Winter Special: विंटर में स्नैक्स के लिए बनाएं भुट्टे के चीले

विंटर में रोजाना पकौड़े खाना हेल्थ के लिए अच्छा नही होता. पर अगर आप हेल्दी को टेस्टी लुक देकर कोई चाज बनाएं तो वो आपकी हेल्थ पर कोई असर नही डालती. आज हम आपको भुट्टे के चीले के बारे में बताएंगे, जिसे आप आसानी से कम समय में हेल्दी तरीके से बना सकते हैं. विंटर में भुट्टे आपको आसानी से मिल जाते हैं और अगर आपकी फैमिली को भी भुट्टे पसंद हैं तो ये डिश आपके लिए परफेक्ट है.

सामाग्री

-1 कप धुली मूंग दाल

-1 कप भुट्टे के दाने पिसे हुए

-1 चम्मच जीरा

-चुटकीभर हींग

-कुछ हरी मिर्च

-1/2 कप कटा प्याज व टमाटर

-कटा धनिया

-1 चम्मच लाल मिर्च पाउडर

-तेल 1 कटोरी

-नमक स्वादानुसार

विधि

– मूंग दाल को साफ करके धोकर 2 घंटे के लिए भिगो दें.

– भीगी दाल को जीरे-हरी मिर्च के साथ पीस लें. नमक डालकर अच्छी तरह मिलाएं.

– इसी तरह पिसे भुट्टों में प्याज-टमाटर और हरा धनियां मिलाकर थोड़ा सा नमक, लालमिर्च पाउडर भी डालकर रख दें.

– अब एक तवे में तेल गरम करें. छोटी सी कटोरी में मूंग का घोल लेकर उसे तवे पर डालकर फैला दें. इसे तवे पर चीले की तरह तलें. दो चम्मच भुट्टे का पेस्ट ऊपर से चीले पर डाल दें.

– चीले के किनारों पर थोड़ा तेल डालकर पकाएं और दूसरी तरफ पलट दें. धीमी आंच पर दो मिनट पकाएं. दोनों ओर से कुरकुरे हो जाने पर उतार लें और हरी चटनी के साथ अपनी फैमिली और बच्चों को स्नैक्स या ब्रेकफास्ट में सर्व करें.

बड़बोला: भाग-3

विपुल की बहन की शादी के दिन पूरे आफिस का स्टाफ नए शानदार चमकते कपड़े पहन कर आफिस आया. ऐसा लगा मानो आफिस बरातघर बन गया हो.

महेश को संबोधित करते हुए मैं ने पूछा, ‘‘क्या बात है, श्वेता नजर नहीं आ रही?’’

‘‘सर, आप भी क्या मजाक करते हैं, शादी से पहले अपनी ससुराल कैसे जा सकती है. बस, आज बहन की शादी हो जाए, अगले महीने विपुल का भी बैंड बजा समझें.’’

लंच के बाद सभी बस अड्डे पहुंच गए. थोड़ी देर इंतजार करने के बाद नवगांव की बस मिली. लगभग 4 बजे बस चली. बस चलते ही महेश और सुषमा शादी की बातें करने लगे, खासतौर से शादी के इंतजाम के बारे में और मैं उन की पिछली सीट पर बैठा मंदमंद मुसकराने लगा. तभी मेरे साथ सीट पर बैठे सज्जन ने बीड़ी सुलगाई और मेरे से पूछा, ‘‘भाई साब, क्या आप भी इन लोगों के साथ नवगांव जा रहे हैं बिहारी की छोरी की शादी में?’’

‘‘आप की बात मैं समझा नहीं,’’ मैं ने बीड़ी वाले सज्जन से पूछा.

बीड़ी का कश लगाते हुए उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम बांके है. मैं और बिहारी अनाज मंडी में दलाली करते हैं. बिहारी का छोरा नवयुग सिटी में किसी बड़े दफ्तर में काम करता है. ऐसा लगता है कि आप लोग उसी दफ्तर में काम करते हैं और उस की बहन की शादी में जा रहे हैं. मैं आप लोगों की बातों से समझ गया कि आप वहीं जा रहे हो, क्योंकि इतनी लंबी बातें पूरे नवगांव में बिहारी का खानदान ही कर सकता है. अगर इतना ही अमीर होता तो उस का लड़का 3 हजार की नौकरी करता, ठाट से 18 ट्रक चलाता.

‘‘बिहारी के महल्ले में रहता हूं, आप सब जिस दाल मिल की बात कर रहे हैं उसे बंद हुए 10 साल हो गए हैं. मैं और बिहारी उस दाल मिल में नौकरी करते थे. जब मिल बंद हुई तब से अनाज मंडी में दलाली कर रहे हैं,’’ बीड़ी का कश लगाते हुए बांके की आवाज में व्यंग्य था.

बांके की बातें सुन कर हम सब सकते में आ गए. सब की बोलती बंद हो गई और भौचक से एकदूसरे की शक्ल देखने लगे. साहस जुटा कर बड़ी मुश्किल से आवाज निकाल कर सुषमा बोली, ‘‘अंकल, आप सच कह रहे हो, कहीं मजाक तो नहीं कर रहे हो.’’

बांके ने एक और बीड़ी सुलगाई, फिर कश लगाते हुए बोला, ‘‘नवगांव पहुंच कर देख लेना. मेरी कोई दुश्मनी थोड़े है. इतना गपोड़ी निकलेगा, पता नहीं था. पूरा नवगांव बिहारी को एक नंबर का गपोड़ी मानता है पर बेटा तो बाप से भी दस कदम आगे निकला.’’

अब बाकी का रास्ता काटना दूभर हो गया. सभी इस सोच में थे कि जल्दी से नवगांव आ जाए और हकीकत से सामना करें. तभी बस एक पुरानी बिल्ंिडग के सामने रुकी. तब बांके ने कहा, ‘‘नवगांव आ गया, यह खंडहर ही दाल मिल है, जहां बिहारी क ा छोरा 18 ट्रक चला रहा है.’’

हम सब टूटे मन से बस से उतरे. अब करते भी क्या, कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था. जो दाल मिल 10 साल से बंद है उस की हालत खंडहर से कम क्या और ज्यादा क्या. कच्ची टूटी सड़क पर हम कारपेट ढूंढ़ते रह गए. अब स्टाफ का सब्र टूट गया, सब विपुल को गालियां निकालने लगे, अपनी झूठी शान के लिए विपुल इतना बड़ा झूठ बोलेगा, इस की उम्मीद किसी को नहीं थी.

तभी सामने से एक तांगे में कुछ कारपेट और कुरसियों के साथ विपुल आता दिखाई दिया. उसे देख कर सुषमा जोर से चिल्लाई, ‘‘विपुल के बच्चे, नीचे उतर. हमें बेवकूफ बना कर कहां जा रहा है. इन टूटी गड्ढे वाली सड़कों पर चल कर हमारी टांगें टूट गई हैं और तू मजे में तांगे की सवारी कर रहा है.’’

हमें देख कर विपुल तांगे से नीचे आ कर बोला, ‘‘आइए सर, कारपेट बिछने के लिए गली में जा रहे हैं. बांके अंकल, तांगे का सामान घर पहुंचवा दो, मैं सर के साथ हवेली जाता हूं.’’

महेश ने विपुल का कालर पकड़ कर पूछा, ‘‘बेटे, इतना झूठ बोलने की क्या जरूरत थी. इतने महंगे कपड़े पहन कर आए, सब खराब करवा दिए, अगर सच बता देता तब भी शादी में आते, तब और ज्यादा खुशी होती. पागल बना कर रख दिया, अब राष्ट्रपति भवननुमा हवेली के दर्शन भी करवा दे, उस को भी देख कर तृप्त हो जाएं.’’

शायद विपुल को हमारे आने की उम्मीद नहीं थी. एक पल के लिए वह हमें देख कर सन्न रह गया, लेकिन हर बड़बोले की तरह चतुराई से बातें बनाने लगा. ऐसे व्यक्ति आदत से मजबूर…हार नहीं मानते. बात को पलटते हुए बोला, ‘‘आइए सर, हवेली चलते हैं. आप सफर में थक गए होंगे, कुछ जलपान कर लेते हैं.’’

थोड़ी देर पैदल चलने के बाद हम सब हवेली में पहुंच गए. हवेली एक पुरानी इमारत निकली. हवेली को देख कर लगता था कि किसी समय जमींदार की रिहाइश रही होगी, जो अब एक धर्मशाला बन कर रह गई है, जिस के 2 तरफ कमरे बने हुए थे और बाकी 2 तरफ खाली मैदान. रोशनी के नाम पर 3-4 खंभों पर बल्ब लटक रहे थे. 2-3 कमरों में कुछ हलचल हो रही थी, जहां वरपक्ष के पुरुष तैयार हो रहे थे, कुछ महिलाएं तैयार हो कर तांगे पर बैठ कर जा रही थीं. तभी विपुल ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘हमारे यहां औरतें बरात के साथ नहीं जातीं, इसीलिए पहले हमारे घर जा रही हैं.’’

हलवाई ने विपुल के आग्रह पर कुछ पकौड़े तल दिए और चाय बना दी. जलीभुनी बैठी सुषमा जलीकटी सुनाने लगी, ‘‘विपुल, तू ने यह अच्छा काम नहीं किया, इतना झूठ तो कोई अपने दुश्मन से भी नहीं बोलता. सारा मेकअप खराब हो गया, इतनी महंगी साड़ी धूल से सन गई, ड्राईक्लीनिंग के पैसे तेरे से लूंगी.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ झेंपती हंसी के साथ विपुल बोला.

‘‘इतनी भूख लग रही है और खिलाने को तुझे ये सड़े हुए बैगन और सीताफल के पकौड़े ही मिले थे. नहीं चाहिए तेरी दावत. इस से तो उपवास अच्छा,’’ कहते हुए सुषमा ने पकौड़े की प्लेट विपुल को ही पकड़ा दी. विपुल ने एक पकौड़ा मुंह में डालते हुए कहा, ‘‘सुषमा, नाराज नहीं होते, फाइव स्टार होटल से अच्छे पकौड़े हैं.’’

‘‘तेरे घर का एक बूंद पानी भी नहीं पीना,’’ सुषमा तमतमाती हुई बोली.

‘‘सर, इस में नाराजगी की क्या बात है. आप इतनी दूर से आए हैं, कुछ तो लीजिए,’’ पकौड़ों की प्लेट मेरे आगे करते हुए विपुल ने कहा.

एक पकौड़ा खाते हुए मैं सुषमा से बोला, ‘‘छोड़ो नाराजगी, भूखे पेट रहना ठीक नहीं, कुछ खा लो,’’ लेकिन सुषमा टस से मस नहीं हुई. उस ने कुछ नहीं खाया.

सुषमा और महेश ने अपनी नाराजगी विपुल को जाहिर कर दी. बाकी स्टाफ चुप रहा, लेकिन मेरे समेत सभी दुखी थे.

आगे पढ़ें- हम विपुल के घर गए तो…

पति का मजाक उड़ाने से पहले सोचें

‘‘ बेटा, खाना ठीक से खाना. बेटा, वक्त पर सो जाना. बेटा, घर का खयाल रखना. बेटा, फोन करते रहना. अच्छा मम्मीजी. मम्मीजी के बेटेजी, अब हम चलें क्या?’’आस्था ने अपनी सास के अंदाज में ही महेश से मजाक किया, तो महेश का चेहरा उतर गया. महेश का सिर्फ चेहरा ही नहीं उतरा, वह मन से भी उखड़ गया. हर वक्त अपनी पत्नी आस्था का खयाल रखने वाला महेश बातबात पर खीजने लगा. एक छोटा सा मजाक प्यार भरे रिश्ते की दीवार बन गया. आस्था चाह कर भी वह दीवार लांघ नहीं पा रही थी. आस्था ने तो सीधा सा मजाक ही किया था, पर महेश को चुभ गया. कई बार हम अपने ही शब्दों के तीखेपन को नहीं पहचान पाते. पर जिसे तीर लगता है वह उसे भूल नहीं पाता और रिश्तों में खटास आने लगती है. बेहतर है कि ऐसी बातें जबान पर लाई ही न जाएं.

‘‘तुम्हारी मम्मी को पैसों की बड़ी चिंता रहती है,’’ मीना ने राजेश से मजाक किया. बात तो मजाक की ही थी. पर उस का अर्थ राजेश को चुभ गया. कुछ विषयों पर पतियों की आलोचना करते हुए मजाक न ही करें तो बेहतर है. दरअसल, आप नहीं जानतीं कि कौन सी बात या वस्तु उन के दिल के कितने नजदीक है और वे उसे कितना चाहते हैं. बहुत बार आप ने पुरुषों को देखा होगा कि वे अपने सिर के 2-4 बालों पर कितने प्यार से कंघी करते हैं, बारबार आईना देखते हैं. सोचिए, अगर उन्हीं 2-4 बालों को आप ने मजाक का विषय बनाया, तो क्या होगा? ‘‘इन की तो सड़क ही साफ है. इन्हें यह भी नहीं पता चलता कि कहां तक साबुन लगाना है और कहां तक मुंह धोना है.’’ रजनी ने मोहन के बारे में कहा और वह भी अपने मायके में, तो मोहन को बात चुभ गई. अब मोहन रजनी के मायके के नाम से भी चिढ़ने लगा है. बालों की तरह अपने चेहरे के मोटे, पतले या खराब होने पर किसी तरह की टीकाटिप्पणी उन्हें नहीं भाती, भले ही आप शब्दों को चाशनी में लपेटलपेट कर परोसें. पति फौरन चाशनी और मजाक के भाव को अलग कर देते हैं और भावार्थ दिल तक ले जाते हैं. यही पतिपत्नी के रिश्तों की दूरियां बढ़ा देता है.

रजनी जैसी ही एक बात रीटा के मुंह से भी निकल गई, जब किसी ने पूछा, ‘‘तेरे पति कहां हैं, दिख नहीं रहे?’’

‘‘मेरे चुन्नेमुन्ने किसी के पीछे छिप गए होंगे.’’

रीटा ने ‘चुन्नेमुन्ने’ शब्द पति के छोटे कद के कारण प्यार से कहा. पर किसी के सामने कह दिया, यही खल गया रोहन के मन को. रोहन को बुरा लगा कि वह अपने कद को बदल तो नहीं सकता, फिर सब के सामने मुझे ‘चुन्नेमुन्ने’ क्यों कहा. 

रिश्तों में कड़वाहट

अपने कद की तरह कोई अपने रिश्तेदारों को, उन की सूरतों को, उन के बात करने के अंदाज को भी बदल तो नहीं सकता न. फिर पत्नी अगर इन बातों को अपने मजाक का विषय बनाए, भले ही मजाक उड़ाना उस का उद्देश्य न हो, पति को कभी पसंद नहीं आएगा. अगर पत्नी ने कोई ऐसा तीर छोड़ दिया, तो वह फूल की तरह तो लगने से रहा. शूल की तरह मन में चुभता ही रहेगा और पत्नी चाह कर भी शूल निकाल नहीं पाएगी. एक अन्य विषय पत्नियों के मजाक का हो जाता है, वह यह कि अगर पति महोदय किसी खास व्यक्ति के स्वागत में बौराने लगें.

‘‘आओजी, बैठो जी, लाओजी, ठंडा पियोजी, चाय पियोजी. न न न अभी नहीं जा सकते आप. बैठो न. रह जाओ न. ऐसे कैसे जाने देंगे. फलांफलां.’’ भले ही मेहमान महिला नहीं पुरुष हो, पति के इस अंदाज में उतावला हो जाने पर स्वाभाविक है कि पत्नी मजाक कर दे. मजाक हुआ तो समझिए पत्नी की इज्जत का पत्ता भी साफ हुआ. पति सोच बैठते हैं कि पत्नी फलां मेहमान से जलती है. मैं इज्जत करता हूं किसी की, तो इस से बरदाश्त नहीं होता. ऐसे में पत्नी के मजाक पर पति अपना ध्यान केंद्रित कर के उसे ही दोषी मान लेता है. उस का तर्क होता है, ‘‘जब मैं किसी की इज्जत करता हूं तो मेरी पत्नी को भी करनी चाहिए,’’ मेरा तो मन खट्टा हो गया. उसे पत्नी ही मेहमान की प्रतिद्वंद्वी लगने लगती है.

एक विषय बहुत नाजुक

पिछली सभी बातों और विषयों को नजरों से ओझल भी कर दें, तो एक खास विषय है जिस पर कोई भी पति, कोई भी मजाक सुनना पसंद नहीं करता. वह है पति के यौनांग पर और उस के सहवास करने के तरीके पर. उस पर कोई भी मजाक होने पर पति के मन में पत्नी के प्रति कड़वाहट भर जाती है. नीना सोने के लिए कमरे में आई ही थी कि आशू को देख कर उस के मुंह से निकल गया, ‘‘तुम तो पहले से ही तैयार बैठे हो.’’ बात कुछ भी नहीं थी पर आशू को चुभ गई. उस के बाद तो हालात कुछ ऐसे बने कि नीना कहती रहे पर आशू का हर बार एक ही जवाब होता था ‘‘मूड नहीं है.’’

मीनाक्षी ने भी कुछकुछ नीना जैसा ही मजाक किया था, ‘‘चूहे की तरह कुतरकुतर क्या करते हो?’’ लो, नारंग तो मरे चूहे जैसा ही ठंडा हो गया. सहवास के दौरान ऐसे मजाक तो रिश्तों पर बहुत ही भारी पड़ जाते हैं. बहुत सी बातें देखसुन कर खामोश रह जाने की होती हैं. उन से जुड़े मजाक, मजाक उड़ाना ही कहलाते हैं. अपने मन की कड़वाहट या प्रश्नों को, शब्दों में न ही ढालें तो बेहतर होगा. मजाक करें भी तो सोचसमझ कर. उन विषयों पर कतई मजाक न करें, जिन्हें पति बदल नहीं सकता या वे उस के नितांत व्यक्तिगत हों.

जूतों की बदबू को कहें बाय-बाय

आपके जूते से बदबू आने के कारण आपके साथ-साथ आपके घरवाले और आस पास के लोग भी परेशान होते हैं. आप हमेशा सोचते हैं कि आखिर क्यों आपके पैर और जूते से इतनी बदबू आती है. हालांकि पैरों से बदबू आने का मुख्य कारण बैक्टीरिया होते हैं लेकिन जिन लोगों को बहुत अधि‍क पसीना आता है या फिर जो लोग बहुत गंदे से रहते हैं, उनके जूते से भी बदबू आना शुरू हो जाती है.

अगर जूते गंदे हैं तो गंदगी के पैर में चिपकने की आशंका भी बढ़ जाती है. ये गंदगी बाद में कई बीमारियों का कारण भी बन सकती है.

ऐसे में आप चाहें तो इन उपायों को अपनाकर अपने जूतों की बदबू दूर कर सकते हैं.

  • हर रोज एक ही जूता पहनने से परहेज करें.
  • दो जोड़े जूते रखें और उन्हें बदल-बदलकर पहनें. इससे जूतों के भीतर मौजूद आपके पसीने की नमी को सूखने का समय मिल सकेगा और इससे बदबू पैदा नहीं होगी.
  • अपने जूतों के भीतर मेडिकेटेड इन-सोल लगाएं. इससे पसीना जल्दी सूख जाएगा.
  • जब भी बाहर से लौटें, जूतों को तुरंत उतार दें. जूते उतारने के बाद उनमें पेपर बॉल या फिर पेपर भर दें. अखबार अंदर की सारी नमी सोख लेता है जिससे बैक्टी‍रिया पनपने नहीं पाते हैं.
  • जूतों के अन्दर थोड़ा सा बेकिंग पाउडर डालकर छोड़ दें. इससे नमी भी सूख जाएगी और बदबू भी नहीं आएगी.
  • अगर जूते गीले हो जाएं तो उन्हें ड्रायर से सुखा लें.

Winter Special: दांतों के आधुनिक उपचार

चिकित्सा जगत में अब दांतों के आधुनिक उपचार में क्रांति आई है. दांतों के आधुनिक उपचार की मांग तो बढ़ी है, लेकिन जानकारी न होने के कारण कई मरीजों को इस का खमियाजा भुगतना पड़ता है. एक ही सेशन के दौरान होने वाली कई प्रक्रियाओं जैसे दांतों को सफेद करना, ब्लीचिंग, लैमिनेट, वेनीर, मसूढ़ों की सर्जरी इनेमेलोप्लास्टी आदि से लोगों को न सिर्फ संतुष्टि मिलती है, बल्कि बिना कारण के भी औसतन से अधिक हंसने लगते हैं. लेकिन इन प्रक्रियाओं के दुष्प्रभावों को जानने के बाद आप के लिए यह निर्णय करना आसान हो जाएगा कि आप बिना कारण कुछ दिन तक हंसना चाहते हैं या फिर हमेशा के लिए अपनी हंसी को अपने पास संजो कर रखना चाहते हैं.

दांतों को सफेद कराना या ब्लीचिंग कराने की प्रक्रिया को एक सेशन मेें ही किया जा सकता है. लेकिन क्या आप इस के लिए उपयुक्त उम्मीदवार हैं?सब के लिए यह जानना आवश्यक है कि दांतों पर ब्लीचिंग का असर सिर्फ कुछ हफ्तों तक ही रहता है इसलिए इसे बारबार और जल्दीजल्दी कराना पड़ता है. फिर हर बार उतनी चमक नहीं आती जितनी कि शुरुआत में आती है. इस का सब से बड़ा दुष्प्रभाव तो यह होता है कि बारबार ब्लीचिंग कराने से दांत कमजोर हो जाते हैं और आगे चल कर इन के जल्दी ही गिरने की आशंका रहती है. दांत जल्दी सड़ जाते हैं, खुरदुरे हो जाते हैं और दांतों के बीच फ्रेक्चर लाइन बन जाती है. तो क्या ये सब जानने के बाद आप मुसकराना चाहेंगे?

अब कई आधुनिक तकनीकों केक आने से ब्लीचिंग के लिए सही सदस्यों का चयन कर पाना आसान हो गया है. एडवांस्ड पावर जूम भी एक ऐसी ही तकनीक है. इस के दौरान प्रोफेशनल तरीके से दांतों को चमकाया जाता है. इस के शतप्रतिशत परिणामस्वरूप जादू जैसा असर देखने को मिलता है. शेड गाइड पर तुलना करने से पता चलता है कि यह दांतों को 6-8 शेड अधिक चमकदार बनाता है. इस का असर कम से कम दो सालों तक रहता है अन्यथा ब्लीचिंग या अन्य उत्पादों का इस्तेमाल करने से केवल एक या दो शेड ही चमक मिलती है व इस का प्रभाव केवल कुछ समय तक ही रहता है.

लैमिनेट

लैमिनेट धातु से बने पतले कवर की तरह होते हैं जिन्हें पीले, भूरे दांतों की गंदगी, फ्लोराइड दाग आदि को छिपाने के लिए लगाया जाता है. यह पुरानी मगर विशष्ट प्रक्रिया है. लेकिन यहां भी वही सवाल उठता है कि क्या आप इस के लिए उपयुक्त उम्मीदवार हैं?

लैमिनेट कैप या क्राउन का बेहतर विकल्प माना जाता है. कैप के मुकाबले इस में दांतों को 75 % काटना पड़ता है. तकनीकी तौर पर इस प्रक्रिया के दौरान सामने से दांतों के आकार को केवल 0.5 मि.मी. से अधिक नहीं काटना पड़ता है. जबकि कैप लगाने के लिए दांतों के चारों तरफ से उसे 1.5 मि.मी. काटना पड़ता है. इस के अलावा कैप लगवाने वाले दांतों में पहले रूट कैनाल ट्रीटमेंट आरसीटी कराना पड़ता है. इस से दांत निष्क्रिय हो जाते हैं, उन तक कोई पौष्टिक आहार आदि नहीं पहुंचता और दांत जल्द ही कमजोर हो जाते हैं.

हालांकि कैप और लैमिनेट दोनों का खर्चा लगभग बराबर ही होता है लेकिन कैप के साथ आरसीटी कराने का खर्चा अलग से करना पड़ता है यानी कैप अधिक महंगा पड़ता है.

मसूढ़ों की सर्जरी या एनेमेलोप्लास्टी

हर कोई इन प्रक्रियाओं के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता. इस से दांतों को नुकसान हो सकता है. दांतों पर लगने वाले ब्रेसिस चलिए किसी अवस्था के बारे में सोचते हैं. कोई लड़की जिस के दांत टेढ़ेमेढ़े हैं और 2-3 महीने में उस की शादी होने वाली है. वह अपने दांतों के लिए कोई उपचार ढूंढ़ रही है. लेकिन उसे लगभग हर दंत रोग विशेषज्ञ यही कहेगा कि ब्रेसिस लगाने की उस की उम्र समाप्त हो चुकी है. और अगर ब्रेसिस लगाए भी गए तो उन्हेें अपना परिणाम देने में लगभग 1 वर्ष का समय लगेगा. लेकिन यह एक मिथ्य है कि किशोर ब्रेसिस नहीं लगवा सकते या फिर हर केस में परिणाम आने में 1 वर्ष का समय लगेगा. यह उपचार किसी भी उम्र में किया जा सकता है. इस का परिणाम भी 3-4 महीनों में आ जाता है. लेकिन यह मरीज के ऊपर निर्भर करता है कि वह उम्र भर के लिए आरसीटी करा के नकली कैप लगा कर हरना है कि फिर उम्र भर के लिए प्राकृतिक मुसकराहट चाहिए. इस का निर्णय मरीज को सोचसम?ा कर करना चाहिए. अगर हम खर्चे की बात करें तो किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि ब्रेसिस का खर्चा लैमिनेट की तुलना में 50 से 70 % तक कम होता है.

मुसकराहट की बनावट

किसी भी दंत उपचार के लिए विज्ञान की बहुत बड़ी भूमिका होती है. लैमिनेट का आकार हर व्यक्ति व हर दांत के लिए अलग होता है. यह आप के चेहरे के आकार पर भी निर्भर करता है. अगर आप का चेहरा गोल, अंडाकार, लंबा, छोटा है और आप के दांत छोटेबड़े, चौड़े, पतले, टेढ़े या ?ाके हुए हैं या फिर ऊपरनीचे के दांत कम दिखते हैं या कई केसों में आगे के नीचे वाले दांत ऊपरी दांतों को बारबार रगड़ देते हैं जिस से ऊपरी दांत घिसने लगते हैं तो ऐसे में आसानी से ब्रेसिस लगाए जा रहे हैं.

दांतों की सुरक्षा या खूबसूरती की एक दंत रोग विशेषज्ञ जिसे स्माइल आर्किटेक्ट भी कहा जाता है, आज के लिए बहुत जरूरी है और कोई भी सौंदर्य उपचार इस के बिना पूरा नहीं है. दांतों के उपचार में अवेजेनेटिक का भी रोल रहेगा. आप के शरीर के जीन के कोड के अनुसार टूटे या सड़े दांतों को ठीक करना सर्जनों के लिए आम हो जाएगा. डा. थिमि और मितसैदीस, जो यूनीवर्सिटी औफ ज्यूरिक में हैं. अब दांतों के एनेमल और आप के शरीर के जीन पर काम कर रहे हैं.

आखिर संजय मिश्रा मनोहर कहानियां से कैसे हुए प्रेरित, पढ़े इंटरव्यू

अभिनेता संजय मिश्रा के लिए ’वध’ एक ऐसे फिल्म की कहानी है,जो आज की दुनिया में उन सभी पैरेंट्स को समर्पित है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन बच्चो के पालन –पोषण के लिए लगा दिया है,लेकिन आज वे अकेले जीने पर मजबूर है, उन्हें देखने वाला कोई नहीं,उनकी समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं है. ‘वध’ ऐसे ही दुखद परिस्थिति को समाप्त करने की दिशा में लिया गया कदम है, जिसे वह जायज समझता है. इसमें मुख्य चरित्र मनोहर कहानियां है, जो इस परिस्थिति से निकलने में शंभूनाथ मिश्रा को मदद करता है. इंटरव्यू के दौरान संजय कहते है कि मैं ऐसे कई अंकल आंटी से मिला हूँ, जिसने दुनिया तो बनाई थी, पर वे अब अकेले रह गए है. किसी ने सही लिखा है कि बच्चों को दीवारों पर लिखने दो, उन्हें चिल्लाने दो, शरारत करने दो ,क्योंकि एक समय आएगा जब घर खाली होगा, आप अकेले होंगे, चारों तरफ शांति होगी. हालांकि संजय मानते है कि इसे वध नाम देने की वजह किरदार की सोच है,क्योंकि वध पापियों का किया जाता है,जबकि हत्या एक बड़ी क्राइम है. उनका आगे कहना है कि अगर रावण का वध नहीं होता, तो वह कईयों की हत्या कर सकता था. इसलिए उसके वध को जायज माना गया.

रहे काम से दूर

अभिनेता संजय ने हमेशा कॉमेडी और अलग तरीके की फिल्में की है, इन्होंने अधिकतर हिन्दी फ़िल्मों तथा टेलीविज़न धारावाहिकों में अभिनय किया है. वर्ष 2015 में उन्हें आँखों देखी के लिए फ़िल्मफ़ेयर क्रिटिक अवॉर्ड फ़ॉर बेस्ट एक्टर से नवाजा गया. वे एक इमोशनल इंसान है और पिता की मृत्यु के बाद कई साल तक फ़िल्मी दुनिया से दूर रहे और दूसरों के लिए काम किया. उनका कहना है कि जिंदगी केवल खुद के लिए काम करना नहीं होता, दूसरों के लिए भी बहुत कुछ करने की जरुरत है और वह निस्वार्थ भाव से करना पड़ता है. इससे एनर्जी बढती है.

प्रेरित करती है मनोहर कहानियां  

लीक से हटकर फिल्म वध उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण थी.उनका कहना है कि मुझे हमेशा से ही अलग भूमिका निभाना पसंद है, इस फिल्म की कहानी को जब लेखक ने मुझे मानकर लिखा है, तो ना कहने की कोई बात नहीं थी. मैंने तैयारी अधिक नही की, क्योंकि ऐसी स्टोरी मैंने मनोहर कहानियों में पढ़ा है. मुझे याद आता है, जब मैंने ट्रेन से जाते हुए कई डेस्टिनेशन को मनोहर कहानियां पढ़ते हुए पार किया है.

मिली प्रेरणा

बनारस के रहने वाले संजय मिश्रा को फिल्म और संगीत से बहुत अधिक लगाव था और उन्हें फिल्मों में एक्टर, डायरेक्टर, कैमरामैन या कॉस्टयूम डिज़ाइनर किसी एक में काम करने  का शौक बचपन से था, इसलिए उन्होंने दिल्ली के एन एस डी से एक्टिंग का कोर्स किया और मुंबई अपने दोस्त के साथ आ गए. मुंबई आकर उन्हें काम मिलना आसान नहीं था.कई प्रोडक्शन हाउस में पिक्चर्स दिए, कई अच्छे दोस्त मिले और कुछ दिनों बाद उन्हें ‘ओह डार्लिंग ये है इंडिया’ में काम करने का मौका मिला इसके बाद से उन्हें पीछे मुड़कर देखना नहीं पड़ा.

मिला परिवार का सहयोग

उनकी इस जर्नी में परिवार का बहुत बड़ा योगदान रहा है, इसमें पहले वे अपने पेरेंट्स और शादी के बाद पत्नी किरण मिश्रा का हाथ मानते है. संजय का कहना है कि मेरी पत्नी ने हर समय मेरा साथ दिया है, पिथौडागढ़ के डीडीहाट की रहने वाली किरण से जब मेरी अरेंज शादी हुई, तो मैंने शादी के तुरंत बाद उसे गाड़ी चलाने की ट्रेनिग लेने को कहा, ताकि उसके लिए मुंबई में काम करना आसान हो.मेरी दोनों बेटियां पल (13वर्ष)और लम्हा (9वर्ष ) की है. दोनों की पढाई की सारी जिम्मेदारी किरण निभाती है. मुझे उनकी शिक्षा के बारें में अधिक ध्यान नहीं देना पड़ता. मेरी लड़कियां खूब मजेदार और शरारती है. समय मिले तो उनके साथ अधिक से अधिक समय बिताना पसंद करता हूँ.

गृहशोभा के लिए मेरा कहना है कि इस पत्रिका को मैंने बचपन से आजतक देखा है, पहले मेरी माँ और अब मेरी पत्नी इसे पढना पसंद करती है. ये एक प्रोग्रेसिव पत्रिका है,  इसलिए हर नागरिक को इसे पढना चाहिए और मैं इस पत्रिका को हर मुश्किल हालात में  टिके रहने और अपनी जिम्मेदारी को बनाए रखने के लिए पब्लिकेशन को बधाई देता हूँ.

वध फिल्म रिव्यू: संजय मिश्रा व नीना गुप्ता का शानदार अभिनय

 रेटिंग: साढ़े तीन स्टार

निर्माताः लव रंजन, अंकुर गर्ग,जतिन चैधरी,मयंक जोहरी,नीरज रुहिल

लेखक व निर्देशकः जसपाल सिंह संधू व राजीव बरनवाल

कलाकारः संजय मिश्रा, नीना गुप्ता, मानव विज,सौरभ सचदेव, दिवाकर कुमार, तान्या लाल, उमेश कौशिक, अभितोश सिंह राजपूत, प्रांजल पटेरिया व अन्य.

अवधिः दो घंटे

बौलीवुड ही क्या पूरे संसार में अब तक कोई ऐसी फिल्म नही बनी है, जिसमें एक मशहूर मासिक पत्रिका भी एक अहम किरदार के रूप में नजर आया हो. मगर कई पंजाबी फिल्मों के निर्माता जसपाल सिंह संधू ने पहली बार राजीव बरनवाल संग निर्देशक बनकर रोमांचक फिल्म ‘‘वध’’ की कहानी लिखते समय ही ‘दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन’ की मशहूर पत्रिका ‘मनोहर कहानियां’ को भी एक किरदार के रूप में पेश किया है.

फिल्म की कहानी का सार संजय मिश्रा के एक संवाद- ‘‘हमने हत्या नहीं, वध किया है.’ में ही निहित है.

 

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कहानीः

फिल्म की कहानी ग्वालियर में रह रहे अवकाश प्राप्त शिक्षक शंभूनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा) और उनकी पत्नी मंजू मिश्रा (नीना गुप्ता) के इर्द गिर्द घूमती है. शंभूनाथ मिश्रा मध्यम वर्गीय दुबले पतले,बेबस,गरीबी और अकेलेपन से जूझ रहे बुजुर्ग व्यक्ति हैं. जिनके घर में चूहे को मारा नहीं जाता, बल्कि पकड़ के कहीं छोड़ दिया जाता है, कि उनके हाथों कहीं हत्या न हो जाए. पर उन्हे ‘मनोहर कहानियां’ पत्रिका पढ़ने का शौक है.

शंभूनाथ मिश्रा ने अपने बेटे दिवाकर मिश्रा (दिवाकर कुमार) को पढ़ाकर इंजीनियर बनाया. फिर पुत्र मोह में बेटे दिवाकर की जिद के चलते प्रजापति पांडे (सौरभ सचदेवा) से ब्याज पर पच्चीस लाख रूपए उधार लेकर बेटे को अमरीका भेजा, इस उम्मीद में कि बेटा वहां कमाकर कर्जा उतार देगा. मगर छह वर्ष से दिवाकर आया ही नहीं. बल्कि उसने वहां शादी कर ली. मकान भी खरीद लिया.

यहां शंभूनाथ को बार बार प्रजापति पांडे अपमानित करता हरता है. पर पेसा भेजना तो दूर दिवाकर के पास अपने माता पिता से बात करने का भी वक्त नहीं है. प्रजापति पांडे शराबी व अय्याश युवक इंसान है, जिसकी एक सुंदर पत्नी व छोटी बेटी भी है. पर प्रजापति आए दिन इन बुजुर्ग दम्पति को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ता. कभी उनके घर पर शराब, मटन व लड़की लेकर पहुंच जाता है ओर मिश्रा जी के घर में लड़की के साथ कुकर्म करता है. कभी उन्हें सरेआम पीटता है. मजबूरन शंभूनाथ व उनकी पत्नी मंजू, प्रजापति के हाथों प्रताड़ित होते रहते हैं.

मगर एक दिन रात में जब मंजू मंदिर की आरती में सम्मिलित होने गयी होती हैं, तब प्रजापति पांडे, शंभूनाथ पांडे के घर पहुंचकर एक ऐसा काम करने के लिए कहता है कि मिश्रा जी के सब्र का बांध टूट जाता है और वह किचन से स्क्रू ड्रायवर लाकर प्रजापति के गले में ठूंसकर उसकी हत्या कर देते हें, पर वह इसे हत्या नहीं वध की संज्ञा देते हैं.

अब पुलिस अफसर शक्ति सिंह (मानव विज) और इलाके का विधायक (जसपाल सिंह संधू) भी अपनी पोल खुल जाने के डर से पांडे की मौत का सुराग लगाने लगते हैं. शंभूनाथ साफ कह देते हैं कि उन्हे प्रजापति के बारे में कोई जानकारी नहीं है. सब इंस्पेक्टर, शंभूनाथ मिश्रा के घर से ‘मनोहर कहानियां’ पत्रिका पढ़ने के लिए ले जाता है.

अचानक शंभूनाथ का जमीर जागता है और दो दिन बाद वह पुलिस स्टेशन अपना जुर्म कबूल करने पहुंच जाता है. वहां सब इंस्पेक्टर उनकी बात पर यकीन करने की बजाय कहता है कि आप यह कहानी वही सुना रहे हैं,जो कि ‘मनोहर कहानियां’ के जुलाई अंक में पेज नंबर 23 पर छपी है. पर मामला ठंडा नही होता.

पुलिस की जांच पड़ताल में तेजी आ जाती है. क्या पुलिस हत्यारे को पकड़ पाती है? इसके लिए फिल्म देखना ही ठीक रहेगा. जीत और निराशा की परस्पर विरोधी भावनाओं के साथ फिल्म समाप्त होती है.

 

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लेखन व निर्देशन:

लेखक व निर्देशक जसपाल सिंह संधू और राजीव बरनवाल ने फिल्म को यथार्थ लुक देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. कहानी ग्वालियर की है, तो ग्वालियर में ही शूटिंग कर शहर के रहन सहन सहन के साथ ही झलक भी उकेरा है. शुरू से अंत तक रोमांच बना रहता है. मगर इंटरवल से पहले फिल्म सुस्त गति से आगे बढ़ती है. शंभूनाथ व मंजू की बेबसी देखकर दर्शक को उनके साथ हमदर्दी भी होती है और दर्शक यही सोचता रहता है कि शंभूनाथ को सजा न हो.

ऐसा उत्कृष्ट पटकथा लेखन व निर्देषन के चलते ही संभव हो पाया है. फिल्म देखकर अहसास ही नही होता कि दोनो ने पहली बार निर्देशन में कदम रखा है. यदि इस कहानी में रहस्य का पुट भी रहता, तो फिल्म और बेहतर हो सकती थी.

लेखक व निर्देशक ने जिस तरह से फिल्म में मनेाहर कहानियां पत्रिका को एक किरदार के तौर पर उपयोग किया है, वह भी कमाल की बात है. लेखक व निर्दशक ने फिल्म का जिस मोड़ पर अंत किया है, वह हृदयस्पर्शी है. इस तरह के अंत की कल्पना लोग कर भी नहीं सकते.

यह फिल्म महज अपराध की रोमांचक कहानी नहीं है, बल्कि यह फिल्म इस बात को भी रेखांकित करती है कि हर माता पिता को अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए, मगर यह प्रयास पुत्र मोह में अंधे हो कर न करें.

 

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अभिनयः

कर्ज तले दबे हताश पिता व बुजुर्ग शंभूनाथ के किरदार में संजय मिश्रा का अभिनय शानदार है. कई दृष्यों में वह अपने भाव शून्य अभिनय से दर्शकों को अंदर तक दहला देते हैं. परेशान होते हुए भी पत्नी के सामने मजबूत बने रहना संजय मिश्रा जैसे कलाकार के वश की ही बात है.

संजय मिश्रा की पहचान हास्य कलाकार के रूप में रही है. लेकिन फिल्म ‘आंखों देखी’ से उनके अभिनय का एक नया आयाम लोगों के सामने आया. उसके बाद ‘कांचली’,‘होली काउ’ जैसी कई फिल्मों में उनके अभिनय को काफी सराहा गया. इसी क्रम में फिल्म ‘वध’ में वह अपने अभिनय को एक नया आयाम, नई उंचाईयां प्रदान करते हैं.

मंजू मिश्रा के किरदार में नीना गुप्ता के हिस्से कम संवाद आए हैं, मगर उनका अभिनय कमाल का है. संजय मिश्रा व नीना गुप्ता के बीच की केमिस्ट्री हर किसी को याद रह जाती है. आम जिंदगी की परेशानियां और उनकी आपस की नोंकझोक दर्शक को अपने घर की याद दिलाती है.

नीना गुप्ता और संजय मिश्रा दोनों ही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित कलाकार हैं. नीना गुप्ता बीच में अभिनय से दूर हो गयी थीं. लेकिन फिल्म ‘बधाई हो’ से उन्होंने ऐसी धमाकेदार वापसी की, कि लोग फिल्म दर फिल्म उनके अभिनय को देखकर चकित हो रहे हैं.

प्रजापति पांडे के किरदार में सौरभ सचदेवा को देखकर लोग उससे नफरत जरुर करेंगें. भ्रष्ट पुलिस अफसर शक्ति सिंह के किरदार में मानव विज अपनी छाप छोड़ जाते हैं.

Hansika Motwani ने सुसराल में बनाया हलवा, पति ने दिया ऐसा रिएक्शन

इन दिनों शादिया को सीजन चल रहा है ऐसे मे सिलेब्रिटी भी शादी करते हुए नजर आ रहे है. ऐसे में हंसिका मोटवानी भी शादी के बंधन बंध चुकी है एक्ट्रेस ने हाल ही में जयपुर में सुहेल खतुरिया के साथ अपनी शादी रचाई है. वही अब हंसिका ससुराल पहुंच गई है औरससुराल सबको हलवा बनाकर खिला रही है.

 

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जी हां, हंसिका मोटवानी ने अपने बॉयफ्रेंड सुहेल खतुरिया के साथ सात फेरे लिए है कपल ने शादी 4 दिसंबर को की थी, हालांकि अब एक्ट्रेस अपने ससुराल पहुंच गई है और रीती रीवाजों के हिसाब से पहली रसोई  की है. ऐसे में उन्होंने सबके के लिए हलवा बनाया और सबको खिलाया है. और इसे जुड़ी फोटो भी शेयर की है

 

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फोटो में नई नवेली दुल्हन नीले रंग के चिकनकारी कुर्ते में नजर आ रही हैं. गले में डायमंड का मंगलसूत्र और हाथों में लाल चूड़ा पहले एक्ट्रेस बेहद प्यारी लग रही हैं. टेबल पर रखे कटोरे में से हलवा निकालते हुए हंसिका स्माइल कर रही हैं. उनके पास में एक ज्वेलरी बॉक्स रखा हुआ भी नजर आ रहा, जो शायद उन्हें पहली रसोई पर गिफ्ट के तौर पर मिला है. पोस्ट को शेयर करते हुए सोहेल कथुरिया ने हंसिका के लिए हार्ट इमोजी बनाया और साथ में नजर इमोटिकॉन भी पोस्ट किया. अब ये स्टार कपल करीबी दोस्तों को रिसेप्शन पार्टी कब देगा. इसकी अपडेट जल्द ही मिल जाएगी.

Bigg boss 16 के मंच पर पहुंचींं शहनाज गिल, सलमान के साथ किया डांस

कलर्स टीवी का रियलिटि शो बिग बॉस 16 मीडिया की सुर्खियो में बना हुआ है. शो में हर दिन नए टिवस्ट शो को और बेहतर बना रहे है शो टीआरपी की रेस में भी टॉप चल रहा है इससे पहले घर में वाइल्ड कार्ड एंट्री भी हुई है, ऐसे में बिग बॉस की विजेता शहनाज गिल भी मंच पर पहुंची है.

आपको बता दे, कि बिग बॉस16 का प्रोमो वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है प्रोमो वीडियो में दिखाया गया है कि सलमान खान से मिलने नए गेस्ट आए है जिसने मंच पर धूम मचा दी है. जीं हां शो के स्टेज पर शहनाज गिल पहुंची है जिन्होंने अपना प्रफोमेंस भी दी है. उन्होंने गाने पर डांस कर सबको एंटरटेन किया है.

शहनाज गिल सलमान खान से मिलने और अपना आइट सॉन्ग प्रमोट करने शो पर पहुंची और दिल दिया गला पर जमकर डांस किया. बता दे, कि शहनाज अपना गाना घनी सयानी को प्रमोट करने बिग बॉस में पहुंची है.

वही शो में आज के एपिसोड में एमसी स्टेन घर से बेघर हो सकते हैं. शुरू से ही एमसी को इस घर में रहने का मन नहीं था. इस बार सलमान खान के सामने भी एमसी स्टेन ने यही बात कही है. अब देखना ये दिलचस्प होगा कि एमसी स्टेन इस शो में रहते हैं या नहीं. वहीं इस हफ्ते के लिए 4 सदस्य घर से बेघर होने के लिए नॉमिनेट है, जिसमें सुंबुल तौकीर खान, निमृत कौर, टीना दत्ता और एमसी स्टेन का नाम शामिल है.

कुछ समय से मेरे घुटनों में दर्द हो रहा है, कहीं यह गठिया का लक्षण तो नहीं है?

सवाल-

मैं 40 वर्षीय कामकाजी महिला हूं. कुछ समय से मेरे घुटनों में दर्द हो रहा है. किसी-किसी दिन तो तकलीफ इतनी बढ़ जाती है कि रोजाना के कामकाज यहां तक कि चलनेफिरने में भी परेशानी महसूस होने लगती है. मन ही मन बहुत चिंतित हूं कि इतनी कम उम्र में ही घुटने बिगड़ गए तो आगे जीवन कैसे चलेगा, कहीं यह गठिया का लक्षण तो नहीं है? समस्या आगे न बढ़े, उस के लिए मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब-

क्या मुझे किसी डाक्टर के पास जाना चाहिए? 40 की उम्र में शुरू हुए घुटनों के दर्द के पीछे कई प्रकार के गठिया और घुटनों के तंतु व स्नायु पेशियों का चोटिल होना जिम्मेदार हो सकता है. रह्यूमेटाइड आर्थ्राइटिस, औस्टियोआर्थ्राइटिस, दूसरे कई तरह के आर्थ्राइटिस तो दोषी हो ही सकते हैं, कहीं उठतेबैठते, चलतेफिरते, दौड़तेभागते तंतु और स्नायु पेशियों को पहुंची ऐसी भी बड़ी समस्या बन जाती है. आप योग्य और्थोपैडिक सर्जन रह्यूमेटाइड से संपर्क करें. दोष का पता कर उपचार कराएं.

दिल्ली-एनसीआर में आर्थराइटिस की एक बड़ी वजह अंडरग्राउंड वौटर या बोरवेल के पानी का इस्तेमाल भी है. डाक्टरों का कहना है कि अंडरग्राउंड वौटर में फ्लोराइड की अधिक मात्रा से लोगों की हड्डियों के जौइंट खराब हो रहे हैं. उन्हें आर्थराइटिस और ओस्टियो आर्थराइटिस जैसी बीमारी हो रही है. देश के जिन इलाकों में अंडरग्राउंड वौटर में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है, उनमें दिल्ली भी शामिल है.

इंडियन कार्टिलेज सोसायटी और आर्थराइटिस केयर फाउंडेशन के अध्यक्ष डा. राजू वैश्य ने बताया कि दिल्ली के वेस्ट, नौर्थ-वेस्ट, ईस्ट, नौर्थ ईस्ट और साउथ वेस्ट जोन में इस बीमारी के मरीज ज्यादा हैं. आए दिन लोग इलाज के लिए पहुंचते हैं. उन्होंने बताया कि फ्लोराइड युक्त पानी लगातार पीने से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं. जोड़ों में कड़ापन आ जाता है. इसके बाद आर्थराइटिस और ओस्टियो आर्थराइटिस जैसी समस्याएं हो जाती हैं. गंभीर स्थिति में हाथ-पैर की हड्डियां टेड़ी हो जाती हैं. जब कोई ज्यादा फ्लोराइड वाला पानी लगातार पीता है तो उसे फ्लोरोसिस होने का खतरा भी होता है. जिन एरिया में पाइपलाइन की सप्लाई नहीं है, वहां बोरवेल का पानी खूब इस्तेमाल हो रहा है.

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