अगले दिन दीपिका ने 1 नहीं 2 बार उदय से फोन पर बात की. ‘‘सुबह के समय उदय खुश था, किंतु अभी जब मैं ने बात की तो वह कुछ चुप सा था. क्या बात हो सकती है?’’
‘‘दफ्तर के किसी काम में उलझा होगा. तुम्हें यहां उदय के मूड के बारे में बात करनी थी तो आई ही क्यों?’’ उदय के जिक्र से संतोष चिढ़ने लगा था. आज का दिन भी सुस्त बीता. जैसा सोचा था, वैसे कुछ नहीं हो रहा था. जबजब संतोष दीपिका को बिस्तर पर ले जाता, उस का व्यवहार इतना शिथिल रहता मानो सब कुछ उस की इच्छा के खिलाफ हो रहा हो. जिस अल्हड़ यौवन की खुशबू में संतोष खिंचा चला आता था, वह कहीं गायब हो चुकी थी. ऊपर से होटल का खर्च अलग. अगली शाम को ही दोनों ने लौटने की सोच ली.
‘‘कह दूंगी उदय से कि आप की याद आ रही थी.’’
दीपिका के कहने पर संतोष ने उस की आंखों को भेदते हुए पूछा, ‘‘कहीं यही सच तो नहीं?’’
दीपिका चुप रही. किंतु उस की झुकी नजरों ने भेद खोल दिया था. संतोष की उदासीन भावभंगिमा उस के उदास चेहरे से मेल खा रही थी. दीपिका को उस के घर रवाना कर संतोष अपने घर निकल गया.
शाम को घर लौटने पर अचानक दीपिका को अपने समक्ष पा उदय थोड़ा हैरान हुआ.
‘‘सरप्राइज,’’ चिल्ला कर दीपिका ने उदय के गले में बांहें डाल दीं.
‘‘जल्दी कैसे आ गई तुम? तुम्हें तो 2 दिन बाद आना था?’’ उदय के स्वर में कोई आवेग नहीं था.
‘‘क्यों, तुम्हें खुशी नहीं हुई क्या? अरे, तुम्हारी याद जो मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी, इसलिए जल्दी चली आई,’’ खाना लगाते हुए दीपिका चहक रही थी. आज उस का सुर उत्साह से लबरेज था, ‘‘इतने थके से क्यों लग रहे हो? तबीयत तो ठीक है न?’’
‘‘हां, थोड़ी थकान है. जल्दी सो जाऊंगा तो सुबह तक स्वस्थ महसूस करूंगा.’’
अगली सुबह जब उदय दफ्तर के लिए निकल रहा था तब संतोष को घर में आते देख पूछ बैठा, ‘‘आज इतनी जल्दी आ गए आप संतोष? लगता है मन नहीं लगता आप का दीपिका के बिना… और कितने दिन चलेगी आप की संगीत की कक्षा?’’
उदय के हावभाव देख कर संतोष और दीपिका दोनों को हैरानी हुई. अमूमन संतोष को देख उदय प्रसन्न होता था, उन की संगीत कक्षा की प्रगति के बारे में पूछता था, एक संगीत समारोह रखने की बात कहता था किंतु आज उदय उदासीन था. आज संतोष भी उदास था और दीपिका थोड़ी चिंतित कि क्यों आ गया संतोष इतनी सुबह… उदय के दफ्तर जाने का इंतजार भी नहीं किया.
उदय के चले जाने के बाद दीपिका ने कहा, ‘‘संतोष, मैं आजीवन तुम्हारी आभारी रहूंगी. तुम मेरे जीवन में एक बार फिर लौट कर आए. तुम ने मुझे वही खुशी के पल देने चाहे, जिन के लिए शायद मैं भागती फिरती पर कभी उन्हें पाने की लालसा को शांत नहीं कर पाती. अच्छा हुआ जो पल तुम ने मेरी झोली में डाले. अब मैं समझ गई हूं कि मुझे अपने जीवन में क्या चाहिए मृगतृष्णा के वे क्षण या ठोस धरातल भरी जिंदगी.’’
‘‘संतोष, मैं शादीशुदा हूं, यह बात शायद मैं भूल गई थी. एक षोडशी की तरह मैं अपने प्रेमी की बांहों में खो कर अपना संसार तलाश रही थी. यदि तुम मुझे मेरी इस गृहस्थी से दूर, होटल के उस कमरे में नहीं ले जाते तो मुझे कभी नहीं ज्ञात होता कि मैं इस गृहस्थी में कितनी रम चुकी हूं. जब तुम इस घर में आते हो तब मुझे इस घर को छोड़ कर जाने का कोई भय नहीं होता. लेकिन इस घर के बाहर कदम रखने पर मैं ने जाना कि इस पहचान के बिना मैं कितनी अधूरी हूं.
‘‘उदय की क्या गलती है. उन्होंने हमेशा मेरा ध्यान रखा, मुझे पूरा प्यार दिया, अपने परिवार में सम्मान दिया. मैं किस हक से उन की नाक पूरे समाज में कटवा दूं? मेरी इस एक हरकत से उदय का प्यार पर से विश्वास उठ जाएगा. अपनी जिंदगी में रंग भरने हेतु मैं उन की जिंदगी को स्याह नहीं कर सकती.’’
‘‘काश, हमारी शादी हो गई होती तो मैं तुम्हें कभी खुद से अलग नहीं होने देता पर अब… अब तुम्हारी मरजी के आगे मैं बेबस हूं,’’ पिछले दिनों के अनुभव और आज दीपिका के मत के आगे संतोष के पास चुप रहने के अलावा और कोई चारा नहीं था. वह उलटे पांव लौट गया.
दीपिका सारे घर में बेचैन घूमती रही. सारा दिन सोचती रही कि कैसे उस के कदम इतनी गलत दिशा में उठ गए. सारा दिन मंथन करने के बाद उस ने निर्णय लिया कि वह उदय को सब कुछ बता देगी. बस, दिल पर इतना भारी बोझ ले कर आगे की पूरी जिंदगी तय करना बहुत मुश्किल होगा.
शाम को जब उदय घर लौटा तब दीपिका ने शांत स्वर में उसे सारी बात बता दी.
उदय मुंह नीचे किए बैठा सुनता रहा और दीपिका नजरें नीची किए सब कहती गई, ‘‘मुझे माफ कर दो उदय. मुझ से बहुत बड़ा गुनाह हो गया. आगे मेरी जिंदगी में जो होगा वह तुम्हारे निर्णय पर निर्भर करेगा.’’
उदय चुपचाप उठ कर चला गया और रात भर बैठक में ही रहा. दीपिका अपने कक्ष में चली गई. बैठक में बैठे हुए उदय विचारों के भंवर में घूमने लगा…
3 दिन पहले उदय को दफ्तर के कार्य से पास के शहर जाना पड़ा था. अपना काम पूरा करने के बाद वह मायके गई अपनी पत्नी के लिए पसंदीदा मिठाई लेने बाजार पहुंच गया. वहां घूमते हुए वह हूबहू दीपिका के हाथ से बने स्वैटर को देख स्तब्ध रह गया. ध्यान दिया तो वह स्वैटर संतोष ने पहना था और उस की बांहों में बांहें डाले उदय की पत्नी दीपिका लहरा रही थी. यह दृश्य देख कर उदय के मन में रोष, प्रतिघात, वेदना, संताप के मिलेजुले भाव तूफान मचाने लगे. उस का सिर घूमने लगा. इतना बड़ा विश्वासघात? उस की अपनी जीवनसंगिनी ने उस के साथ इतना बड़ा धोखा किया. उस समय उदय खून का घूंट पी कर रह गया था. लेकिन आज दीपिका के सब कुछ बताने पर उदय के मनमस्तिष्क में एक प्रतिद्वंद्व शुरू हो गया. अब तक वह दीपिका को सजा देने की सोच रहा था, बस इस प्रतीक्षा में था कि वह उसे कुछ बताती है या नहीं. किंतु आज दीपिका के आत्मसमर्पण करने पर उस की आंखों से बह रही प्रायश्चित्त की धारा ने उदय के मन की अग्नि पर कुछ छींटे छिड़क दिए थे.
सारी रात इसी ऊहापोह में गुजरी. वह दीपिका को सजा दे या उस के प्रायश्चित्त को देखते हुए उसे माफ कर दे. यदि दीपिका को सजा देता है तो क्या खुद उस की तपिश से बच पाएगा? अपनी गृहस्थी तोड़ बैठेगा और जग हंसाईर् होगी वह अलग. पर इतने बड़े विश्वासघात के पश्चात क्या वह अपनी पत्नी पर भरोसा कर पाएगा?
अल्लसुबह दीपिका घर के रोजमर्रा के कार्यों में लग गई. एक हिचकिचाहट अवश्य थी उस की भावभंगिमा में. चाय का प्याला थमा वह उदय के पास बैठ गई, ‘‘क्या निर्णय लिया आप ने? आप का हर निर्णय मुझे स्वीकार्य होगा.’’
‘‘दीपिका, मैं यह बात पहले से जानता हूं. जब तुम मायके का बहाना बना कर दूसरे शहर चली गई थीं तब मैं ने तुम दोनों को एकसाथ देख लिया था. उस पर तुम्हारे मायके भी मेरी बात हुई थी जहां से मुझे यकीनन पता चल गया कि तुम अपने मायके नहीं गई हो. मैं तुम्हारे बताने के इंतजार में ही था. उदय की ये बातें सुन कर दीपिका की आंखों से प्रायश्चित्त की बूंदें टपक पड़ीं.
‘‘यदि मैं ने तुम्हें माफ नहीं किया तो इस अग्नि में मैं भी सारी उम्र जलता रहूंगा. लेकिन माफ करना इतना सरल नहीं. पता नहीं मैं दोबारा तुम पर कब भरोसा कर पाऊंगा. किंतु मैं अपनी गृहस्थी नहीं तोड़ना चाहता. सारी रात सोचने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि तुम्हारी आंखों में जो प्रायश्चित्त दिखाई दे रहा है और अतीत में जो हम ने सुखद पल व्यतीत किए हैं, उन की तुलना में आज का यह धोखा कहीं हलका है. इसलिए मैं तुम्हें एक मौका और दूंगा परंतु इस मौके का भरपूर फायदा उठाना तुम्हारी जिम्मेदारी है.’’
सही तो है, यदि बरसात में हमारे आंगन में काई जम जाए तो क्या हम आंगन तोड़ बैठते हैं? नहीं, हम उस हिस्से को सुखा कर उस काई को साफ करते हैं और फिर ध्यान रखते हैं कि हमारे घर में अनचाही उपज न पनपे. बरसाती काई का उग जाना इस बात का संकेत नहीं कि हमारे आंगन में कोई कमी है, अपितु वह केवल इतना सा संदेश है कि हमारे घरआंगन को थोड़े और ध्यान की आवश्यकता है.
