फ्रांस की ये 5 जगह किसी स्वर्ग से नहीं हैं कम, आप भी जाएं

कई बार ऐसा होता है कि हम विदेश घूमने की प्लानिंग करते हैं, लेकिन आपको उस जगह के बारे में ज्यादा पता नहीं होता और आप कई खूबसूरत जगहों को मिस कर देते हैं. ऐसे में अगर आप कभी फ्रांस जाने की प्लानिंग करें, तो यहां की सबसे खूबसूरत 5 जगहों पर घूमना न भूलें. फ्रांस जो कि एक ऐतिहासिक जगह होने के साथ साथ पर्यटन के लिहाज से भी विश्व भर में जाना जाता है. फ्रास के पर्यटन स्थलों की खूबसूरती के अलग ही मायने हैं.

पेरिस

फ्रांस की राजधानी पेरिस देखने में बहुत ही खूबसूरत बेस्ट डेस्टिनेशन्स है. इसे सिटी औफ लव, सिटी औफ लाइट्स, कैपिटल औफ फैशन नाम दिए गए हैं. इस शहर में  विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय भी हैं. यहां हर साल दुनियाभर के कपल्स हनीमून मनाने पहुंचते हैं. इस शहर में देखने वाली ट्रायोमफे, नौट्रे डेम कैथेड्रल, एफिल टौवर, आर्क डी आदि खास जगहें हैं.

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फ्रेंच रिवेरा

फ्रेंच रिवेरा फ्रांस के भूमध्य सागर के तट पर स्थित है. फ्रांस जाने वाले सभी पर्यटक यहां जरूर पहुंचते हैं. यहां पर बहुत बड़ा प्ले ग्राउंड है. यह जगह मोनाको या कान फिल्म फेस्टीवल, सेंट ट्रोपेज के लिए काफी मशहूर है. इसके अलावा यहां पर एजे और सेंट-पौल डे वेंस के गढ़े गांव और ग्रास के पेर्फियमस बेहद मशहूर है.

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दौरदाग्ने

यह जगह फ्रांस के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है. यहां पर नेचुरल दृश्य देखने को मिलता है और यहां पर दौरडोन नदी भी है. इस जगह पर चैटाऊ डी बायनाक नाम की एक पहाड़ी भी है जो काफी खूबसूरत है.

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मौन्ट सेंट-मिशेल

मौन्ट सेंट-मिशेल एक द्वीप की तरह है. इसका निर्माण 708 ईस्वी में एवरेश के बिशप और मोन्क्स ने करवाया था. यह फ्रांस के नौर्थेंडी के उत्तर-पश्चिमी में स्थित है. यह फ्रांस घूमने के शौकीन लोगों के लिए मनपसंद जगहों में से एक है.

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लाइबेरौन

स्वर्ग की तरह मानी जाने वाली जगह है लाइबेरौन. इस जगह के जंगल, लैवेंडर के खेत, किसानों के बाजार, कलरफूल और कलात्मक घर यहां पर घूमने वालों के आकर्षण का केंद्र हैं. इस जगह को देखने के लिए ज्यादातर लोग गर्मियों में पहुंचते हैं.

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शुगर नो नो नो…जानिए क्यों जरूरी है चीनी कम करना

आज हमारी दिनचर्या ऐसी हो गई है कि हमें पूरा दिन बैठे ही रहना पड़ता है जिस से मानसिक तनाव तो बढ़ता ही है, साथ ही उतनी कैलोरी भी खर्च नहीं हो पाती जितनी होनी चाहिए, इस से हम तरहतरह की गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं.

इस के अलावा हम हैवी प्रैशर को कम करने के लिए औफिस हो या घर बैठेबैठे कई कप चाय या फिर कौफी पी लेते हैं, जो हमारे लिए घातक साबित होता है. ऐसे में जरूरत है शुगर फ्री चीजों को अपनी डाइट में शामिल करने की, ताकि आप रहें हैल्दी व फिट. चीनी शरीर में ऐसिड बनाती है, जो पेट के लिए बिलकुल सही नहीं है. ऐसे में आप का धीरेधीरे चीनी नामक सफेद जहर को छोड़ना बहुत जरूरी है.

अमेरिका में हाल ही में की गई एक रिसर्च के अनुसार अगर एक व्यक्ति पूरे दिन में 94 ग्राम जो 358 कैलोरी के बराबर होती है चीनी लेता है तो यह उस के लिए नुकसानदायक है. इसे छोड़ने से वह मोटापे, टाइप 2 डायबिटीज पाचन संबंधी समस्याओं से छुटकारा पा सकता है.

क्यों जरूरी है चीनी कम करना: अगर आप जरूरत से ज्यादा चीनी लेती हैं तो यह आप के ब्लड शुगर लैवल को बढ़ा देगी. आप को बता दें कि जब तक इस का असर रहता है तब तक आप बहुत सक्रिय रहती हैं, लेकिन असर खत्म होते ही आप को थकान फील होने लगती है, जिस से काम में मन नहीं लगना आदि समस्याएं होने लगती हैं. जबकि फाइबर, विटामिन, प्रोटीन ज्यादा से ज्यादा लेने से आप के ब्रेन और बौडी को ऐनर्जी मिलती है जिस से पूरा दिन आप बिना थके काम करने में सक्षम रहते हैं.

वजन कम करने में सहायक: हर व्यक्ति को गुड फैट जैसे ओमेगा 3 फैटी ऐसिड की जरूरत होती है, क्योंकि यह हमारे ब्लड सर्कुलेशन को ठीक करने का काम जो करता है जबकि ज्यादा मात्रा में चीनी लेने से यह खतरनाक फैट के रूप में ही हमारे शरीर में जमा हो जाता है. इसलिए अगर मीठा खाने का मन करे भी तो आर्टिफिशियल स्वीटनर लें.

बचें ऐलर्जी से : हर कोई मुंहासों और झुर्रियों से दूर रहना चाहता है. इसलिए आप को बता दें कि चीनी से बनी चीजों को डाइट से गुडबाय करने से आप पिंपल्स, झुर्रियों की समस्या से खुद को दूर रख कर क्लीयर स्किन की मलिका बन सकती हैं.

मैमोरी लौस से बचाए : एक रिसर्च के अनुसार ज्यादा शुगर लेने से काम में मन नहीं लगने के साथसाथ मैमोरी लौस की समस्या भी आती है. ऐसे में अगर आप नैगेटिव विचारों से खुद को दूर रखना चाहते हैं तो चीनी को छोड़ हैल्दी फूड खाने पर ध्यान दें. साथ ही दांतों व लिवर संबंधी बीमारियों से भी खुद को दूर रखें.

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शूटिंग के वक्त गंभीर रूप से घायल हुईं जैकलीन फर्नांडीस

सलमान खान स्टारर फिल्म ‘रेस 3’ के टीजर के अलावा सलमान, जैकलीन फर्नांडीस और बौबी देओल का फर्स्ट लुक सामने आया था. वहीं अब खबर आ रही है कि ‘रेस 3’ के सेट पर एक्ट्रेस जैकलीन फर्नांडीस घायल हो गई हैं. दरअसल, जैकलीन फर्नांडीस दुबई में ‘रेस 3’ की शूटिंग कर रही थीं. इस दौरान सेट में शूटिंग करते वक्त जैकलीन को चोट लग गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा.

जैकलीन अपनी फिल्म के शौट के बीच स्क्वैश खेल रही थीं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, जैकलीन स्क्वैश खेल रही थीं तभी बौल सीधे उनकी आंख में जा लगी. इसके बाद उन्हें गंभीर चोट आई जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया.

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खबरों के मुताबिक, सोर्स ने कहा, ‘जैकलीन को तेजी के साथ अस्पताल ले जाया गया है. उनकी आंख से लगातार खून बह रहा है. फिलहाल वह डौक्टरों की निगरानी में हैं, डौक्टर्स उनका ट्रीटमेंट करना शुरू कर चुके हैं.’ बता दें, जैकलीन जल्द ही ‘रेस 3’ में सलमान खान और डेजी शाह के साथ नजर आएंगी. ‘रेस 3’ में सलमान खान, डेजी शाह और जैकलीन फर्नांडीस के अलावा बौबी देओल और अनिल कपूर भी हैं. इससे पहले फिल्म से सलमान खान का फर्स्ट लुक जारी किया गया था.

सलमान पोस्टर में ब्लैक शर्ट में नजर आ रहे हैं, वहीं उन्होंने हाथ में बंदूक भी पकड़ी हुई है. फिल्म में सलमान ‘सिकंदर’ का किरदार निभा रहे हैं. फिल्म रेस 3 से जैकलीन का फर्स्ट लुक भी सामने आया था. जैकलीन ने भी पोस्टर में ब्लैक ड्रेस पहनी हुई है और वह बेहद खूबसूरत लग रही हैं. फिल्म में जैकलीन का नाम ‘जैसिका’ है.

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गर्मियों के मौसम के लिए खास फैशन टिप्स, आप भी अपनाएं

गर्मियों में स्किन की देखभाल करना बेहद जरूरी है. फैशन की बात करें तो कई बार महिलाओं के लिए यह तय करना बेहद मुश्किल हो जाता है कि गर्मियों के मौसम में वे किस तरह के कपड़े पहने, किन फैशन टिप्स को फौलो करें जो उनके और उनके स्किन के लिए बेहतर हो. आपके भी मन में इस तरह के सवाल उठते होंगे. चलिए आज हम आपको बताते हैं ऐसे बेसिक फैशन टिप्स जो गर्मियों में भी आपको कूल रखने के साथ देंगे बेहतर लुक.

कपड़ें :  गर्मियों में किस तरह के कपड़ें पहनना सही है, ये तय करना काफी जरूरी होता है. गर्मियों में लूज कपड़े पहनना एक बढ़िया विकल्प है. जितना कम कपड़ा आपके शरीर से टच होगा उतना ही यह आपको कूल रहने में मदद करेगा. इसके अलावा कपड़े के फैब्रिक पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. रेयान, पालियेस्टर, नायलान जैसे फैब्रिक्स को नजरअन्दाज करना ही सही है. कई फैशन एक्सपर्ट्स के मुताबिक गर्मियों के लिए काटन बेस्ट है. इसके अलावा लाइट कलर्स पहनना और साफ कपड़े पहनना फैशन और सेहत दोनो ही दृष्टी से आपके लिए बेहतर रहेगा. धुले हुए साफ कपड़े न सिर्फ आपको कूल रहने में मदद करेंगे बल्कि आपके स्किन को भी स्वस्थ बनाए रखेंगे.

जूलरी : इस तरह के मौसम में जितना हो सके उतना ही कम जूलरी पहनने की कोशिश करें. फैशन एक्सपर्ट्स की मानें तो छोटी इयररिंग्ज, पेंडेंट्स का इस्तेमाल करना बेहतर है. ब्रेसलेट्स और रिंग्स को नजरअन्दाज करना भी बेहतर होगा. वहीं मेटैलिक जूलरी भी एवाइड करना बढ़िया विकल्प होगा.

फुल कवर : गर्मी में अक्सर लोग खुद को कूल रखने के लिए कट-स्लीव्स या फिर शौर्ट्स पहनने के बारे में सोचते हैं लेकिन इस तरह के कपड़े आपके स्किन के लिए सही नही होते. स्किन को धूप से बचाना जरूरी होता है ऐसे में आप जितना अपनी बौडी को कवर करके रखेंगी उतना फायदेमंद होगा. साथ ही गर्दन या चेहरे को ढकने के लिए कौटन स्काफ का इस्तेमाल करें. साथ ही कैप-हैट और आंखों के लिए सनग्लासेस भी साथ में रखें.

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‘ढाई किलो प्रेम’ की अंजलि ने अपनाया ग्लैमरस अवतार

टीवी सीरियल ‘ढाई किलो प्रेम’ की दीपिका का किरदार फैंस को आज भी याद है. इस शो के लिए अंजलि आनंद ने अपना वजन 108 किलो तक बढ़ा लिया था. फिलहाल शो औफ एयर हो चुका है, लेकिन अंजलि ने इस तरह के किरदार से हटकर नए लुक के साथ एक नए टीवी शो में कमबैक किया है. उनके इस नये लुक ने हर किसी को हैरत में डाल दिया है.

बता दें कि अंजलि आनंद इन दिनों अपने नए शो ‘कुल्फी कुमार बाजेवाला’ में दिखाई दे रही हैं. हालांकि उन्‍होंने एक बच्‍ची की मां का किरदार निभाया है, पर इस शो में उनका लुक पिछले टीवी शो के मुकाबले थोड़ा मौडर्न है. वे अपनी बेटी को किसी भी तरह से एक स्‍टार बनाना चाहती हैं. इस किरदार में अंजलि पहली बार निगेटिव रोल कर रहीं हैं.

अंजलि ने बताया कि वह अपने इस कमबैक को लेकर काफी खुश हैं. उन्होंने सीरियल ‘ढाई किलो प्रेम’ के लिए अपना वजन 108 किलो तक बढ़ाया था. अपने वजन पर बात करते हुए अंजलि कहती हैं कि उन्हें उनके माप के कपड़े बड़ी मुश्किल से मिलते हैं, इसिलए वह अपनी ज्यादातर शौपिंग इंडिया के बाहर जाकर करती हैं. इतना मोटा होने के बावजूद उन्होंने मौडलिंग और एक्टिंग का सपना पूरा किया और कभी भी हार नहीं मानी.

अंजलि ने कहा, मुझे टीवी देखने का बहुत शौक है. मैं घंटों टीवी देख सकती हूं. मैंने साल 2013 से एक्टिंग शुरू की थी. साथ ही मैंने कुछ प्रोडक्‍ट्स के लिए मौडलिंग भी की थी. मुझे ट्रैकिंग और साईकिलिंग से प्‍यार है. यही वजह है कि मैं इससे ज्‍यादा वजन नहीं बढ़ा सकती हूं.

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कोई भी हेयरस्टाइल नहीं फबता तो जरा ये तरीके आजमा कर देखें

स्टाइल से रहने के लिए केशों का स्टाइल भी बेहतरीन होना बहुत जरूरी होता है. केश चाहे छोटे हों या लंबे, चेहरे की खूबसूरती निखारने में उन का बहुत बड़ा रोल होता है. अगर चेहरा खूबसूरत है और हेयरस्टाइल ठीक नहीं है, तो खूबसूरती फीकी पड़ जाती है.

चेहरे की खूबसूरती को निखारने के लिए पर्ल ऐकैडमी की हेयर डिजाइनर परमजीत सोई ने बताए कुछ ऐसे हेयरस्टाइल और हेयर ऐक्सटैंशन के तरीके जो आप की खूबसूरती को बढ़ाने के साथसाथ आप की पर्सनैलिटी को देंगे स्टाइलिश और ट्रैंडी लुक.

ट्विस्ट जूड़ा

सब से पहले केशों को अच्छी तरह से कंघी करें. फिर ऊपर के आधे केशों को उठा कर रोल करें. पीछे के बचे केशों के 2 सैक्शन बनाएं. इस के लिए पीछे बीच से मांग निकाल कर 2 अलगअलग चोटियां बनाएं. अब आगे के केश खोल कर बीच के कुछ केशों को ले कर बैक कौंबिंग कर के उसे ट्विस्ट करते हुए पीछे ले जा कर चोटी में पिन से सैट करें. ऐसे ही दूसरा सैक्शन ले कर सौफ्ट बैक कौंबिंग करें और उस पर हेयरस्प्रे डालें. फिर साइड के केशों को ट्विस्ट कर के हेयरस्प्रे डालें.

अब पीछे के बचे केशों में नौर्मल स्टफिंग लगा कर नीचा जूड़ा बनाएं. गुंथी हुई एक चोटी ले कर उस का एक सिरा पकड़ कर खींच दें.

ऐसे ही दूसरी चोटी को करें और चोटी को फ्लौवर जैसा बना कर जूड़े में सैट करें. स्टाइल बन जाने के बाद हेयरस्प्रे डालें और ऐक्सैसरीज लगाएं.

पफ जूड़ा स्टाइल

पूरे केशों में कंघी कर के इयर टु इयर केशों को छोड़ कर पीछे के केशों में रबड़बैंड लगा कर ऊंची पोनी बनाएं. आगे व साइड के केशों को छोड़ कर मिडिल सैक्शन अलग कर के पिन से सैट करें. अब साइड के केशों को कौंब कर के पीछे पोनी पर ला कर पिन से सैट करें. ऐसा दोनों तरफ करें.

फ्रंट लुक में आगे के कुछ केशों को छोड़ कर बीच के केशों की बैक कौंबिंग करें. फिर पूरे केशों की बैक कौंबिंग करें. अब दोनों साइड से टाइट और सैंटर से ऊंचा पफ बनाएं. पीछे पोनी को ढीली चोटी कर के ऊपर रोल कर के पिनअप करें. अब आर्टिफिशियल लीप को रोल कर के जूड़े के साइड में लगाएं. जूड़े के चारों तरफ बौब पिन से लौक कर दें. फिर केशों में स्प्रे डाल कर सैट करें.

मौडल फंकी स्टाइल

केशों को कंघी कर के उन पर स्प्रे डालें. फिर पूरे केशों की टौप पर एक पोनी बनाएं. अब पोनी एक पानी की बोतल (कटी हुई) में डालें और दूसरी तरफ से उसे निकाल लें. अब बोतल को छिपाने के लिए उस पर आर्टिफिशियल केश लपेट दें और उस पर कलरफुल ऐक्सैसरीज लगा कर खूबसूरत स्टाइल बनाएं.

हेयर ऐक्सटैंशन

बीच के केशों को अलग कर के पैक कर दें. अब बीच की मांग निकाल 6 पोनियां बनाएं. फिर 2 पोनियों को पकड़ कर नौट बनाएं. ऐसे ही सभी पोनियों के साथ करें.फिर इन पर नौट लगाएं.

अब आगे के केशों को खोल कर बैक कौंबिंग कर के स्प्रे डालें. फिर हेयर ऐक्सटैंशन वाले केशों में मिला दें.

यह स्टाइल हलके केशों के लिए बहुत अच्छा है. इस से केश हैवी लगते हैं और स्टाइल भी अच्छा बनता है.

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माता पिता के सपनों तले मिटता बचपन

हमारे पड़ोसी की हंसमुख तथा चुलबुली बेटी जब भी मिलती बहुत तपाक से ‘हैलो अंकल’ बोल कर स्वागत करती. उस की उम्र रही होगी मुश्किल से 14 वर्ष. उस के पिता का 2 साल पहले एक हादसे में देहांत हो गया था. उस की मां एक बैंक में नौकरी करती थीं और वे बहुत जतन से अपनी इस इकलौती बेटी का पालनपोषण करने में लगी हुई थीं. लेकिन उन्होंने अनजाने में ही अपने सपने उस बच्ची पर लादने शुरू कर दिए थे. जब वह उन की गोद में किलकारियां भर कर खिलखिलाती, तो वे उसे प्यार करती हुई बड़े गर्व से कहतीं, ‘‘मेरी दुलारी बेटी डाक्टर बनेगी.’’

असल में हुआ यह था कि वे खुद पढ़ाईलिखाई में बहुत तेज थीं और इंटर की परीक्षा में उन्हें लगभग हर विषय में डिस्टिंक्शन मिला था. वे डाक्टर बनना चाहती थीं, लेकिन घर वाले उन्हें ज्यादा पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे. शायद परिवार की आर्थिक स्थिति उन के और उन के सपनों के बीच एक दीवार बन कर खड़ी हो गई थी.

उन्होंने घर में लड़झगड़ कर किसी तरह मैडिकल का ऐंट्रैंस ऐग्जाम तो क्लियर कर लिया था, लेकिन मैडिकल कालेज की फीस जमा करने के लिए पैसों का इंतजाम न हो पाने के कारण उन्हें मनमसोस कर रह जाना पड़ा था. और फिर विवाह के बाद वे एक नए माहौल और नई जिम्मेदारियों के बीच घिर गई थीं.

उन्होंने अपने सपने को तभी अपनी इस चुलबुली बच्ची के ऊपर थोप दिया था जब वह डाक्टर शब्द का मतलब समझने के लायक भी नहीं हुई थी. 14 साल की उम्र तक पहुंचतेपहुंचते इस मासूम बच्ची को यह एहसास हो गया था कि वह बचपन से अपनी मां के किसी अधूरे सपने को जीती आ रही थी और अब इस सपने को साकार करना ही उस के जीवन का एकमात्र मकसद बन गया था.

तब वह 9वीं कक्षा में पढ़ती थी. उस ने पूरीपूरी रात जाग कर परीक्षा की तैयारी की थी, लेकिन गणित का पेपर उस की इच्छा के अनुरूप नहीं हुआ था. जब परीक्षा का रिजल्ट आया, तो वह यह देख कर एकदम स्तब्ध रह गई थी कि वह गणित में फेल हो गई थी. उस की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था और शायद उसे लगा होगा कि उस ने अपनी मां के सपने को चूरचूर कर दिया था. उसे अपना जीवन व्यर्थ लगने लगा था और व न जाने कब कक्षा से चुपचाप उठ कर स्कूल की छत पर जा पहुंची थी. उस ने बिना कुछ सोचेसमझे छत से नीचे छलांग लगा दी थी. एक पल में ही उस की मासूम जिंदगी पर पूर्ण विराम लग गया था. एक नन्ही कली खिलने से पहले ही मुरझा गई थी.

लेकिन वह कोई अकेली ऐसी नहीं थी, जो अपने मातापिता के सपने पूरे न कर पाने या उन की आशाओं पर खरा न उतर पाने के कारण इस दुनिया से समय से पहले ही कूच कर गई थी. हमारे देश में हजारों छात्र परीक्षा के बाद असफलता के डर से अपना जीवन समाप्त कर देते हैं.

आम मानसिकता

आज मातापिता की आशाएं, अपेक्षाएं पूरी करने की चुनौती के साथसाथ बेमानी विषयों की पढ़ाई भी बच्चों पर निरर्थक बोझ डाल रही है. यह एक ऐसा ज्ञान है जिस का व्यावहारिक जीवन में कभी कोई लाभ नहीं होता. हमारे देश के लोगों की आम मानसिकता कुछ ऐसी बन गई है कि हमारे बच्चे अगर डाक्टरी या इंजीनियरिंग जैसे प्रोफैशनल कोर्स में नहीं जाते, तो उन का भविष्य अंधकारमय बन जाता है. लेकिन ऐसा सोचते समय वे यह भूल जाते हैं कि अगर सारे मातापिता हमेशा ऐसा ही सोचते, तो फिर लोकमान्य तिलक, सुभाष चंद्र बोस या महात्मा गांधी कहां से पैदा होते.

गांधी का उदाहरण तो इस संदर्भ में सभी की आंखें खोलने के लिए पर्याप्त होना चाहिए. एक सामान्य सा कमजोर छात्र अपनी तमाम शारीरिक तथा मानसिक सीमाओं को लांघ कर न सिर्फ स्वाधीनता संग्राम का प्रमुख सूत्रधार बन गया, वरन सारी दुनिया को अहिंसा तथा प्रेम का संदेश देने वाला मसीहा और हमारा राष्ट्रपिता भी बन गया. वे इतिहास की एक अनूठी मिसाल हैं जो सदियों तक पूरी मानव जाति के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी.

इस संदर्भ में हमें हाल ही में सिंगापुर में विश्व प्रसिद्ध मनोविश्लेषक तथा सिडनी विश्वविद्यालय के ‘सैंटर फौर द माइंड’ के निदेशक प्रोफैसर ऐलेन स्नाइडर के विचार सुनने का अवसर मिला. उन का कहना था कि अगर मेरा बेटा अपनी परीक्षाओं में उच्च अंक प्राप्त करता है, तो यह मेरे लिए चिंता का विषय बन जाएगा. मैं नहीं चाहता कि मेरा बेटा केवल किताबी कीड़ा बन कर रह जाए. मेरी खोज इस बात का सुबूत है कि अपनेअपने क्षेत्र में जो लोग उच्चतम शिखर पर पहुंचे, वे कभी अपनी कक्षा में सब से ज्यादा अंक प्राप्त करने वाले छात्र नहीं रहे. जो छात्र सर्वोच्च अंक हासिल करते हैं, वे अकसर अपने जीवन में कोई असाधारण काम नहीं कर पाते.

अपनी बात पर बल देने के लिए उन्होंने अलबर्ट आइंस्टाइन का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि आइंस्टाइन एक औसत छात्र थे. उन के शिक्षकों ने कभी यह नहीं सोचा था कि वह कोई असाधारण प्रतिभा का धनी है और बड़ा हो कर अपने जीवन में कोई अविस्मरणीय काम कर पाएगा. जब वे भौतिकशास्त्र के सामान्य सिद्धांतों का अध्ययन कर रहे थे, तो उस समय एक सामान्य छात्र थे और परीक्षा पास करने के लिए उन सिद्धांतों को केवल याद करने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन जब बड़े हो कर उन्होंने इन परंपरागत सिद्धांतों की सत्यता पर संदेह करना और उन्हें चुनौती देना शुरू किया तो उन की उस असाधारण प्रतिभा का जन्म हुआ, जिस ने उन्हें दुनिया के महानतम वैज्ञानिकों की श्रेणी में ले जा कर बैठा दिया.

प्रोफैसर स्नाइडर की खोज का महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि सभी बच्चे कोई न कोई जन्मजात गुण ले कर पैदा होते हैं. यह गुण ही उन्हें महानतम लोगों की श्रेणी में शामिल करने के लिए पर्याप्त होता है. जरूरत केवल इस बात की होती है कि मातापिता अपने बच्चों पर अपने सपने थोपने के बजाय उन के जन्मजात गुणों को विकसित करने में उन की सहायता करें.

उन का मानना है कि जिन छात्रों को पढ़ाईलिखाई में फिसड्डी कह कर उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है, वे ही छात्र आगे जा कर किसी क्षेत्र विशेष में अपनी अनोखी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं.

इस संदर्भ में वे आस्ट्रेलिया के मैकडोनल फर्म के चेयरमैन पीटर रिची की कहानी सुनाते हैं. रिची सड़क पर भीख मांगने वाले बच्चों को अपने साथ ले गए और उन्हें अपने रेस्तरां में ग्राहकों की मेज तक बर्गर पहुंचाने के बुनियादी उसूलों का प्रशिक्षण दे कर काम पर रख लिया. बाद में इन्हीं भीख मांगने वाले बच्चों में से फास्ट फूड उद्योग के कुछ महानतम नेता पैदा हुए.

स्नाइडर का कहना है कि इस उदाहरण से यह साबित होता है कि जो लोग नियमों को तोड़ कर तथा आम सोच से अलग हट कर कुछ नया करते हैं, वे ही जीवन की महानतम ऊंचाइयों को छू पाते हैं. नियमों को तोड़ने के साथसाथ वे कुछ ऐसा भी करते हैं जो दूसरे लोग करते हुए डरते या हिचकिचाते हैं.

चैंपियन बनता कौन

इस में कोई शक नहीं कि शिक्षा की जीवन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि शिक्षा ही सब कुछ नहीं होती और न ही किताबी कीड़ा बन कर जीवन में कोई अद्भुत उपलब्धि हासिल की जा सकती है. जिस तरह कोई इमारत खड़ी करने में उस की नींव की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, उसी तरह किसी व्यक्ति के सफल जीवन की इमारत भी शिक्षा की नींव पर ही खड़ी होती है.

किसी भी विषय के मूलभूत सिद्धांतों को जानना जरूरी है. वे चाहे भौतिकशास्त्र के सामान्य सिद्धांत हों या फिर ग्राहकों तक बर्गर पहुंचाने के नियम. चैंपियन वही बनता है, जो इन सामान्य नियमों की जानकारी हासिल करने के बाद इन के साथ नएनए प्रयोग करने का साहस करता है और कोई भी काम करने का अपना खुद का कोई नया तरीका ढूंढ़ निकालता है.

वे तेनसिंह के साथ एवरेस्ट की चोटी पर सब से पहले पहुंचने वाले चैंपियन एडमंड हिलेरी का जिक्र करते हुए कहते हैं कि हिलेरी के लिए एवरेस्ट की चोटी पर पहुंच पाना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं था. वहां पहुंच जाने के बाद वे नेपाल के मकालू पर्वत के शिखर पर पहुंचने की योजना बनाने लगे थे.

उस समय तक इस पर्वत शिखर को भी कोई नहीं जीत पाया था. एडमंड हिलेरी ने एक बार प्रोफैसर स्नाइडर से कहा था, ‘‘जब आप जानते हैं कि आप उस पर्वत शिखर पर चढ़ सकते हैं, तो फिर चिंता किस बात की?’’

प्रोफैसर स्नाइडर कहते हैं कि इस दृष्टांत से चैंपियन लोगों के एक अन्य महत्त्वपूर्ण गुण का पता चलता है कि वे सृजनात्मक प्रवृत्ति के लोग होते हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि महान आविष्कारक अकसर अलगअलग असंबंधित विषयों का अध्ययन कर के उन के बीच के किसी नए रिश्ते को खोज निकालते हैं. कई बार ऐसा भी होता है कि कोई संबंधित व्यक्ति किसी तकनीकी गुत्थी को बहुत दिमाग लगाने के बावजूद नहीं सुलझा पाता, जबकि कोई बाहरी व्यक्ति उसे एक क्षण में हल कर देता है.

न्यूटन ने धरती के गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज भौतिकशास्त्र की किसी प्रयोगशाला में नहीं, वरन सेब के एक बगीचे में की थी. उस से पहले अनगिनत लोगों ने सेब को या किसी और फल को पेड़ से टूट कर धरती पर गिरते हुए देखा होगा, लेकिन किसी अन्य व्यक्ति ने इस बात को कभी विचारणीय नहीं माना. उन के लिए यह एक प्रतिदिन होने वाली एक सामान्य सी घटना थी. लेकिन न्यूटन ने इस सामान्य घटना के पीछे छिपे एक महान वैज्ञानिक सत्य को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया. न्यूटन की ही तरह आर्कमिडीज को भी एक वैज्ञानिक सत्य का एहसास स्नानागार के टब में नहाने के लिए बैठते हुए हुआ था.

अब सवाल यह उठता है कि क्या हरेक व्यक्ति ऐसा बन सकता है? क्या हम किसी आम आदमी को चैंपियन के रूप में विकसित कर सकते हैं? इस सवाल के जवाब में प्रोफैसर स्नाइडर कहते हैं कि हरेक आदमी में किसी न किसी क्षेत्र का चैंपियन बनने के जन्मजात गुण होते हैं.

यह बात ठीक उसी तरह है कि जैसे सरोजिनी नायडू बचपन में आड़ेतिरछे शब्द लिखतेलिखते एक महान कवयित्री में परिवर्तित हो गई थीं या फिर पिकासो अपनी पैंसिल से स्कूल की किताबों पर पशुपक्षियों के बेडौल चित्र बनातेबनाते दुनिया के महान चित्रकार बन गए थे.

यह हमारा अपना मानसिक दृष्टिकोण ही है, जो हमारी उम्मीदों पर सीमारेखाएं खींच सकता है, तो यह मनुष्य की अपनी खुद की सोच ही है, जो उसे उस के किसी खुद के चुने हुए क्षेत्र में चैंपियन बना सकती है. शर्त सिर्फ यही है कि मातापिता अपने लादे गए लक्ष्यों से उस के दिमाग को बोझिल अथवा कुंद न बना दें.

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जब नौकरी ही बन गई हत्यारी

सरकारी पक्की नौकरी की चाह इस देश में इतनी अधिक है कि भाई भाई को ही नहीं मां को भी मार सकता है, क्योंकि उन्होंने पिता के मरने के बाद उस की जगह नौकरी बड़े भाई को दिला दी. पश्चिम बंगाल के खड़गपुर शहर में रेलवे क्वार्टरों में रहने वाले शुभाषीश मंडल ने एक रात भाई के घर में घुस कर अपनी मां और भाई को मार डाला, क्योंकि उन दोनों ने मिल कर पिता के मरने के बाद नौकरी उसे नहीं मिलने दी.

13 साल तक मुकदमा लड़ते रहने पर भी शुभाषीश मंडल को कहीं से रहम नहीं मिला. शुभाषीश ने कहानी गढ़ने की पूरी कोशिश की थी कि हत्याएं किसी और ने लूट के इरादे से की थीं पर उस की बहन के बयान पर विश्वास करते हुए अदालतों ने उस बनावटी बहाने को नहीं माना.

हत्याएं तो हर समाज में होती रहती हैं पर सरकारी नौकरी के लिए कोई युवा अपनी मां और भाई को मार डाले यह अचंभे की बात जरूर है. सरकारी नौकरी का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि लोग इसे जीवन का अकेला उद्देश्य समझ लेते हैं. एक बार नौकरी लगी नहीं कि जीवन भर की पैंशन तय. अच्छा वेतन तो मिलेगा ही ऊपर से अच्छीखासी रिश्वत भी आप की. हर तरह से यह नौकरी जीवन को पक्की सड़क पर रखती है, इसीलिए जब हाथ से यह फिसलती नजर आए तो गुस्सा आ ही जाता है.

सरकारी नौकरी में मिलने वाली सुविधाओं की कीमत कोई तो देता ही है. जो देता है वह आम आदमी है जिस के पास सरकारी नौकरी नहीं है. इस देश में अगर

हर जगह मारामारी है, अस्तव्यस्तता है, गरीबी है, लूट है तो इस का बड़ा कारण सरकारी नौकरियां हैं, जो सिखाती हैं कि कम काम और ज्यादा वेतन ही जीवन का तत्त्व है.

आरक्षण के नाम पर चल रही राजनीति के पीछे यही है. भारीभरकम टैक्सों के पीछे यही है. पगपग पर रिश्वतखोरों के लिए यही जिम्मेदार है. सरकारी पैसे की बरबादी का कारण यही सरकारी कर्मचारी हैं, जो सरकार से सिर्फ पैंशन पाने आते हैं, काम करने नहीं.

जब सरकारी नौकरी में हर समय शहद की बूंदें टपकती रहें तो कौन उसे छोड़ेगा. उस के लिए  न पिता पिता है,न मां मां और न भाई भाई. आम जनता तो कहीं भी नहीं.

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