बाढ़: क्या मीरा और रघु के संबंध लगे सुधरने

बौस ने जरूरी काम बता कर मीरा को दफ्तर में ही रोक लिया और खुद चले गए.

मीरा को घर लौटने की जल्दी थी. उसे शानू की चिंता सता रही थी. ट्यूशन पढ़ कर लौट आया होगा, खुद ब्रेड सेंक कर भी नहीं खा सकता, उस के इंतजार में बैठा होगा.

बाहर तेज बारिश हो रही थी…अचानक बिजली चली गई तो मीरा इनवर्टर की रोशनी में काम पूरा करने लगी. तभी फोन की घंटी बज उठी.

‘‘मां, तुम कितनी देर में आओगी?’’ फोन कर शानू ने जानना चाहा, ‘‘घर में कुछ खाने को नहीं है.’’

‘‘पड़ोस की निर्मला आंटी से ब्रेड ले लेना,’’ मीना ने बेटे को समझाया.

‘‘बिजली के बगैर घर में कितना अंधेरा हो गया है, मां. डर लग रहा है.’’

‘‘निर्मला आंटी के घर बैठे रहना.’’

‘‘कितनी देर में आओगी?’’

‘‘बस, आधा घंटा और लगेगा. देखो, मैं लौटते वक्त तुम्हारे लिए बर्गर, केले व आम ले कर आऊंगी, होटल से पनीर की सब्जी भी लेती आऊंगी.’’

बेटे को सांत्वना दे कर मीरा तेजी से काम पूरा करने लगी. वह सोच रही थी कि महानगर में इतनी देर तक बिजली नहीं जाती, शायद बरसात की वजह से खराबी हुई होगी.

काम पूरा कर के मीरा ने सिर उठाया तो 9 बज चुके थे. चौकीदार बैंच पर बैठा ऊंघ रहा था.

मीरा को इस वक्त एक प्याला चाय पीने की इच्छा हो रही थी, पर घर भी लौटने की जल्दी थी. चौकीदार से ताला बंद करने को कह कर मीरा ने पर्स उठाया और जीना उतरने लगी.

चारों तरफ घुप अंधेरा फैला हुआ था. क्या हुआ बिजली को, सोचती हुई मीरा अंदाज से टटोल कर सीढि़यां उतरने लगी. घोर अंधेरे में तीसरे माले से उतरना आसान नहीं होता.

सड़क पर खड़े हो कर उस ने रिकशा तलाश किया, जब नहीं मिला तो वह छाता लगा कर पैदल ही आगे बढ़ने लगी.

अब न तो कहीं रुक कर चाय पीने का समय रह गया था न कुछ खरीदारी करने का.

थोड़ा रुक कर मीरा ने बेटे को मोबाइल से फोन मिलाया तो टींटीं हो कर रह गई.

अंधेरे में अचानक मीरा को ऐसा लगा जैसे वह नदी में चली आई हो. सड़क पर इतना पानी कहां से आ गया…सुबह निकली थी तब तो थोड़ा सा ही पानी भरा हुआ था, फिर अचानक यह सब…

अभी वह यह सब सोच ही रही थी कि पानी गले तक पहुंचने लगा. वह घबरा कर कोई आश्रय स्थल खोजने लगी.

घने अंधेरे में उसे दूर कुछ बहुमंजिली इमारतें दिखाई पड़ीं. मीरा उसी तरफ बढ़ने लगी पर वहां पहुंचना उस के लिए आसान नहीं था.

जैसेतैसे मीरा एक बिल्ंिडग के नीचे बनी पार्किंग तक पहुंच पाई. पर उस वक्त वह थकान की अधिकता व भीगने की वजह से अपनेआप को कमजोर महसूस कर रही थी.

मीरा को यह स्थान कुछ जानापहचाना सा लगा. दिमाग पर जोर दिया तो याद आया, इसी इमारत की दूसरी मंजिल पर वह रघु के साथ रहती थी.

फिर रघु के गैरजिम्मेदाराना रवैये से परेशान हो कर उस ने उस के साथ संबंध विच्छेद कर लिया था. उस वक्त शानू सिर्फ ढाई वर्ष का था. अब तो कई वर्ष गुजर चुके हैं…शानू 10 वर्ष का हो चुका है.

क्या पता रघु अब भी यहां रहता है या चला गया, हो सकता है उस ने दूसरा विवाह कर लिया हो.

मीरा को लग रहा था कि वह अभी गिर पडे़गी. ठंड लगने से कंपकंपी शुरू हो गई थी.

एक बार ऊपर जाने में हर्ज ही क्या है. रघु न सही कोई दूसरा सही, उसे किसी का सहारा तो मिल ही जाएगा. उस ने सोचा और जीने की सीढि़यां चढ़ने लगी…फिर उस ने फ्लैट का दरवाजा जोर से खटखटा दिया.

किसी ने दरवाजा खोला और मोमबत्ती की रोशनी में उसे देखा, बोला, ‘‘मीरा, तुम?’’

रघु की आवाज पहचान कर मीरा को भारी राहत मिली…फिर वह रघु की बांहों में गिर कर बेसुध होती चली गई.

कंपकपाते हुए मीरा ने भीगे कपडे़ बदल कर, रघु के दिए कपडे़ पहने फिर चादर ओढ़ कर बिस्तर पर लेट गई.

कानूनी संबंध विच्छेद के वर्षों बाद फिर से उस घर में आना मीरा को बड़ा विचित्र लग रहा है, उस के  व रघु के बीच जैसे लाखों संकोच की दीवारें खड़ी हो गई हैं.

रघु चाय बना कर ले आया, ‘‘लो, चाय के साथ दवा खा लो, बुखार कम हो जाएगा.’’

दवा ने अच्छा काम किया…मीरा उठ कर बैठ गई.

रघु खाना बना रहा था.

‘‘तुम ने शादी नहीं की?’’ मीरा ने धीरे से प्रश्न किया.

‘‘मुझ से कौन औरत शादी करना पसंद करेगी, न सूरत है न अक्ल और न पैसा…तुम ने ही मुझे कब पसंद किया था, छोड़ कर चली गई थीं.’’

मीरा देख रही थी. पहले के रघु व इस रघु में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है.

‘‘तुम ने खाना बनाना कब सीख लिया? सब्जी तो बहुत स्वादिष्ठ बनाई है.’’

‘‘तुम चली गईं तो मुझे खाना बना कर कौन खिलाता, सारा काम मुझे ही करना पड़ा, धीरेधीरे सारा कुछ सीख लिया, बरतन साफ करता हूं, कपड़े धोता हूं, इस्तिरी करता हूं.’’

‘‘आज बिजली को क्या हुआ, आ जाती तो मैं फोन चार्ज कर लेती.’’

‘‘तुम्हें शायद पता नहीं, पूरे शहर में बाढ़ का पानी फैल चुका है. बिजली, टेलीफोन सभी की लाइनें खराब हो चुकी हैं, ठीक करने में पता नहीं कितने दिन लग जाएं.’’

मीरा घबरा गई, ‘‘बाढ़ की वजह से मैं घर कैसे जा पाऊंगी…शानू घर में अकेला है.’’

‘‘शानू यानी हमारा बेटा,’’ रघु चिंतित हो उठा, ‘‘मैं वहां जाने का प्रयास करता हूं.’’

मीरा ने पता बताया तो रघु के चेहरे पर चिंता की लकीरें और अधिक बढ़ गईं. वह बोला, ‘‘मीरा, उस इलाके में 10 फुट तक पानी चढ़ चुका है. मैं उसी तरफ से आया था, मुझे तैरना आता है इसलिए निकल सका नहीं तो डूब जाता.’’

‘‘शानू, मेरा बेटा…किसी मुसीबत में न फंस गया हो,’’ कह कर मीरा रोने लगी.

‘‘चिंता करने से क्या हासिल होगा, अब तो सबकुछ समय पर छोड़ दो,’’ रघु उसे सांत्वना देने लगा. पर चिंता तो उसे भी हो रही थी.

दोनों ने जाग कर रात बिताई.

हलका सा उजाला हुआ तो रघु ने पाउडर वाले दूध से 2 कप चाय बनाई.

मीरा को चाय, बिस्कुट व दवा की गोली खिला कर बोला, ‘‘मैं जा कर देखता हूं, शानू को ले कर आऊंगा.’’

‘‘उसे पहचानोगे कैसे, वर्षों से तो तुम ने उसे देखा नहीं.’’

‘‘बाप के लिए अपना बेटा पहचानना कठिन नहीं होता, तुम ने कभी अपना पता नहीं बताया, कभी मुझ से मिलने नहीं आईं, जबकि मैं ने तुम्हें काफी तलाश किया था. एक ही शहर में रह कर हम दोनों अनजान बने रहे,’’ रघु के स्वर में शिकायत थी.

‘‘मैं ही गलती पर थी, तुम्हें पहचान नहीं पाई. मैं सोच भी नहीं सकती थी कि तुम इतना बदल सकते हो. शराब पीना और जुआ खेलना बंद कर के पूरी तरह से तुम जिम्मेदार इनसान बन चुके हो.’’

रघु ने बरसाती पहनी और छोटी सी टार्च जेब में रख ली.

मीरा, शानू का हुलिया बताती रही.

रघु चला गया, मीरा सीढि़यों पर खड़ी हो उसे जाते देखती रही.

आज दफ्तर जाने का तो सवाल ही नहीं था, बगैर बिजली के तो कुछ भी काम नहीं हो सकेगा.

मीरा ने पहले कमरे की फिर रसोई और बरतनों की सफाई का काम निबटा डाला. उस ने खाना बनाने के लिए दालचावल बीनने शुरू किए पर टंकी में पानी समाप्त हो चला था.

उसे याद आया कि नीचे एक हैंडपंप लगा था. वह बालटी भर कर ले आई और खाना बना कर रख दिया.

पर रघु अभी तक नहीं आया था. मीरा को चिंता सताने लगी…पता नहीं वह उस के कमरे तक पहुंचा भी है या नहीं. किस हाल में होगा शानू.

मीरा कुछ वक्त पड़ोसिन के साथ गुजारने के खयाल से जीना उतरी तो यह देख कर दंग रह गई कि सभी फ्लैट खाली थे. वहां रहने वाले बाढ़ के डर से कहीं चले गए थे.

बाहर सड़क पर अब भी पानी भरा हुआ था, बरसात भी हो रही थी. अकेलेपन के एहसास से डरी हुई मीरा फ्लैट का दरवाजा बंद कर के बैठ गई.

रघु काफी देरी से आया, उस के जिस्म पर चोटों के निशान थे.

मीरा घबरा गई, ‘‘चोटें कैसे लग गईं आप को, शानू कहां है?’’

उस ने रघु की चोटों पर दवा लगाई.

रघु ने बताया कि उस के घर में शानू नहीं था, पुलिस ने बाढ़ में फंसे लोगों को राहत शिविरों में पहुंचा दिया है, शानू भी वहीं गया होगा.

मीरा की आंखों में आंसू भर आए, ‘‘मैं ने कभी बेटे को अपने से अलग नहीं किया था. खैर, तुम ने यह तो बताया नहीं, चोटें कैसे लगी हैं.’’

‘‘फिसल कर गिर गया था…पैर की मोच के कारण कठिनाई से आ पाया हूं.’’

मीरा ने खाना लगाया, दोनों साथसाथ खाने लगे.

खाना खाने के तुरंत बाद रघु को नींद आने लगी और वह सो गया. जब उठा तो रात गहरा उठी थी.

मीरा खामोशी से कुरसी पर बैठी थी.

‘‘तुम ने मोमबत्ती नहीं जलाई,’’ रघु बोला और फिर ढूंढ़ कर मोमबत्ती ले आया और बोला, ‘‘मैं राहत शिविरों में जा कर शानू की खोज करता हूं.’’

‘‘इतनी रात को मत जाओ,’’ मीरा घबरा उठी.

‘‘तुम्हें अब भी मेरी चिंता है.’’

‘‘मैं ने तुम्हारे साथ वर्षों बिताए हैं.’’

रघु यह सुन कर बिस्तर पर बैठ गया, ‘‘जब सबकुछ सही है तो फिर गलत क्या है? क्या हम लोग फिर से एकसाथ नहीं रह सकते?’’

मीरा सोचने लगी.

‘‘हम दोनों दिन भर दफ्तरों में रहते हैं,’’ रघु बोला, ‘‘रात को कुछ घंटे एकसाथ बिता लें तो कितना अच्छा रहेगा, शानू की जिम्मेदारी हम दोनों मिल कर उठाएंगे.’’

मीरा मौन ही रही.

‘‘तुम बोलती क्यों नहीं, मीरा. मैं ने जिम्मेदारियां निभाना सीख लिया है. मैं घर के सभी काम कर लिया करूंगा,’’ रघु के स्वर मेें याचक जैसा भाव था.

मीरा का उत्तर हां में निकला.

रघु की मुसकान गहरी हो उठी.

सुबह एक प्याला चाय पी कर रघु घर से निकल पड़ा, फिर कुछ घंटे बाद ही उस का खुशी भरा स्वर फूटा, ‘‘मीरा, देखो तो कौन आया है.’’

मीरा ने दरवाजा खोल कर देखा तो सामने शानू खड़ा था.

‘‘मेरा बेटा,’’ मीरा ने शानू को सीने से चिपका लिया. फिर वह रघु की तरफ मुड़ी, ‘‘तुम ने आसानी से शानू को पहचान लिया या परेशानी हुई थी?’’

‘‘कैंप के रजिस्टर मेें तुम्हारा पता व नाम लिखा हुआ था.’’

रघु राहत शिविर से खाने का सामान ले कर आया था, सब्जियां, दूध का पैकेट, डबलरोटी, नमकीन आदि.

उस ने शानू के सामने प्लेटें लगा दीं.

‘‘बेटा, इन्हें जानते हो.’’

शानू ने मां की तरफ देखा और बोला, ‘‘यह मेरे डैडी हैं.’’

‘‘कैसे पहचाना?’’

‘‘इन्होंने बताया था.’’

‘‘शानू, तुम्हें पकौड़े, ब्रेड- मक्खन पसंद हैं न,’’ रघु बोला.

‘‘हां.’’

‘‘यह सब मुझे भी पसंद हैं. हम दोनों में अच्छी दोस्ती रहेगी.’’

‘‘हां, डैडी.’’

मुसकराती हुई मीरा बाप- बेटे की बातें सुनती रही, कितनी सरलता से रघु ने शानू के साथ पटरी बैठा ली.

‘‘शुक्र है इस बरसात के मौसम का कि हम दोनों मिल गए,’’ मीरा बोली और रसोई में जा कर पकौडे़ तलने लगी.

उसे लग रहा था कि उस का बोझ बहुत कुछ हलका हो गया है. सबकुछ रघु के साथ बंट जो चुका है.

बीच का लंबा फासला न जाने कहां गुम हो चुका था. जैसे कल की ही बात हो.

घर तो इनसानों से बनता है न कि दीवारों से. पशु भी तो मिल कर रहते हैं. मीरा न जाने क्याक्या सोचे जा रही थी. बापबेटे की संयुक्त हंसी उस के मन में खुशियां भर रही थी.

प्यार का तीन पहिया

‘‘जी मैडम, कहिए कहां चलना है?’’

‘‘कनाट प्लेस. कितने रुपए लोगे?’’

‘‘हम मीटर से चलते हैं मैडम. हम उन आटो वालों में से नहीं हैं जिन की नजरें सवारियों की जेबों पर होती हैं. जितने वाजिब होंगे, बस उतने ही लेंगे.’’

मैं आटो में बैठ गई. आटो वाला अपनी बकबक जारी रखे हुए था, ‘‘मैडम, दुनिया देखी है हम ने. बचपन का समय बहुत गरीबी में कटा है, पर कभी किसी सवारी से 1 रुपया भी ज्यादा नहीं लिया. आज देखो, हमारे पास अपना घर है, अपना आटो है.’’

‘‘आटो अपना है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘बिलकुल मैडम, किस्तों पर लिया था. साल भर में सारी किस्तें चुका दीं. अब जल्द ही टैक्सी लेने वाला हूं.’’

‘‘इतने रुपए कहां से आए तुम्हारे पास?’’

‘‘ईमानदारी की कमाई के हैं, मैडमजी. दरअसल, हम सिर्फ आटो ही नहीं चलाते विदेशी सैलानियों को भारत दर्शन भी कराते हैं. यह देखो, हर वक्त हमारे आटो में दिल्ली के 3-4 मैप तो रखे ही होते हैं. विदेशी सैलानी एक बार हमारे आटो में बैठते हैं, तो शाम से पहले नहीं छोड़ते. मैं सारी दिल्ली दिखा कर ही रुखसत करता हूं उन्हें. इस से मन तो खुश होता ही है, अच्छीखासी कमाई भी हो जाती है. कुछ तो 10-20 डौलर अतिरिक्त भी दे जाते हैं. लो मैडम, आ गई आप की मंजिल. पूरे 42 रुपए, 65 पैसे बनते हैं.’’

‘‘50  रुपए का नोट है मेरे पास. बाकी लौटा दो,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैडम चेंज नहीं है हमारे पास? आप देखो अपने पर्स में.’’

‘‘नहीं है मेरे पास. बाकी 500-500 के नोट ही हैं.’’

‘‘तो फिर छोड़ो न मैडमजी, बाद में कभी बैठ जाना. तब हिसाब कर लेंगे और वैसे भी इतना तो चलता ही है,’’ वह बोला.

‘‘ऐसे कैसे चलता है? पैसे वापस करो.’’

‘‘क्या मैडम, 5-6 रुपयों के लिए इतनी चिकचिक? 5-6 रुपए छोड़ने पर कौन सा आप गरीब हो जाओगी?’’

‘‘बात रुपयों की नहीं, नीयत की है.’’

‘‘क्या बात करती हो मैडम? कोई और आटो वाला होता तो 60-70 रुपए से कम में बैठाता ही नहीं.’’

‘‘हद करते हो,’’ कह कर मैं गुस्से में आटो से उतर गई और वह खीखी कर हंसता रहा.

औफिस आ कर भी काफी देर तक मेरा मूड अजीब सा रहा. क्या करूं? औफिस आते वक्त हड़बड़ी में आटो लेना ही पड़ता है पर इस तरह का कोई अनुभव हो जाए तो सारा दिन ही खराब हो जाता है.

शाम को जब मैं औफिस से निकली तो काफी थक चुकी थी. तबीयत भी ठीक नहीं थी. चलने का बिलकुल मन नहीं कर रहा था. मैट्रो स्टेशन औफिस से दूर है, इसलिए आटो ही देखने लगी. पास ही एक खाली आटो वाला दिखा. मैं ने जल्दी से उसे हाथ दिया. पर यह क्या, सामने वही आटो वाला था, जिस ने सुबह मेरा दिमाग खराब किया था.

मजबूरी थी, इसलिए मैं ने उसे चलने को कहा तो वह रूखे अंदाज में बोला, ‘‘मुझे नहीं जाना मैडम. आप दूसरा आटो देख लो.’’

मेरा मन किया कि उस का सिर फोड़ दूं. पर किसी तरह खुद पर कंट्रोल कर मैट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ चली.

तभी उस की तेज, भद्दी आवाज सुनाई दी, ‘‘ओ वसुधाजी, अरे ओ वसुधाजी, आओ बैठो, मैं आप को छोड़ दूं.’’

मेरा मन गुस्से से जल उठा कि मैं ने कहा तो साफ इनकार कर गया और अब किसी लड़की को आवाजें लगा रहा है. फिर मैं ने पलट कर देखा तो पाया कि वह आटो ले कर जिस लड़की की तरफ बढ़ रहा है, वह वसुधा थी, जो एक पैर से अपाहिज थी और धीरेधीरे मैट्रो की तरफ बढ़ रही थी. वसुधा और मेरा परिचय मैट्रो में ही हुआ था. वह आटो वाले को इनकार करते हुए मेरे साथ मैट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ चली.

लगभग साल भर में हम कई बार मिले थे. वह बहुत बतियाती थी और घरबाहर की बहुत बातें हम लोग शेयर कर चुके थे. अपाहिज होने के बावजूद उस में गजब का आत्मविश्वास था. वह जौब करती थी और दिल्ली में अपनी बूआ के साथ अकेली रहती थी. सीपी में उस का औफिस और घर करोलबाग में था, जहां मैं भी रहती थी. सफर में ही हमारी अच्छी दोस्ती हो गई थी.

अगले दिन हम दोनों औफिस से एक ही वक्त पर निकले. वह आटो वाला लपक कर आगे बढ़ा और हमारे करीब आटो रोकते हुए बोला, ‘‘वसुधाजी, बैठिए न… छोड़ दूंगा आप को.’’

वसुधा ने नकारात्मक मुद्रा में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘नहीं. तुम जाओ, मैं चली जाऊंगी.’’

आटो वाला अड़ा रहा, ‘‘आप ऐसा क्यों कह रही हैं? मैं इतना बुरा इंसान नहीं. बैठ जाओ, घर तक सलामत पहुंचा दूंगा.’’

वसुधा ने प्रश्नवाचक नजरों से मेरी तरफ देखा. मैं समझ नहीं सकी कि आखिर माजरा क्या है? फिर बोली, ‘‘चलो बैठ जाते हैं प्रीति. वैसे भी देर हो रही है.’’

मैं ने इनकार किया, ‘‘तू बैठ, मैं किसी और में चली जाऊंगी.’’

‘‘तो फिर मैं तेरे साथ ही चलती हूं,’’ और वह मेरे साथ हो ली.

तभी आटो वाला मुझ से बड़ी नम्रता से बोला, ‘‘बहनजी, प्लीज आप भी बैठ जाओ, वसुधाजी तभी बैठेंगी. किराया भी जितना मन करे दे देना. न भी दोगी तो भी चलेगा,’’ और फिर मेरी तरफ मुसकरा कर देखा.

उस की मुसकान मुझे व्यंग्यात्मक नहीं, सहज सरल लगी अत: मैं आटो में बैठ गई. रास्ते भर तीनों खामोश रहे. मैं सोच रही थी, आज इस की बकबक कहां गई. उस ने सीधे वसुधा के घर के आगे आटो रोका.

वह उतर गई, तो मुझ से बोला, ‘‘अब बताइए, आप को कहां छोड़ूं?’’

‘‘मैं चली जाऊंगी. पास ही है मेरा घर,’’ कह मैं ने पर्स निकाला.

‘‘रहने दीजिए. आप लोगों से क्या किराया लेना?’’ वह बोला.

‘‘क्या मैं इस दरियादिली की वजह जान सकती हूं?’’

‘‘आप वसुधाजी की सहेली हैं, तो जाहिर है मेरे लिए भी खास हैं… खैर, मैं चलता हूं,’’ और वह चला गया.

‘इस आटो वाले को वसुधा में इतनी दिलचस्पी क्यों? कहीं दोनों पुराने प्रेमी तो नहीं?’ मैं सोच में पड़ गई.

अगले दिन जब मैं ने वसुधा से इस संदर्भ में बात की तो उस ने बताया, ‘‘ऐसा कुछ नहीं है. हां, कुछ दिनों से वह मेरे पीछे जरूर पड़ा है, पर कभी गलत हरकत नहीं की.’’

‘‘क्या तू भी उसे मन ही मन पसंद करती है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मेरा और उस का क्या मेल? वह एक तो आटो वाला, ऊपर से न जाने किस जाति का है… हम लोग कुलीनवर्ग के हैं. मैं अपाहिज हूं, तो इस का मतलब यह तो नहीं कि कोई भी मुझे अपने लायक समझने लगे.’’

मैं बोली, ‘‘ये छोटे लोग तो बस ऐसे ही होते हैं.’’

अगले दिन जानबूझ कर हम दूसरे रास्ते से निकले पर उस आटो वाले ने हमें ढूंढ़ ही लिया और आटो बगल में रोक कर बोला, ‘‘चलिए.’’

‘‘नहीं जाना,’’ हम ने रुखाई से कहा.

‘‘गरीब हूं, पर बेईमान नहीं. वसुधाजी ज्यादा चल नहीं सकतीं, मैं आटो ले आता हूं, तो इस में बुरा क्या है?’’

मैं ने वसुधा की तरफ देखा तो वह भी पसीज गई. हम दोनों एक बार फिर आटो में खामोश बैठे थे. सच, कभीकभी जिंदगी कितनी अजनबी लगती है. कौन किस तरह और कब हमारे जीवन से जुड़ जाए, कुछ पता नहीं.

अब तो रोज का नियम बन गया था. आटो वाला मुझे और वसुधा को घर छोड़ता पर एक रुपया भी नहीं लेता. रास्ते भर वह अपने बारे में बताता रहता. उस का नाम अभिषेक था और वह बिहार का रहने वाला था. 2 कमरे के घर में किराए पर रहता था.

उस दिन औफिस से निकलते हुए मैं ने वसुधा से कहा, ‘‘शुक्रवार की छुट्टी है, यानी कुल मिला कर 3 दिन की छुट्टियां लगातार पड़ रही हैं. कितना मजा आएगा.’’

मैं खुश थी पर वसुधा परेशान सी थी. बोली, ‘‘क्या करूंगी 3 दिन… समय काटना मुश्किल हो जाएगा.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रही है? हम घूमने चलेंगे. खूब ऐंजौय करेंगे.’’

‘‘सच,’’ वसुधा का चेहरा खिल उठा.

शुक्रवार को सुबह हम लोटस टैंपल देखने के लिए निकले. इस के बाद कुतुबमीनार जाने की प्लानिंग थी. तभी अभिषेक आटो ले कर सामने आ खड़ा हुआ, ‘‘आइए मैं ले चलता हूं. कहां जाना है?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम आज सुबह ही आ गए हमारी खिदमत के लिए, माजरा क्या है?’’

‘‘क्या करूं मैडम, अपना मिजाज ही ऐसा है. आइए न.’’

उस ने फिर निवेदन किया तो मैं हंस पड़ी. बोली, ‘‘हम आज लोटस टैंपल और कुतुबमीनार जाने वाले थे.’’

‘‘तब तो आप दोनों को इस बंदे से बेहतर गाइड कोई मिल ही नहीं सकता. कुतुबमीनार ही क्यों, पूरी दिल्ली घुमाऊंगा. बैठिए तो सही.’’

हम दोनों बैठ गए.

‘‘आप को पता है कि कुतुबमीनार कब और किस के द्वारा बनवाई गई थी?’’ अभिषेक की बकबक शुरू हो गई.

‘‘जी नहीं, हमें नहीं पता पर क्या आप जानते हैं?’’ वसुधा ने पूछा.

‘‘बिलकुल. कुतुबमीनार का निर्माण दिल्ली के प्रथम मुसलिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1193 में आरंभ कराया था. पर उस समय केवल इस का आधार ही बन पाया. फिर उस के उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इस का निर्माण कार्य पूरा करवाया.’’

‘‘अच्छा, पर यह बताओ, इसे बनवाने के पीछे मकसद क्या था?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘दरअसल, मुगल अपनी जीत सैलिब्रेट करने के लिए विक्ट्री टावर बनवाते थे. कुतुबमीनार को भी ऐसा ही एक टावर माना जा सकता है. वैसे आप के लिए यह जानना रोचक होगा कि कुतुबमीनार को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में स्वीकृत किया गया है.’’

वसुधा और मैं एकदूसरे की तरफ देख कर मुसकरा पड़े, क्योंकि एक आटो वाले से इतनी ज्यादा ऐतिहासिक और सामान्यज्ञान की जानकारी रखने की उम्मीद हमें नहीं थी.

‘‘1 मिनट, तुम ने यह तो बताया ही नहीं कि कुतुबमीनार की ऊंचाई कितनी है?’’ वसुधा ने फिर से सवाल उछाला और फिर मेरी तरफ देख कर मुसकराने लगी, क्योंकि उसे पूरा यकीन था कि यह सब अभिषेक नहीं जानता होगा.

‘‘5 मंजिला इस इमारत की ऊंचाई 234 फुट और व्यास 14.3 मीटर है, जो ऊपर जा कर 2.75 मीटर हो जाता है और इस में कुल 378 सीढि़यां हैं.’’ आटो वाला गर्व से बोला.

अब तक हम कुतुबमीनार पहुंच चुके थे. अभिषेक हमारे साथ परिसर में गया और रोचक जानकारियां देने लगा. हम चकित थे. इतनी गूढ़ता से तो कोई गाइड भी नहीं बता सकता था.

परिसर में घूमते हुए वसुधा कुछ आगे निकल गई, तो अभिषेक तुरंत बोला, ‘‘अरे मैडम, उधर ध्यान से जाना… कहीं चोट न लग जाए.’’

‘‘बहुत फिक्र करते हो उस की. जरा बताओ, ऐसा क्यों?’’ मैं ने पूछा.

‘‘क्योंकि वे मुझे बहुत अच्छी लगती हैं.’’

‘‘पर क्यों?’’

‘‘उन की झील सी आंखें… वह सादगी…’’

वह और कुछ कहता, मैं उसे बीच में ही टोकती हुई बोली, ‘‘कभी सोचा है, तुम ने कि तुम दोनों में क्या मेल है? तुम ठहरे आटो वाले और वह है बड़े घराने की.’’

‘‘मैडमजी, ठीक कहा आप ने. कहां वे महलों में रहने वाली और कहां मैं आटो वाला. पर क्या मैं इंसान नहीं? क्या मेरी पहचान सिर्फ इतनी है कि मैं आटो चलाता हूं. आप को नहीं पता, मैं भी अच्छे परिवार से हूं. इतिहास में एम.ए. किया है, परिस्थितियोंवश हाथों में आटो आ गया.’’

तभी वसुधा आ गई और हमारी बात बीच में ही रह गई. अगले दिन जब मैं वसुधा से मिली तो अभिषेक से हुई बातचीत सुनाते हुए उसे समझाया, ‘‘एक बार तुझे अभिषेक के लिए सोचना चाहिए. इतना बुरा भी नहीं है वह… और तुझे कितना प्यार करता है.’’

‘‘देख प्रीति, यह संभव नहीं. मेरे घर वाले ऐसे बेमेल रिश्ते के लिए कभी तैयार नहीं होंगे और मेरा दिल भी इस की गवाही नहीं देता. क्या कहूंगी उन्हें कि एक आटो वाले से प्यार करती हूं? नहीं यार, कभी नहीं. इतना नहीं गिर सकती मैं. वह चाहे कितना भी काबिल हो, है तो एक आटो वाला ही न?’’

वसुधा का जवाब मुझे पता था, पर वह यह सब इतनी बेरुखी से कहेगी, यह मैं ने नहीं सोचा था. मैं समझ गई, वसुधा कभी उसे स्वीकार नहीं करेगी. मुझे भी वसुधा का फैसला सही लगा.

एक दिन सुबहसुबह ही वसुधा ने मुझे फोन किया, ‘‘प्रीति प्लीज, अभी जल्दी से मेरे घर आ जा. एक बहुत जरूरी बात करनी है.’’

उस की बेसब्री देख कर मैं जिन कपड़ों में थी, उन्हीं में उस के घर पहुंच गई. फिर पूछा, ‘‘क्या बात है? सब ठीक तो है? बूआजी कहां हैं?’’

वह मुझ से लिपटती हुई बोली, ‘‘बूआजी 4 दिनों के लिए मामाजी के यहां गई हैं.’’

मैं ने देखा, उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. मैं ने पूछा, ‘‘वसुधा, बता क्या हुआ? रो क्यों रही है?’’

‘‘ये खुशी के आंसू हैं. मुझे मेरा हमसफर मिल गया प्रीति,’’ वह बोली.

‘‘अच्छा… पर है कौन वह?’’

‘‘वह और कोई नहीं, अभिषेक ही है.’’

‘‘क्या? इतना बड़ा फैसला तू ने अचानक कैसे ले लिया? कल तक तो तू उस के नाम पर भड़क जाती थी?’’ मैं ने चकित हो कर पूछा.

वह मुसकराई, ‘‘प्यार तो पल भर में ही हो जाता है प्रीति. कल शाम तू नहीं थी तो मैं अकेली ही अभिषेक के आटो में बैठ गई. मुझे एक बैग खरीदना था. उस ने कहा कि मैं जनपथ ले चलता हूं. वहां से खरीद लेना.

‘‘बैग खरीद कर मैं लौटने लगी, तो अंधेरा हो चुका था. ओडियन के पास वह बोला कि क्या फिल्म देखना पसंद करेंगी मेरे साथ? घर में तो मैं अकेली ही थी. अब हां करने में क्या हरज था. हमें 6 बजे के टिकट मिले. 9 बजे तक फिल्म खत्म हुई तो गहरा अंधेरा था. उस ने एक पल भी मेरा हाथ न छोड़ा. प्यार और दुलार का ऐसा एहसास मैं ने जीवन में कभी नहीं महसूस किया था.

‘‘रास्ते में याद आया कि बूआजी की दवा लेनी है. एक मैडिकल शौप नजर आई तो मैं ने हड़बड़ा कर आटो रुकवाया और तेजी से उतरने लगी तभी लड़खड़ा कर गिर पड़ी. सिर पर चोट लगी थी. अत: मैं बेहोश हो गई. फिर मुझे कुछ याद नहीं. जब होश आया तो देखा, कि मैं अपने कमरे में एक शाल ओढ़े लेटी थी और मेरे कपड़े उतरे हुए थे. घुटने पर पट्टी बंधी थी. एक पल को तो लगा जैसे मेरा सब कुछ लुट चुका है. मैं घबरा गई पर फिर तुरंत एहसास हुआ कि ऐसा कुछ नहीं है. किसी तरह उठ कर बाथरूम तक गई तो देखा कि अभिषेक कीचड़ लगे मेरे कपड़े धो रहा था.

‘‘मैं खुद को रोक न सकी और पीछे से जा कर उस से लिपट गई. उस के बदन के स्पर्श से मेरे भीतर लावा सा फूट पड़ा. अभिषेक भी खुद पर काबू नहीं रख सका और फिर वह सब हो गया, जो शायद शादी से पहले होना सही नहीं था. पर मैं एक बात जरूर कह सकती हूं कि अभिषेक ने मुझे वह खुशी दे दी, जिस की मैं ने कल्पना भी नहीं की थी. अपाहिज होने के बावजूद मुझे ऐसा सुख मिलेगा, यह मेरी सोच से बाहर था.

‘‘उस का प्यार, उस की सादगी, उस की इंसानियत, उस के सारे व्यक्तित्व ने मुझ पर जैसे जादू कर दिया है. जरा सोच मैं जिस हालत में उस के पास थी, बिलकुल अकेली… किसी का भी दिल डोल जाता. पर उस ने अपनी तरफ से कोई गलत पहल नहीं की. क्या यह साबित नहीं करता कि वह नेकदिल और विश्वस्त साथी है? मैं अब एक पल भी उस से दूर रहना नहीं चाहती. प्लीज, कुछ करो कि हम एक हो जाएं. प्लीज प्रीति…’’

‘‘मैं थोड़ी देर अचंभित बैठी रही. वैसे मुझे वसुधा को खुश देख कर बहुत खुशी हो रही थी. फिर मैं ने वसुधा को समझाया, ‘‘सब से पहले तुम दोनों कोर्ट मैरिज के लिए कोर्ट में अर्जी दो. फिर मैं तुम्हारी बूआ व परिवार वालों को इस शादी के लिए तैयार करती हूं. थोड़े प्रतिरोध के बाद वसुधा के घर वाले मान गए.’’

हंसीखुशी के माहौल में अभिषेक और वसुधा का विवाह संपन्न हो गया. ‘मन’ फिल्म के आमिर खान की तरह अभिषेक ने वसुधा को गोद में उठाया कर फेरे निबटाए. बात यहीं खत्म नहीं हुई, शादी के बाद जब हनीमून से दोनों लौटे और मैं औफिस जाने के लिए अभिषेक की टैक्सी (अभिषेक ने नई टैक्सी ले ली थी) में बैठी तो अभिषेक ने चुटकी ली, ‘‘साली साहिबा, अब तो आप से मनचाहा किराया वसूल कर सकता हूं. हक बनता है मेरा.’’

मैं ने हंस कर कहा, ‘‘बिलकुल. पर साली होने के नाते मैं आधी घरवाली हूं. इसलिए तुम्हारी आधी कमाई पर मेरा हक होगा, यह मत भूलना.’’

मेरी बात सुन कर वह ठठा कर हंस पड़ा और फिर मैं ने भी हंसते हुए उस की पीठ पर धौल जमा दी.

Raksha Bandhan: ज्योति- सुमित और उसके दोस्तों ने कैसे निभाया प्यारा रिश्ता

मनीष ने ज्योति की इस नसीहत का बुरा नहीं माना. वह खुद भी नेहा को इस तरह रुला कर अच्छा महसूस नहीं कर रहा था. एक लंबे अरसे से वह और नेहा एकदूसरे के करीब थे. दोनों ने एकदूसरे के साथ जीनेमरने के वादे किए थे. कितनी ही बार दोनों ने अलग होने का फैसला लिया, मगर कुछ पलों की जुदाई भी दोनों से बरदाश्त नहीं होती थी.

मनीष को ज्योति की बात में सचाई लगी. जातपांत के ढकोसलों में आ कर नेहा जैसी लड़की को खोना बहुत बड़ी बेवकूफी थी, जो उसे टूट कर चाहती थी और हर हाल में उस का साथ देने को तैयार थी.

‘‘अब चाहे कुछ भी हो जाए. नेहा ही मेरी जीवनसंगिनी बनेगी,’’ मनीष के शब्दों में सचाई की झलक थी.

ज्योति मुसकरा उठी. उस की एक कोशिश से 2 दिल टूटने से बच गए थे.

उसी दिन नेहा से माफी मांग कर मनीष ने उस से शादी का वादा किया. रही बात घरवालों की, तो उन्हें भी किसी तरह मानना होगा, और वह उन्हें राजी कर के रहेगा.

रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले सुमित के लिए उस की छोटी बहन की राखी आई थी. रोहन और मनीष की कोई बहन नहीं थी. तो इस दिन उन दोनों की कलाई सूनी रह जाती थी. नहाधो कर नया कुरतापजामा पहन कर सुमित ने उल्लास से लिफाफा खोल कर राखी निकाली. ज्योति से उस ने छुटकी की भेजी राखी अपनी कलाई में बंधवा ली. एक राखी ज्योति ने भी उसे अपनी ओर से बांध दी.

रोहन मनीष के साथ बैठा मैच देख रहा था. हाथ में राखी के 2 चमकीले धागे लिए ज्योति आई.

‘‘भैया, मैं आप दोनों के लिए भी राखी लाई हूं. असल में, मेरा कोई सगा भाई नहीं है, तो आप तीनों  को ही मैं भाई मानती हूं.’’

रोहन और मनीष ने भी खुशीखुशी ज्योति से राखी बंधवाई.

उसी शाम तीनों दोस्त बैठ कर छुट्टी वाले दिन का आनंद ले रहे थे. ‘‘यार सुमित, नेहा से शादी कर के मुझे अलग फ्लैट लेना पड़ेगा, तुम लोगों के साथ बिताए ये दिन बहुत याद आएंगे,’’ मनीष ने कहा.

‘‘और हम क्या यों ही कुंआरे रहेंगे?’’ रोहन ने उस की पीठ पर धप्प से एक हाथ मारा, ‘‘क्यों, है न सुमित? तेरी और मेरी भी शादी हो जाएगी.’’

फिर सब अपनीअपनी जिंदगी में मस्त भविष्य के सपनों में तीनों कुछ देर के लिए खो गए. लेकिन सुमित कुछ और ही सोच रहा था.

शादी की बात पर उसे न जाने क्यों सुरेश का खयाल आ गया. इतने अच्छे स्वभाव वाला सुरेश अपने निजी जीवन में निपट अकेला था. ‘‘यार, मैं सोच रहा हूं किसी का घर बसाना अच्छा काम है, मेरी जानपहचान में एक सुरेश है, वही गैराज वाला,’’ सुमित ने रोहन की तरफ देखा. रोहन सुरेश को जानता था. ‘‘अगर कोई सलीकेदार महिला सुरेश की जिंदगी में आ जाए तो कितना अच्छा हो.’’

‘‘सही कहा तुम ने, बहुत भला है बेचारा,’’ रोहन समर्थन में बोला.

कुछ देर खामोशी छाई रही, शायद अपनेअपने तरीके से सब सोच रहे थे.

‘‘एक बहुत नेक औरत है मेरी नजर में,’’ तभी तपाक से रोहन बोला.

‘‘कौन?’’ मनीष और सुमित ने एकसाथ पूछा.

‘‘हमारी ज्योति दीदी, और कौन?’’

दोनों ने रोहन को अजीब सी नजरों से घूरा.

‘‘यार, ऐसे क्यों देख रहे हो. कुछ गलत थोड़े ही बोला मैं ने. एक चोरउचक्के को भी जिंदगी में दूसरा मौका मिल जाता है तो फिर एक विधवा क्यों दूसरी शादी नहीं कर सकती? औरत को भी दूसरी शादी करने का उतना ही हक है जितना मर्द को. और फिर मुन्नी के बारे में सोचो. इतनी छोटी सी उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया, आखिर उस को भी तो एक पिता का प्यार मिलना चाहिए कि नहीं? बोलो, क्या कहते हो?’’

रोहन की बात सौ फीसदी सच थी. ज्योति कम उम्र में ही विधवा हो गई थी. उसे पूरा अधिकार था कि वह किसी के साथ एक नया जीवन शुरू कर सके, जो उस का और उस की बेटी का सहारा बन सके. उस के जैसी व्यवहारकुशल और भली औरत किसी का भी घर संवार सकती थी.

तीनों दोस्तों की नजर में सुरेश के लिए ज्योति एकदम फिट थी. ‘‘लेकिन ज्योति मानेगी क्या?’’ मनीष ने शंका जाहिर की.

‘‘मैं मनाऊंगा ज्योति दीदी को,’’ सुमित बोला.

उसी शाम जब ज्योति उन तीनों का खाना पका कर निपटी और मुन्नी भी अपनी पढ़ाई कर चुकी तो सुमित ने उसे रोक लिया.

‘‘बोलो, क्या बात करनी थी भैया,’’ ज्योति ने पूछा.

बड़े नापतोल कर शब्दों को चुन कर सुमित ने अपनी बात ज्योति के सामने रखी. वह कुछ अन्यथा न ले ले, इस बात का उस ने पूरा ध्यान रखा.

सिर झुकाए सुमित की बातों को चुपचाप सुनती रही ज्योति. आज तक उस के अपने सगे रिश्ते वालों ने उस का घर बसाने की चिंता नहीं की थी. वह अकेली ही अपने दम पर अपना और अपनी बेटी का पेट पाल रही थी. उस ने कभी किसी से सहारे की उम्मीद नहीं की थी. लेकिन खून का रिश्ता न होने पर भी उस के ये तीनों मुंहबोले भाई आज उस के भले के लिए इतने फिक्रमंद हैं, यह सोच कर ही ज्योति की आंखों से आंसू बह चले.

उसे इस तरह से रोता देख तीनों के चेहरे पर परेशानी के भाव आ गए. सुमित को लगा शायद उसे यह सब नहीं कहना चाहिए था.

‘‘देखो ज्योति, रो नहीं, हम तुम्हारी और मुन्नी की भलाई चाहते है, बस. एक बार सुरेश से मिल लो, फिर आगे जो तुम्हारी मरजी,’’ सुमित ने प्रयास किया उसे शांत कराने का.

‘‘भैया, मैं तो इसलिए रो रही हूं कि आज मुझे अपने और पराए की पहचान हो गई. जो मेरे अपने हैं, वे कभी मेरे सुखदुख में काम नहीं आए और एक आप हो, जिन से खून का रिश्ता नहीं है, फिर भी आप लोगों को मेरी और मेरी बेटी की चिंता है,’’ कुछ सयंत हो कर अपनी गीली आंखें पोंछती हुई वह बोली, ‘‘यह सच है कि एक पिता की जगह कोईर् नहीं ले सकता. मेरी बेटी पिता के प्यार से हमेशा महरूम रही है. मगर मैं ने उसे मां और बाप दोनों का प्यार दिया है. अगर आप लोगों को यकीन है कि कोई नेक इंसान मेरी बेटी को सगी बेटी की तरह प्यार देगा, तो मैं भी आप पर भरोसा करती हूं.’’

बात बनती देख तीनों के चेहरे खिल गए. 2 अधूरे लोगों को मिला कर उन के जीवन में खुशियों की बहार लाने से बढ़ कर भला और क्या नेकी हो सकती थी.

सुरेश और ज्योति की एक औपचारिक मुलाकात करवाई गई. तीनों ने पूरी तसल्ली के बाद ही ज्योति के लिए सुरेश जैसे इंसान को चुना था. सुरेश ने सहर्ष ज्योति और मुन्नी को अपना लिया, एकाकी जीवन के सूनेपन को भरने के लिए कोई तो चाहिए था.

बहुत ही सादगी के साथ सुरेश और ज्योति का विवाह संपन्न हुआ. तीनों दोस्तों ने शादी की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली थी. प्रीतिभोज पर वरवधू पक्ष के कुछेक रिश्तेदारों को भी बुलाया गया था.

सुमित ने मां और छुटकी को भी खास इस विवाह के लिए बुला रखा था. उस की मां गर्व का अनुभव कर रही थी सपूत के हाथों नेक काम होते देख कर.

विदाई के समय ज्योति सुमित, मनीष और रोहन के गले लग कर जारजार रोने लगी, तो तीनों को महसूस हुआ जैसे उन की सगी बहन विदा हो रही है.

अपने आंचल में बंधे खीलचावल को सिर के ऊपर से पीछे फेंक कर रस्म पूरी करती ज्योति विदा हो गईर् थी, साथ में देती गई ढेरों आशीर्वाद अपने तीनों भाइयों को.

अभिनेता प्रेम परिजा सुपर पॉवर होने पर क्या करना चाहते है, पढ़ें इंटरव्यू

उड़ीसा के भुवनेश्वर में जन्मे अभिनेता प्रेम परिजा ने काफी संघर्ष के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी साख जमाने में कामयाब हुए है. उनकी डेब्यू वेब सीरीज कमांडो रिलीज पर है, जिसमें उन्होंने कमांडो की मुख्य भूमिका निभाई है. इसे लेकर वे बहुत उत्साहित है.

उन्हें बचपन से ही अभिनय की इच्छा थी. दिल्ली में हायर स्टडीज के साथ-साथ उन्होंने थिएटर में अभिनय करना शुरू किया, ताकि वे एक्टिंग सीख सकें. मुंबई आकर प्रेम ने पर्दे के पीछे कई फिल्मों के लिए असिस्टेंट डायरेक्टर का भी काम किया, जिसमे लखनऊ सेंट्रल, वेलकॉम टू कराची आदि कई है, जिससे वे फिल्मों की बारीकियों को अच्छी तरह से समझ सकें.

एक्टिंग था पैशन

प्रेम कहते है कि मैं 11 साल की आयु से अभिनय करना चाहता था. एक्टिंग मेरा पैशन रहा है. मैंने अपने पेरेंट्स को शुरु से ही इस बात की जानकारी दे दी थी. मैं मध्यमवर्गीय परिवार से हूँ, इसलिए मुझे अपनी राह खुद ही चुनना और उस पर चलना था. इसलिए मैंने संघर्ष को साथी समझा और आज यहाँ पहुँच पाया हूँ. मेरे आदर्श अभिनेता शाहरुख़ खान है, उन्होंने भी पहली टीवी शो फौजी में सैनिक की भूमिका निभाई थी और आज मैं भी पहली वेब सीरीज में कमांडो की भूमिका निभा रहा हूँ.

 

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मिला ब्रेक

कमांडों फिल्म में काम करने की उत्सुकता के बारें में पूछने पर प्रेम का कहना है कि मैंने भुवनेश्वर में रहते हुए छोटी उम्र से एक्टर बनना चाहता था. वहां से दिल्ली और फिर मुंबई आया, पर्दे के पीछे काफी सालों तक काम किया, ऐसे करीब 16 साल के बीत जाने पर अगर एक बड़ी हिंदी वेब शो जिसके निर्देशक विपुल अमृतलाल शाह है, उस फिल्म में काम करने का मेरा सपना, अब साकार होता हुआ दिखता है, इसकी ख़ुशी को बयान करना मेरे लिए संभव नहीं.

चुनौतीपूर्ण भूमिका

कमांडों की भूमिका में फिट बैठना आपके लिए कितना चुनौतीपूर्ण रहा? प्रेम कहते है कि मैं मुंबई में एसिस्टेंट डायरेक्टर का काम छोड़ने के बाद एक्टिंग के बारें में जब सोचा, तब मेरे दो ट्रेनर अक्षय और राकेश ने मुझे बहुत स्ट्रोंग ट्रेनिग दिया और मुझे एक कमांडो तैयार किया. स्क्रिप्ट मिलने पर जब पता चला कि मुझे कमांडो विराट की भूमिका निभानी है, तो मैंने थोड़े एक्स्ट्रा मार्शल आर्ट सीखा, मसल्स बढ़ाए और इंटरनली स्ट्रोंग मानसिक भावनाओं पर भी काम करना पड़ा.

कठिन था फिल्माना  

कठिन दृश्यों के बारें में प्रेम कहते है कि इसमें दो ऐसे मौके थे जब मुझे उसे शूट करना कठिन था. मेरे पहले दिन की शूटिंग, जब मुझे कैमरे के सामने एक्टिंग करना पड़ा. पहला दिन मुझे तिग्मांशु धुलिया के साथ शूट करना था. उस दिन कॉन्फिडेंस आने में समय लगा. पहले सीन में 6 से 7 टेक लगे थे. इसके अलावा एक सीन में आँखों से 10 साल की दोस्ती को बताना था, जो बहुत कठिन था. इसे भी करने में 7 से 8 टेक लगे थे.

 

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मिली प्रेरणा  

प्रेम आगे कहते है कि मेर परिवार में कोई भी एक्टिंग फील्ड से नहीं है, मेरे परिवार के सारें लोग एकेडमिक प्रोफेशन में है. मेरे पिता एक प्रतिभावान व्यक्ति थे. जब मैंने पहली बार सबको अभिनय की इच्छा के बारें में बताया तो सभी चकित रह गयें. मैं छोटी उम्र से फिल्में बहुत देखता था और फिल्में मुझे आकर्षित करती थी. मुझे याद है कि मैं शाहरुख़ की अधिक फिल्में देखता था. उनकी एक फिल्म को देखकर लगा कि मुझे भी इसी फील्ड में आना है. उनकी फिल्में देखकर ही मेरी एक्टिंग की प्रेरणा जगी.

मिला सहयोग  

परिवार के सहयोग के बारें में प्रेम का कहना है कि शुरू में उन्होंने पढ़ाई पूरी करने को कहा और मैं स्टडीज में काफी अव्वल भी था, लेकिन थिएटर में मेरी रूचि को देखने के बाद उन्हें लगने लगा कि मैं वाकई अभिनय में इंटरेस्ट रखता हूँ और उन्होंने मुझे अभिनय के लिए सहयोग दिया. दिल्ली के कॉलेज में मैंने पढ़ाई के साथ-साथ थिएटर सोसाइटी में भाग लिया. वहां परिवार वालों ने मुझे डांस और अभिनय करते हुए देखा तो उन्हें भी समझ आ गई कि मेरा इसी फील्ड में जाना सही होगा और सहयोग दिया.

किये संघर्ष

दिल्ली से मुंबई आकर खुद की पहचान बनाना प्रेम के लिए काफी मुश्किल था. वे कहते है कि मैं संघर्ष के बारें में कितना भी बताऊँ वह कम ही होगा. मैं इसे अपनी जर्नी मानता हूँ, संघर्ष नहीं. दिल्ली में मेरी जर्नी ख़त्म होने के बाद मुझे मुंबई जाना सही लगा लगा. यहाँ आकर भी मुझे फिल्म बनाने के बारें में जानकारी हासिल करना जरुरी लगा. मुझे एसिस्टेंट डायरेक्टर का काम 9 महीने के बाद मिला, जो डायरेक्टर निखिल अडवानी के साथ काम करने का था. मैंने उनके साथ कई फिल्मों के लिए काम किया और फिल्म बनाने की कला सीखी. शुरू में मैं खुद हर प्रोडक्शन हाउस में जाकर अपनी रिजुमे दिया करता था और एसिस्टेंट डायरेक्टर का काम माँगता था. इस दौरान मैंने फिजिकल ट्रेनिग और अभिनय को भी चालू रखा.

 

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वित्तीय संघर्ष

9 महीने की गैप में आपने अपनी फिनेंशियल स्थिति को कैसे सम्हाला? इस प्रश्न के जवाब में प्रेम का कहना है कि उन दिनों फाइनेंस को सम्हालना बहुत मुश्किल था. पेरेंट्स के भेजे गए पैसे से दिन गुजारता रहा. कई बार बहुत मुश्किल होता था. मुझे याद आता है कि मैं जिस फ्लैट में रहता था, उसमे 14 लड़के रहते थे, बाथरूम एक था, ताकि रेंट बचाया जा सकें. उस वक्त पिता थे, तो उन्होंने फाइनेंसियली बहुत हेल्प किया.

रिजेक्शन से होती है मायूसी  

शुरुआत में हुए रिजेक्शन का सामना करना और आगे फिर से खुद को ऑडिशन के लिए तैयार करना आसान नहीं था, क्योंकि ऐसे में उन्हें खुद की फाइनेंसियल पहलू को भी ध्यान में रखना पड़ा. प्रेम सोचते हुए कहते है कि सबसे अधिक मैं इन सबसे निपटने के लिए खुद को अनुसाशन में रखना पसंद करता किया. इसमें मैं मेडिटेशन करता हूँ, इससे मुझे आत्मविश्वास और शक्ति मिलती है. रिजेक्शन तो होना ही है और इसे सहजता से लेना भी पड़ता है. नहीं तो इस इंडस्ट्री में काम करना संभव नहीं. कई बार बहुत मायूसी होती है, तब मैं अपनी माँ, बहन और कुछ दोस्तों से बातचीत कर लेता हूँ, जो मुझे मेरे पैशन को याद दिलाते थे. इसके अलावा मैं अभिनय की ट्रेनिंग पर बहुत अधिक फोकस करता हूँ. इन सभी को करने से मुझे स्ट्रेस नहीं होता.

सपना स्टार बनने का

ड्रीम के बारें में प्रेम कहते है कि मैंने इस देश का सबसे बड़ा स्टार बनने का सपना देखा है और उसी दिशा में मेहनत कर रहा हूँ. इसके अलावा सबसे अधिक मनोरंजन वाली फिल्मों और अभिनय से दर्शकों को खुश करना चाहता हूँ. मेरे पास सुपर पॉवर, स्ट्रेंथ की होनी चाहिए, ताकि मैं जरुरतमंदों को जी-जान से मदद कर सकूँ. मेरी माँ की सीख भी यही है.

BB Ott 2: अभिषेक के नेगेटिव PR के आरोप पर Emotional हुए एल्विश यादव, भड़के फैंस

बिग बॉस ओटीटी 2 के फिनाले का वीक शुरु हो गया है. अभिषेक मल्हान, एल्विश यादव, मनीषा रानी, ​​पूजा भट्ट, जिया शंकर और बेबिका धुर्वे में से कोई एक ट्रॉफी घर ले जाएगा. पिछला वीकेंड के वार में काफी ड्रामा हुआ क्योंकि होस्ट सलमान खान ने कंटेस्टेंट को उनके गलत कार्यो के लिए फटकार लगाई. हालांकि, रविवार का एपिसोड हल्का-फुल्का था, जिसमें सलमान ने कुछ खुलकर बातचीत की और उनके साथ कुछ मजेदार गेम खेले.

अभिषेक ने एल्विश यादव पर लगाया आरोप

रविवार के एपिसोड के बीच में, फैंस को तब करारा झटका लगा जब अभिषेक मल्हान और एल्विश यादव के बीच नकारात्मक प्रचार को लेकर बहस हो गई. उनके शब्दों ने एल्विश को भावुक और आहत कर दिया, क्योंकि बाद में उन्हें रोते हुए देखा गया.

अभिषेक ने किया खुलासा

अभिषेक ने खुलासा किया कि उनकी मां ने उन्हें यह भी बताया था कि जिस दिन से एल्विश यादव ने वाइल्ड कार्ड के रूप में घर में प्रवेश किया है, उनके फैंस अभिषेक के पेज पर आकर नकारात्मक पोस्ट कर रहे हैं.

”अभिषेक उर्फ ​​फुकरा इंसान ने एल्विश से कहा.  “आपकी टीम बाहर मेरे खिलाफ नकारात्मक पीआर कर रही है. शायद आपको इसके बारे में पता हो.

मैं इसके बारे में ज्यादा बात करने से पहले बाहर जाकर इसे देखना चाहता हूं,”. आरोपों से हैरान एल्विश ने अपना बचाव करते हुए कहा कि वह ऐसा करना चाहता तो वह उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता या वह खुद शो भी जीतना चाहता.

लोगों ने अभिषेक को किया एक्सपोज

एल्विश यादव को अभिषेक मल्हान की बातों से इमोशनल होता देख फैंस भड़क गए हैं. ऐसे में लोग एल्विश यादव को को भर-भर के सपोर्ट कर रहे है. वहीं एल्विश के फैंस ने ट्विटर पर We Love You Elvish और Negative PR ट्रेंड करना शुरू कर दिया है. फैन्स एल्विश के सपोर्ट में हैं कि उन्हें पीआर की जरूरत नहीं है, उनकी आर्मी ही काफी है. वहीं कई लोगों ने अभिषेक को ‘दोगला’ और ‘सांप’ का टैग भी दिया है.

Deepika Padukone ने Ranveer Singh के लिए लिखा खास नोट, देखें पोस्ट

सोशल मीडिया पर दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह ने एक बार फिर अपने फैंस का दिल खुश कर दिया है. दीपिका ने इंस्टाग्राम पर खूबसूरत नोट साझा किया है, दीपिका ने इस लैटर में लिखा कि ‘शादी अपने बेस्ट फ्रेंड से करो, ये बात में ऐसे ही नहीं बोल रही हूं. जब आपकी दोस्ती गहरी होगी, तब आपको प्यार होना तय है. आप ऐसे आदमी से शादी करो जो अपके अंदर के पागलपन को बाहर निकाल पाए और आपके दुख-तकलीफ को समझ सके.’

वहीं दीपिका ने और भी कई बातें लिखी है. इस तस्वीर के कैप्शन में दीपिका पादुकोण ने रणवीर सिंह को टैग किया है. दीपिका पादुकोण की ये पोस्ट सोशल मीडिया पर खूब शेयर की जा रही है.

रणवीर सिंह का आया रिएक्शन

दीपिका पादुकोण ने फ्रेंडशिप डे पर पति रणवीर सिंह के लिए एक इमोशनल नोट शेयर किया. नोट में, एक्ट्रेस ने ‘अपने सबसे अच्छे दोस्त से शादी करने’ की खुशी व्यक्त की. रणवीर सिंह ने पोस्ट पर भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया देते हुए पोस्ट के टिप्पणी अनुभाग में एक बुरी नजर, एक दिल और एक अनंत प्रतीक डाला.

दीपिका-रणवीर प्रेम कहानी की शुरूआत

दीपिका और रणवीर की प्रेम कहानी की जड़ें संजय लीला भंसाली की 2013 की फिल्म गोलियों की रासलीला राम-लीला में एक साथ अभिनय करने के बाद शुरू हुईं. छह साल की डेटिंग के बाद, इस जोड़े ने 14 नवंबर, 2018 को इटली के लेक कोमो में एक डेस्टिनेशन वेडिंग में सात फेरे लिए. राम-लीला के अलावा, इस जोड़ी ने फाइंडिंग फैनी, बाजीराव मस्तानी, पद्मावत और स्पोर्ट्स ड्रामा 83 जैसी फिल्मों में स्क्रीन साझा की है.

दीपिका पादुकोण नजर आएंगी इन फिल्मों में

बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण की वर्क की बात करें तो दीपिका अपनी अपकमिंग फिल्मों को लेकर का काफी चर्चा में है. दीपिका शाहरूख खान की फिल्म जवान में कैमियो करने वाली हैं. इसके साथ ही एक्ट्रेस फिल्म फाइटर में ऋतिक रोशन साथ लीड रोल में नजर आएंगी.

9 टिप्स: लौन दिखेगा ग्रीन

लौन भले ही छोटा हो, मगर हराभरा हो, कुछ ऐसा जो आंखों को ठंडक दे, पैर रखें तो मखमली घास में धंस जाएं. ऐसे लौन की चाहत के लिए इन जरूरी बातोंको ध्यान में रखना होगा:

  1. जमीन का चयन

बगिया में लौन किस ओर कहां, किस साइज का बनाया जाए इस के लिए सब से पहले अपने मकान के प्लौट का साइज देखें. यदि 500 गज के प्लौट पिछवाड़े लौन तैयारकर रहे हैं तो घास खराब न हो, इस पर आराम से चल सकें, इस के लिए लौन के चारों ओर पैदल चलने के लिए एक पटरी बनाएं. यह प्रावधान रखें कि गोलगोल पत्थर कुछ दूरी पर रख कर आकर्षक रास्ता बने. पत्थर चौकोर या मनपसंद आकार का हों, यह चारों ओर से खुला हो, पेड़ों से ढका न हों, वहां पानी न खड़ा रहता हो, पथरीला न हो.

2. भूमि की जांच

जब यह तय हो जाए कि लौन कहां बनवाना है, तो सब से पहले किसी सौइल एजेंट से अपनी भूमि की जांच करवा लें. दिल्ली पूसा इंस्टिट्यूट में सौइल टैस्ट लैब से किसी विशेषज्ञ से या किसी बढि़या नर्सरी से भूमि जांच की सेवाएं प्राप्त की जा सकती हैं. यह सौइल एजेंट विशेषज्ञ ही आप की भूमि के बारे पूरी जानकारी देगा कि भूमि की किस्म क्या है, रेतीली है, चिकनी है, भुरभुरी है.

इस में न्यूट्रीयनरस कितने हैं, पैलस क्या है, जिस से यह पता चलता है कि यह भूमि अटकलाइन है या नहीं. प्राय उत्तम किस्म के घास वाले लौन के लिए पिट लेवल 6 और 7 के बीच सही माना गया है. यदि जमीन में कुछ कमियां हैं तो भूमि जांच के बाद सौइल एजेंट बताएगा कि अब आगे क्या किया जाए.

3. लौन की खुराक

हरेभरे लौन के लिए खाद कब, कितनी, कौन सी और कैसे डाली जाए यह बात बेहद जरूरी है. अमेरिका में मिसीसिप स्टेट यूनिवर्सिटी के असिसटैंट प्रोफैसर लैंडस्कपिंग बौब ब्रजजैक के अनुसार सिंथैटक खाद के मुकाबले और्गनिक खाद जो कुदरती चीजों जैसे सीवीड या बोन मील अच्छे परिणाम देती है.

अच्छी घास के लिए जरूरी है कंपोजर मिली मिट्टी को खूब मिलाया जाए, इस तरह फावड़े से या ट्रैक्टर चलवाएं कि ऊपरी मिट्टी की परत कम से कम 6 हो. खाद डालने की यह प्रक्रिया साल में कम से कम 2 बार वसंत ऋतु और जब पत्ते झड़ते हैं दोहराई जाए. खाद डालने से इस में मौजूद न्यूट्रीएंट्स और नमी घास के लिए क्रशन का काम करती है. 3-4 बार मिट्टी को ऊपरनीचे करें, फिर समतल करें. कंकड़पत्थर निकालें, जंगली बूटी निकालें. अब इस में गोबर की खाद दे सकते हैं. खाद किसी अच्छे मान्यताप्राप्त स्टोर से ही लें. आजकल तरहतरह की रैडीमेड खाद पैकेटों में मिल रही है और औफ लाइन मंगवाई जा सकती है.

4. घास की किस्म

लौन में घास की किस्म बहुत महत्त्वपूर्र्ण है. जलवायु, स्थान, क्षेत्र और लौन के आकार को देखते हुए घास लगाएं. आजकल नर्सरी में कई प्रकार की घास की वैराइटीज उप्लब्ध हैं जैसे यदि नमी, छाया वाले स्थान पर घास लगानी है तो ऐक्सोनोपस एफिनस की किस्म लगा सकते हैं. अच्छा लौन बनता है, चुभती नहीं, नरम होती है तथा चलने से दबती नहीं. खराब होने का अंदेशा भी नहीं रहता.

गहरे रंग की चाहत हो तो सब की पसंदीदा घास से लौन चमक उठता है. यह बहुत सघन होती है. चलने पर नरम गड्डे सा एहसास दिलाती है.

5. जायसिस किस्म

यदि आप के पास समय काफी है, देखरेख का प्रावधान है, आप बागबानी के शौकीन हैं तो, साउथ ईस्ट एशिया में प्रचलित जायसिस किस्म लगा सकते हैं. इस के पत्ते नुकीले और रंग गहरा हरा होता है.

6. भारत में साइनोडोन

यह घास काफी लोगों की पहली पसंद है. वर्षा ऋतु घास लगाने के लिए सब से उत्तम मौसम माना गया है. घास घनी हो उठती है जिस पर चलने में आनंद आता है.

7. सिंचाई

अमेरिका के ‘अमेरिका सोसाइटी औफ लैंडस्केपिंग आसला’ के विशेषज्ञ जेनेट मेश्सता का मानना है कि यह जरूरी नहीं लौन को रोज पानी दिया जाए. मौसम तथा रोज के तापमान को ध्यान में रखते हुए लौन को धीरेधीरे इस प्रकार पानी दें कि घास की जड़ों को जमने में आसानी हो.

लौन के बीचोंबीच, किनारों में कुछ छोटेछोटे टीन के डब्बे या प्लास्टिक के  खाली डब्बे रख दें. आप स्पिंकल की विधि से 15-20 मिनट तक पानी दें और देखें क्या लौन में रखे डब्बों में 1/2-1 इंच पानी जमा हो गया है. यदि ऐसा है तो इतना पानी अच्छी हरीभरी घास के लिए सप्ताहभर के लिए काफी है.

8. कंटिंग व रोलर लगाना

घास जिस में जड़ लगी हो उसे तैयार भूमि में 1-2 इंच के अंतर से अच्छी तरह दाब कर लगाते जाएं. पासपास लगी घास घनत्व वाला सघन लौन देगी और जल्दी उग भी जाती है.

बाजार में तरहतरह के  लौन उपलब्ध हैं. विदेशों में हाथ से चलाने वाले, मोटर में बैठ कर चलाने वाली घास काटने की मशीनें प्राय आम लोगों के पास रहती हैं क्योंकि वहां घरों में कई एकड़ों में लौन रखने का रिवाज है. हमारे यहां माली घास काटने की मशीन से कटिंग करते हैं, पर इस बात का ध्यान रखें मशीन के ब्लेड तीखे हों ताकि घास ढंग से कटे, उलझे न या जड़ समेत बाहर न आ जाए.

इसलिए बारबार और बहुत छोटी घास काटना अच्छे लौन के हित में नहीं रहता. काटते समय ध्यान में रखें कि किस किस्म की घास लगी है. हर घास को काटने की अपनी अलग मांग रहती है.

9. जो है वह काफी है

यह जरूरी नहींकि आप के पूरे लौन में हरीभरी घास हो. शेड, छायादार और पेड़ के नीचे जहां पानी ठहरता हो वहां घास बराबर नहीं उगती. इसलिए ऐसे स्थानों पर उपयुक्त झड़ीनुमा पौधे लगा कर इस कमी को पूरा किया जा सकता है. इस से लौन हराभरा दिखेगा.

आईब्रो शेप, जो बढ़ाए आप के चेहरे का नूर

तारीफ सुनना हर किसी महिला के लिए बेहद खुशी की बात होती है और खासकर जब कोई उस की तारीफ में यह बोल दे कि तुम्हारी आंखों में डूबने को जी चाहता है मानो जैसे  उस की खुशी का ठिकाना ना हो, लेकिन कभी सोचा है कि आप की आंखें खूबसूरत दिखने में आप की आईब्रो का कितना बड़ा योगदान है.

आईब्रो का डिजाइन इस तरह का होता है कि जब आप के माथे पर पसीना निकलता है, तो आईब्रो के डिजाइन के चलते वो आंखों के बगल में बह जाता है.  इसी तरह पानी को भी सीधे आंखों पर पड़ने से आईब्रो रोकती हैं.साथ ही, सूरज को किरण सीधे आंखों पर ना पड़े, इस का खयाल भी हमारी आईब्रो ही रखती हैं.

आईब्रो किसी भी व्यक्ति के हावभाव  जानने में भी मदद करती हैं और अहम बात कि ये आप की आंखों को और भी खूबसूरत दिखाती हैं, जिस से आप का चेहरा बेहद खूबसूरत लगता है. बस जरूरत होती है तो इन को अपने चेहरे के अनुसार अच्छी शेप देने की. तो चलिए, आईब्रो के फायदे जानने के बाद बात करते ही आप के चेहरे के अनुसार कैसे दें एक अच्छे लुक के लिए शेप.

स्क्वायर शेप चेहरे के लिए

स्क्वायर शेप चेहरे के फीचर्स डिफाइंड और जौलाइन एंग्युलर होते हैं. ऐसे में महिलाओं का चेहरा थोड़ा लंबा दिखाना हो तो  इस के लिए आर्च को ऊपर उठाएं और आईब्रो को लंबा रखें. यदि नैचुरल लुक चाहती हैं तो आईब्रो को एंग्युलर रखें.

हार्ट शेप के लिए

दिल के आकार के चेहरे वाली महिलाओं को राउंड  शेप आईब्रो रखने चाहिए, क्योंकि इन का माथा चौड़ा होता है, जबकि चिन थोड़ी पतली होती है. यह शेप उन को माथा छोटा दिखाने में मदद करती है.

 ओवल शेप के लिए

ओवल शेप चेहरा मेकअप आर्टिस्ट के अनुसार सब से बेहतर माना जाता है. इस तरह के चेहरे पर हर तरह की आईब्रो स्टाइल अच्छी लगती है. लेकिन आईब्रो को सौफ्ट रखने की कोशिश करें.

डायमंड शेप के लिए

ऐसे चेहरे की शेप वाली महिलाओं की हेयरलाइन पतली होती है व चीकबोंस चौड़ी होती है. इन के लिए बेहतर औप्शन राउंड आईब्रो के साथ हलका सा कर्व भी करा सकती हैं.

राउंड फेस के लिए

राउंड यानी गोलाकार चेहरे वाली महिलाओं के चेहरे पर एंगल्स और डेफिनेशन की कमी होती है. उस कमी को खत्म करने के लिए सौफ्ट लिफ्टेड आर्च का सहारा लेना चाहिए, जिस से कि चेहरा लंबा व जौलाइन स्लिमर नजर आने लगती है.

Menstrual हाइजीन टिप्स

पीरियड्स यानि माहवारी महिलाओं के स्वाभाविक विकास का परिचायक है. पहले जहां एक लडकी को पीरियड्स की शुरुआत 12 से 15 साल की उम्र में हुआ करती थी, वहीं आज यह 10 साल की उम्र में ही हो जाती है.

हमारी दादीनानी के समय में पैड्स आम जनता की पहुंच में नहीं थे इसलिए वे घर के फटेपुराने कपड़ों की परतें बना कर प्रयोग करतीं थीं. यही नहीं, उन्हीं कपड़ों को धो कर वे फिर से भी प्रयोग करती थीं पर आज हमारे पास इन दिनों में प्रयोग करने के लिए भांतिभांति के पैड्स, टैंपोन और कप मौजूद हैं और महिलाएं इन्हें यूज भी करती हैं. पर इन दिनों साफसफाई और कुछ अन्य बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है.

अकसर जानकारी के अभाव में महिलाएं साधारण सी सावधानियां भी नहीं रख पातीं और यूरिनरी और फंगल इन्फैक्शन का शिकार हो जाती हैं. बाजार में उपलब्ध किसी भी साधन का पीरियड्स में उपयोग करें पर निम्न बातों का ध्यान जरूर रखें :

  1. सैनेटरी पैड्स

सैनेटरी पैड्स महिलाओं द्वारा सर्वाधिक मात्रा में प्रयोग किए जाते हैं क्योंकि यह कम कीमत में आसानी से मिल जाते हैं पर अकसर महिलाएं इन्हें एक बार प्रयोग करने के बाद बदलने में कंजूसी करती हैं जबकि पैड्स खून के बहाव को एक जगह पर एकत्र कर देते हैं जिस से अकसर अंग में संक्रमण, ऐलर्जी और रैशेज हो जाते हैं. इसलिए अपने खून के बहाव के अनुसार पैड्स को 4-5 घंटे के अंतराल पर बदलना बेहद जरूरी है. साथ ही यदि बहाव अधिक है तो चौड़े पैड्स का प्रयोग करें ताकि किसी भी प्रकार के लीकेज से बची रहें.

2. टैंपोस

पैड्स के मुकाबले टैंपोस काफी आरामदायक और सुरक्षित होते हैं. ये खून को भी अच्छीखासी मात्रा में सोखने की क्षमता रखते हैं पर इन्हें बनाने में भी कैमिकल का प्रयोग किया जाता है इसलिए इन्हें भी नियमित अंतराल पर बदलना जरूरी होता है अन्यथा इन का कैमिकल शरीर को हानि पहुंचा सकता है.

डाक्टरों के अनुसार, इसे 8 घंटे से अधिक नहीं पहनना चाहिए और रात में टैंपुन के स्थान पर पैड का प्रयोग करना चाहिए अन्यथा जलन और खुजली की समस्या हो सकती है.

 

3. मैंस्ट्रुअल कप

यह पीरियड्स के लिए सब से सुरक्षित माना जाता है क्योंकि यह कैमिकल रहित सिलिकौन का एक कप होता है जिसे अंग के मुख पर रखा जाता है और भर जाने पर साफ कर के फिर से प्रयोग किया जा सकता है पर किसी भी प्रकार की ऐलर्जी अथवा इन्फैक्शन होने पर इस का प्रयोग केवल डाक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए. साफ करते समय डेटौल और सैवलौन आदि का प्रयोग भी करना चाहिए ताकि यह पूरी तरह कीटाणुमुक्त हो जाए.

रखें इन बातों का भी ध्यान

  • इन दिनों में अपनी इंटीमेट हाइजीन का विशेष ध्यान रखें ताकि किसी भी प्रकार के इन्फैक्शन से बची रहें.
  • सदैव अच्छी कंपनी के प्रोडक्ट्स का ही प्रयोग करें.
  • पीरियड्स के शुरुआती और अंतिम दिनों में जब फ्लो कम होता है तो पैंटी लाइनर पैड्स का प्रयोग किया जा सकता है। यह पैड पैंटी में आसानी से चिपक जाते हैं.
  • इन दिनों में बहुत भारी वजन को उठाने और लोअर बौडी पार्ट की ऐक्सरसाइज को करने से बचें क्योंकि इन दिनों में लोअर पार्ट में काफी बदलाव होते हैं.
  • सिंथैटिक कपड़े की जगह केवल सूती पैंटी का ही प्रयोग करें क्योंकि कई बार सिंथैटिक कपड़े से इंटीमेट पार्ट में रैशेज हो सकते हैं.

(जे पी हौस्पिटल, भोपाल की वरिष्ठ गाइनोकोलौजिस्ट, डाक्टर सुधा अस्थाना से की गई बातचीत पर आधारित)

बीमारी के कारण मेरी आंखों के नीचे काले घेरे पड़ गए है. मुझे कोई उपाय बताएं

सवाल

मैं 24 वर्षीय छात्रा हूं. करीब 2 वर्ष से मैं बीमार रहती हूं, जिस कारण मेरी आंखों के नीचे काले घेरे हो गए हैं व रंग भी काला लगने लगा है. कृपया कोई ऐसा उपाय बताएं, जिस से मैं इन दोनों परेशानियों से छुटकारा पा सकूं?

जवाब

ये दोनों ही समस्याएं आप को बीमारी व उस के दौरान ली जा रही दवाइयों के साइडइफैक्ट के कारण हो रही हैं. आप अपने आहार में ज्यादा से ज्यादा पौष्टिक चीजें शामिल कीजिए जैसे हरी सब्जियां, दूध, दही, आंवला, संतरा, टमाटर, गाजर आदि. रंग निखारने के लिए घरेलू उबटन का प्रयोग भी कर सकती हैं. इस के लिए संतरे के सूखे छिलके, सूखी गुलाब

व नीम की पत्तियों को समान मात्रा में ले कर पीस लें और इस के बाद उस में कैलेमाइन पाउडर मिला कर रख लें. जब भी स्क्रब करना चाहें तब 1 चम्मच पाउडर में थोड़ा सा औरेंज जूस मिला कर पेस्ट बना लें और रोजाना चेहरे पर इस से स्क्रब करें. इस स्क्रब को करने से चेहरे की त्वचा साफ, चिकनी और निखरी रहती है. काले घेरों के लिए संतरे या गाजर का रस निकालें और रुई को उस में भिगो कर कुछ देर तक आंखों पर रखें.

-समस्याओं के समाधान

ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर, डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055. व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

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