किसी महल की यात्रा हमें उस समय में ले जाती है जब शाही खानदानों का बोलबाला था. भारत में तो कई ऐसे महल आज भी मौजूद हैं पर कोई समय के हाथों बर्बाद हो रहा है तो किसी पर सरकार निगेहबान है. इन्हीं सबके बीच शाही ठाठ-बाट के साथ आज भी अपनी ऐतिहासिक चमक को लिए हुए पश्चिम बंगाल में स्थापित हजारद्वारी महल खड़ा है.
जैसा कि आपको नाम से ही पता चल रहा होगा कि हजारद्वारी ऐसा महल है जिसमें हजार दरवाजे हैं. इस महल का निर्माण 19वीं शताब्दी में नवाब निजाम हुमायूं जहां के शासनकाल में हुआ जिन्होंने बंगाल. इनका राज्य बिहार और ओड़िशा तीनों तक फैला हुआ था. पुराने जमाने में इसे बड़ा कोठी के नाम से जाना जाता था. यह महल पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में स्थित है जो कभी बंगाल राजधानी हुआ करती थी. इस कृति को प्रसिद्ध वास्तुकार मैकलिओड डंकन द्वारा ग्रीक (डोरिक) शैली का अनुसरण करते हुए बनवाया गया था.
महल को कौन सी चीजें खास बनाती हैं?
– भागीरथी नदी के किनारे बसे इस तीन मंजिले महल में 114 कमरे और 100 वास्तविक दरवाजे हैं और बाकि 900 दरवाजे आभासी(हूबहू मगर पत्थर के बने हुए हैं). इन दरवाजों की वजह से इसे हजारद्वारी महल कहा जाता है.
– महल की रक्षा के लिए ये दरवाजे बनवाये गए थे.
– दरवाजों की वजह से हमलावर भ्रमित हो जाते थे और पकड़े जाते थे.
– लगभग 41 एकड़ की जमीन पर फैले हुए इस महल में नवाब अपना दरबार लगाते थे.
– अंग्रेजों के शासनकाल में यहां प्रशासनिक कार्य भी किये जाते थे.
– इस महल का इस्तेमाल कभी भी आवासीय स्थल के रूप में नहीं किया गया.
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महल के दीवार को निजामत किला या किला निजामत कहा जाता है. महल के अलावा परिसर में निजामत इमामबाड़ा, वासिफ मंजिल, घड़ी घर, मदीना मस्जिद और बच्चावाली तोप भी स्थापित हैं. 12-14 शताब्दी में बनी इस 16 फीट की तोप में लगभग 18किलो बारूद इस्तेमाल किया जा सकता था. कहते हैं कि इसे सिर्फ एक ही बार इस्तेमाल किया गया है और उस समय धमाका इतना बड़ा और तीव्र हुआ था कि कई गर्भवती महिलाओं ने समय से पूर्व ही बच्चों को जन्म दे दिए था, इसलिए इसे बच्चावाली तोप कहते हैं.
भागीरथी नदी के तट से लगभग 40 फीट के दूरी पर बने इस महल की नींव बहुत गहरी रखी गई थी, इसलिए आज भी यह रचना इतनी मजबूती से खड़ी है. महल की ओर जाती भव्य सीढ़ियां और भारतीय-यूरोपियन शैली इस संरचना के अन्य मुख्य आकर्षण हैं.
महल का संग्रहालय
यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का सबसे बड़ा स्थल संग्रहालय है. सन् 1985 में इस महल के बेहतर परिक्षण के लिए इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंप दिया गया. यह संग्रहालय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का सबसे बड़ा स्थल संग्रहालय माना जाता है और इसमें बीस दीर्घाएं प्रदर्शित हैं जिनमें 4742 पुरावस्तुएं मौजूद हैं जिनमें से जनता के लिए 1034 पुरावस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं.
पुरावस्तुओ के संग्रह में विभिन्न प्रकार के हथियार, डच, फ्रांसिसी और इतालवी कलाकारों द्वारा बनाए गए तैल चित्र, संगमरमर की मूर्तियां, धातु की वस्तुएं, चीनी मिट्टी और गचकारी की मूर्तियां, फरमान, विरल पुस्तकें, पुराने मानचित्र, पाण्डुलिपियां, भू-राजस्व के रिकॉर्ड, पालकी आदि शामिल हैं जिनमें से अधिकतर 18वीं और 19वीं शताब्दियों से सम्बंधित हैं.
इस संग्राहलय में पर्यटक 2700 से अधिक हथियारों को देख सकते हैं. इन हथियारों में नवाब अलीवर्दी खान, सिराजुद्दौला और उनके दादाजी की तलवारें प्रमुख हैं. यहां घूमने के बाद पर्यटक विन्टेज कारों का अद्भुत संग्रह भी देख सकते हैं. इन कारों का प्रयोग शाही घराने के सदस्य किया करते थे.
संग्राहलय और पैलेस देखने के बाद पर्यटक यहां पर बने पुस्तकालय में भी घूमने जा सकते हैं. पुस्तकालय में घूमने के लिए पर्यटकों को पहले विशेष अनुमति लेनी पड़ती है. अकबरनामा की मूल प्रति भी यहीं रखी हुई है.
महल संग्रहालय के पुरावशेष में शाही परिवार के कई सामान मौजूद हैं, जिनमें दरबार हॉल में लगा हुआ खूबसूरत झूमर भी शामिल है. यह झूमर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा झूमर है, पहला बकिंघम महल में है. यह झूमर नवाब को रानी विक्टोरिया द्वारा तोहफे के रूप में भेंट किया गया था.
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संग्रहालय की गैलरियों में शस्त्रागार विंग, राजसी प्रदर्शनी, लैंडस्केप गैलरी, ब्रिटिश पोर्ट्रेट गैलरी, नवाब नाज़िम गैलरी, दरबार हॉल, समिति कक्ष, बिलबोर्ड कक्ष, पश्चिमी ड्राइंग कक्ष और धार्मिक वस्तुओं वाली गैलरी शामिल हैं. इस महल को देखने के लिए कुछ प्रवेश शुल्क भी निर्धारित है. शुक्रवार के दिन यह महल पर्यटकों के लिए बंद रहता है.
यहां आने का सही समय
महल के भ्रमण के लिए सबसे अच्छा समय सितम्बर से मार्च तक का महीना है.
जब भी आपके दांतों में दर्द होता है आप दवाईयों का सेवन कर लेते हैं, जो कई बार आपके लिए खतरनाक भी साबित होता है. अगर आप दवाई न लेकर कुछ घरेलू नुस्खे अपनाऐं, तो भी दांतों के दर्द से जल्दी छुटकारा पाया जा सकता है. आज हम आपको उन घरेलू उपायों के बारे में जानकारी देगें जिससे आपके दांतों का दर्द कुछ ही देर में ठीक हो जाएगा और आप दवाई खाने से भी बचे रहेंगे. इन घरेलू चीजों के इस्तेमाल से आपके दांतों का दर्द आसानी से दूर हो जाएगा :
1. प्याज का करें इस्तेमाल
जब भी आपके दांतों में दर्द हो तो आपको प्याज के छोटे-छोटे टुकडें करके चबा लेने चाहिए इससे आपके दांत का दर्द तुरंत ठीक हो जाएगा.
2. लहसुन है बेस्ट औप्शन
दांत दर्द होने पर लहसुन में अच्छे से नमक लगा कर चबाएं. ऐसा करने से आपके दांत का दर्द ठीक तो हो ही जाएगा और अगर आप रोजाना इसका इस्तेमाल करेंगी, तो आप के दांत भी मजबूत होंगे.
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3. लौंग का करें इस्तेमाल
जब भी दांत में दर्द शुरु हो जाए तो उस जगह पर लौंग रखने से दर्द में बहुत फायदा मिलता है, अगर दर्द अधिक हो रहा हो तो आपको लौंग का तेल लगाना चाहिए.
4. दर्द से राहत दिलाए नींबू
नींबू विटामिन सी का सबसे अच्छा स्त्रोत माना जाता है, इसलिए जब भी दांतों में दर्द हो, तो दर्द वाली जगह पर नींबू का कतरा लगाने से कुछ ही देर में दर्द ठीक हो जाता है.
5. काली मिर्च से मिलेगी दांत दर्द से राहत
काली मिर्च को पीसकर पाउडर बनाकर, उस पाउडर में थोडा सा नमक मिलाकर दर्द वाली जगह पर मंजन करने से, थोड़ी ही देर में राहत महसूस होने लगती है.
6. गर्म पानी से करें कुल्ला
दांतों में दर्द होने पर गर्म पानी में थोड़ा सा नमक मिलाकर कुल्ला करने से दांत के दर्द से राहत मिल जाती है.
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7. बर्फ की करें सिकाई
दांतों में दर्द होने पर 15-20 मिनट तक बर्फ की सिकाई करने से आपको राहत का एहसास होता है. इस प्रक्रिया को दिन में दो से तीन बार दोहराने पर आपको दीर्घकालीन राहत भी मिलती है.
8. सरसों का तेल है बेस्ट
दांतों में दर्द होने पर थोड़ा सा सरसों का तेल लेकर, उसमे चुटकीभर नमक मिलाकर उसे दांतों में मंजन की तरह करें. ऐसा करने से आपको बहुत राहत मिलेगी.
कुछ अरसा पहले दिल्ली से सटे गे्रटर नोएडा की यह खबर अखबारों की सुर्खियां बनी कि मां के शव को ले कर 4 बेटियां भाई के दरवाजे पर 3 घंटे तक अंतिम संस्कार के लिए रोती रहीं, लेकिन भाई ने दरवाजा नहीं खोला. सैक्टरवासियों और पुलिस के समझाने पर भी उस का दिल नहीं पसीजा, तो अंतत: बेटियों ने ही मां के शव को मुखाग्नि दी. भाई के अपनी मां को मुखाग्नि न देने का कारण चाहे जो भी हो, मगर आज भी घर में बेटा पैदा होने पर मातापिता बेहद खुश होते हैं, क्योंकि आज भी समाज में ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि बेटा घर का कुलदीपक होता है और वही वंश को आगे बढ़ाता है. जबकि आज के बदलते परिवेश में बेटों की संवेदनाएं अपने मातापिता के प्रति दिनबदिन कम होती जा रही हैं. बेटियां जिन्हें पराया धन कहा जाता है, जिन के पैदा होने पर न ढोलनगाड़े बजते हैं, न जश्न मनाया जाता है और न ही लड्डू बांटे जाते हैं. डोली में बैठ कर वे ससुराल जरूर जाती हैं पर वही आज के परिवेश में मांबाप के बुढ़ापे की लाठी बन रही हैं.
बेटियों ने दिया सहारा
कुछ महीने पहले बरेली की रहने वाली कृष्णा जिन की उम्र 80 वर्ष है, रात सोते समय पलंग से गिर गईं. डाक्टरों ने कहा कि कौलर बोन टूट गई है अत: इन्हें बैड रैस्ट पर रहना पड़ेगा. वकील बेटे की पत्नी को उन की देखरेख यानी कपड़े बदलवाना, खाना खिलाना आदि करना ठीक नहीं लगा, तो रोज पतिपत्नी के बीच झगड़ा होने लगा. अंतत: लखनऊ से बेटीदामाद ऐंबुलैंस ले कर आए और मां को अपने घर ले गए. अब बेटी के घर उन की अच्छी तीमारदारी हो रही है. पर बेटे ने वहां जाना तो दूर एक बार फोन कर के भी मां का हालचाल नहीं पूछा. जबकि मां की नजरें हर समय बेटे को खोजती रहती हैं.
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ऐसे न जाने कितने मांबाप होंगे जिन्हें उन के बेटे अपने पास नहीं रखना चाहते. अब रामकुमारजी को ही लें. 10 साल पहले रिटायर हो गए थे. सरकारी नौकरी में अच्छे पद पर थे. पत्नी रही नहीं. बेटे की शादी की. फिर घर के एक कोने में पड़े रहते थे. बेटे ने पूरे घर में अपना कब्जा कर रखा था. बहू उन से बात नहीं करती थी. हाल ही में उन्हें कैंसर होने का पता चला तो बेटी आ कर ले गई. वह पिता का इलाज करवा रही है. बेटे को इस से कोई मतलब नहीं है. घर रामकुमारजी का पर अधिकार बेटे का. रामकुमारजी बताते हैं कि बेटी ने जब लव मैरिज की थी तो वे उस से काफी समय तक नाराज रहे थे. फिर भी आज वही बेटी मेरे बुढ़ापे का सहारा बन रही है. कई महिलाएं तो वृद्धाश्रम में इसलिए रह रही हैं कि उन के बेटे उन की देखभाल नहीं करते और बेटी कोई है नहीं. कर्नाटक की रहने वाली 73 वर्षीय शकुंतला बताती हैं कि उन के पति का बिजनैस था. पति के निधन के बाद इकलौते बेटे ने बिजनैस संभाला. फिर वह गुड़गांव आ कर रहने लगा और घर में पोते के लिए जगह कम होने का हवाला दे कर उसे वृद्धाश्रम में छोड़ गया. इसी तरह केरल की रहने वाली 65 वर्षीय विजयलक्ष्मी का बेटा उन्हें अपने परिवार के साथ मस्कट ले गया. वहां वे घर का काम करती थीं व बेटे के छोटे बच्चे को संभालती थीं. पर जब वे बीमार हुईं और घर का काम करने में असमर्थ हो गईं तो बेटे ने उन्हें घर से निकाल दिया. तब केरल के ही रहने वाले एक व्यक्ति को उन पर दया आई और उस ने उन की भारत वापसी का इंतजाम कराया. अब वे अपनी बेटी के पास हैं. वही उन की देखभाल कर रही है.
इसी तरह एटा के रहने वाले शर्माजी की पत्नी नहीं रहीं तो वे अपने इंजीनियर बेटे के पास नोएडा आ गए. उन के आते ही बहू ने भी जौब शुरू कर दी और अपने बच्चे को क्रैच में न भेज कर उसे सुबह स्कूल की बस में चढ़ाना, दोपहर को घर लाना और खाना खिलाना आदि सभी काम शर्माजी पर डाल दिए. एक दिन वे गिर पडे़ और पैर की हड्डी टूट गई. बस तभी से बेटेबहू ने उन से मुंह मोड़ लिया. अपनी बेटी से मोबाइल पर बात करते थे तो मोबाइल भी उन्होंने ले लिया. वे उन से बात नहीं करते थे. खाना भी मुश्किल से एक समय और वह भी बेसमय मिलता. अंतत: बेटी आई और अपने पिता को देहरादून अपने साथ ले गई. अब वे ठीक हैं. बेटे ने तो उन का हालचाल भी नहीं पूछा. ऐसे किस्से आज समाज के हर वर्ग में और हर दूसरेतीसरे घर में घट रहे हैं.
बेटों के विचार
सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है जो बेटे अपने जन्म देने वाले मांबाप की देखभाल करना नहीं चाहते? क्या उन की संवेदनाएं मर गई हैं अथवा अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं? आइए, जानें कुछ बेटों ने इस संबंध में क्या बताया: बेटे चाहते हैं कि बुढ़ापे में अपने मातापिता की देखभाल करें, पर नौकरी के कारण दूसरे शहर में जाना, बारबार ट्रांसफर होना, छोटा घर, बच्चों की पढ़ाई का बढ़ता खर्चा और सब से मुख्य बात पत्नी का भी नौकरीपेशा होना अथवा सहयोग न देना, जिस की वजह से वे ऐसा नहीं कर पाते. फिर बड़े शहरों में एक तो विश्वासपात्र नौकर नहीं मिलते और अगर कोई मिल भी जाता है तो मोटा वेतन मांगता है. तो भी डर बना रहता है कि कहीं घर में कोई दुर्घटना न घट जाए. उस पर मातापिता का जिद्दी होना, हर समय की टोकाटोकी, खानपान में नुक्ताचीनी जैसी कई समस्याएं हैं. घर आने पर हर व्यक्ति सुकून चाहता है, पर ऐसे हालात में यह संभव नहीं हो पाता. कई बार मातापिता स्वयं भी साथ नहीं रहना चाहते. फिर आज के माहौल में छोटा परिवार की धारणा को भी बढ़ावा मिल रहा है.
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ऐसा क्यों हो रहा
सवाल यह उठता है कि आज के समय में ऐसा क्यों हो रहा है, जबकि मातापिता भी शिक्षित हैं और बच्चे भी?
मनोचिकित्सक दिव्या बताती हैं कि बेटा और बेटी के साथ समान व्यवहार करना व बेटी को भी प्रौपर्टी में समान हिस्सा देने से लड़कों के मन में यह विचार आने लगा है कि मांबाप के देखभाल की जितनी जिम्मेदारी उन की है उतनी ही बेटी की भी यानी मांबाप की देखभाल की जिम्मेदारी अकेले उन की नहीं है. वैसे भी भावनात्मक रूप से लड़कियां अपने मातापिता से ज्यादा जुड़ी रहती हैं. दूसरे अब वे भी आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो रही हैं, अत: ससुराल वाले भी उन से कुछ नहीं कह पाते. अब पतियों को भी यह समझ में आने लगा है कि पत्नी के मातापिता भी उतने ही जरूरी हैं जितने अपने. इसी कारण वे पत्नी को पूरापूरा सहयोग देते हैं.
मातापिता स्वयं भी जिम्मेदार होते हैं. बहू में हर समय कमी देखते हैं, उस के साथ जुड़ाव नहीं कर पाते. कोई बात करनी हो तो भी बेटे से अलग करते हैं. बहू के सामने नहीं. दूसरे हर बात में अपनी बेटी को बहू के मुकाबले ज्यादा आंकते हैं. गाहेबगाहे बेटी को तो तोहफे देते रहते हैं पर बहू को नहीं. यह सच है कि उम्र के साथ कुछ बीमारियों का लगना आम बात है तो भी वे मांबाप हैं और उन्हें भावनात्मक सहारा अपने बच्चों से मिलना ही चाहिए ताकि वे उम्र के आखिरी पड़ाव पर खुद को उपेक्षित न महसूस करें.
ट्रेन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंचने वाली थी. साक्षी सामान संभाल रही थी. उस ने अपने बालों में कंघी की और अपने पति सौरभ से बोली, ‘‘आप भी अपने बाल सही कर लें. यह अपने कुरते पर क्या लगा लिया आप ने? जरा भी खयाल नहीं रखते खुद का.’’
‘‘अरे यार, रात को डिनर किया था न. लगता है कुछ गिर गया.’’
तीखे नैननक्श, सांवले रंग की साक्षी मध्यवर्गीय परिवार से संबंध रखती थी. पति सौरभ सरकारी विभाग में बाबू था. शादी को 15 साल होने जा रहे थे. दोनों का 1 बेटा करीब 13 साल का था. लेकिन इस वक्त उन के साथ नहीं था.
साक्षी जब पढ़ती थी तब कसबे में एक ही सरकारी गर्ल्स कालेज था. उस में ही मध्यवर्गीय और उच्चवर्ग के घरों की लड़कियां स्कूल से आगे की पढ़ाई पूरी करती थीं. कसबे के करोड़पति व्यापारी की बेटी कामिनी भी साक्षी की कक्षा में थी. वह चाहती तो यह थी कि शहर में जा कर किसी बड़े नामी कालेज में दाखिला ले, लेकिन उसे इस बात की इजाजत नहीं मिली.
साक्षी और कामिनी ने सरकारी कालेज में ही बीए किया. दोनों में इतनी गहरी मित्रता थी कि दोनों की सुबहशाम साथ ही गुजरती थीं. साथसाथ पलीबढ़ी हुई दोनों सहेलियां मित्रता की एक मिसाल थीं. बीए के बाद दोनों की शादी के रिश्ते आने लगे. कामिनी की शादी हो गई. शादी के बाद वह दिल्ली में अपनी ससुराल चली गई.
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इधर साक्षी के परिजनों के पास शादी में खर्च को ज्यादा कुछ नहीं था. उस की शादी में कुछ दिक्कतें आईं. 1 साल बाद साक्षी की शादी भी कामिनी की ससुराल के कसबे में ही हो गई. दोनों सहेलियां शादी के बाद बिछुड़ गईं. साक्षी को इतना तो पता था कि कामिनी दिल्ली में है, लेकिन पताठिकाना क्या है, यह उसे नहीं पता था. वह अपने सरकारी बाबू पति सौरभ के साथ जीवन व्यतीत कर रही थी. छोटा सा कसबा ऊपर से पति एक मामूली बाबू. सुबह से शाम, शाम से रात हो जाती. सब कुछ नीरस सा लगता साक्षी को. वह सोचती यह भी कोई जिंदगी है, कुछ भी नया नहीं. उसे रहरह कर कामिनी की याद आती. सोचती कामिनी दिल्ली में है, कितने मजे में रहती होगी.
दोनों की शादी को कई बरस गुजर गए. कामिनी का अतापता नहीं था, क्योंकि उस के पिता ने अपना कारोबार कसबे से समेट कर दिल्ली में शुरू कर लिया था. कसबे से आनाजाना छूटा तो कामिनी भी दिल्ली की हो कर रह गई.
शादी के 14 साल बाद शहर से एक दिन कामिनी के पिता किसी काम से कसबे में आए, तो साक्षी से भी मिले. वे साक्षी को भी अपनी बेटी की ही तरह मानते थे. साक्षी ने उन से कामिनी का मोबाइल नंबर लिया. साक्षी ने कामिनी से बातें कीं. जब भी टाइम मिलता दोनों मोबाइल पर बातें करतीं.
कामिनी ने साक्षी को दिल्ली आने का निमंत्रण दिया. साक्षी कई दिनों तक टालती रही. आखिर एक दिन उस ने अपने पति सौरभ को दिल्ली ले चलने को राजी कर लिया.
कामिनी के निमंत्रण पर ही साक्षी अपने पति के साथ दिल्ली जा रही थी. कामिनी ने कहा था कि वह उसे लेने रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाएगी. साक्षी पहली बार दिल्ली जा रही थी. वह बहुत खुश थी. उस की उम्मीदों को पंख लग रहे थे. दिल्ली जिस का अभी तक नाम सुना था, उसे देखेगी. सब से बड़ी बात कामिनी से 15 साल बाद मिलेगी. बहुत सारी बातें करेगी. उस ने सुना था खूब धनदौलत, ठाटबाट हैं कामिनी के ससुराल में. उस का पति वैभव भी काफी हैंडसम और तहजीब वाला इनसान है.
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ट्रेन पहुंच चुकी थी. साक्षी जैसे ही गेट पर पहुंची सामने कामिनी खड़ी नजर आई. दोनों की नजरें जैसे ही मिलीं होंठों पर मुसकान तैर गई. साक्षी को तो यों लगा जैसे जीवन में बाहर आ गई हो. कामिनी को देख कालियों की तरह उस का रोमरोम खिल उठा. कामिनी तो वैसे के वैसी थी, बल्कि उस का रंगरूप और निखर गया था. जींस और टौप पहने थी. उम्र पर तो जैसे ब्रेक ही लगा लिया था उस ने. वह आज भी कालेज बाला सी लग रही थी.
दिल्ली की सड़कों पर कामिनी की कार दौड़ रही थी, जिसे वह खुद ड्राइव कर रही थी. बराबर में साक्षी बैठी थी और पीछे वाली सीट पर साक्षी का पति सौरभ.
‘‘जीजू क्यों नहीं आए तेरे साथ? अकेली क्यों चली आई?’’ साक्षी ने कामिनी के कंधे पर हाथ मारते हुए पूछा.
‘‘अरे यार, यह दिल्ली है. यहां सब अपनेअपने हिस्से की लाइफ जीते हैं,’’ कामिनी ने आंखें तरेरते हुए जवाब दिया.
‘‘क्या जीजू से बनती नहीं तेरी?’’ साक्षी ने सवाल किया.
‘‘अरे, नहीं यार. ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल, वैभव रात को देर से आते हैं. आने के बाद भी कंप्यूटर पर काम निबटाते हैं, तो सुबह जल्दी नहीं उठ पाते,’’ कामिनी ने कहा.
‘‘अच्छा… यह तो बड़ी दिक्कत है भई.’’
‘‘दिक्कत क्या है साक्षी? अब तो रूटीन लाइफ हो गई है,’’ कामिनी ने कहा.
दोनों की बातचीत में रेलवे स्टेशन और घर के बीच का रास्ता कब कट गया पता ही नहीं चला. कामिनी का घर, घर नहीं एक महल था. कई लग्जरी गाडि़यां खड़ी थीं. घर के बाहर गार्ड, माली अपने काम में लगे थे. जैसे ही गाड़ी रुकी, गार्ड ने बड़ा सा दरवाजा खोला. कामिनी कार को सीधा कोठी के अंदर ले गई. कार जैसे ही रुकी, 2 नौकर दौड़ कर पास आए. यह सब देख साक्षी को कामिनी से एक पल के लिए ईर्ष्या हुई कि क्या ठाट हैं यार इस के.
‘‘गाड़ी का सामान निकालो और गैस्ट हाउस में ले जाओ,’’ कामिनी ने नौकरों को आदेश दिया.
‘‘आओ साक्षी, जीजू प्लीज, आप भी आइए,’’ कामिनी ने कहा.
साक्षी और सौरभ देखते रह गए. उन्होंने इधरउधर नजरें दौड़ाईं. सब कुछ व्यवस्थित नजर आया. सौरभ ने साक्षी को कुहनी मारी और इशारों में कहा कि देखा क्या ठाट हैं, उन्हें लगा वे किसी फिल्मी सैट पर आ गए हैं. अब तक इस तरह का बंगला, गाडि़यां फिल्मों में ही देखी थीं इन्होंने.
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कोरोना की दूसरी लहर के दौरान रेवती को एक दिन अचानक कुछ कोरोना के लक्षण प्रतीत हुए तो हॉस्पिटल में एडमिड रहना पड़ा, 1सप्ताह बाद जब घर आयीं तब तक उनकी लगभग समस्त जमापूंजी इलाज पर खर्च हो चुकी थी क्योंकि उनके परिवार का कोई मेडिकल बीमा नहीं था.
कोरोना के कारण राजाराम जी की अचानक मृत्यु हो गयी. उनके जाने के बाद जब ऑफिसियल और इंश्योरेंस क्लेम करने के लिए कागजों की तलाश की गई तो पता चला कि उन्होंने किसी को अपना नॉमिनी ही नहीं बनाया था. इससे क्लेम मिलने में देरी तो हुई ही साथ ही नॉमिनी रजिस्टर करवाने के लिए अनावश्यक रूप से अनेकों ऑफिसों के चक्कर भी लगाने पड़े सो अलग.
अस्मिता के घर में वित्तीय मामले उसके पति ही सम्भालते थे. उसे न तो इन्वेस्टमेंट के बारे में कोई जानकारी थी और न ही सेविंग्स के बारे में एक दिन अचानक उसके पति को हार्टअटैक आया और वे चल बसे. उनके जाने के बाद सब कुछ समझने में उसे काफी वक्त लग गया दूसरों की अनावश्यक मदद तो लेनी ही पड़ी साथ ही कई प्लान्स की तो किश्तें भी लेट हो गई जिसके कारण पेनॉल्टी भरनी पड़ी.
हमारे सामाजिक ढांचे में आमतौर पर भारतीय परिवार पुरुष प्रधान होते हैं घर के आर्थिक मामलों का हिसाब किताब वे ही रखते हैं. इसके अतिरिक्त कई परिवारों में जब पति अपनी पत्नियों को इस बाबत जानकारी देना भी चाहते हैं तो वे, “हमें वैसे ही घर के क्या कुछ कम काम हैं जो अब ये भी सम्भालें कहकर झिटक देतीं हैं.” परन्तु कोरोना जैसे छोटे से वायरस ने मानव जीवन की अनिश्चितता को पूरी दुनिया के सामने ला खड़ा किया है. कब परिवार पर कोरोना कहर बनकर टूट पड़ेगा ये कोई भी नहीं जानता इसलिए वर्तमान परिदृश्य में घर का वित्तीय प्रबंधन करना बेहद आवश्यक है जिसमें बचत, मेडिकल बीमा और इन्वेस्टमेंट जैसे मुद्दे अवश्य शामिल हों.
-परिवार को जानकारी देना है आवश्यक
अपने बचत खाते, डिपॉजिट, लॉकर, क्रेडिट कार्ड प्रोविडेंट फण्ड , लोन, इन्वेस्टमेंट आदि के बारे में अपने जीवन साथी , बच्चों, माता पिता अथवा किसी भरोसेमन्द को अवश्य बताएं. इस सम्बंध में सी ए रविराज जी कहते हैं, “एक डायरी में सभी इन्वेस्टमेंट, बैंक खाते, उनके पिन, और भविष्य में जमा की जाने वाली किश्तों के बारे में विस्तृत विवरण लिखा जाना चाहिए और इसके बारे में परिवार के प्रत्येक सदस्य को जानकारी होना चाहिए ताकि वक़्त पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके.”
-नामांकन करें
पासबुक, एफ डी या आपका अन्य कोई भी इन्वेस्टमेंट हो सभी जगह पर अपनी पत्नी या बच्चों को नॉमिनी अवश्य बनाएं ताकि आपके जाने के बाद क्लेम लेने में किसी भी प्रकार की परेशानी न आये. इसके साथ ही नॉमिनी को अपडेट कराना भी बेहद आवश्यक है क्योंकि विवाह से पूर्व आमतौर पर युवा अपने माता पिता को नॉमिनी बनाते हैं, इसके अतिरिक्त कई बार जीवन के उत्तरार्द्ध में जीवनसाथी की मृत्यु हो जाती है ऐसे में अपडेट के अभाव में क्लेम लेने में परेशानी आती है
– अपनी वसीयत बनाएं
आपके जाने के बाद आपकी परिसंपत्तियों को लेकर परिवार के सदस्यों में कोई झगड़ा या मनमुटाव न हो इसके लिए वसीयत बनवाना अत्यंत आवश्यक है. कोरोना के इस भयावह काल में अनेकों बच्चों के माता पिता दोनों की मृत्यु हो गयी ऐसे में बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वसीयत बनाना अत्यंत आवश्यक है जिससे बच्चों की समुचित देखभाल के लिए आप परिवार के विश्वसनीय व्यक्ति को नियुक्त कर सकें
-मेडिकल बीमा करवाएं
आजकल अनेकों बीमा कम्पनियां मेडीकल बीमा करतीं हैं आप अपनी सुविधानुसार परिवार का बीमा करवाएं इससे आपकी बीमारी पर होने वाला खर्च काफी कम हो जाता है, चूंकि इसका प्रीमियम साल में एक बार ही देना होता है इसलिए आसानी से इसे भरा जा सकता है.
-मेडिकल बजट बनाए
आजकल बीमार पड़ने पर पैथोलॉजिकल टेस्ट्स, डॉक्टर की फीस आदि पर बहुत खर्च आता है, आवश्यकता पड़ने पर इन खर्चों को सहजता से मैनेज करने के लिए घर का मेडिकल बजट बनाएं इसमें आप अपनी आय का कुछ भाग प्रतिमाह अवश्य जमा करें ताकि जरूरत पड़ने पर इस अतिरिक्त खर्च को आसानी से मैनेज किया जा सके.
रेटिंगः एक स्टार
निर्माताः वीनस वल्र्डवाइड इंटरटेनमेंट
निर्देशकः प्रियदर्शन
कलाकारः परेश रावल, शिल्पा शेट्टी, आशुतोष राणा, मिजान जाफरी, प्रणिता सुभाष, टीकू टलसानिया, जॉनी लीवर, राजपाल यादव, मनोज जोशी व अन्य.
अवधिः दो घंटे 36 मिनट
ओटीटी प्लेटफार्मः हॉट स्टार डिजनी
मशहूर फिल्मसर्जक प्रियदर्शन हमेशा अपनी सफल मलयालम फिल्मों का ही हिंदी रीमेक बनाते रहे हैं. इस बार वह अपनी 1994 की सफल मलयालम हास्य फिल्म ‘‘मिन्नारम’’का हिंदी रीमेक ‘‘हंगामा 2’’लेकर आए हैं, जिसे 2003 की उनकी सफलतम हिंदी फिल्म ‘हंगामा’का सिक्वअल बताया जा रहा है. दो घंटे 36 मिनट लंबी हास्य फिल्म ‘हंगामा 2’’देखकर हंसी आती ही नही है.
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कहानीः
कहानी के केंद्र में दो परिवार हैं. एक परिवार वकील राधे तिवारी( परेश रावल) और उनकी पत्नी अंजली( शिल्पा शेट्टी) का है. और दूसरा परिवार तिहाड़ जेल में सुपरीटेंडेंट रहे कपूर( आशुतोष राणा ) का है. कपूर के परिवार में उनके दो बेटे अमन(रमन त्रिखा ) और आकाश(मिजान जाफरी) तथा एक बेटी है. अमन की पत्नी श्वेता(नायरा शाह) हैं. अमन के तीन बेटे व एक बेटी छोटे है और वह अपने दादाजी कपूर के साथ ही रहते हैं. कपूर के घर मे रसोइया नंदन(टीकू टलसानिया) है. अमन व श्वेता विदेश में रहते हैं. अमन व श्वेता के बीच तलाक होते होते बचा है. इधर कपूर ने अपने दूसरे बेटे आकाश का विवाह अपने मित्र बजाज(मनोज जोशी ) की बेटी सिमरन के साथ तय कर दी है. अमन की जिंदगी व कैरियर को सुधारने के लिए कपूर अपने मित्र बजाज से दस करोड़ रूपए उधार भी मागते हैं. आकाश व सिमरन की सगाई होने से पहले ही एक दिन वाणी(प्रणिता सुभाष ) एक छोटी बच्ची गहना के साथ कपूर के घर पहुंचती है और दावा करती है कि वह आकाश की पत्नी तथा गहना आकाश की बेटी है. आकाश यह स्वीकार करता है कि कालेज में वह वाणी से प्यार करता था. उनके इस प्यार कीक हानी से कालेज कैंटीन का मैनेजर पोपट (राजपाल यादव ) वाकिफ है. मगर उसने वाणी से शादी नही की है. वाणी धमकी देती है कि न्याय न मिलने पर वह कपूर के घर के बाहर बैठकर धरना देगी. मामले को सुलझाने तक कपूर, वाणी को अपने घर में रहने के लिए कह देते हैं और सच का पता लगाना शुरू करते हैं. इस बीच वह वाणी का सच बजाज से भी छिपाने की कोशिश करते रहते हैं. आकाश इस मुसीबत से बचने के लिए अंजली की मदद लेता है. कपूर, अंजली से कह देते हैं कि यह बात राधे तिवारी को भी पता न चले. राधे छिपकर अंजली व आकाश की बातें सुनकर अंदाजा लगाता है कि उसकी पत्नी अंजली, आकाश के बेटे क मां बनने वाली है. अब राधे, आकाश की हत्या करना चाहता है. उधर आकाश अपने तरीके से वाणी से छुटकारा पाना चाहता है. . पर हर बार असफलता ही हाथ लगती है.
लेखन व निर्देशनः
इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसके पटकथा लेखक युनुस सजावल और निर्देशक प्रियदर्शन हैं. इसके अलावा कई किरदारों में कलाकारों का गलत चयन भी कमजोर कड़ी है. इसका अहसास इसी बात से लगाया जा सकता है कि मलयालम फिल्म में जिस किरदार को मोहनलाल ने निभाया था, उसी किरदार में यहां मिजान हैं. निर्देशक प्रियदर्शन इस बात को भूल गए कि मलयालम भाषी और हिंदी भाषी दर्शकों की रूचि अलग है. हिंदी रीमेक करते समय कुछ बदलाव करने चाहिए थे, प्रियदर्शन अतीत में अपनी हर फिल्म के साथ ऐसा करते रहे हैं. मगर इस बार प्रियदर्शन ने अपनी मलयालम फिल्म ‘मिन्नारम’’का हिंदी रीेमेक करते समय सीन दर सीन फिल्मा डाला. मगर मलयालम फिल्म के इमोशनल कर देने वाले क्लायमेक्स को हिंदी में बदलकर फिल्म का बंटाधार कर दिया. इतना ही नही संवाद लेखक ने मलयालम फिल्म के संवादों का शब्दशः हिंदी में अनुवाद कर डाला. इससे ह्यूमर खत्म हो गया. कुछ संवाद अति घटिया व पुराने हैं. एक दो दृश्यों को नजरंदाज कर दें, तो हंसी आती ही नही है. फिल्म में कहानी के एक दो सब प्लॉट बेवजह ठूंसे हुए लगते हैं. इसमें जबरन ठूंसा हुआ हास्य जरुर है. पहली बार प्रियदर्शन ने अपने प्रशंसको को बुरी तरह से निराश किया है.
अभिनयः
पूरे 14 वर्ष बाद शिल्पा शेट्टी ने इस फिल्म से अभिनय में वापसी की है, मगर उनका वनवास खत्म नही हुआ. अंजली के किरदार के साथ न्याय करने में असफल रही हैं. राधे तिवारी के किरदार में परेश रावल भी नही जमे. परेश रावल की बॉडी लैंगवेज, उनके संवाद व उनकी हरकतों से हंसी नही आती. कपूर के किरदार में आशुतोष राणा काफी निराश करते हैं. आकाश के किरदार के लिए मिजान का चयन ही गलत रहा. मिजान को अभी अपने अभिनय को सुधारने के लिए कड़ी मेहनत करने की जरूरत है. मिजान के चेहरे पर भाव ही नही आते हैं. एक दृश्य है जब प्रणिता सुभाष आती है, उसे देखकर आकाश के चेहरे पर डर, गुस्सा, प्रणिता को पहचानते हुए भी न पहचानने का नाटक करने के भाव चेहरे पर एक साथ आने चाहिए थे, पर उनका चेहरा एकदम सपाट रहता है. यह निर्देशक की भी कमी है कि उसने ऐसे दृश्य को ओके कर दिया. वाणी के किरदार में प्रणिता सुभाष कुछ नही कर पायी. प्रणिता को अभिनय की ट्रेनिंग लेना चाहिए. टीकू टलसानिया के किरदार को ठीक से गढ़ा ही नहीं गया. जॉनी लीवर की प्रतिभा को जाया किया गया है. अक्षय खन्ना छोटे से किरदार में भी अपनी छाप नही छोड़ पाते. पोपट के किरदार में राजपाल यादव भी नही जमे. उनकी कॉमिक टाइमिंग भी गड़बड़ है. मनोज जोशी का भी अभिनय बहुत खराब है.
सब टीवी का पौपुलर कौमेडी सीरियल तारक मेहता का उल्टा चश्मा टीआरपी चार्ट्स में टौप 5 में बना रहता है. वहीं सीरियल के किरदार भी घर-घर में फेमस हो चुके हैं. हालांकि अभी तक दयाबेना यानी दिशा बेन शो से गायब हैं, जिसके चलते फैंस काफी दुखी रहते हैं. इसी बीच खबरें हैं कि बबीता जी के रोल में नजर आने वाली मुनमुन दत्ता शो छोड़ने वाली हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…
विवादों के चलते सुर्खियों में हैं बबीता जी
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बीते दिनों एक विवाद के कारण सुर्खियां बटोरने वाली एक्ट्रेस मुनमुन दत्ता सीरियल से गायब हैं, जिसके चलते फैंस कयास लगा रहे हैं कि कही बबीता जी ने भी तो शो को अलविदा कह नही दिया है. दरअसल, कोरोना के चलते महाराष्ट्र में शूटिंग बैन होने की वजह से कलाकारों और क्रू को दमन में शिफ्ट किया गया है. वहीं मुनमुन दत्ता इसलिए शूटिंग का हिस्सा नहीं बनी थीं. लेकिन बावजूद इसके कास्ट के मुंबई लौटने के बावजूद सेट पर वापस नहीं आई हैं.
शो छोड़ने की खबरें पर बोले प्रौड्यूसर
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खबरों की मानें तो कहा जा रहा है कि जातिवाचक शब्द का इस्तेमाल करने वाले विवाद के कारण बबीता जी यानी मुनमुन दत्ता सेट पर नहीं लौटी हैं. लेकिन इसी बीच सीरियल के प्रोडक्शन हाउस ने मुनमुन दत्ता के शो छोड़ने की खबरों को केवल अफवाह बताया है. दरअसल, तारक मेहता का उल्टा चश्मा के प्रोडक्शन हाउस और नीला फिल्म प्रोडक्शंस प्राइवेट लिमिटेड के मालिक असित कुमार मोदी ने इस खबर पर पुष्टि करते हुए कहा है कि “मुनमुन दत्ता बतौर बबीता जी तारक मेहता का उल्टा चश्मा का हिस्सा बनी हुई हैं. उनके शो छोड़ने के बारे में कोई भी अफवाहें निराधार और गलत हैं.”
बता दें, सीरियल की शुरुआत से ही बबीता जी के रोल में मुनमुन दत्ता को फैंस ने काफी पसंद किया है, जिसके चलते वह फैंस के बीच काफी पौपुलर हैं. वहीं जेठालाल के साथ उनकी कैमेस्ट्री फैंस को काफी पसंद आती हैं.
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बारिश के साथ ही मौसम की फिजा में घुल जाती है ठंडक और चारों तरफ हरियाली अपनी छटा बिखेर देती है. इस मौसम में हम अपने घरों की छोटी सी बगिया को भी नए पौधों से सजाते हैं आजकल फ्लैट कल्चर प्रचलन में है जहां पर अपने बागवानी के शौक को पूरा करने के लिए हमारे पास केवलबालकनी होती है. इसीलिए आजकल जमीन की अपेक्षा गमलों में ही पौधे लगाए जा सकते हैं.
आजकल बाजार में मिट्टी, सिरेमिक, सीमेंट और प्लास्टिक के विविध डिजाइन्स में गमले मौजूद हैं. पौधे लगाने से पूर्व प्रत्येक प्रकार के गमले की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है ताकि आप अपनी आवश्यकतानुसार गमले खरीद सकें.
मिट्टी के गमले
इनमें पानी की निकासी सुगमता से होती है इसलिए ये सभी प्रकार के पौधों के लिए उपयुक्त होते हैं. चूंकि ये पानी अधिक सोखते हैं इसलिए गर्मियों में इन्हें अधिक पानी की आवश्यकता होती है.
सीमेंट के गमले
पानी की निकासी तो आसानी से होती ही है परन्तु वजन में भारी होने के कारण इन्हें शिफ्ट करना मुश्किल होता है. छत के लिए ये गमले उपयुक्त नहीं होते.
प्लास्टिक के गमले
आजकल बाजार में इनकी भरमार है, ये भांति भांति के डिजाइन और रंगों में उपलब्ध हैं. वजन में हल्का होने के कारण इन्हें कहीं भी टांगा या रखा जा सकता है. अक्सर पानी की समुचित निकासी न हो पाने से पौधा सड़ने लग जाता है इसलिए इन्हें प्रयोग करने से पूर्व इनमें नीचे छेद करना उचित रहता हैं.
सिरेमिक और पीतल के गमले
इन्हें आमतौर पर कम रोशनी वाले इंडोर पौधों के लिए प्रयोग किया जाता है. इन्हें अधिक देखभाल और पर्याप्त सफाई की आवश्यकता होती है. मिट्टी और सीमेंट के गमलों की अपेक्षा इनकी कीमत अधिक होती है.
हैंगिग गमले
ये आमतौर पर प्लास्टिक के होते हैं इनमें छोटे और कम जगह घेरने वाली जड़ों के पौधों के लिए प्रयोग किया जाता है. बालकनी की रेलिंग या छत की बाउंड्री वाल के लिए ये उपयुक्त होते हैं.
रखें इन बातों का ध्यान
जब आप गमले खरीदने जाएं तो इन बातों का ध्यान अवश्य रखें-
-गुलाब के लिए सीमेंट या मिट्टी का ही गमला खरीदें ताकि पानी की समुचित निकासी हो सके क्योंकि इसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है.
-सेक्युलेन्ट अर्थात कैक्टस जैसे गूदेदार पौधों को आप किसी भी प्रकार के गमले में लगा सकते हैं क्योंकि इसे बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है.
-बोन्साई पौधों के लिए कम गहरे परन्तु चौड़े तसले या ट्रेनुमा गमले खरीदें ताकि इनकी जड़ों को फैलने की जगह मिल सके.
-लौकी, तोरई या पान के पौधों के लिए गहरे और चौड़े गमले लेना उचित रहता है.
-यदि आप पोर्च, बालकनी या लिविंग रूम जैसी कम धूप वाली जगह में गमले रखना चाहतीं हैं तो प्लास्टिक के गमले ले सकतीं हैं.
-इंडोर पौधों के लिए सिरेमिक या प्लास्टिक की डिजाइन वाले गमले उपयुक्त रहते हैं.
बारिश में अक्सर कुछ चटपटा खाने का मन करता है. नाश्ता हर गृहिणी के लिए अक्सर बहुत बड़ी समस्या होती है क्योंकि इसे हर सुबह या शाम को बनाना होता है इसलिए इसका पौष्टिक होना भी अत्यंत आवश्यक है. हमारे घरों में सैंडविच बनाने के लिए आमतौर पर ब्रेड का प्रयोग किया जाता है परन्तु एक तो मैदा से बनाई जाने के कारण दूसरे प्रिजर्वेटिव इत्यादि डाले जाने से इसका कम से कम प्रयोग किया जाना चाहिए. यूं भी पौष्टिकता के लिहाज ताजे खाद्य पदार्थ ही खाना चाहिए. इसी तारतम्य में आज हम आपको बेसन से सैंडविच बनाना बता रहे हैं. बेसन को मूलतः चने की दाल को पीसकर बनाया जाता है इससे अनेकों मिठाईयां, नाश्ते और सेव आदि नमकीन बनाये जाते हैं. तो आइए देखते हैं कि इसे कैसे बनाया जाता है-
कितने लोंगों के लिए 4
बनने में लगने वाला समय 30 मिनट
मील टाइप वेज
सामग्री
बेसन 1 कप
सूजी 1/4 कप
नमक स्वादानुसार
खाने वाला पीला रंग 1 चुटकी
मीठा सोडा 1/4 टीस्पून
तेल 2 टेबलस्पून
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सामग्री (फिलिंग के लिए)
बारीक कटी शिमला मिर्च 1
बारीक कटी गाजर 1
कटी हरी मिर्च 4
कटा हरा धनिया 1 टेबलस्पून
उबला मैश किया आलू 1
किसा चीज 2 टेबलस्पून
नमक 1/4 टीस्पून
लाल मिर्च 1/2 टीस्पून
चाट मसाला 1/4 टीस्पून
विधि
बेसन और सूजी को एक कप पानी में घोलकर 15 मिनट के लिए रख दें ताकि सूजी फूल जाए. भरावन की समस्त सामग्री को एक साथ मिला लें. अब बेसन के घोल में आधा कप पानी, सोडा, नमक और पीला रंग डालकर अच्छी तरह चलाएं. एक नॉनस्टिक पैन में तेल लगाकर तैयार बेसन के मिश्रण से मंदी आंच पर दोनों तरफ हल्का सा सेंककर पैनकेक बनाएं. इसी तरह सारे पैनकेक तैयार करें. 1 टेबलस्पून भरावन के मिश्रण को एक पैनकेक पर फैलाएं, ऊपर से दूसरे पैनकेक से कवर कर दें. एक नॉनस्टिक पैन में 1 चम्मच मक्खन लगाकर तैयार सैंडविच को रखकर ढक दें ताकि चीज मेल्ट हो जाये. पलटकर दूसरी तरफ से भी सेकें. बीच से काटकर टोमेटो सॉस के साथ सर्व करें.