गरबा नाइट में चुराना चाहती हैं लाइमलाइट, जाह्नवी और सानया से लें इंस्पिरेशन

Garba Outfit: गरबा नाइट आते ही हर लड़की का दिमाग एक ही चीज में लग जाता है कि क्या पहनें? किस तरह का लुक दिखने में अच्छा होगा स्टाइलिश या ट्रेडिशनल? इन सब सवालों का जवाब पाने लिए बॉलीवुड एक्ट्रेसेस से इंपास्पिरेशन लेना सबसे बेस्ट औप्शन है. क्योंकि जब हम उन्हें किसी इवेंट या फेस्टिवल में देखते हैं, तो उनके आउटफिट्स, मेकअप और एक्सेसरीज हमेशा ट्रेंड्स सेट करते हैं.

बात गरबा की हो या डांडिया की, अंबानी परिवार हर त्योहार को बड़ी धूमधाम से मनाता है. गरबा के दिन आप अंबानी परिवार की छोटी बहू राधिका मर्चेंट के लुक्स से आसानी से इंस्पिरेशन ले सकती हैं. राधिका ने मल्टीकलर लहंगे को जिस तरह पिनअप स्टाइल में पहना है, वो गरबा में डांस करते समय आपको बहुत आरामदायक महसूस कराएगा.

जाह्नवी कपूर का फैशन हमेशा चर्चा में रहता है, इस बार अगर आप डांडिया नाइट में कुछ ग्रेस फुल और ट्रेडिशनल पहनने का सोच रही हैं तो जाह्नवी कपूर के इस लुक को अपना सकते हैं. जाह्नवी का ये मल्टीकलर हैवी एंब्रॉयडेड वाला चनिया चोली डांडिया नाइट के लिए परफेक्ट है.

अपनी अपकमिंग फिल्म ‘सनी संस्कारी की तुलसी कुमारी’ के प्रोमोशन के दौरान जाह्नवी ने इस लुक को कैरी किया है. यही नहीं सानया मल्होत्रा ने भी गुजराती थीम को ध्यान में रखते हुए वाइब्रैंट और अट्रैक्टिव लुक लिया है. सानया ने मैरून कलर का लहंगी चोली पहनी है, उन्होंने इसमें हैवी वर्क वाला दुपट्टा कैरी किया है. बड़े बड़े झुमकों और सिंपल बन के साथ सानया लाइमलाइट चुराती दिखीं.

वहीं शिल्पा शेट्टी ने भी इस फेस्टिव सीजन ट्रेडिशनल आउटफिट को मौडर्न टच देते हुए वियर किया है. हैवी वर्क वाले मौडर्न ब्लाउज के साथ शिल्पा ने बालों में कलरफुल ब्रेड्स लगाए हुए हैं. इससे उनके लुक में चार चांद लग गए हैं.

इन बातों का ख्याल रखें

सिंपल मेकअप
गरबा नाइट में ज्यादा भारी मेकअप करना आपके लुक को ओवर कर सकता है और जब आप खुले एरिया में डांस करेंगी तो पसीने से आपका हैवी मेकअप केकी भी हो सकता है. नैचुरल ग्लो, हल्का आईलाइनर और लिप कलर काफी होगा. इससे आप स्टाइलिश भी दिखेंगी और डांस करते समय आराम भी महसूस होगा.

हेयरस्टाइल आसान रखें
लंबी चोटी, हल्का वेव्स या बन स्टाइल में बाल बांधना बेहतर रहता है. ये आपके लुक को क्लासिक बनाता है और डांस करते समय बाल चेहरे में नहीं आते. अगहर आपप बाल खुले रख रही हैं तो साथ में एक रबर बैंड भी रख लें ताकि गर्मी में आप उसे टाइ कर सकें.

मैचिंग ज्वेलरी
भारी गहने पहनने से बचें. छोटे झुमके, चूड़ियां और हल्का नेकपीस ही काफी है. इससे लुक स्टाइलिश रहेगा और आप आसानी से मूव कर पाएंगी.

आरामदायक फुटवियर
गरबा में घंटों डांस करना होता है, इसलिए हाई हील्स छोड़कर फ्लैट सैंडल या जूती पहनें. स्टाइल और कम्फर्ट दोनों बनाए रखना जरूरी है.

Garba Outfit

Drama Story: वरमाला- सोमेश-किरन की जिंदगी में खलनायक कौन बन के आया

Drama Story: ‘‘किरन, तुम अंदर जाओ,’’ बेलाजी किरन को अपने मंगेतर सोमेश के साथ जाने को तैयार खड़ा देख कर बोलीं.

किरन सकपका गई पर मां का आदेश टाल नहीं सकी. सोमेश की समझ में भी कुछ नहीं आया पर कुछ उलटासीधा बोल कर बेलाजी को नाराज नहीं करना चाहता था वह.

‘‘मम्मी, रवींद्रालय में एक नाटक का मंचन हो रहा है. बड़ी कठिनाई से 2 पास मिले हैं. आप आज्ञा दें तो हम दोनों देख आएं,’’ वह अपने स्वर को भरसक नम्र बनाते हुए बोला.

‘‘देखो बेटे, हम बेहद परंपरावादी लोग हैं. विवाह से पहले हमारी बेटी इस तरह खुलेआम घूमेफिरे, यह हमारे समाज में पसंद नहीं किया जाता. किरन के पापा बहुत नाराज हो रहे थे,’’ बेलाजी कुछ ऐसे अंदाज में बोलीं मानो आगे कुछ सुनने को तैयार ही न हों.

‘‘मम्मी, बस आज अनुमति दे दीजिए. इस के बाद विवाह होने तक मैं किरन को कहीं नहीं ले जाऊंगा,’’ सोमेश ने अनुनय किया.

‘‘कहा न बेटे, मैं किरन के पापा की

इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकती,’’ वे बेरुखी से बोलीं.

सोमेश दांत पीसते हुए बाहर निकल गया. बड़ी कठिनाई से उस ने नाटक के लिए पास का प्रबंध किया था. उसे बेलाजी से ऐसे व्यवहार की उम्मीद नहीं थी.

किरन से उस की सगाई 2 माह पूर्व हुई थी. तब से वे दोनों मिलतेजुलते रहे थे. उन के साथ घूमनेफिरने पर कभी किसी ने कोई आपत्ति नहीं की थी. फिर आज अचानक परंपरा की दुहाई क्यों दी जाने लगी? सोमेश ने क्रोध में दोनों पास फाड़ दिए और घर जा पहुंचा.

‘‘क्या हुआ, नाटक देखने नहीं गए

तुम दोनों?’’ सोमेश को देखते ही उस की मां ने पूछा.

‘‘नहीं, उन के घर की परंपरा नहीं है यह.’’

‘‘कौन सी परंपरा की बात कर रहा है तू?’’

‘‘यही कि विवाहपूर्व उन की बेटी अपने मंगेतर के साथ घूमेफिरे.’’

‘‘किस ने कहा तुम से यह सब?’’

‘‘किरन की मम्मी ने.’’

‘‘पर तुम दोनों तो कई बार साथ घूमने

गए हो.’’

‘‘परंपराएं बदलती रहती हैं न मां.’’

‘‘बहुत देखे हैं परंपराओं की दुहाई देने वाले. उन्हें लगता होगा जैसे हम कुछ जानते ही नहीं. जबकि सारा शहर जानता है कि किरन की बड़ी बहन ने घर से भाग कर शादी कर ली थी. तुम ने किरन को पसंद कर लिया, नहीं तो ऐसे घर की लड़की से विवाह कौन करता.’’

‘‘छोड़ो न मां, हमें उस की बहन से क्या लेनादेना. वैसे मुझे ही क्यों, किरन तो आप को भी बहुत भा गई है,’’ कह कर सोमेश हंसा.

‘‘यह हंसने की बात नहीं है, सोमू. मुझे तो दाल में कुछ काला लगता है. नहीं तो इस तरह के व्यवहार का क्या अर्थ है? किरन से साफ पूछ ले. कोई और तो नहीं है उस के मन में?’’

‘‘मां, दोष किरन का नहीं है. वह तो मेरे साथ आने को तैयार थी. पर उस की मम्मी

के व्यवहार से मुझे बहुत निराशा हुई. उन से मुझे ऐसी आशा नहीं थी,’’ सोमेश उदास स्वर में बोला.

‘‘समझ क्या रखा है इन लोगों ने. जैसे चाहेंगे वैसे व्यवहार करेंगे?’’ बेटे की उदासी देख कर रीनाजी स्वयं पर नियंत्रण खो बैठीं.

‘‘शांति मां, शांति. पता तो चलने दो कि माजरा क्या है.’’

‘‘कब तक शांति बनाए रखें हम. हमारा कुछ मानसम्मान है या नहीं. मुझे तो लगता है कि हमें इस संबंध को तोड़ देना चाहिए. तभी इन लोगों की अक्ल ठिकाने आएगी.’’

‘‘ठीक है मां. पापा को आने दो. उन से विचार किए बिना हम कोई निर्णय भला कैसे ले सकते हैं,’’ सोमेश ने मां को शांत करने का प्रयत्न किया.

‘‘वे तो अगले सप्ताह ही लौटेंगे. आज ही फोन आया था. वे घर में रहते ही कब हैं,’’ रीना ने अपना पुराना राग अलापा.

‘‘क्या करें मां, पापा की नौकरी ही ऐसी है,’’ सोमेश ने कंधे उचका दिए थे और रीनाजी चुप रह गईं.

अगले दिन सोमेश अपने औफिस पहुंचा ही  था कि किरन का फोन आया.

‘‘कहो, इस नाचीज की याद कैसे आ गई?’’ सोमेश हंसा.

‘‘तुम्हें मजाक सूझ रहा है. यहां मेरी जान पर बनी है,’’ किरन रोंआसी हो उठी.

‘‘कल मेरा घोर अपमान करने के बाद अब तुम्हारी जान को क्या हुआ?’’ सोमेश ने रूखे स्वर में पूछा.

‘‘इसीलिए तो फोन किया है तुम्हें. अभी गेलार्ड चले आओ. बहुत जरूरी बात करनी है,’’ किरन ने आग्रह किया.

‘‘मैं यहां काम करता हूं. तुम्हारी तरह कालेज में नहीं पढ़ता हूं कि कालेज छोड़ कर गेलार्ड में बैठा रहूं.’’

‘‘पता है, यह जताने की जरूरत नहीं है कि तुम बहुत व्यस्त हो और मुझे कोई काम नहीं है. बहुत जरूरी न होता तो मैं तुम्हें कभी फोन नहीं करती,’’ किरन का भीगा स्वर सुन कर चौंक गया सोमेश.

‘‘ठीक है, तुम वहीं प्रतीक्षा करो मैं

10 मिनट में वहां पहुंच रहा हूं.’’

सोमेश को देखते ही किरन फूटफूट कर रो पड़ी.

‘‘क्या हुआ? कुछ बोलो तो सही,’’ सोमेश किरन को सांत्वना देते हुए बोला था.

‘‘मां ने मुझे आप से मिलने को मना

किया है.’’

‘‘यह तो मैं कल ही समझ गया था. पर उन्हें हुआ क्या है?’’

‘‘वे यह मंगनी तोड़नी चाहती हैं.’’

‘‘पर क्यों?’’

‘‘पापा को कोई और पसंद आ गया है, कहते हैं कि मंगनी ही तो हुई है कौन सा विवाह हो गया है.’’

‘‘ऐसी क्या खूबी है उन महाशय में.’’

‘‘सरकारी नौकरी में हैं वे महाशय.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘पापा कहते हैं कि सरकारी नौकरी वाले की जड़ पाताल में होती है.’’

‘‘तो जाओ रहो न पाताल में, किस ने रोका है,’’ सोमेश हंसा.

‘‘तुम्हें मजाक सूझ रहा है. यहां मेरी जान पर बनी है.’’

‘‘पहेलियां बुझाना छोड़ो और यह बताओ कि तुम क्या चाहती हो?’’

‘‘मुझे लगा तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं क्या चाहती हूं. मैं तो किसी और से विवाह की बात सोच भी नहीं सकती,’’ किरन रोंआसी हो उठी.

‘‘फिर भला समस्या क्या है? अपने मम्मीपापा को बता दो कि और किसी के चक्कर में न पड़ें.’’

‘‘सब कुछ कह कर देख लिया पर वे कुछ सुनने को तैयार ही नहीं हैं. अब तो तुम ही कुछ करो तो बात बने.’’

‘‘फिर तो एक ही राह बची है. हम दोनों भाग कर शादी कर लेते हैं.’’

‘‘नहीं सोमेश, मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगी. दीदी ने ऐसा ही किया था. तब हम ने इतनी बदनामी और शर्म झेली थी कि आज वह सब याद कर के मन कांप उठता है.’’

‘‘पर हमारे सामने और कोई राह नहीं बची किरन.’’

‘‘सोचो सोमेश, कोई तो राह होगी. नहीं तो मैं जीतेजी मर जाऊंगी.’’

‘‘इतनी सी बात पर इस तरह निराश होना अच्छा नहीं लगता. मेरा विश्वास करो, हमें कोई अलग नहीं कर सकता. तुम बस इतना करो कि अपने इन प्रस्तावित भावी वर महोदय का नाम और पता मुझे ला कर दो.’’

‘‘यह कौन या कठिन कार्य है. जगन नाम है उस का. यहीं सैल्स टैक्स औफिस में कार्य करता है. तुम्हें दिखाने के लिए फोटो भी लाई हूं. किरन ने अपने पर्स में से फोटो निकाली.’’

‘‘अरे, यह तो स्कूल में मेरे साथ पढ़ता था. तब तो समझो काम बन गया. मैं आज ही जा कर इस से मिलता हूं. यह मेरी बात जरूर समझ जाएगा.’’

‘‘इतना आशावादी होना भी ठीक नहीं है. मेरी सहेली नीरा इन महाशय से मिल कर उन्हें सब कुछ बता चुकी है. पर वे तो अपनी ही बात पर अड़े रहे. कहने लगे कि सगाई ही तो हुई है, कौन सा विवाह हो गया है. अभी तो बेटी बाप के घर ही है.’’

‘‘बड़ा विचित्र प्राणी है यह, पर तुम चिंता मत करो. मैं इसे समझाऊंगा,’’ सोमेश ने आश्वासन दिया.

‘‘पता नहीं, अब तो मुझे किसी पर विश्वास ही नहीं रहा. मातापिता ही मेरी बात नहीं समझेंगे यह मैं ने कब सोचा था,’’ किरन सुबक उठी.

‘‘चिंता मत करो. कितनी भी बाधाएं क्यों न आएं हमारे विवाह को कोई रोक नहीं सकता,’’ सोमेश का दृढ़ स्वर सुन कर किरन कुछ आश्वस्त हुई.

समय मिलते ही सोमेश जगन से मिलने जा पहुंचा था.

‘‘पहचाना मुझे?’’ सोमेश बड़ी गर्मजोशी से जगन के गले मिलते हुए बोला.

‘‘तुम्हें कैसे भूल सकता हूं. तुम तो हमारी क्लास के हीरो हुआ करते थे. कहो आजकल क्या कर रहे हो?’’ जगन अपने विशेष अंदाज में बोला.

‘‘एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करता हूं.’’

‘‘कितना कमा लेते हो.’’

‘‘20 लाख रुपए प्रति वर्ष का पैकेज है. तुम अपनी सुनाओ.’’

‘‘अपनी क्या सुनाऊं, मित्र. तुम्हारे 20 लाख रुपए मेरी कमाई के आगे कुछ नहीं हैं. यह फ्लैट मेरा ही है और ऐसे 3 और हैं. मुख्य बाजार में 3 दुकानें हैं. घर में कितना पैसा कहां पड़ा है, मैं स्वयं भी नहीं जानता,’’ जगन ने बड़ी शान से बताया. तभी नौकर ने सोमेश के सामने मिठाई, नमकीन, मेवा आदि सजा दिया.

‘‘साहब, चाय लेंगे या ठंडा?’’ उस ने प्रश्न किया.

‘‘ठंडा ले आओ. साहब चाय नहीं पीते,’’  उत्तर जगन ने दिया.

‘‘तुम्हें अब तक याद है?’’ सोमेश ने अचरज से उसे देखा.

‘‘मुझे सब भली प्रकार याद है. तुम लोग किस प्रकार मेरा उपहास करते थे, मैं तो यह भी नहीं भूला. दोष तुम लोगों का नहीं था. मैं था ही फिसड्डी, खेल में भी और पढ़ाई में भी. पर मौसम कुछ ऐसा बदला कि जीवन में वसंत

छा गई.’’

‘‘ऐसा क्या हो गया, जो तुम मंत्रमुग्ध हुए जा रहे हो?’’

‘‘तुम तो मेरे बचपन के मित्र हो, तुम से क्या छिपाना. पापा ने जोड़तोड़ कर के मुझे सैल्स टैक्स औफिस में क्लर्क क्या लगवाया, मेरे लिए तो सुखसंपन्नता का द्वार ही खोल दिया. अब मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. पर अब भी मैं सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास करता हूं. क्या करूं दीवारों के भी कान होते हैं, इसलिए सावधान रहना पड़ता है.’’

‘‘तुम कुछ भी कहो पर ईमानदारी से जीवनयापन का अपना ही महत्त्व है,’’ सोमेश ने तर्क दिया.

‘‘अब मैं स्कूल का छात्र नहीं हूं सोमेश, कि तुम मुझे डांटडपट कर चुप करा दोगे. सत्य और ईमानदारी की बातें अब खोखली सी लगती हैं. मेरी भेंट तो किसी ईमानदार व्यक्ति से हुई नहीं आज तक. तुम्हें मिले तो मुझ से भी मिलवाना. जिस समाज में पैसा ही सब कुछ

हो, वहां इस तरह की बातें बड़ी हास्यास्पद लगती हैं.’’

‘‘छोड़ो यह सब, मैं तो एक जरूरी

काम से आया हूं,’’ सोमेश बहस को आगे बढ़ाने के मूड में नहीं था, इसलिए बात को बदलते हुए बोला.

‘‘कहो न, सैल्स टैक्स औफिस में किसी मित्र या संबंधी का केस फंस गया क्या? मेरी पहुंच बहुत ऊपर तक है.’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं है. मैं तो एक व्यक्तिगत काम से आया हूं.’’

‘‘कहो न, मुझ से जो बन पड़ेगा मैं करूंगा.’’

‘‘तुम कल एक लड़की देखने जा रहे

हो न?’’

‘‘देखने नहीं, मिलने जा रहा हूं. पहली बार कोई लड़की मुझे बहुत भा गई है.’’

‘‘मेरी बात तो सुनो पहले, अपनी राम कहानी बाद में सुनाना. उस लड़की से मेरा संबंध पक्का हो गया है, अत: तुम उस से मिलने का खयाल अपने दिमाग से निकाल दो.’’

‘‘यह आदेश है या प्रार्थना?’’

‘‘तुम जो भी चाहो समझने के लिए स्वतंत्र हो, पर तुम्हें मेरी यह बात माननी ही पड़ेगी.’’

‘‘तुम भी मेरी बात समझने की कोशिश करो मित्र. मेरा किरन के घर जाने का कार्यक्रम

तय हो चुका है. अब मना करूंगा तो बुरा लगेगा. क्यों न हम यह निर्णय कन्या के हाथों में ही छोड़ दें. स्वयंवर में वरमाला तो उसी के हाथ में होगी. है न,’’ जगन ने अपना पक्ष सामने रखा.

‘‘तो तुम मुझे चुनौती दे रहे हो? बहुत पछताओगे, बच्चू. तुम लाख प्रयत्न कर लो, किरन कभी तुम से विवाह करने को तैयार

नहीं होगी.’’

‘‘यह तो समय ही बताएगा,’’ जगन हंसा.

‘‘ठीक है, मैं तुम्हारी चुनौती स्वीकार करता हूं. जाओ मिल लो उस से पर तुम्हारे हाथ निराशा ही लगेगी,’’ सोमेश जगन से विदा लेते हुए उठ खड़ा हुआ.

ऊपर से शांत रहने का प्रयत्न करते हुए भी सोमेश मन ही मन तिलमिला उठा था. समझता क्या है अपने को. ऊपर की कमाई के बल पर इठला रहा है. किरन इसे कभी घास नहीं डालेगी.

सोमेश ने जगन से मिलने के

बाद किरन को फोन नहीं किया. वह व्यग्रता से किरन के फोन की प्रतीक्षा कर रहा था.

 

2 दिन बाद वह घर पहुंचा ही था कि किरन

का फोन आया, ‘‘समझ में नहीं आ रहा

कि तुम्हें कैसे बताऊं,’’ वह बड़े ही नाटकीय अंदाज में बोली.

‘‘कह भी डालो, जो कहना चाहती हो.’’

‘‘क्या करूं, मातापिता की इच्छा के सामने झुकना ही पड़ा. मैं उन का दिल दुखाने का साहस नहीं जुटा सकी. आशा है, तुम मुझे क्षमा कर दोगे.’’

उत्तर में सोमेश ने क्या कहा था, अब

उसे याद नहीं है. पर उस घटना की टीस कई माह तक उस के मनमस्तिष्क पर छाई रही. भ्रष्टाचार का दानव उस के निजी जीवन को भी लील जाएगा, ऐसा तो उस ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था. कौन कहेगा कल तूफान गुजरा था यहां से.

कई साल बाद जब अनायास एक पार्टी में गहनों से लदीफदी किरन से मुलाकात हुई तो उस ने बताया कि उस दिन जगन कोई 4 लाख रुपयों का सैट ले कर आया था. जहां लड़के वाले दहेज मांगते हैं, वहां लड़का पहली मुलाकात में महंगा सैट देगा तो कौन सौफ्टवेयर इंजीनियर से शादी करेगा. किरन पार्टी की भीड़ में इठलाती हुई गुम हो गई.

Drama Story

Best Hindi Story: 16वें साल की कारगुजारियां

Best Hindi Story; कैफेकौफी डे में पहुंच कर सौम्या, नीतू और मिताली कौफी और स्नैक्स का और्डर दे कर आराम से बैठ गईं. नीतू ने सौम्या को टोका, ‘‘आज तेरा मूड कुछ खराब लग रहा है… शौपिंग भी तूने बुझे मन से की. पति से झगड़ा हुआ है क्या?’’

‘‘नहीं यार… छोड़, घर से निकल कर भी क्या घर के ही झमेलों में पड़े रहना? कोई और बात कर… मेरा मूड ठीक है.’’

‘‘ऐसा तो है नहीं कि तेरा खराब मूड हमें पता न चले. हमेशा खुश रहने वाली हमारी सहेली को क्या चिंता सता रही है, बता दे? मन हलका हो जाएगा,’’ मिताली बोली.

म्या ने फिर टालने की कोशिश की, लेकिन उस की दोनों सहेलियों ने पीछा नहीं छोड़ा. तीनों पक्की सहेलियां थीं. शौपिंग के बाद कौफी पीने आई थीं. तीनों अंधेरी की एक सोसायटी में रहती थीं. सौम्या ने उदास स्वर में कहा, ‘‘क्या बताऊं, निक्की के तौरतरीकों से परेशान हो गई हूं… हर समय फोन… हम लोगों से बात भी करेगी तो ध्यान फोन में ही रहेगा. पता नहीं क्या चक्कर है… सोएगी तो फोन को तकिए के पास रख कर सोएगी. 16 साल की हो गई है. चिंता लगी रहती है कि कहीं किसी लड़के के चक्कर में तो नहीं पड़ गई.’’

‘‘अरे, इस बात ने तो मेरी भी नींद उड़ाई हुई है… सोनू का भी यही हाल है. टोकती हूं तो कहता है कि चिल मौम, टेक इट इजी. मैं बड़ा हो गया हूं. बताओ, वह भी तो 16 साल का ही हुआ है. कैसे छोड़ दूं उस की चिंता. कितना समझाया… हर समय मैसेज में ध्यान रहेगा तो पढ़ेगा कब? पता नहीं क्या होगा इन बच्चों का?’’ नीतू बोली. तभी वेटर कौफी और स्नैक्स रख गया. कौफी का 1 घूंट पी कर नीतू मिताली से बोली, ‘‘हमारा तो 1-1 ही बच्चा है… तू तो पागल हो गई होगी 2 बच्चों की देखरेख करते… तेरी तानिया और यश भी तो इसी उम्र से गुजर रहे हैं.’’ मिताली ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हां, यश 16वां साल पूरा करने वाला है. तानिया उस से 2 ही साल छोटी है.’’

‘‘दोनों पागल कर देते होंगे तुझे? मैं तो निक्की पर नजर रखतेरखते थक गई हूं. रात में कई बार उठ कर चैक करती हूं कि क्या कर रही है. पता नहीं इतनी रात तक क्या करती रहती है, कब सोती है. आजकल तो बच्चनजी की यह पंक्ति बारबार याद आती है कि कुछ अवगुन कर ही जाती है चढ़ती जवानी…’’ सौम्या ने कहा. नीतू ठंडी सांस लेते हुए बोली, ‘‘सोनू का तो फोन चैक भी नहीं कर सकती. लौक लगाए रखता है. देख लो, अभी 16-16 साल के ही हैं ये बच्चे और नाच नचा देते हैं मांबाप को.’’ मिताली के होंठों पर मुसकराहट देख कर नीतू ने कहा, ‘‘तू लगातार क्यों मुसकरा रही है? क्या तू परेशान नहीं होती?’’

‘‘परेशान? मैं? नहीं, बिलकुल नहीं.’’

‘‘क्या कह रही हो, मिताली?’’

‘‘हां, माई डियर फ्रैंड्स. मैं तो यश और तानिया के साथ मन ही मन 16वें साल में जी रही हूं.’’

‘‘मतलब?’’ दोनों एकसाथ चौंकी.

‘‘मतलब यह कि बच्चों के साथ फिर से जी उठी हूं मैं… मैं बच्चों की हरकतें देखती हूं तो मन ही मन 16वें साल की अपनी कारगुजारियां याद कर हंसती हूं.’’

सौम्या मुसकरा दी, ‘‘मिताली ठीक कह रही है. अब हम मांएं बन गई हैं तो हमारा सोचने का ढंग कितना बदल गया है. मां बनते ही हम अपनी साफसुथरे चरित्र वाली मां की छवि बनाने में लग जाती हैं.’’

मिताली हंसी, ‘‘मैं तो यह सोचती हूं कि मेरे पास तो आज के बच्चों जितनी सुविधाएं भी नहीं थीं, फिर भी उस उम्र का 1-1 पल का भरपूर लुत्फ उठाया.’’

‘‘तेरा कोई बौयफ्रैंड था?’’ सौम्या ने अचानक पूछा.

‘‘हां, था.’’

नीतू चहकते हुए बोली, ‘‘यार थोड़ा विस्तार से बता न.’’

‘‘ठीक है, हम तीनों उस उम्र की अपनीअपनी कारगुजारियां शेयर करती हैं और हां, ये बातें हम तीनों तक ही रहें.’’ थोड़ी देर रुक कर मिताली ने बताना शुरू किया, ‘‘मेरे सामने वाली आंटी का बेटा था. खूब आनाजाना था. मम्मी घर पर ही रहती थीं. जब वे बाहर जाती थीं तो मैं घर पर अकेली होती थी. बस उस समय के इंतजार में दिनरात बीता करते थे. वह भी अकेले मिलने का मौका देखता रहता था.’’ सौम्या ने बेताबी से पूछा, ‘‘बात कहां तक पहुंची थी?’’

‘‘वहां तक नहीं जहां तक तू सोच रही है,’’ मिताली ने प्यार से झिड़का.

‘‘मम्मी के घर से बाहर जाते ही एक लवलैटर वह पकड़ाता था और एक मैं. थोड़ी देर एकदूसरे को देखते थे और बस. उफ, जिस दिन मम्मी घर से बाहर नहीं जाती थीं वह पूरा दिन बेचैनी में बीतता था.’’

‘‘फिर क्या हुआ? शादी नहीं हुई उस से?’’ सौम्या ने पूछा.

मिताली हंसी, ‘‘नहीं, जब पापा ने मेरा विवाह तय किया तब वह पढ़ ही रहा था. मैं उस समय उदास तो हुई थी, लेकिन शादी के बाद अपनी घरगृहस्थी में व्यस्त हो गई पर

बेटे यश के हावभाव, रंगढंग देख कर अपनी पुरानी बातें जरूर याद कर लेती हूं. फिर मुझे बच्चों पर गुस्सा नहीं आता. जानती हूं एक उम्र है जो सब के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है. बच्चों पर नजर तो रखती हूं, लेकिन उन की रातदिन जासूसी नहीं करती,’’ फिर नीतू से पूछा, ‘‘तेरा क्या हाल था?’’

‘‘सच बताऊं? तुम लोग हंसेंगी तो नहीं?’’

‘‘जल्दी बता… नहीं हंसेंगी,’’ सौम्या ने पूछा.

‘‘मुझे तो उस उम्र में बहुत मजा आया था. जब मैं स्कूल से साइकिल पर निकलती थी, स्कूल के बाहर ही एक लड़का मेरे इंतजार में रोज खड़ा रहता था. अपनी साइकिल पर मेरे पीछेपीछे हमारी गली तक आ कर मुड़ जाता था. कड़ाके की ठंड, घना कुहरा और मेरे इंतजार में खड़ा वह लड़का… आज भी कुहरे में उस का पीछेपीछे आना याद आ जाता है.’’

‘‘फिर क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं. 2 महीनों तक साथसाथ आता रहा, फिर मुड़ जाता. मुझे बाद में पता चला उस का लड़कियों को पटाने का यही ढंग था. मैं अकेली नहीं थी जिस के पीछे वह साइकिल पर आता था. तब मैं ने उसे देखना एकदम छोड़ दिया. कभी रास्ता बदल लेती, कभी किसी सहेली के साथ आती. धीरेधीरे उस ने आना छोड़ दिया. मजेदार बात यह है कि फिर मुझे उस का एक दोस्त अच्छा लगने लगा, जिस के साथ मैं ने कई दिनों तक आंखमिचौली खेली. उस के बाद भी मेरा एक और गंभीर प्रेमप्रसंग चला.’’

सौम्या हंस पड़ी, ‘‘मतलब 16वां साल बड़ी हलचल मचा कर गया… 1 साल में 3 अफेयर.’’

‘‘हां यार, तीसरा कुछ दिन टिका, फिर मेरी संजीव से शादी हो गई,’’ और फिर तीनों हंस दीं. कौफी और स्नैक्स खत्म हो गए थे. तीनों का उठने का मन नहीं हो रहा था. फिर कौफी का और्डर दे दिया.

मिताली ने कहा, ‘‘सौम्या, चल अब तेरा नंबर है.’’

सौम्या ने ठंडी सांस ली और फिर बोलना शुरू किया, ‘‘अब सोच रही हूं कि बहुत कुछ किया है उस उम्र में शायद इसीलिए निक्की पर ज्यादा पहरे लगाती हूं मैं… आकर्षण था, प्यार था, जो भी था, मैं भी उस उम्र के एहसास से बच नहीं पाई थी. हां, प्यार ही तो समझी थी मैं उसे, जो मेरे और उस के बीच था. काफी बड़ा था  से. मेरी एक सहेली का रिश्तेदार था. जब भी आता मैं बहाने से उस के घर जाती. वह भी समझ गया था. बातें होने लगीं. मैं उस से शादी के सपने देखती, मेरी सहेली को अंदाजा नहीं हुआ. कभीकभी बाहर अकेले आतेजाते… बातें होने लगीं. संस्कारों की दीवार, मर्यादा की लक्ष्मणरेखा सब कुछ सलामत था. पर कुछ था जो बदल गया था और वह अच्छा लगता था. लेकिन जब एक दिन सहेली ने बातोंबातों में बताया कि वह शादीशुदा है, तो मैं घर आ कर खूब रोई थी. बड़ी मुश्किल से संभाला था खुद को,’’ फिर सौम्या कुछ पल चुप रही और फिर जोर से हंस पड़ी, ‘‘फिर मुझे 1 महीने बाद ही कोई और अच्छा लगने लगा.’’ वेटर खाली कप उठाने आ गया था. सौम्या ने बिल मंगवाया.

मिताली ने कहा, ‘‘देखा, इसीलिए मुझे अपने बच्चों पर गुस्सा नहीं आता. हम सब इस उम्र से गुजरी हैं. इस उम्र के उन के एहसास, शोखियों, चंचलता का आनंद उठाओ, उन्हें बस अच्छाबुरा समझा कर चैन से जीने दो. आजकल के बच्चे समझदार हैं, जब भी उन पर गुस्सा आए अपनी यादों में खो कर देखो, बिलकुल गुस्सा नहीं आएगा. एक बार नौकरी, घरगृहस्थी के झंझट शुरू हो गए तो जीवन भर वही चलते रहेंगे, बाद में उम्र के साथ दुनिया कब आप को बदल देती है, पता भी नहीं चलता. इस उम्र में बच्चे दूसरी दुनिया में ही जीते हैं. उसी दुनिया में जिस में कभी हम भी जीए हैं, उन्हें इस समय संसार के दांवपेचों की न तो कोई जानकारी होती है और न ही परवाह. उन्हें चैन से जीने दें और खुद भी चैन से जीएं, यही ठीक है.’’

‘‘हां, ठीक कहती हो मिताली,’’ नीतू ने कह कर पर्स निकाला.

वेटर बिल ले आया था. तीनों ने हमेशा की तरह बिल शेयर किया. फिर उठ गईं. बाहर आ कर सौम्या अपनी कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ गई. मिताली और नीतू भी बैठ गईं. तीनों चुप थीं. शायद अभी तक अपनेअपने 16वें साल की कुछ कही कुछ अनकही कारगुजारियों में खोई हुई थीं.

Best Hindi Story

Romantic Story in Hindi: पसंद अपनी-अपनी

Romantic Story in Hindi: आजकल लड़कियों की कदकाठी, रूपरंग, चेहरे की बनावट, आंखों का आकारप्रकार, बालों की लंबाई व चमक आदि को ले कर चर्चाएं होती हैं. लड़कियां सोचती हैं कि अधिक से अधिक सुंदर दिखना आज उन की जरूरत बन गई है.

इसलिए लड़कियां अधिक से अधिक खूबसूरत दिखने के लिए ऐसे विज्ञापनों और सौंदर्य प्रसाधनों की ओर भागती रहती हैं जो कुछ ही सप्ताह में सांवला रंग गोरा करने का दावा करते हैं.

खासकर, उत्तर भारत में गोरे रंग को काफी मान्यता मिल गईर् है. शादी के लिए लड़की का गोरा होना आज पहली शर्त है. वैवाहिक विज्ञापनों के अनुसार सभी लड़कों को गोरी लड़कियां ही चाहिए. मैं तो उन विज्ञापनों की हमेशा तलाश में रहती हूं जिन में गोरे, काले, सांवले, गेहुंए का सवाल न हो.

मेरी मां सांवली थीं और पापा गोरे थे. मैं मम्मी पर गई थी और सोमेश दादा पापा पर. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि सांवली मम्मी की शादी गोरे पापा से कैसे हो गई. मैं अकसर यह सवाल पापा से कर बैठती थी कि उन्होंने सांवली मम्मी के साथ शादी कैसे कर ली.

एक दिन मेरी बात सुन कर पापा खिलखिला कर हंस पडे़ थे.

‘‘उस समय लड़की देखने का रिवाज नहीं था, सब कुछ मांबाप ही तय करते थे. लड़के तो सुहागरात में ही पत्नी का दीदार कर पाते थे, वह भी दीपक के प्रकाश में. जिस लड़के की शादी तय हो जाती थी वह इतना खुश हो जाता था जैसे पहली बार थियेटर देखने जा रहा हो.’’

‘‘आप भी उसी तरह खुश हुए थे, पापा?’’

उत्तर में पापा की तेज हंसी से पूरा घर गूंज उठा था, जिस में मेरा सवाल डूब गया था. पापा ने बात बदल कर कहा, ‘‘देखना तेरी शादी गोरे लड़के से ही होगी…’’

पापा जब एक बार बोलना शुरू करते थे तो अपनी वाणी को विराम देना ही भूल जाते थे. अभी मैं ने विज्ञान विषय में इंटर ही किया था कि पापा ने मेरे लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी थी. पर मेरा गहरा सांवला रंग देख कर लड़के बिदक जाते थे.

अब तक पापा के खोजे 10 लड़के मुंह बिचका कर जा चुके थे. मैं अपनी पढ़ाई में लगी रही. मम्मी, पापा से कहतीं, ‘‘अगर क्षमा की शादी नहीं हो पा रही है तो आप सोमेश की शादी क्यों नहीं कर देते?’’

22 साल की होतेहोते मैं ने एम.बी.बी.एस. कर लिया था. सोमेश दादा एल.एल.एम. कर के एक डिगरी कालिज में लेक्चरर हो गए थे. पापा मेरे लिए लड़के की तलाश अब भी कर रहे थे.

एक दिन पापा जब कालिज से पढ़ा कर लौटे तो बहुत खुश थे. आते ही उन्होंने घर में घोषणा कर दी, ‘‘क्षमा के लिए लड़के की तलाश पूरी हो गई है. लड़का चार्टर्ड एकाउंटेंट है. कल ही वह अपने मातापिता के साथ क्षमा को देखने आ रहा है. किसी प्रकार के तकल्लुफ की जरूरत नहीं है.’’

दूसरे दिन लड़का अपने मम्मीपापा के साथ मुझे देखने आया. गोराचिट्टा, 6 फुट लंबा, 15 मिनट के साक्षात्कार में मुझे पसंद कर लिया गया. मैं अविश्वासों से घिर गई थी. सोचने लगी, जरूर कोई खास बात होगी, या तो उस में कोई कमी होगी या उस के दिमाग का कोई स्क्रू ढीला होगा.

खैर, मेरी शादी हो गई. पापा के लिए तो लड़का सर्वगुण संपन्न था ही. आशंकाएं तो सिर्फ मुझे थीं. नाना प्रकार की आशंकाओं में घिरी मैं अपनी ससुराल पहुंची. घर के  सभी लोगों ने मुझे पलकों पर बैठा लिया. उस से मेरी आशंकाएं और बढ़ गईं. सुहागसेज पर मैं ने रवि से पूछा, ‘‘आप ने मुझ जैसी लड़की को कैसे पसंद किया?’’

रवि ने मुसकरा कर मेरी ओर देखा. बड़ी देख तक वह मुझे निहारते रहे. फिर कहने लगे, ‘‘दरअसल, क्षमा, गोरी लड़कियां मुझे अच्छी नहीं लगतीं. ज्यादातर गोरी लड़कियों के चेहरों की बनावट अच्छी नहीं होती. दांत तो खासतौर पर अच्छे नहीं होते. इसीलिए मुझे तुम्हारी जैसी लड़की की तलाश थी. दूसरी बात यह कि पतिपत्नी के रूपरंग में भिन्नता होनी चाहिए. जानती हो, यह सारी प्रकृति भिन्नता के आधार पर निर्मित हुई है इसीलिए इस में इतना आकर्षण है. भिन्नता इसलिए भी जरूरी है ताकि पतिपत्नी का व्यक्तित्व अलग दिखे. एकरूपता में सौंदर्य उतना नहीं झलकता जितना भिन्नता में,’’ कह कर रवि ने बत्ती बुझा दी.

मैं ने पहली बार नारीपुरुष का भेद समझा था. सुबह काफी देर से आंख खुली. मैँ ने देखा कि रवि बेड पर नहीं हैं. मैं अलसाई आंखों से इधरउधर उन्हें ढूंढ़ने लगी थी. इतने में कमरे का परदा हिला. उसी के साथ रवि एक छोटी सी टे्र में चाय के 2 प्यालों के साथ कमरे में दाखिल हुए.

‘‘आप…’’ मैं अचकचा कर बोली.

‘‘मैं ने निश्चय किया था कि पहली चाय मैं ही बना कर तुम्हें पिलाऊंगा.’’

मुझे कोई उत्तर नहीं सूझा था. मैं रवि को निहारती रह गई थी.

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Avika Gor: मेंहदी पर सासससुर का नाम, दुल्हन के लिए ससुराल कितना जरूरी

Avika Gor: ‘बालिका वधू’ फेम एक्ट्रेस अविका गौर की एक पहल काफी चर्चा में है. दूसरी दुल्हनों से हट कर उन्होंने अपनी मेंहदी में अपने होनेवाले हसबैंड के अलावा अपने सासससुर का नाम भी लिखवाया है. आइए जानें इस तरह की पहल से ससुरालवालों का दिल जीतना कितना आसान होता है.

कौन है अविका गौर

अविका गौर का नाम सीरियल बालिका वधू से पॉपुलर हुआ था, राजस्थान में होने वाले बाल विवाह की पृष्ठभूमि पर बने इस धारावाहिक में अविका का किरदार एक ऐसी बालिका का था जिसकी शादी छोटी उम्र में हो जाती है. इस सीरियल ने प्रोड्यूसर्स को मुनाफा दिलाया, तो इस कैरेक्टर को प्ले करने वाली चाइल्ड एक्ट्रेस अविका को प्रसिद्धि दिलाई.

इस सीरियल के बाद अविका को कुछ सीरियल्स और फिल्मों में देखा गया. आजकल वह दोबारा अपनी शादी को लेकर चर्चा में हैं. वह अपने लॉन्ग टाइम बॉयफ्रेंड मिलिंद चांदवानी से शादी करने जा रही हैं. अपने मेंहदी की रस्म की दौरान अविका ने अपने हाथों पर मिलिंद के साथसाथ अपने ससुरालवालों के नाम भी लिखवाए. इसका जिक्र करते हुए उनके मंगेतर काफी इमोशनल हुए.

ससुराल खुश तो सब खुश

इसमें दो राय नहीं कि एक हैप्पी मैरिड लाइफ के लिए अच्छा ससुराल मजबूत आधार का काम करता है. छोटेछोटे प्रयासों से ससुरालवालों खुश होते हैं, तो नई दुल्हन ऐसे टिप्स को अपना सकती हैं.

  • ससुराल के सदस्यों के बर्थडे और एनीवर्सरी को मोबाइल के कैलेंडर में सेट करें और उनको विश करें.
  • किसी की जॉब लग रही हो या किसी को कॉलेज में एडमीशन मिला हो, तो उसे छोटेमोटे उपहार भेंट दें जैसे फूलों का गुच्छा.
  • आपके इस तरह के प्रयास आपके बेटर हाफ को भी खुश रखता है क्योंकि उनको महसूस होता है कि आप उनकी फैमिली का ख्याल रख रही हैं. बोनस में वह भी आपके परिवार को खुश रखने का प्रयास करते हैं.
  • घर के छोटे बच्चों के साथ थोड़ा टाइम स्पेंड करें खासकर जेठानी या ननद के बच्चों के साथ. इससे बच्चों के साथ ही उनके पेरेंट्स के साथ भी आपके बॉन्ड को मजबूती मिलेगी.
  • इस बात का भी ख्याल रखें कि यह जरूरी नहीं है कि आपका हर प्रयास ससुरालवालों को इंप्रेस करेगा, इसलिए ऐसा नहीं होने पर उदास नहीं हो.
  • सास या ससुर के स्पेशल डेज पर कुछ अच्छा फूड बनाएं या बाहर से मंगाएं, उन्हें अच्छा लगेगा.

ये मत करें

  • दूसरों को खुश करतेकरते अपनी खुशियों को मत भूल जाएं, वरना लंबे समय के बाद आपको सभी रिश्तों से खीझ महसूस होगी.
  • ससुरालवालों के साथ एक सीमारेखा भी खींच कर रखें, इसका अहसास उनको प्यार से कराएं.
  • शादी की शुरुआत से ही ‘इन लॉज’ को पूरी तरह से अपनी ऊपर डिपेंड नहीं होने दें ताकि बाद में यह आपको बोझ सा न लगें.
  • ससुरालवालों की कोई बात नागवार गुजरे, तो उसे बहुत शालीनता से बताएं.
  • जिस तरह से मेकअप में ओवरडू अच्छा नहीं लगता है उसी तरह से रिश्तों में भी यह नहीं करें.
  • प्यार के लेनदेन में इस बात की तुलना नहीं करें कि आपने क्या दिया और आपको क्या मिला. उनके दिल में जगह आपको बनानी हैं क्योंकि आप आउटसाइडर हैं और वह आपको पूरी तरह से नहीं जानते.
  • जो भी कर रहे हैं उसे जताएं नहीं बल्कि दूसरों को जताने दें.

ससुरालवालों के लिए अपनी अच्छी आदतों और रूटीन में केवल इसलिए बदलाव नहीं करें कि उन्हें पसंद नहीं है, जो आपके लिए बेहतर है उसे करती रहें फिर चाहे वह सुबह उठ कर एक्सरसाइज करना हो या ट्यूशन देना.

दूसरों को खुश करने के लिए पूरा बटुआ खाली नहीं करें, वरना बाद में अपने किए पर पछतावा भी हो सकता है.

Avika Gor

Boney Kapoor: पहली पत्नी ने खरीदी श्रीदेवी के लिए अंगुठी, पुरुषों की दूसरी शादी

Boney Kapoor: बोनी कपूर ने साल 1996 में श्रीदेवी से शादी की. यह बोनी कपूर की दूसरी शादी थी. उनकी पहली पत्नी मोना कपूर थीं, जिनसे दो बच्चे एक्टर हैं अर्जुन कपूर और इंफ्लूएंसर अंशुला कपूर. हाल ही में एक इंटरव्यू में बोनी कपूर ने बताया कि श्रीदेवी से उनकी दूसरी शादी की अंगुठी उनकी पहली पत्नी मोना कपूर ने खरीदी थी. इस शादी ने उनके छोटेछोटे बच्चों को भीतर तक आहत कर दिया था. यहां तक कि अर्जुन कपूर ने बोनी कपूर को एक इमोशनल लेटर भी लिखा था, जो आज तक उनके पास है. आखिर पुरुषों के साथ ऐसी क्या मजबूरी होती है कि वे दूसरी शादी करने को मजबूर होते हैं, पढ़ें.

शादीशुदा पुरुष क्यों करते हैं दूसरी शादी

दूसरी शादी की एक बड़ी वजह एक्सट्रा मैरिटल अफेयर को माना जाता है. लेकिन हर एक्सट्रा मैरिटल शादी पर जाकर ही खत्म हो ऐसा जरूरी नहीं होता है. कई बार यह सिचुएशनशिप की तरह होता है जिसकी बड़ी वजह शारीरिक आकर्षण हो सकती है.

पहली शादी के होते हुए दूसरी शादी की एक और भी महत्वपूर्ण वजह होती है, महिला का ब्लैकमेल करना. इस तरह के मामले विवाहेत्तर संबंधों से उपजते हैं जहां महिला को जब यह लगता है कि पुरुष उससे रिश्ते बना लेने के बाद किनारा करना चाह रहा है, तो वह पुरुष पर दूसरी शादी का दबाव डालती है.
कई बार अमीर महिला की संपत्ति भी शादीशुदा पुरुष को शादी के लिए उकसाती है. वह अपनी जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करने के बजाय ऐसी महिला से शादी करना चाहते हैं.
ऐसा भी पाया गया है कि विदेशों में सेटल होने के लिए या ग्रीन कार्ड पाने के लिए भी कुछ पुरुष शादीशुदा होने के बावजूद विदेशी महिलाओं से शादी कर लेते हैं.

ऐसी भी शादियां हैं जहां पहली पत्नी से नहीं बनने के कारण पुरुष दूसरी शादी रचा लेते हैं. कुछ समाज में पुरुष आज भी दूसरी शादी करना शान मानते हैं और पहली पत्नी के रहते दूसरा ब्याह रचाते हैं. इस तरह की शादी में कई बार परिवार और समाज को भी कोई एतराज नहीं होता है.

दूसरी शादी के साइड इफेक्ट

  • पहली शादी से हुए बच्चे पर सबसे अधिक नकारात्मक असर पड़ता है.
  • दूसरी पत्नी, अपने पति पर विश्वास नहीं रख पाती क्योंकि उसका पहला रिश्ता पहले ही टूट चुका होता है.
  • दूसरी शादी, शुरुआत में तो बहुत ही अच्छी लगती है लेकिन शादी के एकदो साल बाद यह तनाव का कारण बनती है.
  • पुरुष पर दोनों परिवारों की देखभाल का जिम्मा आता है क्योंकि पहली शादी से पूरी तरह से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है.
  • आज की सोसाइटी में इस तरह के पुरुष समाज में परिहास का कारण बनते हैं, वह समाज के तानों का भी शिकार होते हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किा जा सकता.

बाेनी कपूर ने माना कि पहली शादी उनकी पहली पत्नी मोना ने कभी भी दोनों परिवारों के बीच नेगेटिविटी फैलाने की कोशिश नहीं की. लेकिन अर्जुन और अंशुला पर दुखी थे. बोनी कपूर ने माना था कि उनके पास आज भी अर्जुन का वह इमोशनल लेटर है, जिसमें उसने लिखा था, “पापा, आप घर क्यों नहीं आते?” यह पढ़कर वे टूट जाते थे. उन्होंने बताया कि वह श्रीदेवी को अकेले नहीं छोड़ सकते थे, क्योंकि उनके माता-पिता की डेथ हो चुकी थी. वहीं दूसरी तरफ अर्जुन और अंशुला थे, लेकिन वो अपनी मां और दादा-दादी के साथ रह रहे थे. उन्हें चुनाव करना पड़ना पड़ा. हालांकि श्रीदेवी की डेथ के बाद बोनी कपूर की पहली और दूसरी शादी से हुए बच्चे एकदूसरे के निकट आ गए.

Boney Kapoor

Drama Story: बंद खिड़की- मंजू का क्या था फैसला

Drama Story: ‘‘मौसी की बेटी मंजू विदा हो चुकी थी. सुबह के 8 बज गए थे. सभी मेहमान सोए थे. पूरा घर अस्तव्यस्त था. लेकिन मंजू की बड़ी बहन अलका दीदी जाग गई थीं और घर में बिखरे बरतनों को इकट्ठा कर के रसोई में रख रही थीं.

अलका को काम करता देख रचना, जो उठने  की सोच रही थी ने पूछा, ‘‘अलका दीदी क्या समय हुआ है?’’

‘‘8 बज रहे हैं.’’

‘‘आप अभी से उठ गईं? थोड़ी देर और आराम कर लेतीं. बहन के ब्याह में आप पूरी रात जागी हो. 4 बजे सोए थे हम सब. आप इतनी जल्दी जाग गईं… कम से कम 2 घंटे तो और सो लेतीं.

अलका मायूस हंसी हंसते हुए बोलीं, ‘‘अरे, हमारे हिस्से में कहां नींद लिखी है. घंटे भर में देखना, एकएक कर के सब लोग उठ जाएंगे और उठते ही सब को चायनाश्ता चाहिए. यह जिम्मेदारी मेरे हिस्से में आती है. चल उठ जा, सालों बाद मिली है. 2-4 दिल की बातें कर लेंगी. बाद में तो मैं सारा दिना व्यस्त रहूंगी. अभी मैं आधा घंटा फ्री हूं.’’ रचना अलका दीदी के कहने पर झट से बिस्तर छोड़ उठ गई. यह सच था कि दोनों चचेरी बहनें बरसों बाद मिली थीं. पूरे 12 साल बाद अलका दीदी को उस ने ध्यान से देखा था. इस बीच न जाने उन पर क्याक्या बीती होगी.

उस ने तो सिर्फ सुना ही था कि दीदी ससुराल छोड़ कर मायके रहने आ गई हैं. वैसे तो 1-2 घंटे के लिए कई बार मिली थीं वे पर रचना ने कभी इस बारे में खुल कर बात नहीं की थी. गरमी की छुट्टियों में अकसर अलका दीदी दिल्ली आतीं तो हफ्ता भर साथ रहतीं. खूब बनती थी दोनों की. पर सब समय की बात थी. रचना फ्रैश हो कर आई तो देखा अलका दीदी बरामदे में कुरसी पर अकेली बैठी थीं.

‘‘आ जा यहां… अकेले में गप्पें मारेंगे…. एक बार बचपन की यादें ताजा कर लें,’’ अलका दीदी बोलीं और फिर दोनों चाय की चुसकियां लेने लगीं.

‘‘दीदी, आप के साथ ससुराल वालों ने ऐसा क्या किया कि आप उन्हें छोड़ कर हमेशा के लिए यहां आ गईं?’’

‘‘रचना, तुझ से क्या छिपाना. तू मेरी बहन भी है और सहेली भी. दरअसल, मैं ही अकड़ी हुई थी. पापा की सिर चढ़ी लाडली थी, अत: ससुराल वालों की कोई भी ऐसी बात जो मुझे भली न लगती, उस का जवाब दे देती थी. उस पर पापा हमेशा कहते थे कि वे 1 कहें तो तू 4 सुनाना. पापा को अपने पैसे का बड़ा घमंड था, जो मुझ में भी था.’’

दीदी ने चाय का घूंट लेते हुए आगे कहा, ‘‘गलती तो सब से होती है किंतु मेरी गलती पर कोई मुझे कुछ कहे मुझे सहन न था. बस मेरा तेज स्वभाव ही मेरा दुश्मन बन गया.’’

चाय खत्म हो गई थी. दीदी के दुखों की कथा अभी बाकी थी. अत: आगे बोलीं, ‘‘मेरे सासससुर समझाते कि बेटा इतनी तुनकमिजाजी से घर नहीं चलते. मेरे पति सुरेश भी मेरे इस स्वभाव से दुखी थे. किंतु मुझे किसी की परवाह न थी. 1 वर्ष बाद आलोक का जन्म हुआ तो मैं ने कहा कि 40 दिन बाद मैं मम्मीपापा के घर जाऊंगी. यहां घर ठंडा है, बच्चे को सर्दी लग जाएगी.’’ मैं दीदी का चेहरा देख रही थी. वहां खुद के संवेगों के अलावा कुछ न था.

‘‘मैं जिद कर के मायके आ गई तो फिर नहीं गई. 6 महीने, 1 वर्ष… 2 वर्ष… जाने कितने बरस बीत गए. मुझे लगा, एक न एक दिन वे जरूर आएंगे, मुझे लेने. किंतु कोई न आया. कुछ वर्ष बाद पता लगा सुरेश ने दूसरा विवाह कर लिया है,’’ और फिर अचानक फफकफफक कर रोने लगीं. मैं 20 वर्ष पूर्व की उन दीदी को याद कर रही थी जिन पर रूपसौंदर्य की बरसात थी. हर लड़का उन से दोस्ती करने को लालायित रहता था. किंतु आज 35 वर्ष की उम्र में 45 की लगती हैं. इसी उम्र में चेहरा झुर्रियों से भर गया था.

मुझे अपलक उन्हें देखते काफी देर हो गई, तो वे बोलीं, ‘‘मेरे इस बूढ़े शरीर को देख रही हो… लेकिन इस घर में मेरी इज्जत कोई नहीं करता. देखती नहीं मेरे भाइयों और भाभियों को? वे मेरे बेटे आलोक और मुझे नौकरों से भी बदतर समझते हैं. पहले सब ठीक था. पापा के जाते ही सब बदल गए. भाभियों की घिसी साडि़यां मेरे हिस्से आती हैं तो भतीजों की पुरानी पैंटकमीजें मेरे बेटे को मिलती हैं. इन के बच्चे पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं और मेरा बेटा सरकारी स्कूल में. 15 वर्ष का है आलोक 7वीं में ही बैठा है. 3 बार 7वीं में फेल हो चुका है. अब क्या कहूं,’’ और दीदी ने साड़ी के किनारे से आंखें पोंछ कर धीरे से आगे कहा, ‘‘भाई अपने बेटों के नाम पर जमीन पर जमीन खरीदते जा रहे हैं, पर मेरे बेटे के लिए क्या है? कुछ नहीं. घर के सारे लोग गरमी की छुट्टियों में घूमने जाते हैं और हम यहां बीमार मम्मी की सेवा और घर की रखवाली करते हैं.

‘‘तू तो अपनी है, तुझ से क्या छिपाऊं… जवान जोड़ों को हाथ में हाथ डाल कर घूमते देखती हूं तो मनमसोस कर रह जाती हूं.’’

मैं दीदी को अवाक देख रही थी, किंतु वे थकी आवाज में कह रही थीं, ‘‘रचना, आज मैं बंद कमरे का वह पक्षी हूं जिस ने अपने पंखों को स्वयं कमरे की दीवारों से टक्कर मार कर तोड़ा है. आज मैं एक खाली बरतन हूं, जिसे जो चाहे पैर से मार कर इधर से उधर घुमा रहा है…’’  आज मैं अकेलेपन का पर्याय बन कर रह गई हूं.’’

दीदी का रोना देखा न जाता था, किंतु आज मैं उन्हें रोकना नहीं चाहती थी. उन के मन में जो था, उसे बह जाने देना चाहती थी. थोड़ी देर चुप रहने के बाद अलका दीदी आगे बोलीं, ‘‘सच तो यह है कि मेरी गलती की सजा मेरा बेटा भी भुगत रहा है… मैं उसे वह सब न दे पाई जिस का वह हकदार था… न पिता का प्यार न सुखसुविधाओं वाला जीवन… कुछ भी तो न मिला. सोचती हूं आखिर मैं ने यह क्या कर डाला? अपने साथ उसे भी बंद गली में ले आई… क्यों मैं ने उस की खुशियों की खिड़की बंद कर दी,’’ और फिर दीदी की रुलाई फूट पड़ी. उन का रोना सुन कर 2-3 रिश्तेदार भी आ गए. पर अच्छा हुआ जो तभी बूआ ने किचन से आवाज लगा दी, ‘‘अरी अलका, आ जल्दी… आलू उबल गए हैं.’’

दीदी साड़ी के पल्लू से अपनी आंखें पोंछते हुए उठ खड़ी हुईं. फिर बोली, ‘‘देख मुझे पता है कि तू भी अपनी मां के पास आ गई है, पति को छोड़ कर. पर सुन इज्जत की जिंदगी जीनी है तो अपना घर न छोड़ वरना मेरी तरह पछताएगी.’’ अलका दीदी की बात सुन कर रचना किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई. यह एक भयानक सच था. उसे लगा कि राजेश और उस के बीच जरा सी तकरार ही तो हुई है. राजेश ने किसी छोटी से गलती पर उसे चांटा मार दिया था, पर बाद में माफी भी मांग ली थी. फिर रचना की मां ने भी उसे समझाया था कि ऐसे घर नहीं छोड़ते. उस ने तुझ से माफी भी मांग ली है. वापस चली जा. रचना सोच रही थी कि अगर कल को उस के भैयाभाभी भी आलोक की तरह उस के बेटे के साथ दुर्व्यवहार करेंगे तो क्या पता मेरे साथ भी दीदी जैसा ही कुछ होगा… फिर नहीं… नहीं… कह कर रचना ने घबरा कर आंखें बंद कर लीं और थोड़ी देर बाद हीपैकिंग करने लगी. अपने घर… यानी राजेश के घर जाने के लिए. उसे बंद खिड़की को खोलना था, जिसे उस ने दंभवश बंद कर दिया था. बारबार उन के कानों में अलका दीदी की यह बात गूंज रही थी कि रचना इज्जत से रहना चाहती हो तो घर अपना घर कभी न छोड़ना.

Drama Story

Fictional Story: अकेला छोड़ दो मुझे

Fictional Story; आजसुरेखा बहुत उदास थी. होती भी क्यों नहीं, जिसे इतना चाहा उसी ने धोखा दे दिया था. सुरेखा ने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर औंधे मुंह लेट गई. बारबार उस के कानों में नीरज की बातें गूंज रही थीं. कितनी आसानी से कह दिया था नीरज ने कि वह निहारिका से प्यार करने लगा है.

सुरेखा ने तड़प कर पूछा था, ‘‘यही बात तुम कुछ दिन पहले तक मुझ से कहा करते थे न नीरज. अब क्या हो गया? मुझ से मन भर गया?’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं सुरेखा. पसंद मुझे तुम भी हो, मगर यदि मेरे पास 2 औप्शन हों, एक निहारिका और दूसरी तुम तो जाहिर है कि मैं निहारिका को ही चुनूंगा. यह बात तुम भी समझ सकती हो. निहारिका एक अविवाहित और स्मार्ट लड़की है जबकि तुम विधवा हो. फिर मैं उसे पसंद क्यों न करूं? हकीकत को समझो प्लीज. सच स्वीकार करो सुरेखा. अगर मैं तुम्हें प्यार करता हूं तो इस का एहसान मानो,’’ नीरज ने बेशर्मी के साथ कहा.

‘‘ठीक है नीरज आज से इस एहसान को अपने पास रखना प्लीज. मेरी तरफ देखना भी मत. कोई फोन मत करना. आज से मेरा और तुम्हारा कोई नात नहीं है. गुडबाय,’’ कह कर सुरेखा चली आई.

उस के मन में तूफान उठ रहा था. अगर वह विधवा है, उस के पति निलय की आकस्मिक मौत हो गई, तो इस में उस की क्या गलती? क्या अब उसे किसी पुरुष का सच्चा प्यार हासिल नहीं हो सकता? क्या कोई उस का हमसफर नहीं बन सकता? अपनी जिंदगी में एक पुरुष की कमी वह बहुत शिद्दत से महसूस करती थी. बच्चों के भरोसे जिंदगी कैसे जी सकती है? आखिर उन की शादी होगी और वे अपनीअपनी दुनिया में व्यस्त हो जाएंगे. फिर कौन देखेगा उसे? एक टीस उस के मन को हमेशा सालती रहती थी.

निलय से सुरेखा की शादी करीब 15 साल पहले हुई थी. निलय एक प्राइवेट  कंपनी में काम करता था और सुरेखा से बहुत प्यार करता था. सुरेखा की जिंदगी बहुत खुशहाल थी. 2 प्यारेप्यारे बच्चे भी हुए. बेटा सुजय जो अब 14 साल का था और बेटी शिवानी जो 12 साल की हो गई थी. शादी के 10 साल बाद ही अचानक निलय की मौत हो गई. उस वक्त बच्चे छोटे थे.

निलय की मौत के बाद करीब एकडेढ़ साल सुरेखा को खुद को संभालने में लगे. वह ज्यादातर वक्त निलय की यादों में खोई रहती थी. बाकी समय बच्चों को संभालने में गुजर जाता. फिर धीरेधीरे बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त होने लगे तब उसे कसक सी महसूस होने लगी. उसे लगता जैसे उसे दोबारा शादी कर लेनी चाहिए. जिंदगी में एक पुरुष की जरूरत बहुत ज्यादा महसूस होने लगी थी.

उसी दौरान शुभंकर नाम का टीचर उस के बच्चों को पढ़ाने के लिए आने लगा. शुभंकर काफी खुशमिजाज इंसान था. जानेअनजाने सुरेखा की आंखें उस से टकराने लगीं. आंखोंआंखों में कहानी आगे बढ़ने लगी. सुरेखा शुभंकर के लिए चायनाश्ता ले कर जाती और फिर वहीं पास में बैठ कर बच्चों की पढ़ाई देखने के बहाने शुभंकर को देखती रहती. धीरेधीरे दोनों के बीच हंसीमजाक भी होने लगा. अब सुरेखा को जिंदगी में खुशियों की एक नई वजह मिल गई थी. अभीअभी सुरेखा ने सपने देखने शुरू ही किए थे कि बच्चे विलेन बन कर सामने आ गए.

‘‘मम्मा हमें शुभंकर सर से अब नहीं पढ़ना,’’ दोनों बच्चों ने एक सुर में कहा.

‘‘ऐसा क्यों?’’ सुरेखा ने चौक कर पूछा.

‘‘क्योंकि वे पढ़ाते कम और आप से बातें ज्यादा करते हैं.’’

‘‘अरे बेटा यह उन के पढ़ाने का तरीका है. तुम लोगों को काम देने के बाद मुझ से बात करते हैं न फिर इस में समस्या क्या है,’’ सुरेखा ने पूछा.

‘‘मम्मा वे टीचर हैं तो पढ़ाना ही उन का काम है, न कि गप्पें मारना और फिर हमें वहे अच्छे भी नहीं लगते.’’

‘‘पर मुझे तो अच्छे लगते हैं. अच्छा एक बात बताओ, अगर शुभंकर सर तुम्हारे पापा बन जाए तो क्या वे तुम्हें अच्छे लगने लगेंगे?’’ सुरेखा ने घुमा कर बड़ी सावधानी से अपने मन की बात कही और बच्चों का दिल टटोलना चाहा.

वे एकदम से भड़क उठे,’’ कभी नहीं मम्मी. सोचना भी मत. हमें शुभंकर सर जैसा पापा तो बिलकुल भी नहीं चाहिए. कभी नहीं.’’

‘‘पर ऐसा क्यों? क्या कमी है उन में? इतने खुशमिजाज हैं, हमेशा हंसाते रहते हैं, तुम लोगों को पढ़ा भी दिया करेंगे. पैसे भी नहीं देने पड़ेंगे,’’ सुरेखा ने समझाना चाहा.

‘‘क्या मम्मा आप हमें बच्चे समझते हो? अब हम नासमझ नहीं हैं. सब समझ में आता है मम्मा. आप हमें बहलाने की कोशिश न करो. हमें शुभंकर सर बिलकुल भी पसंद नहीं हैं. आप उन के प्यार में हो तो आप को कोई कमी नहीं लग रही. पर मुझ से पूछो, न उठनेबैठने का ढंग, न कपड़े पहनने का तरीका, अजीब से लटकेझटके से आ जाते हैं और आप को अच्छे लगते हैं. दोस्तों के बीच हमारी नाक कट जाएगी मम्मी. लोग हमारा कितना मजाक उड़ाएंगे कि टीचर ही पापा बन गया. नहीं मम्मी तुम सोचना भी मत. कभी नहीं वरना हम बात नहीं करेंगे आप से. आप को पता नहीं स्कूल में बच्चे झक्की सर कह कर उन का मजाक उड़ाते हैं,’’ सुजय ने आवेश में कहा.

बेटे की बात सुन कर सुरेखा कुछ कह न सकी. उसे सच में पता नहीं था कि उस के बच्चे इतने बड़े हो गए हैं. इस घटना के बाद उस ने शुभंकर के बारे में सोचना छोड़ दिया.

शुभंकर के अलावा सुरेखा की जिंदगी में रवीश भी आया था. रवीश निलय का कुलीग था और अकसर सुरेखा का हालचाल पूछने के बहाने मिलने चला आता था. शुरूशुरू में वह अकसर ग्रैच्युटी और पीएफ आदि के डौक्यूमैंट्स के सिलसिले में उस से मिलने आता था. धीरेधीरे रवीश सुरेखा को अच्छा लगने लगा.

रवीश भले ही शादीशुदा था, मगर कहते हैं न कि जब किसी पर दिल आ जाता है तो फिर इंसान कोई भी परवाह नहीं करता. यही हाल सुरेखा का भी था. उस का साथ पा कर सुरेखा खुद को सुरक्षित और खुश महसूस करती थी. इसलिए वह भी अब रवीश को बहानेबहाने से बुलाने लगी थी. कभी शौपिंग करने के लिए तो कभी किसी और काम के लिए वह रवीश को ही याद करती. सास भी कुछ कहती नहीं थी क्योंकि सुरेखा का दुख बहुत ज्यादा था और रवीश की संगत से यह दुख कुछ कम होने लगा था. उस वक्त बच्चे भी छोटे थे. धीरेधीरे दोनों के बीच का आकर्षण बढ़ने लगा. अब वे काम के अलावा भी सिर्फ मिलने के लिए बाहर जाने लगे. अकसर छिपछिप कर भी मिलने लगे.

एक समय ऐसा भी आया जब रवीश अपनी बीवी को तलाक दे कर सुरेखा से शादी करने को तैयार था. सुरेखा ने दबी जबान से सास को इन्फौर्म किया कि वह रवीश से शादी कर उसे अपना हमसफर बनाना चाहती है.

सास एकदम से बिगड़ गईं और बोली, ‘‘नहीं बहू उस की जाति अलग है. कहां वह बढ़ई और कहां हम राजपूत. यह बात सोचना भी मत कि कभी मैं तेरी शादी उस से करवाने की सोच सकती हूं. अपनी जाति में तुम्हें कोई अच्छा लड़का मिलता है तो भले ही सोचा जा सकता है और फिर वह विवाहित भी है. इसलिए उस की तरफ से अपने मन को बिलकुल हटा लो.’’

सुरेखा ने उस समय भी सास की बात मान कर रवीश से किनारा कर लिया था.

इस बीच सुरेखा के घर के सामने वाले फ्लैट में एक नया परिवार आया था. बूढ़े मांबाप  के अलावा घर में एक प्रौढ़ और 12 साल की एक लड़की थी. सुरेखा का समझते देर नहीं लगी कि वह प्रौढ़ अपनी बेटी और मांबाप के साथ रहने आया है. दोनों के ही मकान फर्स्ट फ्लोर पर थे. घर की सफाई आदि करते बरबस ही उस की नजरें सामने के घर की तरफ उठ जाती थीं. प्रौढ़ व्यक्ति कभी किचन में खाना बना रहा होता तो कभी फोन पर बातें करता हुआ बालकनी तक आ जाता.

एक दिन मौका मिलने पर सुरेखा ने उस से बात शुरू की. उस ने बताया कि वह विधुर है. पत्नी की एक हादसे में मौत हो गई थी. उस ने अपना नाम प्रताप चंद्र बताया. अब सुरेखा अकसर ही उस से बातें करने लगी थी. कई बार जब वह घर में कुछ नया बनाती तो प्रताप के घर दे आती. प्रताप भी कोई न कोई रैसिपी सीखने के बहाने उस के घर आने लगा. अकसर वे बालकनी में खड़े हो कर भी एकदूसरे से दुनियाजहान की बातें करते. प्रताप काफी इंटैलिजैंट था. वह पेशे से इंजीनियर था, मगर उस का सामान्य ज्ञान भी कमाल का था.

कितनी ही रोचक बातें सुना कर वह सुरेखा का मन लगाए रखता था. प्रताप की बेटी अकसर उस के घर खेलने आने लगी. दोनों परिवारों के बीच मेलजोल बढ़ा तो वे साथ में घूमने जाने लगे. प्रताप और सुरेखा भी एकदूसरे के करीब आने लगे थे.

तब एक दिन सुरेखा ने अपने मन  की बात सास को बताई, ‘‘मां कैसा हो यदि मैं प्रताप से शादी कर लूं?’’

‘‘बेटा मैं भी यह बात काफी समय से सोच रही हूं, मगर एक ही शंका है मन में…’’

‘‘वह क्या मांजी?’’

‘‘देख बेटा शादीब्याह के मामले में कुंडलियां देखनी जरूरी होती हैं खासकर तब जबकि उस की बीवी की हादसे में मौत हुई. मैं एक बार उस की कुंडली देख कर दिल की तसल्ली करना चाहती हूं,’’ सास ने कहा.

‘‘ठीक है मांजी.’’

अगले ही दिन वह प्रताप की कुंडली ले आई. सास ने अपने पंडित को  कुंडली दिखाई और फिर रिश्ते के लिए साफ मना करती हुई बोली, ‘‘बहू, पंडितजी बता रहे थे कि प्रताप की कुंडली में बहुत गहरा दोष है. उसे पत्नी सुख नहीं लिखा है. बेटा मैं नहीं चाहती कि उस से शादी कर उस की पत्नी की ही तरह कहीं तू भी… नहींनहीं बहू फिर इन बच्चों का क्या होगा?’’

‘‘पर मां आज के समय में ये सब बातें कौन मानता है?’’

‘‘मैं मानती हूं. तू इस शादी की सोचना भी मत,’’ सास ने एक बार फिर अपना फैसला सुना दिया.

सास के दबाव डालने पर सुरेखा ने प्रताप से शादी का विचार त्याग दिया. प्रताप को सुरेखा के इस फैसले से बहुत धक्का लगा. उस ने मेलजोल काफी कम कर दिया और 2 माह के अंदर ही किसी और से शादी भी कर ली. वह चैन से अपनी जिंदगी गुजारने लगा और इधर सुरेखा एक बार फिर अकेली रह गई. इस बात को कई साल हो गए. सुरेखा के दिल में एक पुरुष के साथ की जो चाह थी वह दम तोड़ चुकी थी. रहीसही कसर आज नीरज ने पूरी कर दी थी.

नीरज उस की फ्रैंड का कजिन था. फ्रैंड ने ही उसे नीरज से मिलवाया था. नीरज की पत्नी, शादी के 5-6 महीने बाद ही किसी और के साथ भाग गई थी और वह अकेला रह गया था. उसे भी पार्टनर की तलाश थी, इसलिए सुरेखा के साथ उस की ट्यूनिंग अच्छी बैठने लगी थी. वह नीरज के साथ 1-2 बार फिल्म देखने भी जा चुकी थी. दोनों घंटों प्यार की बातें करते.

इस बार सुरेखा ने तय किया था कि वह सीधा शादी कर के घर वालों को बताएगी. पर इस की नौबत ही नहीं आ सकी. इस से पहले ही दोनों के बीच में निहारिका नाम की एक स्टाइलिश सी लड़की ने ऐंट्री मारी और नीरज को चुरा लिया.

नीरज ने साफसाफ शब्दों में कह दिया था कि वह निहारिका को चुनेगा उसे नहीं क्योंकि वह एक विधवा है जबकि निहारिका खूबसूरत अविवाहित लड़की है.

अचानक सुरेखा फूटफूट कर रोने लगी. बहुत देर तक रोती रही. उसे  महसूस हो रहा था जैसे अकेला रहना ही उस की नियति बन चुकी है. बच्चों और सास के समझानेबुझाने से वह थोड़ी शांत हुई और नौर्मल होने की कोशिश करने लगी. मगर उस के चेहरे की हंसी पूरी तरह गायब हो गई थी. एक उदासी उस के चेहरे पर हमेशा पसरी रहती. वह डिप्रैशन का शिकार हो चुकी थी. अकसर कमरा बंद कर खामोश बैठी रहती.

बच्चे मां की इस हालत के लिए खुद को जिम्मेदार मान रहे थे. सास भी यह बात समझ रही थी कि यदि समय रहते सही फैसला ले लिया होता और उसे पुनर्विवाह कर लेने दिया होता तो आज उस की यह हालत नहीं होती. मगर अब वे केवल पछता सकते थे क्योंकि सुरेखा ने अपनी हंसी और खुशियों से हमेशा के लिए दूरी बना ली थी.

एक दिन सास ने प्यार से उस का माथा सहलाते हुए कहा, ‘‘चल बहू ठीक से तैयार हो जा. तुझे किसी से मिलवाना है.’’

‘‘किस से मांजी?’’ उदास स्वर में सुरेखा ने पूछा.

‘‘मेरी सहेली का भतीजा है. उस की भी बीवी मर चुकी है. तेरी शादी की बात चलाई है उस से. बहुत अ?च्छा लड़का है.’’

‘‘केवल विधुर या अच्छा होना ही काफी नहीं मां, आप ने उस की कुंडली देखी? 36 गुण  मिला लिए और उस की जाति देखी? आप ने बच्चों से पूछा? बच्चे मना तो नहीं कर रहे और पंडितजी ने कोई दोष तो नहीं बताया? फिर यह भी तो सोचो कि लोग क्या कहेंगे? मांजी आप जानती हो न मेरी शादी से पहले सैकड़ों सवाल आगे आ जाते हैं.

‘‘उन के जवाब ढूंढ़तेढूंढ़ते मैं थक चुकी हूं. मुझे शादी नहीं करनी. सुना मांजी मुझे नहीं करनी शादी. मेरी जिंदगी में अकेला रहना लिखा है. तभी तो कितने ही पुरुष मेरी जिंदगी में आए, मगर हर बार कोई न कोई सवाल सामने आता रहा और मेरा सपना टूटता रहा, मेरी जिंदगी को सूना करता रहा. अब मुझे इस झांसे में नहीं आना. नहीं करनी मुझे शादी. बस बहुत हो गया. प्लीज अकेला छोड़ दो मुझे,’’ कहतेकहते सुरेखा फूटफूट कर रो पड़ी.

Fictional Story

Hindi Short Story: जीने की इच्छा- कैसे अरुण ने दिखाया बड़प्पन

Hindi Short Story: ‘‘जल्दी करो मां. मुझे देर हो रही है. फिर ट्रेन में जगह नहीं मिलेगी,’’ अरुण ने कहा.

मां बोलीं, ‘‘तेरी गाड़ी तो 12 बजे की है. अभी तो 7 भी नहीं बजे हैं.’’

‘‘मां, तुम समझती क्यों नहीं हो. मैं यार्ड में ही जा कर डब्बे में बैठ जाऊंगा. प्लेटफार्म पर सभी जनरल डब्बे बिलकुल भरे हुए ही आते हैं,’’ अरुण बोला.

उन दिनों ‘श्रमजीवी ऐक्सप्रैस’ ट्रेन पटना जंक्शन से 12 बजे खुल कर अगले दिन सुबह 5 बजे नई दिल्ली पहुंचती थी. अरुण को एक इंटरव्यू के लिए दिल्ली जाना था. अगले दिन सुबह के 11 बजे दिल्ली के दफ्तर में पहुंचना था.

अरुण के पिता किसी प्राइवेट कंपनी में चपरासी थे. अभी कुछ महीने पहले ही वे रिटायर हुए थे. वे कुछ दिनों से बीमार थे. वे किसी तरह 2 बेटियों की शादी कर चुके थे. सब से छोटे बेटे अरुण ने बीए पास करने के बाद कंप्यूटर की ट्रेनिंग ली थी. वह एक साल से बेकार बैठा था.

अरुण 1-2 छोटीमोटी ट्यूशन करता था. उस के पास स्लीपर क्लास के भी पैसे नहीं थे, इसीलिए पटना से दिल्ली जनरल डब्बे में जाना पड़ रहा था.

मां ने कहा, ‘‘बस हो गया. मैं ने  परांठा और भुजिया एक पैकेट में पैक कर दिया है. तुम याद से अपने बैग में रख लेना.’’

पिता ने भी बिस्तर पर पड़ेपड़े कहा, ‘‘जाओ बेटे, अपने सामान का खयाल रखना.’’

अरुण मातापिता को प्रणाम कर स्टेशन के लिए निकल पड़ा. यार्ड में जा कर एक डब्बे में खिड़की के पास वाली सिंगल सीट पर कब्जा जमा कर उस ने चैन की सांस ली.

ट्रेन प्लेटफार्म पर पहुंची, तो चढ़ने वालों की बेतहाशा भीड़ थी. अरुण जिस खिड़की वाली सीट पर बैठा था, वह इमर्जैंसी खिड़की थी. एक लड़की डब्बे में घुसने की नाकाम कोशिश कर रही थी. उस लड़की ने अरुण के पास आ कर कहा, ‘‘आप इमर्जैंसी खिड़की खोलें, तो मैं भी डब्बे में आ सकती हूं. मेरा इस ट्रेन से दिल्ली जाना बहुत जरूरी है.’’

अरुण ने उसे सहारा दे कर खिड़की से अंदर डब्बे में खींच लिया. लड़की पसीने से तरबतर थी. दुपट्टे से मुंह का पसीना पोंछते हुए उस ने अरुण को ‘थैंक्स’ कहा. थोड़ी देर में गाड़ी खुली, तो अरुण ने अपनी सीट पर जगह बना कर लड़की को बैठने को कहा. पहले तो वह झिझक रही थी, पर बाद में और लोगों ने भी बैठने को कहा, तो वह चुपचाप बैठ गई.

तकरीबन 2 घंटे बाद ट्रेन बक्सर पहुंची. यह बिहार का आखिरी स्टेशन था. यहां कुछ लोकल मुसाफिरों के उतरने से राहत मिली. अरुण के सामने वाली सीट खाली हुई, तो वह लड़की वहां जा बैठी.

अरुण ने लड़की का नाम पूछा, तो वह बोली, ‘‘आभा.’’

अरुण बोला, ‘‘मैं अरुण.’’

दोनों में बातें होने लगीं. अरुण ने पूछा, ‘‘पटना में तुम कहां रहती हो?’’

आभा बोली, ‘‘सगुना मोड़… दानापुर के पास.’’

‘‘मैं बहादुरपुर… मैं पटना के पूर्वी छोर पर हूं और तुम पश्चिमी छोर पर. दिल्ली में कहां जाना है?’’

‘‘कल मेरा एक इंटरव्यू है.’’

‘‘वाह, मेरा भी कल एक इंटरव्यू है. बुरा न मानो, तो क्या मैं जान सकता हूं कि किस कंपनी में इंटरव्यू है?’’

आभा बोली, ‘‘लाल ऐंड लाल ला असोसिएट्स में.’’

अरुण तकरीबन अपनी सीट से उछल कर बोला, ‘‘वाह, क्या सुहाना सफर है. आगाज से अंजाम तक हम साथ रहेंगे.’’

‘‘क्या आप भी वहीं जा रहे हैं?’’

अरुण ने रजामंदी में सिर हिलाया और मुसकरा दिया. रातभर दोनों अपनीअपनी सीट पर बैठेबैठे सोतेजागते रहे थे. ट्रेन तकरीबन एक घंटा लेट हो गई थी. इस के बावजूद काफी देर से गाजियाबाद स्टेशन पर खड़ी थी. सुबह के 7 बज चुके थे. अरुण नीचे उतर कर लेट होने की वजह पता लगाने गया.

अरुण अपनी सीट पर बैठते हुए बोला, ‘‘गाजियाबाद और दिल्ली के बीच में एक गाड़ी पटरी से उतर गई है. आगे काफी ट्रेनें फंसी हैं. ट्रेन के दिल्ली पहुंचने में काफी समय लग सकता है.’’

आभा यह सुन कर घबरा गई. अरुण ने उसे शांत करते हुए कहा, ‘‘डोंट वरी. हम दोनों यहीं उतर जाते हैं. यहीं फ्रैश हो कर कुछ चायनाश्ता कर लेते हैं. फिर यहां से आटोरिकशा ले कर सीधे कनाट प्लेस एक घंटे के अंदर पहुंच जाएंगे.’’

दोनों ने गाजियाबाद स्टेशन पर ही चायनाश्ता किया. फिर आटोरिकशा से दोनों कंपनी पहुंचे. दोनों ने अलगअलग इंटरव्यू दिए. इस के बाद कंपनी के मालिक मोहनलाल ने दोनों को एकसाथ बुलाया.

मोहनलाल ने दोनों से कहा, ‘‘देखो, मैं भी बिहार का ही हूं. दोनों की क्वालिफिकेशंस एक ही हैं. इंटरव्यू में दोनों की परफौर्मेंस बराबर रही है, पर मेरे पास तो एक ही जगह है. अब तुम लोग बाहर जा कर तय करो कि किसे नौकरी की ज्यादा जरूरत है. मुझे बता देना, मैं औफर लैटर इशू कर दूंगा.’’

अरुण और आभा दोनों ने बाहर आ कर बात की. अपनीअपनी पारिवारिक और माली हालत बताई.

आभा की मां विधवा थीं. उस की एक छोटी बहन भी थी. वह पटना के कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में पार्ट टाइम नौकरी करती थी, पर उसे बहुत कम पैसे मिलते थे. परिवार को उसी को देखना होता था.

अरुण ने आभा के पक्ष में सहमति जताई. आभा को वह नौकरी मिल गई. मालिक मोहनलाल अरुण से बहुत खुश हुआ और बोला, ‘‘नौकरी तो तुम भी डिजर्व करत थे. मैं तुम से बहुत खुश हूं. वैसे तो किराया देने का कोई करार नहीं था. फिर भी मैं ने अकाउंटैंट को कह दिया है कि तुम्हें थर्ड एसी का अपडाउन रेल किराया मिल जाएगा. जाओ, जा कर पैसे ले लो.’’

अरुण ने पैसे ले लिए. आभा उसे धन्यवाद देते हए बोली, ‘‘यह दिन मैं कभी नहीं भूलूंगी. मिस्टर मोहनलाल ने मुझे बताया कि तुम ने मेरी खाितर बड़ा त्याग किया है.’’

दोनों ने एकदूसरे का फोन नंबर लिया और संपर्क में रहने को कहा.

अरुण जनरल डब्बे में बैठ कर पटना लौट आया. उस ने किराए का काफी पैसा बचा लिया था. मातापिता को जब पता चला कि उसे नौकरी नहीं मिली, तो वे दोनों उदास हो गए.

कुछ ही दिनों में अरुण के पिता चल बसे. अरुण किसी तरह 2-3 ट्यूशन कर अपना काम चला रहा था. जिंदगी से उस का मन टूट चुका था. कभी सोचता कि घर छोड़ कर भाग जाए, तो कभी सोचता गंगा में जाकर डूब जाए. फिर अचानक बूढ़ी मां की याद आती, तो आंखों में आंसू भर आते.

एक दिन अरुण बाजार से कुछ सामान खरीदने गया. एक 16-17 साल का लड़का अपने कंधे पर एक बैग लटकाए कुछ बेच रहा था. उस के एक पैर में पोलियो का असर था. लाठी के सहारे चलता हुआ वह अरुण के पास आ कर बोला, ‘‘भैया, क्या आप को पापड़ चाहिए? 10 रुपए का एक पैकेट है.’’

अरुण ने कहा, ‘‘नहीं चाहिए पापड़.’’

लड़के ने थैले से एक शीशी निकाल कर कहा, ‘‘आम का अचार है. चाहिए? पापड़ और अचार दोनों घर के बने हैं. मां बनाती हैं.’’ अरुण के मन में दया आ गई. उस के पास 5 रुपए ही बचे थे. उस ने लड़के को देते हुए कहा, ‘‘मुझे कुछचाहिए तो नहीं, पर तुम इसे रख लो.’’

अरुण ने रुपए उस के हाथ में पकड़ा दिए. दूसरे ही पल वह लड़का गुस्से से बोला, ‘‘मैं विकलांग हूं, पर भिखारी नहीं. मैं मेहनत कर के खाता हूं. जिस दिन कुछ नहीं कमा पाता, मांबेटे पानी पी कर सो जाते हैं.’’

इतना बोल कर उस लड़के ने रुपए अरुण को लौटा दिए. पर वह अरुण की आंखों में उम्मीद की किरण जगा गया. वह सोचने लगा, ‘जब यह लड़का जिंदगी से हार नहीं मान सकता है, तो मैं क्यों मानूं?’

अरुण के पास दिल्ली में मिले कुछ रुपए बचे थे. वह कोलकाता गया. वहां के मंगला मार्केट से थोक में कुछ जुराबें, रूमाल और गमछे खरीद लाया. ट्यूशन के बाद बचे समय में न्यू मार्केट और महावीर मंदिर के पास फुटपाथ पर उन्हें बेचने लगा.

इस इलाके में सुबह से ले कर देर रात तक काफी भीड़ रहती थी. अरुण की अच्छी बिक्री हो जाती थी.

शुरू में अरुण को कुछ झिझक होती थी, पर बाद में उस का इस में मन लग गया. इस तरह उस ने देखा कि एक हफ्ते में तकरीबन 7-8 सौ रुपए, तो कभी हजार रुपए की बचत होती थी.

इस बीच बहुत दिन बाद उसे आभा का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘अगले हफ्ते मेरी शादी होने वाली है. कार्ड पोस्ट कर दिया है. तुम जरूर आना और मां को भी साथ लाना.’’

अरुण मां के साथ आभा की शादी में सगुना मोड़ उस के घर गया. आभा ने अपनी मां, बहन और पति से उन्हें मिलवाया और कहा, ‘‘मैं जिंदगीभर अरुण की कर्जदार रहूंगी. मुझे नौकरी अरुण की वजह से ही मिली थी.’’

शादी के बाद आभा दिल्ली चली गई. अरुण की दिनचर्या पहले जैसी हो गई.

एक दिन आभा का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘मेरे पति गुड़गांव की एक गारमैंट फैक्टरी में डिस्पैच सैक्शन में हैं. फैक्टरी से मामूली डिफैक्टिव कपड़े सस्ते दामों में मिल जाते हैं. तुम चाहो, तो इन्हें बेच कर अच्छाखासा मुनाफा कमा सकते हो.’’

अरुण बोला, ‘नेकी और पूछपूछ… मैं गुड़गांव आ रहा हूं.’

इधर अरुण उस पापड़ वाले लड़के का स्थायी ग्राहक हो गया था. उस का नाम रामू था. हर हफ्ते एक पैकेट पापड़ और अचार की शीशी उस से लिया करता था. अब अरुण महीने 2 महीने में एक बार दिल्ली जा कर कपड़े लाता और उन्हें अच्छे दाम पर बेचता.

धीरेधीरे अरुण का कारोबार बढ़ता गया. उस ने कंकड़बाग में एक छोटी सी दुकान किराए पर ले ली थी. बीचबीच में कोलकाता से भी थोक में कपड़े लाया करता. कारोबार बढ़ने पर उस ने एक बड़ी दुकान ले ली.

अरुण की शादी थी. उस ने आभा को भी बुलाया. वह भी पति के साथ आई थी. अरुण ने उस पापड़ वाले लड़के को भी अपनी शादी में बुलाया था.

शादी हो जाने के बाद जब अरुण अपनी मां के साथ मेहमानों को विदा कर रहा था, अरुण ने आभा को उस की मदद के लिए थैंक्स कहा.

आभा ने कहा, ‘‘अरे यार, नो मोर थैंक्स. हिसाब बराबर. हम दोस्त  हैं.’’

फिर अरुण ने रामू को बुला कर सब से परिचय कराते हुए कहा, ‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, इस लड़के की वजह से हूं. मैं तो जिंदगी से निराश हो चुका था. मेरे अंदर जीने की इच्छा को इस स्वाभिमानी मेहनती रामू ने जगाया.’’

तब अरुण रामू से बोला, ‘‘मुझे अपनी दुकान में एक सेल्समैन की जरूरत है. क्या तुम मेरी मदद करोगे?’’

रामू ने हामी भर कर सिर झुका कर अरुण को नमस्कार किया.

अरुण बोला, ‘‘अब तुम्हें घूमघूम कर सामान बेचने की जरूरत नहीं है. मैं ने यहां के विधायक को अर्जी दी है तुम्हें अपने फंड से एक तिपहिया रिकशा देने की. तुम उसे आसानी से चला सकते हो और आजा सकते हो.’’

अरुण, आभा, रामू और बाकी सभी की आंखें खुशी से नम थीं. तीनों एकदूसरे के मददगार जो बने थे.

Hindi Short Story

Family Kahani: जहर का पौधा- भाभी का मन कठोर था

Family Kahani: बहुत ज्यादा थक गया था डाक्टर मनीष. अभीअभी भाभी का औपरेशन कर के वह अपने कमरे में लौटा था. दरवाजे पर भैया खड़े थे. उन की सफेद हुई जा रही आंखों को देख कर भी वह उन्हें ढाढ़स न बंधा सका था. भैया के कंधे पर हाथ रखने का हलका सा प्रयास मात्र कर के रह गया था. टेबललैंप की रोशनी बुझा कर आरामकुरसी पर बैठना उसे अच्छा लगा था. वह सोच रहा था कि अगर भाभी न बच सकीं तो भैया जरूर उसे हत्यारा कहेंगे. भैया कहेंगे कि मनीष ने बदला निकाला है. भैया ऐसा न सोचें, वह यह मान नहीं सकता. उन्होंने पहले डाक्टर चंद्रकांत को भाभी के औपरेशन के लिए बुलाया था. डाक्टर चंद्रकांत अचानक दिल्ली चले गए थे. इस के बाद भैया ने डाक्टर विमल को बुलाने की कोशिश की थी, पर जब वे भी न मिले तो अंत में मजबूर हो कर उन्होंने डाक्टर मनीष को ही स्वीकार कर लिया था.

औपरेशनटेबल पर लेटने से पहले भाभी आंखों में आंसू लिए भैया से मिल चुकी थीं, मानो यह उन का अंतिम मिलन हो. उस ने भाभी को बारबार ढाढ़स दिलाया था, ‘‘भाभी, आप का औपरेशन जरूर सफल होगा.’’ किंतु भीतर ही भीतर भाभी उस का विश्वास न कर सकी थीं. और भैया कैसे उस पर विश्वास कर लेते? वे तो आजीवन भाभी के पदचिह्नों पर चलते रहे हैं.

डाक्टर मनीष जानता है कि आज से 30 वर्ष पहले जहर का जो पौधा भाभी के मन में उग आया था, उसे वह स्नेह की पैनी से पैनी कुल्हाड़ी से भी नहीं काट सका. वह यह सोच कर संतुष्ट रह गया था कि संसार की कई चीजों को मानव चाह कर भी समाप्त करने में असमर्थ रहता है. जहर के इस पौधे का बीजारोपण भाभी के मन में उन की शादी के समय हुआ था. तब मनीष 10 वर्ष का रहा होगा. भैया की बरात बड़ी धूमधाम से नरसिंहपुर गई थी. उसे दूल्हा बने भैया के साथ घोड़े पर बैठने में बड़ा आनंद आ रहा था. आने वाली भाभी के प्रति सोचसोच कर उस का बालकमन हवा से बातें कर रहा था. मां कहा करती थीं, ‘मनीष, तेरी भाभी आ जाएगी तो तू गुड्डो का मुकाबला करने के काबिल हो जाएगा. यदि गुड्डो तुझे अंगरेजी में चिढ़ाएगी तो तू भी भाभी से सारे अर्थ समझ कर उसे जवाब दे देना.’ वह सोच रहा था, भाभी यदि उस का पक्ष लेंगी तो बेचारी गुड्डो अकेली पड़ जाएगी. उस के बाद मन को बेचारी गुड्डो पर रहरह कर तरस आ रहा था.

भैया का ब्याह देखने के लिए वह रातभर जागा था और घूंघट ओढ़े भाभी को लगातार देखता रहा था. सुबह बरात के लौटने की तैयारी होने लगी थी. विवाह के अवसर पर नरसिंहपुर के लोगों ने सप्रेम भेंट के नाम पर वरवधू को बरतन, रुपए और अन्य कई किस्मों की भेंटें दी थीं. बरतन और अन्य उपहार तो भाभी के पिताजी ने दे दिए थे किंतु रुपयों के मामले में वे अड़ गए थे. इस बात को मनीष के पिता ने भी तूल दे दिया था. भाभी के पिता का कहना था कि वे रुपए लड़की के पिता के होते हैं, जबकि मनीष के पिता कह रहे थे कि यह भी लोगों द्वारा वरवधू को दिया गया एक उपहार है, सो, लड़की के पिता को इस पर अपनी निगाह नहीं रखनी चाहिए.

बात बढ़ गई थी और मामला सार्वजनिक हो गया था. तुरंत ही पंचायत बैठाई गई. पंचायत में फैसला हुआ कि ये रुपए वरवधू के खाते में ही जाएंगे. इस फैसले से भाभी के पिता मन ही मन सुलग उठे. उस समय तो वे मौन रह गए, किंतु बाद में इस का बदला निकालने का उन्होंने प्रण कर लिया.

उन की बेटी ससुराल से पहली बार 4 दिनों के लिए मायके आई तो उन्होंने बेटी के सामने रोते हुए कहा था, ‘बेटा, तेरे ससुर ने जिस दिन से मेरा अपमान किया है, मैं मन ही मन राख हुआ जा रहा हूं.’

भाभी ने पिता को सांत्वना देते हुए कहा था, ‘पिताजी, आप रोनाधोना छोडि़ए. मैं प्रण करती हूं कि आप के अपमान का बदला ऐसे लूंगी कि ससुर साहब का घर उजड़ कर धूल में मिल जाएगा. ससुरजी को मैं बड़ी कठोर सजा दूंगी.’ इस के पश्चात भाभी ने ससुराल आते ही किसी उपन्यास की खलनायिका की तरह शतरंज की बिसात बिछा दी. चालें चलने वाली वे अकेली थीं. सब से पहले उन्होंने राजा को अपने वश में किया. भैया के प्रति असाधारण प्रेम की जो गंगा उन्होंने बहाई, तो भैया उसी को वैतरणी समझने लगे. भैया ने पारिवारिक कर्तव्यों की उपेक्षा सी कर दी.

मनीष को अच्छी तरह याद है कि एक बार वह महल्ले के बच्चों के साथ गुल्लीडंडा खेल रहा था. गुल्ली अचानक भाभी के कमरे में घुस गई थी. वह गुल्ली उठाने तेजी से लपका. रास्ते में खिड़की थी, उस ने अंदर निगाह डाली. भाभी एक चाबी से माथे पर घाव कर रही थीं. जब वह दरवाजे से हो कर अंदर गया तो भाभी सिर दबाए बैठी थीं. उस ने बड़ी कोमलता से पूछा, ‘क्या हुआ, भाभी?’ तब वे मुसकरा कर बोली थीं, ‘कुछ नहीं.’ वह गुल्ली उठा कर वापस चला गया था.

लेकिन शाम को सब के सामने भैया ने मनीष को चांटे लगाते हुए कहा था, ‘बेशर्म, गुल्ली से भाभी के माथे पर घाव कर दिया और पूछा तक नहीं.’ भाभी के इस ड्रामे पर तो मनीष सन्न रह गया था. उस के मुंह से आवाज तक न निकली थी. निकलती भी कैसे? उम्र में बड़ी और आदर करने योग्य भाभी की शिकायत भैया से कर के उसे और ज्यादा थोड़े पिटना था. भैया घर के सारे लोगों पर नाराज हो रहे थे कि उन की पत्नी से कोई भी सहानुभूति नहीं रखता. सभी चुपचाप थे. किसी ने भी भैया से एक शब्द नहीं कहा था. इस के बाद भैया ने पिताजी, मां और भाईबहनों से बात करना छोड़ दिया था. वे अधिकांश समय भाभी के कमरे में ही गुजारते थे.

इस के बाद एक सुबह की बात है. भैया को सुबह जल्दी जाना था. भाभी भैया के लिए नाश्ता तैयार करने के लिए चौके में आईं. चौके में सभी सदस्य बैठे थे, सभी को चाय का इंतजार था. मनीष रो रहा था कि उसे जल्दी चाय चाहिए. मां उसे समझा रही थीं, ‘बेटा, चाय का पानी चूल्हे पर रखा है, अभी 2 मिनट में उबल जाएगा.’ उसी समय भाभी ने चूल्हे से चाय उतार कर नाश्ते की कड़ाही चढ़ा दी. मां ने मनीष के आंसू देखते हुए कहा, ‘बहू, चाय तो अभी दो मिनट में बन जाएगी, जरा ठहर जाओ न.’

इतनी सी बात पर भाभी ने चूल्हे पर रखी कड़ाही को फेंक दिया. अपना सिर पकड़ कर वे नीचे बैठ गईं और जोर से बोलीं, ‘मैं अभी आत्महत्या कर लेती हूं. तुम सब लोग मुझ से और मेरे पति से जलते हो.’ इतना सुन कर भैया दौड़ेदौड़े आए और भाभी का हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गए. वे भी चीखने लगे, ‘मीरा, तुम इन जंगलियों के बीच में न बैठा करो. खाना अपने कमरे में ही बनेगा. ये अनपढ़ लोग तुम्हारी कद्र करना क्या जानें.’

भैया के आग्रह पर 4-5 दिनों बाद ही घर के बीच में दीवार उठा दी गई. सारा सामान आधाआधा बांट लिया गया. इस बंटवारे से पिताजी को बहुत बड़ा धक्का लगा था. वे बीमार रहने लगे थे. उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र लिख दिया था.

भैया केंद्र सरकार की ऊंची नौकरी में थे. अच्छाखासा वेतन उन्हें मिलता था. मनीष को याद नहीं है कि विवाह के बाद भैया ने एक रुपया भी पिताजी की हथेली पर धरा हो. पिताजी को इस बात की चिंता भी न थी. पुरानी संपत्ति काफी थी, घर चल जाता था. एक दिन भाभी के गांव से कुछ लोग आए. गरमी के दिन थे. मनीष और घर के सभी लोग बाहर आंगन में सो रहे थे. अचानक मां आगआग चिल्लाईं. सभी लोग शोर से जाग गए. देखा तो घर जल रहा था. पड़ोसियों ने पानी डाला, दमकल विभाग की गाडि़यां आईं. किसी तरह आग पर काबू पाया गया. घर का सारा कीमती सामान जल कर राख हो गया था. घर के नाम पर अब खंडहर बचा था. भैया के हिस्से वाले घर को अधिक क्षति नहीं पहुंची थी. पिताजी ने कमचियों की दीवार लगा कर किसी तरह घर को ठीक किया था. मां रोती रहीं. मां का विश्वास था कि यह करतूत भाभी के गांव से आए लोगों की थी. पिताजी ने मां को उस वक्त खामोश कर दिया था, ‘बिना प्रमाण के इस तरह की बातें करना अच्छा नहीं होता.’

साहूकारी में लगा रुपया किसी तरह एकत्र कर के पिताजी ने मनीष की दोनों बहनों का विवाह निबटाया था. उस समय मनीष 10वीं कक्षा का विद्यार्थी था. मां को गठियावात हो गया था. वे बिस्तर से चिपक गई थीं. पिताजी मां की सेवा करते रहे. मगर सेवा कहां तक करते? दवा के लिए तो पैसे थे ही नहीं. मनीष को स्कूल की फीस तक जुटाना बड़ा दुरूह कार्य था, सो, पिताजी ने, जो अब अशक्त और बूढ़े हो गए थे, एक जगह चौकीदारी की नौकरी कर ली.

भाभी को उन लोगों पर बड़ा तरस आया था. वे कहने लगीं, ‘मनीष, हमारे यहां खाना खा लिया करेगा.’ मां के बहुत कहने पर मनीष तैयार हो गया था. वह पहले दिन भाभी के घर खाने को गया तो भाभी ने उस की थाली में जरा सी खिचड़ी डाली और स्वयं पड़ोसी के यहां गपें लड़ाने चली गईं. उस दिन वह बेचारा भूखा ही रह गया था.

मनीष ने निश्चय कर लिया था कि अब वह भाभी के घर खाना खाने नहीं जाएगा. इस का परिणाम यह निकला कि भाभी ने सारे महल्ले में मनीष को अकड़बाज की उपाधि दिलाने का प्रयास किया. मां कई दिनों तक बीमार पड़ी रहीं और एक दिन चल बसीं. मनीष रोता रह गया. उस के आंसू पोंछने वाला कोई भी न था.

पिताजी का अशक्त शरीर इस सदमे को बरदाश्त न कर सका. वे भी बीमार रहने लगे. अचानक एक दिन उन्हें लकवा मार गया. मनीष की पढ़ाई छूट गई. वह पिताजी की दिनरात सेवा करने में जुट गया. पिताजी कुछ ठीक हुए तो मनीष ने पास की एक फैक्टरी में मजदूरी करनी शुरू कर दी. लकवे के एक वर्ष पश्चात पिताजी को हिस्टीरिया हो गया. उसी बीमारी के दौरान वे चल बसे. मनीष के चारों ओर विपत्तियां ही विपत्तियां थीं और विपत्तियों में भैयाभाभी का भयानक चेहरा उस के कोमल हृदय पर पीड़ाओं का अंबार लगा देता. उस ने शहर छोड़ देना ही उचित समझा.

एक दिन चुपके से वह मुंबई की ओर प्रस्थान कर गया. वहां कुछ हमदर्द लोगों ने उसे ट्यूशन पढ़ाने के लिए कई बच्चे दिला दिए. मनीष ने ट्यूशन करते हुए अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. प्रथम श्रेणी में पास होने से उसे मैडिकल कालेज में प्रवेश मिल गया. उसे स्कौलरशिप भी मिलती थी.

फिर एक दिन मनीष डाक्टर बन गया. दिन गुजरते रहे. मनीष ने विवाह नहीं किया. वह डाक्टर से सर्जन बन गया. फिर उस का तबादला नागपुर हो गया यानी वह फिर से अपने शहर में आ गया. मनीष ने भैया व भाभी से फिर से संबंध जोड़ने के प्रयास किए थे किंतु वह असफल रहा था. भाभी घायल नागिन की तरह उस से अभी भी चिढ़ी हुई थीं. उन्हें दुख था तो यह कि उन्होंने जिस परिवार को उजाड़ने का प्रण लिया था, उसी परिवार का एक सदस्य पनपने लगा था.

मनीष को भाभी के इस प्रण की भनक लग गई थी किंतु इस से उसे कोई दुख नहीं हुआ. उस के चेहरे पर हमेशा चेरी के फूल की हंसी थिरकती रहती थी. उस ने सोच रखा था कि भाभी के मन में उगे जहर के पौधे को वह एक दिन जरूर धराशायी कर देगा. मनीष को संयोग से मौका मिल भी गया था. भाभी के पेट में एक बड़ा फोड़ा हो गया था. उस फोड़े को समाप्त करने के लिए औपरेशन जरूरी था. यह संयोग की ही बात थी कि वह औपरेशन मनीष को ही करना पड़ा.

वह जानता था कि यदि औपरेशन असफल रहा तो भैया जरूर उस पर हत्या का आरोप लगा देंगे. वह अपने कमरे में बैठा इसी बात को बारबार सोच रहा था. उसी वक्त मनीष के सहायक डाक्टर रामन ने कमरे में प्रवेश किया. ‘‘हैलो, सर, मीराजी अब खतरे से बाहर हैं,’’ रामन ने टेबललैंप की रोशनी करते हुए कहा.

‘‘थैंक्यू डाक्टर, आप ने बहुत अच्छी खबर सुनाई,’’ मनीष ने कहा, ‘‘लेकिन आगे भी मरीज की देखभाल बहुत सावधानी से होनी चाहिए.’’ ‘‘ऐसा ही होगा, सर,’’ डाक्टर रामन ने कहा.

‘‘मीराजी के पास एक और नर्स की ड्यूटी लगा दी जाए,’’ मनीष ने आदेश दिया. ‘‘अच्छा, सर,’’ डाक्टर रामन बोला. एक सप्ताह में मनीष की भाभी का स्वास्थ्य ठीक हो गया. हालांकि अभी औपरेशन के टांके कच्चे थे लेकिन उन के शरीर में कुछ शक्ति आ गई थी. मनीष भाभी से मिलने के लिए रोज जाता था. वह उन्हें गुलाब का एक फूल रोज भेंट करता था.

एक महीने बाद भाभी को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. मनीष भैयाभाभी को टैक्सी तक

छोड़ने गया. सारी राह भैया अस्पताल की चर्चा करते रहे. भाभी कुछ शर्माई सी चुपचुप रहीं. मनीष ने कहा, ‘‘भाभीजी, मेरी फीस नहीं दोगी.’’

‘‘क्या दूं तुम्हें?’’ भाभी के मुंह से निकल पड़ा. ‘‘सिर्फ गुलाब का एक फूल,’’ मनीष ने मुसकराते हुए कहा.

घर पहुंचने के कुछ दिनों बाद ही भाभी के स्वस्थ हो जाने की खुशी में महल्लेभर के लोगों को भोज दिया गया. भाभी सब से कह रही थीं, ‘‘मैं बच ही गई वरना इस खतरनाक रोग से बचने की उम्मीद कम ही होती है.’’ लेकिन भाभी का मन लगातार कह रहा था, ‘मनीष ने अस्पताल में मेरे लिए कितना बढि़या इंतजाम कराया. मैं ने उसे बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी किंतु उस ने मेरा औपरेशन कितने अच्छे ढंग से किया.’

भाभी बारबार मनीष को भुलाने का प्रयास करतीं किंतु उस की भोली सूरत और मुसकराता चेहरा सामने आ जाता. वे सोचतीं, ‘आखिर बेचारे ने मांगा भी क्या, सिर्फ एक गुलाब का फूल.’ आखिर भाभी से रहा नहीं गया. उन्होंने अपने बाग में से ढेर सारे गुलाब के फूल तोड़े और अपने पति के पास गईं.

‘‘जरा सुनिए, आज के भोज में सारे महल्ले के लोग शामिल हैं, यदि मनीष को भी अस्पताल से बुला लें तो कैसा रहेगा वरना लोग बाद में क्या कहेंगे?’’ ‘‘हां, कहती तो सही हो,’’ भैया बोले, ‘‘अभी बुलवा लेता हूं उसे.’’

एक आदमी दौड़ादौड़ा अस्पताल गया मनीष को बुलाने, लेकिन मनीष नहीं आ सका. वह किसी दूसरे मरीज का जीवन बचाने में पिछली रात से ही उलझा हुआ था. मनीष ने संदेश भेज दिया कि वह एक घंटे बाद आ जाएगा. किंतु मरीज की दशा में सुधार न हो पाने के कारण मनीष अपने वादे के मुताबिक भोज में नहीं पहुंच सका. भाभी द्वारा तोड़े गए गुलाब जब मुरझाने लगे तो भाभी ने खुद अस्पताल जाने का निश्चय कर लिया.

भोज में पधारे सारे मेहमान रवाना हो गए, तब भाभी ने मनीष के लिए टिफिन तैयार किया और गुलाब का फूल ले कर भैया के साथ अस्पताल की ओर रवाना हो गईं. अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि मनीष एक वार्ड में पलंग पर आराम कर रहा है. उस ने मरीज को अपना स्वयं का खून दिया था, क्योंकि तुरंत कोई व्यवस्था नहीं हो पाई थी और मरीज की जान बचाना अति आवश्यक था.

भाभी को जब यह जानकारी मिली कि मनीष ने एक गरीब रोगी को अपना खून दिया है तो उन के मन में अचानक ही मनीष के लिए बहुत प्यार उमड़ आया. भाभी के मन में वर्षों से नफरत की जो ऊंची दीवार अपना सिर उठाए खड़ी थी, एक झटके में ही भरभरा कर गिर पड़ी. उन के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘मनीष वास्तव में एक सच्चा इंसान है.’’

भाभी के मुंह से निकली इस हलकी सी प्रेमवाणी को मनीष सुन नहीं सका. मनीष ने तो यही सुना, भाभी कह रही थीं, ‘‘मनीष, तुम्हारी भाभी ने तुम्हारे लिए कुछ भी अच्छा नहीं किया. लेकिन आश्चर्य है, तुम इस के बाद भी भाभी की इज्जत करते हो.’’ ‘‘हां, भाभी, परिवाररूपी मकान का निर्माण करने के लिए प्यार की एकएक ईंट को बड़ी मजबूती से जोड़ना पड़ता है. डाक्टर होने के कारण मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी भाभी के मन में कहीं न कहीं स्नेह का स्रोत छिपा है.’’

‘‘मुझे माफ कर दो, मनीष,’’ कहते हुए भावावेश में भाभी ने मनीष का हाथ पकड़ लिया. उन की आंखों में आंसू छलक आए. वे बोलीं, ‘‘मैं ने तुम्हारा बहुत बुरा किया है, मनीष. मेरे कारण ही तुम्हें घर छोड़ना पड़ा.’’ ‘‘अगर घर न छोड़ता तो कुछ करगुजरने की लगन भी न होती. मैं यहां का प्रसिद्ध डाक्टर आप के कारण ही तो बना हूं,’’ कहते हुए मनीष ने अपने रूमाल से भाभी के आंसू पोंछ दिए.

देवरभाभी का यह अपनापन देख कर भैया की आंखें भी खुशी से गीली हो उठीं.

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