Kahani In Hindi : दुविधा – क्या रघु को छोड़ पाई बुआ

Kahani In Hindi : कपड़े तहियाते हुए आरती के हाथ थम गए. उस की आंखें नेपथ्य में जा टंगीं. मन में तरहतरह के विचार उमड़नेघुमड़ने लगे. उसे लगा कि वह एक स्वप्नलोक में विचर रही है. उसे अभी भी विश्वास न हो रहा था कि पूरे 10 साल बाद उस का प्रेमी मिहिर फिर उस की जिंदगी में आया था और उस ने उस की दुनिया में हलचल मचा दी थी. वह बैंक में अपने केबिन में सिर झुकाए काम में लगी थी कि मिहिर उस के सामने आ खड़ा हुआ. ‘‘अरे तुम?’’ वह अचकचाई. उस चिरपरिचित चेहरे को देख कर उस का दिल जोरों से धड़क उठा.

‘‘चकरा गईं न मुझे देख कर,’’ मिहिर मुसकराया.

‘‘हां, तुम तो विदेश चले गए थे न?’’ उस ने अपने चेहरे का भाव छिपाते हुए पूछा,

‘‘इस तरह अचानक कैसे चले आए?’’

‘‘बस यों ही चला आया. अपने देश की मिट्टी की महक खींच लाई. तुम अपनी सुनाओ, कैसी गुजर रही है हालांकि मुझे यह पूछने की जरूरत नहीं है. देख ही रहा हूं कि तुम मैनेजर की कुरसी पर विराजमान हो. इस का मतलब है कि तुम्हारी तरक्की हो गई है. लेकिन लगता है कि तुम्हारे निजी जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया है. तुम वैसी ही हो जैसी तुम्हें छोड़ कर गया था.’’

‘‘हां, मेरे जीवन में अब क्या नया घटने वाला है? जिंदगी एक ढर्रे से लग गई है. सब दिन एकसमान, न कोई उतार, न चढ़ाव,’’ उस ने सपाट स्वर में कहा.

‘‘यह रास्ता तुम्हारा खुद का अपनाया हुआ है,’’ मिहिर ने उलाहना दिया, ‘‘मैं ने तो तुम्हें शादी का औफर दिया था. तुम्हीं न मानीं.’’

आरती कुछ न बोली.

‘‘अच्छा यह बताओ, लंच के लिए चलोगी? तुम से मिले अरसा हो गया. मुझे तुम से ढेरों बातें करनी हैं.’’

वे दोनों काफी देर तक रेस्तरां में बैठे रहे. बातों के दौरान मिहिर ने कहा, ‘‘आरती, मेरा भाई अमेरिका में रहता है. उस ने मुझे वहां बुलवा लिया. शुरू में काफी संघर्ष करना पड़ा पर अब मुझे अच्छी नौकरी मिल गई है. मुझे वहां की नागरिकता भी मिल गई है. मैं ने वहां अपना घर खरीद लिया है. केवल गृहिणी यानी पत्नी की कमी है. मैं ने अभी तक शादी नहीं की है. मैं अभी भी तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं. तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूं. इतने दिन तुम्हारी याद के सहारे जिया. अब मैं चाहता हूं कि हम दोनों विवाहबंधन में बंध जाएं. बोलो, क्या कहती हो?’’

‘‘अब मैं क्या बोलूं?’’ वह सिर झुकाए बोली.

‘‘वाह, तुम नहीं तो तुम्हारी जिंदगी के अहम फैसले क्या कोई और लेगा? आरती, तुम्हारा भी जवाब नहीं. तुम्हें कब अक्ल आएगी. मैं और तुम बालिग हैं, अपनी मरजी के मालिक. हमें अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का हक है.’’

‘‘मुझे सोचने का थोड़ा वक्त दो,’’ उस ने कहा.

‘‘हरगिज नहीं,’’ मिहिर ने दृढ़ता से कहा, ‘‘सोचविचार में तुम ने अपनी आधी जिंदगी गंवा दी. अब मैं तुम्हारी एक न सुनूंगा. तुम्हें फैसला अभी, इसी वक्त लेना होगा. अभी नहीं तो कभी नहीं.’’

आरती के मन में उथलपुथल मच गई. जी में आया कि वह तुरंत अपनेआप को मिहिर की बांहों में डाल दे और उस से कहे, मैं तुम्हारी हूं, तुम जो चाहे करो, मुझे मंजूर है. इस के सिवा उस के पास और कोई चारा भी तो न था. वह अपनी एकाकी गतिहीन जिंदगी से बहुत उकता गई थी. अब तक मांबाप का साया सिर पर था पर आगे की सोच कर वह मन ही मन कांप जाती थी. उसे एक सहारे की जरूरत शिद्दत से महसूस हो रही थी. उस ने तय कर लिया कि वह मिहिर का हाथ थाम लेगी. यह निर्णय लेते ही उस के सिर से एक भारी बोझ उतर गया. उस के मन में हिलोरें उठने लगीं.

‘‘ठीक है,’’ वह बोली.

उसे वह दिन याद आया जब मिहिर से पहली बार मिली थी. पहली नजर में ही वह उस की ओर आकर्षित हो गई थी. वह बड़ा हंसोड़ और जिंदादिल था. धीरेधीरे उन में नजदीकियां बढ़ती गईं और एक दिन मिहिर ने विवाह का प्रस्ताव किया. आरती के मन में रस की फुहार फूट निकली. वह भविष्य के सुनहरे सपनों में खो गई. लेकिन उस के मातापिता को उस का प्रेमप्रसंग रास न आया. उन्होंने मिहिर का जम कर विरोध किया. उन्हें मिहिर में खामियां ही खामियां नजर आईं. वह पिछड़ी जाति का था और गरीब घर से था. उन्होंने आरती को समझाने की कोशिश की कि मिहिर उस के लायक नहीं है और वह उस से शादी कर के बहुत पछताएगी. जब उन्होंने देखा कि आरती पर उन की बातों का कोई असर नहीं हो रहा है तो उन्होंने अपना आखिरी दांव चलाया, ‘ठीक है, यदि तू अपनी मनमरजी करने पर तुली है तो यही सही. तू जाने, तेरा काम जाने. लेकिन इस के बाद हमारातुम्हारा रिश्ता खत्म. हम मरते दम तक तेरा मुंह न देखेंगे.’ आरती बहुत रोईधोई पर पिता की बात मानो पत्थर की लकीर थी. और मां ने भी पिता की हां में हां मिलाई.

आरती के मन में भय का संचार हुआ. उस में इतनी हिम्मत न थी कि वह मांबाप से बगावत कर के, समाज की अवहेलना कर के मिहिर से शादी रचाती. वह उधेड़बुन करती रही, सोच में डूबी रही, आगापीछा सोचती रही. दिन बीतते गए और एक दिन मिहिर उस से नाराज हो कर, उस से नाता तोड़ कर उस की दुनिया से दूर चला गया. आरती के मातापिता ने उस के लिए और लड़के तलाश किए पर आरती ने सब को नकार दिया. वह तो मिहिर से लौ लगाए थी. यादों में खोई आरती को मिहिर की आवाज ने झिंझोड़ा, ‘‘मैं कल शाम को तुम्हारे घर आऊंगा. हम अपने भावी जीवन के बारे में बात करेंगे और मैं तुम्हारे मातापिता से भी मिल लूंगा. पिछली बार उन्होंने हमारी शादी में अड़ंगा लगाया था. आशा है इस बार उन्हें कोई आपत्ति न होगी.’’

‘‘नहीं, और होगी भी तो अब मैं उन की सुनने वाली नहीं हूं,’’ वह जरा हिचकिचाई और बोली, ‘‘केवल एक समस्या है.’’

‘‘वह क्या?’’

‘‘रघु की समस्या.’’

‘‘यह रघु कौन है? क्या वह मेरा रकीब है?’’

‘‘हटो भी,’’ आरती हंस पड़ी, ‘‘रघु मेरा भतीजा है. मेरे बड़े भाई का बेटा. कुल 12 साल का है.’’

‘‘तो उस के साथ क्या प्रौब्लम है?’’

‘‘तुम कल घर आ रहे हो न. वहीं पर बातें होंगी.’’

मिहिर आरती के यहां बरामदे में बैठा हुआ था. आरती ने उसे रघु के बारे में विस्तार से बताया. उस के भाई सुरेश ने एक अति सुंदर कन्या से प्रेमविवाह कर लिया था. वे अपने नवजात शिशु को ले कर मुंबई रहने चले गए थे जहां सुरेश की नौकरी लगी थी. पर किन्हीं वजहों से उन में अनबन रहने लगी और एक रोज उस की पत्नी उस से लड़झगड़ कर उसे छोड़ कर चली गई. साथ ही, बच्चे को भी छोड़ गई. सुरेश मजबूरन रघु को बैंगलुरु ले आया क्योंकि मुंबई में उसे देखने वाला कोई न था. ‘तू चिंता मत कर,’ पिता माधवराव ने उसे आश्वासन दिया, ‘बच्चे को यहां छोड़ जा, यह यहां पल जाएगा.’ उन्होंने बच्चे को आरती की गोद में डालते हुए कहा, ‘ले बिटिया, अब तू ही इसे पाल. हमेशा कुत्तेबिल्ली के बच्चों के साथ खेलती रहती है. यह जीताजागता खिलौना आज से तेरे जिम्मे.’

आरती ने शिशु को हृदय से लगा लिया. उस के दिल में ममता का स्रोत फूट निकला. उस नन्ही सी जान के प्रति उस के दिल में ढेर सारा प्यार उमड़ आया. वह सचमुच बच्चे में खो गई. वह बैंक से लौटती तो रघु की देखभाल में लग जाती. रघु भी उस से बहुत हिलमिल गया था और हमेशा उस के आगेपीछे घूमता रहता. वह उसे छोड़ कर एक पल भी न रहता था. कभीकभी रघु को कलेजे से लगा कर वह सोचती कि क्या यही मेरी नियति है? और लड़कियों की तरह उस ने भी सपने देखे थे. उस के हृदय में भी अरमान मचलते थे. वह भी अपना एक घरबार चाहती थी, एक सहचर चाहती थी जो उस को दुलार करे, उस के नाजनखरे उठाए, उस के सुखदुख में साथी हो. पर वह अपनी अधूरी आकांक्षाएं लिए मन ही मन घुटती रही. उसे लगता कि प्रकृति ने उस के साथ अन्याय किया है. और उस के अपनों ने भी उस की अनदेखी की है. सुरेश ने दोबारा शादी कर ली और उस ने रघु को अपने साथ ले जाना चाहा. ‘बेशक ले जाओ,’ माधवराव बोले, ‘तुम्हारी ही थाती है आखिर. इतने दिन हम ने उस की देखभाल कर दी. अब अपनी अमानत को तुम संभालो. मैं और तुम्हारी मां बूढ़े हो चले. अशक्त हो गए हैं. कब हमारी आंखें बंद हो जाएं, इस का कोई ठिकाना नहीं.’

रघु से बिछड़ने की कल्पना से ही आरती का दिल बैठने लगा. ‘यदि मुझे मालूम होता कि इस बालक से एक दिन बिछड़ना होगा तो मैं इस के मोहजाल में न फंसती,’ उस ने आह भर कर सोचा. और जब 7 साल के रघु ने सुना कि उसे मुंबई जाना होगा तो उस ने रोरो कर सारा घर सिर पर उठा लिया, ‘मैं हरगिज मुंबई नहीं जाऊंगा. वहां मेरा मन नहीं लगेगा. मैं बूआ को छोड़ कर नहीं रह सकता.’ पर उस की कौन सुनने वाला था. सुरेश उसे जबरन ले गया. आरती ने बताया कि जबतब रघु फोन पर बहुत रोता और झींकता था. उसे वहां बिलकुल भी अच्छा न लगता था. एक दिन अचानक सुरेश का फोन आया कि रघु गायब है. सुबह स्कूल गया तो घर नहीं लौटा. वे सब परेशान हैं और उसे तलाश कर रहे हैं. घर के लोग चिंतातुर टैलीफोन के इर्दगिर्द जमे रहे. सुबह द्वार की घंटी बजी तो देखा कि रघु खड़ा है, अस्तव्यस्त, बदहवास.

आरती ने दौड़ कर उसे लिपटा लिया.

‘अरे रघु बेटा, तू अचानक ऐसे कैसे चला आया?’

‘बूआ,’ रघु सिसकने लगा, ‘मैं घर से भाग आया हूं. अब कभी लौट कर नहीं जाऊंगा. मुझे वहां बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था. मैं वहां रोज रोता था.’

‘सो क्यों मेरे बच्चे,’ आरती ने उस का सिर सहलाते हुए पूछा.

‘मेरा वहां कोई दोस्त नहीं है. स्कूल से वापस आता हूं तो मां पढ़ने बिठा देती हैं. जरा सा खेलने भी नहीं देतीं. टीवी भी नहीं देखने देतीं. पापा के सामने मुझे प्यार करने का दिखावा करती हैं पर उन की पीठपीछे मुझे फटकारती रहती हैं.’

‘अच्छा, अभी थोड़ा सुस्ता ले. बाद में बातें होंगी.’

‘बूआ, मुझे बहुत भूख लगी है. मैं ने कल से कुछ नहीं खाया.’ उस ने उस का मनपसंद नाश्ता बना कर अपनी गोद में बिठा कर उसे खिलाते हुए कहा, ‘यह तो बता कि तू इस तरह बिना किसी को बताए क्यों भाग आया? तुझे पता है, घर में सब तेरी कितनी फिक्र कर रहे हैं?’ रघु ने अपराधी की तरह सिर झुका लिया. जब सुरेश को सूचना दी गई तो वह बहुत आगबबूला हुआ, ‘इस पाजी लड़के को यह क्या पागलपन सूझा? यहां ऐसा कौन सा कांटों पर लेटा हुआ था? नर्मदा दिनरात उस की सेवाटहल करती थी. सच तो यह है कि आप लोगों के प्यार ने इसे बिगाड़ दिया है. खैर, मैं आ रहा हूं उसे लेने.’ रघु ने सुना तो रोना शुरू कर दिया, ‘मैं हरगिज वापस मुंबई नहीं जाऊंगा. अगर आप लोगों ने मुझे जबरदस्ती भेजा तो फिर घर से भाग जाऊंगा और इस बार वापस यहां भी न आऊंगा.’

‘छि: ऐसा नहीं कहते. हम तेरे पिता से बात करेंगे. कुछ हल निकालेंगे.’

मिहिर ने आरती की ये बातें सुनीं तो बोला, ‘‘इतना तो मेरी समझ में आ गया कि तुम ने रघु को बचपन से पाला है और तुम्हारा उस से गहरा लगाव है पर देखा जाए तो वह तुम्हारी जिम्मेदारी तो नहीं है. तुम ने उस की जिंदगी का ठेका नहीं लिया है. इतने दिन तुम ने उसे संभाल दिया, सो ठीक है. अब उस के मातापिता को उस की फिक्र करने दो. तुम अपनी सोचो.’’ आरती के माथे पर पड़े बल को देख कर उस ने झुंझला कर कहा, ‘‘आरती, मैं तुम्हें समझ नहीं पा रहा हूं. हमेशा दूसरों के लिए जीती आई हो. कभी अपने लिए भी सोचो. यह जीना भी कोई जीना है? बस, मैं ने कह दिया, सो कह दिया, कल हम कचहरी जाएंगे. तुम तैयार रहना.’’

‘‘ठीक है,’’ आरती ने कहा. उस ने एक विश्वास छोड़ा. वह मिहिर को कैसे समझाए कि अपना न होते हुए भी वह भावनात्मक रूप से रघु से जुड़ी हुई है. उस बालक ने मां की ममतामयी गोद न जानी. उस ने पिता का स्नेह व संरक्षण न पाया. आरती ही उस के लिए सबकुछ थी. आरती का उदास चेहरा देख कर मिहिर द्रवित हुआ, ‘‘आरती, अगर तुम रघु से बिछड़ना नहीं चाहतीं तो एक उपाय है. हम कानूनन रघु को गोद ले सकते हैं.’’

‘‘क्या यह संभव है?’’

‘‘क्यों नहीं. अमेरिका से कई संतानहीन दंपती भारत के अनाथालयों से अनाथ बच्चों को गोद लेते हैं. हां, इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है. बहुत कागजी कार्यवाही करनी पड़ती है, बहुत दौड़धूप करनी पड़ती है. अगर तुम चाहो और सुरेश इस के लिए राजी हो तो इस के लिए कोशिश की जा सकती है.’’

‘‘तुम इतना सब करोगे मेरे लिए?’’

‘‘हां, क्यों नहीं. एक प्रेमी अपनी प्रेयसी के लिए कुछ भी कर सकता है.’’

आरती ने उसे स्नेहसिक्त नेत्रों से देखा. मिहिर उसे एकटक देख रहा था. उस की आंखों में कुछ ऐसा भाव था कि वह शरमा गई.

‘‘मैं तुम्हारे लिए चाय लाती हूं.’’

आरती ने चाय बना कर रघु को आवाज दी, ‘‘बेटा, जरा यह चाय बाहर बरामदे में बैठे अंकल को दे आओ. मैं कुछ गरम पकौड़े बना कर लाती हूं.’’

‘‘अंकल चाय,’’ रघु ने कहा.

‘‘थैंक यू. आओ बैठो. तुम रघु हो न?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘तुम्हारी बूआ ने तुम्हारे बारे में बहुतकुछ बताया है. सुना है कि तुम पढ़ने में बहुत तेज हो. हमेशा अपनी क्लास में अव्वल आते हो.’’

‘‘जी.’’

‘‘अच्छा यह तो बताओ, तुम अमेरिका में पढ़ना चाहोगे?’’

‘‘मैं अमेरिका क्यों जाना चाहूंगा जबकि यहां एक से बढ़ कर एक अच्छे स्कूल हैं.’’

‘‘हां, यह तो है पर वहां तुम अपनी बूआ के साथ रह सकोगे.’’

‘‘बूआ का साथ कितने दिन नसीब होगा? एक न एक दिन तो मुझे उन से अलग होना ही पड़ेगा. स्कूली शिक्षा के बाद पता नहीं कौन से कालेज में, किस शहर में दाखिला मिलेगा.’’ मिहिर के जाने के बाद आरती ऊहापोह में पड़ी रही. उस की जिंदगी में भारी बदलाव आने वाला था. वह अपने कमरे में सोच में डूबी हुई बैठी थी कि रघु उस के पास आया, ‘‘बूआ, मैं तुम से एक बात कहना चाह रहा था.’’

‘‘बोल बेटा.’’

‘‘मैं बोर्डिंग में रह कर पढ़ना चाहता हूं.’’

‘‘अरे, सो क्यों?’’

‘‘मेरे कुछ दोस्त ऊटी के स्कूल में पढ़ने जा रहे हैं. वे मुझे बता रहे थे कि चूंकि मैं ने हमेशा अपनी क्लास में टौप किया है, मुझे आसानी से वहां दाखिला मिल सकता है. बूआ, मेरा बड़ा मन है कि मैं अपने साथियों के साथ उसी स्कूल में पढ़ूं. तुम मेरी मदद करोगी तो यह संभव होगा.’’

‘‘तू सच कह रहा है?’’

‘‘हां बूआ, बिलकुल सच.’’

आरती का मन हलका हो गया. उस ने सपने में भी न सोचा था कि उस की समस्याओं का हल इतनी आसानी से निकल आएगा. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि रघु की स्कूली पढ़ाई समाप्त हो जाने पर वह उसे अपने पास बुला लेगी. वह तुरंत मिहिर को फोन करने बैठ गई. रघु उस के पास ही मंडराता रहा. उस ने बूआ और मिहिर की बातें सुन ली थीं. वह जान गया था कि बूआ और मिहिर एकदूसरे को चाहते हैं और विवाह करना चाहते हैं और उस ने अचानक आ कर बूआ को उलझन में डाल दिया था.

उस ने सहसा बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने का निश्चय कर लिया. और सोच लिया कि यदि वहां दाखिला न मिला तो वह मुंबई चला जाएगा. उस ने पलक मारते तय कर लिया कि वह अपनी बूआ की खुशियों के आड़े नहीं आएगा. उस ने अपनी बूआ को करीब से देखा और जाना है. उसे उन के दर्द और तड़प का एहसास है. उस ने बचपन से ही देखा है कि किस तरह उस की बूआ ने पगपग पर सब की मरजी के आगे सिर झुकाया है. वे कितना रोई और कलपी हैं.

क्या रघु भी औरों की तरह बनेगा? नहीं, वह इतना निष्ठुर नहीं बनेगा. वह अपनी बूआ के प्रति संवेदनशील है. वह हमेशा उन का ऋणी रहेगा. उस का रोमरोम बूआ का आभारी है. यदि बचपन में उन्होंने उस की सारसंभाल न की होती तो पता नहीं आज वह किस हाल में होता. उस ने मन ही मन ठान लिया कि वह भरसक कोशिश करेगा कि अपनी बूआ का आगामी जीवन सुखमय बनाए.

Story In Hindi : मन का बोझ – समाज के लिए बदली अपनी ज़िंदगी

Story In Hindi : पार्टी में अनुपम का उत्साह देख शुभा उसे आश्चर्य से देखती रह गई. वह सोच रही थी, क्या यह वही अनुपम है जिसे हर समय कोई न कोई काम रहता है, जो सुबह तड़के ही जब सब अभी मीठी नींद में होते, एक बार जा कर बांध स्थल पर चल रहे निर्माणकार्य का निरीक्षण भी कर आता. रात को भी भोजन के बाद रात की पारी वालों का कार्य देखने के लिए वह बिना नागा कार्यस्थल पर अवश्य जाता, तब कहीं उस की दिनचर्या पूरी होती. यदि काम में कोई समस्या आ जाती तब तो वह उसे निबटा कर ही रात के 2 बज गए.

मगर उस पार्टी में अनुपम को इतने उत्साह में देख शुभा हैरान थी. वह उस के भाई मनोज से बहुत हंसहंस कर बातें कर रहा था. शुभा अनुपम द्वारा उसे किए गए अभिवादन के स्टाइल पर गदगद थी.

कालेज जाने से पहले शुभा सुबह अंधेरे उठती, नहाधो कर अम्मां की आज्ञानुसार ध्यान करने बैठती, पर इन दिनों जब वह आंखें मूंदती तो अनुपम का वही मुसकारता चेहर उस की बंद आंखों के आगे आ खड़ा होता और वह घबरा कर आंखें खोल देती.

वह भोर के हलकेहलके प्रकाश में आंगन के पीछे का द्वार खोल बगीचे में टहलने लगती और उस की आंखें क्षणप्रतिक्षण अनुपम के द्वार की ओर उठ जातीं. कान उस की जीप की आवाज पर लगे रहते. वह सोचती, अनुपम अभी कार्यस्थल पर जाने वाला होगा और ज्यों ही जीप के चालू होने की आवाज आती वह उस की एक झलक देख ऐसी खिल उठती मानो उसे कोई खजाना मिल गया हो. उस के चले जाने पर वह घबरा कर सोचने लगती, आखिर यह उसे क्या होता जा रहा है?

सांझ को अनुपम कभीकभी मनोज के साथ लौटता. कभी 2 मिनट को शुभा के घर पर भी रुकता. कभी बाहर से ही मनोज को छोड़ कर चला जाता. तब शुभा का मन निराशा से भर जाता. वह अपनेआप को फटकारती कि अनुपम से उसे क्या लेनादेना?

अनुपम उस रात अपने पड़ोस के मित्र के यहां रात्रि के भोजन पर चला गया था. शुभा को लौन से उस के हंसनेबोलने की आवाजें सुनाई देती रहीं तो वह देर तक घर के साथ वाले पार्क में टहलती उस की आवाज सुनती रही. उसे लगता रहा मानो अनुपम अपने मित्र से नहीं वरन उसी से बातें कर रहा है. वह रात देर तक उस के घर लौटने की प्रतीक्षा करती रही. रात के अंधेरे में उसे पार्क में यह डर भी न रहा कि कहीं कोई कीड़ा निकल कर काट ले तो.

जब अनुपम अपने मित्र के यहां से लौट कर अपने घर जाता दिखा तो शुभा खुशी से नाच उठी. अनुपम की पीठ देख कर ही उसे लगा कि उस ने सब कुछ पा लिया है. वह सोचने लगी कि काश, इस चांदनी से भीगी रात में अनुपम एक  बार मुड़ कर पीछे उस की ओर देख लेता. पर अनुपम बिना मुड़े तेज कदमों से अपने घर चला गया. उसे क्या पता था कि प्रतीक्षा में आतुर किसी की आंखें उस का पीछा कर रही हैं.

अगले दिन अनुपम मनोज के साथ शुभा के घर आया. मनोज ने आवाज देते हुए पुकारा, ‘‘शुभा देख, आज मेरे साथ अनु भाई आए हैं. तू ने नाश्ते में जो भी बनाया है, जल्दी से ले कर आ.’’

अनुपम ने शुभा की बनाई चीजों की खूब प्रशंसा की. वह बड़े उल्लास से कह रहा था, ‘‘आप इतनी स्वादिष्ठ चीजें बनाती हैं तभी तो मनोज कहीं बाहर जाने का नाम भी नहीं लेता. भाई मनोज, तुम खुशहाल हो, जो ऐसी होशियार बहन मिली है.’’

खाने के बाद अनुपम ने प्रस्ताव रखा, ‘‘मनोज, चलो आज अम्मां और शुभा को बांध स्थल का कार्य दिखा लाएं. वहां की मशीनों की घड़घड़ाहट और दिनरात चल रहे कार्य को देख इन्हें अच्छा लगेगा. हम लोग उधर अपना काम भी देखते आएंगे. मुझे तो अभी एक बार रात में भी जाना है.’’ शुभा को डर था कि कहीं उस के मन की बात भैया या अनुपम पर प्रकट तो नहीं हो गई. अतएव वह न जाने के लिए अपनी परीक्षा का बहाना ले बैठी. पर अनुपम और मनोज के आगे उस की एक न चली. अनुपम ने उसे बांध पर हो रहे कार्य के बारे में सब कुछ बताया और दिखाया कहां बांध बनेगा, कहां से नदी की धारा को मोड़ दिया गया है, कैसे नींव के पानी को बड़े पंपों द्वारा निकाला जा रहा है तथा कहां बांध की नींव को भरने के लिए कंक्रीट के पत्थर तैयार हो रहे हैं.

तेजी से चले रहे कार्य तथा अनुपम के उस में योगदान को देख शुभा मन ही मन उस के प्रति और आकृष्ट हो गई. अनुपम ने कहा, ‘‘आइए, आप लोगों को एकदम पास से वह नदी दिखला लाएं, जिस पर बांध बन रहा है.’’

वे सब एक छोटी सी नाव में बैठ कर नहर के उस पार पहुंच गए. वहीं रात हो गई. सब नदी तट पर बैठ नदी के शीतल जल में पांव डाले उस अंधेरी रात में बांधस्थल पर चल रहे कार्य तथा उस की तेज जगमगाती रोशनियों को देखते रहे. बात करते हुए सब ने नदी में दूर तक पत्थर फेंकने का अभ्यास किया. अनुपम का फेंका हुआ पत्थर सब से दूर तक पहुंचा. शुभा मन ही मन कह उठी कि यहां भी तुम ही सब से आगे निकले. उस दिन अनुपम की जीप खराब थी. अतएव कार्यस्थल पर जाने के लिए वह मनोज की मोटरसाइकिल लेने आया. शुभा ने कल्पना की कि अनुपम कुछ क्षण अवश्य ही उस के घर रुकेगा, पर वह नहीं रुका और मोटरसाइकिल लेते ही तुंरत अपने कार्य पर चला गया. शुभा का मन हुआ कि  वह उसे कुछ देर बैठने को कहे, पर वह संकोचवश कह न सकी. उस का मन अनुपम के जाने से बेहद उदास हो गया. वह सोचने लगी कि कैसा है यह पुरुष जिसे अपने कार्य के आगे कुछ भी याद नहीं रहता. शुभा के कालेज में वार्षिकोत्सव था. उस में शुभा के गायन का भी कार्यक्रम था.

शुभा ने मनोज से अनुपम को ले कर उत्सव में आने का वचन ले लिया था. मनोज कार्यक्रम आरंभ होने से पहले आ भी गया, यह शुभा ने देख लिया था, पर भैया के साथ अनुपम को न आया देख उसे बड़ी निराशा हुई. वह सोच रही थी अनुपम अवश्य अपने कार्य में व्यस्त होता और फिर उसे शुभा के गायन से क्या लेनादेना. अपना गीत गा कर शुभा सब से पीछे आ अपनी सहेलियों के साथ बैठ गई. अनुपम का न आना उसे खल रहा था.

तभी सहेलियों से बात करते हुए उस ने मुड़ कर जो एक नजर डाली तो देखा अनुपम अपनी आंखों में असीमित प्रशंसा के भाव लिए उसे ही देख रहा है. कार्यक्रम समाप्त होने पर बाहर आते हुए अनुपम ने कहा, ‘‘आप की आवाज तो बहुत ही मधुर है. मैं तो कुछ क्षणों के लिए आप के मधुर गायन में खो ही गया था. आप इतना अच्छा गाती हैं यह तो मैं जानता ही न था.’’ अब प्राय: शाम को अनुपम मनोज के साथ शुभा के घर आने लगा था. शुभा भी रोज खाने की नईनई चीजें बना कर रखती और भैया और अनुपम उस की बनाई चीजों की प्रशंसा करते न अघाते.

गरमियों के दिन आ गए थे. वे तीनों लौन की हरी शीतल घास पर बैठे बहुत रात गए तक बातें करते. रात के अंधेरे में भी शुभा को लगता कि अनुपम की टोही आंखें उस के चेहरे पर टिकी हुई न जाने क्या खोजने लगती हैं और तब वह घबरा कर दूसरी ओर देखने लग जाती. अनुपम की खिली हुई हंसी से सारा वातावरण महकने लगता. दिन न जाने कितनी तेजी से पर लगा कर निकलने लगे. सां?ा ढलते ही शुभा अनुपम के आने की बाट जोहने लगती.

अनुपम की आंखों में छाए नेह निमंत्रण को शुभा पहचान गई. फिर वह स्वयं भी तो उस के कितने निकट आ गई थी. पर वह अपने बारे में कैसे अनुपम को सबकुछ बताए. शुभा ने सोचा, अनुपम को सबकुछ बता ही देना चाहिए, वह क्यों अंधेरे में रहे. उस दिन शुभा ने अंतत: साहस बटोर कर अनुपम को एक पत्र लिखा: ‘‘आप आकाश में खिले हुए एक उदीयमान नक्षत्र हैं और मैं एक धूलधूसरित कुचली हुई स्त्री हूं, जो कभी भी ऊपर उठने का साहस नहीं कर सकती. मैं आप के योग्य नहीं. मैं एक विधवा हूं, जिसे हमारा समाज न तो प्यार करने का अधिकार देता है और न विवाह करने का ही. फिर भी आप के इस प्रभावशाली व्यक्तित्व को इस जीवन में भूल पाना संभव नहीं.’’ 2 दिन तक शुभा पत्र को अपने पास ही रखे रही. वह उसे अनुपम को देने का साहस न बटोर पाई. पर फिर एक दिन कालेज जाते हुए पत्र को अनुपम के घर के बाहर लगे डाक बक्से में डालती हुई चली गई. पत्र तो वह दे आई, पर विचारों के ?ां?ावात ने उसे बुरी तरह ?ाक?ोर डाला. 2 दिन तक अनुपम घर नहीं आया. इस से शुभा विचारों की ऊहापोह में बुरी तरह उल?ा गई. वह सोचती, अनुपम पर उस पत्र की न जाने क्या प्रतिक्रिया हुई हो… शायद वह अब कभी भी उस के घर न आए और अगर कहीं वह पत्र ले जा कर भैया को ही दे दे तो? वह भय से कांप उठी. भैया के आगे वह कैसे सिर उठा पाएगी? मां उसे क्या कुछ नहीं कहेंगी. उसे तो घुटघुट कर मर जाना होगा. यदि अनुपम नहीं भी आया तो वह जीवनभर उसे भूल सकेगी? उस के सर्वांगीण व्यक्तित्व से वह पूर्णतया अभिभूत हो चुकी थी. अनुपम को पत्र अवश्य ही बुरा लगा तभी तो वह 2 दिन से नहीं आया.

2 दिन बाद सांझ को अनुपम शुभा के घर आया तो वह बहुत गंभीर दिख रहा था. शुभा उस की सूरत देखते ही सहम गई. वह आते ही बोला, ‘‘शुभा क्षमा करना. कार्य की अधिकता से जल्दी नहीं आ सका. मैं अपनेआप को खुशहाल मानता हूं कि मुझे  तुम जैसी विवेकशील नारी का स्नेह मिला है… मैं मनोज से तुम्हें अपने लिए मांगना चाहता हूं.’’‘‘यह क्या कहते हो, अनुपम?’’ कांपते स्वर में शुभा बोली, ‘‘यह असंभव है. यह कभी नहीं हो सकता. हमारा हिंदू समाज कभी इस की स्वीकृति नहीं देगा. मां भी इसे कभी नहीं मानेंगी. भैया का दिल टूट जाएगा. आप इतने योग्य हैं, इतने ऊंचे पद पर हैं कि आप को तो बड़ी आसानी से सुंदर और योग्य पत्नी मिल जाएगी. मुझ में है ही क्या?’’

‘‘तुम समझती हो, शुभा कि तुम योग्य नहीं हो? तुम अपने को नहीं जानती. मैं ने इतने दिनों में तुम्हें अच्छी तरह जाना और परखा है. हमारे विचार, स्वभाव और रुचियां समान हैं. हम एकदूसरे को अच्छी तरह से समचुके हैं. मैं समझता हूं कि हमारा वैवाहिक जीवन बहुत ही मधुर होगा.

‘‘आज के इस प्रगतिशील युग में किसी एकदम अनजान लड़की से विवाह करना अंधेरे में टटोलना जैसा ही है. तुम विधवा हो यह तो मैं बहुत पहले से जानता था. फिर यह कोई तुम्हारा दोष तो नहीं है.’’

तब तक मां बाहर आ गईं. शुभा और अनुपम की धीमे स्वरों में हो रही बातों की भनक उन के कानों में पड़ चुकी थी. वे गुस्से से बोलीं, ‘‘कुछ तो शर्म कर, क्यों उस बड़े भाई की इज्जत उछालने पर तुली है, जो तुझे जान से ज्यादा चाहता है. उस का घर भी बसने देगी या अपना उजाड़ कर अब उस का भी घर न बसने देने का इरादा है?’’ तब तक मनोज स्वयं बाहर आ गया. मुसकराते हुए बोला, ‘‘अनुपम, तुम मां की बातों का बुरा न मानना, उन्हें क्षमा कर देना. मैं ने तो शुभा के विवाह के लिए विज्ञापन भी दे दिया था.’’

मां की ओर मुड़ते हुए मनोज बोला, ‘‘मां, तुम यह क्या सोचती हो? क्या मैं अपनी बहन का विवाह करने से पहले अपना कराऊंगा. नहीं, कभी नहीं. मैं शुभा के विवाह के लिए चिंतित हूं. वह विधवा हो गई तो क्या उस का मन भी मर गया है? अभी उस की उम्र ही क्या है? पूरी पहाड़ सी जिंदगी अकेले बिना किसी सहारे के वह कैसे काट पाएगी?’’ मां की बात सुन शुभा परकटे पक्षी की भांति विवश वहीं खड़ी रह गई थी. अब भैया की बात सुन कर उस में साहस का संचार हुआ. भैया के उदार दृष्टिकोण पर उस की आंखों से आंसू बह निकले. मां हैरान हो कर बोलीं, ‘‘मनोज, तुम ने मुझ से कुछ भी नहीं पूछा. अभी तक हमारे कुल में ऐसी अनहोनी बात नहीं हुई.’’

‘‘मां, मैं समझता हूं कि मैं जो कर रहा हूं वह बिलकुल उचित है. मैं ने इसीलिए तुम से राय लेने की आवश्यकता नहीं समझ. तुम अनुपम और शुभा को प्रसन्न मन से सुखी होने का आशीर्वाद दो. यह जीवन संवारने का मंगलमय पर्व है, अनहोनी नहीं.’’ ‘‘आओ, अनुपम, चलो अंदर बैठते हैं शुभा के लिए तुम जैसे योग्य और प्रतिभावान युवक को पा कर मैं आज परम प्रसन्न हूं. तुम ने मेरे मन से बहुत बड़ा बोझ हटा दिया है. हमारे समाज को तुम्हारे जैसे प्रगतिशील युवकों की आवश्यकता है. तुम पर मुझे गर्व है.’’

Kitchen Waste Composting : किचन वेस्ट का इन तरीकों से करें स्मार्ट प्रयोग

Kitchen Waste Composting : आज के समय में जैविक खेती और घर में किचन गार्डनिंग का चलन तेजी से बढ़ रहा है. लोग अपने गमलों में हरीभरी सब्जियां और फूल उगाना चाहते हैं. लेकिन प्रौब्लम तब आती है जब खाद की बात आती है. प्लांट लवर अपनी किचन से खाद बनाने की सोच तो रखता है लेकिन उसका लंबा प्रोसैस देख कर परेशान हो जाता है क्योंकि महीनाभर कचरे को बालटी में जमा करना पड़ता है.

इस से बदबू आती है, मक्खियां मंडराने लगती हैं और पूरा वातावरण गंदा हो जाता है. मगर अब समय है इस झंझट को खत्म करने का. हम आप को बताएंगे एक ऐसा तरीका जिस से आप किचन वेस्ट से बना सकते हैं इंस्टैंट और दमदार कंपोस्ट और वह भी बिना बदबू और सड़ांध के.

क्यों जरूरी है किचन वेस्ट से खाद बनाना

रोजाना हमारी किचन में जो जैविक कचरा निकलता है जैसे फलसब्जियों के छिलके, चायपत्ती, अंडे के छिलके, प्याजलहसुन के छिलके, हड्डियां इन सब में बहुत न्यूट्रिशन होता है. अगर इन्हें सीधा फेंक दिया जाए तो ये न केवल प्रदूषण बढ़ाते हैं बल्कि पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह होते हैं. वहीं अगर इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो ये आप के पौधों के लिए सुपरफूड बन सकते हैं.

पुराने तरीके की परेशानी

पारंपरिक खाद बनाने के तरीके में महीनभर कचरे को बालटी या ड्रम में इकट्ठा करना पड़ता है. उस में समयसमय पर गोबर, सूखे पत्ते, मिट्टी आदि डाल कर मिलाना होता है. यह प्रोसैस लंबा होता है और इस में बदबू भी आती है, साथ ही मक्खियों और कीड़ों की समस्या हो जाती है.

यही वजह है कि कई लोग खाद बनाना छोड़ देते हैं. मगर अब एक नया तरीका है इंस्टैंट लिक्विड कंपोस्ट.

इंस्टैंट कंपोस्ट क्या है

इंस्टैंट कंपोस्ट एक ऐसा तरीका है जिस में आप को किचन वेस्ट को सड़ाने की जरूरत नहीं होती. आप ताजे कचरे को भिगो कर या उबाल कर उस का लिक्विड तैयार करते हैं और उसी दिन से उस का उपयोग पौधों में कर सकते हैं.

इस में न तो गंध आती है, न ही मक्खियों की समस्या होती है, साथ ही यह प्रक्रिया पूरी तरह प्राकृतिक भी है और पौधों के लिए तुरंत असरदार भी.

प्याज के छिलके छिपा हुआ पौधों का टौनिक

प्याज के छिलकों को अकसर लोग कूड़े में फेंक देते हैं लेकिन ये छिलके पोटैशियम, कैल्सियम और सल्फर से भरपूर होते हैं. अगर आप इन्हें पानी में कुछ दिन भिगो कर रखें तो यह एक बहुत ही असरदार लिक्विड फर्टिलाइजर बन जाता है. इसे बनाने का तरीका आसान है. आप खाली पड़ी किसी बोतल में पानी भर कर प्याज के छिलके डालें 3-4 दिन के लिए ढक कर रख दें.

जब पानी हलका भूरा या लाल हो जाए तो छान लें. इस पानी को आप डायल्यूट कर के यानी 1 लिटर कंपोस्ट में 5 लिटर पानी मिला कर हफ्ते में 1 बार पौधों में डालें. इस से आप के पत्तेदार पौधों जैसे- क्रोटोन, अजवायन, एरेका पाम, मनी प्लांट में हरे और चमकदार पत्ते आएंगे. फूलफल के पौधों में भी फलफूल बढ़ेंगे, साथ ही मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है.

फलसब्जियों के छिलकों का पानी केले, टमाटर, सेब, आलू आदि के छिलकों को अगर पानी में भिगोया जाए तो उन से भी पौधों के लिए पोषक घोल तैयार होता है. इन्हें बनाने का तरीका भी प्याज के छिलकों जैसा ही है.

केला

केले के छिलके पोटैशियम, मैग्नीशियम और फास्फोरस के अच्छे स्रोत हैं. इन से फल ज्यादा आते हैं और जड़ें मजबूत होती हैं. इन्हें छोटेछोटे टुकड़ों में काट कर पानी में डालें और 1-2 दिन के लिए छोड़ दें. फिर उस पानी को पौधों में डालें. यह फूलों और फलदार पौधों के लिए बहुत अच्छा होता है.

टमाटर और सेब

इन के छिलकों में ऐटीऔक्सीडैंट्स होते हैं. ये पौधों को रोगों से बचाते हैं. टमाटर के छिलकों को उबाल कर उन का पानी छान लें और ठंडा कर के डालें. यह एक तरह से टौनिक की तरह काम करता है.

अंडे के छलकों का उपयोग

उबले अंडों के छिलकों को आप सुखा कर हाथों से चूरा बना कर या मिक्सी में ब्लैंड कर के सीधे पौधों में डाल सकती हैं. अंडे के छिलके में भरपूर कैल्सियम होता है और यह मिट्टी के पीएच बैलेंसिंग का भी काम करता है.

कंपोस्ट के लिए ध्यान रहे

कभी नमक या मसाले मिले कचरे का उपयोग न करें.

पका खाना खाद में न डालें

तेज धूप में इस खाद को रखने से इस की गुणवत्ता कम हो सकती है, खाद वाली बोतल को हमेशा शेड वाली जगह ही रखें.

सप्ताह में 1 या 2 बार ही इस लिक्विड खाद का उपयोग करें.

अगर आप पानी में छिलके न डुबोना चाहें तो एक और उपाय कर सकती हैं. आप चाहें तो अपने कचरे को जैसे प्याज, आलू, केले, संतरे, नींबू, टमाटर जैसी सभी फलसब्जियों के छिलके, अंडे, यूज्ड चाय जैसी चीजों को धूप में अच्छे से सुखा लें, फिर उन को मिक्सर में ब्लैंड कर के सूखे डब्बे में स्टोर करें. महीने में 2 बार 1-1 चम्मच अपने पौधों में डालें. आप खाने के बाद बची बोन्स को भी इसी तरह इस्तेमाल कर सकती हैं. उन्हें पहले धो कर अच्छे से सुखा लें और फिर पीस कर 1-1 चम्मच गमलों में इस्तेमाल करें.

अब खाद बनाने के लिए महीनेभर का इंतजार करने की जरूरत नहीं. आप इंस्टेंट और दमदार कंपोस्ट से अपने पौधों को तुरंत पोषण दे सकती हैं. बस थोड़ी सी समझदारी और नियमितता से आप अपनी किचन वेस्ट को कचरा नहीं बल्कि खजाना बना सकती हैं. न बदबू, न मक्खियां और न कोई झंझट. सिर्फ शुद्ध, नैचुरल और असरदार कंपोस्ट.

इंस्टैंट खाद बनाने के आसान उपाय

अगर आप चाहती हैं बिना बदबू और मक्खियों के किचन वेस्ट से कंपोस्ट बनाना तो इन स्टैप्स को अपनाएं:

सब से पहले किचन वेस्ट को अलग रखें. सूखे पेपर या मोटे गत्ते को आप फाड़ छोटे टुकड़ों में करें और मलचिंग के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं.

तैयार किचन वेस्ट फर्टिलाइजर को छान कर उस का लिक्विड पौधों में डालें. सीधे जड़ों में या स्प्रे कर के पत्तों पर भी डाल सकती हैं.

बचे हुए हिस्से को गमले की मिट्टी में मिलाएं. पानी को छानने के बाद जो छिलके बचते हैं उन्हें आप गमले की मिट्टी में दबा दें. ये धीरेधीरे डीकंपोज हो जाएंगे और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाएंगे.

Vaginal Health : वेजाइनल दर्द को न करें नजरअंदाज, हो सकती है किसी बीमारी की शुरुआत

Vaginal Health :  महिलाओं की वेजाइना से जुड़ी हलकीफुलकी तकलीफें कभीकभी किसी बड़ी बीमारी का संकेत होती हैं, जिन का उपचार समझदारी और समय रहते किया जा सकता है.

बौडी : वेजाइना महिलाओं के शरीर का एक संवेदनशील और अहम हिस्सा है, जिस की सेहत पर पूरा प्रजननतंत्र निर्भर करता है.

सीके बिरला अस्पताल, गुरुग्राम में औब्सटेट्रिक्स ऐंड गायनोकोलौजी स्पैशलिस्ट, डाक्टर अरुणा कालरा के मुताबिक, अगर वेजाइना से असामान्य डिस्चार्ज हो रहा है, जलन हो रही है या बारबार इन्फैक्शन होता है, तो ये सामान्य नहीं हो सकता। वेजाइनल डिस्चार्ज, बदबू, खुजली, सूजन और दर्द जैसे लक्षण छोटी समस्याओं से ले कर बड़ी बीमारियों जैसे पीसीओडी, यौन संक्रमण या यहां तक कि सर्वाइकल कैंसर की ओर इशारा कर सकते हैं. लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है, समय रहते अगर इन संकेतों को समझ लिया जाए, तो आप वेजाइना की हैल्थ को बनाए रख सकती हैं और किसी भी बड़ी परेशानी से बच सकती हैं.

सामान्य और असामान्य वेजाइनल डिस्चार्ज में फर्क जानें

हर महिला को वेजाइनल डिस्चार्ज होता है, जो शरीर को साफ रखने का एक प्राकृतिक तरीका है. लेकिन जब यह डिस्चार्ज पीला, हरा या दुर्गंध वाला हो, तो चिंता की बात हो सकती है. जलन, खुजली या पेन के साथ डिस्चार्ज होना संक्रमण, यीस्ट इन्फैक्शन या यौन संचारित रोग (एसटीआई) का संकेत हो सकता है. अगर ये लक्षण लगातार बने रहें, तो बिना देरी डाक्टर से सलाह लें.

बारबार होने वाला इन्फैक्शन एक चेतावनी है

अगर हर महीने या थोड़ेथोड़े समय में बारबार वेजाइना में इन्फैक्शन हो रहा है, तो यह सामान्य नहीं है. यह शरीर की इम्युनिटी में कमी, हार्मोनल असंतुलन या पीसीओडी जैसे रोगों की शुरुआत का संकेत हो सकता है. इस के अलावा साफसफाई की कमी या गलत अंडरगारमैंट्स का इस्तेमाल भी कारण हो सकता है। बारबार इन्फैक्शन को हलके में न लें, विशेषज्ञ की राय लें.

वेजाइनल दर्द को नजरअंदाज करना हो सकता है खतरनाक

महिलाएं अकसर वेजाइनल दर्द को पीरियड्स या थकान से जोड़ कर अनदेखा कर देती हैं. लेकिन अगर यह दर्द लगातार हो रहा है या सैक्स के दौरान होता है, तो यह ऐंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रौइड या सर्वाइकल इन्फैक्शन जैसे रोगों की ओर इशारा कर सकता है.

दर्द अगर रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है, तो बिना झिझक डाक्टर से जांच कराएं.

हैल्दी वेजाइना के लिए क्या है जरूरी

वेजाइना को हैल्दी बनाए रखने के लिए साफसफाई बेहद जरूरी है. हमेशा कौटन के अंडरवियर पहनें, हार्श कैमिकल वाले साबुन या स्प्रे का इस्तेमाल न करें और पीरियड्स के दौरान पैड को समय पर बदलें.  ज्यादा मीठा खाना और टाइट कपड़े भी वेजाइनल हैल्थ पर असर डालते हैं. साथ ही साल में एक बार पैप स्मीयर टेस्ट जरूर कराएं ताकि किसी भी गंभीर बीमारी को शुरुआती स्तर पर पकड़ा जा सके.

क्या Hair Transplant वाकई सेफ है? जानें ये सर्जरी कब हो सकती है खतरनाक

Hair Transplant : आज के समय में बाल झड़ना, गंजापन और कमजोर बालों की समस्या आम है. खासकर युवाओं में यह परेशानी तेजी से बढ़ रही है. इस के पीछे कई कारण हैं जैसे, बढ़ता प्रदूषण, खराब लाइफस्टाइल, तनाव, नींद की कमी, हैल्दी खानपान की कमी, वंशानुगत और जंकफूड से प्यार.

सोशल मीडिया पर ‘परफैक्ट लुक’ के दबाव के चलते युवा तेजी से कौस्मेटिक ट्रीटमैंट्स की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिन में से एक है हेयर ट्रांसप्लांट। इसे हेयर रैस्टोरेशन या हेयर रिप्लेसमैंट भी कहा जाता है.

हालांकि हेयर ट्रांसप्लांट एक सर्जिकल प्रक्रिया है, जो सही तरीके और अनुभवी डाक्टर की निगरानी में कराई जाए तो असरदार साबित हो सकती है. लेकिन इस में छोटी सी लापरवाही गंभीर नतीजे दे सकती है. यहां तक कि जान भी जा सकती है.

हाल ही में कानपुर में 2 लोगों की मौत के मामले सामने आए, जिन्होंने हेयर ट्रांसप्लांट करवाया था. ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि इस प्रक्रिया को ले कर जागरूकता फैलाई जाए. हम यह नहीं कह रहे हैं कि आप अगर गंजेपन से जूझ रहे हैं तो उस के लिए कोई उपाय न करें. आप को भी अपने पर्सनैलिटी को बेहतर बनाने का पूरा हक है, लेकिन जरूरी है कि आप हेयर ट्रांसप्लांट से पहले उस से संबंधित सारी जानकारी ले लें.

हेयर ट्रांसप्लांट क्या है

हेयर ट्रांसप्लांट एक सर्जरी होती है, जिस में सिर के किसी भाग से बालों की जड़ें (फौलिकल्स) निकाल कर गंजे या पतले बालों वाले हिस्सों में प्रत्यारोपित की जाती हैं. बालों के झड़ने और गंजेपन से जूझ रहे युवा जब बाल उगाने के सब नुसखे आजमा चुके होते हैं तब सीन में आखिरी और स्थायी विकल्प के तौर पर हेयर ट्रांसप्लांट की हीरो जैसी ऐंट्री होती है.

कितने तरह का होता है हेयर ट्रांसप्लांट

फौलिकुलर यूनिट ट्रांसप्लांटेशन (एफयूटी) : इस में सिर के पीछे के हिस्से में चीरा लगाकर स्किन की एक पतली पट्टी निकाली जाती है, जिस में हजारों हेयर फौलिकल्स होते हैं. उस स्किन स्ट्रिप को माइक्रोस्कोप की मदद से कई छोटेछोटे ग्राफ्ट्स (फौलिक्युलर यूनिट्स) में बांटा जाता है, जिन में 1 से 4 बालों की जड़ें होती हैं. इन स्किन ग्राफ्ट्स को जिन जगहों पर बाल कम हैं या नहीं हैं, वहां छोटेछोटे छेद कर के लगाया जाता है. बाद में स्किन को टांके लगा कर सिल दिया जाता है और कुछ हफ्तों में वहां बाल उगने लगते हैं. बहरहाल, इस में सिर के पीछे की तरफ लंबा कट ठीक होने में वक्त लेता है और व्यक्ति को टांके ठीक होने तक सोने में भी परेशानी होती है. कट का निशान भी काफी वक्त तक विजिबल रहता है.

*फौलिक्युलर यूनिट एक्सट्रैक्शन (एफयूई) : इस के लिए सब से पहले उस हिस्से को ट्रिम किया जाता है यानी बालों की लैंथ को कम किया जाता है, जहां से बाल निकाले जाने हैं. फिर एक माइक्रो पंच टूल की मदद से बालों की जड़ों (फौलिक्युलर यूनिट्स) को निकाला जाता है. इस में सर्जिकल स्ट्रिप नहीं निकाली जाती, इसलिए कोई लंबा कट नहीं लगाया जाता. इस की अच्छी बात यह भी है कि इस में बाल केवल सिर से ही नहीं, बल्कि शरीर के अन्य हिस्सों जैसे दाढ़ी, छाती, पेट और प्यूबिक एरिया से भी निकाले जा सकते हैं. इस में जहां से बाल लिए जाते हैं यानी डोनर एरिया में ठीक होने का वक्त भी कम लगता है.

अब बात आती है किन लोगों को हेयर ट्रांसप्लाट की तरफ जाना चाहिए? तो वे लोग जो बाल उगाने के अन्य तरीके आजमा चुके हैं और जिन्हें कोई रिजल्ट नहीं मिल रहा हो, जिन के सिर के 50% के आसपास बाल झड़ चुके हों, हेयरफौल की समस्या स्थायी हो और अनुवांशिक हो, सर के पीछे के हिस्से यानी डोनर एरिया में बाल हों, और उम्र 25 साल से ज्यादा हो.

हेयर ट्रांसप्लांट किन लोगों को नहीं कराना चाहिए

डायबिटीज के मरीजों में घाव भरने की प्रक्रिया धीमी होती है, जिस से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.
दिल के मरीजों को यह सर्जरी कार्डियोलौजिस्ट की देखरेख में ही करानी चाहिए, क्योंकि एनेस्थीसिया या ऐंटीबायोटिक्स से ऐलर्जी हो सकती है. जरूरी है कि सर्जरी से पहले आप सभी ऐलर्जी टेस्ट करा लें.

स्कैल्प से जुड़ी बीमारियों जैसे एलोपेसिया एरियाटा जो कि ओटोइम्यून बीमारी है, जिस में पूरे शरीर के बाल झड़ने लगते हैं या लाइकेन प्लानो पिलारिस वाले लोगों में हेयर ट्रांसप्लांट सफल नहीं होता. कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों के लिए भी यह प्रक्रिया नुकसानदेह हो सकती है.

ब्लड क्लौटिंग या खून में थक्का जमने की बीमारी से जूझ रहे लोगों को भी ट्रांसप्लांट से दूर रहना चाहिए. जो 25 साल से नीचे की उम्र के लोग हैं उन्हें ट्रांसप्लांट से दूरी ही बना कर रखनी चाहिए.

सर्जरी से पहले बरतें सावधानियां

● किसी अनुभवी और प्रमाणित हेयर ट्रांसप्लांट सर्जन से ही सलाह लें.

● डाक्टर की योग्यता, अनुभव और पुराने मरीजों के रिव्यू जान लें.

● अपनी हैल्थ कंडीशन, ऐलर्जी और दवाओं की पूरी जानकारी डाक्टर को दें.

● ऐलर्जी टेस्ट जरूर करवाएं, ताकि एनेस्थीसिया या दवाओं से कोई रिएक्शन न हो.

● क्लिनिक में इमरजैंसी सुविधाएं, स्टरलाइजेशन और औक्सीजन सपोर्ट की व्यवस्था होनी चाहिए.

● एनेस्थीसिया देने के दौरान विशेषज्ञ होना मौजूद चाहिए.

● सर्जरी से पहले कोई टैक्नीशियन या काउंसलर नहीं, बल्कि डाक्टर ही आप का मार्गदर्शन करे.

हेयर ट्रांसप्लांट के बाद बाल कब आते हैं

● 3 से 4 महीने में 10-20% बाल उगते हैं.

● 6 महीने में 50% तक ग्रोथ होती है.

● 8 से 9 महीने में लगभग 80% परिणाम दिखते हैं.

● 12 महीने के भीतर अधिकतर मामलों में 100% ग्रोथ हो जाती है.
हालांकि यह समय हर व्यक्ति के शरीर, स्किन और फौलिकल्स की क्षमता पर निर्भर करता है.

ट्रांसप्लांट के बाद क्या सावधानी रखें

● सर्जरी के बाद कुछ दिनों तक सीधा न सोएं, करवट ले कर और सिर को ऊंचा कर के ही लेटें. सर्जरी से पहले न तो मेहंदी लगाएं न ही हेयर डाई करें. सिर में तेल या जैल लगा कर सर्जरी के लिए न पहुंचें. सर्जरी से पहले बाल और स्कैल्प साफ और धुली हुई हो.

● अगर किसी दूसरे शहर में ट्रीटमैंट कराया है तो 2-3 दिन तक उसी शहर में रहें, जहां ट्रांसप्लांट हुआ है.

● पहली पट्टी क्लिनिक जा कर ही हटवाएं. पहला हेयर वौश क्लिनिक में डाक्टर की निगरानी में ही करवाएं.

● बालों पर ऊपर से सेलाइन स्प्रे करें, हाथ लगाने या खुजली करने से बचें.

● सीधे धूप में जाने से बचें, बाहर जाते समय सर्जरी टोपी पहनें. हेलमेट या नौर्मल कैप 10-15 दिन बाद पहनें.

● बाल धोने के लिए केवल ऊपर से शैंपू का पानी डालें, मसलें नहीं. सिर को खुला नहीं रखें। जब तक घाव भर नहीं जाते तब तक सिर को सर्जिकल कैप या कौटन के कपड़े से ढंक कर ही रखें.

● ट्रांसप्लांट वाली जगह पर मक्खियां व मच्छरों को न बैठने दें.

● कम से कम 2 हफ्ते तक स्विमिंग से बचें. ट्रांसप्लांट के बाद कम से कम 10 दिन हेवी ऐक्सरसाइज से भी दूरी बना कर रखें.

● शराब तथा सिगरेट के सेवन से दूरी ही भली. डाक्टर ने जो ऐंटीबायोटिक्स आप को दिए हैं उन का समय से सेवन करें. सर्जरी से 24 घंटे पहले तक डाक्टर को बताए बगैर किसी भी दवा का सेवन न करें.

हेयर ट्रांसप्लांट के साइड इफैक्ट्स

बहरहाल, ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया आमतौर पर सुरक्षित मानी जाती है, लेकिन कुछ हलके और अस्थायी साइड इफैक्ट्स हो सकते हैं.

सिर पर सूखे घाव या पपड़ियां बनना, हलकी खुजली या जलन, सुन्नपन या सनसनाहट, हलका सिर दर्द या असहजता, सूजन या टाइटनैस की भावना आदि लक्षण आमतौर पर कुछ हफ्तों में अपनेआप ठीक हो जाते हैं. लेकिन अगर इन में सुधार न हो तो तुरंत डाक्टर से संपर्क करना जरूरी है.

हेयर ट्रांसप्लांट कितना खतरनाक हो सकता है

एक स्टडी के अनुसार हेयर ट्रांसप्लांट में 4.7% मामलों में नकारात्मक परिणाम देखे गए. हालांकि संख्या कम है, लेकिन इस में रिएक्शन, इन्फैक्शन और सेप्सिस जैसे मामले भी शामिल हैं, जो जानलेवा हो सकते हैं.

कानपुर की घटना इस बात का उदाहरण है कि बिना जरूरी मैडिकल जांच और सावधानी के की गई हेयर ट्रांसप्लांट सर्जरी जीवन के लिए खतरा बन सकती है. ऐसे में सिर्फ सस्ता औफर देख कर जल्दबाजी में कदम न उठाएं.

हेयर ट्रांसप्लांट आज के समय में एक आम कौस्मेटिक सर्जरी बन चुकी है. लेकिन इस के कौंप्लिकेशन को आम मानना ठीक नहीं है. इसलिए इसे करवाने से पहले हर व्यक्ति को अपनी स्वास्थ्य स्थिति, प्रक्रिया की बारीकियों, डाक्टर की योग्यता और क्लिनिक की विश्वसनीयता की पूरी जांचपड़ताल करनी चाहिए.

बालों की चाह में कोई जल्दबाजी या लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है. जरूरी है कि हम सजग रहें, सही जानकारी जुटाएं और जरूरत पड़े तो वैकल्पिक तरीकों को भी अपनाएं. बालों से बढ़ कर जिंदगी है, इसलिए फैसला सोचसमझ कर लें.

Scrapbook : शौक के साथ व्यायाम भी

Scrapbook : स्क्रैपबुक बनाना पुरानी खूबसूरत स्मृतियों को संजोने की अनोखी कला होने के साथसाथ रचनात्मकता दिखाने का एक बेहतर तरीका है. स्क्रैपबुक का विषय हर किसी का अलग अलग हो सकता है. यह पूरी तरह अपने अनुभव, किसी खास मूमेंट, घटना या शौक पर आधारित हो सकता है. दूसरे शब्दों में कहें तो अपने शब्दों और तसवीरों को एक आकर्षक तरीके से एकसाथ संजोना एक अलग ही अनुभव देता है.

स्क्रैपबुक की थीम चुनें

सब से पहले आप को यह तय करना होगा कि आप किस स्टाइल की स्क्रैपबुक अल्बम चाहते हैं. यह कई तरह की हो सकती है जैसे ट्रैवल स्क्रैपबुक में किसी यात्रा की यादगार तसवीरें, टिकट, नक्शे और वहां के अनुभव आदि हो सकते हैं.

फ्रैंडशिप स्क्रैपबुक : फ्रैंड्स के साथ बिताए खट्टेमीठे पलों की तसवीरें और मजेदार किस्से।

फैमिली स्क्रैपबुक : जैसेकि नाम से ही पता चल रहा है इस स्क्रैपबुक में अपनी फैमिली की फोटो, उन के साथ ऐंजौय किए हुए कुछ फंक्शन, बर्थडे पार्टी की यादें, महत्त्वपूर्ण तिथियां आदि के बारे में जानकारी दी जा सकती है.

स्कूल/कालेज स्क्रैपबुक : स्कूल या कालेज के दिनों की तसवीरें, अपनी फेयरवेल पार्टी, स्कूल पिकनिक, दोस्तों के साथ मस्ती, फेवरिट टीचर्स की कुछ यादें और फोटो डाली जा सकती हैं.

हौबी स्क्रैपबुक : अपने किसी शौक (जैसे बागवानी, खाना बनाना, पेंटिंग) से संबंधित तसवीरें और जानकारी.

औल अबाउट मी स्क्रैपबुक : इस में अपनी पसंद, नापसंद, सपने और उपलब्धियों को दर्शाती स्क्रैपबुक (खासकर बच्चों के लिए मजेदार)

स्क्रैपबुक या अल्बम कैसी लें

सब से पहले आप को यह तय करना होगा कि आप किस स्टाइल की स्क्रैपबुक अल्बम चाहते हैं : पोस्ट बाउंड, थ्री-रिंग, स्ट्रैप-हिंग, बुक बाउंड या अन्य। फिर आप अपनी स्क्रैपबुक का आकार तय कर सकते हैं, 12 x 12 इंच, 8.5 x 11 इंच, 8×6 इंच या मिनी थीम चुन सकते हैं। अधिकांश लोग 4×4, 8×8 और 6×9 जैसे मिनी अल्बम का उपयोग करना पसंद करते हैं। आप चाहें तो मोटे चार्ट पेपर या कार्डबोर्ड शीट का उपयोग कर के घर पर भी अपनी स्क्रैपबुक का बेस तैयार कर सकते हैं।

स्क्रैपबुक बनाने के लिए आवश्यक सामग्री

तसवीरें : अपनी स्क्रैपबुक के विषय से संबंधित तसवीरें इकट्ठा करें.

चिपकाने का सामान : गोंद (फेविकोल), दोतरफा टेप (double-sided tape) या फोटो कौर्नर.

काटने का सामान : कैंची, पेपर कटर.

लिखने का सामान : रंगीन पेन, मार्कर, स्केच पेन.

सजावटी सामान : ग्लिटर और सीक्वेंस, रंगीन कागज, फूल (सूखे या कृत्रिम), स्टिकर, रिबन और लेस
बटन, पुराने लिफाफे, टिकट या कोई भी यादगार चीज, कटआउट (अखबारों या पत्रिकाओं से)

अच्छी फोटो का चुनाव करें

सब से पहली अपनी फोटो अल्बम में से कुछ चुनिंदा फोटो चुनें. जो अब तक की आप की बैस्ट फोटो हों. फोटो वही पसंद करें जो बिलकुल साफ और स्पष्ट हो. यदि आप अपने हनीमून के बारे में स्क्रैपबुकिंग करना चाहते हैं, तो कुछ विस्तृत शौट्स जोड़ने का प्रयास करें, जैसेकि हनीमून पर जाते समय का फोटो, होटल का रूम, अपनी मेहंदी, अपनी बुकिंग के टिकट। ग्लौसी के बजाय, फोटो को मैट फिनिश के साथ प्रोसेस करने का प्रयास करें.

लेआउट बनाएं

हर पेज के लिए एक योजना बनाएं कि आप तसवीरों और सजावटी सामान को कैसे व्यवस्थित करेंगे.

अगर आप बहुत सारी फोटो का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो आप उन फोटो को ट्रिम कर सकते है. अलगअलग शेप की फोटो का उपयोग करने में संकोच न करें.

लिखने के लिए जगह छोड़ें जहां आप तारीखें, नाम, छोटी कहानियां या उद्धरण लिख सकें.

बेस तैयार करें

इन पन्नों को एकसाथ बांधने के लिए आप छेद कर के रिबन का उपयोग कर सकते हैं या उन्हें स्पाइरल बाइंडिंग करवा सकते हैं।

डैकोरेट करें

हर पेज पर कलर फुल पेपर चिपकाकर या पेंट कर के एक आकर्षक पृष्ठभूमि तैयार करें.

फ्रंट पेज डिजाइन करें

स्क्रैपबुक का फर्स्ट पेज आकर्षक होना चाहिए। इस पर स्क्रैपबुक का शीर्षक लिखें और इसे खूबसूरती से सजाएं.

औनलाइन स्क्रैपबुक स्कैच के वीडियो देखें

अगर कंफ्यूज हो रहें हैं और आप को समझ नहीं आ रहा कि कैसे स्क्रैपबुक बनाएं तो आप वीडियो देख कर आइडिआ लें सकते हैं कि स्क्रैपबुक को आसानी से कस्टमाइज कैसे किया जाए.

स्क्रैपबुक एक प्रकार का मानसिक व्यायाम भी है. आइए, जानें कैसे :

मैमोरी को स्ट्रौंग बनता है

स्क्रैपबुकिंग करते समय अपनी यादों को तजा करना पड़ता है, तभी हम उस में से बैस्ट मैमोरी का चयन कर पाते हैं, जिस से मैमोरी को तेज करने में मदद मिलती है.

फोकस बनता है

स्क्रैपबुकिंक करने के लिए कई चीजों पर एक साथ ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होती है, जैसे कि अपनी तसवीरें और उस के आसपास क्या लेखन है, कैसे सजाना है आदि चीजें एकसाथ करनी पड़ती हैं, जिस से आप के ध्यान को केंद्रित करने की क्षमता में सुधार होता है.

क्रिएटिविटी बढ़ती है

स्क्रैपबुक के पेज को डिजाइन करना, रंगों का चयन करना, लेआउट बनाना और विभिन्न सजावटी तत्त्वों का उपयोग करना आप की रचनात्मक सोच को बढ़ावा देता है. आप नए विचारों के साथ प्रयोग करते हैं.

प्रौब्लम सौल्विंग स्किल्स आती है

समस्याओं को रचनात्मक तरीके से हल करने का प्रयास करते हैं (जैसे कि किसी अजीब आकार की तसवीर को कैसे फिट किया जाए). कभीकभी आप के पास सीमित स्थान हो सकता है या सामग्री वैसी नहीं हो सकती जैसी आप ने सोची थी. ऐसी स्थितियों में आप को रचनात्मक समाधान खोजने पड़ते हैं, जो आप के प्रौब्लम सौल्विंग स्किल्स को विकसित करता है।

स्ट्रैस कम करता है

जब आप किसी काम में कई घंटों तक लगे रहते हैं तो आप अपने तनाव को भूल जाते हैं. कई नई चीजे ट्राई करने पर आप को मानसिक संतोष भी मिलता है। इस से मन शांत होता है और स्ट्रैस कम होता है.

स्टोरी टेलिंग स्किल आती है

स्क्रैपबुक के माध्यम से आप तस्वीरों और शब्दों का उपयोग कर के एक कहानी कहते हैं। यह आप के कहानी कहने के कौशल को विकसित करता है, जिस से आप अपने विचारों और अनुभवों को अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त कर पाते हैं।

आत्मअभिव्यक्ति करनी आती है

स्क्रैपबुकिंग आप को अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने का एक तरीका प्रदान करती है.

खुशी और संतुष्टि

स्क्रैपबुकिंग एक संतोषजनक गतिविधि है जो खुशी और उपलब्धि की भावना ला सकती है.

स्क्रैपबुकिंग में शामिल होने के लिए, आप अपनी पसंद की सामग्री, जैसे कि तसवीरें, पत्र और अन्य सजावट वस्तुओं को इकट्ठा कर सकते हैं। आप अपनी पसंद के विभिन्न लेआउट, रंग और सजावट के तरीकों का प्रयोग कर सकते हैं। इस से आप खुश रहते हैं.

ओटीटी और यूट्यूब पर अपनी फिल्म रिलीज करने के सख्त खिलाफ हैं Aamir Khan

Aamir Khan : आमिर खान की फिल्म सितारे जमीन पर जो कि 21 जून को थिएटर में रिलीज होने वाली है इस फिल्म के लिए खबर थी कि आमिर खान इस फिल्म को यूट्यूब पर रिलीज करेंगे , ये पहली बार होगा कि कोई फिल्म यूट्यूब पर रिलीज होने जा रही है . इसके साथ ही सितारे जमीन पर की ओटीटी रिलीज को लेकर भी कई सारी बातें फैली हुई थी.

हाल ही में अपने इंटरव्यू में आमिर खान ने इन सभी खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है. आमिर खान के अनुसार यह खबर पूरी तरह झूठी है कि मैं यूट्यूब पर फिल्म रिलीज कर रहा हूं. सच बात तो यह है कि ना तो मैं अपनी फिल्म यूट्यूब पर रिलीज करूंगा  और ना ही मैं अपनी फिल्म सितारे ज़मीन पर ओटीटी पर रिलीज करूंगा , मेरी फिल्म सिर्फ और सिर्फ सिनेमाघर में रिलीज होगी.

मैं एक बात क्लियर कर देना चाहता हूं कि मैं सिर्फ और सिर्फ सिनेमा के लिए बना हूं और मेरी फिल्म सिर्फ सिनेमाघर में ही रिलीज होगी. किसी और प्लेटफॉर्म पर नहीं. मेरी आटीटी या यूट्यूब में अभिनय करने को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं है. क्योंकि मेरा बचपन जवानी सब सिनेमाघर के इर्दगिर्द ही बीता है. इसलिए मुझे सिनेमाघर से खास लगाव है. गौरतलब है आमिर खान की तरह सलमान खान भी ओटीटी में काम करने के खिलाफ है. सलमान को भी सिर्फ उन्हीं फिल्मों में काम करना है जो थिएटर में रिलीज हो . ओटीटी के लिए वेब सीरीज या फिल्मों में काम करने में उनकी भी दिलचस्पी नहीं है.

Marriage : घरवाले मेरी पसंद के लड़के से शादी के लिए तैयार नहीं हैं, मैं क्या करुं?

Marriage :  अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक पढ़ें

सवाल-

मैं एक लड़के से प्यार करती हूं और उस से विवाह करना चाहती हूं. मगर समस्या यह है कि लड़के के घर वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं है. मैं कोई गलत कदम नहीं उठाना चाहती. मुझे सलाह दें कि मैं क्या करूं?

जवाब-

आप ने यह नहीं बताया कि लड़के के घर वालों को इस रिश्ते पर आपत्ति क्यों है. यदि विरोध की कोई ठोस वजह नहीं है और लड़का इस रिश्ते को ले कर गंभीर है, तो उसे अपने घर वालों को अपनी दृढ़ इच्छा बता कर कि वह सिर्फ आप से ही विवाह करेगा, मनाने की कोशिश करें. यदि वे नहीं मानते और वह उन की इच्छा के विरुद्ध आप से विवाह करने की हिम्मत रखता है, तो आप कोर्ट मैरिज कर सकते हैं. देरसवेर लड़के के घर वाले भी राजी हो ही जाएंगे. हां, यदि लड़का घर वालों की मरजी के खिलाफ जाने का साहस नहीं रखता तो आप को इस संबंध पर यहीं विराम लगा देना चाहिए, क्योंकि जो रास्ता मंजिल तक नहीं पहुंचता उस राह पर चलते रहने का कोई फायदा नहीं है.

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वे कौन से हालात हैं जो लड़की को घर छोड़ने को मजबूर कर देते हैं. आमतौर पर सारा दोष लड़की पर मढ़ दिया जाता है, जबकि ऐसे अनेक कारण होते हैं, जो लड़की को खुद के साथ इतना बड़ा अन्याय करने पर मजबूर कर देते हैं. जिन लड़कियों में हालात का सामना करने का साहस नहीं होता वे आत्महत्या तक कर लेती हैं. मगर जो जीना चाहती हैं, स्वतंत्र हो कर कुछ करना चाहती हैं वे ही हालात से बचने का उपाय घर से भागने को समझती हैं. यह उन की मजबूरी है. इस का एक कारण आज का बदलता परिवेश है. आज होता यह है कि पहले मातापिता लड़कियों को आजादी तो दे देते हैं, लेकिन जब लड़की परिवेश के साथ खुद को बदलने लगती है, तो यह उन्हें यानी मातापिता को रास नहीं आता है.

कुछ ऊंचनीच होने पर मध्यवर्गीय लड़कियों को समझाने की जगह उन्हें मारापीटा जाता है. तरहतरह के ताने दिए जाते हैं, जिस से लड़की की कोमल भावनाएं आहत होती हैं और वह विद्रोही बन जाती है. घर के आए दिन के प्रताड़ना भरे माहौल से त्रस्त हो कर वह घर से भागने जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाती है. यह जरूरी नहीं है कि लड़की यह कदम किसी के साथ गलत संबंध स्थापित करने के लिए उठाती है. दरअसल, जब घरेलू माहौल से मानसिक रूप से उसे बहुत परेशानी होने लगती है तो उस समय उसे कोई और रास्ता नजर नहीं आता. तब बाहरी परिवेश उसे आकर्षित करता है. मातापिता का उस के साथ किया जाने वाला उपेक्षित व्यवहार बाहरी माहौल के आगोश में खुद को छिपाने के लिए उसे बाध्य कर देता है.

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

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कांस से क्लीनअप तक: ‘स्टोलन’ की एक्ट्रेस मिया मेलजर ने मुंबई बीच पर मनाया World Oceans Day

World Oceans Day : जब ग्लैमर का तड़का मिलता है रेत भरे जूतों और समाज सेवा से, तब बनता है एक दमदार रील-से-रियल मोमेंट! इंटरनेशनल एक्ट्रेस मिया मेलज़र, जिन्हें आपने स्टोलन, बियॉन्ड द क्लाउड्स और द ब्रेड जैसी फिल्मों में देखा है, इस बार किसी शूट के लिए नहीं, बल्कि बीच साफ करने के लिए पहुंची मुंबई के चौपाटी पर.
वर्ल्ड ओशन डे के मौके पर कमला अंकीबाई घमंडीराम गोवानी ट्रस्ट की अगुवाई में (नेतृत्व में श्रीमती निदर्शना गोवानी) आयोजित हुआ ये मेगा क्लीनअप ड्राइवज. हां आम लोग, कॉलेज स्टूडेंट्स और सितारे एक ही मिशन पर जुटे:
मुंबई की कोस्टलाइन को रिक्लेम करना

मिया ने मस्ती से कहा, “बिलकुल बच्चे जैसी एक्साइटमेंट थी! बीच सिर्फ बैकड्रॉप नहीं होता, ये हमारी आत्मा का हिस्सा है. इतने जोश से भरे लोगों के साथ मिलकर सफाई करना ऐसा था जैसे धरती का रीसेट बटन दबा दिया हो.”

कैप और ग्लव्स में रेड कारपेट से दूर, लेकिन मकसद से चमकती मिया ने जोड़ा, “समंदर सिर्फ देखने की चीज़ नहीं, ये हमारी रूह को छूता है। आज हमने सिर्फ बीच नहीं साफ किया, हमने समंदर का सम्मान किया.”

उनकी फिल्म एक बेतुके आदमी की अफ़रा-रातें, जिसमें वो आदिल हुसैन के साथ लीड में हैं और आर्ट डायरेक्टर भी हैं, फ्रांस में प्रीमियर हो चुकी है.मिया का करियर शादी के साइड इफेक्ट्स और टारगेट कोलकाता जैसे हिट्स से लेकर टिकटॉक जैसी फिल्मों तक फैला है, जिसके लिए उन्हें लंदन और फ्रांस में बेस्ट एक्ट्रेस के नॉमिनेशन मिल चुके हैं.

जहाँ मिया लेकर आईं स्टार पावर, वहीं किर्ती कॉलेज, लाला लाजपत राय कॉलेज और NSS वॉलंटियर्स ने जोश और जज़्बा दिखाया।.लोकल रहवासी, सीनियर सिटिज़न और मॉर्निंग वॉकर भी प्लास्टिक वेस्ट उठाने में पीछे नहीं रहे.

श्रीमती निदर्शना गोवानी, जो पूरे इवेंट में एक्टिव रहीं. उन्होंने कहा, “समंदर यहीं से शुरू होता है. हमारे पैरों के नीचे से. जब हम अपने बीच साफ करते हैं, तो हम धरती के दिल की हिफाज़त करते हैं.” सुबह खत्म हुई एक साफ-सुथरे कोस्टलाइन और एक गहरे संदेश के साथ. लहरों ने जब किनारे को चूमा, तो ये साफ था. ये सिर्फ एनवायरमेंट का इवेंट नहीं था, ये एक इमोशनल जर्नी थी.

Romantic Hindi Stories : तिकोनी डायरी

नागेश की डायरी

Romantic Hindi Stories : कई दिनों से मैं बहुत बेचैन हूं. जीवन के इस भाटे में मुझे प्रेम का ज्वार चढ़ रहा है. बूढ़े पेड़ में प्रेम रूपी नई कोंपलें आ रही हैं. मैं अपने मन को समझाने का भरपूर प्रयत्न करता हूं पर समझा नहीं पाता. घर में पत्नी, पुत्र और एक पुत्री है. बहू और पोती का भरापूरा परिवार है, पर मेरा मन इन सब से दूर कहीं और भटकने लगा है.

शहर मेरे लिए नया नहीं है. पर नियुक्ति पर पहली बार आया हूं. परिवार पीछे पटना में छूट गया है. यहां पर अकेला हूं और ट्रांजिट हौस्टल में रहता हूं. दिन में कई बार परिवार वालों से फोन पर बात होती है. शाम को कई मित्र आ जाते हैं. पीनापिलाना चलता है. दुखी होने का कोई कारण नहीं है मेरे पास, पर इस मन का मैं क्या करूं, जो वेगपूर्ण वायु की भांति भागभाग कर उस के पास चला जाता है.

वह अभीअभी मेरे कार्यालय में आई है. स्टेनो है. मेरा उस से कोई सीधा नाता नहीं है. हालांकि मैं कार्यालय प्रमुख हूं. मेरे ही हाथों उस का नियुक्तिपत्र जारी हुआ है…केवल 3 मास के लिए. स्थायी नियुक्तियों पर रोक लगी होने के कारण 3-3 महीने के लिए क्लर्कों और स्टेनो की भर्तियां कर के आफिस का काम चलाना पड़ता है. कोई अधिक सक्षम हो तो 3 महीने का विस्तार दिया जा सकता है.

उस लड़की को देखते ही मेरे शरीर में सनसनी दौड़ जाती है. खून में उबाल आने लगता है. बुझता हुआ दीया तेजी से जलने लगता है. ऐसी लड़कियां लाखों में न सही, हजारों में एक पैदा होती हैं. उस के किसी एक अंग की प्रशंसा करना दूसरे की तौहीन करना होगा.

पहली नजर में वह मेरे दिल में प्रवेश कर गई थी. मेरे पास अपना स्टाफ था, जिस में मेरी पी.ए. तथा व्यक्तिगत कार्यों के लिए अर्दली था. कार्यालय के हर काम के लिए अलगअलग कर्मचारी थे. मजबूरन मुझे उस लड़की को अनुराग के साथ काम करने की आज्ञा देनी पड़ी.

मुझे जलन होती है. कार्यालय प्रमुख होने के नाते उस लड़की पर मेरा अधिकार होना चाहिए था, पर वह मेरे मातहत अधिकारी के साथ काम रही थी. मुझ से यह सहन नहीं होता था. मैं जबतब अनुराग के कमरे में चला जाता था. मेरे बगल में ही उस का कमरा था. उन दोनों को आमनेसामने बैठा देखता हूं तो सीने पर सांप लोट जाता है. मन करता है, अनुराग के कमरे में आग लगा दूं और लड़की को उठा कर अपने कमरे में ले जाऊं.

अनुराग उस लड़की को चाहे डिक्टेशन दे रहा हो या कोई अन्य काम समझा रहा हो, मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता. तब थोड़ी देर बैठ कर मैं अपने को तसल्ली देता हूं. फिर उठतेउठते कहता हूं, ‘‘नीहारिका, जरा कमरे में आओ. थोड़ा काम है.’’

मैं जानता हूं, मेरे पास कोई आवश्यक कार्य नहीं. अगर है भी तो मेरी पी.ए. खाली बैठी है. उस से काम करवा सकता हूं. पर नीहारिका को अपने पास बुलाने का एक ही तरीका था कि मैं झूठमूठ उस से व्यर्थ की टाइपिंग का काम करवाऊं. मैं कोई पुरानी फाइल निकाल कर उसे देता कि उस का मैटर टाइप करे. वह कंप्यूटर में टाइप करती रहती और मैं उसे देखता रहता. इसी बहाने बातचीत का मौका मिल जाता.

नीहारिका के घरपरिवार के बारे में जानकारी ले कर अपने अधिकारों का बड़प्पन दिखा कर उसे प्रभावित करने लगा. लड़की हंसमुख ही नहीं, वाचाल भी थी. वह जल्द ही मेरे प्रभाव में आ गई. मैं ने दोस्ती का प्रस्ताव रखा, उस ने झट से मान लिया. मेरा मनमयूर नाच उठा. मुझ से हाथ मिलाया तो शरीर झनझना कर रह गया. कहां 20 साल की उफनती जवानी, कहां 57 साल का बूढ़ा पेड़, जिस की शाखाओं पर अब पक्षी भी बैठने से कतराने लगे थे.

नीहारिका से मैं कितना भी झूठझूठ काम करवाऊं पर उसे अनुराग के पास भी जाना पड़ता था. मुझे डर है कि लड़की कमसिन है, जीवन के रास्तों का उसे कुछ ज्ञान नहीं है. कहीं अनुराग के चक्कर में न आ जाए. वह एक कवि और लेखक है. मृदुल स्वभाव का है. उस की वाणी में ओज है. वह खुद न चाहे तब भी लड़की उस के सौम्य व्यक्तित्व से प्रभावित हो सकती थी.

क्या मैं उन दोनों को अलग कर सकता हूं?

अनुराग की डायरी

नीहारिका ने मेरी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया है. वह इतनी हसीन है कि बड़े से बड़ा कवि उस की सुंदरता की व्याख्या नहीं कर सकता है. गोरा आकर्षक रंग, सुंदर नाक और उस पर चमकती हुई सोने की नथ, कानों में गोलगोल छल्ले, रस भरे होंठ, दहकते हुए गाल, पतलीलंबी गर्दन और पतला-छरहरा शरीर, कमर का कहीं पता नहीं, सुडौल नितंब और मटकते हुए कूल्हे, पुष्ट जांघों से ले कर उस के सुडौल पैरों, सिर से ले कर कमर और कूल्हों तक कहीं भी कोई कमी नजर नहीं आती थी.

वह मेरी स्टेनो है और हम कितनी सारी बातें करते हैं? कितनी जल्दी खुल गई है वह मेरे साथ…व्यक्तिगत और अंतरंग बातें तक कर लेती है. बड़े चाव से मेरी बातें सुनती है. खुद भी बहुत बातें करती है. उसे अच्छा लगता है, जब मैं ध्यान से उस की बातें सुनता हूं और उन पर अपनी टिप्पणी देता हूं. जब उस की बातें खत्म हो जाती हैं तो वह खोदखोद कर मेरे बारे में पूछने लगती है.

बहुत जल्दी मुझे पता लग गया कि वह मन से कवयित्री है. पता चला, उस ने स्कूलकालेज की पत्रिकाओं के लिए कविताएं लिखी थीं. मैं ने उस से दिखाने के लिए कहा. पुराने कागजों में लिखी हुई कुछ कविताएं उस ने दिखाईं. कविताएं अच्छी थीं. उन में भाव थे, परंतु छंद कमजोर थे. मैं ने उन में आवश्यक सुधार किए और उसे प्रोत्साहित कर के एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज दिया. कविता छप गई तो वह हृदय से मेरा आभार मानने लगी. उस का झुकाव मेरी तरफ हो गया.

शीघ्र ही मैं ने मन की बात उस पर जाहिर कर दी. वस्तुत: इस की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि बातोंबातों में ही हम दोनों ने अपनी भावनाएं एकदूसरे पर प्रकट कर दी थीं. उस ने मेरे प्यार को स्वीकार कर के मुझे धन्य कर दिया.

काम से समय मिलता तो हम व्यक्तिगत बातों में मशगूल हो जाते परंतु हमारी खुशियां शायद हमारे ही बौस को नागवार गुजर रही थीं. दिन में कम से कम 5-6 बार मेरे कमरे में आ जाते, ‘‘क्या हो रहा है?’’ और बिना वजह बैठे रहते, ‘‘अनुराग, चाय पिलाओ,’’ चाय आने और पीने में 2-3 मिनट तो लगते नहीं. इस के अलावा वह नीहारिका से साधिकार कहते, ‘‘मेरे कमरे से सिगरेट और माचिस ले आओ.’’

मेरा मन घृणा और वितृष्णा से भर जाता, परंतु कुछ कह नहीं सकता था. वे मेरे बौस थे. नीहारिका भी अस्थायी नौकरी पर थी. मन मार कर सिगरेट और माचिस ले आती. वह मन में कैसा महसूस करती थी, मुझे नहीं मालूम क्योंकि जब भी वह सिगरेट ले कर आती, हंसती रहती थी, जैसे इस काम में उसे मजा आ रहा हो.

एक छोटी उम्र की लड़की से ऐसा काम करवाना मेरी नजरों में न केवल अनुचित था, बल्कि निकृष्ट और घृणित कार्य था. उन का अर्दली पास ही गैलरी में बैठा रहता है. यह काम उस से भी करवा सकते थे पर वे नीहारिका पर अपना अधिकार जताना चाहते थे. उसे बताना चाहते थे कि उस की नौकरी उन के ही हाथ में है.

सिगरेट का बदबूदार धुआं घंटों मेरे कमरे में फैला रहता और वह परवेज मुशर्रफ की तरह बूट पटकते हुए नीहारिका को आदेश देते मेरे कमरे से निकल जाते कि तुम मेरे कमरे में आओ.

मैं मन मार कर रह जाता हूं. गुस्से को चाय की आखिरी घूंट के साथ पी कर थूक देता हूं. कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं, जिन पर मनुष्य का वश नहीं रहता. लेकिन मैं कभीकभी महसूस करता हूं कि नीहारिका को नागेश के आधिकारिक बरताव पर कोई खेद या गुस्सा नहीं आता था.

नीहारिका कभी भी इस बात की शिकायत नहीं करती थी कि उन की ज्यादतियों की वजह से वह परेशान या क्षुब्ध थी. वह सदैव प्रसन्नचित्त रहती थी. कभीकभी बस नागेश के सिगरेट पीने पर विरोध प्रकट करती थी. उस ने बताया था कि उस के कहने पर ही नागेश ने तब अपने कमरे में सिगरेट पीनी बंद कर दी, जब वह उन के कमरे में काम कर रही होती थी.

मुझे अच्छा नहीं लगता है कि घड़ीघड़ी भर बाद नागेश मेरे कमरे में आएं और बारबार बुला कर नीहारिका को ले जाएं. इस से मेरे काम में कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था पर मैं चाहता था कि नीहारिका जब तक आफिस में रहे मेरी नजरों के सामने रहे.

नीहारिका की डायरी

मैं अजीब कशमकश में हूं…कई दिनों से मैं दुविधा के बीच हिचकोले खा रही हूं. समझ में नहीं आता…मैं क्या करूं? कौन सा रास्ता अपनाऊं? मैं 2 पुरुषों के प्यार के बीच फंस गई हूं. इस में कहीं न कहीं गलती मेरी है. मैं बहुत जल्दी पुरुषों के साथ घुलमिल जाती हूं. अपनी अंतरंग बातों और भावनाओं का आदानप्रदान कर लेती हूं. उसी का परिणाम मुझे भुगतना पड़ रहा है. हर चलताफिरता व्यक्ति मेरे पीछे पड़ जाता है. वह समझता है कि मैं एक ऐसी चिडि़या हूं जो आसानी से उन के प्रेमजाल में फंस जाऊंगी.

इस दफ्तर में आए हुए मुझे 1 महीना ही हुआ और 2 व्यक्ति मेरे प्रेम में गिरफ्तार हो चुके हैं. एक अपने शासकीय अधिकार से मुझे प्रभावित करने में लगा है. वह हर मुमकिन कोशिश करता है कि मैं उस के प्रभुत्व में आ जाऊं. दूसरा सौम्य और शिष्ट है. वह गुणी और विद्वान है. कवि और लेखक है. उस की बातों में विलक्षणता और विद्वत्ता का समावेश होता है. वह मुझे प्रभावित करने के लिए ऐसी बातें नहीं करता है.

पहला जहां अपने कर्मों का गुणगान करता रहता है. बड़ीबड़ी बातें करता है और यह जताने का प्रयत्न करता है कि वह बहुत बड़ा अधिकारी है. उस के अंतर्गत काम करने वालों का भविष्य उस के हाथ में है. वह जिसे चाहे बना सकता है और जिसे चाहे पल में बिगाड़ दे. अपने अधिकारों से वह सम्मान पाने की लालसा करता है. वहीं दूसरी ओर अनुराग अपने व्यक्तित्व से मुझे प्रभावित कर चुका है.

नागेश से मुझे भय लगता है, अत: उस की किसी बात का मैं विरोध नहीं कर पाती. मुझे पता है कि मेरी किसी बात से अगर वह नाखुश हुआ तो मुझे नौकरी से निकालने में उसे एक पल न लगेगा. ऐसा उस ने संकेत भी दिया है. वह गंदे चुटकुले सुनाता और खुद ही उन पर जोरजोर से हंसता है. अपने भूतकाल की सत्यअसत्य कहानियां ऐसे सुनाता है जैसे उस ने अपने जीवन में बहुत महान कार्य किए हैं और उस के कार्यों में अच्छे संदेश निहित हैं.

मेरे मन में उस के प्रति कोई लगाव या चाहत नहीं है. वह स्वयं मेरे पीछे पागल है. मेरे मन में उस के प्रति कोई कोमल भाव नहीं है. वह कहीं से मुझे अपना नहीं लगता. मेरी हंसी और खुलेपन से उसे गलतफहमी हो गई है. तभी तो एक दिन बोला, ‘‘तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. शायद मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. क्या तुम मुझ से दोस्ती करोगी?’’

मेरे घर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है. घर में 3 बहनों में मैं सब से बड़ी हूं. घर के पास ही गली में पिताजी की किराने की दुकान है. बहुत ज्यादा कमाई नहीं होती है. बी.ए. करने के बाद इस दफ्तर में पहली अस्थायी नौकरी लगी है. अस्थायी ही सही, परंतु आर्थिक दृष्टि से मेरे परिवार को कुछ संबल मिल रहा है. अभी तो पहली तनख्वाह भी नहीं मिली थी. ऐसे में काम छोड़ना मुझे गवारा नहीं था.

मन को कड़ा कर के सोचा कि नागेश कोई जबरदस्ती तो कर नहीं सकता. मैं उस से बच कर रहूंगी. ऊपरी तौर पर दोस्ती स्वीकार कर लूंगी, तो कुछ बुरा नहीं है. अत: मैं ने हां कह दिया. उस ने तुरंत मेरा दायां हाथ लपक लिया और दोस्ती के नाम पर सहलाने लगा. उस ने जब जोर से मेरी हथेली दबाई तो मैं ने उफ कर के खींच लिया. वह हा…हा…कर के हंस पड़ा, जैसे पौराणिक कथाओं का कोई दैत्य हंस रहा हो.

‘‘बहुत कोमल हाथ है,’’ वह मस्त होता हुआ बोला तो मैं सिहर कर रह गई.

दूसरी तरफ अनुराग है…शांत और शिष्ट. हम साथ काम करते हैं परंतु आज तक उस ने कभी मेरा हाथ तक छूने की कोशिश नहीं की. वह केवल प्यारीप्यारी बातें करता है. दिल ही दिल में मैं उसे प्यार करने लगी हूं. कुछ ऐसे ही भाव उस के भी मन में है. हम दोनों ने अभी तक इन्हें शब्दों का रूप नहीं दिया है. उस की आवश्यकता भी नहीं है. जब दो दिल खामोशी से एकदूसरे के मन की बात कह देते हैं तो मुंह खोलने की क्या जरूरत.

हमारे प्यार के बीच में नागेश रूपी महिषासुर न जाने कहां से आ गया. मुझे उसे झेलना ही है, जब तक इस दफ्तर में नौकरी करनी है. उस की हर ज्यादती मैं अनुराग से बता भी नहीं सकती. उस के दिल को चोट पहुंचेगी.

नागेश के कमरे से वापस आने पर मैं हमेशा अनुराग के सामने हंसती- मुसकराती रहती थी, जिस से उस को कोई शक न हो. यह तो मेरा दिल ही जानता था कि नागेश कितनी गंदीगंदी बातें मुझ से करता था.

अनुराग मुझ से पूछता भी था कि नागेश क्या बातें करता है? क्या काम करवाता है? परंतु मैं उसे इधरउधर की बातें बता कर संतुष्ट कर देती. वह फिर ज्यादा नहीं पूछता. मुझे लगता, अनुराग मेरी बातों से संतुष्ट तो नहीं है, पर वह किसी बात को तूल देने का आदी भी नहीं था.

अब धीरेधीरे मैं समझने लगी हूं कि 2 पुरुषों को संभाल पाना किसी नारी के लिए संभव नहीं है.

नागेश को मेरी भावनाओं या भलाई से कुछ लेनादेना नहीं. वह केवल अपना स्वार्थ देखता है. अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए मुझे अपने सामने बिठा कर रखता है. मुझे उस की नीयत पर शक है. हठात एक दिन बोला, ‘‘मेरे घर चलोगी? पास में ही है. बहुत अच्छा सजा रखा है. कोई औरत भी इतना अच्छा घर नहीं सजा सकती. तुम देखोगी तो दंग रह जाओगी.’’ मैं वाकई दंग रह गई. उस का मुंह ताकती रही…क्या कह रहा है? उस की आंखों में वासना के लाल डोरे तैर रहे थे. मैं अंदर तक कांप गई. उस की बात का जवाब नहीं दिया.

‘‘बोलो, चलोगी न? मैं अकेला रहता हूं. कोई डरने वाली बात नहीं है,’’ वह अधिकारपूर्ण बोला.

मैं ने टालने के लिए कह दिया, ‘‘सर, कभी मौका आया तो चलूंगी.’’

वह एक मूर्ख दैत्य की तरह हंस पड़ा.

आफिस प्रमुख नागेश अपने आफिस के एक अधिकारी अनुराग के लिए स्टेनो नीहारिका की अस्थायी नियुक्ति कर देते हैं. नागेश को स्थायी पी.ए. मिली हुई है. ये तीनों अपनीअपनी पर्सनल डायरी मेनटेन करते हैं. 57 साल के नागेश अपनी डायरी में 20 साल की नीहारिका की खूबसूरती के बारे में बयान करते हैं और अपनी सीट से उठउठ कर अपने कनिष्ठ अफसर अनुराग के कमरे में जाते हैं. कुछ देर बैठ कर नीहारिका को अपने कमरे में आने का निर्देश दे कर चले जाते हैं. वे आगे लिखते हैं कि एक दिन उन्होंने दोस्ती का प्रस्ताव रखा तो नीहारिका ने झट से मान लिया. वहीं नागेश को यह डर भी था कि नीहारिका कहीं अनुराग से प्रभावित न हो जाए.

उधर, अनुराग की डायरी बताती है कि नीहारिका ने उस की रात की नींद और दिन का चैन छीन लिया है. एक दिन बातोंबातों में हम दोनों ने अपनी भावनाएं प्रकट कर दी थीं. उस ने मेरे आग्रह को स्वीकार कर के मुझे धन्य कर दिया.

उधर, अपनी डायरी में नीहारिका लिखती है कि मैं अजीब कशमकश में हूं. मैं 2 पुरुषों के प्यार के बीच फंस गई हूं. एक अपने शासकीय अधिकार से प्रभावित करने में लगा है तो दूसरा अपने व्यक्तित्व से मुझे प्रभावित कर चुका है. नागेश से मुझे डर लगता है. अत: उस की किसी भी बात का मैं विरोध नहीं कर पाती. मेरी हंसी और खुलेपन से उसे गलतफहमी हो गई है. एक दिन वह बोला, ‘तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. क्या तुम मुझ से दोस्ती करोगी?’ मेरे घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है. अस्थायी नौकरी ही सही, घर की कुछ तो मदद हो जाएगी. ये सोच कर मैं ने ‘हां’ कर दी. दूसरी तरफ अनुराग है…शांत और शिष्ट. वह केवल प्यारीप्यारी बातें करता है. दिल ही दिल में मैं उस से प्यार करने लगी हूं. कुछ ऐसे ही भाव उस के मन में भी हैं. हम दोनों ने इन्हें अभी शब्दों का रूप नहीं दिया है. आफिस में नागेश के निर्देश पर उस के कमरे में जाती फिर वहां से ड्यूटी रूम में आने पर मैं हमेशा अनुराग के सामने हंसतीमुसकराती रहती थी ताकि उसे किसी तरह की तकलीफ न पहुंचे.अब आगे…

नागेश की डायरी

2 महीने बीत चुके हैं. बात आगे बढ़ती नहीं दिखाई पड़ रही है. मैं अच्छी तरह जानता हूं. नीहारिका के प्रति मेरे मन में कोई प्यार नहीं. ढलती उम्र में प्यार की चोंचलेबाजी नहीं की जा सकती है. मैं नीहारिका को प्रेमपत्र नहीं लिख सकता, उस की गली के चक्कर नहीं लगा सकता, हाथ में हाथ डाल कर बागों में टहलना अब मेरे लिए संभव नहीं है. मैं केवल नीहारिका के सुंदर शरीर के प्रति आसक्त हूं. फिर उसे प्राप्त करने का क्या तरीका अपनाया जाए?

कितनी बार उस से कहा कि मेरे घर चले, पर वह हंस कर टाल देती है. क्या उसे मेरे कुटिल मनोभावों का पता चल चुका है. जवान लड़की, पुरुष की आंखों की भाषा समझ सकती है. फिर क्यों वह तिलतिल कर, जला कर मार रही है मुझे…परवाने जल जाते हैं, शमा को पता भी नहीं चलता.

नीहारिका के साथ ऐसी बात नहीं है. वह अच्छी तरह जानती है कि मैं उसे दिलोजान से चाहने लगा हूं और उस का सान्निध्य चाहता हूं. वह भी तो यही चाहती है, वरना मेरी दोस्ती क्यों कबूल करती. मेरी किसी बात का बुरा नहीं मानती है. मैं कितनी खुली बातें करता हूं, वह हंसती रहती है. क्या यह संकेत नहीं करता कि उस का दिल भी मुझ पर आ गया है?

मुझे लगता है कि अनुराग भी नीहारिका पर आसक्त हो चुका है. वह युवा है और अविवाहित भी. नीहारिका मेरी तुलना में उस को ज्यादा पसंद करेगी. उस के साथ ही रहती है. नीहारिका को हासिल करने के लिए मुझे शीघ्र ही कोई कदम उठाना पड़ेगा. कार्यालय में उस के साथ कुछ करना संभव नहीं है. बवाल मच सकता है. एक बार वह मेरे घर चलने के लिए राजी हो जाए, तो फिर कुछ किया जा सकता है. वह मेरे हाथों से बच नहीं सकती.

नीहारिका के हावभाव से तो नहीं लगता कि वह अनुराग को चाहती है. कई बार उस से कह चुका हूं कि प्यार में लड़के ही नहीं लड़कियां भी बरबाद हो जाती हैं. अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तरफ ध्यान दे, ताकि स्थायी नौकरी लग सके. पर मेरे बरगलाने से क्या वह मान जाएगी? जवान लड़की क्या किसी बूढ़े व्यक्ति के चक्कर में अपना जीवन और भविष्य बरबाद करेगी? क्या वह नहीं समझती कि मैं उसे चक्कर में लेने का प्रयत्न कर रहा हूं? मेरी बातों से वह कैसे इस तरह प्रभावित हो सकती है कि किसी जवान लड़के का चक्कर छोड़ दे? वह अनुराग के साथ काम करती है, क्या उस से प्रभावित नहीं हो सकती? हां…अवश्य.

अनुराग के रहते मेरा काम बनने वाला नहीं है. मुझे नीहारिका को उस से अलग करना होगा. दोनों साथसाथ रहेंगे तो आपस में लगाव बढ़ेगा. उन्हें कोई ऐसा मौका नहीं देना कि मैं अपना ही मौका चूक जाऊं. मैं उसे एक पत्नी की तरह अपनाना चाहता हूं पर यह कैसे संभव हो सकता है? वह किसी और पुरुष के सान्निध्य में न आए तब…हां, उसे अनुराग से दूर करना ही होगा. मैं उसे किसी और के साथ लगा देता हूं. किस के साथ…इस बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है. हरीश के साथ अनिल काम कर रहा है. उसे हटा कर मैं अनुराग के साथ लगा देता हूं और नीहारिका को हरीश के साथ…अनुराग की तुलना में वह उम्रदराज है. भोंडे दांतों वाला है. आंखों पर मोटा चश्मा लगाता है. बात करता है तो टेढ़ेमेढ़े दांत बाहर निकल आते हैं. मुंह से झाग के छींटे फेंकता रहता है. देख कर उबकाई आती है. नीहारिका उस से अंतरंग नहीं हो सकती.

यह आदेश निकालने के बाद मुझे लगा कि मैं ने नीहारिका को प्राप्त कर लिया है. इस परिवर्तन से कार्यालय में क्या प्रतिक्रिया हुई, मुझे पता नहीं चला. न अनुराग ने मुझ से कुछ कहा न नीहारिका ने कोई शिकायत की. मैं मन ही मन खुश होता रहा.

नीहारिका को मैं पहले की तरह काम के लिए अपने कमरे में बुलाता रहा. वह आती और हंसतीमुसकराती काम करती. मैं अपनी कुरसी छोड़ उस के पीछे खड़ा हो जाता. उस का मुंह कंप्यूटर की तरफ होता. मैं डिक्टेशन देने के बहाने उस की कुरसी की पीठ से सट कर खड़ा हो जाता. फिर अनजान बनता हुआ थोड़ा झुक कर भी उस के कंधे पर, कभी पीठ पर हाथ रख देता.

नीहारिका न तो मेरी तरफ देखती, न कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करती. मेरा हौसला बढ़ता जाता और मैं उस की पीठ सहलाने लगता. तब वह उठ कर खड़ी हो जाती. कहती, ‘‘मैं 2 मिनट में आती हूं.’’ और वह चली जाती. फिर उस दिन उसे नहीं बुलाता. पता नहीं, उस के मन में क्या हो? यह जानने के लिए मैं थोड़ी देर में हरीश के कमरे में जाता तो वहां नीहारिका को प्रफुल्लित देखता. मतलब उस ने मेरी हरकतों का बुरा नहीं माना. मैं आगे बढ़ सकता हूं.

मैं दूसरे दिन का इंतजार करता. दूसरा दिन, फिर तीसरा दिन…दिन पर दिन बीतते जा रहे थे, पर बात शारीरिक स्पर्श से आगे नहीं बढ़ पा रही थी. नीहारिका पत्थर की तरह बन गई थी. मेरी हरकतों पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती. मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. शरीर में उफान सा आता, पर उसे ज्वार का रूप देना मेरे हाथ में नहीं था.

नीहारिका मेरा साथ नहीं दे रही थी. जब मैं उस के साथ कोई हरकत करता, वह बाहर चली जाती, दोबारा बुलाने पर भी जल्दी मेरे कमरे में नहीं आती थी. मुझे अर्दली को 2-3 बार भेजना पड़ता. तब कहीं आती और तबीयत ठीक न होने का बहाना बनाती. पर मैं प्रेमरोग से पीडि़त उस की बात की तरफ ध्यान न देता. उस की भावनाओं से मुझे कोई लेनादेना नहीं था.

पर एक दिन बम सा फट गया. मैं ने उस के साथ हरकत की और वह हो गया, जिस की मैं ने कभी उम्मीद नहीं की थी. मैं उस घटना के बारे में यहां नहीं लिख सकता. मैं इतना चकित और हैरान हूं कि ऐसा कैसे हो गया? क्या नीहारिका जैसी कमजोर लड़की मेरे साथ ऐसा कर सकती है?

अब नारी जाति से मेरा विश्वास उठ गया है. ऊपर से वह कुछ और दिखती है, मन में उस के कुछ और होता है. आसानी से उस के मन को पढ़ पाना या समझ पाना संभव नहीं है. मैं उस की हंसी और प्रेमिल व्यवहार से सम्मोहित हो गया था. समझ बैठा था कि वह मुझे प्रेम करने लगी है. परंतु नहीं…खूबसूरत पंछी सूने वीरान पेड़ पर कभी नहीं बैठता. नीहारिका के बारे में मैं ने बहुत गलत सोचा था. कभी नीहारिका से आप की मुलाकात होगी तो वह अवश्य इस बात का जिक्र करेगी.

मेरा प्रेम का ज्वर जिस तीव्रता से उठा था उसी तीव्रता के साथ झाग की तरह बैठ गया. नीहारिका मेरे सामने से चली गई. मैं उसे चाह कर भी नहीं रोक सकता था. रोकता भी तो वह नहीं रुकती. मेरे अंदर का सांप मर गया.

नागेश की ज्यादतियां बढ़ती जा रही हैं. नीहारिका को अब वह ज्यादा समय अपने कमरे में ही बिठा कर रखता है. काम क्या करवाता होगा, गप्पें ही मारता होगा. नीहारिका से पूछता हूं तो उस के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताती है. मैं मन मसोस कर रह जाता हूं. नागेश क्या मेरे और नीहारिका के बीच दूरियां बनाने का प्रयत्न कर रहा है? लेकिन वह इस में सफल नहीं होगा. नीहारिका और मेरे बीच अब कोई दूरी नहीं रह गई है. उस ने मेरे शादी के प्रस्ताव को मान लिया है. मैं जल्द ही उस के मांबाप से मिलने वाला हूं.

नीहारिका मेरी मनोदशा समझती है. इसीलिए वह नागेश के बारे में भूल कर भी बात नहीं करती है. मैं खोदखोद कर पूछता हूं…तब भी नहीं बताती. मैं खीझ कर कहता हूं, ‘‘वह हरामी कोई ज्यादती तो नहीं करता तुम्हारे साथ?’’

वह हंस कर कहती, ‘‘तुम को मेरे ऊपर विश्वास है न. तो फिर निश्ंिचत रहो. अगर ऐसी कोई स्थिति आई तो मैं स्वयं उस से निबट लूंगी. तुम चिंता न करो.’’

‘‘क्यों न करूं? तुम एक नाजुक लड़की हो और वह विषधर काला नाग. कमीना आदमी है. पता नहीं, कब कैसी हरकत कर बैठे तुम्हारे साथ? उस के साथ कमरे में अकेली जो रहती हो.’’

नीहारिका के चेहरे पर वैसी ही मोहक मुसकान है. आंखों में चंचलता और शैतानी नाच रही है. निचले होंठ का दायां कोना दांतों से दबा कर कहती है, ‘‘वैसी हरकत तो तुम भी कर सकते हो मेरे साथ. तुम्हारे साथ भी एकांत कमरे में रहती हूं.’’ उस ने जैसे मुझे निमंत्रण दिया कि मैं चाहूं तो उस के साथ वैसी हरकत कर सकता हूं. वह बुरा नहीं मानेगी. हम दोनों इंडिया गेट पर भीड़भाड़ से दूर एकांत में टहल रहे थे. अंधेरा घिरने लगा था. मैं ने इधरउधर देखा. कहीं कोई साया नहीं, आहट नहीं. मैं ने नीहारिका को अपनी बांहों में समेट लिया. वह फूल की तरह मेरे सीने में सिमट गई. नागेश रूपी सांप हमारे बीच से गायब हो चुका था.

नीहारिका ने जिस भाव से अपने को मेरी बांहों में सौंपा था, मुझे उस के प्रति कोई अविश्वास न रहा. मैं नागेश की तरफ से भी आश्वस्त हो गया कि नीहारिका उस की किसी भी बेजा हरकत से निबट लेगी. दोनों को ले कर मेरी चिंता निरर्थक है.

इधर लगता है, नागेश को नीहारिका के साथ मेरे प्यार को ले कर शक हो गया है. तभी तो उस ने आदेश पारित किया है कि अब वह हरीश के साथ काम करेगी. मुझे इस से कोई अंतर नहीं पड़ने वाला. नीहारिका मेरे इतने करीब आ चुकी है कि उसे मुझ से जुदा करना नागेश के बूते की बात नहीं है. मुझे इंतजार उस दिन का है जब नीहारिका ब्याह कर मेरे घर आएगी.

नीहारिका की डायरी

बहुत कुछ बरदाश्त के बाहर होता जा रहा है. नागेश ने मुझे अपनी संपत्ति समझ लिया है. इसी तरह की बातें भी करता है और व्यवहार भी.

पता नहीं…शायद नागेश को शक हो गया है कि अनुराग और मेरे बीच अंतरंगता बढ़ती जा रही है. शायद शक न भी हो, पर उसे डर लगता है कि मैं या अनुराग एकदूसरे के ऊपर आसक्त हो जाएंगे. इसी डर की वजह से उस ने मुझे हरीश के साथ लगा दिया है.

मुझे इस से कोई अंतर नहीं पड़ता. दिन में न सही, शाम को हम दोनों मिलते हैं. अनुराग और मेरे दिलों के बीच क ी दूरी समाप्त हो चुकी है. बस, शादी के बंधन में बंधना है. इस में थोड़ी सी रुकावट है. मेरी पक्की नौकरी नहीं है. उम्र भी अभी कम है. मैं ने अनुराग से कह दिया है. कम से कम 1 साल उसे इंतजार करना पड़ेगा. वह तैयार है. तब तक कोई नौकरी मिल ही जाएगी. तब हम दोनों शादी के बंधन में बंध जाएंगे.

अब नागेश खुले सांड की तरह खूंखार होता जा रहा है. जब से हरीश के साथ लगाया है, एक पल के लिए पीछा नहीं छोड़ता या तो अपने कमरे में बुला लेता है या खुद हरीश के कमरे में आ कर बैठ जाता है और अनर्गल बातें करता है. उस के चक्कर में न तो हरीश कोई काम कर पाता है न वह मुझ से कोई काम करवा पाता है.

नागेश की वजह से पूरे दफ्तर में मैं बदनाम होती जा रही हूं. सब मुझे एसी वाली लड़की कहने लगे हैं. नागेश के कमरे में एसी जो लगा है. लोग जब मुझे एसी वाली लड़की कहते हैं मैं हंस कर टाल जाती हूं. किसी बात का प्रतिरोध करने का मतलब उस को बढ़ावा देना है, कहने वालों की सोच बेलगाम हो जाती और फिर मेरे और नागेश के बारे में तरहतरह की बातें फैलतीं, चर्चाएं होतीं. इस में मेरी ही बदनामी होती. नागेश का क्या जाता? उस से कोई कुछ भी न कहता. मैं अस्थायी थी. लोग सोचते, मैं नागेश को फंसा कर अपनी नौकरी की जुगाड़ में लगी हूं. सचाई किसी को पता नहीं है.

नागेश का मुंह तो चलता ही रहता है, अब उस के हाथ भी चलने लगे हैं. वह मेरे पीछे आ कर खड़ा हो जाता है और कंप्यूटर पर काम करवाने के बहाने कभी सर, कभी कंधे और कभी पीठ पर हाथ रख देता है. मुझे उस का हाथ मरे हुए सांप जैसा लगता है. कभीकभी मरा हुआ सांप जिंदा हो जाता है. उस का हाथ अधमरे सांप की तरह मेरी पीठ पर रेंगने लगता है. वह मेरी पीठ सहलाता है. मुझे गुदगुदी का एहसास होता है, परंतु उस में लिजलिजापन होता है.

मन में एक घृणा उपजती है, कोई प्यार नहीं. नागेश के प्रति मैं एक आक्रोश से भर जाती हूं, परंतु इसे बाहर नहीं निकाल सकती. मैं बरदाश्त करने की कोशिश करती हूं. देखना चाहती हूं कि वह किस हद तक जा सकता है. मेरी तय हुई हद के बाहर जाते ही वह परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे…मैं ने मन ही मन तय कर लिया था. जैसे ही उस ने हद पार की, मेरा रौद्र रूप प्रकट हो जाएगा. अभी तक उस ने मेरी हंसी और प्यारी मुसकराहट देखी है. बूढ़े को पता नहीं है कि लड़कियां आत्मरक्षा और सम्मान के लिए चंडी बन सकती हैं.

जब वह मेरी पीठ सहलाता है मैं बहाना बना कर बाहर निकल जाती हूं. कोशिश करती हूं कि जल्दी उस के कमरे में न जाना पड़े. पर वह शैतान की औलाद…कहां मानने वाला है. बारबार बुलाता रहता है. मैं देर करती हूं तो वह खुद उठ कर हरीश के कमरे में आ जाता है…न खुद चैन से बैठता है न मुझे बैठने देता है.

उस दिन हद हो गई. उस ने सारी सीमाएं तोड़ दीं. उस का बायां हाथ अधमरे सांप की तरह मेरी पीठ पर रेंग रहा था. मैं मन ही मन सुलग रही थी. अचानक उस का हाथ आगे बढ़ा और मेरी बांह के नीचे से होता हुआ कुछ ढूंढ़ने का प्रयास करने लगा. मैं समझ गई, वह क्या चाहता था? मैं थोड़ा सिमट गई परंतु उस ने घात लगा कर मेरे बाएं वक्ष को अपनी हथेली में समेट लिया. उसी तरह जैसे चालाक सांप बेखबर मेढक को अपने मुंह में दबोच लेता है.

यह मेरी तय की हुई हद से बाहर की बात थी. मैं अपना होश खो चुकी थी. अचानक खड़ी हो गई. उस का हाथ छिटक गया. पर मेरा दायां हाथ उठ चुका था. बिजली की तरह उस के बाएं गाल पर चिपक गया, मैं ने जो नहीं सोचा था वह हो गया. जोर से तड़ाक की आवाज आई और वह दाईं तरफ बूढे़ बैल की तरह लड़खड़ा कर रह गया.

मैं ने उस के मुंह पर थूक दिया और किटकिटा कर कहा, ‘‘मैं ने दोस्ती की थी…शादी नहीं.’’ और तमतमाती हुई बाहर निकल गई.

फिर मैं वहां नहीं रुकी. नागेश के कमरे से बाहर आते ही मैं बिलकुल सामान्य हो गई. अनुराग को चुपके से बुलाया और कार्यालय के बाहर चली गई. बाहर आ कर मैं ने अनुराग को सबकुछ बता दिया. वह हैरानी से मेरा मुंह ताकने लगा, जैसे उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं ऐसा भी कर सकती हूं. वह मुझे बच्ची समझता था…20 वर्ष की अबोध बच्ची. परंतु मैं अबोध नहीं थी.

अनुराग ने चुपचाप मुझे एक बच्ची की तरह सीने से लगा लिया, जैसे उसे डर था कि कहीं खो न जाऊं. परंतु मैं खोने वाली नहीं थी क्योंकि मैं इस बेरहम और स्वार्थी दुनिया के बीच अकेली  नहीं थी, अनुराग के प्यार का संबल जो मुझे थामे हुए था.

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