Stories :फरवरी की अलसाई सी शाम थी. दिल्ली की हवा में गुलाबी ठंड का नशा माहौल में रोमानियत घोल रहा था. ऐसे में साउथ ऐक्स के ‘कैफे ब्लू हैवन’ के कोने वाली बड़ी टेबल पर 11 लोगों का गु्रप मस्ती कर रहा था. उन की उम्र 38 से 42 के बीच थी. सब के सामने समोसे, सैंडविच, कुकीज, कैपेचीनो, अदरक वाली चाय वगैरह रखे थे. सब के चेहरों पर वीकैंड वाली छुट्टी की रौनक थी. इन में कुछ लड़के थे और कुछ लड़कियां. कुछ शादीशुदा और बच्चे वाले थे जबकि कुछ उम्र के इस पड़ाव पर भी सिंगल रह कर ऐश की जिंदगी जी रहे थे. सब जिंदगी को खुल कर जीने और पसंदीदा लोगों के साथ वक्त गुजारने के आदी थे इसलिए साथ थे. ये अकसर सैटरडे संडे यहां जमा होते, साथ वक्त बिताते, खातेपीते और फिर थिएटर देखते.
43 साल के अजय ने समोसा खाते हुए कहा, ‘‘सुनो, आज शाम 6:30 बजे का शो है श्रीराम सैंटर में, ‘आषाढ़ का एक दिन,’ टिकट मैं ने बुक कर लिए हैं सब के लिए.’’
41 साल की शालिनी 2 बच्चों की मां थी. उस ने अपनी मजबूरी रखी, ‘‘यार मेरी सास की तबीयत फिर डाउन है. मैं थिएटर के बाद सीधी घर भागूंगी. कल फिल्म के लिए भी मु झे मत गिनना.’’
40 साल की सिंगल नेहा मुसकराती हुई बोली, ‘‘यार शालू तू टैंशन मत ले. तेरा पौपकार्न का कोटा मैं खा लूंगी.’’
सब ने मिल कर ठहाका लगाया. कौफी के घूंट के साथ 3 साल पुरानी दोस्ती की
गरमाहट ने हमेशा की तरह आज भी सब के चेहरों पर मुसकान सजा रखी थी.
यह ‘सैटरडे वाला गैंग’ था. इसे रीमा ने शुरू किया था. तलाक के बाद जो खालीपन था उसे मंडी हाउस के अंधेरे हाल में बैठ कर भरती थी. धीरेधीरे नेहा मिली, फिर काव्या, फिर शालिनी, फिर अजय और अंकुर, फिर अनुज और कीर्ति और अंत में केशव, राज और प्रिया ने गु्रप जौइन किया. कुछ एकदूसरे को कालेज के समय से जानते थे तो कुछ गैंग में आने के बाद घनिष्ठ हुए. इस गैंग में कोई बैंक में काम करता था, कोई एड एजेंसी में, कोई एमएनसी में, कोई आर्टिस्ट और कोई फ्रीलांसर था.
ये हर सैटरडे 4 बजे कौफी हाउस में मिलते, कौफी पीते हुए मस्ती करते और फिर थिएटर का रुख कर लेते. संडे औप्शनल था जब फिल्म, ऐग्जीबिशन या बस लंबी गपशप का प्लान बनता. थिएटर में पूरा गैंग आता. फिल्म के नाम पर 4-5 बचते. पर मजाल है जो हर वीक के गु्रप फोटो में कोई कम हो. मंडी हाउस की सीढि़यों पर वे अपनी वीकली पिक ले कर सोशल मीडिया पर शेयर करते.
इस गु्रप का मैंबर राज 41 साल का था. फ्रीलांसर फोटोग्राफर था और मस्तमौला टाइप का इंसान था. कई बार उसे बड़ेबड़े फोटोग्राफी के असाइनमैंट मिलते और कई बार अपना खुद का काम करता. वह अकेला ग्रेटर कैलाश में रहता था. उसी गु्रप की नेहा 40 साल की थी. एक कंपनी में क्रिएटिव डाइरैक्टर थी और अभी तक सिंगल इंडिपैंडैंट लाइफ जी रही थी. वह गु्रप की सब से शांत लेकिन सब से इंटैलिजैंट मैंबर थी. हर तरह के कपड़े पहनती मगर बहुत डिसिप्लिन वाली लाइफ जीती. थिएटर के बाद जब सब चहक रहे होते तो वह कोने में बैठ कर प्ले का पोस्टमार्टम करती. राज को अकसर उस के औब्जर्वेशन सुनने में मजा आता और दोनों एकसाथ कहीं कोने में बैठ जाते.
वह एक मौनसून का दिन था और भारी बारिश हो रही थी. ‘हयवदन’ का शो कैंसिल हो गया और सब कैफे में ही अटक गए. एकएक कर के सब निकल गए और बच गए राज और नेहा. दोनों एक कहानी पर डिस्कशन कर रहे थे. रात होने लगी तो उन्हें भी घर निकलने का खयाल आया. मगर नेहा सोच रही थी कि कैसे जाए. उस का घर करीब 1 घंटे की दूरी पर था और ऐसे मौसम में कैब मिलनी भी कठिन हो जाती है.
राज ने पूछा, ‘‘तुम्हें भीगने से डर लगता है?’’
नेहा ने खिड़की से बाहर देखा और बोली, ‘‘नहीं लेकिन भीगने के बाद वाली चिपचिप से डर लगता है. तुम क्यों रुके हो? निकल जाओ.’’
राज बोला, ‘‘तुम्हें अकेला छोड़ने का मन नहीं कर रहा.’’
माहौल में खामोशी थी. सिर्फ बारिश की बूंदों की आवाज हो रही थी. पहली बार नेहा ने राज की आंखों में देखा. वहां ठहराव था. 41 साल की उम्र का ठहराव जो यंग लड़कों में नहीं होता. बहुत देर तक दोनों एकदूसरे की आंखों में देखते रहे और फिर करीब आ गए. एक नशा और खिंचाव सा दोनों को महसूस हो रहा था. दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षित थे मगर उस वक्त कुछ कह नहीं सके.
उस दिन के बाद दोनों अकसर सब के जाने के बाद भी कुछ समय साथ बिताने लगे. वे आपस में खूब बातें करते. थिएटर की बात से शुरू हो कर ‘तुम्हारी फैवरिट बचपन की किताब’ तक डिस्कसन होता.
एक दिन राज ने बताया, ‘‘मैं 10 साल का था जब पापा ने मु झे कैमरा खरीद कर दिया.
फोटोग्राफी का काम इसलिए लिया ताकि अपनी मरजी से काम कर सकूं. कोई मु झे 10 से 6 के काम में बांध न सके.’’
‘‘तो क्या जिंदगी में कभी किसी बंधन में बंधने का इरादा नहीं? रिश्तों के बंधन में भी नहीं?’’
‘‘अगर बांधने वाली तुम्हारे जैसी कोई ब्यूटी विद ब्रेन हो तो विचार बदल भी सकता हूं,’’ राज ने दिल की बात कुछ इस तरह से कही कि दोनों हंस पड़े.
फिर गंभीर होते हुए राज ने नेहा का हाथ थाम लिया और पूछा, ‘‘क्या तुम मेरे लिए सीरियस हो नेहा?’’
नेहा ने कुछ कहा नहीं बस आंखों से स्वीकृति दे दी. इस के बाद 2-3 महीने दोनों ने डेटिंग की, साथ वक्त गुजारा और एकदूसरे को सम झने की कोशिश की. उन के बीच का प्यार बढ़ता गया और फिर बिना देर किए दोनों ने शादी का प्लान बना लिया. घर वालों और दोस्तों को खबर दी गई तो सब ने इस फैसले का स्वागत किया. शादी वाले दिन पूरा गैंग खुशी से नाच
रहा था. दोस्तों ने एक शानदार दावत दी. राज के साथ नेहा ने नई जिंदगी की शुरुआत की. नेहा राज के घर आ गई और दोनों साथ रहने लगे. अपनेअपने काम से छुट्टी ले कर दोनों हनीमून पर भी हो आए.
हनीमून से लौटने के बाद की पहली सुबह थी. नेहा की आंख औटो पायलट पर खुली. सुबह 5:25 बजे थे. वह पिछले 15 सालों से सुबह 5.00 बजे उठ कर मैडिटेशन करती थी. यह उस का रूटीन था. मगर अब रूटीन में कई दफा थोड़े चेंज लाने पड़ते थे. चेंज लाना उसे पसंद नहीं था इसलिए हनीमून से लौटते ही उस ने डिसाइड किया कि वापस रूटीन फौलो करेगी. उस ने करवट ली. बगल में राज गहरी नींद में सोया था. पहली बार कोई उस की मैडिटेशन मैट और बुद्धा के बीच में सो रहा था.
वह दबे पांव उठी. योगा मैट बिछाई. अगरबत्ती जलाई. ‘ऊं’ की आवाज गले में ही थी कि नेहा का फोन का वाइब्रेशन मोड पर ऐक्टिव हो गया. योगा मैट के पास पड़ा फोन कांप रहा था. स्क्रीन पर ‘सैटरडे वाला गैंग’ का गु्रप काल शो हो रहा था.
नेहा ने एक लंबी सांस ली. काल काट कर फिर से मैडिटेशन की तैयारी करने लगी.
अब राज का फोन बज उठा था. राज के फोन में इनकमिंग रिंग का वौल्यूम बहुत तेज था. नेहा ने आंखें खोलीं. फोन उठाया. आवाज में हलकी इरिटेशन थी, ‘‘हैलो.’’
पूरा गैंग खिलखिलाता हुआ बोला, ‘‘भाभीईईई गुड मौर्निंग. राज भैया उठे नहीं क्या? कैसा रहा हनीमून? कल कितने बजे मिल रहे हो?’’ पीछे से शालिनीकाव्या की हंसी गूंज उठी.
नेहा ने थोड़ा सा झल्लाते हुए कहा, ‘‘यार अभी 5:33 हुए हैं. मैं मेडिटेट कर रही हूं और राज सो रहा है.’’
‘‘हम तो बस… एक्साइटेड थे.’’
‘‘यह एक्साइटमैंट 11 बजे ब्रंच पर भी दिखा सकते थे तुम लोग?’’
रीमा बोली, ‘‘सौरीसौरी नेहा आदत है न. पहले तो तू खुद 6 बजे ग्रुप में गुड मौर्निंग जीआईएफ भेजती थी…’’
नेहा ने बात काटी, ‘‘पहले की बात और है रीमा. पहले मैं 5.30 तक मैडिटेशन कर के फ्री हो जाती थी. मगर अब मेरा वक्त बंट रहा है सो नो मौर्निंग काल्स, नो जीआईएफ, इस वक्त नो हनीमून रिव्यू. सबकुछ अच्छा था. अब ब्रंच पर मिलते हैं तो डिस्कस करेंगे. बाय,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया.
राज की नींद भी टूट चुकी थी. वह कंबल में से बोला, ‘‘क्या हुआ? हमारे गैंग का था?’’
नेहा बोली, ‘‘हां हनीमून कैसा रहा यह डिस्कस करनी थी.’’
राज ने जम्हाई ली, ‘‘पागल हैं सब. तू टैंशन मत ले. उन्हें लगा होगा पहले तो…’’
नेहा ने मैट ठीक करते हुए कहा, ‘‘पहले मैं ‘मिस नेहा’ थी राज और अब मैं ‘मिसेज नेहा’ हूं. ‘मिस’ के टाइमजोन और ‘मिसेज’ की बाउंड्री अलग होती है. यह बात मेरे गैंग को भी सम झनी पड़ेगी.’’
यह केवल उस दिन की बात नहीं थी. इस तरह की डिस्टर्बैंस अब अकसर नेहा को सहने पड़ती थी. टाइमबेटाइम कभी गु्रप का फोन आता कभी राज की बहन का तो कभी किसी और रिश्तेदार का. पहले नेहा अपना फोन साइलैंट पर रख कर निश्चिंत हो कर मैडिटेट करती. औफिस के काम निबटाती. मी टाइम ऐंजौय करती. मगर अब सब बदल गया था. नेहा फोन नहीं उठाती तो लोग राज को रिंग करते और राज कभी भी फोन साइलैंट मोड में नहीं रखता था. समस्या यहीं पर शुरू हो जाती थी.
शादी को डेढ़ महीना बीत गया था. दोनों की जिंदगी बदल गई थी. जिंदगी के साथ
एकदूसरे के प्रति रवैया भी तेजी से बदलने लगा था. जब दोनों अलगअलग रहते थे तब एकदूसरे की अच्छाइयां दिखती थीं मगर दोनों को यह नहीं पता था कि साथ रहना आसान नहीं होगा. दोनों को अब एकदूसरे की खामियां नजर आने लगी थीं. दरअसल, दोनों का स्वभाव बिलकुल अलग था. जिंदगी को देखने और सम झने का नजरिया भी मेल नहीं खाता था.
नेहा थी डिसिप्लिन वाली लाइफ जीने की आदी. उसे हमेशा सबकुछ परफैक्ट चाहिए था. मगर राज इस मामले में बिलकुल अलग था. वह अपना सामान इधरउधर रख देता. टौवेल बिस्तर पर, फाइलें बालकनी में और फोन गुसलखाने में. पहले राज के बिखरा सामान मेड संभाल कर जाती थी. वह राज के औफिस जाने के बाद तक काम करती थी. राज ने उसे एक चाबी दे रखी थी. मगर अब नेहा ने मेड को सुबहसुबह आने को कहा था. मेड 1 घंटे में काम कर के चली जाती. बाद में नेहा औफिस के लिए निकलती और लास्ट में राज सबकुछ बिखेर कर जाता. नेहा लौटती तो सब समेटती और गुस्सा होती.
शादी के 2 महीने बाद राज की बहन प्रीति घर आई. वह करीब 45 साल की 2 बच्चों की मां थी और अकसर राज के घर आती रहती थी. जब राज अकेला रहता था तो प्रीति घर आ कर उस की हैल्प कर जाती थी. वह 8-10 दिनों के लिए आती, आराम से पूरे घर में घूमतीफिरती, अपने मन का पकातीखाती और राज की किचन में जो भी चीजें घट रही होतीं या कुछ खराब हो रहा होता तो उसे मैनेज कर जाती. राज की अलमारियां संवार जाती और कपड़े धो कर प्रैस कर के रख जाती. घर में और कोई कभी हो तो उसे सही कर जाती. उस दौरान पूरा घर उस के अधिकार में होता और वह अपनी मनमरजी से राज के घर को सजाती. मगर अब सबकुछ बदल गया था और घर में बहू यानी नेहा आ गई थी. प्रीति को एहसास था कि अब घर पर या किचन पर उस का अधिकार नहीं रहेगा. इसलिए वह एक मेहमान की तरह राखी पर 5 दिन के लिए आई.
पहले जब आती, राज के बैचलर बैड और बड़े कमरे पर कब्जा कर लेती. राज के घर में 2 बड़े कमरे थे और एक छोटा सा गैस्ट रूम था. इस बार उसे नेहा ने गैस्ट रूम में ठहराया था जहां का एसी भी खराब था. किचन का साम्राज्य पहले प्रीति के हाथ में होता था. मगर इस बार नेहा ने अपने हिसाब से किचन सजा रखी थी. राज की अलमारी, उस की फाइलें, उस का सबकुछ नेहा की निगरानी में था. सुबह प्रीति किचन में घुसी. सिंक में कुछ बरतन जूठे पड़े थे. रात में नेहा के सोने के बाद राज ने मैगी बनाई थी.
प्रीति ने दाल चढ़ाई. टेस्ट की. तब तक नेहा किचन में आई.
नेहा ने दाल चखते हुए कहा, ‘‘प्रीति दी, नमक थोड़ा तेज है. राज को बीपी की दिक्कत है.’’
प्रीति का हाथ रुक गया. यही दाल उस का भाई 10 साल से खा रहा था. कभी कुछ नहीं बोला. प्रीति ने कुछ नहीं कहा. बस खुद को थोड़ा और समेट लिया और 4 दिन में ही अपने घर लौट गई.
इसी तरह दिन गुजरने लगे. उस दिन शाम 7:30 बजे नेहा घर आई. घर का हाल बेहाल था. बैड पर सिलवटें, बेसिन में मग, सोफे पर मोजे, बैड पर टौवेल. राज अकसर 9 बजे तक लौटता था.
नेहा ने फोटो भेजते हुए व्हाट्सऐप किया, ‘‘राज यह हमारा घर है होटल नहीं है.’’
राज ने रिप्लाई किया, ‘‘रिलैक्स यार, थक जाता हूं. तू तो वैसे भी जल्दी आती है.’’
नेहा का मैसेज आया, ‘‘तो घर भी मैं ही संभालूं? तुम गैस्ट हो यहां? आदमी की तरह नहीं रह सकते?’’
यह मैसेज पढ़ कर राज को बहुत गुस्सा आया. उस ने कोई जवाब नहीं दिया. राज घर लौटा तो नेहा के साथ उस का जोरदार झगड़ा हुआ.
उस रात दोनों ने अलगअलग खाना खाया. एक ही छत के नीचे 2 अलगअलग कोनों में अपनेअपने मोबाइल और लैपटौप के साथ दोनों बैठे रहे.
यह बात गैंग तक पहुंची. गैंग ने पंचायत बैठाई. संडे को फिल्म का प्लान कैंसिल किया गया. कैफे ब्लू में इमरजैंसी मीटिंग बुलाई गई.
रीमा ने कहा, ‘‘नेहा थोड़ा एडजस्ट कर यार. नयानया रिश्ता है. वैसे भी लड़के ऐसे ही होते हैं.’’
शालिनी ने राज को सम झाया, ‘‘देख राज तू भी सम झने की कोशिश कर. नेहा नौकरी भी करती है, घर भी देखती है. हैल्प कर दिया कर.’’
कीर्ति ने कहा, ‘‘देखो 40 के बाद शादी की है. 20 साल की आदतें 20 दिन में नहीं बदलतीं. तुम दोनों एकदूसरे को टाइम दो.’’
नेहा झल्लाते हुए बोली, ‘‘टाइम दे रही हूं कीर्ति पर स्पेस कौन देगा मु झे? मेरा मैडिटेशन, मेरी किचन, मेरी सुबह सब डिस्टर्ब है.’’
दोनों को सम झातेसम झाते कौफी ठंडी हो गई. पहली बार गैंग मस्त बातों में नहीं बल्कि टैंशन में उल झा था.
6 महीने बीत गए. राज और नेहा के बीच छोटेछोटे झगड़े अब रोज ही होने लगे थे. कभी ढक्कन बंद क्यों नहीं किया, कभी तौलिया जगह पर क्यों नहीं रखा, कभी फोन काल और कभी रिश्तेदार कारण बनते. नेहा सोचती कि अकेली थी तो सुकून था और इधर राज सोचता कि शादी कर के फंस गया.
फिर आया वह मंगलवार. राज के औफिस से एचआर का मेल आया और उसे अर्जैंट
मीटिंग के लिए तुरंत औफिस बुलाया गया. राज पहुंचा. सामने एचआर हैड, लीगल एडवाइजर और 28 साल की रितिका, जूनियर आर्किटैक्ट बैठे थे.
एचआर ने साफ शब्दों में कहा, ‘‘राज, रितिका ने आप पर फिजिकल ऐक्सप्लौयटेशन और प्रमोशन के बदले फेवर मांगने का आरोप लगाया है. साइट विजिट के दौरान आप ने ऐसा कुछ किया जिस से रितिका असहज हो गई. आप को इस बारे में कुछ कहना है?’’
राज के पैरों तले की जमीन निकल गई. हकलाते हुए बोला, ‘‘व… वह… वह साइट विजिट तो 2 महीने पुरानी है. मैं… मैं ने तो…’’
राज की बात काटते हुए रितिका रोती हुई बोली, ‘‘सर जब मैं फिसली थी तो आप ने मौके का फायदा उठाते हुए मु झे बचाया और फिर मेरी कमर पर हाथ रखा था. फिर आप ने धीरे से मु झे अपने करीब खींच लिया था और कहा था कि प्रोजैक्ट तुम्हें ही मिलेगा अगर मैं आप के साथ एक रात…’’
लीगल एडवाइजर बोला, ‘‘हम पुलिस कंप्लेंट से पहले इंटरनल इन्क्वायरी कर रहे हैं. आप सस्पैंड हैं टिल फर्दर नोटिस.’’
राज औफिस की कैंटीन में बैठा फोन निकालने लगा तो उस के हाथ कांप रहे थे. किस को काल करे? प्रीति को? वह पैनिक कर जाएगी. रीमा को? वे इंप्लौयमैंट ला नहीं जानती.
उस ने नेहा को काल की. पहली बार उस की आवाज में कंपन थी, ‘‘नेहा… मैं… मैं फंस गया हूं.’’
15 मिनट में नेहा टैक्सी से औफिस के नीचे पहुंची. उस का चेहरा पत्थर सा कठोर था. आंखों में आंसू नहीं आग थी.
नेहा ने राज का हाथ पकड़ा, ‘‘घर चलो. रोना बाद में. पहले लड़ना है.’’
घर आ कर नेहा ने पहली काल अपने वकील दोस्त निखिल को की.
निखिल ने हताश स्वर में कहा, ‘‘नेहा, केस सीरियस है. मी टू के
टाइम में कंपनी रिस्क नहीं लेगी. राज को टर्मिनेट कर देंगे.’’
नेहा डटी रही, ‘‘टर्मिनेट तो वे बाद में करेंगे. पहले उन्हें प्रूफ तो देना होगा. साइट विजिट पर कौनकौन था? सीसीटीवी गवाह? ये सब निकालना होगा.’’
नेहा ने औफिस से 15 दिन की छुट्टी ले ली. वकील निखिल के साथ रोज 3 घंटे केस पर डिस्कस करती. पैसों की कमी न हो इस के लिए अपनी एफडी तुड़वाई. इस तरह करीब 8 लाख इकट्ठे किए ताकि लीगल फीस और दूसरे खर्च सही से कर सके.
राज ने उसे टोका तो हंसती हुई बोली, ‘‘अरे यार बाद में फिर से कमा लेंगे.’’
नेहा ने जद्दोजहद कर साइट पर जो लेबर कौंट्रैक्टर था उसे ढूंढ़ा. उस ने स्टेटमैंट दी. ‘‘साहब पूरे विजिट के दौरान मैडम से करीब 10 फुट दूर थे. बीच में मैडम खुद गिरतेगिरते बची थीं. साहब ने पकड़ा नहीं था.’’
नेहा की जूनियर ने रितिका के ऐक्स बौयफ्रैंड से बात की. पता चला रितिका के प्रमोशन की कोई बात ही नहीं हुई थी, राज ने पहले ही उस की जगह किसी और को रिकमैंड कर रखा था. अब रितिका का मोटिव क्लीयर था.
राज और नेहा के गैंग ने भी अपना रोल निभाया. रीमा ने एचआर में अपने कनैक्शन से इंटरनल मेल निकलवाए. कीर्ति ने मीडिया में बात न फैले वह संभाला. शालिनी रोज टिफिन भेजती. काव्या राज के साथ मंडी हाउस जाती और कहती, ‘‘दिमाग फ्रैश रख भाई.’’
इंटरनल इन्क्वायरी कमेटी बैठाई गई.
रितिका चिल्लाई ‘‘ये लोग पावरफुल हैं. मेरी कोई नहीं सुनेगा.’’
नेहा खड़ी हुई. आवाज शांत पर कमरा खामोश, ‘‘मैम मैं नेहा हूं. राज की वाइफ. मैं 40 साल की हूं. 18 साल से एड वर्ल्ड में हूं. मैं ने सैकड़ों पुरुषों के साथ काम किया है. मैं ऐक्सप्लौयटेशन पहचानती हूं. मेरा पति परफैक्ट नहीं हैं. वे तौलिया बैड पर छोड़ते हैं, ढक्कन खुला छोड़ते हैं. फाइल्स इधरउधर फेंक देते हैं. पर वे औरत की इज्जत करना जानते हैं क्योंकि वह मेरी इज्जत करती हैं और प्रूफ यह रहा.’’
उस ने कौंट्रैक्टर का ऐफिडैविट, साइट का प्लान, रितिका के ऐक्स की स्टेटमैंट, ई मेल्स सब टेबल पर रख दिया.
रितिका कई स्टेटमैंट दें कर केस को उल झाना चाहा मगर नेहा के पास हर बात का जवाब था. काफी लंबी बहस और दलीलों को सुनने के बाद इंटरनल कमेटी ने फैसला 1 सप्ताह बाद देना तय किया.
1 हफ्ते बाद राज के ईमेल बौक्स में मेल आया. ‘‘आरोप निराधार हैं और राज को ससम्मान बहाल किया जाता है.’’
बरी होने के बाद की शाम थी. राज और नेहा बालकनी में खड़े थे. दिल्ली की हवा में
अब ठंड नहीं सुकून था. राज ने नेहा का हाथ पकड़ा. पहली बार शादी के 8 महीने बाद उस ने पूरे पैशन के साथ नेहा की हथेली चूमी. नेहा ने मुसकरा कर उस के बालों में हाथ फेरा.
राज भर्राई आवाज में बोला, ‘‘तू नहीं होती न… तो मैं सच में खत्म था नेहा. थैंक यू नहीं बोलूंगा क्योंकि थैंक यू बहुत छोटा शब्द है.’’
नेहा हंसी, ‘‘तो मत बोल. बस कल सुबह 5:30 बजे फोन साइलैंट पर रख देना. वे मेरे लिए थैंक यू होगा.’’
दोनों हंस पड़े. पहली बार झगड़े के बाद वाली नहीं सुकून वाली हंसी थी.
अगली सुबह 5:30 अलार्म नहीं बजा. फोन साइलैंट था. नेहा ने आंखें खोलीं. राज बगल में नहीं था. वह किचन में था. 2 कप ग्रीन टी बना रहा था. डब्बे के ढक्कन टाइट बंद थे.
राज बोला, ‘‘मैडिटेशन के बाद पी लेना. मैं वाक पर जा रहा हूं. 7:30 तक आ जाऊंगा. सुनीता को 8 बजे बुलाया है. साथ नाश्ता करेंगे.’’
नेहा ने कुछ नहीं कहा. उस ने बस उठ कर राज को हग कर लिया.
अगले संडे प्रीति आई. नेहा ने खुद दरवाजा खोला, ‘‘दीदी, आइए आप के रूम
का एसी मैं ने ठीक करवा दिया और हां, आज दाल आप बनाना. राज को आप के हाथ की बनी दाल की बहुत याद आती है. बहुत मिस किया उस ने आप को.’’
प्रीति की आंखें भर आईं. किचन में जातेजाते बोली, ‘‘भाभी, आप से डर लगता था. अब लग रहा है आप जैसी भाभी सब को मिले.’’
सैटरडे वाला गैंग 1 महीने बाद कैफे ब्लू में इकट्ठा हुआ. टेबल पर 10 कौफी थीं.
रीमा मुसकराते हुए बोली, ‘‘तो भाईभाभी, पैचअप हो गया?’’
राज हंसते हुए बोला, ‘‘पैचअप नहीं रीमा, अपग्रेड हो गया. वर्जन 2.0.’’
नेहा भी कम कहां थी. बोली, ‘‘हां. अब बग कम हैं, फीचर ज्यादा.’’
रीमा ने पूछा, ‘‘तो अब पार्टी कब दे रहे हो?’’
राज बोला, ‘‘डन. पर फिल्म मैं चूज करूंगा. ‘‘एडजस्टमैंट’’ नाम की कोई पिक्चर आई है क्या?’’
सब की हंसी कैफे में गूंज गई.
