Drama Story: बदलती दिशा- गृहस्थी के लिए जया आधुनिक दुनिया में ढल पाई?

Drama Story: जया ने घड़ी देखी और ब्रश पकड़े हाथों की गति बढ़ा दी. आज उठने में देर हो गई है. असल में पिं्रस की छुट्टी है तो उस ने अलार्म नहीं लगाया था. यही कारण है कि 7 बजे तक वह सोती रह गई. प्रिंस तो अभी भी सो रहा है.

कल रात जया सो नहीं पाई थी, भोर में सोई तो उठने का समय गड़बड़ा गया. वैसे आज प्रिंस को तैयार करने का झमेला नहीं है. बस, उसे ही दफ्तर के लिए तैयार होना है.

अम्मां ने चलते समय उसे टिफिन पकड़ाया और बोलीं, ‘‘परांठा आमलेट है, बीबी. याद से खा लेना. लौटा कर मत लाना. सुबह नाश्ता नहीं किया…चाय भी आधी छोड़ दी.’’

अम्मां कितना ध्यान रखती हैं, यह सोच कर जया की आंखों में आंसू झिलमिला उठे. यह कहावत कितनी सही है कि अपनों से पराए भले. अपने तो पलट कर भी नहीं देखते लेकिन 700 रुपए और रोटीकपड़े पर काम करने वाली इस अम्मां का कितना ध्यान है उस के प्रति. आज जया उसे हटा दे तो वह चली जाएगी, यह वह भी जानती है फिर भी कितना स्नेह…कैसी ममता है.

ढलती उमर में यह औरत पराए घर काम कर के जी रही है. भोर में आ कर शाम को जाती है फिर भी जया के प्रति उस के मन में कितना लगावजुड़ाव है. और पति रमन…उस के साथ तो जन्मजन्मांतर के लिए वह बंधी है. तब भी कभी नहीं पूछता कि कैसी हो. इतना स्वार्थी है रमन कि किसी से कोई मतलब नहीं. बस, घर में सबकुछ उस के मन जैसा होना चाहिए. उस के सुखआराम की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए. वह अपने को घर का मालिक समझता है जबकि तनख्वाह जया उस से डबल पाती है और घर चलाती है.

अच्छे संस्कारों में पलीबढ़ी जया मांदादी के आदर्शों पर चलती है…उच्च पद पर नौकरी करते हुए भी उग्र- आधुनिकता नहीं है उस के अंदर. पति, घर, बच्चा उस के प्राण हैं और उन के प्रति वह समर्पित है. उसे बेटे प्रिंस से, पति रमन से और अपने हाथों सजाई अपनी गृहस्थी से बहुत प्यार है.

बचपन से ही जया भावुक, कोमल और संवेदनशील स्वभाव की है. पति उस को ऐसा मिला है, जो बस, अपना ही स्वार्थ देखता है, पत्नी बच्चे के प्रति कोई प्यारममता उस में नहीं है.  जया तो उस के लिए विलास की एक वस्तु मात्र है.

जया घर से निकली तो देर हो गई थी. यह इत्तेफाक ही था कि घर से निकलते ही उसे आटो मिल गया और वह ठीक समय पर दफ्तर पहुंच गई.

कुरसी खींच कर जया सीट पर बैठी ही थी कि चपरासी ने आकर कहा, ‘‘मैडम, बौस ने आप को बुलाया है.’’

जया घबराई…डरतेडरते उन के कमरे में गई. वह बड़े अच्छे मूड में थे. उसे देखते ही बोले, ‘‘जया, मिठाई खिलाओ.’’

‘‘किस बात की, सर?’’ अवाक् जया पूछ बैठी.

‘‘तुम्हारी सी.आर. बहुत अच्छी गई थी…तुम को प्रमोशन मिल गया है.’’

धन्यवाद दे कर जया बाहर आई, फिर ऐसे काम में जुट गई कि सिर उठाने का भी समय नहीं मिला.

दफ्तर से छुट्टी के बाद वह घर आ कर सीधी लेट गई. प्रिंस भी आ कर उस से लिपट गया. अम्मां चाय लाईं.

‘‘टिफन खाया?’’

‘‘अरे, अम्मां…आज भी लंच करना ध्यान नहीं रहा. अम्मां, ऐसा करो, ओवन में गरम कर उसे ही दे दो.’’

‘‘रहने दो, मैं गरमगरम नमक- अजवाइन की पूरी बना देती हूं…पर बीबी, देह तुम्हारी अपनी है, बच्चे को पालना है. ऐसा करोगी तो…’’

बड़बड़ाती अम्मां रसोई में पूरी बनाने चली गईं. जया कृतज्ञ नजरों से उन को जाते हुए देखती रही. थोड़ी ही देर में अचार के साथ पूरी ले कर अम्मां आईं.

‘‘रात को क्या खाओगी?’’

‘‘अभी भर पेट खा कर रात को क्या खाऊंगी?’’

‘‘प्रिंस की खिचड़ी रखी है,’’ यह बोल कर अम्मां दो पल खड़ी रहीं फिर बोलीं, ‘‘साहब कब आएंगे?’’

‘‘काम से गए हैं, जब काम खत्म होगा तब आएंगे.’’

रात देर तक जया को नींद नहीं आई. अपने पति रमन के बारे में सोचती रही कि वह अब कुछ ज्यादा ही बाहर जाने लगे हैं. घर में जब रहते हैं तो बातबात पर झुंझला पड़ते हैं. उन के हावभाव से तो यही लगता है कि आफिस में शायद काम का दबाव है या किसी प्रकार का मनमुटाव चल रहा है. सब से बड़ी चिंता की बात यह है कि वह पिछले 4 महीने से घर में खर्च भी नहीं दे रहे हैं. पूछो तो कहते हैं कि गलती से एक वाउचर पर उन से ओवर पेमेंट हो गई थी और अब वह रिफंड हो रही है. अब इस के आगे जया क्या कहती…ऐसी गलती होती तो नहीं पर इनसान से भूल हो भी सकती है…रमन पर वह अपने से ज्यादा भरोसा करती है. थोड़ा सख्त मिजाज तो हैं पर कपटी नहीं हैं. सोचतेसोचते पता नहीं कब उसे नींद आ गई.

अगले दिन दफ्तर में उस के प्रमोशन की बात पता चलते ही सब ने उसे बधाई दी और पार्टी की मांग की.

लंच के बाद जम कर पार्टी हुई. सब ने मिल कर उसे फूलों का गुलदस्ता उपहार में दिया. जया मन में खुशी की बाढ़ ले कर घर लौटी पर घर आ कर उसे रोना आया कि ऐसे खुशी के अवसर पर रमन घर में नहीं हैं.

अम्मां के घर मेहमान आने वाले हैं इसलिए वह जल्दी घर चली गईं. ड्राइंगरूम में कार्पेट पर बैठी वह प्रिंस के साथ ब्लाक से रेलगाड़ी बना रही थी कि रमन का पुराना दोस्त रंजीत आया.

रंजीत को देखते ही जया हंस कर बोली, ‘‘आप…मैं गलत तो नहीं देख रही?’’

‘‘नहीं, तुम सही देख रही हो. मैं रंजीत ही हूं.’’

‘‘बैठिए, वीना भाभी को क्यों नहीं लाए?’’

‘‘वीना क ा अब शाम को निकलना कठिन हो गया है. दोनों बच्चों को होमवर्क कराती है…रमन आफिस से लौटा नहीं है क्या?’’

‘‘वह यहां कहां हैं. आफिस के काम से बंगलौर गए हैं.’’

रंजीत और भी गंभीर हो गया.

‘‘जया, पता नहीं कि तुम मेरी बातों पर विश्वास करोगी या नहीं पर मैं तुम को अपनी छोटी बहन मानता हूं इसलिए तुम को बता देना उचित समझता हूं…और वीना की भी यही राय है कि पत्नी को ही सब से पीछे इन सब बातों का पता चलता है.’’

जया घबराई सी बोली, ‘‘रंजीत भैया, बात क्या है?’’

‘‘रमन कहीं नहीं गया है. वह यहीं दिल्ली में है.’’

चौंकी जया. यह रंजीत कह रहा है, जो उन का सब से बड़ा शुभचिंतक और मित्र है. ऐसा मित्र, जो आज तक हर दुखसुख को साथ मिल कर बांटता आया है.

‘‘जया, तुम्हारे मन की दशा मैं समझ रहा हूं. पहले मैं ने सोचा था कि तुम को नहीं बताऊंगा पर वीना ने कहा कि तुम को पता होना चाहिए, जिस से कि तुम सावधान हो जाओ.’’

‘‘पर रंजीत भैया, यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘सुनो, कल मैं और वीना एक बीमार दोस्त को देखने गांधीनगर गए थे. वीना ने ही पहले देखा कि रमन आटो से उतरा तो उस के हाथ में मून रेस्तरां के 2 बड़ेबड़े पोलीबैग थे. उन को ले वह सामने वाली गली के अंदर चला गया. मैं बुलाने जा रहा था पर वीना ने  रोक दिया.’’

जया की सांस रुक गई. एक पल को लगा कि चारों ओर अंधेरा छा गया है फिर भी अपने को संभाल कर बोली, ‘‘कोई गलती तो…मतलब डीलडौल में रमन जैसा कोई दूसरा आदमी…’’

‘‘रमन मेरे बचपन का साथी है. उस को पहचानने में मैं कोई भूल कर ही नहीं सकता.’’

‘‘पर भैया, उन्होंने आज सुबह ही बंगलौर से फोन किया था. रोज ही करते हैं.’’

‘‘उस का मोबाइल और तुम्हारा लैंडलाइन, तुम को क्या पता कहां से बोल रहा है?’’

जया स्तब्ध रह गईर्. रमन निर्मोही है यह तो वह समझ गई थी पर धोखा भी दे सकता है ऐसा तो सपने में भी नहीं सोचा था.

रंजीत गंभीर और चिंतित था. बोला, ‘‘तुम्हारे पारिवारिक मामलों में मेरा दखल ठीक नहीं है फिर भी पूछ रहा हूं. रमन तुम को अपनी तनख्वाह ला कर देता है या नहीं?’’

‘‘तनख्वाह तो कभी नहीं दी…हां, घरखर्च देते थे पर 4 महीने से एक पैसा नहीं दिया है. कह रहे थे कि गलती से ओवर पेमेंट हो गई, सो वह रिफंड हो रही है. उस में आधी तनख्वाह कट जाती है.’’

‘‘जया, तुम पढ़ीलिखी हो, समझदार हो, अच्छे पद पर नौकरी कर रही हो, घर के बाहर का संसार देख रही हो फिर भी रमन ने तुम्हें मूर्ख बनाया और तुम बन गईं. यह कैसा अंधा विश्वास है तुम्हारा पति पर. सुनो, अपना भला और बच्चे का भविष्य ठीक रखना चाहती हो तो रमन पर लगाम कसो. अपने पैसे संभालो.’’

जया की नींद उड़ गई. चिंता से सिर बोझिल हो गया. वह खिड़की के सहारे बिछी आरामकुरसी पर चुपचाप बैठी रमन के बारे में मां की नसीहतों को याद करने लगी.

संपन्न मातापिता की बड़ी लाड़ली बेटी जया, रमन के लिए उन को भी त्याग आई थी.

रमन का हावभाव और उस के बात करने का ढंग कुछ इस तरह का रूखा था जो किसी संस्कारी व्यक्ति को पसंद नहीं आता था. इस के लिए जया, रमन को दोषी नहीं मानती थी क्योंकि उसे संस्कारवान बनाने वाला कोई था ही नहीं. जिस  समय रमन का उस के परिवार में आनाजाना था तब वह मामूली नौकरी करता था और जया ने लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर के अधिकारी के पद पर काम शुरू किया था. लेकिन तब जया, रमन के प्रेम में एकदम पागल हो गई थी.

मां ने समझाया भी था कि इतने अच्छेअच्छे घरों से रिश्ते आ रहे हैं और तू ने किसे पसंद किया. यह अच्छा लड़का नहीं है, इस के चेहरे से चालाकी और दिखावा टपकता है. तू क्यों नहीं समझ पा रही है कि यह तुझ से प्यार नहीं करता बल्कि तेरे पैसे से प्यार करता है.

जया तो रमन के कामदेव जैसे रूप पर मर मिटी थी, सो एक दिन घर में बिना बताए उस ने चुपचाप रमन के साथ कोर्ट मैरिज कर ली और दोनों पतिपत्नी बन गए. तब से मांबाप से उस का कोई संबंध ही नहीं रहा. अब इस शहर में उस का ऐसा कोई नहीं है जिस के सामने वह रो कर जी हलका कर सके. कोई विपदा आई तो कौन सहारा देगा उसे?

मां के कहे शब्द और रमन  के आचरण की तुलना करने लगी तो पाया कि जब से विवाह हुआ है तब से ले कर अब तक कभी रमन ने उस की इच्छाओं को मान्यता नहीं दी. कभी उसे खुश करने का प्रयास नहीं किया और वह इन सब बातों को नजरअंदाज करती रही, सोचती रही कि रमन का पारिवारिक जीवन कुछ नहीं था इसलिए यह सब सीख नहीं पाया.

शादी के बाद 2 बार घूमने गई थी पर दोनों बार रमन ने अपनी ही इच्छा पूरी की. पहली बार जया ‘गोआ’ जाना चाहती थी और रमन उसे ले कर ‘जयपुर’ चला गया. दूसरी बार वह ‘शिमला’ जाना चाहती थी तो जिद कर रमन उसे ‘केरल’ के कोच्चि शहर ले गया था.

प्रिंस के होने के बाद तो उस ने घूमने जाने का नाम ही नहीं लिया. मजे की बात यह कि दोनों यात्रा का पूरा पैसा रमन ने उस से कैश ले लिया. आश्चर्य यह कि रमन के ऐसे व्यवहार से भी जया के मन में उस के प्रति कोई विरूप भाव नहीं जागा.

अभी तक रमन पर जया को इतना विश्वास था कि पति पास रहे या दूर उस का सुरक्षा कवच था, ढाल था पर अब विश्वास टुकड़ेटुकड़े हो कर बिखर गया…कहीं भी कुछ नहीं बचा. अब अपनी और बच्चे की रक्षा उस को ही करनी होगी.

रमन लौटा, एकदम टे्रन के निश्चित समय पर. जया ने उसे गौर से देखा तो उस के चेहरे पर कहीं भी सफर की थकान के चिह्न नहीं थे.

‘‘जया, जल्दी से नाश्ता लगवा दो. आफिस के लिए निकलना है.’’

अम्मां ने परांठासब्जी प्लेट में रख खाना लगा दिया. खाना खातेखाते रमन बोला, ‘‘200 रुपए मेरे पर्स में रख दो, स्कूटर में तेल डलवाना है. मेरा पर्स खाली है.’’

पहले कहते ही निहाल हो कर जया पैसे रख देती थी पर इस बार अभी से समेटना शुरू हो गया.

‘‘मेरे पास पैसे नहीं हैं. मेरी तनख्वाह एक हफ्ते बाद मिलेगी.’’

‘‘तो क्या मैं बस में जाऊं या पैदल?’’

‘‘वह समस्या तुम्हारी है मेरी नहीं.’’

रमन अवाक् सा उस का मुंह देखने लगा. जया  नहाने चली गई. नहा कर बाहर आई तो रमन तैयार हो रहा था.

‘‘सुनो, मुझे कुछ कहना है.’’

‘‘हां, कहो…सुन रहा हूं.’’

‘‘घर का पूरा खर्च मैं चला रही हूं… तुम देना तो दूर उलटे लेते हो. अगले महीने से ऐसा नहीं होगा. तुम को घरखर्च देना पड़ेगा.’’

‘‘पर मेरा रिफंड…’’

‘‘वह तो जीवन भर चलता रहेगा. ओवर पेमेंट का इतना सारा पैसा गया कहां? देखो, जैसे भी हो, घर का खर्च तुम को देना पड़ेगा.’’

‘‘कहां से दूंगा? मेरे भी 10 खर्चे हैं.’’

‘‘घर चलाने की जिम्मेदारी तुम्हारी है मेरी नहीं.’’

रमन खीसें निकाल कर बोला, ‘‘डार्लिंग, नौकरी वाली लड़की से शादी घर चलाने के लिए ही की थी, समझीं.’’

जया को लगा उस के सामने एक धूर्त इनसान बैठा है.

‘‘और सुनो, रात को खाने में कीमा और परांठा बनवाना.’’

‘‘डेढ़ सौ रुपए गिन कर रख जाओ कीमा और घी के लिए, तब बनेगा.’’

‘‘रहने दो, मैं सब्जीरोटी खा लूंगा.’’

उस दिन जया दफ्तर में बैठी काम कर रही थी कि उस के ताऊ की बेटी दया का फोन आया. घबराई सी थी. दया से उसे बहुत लगाव है. उस के साथ जया जबतब फोन पर बात करती रहती है.

‘‘जया, मैं तेरे पास आ रही हूं.’’

‘‘बात क्या है? कुशल तो है न?’’

‘‘मैं आ कर बताऊंगी.’’

आधा घंटा भी नहीं लगा कि दया चली आई. वास्तव मेें ही वह परेशान और घबराई हुई थी.

‘‘पहले बैठ, पानी पी…फिर बता हुआ क्या?’’

‘‘मेरी छोटी ननद का रिश्ता पक्का हो गया है, पर महज 50 हजार के लिए बात अटक गई. लड़का बहुत अच्छा है पर 50 हजार का जुगाड़ 2 दिन में नहीं हो पाया तो रिश्ता हाथ से निकल जाएगा. सब जगह देख लिया…अब बस, तेरा ही भरोसा है.’’

‘‘परेशान मत हो. मेरे पास 80 हजार रुपए पड़े हैं. तू चल मेरे साथ, मैं पैसे दे देती हूं.’’

दया को साथ ले कर जया घर आई. अलमारी का लौकर खोला तो वह एकदम खाली पड़ा था. जया को चक्कर आ गए. दया उस का चेहरा देख चौंकी और समझ गई कि कुछ गड़बड़ है. बोली, ‘‘क्या हुआ, जया?’’

‘‘40 हजार के विकासपत्र थे. पिछले महीने मेच्योर हो कर 80 हजार हो गए थे. सोच रही थी कि उठा कर उन्हें डबल कर दूंगी पर…’’

तभी अम्मां पानी ले कर आईं और बोलीं, ‘‘बीबीजी, एक दिन दोपहर में आ कर साहब अलमारी से कुछ कागज निकाल कर ले गए थे.’’

‘‘कब?’’

‘‘पिछली बार दौरे पर जाने से पहले.’’

जया सिर थाम कर बिस्तर पर बैठ गई. दया ने ढाढ़स बंधाया.

‘‘जाने दे, जया, तू परेशान न हो. कहीं न कहीं से पैसे का जुगाड़ हो ही जाएगा.’’

‘‘एक बार डाकघर चल तो मेरे साथ.’’

दोनों डाकघर आईं और बड़े बाबू से बात की तो उन्होंने कहा, ‘‘आप के पति 10-12 दिन पहले कैश करा कर रकम ले गए थे. आप को पता नहीं क्या?’’

दोनों चुपचाप डाकघर से निकल आईं. घर आ कर रो पड़ी जया.

‘‘धैर्य रख, जया,’’ दया बोली, ‘‘अब तू भी सावधान हो जा. जो गया सो गया पर अब और नुकसान न होने पाए. इस का ध्यान रख.’’

थोड़ी देर बाद वह फिर बोली, ‘‘जया, एक बात बता…तेरा प्यार अंधा है या तू रमन से डरती है.’’

‘‘अब तक मैं प्यार में अंधी ही थी पर अब मेरी आंख खुल गई है.’’

‘‘ऐसा है तो थोड़ा साहस बटोर. तू तो जो है सो है, प्रिंस के भविष्य को अंधेरे में मत डुबा दे. उसे एक स्वस्थ जीवन दे. अकेले उसे पालने की सामर्थ्य है तुझ में.

‘‘जया, मैं तुझे एक बात बताना चाहती थी, पर तुझे मानसिक कष्ट होगा यह सोच कर आज तक नहीं बोली थी. मेरी भानजी नैना को तो तू जानती है. पिछले माह उस की शादी हुई तो वह पति के साथ हनीमून पर शिमला गई थी. वहां रमन एक युवती को ले कर जिस होटल में ठहरा था उसी में नैना भी रुकी हुई थी.  नैना जब तक शिमला में रही रमन की नजरों से बचती रही पर लौट कर उस ने मुझे यह बात बताई थी.’’

अब सबकुछ साफ हो गया था. जया ने गहरी सांस ली.

‘‘हां, तू ठीक कह रही है…बदलाव से डर कर चुप बैठी रही तो मेरे साथ मेरे बच्चे का भी सर्वनाश होगा, मम्मी भी पिछले रविवार को आ कर यही कह रही थीं. कुछ करूंगी.’’

2 दिन बाद रमन लौटा. प्रिंस को बुखार था इसलिए जया उसे गोद में ले कर बैठी थी. रमन ने उस का हाल भी नहीं पूछा, आदत के मुताबिक आते ही बोला, ‘‘अम्मां से कहो, बढि़या पत्ती की एक कप चाय बना दें.’’

‘‘पहले बाजार जा कर तुम दूध का पैकेट ले आओ तब चाय बनेगी.’’

रमन हैरान हो जया का मुंह देखने लगा.

‘‘मैं… मैं दूध लेने जाऊं?’’

‘‘क्यों नहीं? सभी लाते हैं.’’

जया ने इतनी रुखाई से कभी बात नहीं की थी. रमन कुछ समझ नहीं पा रहा था.

‘‘अम्मां को भेज दो.’’

‘‘अम्मां के पास और भी काम हैं.’’

‘‘ठीक है, मैं ही लाता हूं, पैसे दे दो.’’

‘‘अपने पैसों से लाओ और घर का भी कुछ सामान लाना है…लिस्ट दे रही हूं, लेते आना.’’

‘‘रहने दो, चाय नहीं पीनी.’’

रमन बैठ गया. प्रिंस सो गया तो जया अखबार ले कर पढ़ने लगी. रमन तैयार होते हुए बोला, ‘‘100 रुपए दे देना, पर्स एकदम खाली है.’’

‘‘मैं एक पैसा भी तुम्हें नहीं दे सकती, 100 रुपए तो बड़ी बात है… और तुम बैठो, मुझे तुम से कुछ कहना है.’’

रमन बैठ गया.

‘‘विकासपत्र के 80 हजार रुपए निकालते समय मुझ से पूछने की जरूरत नहीं समझी?’’

‘‘पूछना क्या? जरूरत थी, ले लिए.’’

‘‘अपनी जरूरत के लिए तुम खुद पैसों का इंतजाम करते, मेरे रुपए क्यों लिए और वह भी बिना पूछे?’’

‘‘तुम्हारे कहां से हो गए…शादी में दहेज था. दहेज में जो आता है उस पर लड़की का कोई अधिकार नहीं होता.’’

‘‘कौन सा कानून पढ़ कर आए हो? उस में दहेज लेना अपराध नहीं होता है क्या? आज 5 महीने से पूरा घर मैं चला रही हूं, तुम्हारा पैसा कहां जाता है?’’

‘‘मैं कितने दिन खाता हूं तुम्हारा, दौरे पर ही तो रहता हूं.’’

‘‘कहां का दौरा? शिमला का या गांधीनगर का?’’

तिलमिला उठा रमन, ‘‘मैं कहीं भी जाता हूं…तुम जासूसी करोगी मेरी?’’

‘‘मुझे कुछ करने की जरूरत नहीं. इतने दिन मूर्ख बनाते रहे…अब मेरी एक सीधी बात सुन लो. यह मेरा घर है…मेरे नाम से है…मैं किस्त भर रही हूं…तुम्हारे जैसे लंपट की मेरे घर में कोई जगह नहीं. मुझे पिं्रस को इनसान बनाना है, तुम्हारे जैसा लंपट नहीं. इसलिए चाहती हूं कि तुम्हारी छाया भी मेरे बच्चे पर न पडे़. तुम आज ही अपना ठिकाना खोज कर यहां से दफा हो जाओ.’’

‘‘मुझे घर से निकाल रही हो?’’

‘‘तुम्हें 420 के अपराध में पुलिस के हाथों भी दे सकती थी पर नहीं. वैसे हिसाब थोड़ा उलटा पड़ गया है न.  आज तक तो औरतों को ही धक्के मारमार कर घर से निकाला जाता था…यहां पत्नी पति को निकाल रही है.’’

रमन बुझ सा गया, फिर कुछ सोच कर बोला, ‘‘मैं तुम्हारी शर्तों पर समझौता करने को तैयार हूं.’’

‘‘मुझे कोई समझौता नहीं चाहिए. तुम जैसे धूर्त व मक्कार पति की छाया से भी मैं अपने को दूर रखना चाहती हूं.’’

‘‘तुम घर तोड़ रही हो.’’

‘‘यह घर नहीं शोषण की सूली थी जिस पर मैं तिलतिल कर के मरने के लिए टंगी थी पर अब मुझे जीवन चाहिए, अपने बच्चे के लिए जीना है मुझे.’’

बात बढ़ाए बिना रमन ने अपने कपड़े समेटे और चला गया.

जया ने मां को फोन किया :

‘‘मम्मी, आप की सीता ने निरपराधी हो कर भी बिना विरोध किए अग्निपरीक्षा दी थी और मैं एक छलांग में आग का दरिया पार कर आई. रमन को घर से भगा दिया.’’

‘‘सच, कह रही है तू?’’

‘‘एकदम सच, मम्मी. मां के सामने जब बच्चे के भविष्य का सवाल आ कर खड़ा होता है तो वह संसार की हर कठिनाई से टक्कर लेने के लिए खड़ी हो जाती है.’’

‘‘तू मेरे पास चली आ. यहां ऊपर का हिस्सा खाली पड़ा है.’’

‘‘नहीं, मम्मी, अपने घर में रह कर ही मेरा प्रिंस बड़ा होगा. अम्मां अब मेरे साथ ही रहेंगी, घर नहीं जाएंगी.’’

‘‘जैसी तेरी इच्छा, बेटी,’’ कह कर जया की मां ने फोन रख दिया.

Drama Story

Hindi Kahani: यह वादा रहा- ऐसा क्या हुआ जो आशा की नजरें शर्म से झुक गईं?

Hindi Kahani: ‘‘निक्की डार्लिंग, गुड मौर्निंग,’’ नर्स ने निक्की के वार्ड में प्रवेश करते हुए कहा.

‘‘गुड मौर्निंग सिस्टर,’’ निक्की ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अब कैसा महसूस कर रही हो?’’

‘‘पहले से बेहतर हूं, पर बहुत कमजोरी लग रही है,’’ निक्की ने करवट लेते हुए कहा.

इतनी कम उम्र में निक्की के साथ कुछ ऐसा हुआ कि उस का शरीर कमजोर हो गया है.

‘‘थोड़ी देर में डाक्टर साहब आएंगे तो बता देना. अभी आराम करो,’’ कह नर्स चली गई.

निक्की सोचने में पड़ गई, ‘अपनी इस हालत की जिम्मेदार मैं खुद हूं या मेरी मां? शायद हम दोनों. समझ में नहीं आता है कि किसे अपना समझूं, अपने रिश्तेदार को या बाहर वालों को? अकसर रिश्तों की आड़ में ही लड़कियां ज्यादा शोषित होती हैं. काश, मां ने मेरी बात सुन ली होती… मेरी भी गलती है. जब वह बारबार मुझे छूने की कोशिश करता था तभी मुझे सतर्क हो जाना चाहिए था. तब आज यह दिन न देखना पड़ता हमें. पापा डिप्रैशन में हैं, मां का रोरो कर बुरा हाल हो गया है और मैं यहां अस्पताल में पड़ी हूं.’

निक्की को उस दिन की बातें याद आने लगीं जब आशा (निक्की की मां) तरहतरह के पकवान बना कर टेबल पर रख रही थीं और गुनगुना भी रही थीं.

निक्की ने स्कूल से आते ही पूछा, ‘‘मां, क्या बना रही हो? बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है. कोई मेहमान आने वाला है क्या?’’

‘‘मोहित आ रहा है… उसे कितने दिनों बाद देखूंगी. अब तो बड़ा हो गया होगा. मैं ने उसे अपनी गोद में बहुत खिलाया है,’’ आशा बहुत खुश थीं कि उन की बड़ी बहन का बेटा आ रहा है.

‘‘क्यों आ रहे हैं?’’ निक्की ने पूछा.

‘‘मोहित को डाक्टर बनना है… यहीं कोटा में दाखिला हुआ है उस का. अब उस की सगी मौसी यहां रहती है, तो वह होस्टल में क्यों रहेगा? वैसे दीदी ने मुझ से कहा है कि तुम परेशान मत हो. वह होस्टल में रह लेगा, पर मैं ही नहीं मानी. ठीक किया न?’’ अपने पति संजय की तरफ देखते हुए आशा बोलीं.

‘‘निक्की, मोहित तुम से सिर्फ 3 साल बड़ा है. मेरी शादी में वह 1 साल का था. मैं ने ही उस का नाम मोहित रखा था. बड़ा ही प्यारा बच्चा है.’’

मोहित कोटा आ कर सब से घुलनेमिलने की कोशिश करने लगा. संजय को

कुछ ठीक नहीं लग रहा था कि एक जवान लड़का उस के घर आ कर रह रहा है. अपनी जवान होती बेटी की चिंता हो रही थी उन्हें पर आशा को कौन समझाए, यह सोच कर उन्हें चुप रहना ही बेहतर लगा.

संजय की चुप्पी को भांप कर आशा ने कहा, ‘‘आप चिंता न करो. हम ने अपनी बच्ची को अच्छे संस्कार दिए हैं.’’

आशा चाहती थीं कि निक्की मोहित से घुलमिल जाए, पर उसे मोहित जरा भी अच्छा नहीं लगता था.

एक दिन आशा ने निक्की से कहा, ‘‘निक्की तू मोहित के साथ ही स्कूल चली जाया करना.’’

आशा चाहती थीं कि अगर दोनों बच्चे आपस में हंसेबोलें नहीं तो मोहित बोर हो जाएगा.

संजय को कुछ दिनों के लिए औफिस के काम से बाहर जाना पड़ा, तो मजबूरी में निक्की को मोहित के साथ स्कूल जाना पड़ता था.

मोहित उसे स्कूल छोड़ कर वहीं से कालेज चला जाता था. इस तरह धीरेधीरे दोनों में दोस्ती हो गई. अब निक्की को भी अपने मोहित भैया के साथ बातें करना, कहीं घूमने जाना अच्छा लगने लगा. पहले निक्की चुपचुप रहती थी पर अब खुश रहने लगी थी. यह देख कर आशा भी खुश थीं.

निक्की अब स्कूल से आते ही मोहित के कमरे में चली जाती और मोबाइल में गेम खेलती, फिल्में देखती. ये बातें संजय को ठीक नहीं लग रही थीं.

‘‘निक्की अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो. हमेशा मोबाइल पर लगी रहती हो,’’ एक दिन संजय ने निक्की को डांटते हुए कहा तो मोहित बोल पड़ा, ‘‘मौसाजी, मोबाइल में हम पढ़ भी सकते हैं.’’

‘‘तेरे मौसाजी को क्या पता कि महंगे मोबाइल के क्याक्या फायदे हैं,’’ आशा मजाक के लहजे में बोलीं.

बात हंसीमजाक में खत्म हो गई, पर मोहित का नजरिया निक्की के लिए सही प्रतीत  नहीं हो रहा था. मोहित की कुछ हरकतें धीरेधीरे निक्की को परेशान करने लगीं.

वह कोई भी बात निक्की को छूछू कर कहता. कभी किसी बात पर हंसी आ जाए तो निक्की पर गिर ही जाता. फिर सौरी बोल देता.

निक्की सोचती कि अब बोल दूंगी भैया से कि इस तरह न किया करो. अच्छा नहीं लगता. पर अगले ही पल मोहित कुछ ऐसा करता कि  निक्की को लगता वह कुछ ज्यादा ही सोच रही है.

मोहित हर वक्त निक्की के इर्दगिर्द ही मंडराता रहता, लेकिन आशा इसे भाईबहनों का प्यार समझती रहीं.

‘‘निक्की, चल तुझे मोबाइल पर कार्टून दिखाता हूं,’’ एक दिन मोहित ने कहा.

‘‘कार्टून? वह भी मोबाइल में?’’ चहकते हुए निक्की ने कहा.

‘‘हां, मोबाइल में, मौसामौसी आओ आप भी देखो न,’’ मोहित सब के सामने अपने को अच्छा दिखाने की कोशिश करता रहता.

संजय को भी अब मोहित अच्छा लगने लगा था. कभीकभी संजय भी उन दोनों के साथ मोबाइल के गेम में शामिल हो जाते थे.

‘‘पापा, मुझे भी एक ऐसा मोबाइल ला दो,’’ एक दिन निक्की ने पापा से कहा.

‘‘मेरा ले ले, मैं दूसरा खरीद लूंगा,’’ मोहित ने अपना मोबाइल निक्की को देते हुए कहा.

‘‘निक्की, अभी 2 महीने बाद ही तुम्हारी परीक्षा शुरू होने वाली है न? उस के बाद दिला दूंगा,’’ संजय बेटी को समझाते हुए बोले तो वह मान गई.

अब जब भी दोनों पढ़ाई से बोर हो जाते तो मोबाइल में गेम खेलने लगते. दोनों का साथ हंसना या बातें करना अब संजय को भी अच्छा लगने लगा था.

आशा और संजय को एक रात किसी दूर के रिश्तेदार के घर शादी में जाना था. निक्की को भी ले जाना चाहते थे पर वह जाना नहीं चाहती थी.

‘‘निक्की, हम जा रहे हैं. दरवाजा ठीक से लगा लेना. हमें आने में थोड़ी देर हो जाएगी… तुम दोनों खाना खा लेना,’’ आशा जाते हुए निक्की को समझा गईं.

निक्की, मोहित को खाने को बुलाने गई तो वह हड़बड़ा गया. जब निक्की ने पूछा कि मोबाइल में क्या देख रहे थे? तो वह टालते हुए बोला कि कुछ नहीं… वह मेरे दोस्त ने एक वीडियो भेजा है. उसे देख रहा था.

थोड़ी देर रुक कर मोहित बोला, ‘‘हम खाना बाद में खाएंगे पहले तुम भी  यह वीडियो देखो. बहुत मजा आएगा,’’ कह कर उस ने मोबाइल औन कर दिया.

‘‘छि: भैया, यह तो बहुत गंदा वीडियो है… मुझे नहीं देखना,’’ कह कर निक्की जाने लगी.

‘‘अरे निक्की रुको तो… अच्छा मत देखो. कुछ और देखते हैं,’’ पर थोड़ी देर में मोहित ने फिर वही वीडियो शुरू कर दिया.

निक्की मना करती रही पर मोहित नहीं माना और अब तो वह निक्की के साथ गलत व्यवहार करने लगा.

‘‘भैया, यह क्या कर रहे हो? छोड़ो मुझे,’’ निक्की कहते रही पर मोहित कहां मानने वाला था. उस ने अपनी बहन के साथ ही कुकर्म कर डाला, भाईबहन के रिश्ते को तारतार कर डाला.

निक्की के मातापिता घर देर से आए. निक्की को सोता देख वे दोनों भी सो गए.

आशा सुबह जब निक्की के लिए कौफी ले कर गईं तो निक्की मां के गले लग कर रोने लगी.

‘‘क्या हुआ बेटा?’’ आशा ने आश्चर्य से पूछा.

निक्की कुछ कहती उस से पहले ही मोहित वहां आ गया, ‘‘कुछ नहीं मौसी रात को भूत वाला वीडियो देख कर डर गई…’’

‘‘तुम ने ऐसा वीडियो दिखाया ही क्यों जो यह डर गई?’’ संजय ने थोड़ा गुस्से में कहा.

निक्की जब भी अकेली होती तो मोहित उस के साथ संबंध बनाने की कोशिश करता.

‘‘मैं मां को सब बता दूंगी कि आप मेरे साथ क्या करते हो,’’ निक्की ने कहा तो मोहित उसे एक और वीडियो दिखाते हुए बोला, ‘‘अब बताओगी कुछ मौसीमौसा को? बोलो निक्की?’’

निक्की बहुत डरी हुई थी कि अब क्या करेगी वह… कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे, किस से कहे. मोहित उसे उन दोनों के अंतरंग संबंध का वीडियो जो दिखा चुका था और यह भी कह गया कि अगर तुम ने किसी को भी हमारे संबंधों के बारे में बताने की कोशिश की तो यह वीडियो सार्वजनिक कर दूंगा.

अब यह सोच कर ही निक्की की रूह कांप जाती कि उस के मातापिता की क्या

इज्जत रह जाएगी और वह कहां जा कर अपना मुंह छिपाएगी.

निक्की अपनी मां आशा को अपने हावभाव से बारबार समझाने की कोशिश करती रही, पर मां की आंखों पर तो प्यार का परदा पड़ा था.

एक दिन फोन आया कि आशा के पिताजी की तबीयत बहुत खराब है पर निक्की नहीं चाहती थी कि उस की मां उसे यहां छोड़ कर जाएं.

‘‘मां, मुझे भी ले चलो. मैं यहां आप के बिना नहीं रह सकूंगी,’’ निक्की जिद करने लगी.

‘‘निक्की तुम कैसे जा सकती हो… कुछ दिनों बाद तुम्हारी परीक्षा शुरू होने वाली है… वैसे भी तुम कितनी बार मेरे बिना रह चुकी हो तो अब क्यों जिद कर रही हो?’’ आशा थोड़ा गुस्से में बोलीं.

आशा के चले जाने के बाद तो मोहित और भी ज्यादा बदतमीजी पर उतर आया. निक्की अपने पापा से भी कुछ कह नहीं पा रही थी. पूरे 1 हफ्ते बाद जब आशा आईं तो मां को देखते ही निक्की रो पड़ी.

‘‘निक्की, क्या हुआ बेटा? कितनी कमजोर हो गई हो… मैं हफ्ते भर के लिए चली क्या गई खानापीना ही छोड़ दिया… संजय, आप मेरी बेटी का ध्यान नहीं रखते थे क्या?’’ आशा चिंतित होते हुए बोलीं.

‘‘मुझे क्या पता होता था कि ये दोनों कब जाते और कब आते थे… मैं तो खाना बना कर औफिस चला जाता था.’’

निक्की करीब 2 महीने से ये सब झेल रही थी. अपने में ही  घुट रही थी. 1 महीने से ज्यादा हो गया था मासिकधर्म आए, यह बात भी उसे सताए जा रही थी, पर यह बात अपने मांपापा को कैसे बताती… पढ़ाई भी ठीक से नहीं हो पा रही थी.

एक दिन अचानक निक्की बेहोश हो कर गिर पड़ी. निक्की की आंखें खुलीं तो अपने सामने मां को रोते देखा.

‘‘मां,’’ निक्की के मुंह से निकला.

अपनी बेटी की आवाज सुन कर आशा की जान में जान आई.

‘‘मुझे क्या हुआ था मां?’’

‘‘कुछ नहीं बेटा… अब सब ठीक है.’’

डाक्टर की आवाज से निक्की अतीत में आई. डाक्टर के पूछने पर निक्की ने कहा कि उसे बहुत कमजोरी हो रही है.

‘‘गर्भपात के कारण बहुत ज्यादा खून बह गया है… शुक्र है जान बच गई,’’ निक्की ने डाक्टर को अपने मातापिता से यह कहते सुना.

‘‘आप की कृपा है डाक्टर साहब,’’ उस के मातापिता हाथ जोड़े खड़े थे.

डाक्टर कह रहे थे, ‘‘मैं सब समझता हूं, पर आप लोगों को पुलिस थाने में

एफआईआर लिखा देनी चाहिए. खैर, जो आप को ठीक लगे. कल आप इसे घर ले जा सकते हैं. दवा टाइम पर देते रहना. कोई परेशानी हो तो फिर दिखा जाना.’’

घर आते ही निक्की की आंखों के सामने वही सब कुछ घूमने लगा.

‘‘अगर वह लड़का यहां से भाग नहीं गया होता तो मैं उस का खून कर देता… ये सब तुम्हारे अंधविश्वास का नतीजा है, जो आज मेरी बेटी को भुगतना पड़ा… मुझे तो उस का हमारे घर आ कर रहना ही पसंद नहीं था, पर तुम मेरा बेटा, मेरा बेटा रटती रहती थीं,’’ गुस्से में तमतमाते हुए संजय ने अपनी पत्नी आशा से कहा.

‘‘हांहां, ये सब मेरी करनी का ही फल है… मेरी बेटी मुझे बारबार इशारा करती रही और मैं पागल उसी पापी को बेटा समझती रही… अपनी निक्की का बड़ा भाई समझती रही. अगर दीदी उस दिन फोन पर गिड़गिड़ाती नहीं तो मैं उसे उम्र भर की सजा करवाती… यह सोच कर भी चुप रही कि मेरी बेटी की जिंदगी बरबाद हो जाएगी. लेकिन अब प्रण करती हूं कि किसी पर भी भरोसा नहीं करूंगी. संजय और निक्की आप दोनों मुझे माफ कर दीजिए… अब किसी पर भी जल्दी विश्वास नहीं करूंगी, अपनी बेटी की सुरक्षा और उस के मानसम्मान पर किसी की भी बुरी नजर नहीं पड़ने दूंगी. यह वादा है आप दोनों से.’’

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Suspense Story: राज को राज रहने दो

Suspense Story: आज का युग घोटाले, फिक्सिंग, ठगी, बाबागीरी और भ्रष्टाचार की ओर तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है. ऊपर से जब से मेरे दिलोदिमाग में क्रिकेट में होने वाले स्पौट फिक्ंिसग का मामला घुसा है, मुझे तो बारबार गांधीजी का यह कथन याद आए बिना चैन ही नहीं मिल रहा, ‘‘हमारी धरती प्रत्येक मनुष्य की जरूरतों को पूरा कर सकती है, लेकिन प्रत्येक मनुष्य के लालच को कभी पूरा नहीं कर सकती.’’

इशारों से खेलों में होने वाला भ्रष्टाचार अब सभी के सामने खुल कर आ चुका है. खेलों में तरहतरह के डोपिंग, स्कैंडल और मैच फिक्ंिसग की खबरें आएदिन आती रहती हैं. यहां पर यह कहना भी उचित होगा कि जब लोगों के पास ज्यादा रुपया आता है तो उन के अंदर इस को और अधिक पाने की ललक अनायास ही पैदा हो जाती है. कुछ ही लोग होते हैं जो खुद को संयमित रख पाते हैं. तेज बुखार को पैरासिटामौल यानी बुखार नियंत्रक दवा खा कर नियंत्रित किया जा सकता है मगर किसी व्यक्ति के दिमाग में यदि रुपया कमाने का फुतूर चढ़ जाए तो वह अकसर कारागार की सलाखों के पीछे जा कर ही नियंत्रित होता हुआ देखा गया है.

कहते हैं कि अति तो किसी भी चीज की हो, बुरी ही होती है. फिर भी लोग मानते नहीं. नएनए तरीके निकाल ही लेते हैं घोटाले, फिक्ंसिंग और भ्रष्टाचार करने के. चलना भी नियति का नियम है, सो, हमारे क्रिकेट खिलाड़ी भी चल दिए फिक्ंसिंग जैसी राह पर और खेल के मध्य ही इशारेबाजी कर बैठे. वैसे देखा जाए तो क्रिकेट के इतिहास में इशारों का संबंध  बहुत पुराना रहा है, क्योंकि क्रिकेट के अंपायर इस कला में माहिर होते थे. उन के एक इशारे पर पूरी की पूरी टीम आउट घोषित कर दी जाती थी यानी पूरी टीम की हारजीत व नोबौल का निर्णय हो जाता था.

लेकिन आजकल अंपायर का काम इलैक्ट्रौनिक कैमरों ने भलीभांति संभाल लिया है, इसलिए इस से बच कर अब कुछ नया करने और पाने की चाह में हमारे क्रिकेट खिलाड़ी खुद ही इशारों की कला में पारंगत होना चाहते हैं और लोगों की आंखों में धूल झोंक कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं. वैसे, इशारा कर के सामने वाले को प्रभावित करना व उचित मार्गदर्शन देना किसी ऐरेगैरे नत्थूखैरे के वश की बात भी नहीं है. जरूरत से ज्यादा समझदार लोग ही इस कला में पारंगत हो पाते हैं.

आजकल ‘आसमान से गिरे खजूर पर अटके’ वाला दौर नहीं है. अब तो है परछाईं देख आसमान में पहुंच जाने का युग. यदि इस धरती पर कहीं रुपयों के वृक्ष का बीज होता तो उसे भी बड़ी मेहनत से ही लगाया जाता. उसे लगाने, अंकुरित हो कर वृक्ष बनने तथा उस में रुपया लद कर आने में समय लगता. परिणामस्वरूप उस की भी जबरदस्त सुरक्षा करनी पड़ती. वहां भी कोई चमत्कार नहीं हो जाता कि इशारा किया और रुपयों का वृक्ष लद गया ढेर सारे रुपयों से. मगर जब आजकल खेलखेल में खेलों के अंदर इशारों से ही धनवर्षा हो रही हो तो इस से बेहतर और आसान बात कोई हो ही नहीं सकती. भला ऐसे में कौन ‘इशारा’ करने से वंचित रहना चाहेगा. जो पीछे रह जाएगा वह आखिर में पश्चात्ताप ही करेगा और सोचेगा कि यदि किसी ने मेरे इशारे भी समझ लिए होते या मुझे भी एक इशारा करने का मौका दिया जाता तो मैं भी मालामाल हो जाता, लेकिन छप्परफाड़ कर धनवर्षा सभी के यहां नहीं होती है, इसलिए मन मार कर संतुष्ट होना ही पड़ता है.

आजकल क्रिकेट में भी लोगों ने जाना कि खिलाडि़यों के एक इशारे पर अब रनवर्षा की जगह धनवर्षा भी होती है. इसलिए अब मेरी रायनुसार ‘इंडियन प्रीमियर लीग’ का नाम बदल कर ‘स्पौट फिक्ंिसग मनी गारंटी क्रिकेट मैच’ यानी एसएफएमजीसीएम रख दिया जाना चाहिए. इस प्रकार के मनी गारंटी क्रिकेट खेल के लिए दिशाओं में बैटबौल घुमाने से ज्यादा, खिलाडि़यों को इशारा करने और इशारे पहचानने की ट्रेनिंग दिए जाने की जरूरत पड़ेगी यानी जम कर धन पाने की तैयारी के लिए उन्हें नएनए इशारों द्वारा हार कर भी शानदार से शानदार कहे जाने वाले नतीजे सामने लाने में योग्य होना पड़ेगा.

माना कि लालच बुरी बला होती है मगर धनवर्षा के समय तो सभी भूल जाते हैं कि ज्यादा धनवर्षा की लूटखसोट में सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने का डर भी बना रहता है. फिर भी इस एसएफएमजीसीएम खेल में यही कहा जाएगा, ‘इशारों को अगर समझो तो राज को राज रहने दो…’ और इस से अधिक कुछ नहीं.

कभीकभी इशारे भी खतरनाक सिद्ध होते हैं. इस बात को हम अपने जीवन में भुगत चुके हैं. यहां आपबीती के तौर पर आप को बता रहे हैं. दरअसल, अपनी जवानी में अपने घर के सामने वाली बिल्ंिडग में रहने वाली रंजना को अपना दिल दे बैठे थे और हम ने उसे समझा रखा था कि जब भी घर में तुम्हारे मम्मीपापा न हों तो अपनी बालकनी में लाल रंग का रूमाल टांग दिया करना तो उसे देख कर मैं समझ जाया करूंगा कि तुम्हारे मम्मीपापा घर पर नहीं हैं. बस, तुम ही घर पर अकेली हो. और मैं तुम से मिलने तुम्हारे घर बेधड़क आ जाया करूंगा.

कई बार ऐसा हुआ. लेकिन एक बार मुझे उस की बालकनी में एक लाल रंग के रूमाल की जगह तौलिया टंगा दिखा तो भी रंजना के प्यार में अंधे हो चुके मेरे दीवाने दिल को वह लाल रूमाल ही लगा और प्यार में दीवाना हो कर मैं ने जैसे ही उस के घर की घंटी बजाई, दरवाजा खुलते ही मुझे सामने उस के पिताजी दिखाई दिए और मुझे देख कर वे तेज आवाज में बोले, ‘‘कमबख्त, कई दिनों से देख रहा हूं कि तुम अपने घर से मेरे घर की बालकनी में ही टकटकी लगाए हुए देखते रहते हो और अब तुम्हारी यह हिम्मत कि मेरे घर पर ही आ धमके. अभी लो, पुलिस को बुला कर तुम्हारा हुलिया ठीक करवा देता हूं.’’

उन का तेजतर्रार चेहरा व बातें सुन कर मैं एकदम उन के पैरों में गिर पड़ा और बोला, ‘‘अंकलजी, गलती हो गई. अब कभी ऐसा नहीं करूंगा. मुझे माफ कर दें.’’ मेरे माफी मांगने और गिड़गिड़ाने के संपूर्ण कार्यक्रम को रंजना भी अपने पिताजी के पीछे खड़ी हो कर देख रही थी. परिणामस्वरूप उस ने मेरे डरपोक किस्म के मूल स्वभाव को अच्छी तरह से पहचान लिया. इसलिए फिर उस ने कभी भी लाल रूमाल अपनी बालकनी में नहीं टांगा और मैं ने भी कभी अपनी बदनामी व पिटाई के डर से उस के घर के अंदर दौड़ कर जाने व अपने प्यार की पेंगें बढ़ाने की हिम्मत फिर कभी नहीं जुटा पाई.

कुल मिला कर प्रेम हो, खेल हो या कोई और क्षेत्र, इशारे तो सभी क्षेत्र की जान होते हैं. कोई इन इशारों से सफल होता है, तो कोई असफल. किसी को यश मिलता है, तो किसी को अपयश. फिर भी इशारों का अस्तित्व होता है और सदा रहेगा.

जिन लोगों को लगता है कि इशारों का गणित समझना जरूरी है और वे भविष्य में इशारों की कला में पारंगत होना चाहते हैं, उन्हें इशारों का गणित समझाने वाले गुरु की तलाश करनी चाहिए ताकि अगली बार कलाईबैंड घुमाने, बालकनी में लाल रूमाल टांगने या तौलिया लटकाने या फिर खेल के मैदान में अपनी कमीज उतार कर बारबार लहराने जैसे इशारों पर किसी थानेदार की सख्त व बुरी नजर न पड़ सके.

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Hindi Long Story: मार्मिक बदला

Hindi Long Story: अखिलभारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के वार्षिक सम्मेलन में कई विषयों पर संगोष्ठियां हो रही थीं. एक शाम ऐसी ही एक संगोष्ठी के समाप्त होने पर कुछ डाक्टर उसी विषय पर बात करते हुए परिसर में बने अतिथिगृह में अपनेअपने कमरे की ओर जा रहे थे.

‘‘डा. रंजन ने ठीक कहा है कि सब बीमारियों की जड़ मिलावट और कुपोषण है,’’ एक डाक्टर कह रहा था, ‘‘जिस के चलते आधुनिक चिकित्सा कोई चमत्कार नहीं दिखा सकती.’’

‘‘सही कह रहे हैं डा. सतीश. ये दोनों चीजें जीवन का विनाश कर सकती हैं. मिलावटखोरों को मानवता का दुश्मन घोषित कर देना चाहिए.’’

‘‘मिलावटखोर ही नहीं आतंकवादी भी मानवता के दुश्मन हैं डा. चंद्रा. कितने ही खुशहाल घरों को पलभर में उजाड़ कर रख देते हैं, लेकिन आज तक उन पर ही कोई रोक नहीं लग सकी तो मिलावटखोरों पर कहां लगेगी? आज रोज कुपोषण की रोकथाम के लिए अनेक छोटेबड़े क्लब पांच सितारा होटलों में मिलते हैं  झुग्गी झोंपडि़यों में रहने वाले बच्चों को कितना दूध दिया जाए इस पर विचारविमर्श करने को…’’

‘‘आप ठीक कहते हैं डा. कबीर हम सिर्फ विचारविमर्श और बातें ही कर सकते हैं. इस से पहले की हम बातों में उल झ जाएं और डाइनिंगरूम में बैठने की जगह भी न मिले, चलिए अपनेअपने कमरे में जाने से पहले खाना खा लें,’’ डा. चंद्रा ने कहा.

सब लोग डाइनिंगरूम में चले गए. खाना खा कर जब सब बाहर निकले तो डा. चंद्रा ने कहा, ‘‘मैं तो फैमिली के लिए शौपिंग करने जा रहा हूं, आप लोग चलेंगे?’’

‘‘अभी से कमरे में बैठ कर भी क्या करेंगे, चलिए शौपिंग ही करते हैं. आप भी चलिए न डा. रौनक,’’ डा. कबीर ने बेमन से खड़े व्यक्ति की ओर देख कर कहा.

‘‘धन्यवाद डा. कबीर, लेकिन मु झे किसी चीज की जरूरत नहीं है.’’

‘‘हम अपनी जरूरत के लिए नहीं फैमिली के लिए शौपिंग करने जा रहे हैं.’’

‘‘लेकिन मेरी फैमिली भी नहीं है,’’ डा. रौनक का स्वर संयत होते हुए भी भीगा सा लग रहा था.

‘‘यानी आप घरगृहस्थी के चक्कर में नहीं पड़े हैं.’’

‘‘ऐसा तो नहीं है डा. चंद्रा,’’ डा. रौनक ने उसांस ले कर कहा, ‘‘जैसाकि कुछ देर पहले डा. कबीर ने कहा था कि आतंकवादी पलभर में एक खुशहाल परिवार को उजाड़ देते हैं. मेरी जिंदगी की खुशियां भी आतंकवाद की आंधी उड़ा ले गई. खैर छोडि़ए, ये सब. आप लोग चलिए, देर कर दी तो मार्केट बंद हो जाएगी,’’ किसी को कुछ कहने का मौका दिए बगैर डा. रौनक तेजी से अपने कमरे की ओर बढ़ गए.

‘‘मु झे यह आतंकवाद वाली बात करनी ही नहीं चाहिए थी. इसे सुनने के बाद ही डा. रौनक एकदम गुमसुम हो गए थे, खाना भी ठीक से नहीं खाया,’’ डा. कबीर बोले.

‘‘आप को मालूम थोड़े ही था कि डा. रौनक आतंकवाद के शिकार हैं,’’ डा. चंद्रा ने कहा.

‘‘हरेक शै के अच्छेबुरे पहलु होते हैं. डा. रौनक आतंकवाद का शिकार हैं और मेरे एक मित्र डा. भुपिंदर सिंह आतंकवाद के बैनिफिशियरी,’’ डा. सतीश ने कहा, ‘‘भुपिंदर की माताजी एक समाजसेविका हैं. उन्होंने आतंकवाद की शिकार एक युवती से उस की शादी करवा दी और भुपिंदर शादी के बाद बेहद खुश हैं.’’

‘‘अरे वाह, पहली बार सुना कि कोई समाजसेविका किसी हालात की मारी को अपनी बहू बना ले और बेटा भी मान जाए.’’

‘‘हम ने भी ऐसा पहली बार ही सुना और देखा था. असल में भुपिंदर की माताजी बहुत ही कड़क और अनुशासनप्रिय हैं और भुपिंदर ने सोचा था कि सुख से जीना है तो शादी मां की पसंद की लड़की से ही करनी होगी, चाहे अच्छी हो या बुरी. लेकिन मां ने तो उसे एक नायाब हीरा थमा दिया है…’’

‘‘यानी लड़की सुंदर और पढ़ीलिखी है?’’ कबीर ने बात काटी.

‘‘डाक्टर है और बेहद खूबसूरत. व्यस्त गाइनौकोलौजिस्ट होने के बावजूद सासूमां की समाजसेवा में समय लगाती है सो वे उस से बहुत खुश रहती हैं और भुपिंदर के घरसंसार में सुखशांति,’’ डा. चंद्रा ने बताया.

‘‘आप लोग जाइए शौपिंग के लिए, मैं डाक्टर रौनक के साथ कुछ समय बिताना चाहूंगा. उन की दुखती रग छेड़ने के बाद उन का ध्यान बंटाना तो बनता है,’’ डा. कबीर ने कहा.

डा. रौनक उन्हें गैस्टहाउस के लौन में ही टहलते हुए मिल गए, उन्होंने धीरे से उन के कंधे पर हाथ रख दिया.

‘‘अरे, आप डा. कबीर?’’ डा. रौनक ने चौंक कर कहा, ‘‘आप तो शौपिंग के लिए गए थे?’’

‘‘मगर यहां परदेश में आप को अकेले उदास छोड़ना अच्छा नहीं लगा सो लौट आया, शौपिंग कल कर लेंगे.’’

‘‘मेरे लिए इतना सोचने के लिए बहुतबहुत धन्यवाद कबीर भाई,’’ डा. रौनक नम्रता से बोले, ‘‘मेरी उदासी तो मेरी परछाईं है, देशपरदेश की साथिन उस के लिए आप अपना प्रोग्राम खराब मत करिए.’’

‘‘काहे का प्रोग्राम यार,’’ डा. कबीर भी अनौपचारिक हो गए, ‘‘हर जगह हर चीज मिलती है, लेकिन चाहे 2 रोज को भी अपने शहर से दूर जाओ फैमिली के लिए वापसी में कुछ ले कर आने का रिवाज बन गया है. बस इसीलिए भाई लोग बाजार चले गए हैं.’’

‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं, बहुत पुराना रिवाज है यह. पापा जब भी दौरे पर जाते थे तो मां और बहनें अटकलें लगाने लगती थीं कि वे क्याक्या ले कर आएंगे.’’

‘‘और आप की पत्नी?’’

‘‘कह नहीं सकता, क्योंकि उस समय तो मेरी शादी ही नहीं हुई थी और शादी के बाद रागिनी को छोड़ कर कहीं जाना ही नहीं हुआ. बहुत ही कम समय मिला उस के साथ रहने को,’’ डा. रौनक ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘‘उफ, आई एम सो सौरी,’’ डा. कबीर का स्वर भीग गया, ‘‘वैसे हुआ कैसे ये सब?’’

‘‘डाक्टर बनते ही पहली पोस्टिंग जम्मू के एक सीमावर्ती गांव में हुई थी. जगह सुंदर थी, खानेपीने की दिक्कत भी नहीं थी, लेकिन अकेलापन बहुत था और उसे ही बांटने के लिए मैं ने रागिनी से शादी कर ली. बहुत मजे में गुजर रही थी जिंदगी.

‘‘एक रात घंटी बजने पर जब मैं ने दरवाजा खोला तो मुंहसिर लपेटे 6-7 लोग

एकदम अंदर घुस आए. उन में से एक बुरी तरह जख्मी था. उन की वेशभूषा से ही मैं सम झ गया कि वे सब सीमापार के घुसपैठिए हैं. एक ने मु झ पर बंदूक तान कर कहा कि मैं उन के जख्मी साथी का इलाज करूं. उसे देखने के बाद मैं ने कहा कि उस के जख्म बहुत गहरे हैं और इलाज की दवाइयां मेरे पास नहीं हैं. मेरे पास तो तुरंत खून रोकने के लिए बांधने को पट्टी भी नहीं थी.

‘‘बीवी का दुपट्टा फाड़ कर बांधा और अपनी मोटरसाइकिल पर जा कर तुरंत जरूरी दवाइयां लाने को तैयार हो गया.

‘‘रागिनी जो गले से दुपट्टा खींचे जाने पर तिलमिलाई हुई थी चिल्ला कर बोली कि ये कहीं नहीं जाएंगे.’’

‘‘इस का तो बाप भी जाएगा और तेरी तो मैं अभी ऐसी की तैसी करता हूं,’’ दांत किटकिटाता एक बंदूकधारी रागिनी की ओर लपका.

‘‘इसे मारना नहीं हिरासत में रखना है असलम, तभी तो यह डाक्टर दवाइयां ले कर जल्दी से लौटेगा,’’ दूसरे बंदूकधारी ने उसे रोका.

‘‘ठीक कहते हो उस्ताद, तब तक इस औरत से हम खिदमत करवाते हैं. भूखे हैं कब से. चल, डाक्टर फौरन इलाज का सामान ले कर आ और देख पुलिसवुलिस को बुलाने की हिमाकत करी तो तेरी बीवी जिंदा नहीं बचेगी.’’

‘‘मेरे जिंदा रहने की फिक्र मत करना रौनक…’’ रागिनी चिल्लाई.

यही उस की गलती थी. घुसपैठिए सर्तक

हो गए और उन्होंने अपने एक साथी अकरम

को मेरे कपड़े पहना कर मेरी कमर में पिस्तौल सटा कर मेरे पीछे मोटरसाइकिल पर बैठा दिया. इस बीच रागिनी चिल्लाती रही कि मेरी परवाह मत करना.

‘‘उस के चिल्लाने से शायद मेरी हिम्मत बढ़ी और दवा की दुकान पर कई लोगों को देखते ही मैं चिल्ला पड़ा कि यह आतंकवादी है मु झे इस से बचाओ.’’

इस से पहले कि अकरम कुछ कर पाता कुछ लोगों ने उसे दबोच कर उस की पिस्तौल छीन ली. उस के बाद पुलिस और फिर मिलिटरी ने हमारे घर को घेर लिया. घर में चारों तरफ खिड़कियां थी जिन से घुसपैठिए गोलियां दाग कर किसी को घर के पास नहीं फटकने दे रहे थे और घर के करीब न कोईर् दूसरा घर था और न ही कोई पेड़, जिस पर चढ़ कर सिपाही छत पर पहुंच सकते.

‘‘रागिनी ने जिद कर के यह घर लिया ही इसलिए था कि ताक झांक का डर न होने से हम उन्मुक्त हो कर जीया करेंगे. कई घंटों तक अंदर से गोलाबारी बंद होने यानी घुसपैठियों के असले के खत्म होने का इंतजार करने के बाद हार कर हैलिकौप्टर के जरीए कमांडो छत पर उतारे गए. सब घुसपैठियों ने खुद को गोली मार दी.

‘‘रागिनी रसोई के फर्श पर बेसुध पड़ी थी. थोड़े से उपचार के बाद वह ठीक हो गई. उस ने बताया कि पहले तो घुसपैठिए उस से लगातार चाय, खाना बनवाते रहे, लेकिन मकान की घेराबंदी के बाद उन्होंने उस पर लातघूसें बरसाने शुरू कर दिए कि इसी के उकसाने पर डाक्टर पुलिस ले कर आया है. उस का कहना था कि इस के अलावा उन्होंने उस के साथ कुछ गलत नहीं किया. मु झे उस का यह कहना बिलकुल अविश्वसनीय लगा. इतनी खूबसूरत अकेली जवान औरत को कौन ऐसे ही छोड़ेगा और यह कहने के बाद कि यह हमारी खिदमत करेगी, हम भूखे हैं.

‘‘रागिनी का कहना था कि असलम का मतलब सिर्फ खाना बनवाने

और खाने से था. टीवी पर खबर देख कर मेरे और रागिनी के परिवार के लोग भी आ गए थे. रागिनी के घर वालों का तो पता नहीं, लेकिन मैं और मेरे घर वाले रागिनी की बात को मानने को तैयार नहीं थे कि रागिनी का बलात्कार नहीं हुआ है. जब रागिनी के मम्मीपापा जाने लगे तो रागिनी भी उन के साथ जाने को तैयार हो गई. मैं ने भी उसे रोकने की कोशिश नहीं की.’’

‘‘उस के बाद तो संपर्क किया होगा?’’ डा. कबीर ने पूछा.

‘‘डा. रौनक खिसिया गए कि उसी ने संपर्क किया था यह बताने को कि वह मां बनने वाली है… मैं ने छूटते ही कहा कि फिर तो पक्का हो गया कि उस के साथ बलात्कार हुआ था, क्योंकि मेरा बच्चा होने का तो सवाल ही नहीं उठता. मैं तो बेहद एहतियात बरतता था. सुन कर उस ने फोन रख दिया. उस के बाद आपसी सम झौते से हमारा तलाक हो गया. इसी बीच मु झे एमडी में दाखिला मिल गया और मैं ने खुद को पढ़ाई और फिर काम में  झोंक दिया.’’

‘‘रागिनी का हालचाल मालूम नहीं किया?’’

डा. रौनक ने इनकार में सिर हिलाया.

‘‘जिस गांव जाना नहीं उस की राह क्यों पूछता और पूछता भी किस से? एमडी करने वैल्लोर गया था, फिर वहीं से स्पैशलाइजेशन करने विभिन्न देशों में घूमता रहा सो किसी ऐसे से संपर्क ही नहीं रहा जो रागिनी के संपर्क में हो.’’

‘‘घर वालों ने शादी के लिए नहीं कहा?’’

‘‘पहली शादी के लिए ही जल्दी मचाते हैं सब लोग जो मैं ने खुद ही जल्दी मचा कर करवा ली थी. एमडी करने के दौरान ही मम्मीपापा चल बसे थे. रिश्तेदारों को दूसरी शादी करवाने का उत्साह नहीं होता और अपने को तो अकेले रहने की आदत पड़ चुकी है. बहुत देर हो गई है डा. कबीर, कमरे में चल कर आराम करना चाहिए शुभ रात्रि,’’ कह कर डा. रौनक ने हाथ मिलाया और अपने कमरे की ओर बढ़ गए.

डा. कबीर को उन का रवैया बहुत गलत लगा और उन की सहानुभूति अवहेलना में बदल गई. अगले रोज सिवा औपचारिक अभिवादन के उन्होंने डा. रौनक से कोई बात नहीं की. सम्मेलन खत्म होने के बाद सब अपनेअपने शहर लौट गए. प्राय सालभर बाद डा. कबीर को अपने भतीजे आलोक की शादी में अमृतसर जाना पड़ा. वहां शादी से पहले एक समारोह में उन के भाई ने उन्हें अपने पड़ोसी डा. भुपिंदर सिंह से मिलवाया. डा. कबीर को नाम कुछ जानापहचाना सा लगा. इस से पहले कि वे कुछ सोच पाते, उन की भतीजी ने डा. भुपिंदर सिंह से पूछा, ‘‘और सब नहीं आए अंकल?’’

‘‘सासबहू तो अपनी समाजसेवा से लौटने के बाद ही आएंगी, रूपिंदर टैनिस खेल कर आ गया है अभी कपड़े बदल कर आता होगा.’’

सासबहू और समाजसेवा… तार जुड़ते से लगे… डा. सतीश के दोस्त

भुपिंदर सिंह ही लगते हैं आतंकवाद के बैनिफिशियरी डा. कबीर दिलचस्पी से उन के पास ही बैठ गए. औपचारिक बातचीत खत्म भी नहीं हुई थी कि एक किशोर को देख कर डा. कबीर को जैसे करंट छू गया. हूबहू डा. रौनक की फोटोकौपी.

‘‘मेरा बेटा रूपिंदर, टैनिस की अंडर नाइनटीन प्रतियोगिता में भाग लेने की तैयारी कर रहा है,’’ डा भुपिंदर सिंह ने गर्व से बताया.

‘‘आई सी. और कितने बच्चे हैं आप के?’’

‘‘बस यही है जी, सवा लाख के बराबर एक. असल में इस के जन्म के बाद मम्मी ने इस की मां को अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने में लगा दिया. एमबीबीएस तो कर ही चुकी थी, एमडी करने में व्यस्त हो गई और फिर स्पैशलाइजेशन के लिए हम दोनों ही विदेश चले गए और इन्हीं व्यस्तताओं के चलते रूपिंदर को भाईबहन दिलवाने का समय निकल गया.’’

हालांकि डा. रौनक ने यह नहीं बताया था कि उन की पत्नी भी डाक्टर थी. डा. कबीर को यकीन था कि वह रागिनी है और यह यकीन कुछ ही देर में पक्का हो गया जब किसी फैशन मैगजीन में छपी महिला की तसवीर से डा. भुपिंदर सिंह ने उन का परिचय करवाया, ‘‘मेरी पत्नी रागिनी और रागिनी ये आलोक के चाचा डा. कबीर पाल हैं.’’

रागिनी ने शालीनता से हाथ जोड़े और कहा, ‘‘आलोक के चाचा होने के नाते आप का हमारे घर आना भी बनता है भाई साहब, जाने से पहले आप जरूर आइएगा.’’

‘‘जी, जरूर. पत्नी यहीं कहीं होगी भाभीजी के आसपास, उन से मिलने पर सब तय कर लीजिएगा,’’ डा. कबीर ने विनम्रता से कहा और मन ही मन सोचा कि आप से तो मु झे अकेले में मिलना ही है… पिछले वर्र्ष सुनी एकतरफा कहानी का दूसरा पहलू जानने को.

पड़ोस में रहने वाली डाक्टर रागिनी कहां काम करती हैं यह पता लगाना मुश्किल नहीं था और यह भी कि किस समय वे अपेक्षाकृत कम व्यस्त होती हैं.

शादी के अगले रोज लंच के बाद डा. कबीर रागिनी के हस्पताल पहुंच गए. रागिनी लंच के बाद अपनी कुरसी पर ही सुस्ता रही थी. डा. कबीर को देख कर चौंकना स्वाभाविक था. डा. कबीर ने बगैर किसी भूमिका के बताया कि कैसे पिछले वर्ष एक मैडिकल कौन्फ्रैंस में उन की मुलाकात डा. रौनक से हुई थी और उन्होंने अपने को आतंकवाद का शिकार बताया था. उस के बाद डा. सतीश ने अपने एक दोस्त के बारे में बताया, जो आंतकवाद की शिकार युवती से शादी कर के बहुत खुश था.

‘‘डा. रौनक की कहानी सुन कर मु झे लगा कि वे आतंकवाद के शिकार नहीं अपने वहम और पूर्वाग्रहों के शिकार हैं,’’ डा. कबीर ने कहा, ‘‘यहां आने पर रूपिंदर को देख कर मैं सम झ गया कि आतंकवाद के जिस बैनिफिशियरी का जिक्र डा. सतीश कर रहे थे वे आप के पति ही हैं. बस, जिज्ञासावश डा. रौनक से सुनी कहानी का दूसरा पहलू सुनने चला आया हूं. अगर आप को बुरा लगा हो तो धृष्टता के लिए क्षमा मांग कर चला जाता हूं.’’

‘‘अरे नहीं भाई साहब, आप पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने मु झ से बगैर मिले रौनक को गलत कहा है सो अब तो आप न भी चाहें तो भी मैं आप को अपनी कहानी सुनाऊंगी ही,’’ रागिनी हंसी.

‘‘एलकेजी से एमबीबीएस तक का सफर मैं ने और रौनक ने साथ ही तय किया था, जाहिर है ंिंजदगी का सफर भी साथ ही तय करना था, लेकिन एमडी करने के बाद जब तक एमडी में दखिला नहीं मिलता तब तक तो नौकरी करनी ही थी. मु झे संयोग से अपने शहर में ही नौकरी मिल गई, लेकिन रौनक को जम्मू के एक सीमावर्ती गांव में हालांकि उस गांव में मेरे लिए कोई काम नहीं था फिर भी रौनक के अकेलेपन के रोने से द्रवित हो कर मैं ने मम्मीपापा को शादी के लिए मना लिया. उस रात जो हुआ वह अप्रत्याशित था, लेकिन उस से भी ज्यादा अप्रत्याशित था रौनक का व्यवहार.

‘‘रौनक के जाते ही घुसपैठियों ने मु झे चाय और फिर दालचावल बनाने को कहा. वे लोग खाना खा ही रहे थे कि पुलिस आ गई और खाना छोड़ कर उन्होंने खिड़कियों पर मोरचा संभाल लिया और आतेजाते मु झ पर लातघूसों की बौछार करते रहे. उन्हें इतना समय ही कहां मिला कि मेरे साथ कुछ करते, इस का सुबूत अधखाया खाना और चाय के जूठे बरतन थे.

‘‘उसी रौनक ने जिस ने यह कह कर शादी की थी कि वह मेरे बिना जीने की

कल्पना भी नहीं कर सकता, मु झ पर और सुबूतों पर यकीन करने से इनकार कर दिया. एक डाक्टर होने के नाते क्या रौनक को मालूम नहीं है कि कोई भी गर्भनिरोधक उपाय शतप्रतिशत सुरक्षित नहीं होता. खैर, सब के सम झाने के बावजूद मैं ने गर्भपात नहीं करवाया.

‘‘उस हालत में न तो नौकरी कर सकती थी न ही पढ़ाई, मगर खाली घर बैठना भी नहीं चाहती थी सो मैं ने समय काटने के लिए एक एनजीओ जौइन कर लिया. वहां की संचालिका स्नेहदीप कौर ने मु झे अपने पुत्र के लिए पसंद कर लिया और पुत्र ने भी यह कह कर किसी का भी बच्चा होने दो, कहलाएगा तो यह मेरा बच्चा ही और मैं इसे इतना अच्छा इनसान बनाऊंगा. मु झे शादी के लिए मना लिया. संयोग से रूपिंदर पासपड़ोस में भी सभी का चहेता है.

‘‘वैसे तो मैं रौनक को भूल चुकी हूं और मन ही मन उन घुसपैठियों का भी धन्यवाद करती हूं, जिन के कारण मु झे भुपिंदर जैसे पति और स्नेहदीप जैसी सास मिलीं, जिन के सहयोग से मैं आज एक जानीमानी गाइनौकोलौजिस्ट हूं, मगर अभी भी यदाकदा रौनक का व्यवहार याद कर के तिलमिला जाती हूं और उस से बदला लेने को जी चाहता है. आप के पास रौनक का पता है?’’

‘‘संपर्क तो नहीं रखा उस से, लेकिन यह तो जानता ही हूं कि कहां काम करता है. मिलना चाहेंगी उस से?’’

‘‘कदापि नहीं. बस उस से मूक बदला लेने को रूपिंदर की तसवीर भेजना चाहूंगी यह सिद्ध करने को कि न तो गर्भनिरोधक उपायों पर विश्वास करना चाहिए और न ही बचपन के प्यार पर जो करने की भूल मैं ने करी थी.’’

डा. कबीर ने चुपचाप एक कागज पर डा. रौनक का पता लिख दिया.

Hindi Long Story

Emotional Story: पश्चात्ताप- आज्ञाकारी पुत्र घाना को किस बात की सजा?

लेखक- धीरज कुमार

Emotional Story: ट्रेन से उतर कर टैक्सी किया और घर पहुंच गया. महीनों बाद घर वापस आया था. मुझे व्यापार के सिलसिले में अकसर बाहर रहना पड़ता है. मैं लंबी यात्रा के कारण थका हुआ था, इसलिए आदतन सब से पहले नहाधो कर फ्रेश हुआ. तभी  पत्नी आंगन में चायनाश्ता ले आई. चाय पीते हुए मां से बातें कर रहा था. अगर मैं घर से बाहर रहूं और कुछ दिनों बाद वापस आता हूं तो  मां  घर की समस्याएं और गांवघर की दुनियाभर की बातें ले कर बैठ जाती है. यह उस की पुरानी आदत है. इसलिए कुछ उस की बातें सुनता हूं. कुछ बातों पर ध्यान नहीं देता हूं. परंतु इस प्रकार अपने गांवघर के बारे में बहुतकुछ जानकारी मिल जाती है.

मां ने बातोंबातों में बताया कि, “उस ने अपने बिसेसर चाचा की हत्या  डंडे से पीटपीट कर  कर दी है. उसे  जेल हो गई है.”

“कौन, मां, तुम किस के बारे में कह रही हो?” मैं ने हत्या और जेल के बारे में सुन कर जरा चौकन्ना होते हुए पूछा.

” घाना…ना…, घाना के बारे में बता रही हूं,” मां जोर देते हुए बोली.

” घाना ने किस की हत्या कर दिया, मां? ” मैं ने ज़रा आश्चर्य से पूछा था.

“अरे, वह अपने बिसेसर चाचा की, बउआ,” वह दृढ़ता से बोली थी.

यह सुन कर मुझे विश्वास नहीं हुआ. एक पल को लगा, शायद यह झूठ है. किंतु सच तो सच होता है न, कई दिनों तक उस के बारे में मेरे मन में विचार उमड़तेघुमड़ते रहे.

मुझे आज भी याद है. हम दोनों एकसाथ बचपन में खेलते थे. साथसाथ बगीचे से आम चुराते थे. खेतों से मटर ककी फलियां तोड़ना, एकसाथ पगडंडियों पर दौड़ना… दोनों साथ साथ खेलते हुए बड़े हुए थे.

आज मैं व्यापार के सिलसिले में अपने गांव से दूर रहता हूं और कभीकभार ही आ पाता हूं. समयाभाव के कारण मिलनाजुलना हम दोनों का कम हो गया था. किंतु आज भी हमदोनों की पटती है. जब भी मैं गांव  आता हूं, हम दोनों की घंटों बातें होती हैं.

उस के परिवार के लोगों की विसेसर चाचा से पुरानी रंजिश थी क्योंकि वे उस के गोतिया थे. मैं एक बार किसी काम से उस के घर जा रहा था. उस की चाची से उस की मां की तूतूमैंमैं हो रही थी. उस की मां जोरजोर से गालियां दे रही थी.

उस की चाची व उस की चचेरी बहनें भी उस की मां को  गालियां देने लगीं.

उस की मां  जोरजोर से चिल्लाने लगी, “दौड़ रे घाना…” इतना सुनते ही घाना अंदर से दौड़ पड़ा था. ऐसा लग रहा था, अभी वह चाची पर टूट पड़ेगा. वह भी मां की तरह से अनापशनाप बोलने लगा. मैं ने उस को डांटा और शांत किया. वह मेरी बात मानता था. मैं ने उस को समझाया, “छोटीछोटी बातों पर गुस्सा क्यों करते हो, आखिर, वह तुम्हारी चाची ही तो है.”

कुछ देर बाद मामला रफादफा हो गया था.

कुछ दिनों बाद उस ने बताया कि, “चाचा के परिवार से परेशान हो गया हूं. वे लोग जमीनजायदाद के बंटवारे को उलझा कर रखे हैं. उन्होंने बंटवारे में ज्यादा जमीन रख ली है. इसलिए हम दोनों परिवारों में झगड़ा और तनाव रहता है. वे दोबारा बंटवारे के लिए  तैयार नहीं हो रहे हैं.”

यह कहते हुए वह गंभीर हो गया था.

मैं ने उस को समझाया, “क्यों नहीं तुम लोग सहूलियत से ही  मांग लेते हो.”

“वे कभी नहीं देंगे. वे बहुत अड़ियल हैं,” वह निराश होते हुए बोला था.

वह मेरा बचपन का दोस्त था. मैं उस को भलीभांति जानता हूं. वह कभीकभी उखड़ जाता है, गुस्से पर नियंत्रण नहीं कर पाता है. परंतु वह इतना कठोर नहीं है कि हत्या जैसे अपराध में लिप्त हो जा.

गांव के लोगों से मालूम हुआ कि जब वह केस हार गया और उसे सजा मिल गई तो उस ने अपने मांबाबूजी से भी मिलने से इनकार कर दिया.

सभी लोग उसे अपराधी मान रहे थे. लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा था. इसलिए मैं ने समय निकाल कर उस से मिलने के लिए सोचा.

मैं जेल के सामने खड़ा था. वह कुछ देर बाद  सलाखों के पीछे आ चुका था. मुझे देखते ही उस की आंखों में आंसू आ गए. उस के आंसू रुक नहीं रहे थे. मैं बारबार उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था.

“घाना,  मैं तुम से जानने आया हूं  कि आखिर यह सब कैसे हो गया?” मैं ने उस से सीधा सवाल किया था.

वह बहुत देर तक अपने आंसुओं पर काबू पाने की कोशिश करता रहा. जब आंसू रुके तो उस ने बोलना शुरू किया, “भैया, आप जानते हैं…”

मैं उस की उम्र से थोड़ा बड़ा हूं और गांवघर के रिश्ते में भाई भी लगता हूं, इसलिए वह मुझे भैया ही कहता है. फिर भी, वह मेरा दोस्त है.

एक बार फिर रुक कर उस ने बोला शुरू किया, “मैं गुस्से के आवेग में ऐसा कर गया. वहां मांबाबूजी और मेरी बहन  भी थी. मां मारोमारो की आवाज लगा रही थी. बहन ने आग में घी डालने का काम कर दिया. मैं आगेपीछे नहीं सोच पाया. किसी ने एक बार भी मुझ से यह नहीं कहा कि मत मारो. अगर  किसी ने एक बार भी रोका होता,  तो शायद मैं उन की हत्या न करता और कारावास का दंड न मिलता.”

मैं ने तसल्ली देने की कोशिश की, “अब जो हो गया,  हो गया. अब पछताने से कोई फायदा नहीं है.”

कुछ देर मुझ से नज़रें नहीं मिला पा रहा था वह. अपना चेहरा इधरउधर घुमा रहा था. वह स्वयं को अपराधी महसूस कर रहा था, ऐसा मुझे महसूस हो रहा था.

वह कुछ सोचते हुए अपना हाथ मलने लगा था. वह बारबार अपनी उन हथेलियों को देख रहा था जिन से उस ने हत्या की थी. भले ही वह हत्या के लिए पश्चात्ताप कर रहा था, यह बात तो स्पष्ट थी कि वह गुनाहगार और अपराधी तो बन ही गया. मैं कुछ देर तक गांवघर के बारे में इधरउधर की बातें कर उस का मन बहलाता रहा.

“मैं ने सुना है कि तुम अपने मांबाबूजी से अब नहीं मिलते हो. शायद, तुम ने  उन को मिलने से मना कर दिया है. लेकिन क्यों ?” मैं ने उस से सवाल किया.

उस का चेहरा कठोर हो गया था. उस ने बताया, “भैया, आप जानते हैं,  मांबाबूजी की आकांक्षाओं के कारण ही तो यह महाभारत हुआ है. अब मैं जिंदगीभर जेल में रहूंगा. इस के पीछे मेरे मांबाबूजी ही जिम्मेदार हैं. वे जमीन के कुछ टुकड़ों के लिए जिंदगीभर जहर भरते रहे. वे लोग एक बार भी रोके  होते तो शायद मैं  कारावास में जीवन नहीं भोगता.”

मैं सचाई सुन कर घाना के प्रति द्रवित हो रहा था. लेकिन इस परिस्थिति में मदद नहीं कर पा रहा था. मैं ने महसूस किया कि इन सहानुभूतियों का भी कोई फायदा नहीं है. मैं भारीमन से फिर मिलने का वादा कर के निकल गया.

उस ने कहा, “आते रहिएगा भैया, आप के सिवा अब मेरा कोई अपना नहीं है. अब मेरे मांबाबूजी अपने नहीं रहे जिन्होंने मुझे गुनाह के रास्ते पर धकेल दिया है.”

“ऐसा नहीं कहते मेरे भाई, वे तुम्हारे ही मांबाबूजी हैं. वे तुम्हारे ही रहेंगे,” मैं ने समझाने की कोशिश की.

उस की आंखों में घृणा और पश्चात्ताप के आंसू स्पष्ट दिख रहे थे.

Emotional Story

Fatty Liver और लिवर कैंसर में अंतर

Fatty Liver: 30 वर्षीय नीलिमा को जब पता चला कि उसे फैटी लीवर की डिजीज है, तो पहले उसे खुद पर विश्वास नहीं हुआ. उस ने दूसरे डाक्टरों से भी संपर्क किया, तो उन्होंने भी वही बात बताई और दवा के साथसाथ उस के लाइफस्टाइल में बदलाव के सुझाव दिए. 6 महीने दवा लेने के बाद नीलिमा ठीक हुई और उस ने बाहर के जंक फूड को लेना एकदम कम कर दिया.

असल में, आज के समय में नौन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. पहले यह बीमारी केवल वयस्कों में देखी जाती थी, लेकिन आज की लाइफस्टाइल में बच्चे और युवा भी इस के शिकार हो रहे हैं. यदि समय पर इस का इलाज न किया जाए, तो यह धीरेधीरे लिवर सिरोसिस और यहां तक कि लिवर कैंसर में भी बदल सकता है, जो चिंता का विषय है. इसलिए फैटी लिवर की समस्या का समय रहते इलाज करना बेहद जरूरी है.

नैशनल इंस्टीट्यूट औफ हैल्थ के अनुसार, पहले यह बीमारी बच्चों और युवाओं में 10 से 20 फीसदी हुआ करती थी, जो अब बढ़ कर 40% तक हो चुका है, जिस का मुख्य कारण चाइल्ड्हुड ओबेसिटी है.

इस बारे में मुंबई की ग्लेनइगल्स हौस्पिटल की हेपेटोलौजी और लिवर ट्रांसप्लांट मैडिसिन विभाग के निदेशक डा. अमित मंडोत कहते हैं कि यह आजकल लाइफस्टाइल वाली बीमारी हो गई है, जिस के बारे में सही जानकारी सभी के लिए आवश्यक है. इस के लक्षण, कारण और रोकथाम के बारे में जानकारी निम्न हैं :

डाक्टर आगे कहते हैं कि लिवर की समस्याएं हर उम्र के लोगों के लिए चिंता का विषय बन रहा है, लेकिन अकसर इन्हें गंभीर होने तक नजरअंदाज कर दिया जाता है. आज फैटी लिवर सब से आम लिवर की बीमारियों में से एक है, जो शराब न पीने वालों में भी पाया जाता है. शुरुआत में यह मामूली लग सकता है, लेकिन समय के साथ फैटी लिवर गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है, जैसेकि लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर. इस के लक्षण पहचान कर शुरुआती चरण में ही इलाज करना फायदेमंद साबित हो सकता है.

फैटी लिवर तब होता है जब लिवर में अत्यधिक चरबी जमा हो जाती है. यह 2 प्रकार के होते हैं :

  • अल्कोहोलिक फैटी लिवर.
  • नौन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD)

आज की खराब जीवनशैली और असंतुलित खानपान के कारण एनएएफएलडी ज्यादा आम है. इस के मुख्य कारण हैं- मोटापा, डायबिटीज, उच्च कोलेस्ट्रोल, बैठे रहने की आदत, तैलीय और मीठे भोजन का अधिक सेवन और कुछ दवाओं का लंबे समय तक उपयोग.

इस के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं :

 

  • थकान या कमजोरी.
  • दाईं तरफ ऊपरी पेट में हलका दर्द या भारीपन.
  • भूख न लगना.
  • वजन में कमी.

पौसिबल कौंप्लिकेशन :

  • लिवर में सूजन (स्टीटोहेपेटाइटिस)
  • फाइब्रोसिस (लिवर में निशान पड़ना)
  • सिरोसिस (लिवर का गंभीर नुकसान)
  • लिवर फेल होना या लिवर कैंसर वगैरह.

यहां यह बता दें कि हमेशा फैटी लिवर कैंसर में नहीं बदलता, अगर इस की गंभीरता अधिक हो, तो कैंसर हो सकता है, लेकिन समय से इलाज होने पर यह ठीक भी हो सकता है.

लिवर कैंसर है क्या

डा. अमित कहते हैं कि लिवर कैंसर तब होता है, जब लिवर में असामान्य कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं. इस का सब से आम प्रकार है हेपेटोसैलुलर कार्सिनोमा. यह लिवर में शुरू हो सकता है या शरीर के अन्य हिस्सों से फैल सकता है. इस के कारण हैं क्रोनिक हेपेटाइटिस बी या सी संक्रमण, सिरोसिस, अनुपचारित फैटी लिवर डिजीज, अत्यधिक शराब सेवन, लंबे समय तक लिवर को हुआ नुकसान और अफ्लाटौक्सिन जैसे जहरीले पदार्थों के संपर्क में आना.

लिवर कैंसर के लक्षण

  • दाईं तरफ ऊपरी पेट में दर्द.
  • वजन में कमी.
  • पेट में सूजन.
  • त्वचा और आंखों का पीला पड़ना (पीलिया)
  • भूख न लगना.
  • थोड़ा खाने के बाद ही पेट भरा हुआ लगना आदि.

यहां जान लें कि यदि समय पर इलाज न किया जाए, तो लिवर कैंसर अन्य अंगों में भी फैल सकता है, आंतरिक रक्तस्राव कर सकता है या लिवर फेल हो सकता है और बाद में इस का इलाज और कठिन हो जाता है. इसलिए समय पर जांच और इलाज करवाना बेहद जरूरी है.

फैटी लीवर और कैंसर का संबंध क्या है

फैटी लिवर और लिवर कैंसर का संबंध नौन अल्कोहोलिक फैटी लिवर धीरेधीरे सिरोसिस और अंत में लिवर कैंसर में बदल सकता है, क्योंकि फैटी लिवर की वजह से लिवर में लंबे समय तक सूजन पैदा करता है, जिस से फाइब्रोसिस और सिरोसिस हो जाता है. इस से लगातार होने वाला नुकसान असामान्य कोशिकाओं की वृद्धि का खतरा बढ़ाता है, जिस से लिवर कैंसर हो सकता है. जितना ज्यादा समय लिवर सूजन और नुकसान झेलता है, उतना ही कैंसर का खतरा बढ़ता जाता है.

लिवर की सुरक्षा और एनएएफएलडी (NAFLD) से बचाव के लिए जरूरी उपाय

 

  • वजन को नियंत्रित रखना.
  • ताजा फल, सब्जियां और साबुत अनाज वाले संतुलित आहार लेना.
  • जंक फूड, तैलीय, डब्बाबंद और प्रोसेस्ड फूड से बचना.
  • धूम्रपान और शराब का सेवन न करना.
  • यदि डायबिटीज, मोटापा या लिवर रोग का पारिवारिक इतिहास है, तो नियमित रूप से लिवर की जांच करवाते रहना चाहिए.

 

हालांकि फैटी लिवर का तुरंत कोई बड़ा असर नहीं दिखता, लेकिन लंबे समय में यह गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है. इसलिए जीवनशैली में बदलाव और नियमित स्वास्थ्य जांच लिवर कैंसर से बचाव करने और लिवर को सुरक्षित रखने में मदद कर सकते हैं.

 

यहां इस बात का ध्यान रखें कि ऐसी किसी भी बीमारी का आयुर्वेदिक या होमियोपैथिक इलाज न करें, इस से इलाज में देरी हो सकती है, जिस से बीमारी बढ़ सकती है. सही समय पर सही जांच और इलाज ही आप के लिवर को तंदुरुस्त बना सकता है.

Fatty Liver

Social Story: भोर की सुनहरी किरण- नंदिता की क्या थी सच्चाई

राइटर- रेखा शाह आरबी

Social Story: 22 वर्षीय नंदिता बहुत सुंदर थी. मगर उस के सुंदर चेहरे पर आज सुबह से ही ?ां?ालाहट और परेशानी नजर आ रही थी. वह आज बहुत परेशान थी. सुबह से बहुत सारा काम कर चुकी थीं. फिर भी बहुत सारा निबटाना था. कंप्यूटर पर बिल अपलोड करते हुए जब सुरेश जो इस बड़ी सी शौप में चपरासी था सब की देखभाल करना उसी की जिम्मेदारी थी. सब को पानी देना, कस्टमर को चायपानी पिलाना सब उस की जिम्मेदारी थी. सुरेश ने जब आ कर कहा कि नंदिताजी आप को बौस बुला रहे हैं तो नंदिता का मन किया कि सिर दीवार से टकरा कर अपना सिर फोड़ दे.

मन में एक भददी गाली देते हुए सोचने लगी कि कमीना जब तक 4 बार देख न ले उसे चैन नहीं पड़ता है. एक तो जब उस के कैबिन में जाओ लगता है नजर से ही खा जाएगा. उस की नजर, नजर न हो कर इंचीटेप बन जाती है और इंचइंच नापने लगता है… खूसट बुड्ढे को अपनी बीवी अच्छी नहीं लगती. सारी दुनिया की औरतें अच्छी लगती हैं और लड़कियां अच्छी लगती है… हां कुदरत ने दिल खोल कर दौलत दी है तो ऐयाशी सू?ोगी ही… एक को छोड़ो 4 भी रख सकता है… पैसे की कौन सी कमी है.

लेकिन भला हो इस की बीवी का जिस ने इस की चाबुक खींच कर रखी है… और उस के आगे इस की चूं नहीं निकलती है. नहीं तो अब तक न जाने कितनी लड़कियों की जिंदगी बरबाद कर चुका होता.’’

नंदिता यह सब सिर्फ सोच सकती थी. बोल नहीं सकती थी अत: उस ने सुरेश से कहा, ‘‘भैया, आप चलिए मैं आती हूं.’’

इस बड़ी से मौलरूपी दुकान की असली मालिक तो थी. औफिस में सभी जानते थे कि गौतम और सुनिधि की लवमैरिज थी.

घर वालों ने बेटी को गंवाने के डर से गरीब गौतम को तो स्वीकार कर लिया लेकिन उस की गरीबी को नहीं स्वीकार कर सके. अमीर मांबाप सुनिधि को इतनी धनसंपत्ति दे गए कि उस की भी गिनती शहर के अमीरों में होने लगी थी.

आकर्षण की एक अवधि होती है. उस के बाद हकीकत सामने आने ही लगती है. सुनिधि को बहुत जल्दी गौतम की रंगीनमिजाजी का पता चल गया. सुनिधि खानदानी लड़की थी. गौतम की लाख छिछोरी हरकतें जानती थी लेकिन फिर भी पति के रूप में उसे मानती थी. वह उस के बच्चों का पिता था.

मगर अपनी अमीरी की धौंस जमाने से भी बाज नहीं आती थी और यह सारी कहानी पूरा औफिस जानता था. मुंह पर कोई भले ही कुछ नहीं कहता था लेकिन पीठ पीछे खूब सब बातें करते थे.

वैसे गौतम कोई बुड्ढा इंसान नहीं था. वह तो नंदिता बस खुन्नस में उसे बूढ़ा कहा करती थी और वह भी अपने मन में. गौतम 50 के आसपास हैंडसम इंसान था. कम से कम अपनी बीवी से तो ज्यादा सुंदर था. उस की सुंदरता और बात करने की कला से ही तो सुनिधि ने उस से प्रभावित हो कर उस से शादी की थी और गौतम ने उस की रईसी से प्रभावित हो कर उस से शादी की थी, जिस के मजे वह अब ले रहा था.

नंदिता को आज चौथी बार बुलावा था. मन तो कर रहा था कि सीधे उस के कैबिन में जा कर उस के मुंह पर बोल आए कि कमीने बुड्ढे मु?ो नहीं करनी है तेरी नौकरी, रख अपनी नौकरी अपने पास. लेकिन वह जानती थी चाचा ने बड़ी मुश्किल से यहां पर रखवाया था और सैलरी भी अच्छीखासी मिल रही थी. बुड्ढे को बरदाश्त करना उस की मजबूरी थी. नंदिता को यहां पर काम करने में कोई दिक्कत नहीं थी बल्कि नौकरी भी काफी ऐशोआराम वाली थी. दिनभर दुकान की खरीदबिक्री के बिल कंप्यूटर पर अपलोड करते रहना. दुकान इलैक्ट्रौनिक उपकरणों की थी.

वैसे भी नंदिता का गणित बहुत अच्छा था. हिसाबकिताब रखते रखना जिस में उसे कोई दिक्कत नहीं आती थी. बस दिक्कत उस का बौस खड़ूस गौतम ही था, जिस की हर महिला पर गंदी नजर रहती थी. नंदिता तो फिर भी जवान थी, खूबसूरत थी.

खैर, उस ने लंबी सांस छोड़ कर अपने चेहरे का जियोग्राफी सही किया और स्माइल सजा कर उस ने कैबिन का दरवाजा नोक किया.

गौतम तो जैसे इंतजार में बैठा था. बत्तीसी दिखाते हुए बोला, ‘‘आओआओ नंदिता कुरसी पर बैठो.’’

नंदिता ने स्माइल पास करते हुए पूछा, ‘‘सर आप ने किस लिए बुलाया?’’

‘‘नंदिता तुम तो आते ही बस काम के पीछे पड़ जाती हो. काम तो होता ही रहेगा. अरे कभी हम काम के अलावा भी तो बातें कर सकते हैं… एकदूसरे के दोस्त बन सकते हैं… जिंदगी जीने के लिए होती है.’’

नंदिता उस के मन के भाव खूब सम?ा रही थी पर बिलकुल अनजान बनते हुए मासूम बन कर कहा, ‘‘हां सर लेकिन वह काम पैंडिंग पड़ा है उसे पूरा करना है.’’

‘‘अरे यार… कल पूरा कर लेना. आज कोई दुनिया खत्म होने नहीं जा रही.’’

गौतम को बहुत दिनों के बाद आज नंदिता अकेले मिली थी वरना जब भी आती तो कभी अपने साथ कलीग तो कभी कोई न कोई और आ ही जाता. इसलिए वह मौके का पूरा इस्तेमाल कर लेना चाहता था.

वह अपनी कुरसी से उठ कर नंदिता की कुरसी के पास आ गया और उस के कंधों पर अपने हाथ रख कर बोला, ‘‘नंदिता बहुत दिनों से मैं ने कोई फिल्म नहीं देखी. चलो किसी दिन फिल्म देखने चला जाए अकेले फिल्म देखने को जाने को मन ही नहीं करता है.’’

नंदिता ने अपने मन में गाली देते हुए कहा कि हरामखोर मैं तेरी बेटी की उम्र की हूं और तुझे मेरे साथ फिल्म देखनी है. अपनी बेटी के साथ चला जा या अपनी बीवी के साथ क्यों नहीं जाता है?

स्माइल पास करते हुए नंदिता बोली, ‘‘सर औफिस के बाद घर पर मुझे बहुत सारा काम रहता है. मुझे अपने भाई नवीन को पढ़ाना भी होता है. उस के ऐग्जाम आने वाले हैं इसलिए मैं नहीं जा सकती कृपया मुझे माफ करें.’’

नंदिता महसूस कर रही थी कि गौतम को स्माइल से ही चारों धाम प्राप्त हो गए हैं. लेकिन आखिर क्या करती रोजीरोटी का सवाल था वरना जवाब तो वह भी अपने तमाचे के द्वारा बहुत अच्छे से दे सकती थी अपने कंधों पर हाथ रखने के बदले पर नहीं दे सकती थी.

तब तक अचानक नंदिता की नजर  गौतम के सिर के ऊपर लगी हुई एलईडी पर चली गई, जिस में पूरे औफिस का सीसीटीवी कैमरा चलता था. नंदिता ने देखा बौस की बीवी सुनिधि आ रही है.

नंदिता की तो बांछें ही खिल गईं. मगर गौतम ने अभी तक अपनी बीवी को नहीं देखा था. इसीलिए बहुत तरंग में बात कर रहा था. उस की बीवी तो बीवी थी उसे नोक कर के आने की कोई जरूरत नहीं थी.

डाइरैक्ट वह औफिस के अंदर चली आई और नंदिता को वहां बैठा देख कर और उस के आगेपीछे चक्कर काटते गौतम को देख कर वह लालपीली हो गई. लेकिन उस ने नंदिता से कुछ नहीं कहा. इधर नंदिता का दिल कर रहा था कि उस को गले लगा कर उस के गाल चूम ले गौतम की बकवास से मुक्त दिलाने के लिए.

नंदिता बौस से इजाजत ले कर अपनी टेबल पर चली आई. लेकिन अंदर जो कुछ भी हो रहा था वह कुछ अच्छा नहीं हो रहा था. वह दूर बैठी टेबल से हावभाव देख कर बखूबी अंदाजा लगा रही थी और उस को मजा आ रहा था. जैसी करनी वैसी भरनी.

कुछ देर बाद उस की बीवी उस के कैबिन से निकली और उस की टेबल के पास से गुजरते हुए अपनी आंखों से अंगारे बरसाते हुए निकल गई. नंदिता अपने कंधे उचकाते हुए अपने मन में सोच रही थी कि मु?ो आप के इस बुड्ढे में मेरी कोई रुचि नहीं है. यह तो खुद ही कमीना है. मेरे पीछे पड़ा रहता है. अगर मजबूरी नहीं होती तो कब का इसे लात मार कर यहां से चली गई होती.’’

इन सब के बीच यह बात तो भूल हो गई कि आखिर गौतम ने बुलाया किसलिए था. चाहे गौतम लाख रंगीनमिजाज सही लेकिन कर्मचारियों से काम लेने के मामले में बहुत टाइट इंसान था और इस में कोई भेदभाव नहीं करता था चाहे लड़का हो या लड़की और यही उस की सफलता का भी राज था.

वैसे भी शाम के 4 बजने वाले थे और उस की शिफ्ट पूरी हो रही थी. उस ने सोच लिया कल जा कर गौतम  से जानकारी ले लूंगी.

उधर गौतम जब शाम को घर पहुंचा तो सुनिधि भरी हुई पड़ी थी. देखते ही गौतम पर भड़क उठी और चिल्लाने लगी, ‘‘गौतम अपनी हरकतों से बाज आ जाओ. बच्चे बड़े हो रहे हैं. क्यों चाहते हो कि मैं उन के सामने तुम्हें जलील करूं. अभी तक तो मैं तुम्हारी सारी हरकतों पर परदा डालती आ रही लेकिन ऐसा ही रहा तो

तुम न घर के रहोगे न घाट के. मुझे और मेरी जायदाद को संभालने के लिए मेरे पास मेरे बच्चे हैं. मु?ो तुम्हारी इतनी भी जरूरत नहीं है कि तुम्हारी छिछोरी हरकतें बरदाश्त करती फिरूं,’’ कहते हुए कमरे का दरवाजा जोर से बंद करते हुए वह चली गई.

इधर नंदिता घर पहुंची तो उसे बहुत भूख लग आई थी. अपनी मां सुमित्रा को कुछ बनाने के लिए कहने के बजाय खुद ही बनाने के लिए किचन में चली गई. किचन क्या थी रूम के ही एक पार्ट को डिवाइड कर के एक तरफ किचन और एक तरफ नंदिता का बिस्तर लगा था.

कुछ भारी बनाने का मन नहीं था. इसलिए उसने अपने लिए थोड़ा सा पोहे बना लिया और बना कर ज्यों ही खाने के लिए बैठी तब तक उस का छोटा भाई नवीन आ गया.

हाथमुंह धो कर नवीन नंदिता के पास ही आ कर बैठ गया और उसे पोहा खाते हुए देख कर बोला, ‘‘दीदी क्या बना कर खा रही हो? मुझे भी खिलाओ. मुझे भी भूख लगी है.’’

‘‘खाना है तुझे तो उधर से चम्मच ले कर आओ और इसी में बैठ कर खा लो. बेकार में और बरतन गंदे करने की जरूरत नहीं है,’’ नंदिता खातेखाते बोली.

दोनों भाईबहन एक ही प्लेट से खाने लगे. जब भी नंदिता नवीन को देखती थी उस के अंदर वात्सल्य उमड़ पड़ता था.

दिनभर लोगों की गंदी नजरों का सामना करते हुए दुनिया में एक यही मर्द जात थी जिस पर वह आंख मूंद कर भरोसा कर सकती थी वरना दुनिया तो अकेली लड़की के लिए भेडि़या बन जाती है.

आंखों से ही बलात्कार कर लेती है, जिसे नंदिता बहुत आसानी से महसूस कर लेती थी. नंदिता क्या दुनिया की सारी लड़कियां इस बात को महसूस कर लेती हैं कि कौन किस नजर से उन्हें देख रहा है. मगर कई बार देख कर भी अनजान बनना पड़ता है.

नंदिता को सोच में डूबा हुआ और चुपचाप खाते देख कर नवीन बोला, ‘‘क्या हुआ दीदी?’’

नंदिता बोली, ‘‘कुछ नहीं हुआ चुपचाप खा.’’

‘‘लेकिन दीदी मु?ो आप को कुछ बताना है.’’

‘‘हां तो बता क्या बात है?’’

‘‘दीदी मैं और मेरे दोस्त साहिल और समर तीनों लोग सोच रहे हैं की नौकरी लगना इतना आसान नहीं है… परीक्षा के बाद हम लोग मिल कर अपनी बड़ापाव और चाइनीज फूड वैन लगाएंगे. आजकल इस बिजनैस में बहुत कमाई है. पूरे परिवार का खर्च आराम के साथ चला लूंगा. सारी तैयारी हो चुकी है. बस आप से पूछना बाकी था.’’

‘‘और यह सब तुम ने कब सोचा?’’ नंदिता आश्चर्य मिश्रित स्वर में बोली.

‘‘यह तो हम लोगों ने बहुत पहले से सोचा था बस परीक्षा खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं,’’ नवीन खातेखाते बोला.

‘‘और पिकअप वैन कहां से लाओगे? वह तो बहुत महंगी मिलती है?’’

‘‘अरे दीदी उस की चिंता मत करो. हम लोग नई पिकअप नहीं लेंगे. साहिल के पापा पहले पिकअप चलाते थे जो अब जर्जर अवस्था में है लेकिन मरम्मत के बाद वह फूड वैन बनाने के काबिल हो जाएगी.’’

‘‘फिर भी कुछ तो खर्च आएगा. बरतन आदि की भी तो जरूरत पड़ेगी?’’

‘‘उन सब का इंतजाम हो चुका है. आप चिंता मत कीजिए. मैं तो बस इतना चाहता हूं कि जल्द से जल्द यह फूड वैन चालू हो जाए ताकि मैं आप और मां की जिम्मेदारी अच्छे से उठा लूं. उस के बाद आप के पास नौकरी करने की विवशता भी नहीं रहेगी.आपका मन करेगा तो कीजिएगा नहीं तो नहीं कीजिएगा.’’

‘‘तू ऐसा क्यों बोल रहा है?’’

तो नवीन रोष में आते हुए बोला, ‘‘दीदी, क्या मुझे पता नहीं है आप का मालिक कितना

घटिया आदमी है. जब मैं उस दिन आप के औफिस गया था तो वह आप को काफी गंदी नजरों से देख रहा था.’’

नंदिता नवीन के आगे निरुत्तर थी. वह उसे क्या बताती कि दुनिया के सारे मर्द गैरलड़की के लिए जानवर ही होते हैं. बहुत कम किसी की बहनबेटी को बहनबेटी समझते हैं.

‘‘ठीक है तुम्हारा काम शुरू हो जाएगा

तो मैं अपनी नौकरी के बारे में फिर से विचार करूंगी.’’

नवीन मुसकराते हुए चला गया.

नंदिता के मन में कहीं गहरे संतोष उतरने लगा. अब वह ज्यादा दिन मजबूर नहीं रहेगी और न किसी की गलत हरकतों को बरदाश्त करना पड़ेगा. इस सोच ने ही उस के चेहरे पर ढेर सारी मुसकराहट बिखेर दी. जैसे सवेरा होते ही आसमान में सूरज की सुनहरी किरणें फैल जाती हैं जैसे बादलों को चीर कर सूरज निकल आया हो.

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Best Hindi Story: प्रैशर प्रलय- पार्टी में क्या हुआ था

Best Hindi Story: ‘‘प्रैशर आया?’’ हाथी जैसी मस्त चाल से झूमते हुए अंदर आते ही जय ने पूछा. ‘‘अरे जय भैया आप को ही आया लगता है, जल्दी जाइए न वाशरूम खाली है,’’ प्रश्रय की छोटी बहन प्रशस्ति जोर से हंसी.

‘‘क्यों बिगाड़ता रहता है जय मेरे बेटे का सुंदर नाम. पहले ढंग से बोल प्रश्रय…’’ नीला, बेटे के नर्सरी के दोस्त संजय को आज भी दोस्त का सही नाम लेने के लिए सता कर खूब मजे लेती. बचपन में जय तोतला था तो उस के मुंह से अलग ही नाम निकलता. धीरेधीरे तो बोल जाता पर जल्दी में कुछ और ही बोल जाता. अब तो उस ने प्रश्रय को पै्रशर ही बुलाना शुरू कर दिया. अमूमन वह सीरियस बहुत कम होता. सीरियस होता तो भी प्रैशर सिंह ही पुकारता और प्रश्रय उसे तोतला. ‘‘अरे आंटीजी छोड़ो भी, कितनी बार कहा आसान सा नाम रख दो. इतना मुश्किल नाम क्यों रख दिया. अब हम ने सही नाम तो रख दिया प्रैशर सिन्हा… हा… हा… अरे मोदीजी की क्या खबर है. कुछ पता भी है, आज क्या नया इजाद कर डाला?’’

‘‘क्या?’’ सब का मुंह खुल गया, फिर कोई नई ‘बंदी’, ‘नोटबंदी’? सब सोच ही रहे थे कि वह मोदीजी… मोदीजी कहते हुए किचन में चला आया. ‘‘ओह… क्या जय भैया…’’ सब भूल ही जाते जय प्रश्रय की नईनवेली पत्नी मुदिता को मोदीजी कहना शुरू किया है.

‘‘अरे मुदिता भी नहीं कह पाता, सिंपल तो है. तो मोदीजी क्या भाभी ही कहा कर… कोई और भाभी तो है नहीं.’’ ‘‘मैं तो भैया मोदीजी ही कहूंगा, रोज नया ही कुछ देखने को मिल जाता है. कुछ नया फिर किया?’’ ‘‘किया है न तभी तो स्कूटी से प्रश्रय साथ दूध लेने गई है. बना रही थी हलवा उस में पानी इतना डाला कि वह लपसी बन गया. अब उसे सुधार कर फटाफट खीर बनाने का प्रोग्राम है. लो आ गए दोनों…’’ नीला मुसकरा कर बोलीं.

‘‘हमारे भैया भी तो महा कंजूस… कुछ वैस्ट नहीं करने देते…’’ ‘‘राम मिलाई जोड़ी… आगे नहीं बकूंगा वरना प्रैशर सिन्हा को प्रैशर आ जाएगा. बहुत मारेगा फिर…’’ कहते हुए उस ने प्रशस्ति के हाथ पर जोर से ताली मारी, हंसा और फिर उंगली से उसे चुप रहने का इशारा किया.

‘‘जल्दी भाभी… आप की नई ईजाद डिश ‘एग प्लस’ वह आमलेट में ब्रैड की फिलिंग वाले यम्मी नाश्ते से तो हमारा अभी आधा पेट ही भरा,’’ प्रशस्ति ने जानबूझ कर जबान होंठों पर फिराई, ‘‘आप चूक गए जय भैया उस स्पैशल नाश्ते को…’’ बहन प्रशस्ति छेड़ कर मुसकरा उठी. ‘‘क्याक्या वह ब्रैड में अंडे की स्टफिंग तो खाई है पर अंडे में ब्रैड की स्टफिंग? देखा तश्तरी, मैं ने सही नाम ही दिया है मोदीजी नमस्ते, मेरे लिए तो जरूर, जल्दी…’’ उस ने पेट सहलाते हुए भूखा होने का एहसास दिलाया.

मुदिता ने हंसते हुए प्रतिक्रिया दी, ‘‘मैं अभी सबकुछ, आप के लिए भी लाई…’’ और फिर किचन में चली गई. ‘‘क्यों मजाक बनाता है मेरी नईनवेली का तोतले? वह बुरा नहीं मानती. फिर इस का मतलब क्या?’’ प्रश्रय ने उस की पीठ पर हंसते हुए एक धौल जमा दी.

‘‘क्यों भई, प्रैशर सिन्हा तो प्रैशर में आ गया. तश्तरी तू उठ, उसे ठंडा हो कर बैठने

दे ढक्कन…’’ ‘‘लो अब एक और नामकरण मेरा… क्या है भैया,’’ वह रूठते हुए बोली.

‘‘ठीक ही तो है पर्यायवाची ही तो है तश्तरी का ढक्कन,’’ प्रश्रय हंस कर उसे सरकाते हुए बैठ गया.

‘‘यही तो काम होता है तश्तरी का,’’ दोनों हंसने लगे तो 15 साल की प्रशस्ति पीछे जा कर दोनों को हलकेहलके घूंसे बरसाने लगी. ‘‘अरे, रुकरुक ढक्कन… देख प्रैशर की तो डाई उतरने लगी है,’’ जय उस के बालों को निहारते हुए उन पर हाथ फिराने लगा.

‘‘अरे यार, मैं डाई लगाता कहां हूं जो छूटने लगेगी… पागल है क्या?’’ वह थोड़ा हैरानपरेशान हुआ, नवेली बहू मुदिता भी ध्यान लगा कर सुनने जो लगी थी. ‘‘बड़ी मार खाएगा, मेरी इज्जत का फालूदा क्यों निकालने पर लगा रहता है?’’

‘‘लो भई, प्रैशर सिन्हा तो जरा से में प्रैशर में आ गए.’’ ‘‘अबे समझ न, पैदा ही अच्छी डाई लगवा कर हुआ था, ऊपर वाले के सैलून से. अब और कितने सालों चलेगी आखिर. 30 का तू होने को आया…’’

‘‘ओए तू कितने का होने आया स्वीट सिक्सटीन?’’ वह चिढ़ कर बोला. ‘‘तुझे भी पता है शक्ल से तो स्वीट सिक्सटीन ही लगता है और दिल से ट्वैंटी वन और दिमाग से फोर्टी फोर…’’ कौलर ऊंचा करते हुए अकड़ से बोला.

‘‘मुझे तो तू हर तरह से फोर्टी फोर नहीं, फोरट्वैंटी लगता है.’’ ‘‘भई वकालत क्या यों ही चल जाएगी. इसीलिए तो ये विस्कर्स भी सफेद कलर कर रखे हैं कि लोग थोड़ा अनुभवी वकील समझें… वैसे मुझे तो तुझ से बढि़या डाई लगा कर भेजा है कुदरत ने और फिर प्रैशर सिन्हा तुझ से छोटा भी तो हूं,’’ बात मुदिता तक पहुंचाने के लिए वह तेज स्वर में बोला.

‘‘अच्छा?’’ मुदिता नाश्ते की ट्रे के साथ वहीं आ गई थी.

‘‘अच्छा क्या… केवल 4 दिनों का ही अंतर है महाराज. 1 ही महीना 1 ही साल दोनों पैदा हुए हैं…’’

‘‘तू फिर प्रैशर में आ गया, मजाक में भी सीरियस…’’ उस ने ऐसा चेहरा बनाया कि सभी हंस पड़े. फिर नाश्ते के लिए टेबल पर जा बैठे. मुदिता फिर कुछ लाने किचन में चली गई. तभी मुदिता का टेबल पर रखा मोबाइल बजने लगा.

‘‘देखना किस का है प्रश्रय… उठा लो, मैं आई.’’

‘‘दे भई,’’ प्रश्रय ने उसे मोबाइल पास करने को कहा. ‘‘गदाधर भीम…’’ कहते हुए उस ने मुसकरा कर मोबाइल उसे थमा दिया. मुदिता की बहन मुग्धा के नाम का सरलीकरण उस ने यही कर दिया था.

प्रश्रय ने उसे उंगली से चुप रहने का इशारा किया और बात करने लगा. ‘‘नमस्ते जीजू, जीजी कहां है? उस ने अपना मोबाइल जो मुझे दिया फिर उस में कुछ टाइप हो कर मेरे सिर को चला गया. अब मैं

क्या करूं. मेरा मूड बहुत औफ है जीजू, दीजिए उन को… अपना घटिया फोन मुझे हैल्प के लिए थमा दिया.’’ ‘‘देता हूं 1 सैकंड… किचन में है… पर अब क्या टाइप हो कर सैंड हो गया?’’

‘‘जीजू वह कैमिस्ट्री सर को मैं ने प्रश्न भेजने के लिए लिखा था ‘यू सैंड’

तो ई की जगह ए टाइप हो गया. फिर मैं ने ‘सौरी’ लिखा तो एस की जगह डब्ल्यू सैंड हो गया.’’ ‘‘क्याक्या मतलब…’’

‘‘यू सांड…वरी सर… अब क्या करूं जीजी के फोन ने तो कहीं का न छोड़ा… सर बहुत गुस्सा हो गए,’’ और उस का रोना शुरू हो गया. ‘‘अरे कौन वह विवेक शर्मा ही पढ़ाता है न तुम्हें…यहीं तो रहता है. मैं बात कर लूंगा. कोई गुस्सा नहीं रहेगा. अब रोना बंद करो और लो जीजी से बात करो.’’

‘‘सांड… वरी…’’ जय की हंसी छूट गई. वह पेट पकड़े हंसे जा रहा था. ‘‘मरवाएगा क्या पागल?’’

‘‘इसे बताया ही क्यों,’’ नीला के होंठों पर भी मुसकान खेलने लगी. ‘‘पहले ही बोला था मुझे दिया होता तो अब तक ठीक कर दिया होता,’’ जय किसी तरह हंसी कंट्रोल करते हुए बोला.

‘‘छांट कर ससुराल ढूंढ़ी है. सभी कलाकार हैं. हा… हा…’’ ‘‘ज्यादा मत हंस. तेरी भी शादी छांट कर ही करवाऊंगा, तोतले… जहां लड़की का तो ऐसा मुश्किल नाम होगा कि तू नाम ही सोचता रह जाएगा,’’ प्रश्रय जोर से हंसा.

‘‘ठीकवीक नहीं करना. से नया स्मार्ट फोन चाहिए अपने बर्थडे पर पहले ही वादा कर चुकी हूं. इसी 24 को तो है संडे को… मम्मी ने सब को बुलाया है. आप को भी आना है जय भैया… आंटी को भी लाना है,’’ मुदिता भी आ कर खाली सीट पर बैठ गई. ‘‘अरे बिलकुल. आप की आज्ञा शिरोधार्य.’’

‘‘यार, इतना महंगा फोन अभी बच्ची ही तो है… 11वीं क्लास कुछ होती है?’’ ‘‘लो प्रैशर सिन्हा का प्रैशर फिर बढ़ गया… अच्छा ही तो है रोजरोज गदाधर सायरन तुझे नहीं सुनना पड़ेगा.’’

‘‘अरे इतनी क्या कंजूसी. एक ही साली है, तेरी शादी के बाद उस का पहला जन्मदिन है. सही तो वादा किया है मुदिता ने,’’ नीला मुसकराई.

रविवार को मुदिता के घर जन्मदिन की खूब चहलपहल हो रखी थी. प्रश्रय और जय परिवार के साथ ठीक समय पर पहुंच गए. बर्थडे गर्ल मुग्धा बाकी मेहमानों को छोड़ उन की ओर लपकी और गिफ्ट का डब्बा मुदिता के हाथ से खींच लिया, ‘‘मेरा मोबाइल

है न…’’ ‘‘अरे रुकरुक, पहले सब से मिल… हम सब को विश तो कर लेने दे…’’

‘‘ओकेओकेओके… नमस्तेनमस्ते आंटी, आंटीजी, जीजू भैया दी… थैंकयू… थैंकयू… थैंकयू सब को,’’ उस ने गिफ्ट लेनेके उतावलेपन में इतनी जल्दीजल्दी कहा कि सभी हंस पड़े. ‘‘और मोहित कैसे हो यार? कैसी चल रही है तुम्हारी फाइनल ईयर की पढ़ाई? कभी तो मिलने आ जाया करो घर. कब हैं ऐग्जाम्स?’’ मोहित मुदिता का भाई जिसे जय मिसफिट, कभी लाल हिट कहता, घर भर में उसे वही तेज दिमाग व गोरा लगता था.

‘‘अरे छोड़ यार लाल हिट, सारे प्रश्न कौकरोचों को तुझे तो मार ही डालना है… आज के दिन भी पढ़ाई की बातें ही करेगा… बता आंटीअंकल कहां हैं? दोनों दिख नहीं रहे? नमकमिर्च… पेपरसाल्ट, मेरे अंकलआंटी तेरे मम्मीपापा रौनक कुछ कम लग रही है. मजा नहीं आ रहा,’’ जय ने कुतूहल से पूछा. तभी दोनों आ गए… सक्सेनाजी दोनों हाथों से पैंट संभालने में लगे हुए थे और गोलमटोल मैडम ने केक का डब्बा और एक पैकेट थामा हुआ था. सब से नमस्तेनमस्ते हुई पर दोनों की तूतू मैंमैं अभी भी चालू थी.

‘‘नाड़ा तेरा टूटा तो बैल्ट निकलवा मेरी आफत कर डाली. अब मेहमानों के सामने मेरी फजीहत… सब की तूही जिम्मेदार है…’’ ‘‘चुप करो अकेले तो कोई काम करते नहीं बनता. टेलर से ब्लाउज लेना न होता तो मैं जाती भी न आज तुम्हारे साथ.’’

‘‘तेरा सामान कौन लाता? कम खाया कर वरना नाड़ा न टूटता तेरा… वह तो शुक्र मना मेरा कि मैं ने तुम्हें अपनी बैल्ट मौके पर ही बांधने को दे दी.’’ ‘‘हांहां, क्यों नहीं. भूल गए पहली बार ससुराल कैसी पुरानी बैल्ट पहन कर पहुंच गए थे, जो पटाक से टूटी तो चुपके से मैं ने ही नाड़ा ला कर तुम्हारी इज्जत बचाई थी. बड़े हीरो की तरह शर्ट बिना खोंसे बाहर निकाल कर आए थे कि पुरानी बैल्ट दिखेगी नहीं… हां नहीं तो लो थामो अपना वालेट…’’

‘‘भगवान ने रात बनाई है वरना तो चौबीसों घंटे मुझ से लड़ाई ही करती रहो तुम…’’ मिसेज सक्सेना की साड़ी पर चमकती बैल्ट देख माजरा समझ सभी मुसकरा रहे थे. जय, प्रश्रय के कानों के पास मुंह ले जा कर बुदबुदा उठा, ‘‘राम मिलाए जोड़ी…’’

प्रश्रय ने उसे घूर कर देखा तो उस ने मुसकराते हुए अपने होंठों पर चुप की उंगली रख ली.

‘‘नमस्ते पापा,’’ प्रश्रय चरण छूने झुका था. ‘‘अरे रुकोरुको वरना हाथ उठा कर

आशीष दिया तो गड़बड़ हो जाएगी,’’ वे हंसे और बैठ गए.

‘‘हां अब ठीक है… खुश रहो,’’ उन्होंने दोनों हाथों से आशीर्वाद दिया.

‘‘भागवान, मौके की नजाकत समझो, जल्दी जा कर मेरी बैल्ट ला दो…’’ वे बैठ कर वालेट में नोट गिनगिन कर कुछ परेशान से दिखने लगे…

‘‘लगता है शौप में हजार के 2 नोट देने की जगह 3 नोट दे डाले मैडम ने. 10 होने चाहिए थे अब 9 ही हैं.’’ ‘‘अरे नहीं…’’

‘‘नमस्ते अंकल… लाइए मैं देखता हूं… होंगे इसी में, आंटीजी इतनी भी भुलक्कड़ नहीं… अरे, बहुत गड़बड़ कर दी है आप ने तभी तो… पिताजी की तसवीर उलटी रखेंगे तो क्या होगा. यह देखिए सारे पिताजी को सीधा कर दिया. अब गिन लीजिए पूरे हैं…’’ मिस्टर सक्सेना के साथ औरों का मुंह भी सोच में खुला रह गया था…

‘‘अरे पिताजी मतलब बापू, गांधीजी…’’ उस ने मुसकरा कर वालेट वापस थमा दिया, ‘‘अब गिनिए पूरे हैं ना?’’ ‘‘अच्छा ऐसा भी होता है क्या… मुझे तो मालूम ही नहीं था,’’ उन का मुंह अभी भी खुला हुआ था.

‘‘अरे पापा इस की तो मजाक करने की आदत है. आप को मालूम तो है…’’ प्रश्रय मुसकराया. ‘‘यह लो अपनी बैल्ट… मोहित जल्दी जा गाड़ी में मेरा चश्मा रह गया है उठा ला. नए चश्में के साथ मेरा फोटो सब से रोबदार आती है,’’ उन्होंने मिस्टर सक्सेना की ओर देखते हुए कहा.

‘‘मम्मी सिर पर लगा रखा है पहले देख तो लो…’’ ‘‘देखती कैसे इस की असली आंखें तो सर पर थीं…’’ मिस्टर सक्सेना चिढ़ कर चहक उठे.

‘‘आप भी न भाई साहब भाभी को छेड़ने का कोई मौका नहीं चूकते,’’ नीला मुसकराई. ‘‘सच में प्यारी सी हैं भाभीजी, चहकती

ही अच्छी लगती हैं,’’ जय की मम्मी शांता ने सहमति दर्शाई. ‘‘गजानन का हुक्म हो गया है, चलना ही पड़ेगा…’’ उन्होंने मुसकराते हुए जय, प्रश्रय की ओर देखा. हंसे तो हिल कर उन का शरीर भी साथ देने लगा.

‘‘जानते हो इन का असली नाम तो गजगामिनी था… नए नामकरण में क्या खाली तुम ही उस्ताद हो?’’ वह मुसकराए. ‘‘पर मैं कभी बुला ही नहीं पाया. इतने लंबे नाम से खाली गज कैसे कहता, मार ही डालती, तो गजानन पुकारने लगा,’’ वे ठठा कर हंस पड़े.

‘‘तभी तो आप के बिना माहौल जम नहीं रहा था.’’

‘‘बस 10-10 मिनट रुकिए, मम्मी वह वैशाली पहुंचने वाली है. 1 घंटा पहले एअरपोर्ट से निकली हैं… मुंबई से आ चुकी हैं. उस की दीदी और पापामम्मी भी साथ हैं… दी का कोई ऐग्जाम है. अभीअभी उस का फोन आया.’’

‘‘अरे वाह वैष्णवी… मेरी सहेली कितने सालों बाद हम मिलेंगे मम्मी…’’ मुदिता खुशी से चीखी और मम्मी के गले लिपट गई. डगमगा गया था संतुलन मम्मी का. किसी तरह मोटे शरीर को संभाला. ‘‘छोड़छोड़ मुदि, अभी तो मैं गिर जाती.’’

‘‘अच्छा… हिमांशु अंकल सपरिवार… सही मौके पर…’’ ‘‘तब तक आप लोग कुछकुछ खातेपीते रहो. कोल्ड ड्रिंक्स और लो, बहुत वैराइटी है…’’ गजगामिनी ने पास आ कर बोला.

शीतल बाल पेय बहुत हो लिया आंटीजी अब थोड़ा बड़ों का उष्णोदक मिल जाए तो… मीठा गरम पानी बढि़या… मतलब बींस पाउडर वाला या लीफ वाला…’’ ‘‘मतलब मम्मीजी कौफीचाय की तलब लग रही है इसे…’’ प्रश्रय ने मुसकराते हुए घबराई गजगामिनी को क्लीयर कर दिया.

‘‘आए, हय मैं तो घबरा ही गई कि कोई बीमारी हो गई क्या… अच्छाअच्छा मैं बनवाती हूं अभी,’’ वह मस्त लुढ़कती सी चली गई.

चाय का दौर चल ही रहा था कि मुग्धा की सहेली वैशाली, दीदी वैष्णवी, सुधांशु अंकल व ललिता आंटी आ गए. 3 साल पहले वे दिल्ली इसी कालोनी में रहते थे. बच्चों का स्कूल में भी साथ हो गया तो दोनों परिवारों में अच्छी दोस्ती हो गई थी. फिर सुधांशुजी का परिवार अहमदाबाद शिफ्ट हो गया. वहां प्रोफैसर पद

पर यूनिवर्सिटी में उन की नियुक्ति हो गई थी. सभी अपने पुराने दोस्तों से मिल कर प्रसन्न हो गए. सभी से उन का परिचय कराया जाने लगा. मुदिता वैष्णवी को ले कर प्रश्रय के पास

ले आई, ‘‘मिल, ये तेरे जीजाजी हैं, तू तो शादी में थी नहीं.’’

‘‘नमस्ते जीजाजी… मी वैष्णवी… हाऊ हैंडसम यू आर… हये बहुत लकी है मुदिता तू यार.’’

‘‘अब नजर न लगा मेरे पति को, क्या पता तू मुझ से भी लकी निकले, मुझ से सुंदर जो है.’’ ‘‘इन से मिलो ये हैं जय भैया. प्रश्रय के दोस्त बड़े मजाकिया स्वभाव के हैं. जानती हो प्रश्रय को ये प्रैशर सिन्हा और प्रश्रय इन्हें तोतला पुकारते हैं बचपन से.’’

‘‘हाय, माइसैल्फ वैष्णवी एलएलबी. मुदिता की टैंथ ट्वैल्थ की फ्रैंड,’’ वैष्णवी ने नमस्ते की. ‘‘नमस्ते, पर आप को बता दूं अब मैं तोतला बिलकुल नहीं हूं… वलना तोल्त में तेस तैसे ललता तिनियल लायल जो हूं.’’

वैष्णवी हंस पड़ी. ‘‘क्या मैं जान सकता हूं कौन सा मीठा साबुन चख कर आप आई हैं मुंबई से?’’

‘‘आप की उजली दंत कांति ने मुझे प्रश्न के लिए मजबूर कर दिया,’’ वह गंभीर होते

हुए बोला. ‘‘मीठा साबुन… मतलब?’’ वह सोचने लगी थी. साथ ही मुदिता भी. फिर बोली, ‘‘ओ गुड आप भी लौयर हैं. मेरी भी कानून में बहुत रुचि है, व्यक्ति को सिविलाइज्ड बनाता है कानून. इसीलिए मैं ने एलएलबी किया. अब सिविल जजी का ऐग्जाम ही देने आई हूं यहां.’’

‘‘अरे ठाट से वकालत कीजिए, ढेरों पैसे बनाइए, जजी में क्या रखा है? आप के पास जो केस आएगा समझो जीताजिताया है.’’ ‘‘वह कैसे?’’

‘‘ओ जय भैया, बातें बाद में बनाना. किस से बातें कर रहे हो… यह तो बताओ पहले… ‘वैष्णवी’ बोल के तो दिखाओ, तब मानेंगे हम वरना कुछ तो है बचपन का वह असर अभी भी हम तो यही कहेंगे… मालूम है अब बस आप नया नाम ही दे दोगे, चलो वही दे दो इसे भी,’’ वह मुसकराई.

‘‘मोदीजी माफी…’’ उस ने हंसते हुए हाथ जोड़ दिए. छोटी बहन वैशाली ने जय का प्रश्न सुन लिया था. पापा सुधांशु को पूछने भी चली गई. जहां पहले ही वैष्णवी की शादी के लिए सुधांशु और ललिता को चिंतित देख गजगामिनी नीला और जय की शादी के लिए परेशान शांता सभी अपने सुयोग्य ऐडवोकेट लड़के जय की तारीफ और उस के मजाकिया स्वभाव की भी चर्चा

किए बैठे थे. ‘‘ओ गौड मतलब मंजन टूथपेस्ट… मीठा साबुन? हा… हा… कोलगेट,’’ प्रोफैसर सुधांशु जवाब दे कर हंसे थे.

‘‘मुझे भी मिलाओ उस भैया से,’’ मुग्धा व वैशाली उसे बुलाने चलीं आईं. ‘‘चलचल हीरो बन रहा था न आज तेरी बात ही पक्की करवा देता हूं इसी वैष्णवी से… शांता आंटी की तेरी शादी की चिंता खत्म…

बेटा अब बोल के दिखा नाम या कोई और नाम रख,’’ प्रश्रय उस के कानों में फुसफुसा कर हंसे जा रहा था. वह जय को पकड़ कर वहां ले गया जहां सुधांशु और उस के ससुर मिस्टर सक्सेना पत्नियों के साथ बैठे थे.

हंसीमजाक चलता रहा. केक कटा, खानापीना, नाचगाना और

खूब मस्ती होती रही. बड़ों ने उसी बीच जय और वैष्णवी की रजामंदी ले कर उन की शादी भी तय कर दी. ‘‘जय भैया अब तो नाम लेना ही पड़ेगा, बोलिए वैष्णवी… या नाम बिगाडि़ए हमारे जैसा…’’

‘‘बेशोन दही या नवी मुंबई जो पसंद हो…’’ झट से बोल कर जय जोर से हंसा. सारे बच्चे, बड़े ‘बेशोन दही’ और ‘नवी मुंबई’ कह कर वैष्णवी को चिढ़ाने लगे. ये… ये… उस ने सोफे पर बैठे हुए एक कुशन से जय पर सटीक निशाना लगाया और फिर हंसते हुए कहा, ‘‘अरे ये जय नहीं प्रलय… और फिर कुशन में अपना मुंह छिपा लिया.’’

फिर तो सब का कुशन एकदूसरे पर फेंकने का खेल चल पड़ा. हुड़दंग का जंगल लौ अचानक वैष्णवी को सिविल लौ से और भी अच्छा लगने लगा था.

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Sad Story: तिलांजलि: क्यों धरा को साथ ले जाने से कतरा रहा था अंबर

लेखिका- प्रेमलता यदु

धरा और अंबर की शादी को अभी सप्ताह भर भी नहीं गुजरा था कि उस के लौटने का वक्त आ गया. उसे आज ही बैंगलोर के लिए निकलना था. वह बैंगलोर की एक आईटी कंपनी में कार्यरत था. वहीं धरा अभी अंबर को ठीक से देख भी नहीं पाई थी, देखती भी कैसे…? पूरा घर नातेरिश्तेदारों से जो भरा हुआ था. हर दिन कोई न कोई रस्म अब भी जारी थी, जो समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी. इधर इतनी भीड़भाड़ और शोरशराबे के बीच भला धरा कैसे अंबर से अपने मन की बात कह पाती. कैसे कहती कि मुझे यहां छोड़ कर मत जाओ… या मैं भी तुम्हारे संग चलूंगी.

उधर अंबर भी सारा दिन दोस्तयारों में घिरा रहता. रात को कमरे में आता भी तो धरा उस के गंभीर स्वभाव और संकोचवश कुछ कह नहीं पाती. वह अंबर से पूछना चाहती थी. उस ने ज्यादा दिनों की छुट्टी क्यों नहीं ली? लेकिन पूछ न सकी, वैसे तो अंबर और धरा का मधुर मिलन हो चुका था, लेकिन अब भी दोनों के बीच एक लंबा फासला था, जो धरा के लिए अकेले तय कर पाना संभव नहीं था. हमारे यहां की अरेंज मैरिज‌ में यह सब से बड़ी खासियत है या विडंबना…? मालूम नहीं… दिल मिले ना मिले, लेकिन शरीर जरूर मिल जाते हैं.

वैसे, धरा अंबर को उसी दिन से दिल ही दिल में चाहने लगी थी, जिस दिन से उस की और अंबर की शादी तय हुई थी. कालेज में यह बात सभी जानने लगे थे. यहां तक कि धरा के स्टूडेंट्स भी क‌ई बार उसे अंबर के नाम से छेड़ने लगते. धरा गर्ल्स कालेज के हिंदी विभाग में हिंदी साहित्य की असिस्टेंट प्रोफेसर थी.

अंबर कुछ कहे बगैर और धरा से बिना मिले ही चला गया. इतने भरेपूरे और चहलपहल वाले घर में भी धरा स्वयं को अकेला महसूस करने लगी. वह अंबर के फोन का इंतजार करती रही. अंबर का फोन भी आया, परंतु बाबूजी के मोबाइल पर, सब ने उस से बात की बस… धरा रह गई. सासू मां ने केवल इतना बताया कि अंबर कुशलतापूर्वक बैंगलोर पहुंच गया है. यह सुन धरा चुप रही.

दिन बीतते ग‌ए, धरा यहां बिजनौर, उत्तर प्रदेश में और अंबर वहां बैंगलोर में, दोनों अपनेअपने काम में व्यस्त रहने लगे, लेकिन धरा को हरदम अंबर से उस की यह दूरी खलने लगी. वह उस से मिलने और बातें करने को बेताब रहती, किंतु धरा के मोबाइल पर अंबर कभी फोन ही नहीं करता.

जब भी वह फोन करता, बाबूजी या सासू मां को ही करता. यदाकदा सासू मां धरा को फोन थमा देती, लेकिन सब के सामने धरा कुछ कह ही नहीं पाती, यह देख सासू मां और बाबूजी वहां से हट जाते. उस के बाद भी अंबर उस से कभी प्यारभरे दो शब्द नहीं कहता और धरा के मन में हिलोरें मार रहे प्रेम का सागर थम जाता.

अंबर का यह व्यवहार धरा की समझ से परे था. धरा अपनी ओर से पहल करती हुई जब कभी भी अंबर को फोन करती तो वह फोन ही नहीं उठाता, भूलेभटके कभी फोन उठा भी लेता तो कहता, “मैं मीटिंग में हूं. मैं अभी बिजी हूं.” और कभीकभी तो वह धरा को बुरी तरह से झिड़क भी देता. इन सब बातों की वजह से धरा के मन में उमड़तेघुमड़ते मनोभाव उसे चिंतित होने पर मजबूर करते, वह सोचती कोई भला इतना व्यस्त कैसे हो सकता है कि उस के पास अपनी नईनवेली पत्नी से बात करने तक का भी वक्त ना हो.

एक दिन तो हद ही हो गई, जब सासू मां ने कहा, “देखो बहू तुम बारबार अंबर को फोन कर के उसे परेशान ना किया करो. वहां वो काम करेगा या तुम से प्रेमालाप.”

ऐसा सुनते ही धरा तिलमिला उठी और उस दिन के उपरांत वह फिर दोबारा कभी अंबर को फोन नहीं की.

इन्हीं सब हालात के बीच हिचकोले खाती कालेज और गृहस्थी की गाड़ी चलती रही. अंबर अपनी मरजी से दोचार महीने में आता. 1-2 दिन रुकता और फिर वापस चला जाता, कभी धरा संग चलने की इच्छा जाहिर भी करती तो वह यह कह कर मना कर देता कि तुम साथ चलोगी तो यहां मांबाबूजी अकेले हो जाएंगे, उन की देखभाल कौन करेगा? और तुम्हारे कालेज से भी तुम्हें छुट्टी लेनी पड़ेगी.”

उस के आगे फिर धरा कुछ नहीं कहती. धरा अपनी नाकाम हो रही शादी को बचाने के लिए परिस्थितियों से समझौते करने लगी. उस का अधूरापन ही अब उस की नियति बन गई.

एक ही शहर में ससुराल और मायका होने के कारण छुट्टी वाले दिन कभीकभी धरा अपना अकेलापन दूर करने मायके चली जाती.

मां से जब भी वह अंबर के बारे में कुछ कहती, तो मां उलटा उसे ही समझाइश देने लगती, “कहती, अब जो है अंबर है और तुझे अपनी जिंदगी उसी के साथ ही गुजारनी है, इसलिए वह बेकार की बातों पर ध्यान ना दे, पूजापाठ करे, व्रत करे, भगवान में ध्यान लगाए, इसी में उस की भलाई और दोनों परिवारों का मान है.”

मां से यह सब सुन धरा मन मसोस कर रह जाती.

शादी के 2 साल बाद धरा की गोद हरी हो गई और उस ने सृजन को जन्म दिया. जिस ने धरा की जिंदगी के खालीपन को न‌ई उमंगों से भर दिया और धरा मुसकरा उठी. उस ने 6 महीने का कालेज से मातृत्व अवकाश भी ले लिया, लेकिन अंबर में अब भी कोई बदलाव नहीं था.

कुछ सालों के बाद धरा को कालेज की ओर से बैंगलोर में आयोजित हो रहे सेमिनार में मुख्य प्रवक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया. शादी के इतने साल बाद ही सही, कुछ दिनों के लिए तो उसे अंबर के साथ स्वतंत्र रूप से रहने को मिलेगा.

यह सोच कर वह मन ही मन पुलकित हो उठी.आंखों में प्रेम संजोए धड़कते दिल से अंबर को इत्तला किए बगैर सृजन के संग वह बैंगलोर जा पहुंची और जैसे ही उस ने डोर बेल बजाई…

अचानक मोबाइल का रिंग बज उठा, जिस से धरा की तंद्रा भंग हुई और वह वर्तमान में लौट आई.

सृजन का फोन था. फोन उठाते ही सृजन बोला, “मम्मी आप तैयार रहिए. बस, मैं कुछ ही देर में वहां पहुंच रहा हूं.”

सृजन के फोन रखते ही धरा अपना मोबाइल एक ओर रखती हुई होंठों पर हलकी सी मुसकान और नम आंखों के संग वहीं बिस्तर पर बैठी रही, उसे ऐसा लगा मानो उस ने जिंदगी की सब से अहम जंग जीत ली हो. यह उस की कड़ी मेहनत और संघर्ष का नतीजा था कि सृजन यूपीएससी उत्तीर्ण कर आईपीएस अधिकारी बन गया. वह उस मुकाम पर पहुंच गया, जहां वो सदा से ही उसे देखना चाहती थी. धरा के नयनों के समक्ष दोबारा एकएक कर फिर अतीत के पन्ने उजागर होने लगे.

उसे वह कठिन वक्त स्मरण हो आया, जब सृजन को ले वह अंबर के पास बैंगलोर पहुंची. वहां पहुंचने पर उस ने जो देखा उस के होश उड़ गए, उस के पैरों तले जमीन खिसक गई और इतने सालों का विश्वास क्षण भर में चूरचूर हो गया. अंबर की यहां अपनी एक अलग ही दुनिया थी, जहां धरा और सृजन के लिए कोई स्थान नहीं था.

धरा बोझिल मन से सेमिनार अटेंड कर बिजनौर लौट आई, लेकिन वह ससुराल ना जा अपने मायके आ गई. वह जिंदगी के उस दोराहे पर खड़ी थी, जहां एक ओर उस का आत्मसम्मान था और दूसरी ओर पूरे समाज के बनाए झूठे खोखले आदर्श, जिसे धरा के अपने ही लोग मानसम्मान का जामा पहनाए उसे स्त्री धर्म और मां के कर्त्तव्य का पाठ पढ़ा रहे थे.

विषम परिस्थिति में सब ने उस का साथ छोड़ दिया. यहां तक कि उस के अपने जिन से उस का खून का रिश्ता था, उन लोगों ने भी उस से मुंह मोड़ लिया. जिस घर में उस ने जन्म लिया, जहां वह खेलकूद कर बड़ी हुई, आज वही घर उस के लिए पराया हो ग‌या था.

धरा के पापा आराम कुरसी पर आंखों पर ऐनक चढ़ाए दोनों हाथों को बांधे, सिर झुकाए चुपचाप शांत भाव से बैठे सब देखसुन रहे थे और मां उन्हें उलाहना दिए जा रही थी, “और पढ़ाओ बेटी को, सुनो, क्या कह रही है वह. अपने ससुराल में अब वह नहीं रहेगी. अब क्यों बुत बने बैठे हो, नाक कटाने पर आमादा है तुम्हारी लाड़ली, उसे कुछ कहते क्यों नहीं?”

पूरा घर धरा को यह समझाने में लगा हुआ था कि परिवार को सहेजना और बनाए रखना हर नारी का परम धर्म है. स्त्री की पहचान और उस के बच्चे का उज्ज्वल भविष्य पति के संग हर परिस्थिति में समझौता करने में है.

उसी नारी की मान और पूछ होती है, जो अपने घर की दहलीज मृत्यु के उ‌परांत लांघती है, परंतु धरा ने तो जैसे हठ ही पकड़ ली थी कि वह अब ससुराल में किसी भी हाल में नहीं रहेगी.

धरा की सासू मां अपनी भौंहें मटकाती और हाथ नचाती हुई बोली, “औरत जात को इतना घमंड शोभा नहीं देता और कौन सा अंबर ने उस औरत के संग ब्याह रचा लिया है. साथ ही तो रह रहा है ना‌… तो क्या हुआ, मर्द ऐसा करते हैं? यहां तुझे किस बात की कमी है. तुम यहां हमारे साथ रहो, किसी को कुछ पता नहीं चलेगा और समाज में भी मानप्रतिष्ठा बनी रहेगी.”

अंबर को अपने किए पर जरा भी अफसोस नहीं था. वह पिता के रुप में सृजन का सारा खर्च उठाने को तैयार था, लेकिन वह अभी भी यही चाहता था कि धरा पहले की तरह उस के घर में उस के मातापिता के साथ रहे, उन की सेवा करे. जिस से समाज में उन का मान बना रहे, लेकिन इस बार धरा यह ठान चुकी थी कि वह किसी की नहीं सुनेगी, केवल अपने मन का ही करेगी.

धरा ना ससुराल लौटी और ना ही अपने मायके में रही. उस ने अकेले ही सृजन की परवरिश की. धरा पूर्ण रूप से अतीत में डूब चुकी थी, तभी डोर बेल बजी.

धरा के दरवाजा खोलते ही सृजन धरा से लिपटते हुए बोला, ” डियर मम्मा ये क्या है…? आप अभी तक तैयार नहीं हुईं… हमें बस थोड़ी ही देर में निकलना है.”

धरा मुसकराती हुई बोली, “बस अभी तैयार होती हूं आईपीएस साहब.”

सृजन की पोस्टिंग लखनऊ हो गई थी और वह चाहता था कि उस की मां धरा उस के साथ ही रहे. तभी सृजन का मोबाइल बजा, फोन उस के पिता अंबर का था.

सृजन के फोन रिसीव करते ही अंबर करुणा और याचना भरे शब्दों में कहने लगा, “बेटा अब मेरी सेहत ठीक नहीं रहती है. मैं अकसर बीमार रहने लगा हूं और अब बहुत अकेला भी हो गया हूं. तुम मुझे भी अपने साथ ले चलो.”

सृजन बोला, “पापा, आप चिंता ना करें. आप की दवाओं का सारा खर्च मैं उठा लूंगा. आप की देखभाल के लिए पूरी व्यवस्था कर दूंगा, लेकिन अब आप हमारी दुनिया का हिस्सा नहीं बन सकते. आप हमारे साथ नहीं रह सकते,” कहते हुए सृजन ने फोन धरा को थमा दिया.

धरा के फोन पर आते ही अंबर बोला, “धरा, अब भी हम पतिपत्नी हैं. हमारे बीच तलाक नहीं हुआ है.”

अंबर के ऐसा कहने पर धरा लंबी सांस लेती हुई बोली, “कानूनी तौर पर भले ही हमारा रिश्ता टूटा नहीं है. हम अब भी पतिपत्नी हैं, किंतु मानसिक रूप से तो यह रिश्ता कब का टूट चुका है. मैं तो काफी पहले ही इस रिश्ते को तिलांजलि और तुम्हारा परित्याग कर चुकी हूं. अब इसे जोड़ पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं.”

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Hindi Fictional Story: लौटते कदम

Hindi Fictional Story: जीवन में सुनहरे पल कब बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता है. वक्त तो वही याद रहता है जो बोझिल हो जाता है. वही काटे नहीं कटता, उस के पंख जो नहीं होते हैं. दर्द पंखों को काट देता है.

शादी के बाद पति का प्यार, बेटे की पढ़ाई, घर की जिम्मेदारियों के बीच कब वैवाहिक जीवन के 35 साल गुजर गए, पता ही नहीं चला.

आंख तो तब खुली जब अचानक पति की मृत्यु हो गई. मेरा जीवन, जो उन के आसपास घूमता था, अब अपनी ही छाया से बात करता है.

पति कहते थे, ‘सविता, तुम ने अपना पूरा वक्त घर को दे दिया, तुम्हारा अपना कुछ भी नहीं है. कल यदि अकेली हो गई तो क्या करोगी? कैसे काटोगी वो खाली वक्त?’

मैं ने हंसते हुए कहा था, ‘मैं तो सुहागिन ही मरूंगी. आप को रहना होगा मेरे बगैर. आप सोच लीजिए कि कैसे रहेंगे अकेले?’ किसे पता था कि उन की बात सच हो जाएगी.

बेटा सौरभ, बहू रिया और पोते अवि के साथ जी ही लूंगी, यही सोचती थी. जिंदगी ऐसे रंग बदलेगी, इस का अंदाजा नहीं था.

बहू के साथ घर का काम करती तो वह या तो अंगरेजी गाने सुनती या कान में लीड लगा कर बातें करती रहती. मेरे साथ, मुझ से बात करने का तो जैसे समय ही खत्म हो गया था.

कभी मैं ही कहती, ‘रिया, चल आज थोड़ा घूम आएं. कुछ बाजार से सामान भी लेना है और छुट्टी का दिन भी है.’

उस ने मेरे साथ बाहर न जाने की जैसे ठान ली थी. वह कहती, ‘मां, एक ही दिन तो मिलता है, बहुत सारे काम हैं, फिर शाम को बौस के घर या कहीं और जाना है.’

बेटे के पास बैठती तो ऐसा लगता जैसे बात करने को कुछ बचा ही नहीं है. एक बार उस से कहा भी था, ‘सौरभ, बहुत खालीपन लगता है. बेटा, मेरा मन नहीं लगता है,’ कहतेकहते आंखों में आंसू भी आ गए पर उन सब से अनजान वह बोला, ‘‘अभी पापा को गए 6 महीने ही तो हुए हैं न मां, धीरेधीरे आदत पड़ जाएगी. तुम घर के आसपास के पार्क क्यों नहीं जातीं. थोड़ा बाहर जाओगी, तो नए दोस्त बनेंगे, तुम को अच्छा भी लगेगा.’’

सौरभ का कहना मान कर घर से बाहर निकलने लगी. पर घर आ कर वही खालीपन. सब अपनेअपने कमरे में. किसी के पास मेरे लिए वक्त नहीं.

जहां प्यार होता है वहां खुद को सुधारने की या बदलने की बात भी खयाल में नहीं आती. पर जब किसी का प्यार या साथ पाना हो तो खुद को बेहतर बनाने की सोच साथ चलती है. आज पास्ता बनाया सब के लिए. सोचा, सब खुश हो जाएंगे. पर हुआ उलटा ही. बहू बोली, ‘‘मां, यह तो नहीं खाया जाएगा.’’

यह वही बहू है, जिसे खाना बनाना तो दूर, बेलन पकड़ना भी मैं ने सिखाया. इस के हाथ की सब्जी सौरभ और उस के पिता तो खा भी नहीं पाते थे.

सौरभ कहता, ‘‘मां, यह सब्जी नहीं खाई जाती है. खाना तुम ही बनाया करो. रिया के हाथ का यह खाना है या सजा?’’

जब रिया के पिता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी तब उसे दर्द से संभलने में मैं ने उस का कितना साथ दिया था. तब मैं अपने पति से कहती, ‘रिया का ध्यान रखा करो. पिता को यों अचानक खो देना उस के लिए बहुत दर्दनाक है. अब आप ही उस के पिता हैं.’

मेरे पति भी रिया का ध्यान रखते. वे बारबार अपनी मां से मिलने जाती, तो पोते को मैं संभाल लेती. उस की पढ़ाई का भी तो ध्यान रखना था न.

इतना कदम से कदम मिला कर चलने के बाद भी आज यह सूनापन…

एक दिन बहू से कहा, ‘‘रिया, कालोनी की औरतें एकदूसरे के घर इकट्ठी होती हैं. चायनाश्ता भी हो जाता है. पिछले महीने मिसेज श्वेता की बहू ने अच्छा इंतजाम किया था. इस बार हम अपने घर सब को बुला लें क्या?’’

सुनते ही रिया बोली, ‘‘मां, अब यह झमेला कौन करेगा? रहने दो न, ये सब. मैं औफिस के बाद बहुत थक जाती हूं.’’

मैं ने कहा, ‘‘आजकल तो सब की बहुएं बाहर काम पर जाती हैं, पर उन्होंने भी तो किया था न. चलो, हम नहीं बुलाते किसी को, मैं मना कर देती हूं.’’

उस दिन से मैं ने उन लोगों के बीच जाना छोड़ दिया. कल मिसेज श्वेता मिल गईं तो मैं ने उन से कहा, ‘‘मुझे वृद्धाश्रम जाना है, अब इस घर में नहीं रहा जाता है. अभी पोते के इम्तिहान चल रहे हैं, इस महीने के आखिर तक मैं चली जाऊंगी.’’

यह सुन कर मिसेज श्वेता कुछ भी नहीं कह पाई थीं. बस, मेरे हाथ को अपने हाथ में ले लिया था. कहतीं भी क्या?

सबकुछ तय कर लिया था. फिर भी जाते समय हमारे बच्चे को हम से कोई तकलीफ न हो, हम यही सोचते रहे. वक्त भी बड़े खेल खेलता है. वृद्धाश्रम का फौर्म ला कर रख दिया था. सोचा, जाने से पहले बता दूंगी.

आज दोपहर को दरवाजे की घंटी बजी. ‘इस समय कौन होगा?’ सोचते हुए मैं ने दरवाजा खोला तो सामने बहू खड़ी थी. मुझे देखते ही बोली, ‘‘मां, मेरी मां को दिल का दौरा पड़ा है. वे अस्पताल में हैं. मुझे उन के पास जाना है. सौरभ पुणे में है, अवि की परीक्षा है, मां, क्या करूं?’’ कहतेकहते रिया रो पड़ी.

‘‘तू चिंता मत कर. अवि को मैं पढ़ा दूंगी. छोटी कक्षा ही तो है. सौरभ से बात कर ले वह भी वहीं आ जाएगा.’’

4 दिनों बाद जब रिया घर आई तो आते ही उस ने मुझे बांहों में भर लिया. ‘‘क्या हो गया रिया, तुम्हारी मां अब कैसी है?’’ उस के इस व्यवहार के लिए मैं कतई तैयार नहीं थी.

‘‘मां अब ठीक हैं. बस, आराम की जरूरत है. अब मां ने आप को अपने पास बुलाया है. भाभी ने कहा है, ‘‘आप दोनों साथ रहेंगी तो मां को भी अच्छा लगेगा. वे आप को बहुत याद कर रही थीं.’’

रिया ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘मां, इस घर को आप ने ही संभाला है. आप के बिना ये सब असंभव था. यदि आप सबकुछ नहीं संभालतीं तो अवि के एक साल का नुकसान होता या मैं अपनी मां के पास नहीं जा पाती.’’

‘‘अपने बच्चों का साथ नहीं दिया तो यह जीवन किस काम का. चल, अब थोड़ा आराम कर, फिर बातें करेंगे.’’

अगले दिन सुबह जब रिया मेरे साथ रसोई में काम कर रही थी, तो हम दोनों बातें कर रहे थे. दोपहर में तो घर सूना होता है पर आज हर तरफ रौनक लग रही थी. सोचा, चलो, मिसेज श्वेता से मिल कर आती हूं.

उन के घर गई तो उन्होंने बड़े प्यार से पास बिठाया और बोलीं, ‘‘कल रात को रिया हमारे घर आई थी. मुझ से और मेरी बहू से पूछ रही थी कि हम ने अपने घर कितने लोगों को बुलाया और पार्टी का कैसा इंतजाम किया. इस बार तुम्हारे घर सब का मिलना तय कर के गई है. तुम्हें सरप्राइज देगी. तुम्हारे दिल का हाल जानती हूं, इसलिए तुम्हें बता दिया. बच्चे अपनी गलती समझ लें, यही काफी है. हम इन के बगैर नहीं

जी पाएंगे.’’

‘‘यह तो सच है, हम सब को एकदूसरे की जरूरत है. सब अपनाअपना काम करें, थोड़ा वक्त प्रेम को दे दें, तो जीवन आसान लगने लगता है.’’

मिसेज श्वेता के घर से वापस आते समय मुझे धूप बहुत सुनहरी लग रही थी. लगा कि आज फिर वक्त के पंख लग गए हैं.

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