Actress Sarika : अपनों ने ही दिया धोखा, कार में रात बिताने को हुईं मजबूर

Actress Sarika: बाल कलाकार के रूप में अपना कैरियर शुरू करने वाली सारिका ने ‘मास्टर सूरज’ नामक फिल्म में बतौर बाल कलाकार नजर आई थीं। उस के बाद फिल्म ‘गीत गाता चल’ में बतौर अभिनेत्री उन को पहचान मिली.1988 में सारिका ने ऐक्टर कमल हसन से शादी कर ली। इस से पहले वे कई सालों तक कमल हसन के साथ लिवइन रिलेशनशिप में थीं. उन की 2 बेटियां हैं श्रुति हसन और अक्षरा हसन. 2004 में सारिका का कमल हसन से तलाक हो गया और बाद में वे मुंबई में बस गईं. मुंबई में सारिका ने बतौर कौस्ट्यूम डिजाइनर अपनी अलग पहचान बनाई.

राष्ट्रीय पुरस्कार

सारिका को फिल्म ‘परजानिया’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया और फिल्म ‘हे राम’ के लिए सन 2000 में उन को सर्वश्रेष्ठ कौस्टयूम डिजाइनर का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

कमल हसन के साथ तलाक के बाद सारिका ने फिल्मों में फिर से वापसी की और कुछ फिल्मों में काम भी किया. जिन में से एक फिल्म अमिताभ बच्चन व अनुपम खेर और डैनी के साथ सूरज बडजात्या की फिल्म ‘ऊंचाई’ थी.

प्यार और धोखा

सारिका ने अगर प्रोफैशनल लाइफ में ढेर सारी प्रसिद्धि पाई तो पर्सनल लाइफ में सारिका को सिवाय धोखे के कुछ और नहीं मिला. सूत्रों के अनुसार सारिका बचपन से ही ऐक्टिंग कर रही थीं लेकिन सारे पैसे उन की मां के अकाउंट में ही जाते थे क्योंकि वे उस वक्त छोटी थीं और दुनियादारी और पैसे व अकाउंट को ले कर उन की समझ कम थी, लेकिन उन की मां ने सारी प्रौपर्टी अपने नाम से खरीदी और सारिका के लिए कुछ भी नहीं किया.

एक बार बुरे हालात के चलते सारिका जब एक किराए के मकान में रहने गईं तो उन को पता चला कि वह मकान उन की मां के नाम पर ही है। बचपन से काम करने के बावजूद सारिका के नाम पर कुछ भी नहीं था. जवानी में सारिका कमल हसन के प्यार में पड़ गईं और काफी समय तक लिवइन रिलेशनशिप में रहीं। 1988 में उन्होंने कमल हसन से शादी की और सारिका ने 2 बेटियों को जन्म दिया। इस के बाद सारिका को पता चला कि कमल हसन किसी साउथ इंडियन ऐक्ट्रैस के चक्कर में हैं और उन का साउथ इंडियन ऐक्ट्रैस से अफेयर चल रहा है। यह जान कर सारिका ने अपने घर की बालकनी से छलांग लगा दी, जिस में उन की मौत तो नहीं हुई लेकिन वे गंभीर रूप से घायल हो गईं।

कमल हसन को तलाक

कुछ समय बाद सारिका ने पति कमल हसन को तलाक दे दिया और कमल हसन का घर छोड़ दिया तब उन की बेटियों ने कमल हसन के साथ ही रहना मंजूर किया और सारिका को अकेले घर छोड़ना पड़ा. उस वक्त सारिका के पास पैसे नहीं थे, सिर्फ अपनी कार थी, जिस में रह कर उन्होंने कुछ दिन निकाले और फिर आखिरकार दोस्तों की मदद से वे मुंबई आ गईं और यहां पर उन्होंने नई जिंदगी शुरू की।

सामने आए दोस्त

बुरे वक्त में कुछ दोस्तों ने सारिका का साथ दिया, जिस के बाद सारिका ने बतौर कौस्टयूम डिजाइनर अपना नया काम शुरू किया और इस नए काम में भी उन्होंने ख्याति पाई और बतौर कौस्ट्यूम डिजाइनर फिल्म ‘हे राम’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हुईं.

पिछले दिनों उन्होंने सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘ऊंचाई’ में काम किया था, जिस में उन के साथ अमिताभ बच्चन, अनुपम खेर और डैनी मुख्य भूमिका में थे। कई सारी मुश्किलों और मुसीबतों के बाद भी सारिका ने कभी भी हार नहीं मानी और अपने बलबूते पर पूरी बहादुरी के साथ जिंदगी की जंग लड़ीं और आज भी पूरी बहादुरी के साथ एक अच्छी जिंदगी जी रही हैं.

Yami Gautam: दकियानूसी समाज से लड़ना हर महिला का हक है

Yami Gautam:  हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में 28 नवंबर, 1988 को जन्मी यामी गौतम बौलीवुड इंडस्ट्री में एक जानामाना नाम है. पंजाबी फिल्मों के निर्देशक मुकेश गौतम की बेटी यामी गौतम ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत बतौर मौडल की. यामी गौतम का पहला विज्ञापन फेयर ऐंड लवली क्रीम का था. इस के बाद यामी ने कई और प्रोडक्ट्स के लिए भी मौडलिंग की है जैसे शेवरलेट, कार्नेटो आदि कई ब्रैंड की यामी सैलिब्रिटी ऐंडोर्स हैं.

शुरुआती दिनों में मौडलिंग के बाद यामी ने छोटे परदे का रुख किया और पहला सीरियल ‘चांद के पार चलो’ से टीवी सीरियल में डेब्यू किया. इस सीरियल के बाद यामी ने एक और सीरियल में काम किया जिस का नाम ‘प्यार ना होगा कम’ था. हालांकि यामी गौतम अभिनय कैरियर में आने से पहले आईएएस औफिसर बनना चाहती थीं लेकिन बाद में उन्होंने वकील बनने के उद्देश्य से एलएलबी की पढ़ाई करने लगीं. मगर वह भी पूरी नहीं हो पाई क्योंकि उन का ध्यान अभिनय की तरफ चला गया.

हिंदी फिल्मों में आने से पहले यामी ने कन्नड़ फिल्म ‘उल्लास उत्साह’ से अभिनय में कदम रखा. कन्नड़ फिल्म के अलावा यामी तेलुगु फिल्मों में भी काम कर चुकी हैं. यामी ने 2012 में आयुष्मान खुराना के साथ जौन अब्राहम द्वारा निर्मित फिल्म ‘विक्की डोनर’ से अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत की. यामी गौतमी की पहली ही फिल्म ‘विक्की डोनर’ सुपर हिट रही. इस फिल्म के बाद यामी गौतम ने रितिक रोशन के साथ ‘काबिल’ फिल्म में काम किया और वह फिल्म भी अच्छी चली.

अगर यामी गौतम के पारिवारिक सदस्यों की बात करें तो यामी की बहन सुरीली गौतम भी बतौर हीरोइन पंजाबी फिल्म ‘पावर कट’ में अभिनय कर चुकी हैं. यामी का एक भाई भी है, जिस का नाम ओजस गौतम है. मां हाउसवाइफ हैं और अपने बच्चों के साथ ही समय बिताना उन को अच्छा लगता है, जिस के चलते यामी के मां बनने के बाद भी उन की मां ने बेटी का साथ नहीं छोड़ा और यामी के बेटे की परवरिश में भी सहयोग दिया.

हाल ही में यामी गौतम मुसलमान औरतों के हक को ले कर बनी फिल्म ‘हक’ में नजर आईं जो सच्ची कहानी पर आधारित है. इस फिल्म में तलाक के मुद्दे को ले कर शाहबानो की जिंदगी पर आधारित कहानी में यामी ने शाहबानो के किरदार को निभा कर मुसलिम औरतों पर तलाक के नाम पर चल रहे अत्याचारों को और मुसलिम औरत के हक की लड़ाई जो समाज से अपने हक के लिए लड़ती हैं.

अपने जरीए प्रस्तुत किया है. यामी गौतम ने इस किरदार को बखूबी निभाया. फिल्मों के मामले में क्वांटिटी से ज्यादा क्वालिटी को महत्त्व देने वाली यामी गौतम ने अपने अभिनय कैरियर में कई सारी बेहतरीन फिल्में दी हैं. हाल ही में यामी गौतम ने गृहशोभा को दिए इंटरव्यू में अपनी प्रोफैशनल और पर्सनल लाइफ को ले कर खुल कर बातें कीं.

पेश हैं, इसी सिलसिले पर यामी गौतम की जबानी उन की अभिनय कैरियर और पर्सनल जिंदगी की दिलचस्प कहानी:

मुसलिम औरत के हक और अधिकार को ले कर समाज से सवाल पूछने वाली मुस्लिम महिला की कहानी, मेरे लिए फिल्म ‘हक’ करने के पीछे की खास वजह थी…

औरतों के हक की लड़ाई, अपने अधिकारों  के लिए समाज से लड़ना हर औरत का हक है, इस बात का अंदाजा मुझे उस वक्त हुआ जब मैं ने ‘हक’ फिल्म में एक ऐसी औरत शाह बानो का किरदार निभाया जिस के पति ने अपनी पत्नी को अपने स्वार्थ के चलते न सिर्फ तलाक दे दिया बल्कि उसे उस के बच्चों सहित पैसेपैसे के लिए मुहताज भी कर दिया. शाहबानो की इस कहानी ने मुझे बहुत ज्यादा भावुक कर दिया क्योंकि इस कहानी के जरीए कई ऐसी औरतों का दर्द सामने आया जिन के पति तलाक के नाम पर न सिर्फ अपनी पत्नियों को घर से बेघर कर देते हैं बल्कि पैसेपैसे के लिए मुहताज कर देते हैं.

मगर शाहबानो एक ऐसी औरत थी जिस ने अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी और जीत भी हासिल की जो हर उस औरत के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो बुरे हालात के आगे मजबूरन हार मान लेते हैं. मुझे यह किरदार निभाने में बहुत अच्छा लगा क्योंकि यह किरदार औरतों के सशक्तीकरण का मजबूत उदाहरण है. मैं ने इस किरदार को निभाने के लिए खासतौर पर उर्दू भाषा भी सीखी और अपने इस किरदार को निभाने के लिए अपना सौ प्रतिशत दिया.

अपनी फिल्मों के लिए मिलने वाले अवार्ड को ले कर मुझे हुई निराशा…

मैं ने अपने अभिनय कैरियर में कुछ फिल्में ऐसी की हैं, जिन के लिए मुझे उम्मीद थी कि इन फिल्मों के लिए मुझे अवार्ड मिलेगा जैसेकि ‘आर्टिकल-370’ में मेरी परफौर्मैंस को सराहा गया. मेरा नाम नौमिनेशन में भी था. उस दौरान मुझे लगा था कि मुझे इस फिल्म के लिए अवार्ड मिलेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उस वक्त मुझे काफी निराशा हुई. हालांकि मुझे अपनी पहली फिल्म ‘विक्की डोनर’ के लिए बैस्ट डेब्यू का अवार्ड मिला था लेकिन उस के बाद कई फिल्मों के लिए नौमिनेशन में जाने के बावजूद मुझे कोई अवार्ड नहीं मिला.

एक कलाकार के लिए अवार्ड उस की काबिलीयत की पहचान होती है जो कलाकार को प्रोत्साहित करती है. इसलिए करीब हर कलाकार को अपनी परफौर्मैंस के लिए अवार्ड पाना अच्छा लगता है. मगर उस से भी ज्यादा जरूरी होता है पब्लिक का रिवार्ड पाना क्योंकि पब्लिक का रिवार्ड ही आप को फिल्मों में लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करता है. आज पब्लिक की वजह से ही मैं 12 सालों से हिंदी फिल्मों में सक्रिय हूं और अच्छे रोल निभाने का मुझे मौका भी मिल रहा है. यह भी मेरे लिए सुकून की बात है.

प्रोडक्शन हाउस और डाइरैक्शन के बारे में…

फिलहाल मेरा डाइरैक्शन का कोई इरादा नहीं है क्योंकि परिवार, आदित्य धर और ऐक्टिंग कैरियर संभालना मेरी प्रायौरिटी है. लेकिन मैं अपने पति आदित्य धर के प्रोडक्शन हाउस बी 62 स्टूडियो में सक्रिय रहती हूं. हमारे इस स्टूडियो में फिल्म निर्माण का कार्य होता है. हाल ही में रिलीज ‘धुरंधर’ के बाद अब अगली फिल्म ‘धूमधाम’ के लिए काम चल रहा है,. मैं इस बी 62 स्टूडियो प्रोडक्शन हाउस के साथ बतौर अभिनेत्री जुड़ी रहती हूं और मेरी तरफ से जो भी मुमकिन मदद होती है वह मैं करती हूं.

मैं अपनी फिल्मों का चुनाव डाइरैक्टर या हीरो देख कर नहीं बल्कि कहानी और किरदार देख कर करती हूं…

मैं ने अपने अभिनय कैरियर में बहुत ज्यादा फिल्में नहीं की हैं लेकिन जितनी भी की हैं दर्शकों ने उन फिल्मों में मेरे किरदार को याद रखा है और कहानी दमदार होने की वजह से मेरे द्वारा अभिनीत फिल्में भी दर्शकों द्वारा पसंद की गई हैं. फिर चाहे वह मेरी पहली फिल्म ‘विक्की डोनर’ हो या हालिया रिलीज फिल्म ‘हक’ हो, मुझे अपनी फिल्मों के जरीए दर्शकों का हमेशा प्यार मिला है. इस के पीछे खास वजह यही है कि मैं जब भी कोई फिल्म साइन करती हूं तो मेरा ध्यान फिल्म की कहानी और अपने किरदार पर केंद्रित होता है. मैं ने कई सारी फिल्में रिजैक्ट की हैं, जिन की कहानी में दम नहीं था और मुझे अपना किरदार भी पावरफुल नहीं लगा था.

अगर किसी फिल्म में मेरा किरदार छोटा है लेकिन महत्त्वपूर्ण है और उस की कहानी भी दमदार है तो वह रोल भी निभाना मैं कबूल कर लेती हूं जैसे राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘सरकार 3’ में मेरा रोल ज्यादा बड़ा नहीं था लेकिन दमदार था. लिहाजा ‘सरकार 3’ में मैं ने छोटा रोल भी स्वीकार लिया. ऐसी ही कुछ और फिल्में हैं जिन में मैं मुख्य हीरोइन नहीं थी लेकिन मेरा रोल अच्छा था तो मैं ने वह किरदार निभाने से इनकार नहीं किया.

अपनी पसंदीदा फिल्मों के बारे में…

वैसे तो मेरी हर फिल्म मेरे दिल के करीब है लेकिन आयुष्मान खुराना के साथ पहली फिल्म ‘विक्की डोनर’ मेरी पसंदीदा फिल्म है क्योंकि यह मेरी पहली हिंदी फिल्म है और इस फिल्म के बाद मेरे कैरियर में एक बड़ा उछाल आया. इन फिल्मों के अलावा ‘ओएमजी 2’ जिस में मैं ने वकील का किरदार निभाया है और फिल्म ‘हक’ जिस में मुझे मुसलिम औरतों के हक की लड़ाई लड़ने का मजबूत किरदार निभाने का मौका मिला, ये दोनों ही फिल्में समाज को एक शिक्षाप्रद मैसेज देती हैं. इसलिए मुझे इन फिल्मों में काम करने में अच्छा लगा.

इन फिल्मों के अलावा रितिक रोशन के साथ फिल्म ‘काबिल’ अपने पति आदित्य धर की फिल्म ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ जो देशभक्ति पर आधारित है, बदले की भावना पर केंद्रित ‘बदलापुर’ मेरी पसंदीदा फिल्मों में से हैं. इन फिल्मों में काम कर के मुझे बतौर अभिनेत्री काफी कुछ सीखने को मिला.

बौलीवुड हीरोइन के 8 घंटे ही काम करने को ले कर यामी गौतमी ने दीपिका पादुकोण का समर्थन किया…

हाल ही में दीपिका पादुकोण ने कुछ फिल्में इसलिए छोड़ दीं क्योंकि उन की फिल्म करने को ले कर शर्त थी कि न्यू बौर्न बेबी और परिवार की जिम्मेदारी के चलते दीपिका किसी भी फिल्म के लिए 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करेंगी. दीपिका ने इस शर्त के चलते कुछ बड़ी फिल्में करने से इनकार कर दिया. हाल ही में इसी बारे में जब यामी गौतमी से सवाल किया गया क्योंकि वे भी एक बच्चे की मां हैं और शादीशुदा परिवार वाली हैं, तो ऐसे में यामी गौतम ने दीपिका का समर्थन करते हुए कहा कि यह एक ऐक्टर, डाइरैक्टर और प्रोड्यूसर की सम?ा पर निर्भर करता है.

हर इंसान अपने हिसाब से काम करने के लिए स्वतंत्र है क्योंकि यह एक हीरोइन ने कहा है. इसलिए इसे मुद्दा बनाना गलत है क्योंकि हर मां अपने बच्चों के लिए समय निकालना चाहती है और यह उस का हक है क्योंकि वह एक हीरोइन होने के साथसाथ एक मां और एक पत्नी भी है जिस वजह से उस की घर के प्रति भी जिम्मेदारियां हैं. ऐसे में काम और परिवार के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए उस का अपनी शर्त पर काम करना जरूरी है. हालांकि फिल्म इंडस्ट्री में लोकेशन, परमिशन और अन्य तकनीकी कारणों की वजह से समय सीमा तय करना मुश्किल होता है लेकिन यह असंभव भी नहीं है.

बौलीवुड में पक्षपात के चलते शुरुआती दिनों में संघर्ष का सामना करना पड़ा…

अपने कैरियर के शुरुआती दिनों में मैं ने इस बात का एहसास किया कि फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए कलाकारों के मुकाबले बाहर से आए कलाकारों को काम पाने के लिए ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है. मुझे भी शुरुआती दिनों में फिल्मों में काम पाने के लिए संघर्ष करना पड़ा था. यहां तक कि मेरी पहली फिल्म ‘विक्की डोनर’ की सफलता के बावजूद मुझे कई फिल्मों के लिए औडिशन देना पड़ा, जबकि अन्य हीरोइनों को औडिशन नहीं देना पड़ता था. मगर उस दौरान भी मैं ने हार नहीं मानी और अपना काम ईमानदारी से करती रही.

आखिरकार जब मुझे रितिक रोशन के साथ ‘काबिल’ फिल्म मिली तो मुझे बहुत खुशी हुई और लगा जैसे मुझे मेहनत का फल मिल गया. धीरेधीरे ही सही मैं सफलता की सीढि़यां चढ़ती गई. इस से मैं ने यही सीखा कि अगर आप का काम अच्छा है, आप अपने काम के प्रति ईमानदार हैं तो आप को सफल होने से कोई नहीं रोक सकता.

प्रसिद्ध डाइरैक्टर आदित्य धर से प्यारमुहब्बत के बाद अचानक झटपट शादी के बारे में…

आदित्य धर से मेरी मुलाकात ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ के दौरान हुई थी. इस फिल्म के प्रमोशन के दौरान हम एकदूसरे के करीब आए थे. यहीं से हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई थी जो बाद में प्यार में बदल गई. हमारी दोस्ती को 2 साल हो गए थे तो हम ने सोचा कि परिवार वालों को बता देते हैं और हम सगाई कर लेते हैं. जब मैं ने अपने परिवार से आदित्य को मिलवाया तो मु?ा से ज्यादा मेरे परिवार वाले खुश थे.

हमारा इरादा सगाई करने का था और कुछ महीनों बाद शादी की प्लानिंग थी. लेकिन मेरी नानी ने कहा कि हमारे हिमाचल में सगाई का रिवाज नहीं है, इसलिए हमें डाइरैक्ट शादी ही करनी पड़ेगी. उस वक्त आदित्य ने मुझ से पूछा कि क्या मैं शादी के लिए तैयार हूं? मैं ने हामी भर दी और इस तरह बिना किसी प्लानिंग के

4 जून, 2021 को हमारी शादी हो गई. शादी इतने शौर्ट नोटिस में हुई कि मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मेरी शादी हो गई है.

हमारी शादी इतनी जल्दबाजी में हुई की शादी का मेकअप भी मैं ने खुद ही किया था और अपनी नानी की दी हुई हिमाचली नथनी खासतौर पर पहनी थी. हमारी शादी में बहुत कम लोग आए थे इसलिए सादे ढंग से लेकिन सारी रस्मों के साथ हमारे होमटाउन बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश में मेरे परिवार के सामने पूरे रीतिरिवाज के साथ मेरी शादी हो गई.

हाल ही में रिलीज ‘धुरंधर’ से लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने वाले आदित्य धर की यामी गौतम से मुलाकात ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ के दौरान हुई थी. यामी के अनुसार हमारी अच्छी दोस्ती हो गई थी जो आगे बढ़ती गई. यामी बताती हैं कि आदित्य उन्हें एक शांत धैर्यवान और सम्मानित निर्देशक लगे एक पत्नी के तौर पर नहीं बल्कि एक ऐक्ट्रैस के तौर पर भी मै कह सकती हूं कि आदित्य धर उन निर्देशकों में से एक हैं जो सम्मान मांगते नहीं बल्कि अपने काम से सम्मान पाते हैं. पर्सनली आदित्य बहुत ही शांत स्वभाव के हैं. मैं ने कभी उन्हें अपना आपा खोते नहीं देखा. मुश्किल वक्त में भी उन्होंने कोई न कोई रास्ता निकाल लिया. यही वजह है कि हमें शादी के लिए भी एकदूसरे की परमिशन लेने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि हम एकदूसरे के दिल की बात जानते थे.

शादी के बावजूद मैं ने हमेशा परिवार, निजी जीवन और ऐक्टिंग कैरियर के बीच संतुलन बनाए रखा…

ऐक्टिंग हमेशा से मेरा पैशन रहा है इसलिए ऐक्टिंग कभी भी न छोड़ने का मेरा निर्णय रहा है. शादी के बाद भी मैं ने अपने ऐक्टिंग कैरियर को सीरियसली लिया क्योंकि अभिनय मेरा पैशन है. एक औरत जब शादी के बाद मां बनती है तो उस की बहुत सारी चीजें पीछे छूटने लगती हैं क्योंकि शादी के बाद परिवार, बच्चा, पति की जिम्मेदारी आ जाती है. मगर अगर मैं अपनी बात करूं तो अपने पति आदित्य की वजह से मुझे कभी इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि मैं शादीशुदा और एक बच्चे की मां बन चुकी हूं.

इस के पीछे खास वजह यह है कि आदित्य के परिवार वालों ने और मेरी मां और मेरे घर वालों ने मुझे पूरा सपोर्ट दिया. शूटिंग के लिए जाते वक्त या बच्चे को घर में अकेला छोड़ कर जाते वक्त मुझे इस बात की टैंशन नहीं थी कि मेरे बिना बच्चा अकेला कैसे रहेगा क्योंकि मेरे बेटे को संभालने के लिए मेरी मां ने हमेशा मेरा साथ दिया क्योंकि आदित्य और उन के घर के लोग बहुत सपोर्टिव हैं और मेरे परिवार वाले भी मुझे बहुत सपोर्ट करते हैं इसलिए मेरा बेटा कब बड़ा हो गया, मुझे पता ही नहीं चला.

बेटे वेद विद के जन्म के बाद परिवार के सहयोग की वजह से कोई टैंशन नहीं हुई. अपने काम और मातृत्व कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखने में मैं कामयाब हो पाई और शादी और मां बनने के बाद भी मैं फिल्मों में काम कर रही हूं और अपना 100% देने की कोशिश कर रही हूं.

Yami Gautam

Accident: बहस करना गलत है

Accident: सरकार अपने लंबेचौड़े ऐक्सप्रैस वे की खुदबखुद तारीफ करती रहती है और हर अखबार में बारबार 4 लेन, 6 लेन, 8 लेन के हाईवे के उद्घाटनों के फोटो छपते रहते हैं पर ये ऐक्सप्रैस वे जानलेवा भी बनते जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश में भगवानों की नगरी की भगवानों द्वारा दी गई सेफ्टी के बावजूद मथुरा, वृंदावन के पास यमुना ऐक्सप्रैस वे पर दिसंबर के मध्य में कुहरे के कारण 2 गाडि़यों में टक्कर हो गई.

इन कारों के ड्राइवर बीच सड़क में कारें खड़ी कर के उतर कर बहस करने लगे तो पीछे से एकएक कर के कई गाडि़यों ने तेज रफ्तार में इन खड़ी कारों में टक्कर मार दी. इन में बसें और ट्रक भी शामिल थे. कम से कम 13 व्हीकल इस हादसे के शिकार हुए. 13 मरे, 100 घायल हुए. कुहरा तो था ही उस से ज्यादा बेवकूफी रही कि पहली 2 कारों के मालिकों ने सुबह 4 बजे सड़क पर बहस करनी शुरू की कि गलती किस की थी. जब दिखना कम हो, बंद गाडि़यों की लाइटें भी बंद हों या टूट चुकी हों तो पीछे से आ रही तेज रफ्तार की गाडि़यों का पाइल अप होना कोई इंपौसिबल बात नहीं है.

ऐक्सप्रैस वे पर चलने का डिसिप्लिन कुछ और होता है पर यहां के लोगों ने तेज रफ्तार वाली गाडि़यां तो खरीद लीं पर यूरोप, चीन, जापान, अमेरिका जहां इन कारों और बसों को डिजाइन किया गया है, वहां का डिसिप्लिन नहीं सीखा. डिजाइनर यह तो सोच कर चलते हैं कि कार, बस ड्राइवर कुछ समझदारी से काम लेंगे पर यहां हर तरह की सेफ्टी को छोड़ कर एक लाल रंग का कपड़ा बांध लेना या किसी देवीदेवता की मूर्ति को डैशबोर्ड पर चिपका लेना ही काफी समझ जाता है.

ऐक्सीडैंट कहीं भी कभी भी हो सकते हैं पर सब से पहले बहसकरना ही गलत है पर इस देश में जहां हर समय कानून की परवाह न करना सिखाया जाता है और झठ व फरेब ही नहीं, दूसरों को तरहतरह की गालियां देना भी धर्म का हिस्सा है वहां ऐक्सीडैंट होने पर समस्या सुलझने की जगह ब्लेम गेम शुरू हो जाता है. कुछ लोग तो गाडि़यों में लकड़ी व लोहे के डंडे रखते हैं और ऐक्सीडैंट कर के पैसा बनाने के लिए जान से मारने की धमकियां तक देते हैं.

यह मौडर्न जमाने का सड़कों के लिए एक खतरनाक रवैया है पर भगवान के आसरे रहने वालों को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सही कौन है, गलत कौन है. उन्हें बचपन से रामायण और महाभारत की कहानियों से सिखाया गया है कि सच्चा वह होता है जो जीतता है. रामायण और महाभारत की कथाओं को सत्य की जीत के रूप में पेश किया जाता है बिना लौजिक का इस्तेमाल किए. इन दोनों कथाओं में छलफरेब भी भरा है. जनता जिस की आज की चैलेंज केवल यह धर्म की बकवास रह गई है, अपने आसपास के विवाद बिना लौजिक के, केवल वायलैंस से, सुलझाना चाहती है.

ओसामा बिन लादेन ने न्यूयौर्क के वर्ल्ड ट्रेड सैंटर पर हमला करवा कर दिया, इस से इसलाम को क्या मिला? क्या दुनिया के एक भी देश में इसलाम पहले से ज्यादा खुशियां ला कर मजबूत हुआ? ऐक्सीडैंट होने पर सब से पहले गलती किस की थी की जगह खड़ी हुई समस्या को सुलझाना चाहिए, रास्ता खाली कराना चाहिए, घायलों का इलाज कराना चाहिए, दूसरों को तकलीफ न हो यह देखना चाहिए, अपनों की देखभाल और अपने सामान की सुरक्षा करनी चाहिए, मंदिर पास है तो कतई कोई गारंटी नही है कि कोई दिव्य शक्ति इस कार्य के लिए आएगी.

Accident

Overspending: समझदारी नहीं सिर्फ खर्च करना

Overspending: अमेरिका हो या भारत पूरा मीडिया इसी बात पर टिका है कि लोग जो भी काम कर के पैसे कमाएं, पूरा खर्च डालें. सभी कंपनियां, क्रैडिट कार्ड कंपनियां, एअरलाइंस, ट्रैवल एजेंसियां, धर्म का व्यापार करने वाले (जो शायद सब से बड़ा धंधा करते हैं) ग्राहकों को हर समय खर्च करते रहने को उकसाते हैं. सोशल मीडिया ने तो हद कर दी है. उस में हर रोज कुछ नया खर्च करने की ही सलाह दी जाती है मानो जिंदगी खर्च करने के लिए बनी है, कमाने के लिए नहीं.

असल में आधुनिक बिजनैस और इकौनोमिक्स इस तरह विकसित किए गए हैं कि एक वर्किंग क्लास है जो बहुत हद तक अनपढ़ है और जिसे सिर्फ जीने लायक पैसे दे कर सामान तैयार करने के लिए प्रिपेयर कर डाला गया है. आमतौर पर हर देश में ऐसा हो रहा है पर कुछ देशों में यह काम बाहरी, अलग धर्म वालों, अलग रंग वालों या समाज के फेल लोगों को दिया जाता है.

इन्हें कंट्रोल करने वालों को बिना निर्माण किए प्रोडक्शन में लगे लोगों को गाइड व कंट्रोल करने का काम दे दिया गया है और इन के पास कुछ पैसा बच जाता है. पहले ये लोग अपनी बचत मकान, गाड़ी, व्हाइट गुड्स खरीदने में लगाते थे और लग्जरी गुड्स कम खरीदते थे. अब अपने खरीदे मकान की जगह किराए के मकान में रहने की जम कर वकालत की जा रही है और सामान किस्तों में लेने व लोन पर लेने की.

आज खर्च, पैसा बाद में दो, खासा महंगा सौदा है पर इसे खूब बेचा जा रहा है. जो लोग पहले ही अपना दिमाग मोबाइलों की बकवास में बरबाद कर चुके हैं, वे नहीं समझ पाते कि इस ईएमआई से ही बड़ी कंपनियां अरबोंखरबों कमा रही हैं. हर ईएमआई के लिए जो लोन लिया जाता है वह बहुत सी कंपनियों में कंप्यूटरों के सौफ्टवेयरों से बंट जाता है. लोन की खरीदीबेची में लोग अरबों बनाते हैं पर वह कीमत कंज्यूमर ही देता है जो सामान खरीदता है.

हद तो यह है कि कुछ प्रोडक्ट मैन्यूफैक्चरर्स ईएमआई वालों को ही प्रैफर करते हैं और कागजों पर उन्हें सस्ते में पैसे लेते दिखाते हैं. चूंकि यह पैसा उन के पास है जो कमाई प्रोडक्शन से नहीं, शेयर बाजार, मिडलमैन, सौफ्टवेयर डैवलपमैंट, आर्मड फोर्सेज के लिए और्मामैंट्स, गवर्नमैंट कौंट्रैक्ट से कमाते हैं, वे जानते हैं कि उन की कमाई बंद नहीं होगी.

रिटेलरों को फर्क नहीं पड़ता कि ग्राहक कैसे खरीद रहा है क्योंकि उसे तो पैसे मिल चुके होते हैं, पर यह पक्का है कि वह भी नुकसान उठाता है जब कोई खास प्रोडक्ट नहीं बिकता जिस की डिमांड अचानक कम हो जाए. कंज्यूमर्स को यह भरोसा भी होना चाहिए कि अगले साल भरोसों के हैं. आज चीन के अलावा दुनिया का कोई देश नहीं है जहां कल का भरोसा है पर फिर भी लोग बचत करने की जगह खर्च पर खर्च कर रहे हैं. भारत में क्रैडिट कार्ड आउटस्टैंडिंग तेजी से बढ़ रही है. गोल्ड लोन तेजी से लिए जा रहे हैं.

यह फ्यूचर के लिए खतरा है. प्रैजेंट में मजे से जीयो का प्रिंसिपल अच्छा है पर याद रखें कि गढ़ा धन नहीं होगा तो सुसाइडों की नौबत आ जाएगी.

Overspending

Muscular Women: मजबूत लड़कियां आज की जरूरत

Muscular Women: अब औरतें साइंस का इस्तेमाल अपनी जवानी को बरकरार रखने, ऐनर्जी बनाए रखने, सैक्सी बने रहने और मसल्स बनाने के लिए करने में हिचक नहीं रही हैं. पहले जो बात केवल मर्दों के लिए होती थी अब औरतों के लिए भी होने लगी है कि उन की मसल्स कितनी हैं, कितनी मजबूत हैं, इस के लिए टेस्टोस्टेरौन हारमोन लेना शुरू कर दिया गया है जिसे पहले केवल मर्द लेते थे.

हालांकि अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि टेस्टोस्टेरौन लेने से लंबे समय तक फायदा होता है पर जैसेजैसे लड़कियां अपने बदन के साथ ऐक्सपैरिमैंट करने को तैयार हो रही हैं यह सब टैबू नहीं रह गया है तो देख लो, अच्छा हुआ तो ताकत आएगी नहीं तो देखा जाएगा. दुनियाभर की औरतें आदमियों की मसल्स पावर से परेशान हैं और वे नेचर को बदलने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं.

सदियों से समाज ने शायद जानबूझ कर मसकुलर लड़कियों को गरीबी में धकेल कर लगभग मार डाला है कि आज जो लड़कियां पैदा होती हैं उन्हें प्यार तब ही मिलता है जब वे सौफ्ट और दुबलीपतली होती हैं. उन्हें सदा गुडि़या सी बने रहने पर ही ईनाम मिलता रहा है. उन के लिए ही बार्बीडौल का इजाद किया गया जो लंबी, छरहरी, बिना मसल्स वाली हैं. इन के मुकाबले लड़कों को सुपरमैन बनने की प्रेरणा मिली है. उन्हें सिक्सएब्स दिखाने को एनकरेज किया जाता रहा है.

लड़कियों को केवल ब्रैस्ट और हिप्स पर जोर देने को कहा गया जिन का न सैल्फ  डिफैंस में कोई चांस है न मेहनती काम में. अब अगर लड़कियां टेस्टोस्टेरौन ले कर सदियों की कमी को पूरा कर रही हैं तो उन्हें डिस्करेज करा जा रहा है और मैडिकल रिसर्च जानबूझ कर ऐसी तैयार कराई जा रही है कि लड़कियां आमतौर पर टेस्टोस्टेरौन जैसी मैडिकल हैल्प न लें जबकि  लड़कों को डब्बे भरभर कर मसल्स बिल्डिंग कैमिकल खिलाए जा रहे हैं.

मजबूत लड़कियां आज के युग की जरूरत हैं. अकेली रहती लड़की को घर के कामों में मसल्स की जरूरत होती है. उसे सामान उठाने के लिए हर बार बौयफ्रैंड को बुलाना पड़े जरूरी नहीं. टैक्नोलौजी ने आज मेलफीमेल का अंतर कम कर दिया है पर आज भी मेल डौमिनेटेड डिसीजन मेकर छोटेछोटे स्टैप ले कर लड़कियों के लिए बड़े स्पीड ब्रेकर लगा रहे हैं.

लड़कियों को हरगिज इस तरह की मैडिकल हैल्प लेने से डरना नहीं चाहिए. आज सुंदर दिखने, बिग ब्रैस्ट या बिग हिप्स वाली नहीं स्ट्रौंग मसल्स वाली बनना चाहिए चाहे जो कीमत देनी पड़े. अगर बौडी साथ देगी तो किसी मेल की हिम्मत न होगी कि वह रेप तो क्या जबरन किस भी कर सके.

Muscular Women

Moisture Maintenance: चेहरे की नमी के लिए क्या है सही स्किनकेयर

Moisture Maintenance: सर्दियां शुरू होते ही त्वचा पर रूखापन, बेजानपन और खिंचाव जैसी परेशानियां बढ़ जाती हैं. ठंडी हवा और कम नमी की वजह से स्किन अपनी प्राकृतिक चमक खोने लगती है. ऐसे मौसम में त्वचा को हैल्दी, ग्लोइंग और मौइस्चराइज्ड रखने के लिए खास देखभाल और सही स्किनकेयर रूटीन अपनाना जरूरी है. इसलिए जरूरी है कि हमें पता हो कि क्या करें और क्या न करें.

क्या करें

नमी का खयाल रखें: सर्दियों में स्किन का ग्लो बनाए रखने के लिए सब से अहम है- हाइड्रेशन यानी ऐसे प्रोडक्ट चुनें जिन में ह्यालूरोनिक ऐसिड, ऐलोवेरा, ग्लिसरीन या शिया बटर हो. ये त्वचा को भीतर तक नमी देते हैं, ड्राई पैच हटाते हैं और स्किन को मुलायम बनाते हैं.

सौफ्ट क्लींजिंग अपनाएं: ठंड में धूल, मेकअप और पसीने की हलकी परत भी पोर्स बंद कर देती है, जिस से चेहरा रूखा और डल दिखने लगता है. हलके क्लींजिंग जैल या मिल्क क्लींजिंग का दिन में 2 बार उपयोग करें ताकि त्वचा साफ और फ्रैश रहे.

प्रकृति का फेशियल टच दें: सर्दियों में थकी और बेरौनक त्वचा को प्राकृतिक फेशियल से तुरंत ताजगी मिलती है. खीरा+गुलाब जल+मुलतानी मिट्टी वाला फेसपैक स्किन को ठंडक देता है और नैचुरल ग्लो लाता है.

हफ्ते में एक बार यह नैचुरल ट्रीटमैंट त्वचा की चमक बढ़ा देता है. ऐसे ही शहद में नीबू मिला कर उस पर लगाने से स्किन पर रूखापन कम होता है व स्किन मुलायम बनती है.

त्वचा को पोषण दें: अनियमित खानपान और ठंड की वजह से स्किन अपनी चमक खो देती है. ऐसे में विटामिन वाले सीरम, नारियल तेल या बादाम तेल की हलकी मसाज त्वचा को पोषण देती है और चेहरे में फिर से नूर भरती है.

पर्याप्त नींद और पानी जरूरी: सर्दियों में प्यास कम लगती है लेकिन शरीर और त्वचा को पानी की उतनी ही जरूरत होती है. दिन में 8-10 गिलास पानी और 7-8 घंटे की नींद त्वचा की अंदरूनी चमक को फिर से लौटाती है.

सनस्क्रीन कभी न भूलें: सर्दियों की हलकी धूप भी त्वचा पर टैनिंग और पिग्मैंटेशन कर सकती है. स्किन इस मौसम में ज्यादा सैंसिटिव हो जाती है, इसलिए हर 3-4 घंटे बाद सनस्क्रीन दोबारा लगाना जरूरी है.

क्या न करें

चेहरे को बारबार गरम पानी से न धोएं: गरम पानी त्वचा के नैचुरल औयल को हटा कर उसे और ज्यादा रूखा बना देता है. अत: हमेशा कुनकुने पानी का इस्तेमाल करें.

मौइस्चराइजर लगाने में देरी न करें: चेहरा धोने के 1-2 मिनट के अंदर मौइस्चराइजर जरूर लगाएं. देर करने से स्किन की नमी उड़ जाती है.

बहुत हार्श स्क्रब न करें: ज्यादा रगड़ने वाले या मोटे दाने वाले स्क्रब से स्किन में माइक्रो टियरिंग हो सकती है, जिस से चेहरा लाल और संवेदनशील हो जाता है.

बारबार फेसवाश न करें: दिन में 2 बार से ज्यादा फेसवाश करने पर स्किन और ज्यादा ड्राई होती है.

भारी मेकअप का ज्यादा इस्तेमाल न करें: सर्दियों में मोटी लेयर वाला मेकअप पोर्स ब्लौक कर सकता है, जिस से बेजानपन और मुंहासे बढ़ते हैं.

लिपकेयर को नजरअंदाज न करें: होंठ सर्दियों में सब से जल्दी ड्राई होते हैं. लिप बाम न लगाने से होंठ फट सकते हैं और खून भी निकल सकता है.

सनस्क्रीन छोड़ने की गलती न करें: सर्दियों में धूप हलकी लगती है लेकिन किरणें उतनी ही तेज होती हैं यानी सनस्क्रीन न लगाने से टैनिंग और पिग्मैंटेशन बढ़ता है.

पानी कम न पीएं: सर्दियों में प्यास कम लगती है लेकिन शरीर को उतना ही पानी चाहिए. पानी कम पीने से स्किन डल और खुरदुरी हो जाती है.

Moisture Maintenance

Short Story in Hindi: दो राहें : किस रास्ते पर चल पड़ा था वो

Short Story in Hindi: वसन्त खाडिलकर पटेल रोड पर चला जा रहा था. एक ही विचार उसके मस्तिष्क में कौंध रहा था कि किसी भी तरह से उसे इस अपमान का बदला लेना है, परंन्तु क्यो? एका एक उसके मस्तिष्क में यह प्रश्न कौंध गया.वह ठिठक गया , अरे ये क्या सोचने लगा वह , पूनम का करता कसूर ?”नहीं आखिर पूनम ने ही तो उसे बुलाया,उसका ही अपराध है “, लेकिन वह इतना नीचे क्यो गिरा ,; वह फिर से सोचने लगा.इस तरह सभी घटनाएं उसके सामने स्पष्ट होने लगी. एलीट पार्क में बैठे हुए वह फिर सिगरेट के छल्ले बना रहा था; आज से दो वर्ष पहले वह इसी स्थान पर पूनम से मिला था.

“आजकल तुम इतना खोए क्यो रहते हो ”

” ‌‌‌  कुछ नही ” ‌‌‌वह बुदबुदाता

” पर मुझसे ‌‌‌क्या छिपाना ”

” नहीं ऐसी कोई बात नहीं है ”

वह मुस्कराई और दोनों पटेल रोड पर चल पड़े. फिर एक कैफे में बैठ कर दोनों ने काफी पी. और हंसते हुए उठकर चलने लगे, पर फिर एक बार मौन दोनों ‌‌‌के बीच था.तभी एकाएक रमेश, पूनम का पुराना मित्र दिखा “हेलो पूनम ”

“हेलो रमेश”

“अरे भाई तुम तो दूज की चांद हो गयी हो पूनम , दिखाई ही नहीं देती ”

“नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं है मेरी तबियत ठीक नहीं रहती” पूनम ने कहा

“अरे तो मुझे खबर क्यो नही दिया ” रमेश बोला “अरे नहीं अब ठीक हूं ” पूनम ने बात को खत्म करने ‌की कोशिश की.

“अच्छा तो यही है आपके——–“रमेश ने बसन्त की ओर इशारा करते हुए कहा”अरे नहीं ये तो मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं ” पूनम ने बसन्त की ओर कनखियो से देखते हुए कहा.

“चलो ठीक है वरना मैं भी सोचूं इतना बेमेल तो नहीं ही होना चाहिए “रमेश ने हंसते हुए कहा.

“और———–” आगे बसन्त सुन न पाया क्योंकि वह पूनम से अलग हो कर दूसरी तरफ़ चला गया था.उसका मन विद्वेष ‌‌‌से भर गया” ये पूनम भी ‌‌‌क्याहै; जहरीली फूल,—तो क्या‌उसे मुझसे प्रेम नहीं है,मात्र दिखावा करती है, उसे सिर्फ धन से प्यार है” इसी तरह सोचते हुए वह चलता रहा, कि फिर उसे ऐसा लगने लगा कि शायद वह कुछ ग़लत सोच रहा है, आखिर इसमें पूनम का करता कसूर, उसने अपने आप से प्रश्न किया.”नहीं नहीं, पूनम तो सिर्फ़ और सिर्फ़ मुझसे ही ‌‌‌प्रेम करती है ,—तब दोष किसका? उसका –”

” हां यही ठीक है ‌‌‌इसी तरह से उधेड़बुन में सोचते हुए ‌‌‌कब घर आगया पता ही नहीं चला. तभी नौकर ने खाना लगा दिया उसे खाने में तनिक भी स्वाद नहीं आ रहा ‌था , उसके दिमाग में रह रह कर रमेश केकहे शब्द गूंज रहे थे.इसके लिए वह खुद को जिम्मेदार मान रहा था.तनाव से उसके मस्तिष्क की शिराओं में दर्द होने लगा था. उसे लगा कि अब वह आगे कुछ भी सोचने की स्थति में नहीं है अब वह सोने की तैयारी कर रहा था तभी अचानक दरवाजे की ‌‌‌‌‌‌‌‌‌घंटी बज उठी उसने सोचा कि इतनी रात में कौन हो सकता है फिर भी उसने दरवाजा खोला तो देखा कि पूनम ‌‌‌सामने खड़ी थी. “तुम !”आश्चर्य से उसने कहा

“हां मैं “पूनम ने कहा ” तुम इतनी ‌‌‌रात में, लौट जाओ मेरे जख्मों पर नमक न लगाओ “” नहीं मैं तुमसे क्षमा मांगने आती हूं” पूनम ने विनम्रता से कहा ” नहीं, नहीं पूनम , तुम मुझे माफ़ कर दो ‌‌‌मेरी औकात ही नहीं मेरी वजह से तुम्हें नीचा दिखाना पड़ा “उसने कातर स्वर में कहा ‌

“ऐसा क्यो ,क्या तुम नहीं चाहते कि समाज में मेरा कोई स्थान न हो ?””ऐसा नहीं है पूनम ,तुम एक ऐसे पिता की‌ बेटी हो जो सिर्फ पैसे वाले ही‌नही है उनका समाज में बहुत बड़ा स्थान है और मैं एक बिन बाप मां का अनाथ कोई भी

कुछ कह सकता है।”बसन्त ने कटाक्षपूर्ण तरीके से कहा”अच्छा,तो क्या मुझे इस रात में थोड़ी सी जगह भी न दोगे .जगह तो मेरा सब कुछ है लेकिन मेरा समाज मुझे इसकी इजाजत नहीं देता है और मैं अनाथ हूं मुझे अपनी हैसियत का अंदाजा हो चुका है.”बसन्त ने बेबसी में कहा

” कुछ लोग कहें कहते रहे, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता ” पूनम ने चेयर पर‌बैठते हुए कहा.”हो सकता है कि तुम्हें कुछ कहने की हिम्मत किसी में नहीं हो पर मेरे साथ ऐसा नहीं है “बसन्त ने लगभग हारकर कहा

“ठीक है, मैं जा रही हूं पर एक बात याद रखना ,मैं निर्दोष हूं और तुमने मुझे समझने में बहुत भूल की है” पूनम चली आती ,बसन्त अवाक सा तकता रहता रह गया.

न जाने कब तक वह सोया रहता अगर नौकर उसे न जगाता ,आंख खुली तो उसनेे पाया कि नौकर उसे जगा रहा था”, मालिक अभी अभी एक आदमी यह ख़त दे गया है.

बसन्तअवाक सा ख़त पढ़ने लगा, “मेरे देवता, मेरे सर्वस्व,

आशा है आपको रात भर सुख की नींद आती होगी,मैं कल कुछ आपसे कहने आती थी, क्योंकि मुझे ‌‌‌‌कल ऐसा लगा‌कि प्यार दुनियाका वह  अनमोल सच है जिसके लिए कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता. नारी समाज के लिए एक खिलौना है जिसके बारे में पुरुषों ने कभी यह सोचा ही नहीं कि नारी के अंदर भावनाओं का एक सागर होता है लेकिन हया और बहुत कुछ ऐसा भी होता है कि वह खुद को जाहिर नही‌कर‌पाती संवेदनाओं को भी भीतर ही भीतर मरना पड़ता है.मैं सारी दुनियां छोड़ कर आयीथी यह बताने‌ की कोशिश कर रही थी कि‌रमेश एक‌गुन्डा किस्म आदमी है उसने मेरे पिता को ब्लेकमेल कर के मुझसे जबरदस्ती शादी करना चाहता है मैं इस जीवन में सिर्फ और सिर्फ आपसे प्यार करती हूं लेकिन आपने मुझे ठुकराया अब मेरे जीवित रहने का कोई मतलब‌ही नहीं है.मैं जा रही हूं यह पत्र जब तक आप तक पहुंचेगा तब तक मैं जा चुकी होगी अनन्त की ओर

आपकी पूनम

पत्र आंसुओं से भीग चुका था. बसन्त पागलों की तरह पूनम के घर की ओर भागा जैसे उड़ते हुए पक्षी को पकड़ने की कोशिश कर रहा हो.

“बेटा बड़ी देर कर दी आने में, पूनम ने तुम्हारा बहुत इंतजार किया अब तो सब खत्म हो गया.” पूनम के पिता ने रोते हुए कहा ।बसन्त की पथराई आंखें अनन्त मे‌ पूनम को ढूंढ रही थी.

Short Story in Hindi

Fictional Story: रज्जो- क्यों रोने लगा रामदीन

Fictional Story: रज्जो रसोईघर का काम निबटा कर निकली, तो रात के 10 बज रहे थे. वह अपने कमरे में जाने से पहले सुरेंद्र के कमरे में पहुंची. वह उस समय बिस्तर पर आंखें बंद किए लेटा था.

‘‘साहबजी, मैं कमरे पर सोने जा रही हूं. कुछ लाना है तो बताइए?’’ रज्जो ने सुरेंद्र की ओर देखते हुए पूछा.

सुरेंद्र ने आंखें खोलीं और अपने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘रज्जो, आज सिर में बहुत दर्द हो रहा है.’’

‘‘मैं आप के माथे पर बाम लगा कर दबा देती हूं,’’ रज्जो ने कहा और अलमारी में रखी बाम की शीशी ले आई. वह सुरेंद्र के माथे पर बाम लगा कर सिर दबाने लगी.

कुछ देर बाद रज्जो ने पूछा, ‘‘अब कुछ आराम पड़ा?’’

‘‘बहुत आराम हुआ है रज्जो, तेरे हाथों में तो जादू है,’’ कहते हुए सुरेंद्र ने अपना सिर रज्जो की गोद में रख दिया.

रज्जो सिर दबाने लगी. वह महसूस कर रही थी कि एक हाथ उस की कमर पर रेंग रहा है. उस ने सुरेंद्र की ओर देखा.

सुरेंद्र बोला, ‘‘रज्जो, यहां रहते हुए तू किसी बात की चिंता मत करना. तुझे किसी चीज की कमी नहीं रहेगी. जब कभी जितने रुपए की जरूरत पड़े, तो बता देना.’’

‘‘जी साहब.’’

‘‘आज तेरी मैडम लखनऊ गई हैं. वहां जरूरी मीटिंग है. 4 दिन बाद वापस आएंगी,’’ कह कर सुरेंद्र ने उसे अपनी ओर खींच लिया.

रज्जो समझ गई कि सुरेंद्र की क्या इच्छा है. वह बोली, ‘‘नहीं साहबजी, ऐसा न करो. मुझे तो मांकाका ने आप की सेवा करने के लिए भेजा है.’’

‘‘रज्जो, यह भी तो सेवा ही है. पता नहीं, आज क्यों मैं अपनेआप पर काबू नहीं रख पा रहा हूं?’’ सुरेंद्र ने रज्जो की ओर देखते हुए कहा.

‘‘साहबजी, अगर मैडम को पता चल गया तो?’’ रज्जो घबरा कर बोली.

‘‘उस की चिंता मत करो. वह कुछ नहीं कहेगी.’’

रज्जो मना नहीं कर सकी और न चाहते हुए भी सुरेंद्र की बांहों समा गई.

कुछ देर बाद जब रज्जो अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर लेटी, तो उस की आंखों से नींद भाग चुकी थी. उस की आंखों के सामने मांकाका, 2 छोटी बहनों व भाई के चेहरे नाचने लगे.

यहां से 3 सौ किलोमीटर दूर रज्जो का गांव चमनपुर है. काका राजमिस्त्री का काम करता है. महीने में 10-15 दिन मजदूरी पर जाता है, क्योंकि रोजाना काम नहीं मिलता.

रज्जो तो 5 साल पहले 10वीं जमात पास कर के स्कूल छोड़ चुकी थी. उस की 2 छोटी बहनें व भाई पढ़ रहे थे. मां ने उस का नाम रजनी रखा था, पर पता नहीं, कब वह रजनी से रज्जो बन गई.

एक दिन गांव की प्रधान गोमती देवी ने मां को बुला कर कहा था, ‘मुझे पता चला है कि तेरी बेटी रज्जो तेरी तरह बहुत बढि़या खाना बनाती है. तू उसे सुबह से शाम तक के लिए मेरे घर भेज दे.’

‘ठीक है प्रधानजी, मैं रज्जो को भेज दूंगी,’ मां ने कहा था.

2 दिन बाद रज्जो ने गोमती प्रधान के घर की रसोई संभाल ली थी.

एक दिन एक बड़ी सी कार गोमती प्रधान के घर के सामने रुकी. कार से सुरेंद्र व उस की पत्नी माधवी मैडम उतरे. कार पर लाल बत्ती लगी थी. गोमती प्रधान की दूर की रिश्तेदारी में माधवी मैडम बहन लगती थीं.

दोपहर का खाना खा कर सुरेंद्र व माधवी ने रज्जो को बुला कर कहा, ‘तुम बहुत अच्छा खाना बनाती हो. हमें तुम जैसी लड़की की जरूरत है. क्या तुम हमारे साथ चलोगी? जैसे तुम यहां खाना बनाती हो, वैसा ही तुम्हें वहां भी रसोई में काम करना है.’

रज्जो चुप रही.

गोमती प्रधान बोल उठी थीं. ‘यह क्या कहेगी? इस के मांकाका को कहना पड़ेगा.’

कुछ देर बाद ही रज्जो के मांकाका वहां आ गए थे.

गोमती प्रधान बोलीं, ‘रामदीन, यह मेरी बहन है. सरकार में एक मंत्री की तरह हैं. इस को रज्जो के हाथ का बना खाना बहुत पसंद आया, तो ये लोग इसे अपने घर ले जाना चाहते हैं रसोई के काम के लिए.’

‘रामदीन, बेटी रज्जो को भेज कर बिलकुल चिंता न करना. हम इसे पूरा लाड़प्यार देंगे. रुपएपैसे हर महीने या जब तुम चाहोगे भेज देंगे,’ माधवी मैडम ने कहा था.

‘साहबजी, आप जैसे बड़े आदमी के यहां पहुंच कर तो इस की किस्मत ही खुल जाएगी. यह आप की सेवा खूब मन लगा कर करेगी. यह कभी शिकायत का मौका नहीं देगी,’ काका ने कहा था.

सुरेंद्र ने जेब से कुछ नोट निकाले और काका को देते हुए कहा, ‘लो, फिलहाल ये पैसे रख लो. हम लोग हर तरह  से तुम्हारी मदद करेंगे. यहां से लखनऊ तक कोई भी सरकारी या गैरसरकारी काम हो, पूरा करा देंगे. अपनी सरकार है, तो फिर चिंता किस बात की.’

रज्जो उसी दिन सुरेंद्र व माधवी के साथ इस कसबे में आ गई थी.

सुरेंद्र की बहुत बड़ी कोठी थी, जिस में कई कमरे थे. एक कमरा उसे भी दे दिया गया था. माधवी मैडम ने उस को कई सूट खरीद कर दिए थे. उसे एक मोबाइल फोन भी दिया था, ताकि वह अपने घरपरिवार से बात कर सके.

रज्जो को पता चला था कि सुरेंद्र की काफी जमीनजायदाद है. एक ही बेटा है, जो बेंगलुरु में पढ़ाई कर रहा है.

माधवी मैडम बहुत बिजी रहती हैं. कभी पार्टी मीटिंग में, तो कभी इधरउधर दूसरे शहरों में और कभी लखनऊ में.

इन्हीं विचारों में डूबतेतैरते रज्जो को नींद आ गई थी. अगले दिन सुरेंद्र ने रज्जो को कमरे में बुला कर कुछ गोलियां देते हुए कहा, ‘‘रज्जो, ये गोलियां तुझे खानी हैं. रात जो हुआ है, उस से तेरी सेहत को नुकसान नहीं होगा.’’

‘‘जी…’’ रज्जो ने वे गोलियां देखीं. वह जान गई कि ये तो पेट गिराने वाली गोलियां हैं.

‘‘और हां रज्जो, कल अपने घर ये रुपए मनीऔर्डर से भेज देना,’’ कहते हुए सुरेंद्र ने 5 हजार रुपए रज्जो को दिए.

‘‘इतने रुपए साहबजी…?’’ रज्जो ने रुपए लेते हुए कहा.

‘‘अरे रज्जो, ये रुपए तो कुछ भी नहीं हैं. तू हम लोगों की सेवा कर रही है न, इसलिए मैं तेरी मदद करना चाहता हूं.’’

रज्जो सिर झुका कर चुप रही.

सुरेंद्र ने रज्जो का चेहरा हाथ से ऊपर उठाते हुए कहा, ‘‘तुझे कभी अपने गांव जाना हो, तो बता देना. ड्राइवर और गाड़ी भेज दूंगा.’’

सुन कर रज्जो बहुत खुश हुई.

‘‘रज्जो, तू मुझे इतनी अच्छी लगती है कि अगर मैडम की जगह मैं मंत्री होता, तो तुझे अपना पीए बना लेता,’’ सुरेंद्र ने कहा.

‘‘रहने दो साहबजी, मुझे ऐेसे सपने न दिखाओ, जो मैं रोटी बनाना ही भूल जाऊं.’’

‘‘रज्जो, तू नहीं जानती कि मैं तेरे लिए क्या करना चाहता हूं,’’ सुरेंद्र ने कहा.

खुशी के चलते रज्जो की आंखों की चमक बढ़ गई.

4 दिन बाद माधवी मैडम घर लौटीं. इस बीच हर रात को सुरेंद्र रज्जो को अपने कमरे में बुला लेता और रज्जो भी पहुंच जाती, उसे खुश करने के लिए.

अगले दिन रज्जो एक कमरे के बराबर से निकल रही थी, तो सुरेंद्र व माधवी की बातचीत की आवाज आ रही थी. वह रुक कर सुनने लगी.

‘‘कैसी लगी रज्जो?’’ माधवी ने पूछा.

‘‘ठीक है, बढि़या खाना बनाती है,’’ सुरेंद्र का जवाब था.

‘‘मैं रसोई की नहीं, बैडरूम की बात कर रही हूं. मैं जानती हूं कि रज्जो ने इन रातों में कोई नाराजगी का मौका नहीं दिया होगा.’’

‘‘तुम्हें क्या रज्जो ने कुछ बताया है?’’

‘‘उस ने कुछ नहीं बताया. मैं उस के चेहरे व आंखों से सच जान चुकी हूं.

‘‘खैर, मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं. तुम कहा करते थे कि मैं बाहर चली जाती हूं, तो अकेले रात नहीं कटती, इसलिए ही तो रज्जो को इतनी दूर से यहां लाई हूं, ताकि जल्दी से वापस घर न जा सके.’’

‘‘तुम बहुत समझदार हो माधवी…’’ सुरेंद्र ने कहा, ‘‘लखनऊ में तुम्हारे नेताजी के क्या हाल हैं? वह तो बस तुम्हारा पक्का आशिक है, इसलिए ही तो उस ने तुम्हें लाल बत्ती दिला दी है.’’

‘‘इस लाल बत्ती के चलते हम लोगों का कितना रोब है. पुलिस या प्रशासन में भला किस अफसर की इतनी हिम्मत है, जो हमारे किसी भी ठीक या गलत काम को मना कर दे.’’

‘‘नेताजी का बस चले तो वह तुम्हें लखनऊ में ही हमेशा के लिए बुला लें.’’

‘‘अगले हफ्ते नेताजी जनपद में आ रहे हैं. रात को हमारे यहां खाना होगा. मैं ने सोचा है कि नेताजी की सेवा में रात को रज्जो को उन के पास भेज दूंगी.

‘‘जब नेताजी हमारा इतना खयाल रखते हैं, तो हमारा भी तो फर्ज बनता है कि नेताजी को खुश रखें. अगले महीने रज्जो को लखनऊ ले जाऊंगी, वहां

2-3 दूसरे नेता हैं, उन को भी खुश करना है,’’ माधवी ने कहा.

सुनते ही रज्जो के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं. वह चुपचाप रसोई में जा पहुंची. उस ने तो साहब को ही खुश करना चाहा था, पर ये लोग तो उसे नेताओं के पास भेजने की सोच बैठे हैं. वह ऐसा नहीं करेगी. 1-2 दिन बाद ही वह अपने गांव चली जाएगी.

तभी मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. वह बोली, ‘‘हैलो…’’

‘‘हां रज्जो बेटी, कैसी है तू?’’ उधर से काका की आवाज सुनाई दी.

काका की आवाज सुन कर रज्जो का दिल भर आया. उस के मुंह से आवाज नहीं निकली और वह सुबकने लगी.

‘‘क्या हुआ बेटी? बता न? लगता है कि तू वहां बहुत दुखी है. पहले तो तू साहब व मैडम की बहुत तारीफ किया करती थी. फिर क्या हो गया, जो तू रो रही है?’’

‘‘काका, मैं गांव आना चाहती हूं.’’

‘‘ठीक है रज्जो, मेरा 2 दिन का काम और है. उस के बाद मैं तुझे लेने आ जाऊंगा. मैं जानता हूं कि मैडम व साहब बहुत अच्छे लोग हैं. तुझे भेजने को मना नहीं करेंगे. तू हमारी चिंता न करना. यहां सब ठीक है. तेरी मां, भाईबहनें सब मजे में हैं,’’ काका ने कहा.

रज्जो चुप रही.

अगले दिन सुरेंद्र व माधवी ने रज्जो को कमरे में बुलाया.

सुरेंद्र ने कहा, ‘‘रज्जो, 4-5 दिन बाद लखनऊ से बहुत बड़े नेताजी आ रहे हैं. यह हमारा सौभाग्य है कि वे हमारे यहां खाना खाएंगे और रात को आराम भी यहीं करेंगे.’’

‘‘जी…’’ रज्जो के मुंह से निकला.

‘‘रात को तुम्हें नेताजी की सेवा करनी है. उन को खुश करना है. देखना रज्जो, अगर नेताजी खुश हो गए तो…’’ माधवी की बात बीच में ही अधूरी रह गई.

रज्जो एकदम बोल उठी, ‘‘नहीं मैडमजी, यह मुझ से नहीं होगा. यह गलत काम मैं नहीं करूंगी.’’

‘‘और मेरे पीठ पीछे साहबजी के साथ रात को जो करती रही, क्या वह गलत काम नहीं था?’’

रज्जो सिर झुकाए बैठी रही, उस से कोई जवाब नहीं बन पा रहा था.

‘‘रज्जो, तू हमारी बात मान जा. तू मना मत कर,’’ सुरेंद्र बोला.

‘‘साहबजी, ये नेताजी आएंगे, इन को खुश करना है. फिर कुछ नेताओं को खुश करने के लिए मुझे मैडमजी लखनऊ ले कर जाएंगी. मैं ने आप लोगों की बातें सुन ली हैं. मैं अब यह गलत काम नहीं करूंगी. मैं अपने घर जाना चाहती हूं. 2 दिन बाद मेरे काका आ रहे हैं,’ रज्जो ने नाराजगी भरे शब्दों में कहा.

‘‘अगर हम तुझे गांव न जाने दें तो…?’’ माधवी ने कहा.

‘‘तो मैं थाने जा कर पुलिस को और अखबार के दफ्तर में जा कर बता दूंगी कि आप लोग मुझ से जबरदस्ती गलत काम कराना चाहते हैं,’’ रज्जो ने कड़े शब्दों में कहा.

रज्जो के बदले तेवर देख कर सुरेंद्र ने कहा, ‘‘ठीक है रज्जो, हम तुझ से कोई काम जबरदस्ती नहीं कराएंगे. तू अपने काका के साथ गांव जा सकती है,’’ यह कह कर सुरेंद्र ने माधवी की ओर देखा.

उसी रात सुरेंद्र ने रज्जो की गला दबा कर हत्या कर दी और ड्राइवर से कह कर रज्जो की लाश को नदी में फिंकवा दिया. दिन निकलने पर इंस्पैक्टर को फोन कर के कोठी पर बुला लिया.

‘‘कहिए हुजूर, कैसे याद किया?’’ इंस्पैक्टर ने आते ही कहा.

‘‘हमारी नौकरानी रजनी उर्फ रज्जो घर से एक लाख रुपए व कुछ जेवरात चुरा कर भाग गई है.’’

‘‘सरकार, भाग कर जाएगी कहां वह? हम जल्द ही उसे पकड़ लेंगे,’’ इंस्पैक्टर ने कहा और कुछ देर बाद चला गया.

दोपहर बाद रज्जो का काका रामदीन आया. सुरेंद्र ने उसे देखते ही कहा, ‘‘अरे ओ रामदीन, तेरी रज्जो तो बहुत गलत लड़की निकली. उस ने हम लोगों से धोखा किया है. वह हमारे एक लाख रुपए व जेवरात ले कर कल रात कहीं भाग गई है.’’

‘‘नहीं हुजूर, ऐसा नहीं हो सकता. मेरी रज्जो ऐसा नहीं कर सकती,’’ घबरा कर रामदीन बोला.

‘‘ऐसा ही हुआ है. वह यहां से चोरी कर के भाग गई है. जब वह गांव में अपने घर पहुंचे तो बता देना. थाने में रिपोर्ट लिखा दी है. पुलिस तेरे घर भी पहुंचेगी.

‘‘अगर तू ने रज्जो के बारे में न बताया, तो पुलिस तुम सब को उठा कर जेल भेज देगी.

‘‘और सुन, तू चुपचाप यहां से भाग जा. अगर पुलिस को पता चल गया कि तू यहां आया है, तो पकड़ लिया जाएगा.’’

यह सुन कर रामदीन की आंखों में आंसू आ गए. रज्जो के लिए उस के दिल में नफरत बढ़ने लगी. वह रोता हुआ बोला, ‘‘रज्जो, यह तू ने अच्छा नहीं  किया. हम ने तो तुझे यहां सेवा करने के लिए भेजा था और तू चोर बन गई.’’

रामदीन रोतेरोते थके कदमों से कोठी से बाहर निकल गया.

Fictional Story

Hindi Sad Story: क्या मिला- उसने पूरी जिंदगी क्यों झेली तकलीफ

Hindi Sad Story: अब मैं 70 साल की हो गई. एकदम अकेली हूं. अकेलापन ही मेरी सब से बड़ी त्रासदी मुझे लगती है. अपनी जिंदगी को मुड़ कर देखती हूं तो हर एक पन्ना ही बड़ा विचित्र है. मेरे मम्मीपापा के हम 2 ही बच्चे थे. एक मैं और मेरा एक छोटा भाई. हमारा बड़ा सुखी परिवार. पापा साधारण सी पोस्ट पर थे, पर उन की सरकारी नौकरी थी.

मैं पढ़ने में होशियार थी. मुझे पापा डाक्टर बनाना चाहते थे और मैं भी यही चाहती थी. मैं ने मेहनत भी की और उस जमाने में इतना कंपीटिशन भी नहीं था. अतः मेरा सलेक्शन इसी शहर में मेडिकल में हो गया. पापा भी बड़े प्रसन्न. मैं भी खुश.

मेडिकल पास करते ही पापा को मेरी शादी की चिंता हो गई. किसी ने एक डाक्टर लड़का बताया. पापा को पसंद आ गया. दहेज वगैरह भी तय हो गया.

लड़का भी डाक्टर था तो क्या मैं भी तो डाक्टर थी. परंतु पारंपरिक परिवार होने के कारण मैं भी कुछ कह नहीं पाई. शादी हो गई. ससुराल में पहले ही उन लोगों को पता था कि यह लड़का दुबई जाएगा. यह बात उन्होंने हम से छुपाई थी. पर लड़की वाले की मजबूरी… क्या कर सकते थे.

मैं पीहर आई और नौकरी करने लगी. लड़का 6 महीने बाद आएगा और मुझे ले जाएगा, यह तय हो चुका था. उन दिनों मोबाइल वगैरह तो होता नहीं था. घरों में लैंडलाइन भी नहीं होता था. चिट्ठीपत्री ही आती थी.

पति महोदय ने पत्र में लिखा, मैं सालभर बाद आऊंगा. पीहर वालों ने सब्र किया. हिंदू गरीब परिवार का बाप और क्या कर सकता था? मैं तीजत्योहार पर ससुराल जाती. मुझे बहुत अजीब सा लगने लगा. मेरे पतिदेव का एक महीने में एक पत्र  आता. वो भी धीरेधीरे बंद होने लगा. ससुराल वालों ने कहा कि वह बहुत बिजी है. उस को आने में 2 साल लग सकते हैं.

मेरे पिताजी का माथा ठनका. एक कमजोर अशक्त लड़की का पिता क्या कर सकता है. हमारे कोई दूर के रिश्तेदार के एक जानकार दुबई में थे. उन से पता लगाया तो पता चला कि उस महाशय ने तो वहां की एक नर्स से शादी कर ली है और अपना घर बसा लिया है. यह सुन कर तो हमारे परिवार पर बिजली ही गिर गई. हम सब ने किसी तरह इस बात को सहन कर लिया.

पापा को बहुत जबरदस्त सदमा लगा. इस सदमे की सहन न कर पाने के कारण उन्हें हार्ट अटैक हो गया. गरीबी में और आटा गीला. घर में मैं ही बड़ी थी और मैं ने ही परिवार को संभाला. किसी तरह पति से डाइवोर्स लिया. भाई को पढ़ाया और उस की नौकरी भी लग गई. हमें लगा कि हमारे अच्छे दिन आ गए. हम ने एक अच्छी लड़की देख कर भैया की शादी कर दी.

मुझे लगा कि अब भैया मम्मी को संभाल लेगा. भैया और भाभी जोधपुर में सैटल हो गए थे. मैं ने सोचा कि जो हुआ उस को टाल नहीं सकते. पर, अब मैं आगे की पढ़ाई करूं, ऐसा सोच ही रही थी. मेरी पोस्टिंग जयपुर में थी. इसलिए मैं यहां आई, तो अम्मां को साथ ले कर आई. भैया की नईनई शादी हुई है, उन्हें आराम से रहने दो.

मैं भी अपने एमडी प्रवेश परीक्षा की तैयारी में लगी. राजीखुशी का पत्र भैयाभाभी भेजते थे. अम्मां भी खुश थीं. उन का मन जरूर नहीं लगता था. मैं ने कहा, ‘‘अभी थोड़े दिन यहीं रहो, फिर आप चली जाना.‘‘ ‘‘ठीक है. मुझे लगता है कि थोड़े दिन मैं बहू के पास भी रहूं.‘‘

‘‘अम्मां थोड़े दिन उन को अकेले भी एंजौय करने दो. नईनई शादी हुई है. फिर तो तुम्हें जाना ही है.‘‘
इस तरह 6 महीने बीत गए. एक खुशखबरी आई. भैया ने लिखा कि तुम्हारी भाभी पेट से है. तुम जल्दी बूआ बनने वाली हो. अम्मां दादी.

इस खबर से अम्मां और मैं बहुत प्रसन्न हुए. चलो, घर में एक बच्चा आ जाएगा और अम्मां का मन पंख लगा कर उड़ने लगा. ‘‘मैं तो बहू के पास जाऊंगी,‘‘ अम्मां जिद करने लगी. मैं ने अम्मां को समझाया, ‘‘अम्मां, अभी मुझे छुट्टी नहीं मिलेगी? जैसे ही छुट्टी मिलेगी, मैं आप को छोड़ आऊंगी. भैया को हम बुलाएंगे तो भाभी अकेली रहेंगी. इस समय यह ठीक नहीं है.‘‘

वे भी मान गईं. हमें क्या पता था कि हमारी जिंदगी में एक बहुत बड़ा भूचाल आने वाला है. मैं ने तो अपने स्टाफ के सदस्यों और अड़ोसीपड़ोसी को मिठाई मंगा कर खिलाई. अम्मां ने पास के मंदिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ाया. परंतु एक बड़ा वज्रपात एक महीने के अंदर ही हुआ.

हमारे पड़ोस में एक इंजीनियर रहते थे. उन के घर रात 10 बजे एक ट्रंक काल आया. मुझे बुलाया. जाते ही खबर को सुन कर रोतेरोते मेरा बुरा हाल था. मेरे भाई का एक्सीडेंट हो गया. वह बहुत सीरियस था और अस्पताल में भरती था.

अम्मां बारबार पूछ रही थीं कि क्या बात है, पर मैं उन्हें बता नहीं पाई. यदि बता देती तो जोधपुर तक उन्हें ले जाना ही मुश्किल था. पड़ोसियों ने मना भी किया कि आप अम्मां को मत बताइए.

अम्मां को मैं ने कहा कि भाभी को देखने चलते हैं. अम्मां ने पूछा, ‘‘अचानक ही क्यों सोचा तुम ने? क्या बात हुई है? हम तो बाद में जाने वाले थे?‘‘

किसी तरह जोधपुर पहुंचे. वहां हमारे लिए और बड़ा वज्रपात इंतजार कर रहा था. भैया का देहांत हो गया. शादी हुए सिर्फ 9 महीने हुए थे.

भाभी की तो दुनिया ही उजड़ गई. अम्मां का तो सबकुछ लुट गया. मैं क्या करूं, क्या ना करूं, कुछ समझ नहीं आया. अम्मां को संभालूं या भाभी को या अपनेआप को?

मुझे तो अपने कर्तव्य को संभालना है. क्रियाकर्म पूरा करने के बाद मैं भाभी और अम्मां को साथ ले कर जयपुर आ गई. मुझे तो नौकरी करनी थी. इन सब को संभालना था. भाभी की डिलीवरी करानी थी.

भाभी और अम्मां को मैं बारबार समझाती.

मैं तो अपना दुख भूल चुकी. अब यही दुख बहुत बड़ा लग रहा था. मुझ पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. उन दिनों वेतन भी ज्यादा नहीं होता था.

मकान का किराया चुकाते हुए 3 प्राणी तो हम थे और चौथा आने वाला था. नौकरी करते हुए पूरे घर को संभालना था.

अम्मां भी एक के बाद एक सदमा लगने से बीमार रहने लगीं. उन की दवाई का खर्चा भी मुझे ही उठाना था.

मैं एमडी की पढ़ाईलिखाई वगैरह सब भूल कर इन समस्याओं में फंस गई. भाभी के पीहर वालों ने भी ध्यान नहीं दिया. उन की मम्मी पहले ही मर चुकी थी. उन की भाभी थीं और पापा बीमार थे. ऐसे में किसी ने उन्हें नहीं बुलाया. मैं ही उन्हें आश्वासन देती रही. उन्हें अपने पीहर की याद आती और उन्हें बुरा लगता कि पापा ने भी मुझे याद नहीं किया. अब उस के पापा ना आर्थिक रूप से संपन्न थे और ना ही शारीरिक रूप से. वे भला क्या करते? यह बात तो मेरी समझ में आ गई थी.

अम्मां को भी लगता कि सारा भार मेरी बेटी पर ही आ गया. बेटी पहले से दुखी है. मैं अम्मां को भी समझाती. इस छोटी उम्र में ही मैं बहुत बड़ी हो गई थी. मैं बुजुर्ग बन गई थी.

भाभी की ड्यू डेट पास में आने पर अम्मां और भाभी मुझ से कहते, ‘‘आप छुट्टी ले लो. हमें डर लगता है?‘‘

‘‘अभी से छुट्टी ले लूं. डिलीवरी के बाद भी तो लेनी है?‘‘

बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया. रात को परेशानी हुई तो मैं भाभी को ले कर अस्पताल गई और उन्हें भरती कराया. अस्पताल वालों को पता ही था कि मैं डाक्टर हूं. उन्होंने कहा कि आप ही बच्चे को लो. सब से पहले मैं ने ही उठाया. प्यारी सी लड़की हुई थी.

सुन कर भाभी को अच्छा नहीं लगा. वह कहने लगी, ‘‘लड़का होता तो मेरा सहारा ही बनता.‘‘

‘‘भाभी, आप तो पढ़ीलिखी हो कर कैसी बातें कर रही हैं? आप बेटी की चिंता मत करो. उसे मैं पालूंगी.‘‘

उस का ज्यादा ध्यान मैं ने ही रखा. भाभी को अस्पताल से घर लाते ही मैं ने कहा, ‘‘भाभी, आप भी बीएड कर लो, ताकि नौकरी लग जाए.‘‘

विधवा कोटे से उन्हें तुरंत बीएड में जगह मिल गई. बच्चे को छोड़ वह कालेज जाने लगी. दिन में बच्ची को अम्मां देखतीं. अस्पताल से आने के बाद उस की जिम्मेदारी मेरी थी. पर, मैं ने खुशीखुशी इस जिम्मेदारी को निभाया ही नहीं, बल्कि मुझे उस बच्ची से विशेष स्नेह हो गया. बच्ची भी मुझे मम्मी कहने लगी.

नौकरानी रखने लायक हमारी स्थिति नहीं थी. सारा बोझ मुझ पर ही था. किसी तरह भाभी का बीएड पूरा हुआ और उन्हें नौकरी मिल गई. मुझे थोड़ी संतुष्टि हुई. पर पहली पोस्टिंग अपने गांव में मिली. भाभी बच्ची को छोड़ कर चली गई. हफ्ते में या छुट्टी के दिन ही भाभी आती. बच्ची का रुझान अपनी मम्मी की ओर से हट कर पूरी तरह से मेरी ओर और अम्मां की तरफ ही था. हम भी खुश ही थे.

पर, मुझे लगा कि भाभी अभी छोटी है. वह पूरी जिंदगी कैसे अकेली रहेगी?

मैं ने भाभी से बात की. भाभी रितु बोली, ‘‘मुझे बच्चे के साथ कौन स्वीकार करेगा?‘‘

मैं ने कहा, ‘‘तुम गुड़िया की चिंता मत करो. उसे हम पाल लेंगे.‘‘

उस के बाद मैं ने भाभी रितु के लिए वर ढूंढ़ना शुरू किया. माधव नाम के एक आदमी ने भाभी से शादी करने की इच्छा प्रकट की. हम लोग खुश हुए. पर उस ने भी शर्त रख दी कि रितु भाभी अपनी बेटी को ले कर नहीं आएगी, क्योंकि उन के पहले ही एक लड़की थी.

मैं ने तो साफ कह दिया, ‘‘आप इस बात की चिंता ना करें. मैं बिटिया को संभाल लूंगी. मैं उसे पालपोस कर बड़ा करूंगी.‘‘

उस पर माधव राजी हो गया और यह भी कहा कि आप को भी आप के भाई की कमी महसूस नहीं होने दूंगा.

सुन कर मुझे भी बहुत अच्छा लगा. शुरू में माधव और रितु अकसर आतेजाते रहे. अम्मां को भी अच्छा लगता था, मुझे भी अच्छा लगता था. मैं भी माधव को भैया मान राखी बांधने लगी. सब ठीकठाक ही चल रहा था.

उन्होंने कोई जिम्मेदारी नहीं उठाई, परंतु अपने शहर से हमारे घर पिकनिक मनाने जैसे आ जाते थे. इस पर भी अम्मां और मैं खुश थे.

जब भी वे आते भाभी रितु को अपनी बेटी मान अम्मां उन्हें तिलक कर के दोनों को साड़ी, मिठाई, कपड़े आदि देतीं.

अब गुड़िया बड़ी हो गई. वह पढ़ने लगी. पढ़ने में वह होशियार निकली. उस ने पीएचडी की. उस के लिए मैं ने लड़का ढूंढा. अच्छा लड़का राज भी मिल गया. लड़कालड़की दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. अब लड़के वाले चाहते थे कि उन के शहर में ही आ कर शादी करें.

मैं उस बात के लिए राजी हो गई. मैं ने सब का टिकट कराया. कम से कम 50 लोग थे. सब का टिकट एसी सेकंड क्लास में कराया. भाभी रितु और माधव मेहमान जैसे हाथ हिलाते हुए आए.

यहां तक भी कोई बात नहीं. उस के बाद उन्होंने ससुराल वालों से मेरी बुराई शुरू कर दी. यह क्यों किया, मेरी समझ के बाहर की बात है. अम्मां को यह बात बिलकुल सहन नहीं हुई. मैं ने तो जिंदगी में सिवाय दुख के कुछ देखा ही नहीं. किसी ने मुझ से प्रेम के दो शब्द नहीं बोले और ना ही किसी ने मुझे कोई आर्थिक सहायता दी.

मुझे लगा, मुझे सब को देने के लिए ही ऊपर वाले ने पैदा किया है, लेने के लिए नहीं. पेड़ सब को फल देता है, वह स्वयं नहीं खाता. मुझे भी पेड़ बनाने के बदले ऊपर वाले ने मनुष्यरूपी पेड़ का रूप दे दिया लगता है.

मुझे भी लगने लगा कि देने में ही सुख है, खुशी है, संतुष्टि है, लेने में क्या रखा है?

मैं ने भी अपना ध्यान भक्ति की ओर मोड़ लिया. अस्पताल जाना, मंदिर जाना, बाजार से सौदा लाना वगैरह.

गुड़िया की ससुराल तो उत्तर प्रदेश में थी, परंतु दामाद राज की पोस्टिंग चेन्नई में थी. शादी के बाद 3 महीने तक गुड़िया नहीं आई. चिट्ठीपत्री बराबर आती रही. अब तो घर में फोन भी लग गया था. फोन पर भी बात हो जाती. मैं ने कहा कि गुड़िया खुश है. उस को जब अपनी मम्मी के बारे में पता चला, तो उसे भी बहुत बुरा लगा. फिर हमारा संबंध उन से बिलकुल कट गया.

3 महीने बाद गुड़िया चेन्नई से आई. मैं भी खुश थी कि बच्ची देश के अंदर ही है, कभी भी कोई बात हो, तुरंत आ जाएगी. इस बात को सोच कर मैं बड़ी आश्वस्त थी. पर गुड़िया ने आते ही कहा, ‘‘राज का सलेक्शन विदेश में हो गया है.‘‘

इस सदमे को कैसे बरदाश्त करूं? पुरानी बातें याद आने लगीं. क्या इस बच्ची के साथ भी मेरे जैसे ही होगा? मेरे मन में एक अनोखा सा डर बैठ गया. मैं गुड़िया से कह न पाई, पर अंदर ही अंदर घुटती ही रही.

शुरू में राज अकेले ही गए और मेरा डर मैं किस से कहूं? पर गुड़िया और राज में अंडरस्टैंडिंग बहुत अच्छी थी. बराबर फोन आते. मेल आता था. गुड़िया प्रसन्न थी. मैं अपने डर को अंदर ही अंदर महसूस कर रही थी.

फिर 6 महीने बाद राज आए और गुड़िया को ले गए. मुझे बहुत तसल्ली हुई. पर अम्मां गुड़िया के वियोग को सहन न कर पाईं. उस के बाद अम्मां निरंतर बीमार रहने लगीं.

अम्मां का जो थोड़ाबहुत सहारा था, वह भी खत्म हो गया. उन की देखभाल का भार और बढ़ गया.

एक साल बाद फिर गुड़िया आई. तब वह 2 महीने की प्रेग्नेंट थी. राज ने फिर अपनी नौकरी बदल ली. अब कनाडा से अरब कंट्री में चला गया. वहां राज सिर्फ सालभर के लिए कौंट्रैक्ट में गया था. अब तो गुड़िया को ले जाने का ही प्रश्न नहीं था. गुड़िया प्रेग्नेंट थी.

क्या आप मेरी स्थिति को समझ सकेंगे? मैं कितने मानसिक तनावों से गुजर रही थी, इस की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता. मैं किस से कहती? अम्मां समझने लायक स्थिति में नहीं थीं. गुड़िया को कह कर उसे परेशान नहीं करना चाहती थी. इस समय वैसे ही वह प्रेग्नेंट थी. उसे परेशान करना तो पाप है. गुड़िया इन सब बातों से अनजान थी.

डाक्टर ने गुड़िया को बेड रेस्ट के लिए कह दिया था. अतः वह ससुराल भी जा नहीं सकती थी. उस की सासननद आ कर कभी उस को देख कर जाते. उन के आने से मेरी परेशानी ही बढ़ती, पर मैं क्या करूं? अपनी समस्या को कैसे बताऊं? गुड़िया की मम्मी ने तो पहले ही अपना पल्ला झाड़ लिया था.

मैं जिम्मेदारी से भागना नहीं चाहती थी, परंतु विभिन्न प्रकार की आशंकाओं से मैं घिरी हुई थी. मैं ने कभी कोई खुशी की बात तो देखी नहीं, हमेशा ही मेरे साथ धोखा ही होता रहा. मुझे लगने लगा कि मेरी काली छाया मेरी गुड़िया पर ना पड़े. पर, मैं इसे किसी को कह भी नहीं सकती. अंदर ही अंदर मैं परेशान हो रही थी. उसी समय मेरे मेनोपोज का भी था.

इस बीच अम्मां का देहांत हो गया.

गुड़िया का ड्यू डेट भी आ गया और उस ने एक सुंदर से बेटे को जन्म दिया. मैं खुश तो थी, पर जब तक उस के पति ने आ कर बच्चे को नहीं देखा, मेरे अंदर अजीब सी परेशानी होती रही थी.

जब गुड़िया का पति आ कर बच्चे को देख कर खुश हुआ, तब मुझे तसल्ली आई.

अब तो गुड़िया अपने पति के साथ विदेश में बस गई और मैं अकेली रह गई. यदि गुड़िया अपने देश में होती तो मुझ से मिलने आती रहती, पर विदेश में रहने के कारण साल में एक बार ही आ पाती. फिर भी मुझे तसल्ली थी. अब कोरोना की वजह से सालभर से ज्यादा हो गया, वह नहीं आई. और अभी आने की संभावना भी इस कोरोना के कारण दिखाई नहीं दे रही, पर मैं ने एक लड़की को पढ़ालिखा कर उस की शादी कर दी. भाभी की भी शादी कर दी. यह तसल्ली मुझे है. पर बुढ़ापे में रिटायर होने के बाद अकेलापन मुझे खाने को दौड़ता है. इस को एक भुक्तभोगी ही जान सकता है.

अब आप ही बताइए कि मेरी क्या गलती थी, जो पूरी जिंदगी मैं ने इतनी तकलीफ पाई? क्या लड़की होना मेरा गुनाह था? लड़का होना और मेरी जिंदगी से खेलना मेरे पति के लड़का होने का घमंड? उस को सभी छूट…? यह बात मेरी समझ में नहीं आई? आप की समझ में आई तो मुझे बता दें.

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Social Story: क्वार्टर: क्या हुआ था धीमा के साथ

Social Story: कुंजू प्रधान को घर आया देख कर धीमा की खुशी का ठिकाना न रहा. धीमा की पत्नी रज्जो ने फौरन बक्से में से नई चादर निकाल कर चारपाई पर बिछा दी. कुंजू प्रधान पालथी मार कर चारपाई पर बैठ गया. ‘‘अरे धीमा, मैं तो तुझे एक खुशखबरी देने चला आया…’’ कुंजू प्रधान ने कहा, ‘‘तेरा सरकारी क्वार्टर निकल आया है, लेकिन उस के बदले में बड़े साहब को कुछ रकम देनी होगी.’’ ‘‘रकम… कितनी रकम देनी होगी?’’ धीमा ने पूछा. ‘‘अरे धीमा… बड़े साहब ने तो बहुत पैसा मांगा था, लेकिन मैं ने तुम्हारी गरीबी और अपना खास आदमी बता कर रकम में कटौती करा ली थी,’’ कुंजू प्रधान ने कहा. ‘‘पर कितनी रकम देनी होगी?’’ धीमा ने दोबारा पूछा. ‘‘यही कोई 5 हजार रुपए,’’ कुंजू प्रधान ने बताया. ‘‘5 हजार रुपए…’’ धीमा ने हैरानी से पूछा, ‘‘इतनी बड़ी रकम मैं कहां से लाऊंगा?’’

‘‘अरे भाई धीमा, तू मेरा खास आदमी है. मुझे प्रधान बनाने के लिए तू ने बहुत दौड़धूप की थी. मैं ने किसी दूसरे का नाम कटवा कर तेरा नाम लिस्ट में डलवा दिया था, ताकि तुझे सरकारी क्वार्टर मिल सके. आगे तेरी मरजी. फिर मत कहना कि कुंजू भाई ने क्वार्टर नहीं दिलाया,’’ कुंजू प्रधान ने कहा. ‘‘लेकिन मैं इतनी बड़ी रकम कहां से लाऊंगा?’’ धीमा ने अपनी बात रखी. ‘‘यह गाय तेरी है…’’ सामने खड़ी गाय को देखते हुए कुंजू ने कहा, ‘‘क्या यह दूध देती है?’’ ‘‘हां, कुंजू भाई, यह मेरी गाय है और दूध भी देती है.’’ ‘‘अरे पगले, यह गाय मुझे दे दे. इसे मैं बड़े साहब की कोठी पर भेज दूंगा. बड़े साहब गायभैंस पालने के बहुत शौकीन हैं. तेरा काम भी हो जाएगा.’’ कुंजू प्रधान की बात सुन कर धीमा ने रज्जो की तरफ देखा, मानो पूछ रहा हो कि क्या गाय दे दूं? रज्जो ने हलका सा सिर हिला कर रजामंदी दे दी.

रज्जो की रजामंदी का इशारा पाते ही कुंजू प्रधान के साथ आए उस के एक चमचे ने फौरन गाय खोल ली. रास्ते में उस चमचे ने कुंजू प्रधान से पूछा, ‘‘यह गाय बड़े साहब की कोठी पर कौन पहुंचाएगा?’’ ‘‘अरे बेवकूफ, गाय मेरे घर ले चल. सुबह ही बीवी कह रही थी कि घर में दूध नहीं है. बच्चे परेशान करते हैं. अब घर का दूध हो जाएगा… समझा?’’ कुंजू प्रधान बोला. ‘‘लेकिन बड़े साहब और क्वार्टर?’’ उस चमचे ने सवाल किया. ‘‘मुझे न तो बड़े साहब से मतलब है और न ही क्वार्टर से. क्वार्टर तो धीमा का पहली लिस्ट में ही आ गया था. यह सब तो ड्रामा था.’’ कुंजू प्रधान दलित था. जब गांव में दलित कोटे की सीट आई, तो उस ने फौरन प्रधानी की दावेदारी ठोंक दी थी, क्योंकि अपनी बिरादरी में वही तो एक था, जो हिंदी में दस्तखत कर लेता था. उधर गांव के पहले प्रधान भगौती ने भी अपने पुराने नौकर लालू, जो दलित था, का परचा भर दिया था, क्योंकि भगौती के कब्जे में काफी गैरकानूनी जमीन थी.

उसे डर था, कहीं नया प्रधान उस जमीन के पट्टे आवंटित न करा दे. इस जमीन के बारे में कुंजू भी अच्छी तरह जानता था, तभी तो उस ने चुनाव प्रचार में यह खबर फैला दी थी कि अगर वह प्रधान बन गया, तो गांव वालों के जमीन के पट्टे बनवा देगा. जब यह खबर भगौती के कानों में पड़ी, तो उस ने फौरन कुंजू को हवेली में बुलवा लिया था, क्योंकि भगौती अच्छी तरह जानता था कि अगला प्रधान कुंजू ही होगा. कुंजू और भगौती में समझौता हो गया था. बदले में भगौती ने कुंजू को 50 हजार रुपए नकद व लालू की दावेदारी वापस ले ली थी. लिहाजा, कुंजू प्रधान बन गया था. आज धीमा के क्वार्टर के लिए नींव की खुदाई होनी थी. रज्जो ने अगरबत्ती जलाई, पूजा की. धीमा ने लड्डू बांट कर खुदाई शुरू करा दी थी. नकेलु फावड़े से खुदाई कर रहा था, तभी ‘खट’ की आवाज हुई. नकेलु ने फौरन फावड़ा रोक दिया.

फिर अगले पल कुछ सोच कर उस ने दोबारा उसी जगह पर फावड़ा मारा, तो फिर वही ‘खट’ की आवाज आई. ‘‘कुछ है धीमा भाई…’’ नकेलु फुसफुसाया, ‘‘शायद खजाना है.’’ नकेलु की आंखों में चमक देख कर धीमा मुसकराया और बोला, ‘‘कुछ होगा तो देखा जाएगा. तू खोद.’’ ‘‘नहीं धीमा भाई, शायद खजाना है. रात में खोदेंगे, किसी को पता नहीं चलेगा. अपनी सारी गरीबी खत्म हो जाएगी,’’ नकेलु ने कहा. ‘‘कुछ नहीं है नकेलु, तू नींव खोद. जो होगा देखा जाएगा.’’ नकेलु ने फिर फावड़ा मारा. जमीन के अंदर से एक बड़ा सा पत्थर निकला. पत्थर पर एक आकृति उभरी हुई थी. ‘‘अरे, यह तो किसी देवी की मूर्ति लगती है,’’ सड़क से गुजरते नन्हे ने कहा. फिर क्या था. मूर्ति वाली खबर गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई और वहां पर अच्छीखासी भीड़ जुट गई. ‘‘अरे, यह तो किसी देवी की मूर्ति है…’’ नदंन पंडित ने कहा, ‘‘देवी की मूर्ति धोने के लिए कुछ ले आओ.’’ नदंन पंडित की बात का फौरन पालन हुआ. जुगनू पानी की बालटी ले आया. बालटी में पानी देख कर नदंन पंडित चिल्लाया, ‘‘अरे बेवकूफ, पानी नहीं गाय का दूध ले कर आ.’’ नदंन पंडित का इतना कहना था कि जिस के घर पर जितना गाय का दूध था, फौरन उतना ही ले आया. गांव में नदंन पंडित की बहुत बुरी हालत थी.

उस की धर्म की दुकान बिलकुल नहीं चलती थी. आज से उन्हें अपना भविष्य संवरता लग रहा था. नंदन पंडित ने मूर्ति को दूध से अच्छी तरह से धोया, फिर मूर्ति को जमीन पर गमछा बिछा कर 2 ईंटों की टेक लगा कर रख दिया. उस के बाद 10 रुपए का एक नोट रख कर माथा टेक दिया. इस के बाद नंदन पंडित मुुंह में कोई मंत्र बुदबुदाने लग गया था. लेकिन उस की नजर गमछे पर रखे नोटों पर टिकी थी. गांव वाले बारीबारी से वहां माथा टेक रहे थे. धीमा और रज्जो यह सब बड़ी हैरानी से देख रहे थे. उन की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा. ‘‘यह देवी की जगह है, यहां पर मंदिर बनना चाहिए,’’ भीड़ में से कोई बोला. ‘हांहां, मंदिर बनना चाहिए,’ समर्थन में कई आवाजें एकसाथ उभरीं. दूसरे दिन कुंजू प्रधान के यहां सभा हुई. सभा में पूरे गांव वालों ने मंदिर बनाने का प्रस्ताव रखा और आखिर में यही तय हुआ कि मंदिर वहीं बनेगा, जहां मूर्ति निकली है और धीमा को कोई दूसरी जगह दे दी जाएगी. धीमा को गांव के बाहर थोड़ी सी जमीन दे दी गई, जहां वह फूंस की झोंपड़ी डाल कर रहने लगा था.

धीमा अब तक अच्छी तरह समझ चुका था कि सरकारी क्वार्टर के चक्कर में उस की पुश्तैनी जमीन भी हाथ से निकल चुकी है. मंदिर बनने का काम इतनी तेजी से चला कि जल्दी ही मंदिर बन गया. गांव वालों ने बढ़चढ़ कर चंदा दिया था. आज मंदिर में भंडारा था. कई दिनों से पूजापाठ हो रहा था. नंदन पंडित अच्छी तरह से मंदिर पर काबिज हो चुका था. खुले आसमान के नीचे फूंस की झोंपड़ी के नीचे बैठा धीमा अपने बच्चों को सीने से लगाए बुदबुदाए जा रहा था, ‘‘वाह रे ऊपर वाले, इनसान की जमीन पर इनसान का कब्जा तो सुना था, मगर कोई यह तो बताए कि जब ऊपर वाला ही इनसान की जमीन पर कब्जा कर ले, तो फरियाद किस से करें?’’

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