Family Story: सबकुछ है पर कुछ नहीं- राधिका को किस चीज की कमी थी

Family Story: ‘‘दीदी,जीजाजी कहा हैं? फोन भी औफ कर रखा है.’’

‘‘बिजी होंगे किसी मीटिंग में, तुम बैठो तो सही, क्या लोगे?’’

‘‘जीजाजी के साथ ही बैठूंगा अब दीदी. मां ने जीजाजी के लिए ये कुछ चीजें भेजी हैं. अच्छा मैं आता हूं अभी,’’ कह कर दिनेश अपनी बड़ी बहन राधिका, जो एक बड़े मंत्री की पत्नी थी, को बैग पकड़ा कर विशालकाय कोठी से बाहर निकल गया.

राधिका ने उत्साह से बैग खोल कर मां की भेजी हुई चीजों पर नजर डाली. सब चीजें उस के पति अमित की पसंद की थीं, उस की खुद की पसंद की एक भी चीज नहीं थी. मां ने सबकुछ अपने मंत्री दामाद के लिए भेजा था, अपनी बेटी के लिए कुछ भी नहीं.

अजीब सा मन हुआ राधिका का. ठंडी सांस लेते हुए बैग एक किनारे रख वहीं सोफे पर बैठ कर अमित के पीए को फोन मिलाया तो उस ने अमित को बता दिया.

‘‘हां बोलो, राधिका, क्या हुआ?’’ अमित

ने पूछा.

‘‘बस, यही याद दिलाना था कि कल सुजाता के स्कूल जाना है, कोई प्रोग्राम मत रखना और हां, दिनेश भी आया है.’’

‘‘हांहां, चलेंगे कल. अभी बिजी हूं बाद में बात करता हूं,’’ कह कर अमित ने फोन रख दिया.

बेटी सुजाता के स्कूल का वार्षिकोत्सव है कल. अमित को याद दिला दिया. वे चलेंगे यह बड़ी बात है नहीं तो अमित इतने व्यस्त रहते हैं कि राधिका ने उन से कोई उम्मीद रखनी छोड़ ही चुकी है… पता नहीं कल कैसे समय निकाल पाएंगे. हो सकता है सुजाता की लगातार जिद का असर हो… वैसे तो उसे आजकल यही लगता है कि कहने के लिए उस के पास सबकुछ है पर हकीकत में नहीं है.

राधिका के सारे रिश्तेदार, दोस्त, परिचित, पड़ोसी सब के लिए वह बस राज्य सरकार के एक मंत्री की पत्नी है. वह तरसती रहती है कि काश, किसी के दिल में उस के लिए, राधिका के लिए, कोई स्थान हो. वह हर तरफ  से अमित से काम निकलवाने वाले लोगों से घिरी रहती है. उस के अपने मायके वाले बस अमित की की ही जीवनशैली, पद, अधिकार में रुचि रखते हैं, उस की तथाकथित दोस्त, परिचित सिर्फ अमित की ही बात करना पसंद करते हैं.

उस के युवा बच्चे सुजाता और सुयश भी पिता के पद के अहंकार में डूबे मां की ममता को व्यर्थ की चीज समझते हैं. वह जब भी अपने बच्चों से उन के स्कूल, दोस्तों की बातें करना चाहती है तो बच्चों के अहं और दर्दभरे स्वर से उसे लगता ही नहीं कि वह अपने बच्चों से बात कर रही है. लगता है किसी मंत्री के घमंडी बच्चों से बात कर रही है. आजकल वह ज्यादातर चुप ही रहती है. किस से बात करें और क्या बात करे. सब की तो उस के मंत्री पति में ही रुचि है, उस का अपना तो कहीं कोई है ही नहीं… वह अपने विचारों में गुम थी. अमित और दिनेश अंदर आते दिखे. दिनेश ने आते हुए कहा, ‘‘देखो दीदी, जीजाजी को जबरदस्ती पकड़ कर ले आया हूं, अब साथ में लंच करेंगे,’’

आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी अमित मुसकराते हुए बोले, ‘‘देख लो राधिका, तुम्हारा भाई मुझे औफिस से जबरदस्ती उठा लाया है. बोला आप से मिलने ही तो आया हूं.’’

‘‘हां जीजाजी, मैं आप से ही मिलने आया था. दीदी का क्या है, उन से तो कभी भी मिल सकते हैं. दीदी, अब लंच लगवा दो.’’

अमित जब तक  फ्रैश हो कर आए खाना लग चुका था. तीनों खाने बैठे तो दिनेश ने कहा, ‘‘जीजाजी, मैं आज ही वापस चला जाऊंगा. बस आप याद रखना आप को मेरे दोस्त का काम करवाना ही पड़ेगा.’’

राधिका ने पूछा, ‘‘कौन सा काम दिनेश?’’

‘‘आप रहने दो दीदी, यह जीजाजी के बस का ही है, मैं ने उन्हें रास्ते में समझा दिया है सब.’’

अमित मुसकराते हुए खाना खाते रहे. थोड़ी देर में बच्चे भी आ गए, वे भी खाना खा कर सब के साथ बैठ गए.

सुजाता अगले दिन होने वाले स्कूल के प्रोग्राम के बारे में उत्साह से बताने लगी, ‘‘कल मेरे दोस्त भी तो देखें मेरे डैड क्या चीज हैं. एक मंत्री के जलवे मेरी टीचर्स भी तो देखें.’’

सुजाता खिलखिला रही थी, सुयश भी दिनेश से बातों में व्यस्त था. राधिका चुपचाप सब की बातें सुन रही थी.

दिनेश ने कहा, ‘‘जीजाजी, आप के लिए मां ने कुछ चीजें भेजी हैं, जरूर खाना.’’

अभी कुछ दिन पहले तक ऊंची जातियों के जो साथी बच्चों से कन्नी सी काटते थे, अमित के मंत्री बनते ही उन से दोस्ती बढ़ाने लगे थे.

‘‘अच्छा? उन्हें मेरा धन्यवाद कहना.’’

अमित की आकर्षक हंसी को निहारती रह गई राधिका कि अमित का संपूर्ण व्यक्तित्व कितना आकर्षक व प्रभावशाली है. हालांकि उन में थोड़ा सा गांव का टच आता है पर फिर भी कीमतों कपड़ों में वह छिप जाता है. कितनी मेहनत से पहुंचे हैं यहां तक और अब जब

जीवन में हर सुखसुविधा है तो उसे क्यों लगता

है उस के पास कुछ नहीं है. उस से अच्छी तो वह तब थी जब छोटे से घर में रहती थी और अमित उस के चारों और मंडराता थे. उस ने अपनी सोच को झटक दिया. अमित उठ खड़े हुए थे, ‘‘राधिका, आने में देर होगी, डिनर शायद घर न करूं.’’

उन के उठते ही दिनेश भी जाने के लिए खड़ा हो गया, तो राधिका बोल पड़ी, ‘‘दिनेश, तुम तो रुको… तुम तो बैठे ही नहीं मेरे पास.’’

‘‘नहीं दीदी, मैं भी निकलता हूं,’’ कह वह अमित के साथ ही निकल गया. बच्चे अपनेअपने रूम में चल गए, वह अकेली खड़ी रह गई, फिर वह भी अपने बैडरूम में चली गई.

अगले दिन सुजाता अमित और राधिका के साथ उस के स्कूल पहुंची. स्कूल के

गेट पर ही अमित का भव्य स्वागत हुआ. राधिका भी मुसकरा कर सब के अभिवादन का जवाब देती रही. ऐसे में उसे हमेशा महसूस होता था जैसे

वह कोई मशीन है या कठपुतली है अथवा

रोबोट, मन में कोई उमंग नहीं. बस, सब अमित को घेरने की कोशिश करते रहते थे और वह सजीधजी अपनी नकली मुसकराहट बिखरेती,

उन के साथ खड़े रहने की कोशिश करती रह जाती थी.

स्कूल में पता नहीं कितने बच्चों ने, कितनी टीचर्स ने अमित के साथ फोटो खिंचवाए. वहां सब उन के आसपास पहुंचने की कोशिश करते रहे. अमित का सुरक्षा घेरा आज अमित के कहने पर कुछ दूरी पर ही रहा. समारोह में आने के लिए उन्हें विशेष रूप से धन्यवाद कहा गया.

प्रोग्राम खत्म होने पर राधिका रोबोट की तरह उन के साथ चलती घर आ गई. घर आ कर देखा अमित की 2 चचेरी बहनें आई हुई थीं. राधिका उन की आवभगत में व्यस्त हो गई.

बड़े मंत्री की पत्नी बनना भी कांटों का ताज पहनना है यह वह भलीभांति समझ गई थी पर कुशल पत्नी की भांति वह बिना मीनमेख निकाले जानबूझ कर भी मक्खी निगल लेती थी. दिनरात के मेहमानों ने उस की नाक में दम कर रखा था. पहले भी लोग आते थे पर कम और उन के अपने स्तर के. अब तरहतरह के लोग आतेजाते थे.

कभी कोई आत्मीय इंटरव्यू के लिए चला आ रहा है तो कभी कोई अपना

ट्रांसफर रुकवाने. कभीकभी उस के जी में आता सब को निकाल बाहर करे पर भारतीय नारी और वह भी जिस के पुरखों ने कभी ऐश नहीं देखी हो, कभी ऐसा दुस्साहस कर सकती है खूब हंसहंस कर वह मेहमानों की आवभगत करती रहती है.

दोनों बहनें रेखा और मंजू अपनी सुसराल के किसी रिश्तेदार की फैक्टरी लगाने में आई अड़चनें दूर करवाने की बात कर रही थीं. अमित ने उन की बात सुन कर मदद करने का आश्वासन दिया.

रेखा और मंजू बहुत दिनों बाद आईर् थीं. राधिका ने सोचा आज कुछ देर बैठ कर उन से बातें करेगी पर अमित के उठते ही वे दोनों भी जल्दीजल्दी चाय समाप्त कर अमित के साथ ही निकलने के लिए उठ खड़ी हुईं. उन्हें भी सिर्फ अमित से ही मतलब था. राधिका का दिल फिर डूब गया. उसे लगने लगा उस के पास कोई बात करने वाला नहीं है जो कुछ उस की सुने, कुछ अपनी कहे. किसी आम औरत की तरह वह पासपड़ोस में बैठ कर गप्पें नहीं मार सकती थी.

एक बार किट्टी पार्टी जौइन की तो वहां भी हर सदस्य किसी न किसी काम की सिफारिश करता रहा तो राधिका ने वहां जाना भी बंद कर दिया. किसी समाजसेवा संस्था से जुड़ना चाहा तो वहां भी अमित की पुकार होती रहती. अब राधिका ने धीरेधीरे सब जगह जाना छोड़ दिया था.

मंत्री की पत्नी होने के सुखदुख पर वह मन ही मन गौर करती और किसी से शेयर न कर पाने की स्थिति में मन ही  मन अकेलेपन से घिरी रहती. कभी दिनबदिन व्यस्त होते अमित से मिले कभीकभार कुछ अंतगरंग पल उस की झोली में आ गिरते तो वह कई दिनों तक उन्हें सहेजे रहती.

एक दिन जब उस के बचपन की प्रिय सखी का फोन आया कि  वह किसी काम से लखनऊ आ रही है तो राधिका खिल उठी.

कामिनी ने छेड़ा, ‘‘मंत्री की पत्नी बन कर मिलेगी या सहेली बन कर?’’

हंस पड़ी राधिका, ‘‘तू आ कर खुद ही

देख लेना.’’

कामिनी आई तो राधिका के ठाटबाट देख कर हैरान रह गई. राधिका के गले लगते हुए बोली, ‘‘वाह, कभी सोचा था ऐसा वैभव देखेगी? चल, पूरा घर दिखा पहले.’’

घर था तो सरकारी बंगला. अमित के

कहने पर कई ठेकेदारों ने मुफ्त में उस का काया पलट कर दिया था. वह देखती रह गई कि कैसे

2 महीनों में रातदिन लगा कर खंडहर को महल बना दिया गया. बाहर काले ग्रेमइट पर खुदा था

-अमित कुमार मंत्री, राज्य सरकार.

राधिका ने उसे पूरा घर दिखाया. कामिनी ने खुले दिल से कोठी की भव्यता की प्रशंसा की. कामिनी किसी विवाह में शामिल होने आई थी और सीधी राधिका के पास ही आ गई थी. कामिनी और राधिका का बचपन रुड़की में एक ही गली में आमनेसामने के घरों में बीता था. दोनों के पिताओं के पास पैसा न था. छोटीछोटी नौकरियां ही तो करते थे. कामिनी फ्रैश होने चली गई तो राधिका को बीते समय की बहुत सी बातें याद आने लगी.

राधिका और कामिनी की कालेज की पढ़ाई भी साथ हुई थी, उसी कालेज में अमित उसे पसंद आ गया था. उस के पिता भी साधारण थे पर पिता और पुत्र दोनों राजनीति में सक्रिय थे.

राधिका और दोनों का साधारण सा विवाह हो गया था. स्टूडैंट राजनीति से शुरू कर मेन राजनीति में अपनी पकड़ बनाते चले गए थे अमित. पिछड़े वर्ग का होने के कारण हर पार्टीको उनकी जरूरत थी. वे मेधावी भी थे. एक मंत्री की पत्नी बन कर वह कभी गर्व से इतराती तो कभी अकेलेपन में अकुलाती, पति की व्यस्त दिनचर्या, नपीतुली बातचीत और संतुलित व्यवहार के साथ खुद को परिवेश में डालने की कोशिश में जीवन बीतता चला गया था.

कामिनी राधिका के ऐशोआराम पर मुग्ध थी. कामिनी का पति एक ऊंची

जाति का था. एमबीए में कामिनी से मिला था. राधिका जो बहुत कुछ बांटना चाहती थी अपनी बालसखी से, कुछ भी नहीं कह पाई. कामिनी खूब उत्साह से उस की घरगृहस्थी की तारीफ करने में ही व्यस्त रही.

खाने की टेबल पर शानदार लंच देख कर, नौकरों को इधर से उधर काम करते देख कामिनी ने चहकते हुए खाना शुरू किया, बोली, ‘‘राधिका, इतना वैभव, ऐशोआराम का हर साधन, योग्य पति, बच्चे, वाह, सबकुछ है न आज तेरे पास?’’ राधिका ने फीकी सी हंसी हंसते हुए मन ही मन कहा कि हां, सबकुछ है पर कुछ नहीं.’’

कामिनी ने उस के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘राधिका मैं समझ सकती हूं कि तुम पर क्या बीत रही होगी. साधारण घरों में बड़े हुए हम लोगों को प्यार चाहिए. यह वैभव, पैसा कचोटता है. मयंक के पास पैसा भी है और ऊंची जाति होने का गरूर भी. मैं भी कमाती हूं पर वह खुशी नहीं मिलती. मयंक ने कितनी बार कहा कि तुम से कह कर कोई काम करा दूं पैसा भी मिल जाएगा. पर मैं जानती हूं कि तुझे प्यारी सहेली चाहिए, पैसा नहीं. इतने साल में इसीलिए आने से कतराती रही कि न जाने तू कहीं बदल नहीं गई हो पर उस दिन स्कूल में हुए कार्यक्रम की रिपोर्ट टीवी में देखी तो तेरे चेहरे की बनावटी मुसकान के पीछे का दर्द में देख सकती थी. अब तो तू भंवरजाल में फस चुकी है… खुश रह.’’

राधिका ने कहा, ‘‘तू सही कहती है, कामिनी. इसी कुछ नहीं के साथ जीना पडे़गा वरना न वे बच्चे साथ रहेंगे, न भाई, न मांबाप.’’

Family Story

Hindi Short Story: दुश्चक्र- क्यों वंदना को बोझ लगने लगा श्याम

Hindi Short Story: स्कूल छूटने के बाद मैं साथी शिक्षिकाओं के साथ घर लौट रही थी, तभी घर के पास वाले चौराहे पर एक आवाज सुनाई दी, ‘बहनजी, जरा सुनिए तो.’

पहले तो मैं ने आवाज को अनसुना कर दिया यह सोच कर कि शायद किसी और के लिए आवाज हो लेकिन वही आवाज जब मुझे दोबारा सुनाई दी, ‘बहनजी, मैं आप से ही कह रहा हूं, जरा इधर तो आइए,’ तो इस बार मजबूरन मुझे उस दिशा में देखना ही पड़ा.

मैं ने देखा, चौराहे पर स्थित एकमात्र पान की दुकान वाला मुझे ही बुला रहा था. मुझे भी आश्चर्य हुआ कि पान की दुकान पर भला मेरा क्या काम? साथ की शिक्षिकाएं भी मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगीं, लेकिन जब मुझे स्वयं ही कुछ पता नहीं था तो मैं भला उन से क्या कहती? अत: उन सब को वहीं छोड़ कर मैं पान की दुकान पर पहुंच गई और दुकानदार से कुछ पूछती उस से पहले उस ने स्वयं ही बोलना शुरू कर दिया :

‘‘बहनजी, आप इस महल्ले में अभी नईनई ही आई हैं न?’’

‘‘जी हां, अभी पिछले महीने ही मैं ने गुप्ताजी का मकान किराए पर लिया है,’’ मैं ने उसे जवाब दे दिया फिर भी दुकानदार द्वारा बुलाने का कारण मेरी समझ में नहीं आया.

‘‘अच्छा, तो मिस्टर श्याम आप के पति हैं?’’ दुकानदार ने आगे पूछा.

‘‘जी हां, लेकिन आप यह सब पूछ क्यों रहे हैं?’’ अब उस दुकानदार पर मुझे खीज होने लगी थी.

‘‘कुछ खास बात नहीं है, मुझे तो आप को सिर्फ यह बताना था कि सुबह  आप के पति दुकान पर आए थे और सिगरेट के 2 पैकेट, 4 जोड़े पान और कोल्डडिं्रक की 1 बड़ी बोतल ले गए थे. उस वक्त शायद उन की जेब में पैसे नहीं थे या फिर वे अपना पर्स घर पर ही भूल गए थे. उन्होेंने आप का परिचय दे कर आप से रुपए ले लेने के लिए कहा था,’’ दुकानदार ने मुझे बुलाने का अपना प्रयोजन स्पष्ट किया.

मैं ने पर्स खोल कर 100 रुपए का एक नोट दुकानदार की ओर बढ़ा दिया. उस ने पैसे काट कर जो पैसे वापस दिए, उन्हें बिना गिने ही मैं ने पर्स में रखा और वहां से चल दी. रास्ते में सोचने लगी कि इस आदमी ने यहां भी उधार लेना शुरू कर दिया. मेरे कानों में दुकानदार के कहे शब्द अब भी गूंज रहे थे :

‘कुछ भी हो आदमी वे बड़े दिलचस्प हैं. बातों का तो जैसे उन के पास खजाना है. बड़े काम की बातें करते हैं. दिमाग भी उन्होंने गजब का पाया है. मेरी दुकान की तो बहुत तारीफ कर रहे थे. साथ ही कुछ सुझाव भी दे गए.’

‘दिमाग की ही तो खा रहा है,’ मन ही मन सोचा और शिक्षिकाओं के समूह से आ मिली.

‘‘क्यों? क्या बात हो गई? क्यों बुलाया था दुकानदार ने?’’ रीना मैडम ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस यों ही,’’ कहते हुए मैं ने बात को टाल दिया.

वे भी शायद घर पहुंचने की जल्दी में थीं, इसलिए किसी ने भी बात को आगे नहीं बढ़ाया. सब चुपचाप जल्दीजल्दी अपनेअपने घरों की ओर बढ़ने लगीं.

घर पहुंची तो देखा महाशय ड्राइंगरूम में सोफे पर लेट कर सिगरेट फूंक रहे थे. टेलीविजन चल रहा था और एक फैशन चैनल पर आधुनिक फैशन का ज्ञान लिया जा रहा था.

मुझे देखते ही श्याम बोले, ‘‘अच्छा हुआ यार, तुम आ गईं. मैं भी घर पर बैठेबैठे बोर हो रहा था. टेलीविजन भी कोई कहां तक देखे? फिर इस पर भी तो वही सब घिसेपिटे कार्यक्रम ही आते हैं.’’

जवाब में मैं ने कुछ भी नहीं कहा.

मेरी चुप्पी की ओर बिना कोई ध्यान दिए श्याम बोले, ‘‘सुनो, बहुत जोर की भूख लगी है. मैं सोच ही रहा था कि तुम आ जाओ तो साथ में भोजन करते हैं. अब तुम आ गई हो तो चलो फटाफट भोजन लगाओ, तब तक मैं हाथ धो कर आता हूं.’’

मेरा मन तो हुआ कि पूछ लूं, ‘क्या थाली ले कर खा भी नहीं सकते हो. सुबह स्कूल जाने से पहले ही मैं पूरा भोजन बना कर जाती हूं, क्या भोजन परोस कर खाना भी नहीं होता?’ लेकिन फालतू का विवाद हो जाएगा, यह सोच कर चुप रही.

‘‘क्या सोच रही हो?’’ मुझे चुप देख कर श्याम ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं,’’ मैं ने संक्षिप्त सा जवाब दिया.

अभी मैं आगे कुछ कहती, इस से पहले ही जैसे श्याम को कुछ याद आ गया, वह बोले, ‘‘अरे, हां यार, घर में कुछ पैसे तो रख कर जाया करो. आज तुम्हारे जाने के बाद मुझे सिगरेट के लिए पैसों की जरूरत थी. पूरा घर छान मारा पर कहीं भी एक पैसा नहीं मिला. मजबूरन नुक्कड़ वाली पान की दुकान से मुझे सिगरेट उधार लेनी पड़ी. अभी कुछ रुपए दे देना तो शाम को मैं उस के रुपए चुका आऊंगा.’’

‘‘आप का उधार मैं ने चुका दिया है,’’ मैं ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और भोजन गरम करने में लग गई.

भोजन करते समय श्याम एक बार फिर शुरू हो गए, ‘‘यार, वंदना, यह तो बहुत ही गलत बात है कि सारे पैसे पर्स में रख कर तुम स्कूल चली जाती हो. ए.टी.एम. कार्ड भी तुम्हारे ही पास रहता है. ऐसे में अचानक यदि मुझे रुपयों की जरूरत पड़ जाए तो मैं क्या करूं, किस से मांगूं? जरा मेरी हालत के बारे में भी तो सोचो. मैं यहां पर घर की रखवाली करूं, सारी व्यवस्थाएं करूं, तुम्हारी देखभाल करूं, तुम्हारी सुरक्षा की चिंता करूं. ऐसे में यदि मेरी ही जेब खाली हो तो मैं कैसे ये सबकुछ कर पाऊंगा. पैसों की आवश्यकता तो पगपग पर होती है. अरे, तुम्हारे लिए ही तो मैं यहां पड़ा हूं.’’

‘‘आप को कुछ भी करने की जरूरत नहीं है. क्या करना है, कैसे करना है, मुझे सब पता है. और हां, रुपयों की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. कोई रुपए मांगते हुए यहां घर तक नहीं आएगा. मुझे सब का हिसाब करना आता है,’’ मैं ने तिक्त स्वर में कहा.

पिछला अनुभव मुझे अच्छी तरह याद है कि उधार तो चुकेगा नहीं, उलटे दोबारा भुगतान अलग से करना पड़ जाएगा. रायपुर का एक किस्सा मुझे अच्छी तरह याद है कि किस तरह मुझे दुकानदारों के सामने शर्मिंदा होना पड़ता था. किस तरह एक ही बिल का मुझे 2 बार भुगतान करना पड़ता था. एक बार तो एक दुकानदार ने पूछ भी लिया था, ‘मैडमजी, यदि बुरा न मानें तो एक बात पूछ सकता हूं?’

‘पूछिए, गुप्ताजी क्या पूछना चाहते हैं आप?’ मुझे कहना पड़ा था क्योंकि गुप्ता किराना वाले के मुझ पर बहुत से एहसान थे.

‘मैडम, श्याम भाई कुछ करते क्यों नहीं? आप कहें तो मैं उन के लिए कहीं नौकरी की बात करूं?’ गुप्ताजी ने कुछ संकोच से पूछा था.

‘गुप्ताजी, बेहतर होगा ये सब बातें आप उन्हीं से कीजिए. उन के बारे में भला मैं क्या कह सकती हूं? अपने बारे में वे स्वयं ज्यादा अच्छी तरह से बता पाएंगे,’ कहते हुए मैं ने घर की तरफ कदम बढ़ा दिए थे.

‘‘कुछ ले नहीं रही हो, तबीयत खराब है क्या?’’ रुके हुए हाथ को देख कर श्याम ने पूछा.

‘‘कुछ विशेष नहीं, बस थोड़ा सिरदर्द है,’’ कह कर मैं किसी तरह थाली में लिया भोजन समाप्त कर के बिस्तर पर आ कर लेट गई. अतीत किसी चलचित्र की तरह मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था.

मातापिता और भाइयों के मना करने और सब के द्वारा श्याम के सभी दुर्गुणों को बताने के बावजूद मैं ने श्याम से प्रेम विवाह किया था. श्याम ने मुझे भरोसा दिलाया था कि शादी के बाद वह स्वयं को पूरी तरह से बदल लेगा और अपनी सारी बुराइयों को छोड़ देगा.

शादी के बाद जब श्याम ने मुझे नौकरी के लिए प्रोत्साहित किया तो श्याम की सोच पर मुझे गर्व हुआ था. श्याम का कहना था कि यदि हम दोनों नौकरी करेंगे तो हमारी गृहस्थी की गाड़ी और ज्यादा अच्छी तरह से चल निकलेगी. उस समय मुझे श्याम की चालाकी का जरा भी अनुभव नहीं हुआ था…लगा कि श्याम सच ही कह रहा है. यदि मैं पढ़ीलिखी हूं, प्रशिक्षित हूं तो मुझे अपने ज्ञान का सदुपयोग करना चाहिए. उसे यों ही व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए.

संयोग से हमारी शादी के कुछ दिनों बाद ही केंद्रीय विद्यालय समूह में नौकरी (शिक्षकों) की रिक्तियां निकलीं. श्याम के सुझाव पर मैं ने भी आवेदनपत्र जमा कर दिया. जिस दिन मुझे शिक्षिका की नौकरी मिली उस दिन मुझ से ज्यादा खुश श्याम था.

श्याम की आंखों की चमक ने मेरी खुशियों को दोगुना कर दिया था. मुझे तब ऐसा लगा था जैसे श्याम को पा कर मैं ने जिंदगी में सबकुछ पा लिया. मेरी जिंदगी धन्य हो गई. हां, एक बात मुझे जरूर खटकती थी कि मुझ से वादा करने के बाद भी श्याम ने अपनी सिगरेट और शराब की आदतें छोड़ी नहीं थीं. कई बार तो मुझे ऐसा लगता जैसे वह पहले से कहीं अधिक शराब पीने लगा है.

श्याम की नौकरी लगे मुश्किल से 8 महीने भी नहीं हुए थे कि अचानक एक दिन श्याम के आफिस से उस के निलंबन का पत्र आ गया. कारण था, शराब पी कर दफ्तर आना और अपने सहकर्मियों के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार करना. दफ्तर का काम न करना, लेकिन श्याम पर जैसे इस निलंबन का कोई असर ही नहीं पड़ा. उलटे उस पत्र के आने के बाद वह और अधिक शराब पीने लगा.

कभीकभी वह शराब के नशे में बड़बड़ाता, ‘करो, जो करना है करो. निलंबित करो चाहे नौकरी से निकालो या और भी कुछ बुरा कर सकते हो तो करो. यहां नौकरी की चिंता किसे है? अरे, चिंता करनी ही होती तो पत्नी को नौकरी पर क्यों लगवाता. चिंता तो वे करें जिन के घर में अकेला पति कमाने वाला हो. यहां तो मेरी पत्नी भी एक केंद्रीय कर्मचारी है. यदि मेरी नौकरी छूट भी गई तो एकदम सड़क पर नहीं आ जाऊंगा. मेरा घर तो चलता रहेगा. मैं नहीं तो पत्नी कमाएगी.’

वह दिन है और आज का दिन है. अकेली मैं कमा रही हूं. मुझे स्वयं ही नहीं मालूम कि कब तक अपने कंधों पर न केवल खुद का बल्कि अपने पति का भार भी ढोना पड़ेगा. अचानक मुझे अपने कंधों में दर्द का अनुभव होने लगा. दर्द के मारे मेरे कंधे झुकते चले गए.

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Festival Celebration: यूथ फैस्टिव सैलिब्रेशन

Festival Celebration: 24 वर्षीय नेहा आस्ट्रेलिया में नौकरी करती है, लेकिन हर दीवाली घर आती है ताकि सब के साथ मिल कर त्योहार मना सके. इस बार भी उस ने टिकट पहले से कर लिया है और आने वाली है क्योंकि इस दीवाली पर उस की बड़ी बहन भी अपने परिवार के साथ मुंबई आ रही है. इस में सब के साथ मिलना संभव हो सकेगा.

नेहा का हर साल त्योहार में मुंबई आने के पीछे का मकसद सब से मिलना होता है. इस से उस की पूरे परिवार और रिश्तेदारों के साथ अच्छी बौडिंग हो जाती है. घर आने के लिए उस की तैयारी भी उसे 2-3 महीने पहले से ही कर लेनी पड़ती है.

केवल नेहा ही नहीं बैंगलुरु में रहने वाला 25 वर्षीय संदीप भी हर साल दीवाली पर अपने पेरैंट्स और रिश्तेदारों से मिलने दिल्ली आता है, जिस की तैयारी वह काफी पहले से कर लेता है ताकि उसे वहां आने पर सैलिब्रेशन में किसी प्रकार की बाधा न हो, हर बार उसे घर जा कर बहुत अच्छा लगता है और खुद को रिजूविनेट कर वापस काम पर लौटता है. वह पिछले 10 सालों से घर से बाहर है क्योंकि उस ने पढ़ाई भी बैंगलुरु में ही की है और अब जौब भी वहीं करने लगा है.

परिवार के साथ होता था लगाव

असल में पहले लोगों में भाईचारे की भावना अधिक होती थी क्योंकि लोग साथ रहते थे और वहीं रोजीरोटी कमाते थे. घर से अधिक दूर जा कर काम करना किसी के वश में नहीं था, इसलिए परिवार के साथ लगाव ज्यादा होता था. सभी त्योहारों को वे परिवार के साथ मना सकते थे. सुविधाएं कम होती थीं लेकिन तब लोगों में आपसी मेल अधिक रहता था.

आधुनिकता ने की परिवार में दूरी

आधुनिकता के दौर में सुविधाएं बढ़ी हैं. लोग घरों से दूर जा कर अच्छे लाइफस्टाइल के लिए शिक्षा या जौब करने लगे हैं, इस से लोग आर्थिक रूप से मजबूत तो हुए लेकिन उन लोगों के पास समय की कमी होने लगी, जिस वजह से परिवार से दूरी बढ़ गई.

लोग काम के कारण परिवार से दूर रहने लगे हैं. यहां तक कि त्योहार भी परिवार के साथ मनाना मुश्किल होने लगा है. काम करने के लिए दूसरे शहर या देश में जाना पसंद कर रहे हैं. ऐसे में त्योहार पर भी परिवार के साथ समय नहीं बिता पाते. इसलिए त्योहारों की रौनक पिछले कुछ दशकों से कम होने लगी थी.

व्यवस्थित जीवन, समय की कमी लोगों को परिवार से दूर करती जा रही थी, जिस से हमारे त्योहार भी प्रभावित हुए हैं. लोग त्योहार भी परिवार के सदस्यों के साथ मिल कर नहीं बल्कि वीडियो काल के माध्यम से मनाने लगे थे, लेकिन इस सब में अच्छी बात यह हुई है कि पिछले कुछ सालों से हमारी नई पीढ़ी आर्थिक रूप से मजबूत हो चुकी है और कहीं से भी त्योहारों पर घर आना उस के लिए बो झ नही बनता.

बदली है युवाओं की सोच

आज के माहौल में युवाओं की सोच में काफी परिवर्तन दिख रहा है, आज के युवा त्योहारों को परिवार के साथ मनाना ही पसंद कर रहे हैं, इस की वजह उन का काफी समय तक अपने पेरैंट्स और रिश्तेदारों से अलग रहना और खुद को संभालना है. आज वे परिवार के महत्त्व को भी सम झने लगे हैं. यही वजह है कि त्योहारों में परिवार के सदस्यों का एकसाथ आना एक स्वाभाविक और बढ़ता हुआ ट्रेंड हो रहा है, जिसे यूथ आकर्षक मान रहे हैं जो लोगों को दैनिक जीवन की भागदौड़ से दूर ले जा कर भावनात्मक जुड़ाव और रिश्तों को मजबूत करने का अवसर देता है.

इस के अलावा यह आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी परिवार और प्रियजनों के साथ रहने की भारतीय संस्कृति को दर्शाता है और परिवार में एकता, प्रेम और मानसिक सुकून लाता है. त्योहार परिवार को साथ रखने और आपसी सा झेदारी बढ़ाने का एक संस्कार है यानी यह मधुर संबंधों की एक सौगात है.

त्योहार साथ मनाने के फायदे

तनाव से मुक्ति और मानसिक सुकून: रोजमर्रा की जिंदगी के तनाव और थकान से दूर रहने और परिवार के साथ समय बिताने का एक अच्छा मौका त्योहार देता है, जिस से तनाव कम होता है और मानसिक सुकून मिलता है. ऐसे समय में लोग शौपिंग कर के न सिर्फ अपनेआप को फ्रैश करते हैं बल्कि मानसिक रूप से भी तनावमुक्त होते हैं.

सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्त्व: हर त्योहार संस्कृति का एक अभिन्न अंग होता हैं जो परिवार को एकजुट करने और भाईचारे को बढ़ाने का काम करता है. लोग त्योहारों पर पुरानी यादों को ताजा करते हैं और उपहारों का आदानप्रदान करते हैं, इसीलिए सभी बेसब्री से त्योहार के मौसम का इंतजार करते हैं.

बड़ेबुजुर्गों से मिलना संभव होता है: त्योहारों पर परिवार के बुजुर्गों के साथ समय बिताना युवाओं को मानसिक सुकून देता है, जो उन्हें पारिवारिक मूल्यों और एकता का महत्त्व बताता है.

Festival Celebration

Eye Makeup: आंखें छोटी हैं, तो बड़ी कैसे दिखाएं

Eye Makeup:

मोटा आईलाइनर न लगाएं

ज्यादा मोटा लाइनर आंखों को और भी छोटा कर देता है या छोटा दिखाता है. इसलिए कोशिश करें कि आंखों में लाइनर थोड़ा पतला ही लगाएं ताकि आंखें हाइलाइट हो सकें.

विंग्ड आईलाइनर से आंखें बड़ी दिखती हैं

विंग्ड आईलाइनर से आंखें बड़ी दिखती हैं और मेकअप भी उभर कर आता है. इसे लगाने का भी एक तरीका है ताकि दोनों आंखों में एकसमान लाइनर लग सकें. लाइनर को आंख के कोने से शुरू करें और एक ही बार में बिना हाथ को हिलाए एक लाइन लाइनर से बनाएं और उसे बिना उठाए आंख के कोने तक खींचें. अब इस लाइनर को आंख के कोने से थोड़ा सा बाहर की तरफ खीचें जितना आप चाहें. अब जो लाइन खिंची है उस के अंदर लाइनर अच्छी तरह से भरें और एक अच्छी शेप आंख को दें. अब आप यह लाइनर कितना पतला और मोटा लगाना चाहती हैं यह आप पर निर्भर करता है.

अब दूसरी आंख पर भी यही प्रोसेस रिपीट करें. लेकिन नापें कि विंग को कितना बाहर निकालना है. यह दोनों आंखों में एक बराबर होना चाहिए. अगर दोनों विंग एकजैसी नहीं बनतीं तो कौटन स्वैब और मेकअप रिमूवर की मदद से उन्हें बैलेंस करें. परफैक्ट फिनिश के लिए विंग्ड लाइनर के साथ मसकारा और काजल का इस्तेमाल करें.

स्मज्ड आईलाइनर लगाएं

छोटी आंखों पर स्मज्ड लुक बहुत अच्छा लगता है. स्मज्ड आईलाइनर लगाने के लिए अपनी पलकों के पास आईलाइनर लगाएं, फिर उसे ब्रश या कौटन बड से जल्दी से स्मज कर लें. आप अपनी लोअर लैश लाइन पर भी हलका सा लाइनर लगा कर उसे स्मज कर सकती हैं. गहराई के लिए आप आईशैडो का इस्तेमाल कर सकती हैं. इसे छोटे ब्लेंडिंग ब्रश से लाइनर पर लगा कर रंग को गहरा और धुंधला कर सकती हैं. इस से आंखें बड़ी दिखेंगी.

ब्लैक नहीं व्हाइट आईलाइनर लगाएं

आंखों को बड़ा दिखाना चाहती हैं तो उस में व्हाइट लाइनर आप की काफी मदद कर सकता है. ब्लैक लाइनर से आंखें और भी छोटी लगेंगी इसलिए उस के बजाय व्हाइट, ब्राउन, ग्रीन, ब्लू लाइनर लगाएं. आप व्हाइट लाइनर को काजल की तरह लोअर लैश लाइन पर लगाएं. यह आप की आंखों को अंदर से बड़ा दिखाने में मदद करेगा. आप चाहें तो व्हाइट लाइनर को इनर साइड में अपर पार्ट पर लगा लें. यह लुक भी दिखने में अच्छा लगेगा.

ऊपर या नीचे में से एक जगह लगाएं लाइनर

अगर हम ऊपर और नीचे दोनों तरफ एकसाथ लाइनर लगाएंगे तो यह लुक हमारी आंखों को और भी ज्यादा छोटा दिखाएगा. इस के बजाय हमें ऊपर लाइनर लगाना चाहिए और नीचे हलका सा काजल लगाएं. इस से आंखें छोटी भी लगेंगी.

टाइटलाइनिंग लगाएं

टाइटलाइनिंग लगाने के लिए ऊपरी पलक को हलके से ऊपर उठाएं और अपनी पलकों की जड़ों के बीच में एक वाटरप्रूफ पेंसिल या जैल लाइनर लगाएं, नकि वाटरलाइन पर. यह पलकों की ऊपरी रेखा को मोटा और घना दिखाती है, जिस से आंखें बड़ी और अधिक खुली हुई दिखती हैं. नीचे की पालक लाइन पर वाइट या न्यूड आईलाइनर लगाएं ताकि आंखें ज्यादा ओपन दिखें.

कौर्नर में ब्राइटनिंग हाई लाइटर लगाएं

अपनी आंखों के कौर्नर को और भी ज्यादा बड़ा दिखाने और हाइलाइट करने के लिए वहां कोई भी शिमरी शेड लगाएं ताकि वह आंखों को एक अलग ही लुक दे सकें. अगर अंदर हल के कलर का शेड लगाया है तो बाहर ब्राइट कलर लगाएं.

आईब्रो का आर्क सही होना चाहिए

आंखों को बड़ा देखने में आईब्रो का भी अहम रोल है इसलिए ध्यान दें कि आईब्रो का आर्क सही होना चाहिए. दोनों एक सी ही शेप में होनी चाहिए.

आई लैश पर मसकारा लगाएं

आई लैश पर ऊपर नीचे मसकारा लगाने से पलके बड़ी लगेंगी जो आंखों को भी बड़ा करेंगी.

कंसीलर लगाएं

अगर आप की आंखों के नीचे डार्क सर्कल हैं तो आंखें सूजी हुए लगेंगी जिस से वे छोटी भी लगेंगी. इसलिए सब से पहले आंखों के नीचे के डार्क सर्कल को छिपाने के लिए वहां कंसीलर लगाएं. कंसीलर को आंखों के बाहरी हिस्से पर लगाएं. इस के बाद फाउंडेशन और कौंपैक्ट भी लगाएं. इस से भी आंखें बड़ी दिखती हैं.

आंखों की पलकों को कर्ल करें

आप बड़ी आंखें और अच्‍छा आई लुक पाने के लिए अपनी पलकों या लैशेज को कर्ल कर सकते हैं. इस से आप की आंखों के लुक में काफी बदलाव आएगा. पलकों को कर्ल करने से आप को अपनी आंखों को बङा दिखाने में भी मदद मिलेगी. आप अपनी पलकों पर मसकारा लगाएं और फिर उन्‍हें आई लैश कर्लर से पलकों को कर्ल करें. आप अपने निचले लैशेज में भी मसकारा लगाएं और इसे 3 से 4 बार कोट करें. इस के बाद आप अपनी आंखों पर ब्राउन या किसी और रंग का काजल लगा सकते हैं. इस के लिए अच्छे कर्लर का यूज करें.

Eye Makeup

Appliances For Diwali: दीवाली पर एक व्हाइट गुड्स तो बनता है

Appliances For Diwali: हर दीवाली आप एक ऐसी इलेक्ट्रौनिक चीज खरीदें जो सालोंसाल याद रहें. एक एअर फायर है, तो भी दूसरा ले लें. अब नए फीचर्स के साथ लें. एक रोज में इस्तेमाल किया और दूसरा मेहमानों के आने पर इस्तेमाल किया. इस तरह घर में कई नए अच्छी और उपयोगी चीजें इकठ्ठा हो जाएंगी, जिस से न सिर्फ लाइफ आसान हो जाएगी बल्कि हमारा अपना एक स्टैंडर्ड भी बनेगा कि हमारे घर जरूरत की हर चीज है और हम समय के साथ चलने वाले लोग हैं.

इलेक्ट्रौनिक आइटम से आप घर को मौडर्न बना सकते हैं

इलेक्ट्रौनिक उपकरण घर की सुंदरता बढ़ाते हैं और उसे एक आधुनिक रूप देते हैं. आप अपने लिविंगरूम को एक नए टीवी से सजा सकते हैं या अपनी किचन को एक नए उपकरण से अपग्रेड कर सकते हैं. आप अपनी जरूरत के हिसाब से घर में कोई भी नया इलेक्ट्रौनिक उपकरण ला कर घर को और भी आधुनिक और आरामदायक बना सकते हैं. अगर आप के घर में जरूरत की हर चीज होगी तो आप के घर आने वाला मेहमान भी आप की शानोशौकत देख कर आप का कायल हो जाएगा.

दीवाली पर डिस्काउंट और औफर काफी होते हैं

दीवाली जैसे त्योहारों के दौरान इलेक्ट्रौनिक कंपनियों द्वारा कई तरह की छूट और विशेष औफर्स दिए जाते हैं, जिस से आप अच्छी डील्स के साथ इलेक्ट्रौनिक सामान खरीद सकते हैं. यही सही समय होता है अपने घर में कुछ नए इलेक्ट्रौनिक आइटम खरीदने का. इस समय पर डिस्काउंट होता है तो आप के सीमित बजट में कुछ अच्छा आइटम भी आ सकता है. इस समय आप इन महंगी वस्तुओं को कम कीमत पर खरीद सकते हैं.

रोजमर्रा के काम को आसान बनाते हैं इलेक्ट्रौनिक आइटम्स

माइक्रोवेव ओवन खाने को जल्दी गरम करने या पकाने में मदद करता है, जिस से खाना बनाने में लगने वाला समय कम हो जाता है. वैक्यूम क्लीनर फर्श और कालीन की सफाई को बहुत आसान बनाते हैं. यह धूल और गंदगी को खींच लेता है, जिस से झाड़ू लगाने की मेहनत बचती है. डिश वौशर में मिनटों में सारे बर्तन बिना मेहनत किए साफ हो जाते हैं. इस तरह आधुनिक उपकरण समय बचाते हैं और घर के कामों को आसान बनाते हैं, जिस से आप के पास परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने का अधिक अवसर मिलता है.

दीवाली पर नए लौंच होते हैं

दीवाली से ठीक पहले कई कंपनियां अपने नए इलेक्ट्रौनिक आइटम्स लौंच करती हैं. इस से ग्राहकों को नवीनतम तकनीक और नए मौडल खरीदने का मौका मिलता है, जो अकसर विशेष दीवाली औफर के साथ आते हैं. ऐसा करने से लेटैस्ट मौडल की चीज इस समय कम कीमत में मिलने के चांस भी काफी ज्यादा होते हैं.

गिफ्ट देने के लिए भी इलेक्ट्रौनिक आइटम्स अच्छे रहते हैं

अगर आप की बेटी की नई शादीहुई है और उस की पहली दीवाली देनी है या फिर किसी की शादी है या फिर दीवाली के समय पर भी लोग एकदूसरे को तोहफे देते हैं, तो ऐसे में इलेक्ट्रौनिक गैजेट्स जैसे स्मार्टवाच, हेडफोन, और पोर्टेबल स्पीकर एक बेहतरीन और उपयोगी तोहफा होते हैं. ये आजकल की जीवनशैली के अनुरूप भी होते हैं.

दीवाली पर शौपिंग इलेक्ट्रौनिक्स की शौपिंग एक अच्छी इन्वेस्टमैंट भी है

समय के साथ खराब होने वाली चीजों को बदलने और घर के लिए एक नया और आधुनिक उपकरण खरीदने के लिए दीवाली एक अच्छा समय है. दीवाली की बिक्री के दौरान आप अपने बजट को ध्यान में रखते हुए अच्छी और उपयोगी चीजें खरीद सकते हैं. इस से आप बचत कर पाते हैं और अनावश्यक खर्च से बचते हैं.

औफिस से मिलने वाले बोनस का लाभ उठाएं

दीवाली के समय में कई औफिस में बोनस मिलता है. इस का लाभ भी आप घर के लिए नए चीज लेने में कर सकते हैं. इस से आप की पौकेट पर भी जोर नहीं पड़ेगा और हर साल इन दिनों में  नए इलेक्ट्रौनिक आइटम की भी ऐंट्री हो जाएगी.

वारंटी और सेवा

दीवाली के दौरान खरीदे गए उत्पादों पर अकसर लंबी वारंटी और बेहतर ग्राहक सेवा मिलती है, जो ग्राहकों के लिए फायदेमंद होती है.

मौडर्न इलेक्ट्रौनिक आइटम्स कौन से हैं

गेमिंग कंसोल (जैसे प्लेस्टेशन 5, ऐक्स बौक्स सीरीज X): ये हाई परफौर्मेंस वाले गेमिंग डिवाइस हैं जो बेहतरीन ग्राफिक्स और गेमप्ले का अनुभव देते हैं.

रोबोट वैक्यूम क्लीनर

यह बिना किसी की मदद के फर्श की सफाई कर सकते हैं. ​एआई (AI) की मदद से यह घर के नक्शे को सीखता है, ताकि फर्नीचर से न टकराए और हर कोने की सफाई कर सके.

पंखे के साथ सोलर कैप

एक और कूल समर गैजेट है- फैन के साथ सोलर कैप. इन कैप्स में पावर के लिए सौर पैनल्स के साथसाथ ऐडवांस फैन लगे होते हैं. कैब सूरज की रोशनी के संपर्क में आने के बाद अपनेआप चलने लगते हैं.

एआई संचालित स्मार्ट फैन

यह सिर्फ रिमोट से चलने वाले पंखे नहीं होते. इन में एआई आप के कमरे के तापमान, ह्यूमिडिटी यानि और आप की पसंद को समझता है. यदि आप रात में सो रहे हैं और कमरे का तापमान गिरता है, तो एआई संचालित पंखा अपनी गति को अपनेआप कम कर देगा. कुछ मौडलों में मोशन सेंसर भी होते हैं, जो यह पता लगा लेते हैं कि कमरे में कोई है या नहीं. यदि कोई नहीं है, तो वे बिजली बचाने के लिए अपनेआप बंद हो जाते हैं.

एआई संचालित एअर कंडीशनर

सैमसंग जैसी कंपनियों ने एआई विंडफ्री एसी (AC) लौंच किए हैं, जो आप के सोने के पैटर्न और बाहरी तापमान को समझ कर कमरे को आरामदायक रखते हैं. इन के इस्तेमाल से बिजली का बिल भी कम आता है.

डिशवौशर

यह एक ऐसा इलेक्ट्रौनिक उपकरण है जो बर्तनों को धोने के काम को बहुत आसान बना देता है. यह हमारी मेहनत और समय दोनों की बचत करता है, खासकर बड़े परिवारों या रेस्टोरैंट के लिए.

Appliances For Diwali

Family Get Together: ग्रैंड फैमिली डिनर से होगा इमोशनल डिटौक्स

Family Get Together: आजकल हम सब बहुत बिजी हो गए हैं. सुबह से शाम तक या तो औफिस में काम या घर की टैंशन या बच्चों के स्कूल और ऐक्टिविटी की भागदौड़, ऊपर से ट्रैफिक, मीटिंग, मोबाइल और सोशल मीडिया. इस रेस में हम सब से जरूरी चीज अपने परिवार और रिश्तों को भूलते जा रहे हैं.

एक समय था जब दादीनानी के घर सब भाईबहन इकट्ठा होते थे. चचेरा, ममेरा, फुफेरा, सब रिश्तेदार शामिल होते थे. अब तो हालत यह है कि सालों तक कोई किसी से नहीं मिलता. कजिंस को फेसबुक या इंस्टा पर लाइक करते हैं, लेकिन असल में मिलना कब हुआ था याद भी नहीं.

रिश्ते अब फौरमैलिटी बनते जा रहे हैं

‘‘बूआजी कैसे हैं?’’

‘‘अरे क्या बताऊं, अभी 2 साल से तो मुलाकात ही नहीं हुई.’’

‘‘कब मिलेंगे?’’

‘‘बस देखो बच्चों की पढ़ाई है, तुम्हारे फूफा का औफिस, जल्द ही मिलेंगे डौंट वरी.’’

ऐसी बातें आजकल बहुत आम हैं. एक दौर था जब रिश्तेदारों के बिना त्योहार अधूरे लगते थे. अब अगर भाई की शादी भी होती है तो लोग वीडियो कौल से शामिल होते हैं. सबकुछ बस ‘काम खत्म करो और निकलो’ वाली सोच पर चलने लगा है. रिश्तों में जो मिठास और अपनापन हुआ करता था वह अब सिर्फ फौरमैलिटी बन कर रह गया है.

खून के रिश्तों का कोई मुकाबला नहीं

आजकल लोग सोशल क्लब, गु्रप्स और औनलाइन कम्युनिटी को ही अपने रिश्तों का दायरा मानने लगे हैं. रोटरी, लौयंस या राउंड टेबल जैसे क्लब में जाना बुरा नहीं है लेकिन यह मान लेना कि वहीं आप की दुनिया बस गई है गलतफहमी है.

ये सब रिश्ते समय और स्वार्थ पर टिके होते हैं. जब तक काम है साथ हैं वहीं आप के रिश्तेदार चाहे जैसे भी हों खून या शादी से जुड़े होते हैं और वक्त पड़ने पर सब से पहले वही साथ खड़े मिलते हैं. दोस्ती अपनी जगह है लेकिन परिवार और रिश्तेदारों से जुड़ाव कहीं ज्यादा गहरा होता है. इन से लड़ाई हो सकती है अनबन हो सकती है, लेकिन जब जरूरत पड़े तो भरोसा भी इन्हीं पर होता है. इसलिए सोशल नैटवर्किंग के चक्कर में अपने असली रिश्तों को मत भूलिए. जो रिश्ते बिना बनावटीपन के बने हैं उन्हीं की असली कीमत होती है.

ऐसे में ग्रैंड फैमिली डिनर क्यों जरूरी है

जब सब लोग सालों तक नहीं मिलते तो आपसी रिश्ते कमजोर हो जाते हैं. मनमुटाव हो तो सुलझाने का टाइम नहीं होता. प्यार हो तो जताने का मौका नहीं मिलता. ऐसे में ग्रैंड फैमिली डिनर या लंच एक ऐसा मौका बन सकता है जहां सब एक टेबल पर बैठें, खाना खाएं, और दिल से बातचीत करें.

यह सिर्फ एक ‘खाना’ नहीं होता बल्कि एक नौस्टैल्जिया का फ्लैशबैक भी होता है. जब सब एकसाथ मिलबैठ बचपन की पुरानी यादें ताजा करते हैं, भाईबहन एकदूसरे की खिंचाई करते हैं.

गुप्ता परिवार की परंपरा

दिल्ली में रहने वाले गुप्ता परिवार के 4 भाईबहन अलगअलग शहरों में रहते हैं. एक अमेरिका में, एक पुणे में, एक गुरुग्राम में और चौथी बहन दिल्ली में. पहले हर त्योहार पर सब साथ होते थे. लेकिन पिछले 6 सालों में वे साथ एक बार भी पूरे नहीं मिल पाए.

तब सब से बड़ी बहन सीमा ने एक आइडिया दिया कि हर साल जून में एक फैमिली गैटटुगैदर करेंगे. अब हर साल सब 1 हफ्ते के लिए अपनेअपने काम से छुट्टी ले कर मिलते हैं.

कभी मसूरी, कभी गोवा, कभी घर पर. जहां सब 15-16 लोग एकसाथ बैठते हैं, खाना खाते हैं, पुराने किस्से सुनते हैं और ढेरों हंसीठिठोली करते हैं.

सीमा कहती हैं, ‘‘यही एक वक्त होता है जब हम सब फिर से छोटे बच्चे बन जाते हैं.’’

यह सिर्फ मिलना नहीं हीलिंग भी है

जब हम किसी अपने के पास बैठते हैं तो कई सालों की थकान उतर जाती है. कोई पूछे कि कैसा चल रहा है? तो लगता है कि कोई वाकई जानना चाहता है.

फैमिली डिनर में ऐसी बातें होती हैं

कौन क्या कर रहा है, कौन किस से नाराज है, कौन किसे मिस करता है और फिर इन सब के बीच हंसी, रोना, मजाक और ढेर सारा प्यार भी होता है. यह एक इमोशनल डिटौक्स होता है.

जोर अनबन खत्म कराने पर नहीं साथ बैठने पर हो

परिवार में अगर 2 लोगों के बीच अनबन है तो इस का मतलब यह नहीं कि उन्हें पारिवारिक मिलन से दूर रखा जाए. हमें यह समझना चाहिए कि किसी की सब के साथ नहीं बन सकती, यह बिल्कुल सामान्य बात है. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि किसी को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए.

परिवार में कुछ ऐसे लोग तो जरूर होते हैं, जिन से मिलने की खुशी होती है, जिन से बात कर के दिल हलका लगता है.

पहले के समय में जब बच्चों की संख्या ज्यादा होती थी और शादियां अकसर जल्दी होती थीं तो न चाहते हुए भी सभी का मिलना हो ही जाता था. ऐसे मौकों पर दिल की दूरियां थोड़ी कम हो जाती थीं.

जरूरी नहीं कि जब भी कोई साथ आए, उस पर अनबन खत्म करने का दबाव बनाया जाए. बस इतना काफी है कि सब एक जगह हों, बिना किसी उम्मीद या जबरदस्ती के. यही धीरेधीरे रिश्तों को ठीक करने की शुरुआत बन सकता है.

बच्चों के लिए भी सीख

आजकल के बच्चे अपने कजिंस को ठीक से जानते भी नहीं. उन्हें सिर्फ स्कूल, मोबाइल गेम और नैटफ्लिक्स की दुनिया दिखती है. लेकिन जब वे दादी के हाथ का खाना, मामा के जोक्स, चाची की नाराजगी और बूआ के लाड से रूबरू होते हैं तो उन्हें असली फैमिली कनैक्शन का मतलब समझ में आता है.

नौकरी, पढ़ाई, या शादी के बाद लोग अलगअलग शहरों या देशों में बस जाते हैं. इस दूरी ने हमारे रिश्तों में भी एक तरह की खाई बना दी है. बच्चे अपने दादादादी की कहानियों से अनजान रहते हैं, और बड़ों को नई पीढ़ी की सोच समझने का मौका ही नहीं मिलता.

  एक तारीख तय कीजिए

कोई वीकैंड या छुट्टी. जरूरी नहीं होटल में हो, घर पर ही एक बड़ा खाना रखिए.

क्या परोसें ग्रैंड फैमिली डिनर में

– दादी के टाइम के स्पैशल पकवान जैसे आलू की पूरी, कढ़ी, पकौड़े, खीर.

– हर सदस्य की पसंद की एक आइटम: कोई बहन चाइनीज पसंद करती है तो एक कौर्न मंचूरियन भी रख दे.

– बच्चों के लिए कुछ स्पेशल: मैकरोनी, पिज्जा या आइसक्रीम.

यह खाना सिर्फ पेट के लिए नहीं दिल के लिए होता है क्योंकि लंच या डिनर गैदरिंग ही एक ऐसा औप्शन है जब सब एकसाथ बिना किसी अवसर के इकट्ठा हो सकते हैं.

Family Get Together

Festival Shopping: औनलाइन शौपिंग करते समय, किन बातों का धयान रखें

Festival Shopping: औनलाइन शौपिंग ने जहां शौपिंग को बहुत आसान बना दिया है, वहीं इस के बहुत से फायदे भी हैं. अगर समझदारी और ध्यान से शौपिंग न करी जाए तो इस के नुकसान भी बहुत हैं. अपनी बेवजह की लापरवाही के चलते आप मुश्किल में भी पढ़ सकते हैं. इसलिए त्योहारों के समय में खासतौर पर औनलाइन शौपिंग करते समय कुछ बातों का खयाल जरूर रखें :

वैबसाइट का यूआरएल चैक करें

यदि वैबसाइट के यूआरएल में सिक्योर मोड (https) में नहीं है, तो वहां से शौपिंग न करें. इस के आलावा फेक शौपिंग वैबसाइट के यूआरएल में ग्रामर की गलतियां होना आम बात है. अगर कोई शौपिंग ऐप है तो उस के डेवलपर के बारे में प्लेस्टोर पर जा कर पढ़ें.

टर्म ऐंड कंडीशन और रिटर्न पौलिसी को चैक कर लें

जहां पर आप को प्रोडक्ट की पिक्चर दिख रही है वहां पर आप को शौपिंग की पौलिसी के बारे  लिखा रहता है उस को पूरा खोल कर पढ़ें कि जो प्रोडक्ट आप मंगा रहे हैं वह अगर पसंद नहीं आया तो उस के रिटर्न करने की क्या पौलिसी है. इस तरह खरीदारी करने से पहले टर्म ऐंड कंडीशन और वारंटी पौलिसी को बारीकी से पढ़ना चाहिए.

हर लिंक को न खोलें

कई बार हमें अनजान नंबर से शौपिंग का कोई लिंक आता है, जिस में बहुत अच्छी ड्रैसेज होती हैं. लेकिन यह सिर्फ एक धोखा होता है. इसलिए किसी के द्वारा भेजे गए ऐसे किसी भी लिंक से शौपिंग न करें. कई कंपनियां फ्रौड भी होती हैं, जो मैसेज में एक लिंक भेजती है. जैसे ही लिंक को क्लिक करते हैं तो आप के सामाने बड़ेबड़े आइटम्स पर जबरदस्त छूट के औफर्स दिखाई देते हैं. औफर्स देख कर कुछ लोग इन वैबसाइट पर पेमेंट कर सामान का और्डर कर देते हैं. इसी का फायदा उठाते हुए ठग फ्रौड कर लेते हैं.

शौपिंग साइट की स्पेलिंग चेक करें

कई बार शौपिंग साइट की स्पेलिंग में एकआध नंबर का फर्क होता है, जिस पर हम ध्यान नहीं देते हैं और उसे ओरिजनल साइट समझ कर आगे बढ़ जाते हैं लेकिन यह फेक भी हो सकता है. इसलिए जिस भी वैबसाइट पर जा रहे हैं उस की स्पेलिंग अच्छी तरह से चैक करें.

ऐंटी वायरस जरूर रखें

अपने लैपटौप या मोबाइल में ऐंटी वायरस जरूर रखें. किसी अनजान ऐप को कभी डाउनलोड न करें. कई बार औनलाइन शौपिंग करते समय हम गलती से कुछ ऐसा क्लिक कर देते हैं जिस से लैपटौप में वायरस आ जाता है.

कैशऔन डिलिवरी चुनें

जब बात औनलाइन की आती है तो फ्रौड के तरीके काफी क्रिएटिव हो जाते हैं. वैसे तो फिशिंग स्कैम्स, फेक औफर्स और डिस्काउंट के नाम पर धोखाधड़ी सामान्य है, लेकिन ऐसे और भी कई तरीके हैं, जिन के माध्यम से लोगों को आजकल खूब लूटा जा रहा है. इन सब पर भी अपनी नजर बनाए रखें.

डेटा फार्मिंग से बचें

सोशल मीडिया या वैबसाइट पर अपने बैंक या कार्ड की जानकारी बिलकुल शेयर न करें. कई वैबसाइट व्यक्तिगत जानकारी इकट्ठा कर डेटा स्कैमर्स को बेच देती हैं, जिस से अनधिकृत ट्रांजैक्शन हो सकता है. कोई भी कितना ही बड़ा औफर क्यों न दे, कभी भी अपने बैंक डिटेल्स शेयर न करें.

फेक वेबसाइट से बचें

त्योहारों के समय कई सारे ऐसे ऐप और वैबसाइट देखने को मिलते हैं, जो फेक होते हैं. देखने में तो वे सही लगते हैं लेकिन असल में वे फ्रौड साइट्स होते हैं. इन फेक ई कौमर्स प्लेटफौर्म्स पर खूब सारा डिस्काउंट दिया जाता है. यहां तक कि 80% तक भी यहां छूट मिलती है. हालांकि जब सामान आप के पास डिलिवर होता है तो वह बेकार होता है या फिर वह होता ही नहीं है जिस के बारे में बताया होता है या प्रोडक्ट वह नहीं होता है जिस की पिक्चर दी गई होती है.

क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी से रहें सतर्क

त्योहारों में क्रेडिट कार्ड फ्रौड के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं. कभी भी अपने कार्ड की जानकारी किसी दुकानदार या अनजान व्यक्ति से साझा न करें. औनलाइन शौपिंग में अगर कोई व्यक्ति कौल कर आप से कार्ड नंबर, सीवीवी या ओटीपी पूछे तो समझ जाएं कि यह एक फ्रौड कौल है.

शौपिंग के वक्त क्वालिटी पर भी ध्यान दें

हम प्रोडक्ट की क्वालिटी चैक करने के लिए साइट पर मौजूद रिव्यू पर निर्भर करते हैं. कई बार यह रिव्यू फेक होते हैं जो पैसे दे कर कराए जाते हैं और आप उन के जाल में फंस जाते हैं. अगर आप कहीं रिव्यू देख रहे हैं तो इस बात पर ध्यान दें कि रिव्यू सिर्फ पोजिटिव ही न हो बल्कि कुछ लोगों ने नैगटिव रिव्यू भी दिया हो, तभी वह सही होगा.

फ्रौड होने पर शिकायत करें

अगर आप को किसी भी तरह के फ्रौड का अंदेशा हो तो इस की शिकायत साइबर थाने में करें. किसी भी तरह की धोखाधड़ी की शिकायत https://consumerhelpline.gov.in/ पर जा कर कर सकते हैं.

Festival Shopping

Family Story: निर्मल- क्या नई दुनिया में खुश थी गोमती

Family Story: आजकी सुबह भी कुछ उदासी भरी थी. मन बेहद बोझोल था. ऐसा लग रहा था कि उसे निकाल कर कहीं फेंक दूं और सब कुछ भुला कर निश्चिंत हो कर पड़ी रहूं. पूरी जिंदगी संघर्ष करते गुजर गई. एक समस्या खत्म होतेहोते दूसरी समस्या आ खड़ी होती थी. नौकरी पाने के लिए की गई भागदौड़, शेखर के साथ भाग कर शादी करना और उस के बाद शुरू हुए खत्म न होने वाले सवाल, कोर्टकचहरी की भागदौड़ और

आज मेरे ही घर में बुद्धिराज का मुझो फटकारना ये सारी बातें एकएक कर के आंखों के आगे तैरने लगी थीं.

‘‘तुम्हारा और करण का क्या रिश्ता है?

वह चंडाल चौकड़ी मेरे घर क्यों आई थी? उस करण के साथ कैसे चिपक रही थीं तुम…’’ शेखर के मुंह से आग बरस रही थी. पर उस से भी भयानक काम उस के हाथ कर रहे थे.

गोमती की लिखी कविताओं के पन्नों को वह एकएक कर जला रहा था. हर पन्ना जलाते वक्त वह कू्रर हंसी हंस रहा था.

गोमती यह देख कर तिलमिला उठी थी. वह उस के हाथपांव जोड़ने लगी थी. पर अपने पैरों पर गिरी गोमती को शेखर ने जोर से झोटक दिया.

‘‘मेरी बीवी पर नजर डालते हैं. एकएक की आंखें नोच लूंगा. कविता करने के लिए क्या मेरा ही घर नजर आता है?’’ देर तक गालीगलौज करने के बाद शेखर पांव पटकते हुए बैडरूम

में चला गया और फिर थोड़ी ही देर में खर्राटे भरने लगा.

पर उन्हें घर तक लाने वाला भी तो वही था. फिर ऐसा क्यों? उसे अच्छी तरह याद है जब उस के गांव में साहित्य मंच की शाखा खुलने वाली थी. तब मुंबई से साहित्य मंच के संस्थापक कवि माधव मानविंदे वहां स्वयं आने वाले थे. वहां उसे भी आमंत्रित किया गया था. उस वक्त साहित्य मंच की स्थापना की मीटिंग कहां की जाए, इस बाबत चर्चा चल रही थी. करण और पोटे साहब ने 1-2 नाम लिए पर उन की कुछ अपनी समस्याएं थीं.

‘‘गोमती दीदी, आप के घर में की जाए क्या?’’ करण के इस सवाल पर शेखर ने काफी उत्साह दिखाया.

‘‘हांहां, जरूरजरूर, हमें भी साहित्यिक लोगों के दर्शन हो जाएंगे…’’

यह सुन सभी ने खुशी से तालियां बजाईं. पर मेरे तो होंठ ही सिल गए थे.

‘‘पर हम दोनों भी तो नौकरी करते हैं. आप कहीं और मीटिंग रख लेंगे तो ज्यादा अच्छा होगा,’’ मैं ने बहुत ही रूखेपन से जवाब दिया.

‘‘पर आप के पति तो काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं,’’ विजया बोली.

‘‘मैं बिस्कुट के पैकेट्स ले आऊंगा. चाय बाहर से मंगा लेंगे,’’ करण बोला.

‘‘बिलकुल नहीं. आप घर में मेहमान बन कर आ रहे हो… कोई कुछ नहीं लाएगा. हम ही घर में गरमगरम पकौड़े बना देंगे. खा कर देखिएगा, उंगलियां चाटते रह जाएंगे. मैं कविता भले ही नहीं करता हूं, पर बीवी की कविताएं तो सुनता ही हूं,’’ शेखर बोला.

उस वक्त हर कोई शेखर की प्रशंसा कर रहा था. उस के बाद तो हर कार्यक्रम हमारे

ही घर होने लगा. मेरा विरोध खत्म हुआ और धीरेधीरे मेरी भी इस में रुचि बढ़ने लगी. पर शेखर नीरस होने लगा. उसे उन लोगों पर गुस्सा आने लगा. मेरी कविताओं की सभी प्रशंसा करने लगे. बाहर से भी मुझो कविताओं के औफर्स आने लगे. मैं भी औफिस से छुट्टी ले कर सम्मेलनों में भाग लेने लगी. शेखर का गुस्सा अब शक में बदलने लगा था. वह अब उन लोगों के साथ मेरा नाम जोड़ने लगा था. शराब पी कर गालीगलौज करना और मुझो से मारपीट करना उस की आदत बन गई थी. कभीकभी तो वह इतनी मारपीट करता कि पिटाई के निशान भी शरीर पर दिखाई देते.

रोजरोज के झोगड़े से तंग आ कर आखिर मैं ने शेखर से तलाक लेने का फैसला कर लिया. पर मेरी तनख्वाह इतनी ज्यादा नहीं थी. शेखर बैंक में अफसर था. मेरे 17 और 15 साल के बेटे बुद्धिराज और युवराज भी उस के साथ रहना पसंद कर रहे थे. वजह सिर्फ एक थी. जो शानशौकत और पैसा वह दे सकता था, वह मैं नहीं दे सकती थी. आज सचमुच रिश्तेनातों के कोई माने नहीं रह गए हैं. भावनात्मक तौर से भी उन्हें मेरी कोई कद्र नहीं थी. कोर्ट ने भी उन्हें शेखर के साथ ही भेज दिया. मैं 1 कमरे के छोटे से मकान में रहने आ गई. कुछ दिनों बाद मैं ने अपील कर के कोर्ट से बच्चों की कस्टडी मांगी तो 1 बेटे बुद्धिराज की कस्टडी मुझो सौंप दी गई. पर मैं उस की जरूरतें पूरी करने में असमर्थ थी. परिणामस्वरूप उस का चिड़चिड़ापन बढ़ता गया और एक दिन वह खुद ही मुझो छोड़ कर अपने पिता के पास चला गया.

एक दिन मेरा मार्केटिंग विभाग में ट्रांसफर हो गया. इस डिपार्टमैंट में जाने के लिए लोग क्याक्या कोशिशें नहीं करते, क्योंकि यहां की दहलीज लांघते ही पैसों की बरसात होती थी. पर इस विभाग में कमर कस कर काम करना पड़ता था, इसलिए मैं यह विभाग नहीं चाहती थी. पर मन के किसी कोने में मुझो भी पैसों की चाह थी. बड़ा घर चाहिए था. फिर शेखर को दुत्कार कर मेरे बच्चे मेरे पास वापस आएं, ऐसी चाह भी थी. इसलिए मैं कुछ भी करने को तैयार थी. पहले टैंडर को मंजूरी देते वक्त मुझको1 लाख का औफर मिला था. औफिस के बाहर एक पेड़ के नीचे रुपयों का वह बंडल लेते वक्त मेरे हाथ थरथरा रहे थे. फिर उस के बाद मैं ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. मैं ने नया घर खरीद लिया.

उधर शेखर के कुकर्मों का घड़ा भर गया था. उस के खिलाफ शिकायत हुई और उस की जांचपड़ताल शुरू हुई. उसे सस्पैंड कर दिया गया और उस के घर को सील कर दिया गया. दोनों बच्चे मेरे पास आ गए और फिर कभी उन्होंने मेरे आलीशान मकान से जाने का नाम नहीं लिया. एक बात तो समझो आ गई कि आज की पीढ़ी को रिश्तेनातों और भावनाओं की परवाह नहीं. केवल पैसा ही सब कुछ होता है.

बी.एससी. करते ही बुद्धिराज की अच्छी नौकरी लग गई. मैं अब भी शेखर को याद करती थी. अब भी मेरा मन उस से मिलने को करता था. एक बैंक मामले के बाद उस ने मुझो फोन किया था, ‘‘बैंक वाले शायद तुम्हारी जांच कर सकते हैं,’’ वकील की सलाह ले लो.’’

उस वक्त अपने किए पर पछतावा होने की बात भी उस ने कही थी और मुझो भी यह सलाह दी कि मैं ऐसे गैरकानूनी काम छोड़ दूं.

पर तब मैं ने कहा था, ‘‘मुझो तुम्हारी सलाह नहीं चाहिए,’’ और फोन पटक दिया था.

फिर मैं ने बुद्धिराज की उस की पसंद की लड़की निकिता से शादी करा दी. मेरे

घर में पैसों की बरसात हो रही थी. सुबह 9 से रात के 9 बजे तक मैं औफिस में ही पिसती रहती थी पर मेरे घर का कायाकल्प हो चुका था. रोज शाम को बुद्धिराज और निकिता की उन के दोस्तों के साथ शराब की पार्टियां चलने लगी थीं. इधर मुझो पर एक जांच कमेटी बैठा दी गई थी और मेरे एमडी ने 1 महीना घर बैठने की सलाह दी थी. पर बुद्धिराज के कहने पर मैं घर नहीं बैठी और मैं ने फिर से औफिस जौइन कर लिया. तब एमडी ने सीधे मेरा सस्पैंड और्डर निकाल दिया.

घर बैठने के बाद घर का सारा नजारा मेरे सामने आया. घर पर खाली बैठना मुझो मंजूर नहीं था और बच्चों की हरकतें मुझो से देखी नहीं जाती थीं, इसलिए मैं ने विनया के घर जाना शुरू कर दिया. वहां पर हम ने फिर से कविताएं पढ़नालिखना शुरू कर दिया. विनया ने मुझो नौकरी से रिजाइन कर देने की सलाह दी, क्योंकि रिजाइन करने के बाद प्रौविडैंट फंड के क्व35 लाख मुझो मिलते. उन्हें बैंक में जमा करने पर उन से मिलने वाले ब्याज से आराम से मेरा घर खर्च चलता. उस के बाद मैं आजादी से कहीं भी घूमफिर सकती थी. वर्ल्ड टूर कर सकती थी. मुझो काम की चिंता नहीं होती. न ही कोई बंधन होता. मैं अपनी सारी ख्वाहिशें पूरी कर सकती थी.

फिर मैं ने फैसला कर लिया. बैंक में मेरा और बुद्धिराज का जौइंट अकाउंट था. वहां जा कर मैं ने सारे पैसे निकालने चाहे तो मैनेजर ने बताया कि बुद्धिराज ने कब के सारे पैसे निकाल लिए हैं. इस बारे में बुद्धिराज से पूछने पर वह मुझो पर ही बिफर पड़ा और चिल्ला कर मुझो से कहने लगा कि बैंक जाने से पहले एक बार मुझो से क्यों नहीं पूछा? मैनेजर न जाने क्या सोचेगा.

उस की इस हरकत ने मुझो सोचने पर मजबूर कर दिया और एक ठोस निर्णय लेते हुए मैं ने बुद्धिराज, निकिता और युवराज को कमरे में बुला कर अपना फैसला सुना दिया कि मैं नौकरी से त्यागपत्र दे रही हूं. प्रौविडैंट फंड के जो रुपए मिलेगे उन्हें बैंक में जमा करा दूंगी. उन से मिलने वाले ब्याज से अपना खर्चा चलाऊंगी. आज के बाद न मैं किसी को कुछ दूंगी और न किसी से कुछ लूंगी. यह मेरा घर है. आज के बाद यहां शराब की पार्टियां नहीं चलेंगी. तुम सब को मेरी मरजी से रहना होगा. अगर मंजूर हो तो ठीक वरना तुम सब अपनी राह चुन सकते हो.

मेरी बात सुन कर तीनों सकते में आ गए और मैं मौर्निंग वाक के लिए निकल पड़ी.

Family Story

Crime Story: आखिर क्यों- अंधभक्ति के कारण बर्बाद हुई रोली की जिंदगी

Crime Story: रोली बहुत देर तक अपनी मम्मी की बात पर विचार करती रही. कुछ गलत तो नहीं कह रही थी उस की मम्मी. परंतु रोली को अच्छे से पता था कि शिखर और उस के मातापिता रोली की बात को पूरी तरह से नकार देंगे. तभी बाहर ड्राइंगरूम में शिखर ने न्यूज लगा दी. चारों तरफ कोरोना का कहर मचा हुआ था. हर तरफ मृत्यु और बेबसी का ही नजारा था, तभी पापाजी चिंतित से बाहर निकले और शिखर से बोले, ‘‘वरुण को कंपनी ने 2 महीने का नोटिस दे दिया है.‘‘

वरुण शिखर की बहन का पति था. शिखर बोला, ‘‘पापा, चिंता मत कीजिए, वरुण टैलेंटेड लड़का है. कुछ न कुछ हो जाएगा, मैं 1-2 जगह बात कर के देखता हूं.‘‘

रोली रसोई में चाय बनाते हुए सोच रही थी, ‘आज वरुण हैं तो कल शिखर भी हो सकता है,’ चाय बनातेबनाते रोली ने दृढ़ निश्चय ले लिया था.

जब सभी लोग चाय की चुसकियां ले रहे थे, तो रोली बोली, ‘‘अगले हफ्ते मेरठ वाले गुरुजी यहीं पर आ रहे हैं. मैं चाहती हूं कि हम भी अपने घर पर यज्ञ करवाएं.

‘‘यज्ञ करवाने के पश्चात न केवल हमारा परिवार कोरोना के संकट से बचा रहेगा, बल्कि शिखर की नौकरी पर भी कोई आंच नहीं आएगी.‘‘

‘‘बस 50,000 रुपए का खर्च है, पर ये कोरोना पर होने वाले खर्च से तो बहुत सस्ता है शिखर.”

रोली की सास अपनी पढ़ीलिखी बहू के मुंह से ये बात सुन कर हक्कीबक्की रह गईं और बोलीं, ‘‘रोली, ये तुम क्या कह रही हो? चारों तरफ कोरोना का कहर है और तुम ऐसे में घर में यज्ञ करवाना चाहती हो?‘‘

रोली तुनकते हुए बोली, ‘‘हां मम्मीजी, आप को तो मेरी सब चीजों से दिक्कत है.’‘

‘‘आप खुद जपतप करें सब ठीक, पर अगर मैं परिवार की भलाई के लिए कुछ करवाना चाहूं तो आप को उस में भी दिक्कत है.‘‘

रोली के ससुर बोले, ‘‘रोली बेटा, ऐसी बात नहीं है, पर ये संभव नहीं है.

‘‘तुम्हें तो मालूम ही है कि हम ऐसे भीड़ इकट्ठी नहीं कर सकते हैं.‘‘

शिखर उठते हुए बोला, ‘‘रोली, मेरे पास ऐसे यज्ञपूजन पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं और शायद हम अब कोरोना से बच भी जाएं, परंतु उस यज्ञ के कारण हमारा पूरा परिवार जरूर कोरोना के कारण स्वाहा हो जाएगा.‘‘

रोली गुस्से में पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई. रात के 8 बज गए, लेकिन रसोई में सन्नाटा था. शिखर कमरे में गया और प्यार से बोला, ‘‘रोली गुस्सा थूक दो, आज खाना नहीं खिलाओगी क्या?‘‘

रोली चिल्लाते हुए बोली, ‘‘क्यों नौकरानी हूं तुम्हारी और तुम्हारे मम्मीपापा की?‘‘

‘‘अपनी इच्छा से मैं घर में एक काम भी नहीं कर सकती, पर जब काम की बारी आती है तो बस वह ही याद आती है.’‘

शिखर रोली को प्यार से समझाता रहा, परंतु वह टस से मस नहीं हुई.

शिखर और उस के मम्मीपापा की सारी कोशिशें बेकार हो गई थीं. रोली की आंखों पर गुरुजी के नाम की ऐसी पट्टी बंधी थी कि वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी.

रोली के मन में कोरोना का डर इस कदर हावी था कि वह किसी भी तरह कोरोना के पंजे से बचना चाहती थी.

रोली की मम्मी उसे रोज फोन पर बताती कि कैसे गुरुजी ने अपने तप से रोली के मायके में पूरे परिवार को कोरोना से पूरी तरह सुरक्षित कर रखा है.

रोली की मम्मी यह भी
बोलतीं, ‘‘अरे, हम लोग न तो मास्क लगाते हैं और न ही सेनेटाइजर का प्रयोग करते हैं. बस गुरुजी की भभूति लगा लेते हैं.‘‘

‘‘सारी कंपनियों में छंटनी और वेतन में कटौती हो रही है, पर तेरे छोटे भाई का तो गुरुजी के कारण ऐसे संकट काल में भी प्रमोशन हो गया है.‘‘

आज गुरुजी रोली के शहर देहरादून आ गए थे. रोली को पता था कि शिखर गुरुजी का यज्ञ घर पर कभी नहीं कराएगा और न ही कभी पैसे देगा.

रोली ने गुरुजी के मैनेजर से फोन पर बात की, तो उन्होंने कहा, ‘‘आप यहीं पर आ जाएं. तकरीबन 500 भक्त और भी हैं. गुरुजी के भक्तों ने ही गुरुद्वारा रोड पर एक हाल किराए पर ले लिया है…

‘‘आप बेझिझक यहां चली आएं,‘‘ गुरुजी के मैनेजर ने कहा.

रोली मन ही मन खुश थी, परंतु 50,000 रुपयों का इंतजाम कैसे करे? वह यही सोच रही थी, तभी रोली को ध्यान आया कि क्यों न वह अपने मायके से मिला हुआ सेट इस अच्छे काम के लिए दान कर दे.

सुबह काम करने के बाद रोली तैयार हो गई और शिखर और उस के मम्मीपापा से बोली, ‘‘मैं 2 दिन के लिए गुरुजी के शिविर में जा रही हूं.‘‘

‘‘मैं ने पैसों का बंदोबस्त कर लिया है. परिवार की खुशहाली के लिए यज्ञ कर के मैं परसों तक लौट आऊंगी.‘‘

शिखर की मम्मी बोलीं, ‘‘रोली, होश में तो हो ना…‘‘

‘‘हम तुम्हें कहीं नहीं जाने देंगे. तुम्हें मालूम है ना कि ये महामारी है और इस का वायरस बड़ी तेजी से फैलता है.‘‘

रोली गुस्से में बोली, ‘‘आप भी भूल रही हैं मम्मी कि मैं एक बालिग हूं. आप को शायद मालूम नहीं है कि जिस तरह का व्यवहार आप मेरे साथ कर रही हैं, वो घरेलू हिंसा के दायरे में आता है. यह एक तरह की मानसिक और भावनात्मक हिंसा है.‘‘

शिखर ने अपने मम्मीपापा से कहा, ‘‘जब रोली ने कुएं में छलांग लगाने का निर्णय ले ही लिया है, तो आप उसे रोकिए मत.‘‘

शिखर बिना कुछ बोले रोली को उस हाल के गेट तक छोड़ आया. हाल के गेट पर भीड़ देख शिखर ने रोली से कहा, ‘‘रोली, एक बार और सोच लो.‘‘

रोली मुसकराते हुए बोली, ‘‘मैं तो गुरुजी को घर पर बुलाना चाहती थी, पर तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की जिद के कारण मैं यहां पर हूं.‘‘

रोली जैसे ही हाल के अंदर पहुंची, बाहर गेट पर खड़े युवकों ने उस का मास्क उतरवा दिया और फिर गंगाजल से उस के हाथ धुलवाए.

अंदर धीमाधीमा संगीत चल रहा था. रोली ने देखा कि तकरीबन 300 लोग वहां थे. हर कोई गुरुजी के आगे सिर झुका कर श्रद्धा के साथ दान कर रहा था.

रोली भी गुरुजी के आगे हाथ जोड़ते हुए बोली, ‘‘गुरुजी, मेरे पास तो बस ये गहने हैं देने के लिए.‘‘

गुरुजी शांत स्वर में बोले, ‘‘बेटी, दान से अधिक भाव का महत्व है. तुम जो भी पूरी श्रद्धा से भेंट करोगी, वह हमें स्वीकार है.‘‘

सात्विक भोजन, सात्विक माहौल, न कोई महामारी का डर और न ही चिंता. रोली को इतना हलका तो पहले कभी महसूस नहीं हुआ था. उस का गुस्सा भी काफूर हो गया था. अब तो रोली को अपने परिवार की बुद्धि पर तरस आ रहा था कि वो ऐसे अच्छे आनंदमय वातावरण से वंचित रह गए हैं.

पूरा दिन गुरुजी के प्रवचन और यज्ञ में बीत गया था. रात में जब रोली सोने के लिए कमरे में गई तो देखा कि उस छोटे से कमरे में 8 महिलाओं के बिस्तर लगे हुए थे.

रोली पहले तो हिचकिचाई, पर फिर उसे गुरुजी की कही हुई बात याद आई कि कैसे हम ने डरडर कर इस वायरस को अपने ऊपर हावी कर रखा है. ये वायरस मनुष्य को मनुष्य से दूर करना चाहता है. दरअसल, ऐसे पूजाहवन से ही इस महाकाल वायरस का सफाया हो जाएगा. ये ऊपर वाले का इशारा है हम मूर्ख मनुष्यों के लिए कि हम उन की शरण में जाएं. अगर विज्ञान कुछ करने में सक्षम होता, तो क्यों पूरे विश्व मे त्राहित्राहि मची रहती.

ये सब बातें याद आते ही रोली शांत मन से आंखें बंद कर के सो गई. सुबह 6 बजे रोली की आंखें खुलीं तो उसे लगा, जैसे वह रूई की तरह हलकी हो गई है.

गुरुजी को स्मरण कर के रोली ने सब से पहले अपनी मम्मी को फोन लगाया और फिर शिखर को फोन कर अपना हालचाल बताया.

अगला दिन भी भजन, प्रवचन और ध्यान में ऐसे बीत गया कि रोली को पता भी नहीं चला कि कब शाम हो गई. तकरीबन 500 लोग इस पूजा में सम्मलित थे, परंतु न तो कोई आपाधापी थी, न ही कोई घबराहट.

शाम के 7 बजे रोली ने गुरुजी को प्रणाम किया, तो गुरुजी ने उसे भभूति देते हुए कहा, ‘‘बेटी, ये भभूति तुम्हारी हर तरह से रक्षा करेगी.‘‘

जब रोली बाहर निकली तो देखा कि शिखर कार में बैठा उस की प्रतीक्षा कर रहा था.

रोली बिना कोई प्रतिक्रिया किए कार में बैठ गई. घर आ कर भी वह बेहद शांत और संभली हुई लग रही थी. रोली ने किसी से कुछ नहीं कहा और न ही उस के सासससुर ने उस से कुछ पूछा.

अगले रोज सुबहसुबह शिखर ने रोली को खुशखबरी सुनाई कि बहुत दिनों से जिस कंपनी में उस की बात अटकी हुई थी, वहां से बात फाइनल हो गई है. 1 अगस्त को उसे पूना में ज्वाइनिंग के लिए जाना है.

रोली नाचते हुए बोली, ‘‘ये सब गुरुजी की कृपा है.‘‘

शिखर बोला, ‘‘अरे वाह, मेहनत मैं करूं और क्रेडिट तुम्हारे गुरुजी ले जाएं.‘‘

जब से रोली गुरुजी के पास से आई थी, उस ने सावधानी बरतनी छोड़ दी थी. शिखर की नौकरी के कारण रोली का विश्वास और पक्का हो गया था.

और फिर एक हफ्ते बाद रोली को वह खुशखबरी भी मिल गई, जिस का पिछले 5 साल से इंतजार कर रही थी. वह मां बनने वाली थी. घर में ऐसा लग रहा था, चारों ओर खुशियों की बरसात हो रही है. रोली को पक्का विश्वास था कि देरसवेर ही सही, शिखर और उस का परिवार भी गुरुजी की भक्ति में आ जाएगा. पर, जब 5 दिन बाद रोली को बुखार हो गया, तो रोली के सासससुर और शिखर के होश उड़ गए थे. परंतु रोली ने कोई दवा नहीं ली, बल्कि गुरुजी के यहां से लाई भभूति चाट ली.

शिखर ने रोली को टेस्ट कराने के लिए भी कहा, परंतु रोली ने कहा, ‘‘मैं ने गुरुजी से फोन पर बात की थी. मुझे वायरल हुआ है. गुरुजी ने कहा है कि परसों तक सब ठीक हो जाएगा.‘‘

पर, उसी रात अचानक ही रोली को सांस लेने में दिक्कत होने लगी. रोली को महसूस हो रहा था, जैसे पूरे वातावरण में औक्सीजन की कमी हो गई हो.

शिखर रात में ही रोली को ले कर अस्पताल भागा. बहुत मुश्किलों से रोली को किसी तरह अस्पताल में दाखिला मिला. पुलिस ने पूछताछ की, तो एक के बाद एक लगभग 500 लोगों की एक लंबी कोरोना चेन बन गई.

गुरुजी का फोन स्विच औफ आ रहा था. यज्ञ में शामिल हुए परिवारों का जब कोरोना टेस्ट हुआ तो ऐसा लगा, कोरोना बम का विस्फोट हो गया है. जहां पहले शहर में बस गिनती के 50 मामले थे, वे अब सीधे 500 पार कर गए थे.

रोली शर्म के कारण आंख नहीं उठा पा रही थी. काश, उस ने शिखर और उस के परिवार की बात मान ली होती. रोली को अपने से ज्यादा पेट में पल रहे बच्चे की चिंता हो रही थी. उधर शिखर को रोली के साथसाथ अपने डायबिटिक मातापिता की भी चिंता हो रही थी. शिखर को समझ नहीं आ रहा था कि क्यों रोली की इस अंधभक्ति का नतीजा रोली के साथसाथ पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा. आखिर कब तक हम पढ़ेलिखे लोग भी अपनेआप को इस तरह अंधविश्वास के कुएं में धकेलते रहेंगे? आखिर क्यों हम आज भी हर समस्या का शार्टकट ढूंढ़ते हैं? आखिर क्यों…?

Crime Story

Hindi Parivarik Kahani: मर्यादा- आखिर क्या हुआ निशा के साथ

Hindi Parivarik Kahani: देर रात गए घर के सारे कामों से फुरसत मिलने पर जब रोहिणी अपने कमरे में जाने लगी तभी उसे याद आया कि वह छत से सूखे हुए कपड़े लाना तो भूल ही गई है. बारिश का मौसम था. आसमान साफ था तो उस ने कपड़ों के अलावा घर भर की चादरें भी धो कर छत पर सुखाने डाल दी थीं. थकान की वजह से एक बार तो मन हुआ कि सुबह ले आऊंगी, लेकिन फिर ध्यान आया कि अगर रात में कहीं बारिश हो गई तो सारी मेहनत बेकार चली जाएगी. फिर रोहिणी छत पर चली गई.

वह कपड़े उठा ही रही थी कि छत के कोने से उसे किसी के बात करने की धीमीधीमी आवाज सुनाई दी. रोहिणी आवाज की दिशा में बढ़ी. दायीं ओर के कमरे के सामने वाली छत पर मुंडेर से सट कर खड़ा हुआ कोई फोन पर धीमी आवाज में बातें कर रहा था. बीचबीच में हंसने की आवाज भी आ रही थी. बातें करने वाले की रोहिणी की ओर पीठ थी इसलिए उसे रोहिणी के आने का आभास नहीं हुआ, मगर रोहिणी समझ गई कि यह कौन है.

रोहिणी 3-4 महीनों से निशा के रंगढंग देख रही थी. वह हर समय मोबाइल से चिपकी या तो बातें करती रहती या मैसेज भेजती रहती. कालेज से आ कर वह कमरे में घुस कर बातें करती रहती और रात का खाना खाने के बाद जैसे ही मोबाइल की रिंग बजती वह छत पर भाग जाती और फिर घंटे भर बाद वापस आती.

रोहिणी के पूछने पर बहाना बना देती कि सहेली का फोन था या पढ़ाई के बारे में बातें कर रही थी. लेकिन रोहिणी इतनी नादान नहीं है कि वह सच न समझ पाए. वह अच्छी तरह जानती थी कि निशा फोन पर लड़कों से बातें करती है. वह भी एक लड़के से नहीं कई लड़कों से.

‘‘निशा इतनी रात गए यहां अंधेरे में क्या कर रही हो? चलो नीचे चलो,’’ रोहिणी की कठोर आवाज सुन कर निशा ने चौंक कर पीछे देखा.

‘‘चल यार, मैं तुझे बाद में काल करती हूं बाय,’’ कह कर निशा ने फोन काट दिया और बिना रोहिणी की ओर देखे नीचे जाने लगी.

‘‘तुम तो एकडेढ़ घंटा पहले छत पर आई थीं निशा, तब से यहीं हो? किस से बातें कर रही थीं इतनी देर तक?’’ रोहिणी ने डपट कर पूछा.

निशा बिफर कर बोली, ‘‘अब आप को क्या अपने हर फोन काल की जानकारी देनी पड़ेगी चाची? आप क्यों हर समय मेरी पहरेदारी करती रहती हैं? किस ने कहा है आप से? मेरा दोस्त है उस से बातें कर रही थी.’’

‘‘निशा, बड़ों से बातें करने की भी तमीज नहीं रही अब तुम्हें. मैं तुम्हारे भले के लिए ही तुम्हें टोकती हूं,’’ रोहिणी गुस्से से बोली.

‘‘मेरा भलाबुरा सोचने के लिए मेरी मां हैं. सच तो यह है कि आप मुझ से जलती हैं. आप की बेटी मेरे जितनी सुंदर नहीं है. उस का मेरे जैसा बड़ा सर्कल नहीं है, दोस्त नहीं हैं. इसीलिए मेरे फोन काल से आप को जलन होती है,’’ निशा कठोर स्वर में बोल कर बुदबुदाती हुई नीचे चली गई.

कपड़ों को हाथ में लिए हुए रोहिणी स्तब्ध सी खड़ी रह गई. उस की गोद में पली लड़की उसे ही उलटासीधा सुना गई.

रोहिणी की बेटी ऋचा निशा से कई गुना सुंदर है, लेकिन हर समय सादगी से रहती है और पढ़ाई में लगी रहती है.

रोहिणी बचपन से ही उसे समझती आई है और ऋचा ने बचपन से ले कर आज तक उस की बताई बात का पालन किया है. वह अपने आसपास फालतू भीड़ इकट्ठा करने में विश्वास नहीं करती. तभी तो हर साल स्कूल और कालेज में टौप करती आई है.

लेकिन निशा संस्कार और गुणों पर ध्यान न दे कर हर समय दोस्तों व सहेलियों से घिरे रहना पसंद करती है. तारीफ पाने के लिए लेटैस्ट फैशन के कपड़े, मेकअप बस यही उस का प्रिय शगल है और इसी में वह अपनी सफलता समझती है. तभी तो ऋचा से 2 साल बड़ी होने के बावजूद भी उसी की क्लास में है.

नीचे जा कर रोहिणी ने ऋचा के कमरे में झांक कर देखा. ऋचा पढ़ रही थी, क्योंकि वह पी.एस.सी. की तैयारी कर रही थी. रोहिणी ने अंदर जा कर उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और अपने कमरे में आ गई.

‘जिंदगी में हर बात का एक नियत समय होता है. समय निकल जाने के बाद सिवा पछतावे के कुछ हासिल नहीं होता. इसलिए जीवन में अपने लक्ष्य और प्राथमिकताएं तय कर लेना और उन्हीं के अनुसार प्रयत्न करना,’ यही समझाया था रोहिणी ने ऋचा को हमेशा. और उसे खुशी थी कि उस की बेटी ने जीवन का ध्येय चुनने में समझदारी दिखाई है. पूरी उम्मीद है कि ऋचा अपने लक्ष्य प्राप्ति में अवश्य सफल होगी.

अगले दिन ऋचा और निशा के कालेज जाने के बाद रोहिणी ने अपनी जेठानी से बोली कि निशा आजकल रोज घंटों फोन पर अलगअलग लड़कों से बातें करती है. आप जरा उसे समझाइए. लेकिन बदले में जेठानी का जवाब सुन कर वह अवाक रह गई.

‘‘करने दे रे, यही तो दिन हैं उस के हंसनेखेलने के. बाद में तो उसे हमारी तरह शादी की चक्की में ही पिसना है. बस बातें ही तो कर रही है न और वैसे भी सभी लड़के एक से एक अमीर खानदान से हैं.’’

रोहिणी को समझते देर नहीं लगी कि जेठानी की मनशा क्या है. वैसे भी उन्होंने निशा को ऐसे ढांचे में ही ढाला है कि अमीर खानदान में शादी कर के ऐश से रहना ही उस का एकमात्र ध्येय है. अमीर परिवार के इतने लड़कों में से वह एक मुरगा तो फांस ही लेगी.

रोहिणी को जेठानी की बात अच्छी नहीं लगी, लेकिन उस ने समझ लिया कि उन से और निशा से कुछ भी कहनासुनना बेकार है. वह ऋचा को उन दोनों से भरसक दूर रखने का प्रयत्न करती. वह नहीं चाहती थी कि ऋचा का ध्यान इन बातों पर जाए.

कई महीनों तक रोहिणी ऋचा की पढ़ाई को ले कर व्यस्त रही. उस ने निशा को टोकना छोड़ दिया और अपना सारा ध्यान ऋचा पर केंद्रित कर लिया. आखिर बेटी के भविष्य का सवाल है. रोहिणी अच्छी तरह समझती थी कि बेटी को अच्छे संस्कार दे कर बड़ा करना और बुरी सोहबत से बचा कर रखना एक मां का फर्ज होता है.

एक दिन रोहिणी ने निशा के हाथ में बहुत महंगा मोबाइल देखा तो उस का माथा ठनका. निशा और उस की मां की आपसी बातचीत से पता चला कि कुछ दिन पहले किसी हिमेश नामक लड़के से निशा की दोस्ती हुई है और उसी ने निशा को यह मोबाइल उपहार में दिया है.

जेठानी रोहिणी की ओर कटाक्ष कर के कहने लगीं कि लड़का आई.ए.एस. है. खानदान भी बहुत ऊंचा और अमीर है. निशा की तो लौटरी खुल गई. अब तो यह सरकारी अफसर की पत्नी बनेगी.

रोहिणी को इस बात पर बड़ी चिंता हुई. कुछ ही दिनों की दोस्ती पर कोई किसी पर इतना पैसा खर्च कर सकता है, यह बात उस के गले नहीं उतर रही थी.

उस ने अपने पति नीरज से बात की तो नीरज ने कहा, ‘‘मैं भी धीरज भैया को कह चुका हूं, लेकिन तुम तो जानती हो, वे भाभी और बेटी के सामने खामोश रहते हैं. तुम जबरन तनाव मत पालो. ऋचा पर ध्यान दो.

जब उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की चिंता नहीं है तो हम क्यों करें? समझाना हमारा काम था हम ने कर दिया.’’

रोहिणी को नीरज की बात ठीक लगी. उस ने तो निशा को भी अपनी बेटी समान ही समझा, पर अब जब मांबेटी दोनों अपने आगे किसी को कुछ समझती ही नहीं तो वह भी क्या करे.

अगले कुछ महीनों में तो निशा अकसर हिमेश के साथ घूमने जाने लगी. कई बार रात में पार्टियां अटैंड कर के देर से घर आती. उस के कपड़ों से महंगे विदेशी परफ्यूम की खुशबू आती.

कपड़े दिन पर दिन कीमती होते जा रहे थे. रोहिणी ने कभी ऋचा और निशा में भेद नहीं किया था, इसलिए उस के भविष्य के बारे में सोच कर उस के मन में भय की लहर दौड़ जाती. पर वह मन मसोस कर मर्यादा का अंशअंश टूटना देखती रहती. घर में 2 विपरीत धाराएं बह रही थीं.

ऋचा सारे समय अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहती और निशा सारे समय हिमेश के साथ अपने सुनहरे भविष्य के सपनों में खोई रहती. उस के पैर जमीन पर नहीं टिकते थे. उस के सुंदर दिखने के उपायों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही थी. वह ऋचा और रोहिणी को ऐसी हेय दृष्टि से देखती थी मानो हिमेश का सारा पैसा और पद उसी का हो.

ऋचा के बी.ए. फाइनल और पी.एस.सी. प्रिलिम्स के इम्तिहान हो गए, लेकिन आखिरी पेपर दे कर आने के तुरंत बाद ही वह अन्य परीक्षा की तैयारियों में जुट गई. उस की दृढ़ता और विश्वास देख कर रोहिणी और नीरज भी आश्वस्त थे कि वह पी.एस.सी. की परीक्षा में जरूर सफल हो जाएगी.

और वह दिन भी आ गया जब रोहिणी और नीरज के चेहरे खिल गए. उन के संस्कार जीत गए. ऋचा की मेहनत सफल हो गई. वह प्रिलिम्स परीक्षा पास कर गई और साथ ही बी.ए. में पूरे विश्वविद्यालय में अव्वल रही.

लेकिन इस खुशी के मौके पर घर में एक तनावपूर्ण घटना घट गई. निशा रात में हिमेश के साथ उस की बर्थडे पार्टी में गई. घर में वह यही बात कह कर गई कि हिमेश ने बहुत से फ्रैंड्स को होटल में इन्वाइट किया है. खानापीना होगा और वह 11 बजे तक घर वापस आ जाएगी. लेकिन जब 12 बजे तक निशा घर नहीं आई तो घर में चिंता होने लगी. वह मोबाइल भी रिसीव नहीं कर रही थी. रात के 2 बजे तक उस की सारी सहेलियों के घर पर फोन किया जा चुका था पर उन में से किसी को भी हिमेश ने आमंत्रित नहीं किया था. जिस होटल का नाम निशा ने बताया था नीरज वहां गया तो पता चला कि ऐसी कोई बर्थडे पार्टी वहां थी ही नहीं.

गंभीर दुर्घटना की आशंका से सब का दिल धड़कने लगा. रोहिणी जेठानी को तसल्ली दे रही थी पर उन के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. वे रोहिणी से नजरें नहीं मिला पा रही थीं. सुबह 4 बजे जब वे लोग पुलिस में रिपोर्ट करने की सोच रहे थे कि तभी एक गाड़ी तेजी से आ कर दरवाजे पर रुकी और तेजी से चली गई. कुछ ही पलों बाद निशा अस्तव्यस्त और बुरी हालत में घर आई और फूटफूट कर रोने लगी.

उस की कहानी सुन कर धीरज और उस की पत्नी के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. रोहिणी और नीरज अफसोस से भर उठे.

बर्थडे पार्टी का बहाना बना कर हिमेश निशा को एक दोस्त के फार्म हाउस में ले गया. वहां उस के कुछ अधिकारी आए हुए थे. उसने निशा से उन्हें खुश करने को कहा. मना करने पर वह गुस्से से चिल्लाया कि महंगे उपहार मैं ने मुफ्त में नहीं दिए. तुम्हें मेरी बात माननी ही पड़ेगी. उपहार लेते समय तो हाथ बढ़ा कर सब बटोर लिया और अब ढोंग कर रही हो. और फिर पता नहीं उस ने निशा को क्या पिला दिया कि उस के हाथपांव बेदम हो गए और फिर…

कहां तो निशा उस की पत्नी बनने का सपना देख रही थी और हिमेश ने उसे क्या बना दिया. हिमेश ने धमकी दी थी कि किसी को बताया तो…

रोहिणी सोचने लगी अगर मर्यादा का पहला अंश भंग करने से पहले ही निशा सचेत हो जाती तो आज अपनी मर्यादा खो कर न आती.

निशा के कानों में रोहिणी के शब्द गूंज रहे थे, जो उन्होंने एक बार उस से कहे थे कि मर्यादा भंग करते जाने का साहस ही हम में एकबारगी सारी सीमाएं तोड़ डालने का दुस्साहस भर देता है.

वाकई एकएक कदम बिना सोचेसमझे अनजानी राह पर कदम बढ़ाती वह आज गड्ढे में गिर गई थी.

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