बहन का सुहाग: भाग 3- क्या रिया अपनी बहन का घर बर्बाद कर पाई

लेखकनीरज कुमार मिश्रा

राजवीर सिंह की शानोशौकत देख कर रिया सोचती कि निहारिका कितनी खुशकिस्मत है, जो इसे बड़ा और अमीर परिवार मिला. उस के मन में भी कहीं न कहीं राजवीर सिंह जैसा पति पाने की उम्मीद जग गई थी.

‘‘ये लो… तुम्हारा बर्थडे गिफ्ट,‘‘ राजवीर सिंह ने एक सुनहरा पैकेट रिया की और बढ़ाते हुए कहा.

‘‘ओह, ये क्या… लैपटौप… अरे, वौव जीजू… मुझे लैपटौप की सख्त जरूरत थी. आप सच में बहुत अच्छे हो जीजू…‘‘ रिया खुशी से चहक उठी थी.

राजवीर को पता था कि रिया को अपनी पढ़ाई के लिए एक लैपटौप चाहिए था, इसलिए आज उस के जन्मदिन पर उसे गिफ्ट दे कर खुश कर दिया था राजवीर ने.

रात को अपने कमरे में जा कर लैपटौप औन कर के रिया गेम्स खेलने लगी. कुछ देर बाद उस की नजर लैपटौप में पड़ी एक ‘निहारिका‘ नाम की फाइल पर पड़ी, तो उत्सुकतावश रिया ने उसे खोला. वह एक ब्लू फिल्म थी, जो अब लैपटौप की स्क्रीन पर प्ले हो रही थी.

पहले तो रिया को कुछ हैरानी हुई कि नए लैपटौप में ये ब्लू फिल्म कैसे आई, पर युवा होने के नाते उस की रुचि उस फिल्म में बढ़ती गई और फिल्म में आतेजाते दृश्यों को देख कर वह भी उत्तेजित होने लगी.
यही वह समय था, जब कोई उस के कमरे में आया और अपना हाथ रिया के सीने पर फिराने लगा था.

रिया ने चौंक कर लैपटौप बंद कर दिया और पीछे घूम कर देखा तो वह राजवीर था, ‘‘व …वो ज… जीजाजी, वह लैपटौप औन करते ही फिल्म…‘‘

‘‘अरे, कोई बात नहीं… तुम खूबसूरत हो, जवान हो, तुम नहीं देखोगी, तो कौन देखेगा… वैसे, तुम ने उस दिन मुझे और निहारिका को भी एकदूसरे को किस करते देख लिया था,‘‘ राजवीर ने इतना कह कर रिया को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ लिया और उस के नरम होंठों को चूसने लगा.

जीजाजी को ऐसा करते रिया कोई विरोध न कर सकी थी. जैसे उसे भी राजवीर की इन बांहों में आने का इंतजार था.

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राजवीर रिया की खूबसूरती का दीवाना हो चुका था, तो रिया भी उस के पैसे और शानोशौकत पर फिदा थी.
दोनों की सांसों की गरमी से कमरा दहक उठा था. राजवीर ने रिया के कपड़े उतारने शुरू कर दिए. रिया थोड़ा शरमाईसकुचाई, पर सैक्स का नशा उस पर भी हावी हो रहा था. दोनों ही एकदूसरे में समा गए और उस सुख को पाने के लिए यात्रा शुरू कर दी, जिसे लोग जन्नत का सुख कहते हैं.

उस दिन जीजासाली दोनों के बीच का रिश्ता तारतार क्या हुआ, फिर तो दोनों के बीच की सारी दीवारें ही गिर गईं.

राजवीर का काफी समय घर में ही बीतता. जरूरी काम से भी वह बाहर जाने में कतराता था. घर पर जब भी मौका मिलता, तो वह रिया को छूने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता. और तो और दोनों सैक्स करने में भी नहीं चूकते थे.

एक दोपहर जब निहारिका कुछ रसोई के काम निबटा रही थी, तभी राजवीर रिया के कमरे में घुस गया और रिया को बांहों में दबोच लिया. दोनों एकदूसरे में डूब कर सैक्स का मजा लूटने लगे. अभी दोनों अधबीच में ही थे कि कमरे के खुले दरवाजे से निहारिका अंदर आ गई. अंदर का नजारा देख उस के पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गई. दोनों को नंगा एकदूसरे में लिप्त देख पागल होने लगी थी निहारिका.

‘‘ओह राजवीर, ये क्या कर रहे हो मेरी बहन के साथ… अरे, जब मेरा पेट तुम से नहीं भरा, तो मेरी बहन पर मुंह मारने लगे. माना कि मैं तुम्हारी सारी मांगें पूरी नहीं कर पाती थी, पर तुम्हें कुछ तो अपने ऊपर कंट्रोल रखना चाहिए था.

‘‘और तुम रिया…‘‘ रिया की ओर घूमते हुए निहारिका बोली, ‘‘बहन ही बहन की दुश्मन बन गई. तुम से अपनी जवानी नहीं संभली जा रही थी तो मुझे बता दिया होता. मैं मम्मीपापा से कह कर तुम्हारी शादी करा देती, पर ये क्या… तुम्हें मेरा ही आदमी मिला था अपना मुंह काला करने के लिए. मैं अभी जा कर यह बात पापा को बताती हूं,‘‘ कमरे के बाहर जाते हुए निहारिका फुंफकार रही थी.

राजवीर ने सोचा कि आज तो निहारिका पापा को यह बात बता ही देगी. अपने ही पिता की नजरों में वह गिर जाएगा…
‘‘मैं कहता हूं, रुक जाओ निहारिका… रुक जाओ, नहीं तो मैं गोली चला दूंगा…‘‘

‘‘धांय…‘‘

और अगले ही पल निहारिका के मुंह से एक चीख निकली और उस की लाश फर्श पर पड़ी हुई थी.

अपनी जेब में राजवीर हमेशा ही एक रिवौल्वर रखता था, पर किसे पता था कि वह उसे अपनी ही प्रेमिका और नईनवेली दुलहन को जान से मारने के लिए इस्तेमाल कर देगा.

यह देख रिया सकते में थी. अभी वह पूरे कपडे़ भी नहीं पहन पाई थी कि गोली की आवाज सुनते ही पापामम्मी ऊपर कमरे में आ गए.

अंदर का नजारा देख सभी के चेहरे पर कई सवालिया निशान थे और ऊपर से रिया का इस अवस्था में होना उन की हैरानी को और भी बढ़ाता जा रहा था.

‘‘क्या हुआ, बहू को क्यों मार दिया…?‘‘ मां बुदबुदाई, ‘‘पर, क्यों राजवीर?‘‘

‘‘न… नहीं… मां, मैं ने नहीं मारा उसे, बल्कि उस ने आत्महत्या कर ली है,‘‘ राजवीर ने निहारिका के हाथ के पास पड़े रिवौल्वर की तरफ इशारा करते हुए कहा और इस हत्या को आत्महत्या का रुख देने की कोशिश की.

यह देख कर सभी चुप थे.

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राजवीर, रिया… और अब उस के मम्मीपापा पर अब तक बिना कहे ही कुछकुछ कहानी उन की समझ में आने लगी थी.

निहारिका के मम्मीपापा को खबर की गई.

अगले साल निहारिका के मम्मीपापा भी रोते हुए आए. पर यह बताने का साहस किसी में नहीं हुआ कि निहारिका को किस ने मारा है.

आनंद रंजन ने रोते हुए कहा, ‘‘अच्छीखासी तो थी, जब मैं मिल कर गया था उस से… अचानक से क्या हो गया और भला वह आत्महत्या क्यों करेगी? बोलो दामादजी, बोलो रिया, तुम तो उस के साथ थे. वह अपने को क्यों मारेगी…

आनंद रंजन बदहवास थे. किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. वे पुलिस को बुलाना चाहते थे और मामले की जांच कराना चाहते थे.

उन की मंशा समझ राजवीर ने खुद ही पुलिस को फोन किया.

आनंद रंजन को समझाते हुए राजवीर ने कहा, ‘‘देखिए… जो होना था हो गया. ऐसा क्यों हुआ, कैसे हुआ, इस की तह में ज्यादा जाने की जरूरत नहीं है… हां, अगर आप को यही लगता है कि हम निहारिका की हत्या के दोषी हैं, तो बेशक हमारे खिलाफ रिपोर्ट कर दीजिए और हम को जेल भेज दीजिए…

‘‘पर, आप को बता दें कि अगर हम जेल चले भी गए, तो जेल के अंदर भी वैसे ही रहेंगे, जैसे हम यहां रहते हैं. और अगर आप जेल नहीं भेजे हम को तो आप की छोटी बेटी की जिंदगी भी संवार देंगे.

“अगर हमारी बात का भरोसा न हो तो पूछ लीजिए अपनी बेटी रिया से.‘‘

इतना सुनने के बाद आनंद रंजन के चेहरे पर कई तरह के भाव आएगए. एक बार भरी आंखों से उन्होंने रिया की तरफ सवाल किया, पर रिया खामोश रही, मानो उस की खामोशी राजवीर की हां में हां मिला रही थी.

आनंद रंजन ने दुनिया देखी थी. वे बहुतकुछ समझे और जो नहीं समझ पाए, उस को समझने की जरूरत भी नहीं थी.

पुलिस आई और राजवीर के पैसे और रसूख के आगे इसे महज एक आत्महत्या का केस बना कर रफादफा कर दिया गया.

किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि सभी राजवीर के जलवे को जानते थे, पर हां, आनंद रंजन के नातेरिश्तेदारों और राजवीर के पड़ोसियों को जबरदस्त हैरानी तब जरूर हई, जब एक साल बाद ही आनंद रंजन ने रिया की शादी राजवीर से कर दी.

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निहारिका के बैडरूम पर अब रिया का अधिकार था और राजवीर की गाड़ी में रिया घूमती थी. इस तरह एक बहन ने दूसरी बहन के ही सुहाग को छीन लिया था.

ये अलग बात थी कि जानतेबूझते हुए भी अपनी बेटी को इंसाफ न दिला पाने का गम आनंद रंजन सहन न कर पाए और रिया की शादी राजवीर के साथ कर देने के कुछ दिनों बाद ही उन की मृत्यु हो गई.
रिया अब भी राजवीर के साथ ऐश कर रही थी.

ताईजी: भाग 2-क्या रिचा की परवरिश गलत थी

लेखिका- सरला अग्रवाल

पिछली रात जब वे दोनों बातें करने बैठी थीं तो विक्की के उन के पास आ कर चिपट कर बैठने पर रिचा ने उसे वहां से भगाने की चेष्टा की थी. पर वह वहां से जाना नहीं चाहता था. तब रिचा फूट पड़ी थी, ‘‘देखा दीदी, यह तो मेरी जान का दुश्मन बना हुआ है, कभी किसी से दो बातें नहीं कर सकती. देखिए, कैसे मुंह से मुंह जोड़ कर बैठा हुआ है. यहां सब बातें सुनेगा और वहां जा कर मांजी व अपने पिता से एक की दस लगाएगा. हर बात में अपनी टांग अड़ाएगा. मेरी छोटी बहन आई थी, तब भी इस ने बातें नहीं करने दीं. पीहर भी जाती हूं तो मां, बहनों, भाभी व सहेलियों से जरा भी बात नहीं करने देता. सच कहती हूं, बड़ी परेशान हो गई हूं, अब तो इस के मारे कहीं जाने का मन भी नहीं करता.’’

‘‘ठीक है, ठीक है. मैं आप के पास रहना ही कब चाहता हूं. मैं तो अब बड़े ताऊजी के पास बरेली जा रहा हूं. पिताजी ने उन से बात कर ली है,’’ विक्की बेफिक्री से बोला.

‘‘अरे, यह बरेली जाने की क्या बात है?’’ विभा ने पूछा.

‘‘दीदी, यह इतना बिगड़ता जा रहा है, इसी कारण हम लोग इसे बड़े भैया के पास भेजने की सोच रहे हैं.’’

‘‘वहां कोई अच्छा स्कूल है क्या?’’

‘‘न सही, पर उन का अनुशासन तो रहेगा ही. हमारी तो सुनता नहीं है, उन की तो सुनेगा. अब तो 7वीं कक्षा में आ गया है.’’

‘‘मतलब, अपनी बला औरों के सिर डालने से है? जब तुम सारा दिन बच्चे के सामने यही राग अलापती रहोगी कि हमारी तो सुनता नहीं, हमारी तो सुनता नहीं है, तो वह क्यों सुनेगा तुम्हारी?’’ विभा कुछ नाराजगी के साथ बोली.

‘‘दीदी, आप तो हर बात का दोष मुझे ही दे देती हो, बस.’’

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‘‘रिचा, समझने की कोशिश तो करो. बच्चे प्यार के भूखे होते हैं. यों थोड़ीबहुत सख्ती कर लो, पर हर समय उसे सुनाते रहना, ताने देना, व्यंग्य कसना, बातबात पर डांटना, मारना, हर एक से उस की बुराई करना, किसी मां को शोभा नहीं देता. दूसरे के पास भेज तो दोगी, पर वे भी इस के साथ क्या सख्ती बरत सकेंगे? और यदि सिखाने के लिए सख्ती करेंगे तो कल को तुम्हें ही नागवार गुजरेगा. इस से तो अच्छा है कि किसी अच्छे होस्टल में इसे डाल दो.’’ ‘‘पहली बात तो यह है कि इसे इतने कम नंबरों पर किसी अच्छे स्कूल में दाखिला मिलेगा ही नहीं, फिर अच्छे महंगे स्कूलों के होस्टलों में ‘ड्रग्स’ का कितना चलन हो गया है आजकल, यह तो कुछ भी कर सकता है. दीदी, आप को पता नहीं है, इसे तो केवल मैं ही समझ सकती हूं. अभी से अपने पास पर्स रखता है, वह भी रुपयों से भरा होना चाहिए, नहीं तो रोनाधोना मचा देता है. इस से बाजार से सब्जी मंगवाती हूं तो बाकी के रुपए वापस नहीं करता. एक मुसीबत है क्या इस लड़के के साथ… अब मैं इस से लिख कर हिसाब मांगती हूं,’’ रिचा सिसकती हुई बोली.

‘बच्चे को मेरे प्रश्न से कितना आघात लगा है,’ सोच कर विभा अनमनी सी हो आई. बच्चे का कोमल हृदय दुखाने के लिए उस ने यह सब नहीं पूछा था, वह तो केवल यही जानना चाहती थी कि बच्चे की मानसिक दशा कैसी है? क्यों वह इस प्रकार का अभद्र व्यवहार अपनी मां के साथ करता है? विभा वहां अपने पति के साथ 8-10 दिन के लिए आई हुई थी. रिचा उस की सब से छोटी देवरानी थी. आयु में भी वह विभा से काफी छोटी थी. इस कारण विभा उस पर अपना अधिकार जमा लेती थी. विभा बहुत समझदार थी और पूरे परिवार में उस का बड़ा मान था. रिचा भी उस से परामर्श लेने हेतु उसे अपने मन की सब बातें बता दिया करती थी. दोनों भाइयों में भी बहुत स्नेहभाव था.

विक्की रिचा के विवाह के कई वर्षों के बाद हुआ था. इस से पूर्व उस के 2 बेटे जन्मते ही जाते रहे थे. सो, विक्की से परिवार के सब ही लोगों का असीम स्नेह था. रिचा हर समय अपने इकलौते बेटे के भविष्य के लिए चिंतित रहती थी. संयुक्त परिवार होने के कारण वह अपने मनोनुकूल अधिक कर नहीं पाती थी. पिछले 2-3 वर्षों से विक्की बिगड़ने लगा था, बड़ों के अत्यधिक लाड़प्यार ने उसे जिद्दी और चटोरा तो बनाया ही था, साथ ही अपनी बात मनवाने के लिए वह झूठ भी बोलने लगा था.

ऐसे में रिचा का दुख क्रोध के रूप में बाहर निकलता था. पति तो बच्चे की शिक्षा पर तनिक भी ध्यान केंद्रित नहीं करते थे, अधिक से अधिक ट्यूटर लगा दिया. पुत्र को अपने पिता द्वारा जिस व्यवहार, शिष्टाचार, शिक्षा, मार्गदर्शन, स्नेह और दुलार की अपेक्षा होती है, विक्की उस से पूर्णतया वंचित रहा था. हां, बच्चे के प्रति उन के लाड़प्यार में कोई कमी नहीं थी, उस की मुंहमांगी वस्तु उसे तत्क्षण प्राप्त हो जाती थी. इस कारण वह और भी अधिक ढीठ और आलसी होता जा रहा था. घर के किसी भी कार्य की आशा उस से नहीं की जा सकती थी, हर समय उस के पीछे होहल्ला मचा ही रहता. एक दिन विभा के काफी समझाने पर रिचा ने बेटे को वह टेपरिकौर्डर दे दिया. तब वह दौड़ता हुआ विभा के पास आया और उन के दोनों गालों की पप्पी लेते हुए बोला, ‘‘धन्यवाद, ताईजी. देखिए, मां ने मुझे टेपरिकौर्डर दे दिया है. सुनेंगी?’’

इतना कह कर विक्की ने टेपरिकौर्डर चला दिया. टेप में से उस की सुमधुर आवाजें सुनाई देने लगीं.

‘‘अरे विक्की, यह तो तुम्हारी आवाज है? तो तुम्हें गाना भी आता है?’’ विभा ने प्रसन्न होते हुए अचरज से पूछा.

‘‘देख लीजिए ताईजी,’’ विक्की मटकते हुए बोला. उस की सुंदर आंखों में उस समय विचित्र चमक भर उठी थी. विभा ने टेपरिकौर्डर को हाथ में ले कर देखा, नन्हा सा लाल रंग का वह जापानी रिकौर्डर बहुत ही प्यारा था. तब विभा को समझ में आया कि बच्चा उसे अपना गायन सुना कर प्रभावित करने के लिए ही टेपरिकौर्डर लेने की जिद कर रहा था. पर रिचा ने मां हो कर भी इस तथ्य को नहीं समझा. वह सोचने लगी, ‘आखिर इतना छोटा भी तो अब विक्की नहीं है, 11 वर्ष का हो चला है.’

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विभा को सुबहशाम घूमने की आदत थी. वहां की सड़कों के विषय में अधिक जानकारी न होने के कारण उस ने पहले दिन अपने साथ विक्की को ले लिया था. उस के बाद उस के वहां रहने तक एक दिन भी उसे विक्की को साथ चलने के लिए कहना नहीं पड़ा था. वह स्वयं ही उन के साथ दौड़ा चला आता. विक्की को बिना बताए भी वह घर से निकल पड़ती, तो भी वह जाने कहां से सूंघ लेता और झटपट साथ हो लेता. तब विभा को बराबर लगता रहता था कि विक्की केवल प्यार का भूखा है. यदि उस के साथ प्यार व समझदारी से व्यवहार किया जाए तो वह हर बात मानने व करने को तैयार रहेगा. विभा एवं ताऊजी की तो वह हर बात बड़े ही ध्यान से सुनता था, केवल सुनता ही नहीं, बल्कि उस पर अमल भी करता. जैसे ही कोई काम उसे बताते, वह झटपट कर देता तब क्यों अपनी मां एवं घर के अन्य सदस्यों की बातों की वह इतनी अवहेलना करता है? क्यों सब को इतना छकाता है, इतना परेशान करता है? विभा बारबार सोचती. उधर मांजी कहतीं, ‘‘अरे, क्या बताऊं विभा, रिचा को तो विक्की फूटी आंखों नहीं सुहाता. रातदिन इस के पीछे हाथ धो कर पड़ी रहती है. कभी प्यार से बात नहीं करती. देखो, कब से वह ‘नाइटसूट’ बनवाने को कह रहा है, सारे पजामे फट गए हैं, पर यह है कि कपड़ा घर में ला कर रखा हुआ है, तो भी दरजी को नहीं दे रही, न ही अखिल को बाजार से बनेबनाए सूट लाने देती है. कहती है कि मैं स्वयं सिलूंगी, 6 महीने तो हो गए हैं ऐसे ही कहते…अब तू ही देख कि कितना परेशान हो रहा है बेचारा विक्की, इतनी घोर गरमी में भी पैंट पहन कर सोता है.’’

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ट्रस्ट एक कोशिश: भाग 3- क्या हुआ आलोक के साथ

लेखिका- अर्चना वाधवानी   

‘‘बिलकुल, तभी तो तुम ने मुझ से कल की सारी बातें छिपाईं,’’ उन के दुखी स्वर से मैं और दुखी थी.

‘‘मैं आप को दुखी नहीं करना चाहती थी. बस, इसलिए मैं ने आप को कुछ नहीं बताया,’’ मैं रो पड़ी.

‘‘नैना, मैं पराया नहीं हूं, तुम्हारा अपना…’’ वह आगे नहीं बोल पाए. मैं उन के कंधे पर सिर रख कर सिसक पड़ी थी.

कुछ ही दिन बाद…

‘‘नैना, तैयार रहना, आज कहीं खास जगह चलना है, ठीक 5 बजे,’’ कह कर आलोक ने फोन रख दिया. मैं ने घड़ी देखी तो 4 बज रहे थे.

मैं धीरेधीरे तैयार होने लगी. अपनी शक्ल शीशे में देखी तो चौंक गई. लग ही नहीं रहा था कि मेरा चेहरा है. गुलाबी रंगत गायब हो गई थी. आंखों के नीचे काले गड्ढे पड़ गए थे. कितने ही दिनों से खुद को शीशे में देखा ही नहीं था. सारा दिन भाइयों की बातें ध्यान में आती रहतीं. भाइयों का तो दुख था ही उस पर बाऊजी से मिल न पाने का गम भीतर ही भीतर दीमक की तरह मुझे खोखला करता जा रहा था.

आलोक दुखी न हों इसलिए उन से कुछ न कह कर मैं अपना सारा दुख डायरी में लिखती जा रही थी. बचपन से ही मुझे डायरी लिखने का शौक था. पता नहीं अब शादी से पहले की डायरी किस कोने में पड़ी मेरी तरह जारजार आंसू बहाती होगी. शादी के बाद वह डायरी बाऊजी के पास ही रह गई थी.

‘‘आलोक, हम कहां जा रहे हैं?’’ मैं आलोक के साथ कार में बैठी हुई थी.

‘‘बस, नैना, कुछ देर और फिर सब पता चल जाएगा,’’ आलोक हंस कर बोले.

कार धीरेधीरे शहर से बाहर लेकिन एक खुली जगह पर जा रुकी. मैं हैरानपरेशान कार में बैठी रही. समझ नहीं पा रही थी कि आखिर आलोक चाहते क्या हैं. अभी इसी उधेड़बुन में थी कि सामने खड़ी कार से जिस व्यक्ति को उतरते देखा तो उन्हें देख कर मैं एकदम चौंक पड़ी. मुझ से रहा न गया और मैं भी कार से बाहर आ गई.

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‘‘आओ, नैना बिटिया,’’ वर्मा चाचाजी बोले.

‘‘नमस्ते, चाचाजी, आप यहां?’’

‘‘हां, बेटी, अब तो यहां आना लगा ही रहेगा.’’

‘‘आलोक, प्लीज, क्या छिपा रहे हैं आप लोग मुझ से?’’

‘‘नैना, क्या छिपाने का हक सिर्फ तुम्हें ही है, मुझे नहीं.’’

‘‘आलोक, मैं ने आप से क्या छिपाया है?’’ मैं हैरान थी.

‘‘अपना दुख, अपने जज्बात, छिपाए या नहीं वह तो अलमारी में रखी तुम्हारी डायरी पढ़ ली वरना तुम्हारा चेहरा तो वैसे ही सारा हाल बता रहा है. तुम ने क्या सोचा, मुझे कुछ खबर नहीं है?’’

नजरें नीची किए मैं किसी अपराधी की तरह खड़ी रही लेकिन यह समझ अभी भी नहीं आया था कि यहां क्या यही सब कहने के लिए लाए हैं.

‘‘आलोक, बेटा, अब नैना को और परेशान मत करो और सचाई बता ही डालो.’’

‘‘नैना, यह जमीन का टुकड़ा, जहां हम खडे़ हैं, अब से तुम्हारा है.’’

‘‘लेकिन, आलोक, हमारे पास तो अच्छाखासा मकान है, फिर यह सब?’’

‘‘नैना, यह जमीन तुम्हारे बाऊजी ने दी है,’’ चाचाजी भावुक हो कर बोले और फिर बताते चले गए, ‘‘हरिश्चंद्र (बाऊजी) को तुम्हारे विवाह से बहुत पहले ही यह आभास होने लगा था कि बहुओं ने तुम्हें दिल से कभी स्वीकार नहीं किया. उन्होंने कई साल पहले यह प्लाट बुक किया था जिस की भनक उन्होंने किसी को भी नहीं लगने दी. उन्होंने अपने प्लाट और फिक्स्ड डिपोजिट की नामिनी तुम्हें बनाया था. जब वह बीमार रहने लगे तो उन्होंने मुझे सब कागजात दे दिए और तुम्हें देने के लिए कहा. क्या पता था कि वह अचानक हमें यों छोड़ जाएंगे. मैं ने आलोक को वे सब कागजात, एक डायरी और तसवीरें, जो तुम्हारे बाऊजी ने तुम्हें देने को बोला था, क्रिया के बाद भिजवा दीं. आगे आलोक तुम्हें बताएगा.’’

मैं ने प्रश्नसूचक नजरों से आलोक को देखा, ‘‘नैना, याद है जब तुम रजिस्ट्रार आफिस से लौटी थीं तो मैं ने एक पैकेट की बात की थी. लेकिन तुम ने ध्यान नहीं दिया तो उत्सुकतावश मैं ने खोल लिया था, जानती हो उस में क्या था, प्लाट के कागजात के अलावा… तुम्हारी शादी से पहले की डायरी…

‘‘मैं नहीं जानता था कि तुम बचपन से ही इतनी भावुक थीं. उस मेें तुम ने एक सपने का जिक्र किया था. बस, वही सपना पूरा करने का मैं ने एक छोटा सा प्रयास किया है.’’

आलोक और भी पता नहीं क्याक्या बताते चले गए. मेरी आंखों से आंसू बह निकले. लेकिन आज आंसू खुशी के थे, इस एहसास से भरे हुए थे कि मेरा वह सपना जो मैं ने बाऊजी की लिखी हुई एक कहानी ‘ट्रस्ट : एक छोटा सा प्रयास’ से संजोया था, सच बन कर, एक हकीकत बन कर मेरे सामने खड़ा हुआ है.

उन की उस कहानी का नायक अपना सारा जीवन समाजसेवा में लगा देता है. वह एक ऐसे ट्रस्ट का निर्माण करता है जिस का उद्देश्य अपंग और अपनों से ठुकराए, बेबस, लाचार, बेसहारा लोगों की मदद करना होता है. लेकिन मदद के नाम पर केवल रोटी, कपड़ा या आश्रय देना ही उस का उद्देश्य नहीं होता, वह उन में स्वाभिमान भी जागृत करना चाहता है.

बाऊजी से मुझे क्या नहीं मिला. अच्छी परवरिश, अच्छी शिक्षा, संस्कार, प्यार, आत्मविश्वास और अब एक अच्छे जीवनसाथी का साथ.

चाचाजी ने बताया कि आलोक ने अपनी तरफ से भी बहुत बड़ी रकम ट्रस्ट के लिए दी है. वह चाहते तो प्लाट या बैंक के पैसे अपने इस्तेमाल में ले लेते लेकिन मेरा दुख देख उन्होंने इस कार्य को अंजाम दिया.

‘‘आलोक, आप एक अच्छे जीवनसाथी हैं यह तो मैं जानती थी लेकिन इतने अच्छे इनसान भी हैं, यह आज पता चला.’’

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‘‘अब यह तुम्हारा नहीं हमारा सपना है,’’ आलोक ने कहा, ‘‘हम अपने चेरिटेबल ट्रस्ट का नाम ‘प्रयास’ रखेंगे. कैसा लगा?’’

‘‘बहुत अच्छा और सटीक लगा यह नाम,’’ नैना बोली, ‘‘सच ही तो है, जरूरतमंदों की मदद के लिए जितना भी प्रयास किया जाए कम होता है.’’

ट्रस्ट का एक मतलब जहां विश्वास होता है तो दूसरा मतलब अब हमारी जिंदगी का उद्देश्य बन चुका था. यानी कि मानव सेवा. जैसेजैसे हम इस उद्देश्य के निकट पहुंचते गए वैसेवैसे ही मेरे भीतर के दुख दूर होते गए.

आज भी मां और बाऊजी की तसवीरें ‘प्रयास’ के आफिस में हमें आशीर्वाद देती प्रतीत होती हैं. उन दोनों ने मुझे अपनाया और एक पहचान दी. वे दोनों ही मेरे परिवार और मेरी नजरों में अमर हैं. वे हमारे दिलोें में सदा जीवित रहेंगे. मैं, आलोक और मेरी दोनों बेटियां, आन्या और पाखी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं हर दिन, हर पल लेकिन फूलों से नहीं बल्कि ट्रस्ट  ‘प्रयास’ के रूप में.

हवाई जहाज दुर्घटना: भाग 3- क्या हुआ था आकृति के साथ

लेखक-डा. भारत खुशालानी

नब्ज की धड़कन को महसूस करने के लिए अब उसे कनपटियों पर उंगलियां फिराने की जरूरत नहीं थी. उसे ऐसा लग रहा था, जैसे खून की यह नाड़ी कनपटियों के बाहर आ गई हो. जैसेजैसे उस की बेचैनी बढ़ रही थी, वैसेवैसे नाड़ी की धड़कन बढ़ रही थी. उस के दिलों की धड़कन तो बढ़ ही गई थी, लेकिन अधिक दबाव के कारण कनपटियों की नाड़ी सिर में दर्द पैदा कर रही थी. आमतौर पर सौ से नीचे रहने वाली यह धड़कन अब शायद डेढ़ सौ तक पहुंच गई थी.

ऐसा लग रहा था कि कानों के पास का हिस्सा फट जाएगा. उस ने थोड़ा सोचने की कोशिश की, लेकिन सोचने का समय नहीं था. स्टौल की स्थिति गंभीर हो कर और खराब हो रही थी.

अचानक आकृति को एहसास हुआ कि यदि इस क्षण में वो किसी नतीजे पर पहुंच कर ठोस कदम नहीं उठाएगी, तो विमान आकाश से नीचे गिर जाएगा.

उस क्षण में आकृति ने अपना मन बना लिया. उस ने फैसला कर लिया कि विमान को बचाने के लिए वह उसे नीचे की ओर ले जाएगी. उस ने कार के स्टीयरिंग व्हील जैसे दिखने वाले जोत को सामने की ओर धकेला, जिस से विमान के सामने का नाक वाला हिस्सा नीचे की ओर झुक गया और विमान के पीछे का हिस्सा ऊपर उठ गया. इस से विमान अपनी नाक की सीध में नीचे की ओर जाने लगा.

आकृति ने मन ही मन कहा कि विमान की रफ्तार तेज हो जाए. तुरंत ही, विमान की रफ्तार तेज हो गई. लेकिन अब समस्या यह खड़ी हो गई कि विमानतल के दौड़पथ की तरफ जाने के बदले विमान शहर के इलाके में जा रहा था.

ऊंचाईसूचक यंत्र बता रहा था कि विमान की ऊंचाई तेजी से शून्य की ओर बढ़ रही है. मतलब, विमान तेजी से जमीन की ओर आ रहा था.

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जैसेजैसे इस यंत्र की सूई शून्य की तरफ झुक रही थी, वैसेवैसे शहर के इलाके में घुस कर विमान के तबाही मचा देने के आसार बढ़ रहे थे. लेकिन विमान के अतिरिक्त वेग का एक फायदा यह हुआ कि आकृति को विमान को समतल बनाने में अचानक ही आसानी हो गई.

जिस समय इंजन में आग लगी थी, उस समय से ले कर अब तक, पहली बार आकृति को प्रतीत हुआ कि विमान को नियंत्रण में ला कर उसे स्थिर रास्ते पर लाया जा सकता है.

वैसे तो विमान अभी भी किसी भारी पत्थर की तरह ही नीचे गिर रहा था, लेकिन आकृति उस को एक सीधी रेखा में रख काबू में रखने की कोशिश कर पा रही थी. उस ने तब तक इंतजार किया, जब तक विमान 2,000 फुट नीचे न गिर गया हो, उस के बाद उस ने जोत को पीछे की ओर खींचा.

जोत को पीछे की ओर खींचने से विमान की नाक नीचे की ओर से ऊपर आ कर सीधी हो गई और विमान आकाश में समतल हो गया.

इस के बाद आकृति ने थ्रौटल को आगे धकेला, जिस से विमान की गति बढ़ी. विमान की उड़ान में अभी भी ऊबड़खाबड़ मची हुई थी, लेकिन एक इंजन पर विमान को उस दिशा में घुमा पाना संभव हो गया था, जिस दिशा से वह भटक गया था. विमान की उतराई का मार्ग अब निशाने पर था.

आकृति ने अवतरण गियर को नीचे किया, जिस से वायुयान के पहिए अपनी सामान्य गति से विमान के बाहर आ गए. अपने सामने के वायुरोधक शीशे से उसे हवाईअड्डे का दौड़पथ नजर आ रहा था.

आकृति ने अपना ध्यान विमान को नियंत्रित रखने पर केंद्रित किया और दौड़पथ पर लगी बत्तियों को सामने के शीशे के बीचोंबीच रखने का प्रयास किया. उस ने ऊंचाईसूचक यंत्र की तरफ जल्दी से नजर डाली. यंत्र की सूई 500 फुट से गिर कर 400 फुट हुई, फिर 300 फुट, फिर 200 फुट, फिर 100 फुट.

100 फुट के बाद आकृति ने विमान को दौड़पथ की रोशनियों के सहारे विमान को बिलकुल बीच में लाने का प्रयास किया. यंत्र की सूई 50 फुट तक आई, फिर 25, फिर 10 और फिर विमान तीव्रता से दौड़पथ से आ कर मिला. एक गतिरोधक के ऊपर से गुजरने वाली वेदना के साथ विमान ठोस धरती से टकराया और दौड़पथ पर दौड़ने लगा.

विमान की उतरान बदसूरत थी. आकृति ने जोर से ब्रेक दबाए. उस ने तेज गति से और झटके से विमान को मोड़ा, ताकि विमान के पंख अपने निर्धारित दौड़पथ की रेखाओं के अंदर आ जाएं. अगर उतरने के बाद भी विमान को काबू में न रखा गया तो वह आसपास के दौड़पथ पर जा कर दूसरी चीजों से टकरा सकता था.

विमान सुरक्षित तो नीचे उतर गया था, लेकिन उतरने के बाद जोर से ब्रेक लगने और झटके से मुड़ने के कारण वह दौड़पथ पर अस्थिर रूप से इधरउधर दौड़ रहा था.

आकृति ने अपना हौसला नहीं खोया. इंजन में आग लग जाने के बावजूद भी वह विमान को सुरक्षित तरीके से नीचे ले आने में कामयाब हो पाई थी, इस बात से उस का आत्मविश्वास अब काफी हद तक बढ़ गया था. उस ने जोत को कस कर पकड़ लिया और उसे एकदम सीधे मजबूती से पकड़ कर रखा. इस से विमान की लहरदार चाल पर लगाम लग गई और विमान धीरेधीरे कर के दौड़पथ के बीच की रेखा में सीधा आ गया.

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जोर से ब्रेक लगाने के कारण विमान ने दौड़पथ पर अपनी निश्चित सीमा का उल्लंघन नहीं किया और दौड़पथ खत्म होने से पहले ही अपनी दौड़ को विराम दिया.

जब विमान पूरी तरह से स्थिर हो कर खड़ा हो गया तो आकृति ने अपने हाथ जोत पर से हटाए, अपने माथे को जोर से रगड़ा और दो पल के लिए अपना सिर नीचे की ओर झुकाया.

आज की अविश्वसनीय घटना आकृति ने दूसरों से होती हुई सुनी थी, लेकिन जिंदगी में कभी भी यह नहीं सोचा था कि किसी दिन उस के साथ भी ऐसा होगा.

विमान के बाहर अग्निशामक दस्ते दौड़ते हुए विमान की तरफ आ रहे थे. मई की भीषण गरमी में बदन को झुलसाती इस विमान में लगी आग… विमान के अंदर, एक कोरोना से बचने के लिए मास्क काफी नहीं था, यात्रियों को ऊपर से गिरा औक्सीजन का मास्क भी पहनना पड़ा था.

विमान के इंजन में आग लगते ही औक्सीजन के मास्क नीचे आ गए थे और एयर होस्टेस ने यात्रियों की मदद की थी औक्सीजन मास्क पहनने में, हालांकि यात्रियों से थोड़ा सा दूर रह कर. जब एक के ऊपर एक आपदाएं आती हैं, तो उन सब से एकसाथ निबटने के लिए नए आयामों को ईजाद करना पड़ता है.

यात्रियों ने विमान के जमीन पर उतरते ही एक नए जीवन को अपने भीतर जाते हुए महसूस किया. विमान के पूरी तरह से स्थिर हो जाने के बाद भी तब तक खतरा बना हुआ था, जब तक सभी यात्रियों को सुरक्षित बाहर नहीं निकाल लिया जाता. एक तरफ आग को काबू में लाने के लिए पानी की बौछारें बरसाई जा रही थी, तो वहीं दूसरी तरफ यात्रियों को सुरक्षित नीचे उतारने के लिए सीढ़ियां पीछे के दरवाजे पर लगाई जा रही थीं.

आकृति अपना सिर नीचे झुकाए बैठी थी. उस की आंखों में आंसू आ गए थे. वह अपनेआप को ही इस विपदा का कारण समझने लगी थी, ‘मेरी ही गलत सोच थी यह, जिस ने ऐसी परिस्थितियों को पैदा किया, जिस से विमान के इंजन में आग लग गई. अगर मेरी सोच सकारात्मक होती तो विमान के इंजन में आग कभी नहीं लगती,’ यही सोच आकृति को खाए जा रही थी. वह यह भूल गई कि अगर उस की जगह कोई और होता तो शायद विमान उसी प्रकार की दुर्घटना का शिकार हो गया होता, जैसे 2 दिन पहले कराची में हुआ था.

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दिल्ली प्रैस के लिए संपादकीय इंटर्न

दिल्ली प्रैस की हिंदी पत्रिकाओं के लिए इंटर्नस के अवसर उपलब्ध हैं. आवेदक हिंदी माध्यम से हानर्स स्नातक हों और उनकी लेखन में क्षमता हो. दिल्ली, मुंबई, पटना, जयपुर, भोपाल, फरीदाबाद, गुड़गांव में अवसर. आवेदन में पूरा पता और मोबाइल नंबर देते हुए ईमेल करें: pn2@delhipress.biz

पोस्टल पता: दिल्ली प्रैस, ई 8, झंडेवाला एस्टेट, रानी झांसी रोड, नई दिल्ली 110055

Bigg Boss 15: Devoleena से भयंकर लड़ाई के दौरान बेहोश हुई Shamita, देखें वीडियो

कलर्स के रियलिटी शो ‘बिग बॉस 15’ (Bigg Boss 15) में VIP मेंबर्स की एंट्री के बाद से शो में लड़ाई और बहस देखने को मिल रही है. वहीं देवोलीना भट्टाचार्जी (Devoleena Bhattacharjee) और शमिता शेट्टी (Shamita Shetty) के बीच वीकेंड के वार पर हुई लड़ाई के बाद अब एक और बहस देखने को मिली, जिसमें  शमिता शेट्टी बेहोश हो गईं. आइए आपको बताते हैं क्या है पूरा मामला…

शमिता औऱ देवोलीना में हई बड़ी लड़ाई

हाल ही में शो का नया प्रोमो सामने आया है, जिसमें देवोलीना भट्टाचार्जी (Devoleena Bhattacharjee) और शमिता शेट्टी (Shamita Shetty) के बीच दोबारा बड़ी लड़ाई हो गई है. दरअसल, प्रोमों में टास्क के दौरान जहां कंटेस्टेंट के बीच बहस हो गई है तो वहीं देवोलीना और शमिता एक दूसरे से भिड़ते नजर आए. इसी कारण दोनों की लड़ाई इतनी बढ़ गई की. शमिता बेहोश हो गईं और करण कुंद्रा उन्हें गोद में ले जाते नजर आए.

 

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तेजस्वी और उमर की हुई बहस

 

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दूसरी तरफ शो के दूसरे कंटेस्टेंट की बात करें तो तेजस्वी प्रकाश और उमर रियाज के बीच लड़ाई देखने को मिली है, जिसमें उमर, तेजस्वी पर भड़कते हुए नजर आ रहे हैं. हालांकि करण कुंद्रा उन्हें समझाते नजर आ रहे हैं. वहीं इस मामले में तेजस्वी इमोशनल होती हुई भी नजर आईं.

बता दें, शो में इन दिनों वीआईपी औऱ नौन वीआईपी का केस चल रहा है, जिसे फैंस काफी पसंद रहे हैं. हालांकि शो में इस कारण कई लड़ाईयां भी होती हुई देखने को मिल रही  हैं. वहीं टास्क के दौरान ये लड़ाई इतनी बढ़ गई हैं कि नौन वीआईपी एक साथ आ गए हैं.

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अनुज के सामने Anupama की बेइज्जती करेगी काव्या, कहेगी ये बात

रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) स्टारर सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupamaa) टीआरपी चार्ट्स में पहले नंबर पर बना हुआ है. हालांकि मेकर्स सीरियल में और भी कई धमाकेदार ट्विस्ट लाने के लिए तैयार है. दरअसल, जहां अनुज (Gaurav Khanna) की लाइफ में नई हसीना की एंट्री होने वाली है तो वहीं काव्या (Madalsa Sharma) की अनुपमा को लेकर जलन बढ़ने वाली है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा अनुपमा में आगे (Anupamaa Latest Episode)…

अनुपमा की होगी बेइज्जती

 

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अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुपमा की शाह परिवार में एंट्री काव्या को खलती नजर आएगी. वहीं शाह फैमिली की फोटो में वनराज, अनुपमा को साथ आने के लिए कहेगा, जिसे देखकर काव्या का गुस्सा बढ़ जाएगा और वह अनुपमा को खींचकर फोटो खिचवानें से हटवा देगी. काव्या अनुपमा से कहेगी कि तोषू की शादी में वह घरवाली थी और अनुपमा बाहर वाली और अब वह घरवाली है और वह बाहरवाली तो उसे शाह हाउस में रहने का कोई हक नहीं है. वहीं अनुपमा के लिए काव्या का ये बरताव देखकर वनराज और अनुज दोनों गुस्से में नजर आएंगे और काव्या को खरी खोटी सुनाएंगे.

 

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शो में होगी नई एंट्री

खबरों की मानें तो सीरियल अनुपमा में नई एक्ट्रेस की एंट्री होने वाली है, जो अनुज की एक्स गर्लफ्रैंड के किरदार में नजर आएगी. हालांकि वह अनुपमा को उसके प्यार का एहसास करवाने वाली है, जिसके चलते सीरियल की कहानी में नया ट्विस्ट आएगा.

पाखी की बात सुनकर हैरान हुआ शाह परिवार

अब तक आपने देखा कि बा के कहने पर अनुज और जीके शाह हाउस आते हैं. जहां बा और वनराज उनसे माफी मांगते हैं, जिसे देखकर अनुपमा बेहद खुश होती है. वहीं बापूजी तुमसे मिलके दिल का है जो हाल क्या करें गाने पर डांस करते हुए नजर आते हैं. वहीं अनुपमा के साथ अनुज डांस करने का सपना देखता है. दूसरी तरफ पाखी सभी को शादी न करने का फैसला सुनाती है, जिसे सुनकर पूरा परिवार हैरान हो जाता है.

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नजरिया: क्यों पुरुषों से नफरत करती थी सुरभि

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Winter Special: स्नैक्स में बनाएं हलके मीठे शकरपारे

स्नैक्स में अगर आप कोई आसान और कोई टेस्टी रेसिपी ट्राय करना चाहते हैं तो हलके मीठे शकरपारे आपके लिए परफेक्ट रेसिपी है.

सामग्री

–  1/2 कप आटा

–  1/2 कप मैदा

–  2 छोटे चम्मच सूजी

–  1/2 कप दूध –  1/6 कप घी

–  1/2 कप चीनी

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– 1/2 छोटा चम्मच इलायची पाउडर

–  1/8 छोटा चम्मच बेकिंग सोडा

–  2 छोटे चम्मच तिल

–  थोड़ा सा रिफाइंड औयल शकरपारे सेंकने के लिए.

विधि

दूध में चीनी और घी डाल कर उबालें. मैदा, सूजी और आटा छान लें. इस में दूध वाला मिश्रण, बेकिंग सोडा, इलायची पाउडर और तिल डाल कर आटा गूंध लें. 15 मिनट ढक कर रखें फिर छोटीछोटी लोइयां बना कर मोटा बेलें और मनचाहे आकार में काट लें. गरम तेल में मीडियम आंच पर सुनहरा होने तक सेंक लें. ये भी काफी दिनों तक खराब नहीं होते.ट

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सेहत की निशानी नहीं मोटापा

भारतीयों में पिछले 12-15 वर्षों के दौरान मोटापा बड़ी तेजी से बढ़ा है. मोटापे की 2 श्रेणियां मानी जाती हैं. पहली है ओवरवेट यानी जरूरत से ज्यादा वजन. इस से दिल और सांस से जुड़ी कई बीमारियां हो जाती हैं. दूसरी श्रेणी है ओबेसिटी, जो ढेर सारी बीमारियों का आधार होने के अलावा खुद में एक बीमारी है. इसे डाक्टर की मदद के बिना ठीक नहीं किया जा सकता है.

मैडिकल जर्नल ‘लांसेट’ में प्रकाशित सर्वे के अनुसार, भारत में करीब 20 प्रतिशत लोग मोटापे से जुड़ी किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त हैं. खाने की खराब गुणवत्ता और शारीरिक श्रम का अभाव मोटापे की 2 बड़ी वजहें मानी जाती हैं. कार से सफर करना, एयरकंडीशंड में रहना, होटलों में खानापीना व लेटनाइट पार्टियों के मजे लेना आदि आज खातेपीते लोगों की जीवनशैली बन चुकी है.

ऐसी आदतों और जीवनशैली को ले कर हमें समय रहते चेत जाना जरूरी है क्योंकि कड़ी मेहनत की कमाई अगर हमें मोटापे से जुड़ी बीमारियों पर लुटानी पड़े तो यह अफसोसजनक है.

एक अन्य अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2030 तक मोटापा नौन कम्यूनिकेबल डिजीज का एक बड़ा कारण बन जाएगा और दुनिया में 70 प्रतिशत मौतें मोटापे से जुड़ी बीमारियों की वजह से होंगी. इस सर्वे के अनुसार, वर्ष 2030 तक मोटापे से जुड़ी बीमारियों से मरने वाले लोगों में भारत जैसे विकासशील देश के लोगों की संख्या काफी अधिक होगी. मोटापा महामारी बन जाए, इस से पहले इस की रोक पर हमें गंभीर प्रयास शुरू कर देने चाहिए.

यह सवाल, कि हम ओवरवेट या मोटे हैं या नहीं, इस को डा. पारुल आर सेठ की रिपोर्ट से बेहतर ढंग से जाना जा सकता है.

कैसे जानें अपना बीएमआई :

अपनी लंबाई और वजन के जरिए बौडी मास इंडैक्स यानी बीएमआई को कैलकुलेट किया जा सकता है. बीएमआई को जानने के लिए अपनी लंबाई को (मीटर में) इसी नंबर से गुणा कर दें. फिर जो नंबर मिले उसे अपने वजन (किलोग्राम) से भाग कर दें. इस से जो नंबर आएगा वह आप की बौडी का बीएमआई होगा.

क्या हो बीएमआई :

अगर आप का बीएमआई 18.50 से कम है तो आप अंडरवेट हैं. बीएमआई 30 से ज्यादा होने का मतलब है कि आप मोटे हैं और आप को अपने बढ़ते वजन पर नियंत्रण करने की जरूरत है.

कमर कितनी हो: शरीर के मध्य भाग पर जमे फैट का अंदाजा कमर के मापने से हो जाएगा. इस के लिए टेप को अपने लोअर रिब्स और हिप्स के बीच के हिस्से में रखते हुए गहरी सांस छोड़ते हुए घेरा नापें.

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पुरुषों में यह नाप 94 सैंटीमीटर और महिलाओं में 88 सैंटीमीटर से ज्यादा होने का मतलब है कि आप कार्डियोवैस्कुलर, स्ट्रोक या डायबिटीज जैसी बीमारियों के खतरे पर खड़े हैं. पुरुषों में यह नाप 102 सैंटीमीटर और महिलाओं में 88 सैंटीमीटर से ऊपर जाने की स्थिति में मोटापे से जुड़ी बहुत सी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

वेस्ट-हिप रेशियो :

वेस्ट यानी कमर, हिप्स यानी कूल्हे पर जमे फैट का अंदाजा लगाने के लिए उन का रेशियो निकाला जाता है. नाभि के पास से कमर की नाप लें और फिर कूल्हे के निचले हिस्से को नापें. कमर की नाप को कूल्हे की नाप से भाग कर दें. पुरुषों में यह रेशियो एक से ज्यादा और महिलाओं में 0.8 से ज्यादा आने का मतलब है कि आप हैल्थ प्रौब्लम के रिस्क जोन में हैं. ऐसे में आप को अपनी सेहत को ले कर सावधान हो जाने की सख्त जरूरत है.

वेट ज्यादा है तो :

बीएमआई और वेस्ट की नाप ज्यादा होने का साफसाफ मतलब है कि आप ओवरवेट हैं और अपने वजन को नियंत्रण में रखने के लिए अब आप को हैल्दी लाइफस्टाइल अपनाने की सख्त जरूरत है. इस समय अगर आप अब भी रोजाना ऐक्सरसाइज व नियंत्रित खानपान पर ध्यान नहीं देंगे तो आप का शरीर और भी फैल जाएगा.

बढ़ते वजन पर नियंत्रण : सब से पहले हमें इस मूल धारणा को दिमाग से निकालना होगा कि बढ़ता वजन ‘सेहत बन रही है’ की निशानी है. दरअसल, बढ़ता वजन सेहत की नहीं, मोटापे की निशानी है. वजन पर नियंत्रण करें.

मोटापे से बचने के उपाय

–      प्रतिदिन ऐक्सरसाइज अवश्य करें. जिस में एरोबिक व कार्डियो ऐक्सरसाइज भी हो सकती हैं.

–      भोजन एकसाथ ज्यादा न करें. इकट्ठा बहुत सारा भोजन मोटापा लाता है. दिनभर में 6-7 बार थोड़ाथोड़ा कर भोजन लें.

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–      हमेशा सुबह जल्दी सो कर उठें. सो कर उठने के बाद एकदम से काम में न लग जाएं. कम से कम 5 मिनट तक सीधा हो कर हलकेहलके कदम से कमरे के भीतर ही चलफिर कर शरीर का रक्तसंचार ठीक कर लें. फिर काम में लगें.

–      खाने में फल, जूस, दालें और कच्ची हरी सब्जियों का सेवन अधिक करें.

–      अपना आकारप्रकार देख कर और यदि ज्यादा असुविधा न हो तो किसी डाक्टर से परामर्श ले कर वजन व रक्त की मात्रा के आधार पर भोजन का निर्धारण करें.

–      तेलयुक्त चीजों का सेवन कम से कम करें.

–      डिनर जल्दी लिया करें.

–      लंच व डिनर हलका लें किंतु ब्रेकफास्ट भारी लिया करें.

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