बिलखता मौन: भाग 3- क्यों पास होकर भी मां से दूर थी किरण

‘‘परीक्षा में तल्लीन होने के कारण कई दिन सूरज से नहीं मिल पाए. स्कूल जा कर मालूम हुआ, सूरज बहुत दिनों से स्कूल नहीं आया. मुझे चिंता होने लगी. बिक्की ने दिलासा देते हुए कहा, ‘चिंता मत करो. शनिवार को गुरुद्वारे जा कर मिल लेंगे.’ शनिवार को गुरुद्वारे जाते वक्त मुझे खुशी के साथसाथ बहुत घबराहट हो रही थी. ‘बिक्की, अगर मुझे गुरुद्वारे में अंदर न जाने दिया गया तो?’

‘‘‘किरण, विश्वास करो, ऐसा बिलकुल नहीं होगा. वहां सब का स्वागत है. बस, सिर जरूर ढक लेना.’

‘‘कुछ सप्ताह मां और सूरज गुरुद्वारे में भी दिखाई नहीं दिए. चिंता सी होने लगी थी. हार कर एक दिन मैं और बिक्की मां के घर की ओर चल दीं. वहां तो और ही दृश्य था. बहुत से लोग सफेद कपड़े पहने जमा थे. मेरा दिल धड़का.

‘‘‘किरण, लगता है यहां वह हुआ है जो नहीं होना चाहिए था. शायद किसी की मृत्यु हुई है.’ हम दोनों हैरान सी खड़ी रहीं. इतने में हमें दूर से हमारी ओर एक महिला आती दिखाई दीं. बिक्की ने हिम्मत बटोर कर पूछ ही लिया, ‘आंटीजी, यहां क्या हुआ है?’

‘‘‘सिंह साहब की पत्नी की मृत्यु हो गई है. कई महीनों से बीमार थीं.’

‘‘‘आंटीजी, फ्यूनरल कब है?’

‘‘‘बेटा, शुक्रवार को ढाई बजे. पैरीबार के मुर्दाघाट में.’ ‘‘इतना सुनते ही मैं तो सन्न रह गई. भारी मन लिए बड़ी मुश्किल से हम दोनों घर पहुंचीं. देखतेदेखते झुंड के झुंड बादल घिर आए. बादलों की गुड़गुड़ ध्वनि के साथ मेरे मन में भी सांझ उतर आई थी. ‘‘4 दिनों बाद अंतिम संस्कार था. कितना कुछ कहना चाहती थी मां से. सभी गिलेशिकवे, मन की बातें अब मन ही में रह जाएंगी. यह कभी नहीं सोचा था, उस वक्त मैं खुद को बेबस, असहाय महसूस कर रही थी.’’

‘‘‘किरण, क्यों नहीं तुम अपनी मां को पत्र लिख कर मन की बातें कह देती.’

‘‘‘मैं ने बिक्की को बांहों में भर कर कहा, थैंक्यू, थैंक्यू बिक्की.’

‘‘मेरी प्यारी मां…

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‘‘क्यों फिर आज तुम ने वही किया जो 10 वर्ष पहले किया था. तुम्हें याद होगा, 10 वर्ष पहले सब के सामने मेरे हाथ से तुम्हारे दुपट्टे का छोर फिसलताफिसलता छूट गया, तुम बेबसी से देखती रहीं. किंतु आज तो तुम चोरीचोरी अपना छोर छुड़ा कर चली गई हो. अपनी किरण को एक बार गौर से देखा तक नहीं. तुम्हें नहीं पता, तुम्हारी किरण तो अपनी मां और भैया सूरज को हर रोज चोरीचोरी देख लेती थी टौयलट जाने के बहाने  ‘‘मां शायद तुम्हें याद होगा, एक दिन जब आप की और मेरी नजरें स्कूल में टकराई थीं, आप अनजाने से मुझे देखना भूल गई थीं. तब से मैं हर रोज चोरीचोरी सब की नजरों से छिप कर तुम्हारी एक झलक देखने की प्रतीक्षा करती रही. लेकिन मुझे कभी भी आप के पूरे चेहरे की झलक नहीं मिली. बस, यही एहसास ले कर जीती रही कि मेरी भी मां है.

‘‘मां , मेरी प्यारी मां, मुझे आप से कोई शिकायत नहीं है. मैं तो आप की हिम्मत और साहस की दाद देती हूं. आप ने भ्रूण हत्या के बजाय मुझे इस दुनिया में लाने की हिम्मत दिखाई. हर रोज नानी के कड़वेकड़वे कटाक्ष सुने. मेरा मन जानता है, प्यार तो तुम अपनी किरण को बहुत करती थीं. न जाने तुम्हारी क्याक्या मजबूरियां रही होंगी. मैं पुरानी धुंधली यादों के सहारे आज तक कभी हंस लेती हूं, कभी रो लेती हूं. मैं जानती थी कि कोई भी मां इतनी कठोर नहीं हो सकती और न ही जानबूझ कर ऐसा कर सकती है.

‘‘मां, आज तुम्हें मैं एक राज की बात बताती हूं. तुम्हारी छवि, तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी खुशबू को लेने के लिए मैं रोज सूरज से मिलने जाती रही. उस को छूने तथा सूंघने से मेरे मन में तुम्हारे प्यार की लहर सी उठती. जो मेरे मन में उठे गुबार को शांत कर देती. उसे गोद में बिठा कर मैं मन में छवि बना लेती कि जब वह तुम्हारी गोद में बैठेगा, तब सूरज नहीं, मैं किरण होऊंगी. ‘‘मेरी सुंदर मां, देखो न, हम दोनों एकदूसरे को कितना समझते रहे हैं. आप भी जानती थीं कि मैं आप को देखती रहती हूं और मैं भी जानती थी कि आप को पता है. फिर भी हम ने कभी भी एकदूसरे को शर्मिंदा नहीं होने दिया.

‘‘मां, कई बार सोचा, हिम्मत बटोर कर आप से बात करूं. किंतु मैं नहीं चाहती थी कि मेरे कारण आप का अतीत आप के वर्तमान में उथलपुथल मचा जाए. अतीत को साथसाथ लिए तुम आगे नहीं बढ़ सकती थीं. मन ही तो है, मचल जाता है. ‘‘मैं जानती थी आप के लिए ऐसा करना संभव न था. आप की भी सीमाएं हैं. इसीलिए आज तक मैं ने कोई प्रश्न नहीं किया. शायद नानी सही थीं. अगर नानी आप के बारे में न सोचतीं तो और कौन सोचता?

‘‘मां, मेरी प्यारी मां, मेरी आखिरी शिकायत यह है, आज आप ने सदा के लिए मुझ से अपने होने (मां) का एहसास छीन लिया जिस एहसास से मेरी सब आशाएं जीवित थीं, मेरे जीवन की डोर बंधी थी. तुम थीं तो पिता का एहसास भी जीवित था. अब न तुम, न पिता.

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‘‘प्यारी सी तुम्हारी बेटी, किरण.

‘‘मिस हैलन, इंसान में समझौते की प्रवृत्ति कितनी शक्तिशाली होती है? कैसी भी स्थिति क्यों न हो, आदमी उस में जीना सीख ही लेता है.’’

‘‘ठीक कहती हो किरण, जीवन का सतत प्रवाह भी कभी रुक पाया है क्या?’’

‘‘मिस हैलन, अब प्रश्न उठा कि यह पत्र पहुंचाया कैसे जाए.

‘‘मुझे और बिक्की दोनों को पता था कब फ्यूनरल है. कितने बजे पार्थिव शरीर को आखिरी दर्शन के लिए घर लाया जाएगा. हम दोनों सफेद कपड़े पहने भीड़ को चीरते उन के घर पहुंचे. मां के दर्शन करते वक्त मैं ने चोरी से वह पत्र मां को दे दिया. (कफिन बौक्स में रख दिया). अब हमें किसी का डर नहीं था. नानी का भी नहीं. वैसे, नानी मुझे पहचान गई थीं, पर चुप रहीं. हम दोनों चुपके से वहां से निकल आए. आज यही मातम तो मना रही थी, मिस.’’ वह फूटफूट कर रोने लगी.

हैलन ने किरण के कंधों पर हाथ रख कर दिलासा देते उसे गले से लगा कर कहा, ‘‘जाओ, थोड़ा आराम कर लो.’’

इतने में ही ‘चिल्ड्रंस होम’ की प्रधान अध्यापिका किरण के हाथ में एक पैकेट देती बोलीं, ‘‘किरण, आज सुबह ही यह रजिस्टर्ड पत्र तुम्हारे लिए आया है.’’

‘‘मेरे लिए?’’ उस ने पत्र घुमाफिरा कर देखा. कोई अतापता नहीं था. उस के हाथ कंपकंपा रहे थे. शायद वह लिखाई थोड़ी जानीपहचानी लग रही थी.

‘‘किरण, दो इसे मैं पढ़ देती हूं,’’ हैलन ने कहा. उस ने पत्र हैलन की ओर बढ़ाया.

‘‘मेरी प्यारी जिगर की टुकड़ी किन्नी (किरण),

‘‘बेटा, यह संदेश मैं वैसे ही लिख रही हूं जैसे डूबते समय जहाज के साथ समुद्र में समाए जाने से पहले नाविक अंतिम संदेश लिख कर बोतल में रख कर लहरों में छोड़ देता है. इस आशा में मैं ने यह पत्र छोड़ दिया है. तुम्हें मिले या न मिले, यह समय पर निर्भर करता है. अगर यह पत्र तुम्हें मिल गया तो जरूर पढ़ लेना. मुझे शांति मिलेगी.

‘‘मैं जानती हूं, मैं बहुत बड़ी गुनहगार हूं. बहुत बड़ी भूल की है मैं ने. तुम से क्षमा मांगती हूं. ऐसी बात नहीं कि मैं तुम्हें भूल गई थी. भला, कोई मां अपने बच्चों को भूल सकती है क्या? मुझे पूरा विश्वास है, जब तुम बड़ी होगी, शायद मेरी बेबसी को समझ पाओगी. समय जानता है, एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा होगा जब तुम्हारी मां की आंखें नम न हुई हों. मानती हूं, गलतियां बहुत की हैं मैं ने जो क्षमा के योग्य भी नहीं हैं. क्या करूं, कमजोर थी. ‘‘उस दिन मैं ने खुद को बहुत कोसा. रातभर नींद भी नहीं आई जब मैं ने तुम्हें देख कर भी अनदेखा कर दिया और आगे बढ़ गई थी. तुम्हें देखते ही यों लगा, मानो प्रकृति ने मेरी मुराद पूरी कर दी हो. जी तो किया कि तुम्हें गले लगा लूं लेकिन अपराधबोध की दीवार सामने खड़ी थी जिसे मैं मरते दम तक न लांघ सकी. उस दिन के बाद घर से निकलते ही मेरी नजर तुम्हें ढूंढ़ने लगतीं.

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‘‘तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी नानी ने मेरे लाल पासपोर्ट का फायदा उठाया. अपने नए पति को तुम्हारे बारे में न बता सकी. एक दिन भी ऐसा नहीं बीता जब मैं ने अपनी प्यारी पहली बच्ची किरण के बारे में सोचा नहीं. जबजब सूरज को प्यार से गले लगाती तबतब तुम्हारा नाम ले कर सूरज को बारबार पुचकारती रहती. मैं जानती थी कि तुम अकसर सूरज से मिलती हो. जब कभी सूरज बताता कि किरण दीदी ने चौकलेट दी है, उस की बलैया लेते नहीं थकती. बेटा, तुम्हारे लिए मेरी अंतडि़यां रोती थीं. विडंबना यह थी कि किसी से तुम्हारा जिक्र भी नहीं कर सकती थी. तुम्हें तो यह तक न बता सकी कि मेरे पास समय बहुत कम है, कभी भी मेरी मृत्यु हो सकती है. बस, सोच कर तसल्ली कर लेती. तुम्हें अलग करने की यह सजा तो नाममात्र के बराबर है. अब मैं आजाद होने वाली हूं. आज कोई डर नहीं है मुझे, मां का भी नहीं.

‘‘बेटा मरने से पहले यह पत्र तथा एक छोटा सा पैकेट पड़ोसियों को दिया है तुम्हें पोस्ट करने के लिए, जिस में तुम्हारा पहला जोड़ा, हम दोनों की पहली तसवीर, तुम्हारा टैडीबियर, तुम्हारे पापा का नाम और फोटो है. ‘‘जीवन भर तुम्हें कलेजे से लगाने को तरसती रही, लेकिन हिम्मत न जुटा पाई. दोषी हूं तुम्हारी. हाथ जोड़ कर माफी मांगती हूं. मजबूर मां के इस बिलखते मौन को समझ कर उसे क्षमा कर देना.

‘‘तुम्हारी मां.’’

ये हैं दिल्ली के 10 Haunted Places

अगर आपको रोमांच भरी जगहों पर जाना पसंद है और आपको भूत जैसी चीजों से डर नहीं लगता तो आप जा सकते हैं कि दिल्ली इन हॉन्टेड जगहों पर. जहां पर है आत्माओं और रूहों का साया. जानिए दिल्ली की डरावनी जगहों के बारे में.

माली-कमाली का मकबरा और मस्जिद

माली-कमाली का मकबरा और मस्जिद दिल्ली के महरौली में है. यहां पर सोलवहीं शताब्दी के सूफी संत जमाली और कमाली की कब्र मौजूद है. यहां के लोगों का कहना है कि यहां पर जिन्न रहते हैं. सूफी संत जमाली लोधी हुकूमत के राज कवि थे. इसके बाद बाबर और उनके बेटे हुमायूं के राज तक जमाली को काफी तवज्जो दी गई. माना जाता है कि जमाली के मकबरे का निर्माण हुमायूं के राज के दौरान पूरा किया गया. मकबरे में दो संगमरमर की कब्र हैं, एक जमाली की और दूसरी कमाली की. जमाली कमाली मस्जिद का निर्माण 1528-29 में किया गया था. यह मस्जिद लाल पत्थर और संगमरमर से बनी है.

भूली भतियारी का महल, झंडेवालान

यह महल किसी ज़माने में तुगलक वंश का शिकारगाह हुआ करता था. इस महल का नाम यहां की रखवाली करने वाली औरत भूली भतियारी के नाम में रखा गया है.

संजय वन

यह वन 10 किमी क्षेत्रफल में फैला हुआ है. कहा जाता है कि यहां पर अक्सर बच्चें खेलते हुए दिखतें है जो आत्माएं है. इसके साथ ही अन्दर से यह जंगल बहुत घना है. जिसके कारण लोग इसे हॉन्टेड मानते है.

खूनी नदी, रोहिणी

कम शोर गुल वाले इस इलाके में बहुत कम लोग आते हैं. लेकिन नदी के आसपास तो कोई नहीं जाता है. क्योंकि नदी के किनारे लाश मिलना एक आम बात है. यह लाशों का कारण हत्या, आत्महत्या, दुर्घटना चाहे जो हो. इसलिए इस जगह को हान्टेड जगहों के नाम में शुमार किया गया है.

म्यूटिनी हाउस, कश्मीरी गेट

यह स्मारक 1857 में मारे गए सिपाहियों की याद में अंग्रेजों ने बनवाया था. कहा जाता है कि आज भी इन सिपाहियों की आत्मा यहा घूमती है जिसके कारण इसे हॉन्टेड जगह माना जाता है.

मालचा महल

दिल्ली के दक्षिण रिज़ के बीहड़ में छुपा ‘मालचा महल’ जिसमे पिछले 28 सालों से अवध राजघराने के वंशज राजकुमार ‘रियाज़’ और राजकुमारी ‘सकीना महल’ रह रहे हैं. पहले इनके साथ इनकी माँ ‘विलायत महल’ भी रहा करती थी जिन्होंने 10 सितंबर 1993 को आत्महत्या कर ली थी. कहा जाता है कि अब भी उनकी रुह यहीं पर रहती है.

खूनी दरवाजा

दिल्ली का खूनी दरवाजा जो हॉन्टेड लिस्ट में शामिल है. इसी दरवाजें में अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर के तीन बेटों को मार डाला था. माना जाता है कि अब भी तीनों शहज़ादों की रूह इसी इलाके रहती हैं.

अग्रसेन की बावली, कॅनाट प्लेस

यह वही जगह है जहां पर आमिर खान अपनी फिल्म पीके में रहते हैं. माना जाता है इस बावली के गहराई में काला पानी भरा है जिसमें कई लोगों ने आत्महत्या की है जिसके कारण यह जगह भी हॉन्टेड मानी जाती है.

फिरोज शाह कोटला किला

इस किले को फिरोज शाह तुगलक ने साल 1354 में बनवाया था लेकिन आज रख-रखाव न होने के कारण यह किला खंडहर हो गया है. इस किले के बारे में आसपास के लोगों का कहना है कि हर गुरूवार को मोमबत्तियां और अगरबत्ती जलती दिखती है. साथ ही अगले दिन इस किले में दूध और कच्चा अनाज मिलता है.

सपनों की उड़ान: भाग 1- क्या हुआ था शांभवी के साथ

इशिता अपने लैपटौप में जगहजगह कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन देने में व्यस्त थी. तभी उस के पापा भानु प्रताप ने आ कर पूछा, ‘‘मम्मी आज देर से आएगी क्या? तुम्हें कुछ बताया था क्या?’’

‘‘हां, मैं आप को बताना भूल गई आज उन्हें कालेज में ऐक्स्ट्रा क्लास लेनी है, इसलिए देर से आएंगी. फोन साइलैंट में होगा,’’ इशिता ने अपना लैपटौप बंद करते हुए कहा, ‘‘खाना गरम कर देती हूं आप और मैं लंच कर लेते हैं.’’

‘‘पापा आप के कालेज में ऐक्स्ट्रा क्लासें शुरू नहीं हुईं? अगले महीने तो फाइनल ऐग्जाम हैं,’’ इशिता ने पापा को खाना परोसते हुए पूछा.

‘‘मुझे नहीं लेनी हैं. मैं अपना कोर्स कंप्लीट कर चुका हूं. तुम्हारी मम्मी की तो हर साल ऐक्स्ट्रा क्लासें शुरू हो जाती हैं.’’

‘‘पापा, हर साल आप से ज्यादा छुट्टियां मम्मी की हो जाती हैं… घरपरिवार, रिश्तेदारी भी तो उन्हें ही निभानी पड़ती है. आप तो उस समय छुट्टी लेने से मना कर देते हैं.’’

‘‘अपनी मम्मी की ही तरफदारी करना. अब देखो मम्मी देर से आएगी तो अब घर को मैं ही व्यवस्थित करूंगा.’’

‘‘तो आप ही को काम वाली का काम पसंद नहीं आता है.’’

‘‘सारी गलती मेरी है बस. एक तेरा भाई है उसे देख कितना होशियार रहा है बचपन से. एक दिन आईएएस जरूर बनेगा. एक तुम हो एमबीए कर के क्या हासिल हुआ? मैं ने कहा था पीएचडी जौइन कर लो… अभी तक कालेज से अटैच भी करा देता.’’

‘‘जब आप भाई को उस की मरजी से तैयारी करने का समय दे रहे हैं तो मुझे क्यों हर वक्त सुनाते रहते हैं कि यह क्यों नही किया वह क्यों नहीं किया? वह आईएएस कब बनेगा पता नहीं, मगर मुझे जल्दी नौकरी मिल जाएगा,’’ कह इशिता भुनभुना कर अपनी प्लेट सिंक में पटक आई.

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आज फिर इशिता का मूड खराब हो गया था. एक तो नौकरी न मिल पाने की टैंशन ऊपर से पापा के ताने. बेटा बहुत प्यारा है. वह कुछ भी करे पूरी छूट है, मगर उसे अपनी जिंदगी का छोटा सा फैसला लेने का भी हक नहीं. भला हो मम्मी का, उन की सपोर्ट से वह एमबीए कर पाई. पापा तो पीएचडी की रट लगा बैठे थे.

इशिता ने अपना मूड ठीक करने के लिए अपने ताऊजी की बेटी को फोन

मिलाया, ‘‘हैलो दी, क्या हाल हैं?’’ इशिता ने पूछा.

‘‘लगता है आज फिर पापा से बहस हुई है,’’ शांभवी ने हंस कर पूछा.

‘‘हां दी आप तो पापा और ताऊजी का नेचर जानती ही हैं हर समय बेटों की तारीफ करना और बेटियों को नीचा दिखाना.’’

‘‘सच कहा… तुझे क्या बताऊं… आजकल मेरे लिए रिश्ता ढूंढ़ रहे हैं. कितना सम?ाया है पापा को कि मेरा बीएड पूरा हो जाने दो.’’

‘‘उफ, अब क्या करोगी दीदी?’’

‘‘क्या कर सकती हूं… अभी तो कुंडली मिलान ही चल रहा है देखो इस के आगे के स्टैप तक पहुंचने में ही 6 महीने साल बीत जाएगा. तब की तब देखी जाएगी. अभी 1 साल बाकी है बीएड का, बस जो भी हो उस के बाद ही हो.’’

‘‘कहीं किसी से कुंडली तुरंत मिल गई तो क्या करोगी?’’ इशिता ने पूछा.

‘‘शुभशुभ बोल, क्यों मेरे गले में खूंटा बांधना चाहती है,’’ शांभवी ने कहा.

‘‘चलो अच्छा है अभी मेरे पापा के दिमाग में मेरी शादी करने का फुतूर नहीं चढ़ा है शायद तुम्हारी शादी तय होने का ही इंतजार है, फिर मेरे पीछे भी पड़ जाएंगे,’’ इशिता ने घबरा कर कहा.

‘‘इशिता कितनी देर से फोन पर हो 1 ग्लास पानी लाना,’’ रितिका ने अपनी बेटी को आवाज दी.

‘‘ओके बाय दी, मम्मी घर आ गई फिर

बात करूंगी.’’

उस दिन इशिता सुबह से अपने लैपटौप में पांच अलगअलग कंपनियों के इंटरव्यू कौल में बिजी थी कि उस के पापा ने आ कर कुछ कहना चाहा तो उस ने उन्हें इशारे से कमरे से बाहर जाने को कहा.

कुछ देर बाद वह कमरे से बाहर आई और पापा से पूछने लगी, ‘‘हां अब बताइए आप क्या कह रहे थे?’’

‘‘तुम्हारी शांभवी दीदी की एक जगह कुंडली मिल गई है. कल वे लोग हरदोई जा रहे हैं शायद बात पक्की हो जाए.’’

‘‘क्या कुंडली मिल गई?’’ इशिता चीख पड़ी.

‘‘इस में इतना चिल्लाने की क्या जरूरत है? कुंडली तो 3-4 जगह और भी मिल गई थी, मगर लेनदेन को ले कर बात आगे नहीं बढ़ी. इन लोगों को पढ़ीलिखी बहू चाहिए. शांभवी की बीएड शादी के बाद वे पूरी करवा देंगे. शादी के खर्च को ले कर भी सहमती बन गई है. तुम अपने और मम्मी के कपड़े बैग में रख लो. मम्मी के कालेज से आते ही हम लोग हरदोई चल पड़ेंगे.’’

‘‘हम लोगों का क्या काम?’’

‘‘अरे कुछ समझ में नहीं आता तुम्हें? तुम्हारी ताई अकेले मेहमाननवाजी कैसे कर पाएगी. हमें साथ बैठ कर सगाई और शादी की जगह और तारीख तय करनी होगी… बहुत से काम होंगे. भाई साहब अकेले घबरा रहे हैं. लखनऊ से हरदोई है ही कितना दूर. परसों संडे को लौट आएंगे.’’

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इशिता सोचने लगी कि इधर वह लगातार विभिन्न कंपनियों में साक्षात्कार में व्यस्त हो गई थी तो शांभवी से बात भी न हो पाई. उस ने बैग लगाने से पहले शांभवी से फोन पर बात करना उचित सम?ा.

‘‘हैलो दी क्या हालचाल हैं?’’

‘‘पता तो चल ही गया होगा, क ल विजय का परिवार आ रहा हैं… इधर 2 महीनों से मैं बहुत टैंशन में आ गई थी. ऐसेऐसे रिश्ते आए कि मन कर रहा था घर से भाग जाऊं. पर जाती कहां? काश आत्मनिर्भर होती तो घर वालों से विद्रोह भी कर सकती थी,’’ शांभवी ने अपना दुखड़ा रोया.

‘‘पापा तो विजय के परिवार की तारीफ कर रहे हैं कि खुले विचारों के लोग हैं… बहू को आगे पढ़ाने को भी तैयार हैं. होप सो, कुछ घंटों बाद मुलाकात करते हैं. बाय,’’ कह इशिता फोन रख बैग तैयार करने लगी.

शांभवी के पिता का हरदोई रेलवे गंज के मकान में पहले फ्लोर में किराने का थोक व्यापार है. दूसरे फ्लोर में निवासस्थल है. हरदोई से लगे माधो गंज में पुस्तैनी जमीनजायदाद है, जिस से अच्छी आमदनी हो जाती है. दोनों भाइयों के बीच भी प्रेम संबंध बना हुआ है. शांभवी और इशिता दोनों के बड़े भाई दिल्ली में एक फ्लैट ले कर कोचिंग कर रहे हैं. एक का लक्ष्य आईएएस बनना तो दूसरे का आईपीएस.

हरदोई पहुंच कर इशिता, शांभवी के कमरे में अपना बैग पटक कर बैड में पसर गई.

शांभवी ने पूछा, ‘‘मैं चाय बनाने जा रही हूं तुम भी पीयोगी?’’

‘‘नहीं दी अब डिनर ही करूंगी.’’

डाइनिंगटेबल पर इशिता और शांभवी को ढेर सारी हिदायतें दी गईं कि मेहमानों के सामने जोर से न हंसना, सिर और आंखें नीची रखना, बात धीमे स्वर में करना आदि. दोनों मन ही मन कुढ़ कर रह गईं.

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अंधविश्वास से आत्मविश्वास तक: भाग 3- क्या नरेन के मन का अंधविश्वास दूर हो पाया

नरेन उस के पास आ गया. लेकिन चेक देख कर चौंक गया, “यह चेक… तुम्हारे पास कहां से आ गया…? ये तो मैं ने स्वामीजी को दिया था.”

“नरेन, बहुत रुपए हैं न तुम्हारे पास… अपने खर्चों में हम कितनी कटौती करते हैं और तुम…” वह गुस्से में बोली. लेकिन नरेन तो किसी और ही उधेड़बुन में था, “यह चेक तो मैं ने सुबह स्वामीजी को ऊपर जा कर दिया था… यहां कैसे आ गया…?”

“ऊपर जा कर दिया था..?” रवीना कुछ सोचते हुए बोली, “शायद, स्वामीजी का चेला रख गया होगा…”

“लेकिन क्यों..?”

”क्योंकि, लगता है स्वामीजी को तुम्हारा चढ़ाया हुआ प्रसाद कुछ कम लग रहा है…” वह व्यंग्य से बोली.

“बेकार की बातें मत करो रवीना… स्वामीजी को रुपएपैसे का लोभ नहीं है… वे तो सारा धन परमार्थ में लगाते हैं… यह उन की कोई युक्ति होगी, जो तुम जैसे मूढ़ मनुष्य की समझ में नहीं आ सकती…”

“मैं मूढ़ हूं, तो तुम तो स्वामीजी के सानिध्य में रह कर बहुत ज्ञानवान हो गए हो न…” रवीना तैश में बोली, “तो जाओ… हाथ जोड़ कर पूछ लो कि स्वामीजी मुझ से कोई
अपराध हुआ है क्या… सच पता चल जाएगा.”

कुछ सोच कर नरेन ऊपर चला गया और रवीना अपने कमरे में चली गई. थोड़ी देर बाद नरेन नीचे आ गया.

“क्या कहा स्वामीजी ने..” रवीना ने पूछा.

नरेन ने कोई जवाब नहीं दिया. उस का चेहरा उतरा हुआ था.

“बोलो नरेन, क्या जवाब दिया स्वामीजी ने…”

“स्वामीजी ने कहा है कि मेरा देय मेरे स्तर के अनुरूप नहीं है…” रवीना का दिल
किया कि ठहाका मार कर हंसे, पर नरेन की मायूसी व मोहभंग जैसी स्थिति देख कर वह चुप रह गई.

“हां, इस बार घर आ कर तुम्हारे स्तर का अनुमान लगा लिया होगा… यह तो नहीं पता होगा कि इस घर को बनाने में हम कितने खाली हो गए हैं…” रवीना चिढ़े स्वर में बोली.

“अब क्या करूं…” नरेन के स्वर में मायूसी थी.

“क्या करोगे…? चुप बैठ जाओ… हमारे पास नहीं है फालतू पैसा… हम अपनी गाढ़ी कमाई लुटाएं और स्वामीजी परमार्थ में लगाएं… तो जब हमारे पास होगा तो हम ही लगा
लेंगे परमार्थ में… स्वामीजी को माघ्यम क्यों बनाएं,” रवीना झल्ला कर बोली.

“दूसरा चेक न काटूं…?” नरेन दुविधा में बोला.

“चाहते क्या हो नरेन…? बीवी घर में रहे या स्वामीजी… क्योंकि अब मैं चुप रहने वाली नहीं हूं…”
नरेन ने कोई जवाब नहीं दिया. वह बहुत ही मायूसी से घिर गया था.

“अच्छा… अभी भूल जाओ सबकुछ…” रवीना कुछ सोचती हुई बोली, “स्वामीजी रात में ही तो कहीं नहीं जा रहे हैं न… अभी मैं खाना लगा रही हूं… खाना ले जाओ.”

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वह कमरे से बाहर निकल गई, “और हां…” एकाएक वह वापस पलटी, “आज
खाना जल्दी निबटा कर हम सपरिवार स्वामीजी के प्रवचन सुनेंगे… पावनी व बच्चे भी… कल छुट्टी है, थोड़ी देर भी हो जाएगी तो कोई बात नहीं…”

लेकिन नरेन के चेहरे पर कुछ खास उत्साह न था. वह नरेन की उदासीनता का कारण समझ रही थी. खाना निबटा कर वह तीनों बच्चों सहित ऊपर जाने के लिए तैयार हो गई.

“चलो नरेन…” लेकिन नरेन बिलकुल भी उत्साहित नहीं था, पर रवीना उसे जबरदस्ती ठेल ठाल कर ऊपर ले गई. उन सब को देख कर, खासकर पावनी को देख कर तो उन दोनों के चेहरे गुलाब की तरह खिल गए.

“आज आप से कुछ ज्ञान प्राप्त करने आए हैं स्वामीजी… इसलिए इन तीनों को भी आज सोने नहीं दिया,” रवीना मीठे स्वर में बोली.

“अति उत्तम देवी… ज्ञान मनुष्य को विवेक देता है… विवेक मोक्ष तक पहुंचाता
है… विराजिए आप लोग,” स्वामीजी बात रवीना से कर रहे थे, लेकिन नजरें पावनी के चेहरे पर जमी थीं. सब बैठ गए. स्वामीजी अपना अमूल्य ज्ञान उन मूढ़ जनों पर उड़ेलने लगे. उन की
बातें तीनों बच्चों के सिर के ऊपर से गुजर रही थी. इसलिए वे आंखों की इशारेबाजी से एकदूसरे के साथ चुहलबाजी करने में व्यस्त थे.

“क्या बात है बालिके, ज्ञान की बातों में चित्त नहीं लग रहा तुम्हारा…” स्वामीजी
अतिरिक्त चाशनी उड़ेल कर पावनी से बोले, तो वह हड़बड़ा गई.

“नहीं… नहीं, ऐसी कोई बात नहीं…” वह सीधी बैठती हुई बोली. रवीना का ध्यान स्वामीजी की बातों में बिलकुल भी नहीं था. वह तो बहुत ध्यान से स्वामीजी व उन के चेले की पावनी पर पड़ने वाली चोर गिद्ध दृष्टि पर अपनी समग्र चेतना गड़ाए हुए थी और चाह रही थी कि नरेन यह सब अपनी आंखों से महसूस करे. इसीलिए वह सब को ऊपर ले कर आई थी. उस ने निगाहें नरेन की तरफ घुमाई. नरेन के चेहरे पर उस की आशा के अनुरूप हैरानी, परेशानी, गुस्सा, क्षोभ साफ झलक रहा था. वह मतिभ्रम जैसी स्थिति में
बैठा था. जैसे बच्चे के हाथ से उस का सब से प्रिय व कीमती खिलौना छीन लिया गया हो.

एकाएक वह बोला, “बच्चो, जाओ तुम लोग सो जाओ अब… पावनी, तुम भी जाओ…”

बच्चे तो कब से भागने को बेचैन हो रहे थे. सुनते ही तीनों तीर की तरह नीचे भागे.

पावनी के चले जाने से स्वामीजी का चेहरा हताश हो गया.

“अब आप लोग भी सो जाइए… बाकी के प्रवचन कल होंगे…” वे दोनों भी उठ गए.

लेकिन नरेन के चेहरे को देख कर रवीना आने वाले तूफान का अंदाजा लगा चुकी थी और वह उस तूफान का इंतजार करने लगी.

रात में सब सो गए. अगले दिन शनिवार था. छुट्टी के दिन वह थोड़ी देर से उठती
थी. लेकिन नरेन की आवाज से नींद खुल गई. वह किसी टैक्सी एजेंसी को फोन कर टैक्सी बुक करवा रहा था.

“टैक्सी… किस के लिए नरेन…?”

“स्वामीजी के लिए… बहुत दिन हो गए हैं… अब उन्हें अपने आश्रम चले जाना
चाहिए…”

“लेकिन,आज शनिवार है… स्वामीजी को शनिवार के दिन कैसे भेज सकते हो तुम…” रवीना झूठमूठ की गभीरता ओढ़ कर बोली.

“कोई फर्क नहीं पड़ता शनिवाररविवार से…” बोलतेबोलते नरेन के स्वर में उस के दिल की कड़वाहट आखिर घुल ही गई थी.

“मैं माफी चाहता हूं तुम से रवीना… बिना सोचेसमझे, बिना किसी औचित्य के मैं
इन निरर्थक आडंबरों के अधीन हो गया था,” उस का स्वर पश्चताप से भरा था.

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रवीना ने चैन की एक लंबी सांस ली, “यही मैं कहना चाहती हूं नरेन… संन्यासी बनने के लिए किसी आडंबर की जरूरत नहीं होती… संन्यासी, स्वामी तो मनुष्य अपने उच्च आचरण से बनता है… एक गृहस्थ भी संन्यासी हो सकता है… यदि आचरण, चरित्र
और विचारों से वह परिष्कृत व उच्च है, और एक स्वामी या संन्यासी भी निकृष्ट और नीच हो सकता है, अगर उस का आचरण उचित नहीं है… आएदिन तथाकथित बाबाओं,
स्वामियों की काली करतूतों का भंडाफोड़ होता रहता है… फिर भी तुम इतने शिक्षित हो कर इन के चंगुल में फंसे रहते हो… जिन की लार एक औरत, एक लड़की को देख कर, आम कुत्सित मानसिकता वाले इनसान की तरह टपक
पड़ती है… पावनी तो कल आई है, पर मैं कितने दिनों से इन की निगाहें और चिकनीचुपड़ी बातों को झेल रही हूं… पर, तुम्हें कहती तो तुम बवंडर खड़ा कर देते… इसलिए आज प्रवचन सुनने का नाटक करना पड़ा… और मुझे खुशी है कि कुछ अनहोनी घटित होने से पहले ही तुम्हें समझ आ गई.”

नरेन ने कोई जवाब नहीं दिया. वह उठा और ऊपर चला गया. रवीना भी उठ कर बाहर लौबी में आ गई. ऊपर से नरेन की आवाज आ रही थी, “स्वामीजी, आप के लिए टैक्सी मंगवा दी है… काफी दिन हो गए हैं आप को अपने आश्रम से निकले… इसलिए प्रस्थान की तैयारी कीजिए…10 मिनट में टैक्सी पहुंचने वाली है…” कह कर बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए वह नीचे आ गया. तब तक बाहर टैक्सी का हौर्न बज गया. रवीना के सिर से आज मनों बोझ उतर गया था. आज नरेन ने पूर्णरूप से अपने अंधविश्वास पर विजय पा ली थी और उन बिला वजह के डर व भय से निकल कर आत्मविश्वास से भर गया था.

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Bigg Boss 15 में नजर आएंगी Shehnaaz Gill? पढ़ें खबर

बीते दिनों एक्टर सिद्धार्थ शुक्ला के निधन के बाद शहनाज गिल (Shehnaaz Gill) दोबारा काम पर लौटती नजर आईं थीं. वहीं उनकी और दिलजीत दोसांझ की फिल्म भी हिट साबित हुई है. वहीं अब खबरे हैं कि बिग बॉस 15 (Bigg Boss 15) के मेकर्स ने शहनाज गिल को अप्रोच किया है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

शहनाज गिल को मिला औफर

 

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खबरों की मानें तो बिग बॉस 15 के मेकर्स ने शो को और भी मजेदार बनाने के लिए एक्ट्रेस शहनाज गिल को अप्रोच किया है. दरअसल, बिग बॉस 15 के निर्माता चाहते हैं कि एक्ट्रेस शहनाज गिल शो में बतौर गेस्ट एक हफ्ते के लिए हिस्सा लें. हालांकि एक्ट्रेस शहनाज गिल ने अभी तक मेकर्स का ऑफर एक्सेप्ट नहीं किया है. लेकिन अब वह यह एक्सेप्ट करती हैं तो शो की टीआरपी पर असर पड़ने वाला है.

 

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फिल्म हुई हिट

 

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हाल ही में रिलीज हुई शहनाज गिल की फिल्म हौंसला रख ने वर्ल्ड वाइड 54 करोड़ की कमाई कर ली है, जो कि पहली पंजाबी फिल्म है. वहीं इस फिल्म के बाद फैंस उनके अगले प्रौजेक्ट का इंतजार कर रहे हैं. दूसरी तरफ शहनाज गिल की कुछ फोटोज भी वायरल हुई थीं, जिनमें वह एक अनाथालय में बच्चों के साथ समय बिताती नजर आईं थीं.

 

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बता दें कि बिग बॉस 13 के हिट सीजन होने में शहनाज गिल और सिद्धार्थ शुक्ला का काफी हाथ था. दोनों की जोड़ी ने फैंस का दिल जीता था, जिसके कारण #sidnaaz की जोड़ी का हैशटैग काफी फेमस हुआ था. लेकिन हार्ट अटैक से सिद्धार्थ शुक्ला के निधन के बाद फैंस को काफी दुख हुआ था. वहीं वह शहनाज गिल का सपोर्ट करते नजर आए थे.

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फिल्म निर्माता, निर्देशक की किस प्रौब्लम का जिक्र कर रहे है एक्टर Manoj Bajpayee

फिल्म ‘बेंडिटक्वीन’ से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखने वाले अभिनेता मनोज बाजपेयी को फिल्म ‘सत्या’ से प्रसिद्धी मिली. इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला.बिहार के पश्चिमी चंपारण के एक छोटे से गाँव से निकलकर कामयाबी हासिल करना मनोज बाजपेयी के लिए आसान नहीं था. उन्होंने धीरज धरा और हर तरह की फिल्में की और कई पुरस्कार भी जीते है.बचपन से कवितायें पढ़ने का शौक रखने वाले मनोज बाजपेयी एक थिएटर आर्टिस्ट भी है. उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी  में हर तरह की कवितायें पढ़ी है. साल 2019 में साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री अवार्ड से भी नवाजा गया है.ओटीटी पुरस्कार की प्रेस कांफ्रेंस में उपस्थित मनोज बाजपेयी कहते है कि ओटीटी ने फिल्म इंडस्ट्री को एक नई दिशा दी है, पेंड़ेमिक और लॉकडाउन में अगर इसकी सुविधा नहीं होती, तो लोगों को घर में समय बिताना बहुत मुश्किल होता,वे और अधिक तनाव में होते. हालांकि अभी भी लोग थिएटर हॉल जाने से डर रहे है, क्योंकि ओमिक्रोन वायरस एकबार फिर सबको डरा रहा है.

करनी पड़ेगी मेहनत

आज आम जनता की आदत घरों में आराम से बैठकर फ़िल्में अपनी समय के अनुसार देखने की है,ऐसे में फिल्म निर्माता, निर्देशक, लेखक और कलाकार के लिए थिएटर हॉल तक दर्शकों को लाना कितनी चुनौती होगी ?पूछे जाने पर मनोज कहते है कि सेटेलाइट टीवी, थिएटर, ओटीटी आदि ये सारे मीडियम रहने वाले है. लॉकडाउन के बाद थिएटर हॉल में दर्शकों की संख्या कम रही, पर सूर्यवंशी फिल्म अच्छी चली है. दर्शकों को समय नहीं मिल रहा है कि वे कुछ सोच पाए और हॉल में बैठकर फिल्म का आनंद उठाएं. कोविड वायरस उन्हें समय नहीं दे रहा है. असल में सभी की आदत बदलने की वजह पेंडेमिक है,जो पिछले दो सालों में हुआ है, इसे कम करना वाकई मुश्किल है.इसके अलावा इसे आर्थिक और सहूलियत से भी जोड़ा जा सकता है, क्योंकि अब दर्शक घरों में या गाड़ी में बैठकर अपनी पसंद के अनुसार कंटेंट देख सकते है, इसमें उन्हें थोड़े पैसे में सब्सक्रिप्शन और इन्टरनेट की सुविधा मिल जाती है और वे एक से एक अच्छी फिल्में देख सकते है, इसमें पैसे और समय दोनों की बचत होती है. फिल्म निर्माता, निर्देशक, कहानीकार, कलाकार आदि सभी के लिए ये एक चुनौती अवश्य है, क्योंकि फिर से लार्जर देन लाइफ’ और अच्छी कंटेंट वाली फिल्में देखने ही दर्शक हॉल तक जायेंगे और इंडस्ट्री के सभी को मेहनत करनी पड़ेगी, लेकिन मैं इतना मानता हूँ कि कोविड सालों तक रहने वाली नहीं है, उम्मीद है वैज्ञानिक जल्द ही इस बीमारी की दवा अवश्य खोज लेंगे और तब सुबह एक टेबलेट लेने से शाम तक व्यक्ति बिल्कुल इस कोविड फीवर से स्वस्थ हो जाएगा. तब दर्शक बिना डरे फिर से थिएटर हॉल में आयेंगे. इसके अलावा ओटीटी की वजह से नए और प्रतिभाशाली कलाकारों को देखने का मौका मिला है, जो बिग स्टार वर्ल्ड लॉबी से दूर अपनी उपस्थिती को दर्ज कराने में सफल हो रहे है, जिसमें नए निर्देशक, लेखक, कलाकार, एडिटर, कैमरामैन आदि सभी को काम मिल रहा है.

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आहत होती है क्रिएटिविटी

कई बार ओटीटी फिल्मों में कुछ अन्तरंग दृश्य या अपशब्द होते है, ऐसे में कई बार फिल्म निर्देशकों और कलाकारों को धमकी मिलती है कि वे ऐसी फिल्में न बनाये और न ही एक्टिंग करें, क्योंकि ये समाज के लिए घातक साबित हो सकती है.फिल्म बनाने वाले पर ऐसे लोग अपना गुस्सा भी उतारते है. इसके अलावा कुछ लोग इन फिल्मों पर सेंसर बोर्ड की सर्टिफिकेशन करने पर जोर देते आ रहे है. इस बारें में मनोज बाजपेयी कहते हैकि डर के साये में क्रिएटिविटी पनप नहीं सकती. सुरक्षा के लिए कठिन कानून होनी चाहिए, क्योंकि क्रिएटिव माइंड पर किसी की दखलअंदाजी से क्रिएटिव माइंड मर जाती है. किसी भी फिल्म को बनाने में सालों की मेहनत होती है, अगर उसमें कोई दूसरा आकर कुछ बदलाव करने को कहे, तो उस फिल्म को दिखाने का कोई अर्थ नहीं होता. समाज के आईने को उसी रूप में दिखाने के उद्देश्य से ऐसी फिल्में बनती है. दर्शकके पास सही फिल्म चुनने का अधिकार होता है.वे ही तय करते है कि फिल्म या वेब सीरीज उनके या उनके बच्चे देखने के लायक है या नहीं. सेंसर बोर्ड किसी फिल्म को पूरा करने में निर्माता, निर्देशक के साथ नहीं होता, इसलिए वे सालों की मेहनत को नहीं समझते, लेकिन वे सर्टिफाइड करते है, इससे फिल्म की कंटेंट का अस्तित्व समाप्त हो जाता है.

एक्टर बनने की थी चाहत

मनोज बाजपेयी पिछले 25 साल से काम कर रहे है और उन्होंने हर चरित्र को अपनी इच्छा के अनुसार ही चुना है. बचपन की दिनों को याद करते हुए मनोज कहते है कि मुझे छोटी उम्र से फिल्में देखने का शौक था और मेरे पिता मुझे कभी-कभी शहर ले जाकर फिल्में दिखाते थे, तब उस छोटे से पंखे वाली हॉल में देखना भी अच्छा लगता था. थिएटर से मैं फिल्मों में आया और मुझे हमेशा अनुभवी कलाकारों से बहुत कुछ सीखने को मिला है. सभी ने मुझे सहयोग दिया, इसलिए आज मैं भी जरूरतमंद को सहयोग करता हूँ.

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Top 10 Personal Problem Tips in Hindi: टॉप 10 पर्सनल प्रौब्लम टिप्स हिंदी में

Personal Problem in Hindi:  इस आर्टिकल में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं Grihshobha की 10 Personal Problem in Hindi 2021. लोगों के पास कई प्रौब्लम होती हैं, जिन्हें वह दूसरों से शेयर नहीं कर पाते. लेकिन आज हम आपके लिए लाए हैं हमारे रीडर्स द्वारा भेजी गई कुछ प्रौब्लम्स, जो आपकी भी जिंदगी का हिस्सा हो सकती हैं. तो आइए आपको बताते हैं गृहशोभा की ये Readers Personal Problem in Hindi, जिसमें रीडर्स की हेल्थ, ब्यूटी और मैरिड लाइफ से जुड़ी पर्सनल प्रौब्लम और उनके सौल्यूशन आपको मिलेंगे.

1. प्रैगनैंसी रोकने के लिए क्या उपाय अपनाए जा सकते हैं?

personal problem in hindi

मैं 24 साल की हूं. मेरे विवाह को 2 महीने हुए हैं. प्रैगनैंसी से बचे रहने के लिए कौपर टी, कंडोम और डायाफ्राम में से कौन सा गर्भनिरोधक मेरे लिए सब से अच्छा रहेगा और ये गर्भनिरोधक कितनेकितने साल तक प्रैगनैंसी रोकने के लिए अपनाए जा सकते हैं, कृपया विस्तार से जानकारी दें?

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2. ग्लोइंग स्किन के लिए कोई उपाय बताएं?

personal problem in hindi

मेरी त्वचा सांवली है और साथ ही औयली भी है, जिस की वजह से चेहरे पर रौनक नहीं दिखती. कृपया त्वचा की रंगत निखारने का कोई उपाय बताएं?

किसी का गोरा या काला होना जीन्स पर निर्भर करता है. फिर भी घरेलू उपायों से चेहरे की रंगत को थोड़ा निखारा जा सकता है. आप बेसन में दही व शहद मिला कर पेस्ट बनाएं और चेहरे पर लगाएं. पेस्ट के सूखने के बाद उसे पानी से मसाज करते हुए धो लें. बेसन जहां चेहरे के औयल को कम करेगा, वहीं शहद रैशेज होने से बचाव करेगा. इस के अलावा आप बादाम के पाउडर में मिल्क पाउडर और रोजवाटर मिला कर पैक बना कर चेहरे पर लगाएं. सूखने पर कच्चे दूध की सहायता से धो लें. यह पैक भी आप के चेहरे की रंगत को निखारने में मदद करेगा.

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3. मैं अपने पति को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाती, क्या करूं?

personal problem in hindi

मैं 27 वर्षीय शादीशुदा महिला हूं. मेरी शादी 10 महीने पहले हुई है. पति बहुत प्यार करते हैं पर मैं उन्हें सैक्स में पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाती. वजह है मेरी वैजाइनल मसल्स का जरूरत से ज्यादा संकुचित यानी टाइट होना. सैक्स संबंध के दौरान इस वजह से मैं पति को पूरा साथ नहीं दे पाती. इस दौरान मुझे तेज दर्द होता है. पति के आग्रह को मैं ठुकरा भी नहीं सकती पर सैक्स करने के नाम से ही मेरे हाथपांव फूल जाते हैं और पूरी कोशिश करती हूं कि टाल जाऊं. इस से पति नाराज रहने लगे हैं. बताएं मैं क्या करूं?

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4. बालों को झड़ने से रोकने का कोई घरेलू उपाय बताएं?

personal problem in hindi

मैं 23 वर्षीय युवती हूं. इन दिनों मेरे बाल बहुत झड़ रहे हैं. बालों को झड़ने से रोकने का कोई घरेलू उपाय बताएं?

जवाब-

बालों को रूखा न रहने दें, क्योंकि रूखे बाल अधिक टूटते हैं. अपने खानपान में प्रोटीनयुक्त आहार शामिल करें. बालों की हफ्ते में 1 बार अच्छी तरह औयलिंग करें. उन्हें मजबूत और घना बनाने के लिए दही में मेथीदाना पाउडर, काले तिल का पाउडर बराबर मात्रा में मिला कर हेयर पैक बना कर साफ धुले बालों में लगाएं. आधे घंटे बाद बालों को धो लें. ऐसा 15 दिन में 1 बार करें. जरूर लाभ होगा.

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5. मेरे सास-ससुर पुराने ख्यालात वाले हैं, मैं क्या करूं?

personal problem in hindi

मैं 26 साल की हूं. विवाह को डेढ़ साल हुए हैं. परिवार संयुक्त और बड़ा है. यों तो सभी एकदूसरे का खयाल रखते हैं पर बड़ी समस्या वैवाहिक जीवन जीने को ले कर है. सासससुर पुराने खयालात वाले हैं, जिस वजह से घर में इतना परदा है कि 9-10 दिन में पति से सिर्फ हां हूं में भी बात हो जाए तो काफी है. रात को भी हम खुल कर सैक्स का आनंद नहीं उठा पाते. कभी-कभी मन बहुत बेचैन हो जाता है. दूसरी जगह घर भी नहीं ले सकते. बताएं मैं क्या करूं?

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6. मेरे पति मारपीट व गाली-गलौज करते हैं, मैं क्या करूं?

personal problem in hindi

मैं विवाहित महिला हूं. 4 साल का बेटा है. पति सरकारी नौकरी करते हैं. समस्या यह है कि ससुराल वालों के कहने पर मेरे पति मेरे साथ मारपीट व गालीगलौज करते हैं और बातबात पर दूसरी शादी करने व तलाक देने की धमकी देते हैं. घरेलू हिंसा से परेशान हो कर मैं अपने बेटे के साथ मायके रहने चली गई. कुछ समय पहले मेरे पिता का देहांत हो गया तो मैं ससुराल वापस आ गई. लेकिन पति व ससुराल वालों का मेरे प्रति रवैया अभी भी वैसा का वैसा ही है. ससुर अकसर धमकी देते हैं कि उन की पहुंच ऊपर तक है. दरअसल, मेरी ननद पुलिस में दारोगा है, इसी बात का वे मुझ पर रोब जमाते रहते हैं. मैं बहत परेशान हूं. उचित सलाह दें.

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7. मेरे पति मुझ से नौकरी करवाना चाहते हैं, मै क्या करूं?

personal problem in hindi

मेरे विवाह को 2 वर्ष हो चुके हैं. मेरे पति मुझ से नौकरी करवाना चाहते हैं जबकि मैं संतानोत्पत्ति चाहती हूं. मेरे पति की उम्र 38 वर्ष हो चुकी है, इसलिए यदि हम ने अभी से इस विषय में नहीं सोचा तो दिक्कत होगी. मैं भी इस वर्ष 30 की हो गई हूं. कृपया बताएं कि हमें क्या करना चाहिए?

जवाब
आप की उम्र 30 वर्ष हो चुकी है. अधिक विलंब करने से गर्भधारण करने और संतानोत्पत्ति में दिक्कत होगी, इसलिए आप को समय रहते संतानोत्पत्ति के लिए प्रयास करना चाहिए. आप के पति दिनोंदिन बढ़ती महंगाई के कारण चाहते होंगे कि आप नौकरी करें. यदि पति की आमदनी संतोषजनक नहीं है, तो आप घर पर रह कर ट्यूशन आदि कार्य कर के भी उन्हें आर्थिक सहयोग दे सकती हैं.

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8. पीरियड्स में निकल आए पिम्पल्स तो मैं क्या करूं?

personal problem in hindi

मैं 18 वर्ष की युवा हूं. पीरियड्स शुरू होने से एक दो दिन पहले मेरे चेहरे पर पिम्पल्स निकल आते है? ऐसा क्यों होता है? कृपया इससे निजात पाने का उपाय बताएं?

 जवाब-

पीरियड्स के दौरान चेहरे पर पिम्पल्स-मुहांसे निकल आना आम बात है.  दरअसल, पीरियड्स के शुरू होने के सात दिन पहले वाले समय को प्रीमेन्स्ट्रूअल पीरियड कहते हैं. इन सात दिनों में एस्ट्रोजन का स्तर कम और प्रोजेस्टेरोन का स्तर बढ़ जाने के कारण स्किन काफी सेंसेटिव हो जाती है, जिससे चेहरे पर पिम्प्ल्स निकलने लगते हैं. ऐसे में परेशान होने की कोई बात नहीं है. आप इन जरूरी बातों का ध्यान रख कर पिम्पल्स से छुटकारा पा सकती हैं.

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9. कुछ दिनों से मुझे बहुत अधिक व्हाइट डिस्चार्ज हो रहा है, मैं क्या करूं?

personal problem in hindi

  मेरी उम्र 25 साल है और मुझे कोई बीमारी नहीं है. लेकिन पिछले कुछ दिनों से मुझे बहुत अधिक व्हाइट डिस्चार्ज हो रहा है. मुझे समझ नहीं आ रहा ऐसा क्यों हो रहा है. क्या कोई चिंता करने वाली बात हैं?

जवाब-

महिलाओं को वैजाइनल डिस्चार्ज होना आम बात है. इससे यह पता चलता है की बौडी के अंदर मौजूद ग्लैंड अच्छी तरह काम कर रहे हैं और हार्मोन्स बनने की प्रक्रिया भी नॉर्मल तरीके से चल रही है.

गायनोकोलौजिस्ट डौक्टर सुषमा के अनुसार व्हाइट डिस्चार्ज होने के कई कारण है जैसे –…

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10. नसबंदी कराने से मैरिज लाइफ पर कोई असर तो नहीं होगा?

personal problem in hindi

सवाल-

मैं 29 वर्षीय और 2 बच्चों की मां हूं. हम आगे बच्चा नहीं चाहते और इस के लिए मेरे पति स्वयं पुरुष नसबंदी कराना चाहते हैं. कृपया बताएं कि इस से वैवाहिक जीवन पर कोई असर तो नहीं होगा?

जवाब-

आज जबकि सरकारें पुरुष नसबंदी को प्रोत्साहन दे रही हैं, आप के पति का इस के लिए स्वयं पहल करना काफी सुखद है. आमतौर पर पुरुष नसबंदी को ले कर समाज में अफवाहें ज्यादा हैं. आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि भारत में पुरुष नसबंदी कराने वालों का प्रतिशत काफी निराशाजनक है.

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7 Tips: परखिए अपने हमसफर का अपनापन

एक शख्स, जिस की खातिर मन जमाने से बगावत करने पर उतर आता है. हर आहट में उसी का खयाल आने लगता है. उसे पाने की हसरत जिंदगी का मकसद बन जाती है, बस, यही है मुहब्बत. आप का किसी को पूरी शिद्दत से चाहना ही काफी नहीं होता, जरूरी है कि वह भी आप के खयालों में गुम हो.

वैसे तो प्यार को परखने का कोई पैरामीटर नहीं होता, लेकिन निम्न बातों पर ध्यान दे कर आप कुछ हद तक अपने बौयफ्रैंड की हकीकत से रूबरू हो सकती हैं :

1. आप के प्रति उस का नजरिया

आप जब उस के साथ होती हैं तो आप के प्रति उस का नजरिया क्या होता है? यदि वह आप को समानता के स्तर पर रखता है तो यह सब से प्रमुख बात है. इस से यह जाहिर होता है कि मुसीबत के पलों में वह पल्ला नहीं झाड़ेगा. हमेशा आप का साथ देगा.

2. आप की कही बात पर उस की सोच

जब वह आप से बात करता है तो क्या वह जिंदगी के बारे में भी बातें करता है? अगर हां तो वह सही माने में गंभीर है, क्योंकि फ्लर्ट करने वाले अकसर मौजमस्ती की बातों को ही प्रमुखता देते हैं.

3. अपेक्षाएं जायज रखता है

क्या वह आप से आत्मीय सहयोग तथा अपनापन रखता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि घूमनेफिरने या अकसर अकेले में घूमने की जिद करता है. न मानने पर डांट भी देता है. इस से न तो आप खुश रह सकती हैं और न ही वह.

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4. आप की सहेलियों से उस का व्यवहार

एक अच्छे इंसान की तरह पेश आता है या आशिक मिजाज के रूप में. इस से उस का चरित्र पता चलता है. स्त्रीपुरुष के परस्पर रिश्तों में ईमानदारी बरतना जरूरी है, क्योंकि यदि आप समाज और परिवार में रहते हैं तो उन के उत्तरदायित्वों का पालन करना आप का नैतिक कर्तव्य भी है. यदि आप के चोरीछिपे कहीं और रिश्ते हैं तो एक दिन आप की पोल खुलनी तय है.

5. आप का मूड खराब होने पर क्या करता है

कभीकभी सामान्य बातचीत में आप का मूड खराब हो जाता है तब क्या वह आप को खुश करने का प्रयास करता है या उसे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता या  उस की ईगो आड़े आती है कि मैं क्यों मनाऊं. समस्याएं तो जीवन का हिस्सा हैं, अत: उन का दोनों को ही डट कर मुकाबला करना चाहिए. मैं और तुम का चक्कर छोड़ हम पर महत्त्व देना चाहिए.

6. तारीफ भी जरूरी है

क्या वह आप का बर्थडे याद रखता है? अगर नहीं तो समझ लीजिए कि उस का प्रेम बनावटी है और ये ही छोटीछोटी बातें बाद में कई बार तनाव की वजह बन जाती हैं. वैसे भी सफल रिश्ते का मूलमंत्र है अपने जीवन साथी की तारीफ करना.

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7. सब से जरूरी बात

क्या वह आप पर भरोसा करता है या सुनीसुनाई बातों पर यकीन कर के झगड़ा मोल लेता है.

तो अब देखें क्या आप का भावी जीवन साथी आप की बातों पर खरा उतरता है. ये बातें दिखनेसुनने में भले ही सामान्य लगें, पर पूरे जीवन का सफल मूलमंत्र हैं.

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अपूर्ण: मंदार के आने के बाद क्या हुआ धारिणी की जिंदगी में

लेखिका- अर्चना पाटील

‘‘धारिणीआज पहली बार नौकरी के लिए बाहर निकली थी. रुद्र के गुजरने के बाद वाह बहुत अकेली ही थी. समीरा की जिम्मेदारी निभाते हुए वह थक जाती थी. समीरा के जिंदगी में पिता रुद्र की खाली जगह भी धारिणी को ही पूरी करनी पड़ती थी. नौकरी के कारण धारिणी की समस्याएं और भी बढ़ गईं. मगर घर में ऐसे कितने दिन बीतते? इसलिए नौकरी धारिणी की जरूरत बन गई थी. एक होस्टल में उसे रिसैप्शनिस्ट की नौकरी मिली थी. रोज रेल से आनाजाना सब से बड़ी समस्या थी, क्योंकि उसे इस की आदत नहीं थी. पहले दिन धारिणी का भाई सारंग साथ आया.’’

सारंग ने उस की अपने दोस्तों से पहचान करा दी, ‘‘दीदी, ये सब आप को मदद करेंगे… किसी को भी पुकारो.’’

‘‘जरूर, टैंशन मत लो मैडम,’’ दोस्तों के गु्रप से आवाज आई.

‘‘दीदी, ये मंदार शेटे. ये और आप ट्रेन से साथसाथ ही उतरोगे. शाम को भी यह आप के साथ ही रहेंगे. चलो, मैं अब निकलता हूं.’’

‘‘हां, जाओ,’’ धारिणी थोड़ी नाराजगी

से बोली.

2 मिनट में ट्रेन आई. धारिणी महिलाओं के डब्बे में चढ़ने की कोशिश कर रही थी. सारंग के सभी दोस्त उसी डब्बे में चढ़ गए.

‘‘अरे, यह तो लेडीज डब्बा है… आप लोग इस डब्बे में कैसे?’’

‘‘ओ मैडम, हम यही रहते हैं. अपने गांव की ट्रेन में सबकुछ चलता है. यह मुंबई थोड़ी है,’’ मंदार बोला.

धारिणी चुप हो गई. मन ही मन आज का दिन अच्छा गुजरे ऐसी कामना करने लगी. जैसे

ही सावरगांव आया धारिणी और मंदार ट्रेन से नीचे उतरे, ‘‘चलो मैडम मैं आप को होटल तक छोड़ता हूं.’’

‘‘नहींनहीं, आप को क्यों परेशानी…’’

‘‘अरे, इस में किस बात की परेशानी. आप सारंग की बहन… सारंग मेरा अच्छा दोस्त है… मैं छोड़ता हूं आप को…’’

धारिणी का भी पहला दिन था. वह भी घबरा रही थी. मंदार के कारण उस ने खुद को थोड़ा हलका महसूस किया. इसलिए वह मंदार की गाड़ी में बैठ गई. वैसे दिन अच्छा ही गया. शाम रेलवे में उसे फिर मंदार मिला.

‘‘कैसा गया आज का दिन धारिणी… सौरी मैं जरा जल्द ही नाम से पुकारने लगा.’’

‘‘नहीं इट्स ओके. आप पुकारें नाम से. मैं गुस्सा नहीं होऊंगी.’’

दोनों घर पहुंचे. दूसरे दिन वही किस्सा. धीरेधीरे धारिणी और मंदार अच्छे दोस्त

बने. सुबहशाम मंदार और धारिणी रेल में मिलते थे. कभीकभार मंदार धारिणी को होटल तक छोड़ने के लिए भी आता था, तो कभी लेने के लिए आता था. रातबेरात व्हाट्सऐप पर उन का चैटिंग भी चलता था. धारिणी सभी समस्याएं मंदार के साथ शेयर करती थी.

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‘‘जाने भी दो, कुछ नहीं होगा…’’ इन लफ्जों में मंदार धारिणी को समझता था.

धारिणी के लिए मंदार उस की स्ट्रैस रिलीफ की दवा था, समीरा, मांपिताजी, सारंग ये सभी रुद्र की खाली जगह भरने के लिए असमर्थ थे. लेकिन मंदार रुद्र की तरह मानसिक सहारा देता था. मंदार के कारण धारिणी फिर से संजनेसवरने लगी, हंसने लगी, अच्छे कपड़े पहन के घूमने लगी. उस के लिए वह अच्छा दोस्त था. बाइक पर कभीकभी वह उस के कंधे पर हाथ रखती थी. बोलतेबोलते अनजाने में पीठ पर चपत मारती थी. मगर ये सब एक अच्छा दोस्त होने के नाते ही होता था. 6-7 महीने अच्छे बीत गए. एक दिन सावरगांव उतर दोनों ने चाय पी.

‘‘तुम बहुत बातें करती हो मुझ से. ऐसा क्यों?’’

‘‘तुम अच्छे लगते हो मुझे. मुझे तुम्हारे साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है. मुझे तुम्हारी पर्सनैलिटी भी बहुत अच्छी लगती है. रेल में नहीं बोल सकती सब के सामने. इस वक्त हम दोनों ही हैं, इसलिए बता रही हूं.’’

‘‘अरे बाप रे, क्या खा कर निकली हो

घर से?’’

‘‘कुछ नहीं, जो सच है वही बता रही हूं,

तुम से जो लड़की ब्याह करेगी वह सचमुच खुशहाल रहेगी.’’

‘‘हां, यहां से 35 किलीमीटर पर गुफाएं हैं. चलोगी देखने?’’

‘‘पागल हो गए क्या? मैं ने घर पर नहीं बताया. किसी कारण विलंब हुआ तो मांबाबूजी चिंता करेंगे.’’

‘‘नहीं, विलंब नहीं होगा, ट्रेन से तुम रात

9 बजे तक  घर पहुंच जाएगी.’’

‘‘मांबाबूजी क्या कहेंगे?’’

‘‘तुम मेरे साथ गुफा देखने जा रही हो यह मत बताना उन को. एक दिन झठ बोलेगी तो क्या फर्क पड़ने वाला है. पिछले 6 महीनों से मैं ने कुछ मांगा तुम से? थोड़ा घूम के आएंगे… तुम्हें चेंज मिलेगा. तुम्हारे लिए कह रहा हूं… मैं तो हजारों बार गया हूं वहां.’’

‘‘नहीं, मैं काम पर जाती हूं.’’

‘‘हां जाओ. अभी कह रही थी कि तुम्हारे साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है. जब वक्त आया तो घबरा रही हो.’’

‘‘अरे, मुझे अच्छा लगता है तो क्या मैं तुम्हारे साथ पूरे गांव में कहीं भी घुमूं क्या?’’

‘‘ठीक है, यहां मेरा और सारंग का एक दोस्त रहता है. शाम को उस के बच्चे को देखने तो चलोगी न?’’

‘‘ट्रेन जाएगी फिर?’’

‘‘मैं छोड़ दूंगा तुम्हें तुम्हारे घर पर मेरी मां… इस बारे में पहले ही सोचा है मैं ने.’’

‘‘ठीक है, हो के आएंगे,’’ धारिणी ने मंदार नाराज न हो, इसलिए हामी भर दी.

‘‘1 घंटा जल्दी निकलना ताकि तुम्हें घर पहुंचने में देर न हो.’’

‘‘हां बाबा, कोशिश करूंगी.’’

शाम को धारिणी हमेशाकी तरह 4 बजे होटल के बाहर आ कर खड़ी हो गई. मंदार उस का ही इंतजार कर रहा था.

धारिणी ने बाइक पर बैठते हुए पूछा, ‘‘कहां रहता है तुम्हारा दोस्त?’’

आखिरकार गाड़ी एक घर के पास रुकी. घर को ताला लगा था. आसपास खेत फैले थे. जगह सुनसान थी. लोगों की बस्ती नहीं थी और चहलपहल भी नहीं थी.

‘‘इस घर को ताला क्यों लगा है मंदार?’’

‘‘चाबी मेरे पास है. आओ अंदर चलते हैं.’’

‘‘मगर क्यों? मुझे घर छोड़ दो.’’

‘‘बावली हो क्या? कभी न मिलने वाला एकांत मिला है हमें. आधा घंटा बैठेंगे, फिर निकलेंगे.’’

‘‘मैं नहीं जाउंगी अंदर.’’

‘‘देखो, तुम पहले आंखें बंद कर के खड़ी रहो. मैं सिर्फ एक जीभर के किस लूंगा और फिर निकलेंगे. तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है क्या?’’

‘‘देखो मंदार, तुम मुझे दोस्त की हैसीयत से अच्छे लगते हो. लेकिन इस बात के लिए मेरी नजदीकी सिर्फ रुद्र से थी और मरते दम तक उस से ही रहेगी.’’

‘‘लेकिन मुझे भी तुम अच्छी लगती हो और अगर मुझे तुम्हें स्पर्श करने को दिल करता है, तो इस में गलत क्या है?’’

‘‘शायद मेरी ही गलती… मुझे तुम से दूर रहना चाहिए था.’’

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‘‘अरे सुनो तो, खाली 1/2 घंटा है हमारे पास. क्यों वक्त जाया कर रही हो? ऐसी कौन सी धनदौलत मांग रहा हूं तुम से…’’

‘‘माफ करना… मैं अगर अपनी मर्यादा समझती तो शायद तुम्हें गलतफहमी

न होती अपनी रिलेशनशिप पर… अब तो मेरी ट्रेन भी छूट गई होगी… मुझे सहीसलामत घर पहुंचा दो.’’

‘‘ओह मेरी मां. तुम टैंशन मत ले. तुम्हारी रजामंदी के सिवा मैं कुछ नहीं करूंगा,’’ कह मंदार ने जल्दी बाइक को किक लगाई. 8 बजे गाड़ी घर के सामने खड़ी थी. बाइक की स्पीड और मंदार का गुस्सा साथसाथ चल रहे थे. मगर रास्ते में दोनों एकदूसरे से एक लफ्ज तक नहीं बोले. घर आते ही धारिणी जल्दीजल्दी चलने लगी.

‘‘ओ मैडम, आप को बिना स्पर्श किए घर तक छोड़ा है मैं ने. आप जीत गईं, मैं हारा. मैं ही पागल था, जो हर वक्त आगेपीछे घूमता था. मेरी एक इच्छा पूरी करती, तो कौन सा पहाड़ टूट जाता… मैं कुछ सोने के लिए नहीं कह रहा था मेरे साथ. मैं भी अपनी मर्यादा जानता हूं मैडम.’’

‘‘मंदार, प्लीज इस तरह मुझ से बात मत करो. आखिरकार संस्कार भी कोई चीज होती है या नहीं? इस बात के लिए मेरा मन कभी भी राजी नहीं होगा. तुम्हारे कारण रुद्र के जाने के बाद मैं ने फिर से जीना सीखा. मगर तुम्हें अगर सिर्फ मेरा स्पर्श ही चाहिए, तो मुझ से फिर कभी मत मिलना.’’

‘‘यह भी कहती हो कि तुम मुझे अच्छे लगते हो… पगली स्पर्श करने से ही प्यार व्यक्त होता है.’’

‘‘मंदार मेरे तन पर केवल रुद्र का अधिकार था और रहेगा. तुम जो कह रहे हो वह मेरे संस्कार में कभी नहीं बैठेगा… मेरी सोच कुछ ऐसी ही है.’’

‘‘फिर एक बार गौर करना मेरे कहने पर… मैं इंतजार करूंगा तुम्हारा.’’

‘‘मंदार, तुम्हारी इस साल शादी होने वाली है. तुम्हारी पत्नी को क्या मुंह दिखाऊंगी मैं? तुम मेरे दोस्त हो. शायद उस से भी बढ़ कर हो. मगर हर चीज पूरी होनी ही चाहिए ऐसा नहीं होता. मेरे दोस्त, इसलिए आज से मैं तुम्हें कभी भी परेशान नहीं करूंगी… हम दोनों इस के बाद कभी नहीं मिलेंगे. अगर मेरे कारण तुम्हारा दिल टूट गया होगा, तो मुझे माफ कर देना.’’

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