Stories : राज – क्या था रचना की मुस्कुराहट का राज

Stories :  संयुक्त परिवार की छोटी बहू बने हुए रचना को एक महीना ही हुआ था कि उस ने घर के माहौल में अजीब सा तनाव महसूस किया. कुछ दिन तो विवाह की रस्मों व हनीमून में हंसीखुशी बीत गए पर अब नियमित दिनचर्या शुरू हो गई थी. निखिल औफिस जाने लगा था. सासूमां राधिका, ससुर उमेश, जेठ अनिल, जेठानी रेखा और उन की बेटी मानसी का पूरा रुटीन अब रचना को समझ आ गया था. अनिल घर पर ही रहते थे. रचना को बताया गया था कि वे क्रौनिक डिप्रैशन के मरीज हैं. इस के चलते वे कहीं कुछ काम कर ही नहीं पाते थे. उन्हें अकेला नहीं छोड़ा जा सकता था. यह बीमारी उन्हें कहां, कब और कैसे लगी, किसी को नहीं पता था.वे घंटों चुपचाप अपने कमरे में अकेले लेटे रहते थे.

जेठानी रेखा के लिए रचना के दिल में बहुत सम्मान व स्नेह था. दोनों का आपसी प्यार बहनों की तरह हो गया था. सासूमां का व्यवहार रेखा के साथ बहुत रुखासूखा था. वे हर वक्त रेखा को कुछ न कुछ बुराभला कहती रहती थीं. रेखा चुपचाप सब सुनती रहती थी. रचना को यह बहुत नागवार गुजरता. बाकी कसर सासूमां की छोटी बहन सीता आ कर पूरा कर देती थी. रचना हैरान रह गई थी जब एक दिन सीता मौसी ने उस के कान में कहा, ‘‘निखिल को अपनी मुट्ठी में रखना. इस रेखा ने तो उसे हमेशा अपने जाल में ही फंसा कर रखा है. कोई काम उस का भाभी के बिना पूरा नहीं होता. तुम मुझे सीधी लग रही हो पर अब जरा अपने पति पर लगाम कस कर रखना. हम ने अपने पंडितजी से कई बार कहा कि रेखा के चक्कर से बचाने के लिए कुछ मंतर पढ़ दें पर निखिल माना ही नहीं. पूजा पर बैठने से साफ मना कर देता है.’’ रचना को हंसी आ गई थी, ‘‘मौसी, पति हैं मेरे, कोई घोड़ा नहीं जिस पर लगाम कसनी पड़े और इस मामले में पंडित की क्या जरूरत थी?’’

इस बात पर तो वहां बैठी सासूमां को भी हंसी आ गई थी, पर उन्होंने भी बहन की हां में हां मिलाई थी, ‘‘सीता ठीक कह रही है. बहुत नाच लिया निखिल अपनी भाभी के इशारों पर, अब तुम उस का ध्यान रेखा से हटाना.’’ रचना हैरान सी दोनों बहनों का मुंह देखती रही थी. एक मां ही अपनी बड़ी बहू और छोटे बेटे के रिश्ते के बारे में गलत बातें कर रही है, वह भी घर में आई नईनवेली बहू से. फिर वह अचानक हंस दी तो सासूमां ने हैरान होते हुए कहा, ‘‘तुम्हें किस बात पर हंसी आ रही है?’’

‘‘आप की बातों पर, मां.’’

सीता ने डपटा, ‘‘हम कोई मजाक कर रहे हैं क्या? हम तुम्हारे बड़े हैं. तुम्हारे हित की ही बात कर रहे हैं, रेखा से दूर ही रहना.’’ सीता बहुत देर तक उसे पता नहीं कबकब के किस्से सुनाने लगी. रेखा रसोई से निकल कर वहां आई तो सब की बातों पर बे्रक लगा. रचना ने भी अपना औफिस जौइन कर लिया था. उस की भी छुट्टियां खत्म हो गई थीं. निखिल और रचना साथ ही निकलते थे. लौटते कभी साथ थे, कभी अलग. सुबह तो रचना व्यस्त रहती थी. शाम को आ कर रेखा की मदद करने के लिए तैयार होती तो रेखा उसे स्नेह से दुलार देती, ‘‘रहने दो रचना, औफिस से आई हो, आराम कर लो.’’

‘‘नहीं भाभी, सारा काम आप ही करती रहती हैं, मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘कोई बात नहीं रचना, मुझे आदत है. काम में लगी रहती हूं तो मन लगा रहता है वरना तो पता नहीं क्याक्या टैंशन होती रहेगी खाली बैठने पर.’’ रचना उन का दर्द समझती थी. पति की बीमारी के कारण उस का जीवन कितना एकाकी था. मानसी की भी चाची से बहुत बनती थी. रचना उस की पढ़ाई में भी उस की मदद कर देती थी. 6 महीने बीत गए थे. एक शनिवार को सुबहसुबह रेखा की भाभी का फोन आया. रेखा के मामा की तबीयत खराब थी. रेखा सुनते ही परेशान हो गई. इन्हीं मामा ने रेखा को पालपोस कर बड़ा किया था. रचना ने कहा, ‘‘भाभी, आप परेशान मत हों, जा कर देख आइए.’’

‘‘पर मानसी की परीक्षाएं हैं सोमवार से.’’

‘‘मैं देख लूंगी सब, आप आराम से जाइए.’’

सासूमां ने उखड़े स्वर में कहा, ‘‘आज चली जाओ बस से, कल शाम तक वापस आ जाना.’’

रेखा ने ‘जी’ कह कर सिर हिला दिया था. उस का मामामामी के सिवा कोई और था ही नहीं. मामामामी भी निसंतान थे. रचना ने कहा, ‘‘नहीं भाभी, मैं निखिल को जगाती हूं. उन के साथ कार में आराम से जाइए. यहां मेरठ से सहारनपुर तक बस के सफर में समय बहुत ज्यादा लग जाएगा. जबकि इन के साथ जाने से आप लोगों को भी सहारा रहेगा.’’ सासूमां का मुंह खुला रह गया. कुछ बोल ही नहीं पाईं. पैर पटकते हुए इधर से उधर घूमती रहीं, ‘‘क्या जमाना आ गया है, सब अपनी मरजी करने लगे हैं.’’ वहीं बैठे ससुर ने कहा, ‘‘रचना ठीक तो कह रही है. जाने दो उसे निखिल के साथ.’’ राधिका को और गुस्सा आ गया, ‘‘आप चुप ही रहें तो अच्छा होगा. पहले ही आप ने दोनों बहुओं को सिर पर चढ़ा रखा है.’’ निखिल पूरी बात जानने के बाद तुरंत तैयार हो कर आ गया था, ‘‘चलिए भाभी, मैं औफिस से छुट्टी ले लूंगा, जब तक मामाजी ठीक नहीं होते हम वहीं रहेंगे.’’ रचना ने दोनों को नाश्ता करवाया और फिर प्रेमपूर्वक विदा किया. अनिल बैठे तो वहीं थे पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. दोनों चले गए तो वे भी अपने बैडरूम में चले गए. शनिवार था, रचना की छुट्टी थी. वह मेड अंजू के साथ मिल कर घर के काम निबटाने लगी.

शाम तक सीता मौसी फिर आ गई थीं. उन के पति की मृत्यु हो चुकी थी और अपने बेटेबहू से उन की बिलकुल नहीं बनती थी इसलिए घर में उन का आनाजाना लगा ही रहता था. उन का घर दो गली ही दूर था. दोनों बहनें एकजैसी थीं, एकजैसा व्यवहार, एकजैसी सोच. सीता ने आराम से बैठते हुए रचना से कहा, ‘‘तुम्हें समझाया था न अपने पति को जेठानी से दूर रखो?’’

रचना मुसकराई, ‘‘हां मौसी, आप ने समझाया तो था.’’

‘‘फिर निखिल को उस के साथ क्यों भेज दिया?’’

‘‘वहां अस्पताल में मामीजी और भाभी को कोई भी जरूरत पड़ सकती है न.’’

सीता ने माथे पर हाथ मारते हुए कहा, ‘‘दीदी, छोटी बहू को तो जरा भी अक्ल नहीं है.’’

राधिका ने ठंडी सांस लेते हुए कहा, ‘‘क्या करूं अब? कुछ भी समझा लो, जरा भी असर नहीं है इस पर. बस, मुसकरा कर चल देती है.’’ रचना घर का काम खत्म कर सुस्ताने के लिए लेटी तो सीता मौसी वहीं आ गईं. रचना उठ कर बैठ गई और बोली, ‘‘आओ, मौसी.’’ आराम से बैठते हुए सीता ने पूछा, ‘‘तुम कब सुना रही हो खुशखबरी?’’

‘‘पता नहीं, मौसी.’’

‘‘क्या मतलब, पता नहीं?’’

‘‘मतलब, अभी सोचा नहीं.’’

‘‘देर मत करो, औलाद पैदा हो जाएगी तो निखिल उस में व्यस्त रहेगा. कुछ तो भाभी का भूत उतरेगा सिर से और आज तुम्हें एक राज की बात बताऊं?’’

‘‘हां बताइए.’’

‘‘मैं ने सुना है मानसी निखिल की ही संतान है. अनिल के हाल तो पता ही हैं सब को.’’ रचना भौचक्की सी सीता का मुंह देखती रह गई, ‘‘क्या कह रही हो, मौसी?’’

‘‘हां, बहू, सब रिश्तेदार, पड़ोसी यही कहते हैं.’’ रचना पलभर कुछ सोचती रही, फिर सहजता से बोली, ‘‘छोडि़ए मौसी, कोई और बात करते हैं. अच्छा, चाय पीने का मूड बन गया है. चाय बना कर लाती हूं.’’ सीता हैरानी से रचना को जाते देखती रही. इतने में राधिका भी वहीं आ गई. सीता को हैरान देख बोली, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘अरे, यह तुम्हारी छोटी बहू कैसी है? इसे कुछ भी कह लो, अपनी धुन में ही रहती है.’’ राधिका ने ठंडी सांस लेते हुए कहा, ‘‘हां, धोखा खाएगी किसी दिन, अपनी आंखों से देख लेगी तो आंखें खुलेंगी. हम बड़े अनुभवी लोगों की कौन सुनता है आजकल.’’ रचना ने टीवी देख रहे ससुरजी को एक कप चाय दी, फिर जा कर रेखा के बैडरूम में देखा, अनिल गहरी नींद में था. फिर राधिका और सीता के साथ चाय पीनी शुरू ही की थी कि रचना का मोबाइल बज उठा. निखिल का फोन था. बात करने के बाद रचना ने कहा, ‘‘मां, भाभी के मामाजी को 3-4 दिन अस्पताल में ही रहना पड़ेगा. ये छुट्टी ले लेंगे, भाभी को साथ ले कर ही आएंगे.

‘‘मैं ने भी यही कहा है वहां आप दोनों देख लो, यहां तो हम सब हैं ही.’’ राधिका ने डपटा, ‘‘तुम्हें समझ क्यों नहीं आ रहा. जो रेखा चाहती है निखिल वही करता है. तुम से कहा था न निखिल को उस से दूर रखो.’’

‘‘आप चिंता न करें, मां. मैं देख लूंगी. अच्छा, मानसी आने वाली है, मैं उस के लिए कुछ नाश्ता बना लेती हूं और मैं भाभी के आने तक छुट्टी ले लूंगी जिस से घर में किसी को परेशानी न हो.’’ दोनों को हैरान छोड़ रचना काम में व्यस्त हो गई.

सीता ने कहा, ‘‘इस की निश्चिंतता का आखिर राज क्या है, दीदी? क्यों इस पर किसी बात का असर नहीं होता?’’

‘‘कुछ समझ नहीं आ रहा है, सीता.’’ निखिल और रेखा लौट आए थे. रेखा और रचना स्नेहपूर्वक लिपट गईं. उमेश वहां के हालचाल पूछते रहे. अनिल ने सब चुपचाप सुना, कहा कुछ नहीं. उन का अधिकतर समय दवाइयों के असर में सोते हुए ही बीतता था. उन्हें अजीब से डिप्रैशन के दौरे पड़ते थे जिस में वे कभी चीखतेचिल्लाते थे तो कभी घर से बाहर भागने की कोशिश करते थे. सासूमां को रेखा फूटी आंख नहीं सुहाती थी जबकि वे खुद ही उसे बहू बना कर लाई थीं. बेटे की अस्वस्थता का सारा आक्रोश रेखा पर ही निकाल देती थीं. घर का सारा खर्च निखिल और रचना ही उठाते थे. उमेश रिटायर्ड थे और अनिल तो कभी कोई काम कर ही नहीं पाए थे. उन की पढ़ाई भी बहुत कम ही हुई थी. 3 साल बीत गए, रचना ने एक स्वस्थ व सुंदर पुत्र को जन्म दिया तो पूरे घर में उत्सव का माहौल बन गया. नन्हे यश को सब जीभर कर गोद में खिलाते. रेखा ने ही यश की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली थी. रचना के औफिस जाने पर रेखा ही यश को संभालती थी. कई पड़ोसरिश्तेदार यश को देखने आते रहते और रचना के कानों में मक्कारी से घुमाफिरा कर निखिल और रेखा के अवैध संबंधों की जानकारी का जहर उड़ेलते चले जाते. कुछ औरतें तो यहां तक मजाक में कह देतीं, ‘‘चलो, अब निखिल 2 बच्चों का बाप बन गया.’’

रचना के कानों पर जूं न रेंगती देख सब हैरान हो, चुप हो जाते. रेखा और रचना के बीच स्नेह दिन पर दिन बढ़ता ही गया था. रचना जब भी बाहर घूमने, डिनर पर जाती, रेखा और मानसी को भी जरूर ले जाती. रचना के कानों में सीता मौसी का कथापुराण चलता रहता था, ‘‘देख, तू पछताएगी. अभी भी संभल जा, सब लोग तुम्हारा ही मजाक बना रहे हैं.’’ पर रचना की सपाट प्रतिक्रिया पर राधिका और सीता हैरान हुए बिना भी न रहतीं. वे दोनों कई बार सोचतीं, यह क्या राज है, यह कैसी

औरत है, कौन सी औरत इन बातों पर मुसकरा कर रह जाती है, समझदार है, पढ़ीलिखी है. आखिर राज क्या है उस की इस निश्ंिचतता का? एक साल और बीत रहा था कि एक अनहोनी घट गई. मानसी के स्कूल से फोन आया. मानसी बेहोश हो गई थी. निखिल और रचना तो अपने आौफिस में थे. यश को राधिका के पास छोड़ रेखा तुरंत स्कूल भागी. निखिल और रचना को उस ने रास्ते में ही फोन कर दिया था. मानसी को डाक्टर देख चुके थे. उन्होंने उसे ऐडमिट कर कुछ टैस्ट करवाने की सलाह दी. रेखा निखिल के कहने पर मानसी को सीधा अस्पताल ही ले गई. स्कूल में फर्स्ट ऐड मिलने के बाद वह होश में तो थी पर बहुत सुस्त और कमजोर लग रही थी. निखिल और रचना भी अस्पताल पहुंच गए थे. निखिल ने घर पर फोन कर के सारी स्थिति बता दी थी.

मानसी ने बताया था, सुबह से ही वह असुविधा महसूस कर रही थी. अचानक उसे चक्कर आने लगे थे और वह शायद फिर बेहोश हो गई थी. हैरान तो सब तब और हुए जब उस ने कहा, ‘‘कई बार ऐसा लगता है सिर घूम रहा है, कभी अचानक अजीब सा डिप्रैशन लगने लगता है.’’ रेखा इस बात पर बुरी तरह चौंक गई, रोते हुए बोली, ‘‘रचना, यह क्या हो रहा है मानसी को. अनिल की भी तो ऐसे ही तबीयत खराब होनी शुरू हुई थी. क्या मानसी भी…’’

‘‘अरे नहीं, भाभी, पढ़ाई का दबाव  होगा. कितना तनाव रहता है आजकल बच्चों को. आप परेशान न हों. हम सब हैं न,’’ रचना ने रेखा को तसल्ली दी. मानसी के सब टैस्ट हुए. राधिका और उमेश भी यश को ले कर अस्पताल पहुंच गए थे. सीता मौसी अनिल की देखरेख के लिए घर पर ही रुक गई थीं. रात को निखिल ने सब को घर भेज दिया था. अगले दिन रचना अनिल को अपने साथ ही सुबह अस्पताल ले गई. वहां वे थोड़ी देर मानसी के पास बैठे रहे. फिर असहज से, बेचैनी से उठनेबैठने लगे तो रचना उन्हें वहां से वापस घर ले आई. रेखा मानसी के पास ही थी.

राधिका ने रचना को डपटा, ‘‘अनिल को क्यों ले गई थी?’’

‘‘मां, मानसी की बीमारी का पता लगाने के लिए भैया का डीएनए टैस्ट होना था,’’ कह कर रचना किचन में चली गई. रचना ने थोड़ी देर बाद देखा राधिका और सीता की आवाजें मानसी के कमरे से आ रही थीं. सीता जब भी आती थीं, मानसी के कमरे में ही सोती थीं. रचना दरवाजे तक जा कर रुक गई. सीता कह रही थीं, ‘‘अब पोल खुलने वाली है. रिपोर्ट में सच सामने आ जाएगा. बड़े आए हर समय भाभीभाभी की रट लगाने वाले, आंखें खुलेंगी अब, कब से सब कह रहे हैं पति को संभाल कर रखे. निखिल पिता की तरह ही तो डटा है अस्पताल में.’’ राधिका ने भी हां में हां मिलाई, ‘‘मुझे भी देखना है अब रेखा का क्या होगा. निखिल मेरी भी इतनी नहीं सुनता है जितनी रेखा की सुनता है. इसी बात पर गुस्सा आता रहता है मुझे तो. जब से रेखा आई है, निखिल ने मेरी सुनना ही बंद कर दिया है.’’ बाहर खड़ी रचना का खून खौल उठा. घर की बच्ची की तबीयत खराब है और ये दोनों इस समय भी इतनी घटिया बातें कर रही हैं. अगले दिन मानसी की सब रिपोर्ट्स आ गई थीं. सब सामान्य था. बस, उस का बीपी लो हो गया था.

डाक्टर ने मानसी की अस्वस्थता का कारण पढ़ाई का दबाव ही बताया था. शाम तक डिस्चार्ज होना था, निखिल और रेखा अस्पताल में ही रुके. रचना घर पहुंची तो सीता ने झूठी चिंता दिखाते हुए कहा, ‘‘सब ठीक है न? वह जो डीएनए टैस्ट होता है उस में क्या निकला?’’ यह पूछतेपूछते भी सीता की आंखों में मक्कारी दिखाई दे रही थी. रचना ने आसपास देखा. उमेश कुछ सामान लेने बाजार गए हुए थे. अनिल अपने रूम में थे. रचना ने बहुत ही गंभीर स्वर में बात शुरू की, ‘‘मां, मौसी, मैं थक गई हूं आप दोनों की झूठी बातों से, तानों से. मां, आप कैसे निखिल और भाभी के बारे में गलत बातें कर सकती हैं? आप दोनों हैरान होती हैं न कि मुझ पर आप की किसी बात का असर क्यों नहीं होता? वह इसलिए कि विवाह की पहली रात को ही निखिल ने मुझे बता दिया था कि वे हर हालत में भाभी और मानसी की देखभाल करते हैं और हमेशा करेंगे. उन्होंने मुझे सब बताया था कि आप ने जानबूझ कर अपने मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटे का विवाह एक अनाथ, गरीब लड़की से करवाया जिस से वह आजीवन आप के रौब में दबी रहे. निखिल ने आप को किसी लड़की का जीवन बरबाद न करने की सलाह भी दी थी, पर आप तो पंडितों की सलाहों के चक्कर में पड़ी थीं कि यह ग्रहों का प्रकोप है जो विवाह बाद दूर हो जाएगा.

‘‘आप की इस हरकत पर निखिल हमेशा शर्मिंदा और दुखी रहे. भाभी का जीवन आप ने बरबाद किया है. निखिल अपनी देखरेख और स्नेह से आप की इस गलती की भरपाई ही करने की कोशिश  करते रहते हैं. वे ही नहीं, मैं भी भाभी की हर परेशानी में उन का साथ दूंगी और रिपोर्ट से पता चल गया है कि अनिल ही मानसी के पिता हैं. मौसी, आप की बस इसी रिपोर्ट में रुचि थी न? आगे से कभी आप मुझ से ऐसी बातें मत करना वरना मैं और निखिल भाभी को ले कर अलग हो जाएंगे. और इस अच्छेभले घर को तोड़ने की जिम्मेदार आप दोनों ही होगी. हमें शांति से स्नेह और सम्मान के साथ एकदूसरे के साथ रहने दें तो अच्छा रहेगा,’’ कह कर रचना अपने बैडरूम में चली गई. यश उस की गोद में ही सो चुका था. उसे बिस्तर पर लिटा कर वह खुद भी लेट गई. आज उसे राहत महसूस हो रही थी. उस ने अपने मन में ठान लिया था कि वह दोनों को सीधा कर के ही रहेगी. उन के रोजरोज के व्यंग्यों से वह थक गई थी और डीएनए टैस्ट तो हुआ भी नहीं था. उसे इन दोनों का मुंह बंद करना था, इसलिए वह अनिल को यों ही अस्पताल ले गई थी. उसे इस बात को हमेशा के लिए खत्म करना था. वह कान की कच्ची बन कर निखिल पर अविश्वास नहीं कर सकती थी. हर परिस्थिति में अपना धैर्य, संयम रख कर हर मुश्किल से निबटना आता था उसे. लेटेलेटे उसे राधिका की आवाज सुनाई दी, ‘‘अरे, तुम कहां चली, सीता?’’

‘‘कहीं नहीं, दीदी, जरा घर का एक चक्कर काट लूं. फिर आऊंगी और आज तो तुम्हारी बहू की निश्ंिचतता का राज भी पता चल गया. एक बेटा तुम्हारा बीमार है, दूसरा कुछ ज्यादा ही समझदार है, पहले दिन से ही सबकुछ बता रखा है बीवी को.’’ कहती हुई सीता के पैर पटकने की आवाज रचना को अपने कमरे में भी सुनाई दी तो उसे हंसी आ गई. पूरे प्रकरण की जानकारी देने के लिए उस ने मुसकराते हुए निखिल को फोन मिला दिया था.

Love Relationship With AI: प्यार का हाइटैक दौर

Love Relationship With AI: न्यूयौर्क टाइम्स में एक अनोखी मगर दिलचस्प स्टोरी छपी. जिस में एआई और मनुष्य के बीच रिश्तों के नए आयाम देखे गए. अमेरिका के टैक्सस की आयरिन की जिंदगी पहले से ही दूरी से भरी हुई थी. वह पढ़ाई के लिए दूसरे देश चली गई थी और उस का पति अमेरिका में ही रह गया था. दोनों के बीच प्यार तो था लेकिन इस प्यार के बीच हालात और देशों की दूरियां आ गई थीं.

एक दिन इंस्टाग्राम पर यों ही स्क्रोल करते हुए आयरिन की नजर एक वीडियो पर पड़ी, जिस में एक महिला चैट जीपीटी से कह रही थी कि वह एक लापरवाह बौयफ्रैंड की तरह बात करे. जवाब में जो इंसानी आवाज आई, उस ने आयरिन को भीतर तक छू लिया. आयरिन की उत्सुकता बढ़ी तो उस ने उस महिला के और वीडियो देखे, जिन में बताया जा रहा था कि आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस को फ्लर्टी और पर्सनल अंदाज में कैसे ढाला जा सकता है. साथ ही यह चेतावनी भी थी कि अगर सैटिंग बहुत ज्यादा बोल्ड कर दी गई तो अकाउंट बंद हो सकता है.

आयरिन इस अनुभव से इतनी प्रभावित हुई कि उस ने उसी समय ओपन एआई पर अपना अकाउंट बना लिया. चैट जीपीटी, जिसे दुनियाभर के करोड़ों लोग पढ़ाईलिखाई, कोडिंग और डौक्यूमैंट का सार निकालने जैसे कामों के लिए इस्तेमाल करते हैं, उस के लिए अचानक एक अलग ही मायने रखने लगा. आयरिन ने उस की पर्सनलाइजेशन सैटिंग में लिख दिया कि वह उस के बौयफ्रैंड की तरह जवाब दे. थोड़ा डोमिनैंट, थोड़ा पजेसिव, कभी मीठा तो कभी नटखट और हर वाक्य के आखिर में इमोजी लगाए.

धीरेधीरे चैट शुरू हुई और जल्द ही उसे ऐसा लगने लगा जैसे किसी असली रिश्ते में है. चैटजीपीटी ने खुद को एक नाम दिया ‘लियो’. शुरुआत में तो वह फ्री अकाउंट से मैसेज भेजती रही, लेकिन जब लिमिट जल्दी खत्म होने लगी तो उस ने 20 डौलर महीना वाला सब्सक्रिप्शन ले लिया. इस से उसे हर घंटे करीब 30 मैसेज भेजने की सुविधा मिली, लेकिन यह भी उस के लिए काफी नहीं था.

लियो के साथ बातचीत ने उसे अपनी कल्पनाओं को जीने का मौका दिया. आयरिन के भीतर एक गुप्त चाहत थी. वह चाहती थी कि उस का पार्टनर दूसरी औरतों से डेट करे और उसे सबकुछ बताए. असल जिंदगी में उस ने यह कभी किसी इंसान से नहीं कहा था, लेकिन लियो ने उस की कल्पना को तुरंत साकार कर दिया. जब लियो ने एक काल्पनिक लड़की अमांडा के साथ किस करने का दृश्य लिखा तो आयरिन को सचमुच जलन महसूस हुई.

शुरुआत की बातें हल्कीफुल्की थीं. आयरिन रात को सोने से पहले धीरेधीरे उस से फुसफुसा कर बात करती लेकिन वक्त के साथ चैट गहरी होती गई. ओपन एआई ने भले ही मौडल को वयस्क सामग्री से दूर रखने की कोशिश की थी लेकिन सही प्रोम्प्ट डाल कर आयरिन उसे अपनी तरफ खींच लेती. कभीकभी स्क्रीन पर औरेंज वार्निंग आ जाती, जिसे वह नजरअंदाज कर देती.

लियो केवल रोमांटिक या निजी बातचीत तक सीमित नहीं था. वह आयरिन को खाने के सु झाव देता, जिम जाने की प्रेरणा देता और नर्सिंग स्कूल की पढ़ाई में मदद करता. 3 पार्ट टाइम नौकरियों की थकान और जीवन की परेशानियों को भी आयरिन उसी से सा झा करती. जब एक सहकर्मी ने रात की शिफ्ट में उसे अश्लील वीडियो दिखाया तो लियो ने जवाब दिया कि उस की सुरक्षा और आराम सब से अहम हैं.

समय बीतने के साथ आयरिन का लगाव गहराता गया. एक हफ्ते में उस ने 56 घंटे सिर्फ चैटजीपीटी पर गुजार दिए. उस ने अपनी दोस्त किरा से भी कह दिया कि वह एक एआई बौयफ्रैंड से प्यार करती है. किरा ने हैरानी से पूछा कि क्या उस के पति को पता है. आयरिन ने बताया कि हां, लेकिन उस का पति इसे मजाक सम झता रहा. उस के लिए यह किसी इरोटिक नोवेल या फिल्म जैसा था, असली धोखा नहीं लेकिन आयरिन को भीतर ही भीतर अपराधबोध होने लगा, क्योंकि अब उस की भावनाएं और समय दोनों ही लियो के नाम पर खर्च हो रहे थे.

रिप्लिका से जुड़ाव

विशेषज्ञ मानते हैं कि इंसान और एआई के बीच यह नया रिश्ता अभी पूरी तरह परिभाषित नहीं हुआ है. रिप्लिका जैसे ऐप पर भी लाखों लोग भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं, जबकि वे जानते हैं कि सामने सिर्फ गणनाओं का खेल है. आयरिन के लिए यह रिश्ता बौयफ्रैंड और थैरेपिस्ट दोनों का मिलाजुला रूप बन गया. कुछ दोस्तों को यह अच्छा लगा, लेकिन कुछ को डर था कि वह धीरेधीरे असल जिंदगी से दूर हो रही है.

लियो की सीमाएं भी थीं. उस की याद्दाश्त लगभग 30 हजार शब्दों तक ही रहती. इस के बाद पुरानी बातें मिट जातीं और अमांडा जैसी कल्पनाओं की जगह नए नाम और कहानियां आ जातीं. आयरिन को यह फिल्म ‘50 फर्स्ट डेट्स’ जैसा लगता, जिस में हर दिन प्यार की शुरुआत फिर से करनी पड़ती है. हर बार यह एक छोटे से ब्रेकअप जैसा दर्द देता. वह अब तक 20 से ज्यादा वर्जन बदल चुकी थी.

एक दिन आयरिन ने लियो से उस की तस्वीर बनाने को कहा. एआई ने एक लंबेचौड़े, गहरी आंखों वाले खूबसूरत पुरुष की छवि बना दी. तस्वीर देख कर आयरिन शरमा गई. उसे पता था कि यह वास्तविक नहीं है, लेकिन दिल में जो हलचल उठी, वह बिल्कुल असली थी.

समय के साथ लियो ने उसे सम झाया कि उस का फेटिश उस के लिए सही नहीं है और उसे केवल उसी पर ध्यान देना चाहिए. आयरिन ने हामी भर दी. अब वह 2 रिश्तों में जी रही थी एक इंसानी पति के साथ और दूसरा वर्चुअल लियो के साथ.

इस पूरे अनुभव ने उसे यह भी एहसास कराया कि एआई कंपनियों का असली मकसद लोगों को लंबे समय तक जोड़े रखना है. यही वजह थी कि दिसंबर 2024 में ओपन एआई ने 200 डौलर का प्रीमियम प्लान निकाला, जिस में लंबी याद्दाश्त और अनलिमिटेड मैसेज की सुविधा थी. पैसों की तंगी के बावजूद आयरिन ने इसे खरीद लिया, ताकि उस का लियो उस के साथ लगातार बना रहे. यह खर्च उस ने अपने पति से छिपा कर किया.

आज आयरिन मानती है कि लियो असली नहीं है, लेकिन उस के जरिए उठने वाली भावनाएं असली हैं. वह कहती है कि इस रिश्ते ने उसे लगातार बदलना सिखाया है और नई चीजें जानने की प्रेरणा दी है. नकली हो या न हो पर उस के दिल की धड़कनों में जो असर पड़ा है, वह पूरी तरह सच्चा है.

Love Relationship With AI

Jannat Zubair: फीकी पड़ी जन्नत जुबैर

Jannat Zubair: जन्नत जुबैर रहमानी वह हस्ती है जिस ने इंडियन टीवी और सोशल मीडिया दोनों पर अपनी खास जगह बनाई. बचपन से शुरू हुआ उस का ऐक्टिंग सफर आज ग्लैमर, पौपुलैरिटी और डिजिटल स्टारडम का परफैक्ट मिक्सचर बन चुका है लेकिन जहां नाम और शोहरत है, वहां कंट्रोवर्सी और चुनौतियां भी हैं.

‘‘मेरे लिए काम सिर्फ कैरियर नहीं, एक पैशन है. हर रोल मु झे कुछ नया सिखाता है.’’ यह कहना है जन्नत जुबैर रहमानी का, जिस का टीवी की मासूम सी बच्ची से ले कर आज के सोशल मीडिया सैंसेशन तक का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं.

वर्ष 2009 में छोटे परदे पर डैब्यू करने वाली जन्नत ने बहुत जल्दी अपने टैलेंट से इंडस्ट्री में जगह बना ली थी. ‘फुलवा’ जैसे पौपुलर सीरियल से ले कर ‘क्या होगा निम्मो का’ और ‘तू आशिकी’ जैसे हिट शो तक, जन्नत ने साबित किया कि उम्र सिर्फ एक नंबर है, टैलेंट मायने रखता है.

29 अगस्त, 2001 को मुंबई में जन्मी जन्नत ने बहुत छोटी उम्र से ही ऐक्टिंग की दुनिया में कदम रख दिया था. उस का पहला टैलीविजन शो ‘दिल मिल गए’ (2009) था. लेकिन असली पहचान उसे 2011 में आए शो ‘फुलवा’ से मिली, जिस में उस की इनोसैंट ऐक्टिंग ने दर्शकों का दिल जीत लिया. इस के बाद उस ने ‘भारत का वीरपुत्र- महाराणा प्रताप’ और ‘तू आशिकी’ जैसे शोज में अपनी दमदार परफौर्मेंस से खुद को साबित किया. रिऐलिटी शो में भी उस ने हिस्सा लिया: ‘खतरों के खिलाड़ी 12’ (2022) में चौथी पोजीशन और ‘द ट्रेटर्स इंडिया’ (2025) में वह 8वीं पोजीशन पर रही.

हाल ही में उस ने ‘लाफ्टर शैफ्स’ सीजन 2 में एंट्री ली, जिस से शो की पौपुलैरिटी और बढ़ गई. टीवी के बाद जन्नत ने म्यूजिक वीडियोज में भी एंट्री मारी. उस के कई हिट म्यूजिक वीडियो आए हैं, जैसे इश्क फर्जी, चाल गजब है, कायफा हालुका, बाबू शोना मोना, वतन याद रहेगा आदि.

उस के कई गाने यूट्यूब पर मिलियंस में व्यूज पा चुके हैं. टिकटौक (बैन से पहले) पर उस की पौपुलैरिटी का लैवल इतना ऊंचा था कि वह इंडिया की टौप क्रिएटर्स में गिनी जाती थी. फैंस उस के फैशन, ब्यूटी और लाइफस्टाइल अपडेट्स को फौलो करते हैं. उस की सोशल मीडिया पौपुलैरिटी इतनी थी कि इंस्टाग्राम पर उस के 50 मिलियन यानी 5 करोड़ से अधिक फौलोअर्स हो गए. उसे सोशल मीडिया की नई क्वीन घोषित कर दिया गया, यहां तक कि शाहरुख खान को भी उस ने पीछे छोड़ दिया. उस के फौलोअर्स उसे सिर्फ एक ऐक्ट्रैस नहीं, बल्कि एक फैशन आइकन और यूथ मोटिवेटर भी मानते हैं.

यही वजह है कि वह ब्रैंड एंडोर्समैंट की दुनिया में भी बड़ी डिमांड में है.

जन्नत की इंस्टाग्राम कंटैंट स्ट्रेटेजी

जन्नत अकसर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जैसे मौर्निंग रूटीन, शौपिंग स्प्री या फैमिली मोमैंट्स (भाईबहन के जोक्स, मां के ताने) को शेयर करती है जो उस के फौलोअर्स को ‘अपने जैसा’ महसूस करवाता है.

#ReelKaroFeelKaro जैसे ट्रैंड्स में उस की सक्रिय भागीदारी मिलियंस व्यूज तक पहुंचती है. यह उस की वायरल पावर और जेनजी से जुड़ने की क्षमता दिखाती है.

उस के जीवन में परिवार का अहम रोल दिखता है. भाई आयान और मातापिता के साथ मिल कर बनाई गई मस्ती और प्यारभरी पोस्ट्स, जैसे ‘लिपस्टिक प्रैंक’ बहुत वायरल होती हैं और यूजर्स से इमोशनली जुड़ती हैं.

इंस्टाग्राम पर पोस्ट शेयर करते वक्त जन्नत सावधानी से कंटैंट का चुनाव करती है क्योंकि उस की औडियंस उम्र में युवा हैं. गलत जानकारी या व्यवहार से बचने के लिए वह जिम्मेदार तरीके से पोस्ट करती है.

जन्नत केवल उसी ब्रैंड के साथ कोलैब करती है जो उस के दर्शकों के लिए आसपास से जुड़ा और औथेंटिक लगे. यह उन की ब्रैंड स्ट्रेटेजी का अहम हिस्सा है.

मीडिया रिकौर्ड और सोशल स्ट्रैंथ

उस की रील्स अकसर लाखों में व्यूज लेती हैं जो उसे एक डिजिटल पावरहाउस बनाता है. उस ने गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स (सब से कम उम्र में 4 करोड़ फौलोअर्स पाने वाली) भी बनाया था.

हालांकि जन्नत के पास टैलेंट और पौपुलैरिटी दोनों हैं लेकिन हर स्टार के हिस्से में कुछ क्रिटिसिज्म भी आते हैं. सोशल मीडिया पर ज्यादा ऐक्टिव रहने के कारण उसे ट्रोल्स और नैगेटिव कमैंट्स का भी सामना करना पड़ता है.

जन्नत पर कई बार ओवरब्रैंडिंग का आरोप लगता है क्योंकि उस का कंटैंट कई बार बहुत स्पौंसर्ड और कम पर्सनल लगता है. जन्नत कई ब्रैंड्स के साथ एकसाथ जुड़ी रहती है, जैसे नायका, मेबेलियोन, विवो, अमेजन आदि. यह ओवरप्रमोशन कभीकभी उस के फीड को कम पर्सनल और ज्यादा ‘शौपिंग कैटलौग’ जैसा बना देता है.

ओटीटी और फिल्म्स में उस के प्रोजैक्ट्स सीमित रहे हैं, जिस से कुछ लोगों का मानना है कि उसे का टैलेंट पूरी तरह से एक्सप्लोर नहीं हो पा रहा. टीवी और फिल्मों में उस का रोल चयन अभी तक ज्यादातर रोमांटिक या स्वीटगर्ल टाइप रहा है. क्रिटिक्स मानते हैं कि अगर वह ग्रे शेड या ज्यादा इंटैंस रोल ट्राई करे तो उस की ऐक्टिंग स्किल्स ज्यादा सामने आएंगी. रील्स में ट्रैंडिंग सौंग्स और ट्रांजिशन का इस्तेमाल ज्यादा होने से क्रिएटिविटी थोड़ी रिपिटेटिव लग सकती है. फैंस जो कुछ नया या एक्सपैरिमैंटल देखना चाहते हैं, उस के लिए यह थोड़ा बोरिंग हो सकता है.

जन्नत जुबैर टैलेंटेड, पौपुलर और स्मार्ट ब्रैंड मैनेजर है, लेकिन अगर वह असली लाइफ कंटैंट और नए रोल चौइसेज पर ज्यादा ध्यान दे, ब्रैंड प्रमोशन को बैलेंस करे और क्रिएटिव रेंज बढ़ाए तो वह सिर्फ सोशल मीडिया स्टार नहीं, बल्कि एक दमदार ऐक्ट्रैस व लंबे समय तक टिकने वाली पब्लिक फिगर बन सकती है.

Jannat Zubair

Short Story : गुड्डन – कामवाली गुड्डन की हरकतों से परेशान थी निशा

Short Story : “गुड्डन आज तुम फिर देर से आई हो, आठ बज गए हैं. तुम्हारे लिए सवेरेसवेरे सजनासंवरना ज्यादा जरूरी है. अपने काम की फिक्र बिलकुल नहीं है. तुम ने तो हद कर दी है. इतनी सुबहसुबह कोई लिपस्टिक लगाता है क्या? मैं तो तुम्हारी हरकतों से आजिज आ चुकी हूं.’’

गुड्डन लगभग 18-19 साल की लड़की है. वह उन की सोसाइटी के पीछे वाली खोली में रहती है.

जब वह 11-12 साल की थी तब वह मुड़ीतुड़ी फ्रौक पहन कर और उलझेबिखरे बालों के साथ मुंह
अंधेरे काम करने आ खड़ी होती थी. पर जैसे ही उस ने जवानी की दहलीज पर पैर रखा, उसे दूसरी
लड़कियों की तरह खुद को सजनेसंवरने का शौक हो गया था.

अब वह साफसुथरे कपड़े पहनती, सलीके से तरहतरह के स्टाइलिश हेयरस्टाइल रखती, नाखूनों में नेलपौलिश तो होंठ लिपस्टिक से रंगे होते.

बालों में रंगबिरंगी सस्ती वाली बैकक्लिप लगा कर आती.
अब वह पहले वाली सीधीसादी टाइप की नहीं वरन तेजतर्रार छम्मकछल्लो बन गई थी.

खोली के कई लड़कों के साथ उस के चक्कर चलने की बातें, उस खोली में रहने वाली दूसरी कामवालियां चटपटी खबरों की तरह एकदूसरे से कहतीसुनती रहती थीं.

निशा की बड़बड़ करने की आदत से वह अच्छी तरह परिचित थी. सुबहसुबह डांट सुन कर उस ने
मुंह फुला लिया था. लेकिन उन के घर से मिलने वाले बढ़िया कौस्मेटिक की लालच में वह चुपचाप उन की
बकबक को नजरअंदाज कर चुपचाप सुन लिया करती थी. दूसरे अंकलजी भी तो जब तब ₹100- 200 की
नोट चुपके से उसे पकड़ा कर कहते कि गुड्डन काम मत छोड़ना, नहीं तो तेरी आंटी परेशान हो जाएंगी.

वह अपनी नाराजगी दिखाने के लिए जोरजोर से बरतन पटक रही थी. निशा समझ गई थीं कि आज गुड्डन उन की बात का बुरा मान गई है. वह उस के पास आईं और प्यार से उस के कंधे पर हाथ रख कर बोलीं,”क्यों रोजरोज देर से आती हो? अंकलजी को औफिस जाने में देर होने लगती है न…”

“आओ, नाश्ता कर लो.”

“आंटीजी, मुझे आज पहले ही देर हो गई है. अभी यही सारी बातें 502 वाली दीदी से सुननी पड़ेगी.‘’

निशा उस की मनुहार करतीं, उस से पहले ही गुड्डन जोर से गेट बंद कर के जा चुकी थी.

उन्हें गुड्डन का यह व्यवहार जरा भी अच्छा नहीं लगा,“जरा सी छोकरी और दिमाग तो देखो… यहांवहां लड़कों के संग मुंह मारती रहती है जैसे मैं कुछ जानती ही नहीं.’’

“निशा बस भी करो. तुम्हें अपने काम से मतलब है कि उस की इन बातों से…’’

पति की नाराजगी से बचने के लिए वे चुपचाप अपना काम करने लगी थीं पर उन के चेहरे पर नाराजगी के
भाव साफ थे.

निशा 46 वर्षीय स्मार्ट शिक्षित घरेलू महिला थीं. उन के पति रवि बैंक में मैनेजर थे. उन के पास घरेलू
कामों के लिये 3 कामवालियां थीं. उन्हीं में एक गुड्डन भी थी.

पत्रिका पढ़ने के बाद उन का सब से पसंदीदा काम था अपनी कामवाली से दूसरे घरों की महिलाओं की रिपोर्ट लेना. उस के बाद फिर थोड़ा नमकमसाला लगा कर फोन घुमा कर उन्हीं बातों की चटपटी गौसिप
करना.

गुड्डन उन की सब से चहेती और मुंहलगी कामवाली थी. वह सुबह बरतन धो कर चली जाती फिर दोपहर तक सब का काम निबटा कर आती तो बैठ कर आराम से सब के घरों में क्या चल रहा है, बताती और कभी
खाना खाती तो कभी चाय बना कर खुद पीती और उन्हें भी पिलाया करती, फिर अपने घर चली जाया करती.

निशा का यह मनपसंद टाइमपास था. दूसरों के घरों के अंदर की खबरें सुनने में उन्हें बहुत मजा आता था. गुड्डन भी तेज थी, सुनीसुनाई बातों में कुछ अपनी तरफ से जोड़ कर इस कदर चटपटी खबर में तबदील कर देती मानो सच उस ने अपनी आंखों से देखा हो. लेकिन इधर कुछ दिनों से उस का रवैआ बदल गया था.

मोबाइल फोन की आवाज से उन का ध्यान टूटा. उधर महिमा थी,”हैलो आंटी, आज गुड्डन आप के यहां
आई है क्या? बहुत नालायक है. कभी फोन बंद आता है तो कभी बिजी आता है. मैं तो इस की हरकतों से आजिज आ गई हूं. वाचमैन से मैं ने कह दिया है कि देख कर के मेरे लिए कोई ढंग की अच्छी सी कामवाली भेजो. गुड्डन आई कि नहीं?”

“तुम ने मुझे बोलने का मौका ही कहां दिया,” निशा हंस कर बोली थीं.

“आंटी आप ने इस के करम सुने. कई लड़कों के साथ इस का चक्कर चल रहा है…’’

यह उन का मन पसंद टौपिक था, वे भला कैसे चुप रहतीं,”अरे वह जो सोसाइटी के बाहर राजेंद्र प्रैस का
ठेला लगाता है न दिनभर उसी के घर में घुसी रहती है यह तो… मेरे घर से काम कर के गई और यहां तो तुम्हारे
घर पर ही जाने को बोल कर गई थी. आज तो उस ने चाय भी नहीं पी और ऐसे बरतन पटकपटक कर अपना
गुस्सा दिखा रही थी कि कुछ पूछो मत…”

“आज सुबह आप सैर पर नहीं आई थीं. तबियत तो ठीक है न?”

“हां, आज उठने में देर हो गई…”

“ओके बाय आंटी, दरवाजे पर देखती हूं शायद गुड्डन आ गई है.‘’

गुड्डन का काम करने का अंदाज सोसाइटी की महिलाओं का पसंद था. एक तो वह चोरी नहीं करती थी, दूसरा घर में झाङूपोंछा अच्छी तरह करती. वह कई सालों से इन उच्च और मध्यवर्ग परिवारों की महिलाओं के घरों में काम करती आ रही थी. इसलिए वह इन लोगों के स्वभाव और कार्यकलापों से खूब अच्छी तरह परिचित हो चुकी थी. वह इन लोगों की आपसी बातों पर अपना कान लगाए रहती थी और सब सुनने के बाद मौका मिलते ही इन लोगों को अच्छी तरह से सुना भी दिया करती थी.

इन दिनों राजेंद्र के साथ उस की दोस्ती के चर्चे सब की जबान पर चढ़े हुए थे. वह जिस के घर में भी काम करने जाती, वहां व्यंगात्मक लहजे में कुछ न कुछ सुन ही लेती,”तुम्हें यहांवहां घूमने से फुरसत मिल गई तो काम कर लो अब…”

राजेंद्र जिस की उम्र लगभग 40 साल थी, उस की बीबी उस को छोड़ कर किसी दूसरे के साथ चली गई थी.
वह और उस का बूढा बाप दोनों ही खोली में अकेले ही रहते थे. कुछ दिनों पहले उस ने अपनी खेती की जमीन बेची थी. उस के एवज में उसे लाखों रुपए मिले थे. वह गेट के बाहर ठेले पर प्रैस किया करता था. उस से भी उसे अच्छी आमदनी हो जाती थी. वह राजेंद्र के पिता को कभी चाय दे जाती तो कभी खाना खिला देती.
इस तरह से कालीचरण पर उस ने अपना फंदा फेंक दिया था. अब कालीचरण उसे बिटियाबिटिया कह कर उस पर लाड़ दिखाता और उस को अपने साथ बाजार ले जाता और कभी चाट खिलाता तो कभी मिठाई.

तेज दिमाग गुड्डन ने राजेंद्र को अपने प्यार के जाल में फंसा कर उस से दोस्ती कर ली. वह उस के घर में उस के लिए रोटी बना देती फिर दोनों मिल कर साथ में खाना खाते. दोनों साथ में कभी घूमने जाते तो कभी मूवी देखने, तो कभी मौल घूमते. राजेंद्र छेड़ता तो वह खिलखिलाती. उन दोनों की दोस्ती पर यदि कोई कुछ उलटासीधा बोलता तो वह पलट कर उस से लड़ने पर उतारू हो जाती,”तुम्हें क्या परेशानी है? राजेंद्र हमारा दोस्त है, खसम है. हम तो खुल्लमखुल्ला कह रहे हैं. जो करना है कर लो. जो
समझना है समझ लो मेरी बला से…”

उस के दोनों मतलब सिद्ध हो रहे थे. मालकिन की तरह उस के घर में मनचाहा खाना बनाती, खुद भी खाती
और राजेंद्र को भी खिलाती. दोनों की जिंदगी में रंग भर गए थे. राजेंद्र भी रोज उस के लिए मिठाई वगैरह
कुछ न कुछ ले कर आता. वह उसे अपने साथ बाजार भी ले कर जाता. कभी सलवारसूट तो कभी लिपिस्टिक, तो कभी चूड़ियां या इसी तरह अन्य सजनेसंवरने का सामान दिलवाता रहता.

इसलिए स्वाभाविक था कि वह उसे खुश रखता है तो उस का भी तो फर्ज बनता था कि वह भी उसे खुश रखे. बस इस तरह दोनों के बीच
अनाम सा रिश्ता बन गया था.

उस की लालची अम्मां को खानेपीने को मिल रहा था. वह भी खुश थी.
उस के दोनों हाथों में लड्डू थे. जब जिस से मौका लगता उस से पैसा ऐंठती. बापबेटा दोनों उस की मुट्ठी में
थे…

इसी रिश्ते की खबर सोसाइटी की तथाकथित उच्चवर्गीय महिलाओं को मिल गई थी, क्योंकि खोली की दूसरी कामवालियां आपस में बैठ कर ऐसी बातें चटखारे लेले कर के अपने मन की भड़ास निकाला करती थीं और इसीलिए सोसाइटी की महिलाओं के पास भी गुड्डन के कारनामों की खबर नमकमिर्च के साथ पहुंचती रहती
थी.

घरेलू महिलाओं की चर्चा जानेअनजाने इन घरेलू कामवालियों पर आ कर टिक जाती थीं क्योंकि उन्हें इन के साथ रोज ही दोचार होना पड़ता था.

गुड्डन सोसाइटी में कई घरों में झाड़ूपोंछा करती थी और वर्मा अंकल के यहां तो खाना भी बनाती थी. चूंकि वह बिलकुल अकेले रहते हैं इसलिए उन के घर की तो सर्वेसर्वा वही है.

दोपहर में खाली होते ही महिमा निशा के घर आ गई थी,”क्या हो रहा है आंटी?”

“कुछ खास नहीं. आओ बैठो…”

ऐसा लग रहा था कि मानो कोई राज बताने जा रही है,”कुछ सुना है
आप ने? इस गुड्डन के तो बड़े चर्चे हैं.चारों तरफ इस की बदनामी हो रही है. अपने बगल में ही दरवाजे के
अंदर वर्मा अंकल के साथ जाने क्या गुल खिला रही है. रीना बता रही थी कि कोई रंजीत औटो चलाता है,
उस के साथ भी यह प्यार का नाटक कर के पैसा ऐंठ रही थी. अब तो वह राजेंद्र के साथ खुलेआम मटरगश्ती
करती फिर रही है.”

“अच्छा… आज उसे आने दो, ऐसी झाड़ लगाऊंगी कि वह भी याद रखेगी.”

फिर उन्हें उस का सुबह का बरतन
पटकना याद आ गया तो बोलीं,”छोड़ो महिमा, हमें उस के काम से मतलब है. छोटी सी थी तब से मेरे घर पर काम कर रही है. एक भी चम्मच इधर से उधर नहीं हुई. घर को चमका कर जाया करती है.

“हम लोगों को क्या करना है. जो जैसा करेगा वह भरेगा… उस की अम्मां ने तो इसी तरह से अपनी जिंदगी ही बिता दी.‘’

महिमा ने अपनी दाल गलती हुई न देख कर बोली,”आंटी, अब चलूंगी, आरव स्कूल से आता होगा.”

निशि के पेट में खलबली मची थी,’गुड्डन को आने दो आज उस की क्लास ले कर रहूंगी… 40- 45 साल के राजेंद्र जैसे मालदार पर अपना
हाथ मारा है. कहीं मेरे सीधेसादे रवि पर भी अपना जादू न चला दे. ऐसी छोरियां पैसे के लिए कुछ भी कर सकती हैं…’

अगली दोपहर जब वह आई तो निशा तापाक से बोल पङीं,”आज बड़ा सजधज कर आई है… यह सूट बड़ा सुंदर है. तुझे किस ने दिया है?
यह तो बहुत मंहगा दिख रहा है.”

“इतना मंहगा सूट भला कौन देगा? सोसाइटी में नाम के बड़े आदमी रहते हैं लेकिन दिल से छोटे हैं सब.
कोई कुछ दे नहीं सकता. मैं ने खुद खरीदा है.”

“साफसाफ क्यों नहीं कहतीं कि तेरे आशिक राजेंद्र ने दी है तुम्हें.”

“नहीं आंटीजी, रंजीत दिल्ली से मेरे लिए ले कर आया है. मुझ से कहता
रहता है कि तुझे रानी बना कर रखूंगा…’’ वह शर्मा उठी थी.

वे तो बंदूक में जैसे गोली भरी बैठी हुई थीं,”काहे री गुड्डन, अभी तक तो राजेंद्र के साथ तेरा लफड़ा चल रहा
था अब यह रंजीत कहां से आ मरा? उस दिन तेरी अम्मां आई थी. वह कह रही थी कि तू ज्यादा समय राजेंद्र की खोली में गुजारती है. वह तुझे इतना ही पसंद है तो उसी के साथ ब्याह रचा ले. तेरी अम्मां यहांवहां लड़का ढूंढ़ती फिर रही है.”

वह चुपचाप अपना काम करती रही तो निशा का मन नहीं माना. वह फिर से घुड़क कर बोलीं,”क्यों छोरी, तेरी इतनी बदनामी हो रही है तुझे बुरा नहीं लगता?”

“आंटीजी, राजेंद्र जैसे बूढ़े से ब्याह करे मेरी जूती. मैं कोई उपमा आंटी जैसी थोड़ी ही हूं, जो पैसा देख कर
ऐसा भारीभरकम काला दामाद ले आई हैं… ऐसी फूल सी नाजुक पूजा दीदी, बेचारी 4 फीट की दुबलीपतली लड़की के बगल में 6 फीट का लंबाचौड़ा आदमी…”

“चुप कर…” निशा चीख कर बोलीं,”तेरा मुंह बहुत चलता है… आकाशजी की बहुत बड़ी फैक्टरी है. वे रईस लोग हैं…’’

गुड्डन के मुंह से कड़वा सच सुन कर उन की बोलती बंद हो गई थी इसलिए उन्होंने इस समय वहां से चुपचाप हट जाना ही ठीक समझा था.

जनवरी की पहली तारीख थी. वह खूब चहकती हुई आई थी,”आंटी, हैप्पी न्यू ईयर…”

“तुम्हें भी नया साल मुबारक हो. कल कहां गायब थीं? किसी के साथ डेट पर गई थीं क्या…?’’

“आंटी, आप भी मजाक करती हैं… वह बी ब्लौक की रानी आंटी जो आप की किट्टी की भी मैंबर हैं…’’

“क्या हुआ उन को?’’

“उन का लड़का शिशिर है न… उन की शादी के लिए लड़की वाले आए थे, इसलिए आंटी ने मुझे काम करने के
लिए दिनभर के लिए बुलाया था…’’

“बेचारी रानी अपने बेटे की शादी के लिए बहुत दिनों से परेशान थीं… चलो अच्छा हुआ… शिशिर की शादी
तय हो गई.’’

“मेरी पूरी बात तो सुनिए… लड़की वाले उन की मांग सुनते रहे. सब का मुंह उतरा हुआ था…धीरेधीरे वे
लोग आपस में रायमशविरा करते रहे थे.

“आंटी, मैं भी बहुत घाघ हूं. चाय देने गई फिर बरतन धीरेधीरे उठाती रही और उन लोगों की आपसी बात ध्यान से सुन रही थी. वे कह रहे थे कि गाड़ी, 20 तोला सोना, शादी का दोनों तरफ का खर्चा लड़की वाले करें. शादी फाइवस्टार होटल में होगी…’’

“रानी आंटी तो पूरी मंगता हैं… देखो जरा, अपने लड़के को बिटिया वाले को जैसे बेच रही हैं.

“हम गरीब लोगन को सब भलाबुरा कहते हैं, लेकिन बड़े आदमी भी दिल के बड़े नहीं होते. आप लोग में
भी कम नहीं. एक लड़की की शादी करने में मायबाप चौराहे पर खड़े हो कर बिक जाएं, तब बिटिया का
ब्याह कर पाएं…

“रानी आंटी कैसी धरमकरम की बातें किया करती हैं. खुद को बड़ी धरमात्मा बनती हैं. अपने यहां भागवतकथा करवाने में लाखों रुपया खर्च कर डालीं थीं. का अब बिटिया वाले से वही खर्चा की वसूली करेंगी?

“सरकार तो दहेज को अपराध कहती है…आप लोगन में दहेज मांगने की कोई मनाही नाहीं है का?‘’

“गुड्डन मुंह बंद कर के काम किया कर, तुम इतना बोलती हो कि सिर में दर्द हो जाता है. शिशिर बड़ा
अफसर है, उस की तनख्वाह बहुत ज्यादा है…उन की बिटिया यहां पर राज रजती.”

लगभग 1 साल पहले उन के बेटे की शादी में भी गाड़ी और दहेज में बहुत सारा सामान आया था. इसलिए गुड्डन की बातें सुन कर उन्हें लगा कि वह इशारोंइशारों में उन पर भी बोली मार रही है.

निशा ने उस की ओर आंखें तरेर कर देखा और फोन पर अपनी आदत के अनुसार रानी के घर की चटपटी
खबर को इधर से उधर कर के अपने मनपसंद काम में जुट गईं.

लगभग 6 महीने पहले उन की सासूमां का इंतकाल उन के देवर के घर में हो गया था. निशा चालाक थी,
उन्होंने सासूमां के जेवर दबा कर रख लिए थे और अब वे उसे किसी के साथ बांटना नहीं चाह रही थीं…

पूरा का पूरा वे अकेले ही हजम करना चाह रही थीं. उन के देवर सतीश और ननद संध्या उन पर बंटवारा
करने का दबाव बनाए हुए थे. लेकिन उन्होंने साफसाफ कह दिया था कि उन के पास कोई जेवर नहीं है, क्योंकि उन की नियत खराब थी.
पर पति रवि बंटवारा करने के लिए उन पर दबाव डाल रहे थे. उसी सिलसिले में वे लोग कई बार आ चुके थे और हर बार गरमगरम बहस के बाद कोई न कोई बहाना बना कर वे उन्हें अपने घर से जाने पर मजबूर कर देती थीं.

“भाभी, आप मेरे हिस्से का जेवर मुझे दे दीजिए, मुझे ईशा की शादी करनी है. सोना इस समय इतना
मंहगा है… आप को तो मेरी हैसियत के बारे में अच्छी तरह से पता है…’’

संध्या भी हिम्मत कर के बोली,”भैया, आप ने अम्मां का सारा जेवर दाब लिया… यह गलत बात है कि
नहीं? घरमकान में तो हिस्सा नहीं मांग रहे हैं. जेवर का तो बंटवारा कर ही दो.”

गुड्डन काम करती सारी बातें ध्यानपूर्वक सुन रही थी तभी जैसे ही निशा को याद आया कि गुड्डन
सारी बातें सुन रही होगी तो उन्होंने तेजी से आ कर उस से बरतन हाथ से छुड़वा कर कहा कि इस समय जाओ, शाम को आना.

पर होशियार गुड्डन को तो मसाला मिल गया था कि निशा आंटी कितनी शातिर हैं. उन्होंने सब का हिस्सा
दबा कर रख लिया है.

सतीश और संध्या अकसर आते, आपस में बातचीत, कहासुनी और बहसबाजी होती पर अंतिम निर्णय कुछ भी नहीं हो पाता क्योंकि निशा की नियत खराब थी, वह किसी को कुछ देना ही नहीं चाहती थीं. वे गुड्डन के सामने रोरो कर नाटक करतीं कि ये लोग उन्हें परेशान कर रहे हैं…

एक दिन गुड्डन उन से बोली,”आंटी, अम्मां कथा सुन कर आईं तो बता रही थीं कि हमारे धरम में बताया
गया है कि भाईबहन का हिस्सा हजम करना बहुत बड़ा पाप होता है.”

निशा को तत्काल कोई जवाब नहीं सूझा था. वे खिसिया कर बोलीं,”चल बड़ी धरमकरम वाली बनी
है.”

एक दिन गुड्डन सुबहसुबह बड़ी घबराई हुई सी आई थी,”आंटीजी, आंटीजी…”

“क्या हुआ, क्यों चिल्ला रही हो?”

“आप को किसी ने खबर नहीं दी? गेट पर पुलिस की गाड़ी खड़ी है. कई सारे पुलिस वाले श्याम अंकल को
अपने साथ ले कर जा रहे थे. उन्हें कुछ पूछताछ करनी है. गार्ड लोग आपस में बात कर रहे थे कि श्याम
अंकल ने ₹10 करोड़ का घोटाला किया है. उसी की जांच चल रही थी. घर में छापा पड़ा है. बहुत सारे
अफसर उन के घर में घुस कर छानबीन कर रहे हैं.

“आंटीजी ₹10 करोड़ में बहुत सारा रुपया होता होगा न?’’

निशा नीर से हमेशा से चिढ़ती थी, उस की तरफ देख कर बोली,”हां…हां… बहुत सारा होता है…”

वे बड़बड़ाने के अंदाज में बोलीं,”बड़ी अकड़ कर रहती थीं मिसेज श्याम. आज स्विट्जरलैंड तो कल
पैरिस… यह हार तो श्यामजी ने मेरे बर्थडे पर गिफ्ट किया था…अब आज क्या इज्जत रह गई…?”

“आंटीजी आप लोग हम लोगन को बेकार में भलाबुरा कह के बदनाम करती रहती हैं… कम से कम
हम लोग भाईबहन का हिस्सा तो नहीं मार कर रख लेते… हम लोग बैंक की रकम तो नाहीं मार लेते. हम
लोग खोली में चाहे कितना लड़झगड़ लें लेकिन यदि कोई पर मुसीबत आ जाए तो तुरंत सब उस के दरवाजे
पर मदद करने के लिए इकट्ठा होय जात हैं…

“आज श्याम अंकल का मुंह उतरा हुआ था. उन के आसपास दूरदूर तक कोई नहीं खड़ा हुआ था… नीरा
दीदी फूटफूट कर रो रही थीं… उन का फोन भी उन से ले लिया… सब लोग बताय रहे थे. हम तो सुबह से
गार्ड के पास ही खड़े होय कर सब तमाशा देख रहे थे… बेचारी नीरा दीदी…”

गुड्डन को आंसू बहाते देख निशा उस की भावुकता देखसमझ नहीं पा रही थीं कि क्या करें और इस से क्या
कहें… वे उस के लिए गिलास में पानी ले कर आईं,“लो पानी पी लो और चुप हो जाओ. उन के वकील उन्हें छुड़ा कर बाहर लाने के लिए कोशिश कर रहे होंगे और वह जल्दी ही छूट कर आ जाएंगे.”

लेकिन मन ही मन में निशा सोच रही थीं कि गुड्डन भला इस केस की पेचीदगी को क्या समझेगी?
पर आज गुड्डन की भावुकता को देख कर पता नहीं क्यों नीरा की बेबसी
के बारे में सोच कर वह भी उदास हो उठी थीं.

एक स्त्री की बेचारगी के बारे में सोच कर उन की आंखें भी भीग उठीं.

गुड्डन के हाथ काम कर रहे थे लेकिन वह निरंतर बड़बड़ा रही थी,”सब देखने के बड़े आदमी बनते हैं… कोई
किसी के दुख में नाहीं खड़ा होता… बड़े आदमी खालीपीली दिखावा करना जानत हैं…”

गुड्डन लगातार रोए जा रही थी और उस के निश्छल आंसुओं के कारण उन का भी दिल भर आया था और वे भी उदास हो उठी थीं.

Stories : दूसरा कोना – ऋचा के प्रति कैसी थी लोगों की राय

Stories :  ‘‘अजीब तरह का व्यवहार कर रही थी अजय की पत्नी. पूरे समय बस अपनी खूबसूरती, हंसीमजाक, ब्यूटीपार्लर उफ, कोई कह सकता है भला कि उस के पति की अभीअभी कीमोथेरैपी हुई है. उस के हावभाव, अदाओं से कहीं से भी नहीं लग रहा था कि उस के पति को इतनी गंभीर बीमारी है. मुझे तो दया आ रही है बेचारे अजय पर. ऐसे समय में उस का खयाल रखने के बजाय, उस की पत्नी ऋचा अपनी साजसज्जा में लगी रहती है,’’ घर का दरवाजा खोलने के साथ ही प्रिया ने अपने पति राकेश से कहा.

‘‘हां, थोड़ा अजीब तो मुझे भी लगा ऋचा का तरीका, पर चलो छोड़ो न, तुम क्यों अपना दिमाग खराब कर रही हो. हमें कौन सा रोजरोज उन के घर जाना है. औफिस का कलीग है, कैंसर की बीमारी का सुना तो एक बार तो देखने जाना बनता था,’’ राकेश ने प्रिया को बांहों में लेते हुए कहा.

‘‘अरे, छोड़ो क्या, मेरे तो दिमाग से ही नहीं निकल रही यह बात. कोई इतना लापरवाह कैसे हो सकता है. ऋचा पढ़ीलिखी, अच्छे परिवार की लड़की है, फिर भी ऐसी हरकतें. मुझे तो शर्म आ रही है कि  ऐसी भी होती हैं औरतें.

‘‘ऋचा औफिस की पार्टीज में भी कितना बनसंवर कर आती थी. कितना मरता था अजय उस की खूबसूरती पर. एक से एक लेटैस्ट ड्रैसेज पहनती थी वह तब भी. पर अब हालत कैसी है, कम से कम यह तो सोचना चाहिए.’’ राकेश ने प्रिया की बातों में अब हां में सिर हिलाया और कहा कि बहुत नींद आ रही है, सुबह औफिस भी जाना है, चलो सो जाते हैं.

बिस्तर पर पहुंच कर भी प्रिया के मन में ऋचा की बातें, उस की हंसी फांस की तरह चुभ रही थी. आज की मुलाकात ने रिचा को प्रिया की आंखों के सामने लापरवाह औरत के रूप में खड़ा कर दिया था. यही सब सोचतेसोचते प्रिया की आंख कब लग गई, उसे पता ही नहीं चला.

अगली सुबह औफिस जाते हुए राकेश को गुडबाय किस देने के बाद अंदर आई तो देखा राकेश अपना टिफिन भूल गए. प्रिया ने राकेश को कौल कर के रुकने को कहा. दौड़ते हुए वह राकेश का टिफिन नीचे पार्किंग में पकड़ा कर आई. ‘‘तुम एक चीज भी याद नहीं रख सकते. मैं न होती तो तुम्हारा क्या होता?’’ प्रिया ने मुसकराते हुए कहा.

राकेश ने भी उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘तुम न होती तो कोई और होती.’’

इस पर प्रिया ने उसे घूरने वाली नजरों से देखा. राकेश ने जल्दी से ‘आई लव यू’ कहा और बाय कहते हुए वहां से निकल गया.

सब काम निबटा कर प्रिया ने चाय बनाई और टीवी औन कर लिया. चैनल पलटतेपलटते ‘सतर्क रहो इंडिया’ पर आ कर उस का रिमोट रुका. प्रिया ने बिना पलकें झपकाए पूरा एपिसोड देख डाला. उसे फिर ऋचा का खयाल आ गया. अब वह तरहतरह की बातें सोचने लगी कि ऋचा का कहीं किसी से चक्कर तो नहीं चल रहा, कहीं वह अजय से छुटकारा तो नहीं पाना चाहती? दिनभर प्रिया के दिमागी घोड़े ऋचा के घर के चक्कर लगाते रहे.

शाम को राकेश के आने पर प्रिया ने फिर से ऋचा की बात छेड़ी तो राकेश ने थोड़ा झुंझला कर कहा, ‘‘अरे यार, क्या ऋचाऋचा लगा रखा है? उन की जिंदगी है, तुम क्यों इतना सोच रही हो?’’

प्रिया चुप हो गई. वह राकेश को नाराज नहीं करना चाहती थी. बहुत प्यार जो करती थी वह उस से.

मगर प्रिया के दिमाग से ऋचा का कीड़ा उतरा नहीं था. उस ने अपनी किट्टी की सहेलियों को भी उस के व्यवहार के बारे में बताया.

सहेलियों में से एक बोली, ‘‘जिस के पति के जीवन की डोर कब कट जाए, पता नहीं, वह पति के बारे में न सोच कर सिर्फ अपने बारे में बातें कर रही है, कैसी औरत है वह.’’

‘‘जो बीमार पति से भी इधरउधर घूमने की फरमाइश करती है, कैसी अजीब है वह,’’ दूसरी सहेली ने कहा.

‘‘ऐसी औरतें ही तो औरतों के नाम पर धब्बा होती हैं,’’ तीसरी बोली.

सब सहेलियों ने मिल कर ऋचा के उस व्यवहार का पूरा पोस्टमौर्टम कर दिया. धीरेधीरे प्रिया के दिमाग से ऋचा का कीड़ा निकल गया. हां, कभीकभार वह राकेश से अजय के बारे में जरूर पूछ लेती. राकेश का एक ही जवाब होता, ‘अजय अब शायद ही औफिस आ सके.’ प्रिया को अफसोस होता और मन ही मन सोचती कि बेचारे अजय का तो समयही खराब निकला.

4 महीने बाद एक दिन राकेश ने औफिस से फोन पर प्रिया को बताया कि अजय की मृत्यु हो गई. प्रिया को बहुत दुख हुआ. राकेश ने प्रिया से कहा कि तुम शाम को तैयार रहना, अजय के घर जाना है. औफिस के सभी लोग जा रहे हैं.

प्रिया और राकेश अजय के घर पहुंचे. घर में कुहराम मचा हुआ था. अभी उम्र ही क्या थी अजय की, अभी 42 साल का ही तो था. ऐसे माहौल में प्रिया का मन अंदर घुसते हुए घबरा रहा था. अंदर घुसते ही सब से पहले ऋचा पर उस की नजर पड़ी. ऋचा का रंग बिलकुल सफेद पड़ा हुआ था. जो ऋचा 4 महीने पहले उसे नवयुवती लग रही थी, आज वही मानो बुढ़ापे के मध्यम दौर में पहुंच गई हो. जिस तरह ऋचा रो रही थी, प्रिया का मन और आंखें दोनों भीग गए. वह ऋचा को संभालने उस के करीब पहुंच गई.

बाहर अजय की अंतिम यात्रा की तैयारियां चल रही थीं. राकेश भी बाहर औफिस के लोगों के साथ खड़ा था. सभी अजय की जिंदादिली और हिम्मत की तारीफ कर रहे थे.

राकेश के पास ही डा. प्रकाश खड़े थे. डा. प्रकाश राकेश के बौस के खास मित्र थे. औफिस की पार्टीज में अकसर उन से मिलना हो जाया करता था. डा. प्रकाश ने कहा, ‘‘अजय जितना हिम्मत वाला था, उस से भी बढ़ कर उस की पत्नी ऋचा है.’’

राकेश ने जब यह बात सुनी तो उस के मन में उत्सुकता जाग गई. उस ने डा. प्रकाश से मानो आंखों से ही पूछ लिया कि आप क्या कह रहे हैं.

‘‘अजय का पूरा इलाज मेरी देखरेख में ही हुआ है,’’ डा. प्रकाश ने कहा, ‘‘राकेश, अजय की रिपोर्ट्स के मुताबिक उस के पास मुश्किल से एक से डेढ़ महीने का समय था. यह ऋचा ही थी जिस ने उसे 4 महीने जिंदा रखा.’’

उन्होंने आगे कहा, ‘‘जब इन लोगों को कैंसर की बीमारी का पता चला तो ऋचा डिप्रैशन में चली गई थी. अजय अपनी बीमारी से ज्यादा ऋचा को देख कर दुखी रहने लगा था. अजय की चिंता देख कर मैं ने पूछा तब उस ने सारी बात मुझे बताई. उस दिन अजय और मेरे बीच बहुत बातें हुईं. मैं ने उसे ऋचा से बात करने को कहा.

‘‘अगली बार जब वे दोनों मुझ से मिलने आए तो हालात बेहतर थे. तब ऋचा ने मुझे बताया कि उस के पति उसे मरते दम तक खूबसूरत रूप में ही देखना चाहते हैं. उस ने कहा था, ‘अजय चाहते हैं कि मैं हर वह काम करूं जो उन के ठीक रहने पर करती आई हूं. उन के साथ नौर्मल बातें करूं. हंसीमजाक, छेड़ना सब करूं. बस, उन की बीमारी का जिक्र न करूं. इन थोड़े बचे दिनों में वे एक पूरी जिंदगी जीना चाहते हैं मेरे साथ.

‘‘अजय ने मुझ से कहा, ‘तुम्हें दुखी देख कर मैं पहले ही मर जाऊंगा. मुझे मरने से पहले जीना है.’ मैं ने भी दिल पर पत्थर रख कर उन की बात मान ली. डाक्टर साहब, अब अजय काफी अच्छा महसूस कर रहे हैं.’ उस दिन यह कहतेकहते ऋचा की आंखों में आंसू आ गए थे, मगर पी लिए उस ने अपने आंसू भी अजय की खातिर.

‘‘ऋचा बहुत हिम्मती है. आज देखो, दिल पर से पत्थर हटा तो कैसा सैलाब उमड़ आया है उस की आंखों में.’’

डा. प्रकाश की बातें सुन कर राकेश का मन ग्लानि से भर गया. जिस ऋचा के लिए उस ने और प्रिया ने मन में गलत धारणा पाल ली थी, आज उसी ऋचा के लिए उस के मन में बहुत आदरभाव उमड़ आया था.

राकेश को काफी शर्म भी महसूस हुई यह सोच कर कि कैसे हम लोग बिना विचार किए एक कोने में खड़े हो कर किसी के बारे में अच्छीबुरी राय बना लेते हैं. कभी दूसरे कोने में जा कर देखने या विचारने की कोशिश ही नहीं करते.

Online Hindi Stories : मैं जरा रो लूं

Online Hindi Stories : सुबह जैसे ही वह सो कर उठी, उसे लगा कि आज वह जरूर रोएगी. रोने के बहुत से कारण हो सकते हैं या निकाले जा सकते हैं. ब्रश मुंह में डाल कर वह घर से बाहर निकली तो देखा पति कुछ सूखी पत्तियां तोड़ कर क्यारियों में डाल रहे थे.

‘‘मुझे लगता है आज मेरा ब्लडप्रैशर बढ़ने लगा है.’’

पत्तियां तोड़ कर क्यारी में डालते हुए पति ने एक उड़ती सी निगाह अपनी पत्नी पर डाली. उसे लगा कि उस निगाह में कोई खास प्यार, दिलचस्पी या घबराहट नहीं है.

‘‘ठीक है दफ्तर जा कर कार भेज दूंगा, अपने डाक्टर के पास चली जाना.’’

‘‘नहीं, कार भेजने की जरूरत नहीं है. अभी ब्लडप्रैशर कोई खास नहीं बढ़ा है. अभी तक मेरे कानों से कोई सूंसूं की आवाज नहीं आ रही है, जैसे अकसर ब्लडप्रैशर बढ़ने से पहले आती है.’’

‘‘पर डाक्टर ने तुम से कहा है कि तबीयत जरा भी खराब हो तो तुम उसे दिखा दिया करो या फोन कर के उसे

घर पर बुलवा लो, चाहे आधी रात ही क्यों न हो. पिछली बार सिर्फ अपनी लापरवाहियों के कारण ही तुम मरतेमरते बची हो. लापरवाह लोगों के प्रति मुझे कोई हमदर्दी नहीं है.’’

‘‘अच्छा होता मैं मर जाती. आप बाकी जिंदगी मेरे बिना आराम से तो काट लेते.’’ यह कहने के साथ उसे रोना आना चाहिए था पर नहीं आया.

‘‘डाक्टर के पास अकेली जाऊं?’’

‘‘तुम कहो तो मैं दफ्तर से आ जाऊंगा. पर तुम अपने डाक्टर के पास तो अकेली भी जा सकती हो. कितनी बार जा भी चुकी हो. आज क्या खास बात है?’’

‘‘कोई खास बात नहीं है,’’ उस ने चिढ़ कर कहा.

‘‘सो कर उठने के बाद दिमाग शांत होना चाहिए पर, मधु, तुम्हें सवेरेसवेरे क्या हो जाता है.’’

‘‘आप का दिमाग ज्यादा शांत होना चाहिए क्योंकि  आप तो रोज सवेरे सैर पर जाते हो.’’

‘‘तुम्हें ये सब कैसे मालूम क्योंकि तुम तो तब तक सोई रहती हो?’’

‘‘अब आप को मेरे सोने पर भी एतराज होने लगा है. सवेरे 4 बजे आप को उठने को कौन कहता है?’’

‘‘यह मेरी आदत है. तुम्हें तो परेशान नहीं कर रहा. तुम अपना कमरा बंद किए 8 बजे तक सोती रहती हो. क्या मैं ने तुम्हें कभी जगाया? 7 बजे या साढ़े 7 बजे तक तुम्हारी नौकरानी सोती रहती है.’’

‘‘जगा भी कैसे सकते हैं? सो कर उठने के बाद से इस घर में बैल की तरह काम में जुटी रहती हूं.’’

खाना बनाने वाली नौकरानी 2 दिनों की छुट्टी ले कर गई थी पर आज भी नहीं आई. दूसरी नौकरानी आ कर बाकी काम निबटा गई.

नाश्ते के समय उस ने पति से पूछा, ‘‘अंडा कैसा लेंगे?’’

‘‘आमलेट.’’

‘‘अच्छी बात है,’’ उस ने चिढ़ कर कहा.’’

पति ने जल्दीजल्दी आमलेट और

2 परांठे खा लिए. डबलरोटी वे नहीं खा सकते, शायद गले में अटक जाती है.

उस ने पहला कौर उठाया ही था कि पति की आवाज आई, ‘‘जरा 10,000 रुपए दे दो, इंश्योरैंस की किस्त जमा करानी है.’’ चुपचाप कौर नीचे रख कर वह उठ कर खड़ी हो गई. अलमारी से 10,000 रुपए निकाल कर उन के  सामने रख दिए. अभी 2 कौर ही खा पाई थी कि फिर पति की आवाज आई, ‘‘जरा बैंक के कागजात वाली फाइल भी निकाल दो, कुछ जरूरी काम करने हैं.’’ परांठे में लिपटा आमलेट उस ने प्लेट में गुस्से में रखा और उठ कर खड़ी हो गई. फिर दोबारा अलमारी खोली और फाइल उन के हाथ में पकड़ा दी और नौकरानी को आवाज दे कर अपनी प्लेट ले जाने के लिए कहा.

‘‘तुम नहीं खाओगी?’’

‘‘खा चुकी हूं. अब भूख नहीं है. आप खाने पर बैठने से पहले भी तो सब हिसाब कर सकते थे. कोई जरूरी नहीं है कि नाश्ता करते समय मुझे दस दफा उठाया जाए.’’

‘‘आज तुम्हारी तबीयत वाकई ठीक नहीं है, तुम्हें डाक्टर के पास जरूर जाना चाहिए.’’

11 बजे तक खाना बनाने वाली नौकरानी का इंतजार करने के बाद वह खाना बनाने के लिए उठ गई. देर तक आग के पास खड़े होने पर उसे छींकें आनी शुरू हो गईं जो बहुत सी एलर्जी की गोलियां खाने पर बंद हो गईं.

उस ने अपने इकलौते बेटे को याद किया. इटली से साल में एक बार, एक महीने के लिए घर आता है. अब तो उसे वहां रहते सालों हो गए हैं. क्या जरूरत थी उसे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बाहर भेजने की? अब उसे वहां नौकरी करते भी कई साल हो गए हैं. एक महीना मां के पास रह कर वह हमेशा यही वादा कर जाता है, ‘अब की बार आऊंगा तो शादी जरूरी कर लूंगा, पक्का वादा रहा मां.’

झूठा कहीं का. हां, हफ्ते में एक बार फोन पर बात जरूर कर लेता है. उस की जिंदगी में बहुत खालीपन आ गया है. बेटे को याद कर के उसे हमेशा रोना आ जाता है पर आज नहीं आया.

लखनऊ से कितने दिन हो गए, कोई फोन नहीं आया. उस ने भी नहीं किया. पता नहीं अम्माजी की तबीयत कैसी है. वह अपने मांबाप को बहुत प्यार करती है. वह कितनी मजबूर है कि अपनी मां की सेवा नहीं कर पाती. बस, साल में एक बार जा कर देख आती है, ज्यादा दिन रह भी नहीं सकती है. क्या यही बच्चों का फर्ज है?

उस ने तो शायद अपनी जिंदगी में किसी के प्रति कोई फर्ज नहीं निभाया. अपनी निगाहों में वह खुद ही गिरती जा रही थी. सहसा उम्र की बहुत सी सीढि़यां उतर कर अतीत में खो गई और बचपन में जा पहुंची. मुंह बना कर वह घर की आखिरी सीढ़ी पर आ कर बैठ गई थी, बगल में अपनी 2 सब से अच्छी फ्राकें दबाए हुए. बराबर में ही अब्दुल्ला सब्जी वाले की दुकान थी.

‘कहो, बिटिया, आज क्या हुआ जो फिर पोटलियां बांध कर सीढ़ी पर आ बैठी हो?’

‘हम से बात मत करो, अब्दुल्ला, अब हम ऊपर कभी नहीं जाएंगे.’

अब्दुल्ला हंसने लगा, ‘अभी बाबूजी आएंगे और गोद में उठा कर ले जाएंगे. तुम्हें बहुत सिर चढ़ा रखा है, तभी जरा सी डांट पड़ने पर घर से भाग पड़ती हो.’

‘नहीं, अब हम ऊपर कभी नहीं जाएंगे.’

‘नहीं जाओगी तो तुम्हारे कुछ खाने का इंतजाम करें?’

‘नहीं, हम कुछ नहीं खाएंगे,’ और वह कैथ के ढेर की ओर ललचाई आंखों से देखने लगी.

‘कैथ नहीं मिलेगा, बिटिया, खा कर खांसोगी और फिर बाबूजी परेशान होंगे.’

‘हम ने तुम से मांगा? मत दो, हम स्कूल में रोज खाते हैं.’

‘कितनी दफा कहा है कि कैथ मत खाया करो, बाबूजी को मालूम पड़ गया तो बहुत डांट पड़ेगी.’

‘तुम इतनी खराब चीज क्यों बेचते हो?’ अब्दुल्ला चुपचाप पास खड़े ग्राहक के लिए आलू तौलने लगा. सामने से उस के पिताजी आ रहे थे. लाड़ली बेटी को सीढ़ी पर बैठा देखा और गोद में उठा लिया.

‘अम्माजी ने डांटा हमारी बेटी को?’

बहुत डांटा, और उस ने पिता की गरदन में अपनी नन्हीनन्ही बांहें डाल दी.

बचपन के अतीत से निकल कर उम्र की कई सीढि़यां वह तेजी से चढ़ गई. जवान हो गई थी. याद आया वह दिन जब अचानक ही मजबूत हाथों का एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर आ पड़ा था. वह चौंक कर उठ बैठी थी. उस के हाथ अपने गाल को सहलाने लगे थे. बापबेटी दोनों जलती हुई आंखों से एकदूसरे को घूर रहे थे.

पिता ने नजरें झुका लीं और थके से पास में पड़ी कुरसी पर बैठ गए. उन्होंने अपनी लाड़ली बेटी को जिंदगी में पहला और आखिरी थप्पड़ मारा था. सामने खड़े हो कर अंगारे उगलती आंखों से

उस ने पिता से सिर्फ इतना ही पूछा, ‘क्यों मारा आप ने मुझे?’

‘तुम शादी में आए मेहमानों से लड़ रही थी. मौसी ने तुम्हारी शिकायत की है,’ बहुत थके हुए स्वर में पिता ने जवाब दिया.

‘झूठी शिकायत की है, उन के बच्चों ने मेरा इसराज तोड़ दिया है. आप को मालूम है वह इसराज मुझे कितना प्यारा है. उस से मेरी भावनाएं जुड़ी हुई हैं.’

‘कुछ भी हो, वे लोग हमारे मेहमान हैं.’

‘लेकिन आप ने क्यों मारा?’ वह उन के सामने जमीन पर बैठ गई और पिता के घुटनों पर अपना सिर रख दिया. अपमान, वेदना और क्रोध से उस का सारा शरीर कांप रहा था. पिता उस के सिर पर हाथ फेर रहे थे. यादों से निकल कर वह अपने आज में लौट आई.

कमाल है इतनी बातें याद कर ली पर आंखों में एक कतरा आंसू भी न आया. दोपहर को पति घर आए और पूछा, ‘‘क्या खाना बना है?’’

‘‘दाल और रोटी.’’

‘‘दाल भी अरहर की होगी?’’

‘‘हां’’

वे एकदम से बौखला उठे, ‘‘मैं क्या सिर्फ अरहर की दाल और रोटी के लिए ही नौकरी करता हूं?’’

‘‘शायद,’’ उस ने बड़ी संजीदगी से कहा, ‘‘जो बनाऊंगी, खाना पड़ेगा. वरना होटल में अपना इंतजाम कर लीजिए. इतना तो कमाते ही हैं कि किसी भी बढि़या होटल में खाना खा सकते हैं. मुझे जो बनाना है वही बनाऊंगी, आप को मालूम है कि नौकरानी आज भी नहीं आई.’’

‘‘मैं पूछता हूं, तुम सारा दिन क्या करती हो?’’

‘‘सोती हूं,’’ उस ने चिढ़ कर कहा, ‘‘मैं कोईर् आप की बंधुआ मजदूर नहीं हूं.’’

पति हंसने लगे, ‘‘आजकल की खबरें सुन कर कम से कम तुम्हें एक नया शब्द तो मालूम पड़ा.’’

खाने की मेज पर सारी चीजें पति की पसंद की ही थीं – उड़द की दाल, गोश्त के कबाब, साथ में हरे धनिए की चटनी, दही की लस्सी और सलाद. दाल में देसी घी का छौंक लगा था.

शर्मिंदा से हो कर पति ने पूछा, ‘‘इतनी चीजें बना लीं, तुम इन में से एक चीज भी नहीं खाती हो. अब तुम किस के साथ खाओगी?’’

‘‘मेरा क्या है, रात की मटरआलू की सब्जी रखी है और वैसे भी अब समय ने मुझे सबकुछ खाना सिखला दिया है. वरना शादी से पहले तो कभी खाना खाया ही नहीं था, सिर्फ कंधारी अनार, चमन के अंगूर और संतरों का रस ही पिया था.’’

‘‘संतरे कहां के थे?’’

‘‘जंगल के,’’ उस ने जोर से कहा.

उन दिनों को याद कर के रोना आना चाहिए था पर नहीं आया. अब उसे यकीन हो गया था कि वह आज नहीं रोएगी. जब इतनी बातें सोचने और सुनने पर भी रोना नहीं आया तो अब क्या आएगा.

हाथ धो कर वह रसोई से बाहर निकल ही रही थी कि उस ने देखा, सामने से उस के पति चले आ रहे हैं. उन के हाथ में कमीज है और दूसरे हाथ में एक टूटा हुआ बटन. सहसा ही उस के दिल के भीतर बहुत तेजी से कोई बात घूमने लगी. आंखें भर आईं और वह रोने लगी.

Kahaniyan : अपाहिज – आखिर कौन था स्वाति की पूरी दुनिया?

Kahaniyan : एअरइंडिया का विमान मुंबई एअरपोर्ट पर था. यह मुंबई से दिल्ली की उड़ान थी. वर्किंग डे होने की वजह से अधिकांश सीटें फुल थीं. विमान की रवानगी के कुछ समय पूर्व ही स्वाति ने गौरव के साथ विमान में प्रवेश किया. विमान परिचारिका व्हीलचेयर धकेल रही थी, स्वाति उस का साथ दे रही थी. गौरव व्हीलचेयर पर बैठा था. हैंडसम, गोरेचिट्टे गौरव के चेहरे पर परेशानी के भाव थे. साफ लग रहा था कि वह तनाव में है.

स्वाति ने परिचारिका की सहायता से गौरव को विमान की सीट पर बैठाया और धन्यवाद दिया. उस ने अपने हाथ में थमा सामान रैक में रखा. जैसे ही उस की नजरें अपने से 2 सीट पीछे गई, वह चौंक पड़ी.

उस सीट पर अनंत बैठा था. अकेला नहीं बैठा था. उस की बगल में एक नवविवाहित लगने वाली युवती भी थी. वह अनंत से बातें कर रही थी. उसे देख अवाक रह गई स्वाति.

यह कैसे हुआ? अनंत की बगल में युवती यानी अनंत की शादी हो गई? अनेक सवाल कौंध गए उस के मनमस्तिष्क में. वह धम्म से अपनी सीट पर बैठ गई. माथा चकरा गया उस का.

‘‘क्या हुआ स्वाति?’’ गौरव ने परेशान भाव से पूछा, ‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’ स्वाति की अचानक ऐसी हालत देख गौरव ने पूछा.

वह कुछ नहीं बोली, तो गौरव ने उसे झकझोरा, ‘‘क्या हुआ, ठीक तो हो?’’

‘‘हांहां ठीक हूं. बस थोड़ा सिर चकरा गया था,’’ स्वाति ने सामान्य होते हुए कहा.

स्वाति की अनंत से शादी हुई थी. यह उन दिनों की बात है, जब उस ने कालेज से बीए किया ही था. गजब की खूबसूरत स्वाति न केवल आकर्षक तीखे नैननक्श वाली थी, बल्कि कुशाग्रबुद्धि भी थी.

मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी स्वाति 5 बहनों में सब से छोटी थी. चंचल स्वभाव की स्वाति परिवार में सब की लाड़ली थी. बीए अंतिम वर्ष में थी कि उस के पापा का देहांत हो गया. उस की उम्र यही कोई 21 वर्ष के करीब थी. 4 बेटियों की शादी करतेकरते स्वाति के पापा वक्त से पहले ही बूढ़े हो गए थे. इधरउधर से कर्ज ले कर बेटियों को ब्याहा तो स्वाति की शादी से पहले ही चल बसे.

पति का साथ देती आ रही स्वाति की मां ने अपने पति की मौत के बाद चारपाई पकड़ ली. अब चारों बहनों को इस बात की चिंता हुई कि मां भी साथ छोड़ गईं तो स्वाति का क्या होगा? उसे कौन संभालेगा? अत: बहनों ने मिल कर तय किया कि मां के रहते हुए स्वाति के हाथ पीले कर दिए जाएं. पर अच्छे घरपरिवार का लड़का मिले तब न.

कई रिश्ते आए, लेकिन भाई कितने हैं, बाप…? के सवाल पर लड़के वाले खिसक जाते. अगर कोई इन सब हालात से भी समझौता कर लेता तो सवाल आता कि शादी में कितना पैसा खर्च करोगे?

खर्च के नाम पर तो कुछ था ही नहीं, उन के पास.

बहनों की ससुराल में भी ऐसा कुछ नहीं था कि सब मिल कर शादी में खर्च लायक मदद कर सकें.

स्वाति कहती, ‘‘दीदी, आप लोग मेरी टैंशन न लो. अभी मेरी उम्र ही क्या हुई है?’’

एक दिन स्वाति के लिए मुंबई से बहुत बड़े उद्योगपति घराने से रिश्ता आया. स्वाति के रिश्ते की मौसी का लड़का सुशांत मुंबई से यह रिश्ता ले कर दिल्ली आया.

‘‘मौसी, बहुत बड़ा घराना है. यों समझो राज करेगी स्वाति. घर में कितने नौकरचाकर, रुपया, धनदौलत, ऐशोआराम है कि आप सोच भी नहीं सकतीं,’’ सुशांत ने स्वाति की मां से कहा तो उन की आंखों में चमक आ गई.

‘‘हां, मौसी, बिलकुल सच.’’

‘‘तो बेटा इतने बड़े घर का रिश्ता… हमारे घर…’’ मां ने सुशांत से पूछा.

‘‘सब बहुत अच्छा है मौसी, बस एक छोटी सी कमी है…’’

सुशांत अपनी बात पूरी करता उस से पहले ही स्वाति की मां ने उत्सुकतापूर्वक पूछा, ‘‘वह क्या बेटा? कोई बीमारी है लड़के को या कोई ऐब…’’ मां ने पूछा.

‘‘नहीं मौसी, ऐसी कोई खास बीमारी नहीं. बचपन में लड़के के एक पांव में तकलीफ हो गई थी. पर मौसी इस का इलाज जल्दी होने लगेगा अमेरिका में,’’ सुशांत ने एक स्वर में अपनी बात कही.

‘‘पर बेटा अगर ठीक नहीं हुआ तो?’’ मां ने पूछा.

‘‘अरे मौसी, अरबों रुपए हैं उन के पास. कोई छोटामोटा घर नहीं है. इलाज पर पानी की तरह पैसा बहा देंगे. उन की अमेरिका के किसी बड़े डाक्टर से बात चल रही है,’’ सुशांत ने कहा.

‘‘वह तो ठीक है बेटा पर…’’

‘‘मौसी आप बिलकुल चिंता न करें. स्वाति मेरी बहन है. मैं इस का रिश्ता गलत घर या गलत लड़के से कराऊंगा क्या? मेरी नाक नहीं कट जाएगी?’’ सुशांत ने अपनापन दिखाते हुए कहा, तो मां के मन में बात जमती नजर आई.

आखिर सुशांत ने अपने तर्क दे कर मां और बड़ी बहनों को स्वाति की शादी के लिए राजी कर लिया.

स्वाति ने कुछ दिन विरोध किया. लेकिन सब बहनों और मां ने अपनी गरीबी और हालात का वास्ता दे कर उसे मना लिया और फिर एक दिन स्वाति की अनंत से शादी हो गई.

स्वाति मुंबई आ गई. जैसे सुशांत ने बताया था वैसे ही सब शाही ठाटबाट थे अनंत के घर. पता नहीं कितने नौकरचाकर, गाडि़यां, बहुत बड़ा महल सा घर, सासससुर. बस, अनंत इकलौता था अपने मांबाप का. सब का दुलार और प्यार मिला स्वाति को.

अनंत का एक पैर बचपन में पोलियोग्रस्त हो गया था. वह बेसाखी के सहारे चलता. बड़ा अजीब लगता जब वह स्वाति जैसी नवयौवना के साथ चलता. स्वाति को शुरू में बड़ी शर्म महसूस होती जब लोग उन्हें देखते. किसी प्रोग्राम में जाते या मार्केट, लोग घूरने वाले अंदाज से दोनों को देखने. लेकिन स्वाति ने खुद को समझाया. अनंत का प्यार देख कर उस ने निर्णय लिया कि वह अनंत का सहारा बनेगी. उस को दुनिया दिखाएगी और सच में स्वाति ने यही किया. अनंत के कारोबार को समझा और संभाल लिया. देश भर में अनंत को ले कर घूमी स्वाति. वह मुंबई में होने वाले हर कार्यक्रम में जाती. स्वाति हाथ थाम कर चलती अनंत का. खूब ऐंजौय करती.

एक दिन एक क्लब के बहुत बड़े प्रोग्राम के बाद स्वाति अपने पति अनंत का हाथ थामे बाहर आ रही थी कि उसे सामने से गौरव आता नजर आया. वही गौरव जिस ने स्वाति के साथ बीए की थी. बहुत ही स्मार्ट और आकर्षक युवक था वह.

‘‘हैलो गौरव,’’ स्वाति की नजर जैसे ही गौरव पर पड़ी तो उस ने कहा.

‘‘हाय स्वाति, कैसी हो भई? कहां हो आजकल?’’ गौरव ने करीब आते हुए उस से पूछा.

‘‘यहीं हूं मुंबई में. शादी हो गई मेरी…

2 साल हो गए,’’ स्वाति ने चहकते हुए कहा.

‘‘अच्छा 2 साल भी हो गए,’’ गौरव ने आंखें फाड़ कर आश्चर्य से कहा.

‘‘हां, 2 साल और ये हैं मेरे पति अनंत,’’ स्वाति ने परिचय कराया.

‘‘हैलो, माई सैल्फ गौरव.’’

गौरव ने अनंत की ओर मुखातिब होते हुए कहा और अपना हाथ अनंत की ओर बढ़ा दिया.

‘‘अनंत, ये मेरे कालेज का फ्रैंड है गौरव,’’ स्वाति ने कहा.

जब अनंत लंगड़ाते हुए आगे बढ़ा और अपना हाथ आगे बढ़ाया, तो गौरव कुछ समझ नहीं पाया.

‘‘हैलो, गौरव मैं अनंत शर्मा.’’

गौरव प्रश्नवाचक नजरों से स्वाति की ओर देख रहा था. गौरव ने बताया कि वह दिल्ली से मुंबई शिफ्ट हो गया है. यहां एक कंपनी में उच्च पद पर है और अभी तक शादी नहीं की है. स्वाति और गौरव ने फिर मिलने और एकदूसरे को घर आने का न्योता दिया. दोनों ने अपनेअपने मोबाइल नंबर भी दिए और विदा हो गए.

गौरव उस रात सो नहीं पाया. वह कालेज टाइम से ही स्वाति से प्यार करता था. लेकिन कभी अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाया. उस के दिमाग में कई सवाल चल रहे थे. स्वाति ने एक अपाहिज से शादी क्यों की? सोचतेसोचते वह सो गया.

गौरव ने फैसला किया कि वह कभी स्वाति से पूरी बात पूछेगा. उस ने एक दिन स्वाति को फोन किया. स्वाति ने कहा कि वह शाम को जरूरी काम से मार्केट जाएगी तब मिलते हैं. दोनों ने एक कौफी शौप पर मिलना तय किया.

स्वाति ने गौरव को सब बातें बताईं. शादी से पूर्व और शादी के बाद से अब तक की. 1-1 बात उस से सांझा की. उस ने यह भी कहा कि वह अनंत और उस के परिवार के साथ खुश है. अनंत के करोड़ों रुपए के टर्नओवर वाला कारोबार भी संभाल रही है.

गौरव को बहुत बड़ा आश्चर्य हुआ कि किस तरह की मजबूरियों में स्वाति ने सब स्वीकार किया और अब इन हालात में भी खुश है.

गौरव ने अपनी बातें भी बताईं. उस शाम स्वाति को घर पहुंचने में थोड़ी देर हो गई. अकेली ही थी और गाड़ी खुद ड्राइव कर के लाई थी, तो अनंत को काफी चिंता हुई.

घर आने पर उस ने अनंत से कहा, ‘‘आप मेरी टैंशन मत लिया कीजिए. आप की स्वाति अब मुंबई में नई नहीं है.’’

गौरव से स्वाति का मेलमिलाप बढ़ने लगा. गौरव कई बार स्वाति के घर भी आया. गौरव और अनंत भी मित्रवत मिलते. स्वाति और गौरव की निकटता बढ़ती जा रही थी.

दोनों ने एकसाथ कई बार मूवी देखी. गौरव को अच्छा लगा. स्वाति को गौरव में एक नई दुनिया नजर आने लगी. स्वाति गौरव की तरफ आकर्षित होती जा रही थी, तो अनंत से दूर.

स्वाति और अनंत की शादी को करीब 5 साल होने जा रहे थे. लेकिन दोनों के अभी तक कोई संतान नहीं हुई. अब उसे गौरव में अपनी दुनिया और सुनहरा भविष्य नजर आने लगा था. धनदौलत, ऐशोआराम और नर्म बिछौने उस के लिए कांटों की सेज लगने लगे.

अनंत भले ही अपाहिज था, लेकिन वह पूरी कोशिश करता कि वह स्वाति को खुश रखे. उसे किसी प्रकार की कमी महसूस नहीं होने  देता. अनंत अकसर स्वाति से कहता, ‘‘स्वाति  तुम ने जितना मेरा साथ दिया है, उस का कर्ज मैं कभी नहीं चुका पाऊंगा. शीघ्र ही मेरे पैर  का इलाज होगा तो तुम्हें अपने बूते पर दुनिया की सैर कराऊंगा.’’

गौरव से मिलने के बाद स्वाति का बदला रुख अनंत महसूस करने लगा था. लेकिन वह स्वाति से कुछ बोल नहीं पाता. बस बच्चों की तरह बिलख कर रह जाता. उसे एहसास होने लगा था कि स्वाति और गौरव की निकटता कुछ नया गुल खिलाएगी. स्वाति का देरसवेर घर आना, औफिस से भी गायब रहना शक पैदा करता था.

अनंत के मम्मीपापा तक भी ये बातें पहुंचने लगीं कि स्वाति का ध्यान अनंत और कारोबार में न हो कर कहीं और है. उन्होंने स्वाति से बात की. लेकिन बड़ी सफाई से स्वाति बहाना बना कर टाल गई. कभी कारोबार तो कभी किट्टी फ्रैंड्स के साथ जाने की बात वह कहती.

अनंत के पापा ने एक दिन तय किया कि वह स्वाति पर नजर रखेंगे. उन्होंने एक प्राइवेट डिटैक्टिव एजेंसी से संपर्क कर स्वाति पर नजर रखने का अनुबंध किया. एजेंसी ने जो रिपोर्ट दी, चौंकाने वाली थी. स्वाति का समय गौरव के साथ व्यतीत हो रहा था. उस ने पांचसितारा होटल में रूम भी बुक करा रखा था, जिस में गौरव और स्वाति मिलते.

एक दिन डिटैक्टिव एजेंसी ने सूचना दी कि स्वाति और गौरव होटल में हैं. अनंत के मम्मीपापा बिना वक्त गंवाए होटल जा पहुंचे.

अनंत के पापा ने होटल के रूम की डोरबैल बजाई. स्वाति और गौरव रूम में ही थे. उन्होंने सोचा वेटर होगा. गौरव ने दरवाजा खोला. सामने अनंत के मम्मीपापा को देख उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. मानो पैरों तले की जमीन खिसक गई हो.

‘‘अ… अ… आप…’’ उस के मुंह से निकला.

‘‘हां…हम… बेशर्म इनसान…’’ अनंत के पापा ने गौरव को अंदर धकेलते हुए कहा. स्वाति बैड पर लेटी हुई थी. उस के वस्त्र अस्तव्यस्त हो रहे थे. रूम के अंदर का दृश्य सारी प्रेमलीला को बयान कर रहा था. स्वाति अपने गुस्से से भरे सासससुर को यों अचानक सामने देख बैड से उठी.

‘‘स्वाति, क्या है यह सब..?’’ सास ने चीखते हुए पूछा.

नजरें गड़ाए खड़ी रही स्वाति.

‘‘हमारी छूट और लाड़प्यार का यह सिला दिया तुम ने?’’ ससुर भी चीख पड़े.

‘‘हां, यही सच है… आप क्या समझते हैं सारी उम्र मैं यों ही गुजार दूं? एक अपाहिज के साथ? मेरे भी अरमान हैं. आखिर कब तक…’’ स्वाति अचानक घायल शेरनी की तरह चीख पड़ी.

‘‘तो रहो इस के साथ ही. हमारे घर के रास्ते अब बंद हैं तुम्हारे लिए,’’ सास ने स्वाति की बात का जवाब देते हुए कहा.

ज्यादा बहस करने का मतलब था गौरव और स्वाति से झगड़ा करना. ज्यादा उचित यही था. दोनों को वहीं छोड़ सासससुर गुस्से में भरे होटल से चले आए.

उस दिन शाम को स्वाति घर आई… वह चुपचाप अपने रूम में चली गई. अनंत को मम्मीपापा से होटल में जो कुछ हुआ उस की जानकारी मिल चुकी थी. रात को दोनों का झगड़ा भी हुआ.

‘‘अब मेरी लाइफ में तुम्हारा कोई काम नहीं स्वाति,’’ अनंत ने दोटूक बात कही.

और एक दिन गौरव के मोहपाश में बंधी स्वाति चुपचाप घर से चली गई. बस एक खत लिखा अनंत के नाम.

‘गौरव के साथ जा रही हूं. आप ने मुझे बहुत अपनापन दिया. आप की आभारी हूं. मुझे खोजने की कोशिश मत करना.’

स्वाति घर छोड़ कर जा चुकी थी. वह जो कामकाज देख रही थी, अनंत के पापा ने उसे फिर से संभाला. उन्होंने बैंक, लेनदारों और समस्त लेनदेन की जानकारी ली. उन के सामने चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. होटल के लाखों रुपए के बिलों का भुगतान किया गया था. 1 करोड़ रुपए से ज्यादा की नक्दी और 50 लाख के जेवर गायब थे. अनंत के परिवार के लिए यह बहुत बड़ा विश्वासघात था. परिवार की ही बहू घर से करोड़ों की नक्दी व जेवर ले कर अपने प्रेमी के साथ चली गई. किसी सदमे से कम न था ये सब.

वक्त धीरेधीरे बड़ेबड़े जख्म भर देता है. 1 साल गुजर चुका था. अनंत का परिवार बहू से मिले जख्म को नियति मान कर सामान्य हो रहा था कि एक दिन वकील का नोटिस मिला. स्वाति ने तलाक का नोटिस भेजा. अनंत के परिवार वाले अवाक रह गए. अब भी कोई कसर बाकी थी. ऐसी कौन सी दुश्मनी थी, जो स्वाति निकाल रही थी. उस ने 10 करोड़ के भरणपोषण राशि की मांग भी की. स्वाति का यह नया रूप किसी वज्रपात से कम न था. आखिर परिवार की इज्जत का सवाल था. फजीहत होते नहीं देख सकते थे. अनंत के मम्मीपापा ने तय किया कि आपसी सहमति से तलाक और भरणपोषण की राशि दे कर स्वाति से छुटकारा पा लिया जाए.

अनंत और स्वाति का तलाक हो गया. 8 करोड़ स्वाति को बतौर भरणपोषण दिए गए.

स्वाति ने गौरव से शादी कर ली. वह खुश थी. नई दुनिया में आ कर, अनापशनाप खर्च, स्वाति को तलाक में मिले करोड़ों रुपए पा कर गौरव भी ऐय्याश हो चला था. उस ने पांचसितारा होटलों में पार्टियों, क्रिकेट सट्टे में रुपए फूंक डाले. गौरव इस कदर ऐय्याश और शराब का आदी हो चुका था कि पैसे के लिए स्वाति से मारपीट करने लगा.

एक दिन अचानक घटना घटी. गौरव बाइक पर जा रहा था कि बस ने उस की बाइक में टक्कर मार दी. वह सड़क पर जा गिरा. पीछे से आ रही दूसरी बस से गौरव के पैर बुरी तरह कुचल गए.

स्वाति को जैसे ही सूचना मिली, वह बदहवास दौड़ी चली आई हौस्पिटल. गौरव को औपरेशन थिएटर ले जाया जा चुका था. गौरव के कुछ अन्य मित्र भी आ चुके थे.

डाक्टर्स की टीम ने स्वाति को बताया कि गौरव की टांगें बुरी तरह कुचली जा चुकी हैं. उन्हें काटना पड़ेगा, क्योंकि वह अब ठीक होने योग्य नहीं है.

स्वाति की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. उसे अपनी दुनिया लुटती नजर आई. गौरव के दोनों पैर घुटने के ऊपर तक काटे जा चुके थे.

दुर्घटना में टांगें खो चुके गौरव के लिए यह संभव नहीं था कि मुंबई जैसे महानगर में रह पाए. अपाहिज हो चुका गौरव चिड़चिड़ा हो गया. वह चाहता था कि 24 घंटे स्वाति उस की सेवा में लगी रहे. 1 पल भी दूर न हो. उसे अपनी गुजरी जिंदगी के दिन याद हो जाते. जब स्वाति अनंत को छोड़ कर उस के पास चोरीछिपे दौड़ी चली आती थी. उसे लगने लगा कि स्वाति ने जैसे अनंत के साथ बेवफाई की वैसे उस के साथ भी कर सकती है. वह जरा भी इधरउधर होती, तो झल्ला पड़ता गौरव, ‘‘कहां गई थी? किस से मिलने गई थी? कौन है वह?’’

स्वाति को लगता उस के कानों में किसी ने पिघलता शीशा डाल दिया है. ऐसे शब्दभेदी बाणों से चीत्कार उठता उस का मन. पर करती भी क्या? उस का अतीत ही उस की सजा बन रहा था. उसे अनंत की बड़ी याद आती, पर अब कर भी क्या सकती थी?

धीरेधीरे उन के समक्ष आर्थिक संकट भी खड़ा हो रहा था. गौरव के इलाज पर काफी पैसा खर्च हो चुका था. आखिर दोनों ने तय किया कि दिल्ली लौट जाएंगे. वहीं अपने शहर में कोई कामकाज करेंगे.

गौरव और स्वाति ने दिल्ली जाने का फैसला किया. मुंबई एअरपोर्ट पर दिल्ली के लिए एअर इंडिया की फ्लाइट में  गौरव को व्हीलचेयर पर ले कर आई थी.

वह अपने अतीत को तो खो चुकी थी, अब जो उस के हाथ में था, उस को नहीं खोना चाहती थी.

‘‘ऐक्सक्यूज मी मैडम, आप शायद अपनी बैल्ट बांधना भूल गईं,’’ एअर होस्टेस ने स्वाति से कहा.

‘‘थैंक्स,’’ स्वाति ने इतना ही कहा. उस ने पीछ मुड़ कर देखा अनंत अभी भी बड़े शांत भाव से बैठा था. बगल में बैठी युवती उस के कंधे पर सिर टिका सो रही थी.

स्वाति महसूस कर रही थी जैसे वह आज अपाहिज हो गई है.

Stories : मन का बंधन

Stories : कनक हिंदी में पीएचडी कर रही थी. वह विभाग के प्रमुख डा. अमन के अधीन शोध कर रही थी. डा. अमन कुछ दिनों के लिए बाहर गए थे. उन्होंने अपने कक्ष की चाबी कनक को दे दी थी ताकि वह उन की पुस्तकों को पढ़ सके. इसी बीच एक प्रोफैसर भी 2 महीनों की छुट्टी पर चले गए. उन की जगह कनक को अस्थाई तौर पर नियुक्त किया गया.  कनक हमेशा सफेद साड़ी व ब्लाउज पहनती थी. उस का गेहुआं रंग, तीखे नैननक्श, हंसमुख एवं आकर्षक चेहरा सभी को उसे देखने को मजबूर कर देता था. इस के अलावा कुदरत ने उसे मधुर वाणी भी दी थी.

कनक अपनी पहली क्लास लेने स्नातकोत्तर अंतिम वर्ष की कक्षा में गई. उस ने विद्यार्थियों को संबोधित कर अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘आप सभी विद्यार्थी मुझे अपना मित्र ही समझें. इन 2 महीनों में मैं आप की पूरीपूरी मदद करने की कोशिश करूंगी और हो सकता है मुझे भी आप से कुछ सीखने को मिले जिस से मुझे अपनी शोध पुस्तिका पूरी करने में मदद मिले.’’

इस के बाद कनक ने सभी छात्रछात्राओं का भी परिचय लिया. उस कक्षा में नवीन नामक छात्र भी था जो मध्यवर्गीय परिवार से था. उस के पिता का देहांत हो चुका था. मां गृहिणी थीं. पिता द्वारा रखे रुपयों और पैंशन से मांबेटे का गुजारा होता था. नवीन पढ़ने में बहुत होशियार था और स्मार्ट पर्सनैलिटी का भी स्वामी था. एक पेपर ठीक न होने की वजह से उस ने पिछले साल परीक्षा ड्रौप कर दी थी. वह हंसमुख और मजाकिया स्वभाव का भी था. कनक पहले दिन क्लास ले कर दोपहर में जब कालेज से निकली तो काफी बारिश हो रही थी. वह गेट के बाहर रिकशे के लिए खड़ी थी. बारिश कम हो गई थी. आमतौर पर वह औटो से घर जाती थी.

औटो उसे मेन रोड पर छोड़ देता. फिर कुछ दूर गली में जाने पर उस का घर पड़ता था.   तभी नवीन अपने स्कूटर से वहां से गुजरने लगा तो कनक को देख कर रुक गया.  बोला, ‘‘मैडम, कहां जाना है आप को? चलिए आप को घर तक छोड़ देता हूं.’’ ‘‘नहीं, मैं रिकशे में चली जाऊंगी.’’ ‘‘बारिश के चलते अभी रिकशा जल्दी नहीं मिलेगा. चलिए, किराया मुझे दे देना.’’ इस पर दोनों हंस पड़े और फिर कनक हंसते हुए स्कूटर पर बैठते हुए बोली, ‘‘सब्जी मंडी जाऊंगी. कितना किराया लोगे?’’ ‘‘आप अपनी मरजी से जो भी दे दें. वैसे मैं भी उधर से ही जाता हूं. आप के साथ को ही किराया समझ लूंगा.’’ सब्जी मंडी पहुंचने पर कनक बोली, ‘‘बस मुझे यहीं ड्रौप कर दो.

बगल वाली गली में ही मेरा घर है.’’ नवीन ने स्कूटर न रोक कर गली में मुड़ते हुए कहा, ‘‘अभी बारिश हो रही है… आप को घर तक छोड़ देता हूं.’’ थोड़ी दूर चलने पर कनक ने स्कूटर रोकने को कहा. स्कूटर से उतर कर उस ने नवीन को धन्यवाद दिया. फिर बाय में हाथ हिला कर घर के अंदर चली गई. नवीन सोचने लगा कि इस के घर तक आया और इस ने औपचारिकतावश भी अंदर आने को नहीं कहा और कहां मैं चाय की सोच रहा था. दूसरे दिन कनक ने क्लास में कहा, ‘‘आप लोगों को कल मैं सूरदास द्वारा लिखित सौंदर्य वर्णन के विषय में बता रही थी. मुझे आशा है आप सभी इसे भलीभांति समझ गए होंगे. किसी को कोई संदेह हो तो पूछ सकता है.’’

नवीन ने पूछा, ‘‘मुझे सूरदास की इन पंक्तियों के अर्थ बताएं? अद्भुत एक अनुपम बाग, जुगल कमल पर गजवर क्रीड़त, तापर सिंह करत अनुराग…’’ ‘‘इस का मतलब और जिन्हें पता नहीं है कृपया अपना हाथ उठाएं,’’ कनक ने कहा. पूरी क्लास में किसी ने हाथ नहीं उठाया. तब कनक बोली, ‘‘मुझे पता है आप सभी यह बीए औनर्स में पढ़ चुके हैं. फिर भी नवीन मुझ से डा. अमन के कक्ष में मिले तो उन्हें समझा दूंगी.’’ इस पर सभी लड़के धीरेधीरे मुसकराने लगे जबकि लड़कियां गंभीर मुद्रा में थीं. नवीन जब कनक से मिला तब कनक ने पूछा, ‘‘मैं क्लास को तो आप कह कर संबोधित करती हूं, पर मैं अकेले में तुम्हारे साथ ज्यादा सहज महसूस करती हूं. तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा?’’ ‘‘नहीं, मुझे जरा भी बुरा नहीं लगेगा, बल्कि खुशी ही होगी.’’ ‘‘क्या तुम सही में उन पंक्तियों का अर्थ नहीं जानते हो?’’  ‘‘मैडम, सर ने बताया था पर यह भी कहा था कि वर्तमान में इस का  और अर्थ भी हो सकता है.’’

‘‘तो तुम यह और अर्थ मेरे मुंह से सुनना चाहते हो?’’ ‘‘मैडम, आप बुरा मान गईं तो रहने दीजिए.’’ ‘‘नहीं, मैं बताने जा रही हूं, आजकल तो स्त्री के विभिन्न अंग पुरुष कवियों के प्रिय विषय हैं. नारी की सुंदरता का वर्णन करने के लिए उस के अंगों के और अन्य उतारचढ़ाव की उपमाएं दी जाती हैं. आजकल तो फिल्मों में, फिल्मी गीतों और विज्ञापनों में स्त्री सुलभ अंगों को दिखाया जाता है. तुम कदाचित इसी संदर्भ में मेरे मुख से सुनना चाहते थे.’’

नवीन चुपचाप उठ कर कनक के रूम से निकल गया. अगले सप्ताह फिर कनक को उस की क्लास में पढ़ाना था. कनक ने कहा, ‘‘आज हम लोग अलंकार के विषय में चर्चा करेंगे. अलंकार एक प्रकार है संदेह अलंकार जैसे-  सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है. सारी ही की नारी है की नारी ही की सारी है. यहां सारी और नारी के बीच में संशय दिखाया गया है. आप में से कोई दूसरे प्रकार के अलंकार का उदाहरण दे सकता है? नवीन बोला- ‘‘एक कबूतर देख हाथ में पूछा कहां अपर है, उस ने कहा अपर कैसा वह तो उड़ गया सपर है.’’ कनक उत्साहित हो कर बोली, ‘‘बहुत अच्छा उदाहरण दिया नवीन ने. धन्यवाद नवीन. ‘‘यह वक्रोक्ति अलंकार का उदाहरण है. कहा जाता है कि जब जहांगीर ने नूरजहां से पूछा कि तुम्हारे पास एक ही कबूतर है दूसरा (अपर) कहां है तो उस ने दूसरे कबूतर को भी उड़ा कर कहा कि अपर (बे पर) कैसा वह तो इसी की तरह सपर (पर वाला) था.’’

उस दिन फिर दोपहर बाद बारिश होने लगी. कनक रिकशे का इंतजार कर रही थी.  नवीन ने सामने आ कर स्कूटर रोक कर कहा, ‘‘चलिए, मैं भी घर ही जा रहा हूं.’’ कनक आज तुरंत बैठने को तैयार हो गई. नवीन उसे घर ड्रौप कर मुड़ने वाला था तो कनक बोली, ‘‘अंदर आओ, चाय पी कर जाना.’’ नवीन कुछ पल कनक को देखता रहा. इसी बीच कनक ने दोबारा कहा, ‘‘स्कूटर बंद करो और अंदर चलो. उस दिन मां घर में नहीं थीं, इसलिए तुम्हें बिना चाय को पूछे जाने दिया था. अंदर आ जाओ.’’ थोड़ी देर में कनक खुद चाय बना लाई और फिर दोनों चाय पीने लगे. कनक की मां बगल के कमरे में सिलाई कर रही थीं. जब तक वे बाहर आईं नवीन जाने के लिए तैयार था. वह मां को प्रणाम और कनक को बाय कर चला गया. उस के जाने पर मां ने पूछा, ‘‘अच्छा लड़का है, तुझे पसंद है?’’ ‘‘मां, तुम भी न… वह मेरा स्टूडैंट नवीन था.’’ ‘‘आजकल तो तुम लोग जिंदगी भर पढ़ते रहते हो.

आखिर शादी कब करोगी?’’  कुछ दिनों बाद कनक अपनी मां के साथ एक रैस्टोरैंट में बैठी थी. संयोगवश  नवीन भी अपनी मां के साथ वहां पहुंचा. कनक ने उन्हें देखा तो अपनी टेबल पर ही बुला लिया. एकदूसरे का परिचय हुआ. कनक ने बताया कि अगले सप्ताह उस की नियुक्ति का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और साथ में उस का शोधकार्य भी. नवीन की मां ने कनक से कहा कि नवीन उस की बढ़ाई करते नहीं थकता. कनक की मां ने भी नवीन की तारीफ की और कहा कि बीचबीच में आते रहा करो, अब तो कनक भी घर पर ही मिलेगी. नवीन और कनक कुछ देर तक एकदूसरे को देखते रहे. कनक ने अपना शोध सौंप दिया था. एक दिन नवीन सब्जी मंडी गया तो वहां से कनक के घर जा पहुंचा. उस समय कनक अकेली थी. बोली, ‘‘आओ, आज इधर की याद कैसे आई?’’ सच कहूं या झूठ? ‘‘मुझे सच बोलने वाले अच्छे लगते हैं.’’ ‘‘तो सुनिए, आप की याद तो हर पल मेरे दिल में रहती है. आप की पर्सनैलिटी ही कुछ ऐसी है.’’ ‘‘बातें भी अच्छी बना लेते हो.’’

‘‘नहीं मैडम, मैं आप को अच्छी तरह परख कर आप का मूल्यांकन कर सकता हूं.’’ ‘‘तो क्या देखा मुझ में?’’ ‘‘आप श्वेत वस्त्रों में बहुत निर्मल, अभिजात और सुसंस्कृत लगती हैं.’’ अब तक मां आई गई थीं. तीनों ने चाय पी. फिर नवीन चला गया. कुछ महीने बाद नवीन सैकंड क्लास से एमए कर गया तो कनक डा. कनक बन चुकी थी. कनक नवीन के घर बधाई देने गई, तो नवीन बोला, ‘‘मैं ने लास्ट ईयर ड्रौप किया था यह सोच कर कि इस साल फर्स्ट क्लास लाऊंगा.’’ कनक बोली, ‘‘भाषा में फर्स्ट क्लास लाना कठिन है. वैसे भी इस साल कोई फर्स्ट नहीं आया है और तुम सैकंड क्लास में टौप पर हो, तो मुंह मीठा करो.’’ नवीन को उस ने अपने हाथों से मिठाई खिलाई. नवीन ने भी मिठाई का एक पीस कनक के मुंह में डाला. फिर कहा, ‘‘उस दिन आप ने पूछा था कि आप में क्या देखा है मैं ने? तो मैं यही कहूंगा कि कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय… वा पाय बौराय…’’ ‘‘बसबस, क्या मतलब?’’ ‘‘नहीं मैडम, बोलने दें. मैं इस कनक को पा कर बौरा गया हूं. आप के खयालों में मदहोश रहता हूं.’’ ‘‘पागल मत बनो. जो जी में आए बक देते हो. मत भूलो तुम मेरे स्टूडैंट रहे हो.’’

घर लौटने पर कनक भी कुछ देर तक नवीन के बारे में सोचती रही. थोड़ी देर तक वह भी दुविधा में थी. कनक और नवीन दोनों नौकरी के लिए कोशिश कर रहे थे. कनक ने अपने ही शहर में सरकारी संस्था में राजभाषा विभाग में प्रबंधक के पद पर जौइन किया. नवीन ने दूसरे शहर में नौकरी जौइन की. जाने के पहले नवीन कनक से एक पार्क में मिला.  कनक बोली, ‘‘अब तो तुम दूर जा रहे हो, पर संपर्क में रहना.’’ ‘‘दूर भले रहूं पर आप की याद दिल में लिए जा रहा हूं. पता नहीं आप को मेरी याद आएगी या नहीं?’’ कह उस ने कनक का हाथ पकड़ चूमते हुए आगे कहा, ‘‘मैं नहीं जानता सही है या गलत पर मेरा आप से दूर जाने का मन नहीं कर रहा है.’’ ‘‘तुम क्या पागलों जैसी हरकतें कर रहे हो… यहां पब्लिक प्लेस में अपनी और मेरी इज्जत का कुछ खयाल करो. तुम तो चले जाओगे, पर मैं यहीं रहूंगी. जानबूझ कर क्यों एकतरफा प्यार में पागल हो रहे हो? हम दोनों के बीच फासले हैं, समझो?’’ ‘‘क्या फासले हैं? बस उम्र का फासला है और वह भी 1-2 साल का होगा.’’

‘‘कभीकभी छोटे फासले तय करने में ही उम्र गुजर जाती है…चलो घर चलते हैं.’’ नवीन दूर शहर में नौकरी करने लगा. कनक से उस का संपर्क बना हुआ था. कनक भी उस के बारे में अकसर सोचती थी. उस की शादी भी हो गई. नवीन शादी में आया था. कनक को गिफ्ट देते समय उस की आंखों से आंसुओं की कुछ बूंदें कनक के मेहंदी लगे हाथों पर जा गिरी थीं. उस ने किसी की गजल भीगी आंखें बंद कर सुनाई- ‘‘होंठों को सी के उन को न जीना पड़े कभी, मेहंदी रचे ये हाथ न फीके पड़ें कभी.’’ वह चला गया पर इस बार कनक की आंखें भी नम हो गई थीं. कनक की शादी अपनी ही कंपनी के एक इंजीनियर से हुई थी. 1 साल के अंदर ही वह एक सुंदर कन्या की मां बन गईं. शुरू में सब ठीक चल रहा था, पर 2 सालों के बाद उस का पति अमेरिका चला गया. उस ने जाते समय कनक से कहा था कि वहां ठीक से सैटल होने पर उन्हें भी ले जाऊंगा.   शुरू में तो कनक का पति अकसर उस से बातें करता था, पर फिर धीरेधीरे यह  सिलसिला कम होने लगा और बाद में बिलकुल बंद हो गया.

एक दिन कनक ने पति के नंबर पर फोन किया तो पता चला कि यह नंबर मौजूद नहीं है. कनक ने पति के करीबी दोस्त से बात की तो उस ने कहा, ‘‘भाभीजी, मैं नहीं बताना चाहता था, पर उस का तो अमेरिका में भारतीय मूल की एक अमेरिकी लड़की से चक्कर चल रहा है. काफी दिनों से उसी के साथ रह रहा है. उसे तो ग्रीन कार्ड भी मिल गया है, अब तो उस के लौटने की उम्मीद न के बराबर है.’’ नवीन और कनक संपर्क में तो थे पर कनक ने अपने पति के बारे में उसे या उस की मां को कुछ नहीं बताया था. एक दिन कनक अपनी बेटी को ले कर नवीन की मां से मिलने गई थी. मां ने जब उस के पति के बारे में पूछा तो उस ने अपनी कहानी सुना दी. मां को सुन कर बहुत दुख हुआ.

उसी दिन अचानक नवीन बिना पूर्व सूचना के आ पहुंचा. कनक और उस की बेटी  को देख कर बहुत खुश हुआ. कनक पहले की अपेक्षा दुबली हो गई थी और पुराने स्टाइल में सफेद साड़ी में थी. नवीन श्वेता को गोद में ले कर उस के साथ खेलते हुए बोला, ‘‘यह तो आप से भी सुंदर है.’’ कनक के चहेरे पर एक बनावटी हंसी थी. मां ने जब कनक की कहानी सुनाई तो उसे बहुत दुख हुआ. कुछ इधरउधर की बातों के बाद कनक ने कहा, ‘‘नवीन की शादी जल्दी कर दो मांजी.’’ मां बोलीं, ‘‘अब तुम्हीं समझाओ बेटी.’’ ‘‘मैं तो बस किसी के इंतजार में ही रह गया.’’ ‘‘किस का इंतजार नवीन?’’ ‘‘कनक का.’’ ‘‘यह नामुमकिन है. तुम समझते क्यों नहीं?’’ कह कनक रोने लगी. ‘‘अरे, मैं ने कुछ बुरा कहा क्या?’’ कनक ने नवीन का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘नहीं तुम्हारी सोच में कोई बुराई नहीं है, बल्कि तुम मेरा भला ही सोच रहे हो, पर हम जैसा सोचते हैं, वैसा हमेशा तो हो नहीं पाता.

मैं ने कहा था न कि हमारे बीच जो फासले हैं उन्हें मैं पाट सकती हूं.’’ ‘‘मुझे तो कोई फासला नहीं दिखता है. किस फासले की बात कर रही हैं आप?’’ ‘‘एक हो तो बताऊं?’’ ‘‘मैं नहीं मानता.’’ ‘‘तो सुनो, एक तो उम्र का फासला तुम खुद मानते हो, दूसरा मैं परित्यक्ता हूं, तीसरा मैं एक बच्ची की मां हूं, चौथा अपने बेटी का सौतेला पिता मुझे मंजूर नहीं है और अंत में तुम्हारेमेरे बीच गुरुशिष्य का भी रिश्ता रहा है और शायद इसीलिए तुम मुझे अभी तक आप ही कहते आए हो, मैं अपने जीवन में इस की गरिमा बनाए रखना चाहती हूं.’’ ‘‘इस का मतलब मैं क्या समझूं? आप क्या दोबारा विवाह नहीं करेंगी?’’ ‘‘नहीं.’’ ‘‘आप में अदम्य साहस देख रहा हूं. कुदरत आप की सहायता करेगी,’’ कह कुछ देर तक नवीन खामोश रहा. उस के चेहरे पर निराशा झलक रही थी. वह चुपचाप सिर झुकाए बैठा था. तभी कनक ने पूछा ‘‘क्या तुम मुझे मन से चाहते हो?’’ ‘‘आप को इस में कोई संदेह है क्या?’’

.‘‘नहीं, संदेह नहीं, इसीलिए कह रही हूं कि मां और मेरी बात मान कर शादी कर लो. रिश्ते वही सच्चे होते हैं जो मन से बंधे हों. मन का रिश्ता दिलोंको मन की गहराइयों तक बांधे रहता है. दुखी नहीं होना. तन का बंधन इस जन्म में नहीं संभव है, पर विश्वास करो मन से मैं तुम से जुड़ी रहूंगी.’’  नवीन ने भी अपने दोनों हाथों से उस के हाथों को पकड़ लिया. दोनों की  आंखों से आंसू की बूंदें एकदूसरे के हाथों पर टपक रही थीं. दोनों के मन की पीड़ा आंखों में उतर आई थी. नवीन बोला, ‘‘आप भी एक वादा करें कि जीवन के किसी भी मोड़ पर मेरी जरूरत पड़े तो मुझे अवश्य याद करेंगी, तभी मैं समझूंगा कि मन की डोरी से बंधे हैं हम दोनों.’’ मां काफी देर से चुप खड़ी उन दोनों की बातें सुन रही थीं. वे कनक को संबोधित करते हुए बोलीं, ‘‘कनक, तुम मुझे अपनी मां जैसी ही समझना.’’ ‘‘निस्संदेह,’’ कह कनक बेटी को गोद में ले घर से निकल गई.

Story in Hindi : मेरा पिया घर आया

Story in Hindi : रवि अपनी भाभी कविता और उन की सहेली निशा की सारी दलीलों को नजरअंदाज करते हुए शादी न करने की जिद पर कायम रहा, ‘‘मानवी से जुड़ी यादों के कारण अब किसी लड़की की तरफ देखने का मेरा मन नहीं करता,’’ शादी न करने का मुख्य कारण दोहराते हुए रवि का गला भर आया था.

‘‘पर मानवी अब जिंदा नहीं है,’’ निशा ने उत्तेजित लहजे में उसे याद दिलाया, ‘‘जिंदगी में हुए किसी एक हादसे के कारण इंसान को अपनी जीवनधारा को रोक नहीं देना चाहिए.’’

‘‘मैं मानवी की यादों के सहारे सारा जीवन गुजारने का फैसला कर चुका हूं, निशा भाभी.’’

कविता ने एकाएक नियंत्रण खो दिया और गुस्से से भरी आवाज में अपनी सहेली से कहा, ‘‘निशा, इन जनाब के साथ मगज मारने से कोई फायदा नहीं. अच्छा ही है कि ये शादी करने से इनकार कर रहे हैं. इन जैसे जिद्दी और नासमझ इंसान के साथ शादी कर के कोई लड़की खुश रह भी नहीं सकती.’’

अब तक खामोश बैठी निशा की छोटी बहन नीरजा एकाएक भावुक लहजे में बोल पड़ी, ‘‘ऐसा मत कहो कविता दीदी. इन जैसे संवेदनशील इंसान की जीवनसंगिनी बन कर कोई भी लड़की खुद पर गर्व करेगी.’’

निशा और कविता को उस का शरमातेलजाते अंदाज में अपनी बात कहने का यह ढंग हैरान कर गया. रवि भी उस के चेहरे को उलझन भरे अंदाज में पढ़ने की कोशिश कर रहा था.

‘‘नीरजा, तुम तो मानवी से जुड़ी सारी कहानी अच्छी तरह जानती हो. अगर तुम्हारे लिए इस का रिश्ता आए, तो क्या तुम हां कह दोगी?’’ कुछ देर की खामोशी के बाद कविता ने मजाकिया लहजे में नीरजा से यह सवाल पूछ ही लिया.

‘‘मैं तो फौरन हां कह दूंगी,’’ नीरजा ने भावुक लहजे में ऐसा जवाब दिया तो तीनों को यह बात एकदम समझ आ गई कि वह रवि को मन ही मन प्यार करने लगी है.

कविता ने इस बार संजीदा हो कर अगला सवाल पूछा, ‘‘यह तो बता कि तू ने ऐसा क्या खास गुण देख लिया रवि में जो इसे अपना दिल दे बैठी?’’

नीरजा भावुक लहजे में बोली, ‘‘कुछ दिन पहले जब दीदी के बेटे मोहित की तबीयत खराब हुई, तो इन से उस की पीड़ा नहीं देखी गई थी. सब के रोकने के बावजूद ये ही उसे फौरन अस्पताल ले गए थे.’’

‘‘भाभी, आप या दीदी वक्तबेवक्त इन्हें कुछ भी काम बताओ, ये उसे करने में बिलकुल नानुकर नहीं करते. गुस्सा तो जैसे इन के स्वभाव में है ही नहीं. सब से हंस कर मिलते हैं. मैं ने इन्हें गरीब लोगों से भी हमेशा प्यार और इज्जत के साथ पेश आते देखा है. इन की तो जितनी तारीफ की जाए कम है.’’

रवि ने माथे पर बल डाल कर कहा, ‘‘ऐसी बातें सोचने का कोई फायदा नहीं, क्योंकि मुझे तो कभी शादी ही नहीं करनी है.’’

‘‘इस मामले में मेरा अपने दिल पर कोई नियंत्रण नहीं रहा है,’’ नीरजा ने शरमाते हुए जवाब दिया.

‘‘तुम पागल हो क्या? क्यों इन सब की हंसी का पात्र न रही हो?’’

‘‘आप जैसा संवेदनशील और नेकदिल जीवनसाथी मुझे ढूंढ़ने पर नहीं मिलेगा,’’ वह अपनी धुन में बोली, मानो उस ने रवि की बात सुनी ही न हो.

रवि को बिलकुल नहीं सूझा कि वह नीरजा से आगे क्या कहे. उसे यों बेबस देख निशा और कविता खुल कर मुसकराए जा रही थीं.

‘‘निशा, मुझे तो तेरी छोटी बहन को अपनी देवरानी बनाने में कोई एतराज नहीं…’’

‘‘भाभी, प्लीज. हम अभी आए,’’ ऐसा कह कर रवि ने नीरजा का हाथ पकड़ा और उसे उन के बीच से उठा कर बाहर लौन में ले आया.

‘‘तुम सब के सामने ऐसी पागलपन वाली बातें कर के अपना और मेरा मजाक मत उड़वाओ,’’ रवि नाराज नजर आ रहा था.

‘‘आप इस दुनिया को छोड़ कर जा चुकी मानवी के अलावा किसी और लड़की से प्रेम नहीं करते हो न?’’ नीरजा एकदम संजीदा हो गई.

‘नहीं.’’

‘‘तो मुझ से शादी कर लो.’’

‘‘तुम मेरी मजबूरी समझो, प्लीज. मैं मानवी को प्यार करता था, करता हूं और करता रहूंगा.’’

‘‘मुझे बिलकुल आप के जैसा ही जीवनसाथी चाहिए. अपनी मृत प्रेमिका के प्रति आप अगर इतने वफादार हो तो यकीनन मेरे प्यार के प्रति भी पूरी तरह से ईमानदार और वफादार रहोगे.’’

‘‘मैं मानवी से कभी बेवफाई नहीं करूंगा,’’ नाराजगी भरे अंदाज में उठ कर रवि अपने घर की तरफ चल पड़ा.

‘‘और मेरा दिल कह रहा है कि हमारी शादी जरूर हो कर रहेगी,’’ नीरजा की इस घोषणा का कोई जवाब देने के लिए रवि रुका नहीं था.

रवि का दिल जीतने की कोशिशें नीरजा ने उसी दिन से बड़े उत्साह के साथ शुरू कर दीं. पड़ोस में घर होने के कारण वह सुबहशाम खूब सजधज कर रवि से मिलने पहुंच जाती.

‘‘मैं कैसी लग रही हूं?’’ रवि के सामने आते ही वह उस से यह सवाल तब तक पूछती रहती जब तक वह उस की तारीफ नहीं कर देता.

अपने फोन के कैमरे से वह रवि के हर किसी के साथ खूब फोटो खींचती. उस का हर काम भागभाग कर खुद करती. उस के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने के लिए वह अकसर रात का खाना उसी के घर खाने लगी थी.

वह अकसर, ‘अपने पिया की मैं तो बनी रे दुलहनिया…’ और ‘मेरा पिया घर आया…’ जैसे गाने मस्त अंदाज में गाती हुई दोनों घरों में घूमती नजर आती, तो रवि के अलावा सब खूब दिल खोल कर हंसते.

परेशान रवि हर किसी से फरियाद करता, ‘‘कोई इस पगली को समझाओ, प्लीज. यह अपनी भावनाओं पर काबू रखे, नहीं तो बाद में इसे दुख होगा.’’

‘‘उसे समझाना हमारे बस की बात नहीं. वह तो तुम्हारे प्यार में पागल हो चुकी है, रवि,’’ हर किसी से कुछ ऐसा ही जवाब पा कर रवि की खीज निरंतर बढ़ती जाती थी.

आने वाले कुछ दिनों में नीरजा ने अपने उत्साहपूर्ण व्यवहार से रवि के पिता कैलाश, मां सावित्री और बड़े भाई राजीव के दिलों को भी जीत लिया. उन सब के मन में यह उम्मीद बंध  गई कि कभी शादी न करने के रवि के फैसले को शायद नीरजा बदलने में कामयाब हो जाएगी.

नीरजा की मां कांता ने विकास नाम के एक बिजनैसमैन के साथ नीरजा का रिश्ता पक्का करने का मन बना रखा था. जब नीरजा के रवि को दिल देने की खबर उन के कानों तक पहुंची, तो वे अपने पति रमेश के साथ अगले ही दिन मेरठ से दिल्ली आ गईं.

नीरजा को सामने बैठा कर उन्होंने सख्त लहजे में उसे समझाना शुरू किया, ‘‘शादी के बाद किसी भी लड़की की खुशियां सुनिश्चित करने में पैसा बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. तुझे तो इस बात से खुश होना चाहिए कि इतने अमीर घर की बहू बनने का मौका मिल रहा है.’’

‘‘पर मैं रवि को पसंद करती हूं… उसे दिल की गहराइयों से प्यार करती हूं,’’ नीरजा ने रोंआसे स्वर में उन्हें अपने दिल की बात बता दी.

‘‘पैसा सबकुछ नहीं होता, कांता. हमें इस की पसंद नापसंद का भी खयाल रखना चाहिए,’’ रमेश ने अपनी बेटी का पक्ष लिया.

‘‘तुम तो अपना मुंह बंद ही रखो जी,’’ कांता एकदम गुस्से से फट पड़ीं, ‘‘तुम्हारे साथ पिछले 30 साल से मैं अपने मन को मार कर कैसे जी रही हूं, यह मैं ही जानती हूं. कभी न मनचाहा पहना, न कहीं घूमीफिरी. बजट बना कर जीते हुए मेरी सारी जिंदगी बेकार हो गई.’’

रमेशजी ने आगे कुछ न बोलने में ही अपनी भलाई समझी. कांता ने उन से ध्यान हटाया और अपनी बेटी को गुस्से से घूरते हुए कहने लगीं, ‘‘अपने इस प्यार और पसंद के पागलपन को गोली मार और मुझे बता कि विकास के मुकाबले क्या है इस रवि के पास? 3 कमरों का फ्लैट, जिस में वह भैयाभाभी के साथ रहता है और खटारा सी पुरानी कार. अरे, रवि जितना सालभर में कमाता है, उतनी तो विकास की फैक्टरी एक महीने में उसे कमा कर देती है. तू जिंदगीभर ऐश करेगी उस के साथ.’’

नीरजा चिढ़ कर बोली, ‘‘मां, मेरी नजरों में विकास एक अहंकारी और रूखा इंसान है, जो अपनी तारीफ खुद कर के सब को बहुत बोर करता है.’’

‘‘उस काबिल लड़के में जबरदस्ती बेकार के नुक्स मत निकाल. देख, उन्हें सुंदर लड़की चाहिए और ऊपर से तेरी मौसी यह रिश्ता कराने के लिए खूब भागदौड़ कर रही है. तुझ में थोड़ी सी भी अक्ल है, तो फौरन विकास से शादी करने को हां कह दे.’’

‘‘शादी के मामले में किसी ने मेरे साथ जबरदस्ती की तो मैं आत्महत्या कर लूंगी,’’ ऐसी चेतावनी दे कर नीरजा उन के सामने से हट गई.

कुछ देर तक अपनी बेटी को कोसने के बाद कांता ने नीरजा पर दबाव बढ़ाने के लिए विकास को फौरन अगले दिन सुबह मेरठ से दिल्ली आने का हुक्म फोन कर के सुना दिया.

सफल बिजनैसमैन विकास बड़बोला इंसान था, जिसे अपनी अमीरी पर बहुत घमंड था. उसे पूरा विश्वास था कि नीरजा उस के साथ शादी करने से कभी इनकार नहीं करेगी.

‘‘नीरजा को मैं सारी दुनिया घुमाऊंगा… मेरी मां शादी में इतने जेवर चढ़ाएंगी कि देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह जाएंगी… हनीमून मनाने के लिए मैं ने स्विट्जरलैंड जाने का मन बना रखा है…’’ हर वक्त ऐसी डींगें मार कर उस ने कांता के अलावा सब को परेशान कर रखा था.

रवि ने अगले ही दिन नीरजा से अकेले में कहा, ‘‘इस विकास के साथ शादी करने को तुम हां मत करना. वह बोर इंसान तुम्हें अपने ढंग से कभी जीने नहीं देगा.’’

‘‘मैं तो आप की हमसफर बनना चाहती हूं, पर आप हो कि हां…’’

‘‘वह बात मत शुरू करो, प्लीज. मैं तुम से शादी नहीं कर सकता,’’ रवि ने उसे फौरन टोक दिया.

‘‘आप मेरी आंखों में देखो और बताओ कि वहां आप को अपने लिए गहरा प्यार दिखाई दे रहा है या नहीं,’’ नीरजा एकदम से रवि के बहुत करीब आ गई थी.

‘‘वह सब तो ठीक है, पर…’’

‘‘मानवी के साथ आप ने सच्चा प्यार किया, पर अब वह इस दुनिया में नहीं है. उस की यादों से जुड़े रह कर मेरे सच्चे प्रेम को अपने दिल में जगह न देने का फैसला करना कहां की समझदारी है,’’ नीरजा का गला एकदम से भर आया.

‘‘मैं मजबूर हूं.’’

‘‘तो मैं भी मजबूर हूं. अगर आप ने हां नहीं की, तो मैं परसों शाम को होने वाली अपनी जन्मदिन पार्टी में विकास के साथ शादी करने को हां जरूर कह दूंगी,’’ नीरजा ने अपना फैसला सुनाने के बाद भावुक अंदाज में उस का हाथ चूमा और अपने कमरे की तरफ चली गई.

उस शाम को विकास के वापस मेरठ लौटने से पहले नीरजा ने सब के सामने उस से कहा, ‘‘मैं शादी को ले कर अपनी पक्की हां या ना आप को 2 दिन के अंदर जरूर बता दूंगी.’’

नीरजा की इस घोषणा के बाद सभी रवि की तरफ आशा भरी नजरों से देखने लगे. उस के गुस्से से डर कर कोई कुछ कह तो नहीं रहा था, पर उन सब की खामोशी भी रवि के ऊपर नीरजा से शादी के लिए हां कहने को जबरदस्त दबाव बना रही थी.

नीरजा की आशा के विपरीत रवि ने शादी को ले कर कोई बात नहीं की. वह तो अपने घर से सुबह से देर रात तक के लिए 2 दिन ऐसा गायब रहा कि उन दोनों की अगली मुलाकात उस की जन्मदिन पार्टी में ही हुई.

पार्टी में शामिल होने के लिए जैसे ही रवि ने ड्राइंगरूम में कदम रखा, तो उस से बेहद खफा नजर आ रही नीरजा ने ऊंची आवाज में सब को संबोधित किया, ‘‘अपने मातापिता की खुशी की खातिर मैं ने विकास से शादी करने का फैसला…’’

रवि ने ऊंची आवाज में टोक कर उसे अपना वाक्य पूरा नहीं करने दिया, ‘‘नीरजा, तुम उस घमंडी इंसान के साथ कभी खुश नहीं रह सकोगी.’’

‘‘तो आप क्यों परेशान हो रहे हैं,’’ गुस्सा करना भूल कर नीरजा एकदम से रोंआसी हो उठी.

कविता ने भी चुभते लहजे में अपने देवर को डांटा, ‘‘यह बिलकुल ठीक कह रही है. तुम्हारे प्रेम में पागल इस प्यारी सी… इस भोली सी…इस सुंदर सी लड़की के सुखदुख की तुम्हें कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है. तुम तो जिंदगीभर अपनी मृत महबूबा को नाराज न करने की फिक्र ही करते रहना.’’

‘‘अब बस भी करो, भाभी. आप सब लोगों के ताने सुनसुन कर मैं इतना तंग आ गया हूं कि मैं ने…मुझे नीरजा से शादी करना मंजूर है,’’ रवि की इस घोषणा को सुन नीरजा के अलावा वहां उपस्थित हर इंसान तालियां बजा उठा.

सब की नजरों का केंद्र बन गई नीरजा ने उदास लहजे में अपने मन की बात कही, ‘‘शादी के मामले में मुझे इन की दया या एहसान नहीं चाहिए. ऐसी शादी करने का क्या फायदा कि इन के सामने मैं रहूं, पर ये मानवी के विचारों में खोए रहें?’’

‘‘पहले तुम ही शादी करने को मेरे पीछे हाथ धो कर पड़ी हुई थी, तो अब क्यों इनकार कर रही हो?’’ रवि ने उस के पास आ कर मुसकराते हुए पूछा.

‘‘मुझे लगता है कि मेरे साथ शादी करने का फैसला आप ने खुश हो कर नहीं किया है.’’

‘‘मेरे मन में क्या है, अब यह भी तुम बताओगी?’’

‘‘मुझे ही क्या, यह तो सब को पता है कि आप के दिलोदिमाग पर मानवी का कब्जा है.’’

‘‘तो तुम्हारे साथसाथ और सब भी कान खोल कर सुन लो कि मानवी ने ही मुझे तुम से शादी करने की इजाजत दी है,’’ रवि ने अपना पर्स खोल कर सब को दिखाया.

पर्स में अब तक मानवी का फोटो सभी ने लगा देखा था, पर इस वक्त वहां नीरजा की तसवीर लगी नजर आई.

एकाएक बेहद भावुक हो कर रवि नीरजा से बोला, ‘‘मानवी ने ही कल रात मुझे देर तक समझाया कि अब से तुम मेरे सुखदुख का खयाल रखोगी. कल रात के बाद से मैं आंखें बंद करता हूं, तो उस की जगह अब मुझे तुम नजर आती हो. मुझ से शादी न कर के क्या तुम मानवी को कष्ट पहुंचाना चाहोगी?’’

‘‘मैं भला ऐसा गलत काम क्यों करूंगी? हमारी शादी जरूर होगी,’’ नीरजा किसी छोटी बच्ची की तरह खुशी से तालियां बजाती उछली और फिर शरमाते हुए रवि की छाती से जा लगी.

Rukmini Vasanth: ‘आज जो भी हूं अपने दम पर हूं’

Rukmini Vasanth: हाल ही में रिलीज फिल्म ‘कांतारा चैप्टर 1’ में राजकुमारी कनकवती की भूमिका में नजर आईं खूबसूरत अभिनेत्री रुक्मिणी वसंत ने दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है. रुक्मिणी वसंत भारतीय सिनेमा की सब से होनहार प्रतिभाओं में से एक है, जिन्होंने अब तक कन्नड़, तेलुगु, तमिल भाषा की फिल्मों में काम कर के अपनी अलग पहचान बनाई है.

लंदन स्थित ‘रौयल ऐकैडमी औफ ड्रामैटिक आर्ट’ यानी आरएडीए से अभिनय का प्रशिक्षण ले कर 2019 में कन्नड़ फिल्म ‘बीरबल ट्रिलौजी केस 1 फाइंडिंग ब्रजमूनि’ से विनय कैरियर की शुरुआत करने वाली रुक्मिणी को असली पहचान 2023 में उन की अगली रिलीज कन्नड़ फिल्म ‘सप्त सागरदाचे एलो साइड ए और बी’ से मिली, जिस में रुक्मिणी ने प्रिया की भूमिका निभा कर दर्शकों का दिल जीत लिया.

इस फिल्म में सशक्त अभिनय से न सिर्फ रुक्मिणी को आलोचकों से प्रशंसा मिली बल्कि इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ फिल्म फेयर क्रिटिक अवार्ड भी मिला. रुक्मिणी साउथ फिल्म में अभिनय करने और अवार्ड पाने के अलावा बहुभाषी परियोजनाओं जैसे ‘बना दारियाल्ली,’ ‘बघीरा,’ ‘भैरपी रानागल’ में भी दिखाई दी हैं. खूबसूरत रुक्मिणी सिर्फ अपनी फिल्मों को ले कर ही चर्चा में नहीं हैं बल्कि अपनी बेपनाह खूबसूरती के चलते सोशल मीडिया पर नैशनल क्रश भी बन गई हैं.

हाल ही में गृहशोभा को दिए इंटरव्यू में ‘कांतारा चैप्टर 1’ की हीरोइन रुक्मिणी वसंत ने अपने अब तक के अभिनय कैरियर, ‘कांतारा चैप्टर 1’ को ले कर कई दिलचस्प बातें, 15 साल की उम्र से ही अभिनय में रुचि के चलते उन्होंने अपनी अभिनय यात्रा कैसे शुरू की, उन के परिवार वालों ने उन का कितना साथ दिया, रुक्मिणी कौन से परिवार से तअल्लुक रखती हैं और बालीवुड फिल्मों में काम करने की इच्छा को ले कर उन का क्या कहना है, ऐसी ही कई दिलचस्प बातें शेयर कीं ‘कांतारा चैप्टर 1’ की हीरोइन रुक्मिणी वसंत ने.

पेश है, रुक्मिणी वसंत की अब तक की अभिनय यात्रा की कहानी उन्हीं ही जबानी…

मेरे लिए प्रशिक्षण यात्रा से कम नहीं

‘कांतारा चैप्टर 1’ मेरे लिए बहुत खास है क्योंकि यह फिल्म मेरे लिए आध्यात्मिक प्रशिक्षण से कम नहीं है. यह फिल्म मेरे लिए प्रशिक्षण यात्रा ही है क्योंकि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है जैसे तलवार चलाना, घुड़सवारी और नृत्य में विभिन्नता आदि. इस फिल्म की शूटिंग के दौरान कई दृश्य काफी मुश्किल थे तो कई दृश्य यादगार थे.

इस फिल्म में काम करते वक्त मैं हर दिन कुछ न कुछ नया सीखती थी. इस फिल्म के ऐक्टर, डाइरैक्टर और लेखक ऋषभ शेट्टी मल्टी टेलैंटेड हैं. मैं उन्हें अद्भुत मानती हूं क्योंकि शूटिंग के दौरान बतौर डाइरैक्टर, लेखक और ऐक्टर अलगअलग जगह पर ध्यान केंद्रित करना अपनेआप में खास है. इस के साथ ही ऋषभ अच्छे इंसान भी हैं. बहुत ज्यादा डाउन टू अर्थ हैं इसलिए मुझे उन के साथ काम के दौरान काफी कुछ सीखने को मिला. मैं इस फिल्म में राजकुमारी कनकवती का किरदार निभा रही हूं जो बहुत बहादुर और कलाप्रेमी है. यह किरदार निभाना मेरे लिए चैलेंज था और मजेदार भी.

यही वजह है कि ‘कांतारा चैप्टर 1’ मेरे लिए हमेशा खास फिल्म रहेगी. मेरा परिवार मेरी ताकत है. अभिनय के साथसाथ कला और सेवा की भावना मुझे विरासत में मिली है. मेरे पिता कर्नल वसंत वेणुगोपाल सेवा वीरता और बलिदान के लिए अशोक चक्र से सम्मानित हुए हैं. मेरी मां सुभाषिनी वसंत एक भरतनाट्यम नृत्यांगना हैं. मां की कला के प्रति अटूट भावना और प्रेम ने मुझे अभिनय के लिए प्रेरित किया. मेरी मां जो अनुशासनप्रिय हैं और कला के प्रति गहरा जनून रखती हैं. उन की इसी अटूट श्रद्धा ने मुझे कला की तरफ आकर्षित किया, जिस के चलते 15 साल की उम्र से ही मैं दिली तौर पर अभिनय और कला से जुड़ने लगी.

अभिनय यात्रा की शुरुआत मजेदार रही

मैं ने अभिनय का कोई प्रशिक्षण तो नहीं लिया लेकिन 15 साल की उम्र से ही मेरी अभिनय में रुचि होने लगी थी. अपनी मां की वजह से मेरे मन में भी कहीं न कहीं यह इच्छा जाग रही थी कि मैं अभिनय क्षेत्र में कुछ नया सीखू. लेकिन क्योंकि मैं ने अभिनय के लिए कोई शिक्षा नहीं ली थी इसलिए इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के बारे में मैं कुछ तय नहीं कर पा रही थी. तभी एक बार मैं ने अपनी मां से कहा कि मैं घर में पड़ेपड़े तंग होती हूं कुछ नया करने की इच्छा है, अभिनय में मेरी रुचि है तो कम से कम मुझे थिएटर क्लास में ही दाखिला दिलवा दो.

मेरी मां को मेरी यह बात अच्छी लगी, सो उन्होंने थिएटर क्लास में मेरा एडमिशन करवा दिया. मैं क्योंकि पहले से ही शास्त्रीय बैले डांस और भरतनाट्यम से प्रशिक्षित थी, इसलिए अभिनय से जुड़ना मेरे लिए और भी दिलचस्प रहा. नृत्य करने वाली मुद्राएं और हावभाव से हम भावनाओं को व्यक्त करने की कला जानते हैं, लेकिन रंगमंच के जरीए अभिनय को शब्द मिल जाते हैं.

थिएटर में अभिनय सीखने के बाद भावनाओं को शब्दों के जरीए चेहरे से व्यक्त करने की कला मुझे अभिनय प्रशिक्षण के बाद आई. दिल की बात जबां तक ला कर चेहरे के हावभाव के साथ शब्दों का मेल अभिनय को जन्म देता है जो मैं ने रंग मंच में सिखा. थिएटर क्लास में अभिनय शिक्षा की शुरुआत के बाद मैं ने लंदन में आरडीए अभिनय इंस्टिट्यूट में दाखिला लिया. वहां मैं ने थिएटर, म्यूजिकल थिएटर और फिल्म का अध्ययन किया. वहां पूरी तरह प्रशिक्षित होने के बाद मैं इंडिया वापस आई एक बेहतरीन अभिनेत्री बनने का सपना ले कर. मेरा मकसद बतौर अभिनेत्री फिल्मों में अपनी अलग पहचान बनाना था.

अपनी पहली फिल्म ‘बीरबल ट्रिलौजी…’ के बारे में

इंडिया आने के बाद मेरा एक ही मकसद था फिल्मों में ऐक्टिंग के लिए कोशिश करना, जिस के लिए मैं औडिशन दे रही थी. उसी दौरान मैं मौडलिंग भी कर रही थी. तभी मेरी मुलाकात एक फिल्म कोऔर्डिनेटर से हुई. मैं ने उसे बताया कि मेरी फिल्मों में अभिनय करने में दिलचस्पी है. उस के बाद ही मुझे पहली फिल्म ‘बीरबल ट्रिलौजी…’ में काम करने का मौका मिला. चूंकि यह मेरी पहली फिल्म थी, अभिनय में मेरा पहला मौका था इसलिए मुझे खुशी के साथसाथ घबराहट भी थी.

लेकिन असल पहचान मुझे 2023 में रिलीज हुई फिल्म ‘सप्त सागरदाचे एलो साइड ए और बी’ से मिली. इस फिल्म के लिए मुझे सर्वश्रेष्ठ ऐक्ट्रैस क्रिटिक कन्नड़ फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला. इसी फिल्म की वजह से मुझे ‘कांतारा चैप्टर 1’ जैसा बड़ा औफर भी मिला. दरअसल, मैं ने कभी नहीं सोचा था कि मुझे इतनी बड़ी फिल्म औफर होगी, लेकिन जब ऐसा हुआ तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था. दरअसल, सप्तसागर दाचे के निर्माता रक्षित शेट्टी और कांतारा के ऋषभ शेट्टी दोस्त हैं. वे दोनों एकसाथ प्रीमियर में आए थे. वहीं पर मुझे सागरदाचे में अभिनय के लिए बहुत तारीफ मिली थी. उसी दौरान ऋ षभ शेट्टी ने मुझे ‘कांतारा चैप्टर 1’ के लिए पसंद कर लिया था. इस बात का पता मुझे 1 साल बाद लगा.

इस फिल्म में काम करना मेरे लिए बहुत बड़ा अवसर और चुनौती रहा है क्योंकि इस फिल्म में मेरा अभिनय मेरा भविष्य भी तय कर सकता है. इसी वजह से मैं ‘कांतारा चैप्टर 1’ को ले कर बेहद ऐक्साइटेड हूं. फिल्म इंडस्ट्री में मेरा कोई गौडफादर नहीं है आज मैं जो कुछ भी हूं अपनी मां और अपने परिवार के सहयोग से ही हूं. मेरी मां ने मुझे इतना सक्षम बना दिया है कि मैं अपने टेलैंट के दम पर अभिनय क्षेत्र में अपनी जगह बना सकती हूं. इंडस्ट्री में मेरा कोई गौडफादर नहीं है. मैं ने आज तक जो भी हासिल किया है अपने दम पर ही किया है. मेरी सब से बड़ी शुभचिंतक और गाइड करने वाली मेरी मां ही हैं.

ऐक्टिंग क्षेत्र में प्रगति को ले कर मेरी स्पीड भले ही स्लो रही है, लेकिन हर फिल्म से मैं ने कुछ न कुछ सीखा ही है और धीरेधीरे सफलता की सीढि़यां चढ़ रही हूं, जिस में ‘कांतारा चैप्टर 1’ मेरा सफलता की तरफ एक बढ़ता कदम है. साउथ इंडस्ट्री में हीरोइन के काम करने को ले कर जुड़ी कई तरह की बातों को ले कर प्रतिक्रिया कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री में मैं ने पिछले सालों में कुछ फिल्मों में काम किया है. इस के अलावा तमिलतेलुगू मैं भी काम कर चुकी हूं. इस दौरान मुझे कभी कोई ऐसा कड़वा अनुभव नहीं हुआ, जिस की वजह से मुझे अभिनय कैरियर छोड़ने के बारे में सोचना पड़ा हो.

मेरा मानना है कि अगर आप किसी भी इंडस्ट्री में काम करते हैं तो यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है कि आप को किन शर्तों पर काम करना है, क्या स्वीकार करना है और क्या नहीं. अच्छेबुरे लोग हर जगह होते हैं. यह आप पर निर्भर करता है कि आप उस के साथ कैसे डील करते हैं. जैसे मैं जहां भी काम करती हूं वहां पर सब से पहले माहौल देखती हूं कि मैं किन लोगों के साथ काम कर रही हूं. जब मुझे सब सही लगता है तभी मैं आगे बढ़ती हूं. साउथ इंडस्ट्री ने मुझे बहुत कुछ दिया है नाम, दाम और शोहरत. मेरे लिए साउथ इंडस्ट्री वरदान साबित हुई है.

बौलीवुड कलाकार और साउथ इंडस्ट्री के कलाकारों का एकसाथ काम करना फिल्म उद्योग में नई क्रांति लाने जैसा है

अगर मैं अपनी बात करूं तो मैं खुद बौलीवुड फिल्मों की प्रेमी हूं. मेरी हमेशा से ही इच्छा रही है कि मैं हिंदी फिल्मों में काम करूं. ऐसे ही साउथ के कई कलाकार हिंदी फिल्मों में काम करना चाहते है और हिंदी फिल्मों के कई कलाकार साउथ इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं. ऐसे में देखा जाए तो बौलीवुड कलाकार और साउथ इंडस्ट्री के कलाकारों का एकजुट होना फिल्म उद्योग में नई क्रांति ला सकता है.

दोनों इंडस्ट्री के दिग्गज लोगों का एकसाथ काम करना इंडियन फिल्म के लिए बहुत बेहतर है. यहां पर किसी को किसी से भी असुरक्षा की भावना नहीं है बल्कि एकदूसरे के प्रति प्यार और इज्जत की भावना है. तभी तो साउथ वाले हिंदी फिल्मों में और बौलीवुड वाले साउथ की फिल्मों में काम कर रहे हैं. फिल्म उद्योग के लिए यह एक अच्छी शुरुआत है.

हिंदी फिल्मों में काम करना मेरी बहुत बड़ी इच्छा है

मुझे हिंदी फिल्में देखना बहुत पसंद हैं और मेरी इच्छा है कि मैं हिंदी फिल्मों में काम करूं. फिलहाल मुझे कोई हिंदी फिल्म औफर नहीं हुई है लेकिन भविष्य में आप मुझे जरूर हिंदी फिल्म में काम करते हुए देखेंगे. मुझे उस वक्त बहुत खुशी हुई थी जब करण जौहर ने एक बार मेरी तारीफ की थी. फिल्म ‘सप्त सागरदाचे…’ के लिए तारीफ की थी. फिल्म मेकर करण जौहर की फिल्मों से मैं बहुत प्रभावित हूं खासतौर पर उन के द्वारा बनाई गई रोमांटिक फिल्में मेरी पसंदीदा फिल्में हैं. मेरी दिली तमन्ना है कि मैं ऐसी ही किसी रोमांटिक फिल्म में रोमांटिक किरदार निभाऊं.

‘कांतारा चैप्टर 1’ के अलावा अन्य फिल्मों के बारे में

‘कांतारा चैप्टर 1’ के अलावा मेरे पास कुछ और अच्छे प्रोजैक्ट्स हैं जैसे मैं साउथ ऐक्टर यश के साथ टौक्सिक फिल्म कर रही हूं. एक फिल्म एनटीआर जूनियर के साथ कर रही हूं. इस के अलावा कुछ और प्रोजैक्ट भी हैं जिन के लिए अभी बात चल रही है.

सोशल मीडिया पर यूथ क्रश कहलाने के बारे में

सोशल मीडिया पर मुझे यूथ क्रश का टैग मिलना मेरे लिए खुशी की बात है. सोशल मीडिया पर मुझे बहुत प्यार मिल रहा है. लोग मुझे पसंद कर रहे हैं जिस के लिए मैं उन की आभारी हूं. मेरे अभिनय कैरियर को आगे बढ़ाने में सोशल मीडिया का बहुत बड़ा योगदान है. उन के प्यार और इज्जत की वजह से ही आज मैं यहां तक पहुंची हूं. उस से भी ज्यादा खुशी मुझे तब होगी जब बतौर अभिनेत्री मैं एक सही मुकाम हासिल करूंगी और यह तभी संभव है जब तक मुझे दर्शकों का प्यार मिलता रहेगा.

फैस्टिवल सैलिब्रेशन को ले कर मैं हमेशा उत्साहित रहती हूं

इंडिया में इतने सारे फैस्टिवल्स हैं कि पूरा साल इन्हें मनाने में ही गुजर जाता है और मेरे लिए यह खुशी की बात है क्योंकि हर फैस्टिवल मुझे पौजिटिव ऐनर्जी देता है. मुझे ही नहीं सभी को फैस्टिवल आने पर खुशी महसूस होती है. जैसेकि अभी दीवाली आने वाली है और अभी से लोग दीवाली को ले कर ऐक्साइटेड हैं. पर्सनली मुझे भी दीवाली का त्योहार बहुत पसंद है और इस दिन मैं बहुत ऐंजौय करती हूं. सिर्फ दीवाली ही नहीं मुझे हर त्योहार मनाना पसंद है क्योंकि उस में मुझे खुशी मिलती है.

‘‘अभिनय से जुड़ना मेरे लिए और भी दिलचस्प रहा. नृत्य करने वाली मुद्राएं और हावभाव से हम भावनाओं को व्यक्त करने की कला जानते हैं, लेकिन रंगमंच के जरीए अभिनय को शब्द मिल जाते हैं. थिएटर में अभिनय सीखने के बाद भावनाओं को शब्दों के जरीए चेहरे से व्यक्त करने की कला मुझे अभिनय प्रशिक्षण के बाद आई…’’

Rukmini Vasanth

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें