ग्लॉसी और काले बाल बनाने के लिए इस तरह बनाएं कोरियन ऑयल

हर महिला की चाहत होती है की उनके बाल काफी सुंदर, लंबे और घने दिखें. आजकल कोरियन स्किन केयर और हेयर केयर काफी ज्यादा ट्रेंड में चल रहे हैं. अगर आप कोरियन लड़कियों के बाल देखती हैं तो उनके बालों में एक अलग ही चमक होती है. उनके बाल काफी ज्यादा काले और ग्लॉसी होते हैं। हम भारतीय महिलाओं को भी ऐसे ही बाल पाने की चाहत होती है. आप अपने बालों की अच्छे से देख भाल करके और घरेलू रेमेडीज का प्रयोग करके उन्हें मजबूत और खूबसूरत बना सकती हैं लेकिन अगर आप काले और ग्लॉसी बाल पाना चाहती हैं तो आपको इस कोरियन ऑयल का प्रयोग लगातार करते रहना चाहिए.

घर पर ही कैसे बनाएं यह कोरियन हेयर ऑयल?

सामग्री

जोजोबा ऑयल : आपको दो चम्मच जोजोबा ऑयल का प्रयोग करना है. इस तेल में विटामिन और मिनरल होते हैं जो आपके बालों को पोषण प्रदान करते हैं और एक हेल्दी स्कैल्प प्राप्त करने में आपकी मदद करेंगे. यह एक बहुत अच्छे मॉश्चराइजर का काम करता है.

आर्गन ऑयल : दो चम्मच आर्गन ऑयल ले लें। इसे लिक्विड गोल्ड भी कहा जाता है। इसमें विटामिन, एंटी ऑक्सीडेंट और जरूरी फैटी एसिड होते हैं. यह आपके बालों को हाइड्रेट करने का काम करेगा। इससे बालों में फ्रिज कम होगी और बाल शाइन ज्यादा करेंगे.

दो चम्मच मीठे बादाम का तेल : यह आपके बालों को पोषण प्रदान करने का काम करता है और यह बालों को मॉइश्चर भी प्रदान करता है. इसमें विटामिन ई होता है जो बालों को मजबूत करता है और बालों का टूटना कम करता है.

कैमेलिया ऑयल : दो चम्मच कैमेलिया ऑयल ले लें. यह आपके बालों में शाइन एड करता है, बालों को सॉफ्ट बनाता है और दो मुंहे बाल होने से बचाता है.

एसेंशियल ऑयल : आप अपनी पसंद का कोई भी एसेंशियल ऑयल जैसे रोजमेरी, लैवेंडर आदि अच्छी खुशबू के लिए प्रयोग कर सकती हैं. यह पूरी तरह से ऑप्शनल स्टेप है.

एक चम्मच कैस्टर ऑयल : कैस्टर ऑयल अपने मॉश्चराइज करने वाले और कंडीशन करने वाले गुणों के लिए जाना जाता है. यह बालों का गिरना कम करता है.

विधि

सबसे पहले अपने सभी इंग्रेडिएंट्स को अच्छे से इकट्ठा कर लें और अच्छी गुणवत्ता वाले तेलों का ही प्रयोग करें ताकि बालों को अच्छे से लाभ मिल सकें.

इसके बाद सारे तेलों को आपस में मिक्स कर लें और एक बेस ऑयल बना ले। इसे अच्छे से मिलाते रहें ताकि एक गाढ़ा मिश्रण बन कर तैयार हो सके.

आप चाहें तो अन्य लाभों और खुशबू के लिए एसेंशियल ऑयल का प्रयोग कर सकती हैं.

मिश्रण तैयार होने के बाद इसे एक डार्क और ग्लास वाली बॉटल में स्टोर करके रख लें. इसे लाइट के संपर्क में आने से बचाएं ताकि यह तेल लंबे समय तक प्रयोग किया जा सके.

जब भी आप इसे प्रयोग करना चाहें तो थोड़ी सी मात्रा में अच्छे से सिर में इस तेल की मालिश करें. अच्छे नतीजे पाने के लिए हफ्ते में दो बार इस तेल का प्रयोग कर सकती हैं. इसे धोने से पहले कम से कम आधे घंटे तक अपने बालों में लगा रहने दें.

बालों में तेल का प्रयोग करने से पहले थोड़ा सा तेल को गर्म कर लें ताकि बाल अच्छे से तेल के गुणों को अब्जॉर्ब कर सकें. आप अपने लाइफस्टाइल के हिसाब से इसे प्रयोग करने की अवधि को बढ़ा भी सकती हैं

क्रिसमस पर परफेक्ट केक बनाने के 15 टिप्स

क्रिसमस का पर्याय है केक. पूरे दिसम्बर माह को ही क्रिसमस का माह माना जाता है और इसीलिए इन दिनों  हर जगह केक, मफिन्स और कुकीज की भरमार रहती है. अक्सर घर पर जब केक बनाया जाता है तो कभी वह फूलता नहीं है या फिर फूलने के बाद बैठ जाता है या फिर स्वाद में बाजार जैसा नहीं होता. जब कि घर पर बनाया गया केक बाजार से काफी सस्ता और स्वादिष्ट होता है. आज हम आपको केक बनाने के कुछ टिप्स बता रहे हैं जिनका ध्यान रखकर आप बहुत आसानी से घर पर ही परफेक्ट केक बना सकते हैं-

1-आप चाहे किसी भी फ्लेवर का केक बना रहे हों केक बनाने की समस्त सामग्री को एक जगह परफेक्ट मेजरमेंट के साथ रख लें फिर केक बनाना शुरू करें. सूखी सामग्री को छानकर ही प्रयोग करें.

2-मैदा, बेकिंग पाउडर, बेकिंग सोडा जैसी केक की सूखी और दूध, पानी, बटर, दही जैसी  गीली सामग्री को एक साथ मिलाने के स्थान पर 2 अलग अलग बाउल में मिलाकर फिर एक साथ मिलाएं.

3-डेढ़ कप मैदा, 1 कप पिसी शकर, 3/4 कप मलाई, 3/4 कप गुनगुना दूध, 1 टीस्पून बेकिंग सोडा, 1/4 कप मलाई के साथ आप बहुत आसानी से परफेक्ट केक बना सकतीं हैं.

4-माइक्रोवेब में केक बनाने के लिए पहले माइक्रोवेब को 5 मिनट 180 डिग्री पर प्रीहीट करें फिर 180 डिग्री पर 30 मिनट कन्वेक्शन मोड़ पर बेक करें.

5-यदि आपके पास माइक्रोवेब नहीं है तो आप प्रेशर कुकर या कड़ाही में 1 इंच मोटी नमक की लेयर लगाकर गैस पर धीमी आंच पर 10 मिनट प्रीहीट करके 40 मिनट तक ढककर बेक करें. बेक करने से पहले प्रेशर कुकर की सीटी और रबर को निकाल दें.

6-केक के बैटर को बेकिंग डिश में डालने से पूर्व डिश को चिकना करके सूखा आटा या मैदा चारों तरफ बुरक कर अतिरिक्त आटे को डिश को ठोकककर निकाल दें फिर बैटर डालें, आप बटर पेपर को ग्रीस करके भी डिश में लगा सकते हैं इससे पक जाने पर केक बहुत आसानी से डिश से बाहर निकल आता है.

7-यदि आप किसी फल के फ्लेवर का केक बनाना चाहतीं हैं तो फल के पल्प को तैयार बेटर में मिलाएं अथवा किस कर बैटर में मिलाएं, आप चाहें तो फ्रूट के छोटे छोटे टुकड़े काटकर भी मिला सकतीं हैं.

8-केक पक गया है अथवा नहीं यह जानने के लिए केक के पक जाने पर टूथपिक या साफ चाकू डालकर देखें यदि केक नहीं चिपक रहा है इसका मतलब है कि केक पूरी तरह पक गया है.

9-चॉकलेट केक बनाने के लिए कोको पाउडर और  डार्क चॉकलेट का प्रयोग करना चाहिए इससे आपको चॉकलेट का परफेक्ट फ्लेवर मिलेगा.

10-लेयर्ड केक बनाने के लिए मोटा या अधिक ऊंचाई वाला केक बनाएं ताकि आप इसे बीच से काट सकें.

11-केक को मोल्ड में से पूरी तरह ठंडा होने के बाद ही निकालें अन्यथा यह टूट जाएगा.

12-आइसिंग करने के लिए आइसिंग शुगर को अनसाल्टेड बटर में मिलाकर प्रयोग करें

13-आजकल गनाश से आइसिंग की जाती है इसे बनाने के लिए बटर और चॉकलेट को एक साथ गर्म करके गनाश बनाएं फिर इससे आइसिंग करें.

14-केक के बैटर को एक ही दिशा में फेंटने से केक परफेक्ट बनता है, बार बार अलग दिशा में फेंटने से केक में एयर नहीं बन पाती जिससे केक को फूल नहीं पाता.

15-केक को बनाने में प्रयोग की गई सामग्री को ताजा ही लें अधिक पुराना बेकिंग सोडा और बेकिंग पाउडर प्रयोग करने से अक्सर केक फूल नहीं पाता अथवा फूलकर फिर पिचक जाता है.

सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर के चंगुल में इंडियन पौलिटिक्स

सबकुछ सोशल मीडिया हो चला है, राजनीति के धुरंधर नेता भी रील और शौर्ट वीडियोज बना रहे हैं. नेताओं की चलते हुए स्लो मोशन क्लिप वायरल हो रही हैं. हों भी क्यों न, रील वीडियोज में स्लो मोशन का गजब का खेल जो है. नेतामहानेता होने जैसा फील ले पा रहा है, जैसे ‘जवान’ फिल्म का शाहरुख खान 7 बार जनता का मसीहा बनने के लिए परदे पर स्लो मोशन एंट्री लेता है.

नेता समझ गए हैं, उन के लंबे उबाऊ भाषण युवा नहीं सुनना चाहते. अब तो महामानवों के भाषण भी झूठे, नीरस और बोझिल लग रहे हैं. सोसाइटी, इकौनोमी के लिए क्या अच्छा है, किस पार्टी के क्या मुद्दे हैं, युवा इस में इंट्रैस्टेड नहीं हैं. उन्हें20-25 सैकेंड का मजा चाहिए. वह तो नेताओं की वीडियो भी शोर्ट क्लिप में देख रहे हैं, उसी से अपनी समझ बना रहे हैं. वे 20-25 सैकंड लायक ही बच गए हैं, अपनी पर्सनल लाइफ में इस से आगे का वे न तो सोच पा रहे हैं न किसी चीज का मजा ले पा रहे हैं.

राजनीति में चुनाव के समय जनता ही सर्वोपरि है, लेकिन जनता तो रील्स में डूबी है. सुबह उठने के साथ रील, संडास जाते रील, दातून करते रील, खाना बनाते रील्स, खाना खाते रील, रील बनाते रील्स, काम करते रील, यहां तक कि सोने से पहले रील ही रील. अगर तर्जनी उंगली और अंगूठे की जांच की जाए तो हाथों की आधी रेखाएं मिटी दिखेंगी. अब जाहिर है युवा रील पर हैं तो नेता क्यों न हों? जहां जनता वहां नेता.

अब यही देख लो, राहुल गांधी शौर्ट वीडियो और स्लो मोशन क्लिप्स से सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे तो जमीनी नेता कहे जाने वाले यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करने की अपील करने लगे और फिर हरियाणा के इंफ्लुएंसर अंकित बेथनपुरिया के साथ स्वच्छता दिवस के मौके पर कौलेब करते दिखाई दिए.

तालमेल वाले इंफ्लुएंसर

राजनीति में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की मांग बढ़ने लगी है. कुछ दिन पहले गुरुग्राम में बिग बौस विनर रहे और खुद को कट्टर हिंदू बताने वाले एलविश यादव को मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने खुद आ कर स्टेज पर बधाई दी, स्पैशल प्रोग्राम रखा गया और उन्हें युवाओं का आइकन बताया गया.

इस से किसी और को रश्क हुआ हो या न हुआ हो, हरियाणा के उन मैडलधारी रेसलर्स को जरूर हुआ होगा जो महीनों जंतरमंतर पर धरना देते बैठे रहे. वे यही सोच रहे होंगे कि देश के लिए मैडल जीतने से अच्छा शौर्ट रील बना ली होती, लटके?ाटके दिखा दिए होते तो कोई उन की सुनने वाला भी होता.

जिस एल्विश यादव, फायर ब्रैंड हिंदू इंफ्लूएंसर को भाजपा व उस के नेता सरआंखों पर बैठा कर रखते हैं, उस पर रेव पार्टी करने व उन पार्टियों में विदेशी लड़कियों के साथ सांपों की तस्करी करने का आरोप लगा है. यूपी पुलिस ने उस के 6 साथियों को गिरफ्तार किया है.

सोचने वाली बात है कि यह ऐसा अपराध है, जिस में यदि कोई अपराधी साबित होता है तो 7 साल की सजा व भारी जुर्माना तय है.

ऐसे सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर का नाम कभी भोगी तो कभी खट्टर जपते रहते हैं और राजनीतिक राह देते हैं.

आजकल राजनीतिक पार्टियां पेड प्रमोशनल वीडियो बनवा रही हैं. उन के पीआर यूट्यूब इन्फ्लुएंसर को पकड़ रहे हैं. दोनों कोलेबोरेशन कर रहे हैं, पोडकास्ट हो रहे हैं, घंटेडेढ़घंटे इंटरव्यू हो रहे हैं. लंबी इंटरव्यू वीडियोज में आधे से ज्यादा इज्जत खातिरदारी वाले सवाल किए जा रहे हैं, इमेज बिल्ंिडग की जा रही है, हां,20-30 सैकंड का तड़कताभड़कता सवाल बीच में किया जा रहा है, जिसे शौर्ट बना कर सोशल मीडिया पर ठेला जा रहा है.

बीर बायसैप्स के नाम से मशहूर इंफ्लुएंसर रनवीर अलाहबादिया और राज शमामी ऐसे पौलिटिकल इंटरव्यू करते नजर आ रहे हैं, जहां वाहवाही के अलावा और कुछ नहीं है.

युवाओं को साधने की कोशिश

चीजें बदल गई हैं. बौलीवुड सितारों से ले कर राजनीतिक सितारों तक, सभी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं. किसी को अपनी पिक्चर हिट करानी है तो किसी को अपना शो. किसी को अपना राजनीतिक कैरियर बनाना है तो किसी को बचाना है.

एक समय पार्टी और नेता यही काम बौलीवुड के सितारों से लेते रहे. अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, गोविंदा, हेमा मालिनी, राज बब्बर, सनी देओल, परेश रावल ये सब राजनीति में हैं या आए गए. फेहरिस्त लंबी है. रीजनल कलाकारों को भी इस्तेमाल किया जाता रहा, रवि किशन, मनोज तिवारी, निरहुआ, संजय यादव जैसे तमाम नाम सामने हैं.

भले ये सितारे कभी अपने लोकसभाई क्षेत्र नहीं गए, अधिकतर समय अपने एक्ंिटग प्रोफैशन से जुड़े रहे, जिन मुद्दों से सरोकार नहीं रहा, पब्लिक ने भले ही इन के पोस्टर ‘फलां नेता गायब है’ इलाके में चिपका दिए हों, लेकिन चुनाव के समय बस मंच पर डांस कर कमर मटका दी तो जनता ने भी इन की गलतियों को दूधभात समझ माफ करने में भी देर नहीं लगाई.

लेकिन वह दिन अब दूर नहीं जब इन्फ्लुएंसर को लोकसभा और विधानसभा की सीटें पकड़ाई जाएंगी. विधायिका में वैसे भी 33 प्रतिशत वीमेन रिजर्वेशन पास करवा दिया गया है. बेशक कुछ ममता, मायावती जयललिता, शीला जैसी निकलेंगी पर अधिकतर मर्द नेताओं की बहु, पत्नियों, बेटियों, देवरानियां ही होंगी. इस के बाद बची सीटें इन्फ्लुएंसर उड़ा ले जाएं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए. सोशल मीडिया पर वैसे भी रील बालाओं का जलवा है.

पार्टियों के लिए अच्छी बात कि यहां अलगअलग जातियों और धर्मों की रील बालाएं हैं. यहां मैडम भी हैं तो नौकरानी भी. दोनों ही अपनेअपने जोन में फेमस हैं. यानी सारा मसला सोर्टआउट है. राजनीतिक पार्टियों के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं होने वाली. करना क्या है, बस फौलोअर्स ही तो देखने हैं, अपनी पार्टी हित देखते कैंडिडेट चुनने हैं. जो जितना पौपुलर, जिस के लचक में जितना दम, उस के उतने चांस.

कारण भी है इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर बिग बौस विजेता के लिए वोट मांगे जा रहे हैं और इन वीडियोज को देख कर खलिहर लाखों युवा में वोट डाल रहे हैं, अपने कैंडिडेट को जिताने के लिए सड़कों के ट्रैफिक जाम कर रहे हैं, जैसे किसी बाहुबली नेता के लिए गुर्गे निकल पड़ते हैं, घर से पिता की जेब से चुराए पैसों से गाडि़यों में पैट्रोल भर कर सड़कों पर हुडदंग कर रहे हैं और टीवी पर आ कर पागलों की तरह चिल्ला रहे हैं तो ऐसे ही इंस्टाग्राम पर रील्स देख कर ये अपने कैंडिडेट भी चुन ही लेंगे. लगता है भारत का भविष्य इन्हीं के भरोसे हो चला है.

आज ही से पीना शुरू करें पालक का जूस, ये हैं फायदे

शरीर के विकास के लिए हरे साग सब्जियों का सेवन बेहद जरूरी है. इसमें पालक सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. इसमें कई तरह के मिनरल्स, विटामिन्स और कई अन्य जरूरी न्यूट्रिएंट्स पाए जाते हैं. इसके अलावा इसमें मैगनीज, कैरोटीन, आयरन, आयोडीन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, सोडियम, फौस्फोरस और आवश्यक अमीनो एसिड भी पाए जाते हैं. इस खबर में हम आपको पालक जूस से होने वाले फायदे के बारे में बताएंगे.

  • पालक में एंटीऔक्सिडेंट पाए जाते हैं. इसके नियमित सेवन से त्वचा की झुर्रियां दूर रहती हैं और चेहरे पर चमक आती है.
  • गर्भवती महिलाओं के लिए भी पालक का जूस पीने की सलाह दी जाती है. इससे गर्भ में पल रहे बच्चे को आयरन की कमी नहीं होती है.
  • कई तरह के अध्ययनों में ये बात सामने आई है कि पालक में मौजूद कैरोटीन और क्लोरोफिल कैंसर से बचने में हमारी मदद करता है. आंखों की रोशनी के लिए भी ये काफी असरदार होता है.
  • इसमें विटामिन्स की अच्छी मात्रा होती है. इससे हड्डियों को मजबूती मिलती है.
  • पाचन क्रिया को बेहतर करने के लिए भी पालक के जूस के सेवन की राय दी जाती है. ये शरीर के विषाक्त पदार्थों को निकाल कर पको स्वस्थ रखने का काम करती है. इसके अलावा कब्ज की परेशानी में भी खासा आराम देती है.
  • अगर आपको त्वचा से संबंधित परेशानियां हैं तो ये आपके लिए बेहद फायदेमंद होगा. इसके नियमित सेवन से त्वचा पर चमक आती है. बालों के लिए भी ये काफी फायदेमंद है.

फैशन बनते पालतू कुत्ते

राजधानी दिल्ली की किसी भी मार्केट में चले जाएं. आप को चमचम करते पार्लरों में दिख जाएंगे जहां सजनेसंवरने युवतियां नहीं बल्कि शानदार एक से एक पालतू कुत्ता लाया जाता है. दिल्ली के धनाढ्य लोग अपनी बड़ीबड़ी गाडि़यों में इन कुत्तों को ले कर आते हैं. इन पार्लरों की परिचारिकाएं बड़े जतन से इन के बाल काटती हैं. स्पा देती हैं यानी नाखून काटने, सजानेसंवारने से ले कर कुत्तों को यहां तरहतरह के व्यायाम भी करवाए जाते हैं. होम सर्विस भी उपलब्ध है जिस के लिए विशेष वैनें बनवाई गई हैं जिन में कुत्तों से संबंधित हर सुविधा उपलब्ध है.

कुत्ता पालना सालों से स्टेटस सिंबल रहा है. सोसाइटी के नामीगिरामी लोगों में पालतुओं का चलन शुरू से रहा है. पिछले कुछेक सालों से मध्यवर्गीय परिवारों में भी इन्हें पालने का चलन बढ़ा है. ‘इंडिया इंटरनैशनल पेट ट्रेड फेयर’ के आंकड़ों के मुताबिक इस समय देश के सिर्फ 6 मैट्रो शहरों में ही पालतू कुत्तों की संख्या लगभग 40 लाख है. यह संख्या हर साल 10% की दर से बढ़ रही है.

मगर इन पालतू कुत्तों में से छोड़े गए कुत्ते स्ट्रीट डौग बन रहे हैं और लोगों को काट रहे हैं. दिल्ली ही नहीं सारे देश की म्यूनिसिपल कमेटियों के लिए ये सिरदर्द हैं क्योंकि इन्हें मारना संभव नहीं है. उस पर मेनका गांधी जैसे ऐनिमल लवर्स हल्ला मचाने लगते हैं.

ठीक से देखरेख नहीं

जो पाल रहे हैं उन में 10 से 15% संख्या उन लोगों की भी है, जो कुत्ते शुरू में पाल तो लेते हैं पर फिर उन की ठीक से देखरेख नहीं कर पाते और उन्हें सड़क पर छोड़ आते हैं. सड़कों पर सड़क छाप और पालतू कुत्तों के बीच फर्क एकदम साफ नजर आता है. पालतू कुत्ते आमतौर पर प्रशिक्षित होते हैं. उन्हें प्यार और पुचकार की आदत होती है. भूख लगने पर वे खाने पर ?ापटते नहीं, बल्कि हाथ बढ़ा कर मांगते हैं या फिर आवाज निकालते हैं.

सड़क छाप कुत्तों की तरह वे खूंख्वार नहीं होते. इसलिए जैसे ही किसी पालतू कुत्ते को घर से बाहर निकाल दिया जाता है, वह सड़क पर जीने लायक नहीं रह पाता. उसे सड़क के कुत्ते नोचनोच कर खा जाते हैं पर खूंख्वार पालतू कुत्ते बच जाते हैं और यही आक्रमण करते हैं.

राजधानी दिल्ली के पालतू जानवरों की एक डाक्टर कहती हैं कि ऐसे परिवारों को कुत्ते नहीं पालने चाहिए, जिन के पास जगह की कमी हो या वे जो जानवरों के प्रति संवेदनशील न हों. आमतौर पर बच्चों को कुत्ता पालने का क्रेज होता है और उन के जन्मदिन पर अभिभावक या जानपहचान के लोग उपहार स्परूप उन्हें पप्पी देते हैं. पप्पी की भी परवरिश आसान नहीं होती.

लगभग 6 सप्ताह के पपीज गोद देने लायक होते हैं, लेकिन इस उम्र में उन की अच्छी तरह देखभाल करनी पड़ती है. 6 महीने तक पप्पी बिलकुल एक छोटे बच्चे की तरह व्यवहार करते हैं, जो मुंह में मिल जाए, काटे लेंगे, कहीं भी सूसूपौटी कर देंगे, लेकिन इस उम्र में गोद लेने पर कुत्तों को अपनी तरह से प्रशिक्षित किया जा सकता है और वे परिवार के सदस्यों के साथ जल्दी घुलमिल जाते हैं.

छोटी उम्र में घर आने वाले पपीज खुद को घर का एक सदस्य मानने लगते हैं. इन को समय पर टीके लगवाना, वक्त पर पौष्टिक खाना देना और साफसफाई रखना घर वालों की जिम्मेदारी है. जो परिवार यह जिम्मेदारी नहीं उठा पाते उन्हें पालतू जानवर सिरदर्द लगने लगते हैं. ऐसे व्यक्तियों या परिवारों को कुत्ता नहीं पालना चाहिए क्योंकि एक बार घर में पलने के बाद कुत्ते बाहर की दुनिया में जीने लायक नहीं रह जाते.

फायदे भी हैं

कुत्ते पालने के बड़े फायदे भी हैं. सुरक्षा की दृष्टि से कुत्ते बेहद वफादार होते हैं. दिल्ली के मल्टी स्टोरी अपार्टमैंट में रहने वाली उमा अपने 5 साल के बच्चे और पालतू कुत्ते को अकेला घर में छोड़ कर आराम से बाहर का काम कर आती है.

वे कहती हैं, ‘‘मेरा कुत्ता स्नूपी किसी अजनबी को घर के अंदर आने ही नहीं देता. वह हर समय मेरे बेटे के साथ साए की तरह चलता है. मैं खुद अगर बच्चे को जोर से डांटती हूं, तो स्नूपी मुझ पर भी भूंकता है. मेरा बेटा स्नूपी से इतना हिलामिला है कि उसे खुद ही नहलाता है, उस के खानेपीने का खयाल रखता है, उसे शाम को बाहर घुमाने ले जाता है.’’

पालतू कुत्ते घर में सिर्फ सुरक्षा की दृष्टि से ही नहीं रखे जाते. जानवरों के डाक्टर जोशी कहते हैं, ‘‘कुत्ते वफादार होते हैं, यह तो सब को पता है. इस के अलावा उन के घर पर रहने से तनाव छूमंतर हो जाता है. कुत्ते बहुत अच्छे स्ट्रैस बस्टर होते हैं. उन के साथ रहने पर बच्चों की इम्यूनिटी भी बढ़ जाती है और बच्चों को एक अच्छा साथी भी मिल जाता है. अकेलापून दूर भगाने में कुत्ते सब से अच्छे मित्र साबित होते हैं.’’

शहरों में एकल परिवारों के चलन की वजह से भी कुत्ते पालने वालों की संख्या बढ़ी है. जिस तरह आज अमेरिका और कनाडा में लगभग 90% नागरिक कोई न कोई पालतू जानवर घर में रखते हैं उस के पीछे अकेलापन सब से बड़ी वजह है. बाहर के देशों में तो कुत्तों के लिए अलग पार्क, सड़कें और मौल हैं और कैनल भी हैं जहां कुछ दिनों के लिए अपने पालतू को छोड़ कर छुट्टी पर जा सकते हैं.

कुत्ते पालने का चलन

कुत्ते घर के सदस्य की तरह होते हैं. विदेशों में बच्चों को शुरू से ही पालतुओं के प्रति संवेदनशील बनाया जाता है. जानवरों के साथ अपनत्व भरा बरताव, सहृदयता जरूरी है. कुत्ते के मालिकों को उन की पौटी उठाने और सड़क साफ करने में जरा हिचक नहीं होती. वहां ज्यादातर लोग अपने पालतुओं के पीछे हाथों में ग्लब्ज पहने एक पौलिथीन या पेपर बैग उठा कर चलते हैं ताकि उन के पालतू सड़क या शहर गंदा न करें. कुत्ते उन के लिए सिर्फ  स्टेटस सिंबल या प्रहरी नहीं होते.

भारत में मध्यवर्ग में कुत्ते पालने का चलन तो बढ़ गया, पर लोग अब तक सैंसिटिव नहीं हो पाए हैं. उन्हें यह काम नौकरों पर छोड़ना होता है जिन्हें जानवरों से जरा भी लगाव नहीं होता.

राजधानी में आवारा और परित्यक्त कुत्तों के लिए बने संस्थानों में ऐसे कुत्ते आते हैं, जो कभी पालतू थे. अच्छी नस्ल और प्रशिक्षित कुत्ते दूसरे कुत्तों की भीड़ में न ठीक से खा पाते हैं और न ही अपनी आवाज उठा पाते हैं. अकसर उन की आंखें नम रहती हैं और किसी की पुचकार के लिए उन के कान तरसते रहते हैं. बिस्कुट देने पर वे ?ापटते नहीं, बल्कि हाथ चाट कर खाते हैं. ऐसे कुत्तों को अगर दोबारा अडौप्ट कर भी लिया जाए, तो उन्हें नए परिवार में घुलनेमिलने में बहुत समय लगता है.

पेट शोच का आयोजन

इस समय देश में विभिन्न शहरों में डेढ़ सौ से अधिक पेट शोज आयोजित होते हैं, जिन में कुत्ते, बिल्ली, विभिन्न पक्षियों के अलावा खरगोश और सफेद चूहों की नस्लें बिक्री के लिए रखी जाती हैं. पालतुओं को खिलाया जाने वाला खास आहार, उन को सजानेसंवारने में ज्यादा खर्च करने की जरूरत नहीं होती. उन्हें तो बस प्यार की जरूरत होती है. वैसे भी ज्यादा पैंपर करने पर कुत्ते चिड़चिड़े हो जाते हैं. उन्हें समयसमय पर दूसरे कुत्तों से मिलने देना चाहिए. आरामतलब कुत्ते कई बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. अच्छी नस्ल के कुत्तों के लिए रोज 3 से 5 किलोमीटर चलना या दौड़ना जरूरी है. बिना व्यायाम के उन का खाना नहीं पचता और वे पेट की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं.

यह बात बेहद अफसोस की है कि बहुत लोग अपने पालतुओं को साल 2 साल रखने के बाद किसी को दे देना चाहते हैं. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने पालतुओं से बहुत बुरा बरताव करते हैं. कुत्तों को समय पर खाना न देना, मारनापीटना, सर्दी या गरमी में घर से बाहर रखना यह अमानवीय लगता है. अगर आप अपने पालतू को रखने लायक नहीं है, तो मत पालिए.

अगर पैट पाला तो उस के खमियाजे के लिए भी तैयार रहना चाहिए. अगर वह किसी को काट ले तो उसे आर्थिक मुआवजा देने में हिचकिचाएं नहीं.

 दिखावा क्यों

मधुरा जब शहर में चल रहे डौग शो को देखने पहुंची तो वहां पर मौजूद डौग जो अपने मालिकों के साथ वहां आए थे, देख कर चकित रह गई. एक से बढ़ कर स्टाइलिश ढंग से सजे, कीमती कपड़ों से लैस, परफ्यूम से महकते और जूते, कौलर, नैकटाई, रिंग जैसी ऐक्सैसरीज से सज्जित उन पेट्स को देखना किसी स्वप्नलोक से कम न था. उन के नेम टैग भी बहुत ही आकर्षक थे. वे इस तरह से अपने मालिक के साथ खड़े थे जैसे मानो किसी फिल्म की शूटिंग में आए हों और अपनी बारी का इंतजार कर रहे हों.

पग, अमेरिकन, पिट, लेबराडोर, बौक्सर, डेशुंड, अफगान हाउंड, आइरिश वुल्फहाउंड, जरमन शेपर्ड, डाबरमैन, डायमेशियंस जैसे महंगे पेट्स वहां मौजूद थे, जो शानदार गाडि़यों में बैठ कर आए थे. डौग शो में आ कर उन्हें सर्वप्रथम बनने के लिए किसी तरह की ट्रिक नहीं दिखानी थी, बल्कि उन का चयन उन के कोट साइज, आदत और पसंद के  हिसाब से होना था.

तभी वहां से गुजरती एक महिला को मधुरा ने कहते सुना, ‘‘कितने मजे हैं इन पेट्स के. आलीशान गाडि़यों में घूमते हैं, बड़ीबड़ी कोठियों में रहते हैं और हम से भी महंगा खाना खाते हैं. कितना कठिन है आज के जमाने में एक बच्चे को पालना और लोग पेट्स पालते हैं.’’

उस महिला के कहने के अंदाज से झलक रहा था कि पेट्स पर इतना पैसा खर्चने की बात उसे अखर रही थी.

बन गए हैं स्टेटस सिंबल

चीन में एक तिब्बती मस्टिफ 1 करोड़ पाउंड में बिका था. यह बहुत ही आक्रामक गार्ड डौग है. जाहिर सी बात है कि जिस ने इसे खरीदा होगा. वह कोई मामूली आदमी तो होगा नहीं, बल्कि महंगे पेट पालने की हैसियत रखता होगा. कोई भी पैट जितना कीमती होता है या बेहतरीन नस्ल को पालने, उस के रखरखाव में 50 हजार रुपए महीना खर्च हो सकते हैं.

समाजशास्त्रियों का मानना है मर्सिडीज और सोलिटेयर्स को पीछे छोड़ते हुए पेट्स लेटैस्ट स्टेटस सिंबल बनते जा रहे हैं और उन के मालिकों को उन के लिए महंगे से महंगे प्रोडक्ट्स और सर्विसेज लेने में कोई परेशानी महसूस नहीं होती है. शायद यही वजह है कि इस समय भारत मं यह बाजार 500 करोड़ तक पहुंच चुका है और उन के लिए ब्रैंडेड फूड से ले कर इस समय यहां पपकेक, बैड तो उपलब्ध हैं ही साथ ही उन के बर्थडे की पार्टी किसी लग्जरी रिजोर्ट में करवाने का इंतजाम भी किया जाता है.

उन के लिए है हर चीज ब्रैंडेड

जीवनशैली का अनिवार्य अंग व अधिक से अधिक भारतीय परिवारों के पेट्स को रखने के चलन के कारण वे अब केवल कोई खेलने या मन बहलाने की चीज अथवा मात्र सुरक्षागार्ड ही नहीं रह गए हैं, बल्कि वे परिवार का एक अहम हिस्सा भी बन गए हैं. यदि एकल परिवार हो जिस में एक ही बच्चा हो या ऐसे परिवार जहां बच्चे भी न हों, पेट्स उन के लिए एक कीमती चीज बन गए हैं. ब्रैंडेड कपड़ों से ले कर फर्नीचर, खिलौने और फूड तो उपलब्ध हैं ही, साथ ही वीकैंड किसी स्पा में गुजरना ताकि मसाज हो सके, के लिए उन के मालिक कहीं भी जाने व मुंह मांगे दाम चुकाने को तत्पर रहते हैं तो इस की वजह है कि वे चाहते है कि  उन का पेट स्पैशल अनुभव करे.

जगहजगह खुल रही पेट्स शौप पर जा कर उन के लिए टीशर्ट से ले कर कैनल, किताबें, फीडिंग बाउल्स, चेन आदि खरीदी जा सकती है. उन के लिए बाजार में इतने विकल्प व वैराइटीज मौजूद हैं कि उन के मालिक उन्हें स्पैशल ट्रीटमैंट दे सकते हैं. टीवी पर दिखाए जाने वाले पेडीग्री फूड के विज्ञापन से यह तो साबित हो ही जाता है कि पेट्स को ले कर कौशंस हो चुके हैं कि उन के पेट्स का अधिकार रखते हैं और उन के मालिक इस बात को ले कर कौशंस हो चुके हैं कि उन के पेट्स को बढि़या से बढि़या चीजें व सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए. पेडीग्री फूड का 500 ग्राम का पैकेट 65 रुपए का आता है और 1000 रुपए तक उस की कीमत है. इस के अतिरिक्त डौग च्यू जिन का आ कर हड्डी, जूतों आदि जैसा होता है, वे भी मिलते हैं. वे भी 25 से 600 रुपए के बीच आते हैं. उन के लिए हेयर ब्रश, टूथब्रश, टूथपेस्ट, नेलकटर, शैंपू, हेयर टोनिक, परफ्यूम सब मिलते हैं.

पेट्स की हैल्थ की नियमित जांच और समयसमय पर लगने वाले वैक्सीन बहुत ही महंगे होते हैं. यहां तक कि उन्हें कैल्सियम भी खिलाया जाता है. किसी भी डौग क्लीनिक में चले जाएं तो पाएंगे कि कुछ डौग अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में बैठे होते हैं. मंथली चैकअप, रेबीज के टीकों, ग्लूकोस ड्रौप उन्हें समयसमय पर दी जाती हैं.

साठ पार का प्यार: समीर को पाने का सुहानी ने आखिर कैसा अपनाया था पैतरा

सिल्वर जुबली गिफ्ट: भाग 3- क्यों गीली लकड़ी की तरह सुलगती रही सुगंधा

इधर कुछ दिनों से सुगंधा को अपने दाएं स्तन में एक ठोस गांठ सी महसूस हो रही थी. जब उस ने इंद्र से स्थिति बयां की तो उस ने पूछा, ‘‘दर्द होता है क्या उस गांठ में?’’ ‘‘नहीं, दर्द तो नहीं होता,’’ सुगंधा ने जवाब दिया.

‘‘तो शायद तुम्हें मेनोपौज होने वाला है. मैं ने पढ़ा था कि मेनोपौज के दौरान कभीकभी ऐसे लक्षण पाए जाते हैं. घबराने की कोई बात नहीं, जान. कुछ नहीं होगा तुम्हें.’’

इंसान की फितरत होती है कि वह अनिष्ट की तरफ से आंखें बंद कर के सुरक्षित होने की गलतफहमी में खुश रहने की कोशिश करता है. सुगंधा भी इस का अपवाद नहीं थी. मगर जब कुछ महीनों के बाद उस के निपल्स के आसपास की त्वचा में परतें सी निकलने लगीं और कुछ द्रव्य सा दिखने लगा तो वह घबराई. धीरेधीरे निपल्स कुछ अंदर की तरफ धंसने लगे और शुरुआत में जो एक गांठ दाएं स्तन में प्रकट हुई थी, वैसी ही गांठें अब दोनों बगलों में भी उभर आई थीं. अब झटका लगने की बारी इंद्र की थी, वह अपने हाथ लगी ट्रौफी को किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहता था. जब वह सुगंधा को फैमिली डाक्टर के पास ले कर पहुंचा तो डाक्टर ने जनरल चैकअप करने के बाद तत्काल ही मैमोग्राम कराने की सलाह दी. मैमोग्राम रिपोर्ट में स्तन कैंसर के संकेत पाए जाने पर जरूरी ब्लडटैस्ट कराए गए. स्तन से टिश्यूज ले कर टैस्ट के लिए पैथोलौजी भेजे गए. सुगंधा की सभी रिपोर्ट्स के रिजल्ट को देखते हुए अब फैमिली डाक्टर ने उसे स्तन कैंसर विशेषज्ञ औंकोलौजिस्ट के पास जाने की सलाह दी.

‘‘आप ने इन्हें यहां लाने में काफी देर कर दी है. अब तक तो कैंसरस सैल ब्रैस्ट के बाहर भी बड़े क्षेत्र में फैल चुके हैं और अब इस बीमारी को किसी भी तकनीकी सर्जरी द्वारा कंट्रोल नहीं किया जा सकता. मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है, सर, इन का कैंसर अब उस स्टेज पर पहुंच चुका है जहां कोई भी इलाज असर नहीं करता,’’ औंकोलौजिस्ट ने सारी रिपोर्ट्स का सूक्ष्म निरीक्षण और सुगंधा का पूरी तरह से चैकअप करने के बाद इंद्र से कहा. उस रात घर वापस आ कर इंद्र और सुगंधा दोनों ही न सो सके. इंद्र की नींद क्यों उड़ी हुई थी, यह तो अस्पष्ट था मगर सुगंधा एक अजब से सुकून में जागी हुई थी. उस के दिलोदिमाग में बारबार गुलजार की मशहूर गजल का शेर घूम रहा था, ‘‘दफन कर दो हमें कि सांस मिले, नब्ज कुछ देर से थमी सी है.’’ सुगंधा के लिए तो नब्ज पिछले 26 वर्षों से थमी सी थी.

उस रात सुगंधा ने निश्चय किया कि उस का तनमन उस का तनमन है, किसी नामर्द, फरेबी की मिल्कीयत नहीं. उसे खुद के सम्मान का पूरापूरा अधिकार है. जीतेजी तो वह अपना मान न रख पाई और इंद्र उस की भावनाओं से अधिकारपूर्व खेलता रहा. वह सोचता रहा उस के साथ सात फेरे ले कर सुगंधा उस की मिल्कीयत बन गई थी. मगर भूल गया था कि वह सात फेरे गृहस्थ जीवन की नींव होते हैं और वह नींव मजबूत होती है तनमन से एकदूसरे को पूर्ण समर्पित हो कर, एक दूजे का बन कर, खुशियों का आशियाना बनाने से. झूठ के जाल बिछा कर किसी के पंख काट पर उसे पिंजरे में रखने से नहीं.

सुगंधा उम्रभर चुप्पी साधे रही. जीतेजी वह इंद्र से बगावत करने का साहस नहीं कर पाई थी, मगर मौत में ही सही, वह अपना मान जरूर करेगी. वह बदला लेगी और इंद्र को दुनिया के सामने बेनकाब कर के ऐसी जिल्लत देगी जो हिंदुस्तान की किसी भी पत्नी ने अपने पति को न दी हो. ऐसी जिल्लत, जिस के बोझ से दब कर वह अपनी बाकी की जिंदगी कराहते हुए जीने को विवश हो जाएगा. वह अपने एक वार से इंद्र के अनगिनत सितम का हिसाब बराबर करेगी. वह जानती थी कि अब उस के पास ज्यादा सांसें नहीं बची हैं, इसलिए दूसरे ही दिन उस ने शहर के जानेमाने वकील सुधांशु राय को फोन लगाया, मिलने का वक्त निश्चित करने के लिए ताकि वह अपना वसीयतनामा तैयार करवा सके. वैसे भी, अभी तो उस का इंद्र को सिल्वर जुबली गिफ्ट देना भी तो बाकी था.

यह वसीयतनामा जायदाद के लिए नहीं था, बल्कि उस के अंतिम संस्कार का था. दुनिया को बताने के लिए कि उस की शादी अमान्य थी, इंद्र तो शादी के योग्य ही नहीं था. उम्रभर वह नारीत्व के लिए तरसी थी. मातृत्व की हूक कलेजे में दबाती रही थी. वह कोई हृदयरोगी नहीं थी. एक बच्चे को जन्म देने के लिए वह पूरी तरह स्वस्थ थी. रोग तो इंद्र को था नपुंसकता का. ऐसा रोग जिस से वह विवाहपूर्व पूरी तरह परिचित था. फिर भी उसे एक पत्नी चाहिए थी, घर में ट्रौफी की तरह सजाने और दुनिया से अपनी नामर्दगी छिपाने के लिए. वह अपनी वसीयत में इंद्र को अपने अंतिम संस्कार से बेदखल कर गई थी और खुद को एक विधवा की हैसियत से सुपुर्देखाक करने की जिम्मेदारी अपने बेटे समान इकलौते भतीजे को सौंप गई थी.

सुगंधा दुनिया से जा चुकी थी अतृप्त ख्वाहिशों के साथ. उस ने उम्रभर अपनी कामनाओं का गला घोंटा, अपनी इच्छाओं की जमीन को बंजर रख कर, इंद्र के कोरे अहं के पौधे को सींचा था. 26 वर्षों तक दुनियादारी के बोझ से दबी सुगंधा मौत में इंद्र को जबरदस्त तमाचा मार कर गई थी. झूठे बंधन से मुक्त हो कर वह शांति से चिरनिद्रा में सो गई थी और छोड़ गई थी इंद्र को बेनकाब कर के.

अब बाकी बची उम्र सिसकियों में काटने की बारी इंद्र की थी. वह जब भी दीवार पर लटकी सुगंधा की तसवीर को देखता तो सिहर उठता. तसवीर में उस की आंखों को देख कर उसे ऐसा प्रतीत होता मानों वे आंखें उस से पूछ रही हों, ‘एक बार मुझे मेरा दोष तो बताओ, क्या किया था मैं ने ऐसा, जिस की सजा तुम मुझे जिंदगीभर देते रहे. पूरी हो कर भी मैं ने मातृत्व का सुख न जाना. तुम अपना अधूरापन जानते थे, फिर भी तुम ने मेरी जैसी स्त्री से विवाह किया. अपराध तुम्हारा था, तुम से विवाह कर के आहें मैं भरती रही. दिल मेरा जलता रहा.’ इंद्र की रातें अब बिस्तर में करवटें बदलते हुए कटती थीं. उसे याद आतीं हर सुबह सुगंधा की रोई हुई उनींदी आंखें. काश, उस ने वक्त रहते सुगंधा का दर्द, उस की तड़प महसूस की होती तो उस की बेचैनी का आज यह आलम न होता और सुगंधा उसे ऐसा सिल्वर जुबली गिफ्ट दे कर दुनिया से अलविदा न होती.

शेष जीवन: भाग 1- विनोद के खत में क्या लिखा था

‘‘ननदोईजी ठीक कहते हैं कि आप नाम के वकील हैं,’’ सुमन चिढ़ कर बोली.

‘‘खोज लेतीं कोई नाम वाला वकील. 6 बेटियों को पैदा करते हुए तुम्हारे बाप ने यह नहीं सोचा कि मेरे जैसे वकील से ही शादी होगी,’’ सुमन के पति विनोद ने उसी लहजे में जवाब दिया.

‘‘सोचा होता तो 6 बेटियां पैदा ही क्यों करते?’’

‘‘तो चुप रहो. मेरी ओर देखने से पहले अपने बारे में सोचो. तुम्हारे ननदोई को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वह एक नंबर का लंपट है. सारी जिंदगी नौकरी छोड़ कर भागता रहा. एकमात्र बेटी की शादी ढंग से न कर सका. चला है हम पर उंगली उठाने. मैं तो कम से कम अपनी जातिबिरादरी में बेटी की शादी कर रहा हूं. उस से तो वह भी नहीं करते बना.’’ जब से दोनों की इकलौती बेटी रेखा की शादी सुमन के भाई राकेश ने तय कराई तब से आएदिन दोनों में तूतू मैंमैं होती. इस की वजह दहेज में दी जाने वाली रकम थी. विनोद सारी जिंदगी वकालत कर के उम्र के 65वें बरस में सिर्फ 10-12 लाख रुपए ही जुटा पाए. इस में से 10 लाख रुपए खर्च हो गए तो भविष्य के लिए क्या बचेगा? यही सोचसोच कर दोनों दुबले हुए जा रहे थे. विनोद को यह आशंका सता रही थी कि अब वे कितने दिन वकालत कर पाएंगे? 2-4 साल तक और खींचतान कर कचहरी जा सकेंगे. उस के बाद? पुत्र कोई है नहीं जो बुढ़ापे में दोनों का सहारा बने. रहीसही इकलौती संतान बेटी थी जो एक प्राइवेट संस्थान में नौकरी करती थी. कल वह भी विदा हो कर चली जाएगी तब क्या होगा? उन की देखभाल कौन करेगा? घरखर्च कैसे चलेगा?

दहेज में दिया जाने वाला एकएक पैसा विनोद पर भारी पड़ रहा था. जबजब बैंक से रुपया निकालने जाते तबतब उन्हें लगता अपने खून का एक अंश बेच कर आ रहे हैं. मन झल्लाता तो कहते, रेखा भी प्रेमविवाह कर लेती तो ठीक होता. कम से कम दहेज से तो बच जाते. जातिबिरादरी का यह हाल है कि कमाऊ लड़की भी चाहिए, दहेज भी. इन को इतनी भी तमीज नहीं कि जब लड़की कमा रही है तो दहेज कहां से बीच में आ गया? विनोद की रातों की नींद गायब थी. वे अचानक उठ कर टहलने लगते. जितना सोचते, दिल उतना ही बैठने लगता. भविष्य में क्या होगा अगर मैं बीमार पड़ गया तो? अभी तक तो वकालत कर ली. घर से रोजाना 10 किलोमीटर कचहरी जाना क्या आसान है? 65 का हो चला हूं. रेखा 28वीं में चल रही थी. जहां भी शादी की बात चलाते 10 लाख से नीचे कोई बात ही नहीं करता. 23 साल की उम्र में रेखा ने सरकारी पौलिटैक्निक संस्थान से डिप्लोमा किया था. नौकरी लगी तो सब ने सोचा कि चलो, लड़की अपने पैरों पर खड़ी है तो लड़के वाले दहेज नहीं मांगेंगे. इस के बावजूद दहेजलोभियों का लोभ कम नहीं हुआ. विनोद झुंझलाते, कोई पुत्र होता तो वे भी दहेज ले कर हिसाब पूरा कर लेते.

सुमन रोजाना कुछ न कुछ खरीदने के लिए बाजार जाती. अभी से थोड़ीथोड़ी चीजें जुटाएगी तभी तो शादी कर पाएगी. आसपास कोई इतना करीबी भी नहीं था जिसे साथ ले कर बाजार निकल जाए. ले दे कर भाभी थीं जो उस के घर से 5 किलोमीटर दूर रहती थीं. अंगूठी एक से एक थीं, मगर सब महंगी. बड़ी मुश्किल से एक अंगूठी पसंद आई. विनोद को लगा सुमन ने कुछ ज्यादा महंगी अंगूठी खरीद ली. इसी बात पर वह उलझ गया, ‘‘क्या जरूरत थी महंगी अंगूठी खरीदने की?’’ ‘‘सोने का भाव कहां जा रहा है, आप को कुछ पता है. सब से सस्ती ली है.’’ ‘‘सब ढकोसला है. क्या हमारे समय में इतना भव्य इंगेजमैंट होता था? अधिक से अधिक दोचार लोग लड़की की तरफ से, चार लोग लड़के वालों की तरफ से 5 किलो लड्डू दिए, कुछ मेवे और फलफूल. हो गई रस्म. मगर नहीं, आज सौ लोगों को खिलाओपिलाओ, उस के बाद नेग भी दो. वह भी लड़की वालों के बलबूते पर,’’ विनोद की त्यौरियां चढ़ गईं.

‘‘करना ही होगा वरना चार लोग थूकेंगे. अपनी बेटी को भी अच्छा नहीं लगेगा. वह भी दस जगह गई है. उस के भी कुछ अरमान होंगे. उस का सादासादा इंगेजमैंट होगा तो उस के दिल पर क्या गुजरेगी.’’ ‘‘क्या वह हमारे हालात से वाकिफ नहीं है?’’ ‘‘बच्चों को इस से क्या मतलब? उन की भी कुछ ख्वाहिशें होती हैं. उन्हें चाहे जैसे भी हों, पूरी करनी ही पड़ेंगी,’’ सुमन ने दोटूक कहा. वह आगे बोली, ‘‘हम ने रेखा को दिया ही क्या है. अब तक वह बेचारी अभावों में ही पलीबढ़ी. लोगों के बच्चे महंगे अंगरेजी स्कूलों में पढ़े जबकि हम ने उसे सरकारी स्कूल में पढ़ाया. न ढंग से कपड़ा दिया, न ही खाना. सिर्फ बचाते ही रहे ताकि उस की शादी अच्छे से कर सकें,’’ वह भावुक हो गई. विनोद का भी जी भर आया. एकाएक उन के सोचने की दिशा बदल गई. रेखा ही उन के घर रौनक थी. जब वह विदा हो कर चली जाएगी तब वे दोनों अकेले घर में क्या करेंगे? कैसे समय कटेगा? सोच कर उन की आंखें पनीली हो गईं. सुमन की नजरों से उन के जज्बात छिप न सके. वह बोली, ‘‘क्या आप भी वही सोच रहे हैं जो मैं?’’

अपने मन में उमड़ते भावों के ज्वार को छिपाते हुए वे बोले, ‘‘मैं समझा नहीं?’’ ‘‘बनते क्यों हैं? आप की यही आदत मुझे पसंद नहीं.’’

‘‘तुम्हें तो मैं हमेशा नापसंद रहा.’’

‘‘गलत क्या है? आप से शादी कर के मुझे कौन सा सुख मिला? आधाअधूरा आप के पिता का बनवाया यह मकान उस पर आप के पेशे की थोड़ी सी कमाई.’’

‘‘भूखों तो नहीं मरने दिया.’’

‘‘मन का भोजन न मिले तो समझो भूखे ही रहे. राशन की दुकान सभी ने छोड़ दी. कौन जाए पूरा दिन खराब करने? एक मैं ही थी जो आज तक 10 किलो गेहूं खरीदने के लिए दिनभर राशन की दुकान की लाइन में लगती रही. शर्म आती है मुझे एक वकील की बीवी कहते हुए.’’ ‘‘देखो, मेरा दिमाग मत खराब करो. बेटी की शादी कर लेने दो.’’

‘‘उस के बाद क्या कुबेर का खजाना मिलेगा?’’

‘‘मौत तो मिलेगी. कम से कम तुम्हारे उलाहने से मुक्ति तो मिलेगी,’’ विनोद का स्वर तल्ख था. तभी किसी के आने की आहट हुई. सुमन का भाई राकेश था. दोनों ने चुप्पी साध ली. सुमन को एक तरफ ले जा कर उस ने कुछ रुपए दिए. ‘‘ये 10 हजार रुपए हैं, रख लो. आगे भी जो बन पड़ेगा, देता रहूंगा. इस बार गांव में गेहूं की फसल अच्छी हुई है. आटे की चिंता मत करना.’’ सुमन की आंखें भर आईं. जैसे ही वह गया, सुमन फिर विनोद से उलझ पड़ी, ‘‘एक आप के परिवार के लोग हैं. मदद तो दूर झांकने भी नहीं आते.’’

‘‘झांकने लायक तुम ने किसी को छोड़ा है?’’

‘‘तुम्हीं लायक बन जाते उन के लिए.’’ ‘‘लायक होता तो तुम्हारी लताड़ सुनता. आजकल सब रुपयों के भूखे हैं. न मेरे पास रुपए थे, न ही परिवार वालों ने हमें तवज्जुह दी.’’

‘‘अब समझ में आया.’’

‘‘समझ तो मैं पहले ही गया था. तभी तो अपने बेटे की बीमारी में बड़ी बहन रुपए मांगती रही, मगर मैं ने फूटी कौड़ी भी नहीं दी. जबकि खेत बेचने के बाद उस समय मेरे पास रकम थी.’’ ‘‘अच्छा किया, दे देते तो आज भीख मांगते नजर आते.’’ इंगेजमैंट में सुमन ने सिर्फ अपने भाईबहनों को न बुला कर यही संदेश दिया कि उस की कूवत नहीं है बहुत ज्यादा लोगों को खिलानेपिलाने की. इस में दोराय नहीं, ऐसा ही था. मगर थोड़े से रपए बचा कर बिलावजह रिश्तेदारों को नाराज करना कहां की समझदारी थी. सुमन के पास अपनी सास के चढ़ाए कुछ गहने थे, जो उस ने सहेज कर रखे थे. शादीब्याह में भी पहन कर नहीं जाती थी कि कहीं गिर गए तो? विनोद की इतनी कमाई नहीं थी कि वे उसे एक तगड़ी भी खरीद कर दे सकें. ताउम्र उस की साध ही रह गई कि पति की कमाई से एक तगड़ी और चूड़ी अपनी पसंद की खरीदें, यह कसक आज भी ज्यों की त्यों थी. सुमन संदूक खोल कर उन गहनों को देख रही थी. विनोद भी पास थे. ‘‘काफी वजनी गहने हैं मेरी मां के,’’ विनोद की आंखें चमक उठीं. ‘‘मां के ही न,’’ सुमन के चेहरे पर व्यंग्य की रेखा तिर गई.

सिल्वर जुबली गिफ्ट: भाग 2- क्यों गीली लकड़ी की तरह सुलगती रही सुगंधा

केक काटने की रस्म हो चुकी थी, अब बारी थी स्पीच देने की. सुगंधा ने तो उस शाम के लिए कुछ नहीं लिखा था क्योंकि सचाई पब्लिक में सुनाने लायक नहीं थी और झूठ को शब्दों का रुपहला जामा पहनाने की हिम्मत अब शिथिल होने लगी थी. मगर इंद्र ने पिछले कई महीनों से परिश्रम कर के, चिंतनमनन करकर के शब्दों का मखमली जाल बुना था और नातेरिश्तेदारों का दिल छू लेने वाली स्पीच तैयार की थी.

उस ने बड़े आत्मविश्वास के साथ स्पीच देना शुरू किया, ‘‘सुगंधा इज माई बैटरहाफ. मैं सुगंधा के बिना अपने वजूद की कल्पना भी नहीं कर सकता. सुगंधा मेरी वाइफ ही नहीं, मेरी लाइफ हैं. सुगंधा ही हैं जिन्होंने मेरे विचारों को पंख दिए हैं. सुगंधा वे हैं जो हर अच्छेबुरे वक्त में परछाईं की तरह मेरे साथ खड़ी रह कर मेरी ताकत बनी रही हैं. सुगंधा अपने नाम को पूर्ण सार्थक करते हुए मेरे जीवन के उपवन को महका कर खुशगवार बनाती रही हैं.

‘‘जब शादी की रात सुगंधा ने डरतेडरते मुझे बताया कि उन को दिल में छेद की बीमारी है और बच्चे को जन्म देना उन के लिए खतरनाक हो सकता है तो मैं ने उन से वादा किया था कि वे जैसी हैं, मुझे स्वीकार हैं. इतना ही नहीं, उस दिन के बाद मैं ने अपने कलेजे पर पत्थर रख लिया और सुगंधा के सामने संतान की चाहत या संतान न होने का मलाल भूल कर भी नहीं जताया. मैं ने वादा किया था और जगजाहिर है कि उसे निभा कर भी दिखा दिया.

मैं ने सुगंधा को उन की हर कमी के साथ अपनाया, और अपना तनमन सबकुछ उन पर वार दिया. अब आज के इस पावन अवसर पर मेरे पास इस से ज्यादा कुछ नहीं है जो कि मैं उन्हें सिल्वर जुबली गिफ्ट के रूप में दे सकूं.’’ इंद्र ने स्पीच खत्म करते हुए सुगंधा को अपनी बांहों में भर के एक जोरदार चुंबन दे दिया, जैसे कि सिल्वर जुबली की मुहर लगा रहा हो. रिसैप्शन हौल में चीयर्स की आवाजें और तालियों की गड़गड़ाहट गूंजने लगी. सुगंधा की पलकों की कोरों से 2 आंसू उस के गालों पर लुढ़क गए, जिन्हें इंद्र ने बड़े ही प्यार से पोंछ कर उपस्थितजनों के दिमाग में खुशी के आंसुओं का खिताब दे दिया.

इस से पहले कि कोई सुगंधा की आंखों में झांक कर सचाई के दीदार कर पाता और उस के गुलाब जैसे सुंदर चेहरे पर छाती म्लानता की एक झलक भी ले पाता, इंद्र उसे अपनी आगोश में समेट कर डिनरहौल की तरफ ले गया और अपने हाथों से किसी नवविवाहित की तरह मनुहार करते हुए उसे खाना खिलाने लगा.

जिस शादी में सुगंधा की सांसें घुट रही थीं, जिंदगी ढोना मुश्किल रहा था, उस की शानदार यादगार सिल्वर जुबली मनाई जा रही थी. उस के दिल में घृणा का दरिया बह रहा था. उस की हंसी खोखली थी, मुसकराहट में दर्द की लकीरें उभर आती थीं. कोई नहीं जानता था कि सुगंधा अपनी ‘ब्यूटी विद ब्रेन’ इमेज के भीतर कितनी खोखली और कमजोर है.

इंद्र ने शादी की पहली रात को ही अपनी कमी का परदाफाश होने पर सुगंधा से स्पष्ट लहजे में कहा था, ‘किस को क्या बताओगी मेरी जान, यह हिंदुस्तान है. यहां एक बार लड़की की शादी करने में तो बाप के जूते घिस जाते हैं, फिर कोई भला तुम्हारा मुझ से तलाक करा कर क्या करेगा. माई लव, न तो तुम घर की रहोगी न घाट की. बेहतर होगा कि तुम मेरे साथ चुपचाप जिंदगी बसर कर लो. तुम क्या सोचती हो कि तुम मेरी कमजोरी का डंका दुनिया में बजाओगी और मैं चुपचाप इसे बरदाश्त कर लूंगा. अगर तुम ने यह जुर्रत की तो फिर मैं भी तुम्हारे चरित्र पर लांछन लगा कर तुम्हें सब की नजरों में गिरा दूंगा और तुम्हें कहीं का न छोड़ूंगा. अच्छे से अच्छा वकील करने की ताकत है मुझ में और उधर तुम्हारे पिताजी, वे तो तुम्हारी शादी की दावत भी ठीक से न कर पाए. फिर भला राजा भोज को गंगू तेली कैसे टक्कर दे सकता है…इसलिए माई लव, मेरी यह बेशुमार दौलत एंजौय करो और खुश रहो.

आखिर तुम शहर के जानेमाने बिजनैसमैन की पत्नी तो बनी रहोगी.’ सुगंधा की हालत उस पंछी की तरह थी जो चोट खा कर उड़ने को फड़फड़ा रहा हो. उड़ने का हर प्रयास विफल हो कर उस के दर्द में इजाफा कर रहा था, उस के आत्मविश्वास को ध्वस्त कर के उसे और कमजोर बना रहा था. शादी होते ही उस के कुंआरे सपनों की कलियां मुकम्मल फूल बनने के पहले ही मुरझा गई थीं.

सारे रिश्तेदार सिल्वर जुबली पार्टी के दूसरे ही दिन विदा हो चुके थे. आजकल किस को फुरसत होती है किसी के सुखदुख में लंबे समय तक शरीक होने की. जाते वक्त भी कइयों के चेहरे ईर्ष्या की स्याही से पुते हुए थे. रिश्तेदारी की विवाहयोग्य युवतियों के आंखों में सुगंधा जैसी शाही जिंदगी की तमन्ना का प्रतिबिंब झिलमिला रहा था. कोई नहीं सोचना चाहता कि कभीकभी ऊपर से ठीक दिखने वाला व्यक्ति अंदर से घुटघुट कर मर रहा होता है. खुशियों का पैमाना कीमती कपड़े, महंगा पर्यटन, लक्जरी कार नहीं होती. खुशी होती है मन की शांति से, संतृप्त खुशहाल जिंदगी से, मन की सुखी, चटकती धरती पर किसी के प्यार की फुहार से मिली ठंडक से, घर में गूंजती किलकारियों से.

क्या पाया है उस ने इंद्र से? नहीं पूरा कर पाया वह उस के कुंआरे सपनों को, नहीं पूर्ण कर पाया वह उस के नारीत्व को, ऐसे नाम के पति के साथ एक बच्चे का सपना संजोना तो रेगिस्तान में दूब उगाने की सोचने जैसा था.

अपनी खामी को ढांपने के लिए शादी के शुरुआती दिनों में ही उस ने रिश्तेदारों और दोस्तों में ऐलान कर दिया कि सुगंधा को हृदयरोग है और प्रैग्नैंसी उस के लिए घातक हो सकती है. संबंधों का एकतरफा निर्वाह सुगंधा ने किया था और दुनिया में उस को हृदयरोगी बता कर त्याग की मूर्ति स्वयं इंद्र बन बैठा था. यह कैसी विडंबना थी, यह कैसा न्याय था समय का, जहां गुनाहगार किसी की जिंदगी तबाह कर के इज्जतदार बना हुआ था. इंद्र के गुनाह की शिकार सुगंधा विवाहित हो कर भी उम्रभर अतृप्ति के एहसास में गीली लकड़ी की तरह सुलगती रही थी.

शादी की जाती है खुशियों के लिए, खुशियों की तिलांजलि देने के लिए नहीं. सुगंधा करवाचौथ का व्रत करती आई थी दुनियादारी की मजबूरी में बिना किसी भाव, बिना किसी श्रद्धा के. उम्र बीती थी ठंडी आहें भरने में. ऐसे संबंधों में सोच ही कुचली जाती है, समर्पण नहीं होता. अब तक सिल्वर जुबली पार्टी को भी करीबकरीब 6 महीने पूरे हो चुके थे. सुगंधा के लिए खुद को संभालना मुश्किल होता जा रहा था. मन के साथ अब तन भी टूटने लगा था. चलने में कदम डगमगाने लगे थे, हाथों के कंपन से मन की कमजोरी छिपाए न छिपती थी. उस शानदार सिल्वर जुबली की शहर में चर्चा पर अब धूल जमने लगी थी. सब के लिए जिंदगी कमज्यादा बदल रही थी, मगर सुगंधा का जीवन उसी ढर्रे पर चल रहा था, सदा की तरह तनहा दिन, लंबीकाली उदास रातें.

संतुलित सहृदया: भाग 3- एक दिन जब समीरा से मिलने आई मधुलिका

जाने से पहले मयंक ने कहा कि वह कल शाम को फोन करेगा, लेकिन उस का फोन 10 दिन बाद आया, ‘‘माफ करना, मैं जाने से पहले तुम्हें फोन नहीं कर सका. बौस ने राजस्थान में लोकेशन हंटिग का प्रोग्राम बना लिया और हम लोग अगली सुबह ही निकल गए,’’ मयंक ने बताया, ‘‘वहीं से घर चला गया, प्रियंक भैया की सगाई थी. फिर मुंबई से अपना सामान भी ले आया. अब अपने फ्लैट में हूं. शाम को आऊंगा तुम्हारे घर.’’

‘‘यह किस खुशी में?’’ समीरा ने पूछा. ‘‘प्रियंक भैया की सगाई और अपनी लाइन क्लीयर होने की खुशी में.’’

उस के बाद अकसर दोनों की मुलाकातें होने लगीं. फोन पर भी लंबीलंबी बातें होतीं, लेकिन शालीनता की परिधि में. कुछ महीने बाद मयंक भाई के विवाह के लिए गया तो समीरा को 1 सप्ताह काटना असहाय हो गया. वह भी आगरा चली गई. मयंक की याद या सुनील भैया का ठंडा व्यवहार और मां की अनमयंस्कता के कारण उसे घर में अच्छा नहीं लग रहा था. ‘‘भैया के लिए कोई लड़की नहीं देख रहीं मां?’’ ‘‘देखूं तो तब जब सुनील शादी के लिए तैयार हो.’’

‘‘मैं करवाती हूं भैया को तैयार,’’ और फिर समीरा ने सुनील से बात करी. ‘‘मेरी बजाय तू अपनी शादी रचवा समीरा, फिर मैं अपनी शादी की सोचूंगा,’’ सुनील ने सपाट स्वर में कहा.

समीरा ने कहना तो चाहा कि सच भैया पर कह न पाई. ‘अब जब मयंक की लाइन भी क्लीयर हो गई है तो मैं ही अपना ब्याह रचा लेती हूं,’ समीरा सोचने लगी. मयंक के लौटने के बाद उस ने उसे बताया कि भैया उस की शादी के बाद ही शादी करेंगे. अत: अब घर वाले उस की शादी जल्दी करना चाहते हैं.

‘‘किस से?’’ ‘‘तुम चाहो तो तुम से भी हो सकती है.’’

‘‘तो करवाओ जल्दी से. मैं ने भाभी को तुम्हारे बारे में बता दिया है. उन का कहना है कि लड़की के यहां से प्रस्ताव भिजवाओ. सगाई, शादी मैं आननफानन में करवा दूंगी. भाभी बहुत ही समझदार, स्नेहमयी और सुलझी हुई हैं और मेरे खयाल में तुम भी वैसी ही हो. खूब पटेगी तुम दोनों में. लेकिन यह बात मैं स्वयं घर वालों को नहीं बता सकता. तुम्हारे घर से प्रस्ताव आने के बाद तो कह सकता हूं कि काम के सिलसिले में तुम से मिलता रहता हूं. तुम हमारे परिवार के लिए उपयुक्त हो,’’ मयंक बोला.

‘‘मैं भी स्वयं घर वालों से तुम्हारे घर प्रस्ताव भेजने को नहीं कह सकती, मगर फोन पर तुम्हारी बात सुनील भैया से करवा सकती हूं.’’

‘‘हां, करवा देना,’’ मयंक बोला. उस के बाद सब बहुत तेजी से हुआ. मोबाइल पर संपर्क, ईमेल से फोटो और विवरण और फिर मयंक के पिता जनक का फोन आया, ‘‘लड़कीलड़के की मुलाकात की जरूरत न सही, लेकिन मयंक की मां और भाभी का लड़की से मिलना तो जरूरी है. खासकर मयंक की भाभी का. देवरानीजेठानी में तालमेल होना आवश्यक है कृपाशंकरजी ताकि हमारे बाद हमारे बच्चे हिलमिल कर रहें.’’

‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं. आगरा या दिल्ली में आप का स्वागत है और अगर आप को आने में कोई परेशानी है, तो मैं सपरिवार पुणे आ जाता हूं.’’ ‘‘इतनी परेशानी उठाने की जरूरत नहीं है. मयंक की मां और भाभी दिल्ली जा रही हैं मयंक के पास. आप भी अपनी पत्नी को वहां भेज दीजिए. समीरा से मिलने के बाद अगर मेरी बड़ी बहू उसे पसंद कर लेगी तो मैं भी आ जाऊंगा और आप भी आ जाना.’’

कृपाशंकर ने यह बात समीरा को बताई. ‘‘मयंक की बेसब्री देख कर तो लग रहा था कि यह मिलनामिलाना महज एक औपचारिकता है. रिश्ता तो पक्का है, लेकिन उस के पिताश्री के अनुसार उन की बड़ी बहू की सहमति ही सर्वोच्च होगी. असलियत क्या है?’’

‘‘मयंक अपनी भाभी को मेरे बारे में बता चुका है और उन्होंने चट मंगनी पट शादी करवाने का आश्वासन दिया है,’’ समीरा ने शरमाते हुए कहा. ‘‘लेकिन किसी कारण अगर भाभी ने तुझे पसंद न किया तो मयंक क्या करेगा?’’

‘‘यह तो मयंक से पूछना पड़ेगा पापा.’’ ‘‘पूछने की क्या जरूरत है समीरा?’’ सुनील पहली बार बोला, ‘‘तू भी मधुलिका वाली हिम्मत दिखाना. भाभी के असहमत होने पर अपना प्यार ठुकराने वाले युवक से तू स्वयं ही रिश्ता तोड़ लेना,’’ सुनील तुरंत बोला.

समीरा चौंक पड़ी कि भैया अभी तक मधुलिका को भूले नहीं हैं. ‘‘सुनील ठीक कह रहा है. भाभी के आज्ञाकारी देवर से तो तेरी निभने से रही तो बेहतर रहेगा रिश्ता जुड़ने से पहले ही तोड़ ले,’’ मां ने कहा.

समीरा को उन का नकारात्मक रवैया अच्छा तो नहीं लगा लेकिन चुप ही रही. मां उस के साथ दिल्ली आ गई. शाम को मयंक मां और भाभी के साथ आने वाला था, इसलिए समीरा औफिस से जल्दी आ गई. मां मेहमानों के लिए नाश्ता लाने ड्राइवर के साथ बाजार चली गईं. तभी दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजे पर मधुलिका को देख कर समीरा चौंक पड़ी. वेशभूषा से लग रहा था कि उस की शादी हो चुकी है. ‘‘अचानक आने के लिए माफी चाहती हूं समीरा, लेकिन तुम से अकेले में मिलना जरूरी था. मैं मयंक की भाभी हूं.’’

‘‘अच्छा… आइए बैठिए,’’ समीरा समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे. ‘‘तुम ने रोके की रस्म रविवार को इसलिए नहीं होने दी थी कि उस रोज तुम्हें दिल्ली में मयंक से मिलना था?’’ मधुलिका ने बगैर किसी भूमिका के पूछा.

‘‘जी… हां मगर आप को कैसे मालूम?’’ समीरा हकलाई. ‘‘अटकल से,’’ मधुलिका हंसी, ‘‘मयंक ने विस्तार से तुम से पहली और अगली मुलाकात का समय व तारीख बताई थी. फिर जब तुम्हारी तसवीर देखी तो 2 और 2 जोड़ कर 44 बनाना मुश्किल नहीं था. ऐनी वे, ऐवरी थिंक इज फेयर इन लव ऐंड वार वैसे भी मुझे तो इस से फायदा ही हुआ है. पुणे तो खैर आगरा से बेहतर जगह है ही और प्रियंक की कंपनी भी बड़ी है, जिस में मेरी प्रतिभा और क्षमता का पूर्णतया विकास हो सकेगा. सुनील को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती, इसलिए प्रियंक से उस की तुलना नहीं करूंगी, लेकिन प्रियंक और उस के परिवार के साथ मैं बेहद खुश हूं और इस का श्रेय तुम्हारे और मयंक के प्यार को देती हूं. मेरे दिल में तुम्हारे लिए कोई कड़वाहट नहीं है.’’

‘‘लेकिन मेरे भैया के दिल में तो मेरे लिए है,’’ समीरा ने रोंआसे स्वर में कहा और फिर सब बता दिया. ‘‘जैसी पत्नी तुम्हारे भैया चाहते हैं, वैसी ही एक सहेली है मेरी. तुम्हारी शादी में दोनों की मुलाकात करवा दूंगी…’’

‘‘लेकिन मेरी शादी होने देंगी आप मयंक से?’’ समीरा ने हैरानी से पूछा, ‘‘सब पर अपनी मरजी थोपने वाली लड़की को आप अपनी देवरानी बनाएंगी?’’

‘‘जरूर बनाऊंगी समीरा, क्योंकि मुझे मालूम है कि उस ने मनमरजी क्यों की थी और फिर मयंक भी यह विश्वास होने पर ही कि लड़की स्वर्था उस के परिवार के उपयुक्त है उस से शादी कर रहा है,’’ मधुलिका ने गंभीर स्वर में कहा, ‘‘जीवन में खुश रहना है समीरा तो बगैर किसी पूर्वाग्रह या कड़वी यादों के जीना सीखो. भूल जाओ तुम कभी मुझ से मिली थीं. तुम्हारी मम्मी कहां हैं उन से भी एक विनती करनी है.’’

‘‘मैं भला तुम्हारे लिए क्या कर सकती हूं?’’ मां का स्वर सुन कर दोनों चौंक पड़ीं. ‘‘तुम्हें आता देख मैं बाजार गई ही नहीं. दरवाजे के बाहर खड़ी तुम्हारी बातें सुन रही थी.’’

‘‘तो फिर तो आप समझ ही गई होंगी कि आप भी मुझ से अजनबी बन कर मिलेंगी और आप के परिवार के अन्य सदस्य भी… अपने मायके वालों को भी मैं आगरा वाली बात भूलने को कह दूंगी.’’ ‘‘ठीक है बिटिया. दुख तो रहेगा कि तुम मेरी बहू न बन सकीं, मगर यह तसल्ली भी रहेगी कि मेरी बेटी को ससुराल में तुम्हारे जैसी सहृदया जेठानी मिल रही है,’’ मां ने विह्वल स्वर में कहा.

‘‘सहृदया ही नहीं, सुलझी हुई और संतुलित भी हैं मम्मी,’’ समीरा धीरे से बोली.

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