिक्की का घर एडवर्ड के घर के पास ही था.
‘‘बिक्की और मेरा घर पास होने के कारण अब तो हम होमवर्क भी एकसाथ बैठ कर करते थे. मिसेज एडवर्ड पहले तो बहुत अच्छी थीं लेकिन धीरेधीरे उन्होंने घर के सभी कामों का उत्तरदायित्व मेरे कंधों पर डाल दिया. घर के कामकाज मेरी पढ़ाई में दखलंदाजी करने लगे. जिस का प्रभाव मेरी परीक्षा के परिणामों पर पड़ा. मुझे महसूस होने लगा कि मैं उन की बेटी कम, नौकरानी अधिक थी. हमारा स्कूल बहुत बड़ा था. जिस में नर्सरी, प्राइमरी, जूनियर तथा सैकंडरी सभी स्कूल शामिल थे. उन के प्लेग्राउंड अलगअलग थे. क्रिसमस की छुट्टियों से पहले स्कूल में क्रिसमस का समारोह था. सभी बच्चों को जिम्मेदारियां बांटी गई थीं. मेरी ड्यूटी अतिथियों को बैठाने की थी. अचानक मैं ने देखा, मैं जोर से चिल्लाई, ‘बिक्की, बिक्की, इधर आओ, इधर आओ, वो, वो देखो मां, मेरी मां, असली मां.’ मेरी आवाज भर्राई. टांगें कांपने लगीं. बिक्की ने मुझे कुरसी पर बिठाया. ‘मां’ मेरे मुंह से निकलते ही मेरा मन मां के प्रति प्रेम से ओतप्रोत हो गया. आंखों का सैलाब रुक न पाया.
‘‘‘शांत हो जाओ किरण, तुम्हें शायद गलतफहमी हो.’
‘‘‘वो देखो, नीले सूट में,’ मेरा मन छटपटाने लगा.
‘‘‘क्या तुम्हें पूरा यकीन है. उन्हें देखे तो तुम्हें 7-8 वर्ष हो गए हैं.’
‘‘‘क्या कभी कोई अपनी ‘मां’ को भूल सकता है?’
‘‘‘उन के साथ यह बच्चा कौन है?’
‘‘‘मैं नहीं जानती. इस का पता तुम्हें लगाना होगा, बिक्की.’
‘‘समारोह के बाद बिक्की से पता चला कि वह मेरा छोटा भाई सूरज है.’’
‘‘किरण, ध्यान से सुनो, जिंदगी एक नाम और एक रिश्ते से तो नहीं रुक जाती,’’ वार्डन हैलन ने समझाते हुए कहा.
‘‘मिस हैलन, आप नहीं जानतीं, मां की एक झलक ने मुझे कई वर्ष पीछे धकेल दिया. अपनी कल्पना में मैं आज भी उन पलों में लौट जाती हूं जब मैं बहुत छोटी थी और मेरे पास मां थी. तब सबकुछ था. कैसे वह मेरी उंगली पकड़ स्कूल ले जाती. वापसी में आइसक्रीम, चौकलेट ले कर देती. कैसे रास्ते में मैं उन के साथ लुकाछिपी खेलती. कभी कार के पीछे छिप जाती, कभी पेड़ के पीछे. अपनी जिद पूरी करवाने के लिए वहीं सड़क पर पैर पटकतीपटकती बैठ जाती. आज भी उन दिनों को याद कर शिथिल, निढाल हो जाती हूं मैं. जब दुखी होती हूं तो दृश्य आंखों के सामने रीप्ले होने लगता है. 15 दिसंबर, 1995 को जब ‘सोशल सर्विसेज’ वाले मुझे यहां लाए थे, उस दिन मेरी मां के दुपट्टे का छोर मेरे हाथों से खिसकतेखिसकते सदा के लिए छूट गया था. ‘‘क्रिसमस की छुट्टियों के समाप्त होने का इंतजार मुझे बड़ी ब्रेसब्री से रहता. मन में मां की झलक पाने की लालसा, भाई को देखने की उमंग उमड़ने लगी. इसी धुन में अकसर मैं स्कूल के किसी छिपे हुए कोने से मां और भाई को निहारती रहती. छोटा भाई सूरज पैर पटकने में मुझ पर गया था, मेरा भाई जो ठहरा. सूरज के प्ले टाइम में मैं अपनी कक्षा में न जा कर उस से बातें करती, उसे छूने की कोशिश करती. यही सोच कर कि मां ने इसे छुआ होगा. उस में मां की खुशबू ढूंढ़ती. जब बिक्की कहती कि सूरज की आंखें बिलकुल तुम जैसी हैं, मुझे बहुत अच्छा लगता था. मां यह नहीं जानती थीं कि मैं भी इसी स्कूल में हूं. यह सिलसिला चलता रहा. धीरेधीरे मां से मेरी नाराजगी प्यार में बदल गई. मां से भी भला कोई कब तक नाराज रह सकता है. उन्हें बिना देखे मन उदास हो जाता. इतने बड़े संसार में एक वही तो थीं, मेरी बिलकुल अपनी. एक दिन अचानक मां और मेरी नजरें टकराईं. मां बड़ी बेरुखी से मुझे अनदेखा कर आगे बढ़ गईं.
‘‘उस रात मन में अनेक गूंगे प्रश्न उठे, जो मेरे रोंआसे मुख से सूखे तिनके की भांति मन के तालाब में डूबने लगे. सभी दिशाओं से नकारात्मक बहिष्कृति की भावनाएं मेरी पढ़ाई पर हावी होती गईं. स्कूल से मन उचाट रहने लगा. घर के कामकाजों की थकावट के कारण स्कूल का काम करना नामुमकिन सा हो गया. होम स्कूल लाएजन अध्यापिका (घर स्कूल संपर्क अधिकारी) तथा सोशलवर्कर को बुलाया गया. मिसेज एडवर्ड ने सारा दोष मुझ पर उडे़ल दिया. उन के आरोप सुनतेसुनते मैं भी गुस्से में बोली, ‘घर के कामों से फुरसत मिले तो न? मेरी तो नींद तक भी पूरी नहीं होती. मैं यहां नहीं रहना चाहती.’ इतना सुनते ही सोशलवर्कर के शक की पुष्टि हो गई. कुछ ही दिनों में मैं फिर रैजिडैंशियल होम में थी.
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‘‘एक दिन बिक्की से मिलते ही उस का प्रवचन शुरू हो गया, ‘किरण, तुम्हें जीवन में आगे बढ़ना है. पीछे देखती रहोगी तो पीछे ही रह जाओगी. संभालो खुद को. केवल पढ़ाई ही काम आएगी.’
‘‘‘तुम ठीक कहती हो, बिक्की.’ उस दिन हम ने अगलीपिछली मन की सब बातें दोहराईं. बिक्की के जाने के बाद मेरे प्रश्नों के उत्तर मेरे भीतर उभरने लगे. नकारात्मक प्रश्नों को मैं ने चिंदीचिंदी कर कूड़े के ढोल में फेंक डाला. पढ़ाई में मन लगाना आरंभ कर दिया.
‘‘छोटे भाई सूरज से मिलने का क्रम चलता रहा. कभी मैं सूरज से मिलती और कभी बिक्की. एक शनिवार को मैं और बिक्की दोनों पिज्जा हट में पिज्जा खा रहे थे. ‘किरण, एक बुरी खबर है,’ बिक्की ने कहा.
‘‘‘क्या है, जल्दी से बता?’
‘‘‘सूरज से पता चला है, इस वर्ष के आखिर में वह किसी और स्कूल में भरती होने वाला है.’
‘‘‘कहां? फिर मैं सूरज और मां को कैसे देखूंगी?’
‘‘‘उदास मत हो, किरण. इस का हल भी मैं ने ढूंढ़ लिया है. मैं ने सूरज से उन के घर का पता ले लिया है. साथ ही, सूरज ने बताया कि शनिवार को शौपिंग के बाद वह और मां माथा टेकने के लिए सोहोरोड गुरुद्वारे जाते हैं. वहां लंगर भी चखते हैं.’
‘‘‘यह तो बहुत अच्छा किया.’
‘‘पिज्जा खाने के बाद हम दोनों अपनेअपने घर चले गए. परीक्षा नजदीक आ रही थी. बिक्की की डांट तो खा चुकी थी. मेरा मां को देखने का लुकाछिपी का क्रम चलता रहा. चौकलेट ने हमारी सूरज से अच्छी दोस्ती करवा दी थी.
‘‘‘चाइल्ड प्रोटैक्शन ऐक्ट’ के अंतर्गत वे मुझे अपने साथ ले गए. मां के चेहरे पर पछतावे के कोई चिह्न न थे. न ही उन्होंने मुझे रोकने का ही प्रयास किया. पिता का पता नहीं था. मां भी छूट गई. मानो, मुझे एक मिट्टी की गुडि़या समझ कर कहीं रख कर भूल गई हों. चिल्ड्रंस होम में एक और अनाथ की भरती हो गई.
‘‘वहां में सब ने मेरा खुली बांहों से स्वागत किया. एक तसल्ली थी, वहां मेरे जैसे और भी कई बच्चे थे. मेरे देखतेदेखते कितने बच्चे आए और चले गए. बिक्की और मेरा कमरा सांझा था. बिक्की और मेरा स्कूल भी एक ही था. वीकेंड में सभी बच्चों के फोन आते तो मेरे कानों का एंटीना (एरियल) भी खड़ा हो जाता. लेकिन मां का फोन कभी नहीं आया. लगता था मां मुझे हमेशा के लिए भूल गई थीं. अब बिक्की ही मेरी लाइफलाइन थी. हम दोनों की बहुत पटती थी. पढ़ाई में भी होड़ लगा करती थी. बिक्की के प्यार तथा चिल्ड्रंस होम के सदस्यों के सहयोग से धीरेधीरे मैं ने स्वयं को समेटना आरंभ कर दिया.
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