एडवेंचर स्पोर्ट्स की हैं शौकीन तो दिल्ली के पास इन जगहों का करें रुख

हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्हें घूमने-फिरने के अलावा एडवेंचर स्पोर्ट्स का भी बेहद शौक होता है. वो घूमने-फिरने के लिए ऐसी जगहों को चुनते हैं, जहां जाकर वो एडवेंचर स्पोर्ट्स का मजा ले सकते हैं. अगर आप दिल्ली या इसके आसपास की जगहों पर रहती हैं, तो आप एडवेंचर डेस्टिनेशन पर जा सकती हैं. क्योंकि दिल्ली के आस पास ही ऐसी बहुत सी जगहें हैं जहां आप अपने दोस्तों के साथ जाकर एडवेंचर स्पोर्ट्स का मजा ले सकती हैं तो चलिये आपको बताते हैं उन जगहों के बारे में.

जैसलमेर

जैसलमेर को गोल्डन सिटी भी कहा जाता है. यह दिल्ली से करीब 480 किमी दूर है. थार रेगिस्तान के बीचो-बीच स्थित जैसलमेर में आप रेत में टैक्टर बाइक की सवारी भी कर सकती हैं. यह एक अलग तरह का अनुभव होगा. अगर आप स्पोर्ट्स के शौकीन हैं तो यह जगह आपके लिए बेहद खास है.

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शिमला

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला अपनी खूबसूरत वादियों के लिए जाना जाता है लेकिन यहां आप सुकून के साथ-साथ अडवेंचर का मजा भी ले सकती हैं. दिल्ली से 360 किमी दूर स्थित शिमला में टौय ट्रेन की सवारी के अलावा ट्रैकिंग और रौक क्लाइम्बिंग करने का मौका भी मिलेगा. यह एक ऐसा परफेक्ट टूरिस्ट स्पौट है, जहां एक ही जगह पर आपको कई तरह के अनुभव होंगे और हर एक पल यादगार होगा.

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नौकुचियाताल

अगर आपको पैराग्लाइडिंग का शौक है तो आपके लिए नौकुचियाताल बेस्ट है. ‘पैराग्लाइडर्स का स्वर्ग’ कहे जानेवाले नौकुचियाताल में आपको चारों और घने जंगल ही दिखाई देंगे. उत्तराखंड का यह मशहूर टूरिस्ट प्लेस दिल्ली से करीब 300 किमी दूर है. मार्च से जून और अक्टूबर से दिसंबर तक यहां जाने के लिए सबसे अच्छा वक्त माना जाता है.

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सोहना

कुछ रोमांचक करने के लिए आपको बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है. दिल्ली से सिर्फ 40 किमी दूर हरियाणा में स्थिति सोहना इसके लिए परफेक्ट जगह है. यहां पर आप बैलून में बैठकर चारों तरफ के नजारे देख सकती हैं. यह जमीन के करीब 5000 फुट ऊपर उड़ता है. इतनी ऊंचाई से जंगलों और पहाड़ों को निहारने का अलग ही मजा है. वैसे, इसके लिए उम्र की कोई सीमा भी नहीं है यानी पूरी फैमिली इसका मजा ले सकती है.

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जिम कौर्बेट

नैनीताल के पास स्थित जिम कौर्बेट यूं तो शेर, हाथी, जैसे बड़े जंगली जानवरों के लिए मशहूर है लेकिन इसके आसपास आप कई तरह के एडवेंचर स्पोर्ट्स का भी मजा ले सकती हैं. दिल्ली से 226 किमी दूर स्थित जिम कौर्बेट में आप रौक क्लाइंबिंग, माउंटेन बाइकिंग, ट्रैकिंग जैसे कई एडवेंचर स्पोर्ट्स का मजा ले सकती हैं. पास ही, रिवर राफ्टिंग का मजा भी ले सकती हैं.

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हार को हराना ही चुनौती है : स्नेहा वाघ

धारावाहिक ‘ज्योति’ से चर्चा में आने वाली टीवी अभिनेत्री स्नेहा वाघ मुंबई की हैं. उन्होंने 17 साल की उम्र में मराठी थिएटर से अभिनय की शुरुआत की थी. इसके बाद कई मराठी धारावाहिकों में काम करने के बाद उन्हें हिंदी धारावाहिक ‘ज्योति’ मिला और धीरे-धीरे वह सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गयीं. उन्हें बचपन से ही अभिनय की इच्छा थी और इसमें साथ दिया उनकी मां दमयंती वाघ ने. उन्होंने ‘लन्दन फिल्म अकादमी’ से फिल्म मेकिंग का कोर्स भी किया है.

जितनी सफल वह अभिनय के क्षेत्र में हैं, उतना सफल उनका निजी जीवन नहीं रहा. 19 साल की उम्र में उनकी पहली शादी अविष्कार दार्वेकर के साथ हुई, लेकिन घरेलू हिंसा के चलते उन्होंने उसे तोड़ दिया, इसके 7 साल बाद स्नेहा ने दूसरी शादी की, पर सामंजस्य के अभाव से उसे भी तोडना पड़ा. अभी वह सिंगल हैं और अपने काम पर फोकस्ड हैं. उनके इस कठिन सफर में साथ दिया उनके माता-पिता ने, जिन्होंने हर समय उन्हें सहयोग दिया. इस समय वह स्टार भारत टीवी के धारावाहिक ‘चंद्रशेखर’ में चन्द्रशेखर की मां जगरानी तिवारी की भूमिका निभा रही हैं, उस समय की परिधान में वह सामने आई. पेश है उनसे मिलकर बात करने के कुछ अंश.

इस धारावाहिक में खास क्या लगा?

मेरी तरफ से उस समय के क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के लिए ये एक छोटा सा योगदान है, क्योंकि आज कल के बच्चे चंद्रशेखर आजाद के निजी जीवन के बारें में बहुत कम जानते हैं. इसलिए उसमें मुझे कुछ भी करने का मौका मिलना मेरे लिए बड़ी बात है.

कितना रिसर्च करना पड़ा?

बहुत शोध करना पड़ा, क्योंकि चंद्रशेखर एक शार्प शूटर थे, उनकी कोई भी गोली खाली नहीं जाती थी. उनकी ये आदत कहां से आई, उनका स्वभाव, रहन-सहन आदि सभी की जानकारी लेनी पड़ी, क्योंकि कोई भी गलत सूचना उनके चाहने वालो को ठेस न पहुंचा दे, इसका ध्यान रखना पड़ा.

काफी दिनों बाद वापस काम करने की वजह क्या है ?

मैं कैमरे से अधिक कैमरे के पीछे रहकर काम करना और ट्रेवलिंग करना पसंद करती हूं. इसमें कुछ क्रिएटिव काम करना जैसे कहानी लिखना, स्क्रिप्ट लिखना आदि करती हूं. रशिया और अमेरिका छोड़कर हर जगह घूम चुकी हूं. मुझे हर स्थान के रहन-सहन के बारें में जानना अच्छा लगता है.

अभिनय की प्रेरणा कहां से मिली?

बचपन से ही कला की ओर कुछ करने की इच्छा थी. 3 साल की उम्र से मां ने मुझे जबरदस्ती डांस के क्लास में डाल दिया था. 3 साल से 16 साल तक मैंने सिर्फ शास्त्रीय नृत्य में भरतनाट्यम, कत्थक, कुचिपुड़ी, लोक नृत्य आदि सब तरह के डांस सीख लिये थे. उसके बाद मुझे थिएटर में काम करने का मौका मिला और बहुत मजा आया. फिर मैं नृत्य छोड़ अभिनय में आ गयी.

क्या कुछ संघर्ष था? क्या अपने काम से संतुष्ट हैं?

मैंने कभी भी किसी से जाकर काम नहीं मांगा, मराठी थिएटर से मराठी धारावाहिक, फिल्म और फिर हिंदी धारावाहिक मिलता चला गया और मैं अपने काम से पूरी तरह से संतुष्ट हूं. मैंने पैसा, नाम, शोहरत सब कमाया है. मैंने इंडस्ट्री में अपने तरीके से काम किया है. किसी तरह की प्रताड़ना का सामना कभी नहीं करना पड़ा.

परिवार का सहयोग कितना था?

पिता नहीं चाहते थे कि मैं कभी अभिनय के क्षेत्र में जाऊं, क्योंकि मैं उस समय केवल 15 साल की थी, पर मां और मुझे अभिनय पसंद थी. मेरी मां क्रिएटिव स्वभाव की हैं और मराठी में गीत लिखती हैं. उन्होंने ही पिता को समझाया. जब मेरा काम पिता ने टीवी पर देखा और लोगों की तारीफे सुनी तो खुश हुए और मेरी गाड़ी चल पड़ी, लेकिन उस दौरान भी समय से लौटना, देरी से आने पर फोन करना आदि करना पड़ता था.

आपके जीवन का टर्निंग प्वाइंट क्या था? उससे आपने क्या सीखा?

हिंदी धारावाहिक ‘ज्योति’ मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट था. जिससे मुझे सब कुछ मिला. मैं उस समय मराठी से हिंदी में आई थी और मैंने उस शो से काफी कुछ सीखा है.

21वीं सदी में जाने के बाद टीवी धारावाहिकों में महिलाओं को आज भी प्रताड़ित और शोषित दिखाया जाता है, ऐसे शो से आप कितनी सहमत है?

हमारे देश में रोती-बिलखती महिला को देखकर लोग संवेदनशील हो जाते हैं. ऐसे में उसे देखने लगते हैं और उसी को कैश कर लिया जाता है.

क्या कोई खास ड्रीम प्रोजेक्ट है?

मैं अभिनय से अधिक फिल्में बनाना पसंद करती हूं. मुझे रियल स्टोरी काफी आकर्षित करती है. जोया अख्तर की फिल्में बहुत पसंद है.

कितनी फूडी और फैशनेबल है?

में बहुत फूडी हूं मां के हाथ का बनाया खाना पसंद है. मैं खाना बनाने से अधिक हेल्दी फूड को लेकर बेक्ड करना अधिक पसंद करती हूं. फैशनेबल एकदम नहीं हूं. सिंपल रहना पसंद है.

समय मिले तो क्या करती हैं?

परिवार के साथ समय बिताती हूं, क्योंकि वही मुझे तनाव से राहत देते है. इसके अलावा ट्रेवल करती हूं, लिखती हूं और बेक्ड करती हूं.

आप किस स्थान पर बार-बार जाना चाहती हैं?

मुझे यूरोप बहुत पसंद है, वहां का हर स्थान पर मुझे कवितामय और सृजनात्मक वातावरण का एहसास कराता है. भारत में केरल पसंद है और मुझे नार्थ ईस्ट जाने की इच्छा है.

क्या महिलाओं के लिए कोई मेसेज देना चाहती हैं?

कोई अगर आपको नीचा दिखाने की कोशिश करे, तो आप अपने आप को कभी कम न समझे. किसी के कुछ कहने से अधिक जरुरी है कि आप अपने लिए क्या सोचती हैं. आपका आत्मविश्वास कितना स्ट्रोंग है. हार को हराना ही आपकी चुनौती है.

कोई सोशल वर्क करना चाहती हैं?

मैं असहाय महिलाओं और बच्चों के लिए खुद कुछ करना चाहती हूं.

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मां की चेतना को बनाए रखने की जरुरत है : लारा दत्ता

साल 2000 में ‘मिस यूनिवर्स’ का खिताब जीतकर चर्चा में आई लारा दत्ता आज एक नामचीन अभिनेत्री हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उन्होंने ‘अंदाज’ फिल्म से कदम रखा और फिल्म सफल होने की वजह से उन्हें कई फिल्में मिली, जो बौक्स औफिस पर हिट रही. आधुनिक विचार रखने वाली लारा ने फिल्मों में अलग-अलग भूमिका निभाई है, मसलन मस्ती, नो एंट्री, काल, पार्टनर, बिल्लू, हाउस फुल, भागम भाग, पार्टनर, फितूर, वेलकम टू न्यूयार्क आदि.

स्वभाव से नम्र और हंसमुख लारा ने साल 2011 में टेनिस खिलाडी महेश भूपति के साथ शादी की और एक बेटी सायरा की मां बनीं. मां बनने के बाद उनके काम की प्रायोरिटी बदल चुकी है. पहले वह परिवार और बाद में कैरियर देखती हैं, यही वजह है कि उन्होंने बीच में कुछ दिनों के लिए काम से ब्रेक भी लिया था. अभी वह एंड टीवी पर प्रसारित होने वाली रियलिटी शो ‘हाई फीवर डांस का नया तेवर’ की जज बनी हैं और पहली बार छोटे पर्दे पर काम कर रही हैं. उनसे मिलकर बात करना रोचक था, पेश है अंश.

इस शो को करने की खास वजह क्या है?

मेरे पास पहले भी कई औफर रियलिटी शो होस्ट और जज करने के लिए आए थे, लेकिन ये एक अलग तरह का डांस शो है, जिसमें सेलिब्रिटी जोड़ी नहीं. ये आम लोग और अलग-अलग रिश्ते के साथ आये है ,जो अनोखी है, जैसे सास बहू की जोड़ी, ननद भाभी की जोड़ी, जेठ बहू की जोड़ी, दादा पोते की जोड़ी आदि सभी मेरे लिए रुचिपूर्वक है. आज मैं अगर बेटी को घर छोड़कर बाहर काम करने के लिए निकलूं और वह भी टीवी की ओर, जहां बहुत अधिक समय देना पड़ता है, तो वह बहुत हो स्ट्रौंग शो होना चाहिए.

इस शो में आप किस बात पर अधिक ध्यान देंगी?

मैं इसमें रिश्तों की गहराई पर अधिक ध्यान दूंगी, क्योंकि रिश्ते ही आपको नई जिंदगी देते हैं और इसकी अहमियत हमेशा रहती है. यह गहराई डांस के माध्यम से पता चल सकेगी.

रिश्तों के मायने आज बदल चुके हैं,  व्यक्ति के जीवन में ये कितना महत्व रखते हैं और आपकी सोच इस बारें में क्या है?

मेरे कैरियर में हमेशा परिवार सबसे ऊपर रहा है. ऐसी कोई भी फिल्म या अभिनय मेरे लिए अधिक नहीं था, जो मेरी बेटी या परिवार से बढ़कर हो. इसके लिए मैंने बीच में ब्रेक भी लिया है और परिवार को संभाला है.

मेरे हिसाब से जो लोग आज हमारे देश में भी रिलेशनशिप में रहते हैं, उनकी संख्या विदेशों की तुलना में काफी कम है. इसे लोग पूरी तरह से अपना नहीं पाए हैं. ये सही है, क्योंकि हमारे देश में रिश्तों की परिभाषा दूसरे देशों से अलग है. इसमें जो कमी आ रही है, उसे ही हम रियलिटी शो के द्वारा जोड़ने और उसकी महत्व को समझाने का प्रयास कर रहे हैं.

आप परिवार के साथ काम का सामंजस्य कैसे करती है?

आज अधिकतर मां कामकाजी हैं, ऐसे में उन्हें एक प्लानिंग करनी पड़ती है. कई बार ऐसा होता है कि आप कुछ न कर पाने की वजह से अपराधबोध का शिकार होते हैं, पर मेरे और महेश भूपति के बीच में एक अच्छा सामंजस्य है. अगर मेरा काम रहता है, तो वह बच्चे के साथ रहते हैं और अगर उनकी गेम होती है, तो मैं बेटी के साथ में रहती हूं. अब मेरी बेटी थोड़ी बड़ी भी हो गयी है. स्कूल में जाती है और उसे भी समझ में आ गया है कि मम्मी क्या करती है, इसलिए मुश्किल नहीं होती.

फिल्मों में कम दिखायी पड़ने की वजह क्या है?

अधिक फिल्म करने की अब कोई वजह नहीं, जो कहानी अच्छी लगती है, उसे ही आराम से करती हूं, क्योंकि अगर मैं घर छोड़ रही हूं, तो कहानी इतनी आकर्षक होनी चाहिए कि उसे करने के लिए मेरा दिल ललचाये.

क्या कुछ मलाल रह गया है?

मेरे लिए मेरी एक पसंदीदा फिल्म ‘चलो दिल्ली’ थी, जिसे मैंने ही प्रोड्यूस किया था. ऐसी कोई भी भूमिका जिसे करने में चुनौती हो. उसे करना चाहती हूं. ये शो भी मेरे लिए खास है, क्योंकि बहुत दिनों बाद मुझे आम दर्शकों के साथ जुड़ने का अवसर मिल रहा है. अभी तक तो मैं केवल चरित्र के साथ ही जुड़ रही थी.

बच्चों में आजकल हिंसात्मक प्रवृत्ति बढ़ी है, इसे कैसे लेती हैं? क्या संदेश देना चाहती हैं?

मां बनने के बाद पहली जिम्मेदारी होती है कि बच्चे का लालन-पालन और सुरक्षा अच्छी तरह से हो. आज मीडिया बहुत स्ट्रौंग है, पलक झपकते ही न्यूज आ जाती है. जबकि पहले कई दिनों बाद कोई समाचार मिलता था. इसलिए मां की चेतना को बनाये रखने और सजग रहने की जरुरत है. सावधान रहना भी आवश्यक है.

आप कैसी मां है?

मैं अनुशासन प्रिय मां हूं और उसे बनाए रखने की कोशिश करती हूं.

आपकी फिटनेस का राज क्या है?

बच्चा होने के बाद मेरा वजन बढ़ गया था, लेकिन मैंने इसे आर्गेनिकली और नैचुरली धीरे-धीरे कम किया है. केमिकल चीजों पर मैं विश्वास नहीं करती. डाइटिंग मैं नहीं करती. मुझे अपनी बेटी को बढ़ते हुए, उसकी शादी और बच्चे को देखने की इच्छा है. इसके अलावा मेरे ऊपर इतना कोई दबाव नहीं है कि मैं पतली होने के लिए कुछ भी करती फिरू.

आगे की योजनायें क्या है?

आगे मैं कुछ हिंदी फिल्मों और इंटरनेशनल सीरीज को प्रोड्यूस करना चाहती हूं. जो रियल स्टोरी बेस्ड हो, जिसे लोग देखना पसंद करें.

क्या कुछ सामाजिक कार्य करने की इच्छा है?

मैंने ‘ह्यूमन ट्राफिकिंग’ के साथ कुछ काम किया है. इसके अलावा ‘आश्रय’ के बच्चों के साथ भी काम किया है. महिला और बच्चे ही मेरे लिए खास है जिनके लिए मुझे काम करना पसंद है.

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11 चीजें बढ़ाएं सैक्स ड्राइव, आप भी आजमा कर देखें

दैनिक आहार में कुछ महत्त्वपूर्ण खाद्यपदार्थ शामिल कर आप अपने उन खास पलों के रोमांच को किस तरह बढ़ा सकते हैं, जरूर जानिए:

सामन:

सामन ओमेगा-3 फैटी ऐसिड डीएचए और ईपीए का एक ज्ञात प्राकृतिक स्रोत है. इस से मस्तिष्क में डोपामाइन स्तर बढ़ने में मदद मिलती है, जिस से उत्तेजना पैदा होती है. ओमेगा-3 डोपामाइन की उत्पादन क्षमता बढ़ाता है. यह मस्तिष्क के लिए एक महत्त्वपूर्ण रसायन है, जो व्यक्ति के चरमसुख की भावना को ट्रिगर करता है.

कद्दू के बीज: कद्दू के बीज जस्ता (जिंक) का एक बड़ा स्रोत हैं, जो टेस्टोस्टेरौन को बढ़ा देते हैं. इन में आवश्यक मोनोअनसैचुरेटेड वसा भी होती है, जिस से शरीर में कोलैस्ट्रौल बनता है. यौन हारमोन को ठीक से काम करने के लिए कोलैस्ट्रौल की जरूरत पड़ती है.

बैरीज: स्ट्राबैरी, ब्लैकबैरी, नीले जामुन ये सभी प्राकृतिक मूड बूस्टर हैं. स्ट्राबैरी में पर्याप्त विटामिन सी और बी होता है. ब्लैकबैरी और नीले जामुन फाइटोकैमिकल युक्त होते हैं, जो व्यक्ति के मूड को रामांटिक बनाते हैं.

केला: केला पोटैशियम का प्राकृतिक स्रोत है. पोटैशियम एक महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्व है, जो मांसपेशी संकुचन को बढ़ाता है और उन खास पलों में बहुत अहम होता है. साथ ही केला ब्रोमेलैन से समृद्ध होता है, जो टेस्टोस्टेरौन उत्पन्न करने के लिए जिम्मेदार होता है.

तरबूज: तरबूज में 92% पानी है, लेकिन बाकी 8% पोषक तत्त्वों से भरा होता है. तरबूज का शांत प्रभाव रक्तवाहिकाओं को शांत करता है. यह स्त्री और पुरुष दोनों के अंगों में रक्तप्रवाह सुधारता है.

लहसुन: रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल किए जाने वाला खास आहार लहसुन ऐलिकिन समृद्ध होता है, जो पुरुषों और महिलाओं दोनों के यौन अंगों में रक्तप्रवाह को बढ़ाता है. रात में शहद में भिगो कर रखा गया कच्चा लहसुन खाना लाभप्रद होता है.

केसर: केसर एक प्राकृतिक कामोद्दीपक है, जो स्त्रीपुरुष दोनों के लिए उन पलों का आनंद बढ़ाने में मददगार होता है. सब से महंगे मसालों में से एक माने जाने वाले केसर में क्रोकटोन नामक मिश्रण होता है, जो मस्तिष्क में उत्तेजना वाले हारमोन को ट्रिगर करते हुए इच्छा बढ़ाता है. केसर में पिको क्रोकिन रसायन होता है, जो स्पर्श के प्रति संवेदना बढ़ाता है.

लौंग: सदियों से पुरुष यौन रोग का इलाज करने के लिए हमारे देश में लौंग का उपयोग किया जाता है. यदि नियमितरूप से लौंग खाई जाए तो यौन गतिविधि में वृद्धि होती है. इस के अलावा लौंग सांस की गंध से छुटकारा दिलाने में भी मददगार है. लौंग के साथ जीरा एवं दालचीनी का सेवन और अधिक कामोद्दीपक है.

डार्क चौकलेट: डार्क चौकलेट ऐंटीऔक्सीडैंट से भरपूर होती है, जिस के चलते अधिक अनुभूति के लिए यह एक स्वादिष्ठ तरीका है. ऐंटीऔक्सीडैंट उम्र बढ़ने के संकेतों को कम करते हैं और यौन आनंद बढ़ाते हैं.

पालक: पालक जैसी पत्तेदार हरी सब्जियों में जबरदस्त फौलिक ऐसिड होते हैं, जो उर्वरता और कामेच्छा बढ़ाने में मदद करते हैं.

अंडे: अंडे उच्च स्तर के प्रोटीन से भरपूर होते हैं ये स्टैमिना का स्रोत हैं. इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप इन्हें कैसे खाते हैं. इन का किसी भी तरह खाना ऊर्जा प्रदान करता है.

 – सौम्या सताक्षी, न्यूट्रिशनिस्ट हैल्थियंस

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जीएसटी ने बिगाड़ा शादी का गणित, कैसे हम आप को बताते हैं

रमा के पिता रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी हैं. तीसरी श्रेणी के कर्मचारी रमा के पिता ने रिटायरमैंट का पैसा बेटी की शादी के लिए बचा कर रखा था. शादी तय होने के बाद रमा के पिता ने सोचा कि अपने गांव से शादी समारोह संपन्न हो जाए तो खर्चा कम होगा. मगर लड़के वालों की तरफ से शर्त रख दी गई कि वे गांव में शादी करने नहीं जाएंगे. ऐसे में काफी तलाश के बाद हाइवे पर एक रिसौर्ट शादी के लिए बुक किया गया तो पता चला कि कम से कम क्व10 लाख का खर्च होगा. रमा के पिता के पास इतना पैसा नहीं था. लड़के वालों की बात को मानने के अलावा उन के पास कोई विकल्प भी नहीं था. ऐसे में वे पैसों के इंतजाम में लग गए.

शादी के खर्च में हाल के कुछ महीनों में 30 से 40% की बढ़ोत्तरी हो गई है, जिस का असर रमा के पिता जैसे कितने ही पेरैंट्स पर पड़ रहा है.

टैक्स पर टैक्स

इस में जीएसटी का बड़ा रोल है. पहले रिसौर्ट, क्लब और होटल में 12% टैक्स पड़ता था. जीएसटी के बाद यह टैक्स बढ़ कर 18 से 28% हो गया है. रिसौर्ट, क्लब और होटल में शादी करने वाले लोग पहले की तरह शादी का इंतजाम खुद नहीं करते हैं. वे सजावट से ले कर शादी तक का पूरा काम अलगअलग कंपनियों पर डाल देते हैं. अब ये कंपनियां अलगअलग इंतजाम पर अलग टैक्स लेने लगी हैं. शादी के इन इंतजामों में मैरिज हाल, गेस्ट हाउस और क्लब के हिसाब से अलगअलग टैक्स देना पड़ता है. इस के अलावा डैकोरेशन, कैटरिंग, मेकअप, डीजे आदि के लिए भी अलगअलग टैक्स हैं. पहले फू्रट चाट, आइसक्रीम पार्लर और चाट वाले लोग अपने खाने पर टैक्स नहीं लेते थे. अब ये लोग भी जीएसटी लेने लगे हैं.

हर बिल में जीएसटी

कमाल की बात यह है कि ये लोग सरकार को भले ही जीएसटी न देते हों पर खुद जीएसटी के नाम पर टैक्स लेने लगे हैं. इस के साथ ही जीएसटी के बाद अपने प्रोडक्ट्स की कीमतें भी बढ़ा चुके हैं.

बेटी की शादी करने वाले दिनेश कुमार कहते हैं कि सरकार कहती थी कि जीएसटी लागू होने के बाद जनता को लाभ मिलेगा. शादी का इंतजाम करते समय मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिस ने यह कहा हो कि यह सामान पहले से सस्ता हो गया है. छोटेछोटे काम करने वाले भी जीएसटी के नाम पर टैक्स लेने लगे हैं, जिस से शादी के खर्च में बहुत बढ़ोत्तरी हो गई है.

पिछले साल अपनी बेटी की शादी करने वाले प्रेम कुमार का कहना है कि सरकार ने शादी के सीजन के समय ही नोटबंटी की थी, जिस से शादी के लिए बैंक से पैसे निकालने में लोगों को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा था. जिलाधिकारी से ले कर बैंक मैनेजर तक के सामने जी हुजूरी करनी पड़ी थी.

इस साल शादी के सीजन से पहले ही जीएसटी लागू हो गया. शादी में अलगअलग तरह का बिजनैस करने वाले लोग खुद भले ही जीएसटी को ठीक से समझ न पाए हों पर वे शादी करने वालों से जीएसटी वसूलने में पीछे नहीं हैं. जीएसटी की आड़ ले कर वस्तुओं की कीमत बढ़ा दी गई है.

लड़की वालों की बढ़ी परेशानी

वैसे तो शादी हमेशा दो परिवारों का मिलन होता है, मगर हमारे समाज में शादी का बोझ हमेशा लड़की वालों पर ही पड़ता है. आज भी शादी में दहेज बंद नहीं हुआ है. इस के साथ शादी के इंतजाम में दिखावा बढ़ गया है. गांव में रहने वाले ज्यादातर लोग शहरों में रहने लगे हैं. वे अब गांव में शादी नहीं करना चाहते. ऐसे में उन को होटल, रिसौर्ट का सहारा लेना पड़ता है. वहां खुद ही सारा इंतजाम करना पड़ता है और लड़की के पिता पर ही सारा बोझ डाल दिया जाता है.

निशा के पिता दिवाकर बताते हैं कि लड़की पसंद आने के बाद सब से पहले लड़के वाले यह पूछते हैं कि शादी कैसे होगी? खाने का क्या इंतजाम होगा? बरात कहां रुकेगी? दहेज के साथसाथ यह सब भी लड़की वाले को करना पड़ता है. महंगाई बढ़ने से ये खर्चे और बढ़ गए हैं.

पहले दहेज की मार और अब शादी आयोजन में टैक्स का बोझ लड़की के परिवार को खर्च से दबा रहा है. इस ओर किसी ने सोचने की जरूरत नहीं समझी. आज गांवगांव तक शादी से जुड़े कारोबार करने वाले फैल गए हैं, जिस वजह से लड़की की शादी में आज भी घर, जमीन गिरवी रखने या बेचने की नौबत आ रही है.

समाज में हर किसी को इस का पता है. सभी इस से परेशान हैं इस के बाद भी कोई इस के खिलाफ खड़ा नहीं होना चाहता. महंगी शादियों के बोझ तले दब रहे लड़की के मातापिता की परवाह किसी सरकार को नहीं.

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मिथकों में रह गया पशु प्रेम, आम जनजीवन से दूर कर रही हैं मान्यताएं

मनुष्य को हमेशा पशुओं की ताकत से ईर्ष्या रही है. उस की इच्छा हमेशा ही पौराणिक युग के पशुओं जैसे गुण रखने वाले मानवों की तरह संपूर्णता पाने की रही है. हर सभ्यता में परियों, दैत्यों, उड़ने वाले देवताओं की कल्पनाओं की भरमार रही है. चाहे वे ग्रीक हों, रोमन हों, भिक्षु हों या भारत के.

मिथक और लोककथाएं मानवपशु मिश्रित प्राणियों से भरी रही हैं. इन में से बहुत से पात्रों को देवत्व का दर्जा दे दिया गया है चाहे ईश्वर या फिर शैतान के रूप में. ईसाई कल्पना के अनुसार शैतान को मानव शरीर, बकरी के सींगों वाले, भेड़ की खाल और नाककान वाले तथा जंगली सूअर के दांतों वाले पात्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

यह कैसा अंधविश्वास

मानवपशु मिश्रित पात्र हजारों साल पुरानी गुफाओं में बने चित्रों में दिखते हैं. इन में पुजारियों को पशुओं की तरह की ताकत पाते दर्शाया गया है. भारत में मानवपशु मिश्रित पात्र का सब से लोकप्रिय उदाहरण गणेश का है. भारतीय मिथकों में इन मिश्रित पात्रों को ही पूजनीय नहीं बनाया जाता है, यहां कुर्मा-कछुए, मत्स्य-मछली, गरुड़-बाज, जामवंत-भालू, कामधेनु-गाय, नाग-सर्प को पूजा जाता रहा है.

पेन ग्रीकमिथक में एक देवता है, जिस का ऊपर का बदन मानव का है पर निचला हिस्सा सींग, टांगें बकरी की हैं. वह जंगलों, खेतों, भेड़ों के झुंडों, प्रकृति और संगीत का देवता है. वह अपनी आवाज से डराता है. अंगरेजी का शब्द पैनिक उसी से बना है. जब विशाल दैत्यों टाइटनों ने ग्रीक देवताओं पर हमला किया तो पेन ने ही अपनी आवाज निकाल कर उन्हें डरा कर भगाया.

अजबगजब लोक कथाएं

मरमेड यानी जलपरी, आधा मानव, आधी मछली लगभग हर सभ्यता के मिथकों का हिस्सा है. जेंगू अफ्रीकी देश कैमरून की एक मान्यता के अनुसार एक पानी की देवी है. उस की पूजा करने वालों को वह सुख व समृद्घि देती है. सिरेना और सिरेनी जलपरी और जलचर हैं. फिलीपींस की लोककथाओं के अनुसार ये पानी की रक्षा करते हैं. सिरेना की मधुर आवाज से नाविकों पर मदहोशी छा जाती है और उन की नावें टकरा कर डूब जाती हैं.

डैगोन एक जलचर है जिसे मैसोपोटामिया में पूजा जाता था. जापान में समुद्री चुड़ैलों की कहानियां प्रचलित हैं

प्रथाएं जो खत्म होने को हैं

हार्पी ग्रीको- रोमन भिक्षकों के अनुसार एक ऐसा प्राणी है जिस का निचला शरीर पंख और पंजे पक्षी की तरह के हैं और छाती और सिर औरत का. हार्पी गुस्सैल व लड़ाकू होते हैं और गंदगी में रहते हैं. उन्हें उन लोगों को लाने के लिए भेजा जाता है जो मरने को तैयार नहीं होते. वे दूसरे देवताओं के छोटेमोटे काम भी करते हैं. लिलिटस ग्रीक मान्यताओं के अनुसार पक्षी के पैर वाले, पंखों सहित दैत्य हैं जो लोगों को पाप करने की प्रेरणा देते हैं ताकि समाज को नष्ट करा जा सके.

हर समाज और सभ्यता में इस तरह के मिश्रित मानवपशु देवीदेवता या प्राणी हैं, लेकिन नई सभ्यता में पशुओं के आम जनजीवन से जोड़ने की प्रथा समाप्त होने लगी है. इराक के यजीदी मोर जैसे प्रिय प्राणी मेलक तव्वुस को पूजते हैं. इसी कारण शियाओं और सुन्नियों दोनों के लिए शैतान को पूजने वाले अपराधी घोषित कर दिए गए हैं. पशुप्रेम अब मिथकों में बंध कर रह गया है.

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कहे आईना मुझ सा कोई ना

सौंदर्य और छवि के प्रति सजगता और रुझान कोई पाश्चात्य सभ्यता की देन नहीं है. इतिहास गवाह है कि हमारे यहां हर युग में इन के प्रति लोगों का रुझान रहा है. हां, सौंदर्य के मापदंड जरूर अलगअलग रहे हैं और आज के युग में तो डाइट और व्यायाम  शारीरिक सौंदर्य को बरकरार रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

अपने शारीरिक सौंदर्य को देखने के लिए आईने का प्रयोग सभी करते हैं, लेकिन आईने में स्वयं को देखने का सब का अपनाअपना नजरिया होता है. कई बार सुंदर लोगों में भी असुरक्षा की भावना जन्म ले लेती है. वे तनाव में रहते हैं कि कैसे अपने सौंदर्य की देखभाल करें? कहीं वे पहले से कम सुंदर तो नहीं हो गए? वगैरहवगैरह.

अलग अलग सोच

आईने में अपने प्रतिबिंब को ले कर हर आयु के लोग अलगअलग तरह से सोचते हैं. उस समय आईना एक दोस्त की तरह होता है, जिस में न जाने कितने अक्स उभरते हैं. तमाम सर्वे से यह तो तय है कि महिलाएं अपने प्रतिबिंब को ले कर ज्यादा आलोचनात्मक रवैया अपनाती हैं. मोटेतौर पर 10 में से 8 महिलाएं अपने रिफ्लैक्शन से असंतुष्ट ही रहती हैं.

पुरुष अपने आईने के प्रतिबिंब से या तो खुश ही रहते हैं या उस पर खास ध्यान नहीं देते. एक शोध के अनुसार पुरुष अपनी बौडी इमेज के प्रति महिलाओं की तुलना में ज्यादा पौजिटिव होते हैं. कुछ पुरुष आईना देखते समय अपने व्यक्तित्व में कमी की बात सोचते ही नहीं.

यहां एक उत्सुकता का प्रश्न यह है कि महिलाएं क्यों स्वयं को ले कर ऊहापोह के दौर से गुजरती हैं? शायद इसलिए क्योंकि महिलाएं अपने व्यक्तित्व से ज्यादा पहचानी जाती हैं और उन के सौंदर्य को नापने का पैमाना भी कुछ ज्यादा ही बड़ा है, क्योंकि उन्हें सुंदर चेहरे और आकर्षक फिगर के लिए शुरू से ही सचेत किया जाता है.

जीरो फिगर का जनून

न्योमी वुल्फ जैसी फैशन राइटर का तो यहां तक मानना है कि टीवी, मैगजीन वगैरह में महिलाओं का जो भी रूप दिखाया जाता है वह सब तो नौर्मल है. उस में कोई भी कमी हो तो महिला असुंदर तो लगेगी ही. एक अनुमान के अनुसार, युवा महिलाएं तो एक दिन में ही बहुत सुंदर बनने का ख्वाब संजोए रहती हैं, जो शायद उन से पुरानी पीढ़ी ने सोचा तक न होगा.

पिछली शताब्दी से ही महिलाओं के सौंदर्य के पैमाने में बहुत बदलाव आया है. पिछले 25 साल का ही लेखाजोखा देखें तो सुप्रसिद्ध मौडल्स एवं ब्यूटी क्वीन्स इतनी ज्यादा स्लिमट्रिम भी न थीं जितनी आज हैं. जीरो फिगर का जनून तो अब सिर चढ़ कर बोलता है. चौंकाने वाली बात तो यह है कि अब छोटे बच्चे भी अपने फिगर के लिए सजग हो गए हैं.

बच्चे भी पीछे नहीं

बच्चा जब 2 साल का होता है तब से ही आईने में अपना प्रतिबिंब पहचानने लगता है. एक हालिया सर्वे से यह भी पता चला है कि बहुत कम आयु में ही लड़कियां डाइट कंट्रोल शुरू कर देती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे मोटी और अनाकर्षक हैं. इस पर तमाम देशों के सर्वे तो बड़े ही आश्चर्यजनक हैं.

एक अमेरिकन सर्वे के अनुसार 10 साल की 81% लड़कियों ने डाइटिंग की, तो स्वीडिश स्टडी बताती है कि 7 वर्षीय 25% बच्चियों ने डाइटिंग की. जापानी सर्वे में पाया गया कि 41% बच्चियां डाइटिंग कर चुकी हैं. हाल तो यह है कि नौर्मल बच्चियां व कम वजन की बच्चियां भी वजन कम करना चाहती हैं. हां, उस उम्र के लड़के अपने फिगर को ले कर चिंतित नजर नहीं आए.

किशोरावस्था में चाहत

किशोरावस्था में कदम रखने वाले बच्चों में कम उम्र के कुछ किशोर लड़के तो स्वयं को ले कर थोड़े सजग दिखे पर ज्यादातर ऐसे नहीं दिखे. लेकिन बड़े होतेहोते जब वे सभी लंबेचौड़े मसल्स व चौड़े कंधों की ओर बढ़ने लगे, तो स्वयं को संपूर्ण पुरुष ही समझने लगे. लेकिन लड़कियों में उम्र बढ़ने पर जब उन के नितंब व जांघों पर थोड़ी चरबी आई, तो वे स्लिम होने की ओर अग्रसर होने लगीं.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक सर्वेक्षण के अनुसार 2 तिहाई कमजोर लड़कियां, जो महज 12 वर्ष की थीं, स्वयं को मोटी समझने लगीं. औसतन 10 में से 8 लड़कियां आईने में अपने प्रतिबिंब से खुश नहीं दिखीं.

क्या सोचते हैं वयस्क

19 वर्ष से बड़ी 80% लड़कियां अपनी लुक्स से परेशान दिखीं. वे स्वयं को ठीक से आईने में देख कर एकबारगी घबरा ही जाती हैं. हैरानी की बात तो यह है कि न जाने कितनी सुंदर व आकर्षक और सही अनुपात की लड़कियां भी स्वयं को मोटा व बदसूरत मान लेती हैं और फिक्रमंद हो जाती हैं.

इन सब का निचोड़ यही निकल कर आता है कि वे अपनी बौडी लाइन विशेष रूप से नितंब, जांघों व कमर को ले कर परेशान रहती हैं. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू एक अमेरिकन सर्वे से यह जाहिर हुआ कि वहां रहने वाली अश्वेत महिलाएं जो मोटी हैं, स्वयं को बेहद आकर्षक फिगर वाली मानती हैं.

ताजा सर्वे के अनुसार पुरुषों में भी अपने शरीर को ले कर चिंता पाई गई है. बढ़ती उम्र के पुरुष जो 45 से 55 के बीच के हैं, अपने ऐपियरैंस को ले कर ज्यादा चिंतातुर हैं. उन के असंतोष का मुख्य कारण उन की घटती लंबाई, बढ़ता पेट, दबती छाती और सिर के बालों का गिरना है. वे आईने के सामने पेट को अंदर खींच कर थोड़ा लंबा दिखने के मोह को नहीं रोक पाते.

अलग वर्ग के लोग

आम पुरुषों की तुलना में गे पुरुष आईने में अपने प्रतिबिंब से ज्यादातर नाखुश ही रहते हैं, वहीं लैस्बियन महिलाएं आईने में अपने प्रतिबिंब से कुछ ज्यादा ही संतुष्ट रहती हैं.

हालिया स्टडी से यह भी पता चला है कि होमोसैक्सुअल पुरुष हैट्रोसैक्सुअल पुरुषों की तुलना में ज्यादा असंतुष्ट रहते हैं. जबकि समलैंगिक महिलाएं हैट्रोसैक्सुअल महिलाओं की तुलना में बौडी इमेज को ले कर ज्यादा संतुष्ट रहती हैं. इस के अलावा लैस्बियन भी आईना देख कर आम महिलाओं से ज्यादा संतुष्ट होती हैं.

टीवी एवं मैगजींस का असर

कुछ लोग टीवी में विज्ञापन आदि में दिखाए पतले और आकर्षक मौडल्स और कलाकारों की कमनीय काया देख कर उन की स्वयं से तुलना करने लगते हैं और असहज महसूस करते हैं.

फैशन मैगजींस का भी यही हाल है. इन में छपी बेहद स्लिमट्रिम मौडल्स को देख कर भी कुछ लोग परेशान हो कर डिप्रैशन में ही आ जाते हैं. यह सब इसलिए भी होता है, क्योंकि स्वयं को उसी रूप में देखने की ललक जो होती है.

कई बार ऐसा भी होता है कि यदि आप का मूड अच्छा न हो या तब भी आप अपने शरीर को ले कर बहुत परेशान हो जाते हैं. महिलाओं के केस में अकसर ऐसा पाया जाता है. और यदि शारीरिक संरचना का किसी ने मजाक बनाया हो तब भी अवसाद में कुछ लोग आ जाते हैं.

अकेले और दुकेले

आमतौर पर विवाहित लोगों का अपनी शारीरिक संरचना के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रहता है. जबकि अकेले अपनी शारीरिक संरचना के प्रति परेशान से रहते हैं. एक स्टडी के अनुसार गर्भवती महिलाएं आम महिलाओं की तुलना में अपनी बौडी इमेज के प्रति ज्यादा पौजिटिव रहती हैं.

हैरानी की बात तो यह है कि बहुत सारे बौडी बिल्डर पुरुष अन्य पुरुषों की तुलना में अपने व्यक्तित्व से ज्यादा असंतुष्ट रहते हैं. जबकि बौडी बिल्डर महिलाएं अपनी बौडी इमेज से संतुष्ट रहती हैं. लेकिन खेलकूद में भाग लेने वाले दोनों ही वर्ग यानी स्त्रीपुरुष अपने शारीरिक ऐपियरैंस को ले कर संतुष्ट रहते हैं.

इन बातों का सार यही है कि वह आईना ही तो है, जो सब के शारीरिक सौंदर्य की कहानी कह देता है. इस से जहां सुंदर व आकर्षक लोग अपने रूपलावण्य पर फूले नहीं समाते, वहीं कम सुंदर लोग डिप्रैशन में आ जाते हैं. बात पशुओं की करें तो घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली अपनी छवि को आईने में पहचान नहीं पाते. परंतु गुरिल्ला, चिंपाजी आईना देख कर यह समझ लेते हैं कि ये अक्स उन्हीं का है.

आईने के ईजाद होने की तारीख का सही पता तो नहीं चल पाया है, लेकिन 16वीं शताब्दी में वैनिस ग्लास मेकिंग में प्रसिद्ध था, जो नई तकनीक से बनता था और बेशकीमती लग्जरी माना जाता था. जब आईना नहीं था तब लोग बरतन में पानी भर कर उस में अपना अक्स देख लिया करते थे.

यह आईना ही तो है, जो सौंदर्य को ऐसे उकेरता है कि देखने वाले भी ‘वाह’ कह बैठते हैं. इतिहास पर एक नजर डालें तो मशहूर बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने पद्मिनी के सौंदर्य को आईने में ही तो निहारा था और दिलोजान से उस पर फिदा हो गया.

यह आईना ही तो है जो चुगली कर देता है, तो सच भी बयां कर देता है. मुगल बादशाह शाहजहां अपनी प्रिय बेगम मुमताज महल के जाने के बाद गम में ऐसा डूबा कि खुद को एक कमरे में ही बंद कर लिया. महीनों किसी से मिला नहीं. बरसों बाद अचानक एक दिन उस ने आईने में स्वयं को देखा तो उसे उस में एक कमजोर, सफेद बालों वाला बूढ़ा नजर आया, जिसे देख कर वह टूट ही गया. फिर वह टूटता ही गया क्योंकि पहले जब वह आईना देखता था तब खुद की युवा शहंशाह की छवि देखता था, पर अब उस का अक्स आईने में बूढ़ा शख्स जैसा दिखता था.

इतिहास में ही जिक्र है नर्तकी उमराव जान का, जो एक दिन अचानक अपने बचपन के शहर आई तो उसे अपना घर याद आया. जब वह वहां गई तो घर वालों ने उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया. उस के बाद उस ने नाचगाना छोड़ दिया और खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. वहीं एक दिन जब उस ने आईना देखा तो उस में कमजोर, निस्तेज, सफेद केशों से लबरेज सूरत नजर आई. वह टूट कर रह गई और वहां से कहीं और चली गई. बाद में उस का कोई पता न चला.

सब कुछ कर देता बयां

शाहजहां और उमराव जान दोनों ही आईना देख कर ही तो टूटे थे. यह आईना ही तो है जो सब कुछ बयां कर देता है. सोचिए भला, आईना ही न होता तो न जाने क्या होता. कैसे पता चलते शारीरिक झोल, कैसे गुलजार होता ग्लैमर वर्ल्ड? कहने का अर्थ यही है कि हमारे समाज की प्रगति में आईने की एक अहम भूमिका शुरू से रही है.

महिलाएं तो इतिहासकाल से ही आईने की बेहद शौकीन रही हैं. तब आरसी पहनने का प्रचलन जोरों पर था. आरसी आईने की तरह होती थी और अंगूठे में पहनी जाती थी. इसी में रूप निहारा जाता था.

आईना वह है जो इश्क फरमाने की भूमिका भी अदा कर चुका है, तो किसी के सौंदर्य में चार चांद भी लगा देता है. सही माने में यह एक अच्छा दोस्त है जिस की जरूरत हर किसी को है.

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स्वस्थ बच्चा स्वस्थ भविष्य

अंदर और बाहर हमारा शरीर नुकसानदायक बैक्टीरिया और वायरस के निरंतर निर्दयी प्रवाह के कारण असुरक्षित रहता है. ये हमारे स्वास्थ्य को चुनौती देते हैं. हालांकि हमारा शरीर पलट कर इन का मुकाबला करता है, लेकिन फिर भी ये हमें अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं. खासतौर से बच्चे इन के आसानी से शिकार हो जाते हैं. नवजात शिशुओं सहित छोटे बच्चों का भी प्रतिरक्षातंत्र विकसित हो रहा होता है, अत: उन के बीमार पड़ने की संभावना अधिक होती है.

क्या आप ने कभी सोचा है कि इस का संबंध ठीक उस समय से है जब हम पैदा हुए थे? हमारा स्वास्थ्य हमारे पेट में बसने वाले बैक्टीरिया के साथ जुड़ा हो सकता है? बारबार बीमार पड़ते रहने वाला एक नवजात शिशु मातापिता का चैन खो देता है. हम बारबार की बीमारियों से अपने बच्चे की रक्षा किस तरह कर सकते हैं?

बच्चों को बीमारियों से बचाने के लिए उन के प्रतिरक्षातंत्र को मजबूत बनाना जरूरी है, इस का राज पाचनतंत्र के अंदर गहराई में छिपा है.

विज्ञान ने उजागर किया है कि मानव शरीर 100 खरब से अधिक अतिसूक्ष्म जीवाणुओं का घर है और वे हर जगह मौजूद हैं, हमारी जीभ से ले कर बाल, त्वचा और खून तक में. और हमारी पाचन नली की गहराई में बसने वाले लगभग

500 विभिन्न किस्म के बैक्टीरिया ही हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए अद्भुत कारनामे करते हैं. हमारे लाभदायक यानी अच्छे बैक्टीरिया छोटी आंत में रहते हैं और जब हमारे द्वारा खाए जाने वाले भोजन से हमारे शरीर में प्रवेश करने वाले नुकसानदायक सूक्ष्मजीवों से उन का सामना होता है तो ये उन का डट कर मुकाबला करते हैं. शरीर के अच्छे बैक्टीरिया खराब बैक्टीरिया से भी लड़ते हैं. वास्तव में, आंत में अच्छे और खराब बैक्टीरिया के बीच संतुलन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है.

सामान्य प्रसव के दौरान जन्म नाल के माध्यम से नवजात शिशु को उस की मां से अच्छे बैक्टीरिया की खुराक मिलती है. ये अच्छे बैक्टीरिया स्तन के दूध में मौजूद होते हैं. सिर्फ स्तनपान करने वाले नवजात शिशुओं में इन बैक्टीरिया की पर्याप्त मात्रा मौजूद होती है. ये अच्छे बैक्टीरिया सैनिकों की तरह होते हैं जो रक्षा पंक्ति की किलाबंदी बनाते हैं. ऐसा कर के वे आंत की दीवार की रक्षा करते हैं और शत्रु (नुकसानदायक बैक्टीरिया) को शरीर में प्रवेश करने से रोकते हैं. अच्छे बैक्टीरिया ऐसे रसायन पैदा करने के लिए जाने जाते हैं जो नुकसानदायक सूक्ष्मजीवों को शरीर में उन के वास्तविक प्रवेश से पहले मार देते हैं. ये आंत की दीवार का कवच बनने वाला एक भौतिक अवरोधक बनाने और शरीर में नुकसानदायक सूक्ष्मजीवों के मार्ग को अवरुद्ध करने के लिए भी जाने जाते हैं.

अच्छे बैक्टीरिया कैसे फूलेंफलें

शरीर में अच्छे बैक्टीरिया के फूलनेफलने में प्रोबायोटिक्स की विशेष भूमिका है. आमतौर पर खाद्यपदार्थों में मिलाए जाने वाले प्रोबायोटिक्स की किस्म छोटी आंत में पाए जाने वाले अच्छे बैक्टीरिया जैसी होती है. ये सुरक्षित हैं और इन के फायदों को पूरी दुनिया में स्वीकार किया जाता है. स्तनपान करवाए जाने वाले नवजात शिशु को ये प्रोबायोटिक्स स्तन के दूध के जरीए अपनी मां से प्राप्त होते हैं. इसलिए रोजाना प्रोबायोटिक्स का सेवन आंत में अच्छे बैक्टीरिया की सघनता को बढ़ाता है तथा प्रतिरक्षातंत्र का निर्माण करने में मदद करता है. साथ ही, जब हम संक्रमणों का मुकाबला करने के लिए ऐंटीबायटिक लेते हैं तब हम अनजाने में सभी किस्म के बैक्टीरिया को मार देते हैं. यहीं पर प्रोबायोटिक्स का गहरा प्रभाव पड़ता है, न केवल पाचन नली के स्वास्थ्य पर बल्कि बच्चे के समग्र स्वास्थ्य पर भी.

डा. अरुण फोतेदार के अनुसार, ‘‘जन्म के बाद 2 साल का समय शिशुओं के रक्षा (प्रतिरक्षा) तंत्र को आकार देने का अवसर माना जाता है. निश्चित तौर पर इसी कारण पूरी दुनिया के डाक्टर प्रोबायोटिक्स के निवारक लाभों के लिए इस पर भरोसा करते हैं.’’

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मैं 14 साल की हूं. मेरा बड़ा भाई रात में मेरे अंगों को सहलाता है, गुदगुदी करता है. मैं क्या करूं.

सवाल
मैं 14 साल की हूं. मेरा बड़ा भाई रात में मेरे अंगों को सहलाता है, गुदगुदी करता है. मैं क्या करूं?

जवाब
कच्ची उम्र में ऐसी गलती कभी कभी हो जाती है, पर इस से बचना चाहिए. आप भाई से दूर अपनी मम्मी के पास सोया करें. धीरे धीरे आप का भाई सुधर जाएगा. भाई की हरकतें बंद न हों, तो मम्मी को सबकुछ बता दें.

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जब भाई को हुआ बहन से प्यार

झारखंड राज्य का एक शहर है हजारीबाग. यह कुदरत की गोद में बसा छोटा सा, पर बहुत खूबसूरत शहर है. पहाड़ियों से घिरा, हरेभरे घने जंगल, झील, कोयले की खानें इस की खासीयत हैं. हजारीबाग के पास ही में डैम और नैशनल पार्क भी हैं. यह शहर अभी हाल में ही रेल मार्ग से जुड़ा है, पर अभी भी नाम के लिए 1-2 ट्रेनें ही इस लाइन पर चलती हैं. शायद इसी वजह से इस शहर ने अपने कुदरती खूबसूरती बरकरार रखी है.

सोमेन हजारीबाग में फौरैस्ट अफसर थे. उन दिनों हजारीबाग में उतनी सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए उन की बीवी संध्या अपने मायके कोलकाता में ही रहती थी.

दरअसल, शादी के बाद कुछ महीनों तक वे दोनों फौरैस्ट अफसर के शानदार बंगले में रहते थे. जब संध्या मां बनने वाली थी, सोमेन ने उसे कोलकाता भेज दिया था. उन्हें एक बेटी हुई थी. वह बहुत खूबसूरत थी, रिया नाम था उस का. सोमेन हजारीबाग में अकेले रहते थे. बीचबीच में वे कोलकाता जाते रहते थे.

हजारीबाग के बंगले के आउट हाउस में एक आदिवासी जोड़ा रहता था. लक्ष्मी सोमेन के घर का सारा काम करती थी. उन का खाना भी वही बनाती थी. उस का मर्द फूलन निकम्मा था. वह बंगले की बागबानी करता था और सारा दिन हंडि़या पी कर नशे में पड़ा रहता था.

एक दिन दोपहर बाद लक्ष्मी काम करने आई थी. वह रोज शाम तक सारा काम खत्म कर के रात को खाना टेबल पर सजा कर चली जाती थी.

उस दिन मौसम बहुत खराब था. घने बादल छाए हुए थे. मूसलाधार बारिश हो रही थी. दिन में ही रात जैसा अंधेरा हो गया था.

अपने आउट हाउस में बंगले तक दौड़ कर आने में ही लक्ष्मी भीग गई थी. सोमेन ने दरवाजा खोला. उस की गीली साड़ी और ब्लाउज के अंदर से उस के सुडौल उभार साफ दिख रहे थे.

सोमेन ने लक्ष्मी को एक पुराना तौलिया दे कर बदन सुखाने को कहा, फिर उसे बैडरूम में ही चाय लाने को कहा. बिजली तो गुल थी. उन्होंने लैंप जला रखा था.

थोड़ी देर में लक्ष्मी चाय ले कर आई. चाय टेबल पर रखने के लिए जब वह झुकी, तो उस का पल्लू सरक कर नीचे जा गिरा और उस के उभार और उजागर हो गए.

सोमेन की सांसें तेज हो गईं और उन्हें लगा कि कनपटी गरम हो रही है. लक्ष्मी अपना पल्लू संभाल चुकी थी. फिर भी सोमेन उसे लगातार देखे जा रहे थे.

यों देखे जाने से लक्ष्मी को लगा कि जैसे उस के कपड़े उतारे जा रहे हैं. इतने में सोमेन की ताकतवर बाजुओं ने उस की कमर को अपनी गिरफ्त में लेते हुए अपनी ओर खींचा.

लक्ष्मी भी रोमांचित हो उठी. उसे मरियल पियक्कड़ पति से ऐसा मजा नहीं मिला था. उस ने कोई विरोध नहीं किया और दोनों एकदूसरे में खो गए.

इस घटना के कुछ महीने बाद सोमेन ने अपनी पत्नी और बेटी रिया को रांची बुला लिया. हजारीबाग से रांची अपनी गाड़ी से 2 ढाई घंटे में पहुंच जाते हैं.

सोमेन ने उन के लिए रांची में एक फ्लैट ले रखा था. उन के प्रमोशन की बात चल रही थी. प्रमोशन के बाद उन का ट्रांसफर रांची भी हो सकता है, ऐसा संकेत उन्हें डिपार्टमैंट से मिल चुका था.

इधर लक्ष्मी भी पेट से हो गई थी. इस के पहले उसे कोई औलाद न थी. लक्ष्मी के एक बेटा हुआ. नाकनक्श से तो साधारण ही था, पर रंग उस का गोरा था. आमतौर पर आदिवासियों के बच्चे ऐसे नहीं होते हैं.

अभी तक सोमेन हजारीबाग में ही थे. वे मन ही मन यह सोचते थे कि कहीं यह बेटा उन्हीं का तो नहीं है. उन्हें पता था कि लक्ष्मी की शादी हुए 6 साल हो चुके थे, पर वह पहली बार मां बनी थी.

सोमेन को तकरीबन डेढ़ साल बाद प्रमोशन और ट्रांसफर और्डर मिला. तब तक लक्ष्मी का बेटा गोपाल भी डेढ़ साल का हो चुका था.

हजारीबाग से जाने के पहले लक्ष्मी ने सोमेन से अकेले में कहा, ‘‘बाबूजी, आप से एक बात कहना चाहती हूं.’’

‘‘हां, कहो,’’ सोमेन ने कहा.

‘‘गोपाल आप का ही खून है.’’

सोमेन बोले, ‘‘यह तो मैं यकीनी तौर पर नहीं मान सकता हूं. जो भी हो, पर तुम मुझ से चाहती क्या हो?’’

‘‘बाबूजी, मैं बेटे की कसम खा कर कहती हूं, गोपाल आप का ही खून है.’’

‘‘ठीक है. बोलो, तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘ज्यादा कुछ नहीं. बस, यह भी पढ़लिख कर अच्छा इनसान बने. मैं किसी से कुछ नहीं बोलूंगी. आप इतना भरोसा तो मुझ पर कर सकते हैं,’’ लक्ष्मी बोली.

‘‘ठीक है. तुम लोगों के बच्चों का तो हर जगह आसानी से रिजर्वेशन कोटे में दाखिला हो ही जाता है. फिर भी मुझ से कोई मदद चाहिए तो बोलना.’’

इस के बाद सोमेन रांची चले गए. समय बीतता गया. सोमेन की बेटी रिया 10वीं पास कर आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली चली गई थी.

बीचबीच में इंस्पैक्शन के लिए सोमेन को हजारीबाग जाना पड़ता था. वे वहीं आ कर बंगले में ठहरते थे. लक्ष्मी भी उन से मिला करती थी. उस ने सोमेन से कहा था कि गोपाल भी 10वीं क्लास के बाद दिल्ली के अच्छे स्कूल और कालेज में पढ़ना चाहता है. उसे कुछ माली मदद की जरूरत पड़ सकती है.

सोमेन ने उसे मदद करने का भरोसा दिलाया था. गोपाल अब बड़ा हो गया था. वे उसे देख कर खुश हुए. शक्ल तो मां की थी, पर रंग गोरा था. छरहरे बदन का साधारण, पर आकर्षक लड़का था. उस के नंबर भी अच्छे आते थे.

रिया के दिल्ली जाने के एक साल बाद गोपाल ने भी दिल्ली के उसी स्कूल में दाखिला ले लिया. सोमेन ने गोपाल की 12वीं जमात तक की पढ़ाई के लिए रुपए उस के बैंक में जमा करवा दिए थे.

रिया गोपाल से एक साल सीनियर थी. पर एक राज्य का होने के चलते दोनों में परिचय हो गया. छुट्टियों में ट्रेन में अकसर आनाजाना साथ ही होता था. गोपाल और रिया दोनों का इरादा डाक्टर बनने का था.

रिया ने 12वीं के बाद कुछ मैडिकल कालेज के लिए अलगअलग टैस्ट दिए, पर वह कहीं भी पास नहीं कर सकी थी. तब उस ने एक साल कोचिंग ले कर अगले साल मैडिकल टैस्ट देने की सोची. वहीं दिल्ली के अच्छे कोचिंग इंस्टीट्यूट में कोचिंग शुरू की.

अगले साल गोपाल और रिया दोनों ने मैडिकल कालेज में दाखिले के लिए टैस्ट दिए. इस बार दोनों को कामयाबी मिली थी. गोपाल के नंबर कुछ कम थे, पर रिजर्वेशन कोटे में तो उस का दाखिला होना तय था.

गोपाल और रिया दोनों ने बीएचयू मैडिकल कालेज में दाखिला लिया. सोमेन गोपाल की पढ़ाई का भी खर्च उठा रहे थे. अब दोनों की क्लास भी साथ होती थी. आपस में मिलनाजुलना भी ज्यादा हो गया था. छुट्टियों में भी साथ ही घर आते थे.

वहां से शेयर टैक्सी से हजारीबाग जाना आसान था. हजारीबाग के लिए कोई अलग ट्रेन नहीं थी. जब कभी सोमेन रिया को लेने रांची स्टेशन जाते थे, तो वे गोपाल को भी बिठा लेते थे और अगर सोमेन को औफिशियल टूर में हजारीबाग जाना पड़ता था, तो गोपाल को वे साथ ले जाते थे. इस तरह समय बीतता गया और गोपाल व रिया अब काफी नजदीक आ गए थे. वे एकदूसरे से प्यार करने लगे थे.

गोपाल और रिया दोनों असलियत से अनजान थे. दोनों के मातापिता भी उन की प्रेम कहानी से वाकिफ नहीं थे. उन्होंने पढ़ाई के बाद अपना घर बसाने का सपना देख रखा था. साढ़े 4 साल बाद दोनों ने अपनी एमबीबीएस पूरी कर ली. आगे उसी कालेज में दोनों ने एक साल की इंटर्नशिप भी पूरी की.

रिया काफी समझदार थी. उस की शादी के लिए रिश्ते आने लगे, पर उस ने मना कर दिया और कहा कि अभी वह डाक्टरी में पोस्ट ग्रेजुएशन करेगी.

लक्ष्मी कुछ दिनों से बीमार चल रही थी. इसी बीच सोमेन भी हजारीबाग में थे. उस ने सोमेन से कहा, ‘‘बाबूजी, मेरा अब कोई ठिकाना नहीं है. आप गोपाल का खयाल रखेंगे?’’

सोमेन ने समझाते हुए कहा, ‘‘अब गोपाल समझदार डाक्टर बन चुका है. वह अपने पैरों पर खड़ा है. फिर भी उसे मेरी जरूरत हुई, तो मैं जरूर मदद करूंगा.’’

कुछ दिनों बाद ही लक्ष्मी की मौत हो गई.

गोपाल और रिया दोनों ने मैडिकल में पोस्ट ग्रैजुएशन का इम्तिहान दिया था. वे तो बीएचयू में पीजी करना चाहते थे, पर वहां उन्हें सीट नहीं मिली. दोनों को रांची मैडिकल कालेज आना पड़ा.

उन में प्रेम तो जरूर था, पर दोनों में से किसी ने भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया था. दोनों ने तय किया कि जब तक उन की शादी नहीं होती, इस प्यार को प्यार ही रहने दिया जाए.

रिया की मां संध्या ने एक दिन उस से कहा, ‘‘तुम्हारे लिए अच्छेअच्छे घरों से रिश्ते आ रहे हैं. तुम पोस्ट ग्रेजुएशन करते हुए भी शादी कर सकती हो. बहुत से लड़केलड़कियां ऐसा करते हैं.’’

रिया बोली, ‘‘करते होंगे, पर मैं नहीं करूंगी. मुझ से बिना पूछे शादी की बात भी मत चलाना.’’

‘‘क्यों? तुझे कोई लड़का पसंद है, तो बोल न?’’

‘‘हां, ऐसा ही समझो. पर अभी हम दोनों पढ़ाई पर पूरा ध्यान दे रहे हैं. शादी की जल्दी किसी को भी नहीं है. पापा को भी बता देना.’’

संध्या ने कोई जवाब नहीं दिया. इसी बीच एक बार सोमेन के दोस्त ने उन्हें खबर दी कि उस ने रिया और गोपाल को एकसाथ सिनेमाघर से निकलते देखा है.

इस के कुछ ही दिनों बाद संध्या के रिश्ते के एक भाई ने बताया कि उस ने गोपाल और रिया को रैस्टौरैंट में लंच करते देखा है.

सोमेन ने अपनी पत्नी संध्या से कहा, ‘‘रिया और गोपाल दोनों को कई बार सिनेमाघर या होटल में साथ देखा गया है. उसे समझाओ कि उस के लिए अच्छे घरों से रिश्ते आ रहे हैं. सिर्फ उस के हां कहने की देरी है.’’

संध्या बोली, ‘‘रिया ने मुझे बताया था कि वह गोपाल से प्यार करती है.’’

सोमेन चौंक पड़े और बोले, ‘‘क्या? रिया और गोपाल? यह तो बिलकुल भी नहीं हो सकता.’’

अगले दिन सोमेन ने रिया से कहा, ‘‘बेटी, तेरे रिश्ते के लिए काफी अच्छे औफर हैं. तू जिस से बोलेगी, हम आगे बात करेंगे’’

रिया ने कहा, ‘‘पापा, मैं बहुत दिनों से सोच रही थी कि आप को बताऊं कि मैं और गोपाल एकदूसरे को चाहते हैं. मैं ने मम्मी को बताया भी था कि पीजी पूरा कर के मैं शादी करूंगी.’’

‘‘बेटी, कहां गोपाल और कहां तुम? उस से तुम्हारी शादी नहीं हो सकती, उसे भूल जाओ. अपनी जाति के अच्छे रिश्ते तुम्हारे सामने हैं.’’

‘‘पापा, हम दोनों पिछले 5 सालों से एकदूसरे को चाहते हैं. आखिर उस में क्या कमी है?’’

‘‘वह एक आदिवासी है और हम ऊंची जाति के शहरी लोग हैं.’’

‘‘पापा, आजकल यह जातपांत, ऊंचनीच नहीं देखते. गोपाल भी एक अच्छा डाक्टर है और उस से भी पहले बहुत नेक इनसान है.’’

सोमेन ने गरज कर कहा, ‘‘मैं बारबार तुम्हें मना कर रहा हूं… तुम समझती क्यों नहीं हो?’’

‘‘पापा, मैं ने भी गोपाल को वचन दिया है कि मैं शादी उसी से करूंगी.’’

उसी समय संध्या भी वहां आ गई और बोली, ‘‘अगर रिया गोपाल को इतना ही चाहती है, तो उस से शादी करने में क्या दिक्कत है? मुझे तो गोपाल में कोई कमी नहीं दिखती है.’’

सोमेन चिल्ला कर बोले, ‘‘मेरे जीतेजी यह शादी नहीं हो सकती. मैं तो कहूंगा कि मेरे मरने के बाद भी ऐसा नहीं करना. तुम लोगों को मेरी कसम.’’

रिया बोली, ‘‘ठीक है, मैं शादी ही नहीं करूंगी. तब तो आप खुश हो जाएंगे.’’

सोमेन बोले, ‘‘नहीं बेटी, तुझे शादीशुदा देख कर मुझे बेहद खुशी होगी. पर तू गोपाल से शादी करने की जिद छोड़ दे.’’

‘‘पापा, मैं ने आप की एक बात मान ली. मैं गोपाल को भूल जाऊंगी. परंतु आप भी मेरी एक बात मान लें, मुझे किसी और से शादी करने के लिए मजबूर नहीं करेंगे.’’

ये बातें फिलहाल यहीं रुक गईं. रात में संध्या ने पति सोमेन से पूछा, ‘‘क्या आप बेटी को खुश नहीं देखना चाहते हैं? आखिर गोपाल में क्या कमी है?’’

सोमेन ने कहा, ‘‘गोपाल में कोई कमी नहीं है. उस के आदिवासी होने पर भी मुझे कोई एतराज नहीं है. वह सभी तरह से अच्छा लड़का है, फिर भी…’’

रिया को नींद नहीं आ रही थी. वह भी बगल के कमरे में उन की बातें सुन रही थी. वह अपने कमरे से बाहर आई और पापा से बोली, ‘‘फिर भी क्या…? जब गोपाल में कोई कमी नहीं है, फिर आप की यह जिद बेमानी है.’’

सोमेन बोले, ‘‘मैं नहीं चाहता कि तेरी शादी गोपाल से हो.’’

‘‘नहीं पापा, आखिर आप के न चाहने की कोई तो ठोस वजह होनी चाहिए. आप प्लीज मुझे बताएं, आप को मेरी कसम. अगर कोई ऐसी वजह है, तो मैं खुद ही पीछे हट जाऊंगी. प्लीज, मुझे बताएं.’’

सोमेन बहुत घबरा उठे. उन को पसीना छूटने लगा. पसीना पोंछ कर अपनेआप को संभालते हुए उन्होंने कहा, ‘‘यह शादी इसलिए नहीं हो सकती, क्योंकि…’’

वे बोल नहीं पा रहे थे, तो संध्या ने उन की पीठ सहलाते हुए उन को हिम्मत दी और कहा, ‘‘हां बोलिए आप, क्योंकि… क्या?’’

सोमेन बोले, ‘‘तो लो सुनो. यह शादी नहीं हो सकती है, क्योंकि गोपाल रिया का छोटा भाई है.

‘‘जब मैं हजारीबाग में अकेला रहता था, तब मुझ से यह भूल हो गई थी.’’

रिया और संध्या को काटो तो खून नहीं. दोनों हैरानी से सोमेन को देख रही थीं. रिया की आंखों से आंसू गिरने लगे. कुछ देर बाद वह सहज हुई और अपने कमरे में चली गई.

रात में ही उस ने गोपाल को फोन कर के कहा, ‘‘गोपाल, क्या तुम मुझ से सच्चा प्यार करते हो?’’

गोपाल बोला, ‘क्या इतनी रात गए यही पूछने के लिए फोन किया है?’

‘‘तुम ने सुना होगा कि प्यार सिर्फ पाने का नाम नहीं है, इस में कभी खोना भी पड़ता है.’’

गोपाल ने कहा, ‘हां, सुना तो है.’’

‘‘अगर यह सही है, तो तुम्हें मेरी एक बात माननी होगी. बोलो मानोगे?’’ रिया बोली.

गोपाल बोला, ‘यह कैसी बात कर रही हो आज? तुम्हारी हर जायज बात मैं मानूंगा.’

‘‘तो सुनो. बात बिलकुल जायज है, पर मैं इस की कोई वजह नहीं बता सकती हूं और न ही तुम पूछोगे. ठीक है?’’

‘ठीक है, नहीं पूछूंगा. अब बताओ तो सही.’

रिया बोली, ‘‘हम दोनों की शादी नहीं हो सकती. यह बिलकुल भी मुमकिन नहीं है. वजह जायज है और जैसा कि मैं ने पहले ही कहा है कि वजह न मैं बता सकती हूं, न तुम पूछना कभी.’’

गोपाल ने पूछा, ‘तो क्या हमारा प्यार झूठा था?’

रिया बोली, ‘‘प्यार सच्चा है, पर याद करो, हम ने तय किया था कि शादी नहीं होने तक हमारा प्यार ‘अधूरा प्यार’ रहेगा. बस, यही समझ लो.

‘‘अब तुम कहीं भी शादी कर लो, पर मेरातुम्हारा साथ बना रहेगा और तुम चाहोगे भी तो भी मैं कभी भी तुम्हारे घर आ धमकूंगी,’’ इतना कह कर रिया ने फोन रख दिया.

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मराठी फिल्म रिव्यू : बबन

एक लड़का, एक लड़की और उनके प्यार का दुखद अंत, ‘सैराट’ फिल्म में हम सबने देखा ही है. इसी कथासूत्र पर आधारित है भाऊसाहेब कर्हाड़े निर्देशित फिल्म‘बबन’.movie review

बबन (भाऊसाहेब शिंदे) दूध बेचकर कौलेज की पढाई करता है और एक दिन अमीर बनने का सपना देखता है. इसके लिए वह गांव में घर-घर से दूध इकठ्ठा कर कंपनी में बेचता है. उसके क्लास में पढने वाली कोमल (गायत्री जाधव) एक अमीर घर की लड़की है और बबन से प्यार करती है. साथ पढ़ने वाले अभ्या (अभय चव्हाण) को बबन की प्रगति देखी नहीं जाती है. साथ ही दोनों का रिश्ता उसके आंखों में खटकता है. इसलिए वह बबन को परेशान करना शुरू कर देता है. उसकी बाइक और दूध की केतली तोड़ देते हैं. इस बात से गुस्सा बबन अभ्या और उसके साथियों के साथ मारपीट करता है.

बबन दूध का धंधा फिर से शुरू करता है और टेम्पो से दूध ले जाने लगता है. बबन को मन लगाकर काम करते देख अभ्या और उसके साथी एक बार फिर अटैक करते है और उसका टेम्पो जला देते है. एक दिन अभ्या कोमल के साथ छेड़खानी करता है जिसे देखकर बबन फिर से उससे उलझ जाता है. पुलिस से बचाने के लिए बबन के दोस्त उसे तीन दिन के लिए गायब कर देते है. एक स्थानीय नेता की पहचान से बबन छूट जाता है और वह उसे एक पिस्टल देता है. जेल से छूटने के बाद बबन फिर से काम जमाने का प्रयास करता है.movie review

बबन और कोमल को एक साथ देख, अभ्या का साथी विक्रम उनके साथ मारपीट करता है. इस दौरान कोमल बबन के पॉकेट से पिस्टल निकालकर विक्रम को मार देती है और दोनों वहां से भाग जाते हैं. कोमल को उसके घर छोड़कर बबन चला जाता है. बाइक पर जा रहे बबन का एक्सीडेंट होता है और उसकी मौत हो जाती है. बदले की भावना से ग्रस्त विक्रम के साथी कोमल का बलात्कार करते है. प्रेग्नेंट कोमल पागलों की तरह गांव में भटकती रहती है और बच्चे के जन्म लेते ही दीवार पर पटक कर मार देती है.

इस तरह इस फिल्म में गांव की राजनीति, युवाओं में जल्दी अमीर बनने की होड़, दूसरे की प्रगति देखकर ईर्ष्या, बदले की भावना इत्यादि बातों पर जोर दिया गया है. इसलिए पूरी फिल्म आधुनिक ग्रामीण जीवनशैली को अच्छी तरह से दर्शाती है जो फिल्म का एक बेहतरीन पहलू है. लेकिन फिल्म में कई दृश्य बेवजह डाले गए है. मेले में लेझिम का खेल, तमाशा जैसे अनावश्यक चीजों को तूल देना समय की बर्बादी लगती है. फिल्म में गानों की संख्या ज्यादा है जिनका लाऊड संगीत कानों को चुभता है, लेकिन गानों में कई दृश्य आखों को अच्छे लगते है.

कोमल के मुख्य भूमिका में होने के बावजूद उसका अस्तित्व उभरकर नहीं आया है. इसका मूल कारण कोमल की भूमिका पर लेखक और निर्देशक की लापरवाही है. भाऊसाहेब शिंदे ने बबन की भूमिका को बहुत ही अच्छे से निभाया है. ऐसे में फिल्म का नाम ‘बबन’ सटीक है. फिल्म के बाकी कलाकारों ने अपनी-अपनी भूमिका अच्छे से निभाई है. भाऊसाहेब कर्हाड़े की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘ख्वाडा’ के वजह से ‘बबन’ फिल्म से दर्शकों को काफी उम्मीद थी, लेकिन ‘ख्वाडा’ की कहानी जितनी गहराई ‘बबन’ फिल्म में ना होने के कारण यह दर्शकों के अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर नहीं पायी है.

लेखक व निर्देशक  : भाऊराव कर्हाड़े
कलाकर : भाऊसाहेब शिंदे, गायत्री जाधव, अभय चव्हाण

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