बोझ: भाग 3- सुबोध के होश क्यों उड़ गए

धीरेधीरे शादी के 11 साल गुजर गए. पर मैं एक बेटे की मां न बन सकी. मेरी सिर्फ एक बेटी थी. इस बीच दीर्घा से सुबोध का तलाक हो गया. एक दिन मैं ने सुबोध को अपनी मां से कहते सुना, ‘‘क्यों न दीर्घा को वापस ले आया जाए?’’

‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? बेहतर होगा तुम परिस्थितियों से सम झौता करो. बेटी की परवरिश बेटे की तरह करो.’’

‘‘मम्मी, मु झे बेटा चाहिए.’’

‘‘डाक्टर ने क्या कहा?’’

‘‘वे कुछ भी कहें. परंतु मैं अब और इंतजार नहीं कर सकता. मु झे बेटा चाहिए.’’

बेटे की चाह में तुम 2 बार दीर्घा का ऐबौर्शन करा चुके हो. यह अच्छी बात नहीं.

अब क्षण भर की चुप्पी के बाद सुबोध बोला, ‘‘क्यों न दीर्घा से अपना बेटा वापस ले आया जाए?’’

‘‘कैसी बेतुकी बात कर रहो हो? जिद कर के तुम ने दीर्घा के रहते सुधा के साथ विवाह किया. इस से उस की जिंदगी तो तुम ने बरबाद कर ही दी. अब उस के बच्चे को ला कर घर की शांति भंग करना चाहते हो?’’

‘‘कुछ भी हो मैं अपने बच्चे को नहीं छोड़ सकता.’’

‘‘यह कभी संभव नहीं होगा. कोई मां

अपने कलेजे के टुकड़े को इतनी आसानी से नहीं देगी. बच्चा 11 साल का हो गया है. वह आएगा ही नहीं.’’

‘‘तब मैं दीर्घा से भी साथ चलने के लिए कहूंगा.’’

‘‘यह कभी संभव नहीं.’’

इन बातों के बाद जो मैं ने सुनी थी, सुबोध मेरे कमरे में आया. उस का दोहरा चरित्र देख कर मेरा मन टूट चुका था.

‘‘मैं ने तुम दोनों की बातें सुन ली है,’’ मेरा स्वर तल्ख था.

‘‘फिर तो कहनेसुनने को कुछ रह ही

नहीं गया.’’

‘‘क्यों नहीं रह गया? तुम ने सम झ क्या रखा है? जब खूबसूरत औरत की जरूरत थी तो मु झे ले आए. अब बुढ़ापे की चिंता लगी तो दीर्घा अच्छी लगने लगी. एक बार भी नहीं सोचा कि मेरा क्या होगा? और दीर्घा के बारे में तो कभी सोचा ही नहीं कि उस का क्या हो रहा होगा.’’

‘‘मैं अपनी गलती सुधारना चाहता हूं.’’

‘‘ झूठ मत बोलो. अपने दोगले चरित्र को गलती का नाम मत दो.’’

‘‘तुम कुछ भी सोचो पर मैं पीछे हटने

वाला नहीं.’’

‘‘तो मैं भी तुम्हें आसानी से छोड़ने वाली नहीं. तुम ने 2 जिंदगियां बरबाद की हैं. उस का हिसाब देना होगा.’’

मेरा तल्ख तेवर देख वह नरम पड़ गया. वजह जो भी हो मु झे सम झाने के मूड में

आ गया.

‘‘दीर्घा नहीं आएगी. सिर्फ मैं अपने बच्चे को यहां ले आऊंगा.’’

‘‘मु झे बहकाने की कोशिश मत करो.

जिस मां की जिंदगी का एकमात्र सहारा ही

वह बच्चा हो वह क्या आसानी से देने के लिए तैयार होगी?’’

‘‘कोशिश करने में हरज ही क्या है?’’

‘‘अगर बच्चे की शर्त पर दीर्घा तुम से पुनर्विवाह के लिए तैयार हो जाए तब क्या करोगे?’’

‘‘ऐसा हरगिज नहीं होगा.’’

कुछ सोच कर उसे एक मौका देने के लिए मैं तैयार हो गई. मेरे ससुर तो पहले से ही दीर्घा के पक्ष में थे, इसलिए उन्होंने अपनी रजामंदी देने में कोई हीलाहवाली नहीं की.

सुबोध दीर्घा के पास गया तो उसे देखते ही वह बिफरी, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां आने की? मैं ने तुम जैसा बेशर्म नहीं देखा.’’

‘‘बच्चे का मोह खींच लाया.’’

‘‘जब 10 साल मैं ने इसे अपने आंचल में छिपा कर हर दुखदर्द  झेल कर पालापोसा, तब तो तुम ने एक बार भी इस की खबर नहीं ली. रासरंग में डूबे रहे. अब जिंदगी की वास्तविकता सम झ में आई तो बच्चा लेने चले आए.’’

‘‘मेरे गुनाह माफी लायक नहीं.’’

‘‘फिर भी चले आए. तुम ने न तो अच्छा पति बनने के गुण हैं न पिता.’’

 

बात बनते न देख सुबोध ने दूसरा चारा

फेंका, ‘‘क्या हम फिर से एकसाथ नहीं

रह सकते?’’

‘‘काठ की हांडी एक बार चढ़ती है. जब मैं अपने सुहाग व बच्चे के भविष्य के लिए तुम्हारे सामने गिड़गिड़ा रही थी तब तो तुम ने मु झे दुत्कार कर भगा दिया. अब किस मुंह से साथ रहना चाहते हो?’’

हर मानमनौअल के बाद भी दीर्घा नहीं मानी तब सुबोध ने कानून का भय दिखाया. दीर्घा फिर भी नहीं मानी. तब हारे हुए जुआड़ी की तरह सुबोध इलाहाबाद वापस लौट आया. उस का उतरा हुआ चेहरा देख कर सभी को सम झते देर न लगी कि हुआ क्या? इस बीच मैं ने मन बना लिया था कि उस के साथ नहीं रहूंगी. जबकि यह फैसला मु झे उसी समय ले लेना चाहिए था जब उस ने अपनी शादी का सच छिपाया था. जो अपनी पत्नी, बच्चे का नहीं हुआ वह मेरा क्या होगा? तब जमाने की रुसवाइयों का खयाल कर के मैं चुप रही. आज फिर से उस का वही दोहरा चरित्र सामने आ गया जो दीर्घा के लिए था. मैं ने मन को कड़ा किया और एक खत लिख कर हमेशा के लिए मायके चली आई. मैं ने लिखा-

सुबोध,

शादी के 8 साल बाद भी तुम मु झे सम झ नहीं पाए. अगर सम झ पाते तो जरूर तुम्हें मेरी भावनाओं का खयाल होता. हकीकत तो यह है कि तुम अव्वल दर्जे के खुदगर्ज हो. मैं ऐसे आदमी के साथ रहना हरगिज पसंद नहीं करूंगी. लिहाजा हमेशा के लिए घर छोड़ कर जा रही हूं.

खत पढ़ कर तेजी से चल कर वह अपनी मां के पास आया, ‘‘मम्मी, तुम ने उसे जाने

क्यों दिया?’’

‘‘बेटा, मैं ने उसे रोकने की भरसक

कोशिश की.’’

उस की स्थिति पागलों की भांति हो गई. उस ने मु झे फोन लगाया, ‘‘क्या बचपना है सुधा?’’

‘‘मु झे परेशान मत करो. मैं ने वकील से बात कर ली है. तुम्हें तलाक मिल जाएगा.’’

सुबोध ने कुछ सोच कर फोन काट दिया. मेरे सिर से एक बहुत बड़ा बो झ उतर चुका था. द्य

 

डंकी को लेकर डरे शाहरुख, क्रिटिक्स को लगे धमकाने

कारपोरेट और बल्क बुकिंग की मदद से अपनी पिछली दो फिल्मों ‘पठान’ और जवान’ को सफल सिद्ध करा चुके अभिनेता शाहरुख खान इन दिनों 22 दिसंबर को प्रदर्शिात होने वाली अपनी नई फिल्म ‘‘डंकी’ को लेकर आशंकित है.फिल्म ‘‘डंकी’’ के टीजर के अलावा दो गाने और ट्रेलर सोशल मीडिया पर रिलीज किए जा चुके हैं.जिनसे यह बात उभर कर आती है कि फिल्म ‘डंकी’ लोगों को पसंद नही आने वाली.यॅूं तो ‘डंकी’ के टे्लर को सोशल मीडिया पर एक सौ तीस मिलियन व्यूज मिल चुके हैं.मगर शाहरुख खान अच्छी तरह से समझते है कि यह सारे फेक/गलत आंकड़े हैं. यह आंकड़े तो उन्ही के पैसे पर पल रही पीआर व मार्केटिंग एजंसी द्वारा कम्प्यूटर पर खेल करके दर्शकों को धोखा देने के लिए बताए जा रहे हैं.पर उन्हे पता है कि अब दर्शक मूर्ख बनने से रहा.

यही वजह है कि टीजर या किसी गाने को जितने व्यूज सोशल मीडिया पर मिलते हैं ,उसका पांच प्रतिशत दर्शक भी फिल्म देखने सिनेमाघर नहीं पहुॅचता.अंदर से हकीकत को समझने वाले शाहरुख खान इन दिनों काफी बेचैन हैं.सूत्रों का दावा है कि इसी बेचैनी के चलते शाहरुख खान ने अपने कुछ विश्वस्त लोगों को बुलाकर फिल्म ‘‘डंकी’’ दिखाकर उनकी प्रतिक्रिया ली.लोगों को फिल्म पसंद नही आयी.तो अब शाहरुख खान इसी योजना पर काम कर रहे हैं कि उनकी फिल्म को एडवांस बुकिंग ज्यादा से ज्यादा मिल जाए और फिल्म सिनेमाघर पहुंचे,उससे पहले कम से कम तीन दिन की टिकटें सर्वाधिक बिक जाएं.

इसी सोच के साथ शाहरुख खान ने आनन फानन में एक नया प्रमोशनल गाना लिखवाया, उसे रिकार्ड करने के बाद फिल्म के निर्देशक राज कुमार हिरानी के साथ आबू धाबी जाकर तीन दिन में इस प्रमोशनल गाने की शूटिंग कर खुशी खुशी वापस आए.क्योंकि वह अपनी बेटी सुहाना खान की पहली फिल्म ‘‘द आर्चीज’’ का प्रीमियर कराना चाहते थे.

मगर ‘द आर्चीज’ का प्रीमियर कराना उनके लिए ही घातक बन गया.जी हाॅ! उनकी बेटी सुहाना खान के कैरियर की पहली फिल्म ‘‘द आर्चीज’’ भी  टें बोल गयी.और अब शाहरुख खान शुक्र मना रहे हैं कि अच्छा हुआ कि उनकी बेटी सुहाना खान की फिल्म ‘‘द आर्चीज’’ सिनेमाघरों की बजाय ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘नेटफ्लिक्स’’ पर स्ट्रीम हो रही है.अब शाहरुख खान को अपनी बेटी की फिल्म व उसके अभिनय से फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों को रूबरू कराने के लिए फिल्म ‘द आर्चीज’ का प्रीमियर आयोजित करने का फैसला भी उन्हें गलत लग रहा है. सूत्रों का दावा है कि शाहरुख खान के अति करीबी लोगों से मिली प्रतिक्रिया से उन्हे काफी निराशा हुई.अंततः ‘द आर्चीज’ को मीडिया में भी अच्छी प्रतिक्रियाएं नहीं मिली. कई फिल्म आलोचको ने ‘द आर्चीज’ को जीरो स्टार दिया है.

इसके बाद शाहरुख खान ने खुलेआम सोशल मीडिया पर अपने आलोचकों को धमकाना शुरू कर दिया है.सोशल मीडिया पर एक आलोचक को धमकाते हुए शाहरुख खान ने अपनी पीआर टीम से आग्रह किया है कि जिन लोगों के पेट में उनकी फिल्म ‘डंकी’ को लेकर अपच हो गयी है,ऐसे लोगों का अच्छी दवा देकर इलाज किया जाए.अब सवाल उठ रहा है कि क्या शाहरुख खान अपने आलोचकों को धमकी देकर उनका मुंह बंद कर अपनी फिल्म को सफलता दिला पाएंगे? क्या दर्शक  बेवकूफ है.

शाहरुख खान को आलोचको को धमकाने की बजाय अपनी फिल्म ‘‘डंकी’’ का ठीक से प्रचार करने पर धन देना चाहिए.अभी तक इस फिल्म का प्रचार बहुत खराब हुआ है.फिल्म का टीजर ,दो गानों और ट्रलेर ने निराश किया है.उम्मीद है कि फिल्म के प्रमोशनल सांग से कुछ उम्मीद बन जाएगी.

वायलेंस को ग्लोरिफाई करती फिल्में

संदीप रेड्डी वांगा की फिल्म ‘एनिमल’ में अभिनेता रणवीर कपूर के अभिनय की बहुत तारीफ की जा रही है, वहीं दूसरी ओर इसकी बुराई भी खूब हो रही है. फिल्म में हिंसक और इंटिमेट सीन्स को लेकर तमाम तरह की बातें कही जा रही हैं. कुछ लोग तो ‘एनिमल’ के कंटेंट पर भी सवाल उठा रहे हैं. यही नहीं, फिल्म के मुख्य किरदार रणविजय यानि रणवीर कपूर को बहुत ही हिंसक और महिला विरोधी और स्त्रियों के अस्तित्व पर बड़ा आघात करने वाली बताया जा रहा है. कई सेलेब्स ने इस फिल्म का विरोध भी किया है. सिंगर स्वानंद किरकिरे ने तो ‘एनिमल’ को भारतीय सिनेमा को शर्मसार करने वाली फिल्म बताया है. अभिनेता महेश ठाकुर ने हिंसात्मक फिल्मों को परिवार समाज और यूथ की मानसिकता के लिए बहुत प्रभावशाली बताया है, जिसे कम करना जरुरी है. फिल्मों में मनोरंजन है ही नहीं, जबकि फिल्मों की कहानी की मूल में मनोरंजन होना जरुरी होता है. यही वजह है कि आजकल व्यक्ति पडोसी में चोरी होने पर खुद के घर की ताले को मजबूत करता है, ताकि उन्हें कुछ न हो. मीडिया को इसमें समन्वित रूप से भागीदारी होने की जरुरत है, तभी जागरूकता बढ़ेगी.

मानव भावनाओं का तीव्र प्रदर्शन

संदीप रेड्डी ने इससे पहले हिंसक फिल्म कबीर सिंह बनाई थी, उसमे भी उन्होंने मानव भावनाओं को तीव्र रूप में प्रस्तुत किया था, हालांकि कुछ को फिल्म में शाहिद कपूर के आक्रामक एक्टिंग को पसंद किया गया, लेकिन बहुतों को फिल्म की कांसेप्ट पसंद नहीं आई. अधिकतर युवा दर्शकों ने इसे बीमार मानसिकता वाले व्यक्ति की संज्ञा दी, जो आज के परिवेश में सही नहीं बैठती, जहाँ महिलाएं प्यार को पाने के लिए कुछ भी सहने के लिए आज तैयार नहीं होती यही वजह है कि युवाओं में डिवोर्स की संख्या लगातार बढती जा रही है.

सेलेब्स को नापसंद की वजह

एनिमल का किरदार रणविजय भी कबीर सिंह का एक्सटेंड फॉर्म है, जिसके लिए हिंसा कोई बड़ी बात नहीं है. परिवार पर किसी भी प्रकार की समस्या आने पर वह पलक झपकते निर्णय ले लेता है और हिंसा पर उतारू हो जाता है. मनोवैज्ञानिक राशिदा मानती है कि कई सेलेब्रिटी ने इस फिल्म को नापसंद करने की वजह यह रही होगी कि आज की तारीख में पेरेंट्स बच्चों की भविष्य को सुधारने के लिए कड़ी मेहनत करते है, उन्हें उपेक्षा कतई नहीं करते, ऐसी फिल्में परिवार और समाज को गलत सन्देश देती है. परिवार से प्रेम करने वाला एक साधारण बच्चा इतना हिंसक नहीं हो सकता. इसे मानसिक बीमारी कही जानी चाहिए, क्योंकि सीमा से परे कोई भी व्यवहार बीमारी होती है और किसी भी मानसिक बीमार व्यक्ति की प्रशंसा करना उचित नहीं, क्योंकि एनिमल का किरदार रणविजय बहुत हिंसक है. वह लोगों को गाजर-मूली की तरह काटने से पहले जरा भी नहीं सोचता. शिक्षा संस्थान में भी हिंसात्मक हरकत करता है.

आलोचक भी हैरान

फिल्म आलोचकों ने भी माना है कि पहली बार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ए लिस्टेड किसी अभिनेता ने रणवीर कपूर की तरह इतने भद्दे डायलाग बोले हो. रणवीर कपूर की अधिकतर फिल्मे फ्लॉप जा रही है, ऐसे में वायलेंस पर फिल्मे करना वह शायद पसंद कर रहे हो. इस तरह की फिल्में अगर किसी भी रूप में सफलता का दावा करती है, तो आगे कई निर्माता – निर्देशक को गलत मेसेज जाएगा. जबकि इस फिल्म में वायलेंस और सेक्स से कोई भी आज के दर्शक खुद को रिलेट नहीं कर सकते. संदीप रेड्डी वांगा को इस तरह की कहानी से निकल कर कुछ और लिखने की जरुरत है, जिससे आम इंसान रिलेट कर सकें. ये भी सही है कि इस तरह की फिल्में दर्शकों को ख़ुशी नहीं दे पाती है, बल्कि उन्हें उत्तेजक और असंवेदनशील बनाती है, जिससे वे कई बार ऐसी ग्राफिकल वायलेंस के दृश्यों को देखकर पीड़ित व्यक्ति के दर्द को समझ नहीं पाते, क्योंकि फिल्मों में ऐसे हिंसात्मक दृश्यों और उसे करने वाले को बहुत अच्छी तरह से ग्लोरिफाई कर दिखाया जाता है.

इतिहास है साक्ष्य  

यही वजह है कि पिछले दिनों राजस्थान के जयपुर में राजपूत करणीसेना के मुखिया सुखदेव सिंह गोगामेडी की हत्या को भी एनिमल फिल्म स्टाइल से जोड़ा गया, क्योंकि उन्हें मारने वालों ने भी थोड़ी बातचीत के बाद ताबड़तोड़ गोलियां गोगामेड़ी पर चलाई, जो हाल ही में रिलीज हुई एनिमल फिल्म की स्टाइल से मेल खाती हुई है, क्योंकि जिस शख्स के साथ दोनों शूटर आये थे, उन दोनों शूटर ने उन्हें भी गेगामेडी के साथ बेरहमी से शूट कर दिया. इतिहास गवाह है कि हिंसा ने हमेशा युद्ध को ही जन्म दिया है. इसलिए किसी भी परिवार और समाज के लिए हिंसा कभी सही नहीं हो सकता और ऐसे हिंसात्मक मानसिकता वाले व्यक्ति को बीमार की संज्ञा दी जाती है, जिसका इलाज जरुरी होता है.

मनोरंजन है गायब

वरिष्ट पत्रकार शमा भगत कहती है कि इतना अधिक वायलेंस और सेक्स, आजकल फिल्मों में ग्लोरिफाई कर दिखाया जा रहा है कि किसी भी फिल्म को हॉल में जाकर देखने की इच्छा नहीं होती. मनोरंजन और हंसी फिल्मों से पूरी तरह गायब हो चुका है. वायलेंस वाली फिल्मों को देखने पर मन दुखी होता है. कोविड के बाद से वायलेंस वाली फिल्मों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है. मसलन फिल्म ‘KGF’ की सीरीज, आरआरआर, पुष्पा, बीस्ट आदि साउथ फिल्म इंडस्ट्री की कुछ ऐसी फिल्में है, जो पेंडेमिक के बाद की मनोरंजन वाली फिल्मों में गिना गया, जिसे पैन इंडिया के लेवल पर रिलीज भी किया गया और इन फिल्मों ने प्रचुर मात्रा में कमाई भी की. इससे निर्माता, निर्देशकों ने ये समझ लिया है कि सेक्स, क्राइम और वायलेंस ही सबसे अधिक बिकने वाली फिल्म है. इन सभी फिल्मों में वायलेंस या तो बीटिंग, किलिंग, गन शूटिंग से लेकर किसी भी प्रकार की जितनी निर्दयता दिखाई जा सकती हो, दिकाई गई है. पैन – इंडिया मूवी का अब एक मुख्य पार्ट बन गया है.

फिल्मों का असर दर्शकों पर कितना होता है इसे समझने के लिए साल 1981 की फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ का उदहारण लिया जा सकता है, इसमें अभिनेता कमल हासन और अभिनेत्री रति अग्न‍िहोत्री के इस फिल्म का असर इस हद तक यूथ प्रेमी जोड़े में होगा, किसी ने सोचा नहीं था. इस फिल्म को देखने के बाद कई युगल प्रेमी जोड़े ने आत्महत्या तक कर डाली थी.

क्या है दर्शकों की पसंद

दर्शक एक्शन फिल्म पसंद करते है, इसके लिए वे हॉल तक खींचे चले आते है. वायलेंस दर्शक कभी पसंद नहीं करते. वायलेंस और एक्शन में भी जमीन और आसमान के फर्क को शायद लेखक, निर्माता निर्देशक समझ नहीं पा रहे है. यही वजह है कि एक के बाद एक वायलेंस वाली फिल्में बना रहे है, लेकिन इतना सही है कि जिस दिन दर्शक इन फिल्मों को नकारना शुरू कर देंगे, फिल्म मेकर ऎसी फिल्में बनाना भी बंद कर देंगे, जैसा तमिल फिल्म मेकर एल सुरेश ने स्वीकारा है कि उनकी फिल्म ‘बीस्ट’ को भी दर्शकों ने पसंद नहीं किया और करोड़ों की लगत से बनी फिल्म फ्लॉप रही.

समाज का आईना

फिल्मों को देखकर उत्तेजित होकर क्राइम करने की घटनाएं कई है, लेकिन ऐसी हिंसात्मक चीजों की व्यूअरशिप अधिक होने की वजह से ओटीटी से लेकर फिल्में सभी में इसे ग्लोरिफाई कर परोस रहे है. वर्ष 1960 के दशक की शुरुआत से ही इस तरह के शोध के सबूत जमा हो रहे हैं जो बताते हैं कि टेलीविजन, फिल्मों, वीडियो गेम, सेल फोन और इंटरनेट पर हिंसा के संपर्क में आने से दर्शकों में हिंसक व्यवहार का खतरा बढ़ जाता है, मसलन वास्तविक वातावरण को ना समझ पाना, जिससे वे अनजाने में ही हिंसा कर बैठते है. मनोवैज्ञानिक सिद्धांत भी इस बात से सहमत है कि हिंसा के संपर्क में आने से अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों के लिए हानिकारक प्रभाव पड़ता है. वर्ष 2000, में फेडरल ट्रेड कमिशन ने अमेरिका के प्रेसिडेंट और कांग्रेस के रिक्वेस्ट पर एक रिपोर्ट इशू किया, जिसकी सर्वे में भी पाया गया है कि हिंसात्मक फिल्में का असर हमेशा नकारात्मक अधिक होता है.

मेरे गले में खराश रहती है, मुझे कोई उपाय बताएं

सवाल

मैं स्कूल शिक्षिका हूं. मुझे अकसर गले में खराश रहती है. इस के कारण मेरी आवाज भी भारी हो जाती है और बोलने में गले में दर्द भी होता है? क्या करूं?

जवाब

ओरोफेरिंग्स, जीभ के ठीक पीछे स्थित होता है. जब यह सूज जाता है या सूज कर लाल हो जाता है तो उसे गले की खराश कहते हैं. गले में खराश मुख्यत: वायरस के संक्रमण से होती है. इसे चिकित्सीय भाषा में ग्रसनीशोथ (फैरिंजाइटिस) कहते हैं. अधिकतर मामलों में गले में खराश वायरस के कारण होती है हालांकि कुछ मामलों में स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया भी इस का कारण होता है. कुनकुने पानी से गरारे करना, गरम पानी का सेवन, अदरक का सूप गले में खराश होने पर काफी फायदेमंद होता है. आप चाय में अदरक डाल कर उस का भी सेवन कर सकते हैं. अदरक में ऐंटीबैक्टीरियल गुण मौजूद होते हैं जिस से दर्द और सूजन से राहत मिलती है. गले में खराश का कारण सामान्य होने पर इस के उपचार की आवश्यकता नहीं होती है. लेकिन लंबे समय तक गले में खराश को नजरअंदाज करना या घरेलू उपायों के भरोसे बैठे रहना ठीक नहीं है. किसी ईएनटी विशेषज्ञ को दिखाएं क्योंकि इस का कारण ऐलर्जी से ले कर गले का कैंसर भी हो सकता है.

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मेरी बेटी की उम्र 7 माह है लेकिन वह ताली बजाने या बरतन से आवाज करने पर सिर नहीं घुमाती है. क्या उस की सुनने की क्षमता सामान्य नहीं है?

सामान्यत: 4 माह का बच्चा ताली बजाने या बरतन से आवाज करने पर उस तरफ सिर या आंख की पुतली घुमाता है. आप की बच्ची 7 माह की हो गई है लेकिन आवाजों के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही है. आप किसी अच्छे ईएनटी से उस की श्रवण क्षमता की जांच कराएं. अगर वह सामान्य रूप से सुन नहीं पा रही है तो उसे सुनने की मशीन लगवा देनी चाहिए. अगर वह अत्यधिक बहरेपन की शिकार है तो 1 साल की उम्र में कौक्लियर इंप्लांट करा देना चाहिए. इस से ऐसे बच्चे भी सामान्यरूप से बोलना और सुनना शुरू कर देते हैं.

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

स्रूस्, व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.  

महिलाओं को पेड पीरियड लीव की जरूरत नहीं

महिलाओं को पेड पीरियड लीव यानी मासिक धर्म के दौरान छुट्टी मिलनी चाहिए या नहीं, इस पर संसद में कल सवाल पूछा गया. महिला और बाल कल्याण मंत्री स्मृति ईरानी ने इस विचार को.खारिज करते हुए कहा है कि सरकार इस तरह के किसी भी पेड लीव की तरफ नहीं सोच रही है. स्मृति ईरानी के अनुसार यह महिलाओं की जिंदगी का हिस्सा है और इस को हमें दिव्यांगता की तरह नहीं देखना चाहिए. राज्यसभा में सांसद मनोज कुमार झा ने संसद में पेड पिरियड लीव को लेकर सवाल पूछा था.

स्मृति ईरानी ने कहा है कि अगर महिलाओं को पीरियड के दौरान छुट्टी दी गई तो इस से महिलाओं के प्रति भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा. हालांकि मासिक धर्म को लेकर जो हाइजीन की बहस है उस की अहमियत को स्मृति ईरानी ने स्वीकार किया.

स्मृति ईरानी ने कहा कि एक मासिक धर्म वाली महिला के रूप में, मासिक धर्म एक बाधा नहीं है. यह महिलाओं की जीवन यात्रा का एक स्वाभाविक हिस्सा है. हमें उन मुद्दों का प्रस्ताव नहीं करना चाहिए जहां महिलाओं को समान अवसरों से सिर्फ इसलिए वंचित किया जाता है क्योंकि कोई व्यक्ति जो मासिक धर्म के दायरे में नहीं आता है, वह उस के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण रखता है.

केंद्रीय मंत्री और एक्ट्रेस स्मृति ईरानी खुद किसी जमाने में एक स्ट्रगलर मोडल थीं. कुछ समय पहले स्मृति ने अपना 25 साल पुराना एक वीडियो शेयर किया था. यह एक ऐड वीडियो था जो फेमस सेनेटरी नैपकिन ब्रांड का था. इस में एक्ट्रेस बड़ी ही बेबाकी से पीरियड्स के बारे बोलती नजर आ रही हैं. वीडियो शेयर करते हुए स्मृति ने बताया था कि यह उनके करियर का पहला बड़ा ऐड वीडियो था. लेकिन इस तरह का प्रोजेक्ट उस वक्त किसी मॉडल के करियर को खत्म कर सकता था. स्मृति ने हिम्मत दिखाई क्योंकि उन की नजर में यह जागरूकता बढ़ाने वाला ऐड था.

पेड पीरियड लीव का कांसेप्ट महिलाओं को कमजोर दिखाएगा

ब्रिटेन, चीन, जापान, ताइवान और जांबिया समेत कुछ ऐसे देश हैं जहाँ पेड पीरियड लीव की सुविधा है. मगर देखा जाए तो सही में इस की आवश्यकता नहीं है. छुटी की मांग का सपोर्ट करने महिलाओं को यह समझना चाहिए कि छुट्टी की मांग करना एक तरह से उन को कमजोर दिखाना है. यह साबित करना है कि वे पुरुषों की तरह रेगुलर ऑफिस जा कर काम नहीं कर सकतीं. घर में रहने और घर के कामों में ही उस की दुनिया सिमट जानी चाहिए क्योंकि वह इसी के लायक हैं.

यही नहीं अगर स्त्रियों को पैड लीव मिलती है तो इसका मतलब है कि नियोक्ता भविष्य में  महिलाओं के देख पुरुषों को प्रेफरेंस देंगे क्योंकि कहीं न कहीं अगर एक महिला यदि तीन दिन पेड लीव ले रही है तो उस की उत्पादकता में कमी आएगी. नियोक्ता अपना लाभ पहले देखेंगे और इसका असर महिलाओं के रोजगार पर पड़ेगा. उनके आगे बढ़ने के अवसरों में अप्रत्यक्ष रूप से कमी आ सकती है.

झिझक क्यों

सेनेटरी नैपकिन खरीदने के मामले में अक्सर देखा जाता है कि स्त्रियां बहुत झिझकती हैं. मेडिकल स्टोर पर जाकर कई बार एक लड़की यह देख कर खड़ी रह जाती है कि वहां काफी भीड़ है. उनके जाने के बाद धीमी सी आवाज में दुकानदार से नैपकिन मांगती है. कई बार लड़कियों के दोस्त या भाई नैपकिन खरीदने से साफ इनकार कर देते हैं क्योंकि इस मामले में उन्हें भी हिचकिचाहट रहती है. दुकानदार भी नैपकिन को जल्दी से काली पॉलिथीन या लिफ़ाफ़े में डाल कर देता है. इन बातों से यही जाहिर होता है कि सेनेटरी नैपकिन खरीदना बहुत ही छिपाने वाली बात समझी जाती है जबकि हमें समझना होगा कि यह हाइजीन की चीज है. साफ सफाई की बात है. जैसे एक बच्चे के लिए हम डायपर खरीदने जाते हैं या जैसे कोई लड़का अपने लिए सर दर्द या पेट दर्द की दवा लेने आता है वैसे ही एक लड़की अगर अपने लिए पैड  खरीद रही है तो इसमें छिपाने की क्या बात है? पीरियड कोई बीमारी या मुसीबत नहीं. यह तो आप को मातृत्व का सुख देने का जरिया है. यह सभी महिलाओं को होता है.

दरअसल धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने लोगों के जेहन में यह बात बिठा रखी है कि पीरियड्स के दौरान स्त्रियां अपवित्र हो जाती हैं. उन्हें पूजा घर या किचन से बेदखल कर दिया जाता है. यही बेतुकी, रूढ़िवादी सोच महिलाओं की परेशानियों का सबब है. इसी सोच की वजह से इस बात को छिपाया जाता है.

महिलाओं को या लड़कियों को सेनेटरी नैपकिन या फिर पीरियड्स के बारे में बात करने से भी हिचकिचाना नहीं चाहिए. अक्सर ऑफिस में देखा जाता है कि अगर किसी लड़की को पीरियड्स आ जाए तो वह जाहिर नहीं करती. सब से छिपाती है. पैड चेंज करने जा रही है तो भी यह बात अपनी सहेलियों को भी नहीं बताती. सब से छिपा कर पैड को जल्दी से जींस के पॉकेट में डाल कर या फिर रुमाल में छिपा कर ले जाती है. अगर उन्हें दर्द हो रहा है तो भी जेनरली वह इस बारे में अपनी कुलीग से बात नहीं करती. ऐसे ही गुमसुम सी बैठी रहती हैं. इससे कई बार उन के परफॉर्मेंस को लेकर कोई सीनियर टोक भी देता है कि तुम्हें आज काम करने में मन नहीं लग रहा है? दोस्त पूछने लगते हैं कि तुम मुझसे नाराज क्यों हो?

ऐसा नजरिया उचित नहीं.  दूसरों से खुल कर अपनी हालत बताएँ. सामने वाला जितना हो सकेगा आप की मदद करने और बातों में मशगूल रखने का प्रयास करेगा ताकि आप को ज्यादा तकलीफ महसूस न हो.

महिलाओं को पैड लीव नहीं चाहिए बस कुछ सुविधाएं चाहिए

जाहिर है महिलाओं को पैड लीव नहीं चाहिए. महिलाओं के लिए अगर सुविधाएं देनी है तो पीरियड्स के समय साफ सफाई और सुरक्षा की सुविधा देनी चाहिए. पैड लीव्स के बजाए यह ज्यादा जरूरी है कि महिलाएं जहां काम करने जा रही है वहां उनके लिए एक अलग पैड चेंजिंग रूम होने चाहिए. सार्वजनिक स्थलों पर भी पैड चेंजिंग रूम होने चाहिए जहां महिला आसानी से पैड चेंज कर सके. क्योंकि अगर वह नैपकिन चेंज कर रही है तो उसे कुछ सुविधाओं की जरूरत होती है, जैसे कपड़े उतार कर रखने के लिए जगह, पेड रखने की जगह, बदलने के बाद उसे फेंकने के लिए अलग डस्टबिन होना चाहिए जिसे सामान्य कूड़े में मिलाने की जरूरत नहीं है.

पैड चेंजिंग रूम के अलावा लड़कियों को कुछ और सुविधाएं जैसे आरामकुर्सी, एक छोटी सी जगह जहाँ वह कुछ देर आराम कर ले आदि मिलें तो ज्यादा फायदेमंद होगा. साथ ही जहाँ वह काम करने या पढ़ने जाती है अगर वहां कंपाउंड के अंदर या आसपास मेडिकल स्टोर की उपलब्धता भी जरुरी है, जहाँ से वह अचानक जरुरत पड़ने पर पैड खरीद सके.

Wedding Special: सुंदरता और विरासत बढ़ाते गहने

विरासत एक ऐसी चीज है जो पिछली पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक एक हाथ से दूसरे हाथ को जाती है. पारंपरिक गहने इस विरासत का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं. इसीलिए अपनी जिंदगी के सब से बड़े दिनों में से एक शादी पर इन में से कोई एक पहनने से ब्राइड खुद को अपनी जड़ों से जुड़ने का एहसास कर पाती है.

यही मिस्टर इंडिया के नाम से फेमस ऐक्टर अनिल कपूर की बेटी रिया कपूर ने अपनी शादी में महंगे और ट्रैंडी गहनों के बजाय अपनी मां के गहने पहने थे. ऐसा कर के उन्होंने न सिर्फ अपनी मां को सम्मान दिया बल्कि अपने पारंपरिक मूल्यों का भी मान बढ़ाया.

इसी तरह पटौदी खानदान की सब से छोटी बेटी सोहा अली खान ने जब कुणाल खेमू से शादी की तो उन्होंने अपनी शादी में अपने जमाने की खूबसूरत अदाकारा शर्मीला टैगोर जो उन की मां भी हैं का अपनी शादी में रत्नों से जडि़त सब्यसाची लहंगा और रानी हार पहना था, जिस में हरे पन्ने और ट्रेडमार्क पासा था. इस के अलावा उन्होंने हाथीदांत, सोने के आभूषण भी पहने थे.

आम लोगों में भी प्रचलित

यह चलन सैलिब्रिटी से शुरू हो कर अब आम नागरिकों के बीच भी प्रचलित हो गया है. तभी तो शहरों में रहने वाली लड़कियां भी विटेंज ज्वैलरी को अपना रही हैं.

ऐसी ही कहानी नमिता मुखर्जी की है. वे 30 साल की हैं और वह उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं तथा अपने लौंग टर्म बौयफ्रैंड विनय मेहता से शादी की है. वे कहती हैं, ‘‘एक लड़की की जब शादी हो रही होती है तो वह बहुत भावुक होती है. शादी के टाइम पीरियड के दौरान वह बस यह सोच रही होती है कि वह किसी तरह अपने परिवार और उन की मान्यताओं से जुड़ी रहे. इस के लिए वह अपने खानदान के पुश्तैनी जेवर पहनने से भी नहीं हिचकाती बल्कि उन्हें पहन कर खुद को उन से जुड़ा पाती है.

‘‘मैं ने अपनी शादी के लिए दुलहन का कलर कहे जाने वाले रैड कलर को चुना. मैं समझ नहीं पा रही थी मैं  ज्वैलरी कौन सी पहनूं. तभी मैं ने सैलिब्रिटीज की शादियों के बारे में पढ़ा. तब मुझे पता चला कि पारंपरिक आभूषणों को पहनना ट्रैंड बना हुआ है. मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे भी इस ट्रैंड को फौलो करना चाहिए. अत: मैं ने यही किया. मैं ने भी अपनी नानी की शादी के समय का माथटीका अपनी शादी में पहना. हां अगर बात करूं फैशन की तो इस के मामले में हम लड़कियां कोई समझौता नहीं करना चाहती हैं. इसलिए मैं ने अपनी नानी के माथटीके में 2 अतिरिक्त डबल चैन जोड़ कर उसे माथापट्टी बना दिया था. अब मैं ने अपने खानदान के पुश्तैनी आभूषणों और उन के एहसासों को भी जी लिया, साथ ही फैशन के साथ अप टू डेट भी रही.’’

इसी तरह गुरुग्राम में कटैंट राइटिंग की जौब करने वाली 28 वर्षीय मोनिका रवीश शेख कहती हैं, ‘‘मैं ने अपनी रिसैप्शन के लिए रोज गोल्ड कलर का लहंगा लिया है, जिसे मैं अपनी मां के सोने के कुंदन के गहनों के साथ पहनूंगी. मैं रिसैप्शन में कुंदन के झुमके, नैकपीस और मांगटीका पहनूंगी. वहीं शादी के लिए मैं ने मुगलकाल के शुद्ध सोने से बने पारंपरिक हैदराबाद के निजामी गहनों को चुना जो मीनाकारी काम के साथ हमारे परिवार में पीढि़यों से चले आ रहे हैं. अपने खास दिन के लिए मैं ने इन्हें चुना है. इन्हें पहनने के बाद यकीनन मैं खूबसूरत तो लगूंगी ही साथ ही बहुत भावुक भी हो जाऊंगी.’’

शादी का अहम हिस्सा

असल में गहने हमारी भारतीय शादी का सब से अहम हिस्सा हैं. ये सिर्फ खूबसूरती के लिए नहीं होते बल्कि कीमती विरासत भी हैं जो पारिवारिक परंपराओं और विरासतों का भार उठाते हैं. पारंपरिक गहने अतीत को जोड़ने वाली एक ठोस कड़ी के रूप में काम करते आए हैं.

होने वाली ब्राइड आखिर पारंपरिक आभूषणों को क्यों चुन रही हैं? इस बारे में ज्वैलर्स बताते हैं कि होने वाली लगभग 90त्न ब्राइड पारंपरिक गहनों को चुन रही हैं, जिन में चोकर और लंबी गरदन के गहनों से ले कर मांगटीका, माथापट्टी, सतलदास, जड़ाऊ और पोल्का व कुंदन में हाथफूल तक शामिल हैं. ज्वैलर्स का मानना है कि 2017 में अनुष्काविराट की शादी के साथसाथ उस के बाद की सैलिब्रिटी शादियों ने भी इस रिवाज को आगे बढ़ाया है.

नई दिल्ली के उत्तम नगर इलाके के अग्रवाल ज्वैलर्स के सोनी अग्रवाल कहते हैं, ‘‘पिछले एक साल में हुई सभी सैलिब्रिटी शादियों के बाद पारंपरिक गहनों के चलन में भारी तेजी आई है. जिन की शादी होने वाली है वे दुलहनें विरासत में मिले गहने पहनने की इच्छुक हैं. उन की शादी के लिए और सासससुर पारिवारिक परंपराओं को जीवित रखने के लिए अपनी बहुओं को उपहार देने के लिए अपने पुराने गहनों में कुछ बदलाव करवाने के लिए हमारे पास आ रहे हैं.

‘‘दुल्हनें जड़ाऊ, पोल्की और कुंदन में पारंपरिक गहने चुन रही हैं क्योंकि ट्रैंड यह है कि मूल पैटर्न और डिजाइन को बरकरार रखते हुए इन्हें एक नया रूप दिया जाए. ‘‘वैडिंग सीजन में सतलाडा के विरासती गहने भी मांग में हैं. वहीं भारी और चौड़े मंगलसूत्र के उलट चिकने मंगलसूत्र ट्रैंड में छाए हुए हैं.’’

डिजाइन की मौलिकता

हैदराबाद के बड़ा बाजार के ज्वैलरी डिजाइनर नितिन अग्रवाल कहते हैं, ‘‘दुलहनें अपने पुराने पारंपरिक आभूषणों को इस तरह से संशोधित करवा रही हैं कि डिजाइन की मौलिकता खत्म न हो. दुलहनें अपने पुश्तैनी आभूषणों को नया रूप देने के साथसाथ मैचिंग माथापट्टी, मांगटीका और नाक की अंगूठी के साथ पत्थर, मोती और रंगीन पत्थरों को जोड़ कर विरासत के इन गहनों को फिर से बनाने की काफी इच्छुक हैं.’’

उत्तराखंड की निवासी रति रावत कहती हैं, ‘‘हमारे पारंपरिक आभूषणों में नथ का बहुत महत्त्व है. यही कारण है कि मैं ने भी अपनी शादी में अपनी परदादी की पुश्तैनी नथ पहनी थी. यह नथ उन्होंने मेरी दादी को दी थी और फिर मेरी दादी ने मेरी मां को. फिर मेरी मां ने मु?ो दी. हमारे पारंपरिक आभूषण पहनने का कारण हमारा अपने कल्चर के प्रति सम्मान और जुड़ाव है जिसे हम खोना नहीं चाहते.

‘‘जल्द ही दुलहन बनने वाली लड़कियां क्यों ट्रैडिंग और लेटस डिजाइन के महंगे गहनों को छोड़ कर अपने पुश्तैनी या कहें पारंपरिक आभूषणों को अपनी शादी में पहन रही हैं? इस बारे में मेरी अपनी राय है कि हर घर में ऐसा कोई न कोई आभूषण जरूर होता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आता है. फिर आगे इन्हीं आभूषणों को अपने बच्चों को सौंप दिया जाता है ताकि वे अपने बच्चों को विरासत में इन्हें दे सकें.

‘‘मेरी मम्मी के पास भी कुछ पारंपरिक आभूषण हैं जैसे तगड़ी, बाजूबंद और खंड़ाऊ. इन्हें उन्होंने संभाल कर रखा है. इन में से बाजूबंद उन्होंने मेरी बड़ी बहन को उस की शादी में दे दिया. खंड़ाऊ उन्होंने मेरे लिए रखी है. वही तगड़ी उन्होंने अपनी होने वाली बहू के लिए रखी है. ये उन के पारंपरिक आभूषण हैं जो उन्हें उन की मम्मी से मिले थे और अब हम बहनों को मिल रहे हैं.’’

पारंपरिक गहने

असल में ये गहने सिर्फ सजावट का सामान नहीं हैं बल्कि विरासत का एक हिस्सा हैं जिन्हें महिलाएं संजो कर रखती हैं ताकि ये पीढ़ी दर पीढ़ी इन्हें अपने बच्चों को सौंप सकें और अपनी विरासत के एक भाग से अपने पोतेपोतियों, नातिनातिनों से मिला सकें.

अगर दुलहन अपनी शादी में अपने परिवार या अपने होने वाले परिवार के पारंपरिक गहने पहनती है तो वह 2 परिवारों को आपस में जोड़ने का काम करती है, साथ ही वह अपने पूर्वजों को भी जान लेती है. वह यह भी जान लेती है कि वे किस घराने के रहने वाले हैं. इस के अलावा पारंपरिक आभूषणों में एक जुड़ाव होता है जो परिवारों के बीच समन्वय स्थापित करता है.

अगर आप के पास भी अपने खानदान की विरासत के रूप में कुछ गहने हैं तो आप अपने खास दिन में पहन कर उस के एहसासों को जीवंत कर सकती हैं, साथ ही उन में छोटेमोटे बदलाव कर के आप ट्रैंड में भी रह सकती हैं जिस से चारों तरफ आप की वाहवाही होगी.

उड़द दाल रायता बनाने की आसान रेसिपी

सामग्री :

उड़द दाल (02 बड़े चम्मच)

– दही(01 कप)

– टमाटर (2 बारीक कटा हुआ)

– गाजर (01 कद्दूकस किया हुआ)

करी पत्ता ( 05)

– सरसों (01 छोटा चम्मच)

– हरी मिर्च (01 बारीक कटी हुई)

– हींग (चुटकी भर)

हरी धनिया (01 बड़ा चम्मच बारीक कटी हुई)

– तेल (01 छोटा चम्मच)

– नमक (स्वादानुसार)

उड़द दाल रायता बनाने की विधि :

एक बर्तन में दही लेकर उसे अच्छी तरह से फेट लें.

– फेंटे हुए दही में गाजर, टमाटर और नमक डालें और अच्छी तरह से मिला लें.

– अब एक पैन में उड़द दाल को लेकर सूखा भून लें.

– दाल के ठण्डा होने पर उसे ग्राइंडर में बारीक पीस लें.

– पीसने के बाद दाल को दही में डाल दें.

– एक पैन में आधा चम्मच तेल डाल कर उसे गर्म करें.

– गर्म होने पर इसमे सरसों, कटी हुई हरी मिर्च, करी पत्ता और हींग डालें और तलें.

– सरसों के तड़कने पर पैन की सामग्री को दही में डाल कर अच्छी तरह से मिला लें.

– आपका उड़द दाल का रायता तैयार है, इसे थोड़ी देर फ्रिज में रख दें.

– ठंडा होने पर इसे खाने के साथ सर्व करें

Wedding Special: कम खर्च में यादगार शादी

शादी किसी की भी जिंदगी का सब से खूबसूरत समय होता है जब इंसान अपने सपनों को सच होता देखता है. वह अपनी शादी में वह सब करना चाहता है जिस की कल्पना उस ने लंबे समय से की होती है. शादी सिर्फ 2 व्यक्तियों का ही नहीं अपितु 2 परिवारों का भी मिलन होता है. दूल्हा और दुलहन दोनों के ही घर वाले इस शादी को यादगार और शानदार बनाना चाहते हैं. वे इन लमहों बारबार याद कर खुश होना चाहते हैं. इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि आप बहुत रईस हों या फिर एक सामान्य परिवार से संबंध रखते हों. जरूरी है तो दिल का उत्साह और सही अरेंजमैंट. कुछ यूनीक आइडियाज और कूल एवं क्रिएटिव माइंड ताकि शादी का हर पल यादगार हो.

आइए, जानते हैं अपने घर में होने वाली शादी को खूबसूरत, यादगार और शानदार इवेंट का रूप कैसे दें:

वैडिंग प्लान करें कुछ ऐसे

विवाह लग्जरी वैडिंग्स के फाउंडर मोहसिन खान बताते हैं कि वैडिंग प्लान करते समय इन बातों का ध्यान रखें:

  •  सब से पहले जरूरी है कि आप कुछ बातें पहले से क्लीयर करें जैसे आप को लोकल मैरिज  करनी है या डैस्टिनेशन वैडिंग. अपने बजट के हिसाब से लोकेशन और गैस्ट लिस्ट तैयार करें. अब फंक्शंस डिसाइड करें कि कौनकौन से फंक्शन होने हैं जैसे सगाई, हलदी, संगीत, मेहंदी, शादी आदि. अगर समय या बजट का इशू है तो आप 2-3 फंक्शन को एक में भी मिला सकते हैं. अब हर फंक्शन की गैदरिंग डिसाइड करें. इस के बाद आप एक वैंडर लिस्ट तैयार करें जैसे डैकोरेटर, ऐंटरटेनमैंट, मेकअप आर्टिस्ट, बैंडबाजा वाला, पगड़ी वाला, कैटरिंग वाला. अब या तो सारे प्लान और इंतजाम के लिए वैडिंग प्लानर हायर करें या फिर घर के 2 मैंबर को सारे इंतजाम की जिम्मेदारी सौंपें.
  •  शादी के दौरान वेन्यू डिसाइड करना भी एक महत्त्वपूर्ण फैसला है. ध्यान रखें कि जो प्रौपर्टी आप ने ली है उस में मल्टीपल औप्शन हों जैसे लौन, पूल साइड, बैंक्वेट आदि सब हों. उस का अप्रोच अच्छा हो, खाना अच्छा हो, रिव्यूज भी अच्छे हों और यह वैडिंग फ्रैंडली हो. ज्यादा ट्रैफिक जाम वाला एरिया न हो ताकि आप के गेस्ट्स को वहां तक पहुंचने में दिक्कत न हो. मैट्रो के पास हो. कई ऐसी प्रौपर्टी होती हैं मार्केट में जो कौरपोरेट फंक्शन ज्यादा करती हैं उन्हें वैडिंग का ज्यादा ऐक्सपीरियंस नहीं होता.
  •  कोशिश करें कि आप की शादी के सारे फंक्शन अलगअलग वेन्यू में हों. वेन्यू रिपीट करेंगे तो फोटोग्राफी में सारे फंक्शन एक जैसे लगेंगे और फोटोग्राफी में मजा नहीं आएगा.
  • यह मौका जश्न का होता है. जाहिर है लजीज व्यंजनों के बिना कोई भी जश्न अधूरा लगता है. ऐसे में शादी में अच्छे खाने की व्यवस्था की जाती है, जिस के लिए पहले से तैयारी करनी होती है और शादी का मेन्यू तैयार किया जाता है.

डैस्टिनेशन वैडिंग के मेजर औप्शंस

राजस्थान में पुष्कर, जयपुर, रणथंबोर, उदयपुर, जोधपुर आदि हैं. यहां के पैलेस और फोर्ट्स में शादी शानदार नजर आती है मगर ये महंगे औप्शन हैं. खर्च काफी आता है. सस्ते औप्शंस में जिम कार्बेट, आगरा, ऋषिकेश, मसूरी, नैनीताल आदि आते हैं जहां रीजनेबल शादी हो सकती है. वैसे कुल मिला कर दूसरे शहर जा कर यानी डैस्टिनेशन वैडिंग महंगी होती है. लोगों की फीस ज्यादा होती है और आनाजाना भी महंगा हो जाता है.

  •  शादी यादगार हो इस के लिए ऐसे ऐलिमैंट्स ऐसे रखने होंगे- डैकोरेशन क्रिएटिव हो, कोई खास थीम पर सजावट करें जैसे मोरक्कन थीम, विलेज थीम, दुबई थीम आदि ट्रैंड में हैं. ब्राइड ऐंट्री यनीक हो जैसे लो फौग ऐंट्री जबरदस्त और सपनों सी लगती है जैसे बादलों पर चल रहे हैं. जयमाला में इफैक्ट डाले जा सकते हैं.  फ्लौवर रेन करवा सकते हैं जो महंगा नहीं होता मगर सुंदर लगता है. इसी तरह कोल्ड फायर करा सकते हैं. आजकल लोग फेरों के वक्त भी कुछ डिफरैंट करते हैं जैसे मैजिकल फेरे ट्रैंड में हैं. दूल्हा जलती हुई मशाल आदि के साथ ऐंट्री कर सकता है. लाइव बैंड के द्वारा धूम मचा सकते हैं. डीजे और ढोल की जुगलबंदी भी शानदार लगती है.

शादी को ऐसे बनाएं मजेदार और यादगार

  •  आप अपनी शादी में डांस या गाने का कंपीटिशन करवा सकते हैं. इस के लिए आप मेहमानों की टीम बना कर भी कंपीटिशन करवा सकते हैं. इस तरह की फन ऐक्टिविटीज आप के मेहमानों के लिए यादगार बन जाएंगी और सभी को पसंद भी आएंगी. आप अपने मेहमानों को इन फन ऐक्टिविटीज के बाद कुछ खास गिफ्ट भी दे सकती हैं.
  •  आप अपनी शादी में फ्लौवर फ्रेम लगा सकती हैं. इस से डैकोरेशन भी सुंदर दिखेगा, साथ ही साथ फोटोज लेने के लिए भी एक अच्छा फ्रेम मिल जाएगा. यह आप के यादगार पलों को और खास बनाएगा. इस फ्रेम को आप अलगअलग फूलों से सजा सकती हैं या फिर एक ही रंग के फूल भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

आज की जैनरेशन सोशल मीडिया पर काफी ऐक्टिव रहती है वहीं इस फ्रेम में फोटो खिंचवाने के बाद आप इसे सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकती हैं.

  •  फोटो डैकोरेशन मेहंदी या हलदी के फंक्शन के लिए परफैक्ट डैकोरेशन है. इस डेकोरेशन को आप लाइट और फोटोज से कवर कर सकती हैं. इन फोटोज में आप अपनी पुरानी यादों को ताजा कर सकती हैं और इसे सीरीज के बीच में सजा सकती हैं. इस डैकोरेशन से आप की आज की यादें तो यादगार बनेंगी ही साथ ही साथ आप की कुछ खास पुरानी यादें भी ताजा होंगी. फोटो डैकोरेशन के साथसाथ आप फूलों का बंच बना कर बीचबीच में टांग सकते हैं.

आप अपने पलों को और यादगार बनाने के लिए इमोजी फ्रेम्स का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इन फ्रेम्स की खासीयत यह है कि यह आप के आज के पलों को फोटो में संजो कर रखेगा जिसे आप भविष्य में याद कर अपने पलों को ताजा कर सकते हैं. इन फ्रेम्स में आप कई तरह की इमोजी का इस्तेमाल कर सकते हैं. आप कुछ प्यारेप्यारे संदेश भी लिख सकते हैं.

  •  इंडियन वैडिंग्स में अपने परिवार से ज्यादा रिश्तेदारों का खयाल और उन की जरूरतों का खयाल रखा जाता है. रिश्तेदारों को स्पैशल फील करवाने के लिए आप थैंक्यू पैकिंग का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस की खास बात यह है कि यह आप को ज्यादा महंगा भी नहीं पड़ेगा और देने में बेहद खूबसूरत भी लगेगा.

इस के अंदर आप कुछ स्पैशल गिफ्ट रख सकते हैं और बाहर एक थैंक्यू मैसेज भी दे सकते हैं. आप ऐसी पैकिंग का इस्तेमाल शादी के अलावा भी किसी छोटेमोटे फंक्शन में कर सकते हैं. पैकेट्स के अंदर कुछ ड्राई फ्रूट्स या फिर बच्चों को देने के लिए चौकलेट रख सकते हैं.

प्री वैडिंग फोटोशूट हो यादगार

  •  आप अपने प्री वैडिंग शूट को किसी खास जगह ??पर करवा सकते हैं जिस से फोटोज का बैकग्राउंड जबरदस्त लगेगा. आप इस के लिए किसी ऐतिहासिक बिल्डिंग, बीच या पहाड़ी जगह को चुन सकते हैं.
  • आप चाहें तो अपने प्री वैडिंग शूट का फिल्मी थीम रख सकते हैं जैसे आप खेतों में दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे के थीम पर फोटोशूट करवा सकते हैं. इसी तरह अगर आप को कोई और फिल्म पसंद है तो आप उस के थीम पर शूट करवा सकते हैं.
  • अपने प्री वैडिंग शूट में आप थोड़ा ड्रामैटिक एंगल दे सकते हैं जैसे यहां हवा में उड़ता हुआ दुपट्टा, ग्रीन बैकग्राउंड के साथ रैड आउटफिट, सरप्राइज प्रपोजल पोज आप के फोटोज को ड्रामैटिक टच देंगे, साथ ही आप कुछ फनी भी ट्राई कर सकते हैं. अगर आप के पास कोई लोकेशन नहीं है तो आप कुछ अलग तरह से शूट करवा सकते हैं जैसे ऊपर से गिरती हुई गुलाब की पत्तियां एक अलग ही इफैक्ट देंगी.

धर्म के नाम पर पैसे बरबाद न करें

प्राचीनकाल से ही हमारे यहां शादी के दौरान धार्मिक रीतिरिवाजों पर बहुत ज्यादा जोर दिया जाता है. धर्मग्रंथों में भी बेकार के रिवाजों पर जोर दिया जाता है. कौन सा कदम पहले उठाना है, कौन से रंग के कपड़े पहनने हैं, कौन से मुहूर्त में शादी होगी, कौन सी पूजा सामग्री के होने पर ही पूजा संपन्न होगी, कौन से मंत्र जरूरी हैं, कौन सी चीजें बनानी जरूरी हैं, कौन से पकवानों का भोग लगाना जरूरी है जैसे नाना प्रकार के रिवाज हैं जिन्हें पूरा करना जरूरी माना जाता है वरना यह कह कर डराया जाता है कि शादी टूट सकती है. बारबार रस्मों का उल्लेख किया जाता है और लोग नाहक परेशान हो उठते हैं. पुराणों में शादियों का जिक्र है पर उन में भव्यता का जिक्र है जिस का इस्तेमाल पंडेपुजारी अपने फायदे के लिए करते हैं. इस में न फंसें.

रामायणकाल में जनक और दशरथ के बच्चों की शादी का विस्तृत विवरण वाल्मीकी रामायण में है जिसे आज न तो दोहराया जा सकता है न दोहराने लायक है जैसे वाल्मीकि रामायण के बालकांड में भी इस बात का उल्लेख है.

विवाह वेदी को चारों ओर से गंध पुष्प तथा यवांकुर आदि से अलंकृत किया. उस के पास यवांकुर युक्त तथा विचित्र वर्ण के कलश रखे. उन कलशों पर यवांकुर युक्त परई और धूप युक्त धूपपात्र रखे. तदनंतर अर्घ्य आदि से युक्त शंखपात्र, सुवा सुक् आदि जुटाए गए. इन के अतिरिक्त लावा से भरे पात्र, हलदी आदि से रंगे अक्षत भरे पात्र आदि यथास्थान रखे गए. तब मंत्रोच्चारण के साथ विधिवत् कुश बिछा कर वेदी पर अग्नि का आधान किया और मुनिपुंगव तथा महातेजस्वी वसिष्ठ अग्नि में हवन करने लगे.

ये सब करने के बाद क्या शादी करने वाला जोड़ा सुख पाया. उन की शादी को सफल शादी तो कतई नहीं कहा जा सकता. जानकी को शादी के बाद कितने कष्ट सहने पड़े. दोनों को सालों पहले जंगलों में रहना पड़ा फिर 2 बार विरह पीड़ा सहनी पड़ी और अंत में एक ने प्राण ही त्याग दिए. रामायण के अनुसार तो आखिर हंसीखुशी से दोनों ने गिनेचुने दिन ही गुजारे. फिर क्या फर्क पड़ा शादी की विधियां निभाने से?

दरअसल, ये रीतिरिवाज और पूजापाठ तो धर्म के ठेकेदारों की खोली गई दुकानें हैं और वे इन के जरीए दानपुण्य करा कर अपनी जेबें भरने का कारोबार करते हैं. इसलिए बेकार के रिवाजों के पीछे समय और पैसा जाया करने के बजाय शादी के जश्न के दौरान खुशियां बटोरें और रिश्तों को सहेजें. पौराणिक ग्रंथों की कहानियां इस खुशी के अवसर को पंडोंपुजारियों के हवाले कर देती हैं. अत: ऐसा न करने दें.

दहेज न दें और न लें

हमारे यहां दहेज की प्रथा भी सदियों से चली आ रही है. यही वजह है कि लड़कियों के पैदा होने पर लोग दिल खोल कर खुशियां नहीं मना पाते जैसाकि बेटे के जन्म के बाद होता है. बेटी के आते ही लोगों को एक बो?ा सा महसूस होता है और वे उस बच्ची के लिए दहेज जुटाने की तैयारियों में लग जाते हैं. वहीं लड़कों के परिजन सोचते हैं कि उन्होंने एक फैक्टरी डाल ली है.

अब लड़का बड़ा होगा तो उस की शादी में ढेर सारा दहेज ले कर अपनी शान दिखाएंगे. मगर क्या आप को नहीं लगता कि शादी के शानदार होने के लिए दहेज का शोऔफ करने की जरूरत नहीं. यह तो एक तरह से खरीदबिक्री की रस्म हो गई. यह रस्म आज की नहीं है. रामायण और महाभारत काल से भी पहले से चली आ रही है. वाल्मीकि रामायण में सीता की शादी के दौरान जनक द्वारा दी गई दहेज सामग्री का बखूबी बखान किया गया है.

बालकाण्डे दशरथपुत्रोद्वाहो नाम त्रिसप्ततितम: सर्ग:॥ 73॥

(जामदग्न्याभियोग:)॥ अथ रार्त्यां व्यतीतायां विश्वामित्रो महामुनि:॥ आपृच्छय तौ च राजानौ जगामोत्तरपर्वतम्॥ 1॥ आशीभि: पूरयित्वा च कुमाराश्च सराघवान्॥ विश्वामित्रे गते राजा वैदेहं मिथिलाधिपम्॥ 2॥ आपृच्छपाथ जगामाशु राजा दशरथ: पुरीम्॥ गच्छन्त तं तु राजानमन्वगच्छन्नराधिप:॥ 3॥ अथ राजा विदेहानां ददौ कन्याधनं बहु ॥ गवां शतसहस्राणि बहूनि मिथिलेश्वर:॥ 4॥ कम्वलानां च मुख्यानां क्षौमकोट्यम्बराणि च॥ हस्त्यश्वरथपादातं दिव्यरूपं स्वलंकृतम्॥ 5॥ ददौ कन्याशतं तासां दासीदासमनुत्तमम्॥ हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च॥ 6॥ ददौ परमसंहृष्ट: कन्याधनमनुत्तमम्॥ दत्त्वा बहुधनं राजा समनुज्ञाप्य पाथिवम्॥ 7॥ प्रविवेश स्वनिलयं मिथिलां मिथिलेश्वर:॥ राजाप्ययोध्याधिपति: सह पुत्रैर्महात्मभि:॥ 8॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणम्॥ सर्ग 73॥

‘‘(जनकपुर से महाराज दशरथ की विदाई और मार्ग में परशुराम से भेंट) रात बीतने पर सवेरे महाराज दशरथ तथा विदेहराज जनक से अनुमति ले कर विश्वामित्र उत्तर पर्वत पर चले गए. उन के जाते ही अवधेश दशरथ ने भी जनकजी से पूछ कर अयोध्या जाने की तैयारी

कर ली॥ 1-3॥ उस समय विदेह राज ने बहुत

सा धन दहेज में दिया. उस के अतिरिक्त कई लाख गाऐं, अच्छेअच्छे कंबल, करोड़ों कपड़े, सुंदर और अलंकृत हाथीथोड़े, रथ तथा पैदल सेना, सौ सुंदरी कन्याएं, सुंदर दासदासी, सोनाचांदी और मूंगे आदि भी बड़े प्रसन्न मन से दिए. इस प्रकार बहुत तरह की वस्तुएं दे कर जनकजी बहुत दूर तक पहुंचाने गए. फिर राजा दशरथ से अनुमति ले कर के मिथिला को लौट आए.’’

जनक अमीर थे राजा थे. सो उन्होंने सहजता से सब जुटाया और दहेज दिया. मगर इसे रिवाज बना कर जब आगे की पीढि़यों द्वारा निभाया गया तो बहुत से सामान्य लोगों के लिए यह गले का फंदा बन गया. रिवाज की दुहाई दे कर ऐसे लोगों से भी दहेज निकलवाया गया जो इस के चक्कर में खुद को गिरवी रखने को मजबूर हो गए. लोग विवाह को संस्कारों से जोड़ते हैं. उन के लिए रामायण का यह प्रसंग आंख खोलने वाला है कि हर संस्कार तार्किक हो जरूरी नहीं. आज लड़के और लड़कियां मिल कर घर चलाते और कमाते हैं. ऐसे में दहेज की शान दिखाना महज बेवकूफी है और कुछ नहीं.

तनाव हावी न होने दें

यह बहुत जरूरी है कि आप शादी के दौरान तनाव हावी न होने दें. सगाई और शादी के बीच का समय सपनों का होता है. व्यक्ति अपने भावी जीवनसाथी के साथ प्यारमनुहार भरे लमहों का आनंद लेना चाहता है. उसे ले कर कुछ अपेक्षाएं होती हैं. मगर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह समय एक तरह के डर और अजनबीपन का भी होता है. किसी को महसूस हो सकता है कि शादी के बाद उस की जिंदगी बदल जाएगी और इस बात को ले कर उसे कुछ भय या तनाव हो सकता है. उस के मन में कुछ शंकाएं हो सकती हैं कि क्या उस ने सही जीवनसाथी चुना है?

मन में उठ रहे ये सवाल तब गहरे होने लगते हैं जब आप का जीवनसाथी आप की सोच या अपेक्षा से अलग व्यवहार करने लगे. जैसाकि फिल्म ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ में दिखाया गया है. इस में कल्कि अपने होने वाले पति अभय को ले कर ज्यादा ही पजैसिव हो जाती है. इस की वजह से अभय को घुटन महसूस होने लगती है. कल्कि भी तनाव में रहने लगती है. उस के अंदर का तनाव और बेचैनी उस के व्यवहार में ?ालकने लगती है. इस से हालात बिगड़ते हैं और दोनों के बीच कहासुनी होने लगती है.

जल्द ही अभय को समझ आ जाता है कि कल्कि के साथ शादी कर वह खुश नहीं रह पाएगा. वह शादी से इनकार कर देता है. इस तरह एक खूबसूरत रिश्ता जुड़ने से पहले ही टूट जाता है. ऐसा ही कुछ ‘विवाह’ फिल्म में हुआ जब अमृता की चाची बड़े घर में हो रही उस की शादी के दौरान खुश नहीं थी और घर में तनाव था. इसी तनाव की वजह से घर में हादसा होता है और अमृता काफी जल जाती है.

ऐसा कुछ न हो और शादी खुशीखुशी

निबट जाए इस के लिए जरूरी है कि शादी से पहले का समय कूल हो कर और एकदूसरे को सम?ाने की कोशिश कर के बिताया जाए. तनाव हावी न होने दें.

अगर आप भी रिमूव नहीं करती मेकअप तो जरूर पढ़ें ये खबर

औफिस जानें से पहले हम मेकअप करना नहीं भूलते लेकिन शाम को घर पहुचनें पर अक्सर हम मेकअप रिमूव करना भूल जाते हैं. मेकअप के साथ-साथ स्किन पर दिनभर धूल मिट्टी चिपकती हैं, जिसे साफ करना जरूरी होता है. वहीं अगर हम मेकअप रिमूव न करें तो ये हमारी स्किन को नुकसान पहुंचाता है. साथ ही स्किन का ग्लो भी जाने लगता है. आज हम आपको मेकअप रिमूव करने के नुकसान और कुछ मेकअप रिमूव के लिए टिप्स बताएंगे, जिसे आप हेल्दी स्किन के लिए अपना सकते हैं.

1. प्रौडक्ट्स के पड़ने वाले बुरे प्रभाव

मेकअप के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फाउंडेशन की मोटी परत स्किन पर चढ़ती है, इसलिए उस की जगह अन्य प्रौडक्ट्स दिन के लिए इस्तेमाल किए जाएं. फाउंडेशन में होने वाले कण और पिगमैंट दिन भर स्किन के रोमछिद्रों पर इफैक्ट करते हैं. वे कण स्किन में लौक हो जाते हैं और स्किन की परत में हवा के बाहर और अंदर आने में बाधक बनते हैं.

2. प्राइमर से होता है सबसे ज्यादा नुकसान

प्राइमर स्किन को ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. साथ ही आप इसे कैसे लगा रही हैं, उस पर भी यह निर्भर करता है. अगर आप ने प्राइमर पूरा दिन लगाए रखा है तो प्रदूषण आप की स्किन पर बहुत ही हानिकारक प्रभाव डालेगा.

3. लिपस्टिक रिमूव करना है जरूरी

अगर आप रात में लिपस्टिक लगा कर सो रही हैं, तो उस का परिणाम आप को अगले दिन, होंठों के सूखे व फटेफटे से होने के रूप में मिलेगा. यदि आप की लिपस्टिक में ज्यादा पिगमैंट है तो इसे लगाने से आप के होंठ काले भी पड़ सकते हैं. आप को इस तरह की लिपस्टिक हटाने के लिए सौफ्ट वाइप्स से हलकी स्क्रबिंग करनी होगी. कई कंपनियों की लिपस्टिक होंठों पर लंबे समय तक टिकी रहती है. ऐसे में लिपस्टिक हटाने के लिए पैट्रोलियम जैली का इस्तेमाल करें. लिपस्टिक हटाने के बाद लिप्स और ज्यादा ड्राई हो जाते हैं. ऐसे में लिप बाम जरूर लगाएं ताकि होंठों की नमी बरकरार रहे और वे मुलायम हो जाएं.

4. आई मेकअप हटाना है जरूरी

महिलाओं को रोज आंखों पर मसकारा, काजल और आईलाइनर लगाने की आदत होती है. इन में से कोई चीज लगाए बिना तो उन के घर से पैर ही नहीं निकलते. उन के पास में भी ये चीजें जरूर मिलेंगी. आईज मेकअप उन्हें बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन ज्यादातर महिलाएं इसे बिना साफ किए ही सो भी जाती हैं. अगर आप भी ऐसा करती हैं तो फौरन ऐसा करना बंद कर दें. माना कि पलकों पर मसकारा लगाए बिना मेकअप पूरा नहीं होता, मगर इसे लगाए ही रात को सो जाती हैं, तो आप की पलकों में फैलाव आना स्वाभाविक है. मसकारा आप की पलकों पर बोझ डालता है, इसे साफ न करने से पलकें अलगअलग होने लगती हैं. इस से न केवल आप की पलकें ज्यादा टूटेंगी, बल्कि बेहद हलकी भी पड़ जाएंगी. मसकारा के अंदर पाए जाने वाले कण आप की स्किन के छिद्रों को बंद कर देते हैं. ऐसे में आप ब्लेफ्राइटिंस बीमारी से भी ग्रस्त हो सकती हैं. इस के अलावा लंबे समय तक कंजक्टिविटीज की समस्या भी रह सकती है.

काजल, आईलाइनर या मसकारा यदि रात भर लगा कर रखा जाए तो आंखों की इन समस्याओं से आप को जूझना पड़ेगा. शुरुआत में आंखों में इरिटेशन और हलकी ऐलर्जी भी हो सकती है. आंखों में सूजन भी आ सकती है.

5. ऐसे करें बचाव

रात को सोने से पहले सारा मेकअप जरूर उतार दें. मेकअप में धूलमिट्टी फंसी हो सकती है. सारी रात इसे लगा कर सोने से धूलमिट्टी चेहरे के रोमछिद्रों को बंद कर सकती है. साथ ही मेकअप में कुछ ऐसे कैमिकल भी हो सकते हैं, जो कुछ समय बाद आप की त्वचा में जलन पैदा कर सकते हैं. इसलिए सोने से पहले मेकअप उतारना न भूलें. अगर आप अकसर मेकअप साफ करना भूल जाती हैं और बैड पर आ जाती हैं, तो अपने बैड की साइड की टेबल पर मेकअप रिमूव करने की सारी चीजें रखें और अपनी स्किन को स्वस्थ व चमकदार बनाने की ओर कदम बढ़ाएं.

6. ये बात न भूलें

आप की मेकअप किट में मेकअप का सारा सामान होने के साथ ही मेकअप रिमूवर होना भी बहुत जरूरी है. आंखें काफी सैंसिटिव होती हैं और उन्हें अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है. फेशियल मेकअप, फाउंडैशन, लिपस्टिक, वाटर बेस्ड मेकअप आदि क्लींजर से आसानी से साफ हो जाता है, लेकिन आई मेकअप जैसे आईलाइनर, काजल और मसकारा को हटाने के लिए अलग रिमूवर की जरूरत होती है.

7. इन टिप्स की भी रखें ध्यान

अगर आपको हल्का फीवर है तो आई मेकअप रिमूवल को चुनते वक्त एहतियात जरूर बरतें. अगर आप की आंख में लालिमा या फिर इन्फैक्शन है तो कौटन को एक ही आंख पर रख कर इस्तेमाल करें. अगर आप ऐसा नहीं करेंगी तो दूसरी आंख में भी इन्फैक्शन हो जाएगा. इसके अलावा कई महिलाएं रात को सोने से पहले चेहरा साबुन से धो दे दती हैं.अगर आप भी ऐसा करती हैं तो बिल्कुल ऐसा न करें.

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