Modern Girl Outfit: लड़कियां क्यों न पहनें सहज परिधान

Modern Girl Outfit: स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है’ सिमोन द बोउवार की यह पंक्ति दुनियाभर में स्त्री की सचाई बयां करती है. हमारे यहां स्त्री को गढ़ने में पितृसत्तात्मक परिवेश, समाज का संकीर्ण दृष्टिकोण, धर्मग्रंथ, नियमकानून और जरूरत पड़ने पर मारपिटाई महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. यह काम बेटी छोटी सी होती है तभी से शुरू हो जाता है. उसे बताया जाता है कि वह लड़की है इसलिए उस के खानपान, रहनसहन, पहनावे और यहां तक कि पढ़ाईलिखाई पर भी एक शिकंजा कायम रहेगा. उसे पलपल जीवन में समझते करने होंगे और अपने सपनों को दफन करना होगा.

उसे हमेशा पुरुष वर्ग के अधीन रहना होगा. उसे अपना चेहरा और बदन छिपा कर तथा सिर झका कर जीने की आदत डालनी होगी वरना उस का जीना दूभर हो जाएगा.

यही वजह है कि उसे बचपन से अलग तरह के कपड़े पहनाए जाते हैं, अलग तरह के काम कराए जाते हैं और अलग तरह से खिलायापिलाया जाता है. यानी उसे लड़की बनाया जाता है जो कभी लड़कों की बराबरी नहीं कर सकती. अगर उसे बराबरी करनी है तो बहुत कुछ बदलना पड़ता है.
फिल्म ‘दंगल’ एक छोटा सा दृश्य है जिस में महावीर सिंह फोगाट अपनी बेटियों गीता और बबिता को पहलवान बनाना चाहते हैं और इस के लिए रोज सुबह दौड़ने के लिए कहते हैं. वे रोज दौड़ने भी निकलती हैं. लेकिन कुछ दिन दौड़ने के बाद दोनों अपने पिता से बोलती हैं कि पापा सूट में दौड़ा नहीं जाता. तब उन के पिता महावीर सिंह दोनों को चचेरे भाई का निक्कर और शर्ट को छोटा कर पहनने के लिए देते हैं. दोनों उन्हें पहन कर बिना परेशानी के दौड़ लगाती हैं.

भेदभाव की ओर इशारा

फिल्म का यह छोटा सा दृश्य स्त्रीपुरुष के बीच पहनावे में उस भेदभाव की ओर इशारा करता है जिस ने औरत को असुविधाजनक कपड़ों में बांध दिया है. हमारे समाज में स्त्रीपुरुष के लिए अलगअलग पहनावा तय किया गया है. समय के साथ इस में बदलाव भी आए लेकिन अंतर हमेशा कायम रहा. लड़कियों के पहनावे हमेशा से असुविधाजनक और भारीभरकम रहे हैं. आजकल कुछ लड़कियां लड़कों जैसे पहनावे भी पहनने लगी हैं मगर उन की संख्या बहुत कम है.

पहनावे में लैंगिक भेदभाव

बचपन से ही देखें तो छोटी लड़कियों को फ्रौक और स्कर्ट पहनाई जाती है जबकि लड़के पैंट और टीशर्ट में आराम से रहते हैं. फ्रौक एक ऐसा पहनावा है जिस में तेजी से भागनादौड़ना और तुरंत उठनाबैठना मुश्किल होता है. ऊपर से लड़कियों को अपना शरीर छिपाने को ले कर भी मातापिता अति सजग करने लगते हैं. अब फ्रौक और स्कर्ट जैसे पहनावे में लड़कियों को हमेशा उन्हें सिमटा कर बैठना या दौड़ते हुए उड़ने से बचाना पड़ता है. वहीं पैंटशर्ट जैसा पहनावा इन सब चिंताओं से मुक्त होता है.
इसी तरह बड़े होने पर सूटसलवार पहनने और चुन्नी ओढ़ने के लिए दे दिए जाते हैं. यह ऐसा पहनावा है जिस में लड़कियों को आधा ध्यान अपनी चुन्नी संभालने पर ही लगाना पड़ता है. चुन्नी संभालने की बात हमेशा उन के दिमाग में घूमती रहती है. वहीं बिना जेब के इन कपड़ों के साथ उन्हें एक हैंड बैग तो हमेशा ले जाना पड़ता है. इस सब के साथ अगर तेजी से चलना या दौड़ना पड़ जाए तो कितना असुविधाजनक होगा यह हम खुद सोच सकते हैं.

यही हाल साड़ी का है. पल्ला संभालना और जरा सा दौड़ने पर साड़ी का टांगों में फंसना या ढीला होने का डर होना स्वाभाविक है. ऊपर से इसे पहनने में लगने वाला समय भी अपनेआप में एक दिक्कत है.

खूबसूरत दिखने की चाह

अब अगर बुरके की बात करें तो उस में ठीक से चल पाना तक मुश्किल लगता है. गरमी हो या सर्दी हमेशा दोगुने कपड़ों को शरीर पर ढोना ऐसे ही आप को थका देगा. उस पर चेहरा छिपाने की जद्दोजहद और उलझ कर रख देती है. आधुनिक जमाने के साथ आए गाउन, मिडी और लहंगे वाले सूट भी स्त्री की ऐक्टिविटी को धीमा कर देते हैं.

इन के अलावा फुटवियर भी काफी अलग होते हैं. खूबसूरत लड़कियों को स्टाइलिश दिखने के लिए हील्स पहनने का लालच दिया जाता है. हील पहनना भी आसान नहीं है. जब कोई लड़की हील पहनती है तो वह बहुत धीरेधीरे चल पाती है और पैरों में दर्द होना ये हील के साइड इफैक्ट्स हैं. लेकिन स्टाइलिश और खूबसूरत दिखने की चाह में लड़कियां ये सारी दिक्कतें नजरअंदाज कर देती हैं.

स्त्री की सक्रियता पर पहनावे का असर

औरत के लिए तय किए गए कपड़े ऊपरी तौर पर तो असुविधाजनक नहीं लगते क्योंकि वे रोज उन्हें पहन कर चलती हैं और अब उसे आदत बना लिया है. लेकिन अगर स्त्री और पुरुष के कपड़ों की तुलना की जाए तो अंतर साफ नजर आता है. बच्चियों और महिलाओं के कपड़े न सिर्फ इस तरह तैयार किए गए हैं कि पूरा शरीर ढक दें बल्कि इन कपड़ों की वजह से इन की सक्रियता और चुस्तीफुरती भी कम हो जाती है.

मसलन, कई दफा देर होने पर हमें बस और मैट्रो भाग कर पकड़नी पड़ती है. बस में तो लोग लटक कर भी जाते हैं. आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि ऐसी हालत में साड़ी और सूट में महिला कितनी असहज हो जाएगी. वह दौड़ तो सकती है लेकिन पुरुष जितनी तेजी से नहीं. बस में लटकना तो उस के लिए और मुश्किल होता है. अगर आप जल्दबाजी में हैं और जल्दी मैट्रो या बस लेने के लिए जींस या पैंट पहने हुए लड़कियां फट से रेलिंग लांघ कर स्टेशन या बस की सीढि़यां चढ़ सकती हैं लेकिन साड़ी और सूट पहनने वाली लड़कियां धूम कर उस जगह से आती हैं जहां से रेलिंग टूटी हो क्योंकि छोटी सी दिवार फांदना भी उन के लिए संभव नहीं होता. उन्हें इस तरह के हर काम में यानी दौड़भाग में कुछ समय ज्यादा लगता है.
साइकिल चलानी हो या बाइक सूट, साड़ी पहन कर लड़की यह सब नहीं कर सकती. उसे जींसशर्ट पहननी होती है. स्कूल में ही देखें तो लड़कियों को स्कर्ट में खेलने में सहज महसूस नहीं होता. स्पोर्ट्स में भाग लेने वाली लड़कियां कभी स्कर्ट पहन कर नहीं खेलतीं. ऐसे में थोड़ाथोड़ा कर के ही सही लेकिन लड़कियां पीछे छूट जाती हैं.

यह भेदभाव क्यों

दूसरी तरफ लड़कों के कपड़ों को देखें तो उन के कपड़े उन्हें ऐक्टिव बनाए रखने में मदद करते हैं. वक्त के साथ पैंटशर्ट और जींसशर्टटीशर्ट जैसे कपड़े उन के पहनावे का हिस्सा बन गए हैं. अमूमन हम अपने घरों में देखते हैं कि लड़कों को बाहर जाना हो तो पर्स जेब में डाला और जूते पहन कर चल दिए क्योंकि घर में भी वे अमूमन पैंट, टीशर्ट पहने होते हैं और बाहर जाने के लिए भी वही पहनना होता है. बाहर निकल कर दौड़नेभागने में भी उन्हें दिक्कत नहीं होती. उन के दोनों हाथ फ्री होते हैं. हाथ में कुछ संभालना है इस पर उन का ध्यान नहीं बंटता और वे तेजी से जहां जाना हो चले जाते हैं.

हम इस फर्क को ऊपरी तौर पर नहीं समझ पाते क्योंकि हमारे समाज में महिलाएं घर के अंदर ही रही हैं. खेलकूद भी एक समय बाद छुड़वा दिया जाता है. लेकिन अब जो महिलाएं बाहर निकल रही हैं, हर तरह के काम कर रही हैं तो ऐसे में यह अंतर अधिक महसूस होता है.

इस मसले पर यह भी तर्क दिया जाता है कि कौन सा महिलाओं को बाहर जा कर मैराथन में दौड़ना है जो कपड़ों से समस्या आएगी. लेकिन छोटीछोटी चीजों पर गौर करें तो पता लगेगा कि कितने ही काम ऐसे थे जो हम ज्यादा आसानी से कर सकते थे. वैसे भी बाहर निकल कर व्यक्ति एक रेस में अपनेआप शामिल हो जाता है. स्त्री शरीर को छिपाने की कोशिश में स्त्री पर ऐसेऐसे लबादे डाल दिए गए हैं जिन्होंने उस के शरीर को बांध दिया है. आज अगर लड़कियां अपने पहनावे में बदलाव लाने की कोशिश करती हैं तो उस पर संस्कृति का हवाला दे कर सवाला खड़े किए जाते हैं. लेकिन पुरुष उस संस्कृति को तोड़ कर अपने लिए सब से सुविधाजनक विकल्प अपना चुका है इस पर कोई सवाल नहीं उठता. ऐसे में लड़कियां भी क्यों नहीं अपने लिए सब से सहज विकल्प चुनें?

महिलाओं का पहनावा और पितृसत्ता का शिकंजा

जैसे ही बात महिलाओं की आती है तो समाज अपनी पूरी ऊर्जा और दिमाग इस बात पर लगा देता है कि महिलाओं के लिए कपड़े कैसे होने चाहिए जो उन की गतिशीलता को सीमित करें. वे महिलाओं के आगे ज्ञान बघारना शुरू कर देते हैं कि किस धर्मग्रंथ में क्या लिखा है. औरतों को कैसे रहना चाहिए, कितने ही तरह के निर्देश दिए जाते हैं. मसलन, ‘ऐसे कपड़े पहनो कि शरीर का प्रदर्शन न हो,’ ‘औरतों को कपड़े पहनने का ढंग तो जरूर आना चाहिए,’ ‘लड़कियों के कपड़ों से उन का चरित्र पता चलता है’ आदि.
पहनावे हमारी संस्कृति से प्रेरित होते हैं और संस्कृति समाज के विचारों से क्योंकि हमारा भारतीय समाज पितृसत्तात्मक है इसलिए जब भी बात पहनावे की आती है तो यह जैंडर के आधार पर महिलापुरुष के पहनावे का खास ध्यान रखता है.

कपड़ों से जुड़े उन पहलुओं के बारे में जो महिलाओं को जैंडर के ढांचे में ढालने और उन की गतिशीलता को प्रभावित करने का काम करते हैं. बढ़ती, चलती और अपने सपनों के पीछे भागती लड़कियां हमारे समाज को बिलकुल भी पसंद नहीं हैं. इसलिए उन की चाल को धीमा करने के लिए बचपन से ही उन्हें ऐसे कपड़े पहनाए जाते हैं जिन से वे कहीं भी आनेजाने में उलझन महसूस करें. फिर वह फ्रौक हो, स्कर्ट हो, सूटसलवार हो या साड़ी, इन्हीं कपड़ों को हमारे समाज में महिलाओं के लिए सही पहनावा माना जाता है. हमारा समाज महिलाओं का चरित्र प्रमाणपत्र देता है. ऐसे में जब भी कोई महिला अपनी पसंद से कपड़े पहनने की कोशिश भी करती है, पूरे समाज की दिक्कत जैसे बढ़ने लगती है. उस पर पचासों तरह की पाबंदियां लगाई जाती हैं.

सुरक्षा हेतु सिर से पैर तक ढके कपड़े पहनने की पाबंदी

महिलाओं को अकसर यह सलाह दी जाती है कि उन्हें ऐसे कपड़े पहनने चाहिए जिन से उन के शरीर का एक भी नाजुक अंग दिखाई न पड़े. इस के लिए सूटसलवार, साड़ी और बुरके जैसे अलगअलग तरह के कपड़ों को महिलाओं के लिए सही बताया जाता है. महिलाओं के शरीर का कपड़ों से ढका रहना उन की सुरक्षा के लिहाज से भी बहुत जरूरी बताया जाता है. इस का उदाहरण हम आए दिन महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा के रूप में देख सकते हैं जब महिलाओं के कपड़ों को उन के साथ होने वाली हिंसा का जिम्मेदार बताया जाता है.

यह अलग बात है कि जब 60 साल की बूढ़ी महिला और 2 महीने की बच्ची के साथ यौन हिंसा और उत्पीड़न की घटना सामने आती हैं तो सारी दलीलें किनारे हो जाती है. लेकिन इन तमाम तथ्यों और बहस के बावजूद बचपन से ही हम महिलाओं को इस बात की घुट्टी पिलाई जाती है कि हमेशा ऐसे कपड़े पहनो जिन में पूरा शरीर ढका रहे. कई बार पूरे शरीर को ढकने के चक्कर में महिलाएं अपने कपड़ों में ही उलझने को मजबूर हो जाती हैं.

तंग कपड़े न पहनने की पाबंदी

अगर कोई महिला टाइट कपड़े पहने तो उसे बुरा माना जाता है और उस के पहनावे को अंग प्रदर्शन से जोड़ दिया जाता है. कई बार इसे यौन हिंसा का जिम्मेदार भी माना जाता है. इस के बाद अगर कोई महिला ढीले कपड़े पसंद करती है तो उसे भी बुरा माना जाता है क्योंकि इस में उस के शरीर की बनावट साफ पता नहीं चलती. इसलिए महिलाओं पर हमेशा ऐसे कपड़े पहनने का दबाव बनाया जाता है जो समाज की नजर में सही हो. यह पितृसत्ता का महिलाओं की यौनिकता पर ही कंट्रोल है जो पूरी तरह महिलाओं के पहनावे को कंट्रोल करता है.

कपड़ों में जेब नहीं लटकन जरूरी

हम आज भी जब दर्जी के पास कपड़े सिलवाने जाते हैं तो कपड़े में जेब लगाने के नाम पर दर्जी हम महिलाओं को ऊपर से नीचे देखने लगता है. भारतीय समाज में महिलाओं के लिए डिजाइन की गई पारंपरिक पोशाकों में जेब लगवाने के बजाय जगहजगह सुंदरता के नाम पर रंगबिरंगी लटकनें और बटन लगाए जाते हैं. जैसाकि हमारे समाज में पैसे कमाने का काम पुरुषों का बताया गया है इसलिए महिलाओं के कपड़ों में कभी भी जेब की जरूरत समझ ही नहीं जाती. कहीं न कहीं आज भी यह बात समाज के गले नहीं उतरती कि महिलाएं भी पैसे कमा सकती हैं और खुद खर्च भी कर सकती हैं जिन्हें रखने के लिए उन्हें अपने कपड़ों में पुरुषों की ही तरह जेब की जरूरत होती है.

सुंदरता के पितृसत्तात्मक मुखौटे अपनाती लड़कियां

गोरा रंग, नैननक्श, भरे हुए होंठ, सुडौल गढ़ा बदन और खुशबूदार परफ्यूम का सम्मोहन. लड़कियों पर सुंदरता के इन्हीं पितृसत्तात्मक पैमाने के खांचे में फिट होने का दबाव डाला जाता है. इन पैमानों पर खरे उतरने वाली स्त्री ही पितृसत्तात्मक समाज के लिए एक सुंदर स्त्री है.

भारत की स्त्रियों में सुंदर दिखने की कामना बचपन से ही भर दी जाती है और इस वजह से सौंदर्य प्रसाधनों और ब्यूटी पार्लर्स की भीड़ बढ़ती जा रही है जिस ने अनजाने ही स्त्री को एक वस्तु के रूप में देखने के लिए बाध्य कर दिया है. हर गलीमहल्ले में खुले ब्यूटीपार्लर इस बात की ओर इशारा करते हैं कि सुंदरता लड़कियों के जीवन में कितनी अनिवार्य चीज है. मनचाही सुंदरता को न पाने की चिंता और अवसाद उन्हें हमेशा घेरे रहता है. उन का बहुत सारा समय चेहरे पर लीपापोती करने में बरबाद होता है. यह सुंदरता आरोपित और इतनी सहज है कि महिलाएं इसे ही अपनी वास्तविक पहचान मान चुकी हैं.

मेकअप जो चेहरे के फीचर्स उभारने में सहायक होता है वह एक मुखौटा बन चुका है. सुंदरता को ले कर आलम यह है कि भारतीय कौस्मैटिक इंडस्ट्री में पिछले कुछ सालों में बहुत बड़ा उछाल आया है और यह अमेरिका और यूरोप की तुलना में दोगुनी ग्रोथ कर रही हैं. भारतीय कौस्मैटिक्स इंडस्ट्री का 6.5 बिलियन डौलर का कारोबार है. 2025 तक इस के 20 बिलियन डौलर के पार होने का अनुमान है.

असहजता ही सुंदरता का पर्याय बन चुकी है और स्त्रियां इस में अपनेआप को ढालने का काम बखूबी करती हैं. दुनियाभर में महिलाएं अपने कंफर्ट और सुरक्षा के लिए बेझिझक लड़ी हैं. ‘बर्निंग ब्रा’ मूवमैंट इस का उदाहरण है. यही जागरूकता हर स्तर की महिला में आनी जरूरी है ताकि हमारे जीने का ढंग किसी और के नियंत्रण में न हो या वह सहज और सुरक्षित हो. आजादी जरूरी है. आंखों में आंखें डाल कर देखते इंसान के बजाय देखी जा रही चीज होने से. संकोच से आजादी. आजादी तकलीफदेह कपड़ों से जिन का पहना जाना मर्दों को रिझने के लिए जरूरी है. उन जूतों से आजादी जो हमें छोटे कदम लेने पर मजबूर करते हैं.

कभीकभी लगता है ये ऐसी अनावश्यक बाधाएं हैं जिन पर लड़कियों ने कभी सोचना जरूरी नहीं समझ. क्या वाकई इतना कुछ करना आवश्यक होता है? सुंदरता को इतनी अहमियत क्यों दी जाए? पितृसत्ता हमारे व्यवहार, सोचने के तरीके को अनुशासित करती है. कई बार यह सहमति से होता है कई बार आरोपित वरना सहज वस्त्रों का चयन करने में क्या बुराई हो सकती है, बेझिझक अपने रंग को स्वीकार कर सकते हैं. खुद को सितारेमोतियों से सजाना फुजूल लगने लगेगा. यह बात अजीब नहीं लगेगी कि सलवार पर भी जूते पहने जा सकते हैं. ट्रेंडी लगने की जगह फूहड़ नजर न आएं इसलिए असहजता भी स्वीकार्य होती है. स्त्रियों के शरीर से निष्क्रिय सुंदर वस्तुओं की तरह पेश आ कर हम स्त्री और उस के शरीर दोनों को विकृत कर देते हैं.

सब से पहला संघर्ष स्त्री का स्वयं के साथ है, दूसरा पुरुष की मानसिकता के साथ. सर्वप्रथम उसे गढ़ी हुई स्त्री से दूरी बनानी होगी और मनुष्य होने की गरिमा को धारण करना होगा. यदि वह स्वयं को बराबरी और समानता का दरजा नहीं दे सकती तो स्त्रीवाद का झंडा उठाने या नारा लगाने से उस की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला.

उसे बहुत से स्टीरियोटाइप से मुक्ति पानी होगी. मसलन, सौंदर्य का अर्थ महंगे ब्यूटीपार्लर्स में जा कर सौंदर्य प्रसाधनों पर खर्च कर के लीपापोती करना नहीं बल्कि अपनी सुविधानुसार सजनासंवरना है. कपड़े दूसरों के हिसाब से नहीं बल्कि अपने कंफर्ट के हिसाब से पहनना जरूरी है खासकर औफिस में या अपने काम की जगह खुद को स्मार्ट बना कर रखना है. मन और शरीर से मजबूत बनाना है.

Modern Girl Outfit

Family Story: तुम्हारे हिस्से में

Family Story: बाइक ‘साउथ सिटी’ मौल के सामने आ कर रुकी तो एक पल के लिए दोनों के बदन में रोमांच से गुदगुदी हुई. मौल का सम्मोहित कर देने वाला विराट प्रवेशद्वार. द्वार के दोनों ओर जटायु के विशाल डैनों की मानिंद दूर तक फैली चारदीवारी. चारदीवारी पर फ्रेस्को शैली के भित्तिचित्र. राष्ट्रीयअंतर्राष्ट्रीय उत्पादों की नुमाइश करते बड़ेबड़े आदमकद होर्डिंग्स और विंडो शोकेस. सबकुछ इतना अचरजकारी कि देख कर आंखें बरबस फटी की फटी रह जाएं.

भीतर बड़ा सा वृत्ताकार आंगन. आंगन के चारों ओर भव्यता की सारी सीमाओं को लांघते बड़ेबड़े शोरूम. बीच में थोड़ीथोड़ी दूर पर आगतों को मासूमियत के संग अपनी हथेलियों पर ले कर ऊपर की मनचाही मंजिलों तक ले जाने के लिए तत्पर एस्केलेटर.

‘‘कैसा लग रहा है, जेन?’’ नाम तो संजना था, पर हर्ष उसे प्यार से जेन पुकारता. शादी के पहले संजना मायके में ‘संजू’ थी. शादी के बाद हर्ष उसे बांहों में भरते हुए ठुनका था, ‘संजू कैसा देहाती शब्द लगता है. ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में सबकुछ ग्लोबल होना चाहिए, नाम भी. इसलिए आज से मैं तुम्हें जेन कहूंगा, माय जेन फोंडा.’

‘‘अद्भुत,’’ संजना के होंठों की लिपस्टिक में गर्वीली ठनक घुल गई. चेहरा ओस में नहाए गुलाब सा खिल गया, ‘‘लगता है, पेरिस का मिनी संस्करण ही उतर आया हो यहां.’’

‘‘एक बात जान लो. यहां हर चीज की कीमत बाहर के स्टोरों की तुलना में दोगुनी मिलेगी,’’ हर्ष चहका.

संजना खिलखिला कर हंस पड़ी तो लगा जैसे छोटीछोटी घंटियां खनखना उठी हों. होंठों की फांक के भीतर करीने से जड़े मोतियों से दांत चमक उठे. वह शरारत से आंखें नचाती बोली, ‘‘कुछ हद तक बेशक सही है तुम्हारी बात. पर जनाब, इस तरह के मौल में खरीदारी का रोमांच ही कुछ और है. इस रोमांच को हासिल करने के लिए थोड़ा त्याग भी करना पड़ जाए तो सौदा बुरा नहीं.’’

‘‘लगता है, इस क्रैडिट कार्ड का कचूमर निकाल देने का इरादा है आज,’’ हर्ष ने जेब से आयताकार क्रैडिट कार्ड निकाल कर संजना के आगे लहराते हुए कहा. संजना फिर से खिलखिला पड़ी. इस बार उस की हंसी में रातरानी सी महक घुली थी. हंसने से देह में थिरकन हुई तो बालों की एक महीन लट आंखों के पास से होती हुई होंठों तक चली आई.

‘‘तुम औरतों में बचत की आदत तो बिल्कुल नहीं होती,’’ होंठों पर लोटते लट को मुग्ध भाव से देखता हर्ष मुसकराया.

‘‘न, ऐसा नहीं कह सकते तुम. उचित जगह पर भरपूर किफायत और बचत भी किया करती हैं हम औरतें. विश्वास करो, तुम्हारे इस क्रैडिट कार्ड पर जो भी खरोंचें लगेंगी आज, उन पर जल्द ही बचत की पौलिश भी लगा दूंगी. ठीक? पर अभी स्टेटस सिंबल…’’

दोनों एस्केलेटर की ओर बढ़ गए.

‘‘जानते हो हर्ष, पड़ोस के 402 नंबर वाले गुप्ताजी तुम से जूनियर हैं न? उन की मिसेज इसी मौल से खरीदारी कर गई हैं कल,’’ संजना हाथ नचानचा कर बता रही थी, ‘‘आज मैं खबर लूंगी उन की.’’

‘‘नारीसुलभ डाह,’’ हर्ष ने चुटकी ली.

‘‘नहीं, केवल स्टेटस सिंबल,’’ दोनों की आंखों में दुबके शरारत के नन्हे चूजे पंचम स्वर में चींचीं कर रहे थे.

पहली मंजिल. मौल का सब से मशहूर शोरूम ‘अप्सरा’. दोनों शोरूम के भीतर चले आए. अंदर का माहौल तेज रोशनी से जगमगा रहा था. चारों ओर बड़ीबड़ी शैल्फें. वस्त्र ही वस्त्र. राष्ट्रीयअंतर्राष्ट्रीय ब्रांड. फैशन व डिजाइनों के नवीनतम संग्रह. जीवंत से दिखने वाले पुतले खड़े थे, तरहतरह के डिजाइनर कपड़ों को प्रदर्शित करते हुए.

शोरूम का विनम्र व कुशल सेल्समैन उन्हें खास काउंटर पर ले आया. साडि़यां, जींसटौप, पैंटशर्ट, अंडरगार्मेंट्स…रंगों के अद्भुत शेड्स. एक से बढ़ कर एक कसीदाकारी की नवीनतम बानगी. मनपसंद को चुन लेने की प्रक्रिया 3 घंटे तक चली. आखिरकार चुने हुए वस्त्र ढेर से अलग हुए और आकर्षक भड़कीले पैकेटों में बंद हो कर आ गए. पेमेंट काउंटर पर बिल पेश हुआ, 18,500 रुपए का. क्रैडिट कार्ड पर कुछ खरोंचें लगीं और भुगतान हो गया.

संजना के चेहरे पर संतुष्टि के भाव झलक रहे थे. पैकेटों को चमगादड़ की तरह हाथों में झुलाए कैप्सूल लिफ्ट से नीचे उतरे ही थे कि संजना के पांव थम गए.

‘‘दीवाली के इस मौके पर जींसटौप का एक सैट बुलबुल के लिए भी ले लिया जाए तो कैसा रहेगा, हर्ष? जीजू की ओर से गिफ्ट पा कर तो वह नटखट बौरा ही जाएगी.’’

‘‘अरे, वंडरफुल आइडिया, यार,’’ बुलबुल के जिक्र मात्र से ही हर्ष रोमांच से भर गया.

बुलबुल संजना की इकलौती बहन थी. शोख व चंचल. रूप और लावण्य में संजना से दो कदम आगे. 12वीं कक्षा में कौमर्स की छात्रा. शादी की गहमागहमी में तो परिचय बस औपचारिक ही रहा था, पर सप्ताह भर बाद ‘पीठफेरी’ पर संजना को लिवाने हर्ष गया तो संकोचों की बालुई दीवार को ढहते देर नहीं लगी. 3 दिनों का प्रवास था. एक दिन मैथान डैम की सैर का प्रोग्राम बना. डैम देख चुकने के बाद तीनों समीप के पार्क में चले गए. अचानक संजना की नजर दूर खड़े आइसक्रीम के ठेले पर पड़ी तो वह उठ कर आइसक्रीम लाने चली गई. बरगद की ओट. रिश्ते की अल्हड़ता और बुलबुल की आंखों से झरती महुआ की मादक गंध. हर्ष ने आगे बढ़ कर बुलबुल के होंठों पर चुंबन जड़ दिया.

हर्ष की उंगलियां अनायास ही होंठों पर चली गईं. बुलबुल के होंठों का गीलापन अभी भी कुंडली मारे बैठा था वहां. सिहरन से लरज कर हर्ष चहका, ‘‘जींसटौप के साथसाथ एक साड़ी भी ले लो. अपनी जैसी प्राइस रेंज की लेना, ठीक?’’

दोनों वापस एस्केलेटर पर सवार हो कर ऊपर की ओर बढ़ गए.

रमा सिलाई मशीन से उठ कर बाहर बरामदे में आ गई. मशीन पर लगातार 5 घंटे बैठने से पीठ और कमर अकड़ गई थी. सूई की ओर लगातार नजरें गड़ाए रखने से आंखें जल रही थीं. रात के 11 बज रहे थे. बाहर रात की काली चादर पर आधे चांद की धूसर चांदनी झर रही थी. अंधेरे के अदृश्य कोनों से झींगुरों का समवेत रुदन सन्नाटे को रहस्यमय बना रहा था.

चैन नहीं पड़ा तो वापस कोठरी में लौट आई. कोठरी के भीतर बिखरे सामान को देख कर हंसी छूट गई. मरम्मत की हुई पुरानी सिलाई मशीन. पास ही कपड़ों के ढेर, जो महाजनों के यहां से रफू के लिए आए थे. मरम्मत की हुई पुरानी खड़खड़ करती टेबल. बरतनभांडे, दीवार, छत, कपड़ेलत्ते, खाटखटोले सब के सब जैसे रफूमय हों, मरम्मत किए हुए.

रमा ब्याह कर पहली बार आई थी यहां तो उम्र 16 साल थी. रमेसर एक एल्युमिनियम कारखाने में लेबर था. जिंदगी की गाड़ी सालभर ठीकठाक चली. उस के बाद श्रमिक संगठनों व प्रबंधन के आपसी मल्लयुद्ध में लहूलुहान हो कर एशिया का यह सब से बड़ा संयंत्र भीष्म पितामह की तरह शरशय्या पर ऐसा पड़ा कि फिर उठ नहीं सका. हजारों श्रमिक बेकारी की अंधी सुरंग में धकेल दिए गए.

रमेसर ने काम के लिए बहुत हाथपांव मारे पर कहीं भी जुगाड़ नहीं बैठ पाया. अंत में वह रिकशा चलाने लगा. पर दमे का पुराना मरीज होने के कारण कितनी सवारियां खींच पाता भला? खाने के लाले पड़ने लगे. तब बचपन में सीखा सिलाई और रफूगीरी का शौकिया हुनर काम आया. रमा ने पुरानी सिलाई मशीन का जुगाड़ किया. धैर्य रखते हुए पास के रानीगंज व आसनसोल शहर के व्यापारियों से संपर्क साधा और इस तरह सिलाई व रफूगीरी के पेशे से जिंदगी की फटी चादर पर रफू लगाने की कवायद शुरू हुई.

फिर हर्ष पेट में आया. तबीयत ढीली रहने लगी. डाक्टरों के पास जाने की औकात कहां? देशी टोटकों को देह पर सहेजा. देखतेदेखते 9वां महीना आ गया. फूले पेट के भीतर हर्ष की कलाबाजियों से मरणासन्न रमा वेदना को दांत पर दांत जमा कर बर्दाश्त करने की नाकाम कोशिश करती रही, तभी डाक्टर ने ऐलान किया, ‘केस सीरियस हो गया है और जच्चा या बच्चा दोनों में से किसी एक को ही बचाया जा सकता है.’

रमा की आंखों के आगे अंधेरा छा गया, पर दूसरे ही पल उस ने दृढ़ता के साथ डाक्टर से कहा, ‘सिर्फ और सिर्फ बच्चे को बचा लेना हुजूर. रमेसर की गोद में हमारे प्यार की निशानी तो रह जाएगी जो इस सतरंगी दुनिया को देख सकेगी.’

डाक्टर ने हर्ष को जीवनदान दे दिया. रमा कोमा में चली गई. कोमा की यह स्थिति 15 दिनों तक बनी रही. डाक्टरों ने उस की जिंदगी की उम्मीद छोड़ दी थी. पर मौत के संग लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार रमा बच ही गई.

हर्ष पढ़नेलिखने में औसत था. पढ़ने से जी चुराता. स्कूल के नाम पर घर से निकल जाता और स्कूल न जा कर आवारा लड़कों के संग इधरउधर मटरगश्ती करता रहता. राजमार्ग के पास वाली पुलिया पर बैठ कर आतीजाती लड़कियों को छेड़ा करता. इन सब बातों को ले कर रमेसर अकसर उस की पिटाई कर देता.

‘तेरे भले के लिए ही कह रहे हैं रे,’ रमा उसे प्यार से समझाती, ‘पढ़लिख लेगा तो इज्जत की दो रोटियां मिलने लगेंगी, नहीं तो अभावों और जलालत की जिंदगी ही जीनी पड़ेगी.’

किसी तरह मैट्रिक पास हो गया तो रमा ने उसे कोलकाता भेज देने का निश्चय कर लिया. पुराने आवारा दोस्तों का साथ छूटेगा, तभी पढ़ाई के प्रति गंभीर हो सकेगा.

‘पर वहां का खर्च क्या आसमान से आएगा?’ रमेसर ने शंका जाहिर की तो रमा के चेहरे पर आत्मविश्वास की पुखराजी धूप खिल आई, ‘आसमान से कभी कोई चीज आई है जो अब आएगी? खर्चा हम पूरा करेंगे. आधा पेट खा कर रह लेंगे. जरूरतों में और कटौती कर लेंगे. चाहे जैसे भी हो, हर्ष को पढ़ाना ही होगा. उस की जिंदगी संवारनी होगी.’

रमा की जीवटता देख कर रमेसर चुप हो गया. हर्ष को कोलकाता भेज दिया गया. एक सस्ते से पीजी होम में रहने का इंतजाम हुआ. नए दोस्तों की संगत रंग लाने लगी. रमा पैसे लगातार भेजती रही. इन पैसों का जुगाड़ किन मुसीबतों से गुजर कर हो रहा है, हर्ष को कोई मतलब नहीं था. पहले इंटर, फिर बीए और फिर एमबीए. एकएक सीढि़यां तय करता हुआ हर्ष अपनी मंजिल तक पहुंच ही गया.

एमबीए की डिगरी का झोली में आ जाना टर्निंग पौइंट साबित हुआ हर्ष के लिए. पहले ही प्रयास में एक बड़ी स्टील कंपनी में जौब मिल गया. फिर सुंदर और पढ़ीलिखी संजना से ब्याह हो गया. कोलकाता में पोस्ंिटग और अलीपुर में कंपनी के आवासीय कौंप्लैक्स में शानदार फ्लैट. अरसे से दानेदाने को मुहताज किसी वंचित को जैसे अथाह संपदा के ढेर पर ही बैठा दिया गया हो. एकबारगी ढेर सारी सुविधाएं, ढेर सारा वैभव. सबकुछ छोटे से आयताकार क्रैडिट कार्ड में कैद.

उस स्टील कंपनी में जौब लगे 3 साल हो गए. जौब लगते ही हर्ष ने कहा था, ‘नई जगह है मम्मी, सैट होने में हमें वक्त लगेगा. सैट होते ही तुम्हें यहां अपने पास बुला लेंगे. इस जगह को हमेशा के लिए अलविदा कह देंगे.’

सुन कर अच्छा लगा. रफूगीरी का काम करतेकरते तन और मन पर इतने सारे रफू चस्पां हो गए हैं कि घिन्न आने लगी है इन से. अब वह भी सामान्य जिंदगी जीना चाहती है, जिस दिन भी हर्ष कहेगा, चल देगी. यहां कौन सी संपत्ति पड़ी है? सारी गृहस्थी एक छोटी सी गठरी में ही समा जाएगी.

लेकिन 3 साल गुजर गए. इसी बीच हर्ष कई बार आया यहां. 2 दिनों के प्रवास के डेढ़ दिन ससुराल में बीतते. फिर बिना कुछ कहे लौट जाता. ‘मम्मी, इस बार तुम्हें भी साथ चलना है,’ इस एक पंक्ति को सुनने के लिए तड़प कर रह जाती रमा.

‘तो क्या अपने साथ ले चलने के लिए हर्ष के आगे हाथ जोड़ते हुए, गिड़गिड़ाते हुए विनती करनी होगी? मां की तनहाइयों और मुसीबतों का एहसास खुद ही नहीं होना चाहिए उसे? न, वह ऐसा नहीं कर सकती. उस के जमीर को ऐसा कतई मंजूर नहीं होगा. सिर्फ एक बार, कम से कम एक बार तो हर्ष को मनुहार करनी ही होगी. अगर वह ऐसा नहीं कर सकता तो न करे. वह भी कहीं जाने के लिए मरी नहीं जा रही.’

शोरूम में आधे घंटे का वक्त और लगा. जींसटौप के साथ सीक्वेंस वर्क की खूबसूरत साड़ी भी खरीद ली. क्रैडिट कार्ड पर एक और गहरी खरोंच. हाथों में झूलते चमगादड़ों के गुच्छों में एक चमगादड़ और जुड़ गया. लिफ्ट से नीचे उतर कर दोनों शाही अंदाज से चलते हुए मुख्यद्वार तक आए ही थे कि हर्ष एकाएक चौंक पड़ा.

‘‘मम्मी को तो भूल ही गए. उन के लिए साड़ी,’’ हर्ष मिमियाया.

‘‘ओह,’’ संजना भी थम गई.

‘‘एक बार फिर वापस अप्सरा,’’ हर्ष हंसा और हड़बड़ा कर वापस भीतर जाने को मुड़ा तो संजना ने उसे बांह से पकड़ कर रोक लिया, ‘‘अब उतर ही आए हैं तो चलो न, बाहर के किसी स्टोर से ले लेंगे.’’

‘‘बाहर के स्टोर से?’’ हर्ष सकपका गया.

‘‘ऐनी प्रौब्लम?’’ संजना ने आंखें मटकाईं, ‘‘मां ही तो हैं, मैडम मिशेल ओबामा जैसी बड़ी तोप तो नहीं कि साउथ मौल की साड़ी न हुई तो शान में गुस्ताखी हो जाएगी. हुंह…वैसे भी उन जैसी कसबाई महिला को क्या फर्क पड़ेगा कि साड़ी कहां से खरीदी गई है. बाहर के स्टोर से खरीदने पर सस्ती भी तो मिलेगी, आखिर बचत ही तो होगी.’’

‘‘सचमुच, यह तो मैं ने सोचा ही नहीं. यू आर रियली जीनियस, जेन,’’ हर्ष संजना के तर्क पर मुग्ध हो उठा, ‘‘पर लेनी तो प्योर सिल्क ही है यार.’’

‘‘प्योर सिल्क?’’ संजना चौंक पड़ी, ‘‘प्योर सिल्क के माने जानते भी हो?’’

‘‘पिछली बार वहां गया था तो दीवाली पर प्योर सिल्क देने का वादा कर के आया था,’’ हर्ष अपराधबोध से भर गया.

‘‘उफ, तुम भी न…’’ संजना बड़बड़ाई, ‘‘इस तरह के उलटेसीधे वादे करने से पहले थोड़ा तो सोचना चाहिए था न.’’

‘‘अब कुछ नहीं हो सकता, जेन. वादा कर आया हूं न. नहीं दी तो मम्मी क्या सोचेंगी?’’

‘‘ठीक है. कोई उपाय करते हैं,’’ संजना सोच में पड़ गई.

बाइक अलीपुर की ओर दौड़ने लगी. पीछे बैठी संजना ने बायां हाथ आगे ले जा कर हर्ष की कमर को लपेट लिया. संजना की सांसों की मखमली खुशबू हर्ष को सनसनी से भर दे रही थी.

रासबिहारी मैट्रो स्टेशन के पास एक ठीकठाक शोरूम के आगे बाइक रुकी. दोनों भीतर चले आए. उन के हाथों में भारीभरकम भड़कीले पैकेट्स देख कर काउंटर के पीछे बैठे मुखर्जी बाबू मन ही मन चौंके. ऐसे हाईफाई ग्राहक का उन के साधारण से शोरूम में क्या काम?

‘‘वैलकम मैडम, क्या सेवा करें?’’ हड़बड़ा कर खड़े हो गए मुखर्जी बाबू.

‘‘प्योर सिल्क की एक साड़ी लेनी है हमें. कुछ बढि़या डिजाइनें दिखाइए.’’

मुखर्जी बाबू ने सहायक को संकेत दिया. देखते ही देखते काउंटर पर दसियों साडि़यां आ गिरीं. मुखर्जी बाबू उत्साहपूर्वक एकएक साड़ी खोल कर डिजाइन व रंगों की प्रशंसा करने लगे. संजना ने साड़ी पर चिपके प्राइस टैग पर नजर डाली, 3 से 4 हजार की थीं साडि़यां. उस ने हर्ष की ओर देखा.

‘‘तनिक कम रेंज की दिखाइए दादा,’’ संजना धीमे से बोली.

‘‘मैडम, इस से कम प्राइस में अच्छी क्वालिटी की प्योर सिल्क नहीं आएगी. सिंथेटिक दिखा दें?’’ मुखर्जी बाबू सोच रहे थे, ‘इतना मालदार आसामी प्राइस देख कर हड़क क्यों रहा है?’

‘‘प्योर सिल्क ही लेनी है,’’ संजना रुखाई से बोली. फिर तमतमाई आंखों से हर्ष की ओर देखा. दोनों अंगरेजी में बातें करने लगे.

‘‘तुम्हारी मम्मी का दिमाग सनक गया है. माना 40-45 की ही हैं अभी, पर हमारे समाज में विधवा स्त्री को ज्यादा कीमती और फैशनेबल साड़ी पहनना वर्जित है. यह बात उन्हें सोचनी चाहिए. मुंह उठाया और प्योर सिल्क मांग लिया, हुंह. प्योर सिल्क का दाम भी पता है? प्योर सिल्क पहनने का चाव चढ़ा है.’’

‘‘आय एम सौरी, जेन. वायदा कर चुका हूं न. अब कोई उपाय नहीं,’’

हर्ष ने भूल स्वीकारते हुए अफसोस जाहिर किया.

उसे अच्छी तरह याद है. उस दिन दोस्तों के संग घूमफिर कर घर लौटा तो रात के 10 बज रहे थे. मम्मी बिना खाए उस का इंतजार कर रही थीं. दोनों ने साथ भोजन किया. फिर वह मम्मी की गोद में सिर रख कर लेट गया. नीचे मम्मी की गोद की अलौकिक ऊष्मा. ऊपर चेहरे पर उस के ममता भरे हाथों का शीतल स्पर्श. न जाने कैसा सम्मोहन घुला था इन में कि झपकी आ गई. काफी दिनों के बाद एक सुकून भरी नींद. 3 घंटे बाद अचानक नींद टूटी तो देखा, मम्मी ज्यों की त्यों बैठी बालों में उंगलियां फिरा रही हैं.

उन्हीं क्षणों के दौरान उस के मुंह से निकल गया, ‘इस बार दीवाली पर अच्छी सी प्योर सिल्क की साड़ी दूंगा तुम्हें.’ यह सुन कर मम्मी सिर्फ मुसकरा भर दी थीं.

हर्ष और जेन के बीच बातचीत भले ही अंगरेजी में हो रही थी और मुखर्जी बाबू को अंगरेजी की समझ कम थी, फिर भी उन्हें ताड़ते देर नहीं लगी.

‘‘मैडम,’’ मुखर्जी बाबू ने सिर खुजलाते हुए अत्यंत विनम्रतापूर्वक कहा, ‘‘यदि बुरा न मानें तो क्या हम पूछ सकते हैं कि साड़ी किस के लिए ले रही हैं?’’

इस के पहले कि इस अटपटे प्रश्न पर दोनों हत्थे से उखड़ जाते, मुखर्जी बाबू ने झट से स्पष्टीकरण भी पेश कर दिया, ‘‘न, न, मैडम, अन्यथा न लें, सिर्फ इसलिए पूछा कि हम उस के अनुकूल दूसरा किफायती औप्शन बता सकें.’’

संजना ने हिचकिचाते हुए मन की गांठ खोल दी, ‘‘साहब की विडो (विधवा) मदर के लिए.’’

पलक झपकते मुखर्जी बाबू के जेहन में पूरा माजरा बेपरदा हो गया. मैडम ने साहब की मां को ‘मम्मी’ नहीं कहा, ‘सासूमां’ भी नहीं कहा, बल्कि ‘साहब की विडो मदर’ कहा और साहब कार्टून की तरह खड़ा दुम हिलाता ‘खीखी’ करता रहा.

‘‘आप का काम हो गया,’’ उन्होंने सहायक को कुछ अबूझ से संकेत दिए. थोड़ी देर में ही काउंटर पर प्योर सिल्क का नया बंडल दस्ती बम की तरह आ गिरा. एक से एक खूबसूरत प्रिंट. एक से एक लुभावने कलर.

‘‘वैसे तो ये साडि़यां भी 4 हजार से ऊपर की ही हैं मैडम, पर हम इन्हें सिर्फ 800 रुपए में सेल कर रहे हैं. लोडिंगअनलोडिंग के समय हुक लग जाने से या चूहे के काट देने से माल में छोटामोटा छेद हो जाता है. हमारा ट्रैंड कारीगर प्लास्टिक सर्जरी कर के उस नुक्स को इस माफिक ठीक करता है कि साड़ी एकदम नई हो जाती है. सरसरी नजर से देखने पर नुक्स बिलकुल भी पता नहीं चलेगा.’’

‘‘यानी कि रफू की हुई,’’ संजना हकला उठी.

‘‘रफू नहीं मैडम, प्लास्टिक सर्जरी बोलिए. रफू तो देहाती शब्द है. आप खुद देखिए न.’’

सचमुच, बिलकुल नई और बेदाग साडि़यां. जहांतहां छोटेछोटे डिजाइनर तारे नजर आ रहे थे जो साड़ी की खूबसूरती को बढ़ा ही रहे थे. सरसरी तौर पर कोई भी नुक्स नहीं दिख रहा था साडि़यों में, दोनों की बाछें खिल उठीं. आंखों में ‘यूरेकायूरेका’ के भाव उभर आए, मन तनावमुक्त हो गया जैसे जेन का.

आननफानन ढेर में से एक साड़ी चुनी गई और पैक हो कर आ गई. यह नया पैकेट मौल के पैकेटों के बीच ऐसा लग रहा था जैसे प्राइवेट स्कूल के बच्चों के बीच किसी सरकारी स्कूल का बच्चा आ घुसा हो.

‘‘मैं ने कहा था न, सही मौका आते ही क्रैडिट कार्ड की खरोंचों पर रफू लगा दूंगी. देख लो, तुम्हारा वादा भी पूरा हो गया और चिराग पर पूरे 3 हजार का रफू भी लग गया.’’

‘‘यू आर जीनियस, जेन,’’ हर्ष की प्रशंसा सुन कर संजना खिलखिलाई तो बालों की कई महीन लटें पहले की ही तरह आंखों के सामने से होती हुई होंठों तक चली आईं. बाइक की ओर बढ़ते हुए दोनों के चेहरे खिले हुए थे.

Family Story

Short Story in Hindi: मेरा संसार

Short Story in Hindi: प्यार की किश्ती में सवार मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरा साहिल कौन है, रचना या ज्योति? एक तरफ रचना जो सिर्फ अपने बारे में सोचती थी. दूसरी ओर ज्योति, जिस की दुनिया मुझ तक और मेरी बेटी तक सीमित थी.

आज पूरा एक साल गुजर गया. आज के दिन ही उस से मेरी बातें बंद हुई थीं. उन 2 लोगों की बातें बंद हुई थीं, जो बगैर बात किए एक दिन भी नहीं रह पाते थे. कारण सिर्फ यही था कि किसी ऐसी बात पर वह नाराज हुई जिस का आभास मुझे आज तक नहीं लग पाया. मैं पिछले साल की उस तारीख से ले कर आज तक इसी खोजबीन में लगा रहा कि आखिर ऐसा क्या घट गया कि जान छिड़कने वाली मुझ से अब बात करना भी पसंद नहीं करती?

कभीकभी तो मुझे यह भी लगता है कि शायद वह इसी बहाने मुझ से दूर रहना चाहती हो. वैसे भी उस की दुनिया अलग है और मेरी दुनिया अलग. मैं उस की दुनिया की तरह कभी ढल नहीं पाया. सीधासादा मेरा परिवेश है, किसी तरह का कोई मुखौटा पहन कर बनावटी जीवन जीना मुझे कभी नहीं आया. सच को हमेशा सच की तरह पेश किया और जीवन के यथार्थ को ठीक उसी तरह उकेरा, जिस तरह वह होता है.

यही बात उसे पसंद नहीं आती थी और यही मुझ से गलती हो जाती. वह चाहती है दिल बहलाने वाली बातें, उस के मन की तरह की जाने वाली हरकतें, चाहे वे झूठी ही क्यों न हों, चाहे जीवन के सत्य से वह कोसों दूर हों. यहीं मैं मात खा जाता रहा हूं. मैं अपने स्वभाव के आगे नतमस्तक हूं तो वह अपने स्वभाव को बदलना नहीं चाहती. विरोधाभास की यह रेखा हमारे प्रेम संबंधों में हमेशा आड़े आती रही है और पिछले वर्ष उस ने ऐसी दरार डाल दी कि अब सिर्फ यादें हैं और इंतजार है कि उस का कोई समाचार आ जाए.

जीवन को जीने और उस के धर्म को निभाने की मेरी प्रकृति है अत: उस की यादों को समेटे अपने जैविक व्यवहार में लीन हूं, फिर भी हृदय का एक कोना अपनी रिक्तता का आभास हमेशा देता रहता है. तभी तो फोन पर आने वाली हर काल ऐसी लगती हैं मानो उस ने ही फोन किया हो. यही नहीं हर एसएमएस की टोन मेरे दिल की धड़कन बढ़ा देती हैं, किंतु जब भी देखता हूं मोबाइल पर उस का नाम नहीं मिलता.

मेरी इस बेचैनी और बेबसी का रत्तीभर भी उसे ज्ञान नहीं होगा, यह मैं जानता हूं क्योंकि हर व्यक्ति सिर्फ अपने बारे में सोचता है और अपनी तरह के विचारों से अपना वातावरण तैयार करता है व उसी की तरह जीने की इच्छा रखता है. मेरे लिए मेरी सोच और मेरा व्यवहार ठीक है तो उस के लिए उस की सोच और उस का व्यवहार उत्तम है. यही एक कारण है हर संबंधों के बीच खाई पैदा करने का. दूरियां उसे समझने नहीं देतीं और मन में व्यर्थ विचारों की ऐसी पोटली बांध देती है जिस में व्यक्ति का कोरा प्रेममय हृदय भी मन मसोस कर पड़ा रह जाता है.

जहां जिद होती है, अहम होता है, गुस्सा होता है. ऐसे में बेचारा प्रेम नितांत अकेला सिर्फ इंतजार की आग में झुलसता रहता है, जिस की तपन का एहसास भी किसी को नहीं हो पाता. मेरी स्थिति ठीक इसी प्रकार है. इन 365 दिनों में एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब उस की याद न आई हो, उस के फोन का इंतजार न किया हो. रोज उस से बात करने के लिए मैं अपने फोन के बटन दबाता हूं किंतु फिर नंबर को यह सोच कर डिलीट कर देता हूं कि जब मेरी बातें ही उसे दुख पहुंचाती हैं तो क्यों उस से बातों का सिलसिला दोबारा प्रारंभ करूं?

हालांकि मन उस से संपर्क करने को उतावला है. बावजूद उस के व्यवहार ने मेरी तमाम प्रेमशक्ति को संकुचित कर रख दिया है. मन सोचता है, आज जैसी भी वह है, कम से कम अपनी दुनिया में व्यस्त तो है, क्योंकि व्यस्त नहीं होती तो उस की जिद इतने दिन तक तो स्थिर नहीं रहती कि मुझ से वह कोई नाता ही न रखे. संभव है मेरी तरह वह भी सोचती हो, किंतु मुझे लगता है यदि वह मुझ जैसा सोचती तो शायद यह दिन कभी देखने में ही नहीं आता, क्योंकि मेरी सोच हमेशा लचीली रही है, तरल रही है, हर पात्र में ढलने जैसी रही है, पर अफसोस वह आज तक समझ नहीं पाई.

मई का सूरज आग उगल रहा है. इस सूनी दोपहर में मैं आज घर पर ही हूं. एक कमरा, एक किचन का छोटा सा घर और इस में मैं, मेरी बीवी और एक बच्ची. छोटा घर, छोटा परिवार. किंतु काम इतने कि हम तीनों एक समय मिलबैठ कर आराम से कभी बातें नहीं कर पाते. रोमी की तो शिकायत रहती है कि पापा का घर तो उन का आफिस है. मैं भी क्या करूं? कभी समझ नहीं पाया. चूंकि रोमी के स्कूल की छुट्टियां हैं तो उस की मां ज्योति उसे ले कर अपने मायके चली गई है.

पिछले कुछ वर्षों से ज्योति अपनी मां से मिलने नहीं जा पाई थी. मैं अकेला हूं. यदि गंभीरता से सोच कर देखूं तो लगता है कि वाकई मैं बहुत अकेला हूं, घर में सब के रहने और बाहर भीड़ में रहने के बावजूद. किंतु निरंतर व्यस्त रहने में उस अकेलेपन का भाव उपजता ही नहीं. बस, महसूस होता है तमाम उलझनों, समस्याओं को झेलते रहने और उस के समाधान में जुटे रहने की क्रियाओं के बीच, क्योंकि जिम्मेदारियों के साथ बाहरी दुनिया से लड़ना, हारना, जीतना मुझे ही तो है.

गरमी से राहत पाने का इकलौता साधन कूलर खराब हो चुका है जिसे ठीक करना है, अखबार की रद्दी बेचनी है, दूध वाले का हिसाब करना है, ज्योति कह कर गई थी. रोमी का रिजल्ट भी लाना है और इन सब से भारी काम खाना बनाना है, और बर्तन भी मांजना है. घर की सफाई पिछले 2 दिनों से नहीं हुई है तो मकडि़यों ने भी अपने जाले बुनने का काम शुरू कर दिया है.

उफ…बहुत सा काम है…, ज्योति रोज कैसे सबकुछ करती होगी और यदि एक दिन भी वह आराम से बैठती है तो मेरी आवाज बुलंद हो जाती है…मानो मैं सफाईपसंद इनसान हूं…कैसा पड़ा है घर? चिल्ला उठता हूं.

ज्योति न केवल घर संभालती है, बल्कि रोमी के साथसाथ मुझे भी संभालती है. यह मैं आज महसूस कर रहा हूं, जब अलमारी में तमाम कपडे़ बगैर धुले ठुसे पडे़ हैं. रोज सोचता हूं, पानी आएगा तो धो डालूंगा. मगर आलस…पानी भी कहां भर पाता हूं, अकेला हूं तो सिर्फ एक घड़ा पीने का पानी और हाथपैर, नहाधो लेने के लिए एक बालटी पानी काफी है.

ज्योति आएगी तभी सलीकेदार होगी जिंदगी, यही लगता है. तब तक फक्कड़ की तरह… मजबूरी जो होती है. सचमुच ज्योति कितना सारा काम करती है, बावजूद उस के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं देखी. यहां तक कि कभी उस ने मुझ से शिकायत भी नहीं की. ऊपर से जब मैं दफ्तर से लौटता हूं तो थका हुआ मान कर मेरे पैर दबाने लगती है. मानो दफ्तर जा कर मैं कोई नाहर मार कर लौटता हूं. दफ्तर और घर के दरम्यान मेरे ज्यादा घंटे दफ्तर में गुजरते हैं. न ज्योति का खयाल रख पाता हूं, न रोमी का. दायित्वों के नाम पर महज पैसा कमा कर देने के कुछ और तो करता ही नहीं.

फोन की घंटी घनघनाई तो मेरा ध्यान भंग हुआ.

‘‘हैलो…? हां ज्योति…कैसी हो?…रोमी कैसी है?…मैं…मैं तो ठीक हूं…बस बैठा तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था. अकेले मन नहीं लगता यार…’’

कुछ देर बात करने के बाद जब ज्योति ने फोन रखा तो फिर मेरा दिमाग दौड़ने लगा. ज्योति को सिर्फ मेरी चिंता है जबकि मैं उसे ले कर कभी इतना गंभीर नहीं हो पाया. कितना प्रेम करती है वह मुझ से…सच तो यह है कि प्रेम शरणागति का पर्याय है. बस देते रहना उस का धर्म है.

ज्योति अपने लिए कभी कुछ मांगती नहीं…उसे तो मैं, रोमी और हम से जुडे़ तमाम लोगों की फिक्र रहती है. वह कहती भी तो है कि यदि तुम सुखी हो तो मेरा जीवन सुखी है. मैं तुम्हारे सुख, प्रसन्नता के बीच कैसे रोड़ा बन सकती हूं? उफ, मैं ने कभी क्यों नहीं इतना गंभीर हो कर सोचा? आज मुझे ऐसा क्यों लग रहा है? इसलिए कि मैं अकेला हूं?

रचना…फिर उस की याद…लड़ाई… गुस्सा…स्वार्थ…सिर्फ स्वयं के बारे में सोचनाविचारना….बावजूद मैं उसे प्रेम करता हूं? यही एक सत्य है. वह मुझे समझ नहीं पाई. मेरे प्रेम को, मेरे त्याग को, मेरे विचारों को. कितना नजरअंदाज करता हूं रचना को ले कर अपने इस छोटे से परिवार को? …ज्योति को, रोमी को, अपनी जिंदगी को.

बिजली गुल हो गई तो पंखा चलतेचलते अचानक रुक गया. गरमी को भगाने और मुझे राहत देने के लिए जो पंखा इस तपन से संघर्ष कर रहा था वह भी हार कर थम गया. मैं समझता हूं, सुखी होने के लिए बिजली की तरह निरंतर प्रेम प्रवाहित होते रहना चाहिए, यदि कहीं व्यवधान होता है या प्रवाह रुकता है तो इसी तरह तपना पड़ता है, इंतजार करना होता है बिजली का, प्रेम प्रवाह का.

घड़ी पर निगाहें डालीं तो पता चला कि दिन के साढे़ 3 बज रहे हैं और मैं यहां इसी तरह पिछले 2 घंटों से बैठा हूं. आदमी के पास कोई काम नहीं होता है तो दिमाग चौकड़ी भर दौड़ता है. थमने का नाम ही नहीं लेता. कुछ चीजें ऐसी होती हैं जहां दिमाग केंद्रित हो कर रस लेने लगता है, चाहे वह सुख हो या दुख. अपनी तरह का अध्ययन होता है, किसी प्रसंग की चीरफाड़ होती है और निष्कर्ष निकालने की उधेड़बुन. किंतु निष्कर्ष कभी निकलता नहीं क्योंकि परिस्थितियां व्यक्ति को पुन: धरातल पर ला पटकती हैं और वर्तमान का नजारा उस कल्पना लोक को किनारे कर देता है. फिर जब भी उस विचार का कोना पकड़ सोचने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है तो नईनई बातें, नएनए शोध होने लगते हैं. तब का निष्कर्ष बदल कर नया रूप धरने लगता है.

सोचा, डायरी लिखने बैठ जाऊं. डायरी निकाली तो रचना के लिखे कुछ पत्र उस में से गिरे. ये पत्र और आज का उस का व्यवहार, दोनों में जमीनआसमान का फर्क है. पत्रों में लिखी बातें, उन में दर्शाया गया प्रेम, उस के आज के व्यवहार से कतई मेल नहीं खाते. जिस प्रेम की बातें वह किया करती है, आज उसी के जरिए अपना सुख प्राप्त करने का यत्न करती है. उस के लिए पे्रेम के माने हैं कि मैं उस की हरेक बातों को स्वीकार करूं. जिस प्रकार वह सोचती है उसी प्रकार व्यवहार करूं, उस को हमेशा मानता रहूं, कभी दुख न पहुंचाऊं, यही उस का फंडा है.

Short Story in Hindi

Hindi Long Story: सहारे की तलाश

Hindi Long Story: दिल आज फिर दिमाग से विद्रोह कर बैठा. क्या ऐसी ही जिंदगी की उम्मीद की थी उस ने? क्या ऐसे ही जीवनसाथी की कल्पना की थी उस ने? खुद वह कितनी संभावनाओं से भरी हुई थी, अपना रास्ता तलाश कर मंजिल तक पहुंचना वह जानती है, रिश्तों के तारों के छोर सहला कर उन्हें जोड़ना भी उसे आता है. जीवनसाथी ऐसा हो जिस पर नाज कर सके. उस का कोई तो रूप ऐसा हो, वह शारीरिक रूप से ताकतवर हो या मानसिक रूप से परिपक्व हो, खुला व्यक्तित्व हो या फिर आर्थिक रूप से हर सुख दे सके या फिर भावनात्मक रूप से इतना प्रेमी हो कि उस के माधुर्य में डूब जाओ. कोई तो कारण होना चाहिए किसी पर आसक्ति का. प्यार सिर्फ साथ रहने भर से हो सकता है, एकदूसरे की कुछ मूलभूत जरूरतें पूरी करने से हो सकता है. लेकिन आसक्ति, बिना काण नहीं हो सकती.

छलकपट से भरा दिमाग, कभी किसी को निस्वार्थ प्यार नहीं कर सकता और न पा सकता है. ऐसे इंसान पर प्यार लुटाना लुटने जैसा प्रतीत होता है. दिमाग समझता है जिंदगी को नहीं बदल सकते हम. इंसान को नहीं बदल सकते. पति की काबिलीयत, स्वभाव या क्षमता को घटाबढ़ा नहीं सकते, सबकुछ ले कर चालाकी से अपनी टांग ऊपर रखने की आदत को नहीं बदल सकते.

पर खुद को बदल सकते हैं, खुद के नजरिए को बदल सकते हैं. दिमाग की यह घायल समझ दिल से आंसुओं के सैलाब में बह जाती है जब दिल नहीं सुन पाता है किसी की, जब दिल खुद से ही तर्क करने लग जाता है. पूरी जिंदगी रीत गई, अब क्या समेटना है. अब तक जिंदगी के हर पहलू को अपने सकारात्मक नजरिए से देखती रही. पर कब तक दिल में उठ रही नफरत को दबाती रहती. क्या किसी ऐसे ही जीवनसाथी की कल्पना की थी उस ने जो सिर्फ बिस्तर पर ही रोमांटिक प्रणयी हो.

आज वैभवी के दिल के तार झनझना गए थे. उस के पिताजी ने अपनी छोटी सी जायदाद के 2 हिस्से कर अपने दोनों बच्चों में बांट दिए थे. भैया का परिवार मुंबई में रहता था. उस की नौकरी वहीं पर थी. वह खुद दिल्ली में रहती थी और मांपिताजी चंडीगढ़ में रहते थे. डाक्टर ने पिताजी को हर्निया का औपरेशन कराने के लिए कह दिया था. पिताजी काफी समय से तकलीफ में थे. जब वह पिछली बार चंडीगढ़ गई थी तो मां ने पिताजी की तकलीफ के बारे में उसे बताया था. वह विचलित हो गई थी. उस ने भैया से फोन पर बात की तो भाई ने यह कह कर मजबूरी जता दी थी कि इतनी छुट्टी उसे एकसाथ नहीं मिल सकती कि वह चंडीगढ़ जा कर औपरेशन करा सके और साथ ही मां से तेरी भाभी की बिलकुल नहीं बनती, इसलिए मुंबई ला कर भी औपरेशन की बात नहीं सोच सकता.

‘‘वैसे भी तू जानती है वैभवी, छोटा सा फ्लैट, पढ़ने वाले बच्चे, बीमार आदमी के साथ बडे़ शहर में बहुत मुश्किल हो जाती है,’’ भैया ने मजबूरी जताते हुए कहा.

‘‘तो फिर क्या पिताजी को ऐसे ही तकलीफ में मरने के लिए छोड़ दें,’’ वैभवी के स्वर में तल्खी आ गई थी.

‘‘तो फिर तू चली जा या फिर प्रकाश चला जाए. उस की तो सरकारी नौकरी है, छुट्टी मिलने में इतनी दिक्कत भी नहीं होगी,’’ उस के स्वर की तल्खी भांप कर वह भी चिढ़ गया था.

‘‘लेकिन भैया, बेटे के होते हुए दामाद का एहसान लेना क्या ठीक है?’’ वह अपने को संयमित कर लाचारी से बोली थी.

‘‘क्यों? जब हिस्सा मिला तब तो बेटीदामाद जैसी कोई बात नहीं हुई और जब जिम्मेदारी निभाने की बात आई तो वह दामाद हो गया,’’ भैया भुन्नाता हुआ बोला.

वह दुखी हो गई थी. दिल किया कि कोई तीखा सा जवाब दे दे. पर चुप रह गई. आखिर गलत भी नहीं कहा था. पर यह सब कहने का अधिकार भी भैया को तब ही था जब वह अपने कर्तव्य का हर समय पालन करता.

वह तो जायदाद में हिस्सा बिलकुल भी नहीं चाहती थी. उस ने पिताजी को बहुत मना भी किया था पर एक तो मांपिताजी की जिद और दूसरे, प्रकाश की चाहत भांप कर उस ने हां बोल दी. सोचा, जायदाद पा कर ही सही, प्रकाश उस के मांपिताजी के लिए नरम रुख अपना ले. इस के अलावा जरूरत पड़ने पर उसे चंडीगढ़ जाने में भी आसानी हो जाएगी. एकदम मना नहीं कर पाएगा प्रकाश उसे. पर भैया के व्यवहार में तब से तटस्थता आ गई थी. भाभी तो हमेशा से ही तटस्थ थीं. पर भैया का व्यवहार वैसे सामान्य था. उसे अपनी परवा नहीं थी. बस, मांपिताजी का ध्यान रख ले भैया, इसी से वह खुश रहती. पर भैया के जवाब से उस का दिल टूट गया था. भैया का अगर जवाब ऐसा है तो प्रकाश का जवाब तो वह पहले से ही जानती है. फिर भी उस ने सोचा एक बार तो प्रकाश से बात कर के देख ले. उस से और मां से पिताजी के औपरेशन का तामझाम नहीं संभलेगा. कोई भी परेशानी खड़ी हो गई तो एक पुरुष का साथ तो होना ही चाहिए औपरेशन के समय. प्रकाश का मूड ठीक सा भांप कर एक दिन उस ने प्रकाश से बात कर ही ली.

‘‘पिताजी की तकलीफ बढ़ती ही जा रही है प्रकाश, कल भी बात हुई थी मां से. डाक्टर कह रहे हैं कि समय से औपरेशन करवा लो.’’

‘‘हां तो करवा लें,’’ प्रकाश के चेहरे के भाव एकदम से बदल गए थे.

‘‘तुम चलोगे चंडीगढ़, कुछ दिन की छुट्टी ले कर?’’

‘‘क्यों, उन के बेटे का क्या हुआ?’’

‘‘किस तरह से बोल रहे हो, प्रकाश. बात की थी मैं ने भैया से, छुट्टी नहीं मिल रही उन्हें. थोड़े दिन की छुट्टी तुम ले लो न. औपरेशन करवा कर तुम आ जाना. फिर कुछ दिन मैं रह लूंगी. फिर थोड़े दिन के लिए भैया भी आ जाएंगे. तो पिताजी की देखभाल हो जाएगी.’’

‘‘मुझे भी छुट्टी नहीं मिलेगी अभी,’’ कह कर प्रकाश उठ कर बैडरूम की तरफ चल दिया, ‘‘और हां,’’ वह रुक कर बोला, ‘‘तुम भी वहां लंबा नहीं रह सकती हो, यहां खानेपीने की दिक्कत हो जाएगी मुझे,’’ इतना कह कर प्रकाश चला गया.

उस ने भी हार नहीं मानी. और उस के पीछे चल दी, चलतेचलते उस ने कहा, ‘‘प्रकाश, उन्होंने हम दोनों भाईबहन को अपना सबकुछ बांट दिया है तो हमारा भी तो उन के प्रति फर्ज बनता है.’’

‘‘तो,’’ प्रकाश तल्खी से बोला, ‘‘बेटी को ही दिया है क्या, बेटे को नहीं दिया, वह क्यों नहीं आ जाता?’’

‘‘उफ,’’ वैभवी का सिर भन्ना गया. प्रकाश के तर्क इतने अजीबोगरीब होते हैं कि जवाब में कुछ भी कहना मुश्किल है. संवेदनहीनता की पराकाष्ठा तक चला जाता है. दिल घायल हो गया. पिताजी के 2 अपंग सहारे प्रकाश और भैया जिन पर पिताजी ने अपना सबकुछ लुटा दिया, जिन्हें पिताजी ने अपना आधार स्तंभ समझा, आज कैसा बदल गए हैं. इस के बाद उस ने प्रकाश से कोई बात नहीं की. चुपचाप अपना रिजर्वेशन करवाया और जाने की तैयारी करने लगी. प्रकाश के तने हुए चेहरे की परवा किए बिना वह चंडीगढ़ चली गई. उस की बेटी इंजीनियर थी और जौब कर रही थी. 2 दिन बाद वह कुछ दिनों की छुट्टी में घर आ रही थी. वैभवी ने उसे वस्तुस्थिति से अवगत करवाया और चंडीगढ़ चली गई. मां ने वैभवी को देखा तो उन्हें थोड़ा सुकून मिला.

वैभवी को देख मां ने कहा, ‘‘दामाद जी नहीं आए?’’

‘‘तुम्हारा बेटा आया जो दामाद आता,’’ वह चिढ़ कर बोली, ‘‘बेटी काफी नहीं है तुम्हारे लिए?’’

मां चुप हो गईं. एक वाक्य से ही सबकुछ समझ में आ गया था. पिताजी ने कुछ नहीं पूछा. दुनिया देखी थी उन्होंने. फिर कुछ पूछना और उस पर अफसोस करने का मतलब था पत्नी के दुख को और बढ़ाना. सबकुछ समझ कर भी ऐसा दिखाया जैसे कुछ हुआ ही न हो. पिताजी का जिस डाक्टर से इलाज चल रहा था उन से जा कर वह मिली. औपरेशन का दिन तय हो गया. उस ने प्रकाश व भाई को औपचारिक खबर दे दी. डरतेडरते उस ने पिताजी का औपरेशन करवा दिया. मन ही मन डर रही थी कि कोई ऊंचनीच हो गई तो क्या होगा. पर पिताजी का औपरेशन सहीसलामत हो गया, उस की जान में जान आई. पिताजी को जिस दिन अस्पताल से घर ले कर आई, मन में संतोष था कि वह उन के कुछ काम आ पाई. पिताजी को बिस्तर पर लिटा कर, लिहाफ उढ़ा कर उन के पास बैठ गई. उन के चेहरे पर उस के लिए कृतज्ञता के भाव थे जो शायद बेटे के लिए नहीं होते. आज समाज में बेटी को पिता की जायदाद में हक जरूर मिल गया था लेकिन मातापिता अपना अधिकार आज भी बेटे पर ही समझते हैं.

पिताजी ने आंखें बंद कर लीं. वह चुपचाप पिताजी के निरीह चेहरे को निहारने लगी. दबंग पिताजी को उम्र ने कितना बेबस व लाचार बना दिया था. भैया व प्रकाश, पिताजी के 2 सहारे कहां हैं? वह सोचने लगी, उसे व भैया को पिताजी ने कितने प्यार से पढ़ायालिखाया, योग्य बनाया, वह लड़की होते हुए भी अपने पति की इच्छा के विरुद्ध अपने पिता की जरूरत पर आ गई. लेकिन भैया, वह पुरुष होते हुए भी अपनी पत्नी की इच्छा के विरुद्ध अपने पिता के काम नहीं आ पाए. सच है रिश्ते तो स्त्रियां ही संभालती हैं, चाहे फिर वह मायके के हों या ससुराल के. लेकिन पुरुष, वह ससुराल के क्या, वह तो अपने सगे रिश्ते भी नहीं संभाल पाता और उस का ठीकरा भी स्त्री के सिर फोड़ देता है. पिताजी कुछ दिन बिस्तर पर रहे. उन की तीमारदारी मां और वह दोनों मिल कर कर रही थीं. भैया ने पापा की चिंता इतनी ही की थी कि एक दिन फुरसत से मां व पिताजी से फोन पर बातचीत करने के बाद मुझ से कहा, ‘‘कुछ जरूरत हो तो बता देना, कुछ रुपए भिजवा देता हूं.’’

‘‘उस की जरूरत नहीं है, भैया,’’ रुपए का तो पिताजी ने भी अपने बुढ़ापे के लिए इंतजाम किया हुआ है. उन्हें तो तुम्हारी जरूरत थी. उस ने कुछ कहना चाहा पर रिश्तों में और भी कड़वाहट घुल जाएगी, सोच कर चुप्पी लगा गई और तभी फोन कट गया.

वैभवी 15 दिन रह कर घर वापस आ गई. प्रकाश का मुंह फूला हुआ था. उस ने परवा नहीं की. चुपचाप अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई. प्रकाश ने पिताजी की कुशलक्षेम तक नहीं पूछी पर उस की सास का फोन उस के लिए भी और उस के मांपिताजी के लिए भी आया, उसे अच्छा लगा. सभी बुजुर्ग शायद एकदूसरे की स्थिति को अच्छी तरह से समझते हैं. उस की बेटी वापस अपनी नौकरी पर चली गई थी. पिताजी की हालत में निरंतर सुधार हो रहा था, इसलिए वह निश्ंिचत थी. उस के सासससुर देहरादून में रहते थे. सबकुछ ठीक चल रहा था कि तभी एक दिन उस की सास का बदहवास सा फोन आया. उस के ससुरजी की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा था. वे दोनों तुरंत देहरादून के लिए निकल पड़े. प्रकाश का भाई अविनाश, जो पुणे में रहता था, अपनी पत्नी के साथ देहरादून पहुंच गया. पता चला कि प्रकाश के पापा को दिल का दौरा पड़ा था. एंजियोग्राफी से पता चला कि उन की धमनियों में रुकावट थी. अब एंजियोप्लास्टी होनी थी.

अविनाश की पत्नी छवि स्कूल में पढ़ाती थी, वह 2-4 दिन की छुट्टी ले कर आई थी. पापा को तो एंजियोप्लास्टी और उस के बाद की देखभाल के लिए लंबे समय की जरूरत थी. प्रकाश के पापा अभी अस्पताल में ही थे. छवि की छुट्टियां खत्म हो गई थीं. वह वापस जाने की तैयारी करने लगी.

‘‘मैं भी चलता हूं, भैया,’’ अविनाश बोला, ‘‘छवि अकेले कैसे जाएगी?’’

‘लेकिन अविनाश, पापा को लंबी देखभाल और इलाज की जरूरत है. कुछ दिन हम रुक लेते हैं, कुछ दिन तुम छुट्टी ले कर आ जाओ,’’ प्रकाश बोला.

‘‘भैया, हम दोनों की तो प्राइवेट नौकरी है, इतनी लंबी छुट्टियां नहीं मिल पाएंगी और मम्मीपापा को पुणे भी नहीं ले जा सकता, छवि भी नौकरी करती है,’’ कह कर उन्हें कुछ कहने का मौका दिए बिना दोनों पतिपत्नी पुणे के लिए निकल गए.

अब प्रकाश पसोपेश में पड़ गया. बड़ा भाई होने के नाते वह अपनी जिम्मेदारियों से नहीं भाग सकता था. उस ने सहारे के लिए वैभवी की तरफ देखा. पर वहां तटस्थता के भाव थे. मौका पा कर धीरे से बोला, ‘‘वैभवी, मम्मीपापा को अपने साथ ले चलते हैं, वहां आराम से इलाज और देखभाल हो जाएगी. यहां तो हम इतना नहीं रुक पाएंगे. या फिर एंजियोप्लास्टी करवा कर मैं चला जाता हूं, तुम रुक जाओ, मैं आताजाता रहूंगा.’’

‘‘क्यों? मैं क्यों रुकूं, फालतू हूं क्या? नौकरी नहीं कर रही हूं? तो क्या मेरी ही ड्यूटी हो गई, छवि या अविनाश नहीं रह सकता यहां?’’

‘‘लेकिन जब वे दोनों जिम्मेदारियां नहीं उठाना चाह रहे हैं तो पापा को ऐसे तो नहीं छोड़ सकते हैं न. किसी को तो जिम्मेदारी उठानी ही पड़ेगी.’’

‘‘हां तो, जिम्मेदारी उठाने के लिए सिर्फ हम ही रह गए. और सेवा करने के लिए सिर्फ मैं. कल को पापा की संपत्ति तो दोनों के बीच ही बंटेगी, सिर्फ हमें तो नहीं मिलेगी, मुझ से नहीं होगा.’’ कह कर पैर पटकती हुई वैभवी कमरे से बाहर निकल गई. बाहर लौबी में सास बैठी हुई थीं, उदास सी. उन का हाथ पकड़ कर किचन में ले गई वैभवी. उन्होंने सबकुछ सुन लिया था, उन के चेहरे से ऐसा लग रहा था. आंखों में आंसू डबडबा रहे थे. चेहरे पर घोर निराशा थी.

‘‘मां,’’ वह उन का चेहरा ऊपर कर के बोली, ‘‘खुद को कभी अकेला मत समझना, हम हैं आप के साथ और आप की यह बेटी आप की सेवा करने के लिए है, मुझ पर विश्वास रखना, मैं प्रकाश के साथ सिर्फ नाटक कर रही थी, मैं उन्हें कुछ एहसास दिलाना चाहती थी, मुझे गलत मत समझना. आप के पास कुछ भी न हो, तब भी आप के बच्चों के कंधे बहुत मजबूत हैं, वे अपने मातापिता का सहारा बन सकते हैं.’’

सास रो रही थीं. उस ने उन्हें गले लगा लिया. सास को सबकुछ मालूम था, इसलिए सबकुछ समझ गई थीं. मांबेटी जैसा रिश्ता कायम कर रखा था वैभवी ने अपनी सास के साथ. और हर प्यारे रिश्ते का आधार ही विश्वास होता है. उस की सास को उस पर अगाध विश्वास था.

‘‘मां, चलने की तैयारी कर लो चुपचाप. यहां लंबा रहना संभव नहीं हो पाएगा. आप और पापा हमारे साथ चलिए, दिल्ली में अच्छी चिकित्सा सुविधा मिल जाएगी और पापा की देखभाल भी हो जाएगी, आप बिलकुल भी फिक्र मत करो, मां. सारी जिम्मेदारी हमारे ऊपर डाल कर निश्ंिचत रहो. पापा की देखभाल हमारी जिम्मेदारी है.’’ सास का मन बारबार भर रहा था. वे चुपचाप अपने कमरे में आ गईं. वैभवी भी अपने कमरे में गई और अटैची में कपड़े डालने लगी. प्रकाश सिटपिटाया सा चुपचाप बैठा था. वह स्वयं जानता था कि वह वैभवी को कुछ भी बोलने का अधिकार खो चुका है. अटैची पैक करतेकरते वैभवी चुपचाप प्रकाश को देखती रही. अपनी अटैची पैक कर के वैभवी प्रकाश की तरफ मुखातिब हुई, ‘‘तुम्हारी अटैची भी पैक कर दूं.’’

‘‘वैभवी, एक बार फिर से सोच लो, पापा को ऐसे छोड़ कर नहीं जा सकते हम. मुझे तो रुकना ही पड़ेगा, लेकिन नौकरी से इतनी लंबी छुट्टी मेरे लिए भी संभव नहीं है. मांपापा को साथ ले चलते हैं, वरना कैसे होगा उन का इलाज?’’

प्रकाश का गला भर्राया हुआ था. वह प्रकाश की आंखों में देखने लगी, वहां बादलों के कतरे जैसे बरसने को तैयार थे. अपने मातापिता से इतना प्यार करने वाला प्रकाश, आखिर उस के मातापिता के लिए इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है?

पिताजी की याद आते ही उस का मन एकाएक प्रकाश के प्रति कड़वाहट और नकारात्मक भावों से भर गया. लेकिन उस के संस्कार उसे इस की इजाजत नहीं देते थे. वह अपने सासससुर के प्रति ऐसी निष्ठुर नहीं हो सकती. कोई भी इंसान जो अपने ही मातापिता से प्यार नहीं कर सकता, वह दूसरों से क्या प्यार करेगा. और जो अपने मातापिता से प्यार करता हो, वह दूसरों के प्रति इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है? उसे अपनेआप में डूबा देख कर प्रकाश उस के सामने खड़ा हो गया, ‘‘बोलो वैभवी, क्या सोच रही हो, पापा को साथ ले चलें न? उस ने प्रकाश के चेहरे पर पलभर नजर गड़ाई, फिर तटस्थता से बोली, ‘‘टैक्सी बुक करवा लो जाने के लिए.’’

कह कर वह बाहर निकल गई. प्रकाश कुछ समझा, कुछ नहीं समझा पर फिर घर के माहौल से सबकुछ समझ गया. पर वैभवी उसे कुछ भी कहने का मौका दिए बगैर अपने काम में लगी हु थी. तीसरे दिन वे मम्मीपापा को ले कर दिल्ली चले गए. पापा की एंजियोप्लास्टी हुई, कुछ दिन अस्पताल में रहने के बाद पापा घर आ गए. उन की देखभाल वैभवी बहुत प्यार से कर रही थी. प्रकाश उस के प्रति कृतज्ञ हो रहा था. पर वह तटस्थ थी. उस के दिल का घाव भरा नहीं था. प्रकाश को तो उस के पिताजी की सेवा करने की भी जरूरत नहीं थी. उस ने तो सिर्फ औपरेशन के वक्त रह कर उन को सहारा भर देना था, जो वह नहीं दे पाया था. उस के भाई के लिए भलाबुरा कहने का भी प्रकाश का कोई अधिकार नहीं था. जबकि उस ने अपना भी हिस्सा ले कर भी अपना फर्ज नहीं निभाया था. ये सब सोच कर भी वैभवी के दिल के घाव पर मरहम नहीं लग पा रहा था. पापा की सेवा वह पूरे मनोयोग से कर रही थी, जिस से वह बहुत तेजी से स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे. उस के सासससुर उस के पास लगभग 3 महीने रहे. उस के बाद सास जाने की पेशकश करने लगीं पर उस ने जाने नहीं दिया, कुछ दिनों के बाद उन्होंने जाने का निर्णय ले लिया. प्रकाश और वैभवी उन्हें देहरादून छोड़ कर कुछ दिन रुक कर, बंद पड़े घर को ठीकठाक कर वापस आ गए.

सबकुछ ठीक हो गया था पर उस के और प्रकाश के बीच का शीतयुद्ध अभी भी चल रहा था, उन के बीच की वह अदृश्य चुप्पी अभी खत्म नहीं हुई थी. प्रकाश अपराधबोध महसूस कर रहा था और सोच रहा था कि कैसे बताए वैभवी को कि उसे अपनी गलती का एहसास है. उस से बहुत बड़ी गलती हो गई थी. वह समझ रहा था कि इस तरह बच्चे मातापिता की जिम्मेदारी एकदूसरे पर डालेंगे तो उन की देखभाल कौन करेगा. कल यही अवस्था उन की भी होगी और तब उन के बेटाबेटी भी उन के साथ यही करें तो उन्हें कैसा लगेगा. एकाएक वैभवी की तटस्थता को दूर करने का उसे एक उपाय सूझा. वह वैभवी को टूर पर जाने की बात कह कर चंडीगढ़ चला गया. प्रकाश को गए हुए 2 दिन हो गए थे. शाम को वैभवी रात के खाने की तैयारी कर रही थी, तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. उस ने जा कर दरवाजा खोला. सामने मांपिताजी खड़े थे.

‘‘मांपिताजी आप, यहां कैसे?’’ वह आश्चर्यचकित सी उन्हें देखने लगी.

‘‘हां बेटा, दामादजी आ गए और जिद कर के हमें साथ ले आए, कहने लगे अगर मुझे बेटा मानते हो तो चल कर कुछ महीने हमारे साथ रहो. दामादजी ने इतना आग्रह किया कि आननफानन तैयारी करनी पड़ी.’’

तभी उस की नजर टैक्सी से सामान उतारते प्रकाश पर पड़ी. वह पैर छू कर मांपिताजी के गले लग गई. उस की आंखें बरसने लगी थीं. पिताजी के गले मिलते हुए उस ने प्रकाश की तरफ देखा, प्रकाश मुसकराते हुए जैसे उस से माफी मांग रहा था. उस ने डबडबाई आंखों से प्रकाश की तरफ देखा, उन आंखों में ढेर सारी कृतज्ञता और धन्यवाद झलक रहा था प्रकाश के लिए. प्रकाश सोच रहा था उस के सासससुर कितने खुश हैं और उस के खुद के मातापिता भी कितने खुश हो कर गए हैं यहां से. जब अपनी पूरी जवानी मातापिता ने अपने बच्चों के नाम कर दी तो इस उम्र में सहारे की तलाश भी तो वे अपने बच्चों में ही करेंगे न, फिर चाहे वह बेटा हो या बेटी, दोनों को ही अपने मातापिता को सहारा देना ही चाहिए.

Hindi Long Story

Thriller Story: वह काली रात- क्या हुआ था रंजना के साथ

Thriller Story: जैसे ही रंजना औफिस से आ कर घर में घुसीं, बहू रश्मि पानी का गिलास उन के हाथ में थमाते हुए खुशी से हुलसते हुए बोली, मांजी, 2 दिनों बाद मेरी दीदी अपने परिवार सहित भोपाल घूमने आ रही हैं. आज ही उन्होंने फोन पर बताया.’’

‘‘अरे वाह, यह तो बड़ी खुशी की बात है. तुम्हारी दीदीजीजाजी पहली बार यहां आ रहे हैं, उन की खातिरदारी में कोई कोरकसर मत रखना. बाजार से लाने वाले सामान की लिस्ट आज ही अपने पापा को दे देना, वे ले आएंगे.’’

‘‘हां मां, मैं ने तो आने वाले 3 दिनों में घूमने और खानेपीने की पूरी प्लानिंग भी कर ली है. मां, दीदी पहली बार हमारे घर आ रही हैं, यह सोच कर ही मन खुशी से बावरा हुआ जा रहा है,’’ रश्मि कहते हुए खुशी से ओतप्रोत थी.

‘‘बड़ी बहन मेरे लिए बहुत खास है. 12वीं कक्षा में पापा ने जबरदस्ती मुझे साइंस दिलवा दी थी और मैं फेल हो गई थी. मैं शुरू से प्रत्येक क्लास में अव्वल रहने की वजह से अपनी असफलता को सहन नहीं कर पा रही थी और निराशा से घिर कर धीरेधीरे डिप्रैशन में जाने लगी थी. तब दीदी की शादी को 2 महीने ही हुए थे. मेरी बिगड़ती हालत को देख कर दीदी बिना कुछ सोचेविचारे मुझे अपने साथ अपनी ससुराल ले गईर् थीं. जगह बदलने और दीदीजीजाजी के प्यार से मैं धीरेधीरे अपने दुख से उबरने लगी थी. मेरा मनोबल बढ़ाने में जीजाजी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी. उन्हीं की मेहनत और प्यार का फल है कि डौक्टरेट कर के आज कालेज में पढ़ा कर खुशहाल जिंदगी जी रही हूं. मां, कितना मुश्किल होता होगा अपनी नईनवेली गृहस्थी में किसी तीसरे, वह भी जवान बहन को शामिल करना,’’ रश्मि ने अपनी दीदी की सुनहरी यादों को ताजा करते हुए अपनी सास से कहा.

‘‘हां, सो तो है बेटा, पर तुम उन की यादों में ही खोई रहोगी कि कुछ तैयारी भी करोगी. दीदी के कितने बच्चे हैं?’’ रंजना ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘2 बेटे हैं मां, बड़ा बेटा अमन इंजीनियरिंग के आखिरी साल में है और छोटा अर्णव 12वीं कर रहा  है,’’ रश्मि ने खुशी से उत्तर दिया.

‘‘अच्छा,’’ कहते हुए रंजना ने अपने

2 कमरों के छोटे से घर पर नजर डाली जो 4 लोगों के आ जाने से भर जाता था. उन्होंने पति के साथ मिल कर बड़े जतन से इस घर को उस समय बनाया था जब बेटे का जन्म हुआ था. तब आर्थिक स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं थी. सो, किसी तरह 2 कमरे बनवा लिए थे. उस के बाद परिवार बड़ा हो गया पर घर उतना ही रहा. कितनी बार सोचा भी कि ऊपर 2 कमरे और बनवा लें, ताकि किसी के आने पर परेशानी न हो, पर सुरसा की तरह मुंह फाड़ती इस महंगाई में थोड़ा सा पैसा बचाना भी मुश्किल हो जाता है. खैर, देखा जाएगा.

2 दिनों बाद सुबह ही रश्मि की दीदी परिवार सहित आ गईं. सभी लोग हंसमुख और व्यवहारकुशल थे. शीघ्र ही रश्मि के दोनों बच्चे 12 वर्षीय धु्रव और 8 वर्षीया ध्वनि दीदी के बेटों के साथ घुलमिल गए. पुरुष देशविदेश की चर्चाओं में व्यस्त हो गए. वहीं रश्मि और उस की दीदी किचन में खाना बनाने के साथसाथ गपों में मशगूल हो गईं. रंजना स्वयं भी नाश्ता कर के अपने औफिस के लिए रवाना हो गईर्ं.

नहाधो कर सब ने भरपेट नाश्ता किया. रश्मि ने खाना बना कर पैक कर लिया ताकि घूमतेघूमते भूख लगने पर खाया जा सके. पूरे दिन भोपाल घूमने के बाद रात का खाना सब ने बाहर ही खाया. मातापिता के लिए खाना रश्मि के पति ने पैक करवा लिया. घर आ कर ताश की महफिल जम गई जिस में रंजना और उन के रिटायर्ड पति भी शामिल थे.

रात्रि में हौल में जमीन पर ही सब के बिस्तर लगा दिए गए. सभी बच्चे एकसाथ ही सोए. बाकी सदस्य भी वहीं एडजस्ट हो गए. रश्मि की दीदी ने पहले ही साफ कह दिया था कि मम्मीपापा अपने कमरे में ही लेटेंगे ताकि उन्हें कोई डिस्टर्ब न करे. अपने रात्रिकालीन कार्य और दवाइयां इत्यादि लेने के बाद जब रंजना हौल में आईं तो कम जगह में भी सब को इतने प्यार से लेटे देख कर उन्हें बड़ी खुशी हुई. अचानक बच्चों के बीच ध्वनि को लेटे देख कर उन का माथा ठनका, वे अचानक बहुत बेचैन हो उठीं और बहू रश्मि को अपने कमरे में बुला कर कहा, ‘‘बेटा, ध्वनि अभी छोटी है, उसे पास सुलाओ.’’

‘‘मां, वह नहीं मान रही. अपने भाइयों के पास ही सोने की जिद कर रही है. सोने दीजिए न, दिनभर के थके हैं सारे बच्चे, एक बार आंख लगेगी तो रात कब बीत जाएगी, पता भी नहीं चलेगा,’’ कह कर रश्मि वहां से खिसक गईं.

वे सोचने लगीं, ‘यह तो सही है कि थकान में रात कब बीत जाती है, पता नहीं चलता, पर रात ही तो वह समय है जब सब सो रहे होते हैं और करने वाले अपना खेल कर जाते हैं. रात ही तो वह पहर होता है जब चोर लाखोंकरोड़ों पर हाथ साफ करते हैं. दिन में कुलीनता, शालीनता, सज्जनता और करीबी रिश्तों का नकाब पहनने वाले अपने लोग ही अपनी हवस पूरी करने के लिए रात में सारे रिश्तों को तारतार कर देते हैं.

कहते हैं न, दूध का जला छाछ भी फूंकफूंक कर पीता है, सो, उन का मन नहीं माना और कुछ देर बाद ही वे फिर हौल में जा पहुंचीं. ध्वनि उसी स्थान पर लेटी थी. उन्होंने धीरे से उस के पास जा कर न जाने कान में क्या कहा कि वह तुरंत अपनी दादी के साथ चल दी. बड़े प्यार से अपनी बगल में लिटा कर वे ध्वनि को कहानी सुनाने लगीं और कुछ ही देर में ध्वनि नींद की आगोश में चली गई. पर नातेरिश्तों पर कतई भरोसा न करने वाला उन का विद्रोही मन अतीत के गलियारे में जा पहुंचा.

तब वे भी अपनी पोती ध्वनि की उम्र की ही थीं. परिवार में उन के अलावा

4 वर्षीया एक छोटी बहन थी. मां गांव की अल्पशिक्षित सीधीसादी महिला थीं. एक बार ताउजी का 23 वर्षीय बेटा मुन्नू उन के घर दोचार दिनों के लिए कोई प्रतियोगी परीक्षा देने आया था. भाई के आने से घर में सभी बहुत खुश थे, आखिर वह पहली बार जो आया था. गरमी का मौसम था. उस समय कूलरएसी तो होते नहीं थे, सो, मां ने खुले छोटे से आंगन में जमीन पर ही बिस्तर लगा दिए थे.

वे अपने पिता से कहानी सुनाने की जिद कर रही थीं कि तभी भाई ने कहानी सुनाने का वास्ता दे कर उसे अपने पास बुला लिया. वह भी खुशीखुशी भैया के पास कहानी सुनतेसुनते सो गई. आधी रात को जब सब सोए थे, अचानक उन्हें अपने निचले वस्त्र के भीतर कुछ होने का एहसास हुआ. कुछ समझ नहीं आने पर वे अचकचाईं और करवट ले कर लेट गईं. कुछ देर बाद भाई ने दोबारा उन्हें अपनी ओर कर लिया और वही कार्य फिर से शुरू कर दिया. न जाने क्यों उसे यह सब अच्छा नहीं लग रहा था. जब असहनीय हो गया तो एक झटके से उठी और जा कर मां से चिपक कर लेट गई. उस दिन बहुत देर तक नींद ही नहीं आई. वह समझ ही नहीं पा रही थीं कि आखिर भैया उस के साथ क्या कर रहे थे?

8 साल की बच्ची क्या जाने कि उस के ही चचेरे भाई ने उस के साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया था. उस समय मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया तो था नहीं जो मां के बिना बताए ही सब पता चल जाता. यह सब तो उसे बाद में समझ आया कि उस दिन भाई अपनी ही चचेरी बहन के साथ…छि… सोच कर उस का मन आज भी मुन्नू भैया के प्रति घृणा से भर उठता है. अगले दिन सुबह मां ने पूछा, ‘क्या हुआ रात को उठ कर मेरे पास क्यों आ गई थी.’

उसे समझ ही नहीं आया कि क्या कहे? सो वह ‘कुछ नहीं, ऐसे ही’ कह कर बाहर चली गई. उस समय तो क्या वह तो आज तक मां से नहीं कह पाई कि उन के लाड़ले भतीजे ने उस के साथ क्या किया था. पर क्या वह उस समय मां को बताती तो मां उस की बातों पर भरोसा करतीं? शायद नहीं, क्योंकि मां की नजर में वह तो बच्ची थी और मुन्नू भैया उन के लाड़ले भतीजे.

उस जमाने में मांबेटी में संकोच की एक दीवार रहती थी. वे इतने खुल कर हर मुद्दे पर बात नहीं करती थीं जैसे कि आज की मांबेटियां करती हैं. वह कभी किसी से इस विषय में बोल तो नहीं पाई परंतु पुरुषों और सैक्स के प्रति एक अनजाना सा भय मन में समा गया. पुरानी यादों की परतें थीं कि धीरेधीरे खुलती ही जा रही थीं. समय बीतता गया. जब उन्होंने जवानी की दहलीज पर पैर रखा तो मातापिता को शादी की चिंता सताने लगी. आखिर एक दिन वह भी आया जब पेशे से प्रोफैसर बसंत उन के जीवन में आए.

उन्हें याद है जब वे शादी कर के ससुराल आईं तो बहुत डरी हुई थीं. पति बसंत बहुत सुलझे और समझदार इंसान थे. उन्होंने आम पुरुषों की तरह संबंध बनाने की कोई जल्दबाजी नहीं की. जब सारे मेहमान चले गए तो एक दिन परिस्थितियां और माहौल अनुकूल देख कर बसंत ने जब उन के साथ संबंध बनाने की कोशिश करनी चाही तो वे घबरा कर पसीनापसीना हो गईं और उन की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी. इस के बाद जब भी बसंत उन के नजदीक आने की कोशिश करते, उन की यही स्थिति हो जाती.

उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से कई बार रंजना से इस का कारण जानने की कोशिश की परंतु रंजना हर बार टाल गईं. एक दिन जब घर में कोई नहीं था, समझदार बसंत ने मानो समस्या हल करने का बीड़ा ही उठा लिया. वे रंजना का हाथ पकड़ कर जमीन पर बैठ गए और बड़े प्यार से इस मनोदशा का कारण पूछने लगे. पहले तो रंजना चुप रहीं पर फिर बसंत के प्यारभरे स्पर्श से सालों से जमी बर्फ की पर्त मानो पिघलने को आतुर हो उठी, उन की आंखों से आंसुओं के रूप में लावा बह निकला और रोतेरोते पूरी बात उन्होंने बसंत को कह सुनाई, जिस का सार यह था कि जब भी बसंत उन के नजदीक आते हैं उन्हें वह काली रात याद आ जाती है और वे घबरा उठती हैं.

बसंत कुछ देर तो शांत रहे, वातावरण में चारों ओर मौन पसर गया. वे मन ही मन घबराने लगीं कि न जाने बसंत की प्रतिक्रिया क्या होगी. परंतु कुछ देर बाद माहौल की खामोशी को तोड़ते हुए बसंत उठ कर उन की बगल में बैठ गए, रंजना का हाथ अपने हाथ में ले कर बड़े ही प्यार से बोले, ‘रंजू, जो हुआ उसे एक बुरा सपना समझ कर भूल जाओ. तुम्हारी उस में कोई गलती नहीं थी. गलती तो तुम्हारे उस भाई की थी जिस ने एक कोमल कली को कुचलने का प्रयास किया. जिस ने तुम्हारे मातापिता के साथ विश्वासघात किया. जिस ने रिश्तों की गरिमा को तारतार कर दिया. वह भाई के नाम पर कलंक है. जहां तक मां का सवाल है वे यह कभी सपने में भी नहीं सोच पाईं होंगी कि उन का सगा भतीजा ऐसा कुकृत्य कर सकता है. परंतु अब मैं तुम्हारे साथ हूं. हम पतिपत्नी हैं. तुम्हारा और मेरा हर सुखदुख साझा है.

‘कल हम एक मनोवैज्ञानिक काउंसलर के पास चलेंगे जिस से तुम अपने मन की सारी पीड़ा को बाहर ला कर अपने और मेरे जीवन को सुखमय बना पाओगी. इतना भरोसा रखो अपने इस नाचीज जीवनसाथी पर कि जब तक तुम स्वयं को मानसिक रूप से तैयार नहीं कर लेतीं मैं कोई जल्दबाजी नहीं करूंगा. बस, इतना प्रौमिस जरूर चाहूंगा कि यदि भविष्य में हमारी कोई बेटी होगी तो उसे तुम संभाल कर रखोगी. उसे किसी भी हालत में परिचितअपरिचित की हवस का शिकार नहीं होने दोगी. बोलो, मेरा साथ देने को तैयार हो.’

‘हां, बसंत, मैं अपनी बेटी तो क्या इस संसार की किसी भी बेटी को उस तरह की मानसिक यातना से नहीं गुजरने दूंगी, जिसे मैं ने भोगा है, पर मुझे अभी कुछ वक्त और चाहिए,’ रंजना ने बसंत का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, तो बसंत मुसकराते हुए प्यार से बोले, ‘यह बंदा ताउम्र अपनी खूबसूरत पत्नी की सहमति का इंतजार करेगा.’

अचानक रंजना कुछ सोचते हुए बोलीं, ‘बसंत, मैं धन्य हूं जो मुझे तुम जैसा समझदार पति मिला. मुझे लगता है हर महिला बाल्यावस्था में कभी न कभी पुरुषों द्वारा इस प्रकार से शोषित होती होगी. अगर आज तुम्हारे जैसा समझदार पति नहीं होता तो मुझ पर क्या बीतती.’

‘तुम बिलकुल सही कह रही हो, कितने परिवारों में ऐसा ही दर्द अपने मन में समेटे महिलाएं जबरदस्ती पति के सम्मुख समर्पित हो जाती हैं. कितनी महिलाएं अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं और कितनों के इसी कारण से परिवार टूट जाया करते हैं, जबकि इस प्रकार की घटनाओं में महिला पूरी तरह निर्दोष होती है, क्योंकि बाल्यावस्था में तो वह इन सब के माने भी नहीं जानती. चलो, अब कुछ खाने को दो, बहुत जोरों से भूख लगी है,’ बसंत ने कहा तो वे मानो विचारों से जागी और फटाफट चायनाश्ता ले कर आ गईं.

कुछ दिनों की कांउसलिंग सैशन के बाद वे सामान्य हो गईं और एक दिन जब वे नहा कर बाथरूम से निकली ही थीं कि बसंत ने उन्हें अपने बाहुपाश में बांध लिया और सैक्सुअल नजरों से उन की ओर देखते हुए बोले, ‘‘अब कंट्रोल नहीं होता, बोलो, हां है न.’’

बसंत की प्यारभरी मदहोश कर देने वाली नजरों में मानो वे खो सी गईं और खुद को बसंत को सौंपने से रोक ही नहीं पाईं. बसंत ने उन्हें 2 प्यारे और खूबसूरत से बच्चे दिए. बेटी रूपा और बेटा रूपेश. उन्हें अच्छी तरह याद है जैसे ही रूपा बड़ी होने लगी, वे रूपा को अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देती थीं. दोनों बच्चों के साथ बसंत और उन्होंने ऐसा दोस्ताना रिश्ता कायम किया था कि बच्चे अपनी हर छोटीबड़ी बात मातापिता से ही शेयर करते थे.

वे चारों आपस में मातापिता कम दोस्त ज्यादा थे. बेटी रूपा जैसे ही 7-8 वर्ष की हुई, उन्होंने उसे अच्छीबुरी भावनाओं, स्पर्श और नजरों का फर्क भलीभांति समझाया. ताकि उस के जीवन में कभी कोई रात काली न हो. सोचतेसोचते कब आंख लग गई, उन्हें पता ही नहीं चला. सुबह आंख देर से खुली तो देखा कि सभी केरवा डैम जाने की तैयारी में थे. वे भी फटाफट तैयार हो कर औफिस के लिए निकल लीं. अगले दिन रश्मि की दीदी का सुबह की ट्रेन से जाने का प्रोग्राम था. 3 दिन कैसे हंसीखुशी में बीत गए, पता ही नहीं चला.

Thriller Story

Dowry Deaths: कैसे रोका जा सकता है दहेज के लिए होने वाली घटनाओं को

Dowry Deaths: हमारे देश में दहेज़ प्रथा बहुत पहले से चली आ रही है. इसे रोकने के लिए बहुत सारे प्रयास किये गएँ, सख्त कानून बनायें गए. लेकिन अभी हाल ही में ग्रेटर नोएडा में दहेज के लिए एक महिला को जिंदा जला देने की घटना ये बताती है कि ये दहेज़ नाम का दानव अपनी जड़े काफी गहरे तक जमा चुकी हैं. आरोप है कि निक्की नाम की महिला को उसके पति विपिन और ससुराल वालों ने 35 लाख रुपये की दहेज मांग पूरी न होने जिंदा जला दिया.

ये अपने आप में कोई पहला मामला नहीं है. तमिलनाडु के तिरुपुर में जुलाई 2025 में 23 साल की रिधान्या दो महीने पहले एक दुल्हन बनी थी, लेकिन वह ससुराल में प्रताड़ित हो रही थी और यह बात कोई नहीं समझ रहा था. उसने अपने आखिरी व्हाट्सअप मैसेज में लिखा भी था कि –

“पापा, ये शादी एक साजिश थी. कोई मेरी बात नहीं सुनता. हर दिन मुझे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है. अब और नहीं सहा जाता.”“हर कोई कहता है कि समझौता कर लो. लेकिन कितनी बार करूं समझौता? जब हर दिन आत्मा मर रही हो, तो जीना क्यों?”“पापा, मैं आपको बोझ नहीं बनना चाहती. मुझे माफ कर देना. अब सब खत्म हो गया है.”

उसकी आवाज में कंपकंपी है, दर्द है, और सबसे बड़ा सच — सिस्टम से हार मान चुकी एक बेटी की चुप्पी.

इससे पहले उत्तर प्रदेश के ही अलीगढ़ में भी दहेज़ के लिए गर्म (आयरन) सटाने के कारण महिला की मोत हो गई थी. इसके बाद उत्तर प्रदेश के ही पीलीभीत में दहेज़ के लिए एक महिला को जला दिया था. इसी तरह चंडीगढ़ में एक नए शादी वाली लड़की ने दहेज उत्पीड़न से तंग आकर अपनी जान दे दी थी. इसके अलावा दो घटनाएं तमिलनाडु से सामने आईं. पहली घटना में पोन्नेरी के पास एक महिला ने शादी के महज चार दिनों के भीतर ही कथित उत्पीड़न के कारण आत्महत्या कर ली. दूसरी घटना में भी इसी वजह से एक युवती ने शादी के दो महीने के भीतर ही अपनी जान दे दी.

क्या कहते हैं आंकड़े

NCRB (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) के अनुसार, 2022 में दहेज हत्या के कुल 6450 मामले दर्ज हुए थे. इस आंकड़े के अनुसार बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और हरियाणा ने अकेले 80% मामलों में योगदान दिया.

इस डेटा के अनुसार, हर तीन दिन में लगभग 54 महिलाएं दहेज प्रताड़ना और हत्या का शिकार होती रही हैं. यह सिर्फ संख्या या आंकड़े नहीं है, ये एक दर्दनाक सच्चाई है.

एक सच यह भी है ऐसे सारे मामले सामने नहीं आते. कई बार परिवार दबा देता है, कई बार समाज इस पर पर्दा दाल देता है, कभी बेटी की इज़्ज़त का हवाला दिया जाता है, तो कभी जाती की प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता है.

दहेज़ हत्या में लड़की के माँ बाप भी हैं जिम्मेवार

अगर बात करें अभी हाल ही में हुए ग्रेटर निक्की वाले केस की, तो यह पहला मामला नहीं था जब निक्की को प्रताड़ित किया जा रहा था. 2016 से ही उस पर अत्याचार किया जा रहा था. भरी भरकम दहेज़ दिया गया, स्कॉर्पियो गाड़ी दी गयी. उसके बाद डिमांड कभी भी ख़तम नहीं हुए. परिवार के लोग कहते गुजर बिरादरी में तो ये सब तुम्हें सहना पड़ेगा? तुम्हें अपने घर को बचाना पड़ेगा?

जहाँ तक निक्की के पति और ससुरालवालों की बात है वो तो जिम्मेवार है ही, वो गुनहगार हैं. लेकिन जिम्मेवार निक्की के माता पिता भी हैं. उसका परिवार भी है जो सब कुछ जानते हुए और देखते हुए भी सह रहा था और बेटी को सहने को परिवार को बनाये रखने को मजबूर कर रहा था.

तमिलनाडु के तिरुपुर में भी यहाँ हुआ कहती रही मेरे साथ गलत हो रहा है लेकिन माता पिता ने नहीं सुनी और बेटी ने अपनी जान दे कर उन्हें समझाया की मैं किस हद तक परेशां थी.

शादी नहीं चल रही, तो वापस लाएं बेटी

अगर लगता है बेटी की शादी में दिक्कत है और वो नहीं चल पा रही तो बेटी को वापस लाएं. उसके साथ कुछ गलत होने का इंतज़ार करना अपने आप में बेवकूफी है. शादी की है बेटी को छोड़ तो नहीं दिया. अगर वह परेशां है तो उसके साथ खड़े हो.

पहले पैरों पर खड़ा करें फिर शादी करें

ग्रेटर नॉएडा में निक्की के केस में भी 17 साल की उम्र में ही लड़की की शादी कर दी. उसकी पढाई भी पूरी नहीं हुए होगी. ऐसा बहुत से मामले में होता है जो अपने आप में गलत है. शादी की इतनी जल्दी आखिर है क्यूँ ? क्यूँ नहीं पहले बेटी की पढाई पूरी करवाते? उसे नौकरी कर अपने पैरो पर खड़ा तो होने दें तभी शादी लेकिन ऐसा नहीं होता और इसके लिए भी माँ बाप ही जिम्मेवार हैं?

दहेज़ दिया जाता है, तभी तो और दहेज़ की मांग की जाती है

मृतक निक्की की बहन कंचन ने कहा, ”हमारे पिता ने दहेज़ में एक टॉप मॉडल स्कॉर्पियो, एक रॉयल एनफील्ड बाइक, नकद, सोना, सब कुछ उपहार में दिया था. इसके अलावा, करवा चौथ पर हमारे घर से उपहार भेजे जाते थे. हमारे माता-पिता ने वह सब कुछ किया जो वे कर सकते थे, लेकिन ससुराल वाले खुश नहीं थे. इस बयान से ये साफ़ जाहिर होता है कि निक्की के मायके वालों ने अपनी मर्जी से दहेज़ दिया. लड़के वालों के मुँह खोले और फिर जब मांग उनकी तरफ से की गए तो वे बिदक गए.

अगर यह बात सही है तो जितने दोषी निक्की के ससुराल वाले दहेज मांगने के लिए हैं. उससे ज्यादा दोषी निक्की के मां-बाप और परिवार हैं. उन्होंने दहेज देकर शादी की ही क्यों?”इसके लिए तो सीधे तौर पर आज के मौजूदा समाज, निक्की का परिवार भी जिम्मेदार है.

अगर शादी के समय ही कह दिया जाएँ कि हमने अपनी बेटी को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाया है हम दहेज़ नहीं देंगे, तो फिर शदी करना या न करने का फैसला लड़के वालों का होता है. बाद में कोई तमाशा हो इससे अच्छा है पहले ही मन कर दें लेकिन अगर आपने एक बार दहेज़ दे दिया तो आपकी गलती है. फिर तो बार बार मांग किये जाने के पुरे चांस हैं.

दहेज़ की जगह बेटी को प्रॉपर्टी में हिस्सा दें [विवाह कानून 1956 और 2005 ]

विवाह कानून 1956 और 2005

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में और 2005 में हुए संशोधन के बाद एक बेटी चाहे वह शादीशुदा हो या न हो, अपने पिता की संपत्ति को पाने का बराबरी का हक रखती है. अपने पिता और उस की पुश्तैनी संपत्ति में भी लड़कियों को अपने भाइयों और मां जितना हक मिलता है. अगर पिता ने कोई वसीयत नहीं की है तब भी उन्हें भाइयों के बराबर ही हक मिलेगा. यहां तक की अपनी शादी हो जाने के बाद भी यह अधिकार उन्हें मिलेगा.

जहां पहले ये कहा जाता था कि महिलाओं का कोई घर नहीं है. अगर पतिपत्नी में झगड़ा हुआ, वो मायके आ नहीं सकती थी अब उस को कानून ने अधिकार दे दिया है.
अब उसे पता है कि अगर उस की शादी के कोई दिक्कत है तो उस का अपना घर है जहां वह लौट कर जा सकती है क्योंकि पिता के घर पर उस का भी कानूनन अधिकार है.पहले लड़कियों को कहा जाता था कि तुम अपनी जबान बंद रखों जो हो गया उसे भूल जाओं. ये मारपीट तो होती रहती है कौन सा पति नहीं मारता. समझा दिया जाता था लड़कियों को. लड़की पूरी जिंदगी ऐसे ही बिता देती थी क्योंकि उसे पता था कि हमारी शादी के बाद हमारे पेरेंट्स के पास हमारे लिए कुछ है नहीं. आज इस उत्तराधिकार कानून की वजह से अधिकार मिल गया कि अगर शादी के बाद मेरे साथ कुछ गलत होता है तो मैं अपने पिता के घर पर भी अधिकार के साथ रह सकती हूं.

इसलिए यह जरुरी है कि लड़कियों को अपने इस अधिकार के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए ताकि वह अपनी ज़िंदगी का फैसला खुद अपनी मर्जी से ले सकें. अगर शादी में कुछ गलत हो रहा है तो उसे सहने के बजाये छोड़ने की हिम्मत रखें.

बेटी की ज़िंदगी से बड़ा है सामाजिक दबाव

अगर बेटी की शादी में कोई दिक्कत है कोई शिकायत हो, तो बेटी को वापस ले आएं. .शादी में मतभेद होते रहते है कोई बड़ी बात नहीं है. अगर लड़का लड़की में नहीं बन रही हैं तो अपने अपने रास्ते जाओ. मरने मारने की क्या जरुरत है. निक्की के केस में भी पहले जल्दी शादी की, पैसा जितना देना था नहीं दिया, वादा किया होगा हम दे देंगे. 6 साल झगड़े करवाए, डिवोर्स की अर्जी तक नहीं लगाई. मनमुटाव के बावजूद निक्‍की के घरवाले उसे बार-बार ससुराल भेजते ही क्‍यों थे? निक्की के पिता ने कहा भी है कि अगर उन्होंने पंचायत का फैसला न माना होता, बेटियों को ससुराल न भेजा होता, तो आज उनकी बेटी जिंदा होती. यहाँ सवाल ये भी है कि पंचायत में मामला लेकर जाने के बजाए अगर पुलिस में गए होते तो कोई नतीजा भी निकलता.

पंचायत ने भी घर बचाने पर जोर दिया? ये सब कुछ क्यूँ हुआ? जहाँ तक निक्की के पति और ससुरालवालों की बात है वो तो जिम्मेवार है ही, वो गुन्हेगार हैं. लेकिन जिम्मेवार निक्की के माता पिता भी हैं. उसका परिवार भी है जो सबब कुछ जानते हुए और देखते हुए भी सह रहा था और बेटी को सहने को, परिवार को बनाये रखने को मजबूर कर रहा था. समाज के दबाव में आकर मायके वाले बेटी की जिंदगी को दांव पर लगाने को मजबूर हो जाते हैं. उन्हें अपनी बेटी की जान से ज्यादा अपनी खोखली इज़्ज़त जो प्यारी होती है.

वाकई इस तरह की घटनाये हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर क्यों हम आज भी दहेज जैसी कुरीति के शिकंजे से बाहर नहीं आ पाए? कानून सख्त है, जागरूकता अभियान भी चलते हैं, लेकिन असलियत यह है कि अब भी समाज का एक बड़ा हिस्सा बेटियों और बहुओं को बोझ समझता है और शादी को सौदे की तरह देखता है.
जब तक हम सब दहेज को ‘ना’ नहीं कहेंगे तब तक ऐसी घटनाएं रुकने का नाम नहीं लेंगी. निक्की की मौत केवल एक महिला की मौत नहीं है, बल्कि यह चेतावनी है उन सभी परिवारों के लिए जो आज भी दहेज को रिश्तों से बड़ा मानते हैं. अब वक्त है कि शादी को सौदा नहीं, बल्कि बराबरी और सम्मान का बंधन माना जाए. तभी इंसानियत और भरोसा रिश्तों में वापस लौट सकेगा.

Dowry Deaths

Drama Story: जीने दो और जियो- क्यों खुश नहीं थी अर्चना

Drama Story: प्यार पर किस का बस चला है, जो अपने कैरियर के प्रति संप्रित अर्चना का चलता. न चाहते हुए भी नितिन से प्यार हो ही गया और इतना ज्यादा कि नितिन के नौकरी बदलने के बाद उस के लिए भी उस औफिस में काम करना असहनीय हो गया. एक दोपहर उस ने नितिन को फोन किया कि क्या वह लंबा लंचब्रेक ले कर उस से मिल सकता है. अर्चना ने इतनी आजिजी से पूछा था कि नितिन मना नहीं कर सका, उस के आते ही अर्चना ने पूछा, ‘‘तुम्हारे नए औफिस में मु झे कोई जगह मिल सकती है, नितिन?’’

‘‘औफिस में तो नहीं, मेरी जिंदगी और दिल में सारी जगह सिर्फ तुम्हारे लिए है. सो, आ जाओ वहां यानी शादी कर लो मु झ से.’’

‘‘और फिर घरगृहस्थी के चक्कर में फंस कर नौकरी को अलविदा कह दो. बहुत बड़ी कीमत मांग रहे हो प्यार की?’’

‘‘मु झ से शादी कर के तुम घरगृहस्थी के चक्कर में कभी नहीं फंसोगी क्योंकि मेरी मम्मी भी अपनी गृहस्थी वैसे ही खुशीखुशी संभाल रही हैं जैसे तुम्हारी मम्मी, अभी जैसे अपने घर से औफिस आती हो, शादी के बाद मेरे घर से आ जाया करना.’’

‘‘ऐसा अभी सोच रहे हो, लेकिन शादी के बाद तुम भी वैसा ही सोचने लगोगे जैसा तुम्हारी मम्मी सोचेगी कि बहू का काम घर संभालना है, औफिस नहीं.’’

‘‘मेरी मां की नसीहत है कि अगर जिंदगी में तरक्की करनी है तो शादी कामकाजी लड़की से ही करना. ‘मैं अकेले बोर हो रही हूं,’ कह कर तुम्हें, काम अधूरा छोड़ कर, जल्दी घर आने को मजबूर न करें.’’

‘‘तुम्हारी मम्मी भी कुछ काम करती हैं?’’

‘‘कुछ नहीं, बहुत काम करती हैं अपने घर के अलावा पासपड़ोस के भी. जैसे किसी के लिए स्वेटर बुनना, किसी के लिए अचार डालना वगैरहवगैरह यानी, मम्मी हम बापबेटे के इंतजार में बैठ कर बोर नहीं होतीं, व्यस्त रखती हैं स्वयं को. क्यों न कुछ फैसला करने से पहले तुम मम्मी से मिल लो, अभी चलें?’’ नितिन के आग्रह को अर्चना टाल न सकी.

नितिन के घर के दरवाजे पर ताला था. ‘‘पापा औफिस में होंगे और मम्मी कहीं पड़ोस में,’’ कह कर नितिन ने मोबाइल पर नंबर मिलाया.

‘‘मम्मी पड़ोस में अय्यर आंटी को गाजर का हलवा बनाना सिखा रही हैं,’’ नितिन ने ताला खोलते हुए कहा, ‘‘जब तक मम्मी आती हैं तब तक तुम्हें अपना घर दिखाता हूं.’’ छत पर सूखते कपड़ों में जींस, टौप, लैगिंग, कुरतियां और पटियाला सलवार वगैरह देख कर अर्चना पूछे बगैर न रह सकी, ‘‘तुम्हारी कितनी बहनें हैं?’’

‘‘एक भी नहीं. ओह, सम झा, ये कपड़े देख कर पूछ रही हो. ये सब मम्मी के हैं. उधर देखो, मम्मी आ रही हैं.’’

फर्श को छूती अनारकली डै्रस आंखों पर महंगा धूप का चश्मा और स्लिंग बैग से मैच करते सैंडिल पहने एक स्थूल महिला चली आ रही थी. परस्पर परिचय के बाद नितिन ने कहा. ‘‘आप ने कहा था न कि अगर कोई लड़की पसंद हो तो बता. सो, मैं अर्चना को आप से मिलवाने लाया हूं.’’

‘‘मैं ने कहा था, बता, ताकि मैं उस के घर प्रस्ताव भिजवा सकूं, यह नहीं  कि उसे ही यहां ले आ डिसप्ले आइटम की तरह,’’ मम्मी ने स्नेह से अर्चना के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘सौरी बेटा, नितिन ने मु झे गलत सम झा.’’

‘‘मैं ने कुछ गलत नहीं सम झा, मम्मी. प्रस्ताव तो तब भिजवाओगी न, जब यह शादी करने को तैयार होगी,’’ नितिन बोला. ‘‘यह हार्डकोर कैरियर वुमन है. मु झ से प्यार तो करती है पर शादी से डरती है कि कहीं घरगृहस्थी के चक्कर में इसे नौकरी न छोड़नी पड़े.’’

‘‘मु झे नितिन के लिए उस की पसंद की जीवनसंगिनी चाहिए घर चलाने को अपने लिए सहायिका नहीं. मु झे यह घरसंसार चलाते हुए अढ़ाई दशकों से अधिक हो गए हैं अगले 2 दशक तक तो बगैर तुम्हारी मदद लिए या नौकरी छुड़वाए आसानी से यह गृहस्थी और नितिन के बालबच्चे संभाल सकती हूं. अगर मेरी बात पर भरोसा है तो किसी ऐसे का नाम बता दो जिसे तुम्हारे घर…’’

‘‘उस की फ्रिक मत करो, मम्मा. पापा के दोस्त अशोक अंकल अर्चना के मामा हैं,’’ नितिन ने बात काटी.

‘‘तुम्हें अगर मैं पसंद हूं तो हम आज ही अशोकजी से…’’ कि उन का मोबाइल बजने लगा, ‘‘हां रत्नावल्ली, बस, अभी आ रही हूं.’’ वे नितिन से बोलीं, ‘‘भई, इस से पहले कि ‘अईअईयो’ करती रत्नावल्ली अपने हलवे की कड़ाही उठाए यहां आ जाए, मैं उस का हलवा भुनवा कर आती हूं. तुम लोग बैठो.’’

‘‘हम भी चलेंगे, मम्मी. औफिस में छुट्टी नहीं है,’’ नितिन उठ खड़ा हुआ. ‘‘अय्यर आंटी के चक्कर में मम्मी ने तुम्हारा जवाब नहीं सुना. खैर, मु झे बता दो कि मम्मी कैसी लगीं?’’

‘‘अच्छी लगीं,’’ और बहुत मुश्किल से खुद को यह कहने से रोका कि ‘‘कुछ अटपटी या अजीब भी.’’

रात को सब लोग टीवी देख रहे थे कि पापा का मोबाइल बजा.  झुं झलाते हुए पापा ड्राइंगरूम से उठ कर चले गए. फिर कुछ देर के बाद मुसकराते हुए वापस आए, ‘‘तुम अशोक के दोस्त योगेश और उन की बीवी आशा से तो मिली हो न, रचना?’’

‘‘हां, बहुत अच्छी तरह जानती हूं चुलबुली, जिंदादिल आशा को. क्या हुआ उन्हें?’’

‘‘उन्होंने अपने बेटे नितिन के लिए अर्चना का हाथ मांगा है.’’

‘‘अरे नहीं, यह कैसे हो गया,’’ रचना चिल्लाई, ‘‘आशा से यह सुन कर कि चाहे वह कितनी भी मोटी और बेडौल हो जाए, जींस पहनना कभी नहीं छोड़ेगी, मैं ने सोचा था कि तब तो इस की बहू बड़ी सुखी रहेगी कि उस के जींस पहनने पर सास रोक नहीं लगाएगी. मु झे क्या पता था कि मेरी बेटी को ही यह सुख मिल सकता है.’’

‘‘मिल सकता नहीं, मिल गया है. अर्चना और नितिन एकदूसरे को पसंद करते हैं और अर्चना की सहमति के बाद ही उन लोगों ने प्रस्ताव भिजवाया है.’’

‘‘अरे वाह अर्ची, छिपी रुस्तम निकली तू तो. कब से चल रहा था वह सब?’’

‘‘मु झे खुद नहीं पता, मम्मी,’’ अर्चना ने रुंधे स्वर में कहा, ‘‘मैं ने तो नितिन से अपने औफिस में काम दिलवाने को कहा था. उस ने शादी का प्रस्ताव रख दिया और बोला कि मना करने से पहले मेरी मां से मिल लो और मु झे अपने घर ले गया.’’

घर पर क्या हुआ बताने के बाद अर्चना ने कहा कि उसे आशा का व्यवहार आपत्तिजनक तो नहीं, अटपटा जरूर लगा.

‘‘अटपटा क्यों लगा?’’

‘‘उन के कपड़े पहनने और बातचीत का तरीका बड़ा बिंदास सा है, उन की आयु के अनुरूप नहीं.’’

‘‘वह तो है, अपनी उम्र के अनुरूप व्यवहार नहीं करती आशा. मगर तेरे लिए तो यह अच्छा ही है. इतने सहज स्वभाव की सास मुश्किल से मिलती है,’’ रचना ने बात काटी और पति की ओर मुड़ी, ‘‘आप ने क्या कहा अशोकजी से?’’

‘‘कहना क्या था, योगेश का नंबर ले लिया है. चाय या खाने पर आने को कब कहूं, यह तुम बताओ.’’

रचना ने अर्चना की ओर देखा, ‘‘कल ही बुला लें?’’

‘‘इतनी जल्दी नहीं मां, मु झे थोड़ा सोचने का समय दीजिए.’’

‘‘उस का तो अब सवाल ही पैदा नहीं होता, अर्ची. तू शादी इसीलिए नहीं करना चाहती न, कि इस से तेरे कैरियर पर असर पड़ेगा और उस का समाधान तेरी सास ने कर दिया है. अरे तू चाहे तो आशा तु झे स्टांपपेपर पर लिख कर दे देगी कि शादी के बाद तु झे घरगृहस्थी की चक्की में नहीं पिसना पड़ेगा. अपनी पसंद का वर, हर तरह से उपयुक्त संपन्न घर और आशा जैसी खुशमिजाज सास के मिलने पर सोचने के लिए रह क्या गया है?’’ रचना ने कहा.

‘‘बिलकुल ठीक कह रही हो, रचना. मैं योगेशजी को फोन कर के कहता हूं कि जब भी सुविधा हो, आ जाएं,’’ और पापा मोबाइल पर नंबर मिलाने लगे.

अर्चना अपने कमरे में आ गई. कुछ देर के बाद नितिन का फोन आया, ‘‘बधाई हो अर्चना, पापा ने अभी बताया कि फोन पर तो हमारी शादी पक्की हो गई है. मिलनेमिलाने की औपचारिकता इस सप्ताहांत यानी 2 रोज बाद हो जाएगी. अब तो खुश हो न?’’

Drama Story

Aneet Padda: ‘सैयारा’ की सफलता के बाद इस ब्रैंड का चेहरा बनी अनीत

Aneet Padda: बौलीवुड की सब से ताजा चेहरा लैक्मे के उस विजन को दर्शाती है, जो नई पीढ़ी के लिए सहज और अभिव्यक्तिपूर्ण सौंदर्य की पहचान है.

भारत के पहले और सब से बड़े मेकअप ब्रैंड द हाउस औफ लैक्मे ने अनीत पड्डा को अपने नए चेहरे के रूप में स्वागत किया. इस सहयोग के साथ लैक्मे अपना अगला अध्याय शुरू कर रहा है, जो सीधे जैनरेशन Z से संवाद करता है- एक ऐसी पीढ़ी जो प्राकृतिक आभा, स्किनिफाइड फौर्मूला और परफैक्शन से ज्यादा आत्म अभिव्यक्ति के जरीए ब्यूटी को फिर से परिभाषित कर रही है.

दशकों से सक्रिय

दशकों से लैक्मे भारतीय सौंदर्य संस्कृति को आकार देने में सब से आगे रहा है. यह सिर्फ आइकन को सैलिब्रेट नहीं करता बल्कि उन्हें बनाता भी है.

अनीत के साथ यह ब्रैंड अपनी इस विरासत को आगे बढ़ा रहा है, एक नई आवाज को सामने ला कर जो युवा पीढ़ी के नए ब्यूटी कोड्स को दर्शाती है.

अनीत का फलसफा संतुलन पर आधारित है

मिनिमल का मतलब नो मेकअप नहीं है, बल्कि राइट मेकअप है. वह उस बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है जहां जैनरेशन Z अब ब्यूटी को नकाब नहीं बल्कि अभिव्यक्ति का साधन मानती है. उन की शैली प्राकृतिक आभा, हलके सुधार और रचनात्मक प्रयोगों का उत्सव है, जो प्रामाणिक, पहनने योग्य और हमेशा थोड़ा सा ऐक्सपेरिमैंट लगता है.

हाई कवरेज परफैक्शन

सुनंदा खैतान, वाइस प्रेसिडेंट, लैक्मे के अनुसार,”लैक्मे हमेशा से टेलैंट पहचानने और ब्यूटी कनवर्सेशंस को आकार देने में आगे रहा है. अनीत के साथ हम ब्यूटी के उस बदलते रूप को गले लगा रहे हैं जो हाई कवरेज परफैक्शन से सहज, अभिव्यक्ति पूर्ण और आधुनिक मेकअप की ओर बढ़ रहा है, जैसा जैनरेशन Z ब्यूटी को अनुभव करना चाहती है.

अनीत पड्डा ने खुशी जताते हुए कहा, “मेरे लिए मेकअप कभी छिपाने के बारे में नहीं रहा, यह हमेशा आप के असली रूप को दिखाने के बारे में है. मुझे वह मेकअप पसंद है जो सहज हो लेकिन फिर भी एक स्टेटमैंट दे. लैक्मे का दर्शन इसी संतुलन को दर्शाता है. मैं इस ब्रैंड के साथ साझेदारी कर बेहद उत्साहित हूं, जो क्रिएटिविटी को प्रेरित करता है और औरतों को आत्मविश्वास से प्रयोग और अभिव्यक्ति करने के लिए प्रोत्साहित करता है.”

इस साझेदारी के साथ लैक्मे भारतीय सौंदर्य का भविष्य गढ़ने वाले ब्रैंड के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करता है. व्यक्तित्व, रचनात्मकता और उन नई आवाजों को आगे ला कर जो नई पीढ़ी के साथ गहराई से जुड़ती हैं.

Aneet Padda

Avanti Patel: तवायफों के गानें आज की जैनरेशन तक पहुंचाना मेरा मकसद

Avanti Patel: बचपन से ही संगीत में रुचि रखने वाली खूबसूरत और हंसमुख अवंति पटेल शास्त्रीय और प्ले बैक सिंगर हैं. रियलिटी शो के सीजन 10 में आने के बाद वे पौपुलर हुईं.

मुंबई से संगीत में स्नातकोत्तर की डिगरी पूरी करने वाली अवंति के पिता पंकज पटेल गुजरात के एक वैस्कुलर सर्जन हैं, जबकि मां महाराष्ट्र की एक यूरोलौजिस्ट हैं. डाक्टर परिवार में पलीबड़ी हुईं अवंति को हमेशा हर काम की आजादी रही है. उन्होंने केवल 5 वर्ष की उम्र से शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू कर दिया था. पहले उन्होंने गुरु वर्षा भावे से शास्त्रीय गायन में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की और संगीत विशारद पूरा किया और हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की. वे वर्तमान में विदुषी अश्विनी भिड़े देशपांडे की शिष्या हैं, जो जयपुर अतरौली घराने से हैं.

13 साल की उम्र में अवंति ने फैसला लिया कि उन्हें संगीत के क्षेत्र में ही जाना है और उसी दिशा में प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया. उन की अलबम मोगरा मिस्क काफी चर्चित रही, जिस में उन्होंने ‘दमादम मस्त कलंदर…’, ‘तेरे बिन रसिया…’, ‘केसरिया बालम…’ आदि कई गाने गाए हैं. इस के अलावा वे कई गुजराती और मराठी फिल्मों की प्लेबैक सिंगर रही हैं.

तवायफों के गानों में छिपी होती है संघर्ष की कहानी 

इन दिनों अवंति शास्त्रीय संगीत को यूथ में फैलाने और उस के महत्त्व को समझाने के लिए कई शो ‘ओ गानेवाली’ हर बड़े शहरों में कर रही हैं, जिस में वे ठुमरी, दादरा जैसे गानों को एक मनोरंजक तरीके से परफौर्म करती है.

वे कहती हैं कि मैं ने रिसर्च किया, तो पता चला कि इन संगीत के बारे में आज के यूथ को बहुत कम जानकारी है. खासकर दादरा और ठुमरी गानों को तो वे जानते ही नहीं हैं, जिस में तवायफों के खुद के संघर्ष के साथसाथ सामाजिक और पोलिटिकल संघर्ष क्या थे, उन्हें वे जानते नहीं हैं. मीडिया से ले कर फिल्मों में जिस तरह से तवायफों के संगीत के बारे में कहा और दिखाया जाता है, वह उन सभी के जीवन से काफी अलग है.

“उस जमाने की सिद्देश्वरी बाई से ले कर रसुलन बाई सभी ने साड़ी पहन कर दादरा, ठुमरी जैसे गाने गाए हैं और उन के गाने का मकसद क्या था इन सभी बातों को गाने और कहानियों के माध्यम से बताने की कोशिश कर रही हूं. मैं उस जमाने की तवायफों के लिए एक ट्रिब्यूट है, जिसे मैं मुंबई, दिल्ली, बैंगलुरु, कोलकाता आदि कई शहरों में प्रस्तुत करती जा रही हूं,” अवंति ने बताया.

दादरा और ठुमरी है क्या

अवंति आगे कहती हैं कि दादरा और ठुमरी गाने वाली स्त्रियां बहुत कम उम्र से संगीत की तालीम ले रखी होती थीं, जिस में वे अपने मन के भाव को सब के सामने बिना झिझक रखती थीं. ठुमरी और दादरा दोनों हलके भारतीय शास्त्रीय गायन रूप हैं, जिन में ठुमरी की गति धीमी और विस्तृत होती है, जबकि दादरा तेज और अधिक चंचल होता है. दोनों में श्रृंगार रस, प्रेम या विरह के विषय होते हैं, लेकिन दादरा को अकसर इस्टर्न स्टाइल की ठुमरी का हलका संस्करण माना जाता है और इस में अधिक स्वतंत्रता व उन्मुक्तता होती है.

किए शोध

अवंति कहती हैं कि इन गानों को मंच पर लाने के लिए मैं ने कई किताबें और पेपर्स पढ़ी हैं, जिन में सबा दीवान की किताब ‘तवायफनामा’, यतींद्र मिश्र की ‘अख्तरी : बेगम अख्तर का जीवन और संगीत’ आदि हैं, जिस में तवायफों के जीवन की चुनौतियां और संघर्ष की कहानी विस्तार से लिखी गई है, ताकि लोग उन की भावनाओं को अच्छी तरह से महसूस कर सकें. हालांकि यह शो पिछले कई सालों से चला आ रहा है और यंग जैनरेशन इसे पसंद भी कर रही है. इस में मेरे साथ सिंगर ऋतुजा लाड गाते हैं. इस के अलावा इन सब गानों की एक अलबम भी बनाती हूं, जो औनलाइन कई जगहों पर फ्री में सुनने को मिलते हैं.

रास्ता था कठिन

आज की जैनरेशन को ऐसे गाने पसंद नहीं आते, ऐसे में इन्हें रुचिकर बनाना आसान नहीं था. वे कहती हैं कि पहले मेरे शो पर कम दर्शक आते थे, लेकिन जब कुछ युवाओं ने मेरी प्रस्तुति को देखा, तो उन्हें अच्छा लगा और माउथ टू माउथ इस की जानकारी एकदूसरे को मिली और वे अब पसंद करने लगे हैं. इस में मेरी कोशिश यह रहती है कि उन्हें मेरी बातें समझ में आएं, इसलिए मैं हिंदी के अलावा इंग्लिश में भी कहानियों को कहती हूं, जिस से उन्हें समझने में आसानी होती है और वे बारबार सुनने चले आते हैं.

मिली प्रेरणा

संगीत के क्षेत्र में आने की प्रेरणा के बारे में अवंति कहती हैं कि मेरे पेरैंट्स डाक्टर हैं, संगीत से उन का कोई संबंध नहीं है, लेकिन उन्हें कला और साहित्य पसंद हैं. मैं ने 5 साल की उम्र से संगीत की तालिम लेनी शुरू कर दी है. इसी वजह से मुझे संगीत से लगाव हुआ. थोड़ी बड़ी होने पर मुझे बेगम अख्तर और शोभा गुर्टू के गाने सुनना अच्छा लगता था. इस के बाद अश्विनी भिड़े देशपांडे से संगीत की तालिम लेनी शुरू की.

परिवार का सहयोग

अवंति का कहना है कि मेरी मां के परिवार में डाक्टर होने के बावजूद सभी संगीत सीखे हुए हैं. वे सब गाते हैं, लेकिन प्रोफैशनल सिंगर नहीं हैं. मैं जब छोटी थी, तभी मां को पता चल गया था कि मेरे अंदर संगीत की प्रतिभा है, इसलिए उन्होंने इस की तालिम छोटी उम्र से दिलाना शुरू कर दिया था. इस के बाद 13 साल की उम्र में रियलिटी शोज में भाग लिया और तभी से संगीत की दिशा में मेरा कैरियर शुरू हुआ, क्योंकि रियलिटी शो की वजह से लोग मुझे जानने लगे थे. वहां मैं ने परफौर्मेंस करना सीखा. मैं ने स्कूल में पढ़ाई करते हुए ही मंच पर प्रस्तुति देना शुरू कर दिया था. मैं ने मराठी और गुजराती के लिए प्लेबैक सिंगिंग भी किया है.

अच्छे लिरिक्स लिखने वालों की है कमी

गानों में अच्छे लिरिक्स का अभाव के बारे में पूछने पर अवंति कहती हैं कि आज के गीतकार कुछ नया नहीं लिखना चाहते. वैस्टर्न सोसाइटी को फौलो कर गाने लिखते जाते हैं. अगर नई जैनरेशन को अच्छे बोल, मेलोडियस गाने सुनने को मिलें, तो वे उन्हें जरूर पसंद करेंगे. यूथ की गलती नहीं है, उन्हें तो अच्छे लिरिक्स ही सुनने को नहीं मिलते. अगर कोई लिखेगा नहीं, तो उन्हें उस का स्वाद कैसे मिल सकेगा?

एक यंग आर्टिस्ट होने के नाते यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं यूथ को बढ़िया संगीत से परिचय करवाऊं. इस के लिए मैं केवल लाइव शो ही नहीं, रिकौर्डिड गाने भी उन तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हूं.

आगे की योजना

अवंति इस शो को विदेशों में भी परफौर्म करने की इच्छा रखती हैं. इस के लिए वे वहां की भाषा में स्क्रिप्ट को ट्रांसलेट करने की कोशिश कर रही हैं, ताकि उन्हें समझ में आए. यह उन के लिए चुनौती है, लेकिन मुश्किल नहीं.

Love Story: आई लव यू- क्या अनाया अपने प्यार को पा सकी

Love Story: केवल खुद के विचारों और नियमकायदे से घर चलाने की आदत ने सुशील को सब से अलगथलग कर दिया था. उन के घर में सबकुछ था मगर था नहीं तो एकदूसरे के लिए प्यार. फिर एक फरवरीका महीना था. यह समय प्यार करने वाले प्रेमियों के लिए बड़ा ही खास होता है. पूरा वर्ष सभी वैलेंटाइन डे का इंतजार करते हैं ताकि अपने प्यार का इजहार कर सकें. अतुल और अनाया के लिए भी यह दिन बहुत खास था. 4 माह पहले ही उन की शादी हुई थी. दोनों बहुत ही उत्साहित थे. आखिर उन का इंतजार पूरा हुआ और वह दिन आ ही गया.

अनाया को उपहार की आस थी. अतुल ने उस की यह आस पूरी करने के लिए एक बड़ी सी पार्टी रखी थी. अपने पड़ोस में रह रहे चिराग और स्वाति को भी उस ने अपनी पार्टी में आमंत्रित किया था.

चिराग के पिता सुशील को जब यह बात मालूम पड़ी तो वे अपने गुस्से पर नियंत्रण न कर पाए. वे अतुल के घर चले आए. अतुल के घर पर 80 वर्ष की उम्र पार कर चुके उस के दादाजी अजय और दादी के अलावा लगभग 50 वर्ष की आयु के अतुल के पापा विवेक और मम्मी संध्या, इतने लोगों का भरा पूरा संयुक्त परिवार था. 3 पीढि़यां साथ रहती थीं. सब के अलगअलग विचार, अलगअलग व्यवहार, फिर भी आपस में कोई खटपट नहीं.

परिवार में प्यार और सम?ादारी थी. सभी एकदूसरे की भावनाओं की कद्र करते और एकदूसरे का खयाल रखते थे. कोई किसी की आजादी को बाधित नहीं करता. इसीलिए परिवार में सुखशांति का माहौल हमेशा बना रहता था. पासपड़ोस के लोगों के लिए उन का परिवार एक उदाहरण था. गुस्से से बेकाबू हो रहे सुशील ने डोर बेल बजाई.

दादाजी ने दरवाजा खोला, जोकि इतनी उम्र होने के बावजूद काफी चुस्त और तंदुरुस्त थे.

‘‘अरे आओआओ सुशील,’’ अजय ने आदर के साथ उन्हें बैठने के लिए कहा.

अजय को देख कर सुशील का गुस्सा थोड़ा ठंडा पड़ गया फिर भी बैठने से इनकार करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘नहींनहीं अंकल मैं कुछ बात करने आया था.’’

‘‘बोलो न सुशील क्या बात है? आराम से बैठ कर बात करते हैं, आओ बैठो.’’

सुशील ने खड़ेखड़े ही कहा, ‘‘अंकल आप का पोता अतुल और बहू अनाया भले ही विदेशी संस्कृति में रम कर वैलेंटाइन डे मना रहे हों, मु?ो कोई फर्क नहीं पड़ता. किंतु उन्होंने मेरे चिराग और बहू को अपनी उस पार्टी में क्यों बुलाया? अंकल मेरे घर में भारतीय संस्कृति और भारतीय त्योहार माने और मनाए जाते हैं.’’

अजय ने प्यार से उन का हाथ पकड़ कर उन्हें बैठाते हुए कहा, ‘‘सुशील तुम नाराज मत हो.’’

‘‘अंकल मैं आप का पड़ोसी हूं, जानता हूं आप के घर में कभी खटपट, लड़ाई?ागड़ा नहीं होता क्योंकि आप लोगों में शायद जरूरत से कुछ ज्यादा ही सहनशक्ति है. आप सबकुछ देख कर भी अंधे व सुन कर भी बहरे हो जाते हैं. यह कहां तक सही है अंकल?’’

‘‘सुशील तुम बिलकुल गलत सम?ा रहे हो. क्या हुआ जो बच्चे अपने जीवन के कुछ पल आनंदमय बनाना चाहते हैं. एक अच्छे त्योहार को जिस में केवल प्यार ही प्यार है, उसे वे अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाना चाहते हैं.

सुशील सिर्फ अतुल और अनाया ने ही नहीं, हमारे तो पूरे घर ने वैलेंटाइन डे मनाया है. सब ने अपनेअपने तरीके से उस में खुशियां ढूंढ़ी हैं. सुशील वक्त के साथ बदलाव लाना बहुत जरूरी है.

‘‘अच्छी बातों, अच्छी चीजों को अपना कर हम अपनी संस्कृति को तिरस्कृत नहीं कर रहे. अपनी संस्कृति तो दुनिया की सब से श्रेष्ठ संस्कृति है, किंतु यदि बाहर की किसी अच्छी परंपरा को भी हम अपनाएं तो इस में बुराई क्या है? मेरी अनाया आज यदि जींसटौप पहन कर वैलेंटाइन डे की पार्टी मनाने गई है, हो सकता है अंगरेजी गानों पर डांस भी कर रही हो, लेकिन जब हमारी दीपावली आएगी तब वह भारतीय संस्कृति से हमारे संस्कारों से पूरी की पूरी तनमन से सजीधजी नजर आएगी. साड़ीब्लाउज, सिंदूर, मंगलसूत्र पहनी अनाया कभी अपने संस्कार नहीं भूलेगी. वह अपने बड़ों के पैर छू कर आशीर्वाद भी लेगी.’’

अजय के मुंह से निकली ये बातें सुशील के दकियानूसी विचारों को मानो एक ही पल में धराशायी कर गईं.

वे सोच रहे थे कि अंकल की बातों में कितनी सम?ादारी है. उन्हें लगने लगा कि उन्हें इस तरह यहां ?ागड़ा करने नहीं आना चाहिए था. जल्दबाजी में लिया फैसला अकसर गलत ही होता है. काश, उन के मन में भी अजय अंकल जैसी ही भावनाएं पहले से ही होतीं.

सुशील ने जिज्ञासावश पूछा, ‘‘अंकल, आप के बेटे विवेक और बहू संध्या ने किस तरह से वैलेंटाइन डे मनाया? क्या वे भी किसी ऐसी ही पार्टी में गए हैं?’’

‘‘नहीं बेटा, संध्या और विवेक ने अपनी तरह से वैलेंटाइन डे मनाया. वे दोनों फिल्म

देखने गए. खाना भी बाहर ही खा कर आएंगे. यदि हमारा तरीका सही है सुशील तो फिर इस

में बुराई ही क्या है? यह कोई बुरी बात तो है नहीं. हमें मर्यादा में रह कर इस त्योहार को

अवश्य मनाना चाहिए. माना यह हमारे देश की संस्कृति, हमारे त्योहारों का हिस्सा नहीं है लेकिन हम लोग तो खुशियां मनाने का एक भी मौका

नहीं जाने देते. यही तो है जिंदगी… अपने हिस्से की जितनी खुशियां उठा सकते हो जरूर उठा लो, जी लो.’’

सुशील एकटक अजय की तरफ देख रहे थे, उन की बातें ध्यान से सुन रहे थे. उन की बातों में उन्हें विरोध करने जैसा कुछ भी नहीं लगा. ऐसा लग रहा था मानो सुशील उन की हर बात को अपने अंदर ग्रहण कर रहे हैं.

तभी सुशील ने पूछा, ‘‘अंकल, क्या आप

ने भी…’’

‘‘हां सुशील क्यों नहीं? भला हम पीछे

क्यों रहते?

हम ने भी अपनी खुशियां बटोरीं.’’

‘‘कैसे मनाया आप ने अंकल?’’

‘‘मेरी पत्नी ज्यादा चल नहीं सकती, इसलिए उस का हाथ पकड़ कर धीरेधीरे उसे मंदिर तक ले गया. एकदूसरे के अच्छे स्वास्थ्य के लिए कुदरत से आशीर्वाद मांगा, फिर उसे एक गुलाब का फूल दिया.

‘‘इतने में उसे जैसे जीवन

की असीम खुशियां मिल गईं. मानो वह फिर से जवान हो उठी हो. सुशील मैं शुरू से एक ऐसा परिवार चाहता था, जहां साथ रहते हुए भी सब अपनी जिंदगी अपने मनमुताबिक जीएं.

‘‘आपस में प्यार और सम?ादारी हो. शुरू में लगता था ये सब सोचने तक ठीक है, लेकिन हकीकत में अमल में लाना मुश्किल है. सुशील मैं ने जो अनुभव किया वह यह है कि यदि कोई किसी के जीवन में दखलंदाजी न करे तो यह उतना मुश्किल भी नहीं.

‘‘बस इसी सिद्धांत ने मेरे संयुक्त परिवार को प्यार का

घर बना दिया. सच कहूं तो मंदिर बना दिया.’’

अजय के मुंह से निकला 1-1 शब्द आज

सुशील को एकदम सही लग रहा था. आज उन्हें यह बात सम?ा आ रही थी कि 3 पीढि़यां एकसाथ इतने प्यार से कैसे रहती हैं. कैसे जीवन को सुख और शांति से जीती हैं. आज अजय के शब्दों की गहराई को अपने अंदर समेटे हुए सुशील ने अजय के पैर छू कर उन्हें हैप्पी वैलेंटाइन डे कहा. अजय ने उन्हें गले से लगा लिया. फिर सुशील उन से विदा ले कर चले गए.

सुशील की पत्नी काफी आधुनिक विचारों की थीं, लेकिन अपने पति के डर से हमेशा अपनी इच्छाओं को अपने मन में ही दबा लेती थीं. उन की भी इच्छा होती थी कि उन का पति उन्हें न सही कम से कम बेटेबहू को तो उन की इच्छाओं के मुताबिक जीवन जीने दें. वे चाहती थीं कि कभी तो सुशील

उन्हें भी गुलाब का फूल ला कर प्यार सहित दें, किंतु ये सब उन के लिए केवल एक सपना मात्र था. इस तरह की ख्वाहिशों को अब तक तो वे अपने जीवन से रुखसत कर चुकी थीं.

सुशील की पत्नी अनामिका इस वक्त काफी तनाव में थीं. उन्होंने सुशील को अजय अंकल के घर जाते समय कहा था, ‘‘प्लीज, सुशील मत जाओ, अतुल ने हमारे बच्चों को पार्टी में बुलाया तो क्या हुआ. यदि हमें पसंद नहीं था तो न जाते. इस बात के लिए उन के घर जा कर नाराजगी दिखाने की क्या जरूरत है?’’

‘‘तुम शांत रहो, पहली बार में ही बात खत्म करने दो वरना यह पार्टी तो चलती ही रहेगी,’’ कह कर वे गुस्से में घर से निकल गए थे. अनामिका को यह डर भी सता रहा था कि रात को बेटेबहू के आने के बाद बहुत हंगामा होने वाला है. अनामिका मन ही मन विनती कर रही थी कि इन के क्रोध पर काबू रखना प्रभु. पड़ोसी हैं संबंध बिगड़ने नहीं चाहिए. आखिर जीवनभर का साथ है.

तभी दरवाजे पर डोर बेल बजी. अनामिका तुरंत डरते हुए दरवाजा खोलने पहुंचीं. सामने सुशील के हाथों में आज एक गुलाब नहीं लाल गुलाब के फूलों का पूरा गुच्छा था. अनामिका सुशील का यह रूप देख कर अवाक थीं. वे केवल दंग हो कर सुशील की तरफ देखे ही जा रही थीं. तभी दरवाजे के अंदर आ कर सुशील ने फूलों का गुच्छा और साथ में फिल्म के 2 टिकट अनामिका को देते हुए आज पहली बार कहा, ‘‘अनामिका हैप्पी वैलेंटाइन डे, आई लव यू.’’

अनामिका की आंखों से खुशी के मोती ?ार?ार गिर रहे थे और कान जैसे बारबार वही शब्द सुनना चाह रहे थे.

तभी सुशील ने कहा, ‘‘अनामिका, तुम नहीं कहोगी?’’

‘‘क्या कहूं?’’

‘‘वही जो मैं ने अभीअभी कहा था.’’

अनामिका ने शरमाते हुए आई लव यू कहा और फिर दोनों ने एकदूसरे को अपनी बांहों में भर लिया.

रात को वे जब फिल्म देख कर

वापस आए तभी उन के बच्चे भी पार्टी से वापस आए. सुशील ने बड़े ही प्यार से पूछा, ‘‘बच्चो कैसी रही पार्टी?’’

अपने पापा को इतना खुश देख कर अदिति और चिराग के मन का सारा डर रफूचक्कर हो गया.

सुशील रात को अपने बिस्तर पर लेटेलेटे सोच रहे थे कितने गलत थे वे जो उन्होंने अपने घर को केवल खुद के विचारों के बंधन में बांध रखा था जैसे वे उस स्कूल के प्रिंसिपल हों,

जहां केवल उन के बनाए कायदेकानून ही चलेंगे. अच्छा ही हुआ अजय अंकल ने उन की

आंखें खोल दीं और बगावत होने से पहले ही वे संभल गए वरना एक न एक दिन बगावत होनी तो पक्का ही थी. इस के बाद से उन के परिवार से भी खटपट की आवाजें आनी बंद हो गईं.

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