Anupama: काव्या को तलाक के पेपर देगा वनराज, देखें Video

सीरियल अनुपमा (Anupama) की कहानी दिलचस्प होती जा रही है. जहां अनुज (Gaurav Khanna), अनुपमा (Rupali Ganguly) संग सपने देखता नजर आ रहा है तो वहीं काव्या (Madalsa Sharma) की अनुपमा को लेकर जलन बढ़ती जा रही है, जिसके चलते वनराज (Sudhanshu Panday) का गुस्सा बढ़ता जा रहा है. हालांकि काव्या इस बात को समझ नही पा रही है. लेकिन आने वाले एपिसोड में काव्या के लिए खतरा बढ़ने वाला है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे (Anupamaa serial update)…

काव्या को झटका देगा वनराज

 

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अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि वनराज पूरे शाह परिवार के सामने काव्या को तलाक के पेपर्स सौंपेगा और कहेगा कि आज बा बापूजी की वेडिंग एनिवर्सरी है औऱ उसके रिश्ते के खत्म होने का समय. वहीं इस बात को सुनकर काव्या का दिल टूट जाएगा तो पूरा शाह परिवार हैरान होगा.

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काव्या को आया गुस्सा

 

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अब तक आपने देखा कि अनुपमा, बा बापूजी की शादी में खूब मस्ती करती नजर आती है, जिसे देखकर काव्या जलन महसूस करती है. वहीं समर पूरे परिवार को ग्रुप फोटो के लिए बुलाता है. लेकिन काव्या उस फोटो में हिस्सा नहीं बनती है और वनराज बा और बापूजी के पीछे अनु के कंधे पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है, जिसे देखकर काव्या को जलन होती है और अनुपमा को खींच कर फोटो से बाहर करती है.

अनुज को आता है गुस्सा

दूसरी तरफ काव्या का बर्ताव देखकर वनराज का गुस्सा बढ़ जाता है. लेकिन काव्या, वनराज की परवाह किए बगैर अनुपमा से कहेगी कि तोषू की शादी के दौरान उसके साथ बुरा बर्ताव किया था और उसे थप्पड़ मारकर घर से बाहर निकाल दिया था. वहीं उसे बाहरवाली बताया था. लेकिन अब वह खुद बाहर वाली है, जिसे सुनकर अनुज को गुस्सा आता है. लेकिन वह कुछ नही कहता. वहीं अनुपमा, काव्या को कमरे में जाकर बात करने के लिए कहती है, जिसके बाद काव्या, अनुपमा को जबरदस्ती कमरे में ले जाती है. जहां अनुपमा उसे समझाने की कोशिश करती है.

 

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न बनाएं छोटी सी बात का बतंगड़

लेखक-वीरेंद्र बहादुर सिंह 

‘‘नेहा मेरी आरती को तुम ने गुस्से में कुछ कहा क्यों?’’ गुस्से में लालपीली होते हुए मालती जोरजोर से कह रही थी.

‘‘अरे मालती मैं तो आरती और विश्वा, दोनों पर गुस्सा कर रही थी. वह भी इसलिए कि दोनों बहुत शोर कर रहे थे,’’ नेहा ने शांति से कहा.

‘‘बच्चे शोर नहीं करेंगे तो कौन करेगा?’’ मालती कटाक्ष करते हुए बोली.

‘‘बच्चे इतने ही प्यारे हैं तो अपने घर बुला कर शोर कराओ न. मुझे नहीं अच्छा लगता. एक तो सभी को संभालो, ऊपर से ताने भी सुनो,’’ मालती की बातों से तंग आ कर नेहा गुस्से में बोली.

‘‘मुझे सब पता है. आरती ने मुझे सब बताया है, जो तुम ने उसे कहा है. तुम ने उसे घर जाने के लिए भी कहा है. यह लड़की समझती ही नहीं वरना किसी के घर जाने की क्या जरूरत है?’’

‘‘किसी के घर नहीं मालती, जिस तरह मैं अपनी विश्वा को रखती हूं, उसी तरह आरती को भी रखती हूं. अगर कभी गुस्सा आ गया तो इस में क्या हो गया? अगर विश्वा कभी कोई गलती करती है तो मैं उस पर भी गुस्सा करती हूं.’’

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दोनों पड़ोसिन सहेलियों ने छोटी सी बात पर पूरी कालोनी सिर पर उठा ली थी. एक छोटी सी बात ने बहुत बड़ा रूप ले लिया था. दोनों के गुस्से का पारा लिमिट के ऊपर जा रहा था. अगलबगल वाले अपना काम छोड़ कर जुगल जोड़ी कही जाने वाली सहेलियों का झगड़ा देखने लगे थे. वैसे भी जिन के पास कामधाम नहीं होता, इस तरह के लोग किसी के घर आग लगने पर उसे बुझने के बजाय उस में तेल डाल कर रोटी सेंकने में माहिर होते हैं. यहां भी लोगों के लिए रंगमंच पर नाटक जमा हुआ था और कोई भी यह मजा छोड़ना नहीं चाहता था.

देखतेदेखते दोनों पक्षों से उन के पति भी उन्हें शांत कराने के लिए सामने आ गए. अब सभी को और मजा आने लगा था. छोटी सी बात का बतंगड़ बन गया था और छोटे बच्चों को ले कर बड़े झगड़ने लगे थे.

कोई ऐसा नहीं था, जो इन लोगों को शांत कराता. हरकोई दोनों ओर से अच्छा बन कर होम में घी डाल कर हाथ सेंकना चाहता था. इस बात को नेहा और मालती समझे बगैर लोगों का मनोरंजन करते हुए मूर्ख बन रही थीं. दोनों के बीच हमेशा छोटी से छोटी चीज को ले कर मित्रभाव से लेनदेन का व्यवहार चलता रहता था.

उस दिन भी जब एक शब्द पर 2 कटाक्ष भरे शब्दों के बाणों द्वारा लेनदेन का व्यवहार चल रहा था. दोनों में से कोई भी समझने को तैयार नहीं थी.

गलती का एहसास

उन दोनों का झगड़ा कम होने का नाम नहीं ले रहा था. उसी बीच आरती के जोरजोर से रोने की आवाज आई तो सभी का ध्यान उस की तरफ चला गया. आरती और विश्वा आपस में झगड़ रही थीं. उसी की वजह से आरती रोने लगी थी.

बिटिया को रोते देख मालती का गुस्सा और बढ़ गया. गुस्से में पैर पटकते हुए बेटी के पास जा कर लगभग चीखते हुए बोली, ‘‘तुम से कितनी बार कहा कि इस के साथ मत खेला करो, क्या किया विश्वा तुम ने?’’

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‘‘मम्मी, आप ने ही तो कहा था कि जिस का लेना चाहिए, उसे वापस भी करना चाहिए. आप नेहा आंटी से कुछ लेती हैं तो ज्यादा ही वापस करती हैं. आप कहती हैं कि इसे लेनदेन का व्यवहार कहा जाता है. मैं भी वही कर रही थी. विश्वा ने कल मुझे अपनी चौकलेट दी थी. अब मैं अपनी चौकलेट दे रही हूं तो यह मना कर रही है. यह कह रही है कि इस की मम्मी ने कहा है कि अगर दोस्तों को कुछ देते हैं तो उन से वापस नहीं लेते. इस में व्यवहार नहीं होता,’’ रोते हुए आरती ने मालती की ओर देखते हुए कहा.

जिन के लिए अब तक झगड़ा हो रहा था, वे एकदूसरे को खुश करने के लिए परेशान थीं. इन छोटे बच्चों की समझदारी देख कर मालती और नेहा को अपनी गलती का एहसास हो गया. दोनों ही एकदूसरे से माफी मांगते हुए अपनीअपनी बेटी पर गर्व महसूस करते हुए खुश हो रही थीं.

घड़ीभर पहले जो गुस्से की आग बरस रही थी, अब उस पर होने वाली इस प्रेम की बरसात ने वातावरण को एकदम शीतल बना दिया था, जिस से सभी के चेहरे चमक रहे थे.

थोड़ा सा इंतजार: क्या वापस मिल पाया तनुश्री और वेंकटेश को परिवार का प्यार

लेेखक- संतोष झांझी

बरसों बाद अभय को उसी जगह खड़ा देख कर तनुश्री कोई गलती नहीं दोहराना चाहती थी. कई दिनों से तनुश्री अपने बेटे अभय को कुछ बेचैन सा देख रही थी. वह समझ नहीं पा रही थी कि अपनी छोटी से छोटी बात मां को बताने वाला अभय अपनी परेशानी के बारे में कुछ बता क्यों नहीं रहा है. उसे खुद बेटे से पूछना कुछ ठीक नहीं लगा.

आजकल बच्चे कुछ अजीब मूड़ हो गए हैं, अधिक पूछताछ या दखलंदाजी से चिढ़ जाते हैं. वह चुप रही. तनुश्री को किचन संभालते हुए रात के 11 बज चुके थे. वह मुंहहाथ धोने के लिए बाथरूम में घुस गई. वापसी में मुंह पोंछतेपोंछते तनुश्री ने अभय के कमरे के सामने से गुजरते हुए अंदर झांक कर देखा तो वह किसी से फोन पर बात कर रहा था. वह एक पल को रुक कर फोन पर हो रहे वार्तालाप को सुनने लगी. ‘‘तुम अगर तैयार हो तो हम कोर्ट मैरिज कर सकते हैं…नहीं मानते न सही…नहीं, अभी मैं ने अपने मम्मीपापा से बात नहीं की…उन को अभी से बता कर क्या करूं? पहले तुम्हारे घर वाले तो मानें…रोना बंद करो. यार…उपाय सोचो…मेरे पास तो उपाय है, तुम्हें पहले ही बता चुका हूं…’’ तनुश्री यह सब सुनने के बाद दबेपांव अपने कमरे की ओर बढ़ गई. पूरी रात बिस्तर पर करवटें बदलते गुजरी.

अभय की बेचैनी का कारण उस की समझ में आ चुका था. इतिहास अपने आप को एक बार फिर दोहराना चाहता है, पर वह कोशिश जरूर करेगी कि ऐसा न हो, क्योंकि जो गलती उस ने की थी वह नहीं चाहती थी कि वही गलती उस के बच्चे करें. तनुश्री अतीत की यादों में डूब गई. सामने उस का पूरा जीवन था. कहने को भरापूरा सुखी जीवन. अफसर पति, जो उसे बेहद चाहते हैं. 2 बेटे, एक इंजीनियर, दूसरा डाक्टर. पर इन सब के बावजूद मन का एक कोना हमेशा खाली और सूनासूना सा रहा. क्यों? मांबाप का आशीर्वाद क्या सचमुच इतना जरूरी होता है? उस समय वह क्यों नहीं सोच पाई यह सब? प्रेमी को पति के रूप में पाने के लिए उस ने कितने ही रिश्ते खो दिए. प्रेम इतना क्षणभंगुर होता है कि उसे जीवन के आधार के रूप में लेना खुद को धोखा देने जैसा है. बच्चों को भी कितने रिश्तों से जीवन भर वंचित रहना पड़ा.

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कैसा होता है नानानानी, मामामामी, मौसी का लाड़प्यार? वे कुछ भी तो नहीं जानते. उसी की राह पर चलने वाली उस की सहेली कमला और पति वेंकटेश ने भी यही कहा था, ‘प्रेम विवाह के बाद थोड़े दिनों तक तो सब नाराज रहते हैं लेकिन बाद में सब मान जाते हैं.’ और इस के बहुत से उदाहरण भी दिए थे, पर कोई माना? पिछले साल पिताजी के गुजरने पर उस ने इस दुख की घड़ी में सोचा कि मां से मिल आती हूं. वेंकटेश ने एक बार उसे समझाने की कोशिश की, ‘तनु, अपमानित होना चाहती हो तो जाओ. अगर उन्हें माफ करना होता तो अब तक कर चुके होते. 26 साल पहले अभय के जन्म के समय भी तुम कोशिश कर के देख चुकी हो.’ ‘पर अब तो बाबा नहीं हैं,’ तनुश्री ने कहा था.

‘पहले फोन कर लो तब जाना, मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं.’ तनुश्री ने फोन किया. किसी पुरुष की आवाज थी. उस ने कांपती आवाज में पूछा, ‘आप कौन बोल रहे हैं?’ ‘मैं तपन सरकार बोल रहा हूं और आप?’ तपन का नाम और उस की आवाज सुनते ही तनुश्री घबरा सी गई, ‘तपन… तपन, हमारे खोकोन, मेरे प्यारे भाई, तुम कैसे हो. मैं तुम्हारी बड़ी दीदी तनुश्री बोल रही हूं?’ कहतेकहते उस की आवाज भर्रा सी गई थी. ‘मेरी तनु दीदी तो बहुत साल पहले ही मर गई थीं,’ इतना कह कर तपन ने फोन पटक दिया था. वह तड़पती रही, रोती रही, फिर गंभीर रूप से बीमार पड़ गई. पति और बच्चों ने दिनरात उस की सेवा की. सामाजिक नियमों के खिलाफ फैसले लेने वालों को मुआवजा तो भुगतना ही पड़ता है. तनुश्री ने भी भुगता. शादी के बाद वेंकटेश के मांबाप भी बहुत दिनों तक उन दोनों से नाराज रहे. वेंकटेश की मां का रिश्ता अपने भाई के घर से एकदम टूट गया.

कारण, उन्होंने अपने बेटे के लिए अपने भाई की बेटी का रिश्ता तय कर रखा था. फिर धीरेधीरे वेंकटेश के मांबाप ने थोड़ाबहुत आना- जाना शुरू कर दिया. अपने इकलौते बेटे से आखिर कब तक वह दूर रहते पर तनुश्री से वे जीवन भर ख्ंिचेख्ंिचे ही रहे. जिस तरह तनुश्री ने प्रेमविवाह किया था उसी तरह उस की सहेली कमला ने भी प्रेमविवाह किया था. तनुश्री की कोर्ट मैरिज के 4 दिन पहले कमला और रमेश ने भी कोर्ट मैरिज कर ली थी. उन चारों ने जो कुछ सोचा था, नहीं हुआ. दिनों से महीने, महीनों से साल दर साल गुजरते गए. दोनों के मांबाप टस से मस नहीं हुए. उस तनाव में कमला चिड़चिड़ी हो गई. रमेश से उस के आएदिन झगड़े होने लगे. कई बार तनुश्री और वेंकटेश ने भी उन्हें समझाबुझा कर सामान्य किया था. रमेश पांडे परिवार का था और कमला अग्रवाल परिवार की. उस के पिताजी कपड़े के थोक व्यापारी थे. समाज और बाजार में उन की बहुत इज्जत थी. परिवार पुरातनपंथी था. उस हिसाब से कमला कुछ ज्यादा ही आजाद किस्म की थी.

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एक दिन प्रेमांध कमला रायगढ़ से गाड़ी पकड़ कर चुपचाप नागपुर रमेश के पास पहुंच गई. रमेश की अभी नागपुर में नईनई नौकरी लगी थी. वह कमला को इस तरह वहां आया देख कर हैरान रह गया. रमेश बहुत समझदार लड़का था. वह ऐसा कोई कदम उठाना नहीं चाहता था, पर कमला घर से बाहर पांव निकाल कर एक भूल कर चुकी थी. अब अगर वह साथ न देता तो बेईमान कहलाता और कमला का जीवन बरबाद हो जाता. अनिच्छा से ही सही, रमेश को कमला से शादी करनी पड़ी. फिर जीवन भर कमला के मांबाप ने बेटी का मुंह नहीं देखा. इस के लिए भी कमला अपनी गलती न मान कर हमेशा रमेश को ही ताने मारती रहती. इन्हीं सब कारणों से दोनों के बीच दूरी बढ़ती जा रही थी. तनुश्री के बाबा की भी बहुत बड़ी फैक्टरी थी. वहां वेंकटेश आगे की पढ़ाई करते हुए काम सीख रहा था. भिलाई में जब कारखाना बनना शुरू हुआ, वेंकटेश ने भी नौकरी के लिए आवेदन कर दिया. नौकरी लगते ही दोनों ने भाग कर शादी कर ली और भिलाई चले आए. बस, उस के बाद वहां का दानापानी तनुश्री के भाग्य में नहीं रहा.

सालोंसाल मांबाप से मिलने की उम्मीद लगाए वह अवसाद से घिरती गई. जीवन जैसे एक मशीन बन कर रह गया. वह हमेशा कुछ न कर पाने की व्यथा के साथ जीती रही. शादी के बाद कुछ महीने इस उम्मीद में गुजरे कि आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा. जब अभय पेट में आया तो 9 महीने वह हर दूसरे दिन मां को पत्र लिखती रही. अभय के पैदा होने पर उस ने क्षमा मांगते हुए मां के पास आने की इजाजत मांगी. तनुश्री ने सोचा था कि बच्चे के मोह में उस के मांबाप उसे अवश्य माफ कर देंगे. कुछ ही दिन बाद उस के भेजे सारे पत्र ज्यों के त्यों बंद उस के पास वापस आ गए.

वेंकटेश अपने पुराने दोस्तों से वहां का हालचाल पूछ कर तनुश्री को बताता रहता. एकएक कर दोनों भाइयों और बहन की शादी हुई पर उसे किसी ने याद नहीं किया. बड़े भाई की नई फैक्टरी का उद्घाटन हुआ. बाबा ने वहीं हिंद मोटर कसबे में तीनों बच्चों को बंगले बनवा कर गिफ्ट किए, तब भी किसी को तनु याद नहीं आई. वह दूर भिलाई में बैठी हुई उन सारे सुखों को कल्पना में देखती रहती और सोचती कि क्या मिला इस प्यार से उसे? इस प्यार की उसे कितनी बड़ी कीमत अदा करनी पड़ी. एक वेंकटेश को पाने के लिए कितने प्यारे रिश्ते छूट गए. कितने ही सुखों से वह वंचित रह गई.

बाबा ने छोटी अपूर्वा की शादी कितने अच्छे परिवार में और कितने सुदर्शन लड़के के साथ की. बहन को भी लड़का दिखा कर उस की रजामंदी ली थी. कितनी सुखी है अपूर्वा…कितना प्यार करता है उस का पति…ऐसा ही कुछ उस के साथ भी हुआ होता. प्यार…प्यार तो शादी के बाद अपने आप हो जाता है. जब शादी की बात चलती है…एकदूसरे को देख कर, मिल कर अपनेआप वह आकर्षण पैदा हो जाता है जिसे प्यार कहते हैं. प्यार करने के बाद शादी की हो या शादी के बाद प्यार किया हो, एक समय बाद वह एक बंधाबंधाया रुटीन, नमक, तेल, लकड़ी का चक्कर ही तो बन कर रह जाता है. कच्ची उम्र में देखा गया फिल्मी प्यार कुछ ही दिनों बाद हकीकत की जमीन पर फिस्स हो जाता है पर अपने असाध्य से लगते प्रेम के अधूरेपन से हम उबर नहीं पाते. हर चीज दुहराई जाती है. संपूर्ण होने की संभावना ले कर पर सब असंपूर्ण, अतृप्त ही रह जाता है. अगले दिन सुबह तनुश्री उठी तो उस के चेहरे पर वह भाव था जिस में साफ झलकता है कि जैसे कोई फैसला सोच- समझ कर लिया गया है. तनुश्री ने उस लड़की से मिलने का फैसला कर लिया था. उसे अभय की इस शादी पर कोई एतराज नहीं था. उसे पता है कि अभय बहुत समझदार है. उस का चुनाव गलत नहीं होगा. अभय भी वेंकटेश की तरह परिपक्व समझ रखता है.

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पर कहीं वह लड़की उस की तरह फिल्मों के रोमानी संसार में न उड़ रही हो. वह नहीं चाहती थी कि जो कुछ जीवन में उस ने खोया, उस की बहू भी जीवन भर उस तनाव में जीए. अभय ने मां से काव्या को मिलवा दिया. किसी निश्चय पर पहुंचने के लिए दिल और दिमाग का एकसाथ खड़े रहना जरूरी होता है. तनुश्री काव्या को देख सोच रही थी क्या यह चेहरा मेरा अपना है? किस क्षण से हमारे बदलने की शुरुआत होती है, हम कभी समझ नहीं पाते. तनुश्री ने अभय को आफिस जाने के लिए कह दिया. वह काव्या के साथ कुछ घंटे अकेले रहना चाहती थी. दिन भर दोनों साथसाथ रहीं.

काव्या के विचार तनुश्री से काफी मिलतेजुलते थे. तनु ने अपने जीवन के सारे पृष्ठ एकएक कर अपनी होने वाली बहू के समक्ष खोल दिए. कई बार दोनों की आंखें भी भर आईं. दोनों एकमत थीं, प्रेम के साथसाथ सारे रिश्तों को साथ ले कर चलना है. एक सप्ताह बाद उदास अभय मां के घुटनों पर सिर रखे बता रहा था, ‘‘काव्या के मांबाप इस शादी के खिलाफ हैं. मां, काव्या कहती है कि हमें उन के हां करने का इंतजार करना होगा. उस का कहना है कि वह कभी न कभी तो मान ही जाएंगे.’’ ‘‘हां, तुम दोनों का प्यार अगर सच्चा है तो आज नहीं तो कल उन्हें मानना ही होगा. इस से तुम दोनों को भी तो अपने प्रेम को परखने का मौका मिलेगा,’’ तनुश्री ने बेटे के बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा, ‘‘मैं भी काव्या के मांबाप को समझाने का प्रयास करूंगी.’’ ‘‘मेरी समझ में कुछ नहीं आता, मैं क्या करूं, मां,’’ अभय ने पहलू बदलते हुए कहा. ‘‘बस, तू थोड़ा सा इंतजार कर,’’ तनुश्री बोली. ‘‘इंतजार…कब तक…’’ अभय बेचैनी से बोला.

‘‘सभी का आशीर्वाद पाने तक का इंतजार,’’ तनुश्री ने कहा. वह सोचने लगी कि आज के बच्चे बहुत समझदार हैं. वे इंतजार कर लेंगे. आपस में मिलबैठ कर एकदूसरे को समझाने और समझने का समय है उन के पास. हमारे पास वह समय ही तो नहीं था, न टेलीफोन और न मोबाइल ताकि एकदूसरे से लंबी बातचीत कर कोई हल निकाल सकते. आज बच्चे कोई भी कदम उठाने से पहले एकदूसरे से बात कर सकते हैं…एकदूसरे को समझा सकते हैं. समय बदल गया है तो सुविधा और सोच भी बदल गई है. जीवन कितना रहस्यमय होता है. कच्चे दिखने वाले तार भी जाने कहांकहां मजबूती से जुड़े रहते हैं, यह कौन जानता है.

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Winter Special: सर्दियों में बनायें ड्राईफ्रूट पंजीरी

सर्दियों में ड्राईफ्रूट्स तो खाती हैं, तो क्यों न कुछ अलग ट्राई किया जाए. घर पर ट्राई करें ड्राईफ्रूटी पंजीरी. ताकि सर्दी की नजर न लगे और घर वालें भी कुछ अलग चखकर खुश हो जायें.

सामग्री

– 20 ग्राम गोंद

– 20 ग्राम बादाम

– 20 ग्राम चिरौंजी

– 20 ग्राम कसा नारियल

– 30 ग्राम मखाने

– 1 बड़ा चम्मच पिस्ता

– 20 ग्राम किशमिश

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– 1/2 छोटा चम्मच छोटी इलायची चूर्ण

– 1 छोटा चम्मच जीरा

– 1/2 छोटा चम्मच अजवायन

– बूरा स्वादानुसार

– 150 ग्राम देशी घी

विधि

100 ग्राम घी कड़ाही में डाल कर गोंद को भूनें. बचे घी में मखानों को धीमी आंच पर करारा भून लें. गोंद को मोटामोटा कूट लें और मखानों को दरदरा. बचे घी को कड़ाही में डालें और बादाम, चिरौंजी व पिस्ता भून कर निकाल लें. बादाम व पिस्ता को छोटे टुकड़ों में काट लें. उसी घी में जीरा व अजवायन भूनें और फिर नारियल डाल कर 1 मिनट भूनें. अब किशमिश भी डाल दें. फिर सारी सामग्री मिक्स करें. ठंडा होने पर बूरा व छोटी इलायची चूर्ण मिला दें. ड्राईफ्रूटी पंजीरी तैयार है.

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मेरा बेटे को शराब और सिगरेट की लत लग गई है, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरे बेटे की उम्र 21 वर्ष है. वह गलत दोस्तों की संगति में आने की वजह से शराब और सिगरेट की लत का शिकार हो गया है. अब तो स्थिति यह हो गई है कि वह अपनी एडिक्शन की तलब पूरा करने के लिए चोरी भी करने लगा है. घर में किसी के भी पैसे बिना बताए उठा लेता है. मैं उस की इस स्थिति को देखते हुए खुद तनाव में आ गई हूं. कुछ समझ नहीं आता कि क्या करूं. कैसे उस को एडिक्शन से मुक्ति दिलाई जाए?

जवाब

जब हम एडिक्शन यानी लत की बात करते हैं तो इस का सीधा संबंध दिमाग से होता है. लत किसी भी चीज की हो सकती है. आप को यह समझना होगा कि एडिक्शन एक लत या आदत नहीं बल्कि बीमारी होती है. रही बात आप के बेटे की तो पूरी केस हिस्ट्री देखने के बाद उस की शारीरिक और मानसिक स्थिति का आकलन किया जा सकता है. उस से पता चलेगा कि शराब के कारण उस के शरीर पर कितना बुरा असर हुआ है. दूसरा यह पता लगाना भी जरूरी है कि शराब की वजह से डिप्रैशन या अन्य तरह की समस्या तो नहीं है. पहले उस की काउंसलिंग होगी फिर इलाज शुरू किया जाएगा.

आप घबराएं नहीं. एडिक्शन से आजाद होना मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं. अगर सही उपचार द्वारा कोशिश की जाए तो नशे की लत को छुड़ाया जा सकता है. टीएमएस थेरैपी के द्वारा नशे की लत को छुड़ाने में 100% रिजल्ट मिले हैं.

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पीयूष ने दोनों बैग्स प्लेन में चैकइन कर स्वयं अपनी नवविवाहित पत्नी कोकिला का हाथ थामे उसे सीट पर बैठाया. हनीमून पर सब कुछ कितना प्रेम से सराबोर होता है. कहो तो पति हाथ में पत्नी का पर्स भी उठा कर चल पड़े, पत्नी थक जाए तो गोदी में उठा ले और कुछ उदास दिखे तो उसे खुश करने हेतु चुटकुलों का पिटारा खोल दे.

भले अरेंज्ड मैरिज थी, किंतु थी तो नईनई शादी. सो दोनों मंदमंद मुसकराहट भरे अधर लिए, शरारत और झिझक भरे नयन लिए, एकदूसरे के गलबहियां डाले चल दिए थे अपनी शादीशुदा जिंदगी की शुरुआत करने. हनीमून को भरपूर जिया दोनों ने. न केवल एकदूसरे से प्यार निभाया, अपितु एकदूसरे की आदतों, इच्छाओं, अभिलाषाओं को भी पहचाना, एकदूसरे के परिवारजनों के बारे में भी जाना और एक सुदृढ़ पारिवारिक जीवन जीने के वादे भी किए.

हनीमून को इस समझदारी से निभाने का श्रेय पीयूष को जाता है कि किस तरह उस ने कोकिला को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया. एक सुखीसशक्त परिवार बनाने हेतु और क्या चाहिए भला? पीयूष अपने काम पर पूरा ध्यान देने लगा. रातदिन एक कर के उस ने अपना कारोबार जमाया था. अपने आरंभ किए स्टार्टअप के लिए वैंचर कैपिटलिस्ट्स खोजे थे.  न समयबंधन देखा न थकावट. सिर्फ मेहनत करता गया.

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उधर कोकिला भी घरगृहस्थी को सही पथ पर ले चली.

‘‘आज फिर देर से आई लीला. क्या हो गया आज?’’ कामवाली के देर से आने पर कोकिला ने उसे टोका.

इस पर कामवाली ने अपना मुंह दिखाते हुए कहा, ‘‘क्या बताऊं भाभीजी, कल रात मेरे मर्द ने फिर से पी कर दंगा किया मेरे साथ. कलमुंहा न खुद कमाता है और न मेरा पैसा जुड़ने देता है. रोजरोज मेरा पैसा छीन कर दारू पी आता है और फिर मुझे ही पीटता है.’’

पूरी कहानी पढ़ने के लिए- क्रंदन: पीयूष की शराब की लत ने बरबाद कर दिया उसका परिवार

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

नाम बड़े और दर्शन छोटे

देश में 2 समाज बनाने की पूरी तैयारी चल रही है- एक पैसे वालों का, एक बिना पैसों वालों का. समाज का गठन इसा तरह किया जा रहा है कि दोनों को आपस में एक दूसरे का चेहरा भी न देखना पड़े. पैसे वाले केवल पैसे वालों के साथ रहे और बिना पैसे वाले रातदिन लग कर अपने शरीर और जन के जोड़े रखने के लिए मेहनत कर के अलगथलग रहें. इन दोनों वर्गों में अपनेअपने छोटेछोटे और वर्ग भी होंगे, बहुतबहुत अमीर, बहुत अमीर, अमीर कम अमीर. बिना पैसे वालों में बहुतबहुत गरीब से मध्यर्म वर्ग तक होगा जो पैसे वालों को कमा कर भी देगा और अपनी बचत भी उन के पास आएगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली से 75 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश में दिल्ली आगरा के बीच बनने वाले जेवर हवाई अड्डे का जो उद्घाटन किया है वह इस वर्ग विभाजन की एक और ईट है. इस विशाल 3000 एकड़ में फैले हवाई अड्डे पर 30000 करोड़ से ज्यादा खर्च होंगे जो जनता पर कर लगा कर वसूले जाएंगे और उस में वे ही जा सकेंगे जो फर्राटेदार गाडिय़ों में 75 किलोमीटर जा सकें और हजारों के टिकट खरीद सकें. बल्कि आम जनता के लिए भेड़ों की तरह भरी बसें हैं जिन की फटी सीटें और गमाती बदबू कुत्तों को भी उन में घुसने न दे. मुंबई और कोलकाता की लोकल ट्रेनें इ सकी सुबूत हैं. दिल्ली में 3 पहिए वाले ग्रामीण सेवा के वाहन इस के जीते जागते निशान हैं.

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अब सडक़ें ऐसी बनेंगी जिन में दोनों तरह के लोगों को एकदूसरे को देखने की जरूरत ही न हो. अमीरों के लिए जो बनेगा वह वहीं बनाएंगे जिसे अमीर देखना भी नहीं चाहते. उन की बस्तियां अभी बसेंगी फिर उजाड़ दी जाएंगी और किसी दलदली जगह बसा दी जाएंगी जहां सीवर न हों या होंं  तो भरे हों, जहां एयरकंडीशंड बसे न हो, ट्रकनुमा धक्के हों.

जेवर हवाई अड्डा दुनिया का चौथा सबसे बड़ा हवाई अड्डा होगा. पर क्या भारत के प्रति व्यक्ति की आय दुनिया के चौथे नंबर पर खड़े प्रति व्यक्ति वाले देश के बराबर है? यह एशिया का सब से बड़ा हवाई अड्डा होगा पर क्या हमारी आम बेबस जनता चीनी, जापानी, दक्षिणी कोरियाई तो छोडि़ए, थाईलैंड और वियतनाम की जनता के बराबर भी खुशहाल है, संपन्न है.

जेवर हवाई अड्डा चमचमाता होगा, बढिय़ा ग्रेनाइट के फर्श होंगे, महंगा खाना परोसने वाले रेस्ट्रां होंगे जहां चाय 250 ग्राम रुपए की एक कप होगी. पर क्या वे औरतें इस के दर्शन कर पाएंगे जिन्हें अपने घर आए मेहमान के लिए 3 एक जैसे कप जुटाने में तकलीफ होती है?

जेवर हवाई अड्डा प्रगति का प्रतीक है पर यह प्रगति तब अच्छी लगेगी जब आम लोगों का जीवन स्वर भी उठ रहा हो. जब आम लोग और ज्यादा छोटे मोहल्लों में जाने को विवश हो रहे हों तो क्या जेवर को पहन कर मोदीयोगी इतराते फिरें, यह अच्छा है?

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कार्पेट खरीदने से पहले जरूर पढ़ लें ये टिप्स

घर के लिए अच्छा कार्पेट खरीदना मुश्किल कामों में से एक होता है. कारण बाजार में अनेक रंगों, सामग्री और अनेकों डिजाइन में उपलब्ध कार्पेट हैं. कालीन या कार्पेट से बच्चों को खेलने के लिए आरामदायक और सुरक्षित फर्श मिलता है. कार्पेट खरीदने से पहले कार्पेट खरीदने के कुछ टिप्स जानना बेहद जरूरी है.

कुछ कार्पेट्स को नियमित रूप से साफ करना आवश्यक होता है जो कि व्यस्त दिनचर्या में बहुत मुश्किल है. बेकार कार्पेट्स का रंग छूटता है, ये खराब जल्दी होती हैं और इनमें लगे दागों को हटाना भी मुश्किल होता है. आप पैसा खर्च कर रही हैं इसलिए जरूरी है कि अच्छी चीज खरीदें. तो चलिए हम आपको कार्पेट खरीदने के टिप्स बता रहे हैं.

1. कार्पेट की गद्दी अच्छी हो

कार्पेट के नीचे भराव या गद्दीदार परत रखें. कार्पेट के लिए अच्छी भराव सामग्री चुनें. इससे फर्श के साथ कुछ परेशानी होने पर भी यह जल्दी नहीं उधड़ती है. रबर या फोम की भराव सामग्री लें. अनेक प्रकार के कार्पेट स्टाइल देखें ऐसी कार्पेट चुनें जो कि आपकी स्टाइल के अनुसार हो. कुछ कार्पेट्स पर पैरों के निशान, वैक्यूम के निशान आदि रह जाते हैं, जैसे मखमल की कार्पेट्स. सेक्शन कार्पेट्स काफी सामान्य कार्पेट्स हैं जिन्हें ऐसी जगह बिछाया जा सकता है जहां लोग कम आते-जाते हैं जैसे कि लिविंग रूम, मास्टर बेड रूम आदि.

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2. कैसी कार्पेट चुनें

ऐसी कार्पेट चुनें जिसमें कोई वाष्पशील पदार्थ ना हो जैसे कि फोरमलडेहाइड या अन्य कोई केमिकल जो कि इन्स्टालेशन के बाद एक विशेष बदबू दे. ऊन या जैविक सामग्री जैसे प्राकृतिक उत्पादों से बने कार्पेट्स चुनें.

3. मेंटेनेंस की जरूरत को भी समझें

ऐसी कार्पेट चुनें जिसमें कम मेंटेनेंस खर्च कम हो और सावधानी भी कम रखनी पड़े. दाग प्रतिरोधक कार्पेट चुनें और ज्यादा भारी मेंटेनेंस खर्च वाली कार्पेट्स को छोड़ दें. वारंटी पर भी ध्यान दें किसी कार्पेट को सिर्फ इसलिए नहीं खरीदें कि उसकी लंबी वारंटी है. कार्पेट्स की सबसे बड़ी समस्या उसका मैनुफैक्चरिंग डिफेक्ट नहीं बल्कि गलत इन्स्टालेशन होता है.

4. पैसा खराब ना करें

ऐसा नहीं है कि महंगी कार्पेट्स आरामदायक होते हैं. उस पर खर्च करने लायक कीमत और इन्स्टालेशन चार्ज ध्यान से देख लें, ये तुलना आप विभिन्न डीलर्स के पास कर सकती हैं. यह कार्पेट खरीदने का सबसे अच्छा तरीका है. कार्पेट प्रोवाइडर का चुनाव ध्यान से करें. आप कहां-कहां से कार्पेट खरीद सकती हैं इसके सभी विकल्पों पर ध्यान दें. ऐसे स्टोर से खरीदें जहां बहुत वैराइटी हो और आपके बजट में सूट करे.

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घुंघरू: भाग 5- राजा के बारे में क्या जान गई थी मौली

लेखक – पुष्कर पुष्प  

इधर ढोलक पर मानू की थाप पड़ी और उधर मौली के पैर थिरके. पलभर में समां बंध गया. मौली उस दिन ऐसा नाची, जैसे वह उस का अंतिम नृत्य हो. लोगों के दिल धड़कधड़क कर रह गए. अंग्रेज रेजीडेंट बेहद खुश हुआ. उस ने नृत्य, गायन और वादन का ऐसा अनूठा समन्वय पहली बार देखा था. राजा समर सिंह का जो मकसद था, पूरा हुआ. महफिल समाप्त हुई, तो मौली ने मानू से हमेशा की तरह घुंघरू खुलवाने चाहे, लेकिन राजा ने इस की इजाजत नहीं दी.

अंग्रेज अधिकारी वापस चला गया, तो मानू को महल के बाहर कर दिया गया. मौली अपने कक्ष में चली गई. उस ने कसम खा ली कि उस के पैरों के घुंघरू खुलेंगे, तो मानू के हाथों से ही.

झील किनारे वाला महल तैयार होने में एक वर्ष लगा. छोटे से इस महल में राजा समर सिंह ने मौली के लिए सारी सुविधाएं जुटाई थीं. मौली की इच्छानुसार एक परकोटा भी बनवाया गया था, जहां खड़ी हो कर वह झील के उस पार स्थित अपने गांव को निहार सके.

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मौली और मानू एकदूसरे को बेहद प्यार करते हैं. प्यार में वे दोनों किसी भी हद तक जा सकते थे. इसी बात को ध्यान में रख कर राजा समर सिंह ने महल से सौ गज दूर झील के पानी में पत्थरों की एक ऐसी अदृश्य दीवार बनवाई, जिस के आरपार पानी तो जा सके, पर जीवों का जाना संभव न हो. दीवार के इस पार उन्होंने पानी में 2 मगरमच्छ छुड़वा दिए. यह सब उन्होंने इसलिए किया था, ताकि मानू झील में तैर कर इस पार न आ सके. आए, तो मगरमच्छों का शिकार बन जाए.

पूरी तैयारी हो गई, तो मौली को झील किनारे निर्मित महल में भेज दिया गया. जिस दिन मौली को महल में ले जाया गया, उस दिन महल को खूब सजाया गया. राजा समर सिंह की उस दिन वर्ष भर पुरानी आरजू पूरी होनी थी.

वादे के अनुसार मौली ने राजा के सामने स्वयं को समर्पित कर दिया. उस दिन उस ने अपना श्रृंगार खुद किया था, बेहद खूबसूरत लग रही थी वह. समर सिंह की बाहों में सिमटते हुए उस ने सिर्फ इतना कहा था, ‘‘आज से मेरा तन आप का है, पर मन को आप कभी नहीं छू पाएंगे. मन पर मानू का ही अधिकार रहेगा.’’

राजा को मौली के मन से क्या लेनादेना था. उन की जिद भी पूरी हो गई और हवस भी. उस दिन के बाद मौली स्थाई रूप से उसी महल में रहने लगी. सेवा में दासदासियां और सुरक्षा के लिए सैनिकों की व्यवस्था थी. महीने में 6-7 दिन मौली के साथ गुजारने के लिए राजा समर सिंह झीलवाले महल में आते रहते थे. वहीं रह कर वह पास वाले जंगल में शिकार भी खेलते थे.

मौली का रोज का नियम था. हर शाम वह महल के परकोटे पर खड़ी हो कर अपनी वही चुनरी हवा में लहराती, जो गांव से ओढ़ कर आई थी.

मानू को मालूम  था कि मौली झीलवाले महल में आ चुकी है. वह हर रोज झील के किनारे बैठा मौली की चुनरी को देखा करता. इस से उस के मन को काफी तसल्ली मिलती. कई बार उस का दिल करता भी, कि वह झील को पार कर के मौली के पास जा पहुंचे, लेकिन मौली की कसम उस के पैर बांध देती थी.

देखतेदेखते एक वर्ष और गुजर गया. मौली को गांव छोड़े दो वर्ष होने को थे. तभी एक दिन राजा समर सिंह को अंग्रेज रेजीडेंट का संदेश मिला कि वह उन की रियासत के मुआयने पर आ रहे हैं और उसी नर्तकी का नृत्य देखना चाहते हैं, जो पिछली यात्रा में उन के सामने पेश की गई थी.

राजा समर सिंह ने जब यह बात मौली को बताई, तो उस ने अपनी शर्त रखते हुए कहा, ‘‘यह तभी संभव है, जब मानू मेरे साथ हो. उस के बिना नृत्य का कोई भी आयोजन मेरे बूते में नहीं है.’’

समर सिंह ने मौली को समझाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. अंग्रेज रेजीडेंट को खुश करने की बात थी. फलस्वरूप राजा समर सिंह को झुकना पड़ा. मौली ने राजा से कहा कि वह चंदनगढ़ जाने के बजाय उसी महल में नृत्य करेगी और मानू को भी वहीं बुलाना होगा.

राजा समर सिंह नहीं चाहते थे कि मानू किसी भी रूप में मौली के सामने आए. जबकि अंग्रेज रेजीडेंट को खुश करना भी उन की मजबूरी थी. सोचविचार कर राजा ने झील में बनी अदृश्य दीवार (पानी के नीचे) पर ठीक महल के परकोटे के सामने पत्थरों का एक बड़ा सा गोल चबूतरा बनवा कर उस पर प्रकाश स्तंभ स्थापित कराया. इस चबूतरे और महल के बीच ही वह कुंड था, जिस में मगरमच्छ थे. मगरमच्छों को भोजन चूंकि उसी कुंड में डाला जाता था, अत: वे वहीं मंडराते रहते थे. महल के परकोटे से 2 मजबूत रस्सियां इस प्रकार प्रकाश स्तंभ में बांधी गईं, कि आदमी एक रस्सी के द्वारा स्तंभ तक जा सके और दूसरी से आ सके.

अंग्रेज रेजीडेंट के आने का दिन तय हो चुका था. उसी हिसाब से राजा ने झीलवाले महल में मेहमानवाजी की तैयारियां कराईं. जिस दिन रेजीडेंट को आना था, उस दिन 2 सैनिक इस आदेश के साथ राखावास भेजे गए कि वे झील के रास्ते मानू को प्रकाश स्तंभ तक भेजेंगे. मौली ने मानू को झील में न उतरने की कसम दे रखी थी, यह बात समर सिंह नहीं जानते थे.

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तयशुदा दिन जब अंग्रेज रेजीडेंट चंदनगढ़ पहुंचा, राजा समर सिंह यह कह कर उसे झीलवाले महल में ले गए, कि उन्होंने इस बार उन के मनोरंजन की व्यवस्था प्रकृति की गोद में की है. राजा का झीलवाला महल अंग्रेज रेजीडेंट को खूब पसंद आया.

मौली भी उस दिन खूब खुश थी. मानू से मिलने की खुशी उस के चेहरे से फूटी पड़ रही थी. उसे क्या मालूम था कि मानू को उस के सामने झीलवाले रास्ते से लाया जाएगा और वह ठीक से उस की सूरत भी नहीं देख पाएगी.

जब सारी तैयारियां हो गईं और अंग्रेज रेजीडेंट भी आ गया, तो महल के परकोटे से मौली की चुनरी से राखावास की ओर वहां मौजूद सैनिकों को इशारा किया गया. सैनिकों ने मानू से झील के रास्ते प्रकाश स्तंभ तक तैर कर जाने को कहा, तो उस ने इनकार कर दिया कि वह मौली की कसम नहीं तोड़ सकता. इस पर सैनिकों ने उस से झूठ बोला कि मौली ने अपनी कसम तोड़ दी है, वह अपनी चुनरी लहरा कर उसे बुला रही है. मानू ने महल के परकोटे पर चुनरी लहराते देखी, तो उसे सैनिकों की बात सच लगी. उस ने बिना सोचेसमझे मौली के नाम पर झील में छलांग लगा दी.

जिस समय मानू झील को पार कर प्रकाश स्तंभ तक पहुंचा, उस समय तक  राजा समर सिंह का एक कारिंदा रस्सी के सहारे ढोलक लेकर वहां जा पहुंचा था. उसी ने मानू को बताया कि महल और प्रकाश स्तंभ के बीच मगरमच्छ हैं. उसे उसी स्तंभ पर बैठ कर ढोलक बजानी होगी और मौली उसी धुन पर परकोटे पर नाचेगी. कारिंदा राजा का हुक्म सुना कर दूसरी रस्सी के सहारे वापस लौट आया.

मौली को जब राजा की इस चाल का पता चला, तो वह मन ही मन खूब कुढ़ी, लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. उस ने मन ही मन फैसला किया कि आज वह अंतिम बार राजा की महफिल में नाचेगी और नाचतेगाते ही हमेशाहमेशा के लिए अपने मानू से जा मिलेगी.

राजा की महफिल छत पर सजी थी. प्रकाश स्तंभ और महल की छत पर विशेष प्रकाश व्यवस्था कराई गई थी. जब अंधेरा घिर आया और चारों ओर निस्तब्ध्ता छा गई, तो मौली को महफिल में बुलाया गया. उस समय उस के चेहरे पर अनोखा तेज था. सजीधजी मौली घुंघरू खनकाती महफिल में पहुंची, तो लोगों के दिल धड़क उठे. मौली ने परकोटे पर खड़े हो कर श्वेत ज्योत्सना में नहाई झील को देखा. प्रकाश स्तंभ के पास सिकुड़ेसिमटे बैठे मानू को देखा और फिर आकाश के माथे पर टिकुली की तरह चमकते चांद को निहारते हुए बुदबुदाई, ‘‘हे मालिक, तुम से कभी कुछ नहीं मांगा, पर आज मांगती हूं. इस नाचीज को एक बार, सिर्फ एक बार उस के प्यार के गले जरूर लग जाने देना.’’

मन की मुराद मांग कर मौली ने एक बार जोर से पुकारा, ‘‘मानू…’’

उस की आवाज के साथ ही मानू के हाथ ढोलक पर चलने लग. ढोलक की आवाज वादियों में गूंजने लगी और उस के साथ ही मौली के पैरों के घुंघरू भी. पल भर में समां बंध गया. सभा में मौजूद लोग दिल थामे मौली की कला का आनंद लेने लगे. अभी महफिल जमे ज्यादा देर नहीं हुई थी.

मौली का पहला नृत्य पूरा होने वाला था. लोग वाहवाह कर रहे थे. तभी मौली तेजी से पीछे पलटी और कोई कुछ समझ पाता, इस से पहले ही मानू का नाम ले कर चीखते हुए परकोटे से प्रकाश स्तंभ तक जानेवाले रस्से को पकड़ कर झूल गई. मौली का यह दुस्साहसिक रूप देख पूरी सभा सन्न रह गई.

महल के परकोटे से प्रकाश स्तंभ तक आनेजाने वाले कारिंदे रस्सों में विशेष प्रकार के कुंडे में बंध झूला डाल कर आतेजाते थे. काम के बाद कुंडे और झूला निकाल कर रख दिए जाते थे. मौली चूंकि रस्से को यूं ही पकड़ कर झूल गई थी, फलस्वरूप रस्से की रगड़ से उस के हाथ बुरी तरह घायल हो गए. वह ज्यादा देर तक अपने आप को संभाल नहीं पाई और झटके के साथ कुंड में जा गिरी.

हतप्रभ मानू यह दृश्य देख रहा था. मौली के गिरने की छपाक की आवाज उभरी, तो मानू ने भी कुंड में छलांग लगा दी. अंग्रेज रेजीडेंट, राजा और उस की महफिल इस भयावह दृश्य को देखती रह गई. कुछ देर मानू और मौली पानी में डूबतेउतराते दिखाई दिए भी, लेकिन थोड़ी देर में वे आंखों से ओझल हो गए.

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घुंघरू: भाग 3- राजा के बारे में क्या जान गई थी मौली

लेखक – पुष्कर पुष्प  

मानू ने एक विशाल शिला को चुन कर अपना साधनास्थल बनाया और मौली के पैरों में अपने हाथों से घुंघरू बांधे. उसी दिन से मानू की ढफ की ताल पर मौली की नृत्य साधना शुरू हुई, जो अगले 2 वर्षों तक निर्बाध चलती रही. इस बीच ढफ और ढोलक पर मानू ने नएनए ताल ईजाद किए और मौली ने नृत्य एवं गायन की नईनई कलाएं सीखीं.

अपनीअपनी कलाओं में पारंगत होने के बाद मौली और मानू ने होली के मौके पर गांव वालों के सामने अपनीअपनी कलाओं का पहला प्रदर्शन किया, तो लोग हतप्रभ रह गए. उन्होंने इस से पहले न ऐसा ढोलक बजाने वाला देखा था, न ऐसी अनोखी अदाओं के साथ नृत्य करने वाली. कई गांव वालों ने उसी दिन भविष्यवाणी कर दी थी कि मौली और मानू की जोड़ी एक दिन राजदरबार में जा कर इस गांव का मान बढ़ाएगी.

समय के साथ मानू और मौली का भेड़करियां चराना छूट गया और नृत्यगायन पेशा बन गया. कुछ ही दिन में इलाकेभर में उन की धूम मच गई. आसपास के गांवों के लोग अब उन दोनों को तीजत्योहार और विवाहशादियों के अवसर पर बुलाने लगे. इस के बदले उन्हें धनधन्य भी मिल जाता था. मानू ने अपनी कमाई के पैसे जोड़ कर सब से पहले मौली के लिए चांदी  के घुंघरू बनवाए. घुंघरू मौली को सौंपते हुए वह बोला, ‘‘ये मेरे प्यार की पहली निशानी है, इन्हें संभाल कर रखना. लोग घुंघरूओं को नाचने वाली के पैरों की जंजीर कहते हैं, लेकिन मेरे विचार से किसी भी नृत्यांगना के लिए इस से बढि़या कोई तोहफा नहीं हो सकता. तुम इन्हें जंजीर मत समझना. इन घुंघरूओं को तुम्हारे पैरों में बांधूगा भी मैं और खोलूंगा भी मैं.’’

मौली को मानू की बात भी अच्छी लगी और तोहफा भी. उस दिन के बाद से वही हुआ, जो मानू ने कहा था. मौली को जहां भी नृत्यकला का प्रदर्शन करना होता, मानू खुद उस के पैरों में घुंघरू बांधकर ढोलक पर ताल देता. ताल के साथ ही मौली के पैर थिरकने लगते. जब तक मौली नाचती, मानू की निगाह उस के पैरों पर ही जमी रहती. प्रदर्शन के बाद वही अपने हाथों से मौली के पैरों के घुंघरू खोलता.

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प्यार क्या होता है, यह न मौली जानती थी, न मानू. वे तो केवल इतना जानते थे कि वे दोनों बने ही एकदूसरे के लिए हैं. मरेंगे तो साथ, जिएंगे तो साथ. मौली और मानू अपने प्यार की परिभाषा भले ही न जानते हों, पर गांववाले उन के अगाध प्रेम को देख जरूर जान गए थे कि वे दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. उन्हें उन के इस प्यार पर नाज भी था. किसी ने उन के प्यार में बाधा बनने की कोशिश भी नहीं की. मौली के मातापिता तक ने भी नहीं.

एक बार एक पहुंचे हुए साधू घूमतेघामते राखावास आए, तो गांव के कुछ युवकयुवतियां उन से अपनाअपना भविष्य पूछने लगे. उन में मौली भी शामिल थी. साधू बाबा उस के हाथ की लकीरें देखते ही बोले, ‘‘तेरी किस्मत में राजयोग लिखा है. किसी राजा की चहेती बनेगी तू.’’

मौली ने कभी कल्पना भी नहीं की थी, मानू से बिछुड़ने की. उस के लिए वह राजवाज तो क्या, सारी दुनिया को ठोकर मार सकती थी. उस ने हड़बड़ा कर पूछा, ‘‘मेरी किस्मत में राजयोग लिखा है, तो मानू का क्या होगा बाबा? …वह तो मेरे बिना…?’’

साधू बाबा पल भर आंखें बंद किए बैठे रहे. फिर आंखें खोल कर वह नीली झील की ओर निहारते हुए बोले, ‘‘वह इस झील में डूब कर मरेगा.’’

मौली सन्न रह गई. लगा, जैसे धरतीआकाश एक साथ हिल रहे हों, न चाहते हुए भी उस के मुंह से चीख निकल गई, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. मैं ऐसा होने नहीं दूंगी. मुझे मानू से कोई अलग नहीं कर सकता.’’

उस की बात सुन कर साधू बाबा ठहाका लगा कर हंसे. थोड़ी देर हंसने के बाद वे शांत स्वर में बोले, ‘‘होनी को कौन टाल सकता है बालिका.’’

बाबा अपनी राह चले गए. मौली को लगा, जैसे उस के सीने पर सैकड़ों मन वजन का पत्थर रख गए हों. यह बात सोचसोच कर वह पागल हुई जा रही थी कि बाबा की भविष्यवाणी सच निकली, तो क्या होगा? उस दिन जब मानू मिला, तो मौली उसे खींचते हुए झीलकिनारे ले गई और उस का हाथ अपने सिर पर रख कर बोली, ‘‘मेरी कसम खा मानू, तू आज के बाद जिंदगी भर कभी इस झील में कदम तक नहीं रखेगा.’’

मानू को मौली की यह बात बड़ी अजीब लगी. वह उस की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘यह कसम तो मैंने उसी दिन खा ली थी, जब तेरा खून इस झील के जल में मिल गया था. फिर भी तू कहती है, तो एक बार फिर कसम खा लेता हूं …पर बात क्या है? …इतनी घबराई हुई क्यों है?’’

मानू के कसम खा लेने के बाद मौली ने बाबा की बात उसे बताई, तो मानू हंसते हुए बोला, ‘‘तू इतना डरती क्यों है? जब मैं झील के पानी में कभी उतरूंगा ही नहीं, तो डूबूंगा कैसे? फिर कोई जरूरी तो नहीं कि बाबा की भविष्यवाणी सच ही हो.’’

साधू की भविष्यवाणी को वर्षों बीत चुके थे. इस बीच मौली 17 साल की हो गई थी और मानू 19 का. दोनों ही बाबा की बात भूल चुके थे.

…और तभी शिकार से लौटते समय राजा समर सिंह राखावास में रुके थे.

समर सिंह मौली को अपने साथ क्या ले गए, राखावास के प्राकृतिक दृश्यों की शोभा चली गई, गांव वालों का अभिमान चला गया और चली गई मानू की जान. पागलसा हो गया मानू. बस झील किनारे बैठा उस राह को निहारता रहता, जिस राह  राजा के साथ मौली गई थी. खानेपीने का होश ही नहीं था उसे. लगता था, जैसे राजा उस की जान निकाल कर ले गया हो.

बात तब की है, जब हिन्दुस्तान में मुगलिया सल्तनत का पराभव हो चुका था और ईस्ट इंडिया कंपनी का परचम पूरे देश में फहराने के प्रयास किए जा रहे थे. देश के कितने ही राजेरजवाड़े विलायती झंडे के नीचे आ चुके थे, और कितने आने को मजबूर थे. उन्हीं दिनों अरावती पर्वतमाला की घाटियों में बसी एक छोटीसी रियासत थी चंदनगढ़. इस रियासत के राजा समर सिंह थे तो अंग्रेज विरोधी, पर शक्तिहीनता की वजह से उन्हें भी ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे तले आना पड़ा था. उन पर अंग्रेजों का इतना प्रभाव था कि उन्हें अपने घोड़े गोरा का नाम बदल कर गोरू करना पड़ा था.

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समर सिंह उन राजाओं में थे, जो रासरंग में डूबे रहने के कारण राजकाज और प्रजा का ठीक से ध्यान नहीं रख पाते थे. राजा समर सिंह को 2 ही शौक थे, पहला शिकार का और दूसरा नाचगाने और मौजमस्ती का. मौली को भी उन्होंने इसी उद्देश्य से चुना था. लेकिन यह उन की भूल थी. वह नहीं जानते थे कि मौली दौलत की नहीं, प्यार की दीवानी है.

राजा समर सिंह मौली के रूपलावण्य, मदमाते यौवन और उस की नृत्यकला से प्रभावित हो कर उसे साथ जरूर ले आए थे, लेकिन उन्हें इस बात का जरा भी भान नहीं था कि यह सौदा उन्हें सस्ता नहीं पड़ेगा.

राजमहल में पहुंच कर मौली का रंग ही बदल गया. राजा ने उस की सेवा के लिए दासियां भेजीं, नएनए वस्त्र, आभूषण और श्रृंगार प्रसाधन भेजे, लेकिन मौली ने किसी चीज की ओर आंख उठा कर भी नहीं देखा. वह जिंदा लाशसी शांत बैठी रही. किसी से बोली तक नहीं, मानों गूंगी हो गई थी वह. दासियों ने समझाया, पड़दायतों ने मनुहार की, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

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